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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

हयग्रीव अगस्त्य संवाद ] [ १५१

फल होगा और इनका क्या कैसा भी कोई उपाय भी है ? बृहस्पतिजी ने देवराज के इस वाक्य का श्रवण कर फिर उन्होंने धर्मार्थ के सहित परम शुभ वाक्य में उत्तर दिया था ।३३-३४। हे राजन् ! किये हुए कर्मों का फल सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी बिना प्रायश्चित्त और उपभोगों के कभी भी विनाश नहीं होता है ।३५।

इन्द्र उवाच- कर्म वा कीदृशं ब्रह्मन्प्रायश्चित्तं च कीदृशम् । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि तन्मे विस्तरतो वद ॥३६

बृहस्पतिरुवाच- हननस्तेयहिंसाश्च पानमन्यांगनारतिः । कर्म पंचविधं प्राहुर्दुष्कृतं धरणीपतेः ॥३७ ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रगोतुरंगखरोष्ट्रकाः । चतुष्पदोऽण्डजाब्जाश्च तिर्यंचोऽनस्थिकास्तथा ॥३८ अयुतं च सहस्रं च शतं दश तथा दश । दशपंचत्रिरेकार्धमानुपूर्व्यादिदं भवेत् ॥३६ ब्रह्मक्षत्रविशां स्त्रीणामुक्तार्थे पापमादिशेत् । पितृमातृगुरुस्वामिपुत्राणां चैव निष्कृतिः ॥४० गुर्वाज्ञया कृतं पापं तदाज्ञालंघनेऽर्थकम् । दशब्राह्मणभृत्यर्थमेकं हन्याद्द्विजं नृपः ॥४१ शतब्राह्मणभृत्यर्थं ब्राह्मणो ब्राह्मणं तु वा । पंचब्रह्मविदामर्थे वैश्यमेकं तु दंडयेत् ॥४२

इन्द्रदेव ने कहा—हे ब्रह्मन् ! वह कर्म किस प्रकार का है और प्रायश्चित्त कैसा है ? वह सब मैं सुनने का इच्छुक हूँ । वह मुझे विस्तार के साथ बतलाइए ।३६। बृहस्पति जी ने कहा—राजा के लिये पाँच तरह के दुष्कृत कहे गये हैं—किसी का हनन करना—स्तेय (चोरी)—हिंसा—मदिरा पान और अन्य अङ्गना के साथ में रति करना ।३७। ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य, शूद्र, गौ--अश्व, गधा, ऊँट, चतुष्पद--अण्डज--अब्ज—तिर्यक्—

१५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अनास्थिक ये योनियां हैं-इनमें अयुत, सहस्र-शत-दश-दश, पाँच, तीन, एक और आधा क्रम से आरम्भ से अन्त से अन्त तक जन्म धारण करना पड़ता है ।३८-३९। ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य और स्त्रियों का ऊपर में कहे हुए अर्थ में पाप समादिष्ट होता है । पिता-माता-गुरु-स्वामी और पुत्रों की निष्कृति होती है ।४०। गुरु की आज्ञा से कृत पाप उसकी आज्ञालंघन में अर्थ पाता है । राजा को दश ब्राह्मणों की भृति (भरण) के लिए चाहिए कि एक द्विजका हनन कर देवे । तात्पर्य यह है कि यदि दश ब्राह्मणों की जीविका की रक्षा होती है तो एक द्विज का हनन कर देना चाहिए ।४१। सौ ब्राह्मणों की भृति के लिए अथवा ब्राह्मण को ब्राह्मण तथा पाँच ब्रह्म (वेद) के ज्ञाताओं के लिए एक वैश्य को दण्ड राजा को दे देना चाहिए ।४२।

वैश्यं दशविशामर्थे विशां वा दंडयेत्तथा । तथा शतविशामर्थे द्विजमेकं तु दंडयेत् ॥४३

शूद्राणां तु सहस्राणां दंडयेद्ब्राह्मणं तु वा । तच्छतार्थं तु वा वैश्यं तद्दशांशं तु शूद्रकम् ॥४४

बंधूनां चैव मित्राणामिष्टार्थे तु त्रिपादकम् । अर्थकलत्रपुत्रार्थे स्वात्मार्थे न तु किंचन ॥४५

आत्मानं हन्तुमारब्धं ब्राह्मणं क्षत्रियं विशम् । गां वा तुरगमन्यं वा हत्वा दोषैर्न लिप्यते ॥४६

आत्मदारात्मजभ्रातृबंधूनां च द्विजोत्तम । क्रमाद्दशगुणो दोषो रक्षणे च तथा फलम् ॥४७

भूपद्विजश्रोत्रियवेदविद्व्रतोवेदान्तविद्वेदविदां विनाशे । एकद्विपंचाशदथायुतं च स्यान्निष्कृतिश्चेति वदंति संतः ॥४८

तेषां च रक्षणविधौ हि कृते च दाने पूर्वोदितोत्तरगुणं प्रवदन्ति पुण्यम् । तेषां च दर्शनविधौ नमने च कार्ये शुश्रूषणेऽपि चरतां सदृशांश्च तेषाम् ॥४९

हयग्रीव अगस्त्य संवाद ] [ १५३

दस वैश्यों की सुरक्षा के लिये एक वैश्य अथवा वैश्यों को दण्ड दे देना चाहिए। अथवा शत (सौ) वैश्यों का हित सम्पादन होता हो तो एक द्विज को दण्ड दे देना चाहिए ॥४३॥ सहस्त्र शूद्रों के लिए अथवा ब्राह्मण को दण्डित करे। उसके शतार्ध वैश्य को या उसका दशार्ध शूद्र को दण्ड देवे ॥४४॥ बन्धुओं के और मित्रों के अभीष्ट अर्थ में त्रिपाद अर्थात् तीन भाग में और कलत्र तथा पुत्र के लिए भी तीन भाग अर्थ का करे अपनी आत्मा के लिए कुछ भी न करे ॥४५॥ जो आत्मा को अर्थात् अपने को हनन करना आरम्भ करे वह चाहे ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य कोई भी हो अथवा अश्व—गो या अन्य को मारता हो तो उसका हनन करके भी दोषों से लिप्त नहीं होता है ॥४६॥ हे द्विज श्रेष्ठ ! अपनी स्त्री-पुत्र-भाई और बन्धु का हनन करने में दशगुना दोष होता है और रक्षा करने में उतना ही फल भी होता है ॥४७॥ राजा—द्विज—श्रोत्रिय—वेदवेत्ता—व्रती—वेदान्त ज्ञाता और वेदों के मनीषी के विनाश करने में एक-दो-पचास और अयुत गुनी निष्कृति (प्रायश्चित्त) होता है—ऐसा सन्त पुरुष कहते हैं ॥४८॥ और इनकी रक्षा करने की विधि में और दान करने में पूर्व में जो कहा है उससे उत्तर गुना पुण्य कहते हैं। उनके दर्शन की विधि में तथा नमन करने में तथा इनकी सुश्रूषा करने में और इनके सदृश समाचरण करने वालों की भी शुश्रूषा आदि करने में भी वैसा ही फल होता है ॥४९॥

सिंहव्याघ्रमृगादीनि लोकहिंसाकराणि तु ।
नृपो हन्याच्च सततं देवार्थे ब्राह्मणार्थके ॥५०
आपत्स्वात्मार्थके चापि हत्वा मेध्यानि भक्षयेत् ॥५१
नात्मार्थे पाचयेदन्नं नात्मार्थे पाचयेत्पशून् ।
देवार्थे ब्राह्मणार्थे वा पचमानो न लिप्यते ॥५२
पुरा भगवती माया जगदुज्जीवनोन्मुखी ।
ससर्ज सर्वदेवांश्च तथैवासुरमानुषान् ॥५३
तेषां संरक्षणार्थाय पशूनपि चतुर्दश ।
यज्ञांश्च तद्विधानानि कृत्वा चैनानुवाच ह ॥५४

सिंह-व्याघ्र और मृग आदि जो लोगों की हिंसा करने वाले हैं उनको राजा देवों के तथा ब्राह्मणों के लिए निरन्तर हनन कर सकता है ॥५०॥

१५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

आवृत्ति के समय में अपने लिए भी हनन करके मेघों (पवित्रों) का भक्षण कर लेवे ।५१। अपने अन्न का पाचन न करे और पशुओं का भी पाचन नहीं करना चाहिए। देवों तथा ब्राह्मणों के लिये यदि पकाया भी जावे तो शेष से लिप्त नहीं होता है ।५२। पहिले इस जगत् के उज्जीवन की ओर प्रवृत्ति वाली भगवती माया ने देवों—असुरों और मानवों का सृजन किया था । उनकी रक्षा के लिए चौदह पशुओं की भी रचना की थी उसी भाँति यज्ञों की तथा उनके विधानों की भी रचना करके इनको बताया था ।५३-५४।


स्तेयपान वर्णन

इन्द्र उवाच—
भगवन्सर्वमाख्यातं हिंसाद्यस्य तु लक्षणम् ।
स्तेयस्य लक्षणं किं वा तन्मे विस्तरतो वद ॥१

बृहस्पतिरुवाच—
पापानामधिकं पापं हननं जीवजातिनाम् ।
एतस्मादधिकं पापं विश्वस्ते शरणं गते ॥२

विश्वस्य हत्वा पापिष्ठं शूद्रं वाप्यंत्यजातिजम् ।
ब्रह्महत्याधिकं पापं तस्मान्नास्त्यस्य निष्कृतिः ॥३

ब्रह्मज्ञस्य दरिद्रस्य कृच्छ्रार्जितधनस्य च ।
बहुपुत्रकलत्रस्य तेन जीवितुमिच्छतः ।
तद्द्रव्यस्तेयदोषस्य प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४

विश्वस्तद्रव्यहरणं तस्याप्यधिकमुच्यते ।
विश्वस्ते वाप्यविश्वस्ते न दरिद्रधनं हरेत् ॥५

ततो देवद्विजातीनां हेमरत्नापहारकम् ।
यो हन्यादविचारेण सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥६

गुरुदेवद्विजसुहृत्पुत्रस्वात्मसुखेषु च ।
स्तेयादधः क्रमेणैव दशोत्तरगुणं त्वघम् ॥७

स्तेयपान वर्णन ] [ १५५

इन्द्र देव ने कहा—हे भगवन् ! आपने हिंसादि का सम्पूर्ण लक्षण बता दिया है। अब स्तेय का क्या लक्षण है—यह भी आप मेरे सामने विस्तार के साथ वर्णन कीजिए ।१। समस्त पापों में अधिक पाप जीव जातियों का हनन करना ही होता है। इससे भी अधिक पाप उसके हनन करने का होता है जो विश्वस्त होवे तथा शरण में समागत हो गया हो ।२। विश्वास देकर पापिष्ठ शूद्र वा अन्त्य जातिज हो जो उसका हनन करता है वह ब्रह्म हत्या से भी अधिक पाप होता है जिसका कोई भी प्रायश्चित्त ही नहीं होता है ।३। जो ब्रह्मज्ञ हो—दरिद्र हो और बड़ी ही कठिनाई से जिसने धन का अर्जन किया हो तथा बहुत पुत्रों और कलत्र वाला हो एवं उसी धन से जो जीवित रहने की इच्छा रखता हो उसके द्रव्य की चोरी इतना महान दोष होता है कि फिर उसका कोई भी प्रायश्चित्त नहीं होता है ।४। जो विश्वस्त हो उसके द्रव्य के हरण करने का पाप उससे भी अधिक होता है। विश्वस्त हो अथवा अविश्वस्त हो दरिद्र के धन का हरण कभी नहीं करना चाहिए ।५। देवों और द्विजातियों के सुवर्ण तथा रत्नों के अपहरण करने वाले को जो बिना ही विचार किये मार डालता है उसको अश्वमेध यज्ञ का पुण्य-फल प्राप्त होता है ।६। गुरु-देव-द्विज-पुत्र-और आत्म सुख के धन की चोरी करता है उसका अधःक्रम से ही दश गुना उत्तर अघ होता है ।७।

अन्त्यजात्पादजाद्वैश्यात्क्षत्रियाद्ब्राह्मणादपि । दशोत्तरगुणैः पापैर्लिप्यते धनहारकः ॥८ अत्रैवोदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । रहस्यातिरहस्यं च सर्वपापप्रणाशनम् ॥९ पुरा कांचीपुरे जातो वज्राख्यो नाम चोरकः । तस्मिन्पुरवरे रम्ये सर्वैश्वर्यसमन्विताः । सर्वे नीरोगिणो दांताः सुखिनो दययांचिताः ॥१० सर्वैश्वर्यसमृद्धेऽस्मिन्नगरे स तु तस्करः । स्तोकास्तोकक्रमेणैव बहुद्रव्यमपाहरत् ॥११ तदरण्येऽवटं कृत्वा स्थापयामास लोभतः । तद्गोपनं निशार्धायं तस्मिन्दूरं गते सति ॥१२ किरातः कश्चिदागत्य तं दृष्ट्वा तु दशांशतः । जहाराविदितस्तेन काष्ठभारं वहन्ययौ ॥१३

१५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सोऽपि तच्छिलयाच्छाद्य मृद्भिरामूर्य यत्नतः । पुनश्च तत्पुरं प्रायाद्वज्रोऽपि धनतृष्णया ॥१४

अन्त्यज-शूद्र-वैश्य-क्षत्रिय और ब्राह्मण से भी दश गुणोत्तर पापों से धन के हरण करने वाला लिप्त हुआ करता है ।८। इस विषय में एक पुराना इतिहास उदाहृत करते हैं। यह रहस्यों का भी अधिक रहस्य है और पापों का विनाश कर देने वाला है ।६। प्राचीन काल में काञ्चीपुर में एक वज्र नाम वाला चोर उत्पन्न हुआ था। वह पुर ऐसा था कि वहाँ पर बड़ी रम्यता थी और वहाँ के निवासी जन सभी प्रकार के ऐश्वर्य से युक्त—नीरोग—दान्त—सुखी—और दयान्वित थे ।१०। यह नगर सब तरह के ऐश्वर्य से समन्वित था उससे वह तस्कर ने स्तोकास्तोक अर्थात् न्यूनाधिक क्रम से बहुत से धन का अपहरण किया था ।११। उसको वह जङ्गल में एक गड्ढा बनाकर लोभ से रख दिया करता था । उसका गोपन आधी रात में किया करता था । जब धन रख चला गया था तब किसी किरात ने वहाँ आकर उसको देखा था उसका दशम भाग उसमें से किरात ने ले लिया था। वह तस्कर इसको नहीं जान पाया था। वह किरात तो काष्ठ का भार लेकर चला गया था ।१२-१३। वह तस्कर भी एक शिला से उस गड्ढे को ढक कर और मिट्टी से भरकर फिर उसी नगर में धन की तृष्णा से चला गया था ।१४।

एवं बहुधनं हृत्वा निश्चिक्षेप महीतले ।
किरातोऽपि गृहं प्राप्य बभाषे मुदितः प्रियां ॥१५
मया काष्ठं समाहर्तुं गच्छता पथि निर्जने ।
लब्धं धनमिदं भीरु समाधत्स्व धनार्थिनि ॥१६
तच्छ्रुत्वा तत्समादाय निधायाभ्यंतरे ततः ।
चिंतयंती ततो वाक्यमिदं स्वपतिमब्रवीत् ॥१७
नित्यं संचरते विप्रो मामकानां गृहेषु यः ।
मां विलोक्यैवमचिराद् बहुभाग्यवती भवेत् ॥१८
चातुर्वर्ण्यासु नारीषु स्थेयं चेद्राजवल्लभा ।
किं तु भिल्ले किराते च शैलूषे चांत्यजातिजे ।
लक्ष्मीर्न तिष्ठति चिरं शाताद्वल्मीकजन्मनः ॥१९॥

स्तेयपान वर्णन ] [ १५७

तथापि बहुभाग्यानां पुण्यानामपि पात्रिणे । दृष्टपूर्वं तु तद्वाक्यं न कदाचिद्वृथा भवेत् ॥२० अथ वात्मप्रयासेन कृच्छ्राद्यल्लभ्यते धनम् । तदेव तिष्ठति चिरादन्यद्गच्छति कालतः ॥२१

इस रीति से बहुत सा धन चोर कर वज्र ने भूमि में रख दिया उस किरात ने भी घर में आकर प्रसन्न होते हुए अपनी पत्नी से कहा था ।१५। मैंने काष्ठ का समाहरण करने के लिए वन में गमन करते हुए मार्ग में यह धन प्राप्त किया है । हे भीरु ! आपको तो धन की इच्छा है इसे अब अपने पास रक्खो ।१६। यह श्रवण करके उसने उस धन को ले लिया था और घर में अन्दर रख दिया था । फिर मन में कुछ चिन्तन करती हुई उसने अपने पति से यह वाक्य कहा था ।१७। जो यह विप्र हमारे घरों में नित्य ही सञ्चरण किया करता है । वह मुझ को देखकर कि यह थोड़े ही समय में बहुत भाग्य वाली हो गई है । चारों वर्णों की नारियों में यह यदि राज वल्लभा हो-ऐसा ही कहेंगे । किन्तु भील-किरात-शैलूष और अन्त्य जातीय पुरुष में वाल्मीकि के शापसे यह लक्ष्मी अधिक समय तक नहीं स्थित रहा करती है ।१८-१६। तो भी बहुत भाग्य वाले पुण्यों के पात्र के लिए यह वाक्य पूर्व में देखा गया है और यह कभी भी वृथा नहीं होता ।२०। अथवा जो धन अपने प्रयास से कष्ट के साथ प्राप्त किया जाता है वह ही धन स्थिर होता है और अधिक समय पर्यन्त ठहरता है । इसके अतिरिक्त जो अनायास मिल जाता है वह कुछ ही समय में चला जाया करता है ।२१।

स्वयमागतवित्तं तु धर्मार्थेविनियोजयेत् । कुरुष्वैतेन तस्मात्त्वं वापीकूपादिकाञ्छुभान् ॥२२ इति तद्वचनं श्रुत्वा भाविभाग्यप्रबोधितम् । बहूदकसमं देशं तत्रकव्यलोथयत् ॥२३ निर्ममेऽथ महेंद्रस्य दिग्भागे विमलोदकम् । सुबहुद्रव्यसंसाध्यं तटाकं चाक्षयोदकम् ॥२४ दत्तेषु कर्मकारिभ्यो निखिलेषु धनेषु च । असंपूर्ण तु तत्कर्म दृष्ट्वा चिंताकुलोऽभवत् ॥२५

१५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तं चौरं वज्रनामानमज्ञातोऽनुचराम्यहम् । तेनैव बहुधा क्षिप्तं धनं भूरि महीतले ॥२६ स्तोकं स्तोकं हरिष्यामि तत्र तत्र धनं बहु । इति निश्चित्य मनसा तेनाज्ञातस्तमन्वगात् ॥२७ तथैवाहृत्य तद्द्रव्यं तेन सेतुमपूरयत् । मध्ये जलावृतस्तेन प्रसादश्चापि शाङ्गिणः ॥२८

यह धन तो बिना ही श्रम के आपके पास आगया है। इसका तो धर्मार्थ आपको विनियोग करना चाहिए। अतः आप इस धन से शुभ कर्म बावड़ी—कूप और तालाब आदि के निर्माण करने में व्यय कर दीजिए ।२२। अपनी पत्नी के इस वचन का श्रवण करके जो कि आगे होने वाले भाग्य को सुबोधित करने वाला था उस किरात ने जहाँ-तहाँ पर देखा या कि सभी स्थल अधिक जल वाले थे ।२३। फिर ऐन्द्री दिशा में उसने एक विमल उदक वाला तलाब जो बहुत अधिक धन से बनाये जाने वाला था बनवाया था जिसमें जल कभी भी क्षीण नहीं होता था ।२४। सम्पूर्ण धन काम करने बालों को दे देने पर भी वह काम अपूर्ण देखकर वह चिन्ता से बेचैन हो गया था ।२५। उसने सोचा कि उस वज्र नामक चोर के पीछे उसके बिना जाने हुए मैं गमन करूँ । उसने ही प्रायः भूमि में अधिक धन डाला ही होगा ।२६। वहाँ-वहाँ से ही थोड़ा-थोड़ा करके बहुत-सा धन हरण करूँगा । ऐसा ही मन में निश्चय करके वह उसके बिना जाने हुए उसी के पीछे गया था ।२७। उसी भाँति से उसने उस धन का आहरण किया था और उस सेतु को पूर्ण कर दिया था। उस तालाब के मध्य में जिसके चारों ओर जल था, एक भगवान् विष्णु का प्रासाद भी बनवाया था ।२८।


अमृत मन्थन वर्णन

इन्द्र उवाच- भगवन्सर्वधर्मज्ञ त्रिकालज्ञानवित्तम । दुष्कृतं तत्प्रतीकारो भवता सम्यगीरितः ॥१ केन कर्मविपाकेन ममापदियमागता । प्रायश्चित्तं च किं तस्य गदस्व वदतां वर ॥२

अमृत मंथन वर्णन ] [ १५६

बृहस्पतिरुवाच- काश्यपस्य ततो जज्ञे दित्यां दनुरिति स्मृतः । कन्या रूपवती नाम धात्रे तां प्रददौ पिता ॥३ तस्याः पुत्रस्ततो जातो विश्वरूपो महाद्युतिः । नारायणपरो नित्यं वेदवेदांगपारगः ॥४ ततो दैत्येश्वरो वव्रे भृगुपुत्रं पुरोहितम् । भवानधिकृतो राज्ये देवानामिव वासवः ॥५ ततः पूर्वे च काले तु सुधर्मायां त्वयि स्थिते । त्वया कश्चित्कृतः प्रश्नः ऋषीणां सन्निधौ तदा ॥६ संसारस्तीर्थयात्रा वा कोऽधिकोऽस्ति तयोर्गुणः । वदंतु तद्विनिश्चित्य भवन्तो मदनुग्रहात् ॥७

इन्द्र देव ने कहा—हे भगवन् ! आप तो सभी धर्मों के ज्ञान रखने वाले हैं और भूत वर्त्तमान और भविष्य के ज्ञान वाले हैं । आपने दुष्कृत और उसका प्रतीकार भली भांति से वर्णित कर दिया है ।१। अब आप मुझे यही बताने की कृपा करें मुझे यह आपत्ति किस कर्म के विपाक से प्राप्त हुई है और इसका प्रायश्चित्त क्या हो सकता है ? आप तो बोलने वालों में भी परम श्रेष्ठ हैं ।२। बृहस्पतिजी ने कहा—काश्यप मुनि की पत्नी दिति में दनु नाम वाली कन्या ने जन्म ग्रहण किया था । वह कन्या रूपवती थी । पिता ने उसको धाता को दी थी ।३। उसका पुत्र फिर महती द्युति वाला विश्व-रूप उत्पन्न हुआ था वह भगवान् नारायण में ही परायण था तथा वेद वेदाङ्गों का पारगामी विद्वान था ।४। इसके उपरान्त उस दैत्येश्वर ने भृगु के पुत्र पुरोहितजी से कहा था कि आप देवों में वासव की ही भांति राज्य में अधिकृत हैं ।५। फिर पूर्वकाल में देवों की सभा में आप जब स्थित थे तब आपने ऋषियों की सन्निधि में कोई प्रश्न किया था ।६। संसार अथवा तीर्थ यात्रा इन दोनों में कौन अधिक गुण वाला है । अब आप मेरे पर अनुग्रह करके उसका निश्चय करके मुझे बतलाइए ।७।

तत्प्रश्नस्योत्तरं वक्तुं ते सर्व उपचक्रिरे । तत्पूर्वमेव कथितं मया विधिबलेन वै ॥८

१६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तीर्थयात्रा समधिका संसारादिति च द्रुतम् ।
तच्छ्रुत्वा ते प्रकुपिताः शेपुर्मामृषयोऽखिलाः ॥६
कर्मभूमिं व्रजेः शीघ्रं दारिद्र्येण मितैः सुतैः ।
एवं प्रकुपितैः शप्तः खिन्नः कांचीं समाविशम् ॥१०
पुरीं पुरोधसा हीनां वीक्ष्य चिंताकुलात्मना ।
भवता सह देवैस्तु पौरोहित्यार्थमादरात् ॥११
प्राथितो विश्वरूपस्तु बभूव तपतां वरः ।
स्वस्त्रीयो दानवानां तु देवानां च पुरोहितः ॥१२
नात्यर्थमकरोद्वैरं दैत्येष्वपि महातपाः ।
बभूवतूस्तुल्यबलौ तदा दैत्येन्द्रवासवौ ॥१३
ततस्त्वं कुपितो राजन्स्वस्त्रीयं दानवेशितुः ।
हंतुमिच्छन्नगाश्चाशु तपसः साधनं वनम् ॥१४

उस प्रश्न का उत्तर बताने के लिए उनने सबने उपक्रम किया था। उसके पूर्व ही मैंने विधाता के बल से पूर्व में ही शीघ्र कहा था कि तीर्थयात्रा संसार से समधिक है। यह सुनकर वे सब ऋषिगण बहुत प्रकुपित हो गये थे और उन्होंने मुझको शाप दे दिया था ।८-६। कर्म भूमि में मित सुतों के सहित दरिद्रता से युक्त होकर गमन कर जाओ। इस तरह कुपित ऋषियों के द्वारा शाप दिया हुआ मैं काञ्ची में प्रवेश कर गया था ।१०। चिन्ता से विकल पुरोहितजी ने हीन पुरी का अवलोकन करके आपके द्वारा देवों के सहित बड़े ही आदर से पौरोहित्य कर्म के लिए उनसे प्रार्थना की गयी थी ।११। तापसों में श्रेष्ठ विश्व रूप से जब प्रार्थना की गयी थी तो वह दानवों का तो बहिन का पुत्र था और देवों का पुरोहित था ।१२। उस महान् तपस्वी ने दैत्यों में भी अत्यधिक वैर नहीं किया था। उस समय में दैत्येन्द्र और इन्द्र दोनों तुल्य बल वाले हुए थे ।१३। इसके पश्चात् हे राजन् ! दानवेश्वर के स्वस्रीय पर आप कुपित हो गये थे और उसका हनन करने की इच्छा रखते हुए शीघ्र ही तप के साधन वन में चला गया था ।१४।

तमासनस्थं मुनिभिस्त्रिशृंगमिव पर्वतम् ।
त्रयी मुखरदिग्भागं ब्रह्मानन्दैकनिष्ठितम् ॥१५

अमृत मंथन वर्णन ] [ १६१

सर्वभूतहितं तं तु मत्वा चेशानुकूलितः । शिरांसि यौगपद्येन छिन्नान्यासस्तवैव तु ॥१६ तेन पापेन संयुक्तः पीडितश्च मुहुर्मुहुः । ततो मेरुगुहां नीत्वा बहूनब्दान्हि संस्थितः ॥१७ ततस्तस्य वचः श्रुत्वा ज्ञात्वा तु मुनिवाक्यतः । पुत्रशोकेन संतप्तस्त्वां शशाप रुषान्वितः ॥१८ निः श्रीको भवतु क्षिप्रं मम शापेन वासवः । अनाथकास्ततो देवा विषण्णा दैत्यपीडिताः ॥१९ त्वया मया च रहिताः सर्वे देवाः पलायिताः । गत्वा तु ब्रह्मसदनं नत्वा तद्वृत्तमूचिरे ॥२० ततस्तु चितयामास तदघस्य प्रतिकियाम् । तस्य प्रतिक्रियां वेत्तुं न शशाकात्मभूस्तदा ॥२१

मुनियों के साथ आसन पर स्थित उसको तीन शिखरों वाले पर्वत के समान वेदत्रयी से दिशाओं का भाग मुखरित हो रहा था और वह ब्रह्मानन्द में एकनिष्ठ था तथा सब भूतों का हितकर था उसको ऐसा मान कर ईशानुकूलित था। आपने ही एक साथ उसके शिरों को काट दिया था ।१५-१६। उस पाप से संयुत बार-बार पीड़ित हैं। फिर मेरु की गुहा में जाकर बहुत वर्षों तक रहा था।१७। इसके अनन्तर उसके वचन का श्रवण करके और मुनि के वाक्य से ज्ञान प्राप्त करके पुत्र शोक से सन्तप्त होकर क्रोध से समन्वित उसने आपको शाप दे दिया था ।१८। इन्द्र मेरे शाप से शीघ्र ही श्री से विहीन हो जावे। फिर सभी देवगण बिना नाथ वाले हो गये थे और विषाद से युक्त हो गये थे तथा दैत्यों के द्वारा उत्पीड़ित हो गये थे ।१९। तुम्हारे द्वारा और मेरे द्वारा रहित सभी देव भाग गये थे। वे सब देवगण ब्रह्माजी के निवास स्थान में जाकर प्रणाम करके सम्पूर्ण वृत्त उनसे कह दिया था ।२०। इसके पश्चात् ब्रह्माजी ने उसके पाप की प्रतिक्रिया का चिन्तन किया था किन्तु उस समय में ब्रह्माजी उसकी कोई भी प्रतिक्रिया न जान सके थे ।२१।

ततो देवैः परिवृतो नारायणमुपागमन् ॥२२

१६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

नत्वा स्तुत्वा चतुर्वक्त्रस्तद्वृत्तांतं व्यजिज्ञपत् । विचिंत्य सोऽपि बहुधा कृपया लोकनायकः ॥२३ तदघं तु त्रिधा भित्वा त्रिषु स्थानेष्वथार्पयत् । स्त्रीषु भूम्यां च वृक्षेषु तेषामपि वरं ददौ ॥२४ तदा भर्तृ समायोगं पुत्रावाप्तिमृतुष्वपि । छेदे पुनर्भवत्वं तु सर्वेषामपि शाखिनाम् ॥२५ खातपूर्ति धरण्याश्च प्रददौ मधुसूदनः । तेष्वघं प्रबभूवाशु रजोनियांसमूषरम् ॥२६ निर्गतो गह्वरात्तस्मात्त्वमिन्द्रो देवनायकः । राज्यश्रियं च संप्राप्तः प्रसादात्परमेष्ठिनः ॥२७ तेनैव सांत्वितो धाता जगाद च जनार्दनम् । मम शापो वृथा न स्यादस्तु कालांतरे मुने ॥२८

इसके अनन्तर जब कोई भी प्रतिक्रिया समझ में नहीं आयी तो ब्रह्माजी देवों से घिरे हुए ही भगवान् नारायण के समीप में पहुँचे थे ।२२। सर्व प्रथम उन्होंने नारायण को प्रणाम किया था फिर स्तुति की थी ओर इसके उपरान्त यह वृत्तान्त उनकी सेवा में कहा था । उन लोकों के नायक प्रभु ने कृपाकर बहुत विचिन्तिन करके विचार किया था ।२३। उसके अघ को तीन भागों में विभक्त करने तीन स्थानों में अर्पित कर दिया था । स्त्रियों में—वृक्षा में और भूमि में उसको रख दिया था और उनको वरदान भी दिया था । उस अघ के देने के बदले में ही तीनों को तीन वरदान दिये थे । ।२४। उस समय में जब ऋतुकाल हो तो स्वामी के साथ संयोग से पुत्र की प्राप्ति हो जायगी । वृक्षों का छेदन में पुनः जन्म धारण कर लेना हो जायग। ।२५। भूमि में गर्त्त कर दिया जाये तो वह अपने आप ही कुछ समय में भर जायग।—ये तीनों को तीन वरदान मधुसूदन प्रभु ने दिये थे । उसका अघ शीघ्र ही तीनों में प्रभूत हो गया था—स्त्रियों ये रजोधर्शन-वृक्षों में गोद और भूमि में ऊपर में उसी अघ के कारण हुआ था ।२६। तुम इन्द्र उस गहन अघ से निकल गये थे और देव नायक के फिर परमेष्ठी के प्रसाद से राज्य की श्री को प्राप्त करने वाले हो गये थे ।२७। उसके द्वारा धाता को इस प्रकार सान्त्वना दी थी और जनार्दन प्रभु से कहा था । हे मुने ! मेरा शाप वृथा नहीं होगा और अन्य काल में होगा ।२८।

अमृत मंथन वर्णन ] [ १६३

भगवांस्तद्वचः श्रुत्वा मुनेरमिततेजसः ।
प्रहृष्टो भाविकार्यज्ञस्तूष्णीमेव तदा ययौ ॥२६
एतावंतमिमं कालं त्रिलोकीं पालयन्भवान् ।
ऐश्वर्यमदमत्तत्वात्कैलासाद्रिमपीडयत् ॥३०
सर्वज्ञेन शिवेनाथ प्रेषितो भगवान्मुनिः ।
दुर्वासास्त्वन्मदभ्रंशं कर्त्तुकामा शशाप ह ॥३१
एकमेव फलं जातमुभयोः शापयोरपि ।
अधुना पश्यनिःश्रीकं त्रैलोक्यं समजायत ॥३२
न यज्ञाः संप्रवर्त्तंते न दानानि च वासव ।
न यमा नापि नियमा न तपांसि च कुत्रचित् ॥३३
विप्राः सर्वेऽपि निःश्रीका लोभोपहतचेतसः ।
निःसत्वा धैर्यहीनाश्च नास्तिकाः प्रायशोऽभवन् ॥३४
निरोषधिरसा भूमिर्निीवीर्या जायतेतराम् ।
भास्करो धूसराकारश्चन्द्रमाः कांतिवर्जितः ॥३५

उन अपरिमित तेज वाले मुनि के इस वचन का श्रवण करके भगवान उस समय में चुप चाप ही वहाँ से चले गये थे क्योंकि ये तो आगे होने वाले कार्य का ज्ञान रखने वाले थे।२६। आप इतने समय तक त्रिलोकी का पालन करते हुए ऐश्वर्य के मद से मत्तता होने के कारण से आपने कैलाश पर्वत को पीड़ित किया था।३०। इसके अनन्तर सर्वज्ञ भगवान शिव ने भगवान मुनि को भेजा था। दुर्वासा जी ने आपके मद को भ्रंश करने की ही इच्छा से शाप दिया था।३१। इन दोनों शापों का एक फल हुआ है। अब देखिए यह त्रैलोक्य श्री से रहित हो गया।३२। हे वासव ! न तो अब यज्ञ संप्रवृत्त हो हो रहे हैं और न दान ही दिये जा रहे हैं और इस समय में तो कहीं पर भी यम-नियम और तपश्चर्या कुछ भी नहीं हैं।३३। सभी विप्र श्री से रहित हैं और इनके हृदय में लोभ ऐसा बैठ गया है कि इनका चित्त उपहत सा हो गया है। इनमें सत्व नाम मात्र को भी नहीं है—ये धैर्य से हीन हो गये हैं तथा बहुधा ये सब नास्तिक हो गये हैं। जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते हैं वे नास्तिक होते हैं।३४। यह

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भूमि औषधियों के रस से विहीन है और अधिकतया वीर्य हीना हो गयी है। यह सूर्य भी धूसर आकार वाला है तथा चन्द्रमा में कान्ति का अभाव दिखाई देना है ।३५।

निस्तेजस्को हविर्भोक्ता मरुद्धूलिकृताकृतिः । न प्रसन्ना दिशां भागा नभो नैव च निर्मलम् ॥३६ दुर्बला देवताः सर्वा विभांत्यन्यादृशा इव । विनष्टप्रायमेवास्ति त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥३७ हयग्रीव उवाच- इत्थं कथयतोरेव बृहस्पतिमहेंद्रयोः । मलकाद्या महादैत्याः स्वर्गलोकं बबाधिरे ॥३८ नंदनोद्यानमखिलं चिच्छिदुर्बलगर्विताः । उद्यानपालकान्सर्वानायुधैः समताडयन् ॥३९ प्राकारमवभिद्यैव प्रविश्य नगरांतरम् । मंदिरस्थान्सुरान्सर्वानत्यंतं पर्यपीडयन् ॥४० आजह्लू रप्सरोरत्नान्यशेषाणि विशेषतः । ततो देवाः समस्ताश्च चक्रुर्भृशमबाधिताः ॥४१ तादृशं घोषमाकर्ण्य वासवः प्रोज्झितासनः । सर्वैरनुगतो देवैः पलायनपरोऽभवत् ॥४२

हवि का भोक्ता अग्नि तेजसे शून्य है तथा मरुत् धूलि कृत आकृति वाला है। समस्त दिशायें प्रसन्न नहीं हैं और नभो मण्डल में निर्मलता का अभाव है ।३६। सब देवगण भी परम दुर्बल कुछ और ही जैसे विभात हो रहे हैं। यह पूर्ण चराचर त्रैलोक्य विनष्ट युग्म सा ही हो गया है ।३७। हय- ग्रीवजी ने कहा—इस रीति से वृहस्पति और महेन्द्र आलाप कर ही रहे थे कि महान दैत्यों ने स्वर्ग को बाधित कर दिया था ।३८। बल के गर्व वाले दैत्यों ने नन्दन वन को पूर्णतया छेदन कर दिया था। जो उद्यान के पालक थे उन सबको दैत्यों ने आयुधों से प्रताड़ित किया था ।३९। जो स्वर्ग के चारों ओर प्राकार भित्ति थी उसका भेदन करके नगर के भीतर प्रवेश कर गये थे। अन्दर जो मन्दिरों में संस्थित देवगण थे उनको अत्यन्त ही पीड़ित

अमृत मंथन वर्णन ] [ १६५

किया था ॥४०॥ विशेष रूप से जो रत्नों के समान अप्सराएँ थीं उनका हरण कर लिया था। इसके उपरान्त सभी देवगण बहुत ही बाधित कर दिए थे ॥४१॥ उस प्रकार का जो बड़ा भारी शोर हुआ था उसको सुनकर इन्द्र ने अपना आसन त्याग दिया था और सब देवों के साथ में वहाँ से भाग जाने में तत्पर हो गया था ॥४२॥

ब्राह्मं धाम समभ्येत्य विषण्णवदनो वृषा ।
यथावत्कथयामास निखिलं दैत्यचेष्टितम् ॥४३
विधातापि तदाकर्ण्य सर्वदेवसमन्वितम् ।
हतश्रीकं हरिहयमालोक्येदमुवाच ह ॥४४
इन्द्रत्वमखिलैर्देवैर्मु कुन्दं शरणं व्रज ।
दैत्यारातिर्जगत्कर्ता स ते श्रेयो विधास्यति ॥४५
इत्युक्तवा तेन सहितः स्वयं ब्रह्मा पितामहः ।
समस्तदेवसहितः क्षीरोदधिमुपाययौ ॥४६
अथ ब्रह्मादयो देवा भगवन्तं जनार्दनम् ।
तुष्टुवुर्वाग्विरिष्ठाभिः सर्वलोकमहेश्वरम् ॥४७
अथ प्रसन्नो भगवान्वासुदेवः सनातनः ।
जगाद सकलान्देवाञ्जगद्रक्षणलंपटः ॥४८
श्रीभगवानुवाच-
भवतां सुविधास्यामि तेजसंवोपबृंहणम् ।
यदुच्यते मयेदानीं युष्माभिस्तद्विधीयताम् ॥४६

ब्रह्माजी के धाम में जाकर विषाद से युक्त मुख वाले इन्द्र ने जो कुछ भी दैत्यों ने किया था वह सभी ज्यों का त्यों कह दिया था ॥४३॥ विधाता भी उसको सुनकर सब देवों के सहित और हतश्री वाले हरिहय को देखकर यह बोले थे ॥४४॥ हे इन्द्र ! अब आप सब देवों के साथ भगवान् मुकुन्द की शरण में चले जाओ। वही दैत्यों के विनाशक और इस जगत के कर्त्ता हैं और वही तुम्हारा कल्याण करेंगे ॥४५॥ इतना कहकर पितामह ब्रह्माजी उसके तथा समस्त देवों के सहित क्षीर सागर में गये थे ॥४६॥ इसके अनन्तर ब्रह्मा आदि देवों ने भगवान् जनार्दन की जो सब लोकों के महेश्वर हैं बहुत

१६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ही श्रेष्ठ वाणियों के द्वारा स्तुति की थी ।४७। इसके अनन्तर सनातन वासु- देव भगवान् प्रसन्न हुए थे और इस जगत की रक्षा करने में विशेष संसक्त प्रभू ने सम्पूर्ण देवों से कहा था ।४८। श्री भगवान् ने कहा—आप लोगों का उपवृंहण में तेज के ही द्वारा कर दूँगा । अब मेरे द्वारा जो भी कहा जाता है आप लोगों को वह करना चाहिए ।४९।

ओषधिप्रवराः सर्वाः क्षिपत क्षीरसागरे ।
असुरैरपि संधाय सममेव च तैरिह ॥५०
मंथानं मंदरं कृत्वा कृत्वा योक्त्रं च वासुकिम् ।
मयि स्थिते सहाये तु मथ्यताममृतं सुराः ॥५१
समस्तदानवाश्चापि वक्तव्याः सांत्वपूर्वकम् ।
सामान्यमेव युष्माकमस्माकं च फलं त्विति ॥५२
मथ्यमाने तु दुग्धाब्धौ या समुत्पद्यते सुधा ।
तत्पानाद् बलिनो यूयममर्त्याश्च भविष्यथ ॥५३
यथा दैत्याश्च पीयूषं नैतत्प्राप्स्यंति किंचन ।
केवलं क्लेशवंतश्च करिष्यामि तथा ह्यहम् ॥५४
इति श्रीवासुदेवेन कथिता निखिलाः सुराः ।
संधानं त्वतुलैर्दैत्यैः कृतवंतस्तदा सुराः ।
नानाविधौषधिगणं समानीय सुरासुराः ॥५५
क्षीराब्धिपयसि क्षिप्त्वा चंद्रमोऽधिकनिर्मलम् ।
मन्थानं मंदरं कृत्वा कृत्वा योक्त्रं तु वासुकिम् ।
प्रारेभिरे प्रयत्नेन मंथितुं यादसां पतिम् ॥५६

इस क्षीर सागर में आप लोग असुरों के भी साथ में सन्धि अर्थात् मेल-जोल करके सब उनके भी साथ में समस्त परम श्रेष्ठ ओषधियाँ डाल दो ।५०। और मन्दराचल को मन्थान बनाकर अर्थात् मन्थन करने का साधन बनाकर तथा वासुकि नामक सर्पराज को योक्त अर्थात् मथने की डोरी करके सब देवगण मेरे सहायक होने पर अमृत का मथन करो अर्थात् अमृत निकालो ।५१। सान्त्वना के साथ आपको समस्त दानवों से भी इस कार्य को

अमृत मंथन वर्णन ] [ १६७

सम्पन्न कराने के लिए कहना चाहिए। यह उन्हें बताओ कि इसके करने से जो भी कुछ फल होगा वह तो हम और आपको सभी को सामान्य ही होगा अर्थात् उसको हम और आप सभी प्राप्त करेंगे ।५२। इस क्षीरसागर के मन्थन किये जाने पर जो सुधा उत्पन्न होगी उस अमृत के पान करने से आप लोग बलशाली और न मरण वाले हो जाओगे ।५३। जिस प्रकार से ये दैत्यगण उस अमृत को किञ्चिन मात्र भी न प्राप्त कर पावेंगे और केवल मन्थन करने में क्लेश वाले ही होंगे उस प्रकार का उपाय तो मैं कर दूँगा ।५४। यह भगवान् वासुदेव के द्वारा समस्त सुरगणों में कहा गया था तब सब सुरगणों ने उन अतुल दैत्यों के साथ सन्धि की थी। फिर अनेक प्रकार की औषधियाँ सुरो और असुरों ने एकत्रित करके वहाँ पर प्राप्त की थी ।५५। उस क्षीर सागर के जल में डालकर चन्द्रमा से भी अधिक निर्मल मन्दराचल को मन्थन करने का साधन और वासुकि सर्प को उसको डोरी बनाया था। फिर सभी ने मिल-जुलकर क्षीर सागर के मन्थन करने का कार्य बड़े ही प्रबल प्रयत्न से प्रारम्भ कर दिया था ।५६।

वासुकेः पुच्छभागे तु सहिताः सर्वदेवताः ।
शिरोभागे तु दैतेया नियुक्तास्तत्र शौरिणा ॥५७
बलवंतोऽपि ते दैत्यास्तन्मुखोच्छ्वासपावकैः ।
निर्दग्धवपुषः सर्वे निस्तेजस्कास्तदाभवन् ॥५८
पुच्छदेशे तु कर्षंतो महूराप्यायिताः सुराः ।
अनुकूलेन वातेन विष्णुना प्रेरितेन तु ॥५६
आदिकूर्मकृतिः श्रीमान्मध्ये क्षीरपयोनिधेः ।
भ्रमतो मंदराद्रेस्तु तस्याधिष्ठानतामगात् ॥६०
मध्ये च सर्वदेवानां रूपेणान्येन माधवः ।
चकर्ष वासुकिं वेगाद्दैत्यमध्ये परेण च ॥६१
ब्रह्मरूपेण तं शैलं विधायाक्रांतवारिधिम् ।
अपरेण च देवर्षिर्महता तेजसा मुहुः ॥६२
उपबृंहितवान्देवान्येन ते बलशालिनः ।
तेजसा पुनरन्येन बलात्कारसहेन सः ॥६३

१६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वासुकि सर्प के पूँछ के भाग में तो हित के साथ समस्त देवगण और उसके शिर के हिस्से में सब दैत्यगण भगवान् ने ही नियुक्त किये थे ।५७। यद्यपि दैत्यगण बहुत बलवान् थे तो भी उस सर्प के मुख के उच्छ्वासों की अग्नि से उनके समस्त शरीर निर्दग्ध हो गये थे और उस समय में वे बिल्कुल ही तेज से क्षीण हो गये थे ।५८। भगवान् विष्णु के द्वारा प्रेरित अनुकूल वायु से पूँछ के भाग का कर्षण करते हुए देवगण बार-बार आप्यायित (सन्तृप्त) हो रहे थे ।५६। भगवान् आदि कूर्म के आकार वाले बनकर क्षीरसागर के मध्य में भ्रमण करते हुए मन्दर पर्वत के अधिष्ठान बन गये थे जिस पर वह पर्वत टिक रहा था । मध्य में सब देवों के दूसरे स्वरूप से माधव दिखाई दे रहे थे । दूसरे रूप से दैत्यों के मध्य में उन्होंने भी बड़े वेग से वासुकि का कर्षण किया था । ब्रह्म के रूप से जिसने सागर को आक्रान्त कर दिया था उस शैल को धारण किया था और एक दूसरे रूप से देवर्षि ने महान् तेज के द्वारा देवों को सबल बना दिया था ।६०-६२। भगवान् ने देवों का बलवर्धन किया था जिसके वे बली बने रहें और फिर बलात्कारके सहन करने वाले तेज से सभी को कार्य सम्पन्न करने की शक्ति प्रदान की थी ।६३।

उपबृंहितवान्नागं सर्वशक्तिर्जनार्दनः ।
मथ्यमाने ततस्तस्मिन्क्षीराब्धौ देवदानवैः ॥६४
आविर्बभूव पुरतः सुरभिः सुरपूजिता ।
मुदं जग्मुस्तदा देवा दैतेयाश्च तपोधन ॥६५
मथ्यमाने पुनस्तस्मिन्क्षीराब्धौ देवदानवैः ।
किमेतदिति सिद्धानां दिवि चिंतयता तदा ॥६६
उत्थिता वारुणी देवी मदालोलविलोचना ।
असुराणां पुरस्तात्सा स्मयमाना व्यतिष्ठत ॥६७
जगृहुर्नैव तां दैत्या असुराश्चाभवंस्ततः ।
सुरा न विद्यते येषां तेनैवासुरशब्दिताः ॥६८
अथ सा सर्वदेवानामग्रतः समतिष्ठत ।
जगृहुस्तां मुदा देवाः सूचिताः परमेष्ठिना ।

अमृत मंथन वर्णन ] [ १६६

सुराग्रहणतोऽप्येते सुरशब्देन कीर्तिताः ॥६६ मथ्यमाने ततो भूयः पारिजातो महाद्रुमः । आविरासीत्सुगंधेन परितो वासयञ्जगत् ॥७०

सर्वशक्ति शाली जनार्दन प्रभु ने उस नाग वासुकि की भी शक्ति का वर्धन किया था। फिर देवों और दानवों के द्वारा क्षीरसागर के मन्थन किये जाने पर ।६४। फिर आगे अर्थात् सबसे पूर्व सुरों की पूजित सुरभि प्राविर्भूत हुई थी। हे तपोधन ! उसका अवलोकन करके उस समय में देवगण और दैत्यगण सभी प्रसन्नता से भर गये थे ।६५। फिर उस क्षीर सागर के मन्थन करने पर जो कि देवों और दानवों के द्वारा किया गया था, उस समय में सिद्धगण यही चिन्तन कर रहे थे कि यह क्या वस्तु है ।६६। तब उस क्षीर सागर से वारुणी देवी उत्थित हुई थी जिसके मद के कारण परम चञ्चल नेत्र थे। वह असुरों के आगे मुस्कुराती हुई संस्थित हो गयी थी ।६७। दैत्यों ने उसका ग्रहण नहीं किया था। तभी से वे असुर हो गये थे क्योंकि सुरा ग्रहण करने वाले नहीं हुए थे जिनके पास सुरा नहीं है उसी से वे असुर शब्द से कहे गये थे ।६८। इसके पश्चात् वह समस्त देवों के सामने स्थित हो गयी थी। परमेष्ठी के द्वारा संकेतित होकर उन देवों ने बड़े ही आनन्द के साथ उसको ग्रहण कर लिया था। सुरा के ही ग्रहण करने से ये लोग सुर शब्द से कीर्त्तित हुए थे ।६९। फिर मन्थन किये जाने पर महान् द्रुम परिजात प्रकट हुआ था जो अपनी सुगन्ध से सम्पूर्ण जगत् को सुवासित कर रहा था ।७०।

अत्यर्थसुन्दराकारा धीराश्चाप्सरसां गणाः । आविर्भूताश्च देवर्षे सर्वलोकमनोहराः ॥७१ ततः शीतांशुमद्भूतं जग्राह महेश्वरः । विषजातं तदुत्पन्नं जगृहुर्नागजातयः ॥७२ कौस्तुभाख्यं ततो रत्नमाददे तज्जनार्दनः । ततः स्वपत्रगन्धेन मदयंती महौषधीः । विजया नाम संजज्ञे भैरवस्तामुपाददे ॥७३ ततो दिव्यांबरधरो देवो धन्वंतरिः स्वयम् । उपस्थितः करे बिभ्रदमृताढ्यं कमंडलुम् ॥७४

१७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ततः प्रहृष्टमनसो दैंत्याश्च सर्वंतः ।
मुनयश्चाभवंस्तुष्टास्तदानीं तपसां निधे ॥७५॥
ततो विकसितांभोजवासिनीवरदायिनी ।
उत्थिता पद्महस्ता श्रीस्तस्मात्क्षीरमहार्णवात् ॥७६॥
अथ तां मुनयः सर्वे श्रीसूक्तेन श्रियं पराम् ।
तुष्टुवुस्तुष्टहृदया गंधर्वाश्च जगुः परम् ॥७७॥
विश्वाचीप्रमुखाः सर्वे ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।
गङ्गाद्याः पुण्यनद्यश्च स्नानार्थमुपतस्थिरे ॥७८॥

फिर हे देवर्षे ! अत्यधिक सुन्दर आकृति वाली सब लोकों में मन को हरण करने वाली धीर अप्सराओं के गण आविर्भूत हुए थे ॥७१। इसके पश्चात् शीतांशु (चन्द्रमा) प्रकट हुआ था जिसको महेश्वर भगवान् ने मस्तक पर धारण करने के लिये ग्रहण कर लिया था । फिर महा कालकूट विष उत्पन्न हुआ था जिसका ग्रहण नाग जातियों ने किया था ।७२। इसके अनन्तर कौस्तुभ मणि जिसका नाम है वह रत्न निकला था उसको भगवान् जनार्दन ने ले लिया था । इसके पश्चात् अपने पत्रों की गन्ध से मद उत्पन्न करती हुई एक महौषधि आविर्भूत हुई थी उसका विजया नाम रखा गया था और भैरव ने उसका उपादान किया ।७३। इसके उपरान्त परम दिव्य व शस्त्रों के धारण करने वाले देव आविर्भूत हुए थे जो स्वयं ही धन्वन्तरि वे अपने कर में एक अमृत से परिपूर्ण कमंडल लिए हुए ही उपस्थित हुए थे ।७४। हे तपों के निधे ! फिर देवगण-दैत्यवर्ग और मुनिगण सबके सब प्रसन्न मन वाले तथा परम सन्तुष्ट हुए थे ।७५। इसके बाद उत्फुल्ल कमलों के अन्दर निवास करने वाली—वरदान देने वाली—हाथों में पद्म धारण किये हुए श्री देवी उस क्षीर सागर से उठकर बाहिर आयी थी ।७६। फिर तो सभी मुनिगणों ने उस परा देवी श्री का श्रीसूक्त के द्वारा स्तवन किया था । और परम सन्तुष्ट हृदय वाले गन्धर्वों ने बहुत सुन्दर गान किया था ।७७। जिनमें विश्वाची प्रमुख थे उन सभी ने गान किया था । और अप्सराओं के समूह ने श्री देवी के आगे नृत्य किया था । गंगा आदि जो परम पुण्यमयी सरिताएँ थीं वे सभी स्नान के लिए समुपस्थित हो गयी थीं ।७८।

अष्टौ दिग्दंतिनश्चैव मेध्यपात्रस्थितं जलम् ।
आदाय स्नापयांचक्रुस्तां श्रियं पद्मवासिनीम् ॥७६॥