ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ तु=तथा; तत्=वह ब्रह्म; समन्वयात्=समस्त जगत्में पूर्णरूपसे अनुगत (व्यास) होनेके कारण (उपादान भी है)। व्याख्या—जिस प्रकार अनुमान और शास्त्र-प्रमाणसे यह सिद्ध होता है कि इस विचित्र जगत्का निमित्त कारण परब्रह्म परमेश्वर है, उसी प्रकार यह भी सिद्ध है कि वही इसका उपादान कारण भी है; क्योंकि वह इस जगत्मे पूर्णतया अनुगत (व्यास) है, इसका अणुमात्र भी परमेश्वरसे शून्य नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीतामे भी भगवान्ने कहा है कि 'चर या अचर, जड या चेतन, ऐसा कोई भी प्राणी या भूतसमुदाय नहीं है, जो मुझसे रहित हो।' (१० । ३९) 'यह सम्पूर्ण जगत् मुझसे व्याप्त है।' (गीता ९ । ४) उपनिषदोंमें भी स्थान-स्थानपर यह बात दुहरायी गयी है कि 'उस परब्रह्म परमेश्वरसे यह समस्त जगत् व्याप्त है।'* सम्बन्ध—सांख्यमतके अनुसार त्रिगुणात्मिका प्रकृति भी समस्त जगत्में व्याप्त है, फिर व्याप्तिरूप हेतुसे जगत्का उपादान कारण ब्रह्मको ही क्यों मानना चाहिये, प्रकृतिको क्यों नहीं ? इसपर कहते हैं— ईक्षतेर्नाशब्दम् ॥ १ । १ । ५ ॥ ईक्षतेः=श्रुतिमे 'ईक्ष' धातुका प्रयोग होनेके कारण; अशब्दम्=शब्द- प्रमाण-शून्य प्रधान-(त्रिगुणात्मिका जड प्रकृति); न=जगत्का कारण नहीं है। व्याख्या—उपनिषदोंमे जहाँ सृष्टिका प्रसङ्ग आया है, वहाँ 'ईक्ष' धातुकी क्रियाका प्रयोग हुआ है; जैसे 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छा० उ० ६ । २ । १) इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजा- येय' (छा० उ० ६ । २ । ३) अर्थात् 'उस सत्ने ईक्षण—सङ्कल्प किया कि मै बहुत हो जाऊँ, अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ।' ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार दूसरी जगह भी 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीत्' इस प्रकार आरम्भ करके 'स ईक्षत लोकान्नु सृजै' (ऐ० उ० १ । १ । १) अर्थात् उसने ईक्षण—विचार किया कि निश्चय ही मै लोकोंकी रचना करूँ।' ऐसा कहा है। परन्तु त्रिगुणात्मिका प्रकृति जड है, उसमे ईक्षण या सङ्कल्प नहीं
- ईशावास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । ( ईशा० १ )
सूत्र ५-७ ] अध्याय १ ५.
सूत्र ५-७ ] अध्याय १ ५. बन सकता; क्योंकि वह चेतनका धर्म है; अतः शब्दप्रमाणरहित प्रधान ( जड प्रकृति ) को जगत्का उपादान कारण नहीं माना जा सकता । सम्बन्ध—ईक्षण या सङ्कल्प चेतनका धर्म होनेपर भी गौणीवृत्तिसे अचेतन- के लिये प्रयोगमें लाया जा सकता है, जैसे लोकमें कहते हैं 'अमुक मकान अब गिरना ही चाहता है।' इसी प्रकार यहाँ भी ईक्षण-क्रियाका सम्बन्ध गौणरूपसे त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिके साथ मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं— गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ॥ १ । १ । ६ ॥ चेत् =यदि कहो; गौणः = ईक्षणका प्रयोग गौणवृत्तिसे ( प्रकृतिके लिये ) हुआ है; न = तो यह ठीक नहीं है; आत्मशब्दात् = क्योंकि वहाँ 'आत्म' शब्दका प्रयोग है। व्याख्या—ऊपर उद्धृत की हुई ऐतरेयकी श्रुतिमें ईक्षणका कर्ता आत्माको बताया गया है; अतः गौण-वृत्तिसे भी उसका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ नहीं हो सकता। इसलिये प्रकृतिको जगत्का कारण मानना वेदके अनुकूल नहीं है। सम्बन्ध—'आत्म' शब्दका प्रयोग तो मन, इन्द्रिय और शरीरके लिये भी आता है; अतः उक्त श्रुतिमें 'आत्मा' को गौणरूपसे प्रकृतिका वाचक मानकर उसे जगत्का कारण मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं— तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ॥ १ । १ । ७॥ तन्निष्ठस्य = उस जगत्कारण ( परमात्मा ) में स्थित होनेवालेकी; मोक्षोपदेशात् = मुक्ति बतलायी गयी है; इसलिये (वहाँ प्रकृतिको जगत्कारण नहीं माना जा सकता)। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्की दूसरी वल्लीके सातवे अनुवाकमे जो सृष्टिका प्रकरण आया है, वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि 'तदात्मानं स्वयमकुरुत'—'उस ब्रह्मने स्वयं ही अपने आपको इस जड-चेतनात्मक जगत्के रूपमे प्रकट किया।' साथ ही यह भी बताया गया है कि 'यह जीवात्मा जब उस आनन्दमय परमात्मामे निष्ठा करता—स्थित होता है, तब यह अभय पदको पा लेता है।' इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्मे भी श्वेतकेतुके प्रति उसके पिताने उस परम कारणमे स्थित होनेका फल मोक्ष बताया है; किन्तु प्रकृतिमे स्थित होनेसे मोक्ष होना कदापि सम्भव
६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ नहीं है, अतः उपर्युक्त श्रुतियोंमे 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं है; इसीलिये प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता । सम्बन्ध—उक्त श्रुतियोंमें आया हुआ 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता, इसमें दूसरा कारण बतलाते हैं— हेयत्वावचनाच्च ॥ १ । १ । ८ ॥ हेयत्वावचनात्=त्यागनेयोग्य नहीं बताये जानेके कारण; च=भी (उस प्रसङ्गमें 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं है) । व्याख्या—यदि 'आत्मा' शब्द वहाँ गौणवृत्तिसे प्रकृतिका वाचक होता तो आगे चलकर उसे त्यागनेके लिये कहा जाता और मुख्य आत्मामें निष्ठा करनेका उपदेश दिया जाता; किन्तु ऐसा कोई वचन उपलब्ध नहीं होता है। जिसको जगत्का कारण बताया गया है, उसीमें निष्ठा करनेका उपदेश किया गया है; अतः परब्रह्म परमात्मा ही 'आत्म'शब्दका वाच्य है और वही इस जगत्का निमित्त एवं उपादान कारण है । सम्बन्ध—'आत्मा' की ही भाँति इस प्रसङ्गमें 'सत्' शब्द भी प्रकृतिका वाचक नहीं है; यह सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— स्वाप्ययात् ॥ १ । १ । ९ ॥ स्वाप्ययात्=अपनेमें विलीन होना बताया गया है, इसलिये (सत् शब्द भी जड प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता)। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (६ । ८ । १) मे कहा है कि 'यत्रैतत् पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते' अर्थात् 'हे सोम्य ! जिस अवस्थामे यह पुरुष (जीवात्मा) सोता है, उस समय यह सत् (अपने कारण) से सम्पन्न (संयुक्त) होता है; स्व— अपनेमें अपीत—विलीन होता है, इसलिये इसे 'स्वपिति' कहते हैं।'*
- यहाँ स्व (अपने) में विलीन होना कहा गया है; अतः यह सन्देह हो सकता है कि 'स्व' शब्द जीवात्माका ही वाचक है, इसलिये वही जगत्का कारण है, परन्तु ऐसा समझना ठीक नहीं है, क्योकि पहले जीवात्माका सत् (जगत्के कारण) से संयुक्त होना बताकर उसी सत्को पुनः 'स्व' नामसे कहा गया है और उसीमे जीवात्माके विलीन
सूत्र ८-११ ] अध्याय १ ७
सूत्र ८-११ ] अध्याय १ ७ इस प्रसङ्गमे जिस सत्को समस्त जगत्का कारण बताया है, उसीमे जीवात्माका विलीन होना कहा गया है और उस सत्को उसका स्वस्वरूप बताया गया है । अतः यहाँ 'सत्' नामसे कहा हुआ जगत्का कारण जडतत्त्व नहीं हो सकता । सम्बन्ध—यही बात प्रकारान्तरसे पुनः सिद्ध करते हैं— गतिसामान्यात् ॥ १।१।१० ॥ गतिसामान्यात्=सभी उपनिषद्-वाक्योका प्रवाह समानरूपसे चेतनको ही जगत्का कारण बतानेमे है, इसलिये ( जड प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता ) । व्याख्या—'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः' ( तै० उ० २ । १ ) 'निश्चय ही सर्वत्र प्रसिद्ध इस परमात्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ।' 'आत्मत एवेदं सर्वम्' ( छा० उ० ७ । २६ । १ )—'परमात्मासे ही यह सब कुछ उत्पन्न हुआ है।' 'आत्मन एष प्राणो जायते' ( प्र० उ० ३ । ३ )—'परमात्मासे यह प्राण उत्पन्न होता है।' 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी।' ( मु० उ० २ । १ । ३ )—'इस परमेश्वरसे प्राण उत्पन्न होता है; तथा मन ( अन्तःकरण ), समस्त इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल और सम्पूर्ण प्राणियोको धारण करनेवाली पृथिवी—ये सब उत्पन्न होते हैं।' इस प्रकार सभी उपनिषद्-वाक्योंमे समानरूपसे चेतन परमात्माको ही जगत्का कारण बताया गया है; इसलिये जड प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता । सम्बन्ध—पुनः श्रुति-प्रमाणसे इसी बातको दृढ करते हुए इस प्रकरणको समाप्त करते हैं— श्रुतत्वाच्च ॥ १।१।११ ॥ श्रुतत्वात्=श्रुतियोद्वारा जगह-जगह यही बात कही गयी है, इसलिये; च= भी ( परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का कारण सिद्ध होता है ) । होनेकी बात कही गयी है। विलीन होनेवाली वस्तुसे लयका अधिष्ठान भिन्न होता है, अतः यहाँ लीन होनेवाली वस्तु जीवात्मा है और जिसमे वह लीन होता है, वह परमात्मा है। इसलिये यहाँ परमात्माको ही 'सत्' के नामसे जगत्का कारण बताया गया है, यही मानना ठीक है।
८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—'स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः।' ( श्वेता० उ० ६ । ९)—'वह परमात्मा सबका परम कारण तथा समस्त करणोंके अधिष्ठाताओंका भी अधिपति है। कोई भी न तो इसका जनक है और न स्वामी ही है।' 'स विश्वकृत्' ( श्वेता० ६ । १६ )—'वह परमात्मा समस्त विश्वका स्रष्टा है।' 'अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे' (मु० उ० २ । १ । ९)— 'इस परमेश्वरसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं।'—इत्यादिरूपसे उपनिषदोंमे स्थान-स्थानपर यही बात कही गयी है कि सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का कारण है; अतः श्रुति-प्रमाणसे यही सिद्ध होता है कि सर्वाधार परमात्मा ही सम्पूर्ण जगत्का अभिन्न निमित्तोपादान कारण है; जड प्रकृति नहीं। सम्बन्ध—'स्वाप्ययात्' १ । १ । ९ सूत्रमें जीवात्माके स्व ( परमात्मा ) मे विलीन होनेकी बात कहकर यह सिद्ध किया गया कि जड प्रकृति जगत्का कारण नहीं है। किन्तु 'स्व' शब्द प्रत्यक्चेतन ( जीवात्मा ) के अर्थमें भी प्रसिद्ध है; अतः यह सिद्ध करनेके लिये कि प्रत्यक्चेतन भी जगत्का कारण नहीं है, आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है। तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीमें सृष्टिकी उत्पत्ति का वर्णन करते हुए सर्वात्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरसे ही आकाश आदिके क्रमसे सृष्टि बतायी गयी है। (अनु० १, ६, ७)। उसी प्रसङ्गमें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय इन पाँचोंका वर्णन आया है। वहाँ क्रमशः अन्नमयका प्राणमय- को, प्राणमयका मनोमयको, मनोमयका विज्ञानमयको और विज्ञानमयका आनन्दमय- को अन्तरात्मा बताया गया है। आनन्दमयका अन्तरात्मा दूसरे किसीको नहीं बताया गया है; अपि तु उसीसे जगत्की उत्पत्ति बताकर आनन्दकी महिमाका वर्णन करते हुए सर्वात्मा आनन्दमयको जाननेका फल उसीकी प्राप्ति बताया गया और वहीं ब्रह्मानन्दवल्लीको समाप्त कर दिया गया है। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि इस प्रकरणमे आनन्दमय नामसे किसका वर्णन हुआ है, परमेश्वरका? या जीवात्माका? अथवा अन्य किसीका? इसपर कहते हैं— आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥ १ । १ । १२ ॥
सूत्र १२-१३ ] अध्याय १ ९
सूत्र १२-१३ ] अध्याय १ ९ अभ्यासात् = श्रुतिने वारंवार 'आनन्द' शब्दका ब्रह्मके लिये प्रयोग होनेके कारण; आनन्दमयः = 'आनन्दमय' शब्द (यहाँ परब्रह्म परमेश्वरका ही वाचक है)। व्याख्या—किसी बातको दृढ़ करनेके लिये वारंवार दुहरानेको 'अभ्यास' कहते हैं। तैत्तिरीय तथा बृहदारण्यक आदि अनेक उपनिषदोंमे 'आनन्द' शब्द- का ब्रह्मके अर्थमे वारंवार प्रयोग हुआ है; जैसे—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मवल्लीके छठे अनुवाकमे 'आनन्दमय' का वर्णन आरम्भ करके सातवे अनुवाकमे उसके लिये 'रसो वै सः। रसꣳह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयाति' (२।७) अर्थात् 'वह आनन्दमय ही रसस्वरूप है, यह जीवात्मा इस रसस्वरूप परमात्माको पाकर आनन्द- युक्त हो जाता है। यदि वह आकाशकी भाँति परिपूर्ण आनन्दस्वरूप परमात्मा नहीं होता तो कौन जीवित रह सकता, कौन प्राणोंकी क्रिया कर सकता ! सचमुच यह परमात्मा ही सबको आनन्द प्रदान करता है।' ऐसा कहा गया है। तथा 'सैषाऽऽनन्दस्य मीमाꣳसा भवति,' 'एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति।' (तै० उ० २।८) 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन।' (तै० उ० २।९) 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' (तै० उ० ३।६) 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (बृह० उ० ३।९।२८)—इत्यादि प्रकारसे श्रुतियोंमें जगह-जगह परब्रह्मके अर्थमें 'आनन्द' एवं 'आनन्दमय' शब्दका प्रयोग हुआ है। इसलिये 'आनन्दमय' नामसे यहाँ उस सर्वशक्तिमान्, समस्त जगत्के परम कारण, सर्वनियन्ता, सर्वव्यापी, सबके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं। सम्बन्ध—यहाँ यह शङ्का होती है कि 'आनन्दमय' शब्दमे जो 'मयट्' प्रत्यय है, वह विकार अर्थका बोधक है और परब्रह्म परमात्मा निर्विकार है। अतः जिस प्रकार अन्नमय आदि शब्द ब्रह्मके वाचक नहीं हैं, वैसे ही, उन्हीं- के साथ आया हुआ यह 'आनन्दमय' शब्द भी परब्रह्मका वाचक नहीं होना चाहिये। इसपर कहते हैं— विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ॥ १। १। १३ ॥ चेत्=यदि कहो; विकारशब्दात्=मयट् प्रत्यय विकारका बोधक होनेसे; न=आनन्दमय शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता, इति=तो यह कथन; न=
सूत्रके अनुसार प्रचुरताके अर्थमें भी 'मयट्' प्रत्यय होता है; अतः यहाँ 'आनन्द-
१० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ठीक नहीं है; प्राचुर्यात् = क्योंकि 'मयट्' प्रत्यय यहाँ प्रचुरताका बोधक है ( विकारको नहीं ) । व्याख्या—'तत्प्रकृतवचने मयट्' ( पा० सू० ५ । ४ । २१ ) इस पाणिनि- सूत्रके अनुसार प्रचुरताके अर्थमें भी 'मयट्' प्रत्यय होता है; अतः यहाँ 'आनन्द- मय' शब्दमे जो 'मयट्' प्रत्यय है, वह विकारका नहीं, प्रचुरता-अर्थका ही बोधक है अर्थात् वह ब्रह्म आनन्दघन है, इसीका द्योतक है । इसलिये यह कहना ठीक नहीं है कि 'आनन्दमय' शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता । परब्रह्म परमेश्वर आनन्दघनस्वरूप है, इसलिये उसे 'आनन्दमय' कहना सर्वथा उचित है । सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जब 'मयट्' प्रत्यय विकारका बोधक भी होता है, तब यहाँ उसे प्रचुरताका ही बोधक क्यों माना जाय ? विकारबोधक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— तद्धेतुव्यपदेशाच्च ॥ १ । १ । १४ ॥ तद्धेतुव्यपदेशात् = ( उपनिषदोंमे ब्रह्मको ) उस आनन्दका हेतु बताया गया है, इसलिये; च = भी (यहाँ मयट् प्रत्यय विकार-अर्थका बोधक नहीं है ) । व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकरणमे आनन्दमयको आनन्द प्रदान करनेवाला बताया गया है (तै० उ० २ । ७ ) । जो सबको आनन्द प्रदान करता है, वह स्वयं आनन्दघन है, इसमें तो कहना ही क्या है; क्योंकि जो अखण्ड आनन्दका भण्डार होगा, वही सदा सबको आनन्द प्रदान कर सकेगा । इसलिये यहाँ मयट् प्रत्ययको विकारका बोधक न मानकर प्रचुरताका बोधक मानना ही ठीक है । सम्बन्ध—केवल मयट् प्रत्यय प्रचुरताका बोधक होनेसे ही यहाँ 'आनन्द- मय' शब्द ब्रह्मका वाचक है, इतना ही नहीं, किन्तु— मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॥ १ । १ । १५ ॥ च = तथा; मान्त्रवर्णिकम् = मन्त्राक्षरोंमे जिसका वर्णन किया गया है, उस ब्रह्मका; एव = ही; गीयते = (यहाँ) प्रतिपादन किया जाता है ( इसलिये भी आनन्दमय ब्रह्म ही है ) । व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीके आरम्भमे जो यह मन्त्र आया है कि—'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ।' अर्थात् 'ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप
सूत्र १६-१७ ] अध्याय १ ११
सूत्र १६-१७ ] अध्याय १ ११ और अनन्त है। वह ब्रह्म विशुद्ध आकाशस्वरूप परम धाममे रहते हुए ही सब- के हृदयरूप गुफामे छिपा हुआ है। जो उसको जानता है, वह सबको भली- भाँति जाननेवाले ब्रह्मके साथ समस्त भोगोका अनुभव करता है।' इस मन्त्रद्वारा वर्णित ब्रह्मको यहाँ 'मान्त्रवर्णिक' कहा गया है। जिस प्रकार उक्त मन्त्रमे उस परब्रह्मको सबका अन्तरात्मा बताया गया है, उसी प्रकार ब्राह्मण-ग्रन्थमे 'आनन्द- मय'को सबका अन्तरात्मा कहा है; इस प्रकार दोनो स्थलोकी एकताके लिये यही मानना उचित है कि 'आनन्दमय' शब्द यहाँ ब्रह्मका ही वाचक है, अन्य किसी- का नहीं। सम्बन्ध—यदि 'आनन्दमय' शब्दको जीवात्माका वाचक मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं— नेतरोऽनुपपत्तेः ॥ १।१।१६ ॥ इतरः = ब्रह्मसे भिन्न जो जीवात्मा है, वह; न = आनन्दमय नहीं हो सकता; अनुपपत्तेः = क्योंकि पूर्वापरके वर्णनसे यह बात सिद्ध नहीं होती। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीमें आनन्दमयका वर्णन करनेके अनन्तर यह बात कही गयी है कि 'उस आनन्दमय परमात्माने यह इच्छा की कि मैं बहुत होऊँ; फिर उसने तप (सङ्कल्प) किया। तप करके इस समस्त जगत्की रचना की।' (तै० उ० २। ६) यह कथन जीवात्माके लिये उपयुक्त नहीं है; क्योकि जीवात्मा अल्पज्ञ और परिमित शक्तिवाला है; जगत्की रचना आदि कार्य करनेकी उसमें सामर्थ्य नहीं है। अतः 'आनन्दमय' शब्द जीवात्मा- का वाचक नहीं हो सकता। सम्बन्ध—यही बात सिद्ध करनेके लिये दूसरा कारण बतलाते हैं— भेदव्यपदेशाच्च ॥ १।१।१७ ॥ भेदव्यपदेशात् = जीवात्मा और परमात्माको एक दूसरेसे भिन्न बतलाया गया है, इसलिये; च = भी ('आनन्दमय' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं हो सकता)। व्याख्या—उक्त वल्लीमें आगे चलकर (सातवे अनुवाकमे) कहा है कि 'यह जो ऊपरके वर्णनमे 'सुकृत'नामसे कहा गया है, वही रसस्वरूप है। यह जीवात्मा इस रसस्वरूप परमात्माको पाकर आनन्दयुक्त हो जाता है।' इस प्रकार यहाँ
१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ परमात्माको आनन्ददाता और जीवात्माको उसे पाकर आनन्दयुक्त होनेवाला बताया गया है। इससे दोनोंका भेद सिद्ध होता है। इसलिये भी 'आनन्दमय' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं है। सम्बन्ध-आनन्दका हेतु जो सत्त्वगुण है, वह त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिमें भी विद्यमान है ही; अतः 'आनन्दमय' शब्दको प्रकृतिका ही वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— कामाच्च नानुमानापेक्षा ॥ १ । १ । १८ ॥ च=तथा; कामात्=( 'आनन्दमय'मे ) कामनाका कथन होनेसे; अनुमाना- पेक्षा=(यहाँ ) अनुमान-कल्पित जड प्रकृतिको 'आनन्दमय' शब्दसे ग्रहण करने- की आवश्यकता; न=नहीं है। व्याख्या—उपनिषद्मे जहाँ 'आनन्दमय'का प्रसङ्ग आया है, वहाँ 'सोऽकाम- यत' इस वाक्यके द्वारा आनन्दमयमे सृष्टिविषयक कामनाका होना बताया गया है, जो कि जड प्रकृतिके लिये असम्भव है। अतः उस प्रकरणमें वर्णित 'आनन्द मय' शब्दसे जड प्रकृतिको नहीं ग्रहण किया जा सकता। सम्बन्ध—परब्रह्म परमात्माके सिवा, प्रकृति या जीवात्मा कोई भी 'आनन्द- मय' शब्दसे गृहीत नहीं हो सकता; इस बातको दृढ़ करते हुए प्रकरणका उपसंहार करते हैं— अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १ । १ । १९ ॥ च=इसके सिवा; अस्मिन्=इस प्रकरणमे ( श्रुति ); अस्य=इस जीवात्माका; तद्योगम्=उस आनन्दमयसे संयुक्त होना ( मिल जाना ); शास्ति=बतलाती है ( इसलिये जड तत्त्व या जीवात्मा आनन्दमय नहीं है ) । व्याख्या—तै० उ० ( २ । ८ ) मे श्रुति कहती है कि 'इस आनन्दमय परमात्माके तत्त्वको इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् अन्नमयादि समस्त शरीरोके आत्मस्वरूप आनन्दमय ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।' बृहदारण्यकमे भी श्रुतिका कथन है कि '(ब्रह्मको जाननेवाला पुरुष ) ब्रह्मरूप होकर ही ब्रह्ममे लीन होता है' ( बृह० उ० ४ । ४ । ६)। श्रुतिके इन वचनोसे यह स्वत सिद्ध हो जाता है' कि जड प्रकृति या जीवात्माको 'आनन्दमय' नहीं माना जा सकता; क्योकि चेतन जीवात्मा-
सूत्र १८-२१ ] अध्याय १ १३
सूत्र १८-२१ ] अध्याय १ १३ का जड प्रकृतिमे अथवा अपने ही-जैसे परतन्त्र दूसरे किसी जीवमे लय होना नहीं बन सकता। इसलिये एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही 'आनन्दमय' शब्दका वाच्यार्थ है और वही सम्पूर्ण जगत्का कारण है; दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध—तैत्तिरीय-श्रुतिमें जहाँ आनन्दमयका प्रकरण आया है, वह 'विज्ञानमय' शब्दसे जीवात्माको ग्रहण किया गया है, किन्तु बृहदारण्यक ( ४ । ४ । २२ ) में 'विज्ञानमय' को हृदयाकाशमें शयन करनेवाला अन्तरात्मा बताया गया है। अतः जिज्ञासा होती है कि वहाँ 'विज्ञानमय' शब्द जीवात्मा- का वाचक है अथवा ब्रह्मका ? इसी प्रकार छान्दोग्य ( १ । ६ । ६ ) में जो सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुषका वर्णन आया है, वहाँ भी यह शङ्का हो सकती है कि इस मन्त्रमें सूर्यके अधिष्ठाता देवताका वर्णन हुआ है या ब्रह्मका ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ १ । १ । २० ॥ अन्तः = हृदयके भीतर शयन करनेवाला विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलके भीतर स्थित हिरण्मय पुरुष ब्रह्म है; तद्धर्मोपदेशात् = क्योकि ( उसमे ) उस ब्रह्मके धर्मोंका उपदेश किया गया है। व्याख्या—उपर्युक्त बृहदारण्यक-श्रुतिमे वर्णित विज्ञानमय पुरुषके लिये इस प्रकार विशेषण आये हैं—'सर्वस्य वशी सर्वस्येशान. सर्वस्याधिपतिः' एष सर्वेश्वर एष भूतपालः' इत्यादि। तथा छान्दोग्यवर्णित सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती पुरुषके लिये 'सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः' ( सब पापोंसे ऊपर उठा हुआ ) यह विशेषण दिया गया है। ये विशेषण परब्रह्म परमेश्वरमें ही सम्भव हो सकते हैं। किसी भी स्थिति- को प्राप्त देव, मनुष्य आदि योनियोंमें रहनेवाले जीवात्माके ये धर्म नहीं हो सकते। इसलिये वहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष समझना चाहिये; अन्य किसीको नहीं। सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— भेदव्यपदेशाच्चान्यः ॥ १ । १ । २१ ॥ च=तथा; भेदव्यपदेशात् = भेदका कथन होनेसे; अन्यः = सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भिन्न है।
१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या-बृहदारण्यकोपनिषद्के अन्तर्यामिब्राह्मणमें कहा है कि- 'य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।' अर्थात् जो सूर्यमें रहनेवाला सूर्यका अन्तर्वर्ती है, जिसे सूर्य नहीं जानता, सूर्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर सूर्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ।' इस प्रकार वहाँ सूर्यन्तर्वर्ती पुरुषका सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भेद बताया गया है; इसलिये वह हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठातासे भिन्न परब्रह्म परमात्मा ही है । सम्बन्ध-यहाँतकके विवेचनसे यह सिद्ध किया गया कि जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका निमित्त और उपादान कारण परब्रह्म परमेश्वर ही है; जीवात्मा या जड प्रकृति नहीं। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि श्रुति (छा० उ० १ । ९ । १ ) में जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण आकाशको भी बताया गया है, फिर ब्रह्मका लक्षण निश्चित करते हुए यह कैसे कहा गया कि जिससे जगत्के जन्म आदि होते हैं, वह ब्रह्म है । इसपर कहते हैं- आकाशस्तल्लिङ्गात् ॥ १ । १ । २२ ॥ आकाशः=( वहाँ ) 'आकाश' शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है; तल्लिङ्गात्=क्योकि ( उस मन्त्रमे ) जो लक्षण बताये गये हैं, वे उस ब्रह्मके ही हैं। व्याख्या-छान्दोग्य ( १ । ९ । १ ) में इस प्रकार वर्णन आया है- 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशम्प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ।' अर्थात् 'ये समस्त भूत ( पञ्चतत्त्व और समस्त प्राणी ) निःसन्देह आकाशसे ही उत्पन्न होते है और आकाशमे ही विलीन होते हैं । आकाश ही इन सबसे श्रेष्ठ और बड़ा है । वही इन सबका परम आधार है ।' इसमे आकाशके लिये जो विशेषण आये है, वे भूताकाशमे सम्भव नहीं हैं; क्योंकि भूताकाश तो स्वयं भूतोंके समुदायमे आ जाता है । अतः उससे भूतसमुदायकी या प्राणियोंकी उत्पत्ति बतलाना सुसङ्गत नहीं है । उक्त लक्षण एकमात्र परब्रह्म परमात्मामे ही सङ्गत हो सकते है । वही सर्वश्रेष्ठ, सबसे बड़ा और सर्वाधार है; अन्य कोई नहीं । इसलिये यही सिद्ध होता है कि उस श्रुतिमे 'आकाश' नामसे परब्रह्म परमेश्वरको ही जगत्का कारण बताया गया है ।
सूत्र २२—२४ ] अध्याय १ १५
सूत्र २२—२४ ] अध्याय १ १५ सम्बन्ध-अब प्रश्न उठता है कि श्रुति (छा० उ० १ । ११ । ५) में आकाशकी ही भाँति प्राणको भी जगत्का कारण बतलाया गया है; वहाँ 'प्राण' शब्द किसका वाचक है ? इसपर कहते हैं— अत एव प्राणः ॥ १ । १ । २३ ॥ अत एव = इसीलिये अर्थात् श्रुतिमे कहे हुए लक्षण ब्रह्ममे ही सम्भव है, इस कारण वहाँ; प्राणः = प्राण (भी ब्रह्म ही है) । व्याख्या-छान्दोग्य (१ । ११ । ५) में कहा है कि 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते ।' अर्थात् 'निश्चय ही ये सब भूत प्राणमें ही विलीन होते हैं और प्राणसे ही उत्पन्न होते हैं।'-ये लक्षण प्राणवायुमे नहीं घट सकते; क्योकि समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय- का कारण प्राणवायु नहीं हो सकता । अतः यहाँ 'प्राण' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन हुआ है, ऐसा मानना चाहिये । सम्बन्ध-पूर्व प्रकरणमें तो ब्रह्मसूचक लक्षण होनेसे आकाश तथा प्राणको ब्रह्मका वाचक मानना उचित है; किन्तु छान्दोग्योपनिषद् (३ । १३ । ७) में जिस ज्योति (तेज) को समस्त विश्वसे ऊपर सर्वश्रेष्ठ परमधाममें प्रकाशित बताया हे तथा जिसकी शरीरान्तर्वर्ती पुरुषमें स्थित ज्योतिके साथ एकता बतायी गयी हे, उसके लिये वहाँ कोई ऐसा लक्षण नहीं बताया गया हे, जिससे उसको ब्रह्मका वाचक माना जाय । इसलिये यह जिज्ञासा होती हे कि उक्त 'ज्योतिः' शब्द किसका वाचक हे ? इसपर कहते हैं— ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॥ १ । १ । २४ ॥ चरणाभिधानात् = (उस प्रसङ्गमे ) उक्त ज्योतिके चार पादोका कथन होने- से; ज्योतिः = 'ज्योतिः' शब्द वहाँ ब्रह्मका वाचक है । व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायमे 'ज्योति.' का वर्णन इस प्रकार हुआ है—'अथ यदत. परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वत. पृष्ठेषु सर्वत पृष्ठेष्वनुत्तमे- षूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्त. पुरुषे ज्योति. ।' (३ । १३ । ७) अर्थात् 'जो इस स्वर्गलोकसे ऊपर परम ज्योति प्रकाशित हो रही है, वह समस्त विश्वके पृष्ठपर (सबके ऊपर ), जिससे उत्तम दूसरा कोई लोक नहीं है, उस सर्वोत्तम 'परमधाममे
पादोंका कथन है और समस्त भूतसमुदायको उसका एक पाद बताकर शेष तीन
१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ प्रकाशित हो रही है, वह निस्सन्देह यही है जो कि इस पुरुषमें आन्तरिक ज्योति है।' इस प्रसङ्गमें आया हुआ 'ज्योतिः' शब्द जड प्रकाशका वाचक नहीं है, यह बात तो इसमे वर्णित लक्षणोंसे ही स्पष्ट हो जाती है। तथापि यह 'ज्योतिः' शब्द किसका वाचक है ? ज्ञानका या जीवात्माका अथवा ब्रह्मका ? इसका निर्णय नहीं होता; अतः सूत्रकार कहते हैं कि यहाँ जो 'ज्योतिः' शब्द आया है, वह ब्रह्म- का ही वाचक है; क्योंकि इसके पूर्व बारहवें खण्डमे इस ज्योतिर्मय ब्रह्मके चार पादोंका कथन है और समस्त भूतसमुदायको उसका एक पाद बताकर शेष तीन पादोंको अमृतस्वरूप तथा परमधाममें स्थित बताया है ।* इसलिये इस प्रसङ्गमे आया हुआ 'ज्योतिः' शब्द ब्रह्मके सिवा अन्य किसीका वाचक नहीं हो सकता । माण्डूक्योपनिषद्मे आत्माके चार पादोंका वर्णन करते हुए उसके दूसरे पादको तैजस कहा है। यह 'तैजस' भी 'ज्योतिः'का पर्याय ही है। अतः 'ज्योतिः'की भाँति 'तैजस' शब्द भी ब्रह्मका ही वाचक है, जीवात्मा या अन्य किसी प्रकाशका नहीं। इस बातका निर्णय भी इसी प्रसङ्गके अनुसार समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँ यह शङ्का होती है कि छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्याय- के बारहवें खण्डमें 'गायत्री'के नामसे प्रकरणका आरम्भ हुआ है। गायत्री एक छन्दका नाम है। अतः उस प्रसङ्गमें ब्रह्मका वर्णन है, यह कैसे माना जाय ? इसपर कहते हैं— छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगदात्- तथा हि दर्शनम् ॥ १ । १ । २५ ॥ चेत्=यदि कहो ( उस प्रकरणमे ); छन्दोऽभिधानात्=गायत्री छन्दका कथन होनेके कारण ( उसीके चार पादोंका वर्णन है ); न=ब्रह्मके चार पादोंका वर्णन नहीं है; इति न=तो यह ठीक नहीं ( क्योंकि ); तथा=उस प्रकारके वर्णनद्वारा;
- वह मन्त्र इस प्रकार है— तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्या- मृतं दिवि ॥ ( छा० उ० ३ । १२ । ६ )
सूत्र २५-२६ ] अध्याय १ १७
सूत्र २५-२६ ] अध्याय १ १७ चेतोऽर्पणनिगदात्=ब्रह्ममे चित्तका समर्पण बताया गया है; तथा हि दर्शनम्= वैसा ही वर्णन दूसरी जगह भी देखा जाता है। व्याख्या—पूर्व प्रकरणमे 'गायत्री ही यह सब कुछ है' (छा० उ० ३ । १२ । १) इस प्रकार गायत्रीछन्दका वर्णन होनेसे उसीके चार पादोका वहाँ वर्णन है, ब्रह्मका नहीं; ऐसी धारणा बना लेना ठीक नहीं है; क्योकि गायत्रीनामक छन्दके लिये यह कहना नहीं बन सकता कि यह जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् गायत्री ही है। इसलिये यहाँ ऐसा समझना चाहिये कि सबके परम कारण सर्वात्मक परब्रह्म परमेश्वरमे चित्तका समाधान करानेके लिये उस ब्रह्मका ही वहाँ इस प्रकार गायत्री-नामसे वर्णन किया गया है। इसी तरह अन्यत्र भी उद्गीथ, प्रणव आदि नामोके द्वारा ब्रह्मका वर्णन देखा जाता है। सूक्ष्म तत्त्वमे बुद्धिका प्रवेश करानेके लिये, किसी प्रकारकी समानताको लेकर स्थूल वस्तुके नामसे उसका वर्णन करना उचित ही है। सम्बन्ध—इस प्रकरणमे 'गायत्री' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है, इस बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं— भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् ॥ १ । १ । २६ ॥ भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेः=(यहाँ ब्रह्मको ही गायत्रीके नामसे कहा गया है, यह माननेमे ही) भूत आदिको पाद बतलाना युक्तिसंगत हो सकता है, इसलिये; च=भी; एवम्=ऐसा ही है। व्याख्या—छान्दोग्य (३ । १२) के प्रकरणमे गायत्रीको भूत, पृथिवी, शरीर और हृदयरूप चार पादोसे युक्त बताया गया है। फिर उसकी महिमाका वर्णन करते हुए 'पुरुष' नामसे प्रतिपादित परब्रह्म परमात्माके साथ उसकी एकता करके समस्त भूतोको (अर्थात् प्राणि-समुदायको) उसका एक पाद् बतलाया गया है और अमृतस्वरूप तीन पादोको परमधाममे स्थित कहा गया है। (छा० उ० ३ । १२।६)। इस वर्णनकी सङ्गति तभी लग सकती है, जब कि 'गायत्री'शब्दको गायत्री-छन्दका वाचक न मानकर परब्रह्म परमात्माका वाचक माना जाय। इसलिये यही मानना ठीक है। सम्बन्ध—उक्त सिद्धान्तकी पुष्टिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उपस्थित करके उसका समाधान करते हैं— वे० द० २—
पाद दिव्य लोकमे हैं' यह कहकर दिव्य लोकको ब्रह्मके तीन पादोका आधार
१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥ १ । १ । २७ ॥ चेत्=यदि कहो; उपदेशभेदात्=उपदेशमें भिन्नता होनेसे; न=गायत्रीशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं है; इति न=तो यह कथन ठीक नहीं है; उभयस्मिन् अपि= क्योकि दो प्रकारका वर्णन होनेपर भी; अविरोधात्=( वास्तवमें ) कोई विरोध नहीं है । व्याख्या—यदि कहा जाय कि पूर्वमन्त्र ( ३ । १२ । ६) मे तो 'तीन पाद दिव्य लोकमे हैं' यह कहकर दिव्य लोकको ब्रह्मके तीन पादोका आधार बताया गया है और बादमे आये हुए मन्त्र ( ३ । १३ । ७) मे 'ज्योति:' नामसे वर्णित ब्रह्मको उस दिव्य लोकसे परे बताया है । इस प्रकार पूर्वापरके वर्णन- मे भेद होनेके कारण गायत्रीको ब्रह्मका वाचक बताना सङ्गत नहीं है; तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि दोनो जगहके वर्णनकी शैलीमे किञ्चित् भेद होनेपर भी वास्तवमे कोई विरोध नहीं है । दोनो स्थलोमे श्रुतिका उद्देश्य गायत्रीशब्द- वाच्य तथा ज्योतिःशब्दवाच्य ब्रह्मको सर्वोपरि परम धाममे स्थित बतलाना ही है । सम्बन्ध—'अत एव प्राणः' (१ । १ । २३) इस सूत्रमें यह सिद्ध किया गया है कि श्रुतिमें 'प्राण' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन है; किन्तु कौषीतकि-उपनिषद् ( ३ । २ ) में प्रतर्दनके प्रति इन्द्रने कहा हे कि 'मैं ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ; तू आयु तथा अमृतरूपसे मेरी उपासना कर ।' इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि इस प्रकरणमें आया हुआ 'प्राण' शब्द किसका वाचक है? इन्द्रका ? प्राणवायुका ? जीवात्माका ? अथवा ब्रह्मका ? इसपर कहते हैं— प्राणस्तथानुगमात् ॥ १ । १ । २८ ॥ प्राणः=प्राणशब्द ( यहाँ ब्रह्मका ही वाचक है ); तथानुगमात्=क्योकि पूर्वापरके प्रसङ्गपर विचार करनेसे ऐसा ही ज्ञात होता है । व्याख्या—इस प्रकरणमे पूर्वापर प्रसङ्गपर भलीभाँति विचार करनेसे 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक सिद्ध होता है, अन्य किसीका नहीं; क्योंकि आरम्भमे प्रतर्दनने परम पुरुषार्थरूप वर माँगा है । उसके लिये परम हितपूर्ण इन्द्रके उपदेशमें कहा हुआ 'प्राण' 'ब्रह्म' ही होना चाहिये । ब्रह्मज्ञानसे बढ़कर दूसरा कोई हितपूर्ण उपदेश नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त उक्त प्राणको वहाँ प्रज्ञान-
सूत्र २७-२९ ] अध्याय १ १९
सूत्र २७-२९ ] अध्याय १ १९ स्वरूप बतलाया गया है, जो कि ब्रह्मके ही अनुरूप है तथा अन्तमें उसीको आनन्दस्वरूप अजर एवं अमर कहा गया है। फिर उसीको समस्त लोकोंका पालक, अधिपति एवं सर्वेश्वर बताया गया है। * ये सब बातें ब्रह्मके ही उपयुक्त हैं। प्रसिद्ध प्राणवायु, इन्द्र अथवा जीवात्माके लिये ऐसा कहना उपयुक्त नहीं हो सकता। इसलिये यही समझना चाहिये कि यहाँ 'प्राण'शब्द ब्रह्मका ही वाचक है। सम्बन्ध—उक्त प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्ट शब्दोंमें स्वयं अपनेको ही प्राण कहा है। इन्द्र एक प्रभावशाली देवता तथा अजर, अमर हैं ही; फिर वहाँ 'प्राण' शब्दको इन्द्रका ही वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्ध- भूमा ह्यस्मिन् ॥ १।१।२९॥ चेत्=यदि कहो; वक्तुः=वक्ता (इन्द्र) का (उद्देश्य); आत्मोपदेशात् = अपनेको ही 'प्राण' नामसे बतलाना है, इसलिये; न=प्राणशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता; इति=( नो ) यह कथन: ( न )=ठीक नहीं है; हि=क्योंकि; अस्मिन् = इस प्रकरणमें; अध्यात्मसम्बन्धभूमा=अध्यात्मसम्बन्धी उपदेशकी बहुलता है। व्याख्या—यदि कहो कि इस प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्टरूपसे अपने आपको ही प्राण बतलाया है, ऐसी परिस्थितिमें 'प्राण'शब्दको इन्द्रका वाचक न मानकर ब्रह्मका वाचक मानना ठीक नहीं है; तो ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि इस प्रकरणमें अध्यात्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता है।† यहाँ आधिदैविक वर्णन नहीं है; अतः उपास्यरूपसे बतलाया हुआ तत्त्व इन्द्र नहीं हो सकता। इसलिये यहाँ 'प्राण' शब्दको ब्रह्मका ही वाचक समझना चाहिये।
- कौषीतकि-उपनिषद्में यह प्रसङ्ग इस प्रकार है— स होवाच प्रतर्दनस्त्वमेव वृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं मन्यस इति...।' (कौ० उ० ३। १) 'स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा।' (कौ० उ० ३। २) 'एष प्राण एव प्रज्ञात्माऽऽ- नन्दोऽजरोऽमृतः••••••एष लोकपाल एष लोकाधिपतिरेष सर्वेश्वरः।' (कौ० उ० ३। ९) † इस प्रसङ्गमें अध्यात्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता किस प्रकार है, यह पूर्वसूत्रकी टिप्पणीमें देखें।
२० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सम्बन्ध-यहाँ यह प्रश्न उठता है कि यदि 'प्राण' शब्द इन्द्रका वाचक नहीं है तो इन्द्रने जो यह कहा कि 'मै ही प्रज्ञानस्वरूप प्राण हूँ, तू मेरी उपासना कर।' इस कथनकी क्या गति होगी ? इसपर कहते हैं— शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ॥ १ । १ । ३० ॥ उपदेशः=( यहाँ ) इन्द्रका अपनेको प्राण बतलाना; तु=तो; वामदेववत्= वामदेवकी भाँति; शास्त्रदृष्ट्या=( केवल ) शास्त्र-दृष्टिसे है । व्याख्या-बृहदारण्यकोपनिषद् ( १ । ४ । १० ) मे यह वर्णन आया है कि 'तद् यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धैत- त्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभव सूर्यश्चेति।' अर्थात् 'उस ब्रह्मको देवताओमे जिसने जाना, वही ब्रह्मरूप हो गया । इसी प्रकार ऋषियो और मनुष्योमें भी जिसने उसे जाना, वह तद्रूप हो गया । उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना कि मै मनु हुआ और मै ही सूर्य हुआ।' इससे यह बात सिद्ध होती है कि जो महापुरुष उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है, वह उसके साथ एकताका अनुभव करता हुआ ब्रह्मभावापन्न होकर ऐसा कह सकता है । अतएव उस वामदेव ऋषिकी भाँति ही इन्द्रका ब्रह्मभावापन्न-अवस्थामे शास्त्रदृष्टिसे यह कहना है कि 'मैं ही ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हूँ । तू मुझ परमात्माकी उपासना कर।' अतः 'प्राण' शब्दको ब्रह्मका वाचक माननेमे कोई आपत्ति नहीं रह जाती है । सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे शङ्का उपस्थित करके उसके समाधानद्वारा प्राणको ब्रह्मका वाचक सिद्ध करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं-- जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रित- त्वादिह तद्योगात् ॥ १ । १ । ३१ ॥ चेत्=यदि कहो; जीवमुख्यप्राणलिङ्गात्=( इस प्रसङ्गके वर्णनमे ) जीवात्मा तथा प्रसिद्ध प्राणके लक्षण पाये जाते है, इसलिये; न=प्राण शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं है; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं है; उपासात्रैविध्यात्=क्योकि ऐसा माननेपर त्रिविध उपासनाका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; आश्रितत्वात्=( इसके
सूत्र ३०-३१ ] अध्याय १ २१
सूत्र ३०-३१ ] अध्याय १ २१ सिवा ) सब लक्षण ब्रह्मके आश्रित है ( तथा ); इह तद्योगात् = इस प्रसङ्गमें ब्रह्मके लक्षणोंका भी कथन है, इसलिये ( यहाँ 'प्राण'शब्द ब्रह्मका ही वाचक है) । व्याख्या--कौषीतकि-उपनिषद् ( ३ । ८ ) के उक्त प्रसङ्गमे जीवके लक्षणों- का इस प्रकार वर्णन हुआ है—'न वाचं विजिज्ञासीत। वक्तारं विद्यात् ।' अर्थात् 'वाणीको जाननेकी इच्छा न करे। वक्ताको जानना चाहिये।' यहाँ वाणी आदि कार्य और करणके अध्यक्ष जीवात्माको जाननेके लिये कहा है। इसी प्रकार प्रसिद्ध प्राणके लक्षणका भी वर्णन मिलता है—'अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति ।' ( ३ । ३ ) अर्थात् 'निस्सन्देह प्रज्ञात्मा प्राण ही इस शरीरको ग्रहण करके उठाता है।' शरीरको धारण करना मुख्य प्राणका ही धर्म है; इस कथनको लेकर यदि यह कहो कि 'प्राण'शब्द ब्रह्मवाचक नहीं होना चाहिये, तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योकि ब्रह्मके अतिरिक्त जीव और प्राणको भी उपास्य माननेसे त्रिविध उपासनाका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, जो उचित नहीं है। इसके सिवा, जीव और प्राण आदिके धर्मोंका आश्रय भी ब्रह्म ही है, इसलिये ब्रह्मके वर्णनमे उनके धर्मोंका आना अनुचित नहीं है। यहाँ ब्रह्मके लोकाधिपति, लोकपाल आदि लक्षणोंका भी स्पष्ट वर्णन मिलता है। इन सब कारणोंसे यहाँ 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है । इन्द्र, जीवात्मा अथवा प्रसिद्ध प्राणका नहीं—यही मानना ठीक है। पहला पाद सम्पूर्ण।
दूसरा पाद प्रथम पादमे यह निर्णय किया गया कि 'आनन्दमय', 'आकाश', 'ज्योति' तथा 'प्राण' आदि नामोंसे उपनिषद्मे जो जगत्के कारणका और उपास्यदेवका वर्णन आया है, वह परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है। 'प्राण'शब्दका प्रसङ्ग आनेसे छान्दोग्योपनिषद् (३।१४।२) मे आये हुए 'मनोमयः प्राण- शरीरः' आदि वचनोंका स्मरण हो आया। अतः उक्त उपनिषद्के तीसरे अध्यायके चौदहवें खण्डपर विचार करनेके लिये द्वितीय पाद प्रारम्भ करते हैं। इस पादमे यह पहला प्रकरण आठ सूत्रोंका है। छान्दोग्योपनिषद् (३।१४।१) में पहले तो सम्पूर्ण जगत्को ब्रह्मरूप समझकर उसकी उपासना करनेके लिये कहा गया है। उसके बाद उसके लिये 'सत्यसंकल्प', 'आकाशात्मा' और 'सर्व- कर्मा' आदि विशेषण दिये गये है (३।१४।२), जो कि जीवात्माके प्रतीत होते हैं। तत्पश्चात् उसीको 'अणीयान्' अर्थात् अत्यन्त छोटा और 'ज्यायान्' अर्थात् सबसे बड़ा बताकर हृदयके भीतर रहनेवाला अपना आत्मा और ब्रह्म भी कहा है (३।१४। ३-४)। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त उपास्यदेव कौन है ? जीवात्मा या परमात्मा अथवा कोई दूसरा ही ? इसका निर्णय करनेके लिये यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् ॥ १।२।१॥ सर्वत्र = सम्पूर्ण वेदान्त-वाक्योंमे; प्रसिद्धोपदेशात् = (जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके कारणरूपने ) प्रसिद्ध परब्रह्मका ही उपास्यदेवके रूपमें उपदेश हुआ है, इसलिये (छान्दोग्यश्रुति ३।१४ में बताया हुआ उपास्यदेव ब्रह्म ही है)। व्याख्या = छान्दोग्योपनिषद् अध्याय ३ के चौदहवे खण्डके आरम्भमें सबसे पहले यह मन्त्र आया है—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत । अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेत. प्रेत्य भवति , स क्रतुं कुर्वीत ।' अर्थात् 'यह सम्पूर्ण चराचर जगत् निश्चय ब्रह्म ही है; क्योकि यह उसीसे उत्पन्न हुआ है, स्थितिके समय उसीमे चेष्टा करता हैं और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है । साधकको राग-द्वेषरहित शान्तचित्त होकर इस
सूत्र १-२ ] अध्याय १ २३
सूत्र १-२ ] अध्याय १ २३ प्रकार उपासना करनी चाहिये । अर्थात् ऐसा ही निश्चयात्मक भाव धारण करना चाहिये; क्योकि यह मनुष्य संकल्पमय है । इस लोकमे यह जैसे संकल्पसे युक्त होता है, यहाँसे चले जानेपर परलोकमे यह वैसा ही बन जाता है । अतः उसे उपर्युक्त निश्चय करना चाहिये ।' इस मन्त्रवाक्यमे उसी परब्रह्मकी उपासना करनेके लिये कहा गया है, जिससे इस जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते है तथा जो समस्त वेदान्तवाक्योमें जगत्के महाकारणरूपसे प्रसिद्ध है । अतः इस प्रकरणमे बताया हुआ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा नहीं। सम्बन्ध-यहाँ यह प्रश्न उठता है कि छा० उ० (३।१४।२) में उपास्यदेवको मनोमय और प्राणरूप शरीरवाला कहा गया है । ये विशेषण जीवात्माके हैं; अतः उसको ब्रह्म मान लेनेसे उस वर्णनकी सङ्गति कैसे लगेगी ? इसपर कहते हैं— विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ॥ १।२।२॥ च=तथा; विवक्षितगुणोपपत्तेः=श्रुतिद्वारा वर्णित गुणोकी सङ्गति उस परब्रह्ममें ही होती है. इसलिये (इस प्रकरणमे कथित उपास्यदेव ब्रह्म ही है) । व्याख्या-छा० उ० (३।१४।२) मे उपास्यदेवका वर्णन इस प्रकार उपलब्ध होता है—'मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ।' अर्थात् 'वह उपास्यदेव मनोमय, प्राणरूप शरीरवाला, प्रकाशस्वरूप, सत्य-संकल्प, आकाशके सदृश व्यापक, सम्पूर्ण जगत्का कर्ता, पूर्णकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस समस्त जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाणीरहित तथा संभ्रमशून्य है।' इस वर्णनमे उपास्यदेवके जो उपादेय गुण बताये गये है, वे सब ब्रह्ममे ही सङ्गत होते है । ब्रह्मको 'मनोमय' तथा 'प्राणरूप शरीरवाला' कहना भी अनुचित नहीं है; क्योंकि वह सबका अन्तर्यामी आत्मा है । केनोपनिषद्मे उसको मनका भी मन तथा प्राणका भी प्राण बताया है *। इसलिये इस प्रकरणमे बतलाया. हुआ उपास्यदेव परब्रह्म परमेश्वर ही है । सम्बन्ध-उपर्युक्त सूत्रमें श्रुतिवर्णित गुणोंकी उपपत्ति (सङ्गति) ब्रह्ममें
- श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाच५ स उ प्राणस्य प्राणः । (के० उ० १।२)