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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ बतायी गयीं; अब जीवात्मामें उन गुणोंकी अनुपपत्ति बताकर पूर्वोक्त सिद्धान्तकी पुष्टि की जाती है— अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥ १ । २ । ३ ॥ तु=परन्तु; अनुपपत्तेः=जीवात्मामें श्रुतिवर्णित गुणोंकी सङ्गति न होनेके कारण; शारीरः=जीवात्मा; न=( इस प्रकरणमें कहा हुआ उपास्यदेव ) नहीं है। व्याख्या—उपासनाके लिये श्रुतिमें जो सत्य-संकल्पता, सर्वव्यापकता, सर्वात्मकता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुण बताये गये हैं, वे जीवात्मामें नहीं पाये जाते; इस कारण इस प्रसङ्गमें बताया हुआ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है, ऐसा मानना ही ठीक है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी बातको सिद्ध किया जाता है— कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ॥ १ । २ । ४ ॥ कर्मकर्तृव्यपदेशात्=उक्त प्रकरणमें उपास्यदेवको प्राप्तिक्रियाका कर्म अर्थात् प्राप्त होने योग्य कहा है और जीवात्माको प्राप्तिक्रियाका कर्ता अर्थात् उस ब्रह्मको प्राप्त करनेवाला बताया है, इसलिये; च=भी ( जीवात्मा उपास्य नहीं हो सकता ) । व्याख्या—छा० उ० (३ । १४ । ४) में कहा गया है कि 'सर्वकर्मा आदि विशेषणोंसे युक्त ब्रह्म ही मेरे हृदयमें रहनेवाला मेरा आत्मा है; मरनेके बाद यहाँसे जाकर परलोकमें मैं इसीको प्राप्त होऊँगा ।'* इस प्रकार यहाँ पूर्वोक्त उपास्यदेवको प्राप्त होने योग्य तथा जीवात्माको उसे पानेवाला कहा गया है। अतः यहाँ उपास्य- देव परब्रह्म परमात्मा है और उपासक जीवात्मा। यही मानना उचित है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः उक्त बातकी ही पुष्टि करते हैं—

  • 'एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद् वा सर्षपाद् वा श्यामाकाद् वा श्यामाकतण्डुलाद् वैष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरि- क्षाज्ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥' ( छा० उ० ३ । १४ । ३ ) 'सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्मान्तर्हृदय एतद् ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मि ।' ( छा० उ० ३ । १४ । ४ )

सूत्र ३-६ ] अध्याय १ २५

सूत्र ३-६ ] अध्याय १ २५ शब्दविशेषात् ॥ १ । २ । ५ ॥ शब्दविशेषात् = ( उपास्य और उपासकके लिये ) शब्दका भेद होनेके कारण भी ( यह सिद्ध होता है कि यहाँ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है ) । व्याख्या—छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रमे कहा गया है* कि 'यह मेरे हृदयके अंदर रहनेवाला अन्तर्यामी आत्मा है । यह ब्रह्म है ।' इस कथनमें 'एषः' ( यह ) 'आत्मा' तथा 'ब्रह्म' ये प्रथमान्त शब्द उपास्यदेवके लिये प्रयुक्त हुए हैं और 'मे' अर्थात् 'मेरा' यह षष्ठ्यन्त पद भिन्नरूपसे उपासक जीवात्माके लिये प्रयुक्त हुआ है । इस प्रकार दोनोके लिये प्रयुक्त हुए शब्दोंमे भेद होनेके कारण उपास्यदेव जीवात्मासे भिन्न सिद्ध होता है । अतः जीवात्माको उपास्यदेव नहीं माना जा सकता । सम्बन्ध—इसके सिवा— स्मृतेश्च ॥ १ । २ । ६ ॥ स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे; च=भी ( उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है ) । व्याख्या—श्रीमद्भगवद्गीता आदि स्मृति-ग्रन्थसे भी उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है । जैसे— मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ ( गीता १२ । ८ ) 'मुझमें ही मनको लगा और मुझमे ही बुद्धिको लगा, इसके पश्चात् तू मुझमे ही निवास करेगा अर्थात् मुझे ही प्राप्त करेगा; इसमे कुछ भी संशय नहीं है ।' अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ( गीता ८ । ५) 'और जो पुरुष अन्तकालमे मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्यागकर जाता है, वह मेरे स्वरूपको प्राप्त होता है; इसमे कुछ भी संशय नहीं है ।' अतः इस प्रसङ्गके वर्णनमे उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, आत्मा या अन्य कोई नहीं । यही मानना ठीक है ।

  • ये दोनों मन्त्र चौबीसवें पृष्ठकी टिप्पणीमें देखे ।

२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध-छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रोंमें उपास्यदेवको हृदयमें स्थित-एकदेशीय बतलाया है तथा तीसरे मन्त्रमें उसे सरसों और साँवाँसे भी छोटा बताया है; इस अवस्थामें उसे परब्रह्म कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं— अर्भकौकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्य- त्वादेवं व्योमवच्च ॥ १ । २ । ७ ॥ चेत्=यदि कहो; अर्भकौकस्त्वात्=उपास्यदेव हृदयरूप छोटे स्थानवाला है, इसलिये; च=तथा; तद्व्यपदेशात्=उसे अत्यन्त छोटा बताया गया है, इस कारण; न=वह ब्रह्म नहीं हो सकता; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं है; निचाय्यत्वात्=क्योंकि (वह) हृदयदेशमें द्रष्टव्य है, इसलिये; एवम्=उसके विषयमे ऐसा कहा गया है; च=तथा; व्योमवत्=वह आकाशकी भाँति सर्वत्र व्यापक है (इस दृष्टिसे भी ऐसा कहना उचित है)। व्याख्या—यदि कोई यह शङ्का करे कि छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रमे उपास्यदेवका स्थान हृदय बताया गया है, जो बहुत छोटा है तथा तीसरे मन्त्रमे उसे धान, जौ, सरसों तथा साँवाँसे भी अत्यन्त छोटा कहा गया है। इस प्रकार एकदेशीय और अत्यन्त लघु बताया जानेके कारण यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म नहीं हो सकता; क्योकि परब्रह्म परमात्माको सबसे बड़ा, सर्वव्यापी तथा सर्वशक्तिमान् बताया गया है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योकि उक्त मन्त्र- मे जो परब्रह्म परमात्माको हृदयमे स्थित बताया गया है, वह उसके उपलब्धि- स्थानकी अपेक्षासे है। भाव यह है कि परब्रह्म परमात्माका स्वरूप आकाशकी भाँति सूक्ष्म और व्यापक है। अतः वह सर्वत्र है। प्रत्येक प्राणीके हृदयमे भी है और उसके बाहर भी * (ईशा० ५)। (गीता १३ । १५)† अतएव

  • तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः। (ईशा० ५) † बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥ (गीता १३ । १५) 'वह परमात्मा चराचर सब भूतोके बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचररूप भी वही है तथा वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है और अत्यन्त समीप एवं दूरसे भी स्थित वही है।'

सूत्र ७-८ ] अध्याय १ २७

सूत्र ७-८ ] अध्याय १ २७ उसे हृदयस्थ बता देनेमात्रसे उसका एकदेशीय होना सिद्ध नहीं होता तथा जो उसे धान, जौ, सरसो और सार्षोसे भी छोटा बताया गया है, इससे श्रुतिका उद्देश्य उसे छोटे आकारवाला बताना नहीं है, अपितु अत्यन्त सूक्ष्म और इन्द्रियोंद्वारा अग्राह्य ( ग्रहण करनेमे न आनेवाला ) बतलाना है। इसीलिये उसी मन्त्रमे यह भी कहा गया है कि वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक और समस्त लोकोसे भी बड़ा है। भाव यह है कि वह इतना सूक्ष्म होते हुए भी समस्त लोकोंके बाहर-भीतर व्याप्त और उनसे परे भी है। सर्वत्र वही है। इसलिये यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध-परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमे स्थित होकर भी उनके सुख-दुःख- से अभिभूत नहीं होता; उसकी इस विशेषताको बतानेके लिये कहते हैं- संभोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ॥ १ । २ । ८ ॥ चेत्=यदि कहो; संभोगप्राप्तिः=( सबके हृदयमे स्थित होनेसे चेतन होनेके कारण उसको ) सुख-दुःखोंका भोग भी प्राप्त होता होगा; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; वैशेष्यात्=क्योंकि जीवात्माकी अपेक्षा उस परब्रह्ममे विशेषता है। व्याख्या-यदि कोई यह शङ्का करे कि आकाशकी भाँति सर्वव्यापक परमात्मा समस्त प्राणियोंके हृदयमे स्थित होनेके कारण उन जीवोंके सुख-दुःखों- का भोग भी करता ही होगा; क्योकि वह आकाशकी भाँति जड नहीं, चेतन है और चेतनमे सुख-दुःखकी अनुभूति स्वाभाविक है, तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि परमात्मामे कर्तापनका अभिमान और भोक्तापन नहीं है। वह सबके हृदयमे रहता हुआ भी उनके गुण-दोषोसे सर्वथा असङ्ग है। यही जीवोकी अपेक्षा उसमे विशेषता है। जीवात्मा तो अज्ञानके कारण कर्ता और भोक्ता है; किन्तु परमात्मा सर्वथा निर्विकार है। वह केवलमात्र साक्षी है, भोक्ता नहीं (मु० उ० ३ । १ । १)* इसलिये जीवोंके कर्मफलरूप सुख-दुःखादिसे उसका सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है। सम्बन्ध--ऊपर कहे हुए प्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि सबके हृदयमें निवास करते हुए भी परब्रह्म भोक्ता नहीं है; परन्तु वेदान्तमें कहीं-कहीं परमात्मा- को भोक्ता भी बताया गया है ( क० उ० १ । २ । २५ )। फिर वह वचन

  • तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ ( मु० उ० ३ । १ । १ );

प्रकरणाच्च ॥ १ । २ । १० ॥

२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ किसी अन्यके विषयमें है या उसका कोई दूसरा ही अर्थ है ? यह निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं— अत्ता चराचरग्रहणात् ॥ १ । २ । ९ ॥ चराचरग्रहणात्=चर और अचर सबको ग्रहण करनेके कारण यहाँ; अत्ता=भोजन करनेवाला अर्थात् प्रलयकालमे सबको अपनेमे विलीन करनेवाला ( परब्रह्म परमेश्वर ही है ) । व्याख्या—कठोपनिषद् ( १ । २ । २५) मे कहा गया है कि 'यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥' अर्थात् '( संहारकालमे ) जिस परमेश्वरके ब्राह्मण और क्षत्रिय अर्थात् समस्त स्थावर- जङ्गम प्राणीमात्र भोजन बन जाते हैं तथा सबका संहार करनेवाला मृत्यु उपसेचन ( व्यञ्जन—शाक आदि ) बन जाता है, वह परमेश्वर जहाँ और जैसा है, यह कौन जान सकता है ।' इस श्रुतिमे जिस भोक्ताका वर्णन है, वह कर्मफलरूप सुख-दुःख आदिका भोगनेवाला नहीं है । अपितु संहारकालमें मृत्युसहित समस्त चराचर जगत्को अपनेमें विलीन कर लेना ही यहाँ उसका भोक्तापन है । इसलिये परब्रह्म परमात्माको ही यहाँ अत्ता या भोक्ता कहा गया है, अन्य किसीको नहीं । सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— प्रकरणाच्च ॥ १ । २ । १० ॥ प्रकरणात्=प्रकरणसे; च=भी ( यही बात सिद्ध होती है ) । व्याख्या—उपर्युक्त मन्त्रके पूर्व बीसवेसे चौबीसवेतक परब्रह्म परमेश्वरका ही प्रकरण है । उसीके स्वरूपका वर्णन करके उसे जाननेका महत्त्व तथा उसकी कृपाको ही उसे जाननेका उपाय बताया गया है । उक्त मन्त्रमे भी उस परमेश्वर- को जानना अत्यन्त दुर्लभ बतलाया गया है, जो कि पहलेसे चले आते हुए प्रकरण- के अनुरूप है । अतः पूर्वापरके प्रसङ्गको देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही अत्ता ( भोजन करनेवाला ) कहा गया है । सम्बन्ध—अब यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि इसके बादवाली श्रुति ( १ । ३ । १ ) में (कर्मफलरूप ) 'ऋत' को पीनेवाले छाया और धूपके सदृश

सूत्र ९-११ ] अध्याय १ २९

सूत्र ९-११ ] अध्याय १ २९ दो भोक्ताओंका वर्णन है। यदि परमात्मा कर्मफलका भोक्ता नहीं है तो उक्त दो भोक्ता कौन-कौन-से हैं ? इसपर कहते हैं- गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ॥ १ । २ । ११ ॥ गुहाम्=हृदयरूप गुहामें; प्रविष्टौ=प्रविष्ट हुए दोनो; आत्मानौ=जीवात्मा और परमात्मा; हि=ही हैं; तद्दर्शनात्=क्योंकि ( दूसरी श्रुतिमें भी ) ऐसा ही देखा जाता है। व्याख्या-कठोपनिषद् ( १ । ३ । १ ) मे कहा है 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ।।' अर्थात् 'शुभ कर्मोंके फलरूप मनुष्य-शरीरके भीतर परब्रह्मके उत्तम निवास-स्थान ( हृदयाकाश ) मे बुद्धिरूप गुहामे छिपे हुए तथा 'सत्य' का पान करनेवाले दो हैं, वे दोनों छाया और धूपकी भाँति परस्पर विरुद्ध स्वभाववाले हैं। यह बात ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी कहते हैं। तथा जो तीन बार नाचिकेत अग्निका चयन करनेवाले पञ्चाग्नि-सम्पन्न गृहस्थ हैं, वे भी कहते हैं।' इस मन्त्रमे कहे हुए दोनो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही हैं। उन्हींका वर्णन छाया और धूपके रूपमें हुआ है। परमात्मा सर्वज्ञ, पूर्ण ज्ञानस्वरूप एवं स्वप्रकाश है, अतः उसका धूपके नामसे वर्णन किया गया है। और जीवात्मा अल्पज्ञ है। उसमे जो कुछ स्वल्प ज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है। जैसे छायामे जो थोड़ा प्रकाश होता है, वह धूपका ही अंग होता है। इसलिये जीवात्माको छायाके नाम- से कहा गया है। दूसरी श्रुतिमे भी जीवात्मा और परमात्माका एक साथ मनुष्य-शरीर- मे प्रविष्ट होना इस प्रकार कहा है-'सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि' ( छा० उ० ६ । ३ । २ ) अर्थात् 'उस देवता ( परमात्मा ) ने ईक्षण ( सङ्कल्प ) किया कि मै इस जीवात्माके सहित इन तेज आदि तीनों देवताओमे अर्थात् इनके कार्यरूप शरीरमे प्रविष्ट होकर नाम और रूपको प्रकट करूँ।' इससे भी यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त कठोपनिषद्‌के मन्त्रमे कहे हुए छाया और धूप सदृश दो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही हैं। यहाँ जो जीवात्माके साथ-साथ परमात्माको सत्य अर्थात् श्रेष्ठ कर्मोंके फलका भोगनेवाला बताया गया है, उसका यह भाव है कि परब्रह्म परमेश्वर ही समस्त देवता आदिके रूपमे प्रकारान्तरसे समस्त यज्ञ और तपरूप

३० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ शुभ कर्मोंके भोक्ता हैं। * परन्तु उनका भोक्तापन सर्वथा निर्दोष है, 'इसलिये वे भोगते हुए भी अभोक्ता ही हैं। † सम्बन्ध-उपर्युक्त कथनकी सिद्धिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं- विशेषाणाच्च ॥ १ । २ । १२ ॥ विशेषाणात् = (आगेके मन्त्रोंमें) दोनोंके लिये अलग-अलग विशेषण दिये गये हैं, इसलिये; च = भी (उपर्युक्त दोनों भोक्ताओंको जीवात्मा और परमात्मा मानना ही ठीक है)। व्याख्या-इसी अध्यायके दूसरे मन्त्रमे उस परम अक्षर ब्रह्मको संसारसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये 'अभय पद' बताया गया है। तथा उसके बाद रथके दृष्टान्तमें जीवात्माको रथी और उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्तव्य परमधामके नामसे कहा गया है। इस प्रकार उन दोनोंके लिये पृथक्-पृथक् विशेषण होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ जिनको गुहामें प्रविष्ट बताया गया है, वे जीवात्मा और परमात्मा ही है। सम्बन्ध-यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि परमात्माकी उपलब्धि हृदयमें होती है, इसलिये उसे हृदयमें स्थित बताना तो ठीक है, परन्तु छान्दोग्योपनिषद् (४।१५।१) में ऐसा कहा हे कि 'यह जो नेत्रमे पुरुष दीखता है, यह आत्मा है, यही अमृत हे, यही अभय और ब्रह्म है।' अतः यहाँ नेत्रमें स्थित पुरुष कौन है ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है- अन्तर उपपत्तेः ॥ १ । २ । १३ ॥ अन्तरे = जो नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाला कहा गया है, वह ब्रह्म ही है; उपपत्तेः = क्योंकि ऐसा माननेसे ही पूर्वापर-प्रसङ्गकी सङ्गति बैठती है। व्याख्या-यह प्रसङ्ग छान्दोग्योपनिषद्मे चौथे अध्यायके दशम खण्डसे आरम्भ हुआ है और पन्द्रहवे खण्डमें समाप्त। प्रसङ्ग यह है कि उपकोशल नामका

  • भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ ( गीता ५ । २९ ) अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । ( गीता ९ । २३ ) † सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ ( गीता १३ । १४)

सूत्र १२-१३ ] अध्याय १ ३१

सूत्र १२-१३ ] अध्याय १ ३१ ब्रह्मचारी सत्यकाम नामक ऋषिके आश्रममें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करता हुआ गुरुकी और अग्नियोंकी सेवा करता था । सेवा करते-करते उसे बारह वर्ष व्यतीत हो गये; परन्तु गुरुने उसे न तो उपदेश दिया और न स्नातक ही बनाया । इसके विपरीत उसीके साथ आश्रममे प्रविष्ट होनेवाले दूसरे शिष्योको स्नातक बनाकर घर भेज दिया । तब आचार्यसे उनकी पत्नीने कहा, 'भगवन् ! इस ब्रह्मचारीने अग्नियोकी अच्छी प्रकार सेवा की है । तपस्या भी इसने की ही है । अब इसे उपदेश देनेकी कृपा करे ।' परन्तु अपनी भार्याकी बातको अनसुनी करके सत्यकाम ऋषि उपकोशलको उपदेश दिये बिना ही बाहर चले गये । तब मनमे दुखी होकर उपकोशलने अनशन व्रत करनेका निश्चय कर लिया । यह देख आचार्य-पत्नीने पूछा —'ब्रह्मचारी ! तू भोजन क्यो नहीं करता है ?' उसने कहा, 'मनुष्यके मनमे बहुत-सी कामनाएँ रहती है । मेरे मनमे बड़ा दुःख है, इसलिये में भोजन नहीं करूँगा ।' तब अग्नियोने एकत्र होकर विचार किया कि 'इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है, अतः उचित है कि हम इसे उपदेश करे' ऐसा विचार करके अग्नियोने कहा—'प्राण ब्रह्म है, क ब्रह्म है, ख ब्रह्म है ।' उपकोशल बोला—'यह बात तो मै जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है । परन्तु 'क' और 'ख' को नहीं जानता ।' अग्नियोने कहा—'निस्सन्देह जो 'क' है, वही 'ख' है और जो 'ख' है, वही 'क' है तथा प्राण भी वही है ।' इस प्रकार उन्होने ब्रह्मको 'क' सुख-स्वरूप और 'ख' आकाशकी भाँति सूक्ष्म एव व्यापक बताया तथा वही प्राणरूपमे सबको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाला है; इस प्रकार सकेतसे ब्रह्मका परिचय कराया । उसके बाद गार्हपत्य अग्निने प्रकट होकर कहा—'सूर्यमे जो यह पुरुष दीखता है, वह मै हूँ; जो उपासक इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह पापोका नाश करके अच्छे लोकोका अधिकारी होता है तथा पूर्ण आयुष्मान् और उज्ज्वल जीवनसे युक्त होता है । उसका वश कभी नष्ट नहीं होता ।' इसके बाद 'अन्वाहार्यपचन' अग्निने प्रकट होकर कहा, 'चन्द्रमामे जो यह पुरुष दिखायी देता है, वह मै हूँ । जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर उपासना करता है, वह अच्छे लोकोका अधिकारी होता है ।' इत्यादि तत्पश्चात् आहवनीय अग्निने प्रकट होकर कहा, 'बिजलीमे जो यह पुरुष

३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ दीखता है, वह मैं हूँ ।' इसको जानकर उपासना करनेका फल भी उन्होंने दूसरी अग्नियोंकी भाँति ही बतलाया । तदनन्तर सब अग्नियोंने एक साथ कहा, 'हे उपकोशल ! हमने तुमको हमारी विद्या ( अग्नि-विद्या ) और आत्म-विद्या दोनों ही बतलायी है । आचार्य तुमको इनका मार्ग दिखलावेंगे ।' इतनेमें ही उसके गुरु सत्यकाम आ गये । आचार्यने पूछा, 'सौम्य ! तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताकी भाँति चमकता है, तुझे किसने उपदेश दिया है ?' उपकोशलने अग्नियोंकी ओर संकेत किया । आचार्यने पूछा, 'इन्होंने तुझे क्या बतलाया है ?' तब उपकोशलने अग्नियोंसे सुनी हुई सब बातें बता दीं । तत्पश्चात् आचार्यने कहा, 'हे सौम्य ! इन्होंने तुझे केवल उत्तम लोकप्राप्तिके साधनका उपदेश दिया है, अब मैं तुझे वह उपदेश देता हूँ, जिसको जान लेनेवालेको पाप उसी प्रकार स्पर्श नहीं कर सकते, जैसे कमलके पत्तेको जल ।' उपकोशलने कहा, 'भगवन् ! बतलानेकी कृपा कीजिये ।' इसके उत्तरमें आचार्यने कहा, 'जो नेत्रमे यह पुरुष दिखलायी देता है, यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय और ब्रह्म है ।' उसके बाद उसीको 'संयद्वाम' 'वामनी' और 'भामनी' बतलाकर अन्तमें इन विद्याओका फल अर्चिर्मागसे ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है । इस प्रकरणको देखनेसे मालूम होता है कि आँखके भीतर दीखनेवाला पुरुष परब्रह्म ही है, जीवात्मा या प्रतिबिम्बके लिये यह कथन नहीं है; क्योकि ब्रह्मविद्या- के प्रसङ्गमे उसका वर्णन करके उसे आत्मा, अमृत, अभय और ब्रह्म कहा है । इन विशेषणोंकी उपपत्ति ब्रह्ममे ही लग सकती है, अन्य किसीमे नहीं । सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि यहाँ ब्रह्मको आँखमे दीखनेवाला पुरुष क्यों कहा गया ? वह किसी स्थानविशेषमें रहनेवाला थोड़े ही है ? इसपर कहते हैं— स्थानादिव्यपदेशाच्च ॥ १ । २ । १४ ॥ स्थानादिव्यपदेशात् = श्रुतिमे अनेक स्थलोंपर ब्रह्मके लिये स्थान आदिका निर्देश किया गया है, इसलिये; च = भी ( नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है ) । व्याख्या—श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मको समझानेके लिये उसके स्थान तथा नाम, रूप आदिका वर्णन किया गया है । जैसे अन्तर्यामि-ब्राह्मण ( बृह० उ० ३ । ७ । ३—२३ ) में ब्रह्मको पृथ्वी आदि अनेक स्थानोंमें स्थित बताया

सूत्र १४-१६ ] अध्याय १ ३३

सूत्र १४-१६ ] अध्याय १ ३३ गया है। इसी प्रकार अन्य श्रुतियोमे भी वर्णन आया है। अतः यहाँ ब्रह्मको नेत्रमे दीखनेवाला कहना अयुक्त नहीं है; क्योकि ब्रह्म निर्लिप्त है और आँखमे दीखनेवाला पुरुष भी आँखके दोषोसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है। इस समानताको लेकर ब्रह्मका तत्त्व समझानेके लिये ऐसा कहना उचित ही है। इसीलिये वहाँ यह भी कहा है कि 'आँखमे घी या पानी आदि जो भी वस्तु डाली जाती है, वह आँखकी पलकोंमें ही रहती है, द्रष्टा पुरुषका स्पर्श नहीं कर सकती।' सम्बन्ध—उक्त सिद्धान्तको दृढ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॥ १ । २ । १५ ॥ च=तथा; सुखविशिष्टाभिधानात्=नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको आनन्दयुक्त बताया गया है, इसलिये; एव=भी (यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म ही है)। व्याख्या—उक्त प्रसङ्गमे यह कहा गया है कि 'यह नेत्रमे दीखनेवाला पुरुष ही अमृत, अभय और ब्रह्म है।' इस कथनमे निर्भयता और अमृतत्व—ये दोनो ही सुखके सूचक हैं। तथा जब अग्नियोने एकत्र होकर पहले-पहल उपदेश दिया है, वहाँ कहा गया है कि जो 'क' अर्थात् सुख है, वही 'ख' अर्थात् 'आकाश' है। भाव यह है कि वह ब्रह्म आकाशकी भाँति अत्यन्त सूक्ष्म, सर्वव्यापी और आनन्दस्वरूप है। इस प्रकार उसे आनन्दयुक्त बतलाया जानेके कारण वह ब्रह्म ही है। सम्बन्ध—इसके सिवा, श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ॥ १ । २ । १६ ॥ श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानात्=उपनिषद् अर्थात् रहस्य-विज्ञानका श्रवण कर लेनेवाले ब्रह्मवेत्ताकी जो गति बतायी है, वही गति इस पुरुषको जाननेवालेकी भी कही गयी है, इससे; च=भी (यही ज्ञात होता है कि नेत्रमे दीखनेवाला पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)। व्याख्या—इस प्रसङ्गके अन्तमे इस नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको जाननेवालेकी वही पुनरावृत्तिरहित गति अर्थात् देवयानमार्गसे जाकर ब्रह्मलोकमे ब्रह्मको प्राप्त होने और वहाँसे पुनः इस संसारमे न लौटनेकी बात बतायी गयी है; जो अन्यत्र वे० द० ३—

३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ ब्रह्मवेत्ताके लिये कही गयी है ( प्र० उ० १ । १० ) * । इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ नेत्रमें दीखनेवाला पुरुष ब्रह्म ही है । सम्बन्ध—यदि इस प्रकरणमें नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाले प्रतिबिम्ब, नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा—इनमेंसे किसी एकको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं— अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ॥ १ । २ । १७ ॥ अनवस्थितेः = अन्य किसीकी नेत्रमें निरन्तर स्थिति न होनेके कारण; च = तथा; असम्भवात् = ( श्रुतिमें बताये हुए अमृतत्व आदि गुण ) दूसरे किसीमें सम्भव न होनेसे; इतरः = ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भी; न = नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं है । व्याख्या—छाया-पुरुष या प्रतिबिम्ब नेत्रेन्द्रियमें सदा नहीं रहता; जब कोई पुरुष सामने आता है, तब उसका प्रतिबिम्ब नेत्रमे दिखायी देता है और उसके हटते ही अदृश्य हो जाता है । इन्द्रियानुग्राहक देवताकी स्थिति भी नेत्रमे सदा नहीं रहती, जिस समय वह इन्द्रिय अपने विषयको ग्रहण करती है, उसी समय वह उसके सहायक रूपसे उसमें स्थित माना जाता है । इसी प्रकार जीवात्मा भी मनके द्वारा एक समय किसी एक इन्द्रियके विषयको ग्रहण करता है तो दूसरे समय दूसरी ही इन्द्रियके विषयको; और सुषुप्तिमे तो किसीके भी विषयको नहीं ग्रहण करता । अतः निरन्तर एक-सी स्थिति आँखमे न रहनेके कारण इन तीनोमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं कहा जा सकता । इसके सिवा, नेत्रमे दिखायी देनेवाले पुरुषके जो अमृतत्व और निर्भयता आदि गुण श्रुतिने बताये है, वे ब्रह्मके अतिरिक्त और किसीमे सम्भव नहीं है; इस कारण भी उपर्युक्त तीनोंमेंसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं माना जा सकता । इसलिये परब्रह्म परमेश्वरको ही यहाँ नेत्रमे दिखायी देनेवाला पुरुष कहा गया है; यही मानना ठीक है।

  • अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः । 'किन्तु जो तपस्याके साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक और श्रद्धासे युक्त होकर अध्यात्मविद्याके द्वारा परमात्माकी खोज करके जीवन सार्थक कर लेते हैं, वे उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकको जीत लेते ( प्राप्त कर लेते ) हैं । यही प्राणोंका केन्द्र है । यह अमृत और निर्भय पद है । यह परम गति है । इससे पुनः लौटकर नहीं आते । इस प्रकार यह निरोध— पुनरावृत्ति-निवारक है ।'

सूत्र १७—१९ ] अध्याय १ ३५

सूत्र १७—१९ ] अध्याय १ ३५ सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें यह बात बतायी गयी है कि श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मके लिये भिन्न-भिन्न स्थान आदिका निर्देश किया गया है । अब पुनः अधिदैव, अधिभूत आदिमें उस ब्रह्मकी व्याप्ति बतलाकर उसी बातका समर्थन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १ । २ । १८ ॥ अधिदैवादिषु = अधिदैविक और आध्यात्मिक आदि समस्त वस्तुओंमें; अन्तर्यामी = जिसे अन्तर्यामी बतलाया गया है (वह परब्रह्म ही है); तद्धर्म- व्यपदेशात् = क्योंकि वहाँ उसीके धर्मोंका वर्णन है । व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद् (३ । ७) में यह प्रसङ्ग आया है। वहाँ उद्दालक ऋषिने याज्ञवल्क्य मुनिसे पहले तो सूत्रात्माके विषयमें प्रश्न किया है; फिर उस अन्तर्यामीके सम्बन्धमे पूछा है, जो इस लोक और परलोकको तथा समस्त भूत-प्राणियोंको उनके भीतर रहकर नियन्त्रणमे रखता है । इसके उत्तरमे याज्ञवल्क्यने सूत्रात्मा तो वायुको बताया है और अन्तर्यामीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उसे जड-चेतनात्मक समस्त भूतो, सब इन्द्रियो और सम्पूर्ण जीवोंका नियन्ता बताकर अन्तमे इस प्रकार कहा है—'वह अन्तर्यामी देखनेमे न आने- वाला किन्तु स्वयं सबको देखनेवाला है, सुननेमें न आनेवाला किन्तु स्वयं सब कुछ सुननेवाला है और मनन करनेमे न आनेवाला किन्तु स्वयं सबका मनन करनेवाला है । वह विशेषरूपसे किसीके जाननेमे नहीं आता, किन्तु स्वयं सबको विशेषरूपसे भलीभाँति जानता है । ऐसा यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इससे भिन्न सब कुछ विनाशशील है ।' इस वर्णनमे आये हुए महत्त्वसूचक विशेषण परब्रह्ममे ही सङ्गत हो सकते हैं । जीवात्माका अन्तर्यामी आत्मा ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई नहीं हो सकता । अतः इस प्रसङ्गमे ब्रह्मको ही अन्तर्यामी बताया गया है—यही मानना ठीक है । सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें विधि-मुखसे यह बात सिद्ध की गयी कि अन्तर्यामी ब्रह्म ही है । अब निषेधमुखसे यह सिद्ध करते हैं कि अव्यक्त जड प्रकृति अन्तर्यामी नहीं हो सकती— न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापात् ॥ १ । २ । १९ ॥

३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ स्मार्तम्=सांख्यस्मृतिद्वारा प्रतिपादित प्रधान (जड प्रकृति); च=भी; न= अन्तर्यामी नहीं है; अतद्धर्माभिलापात्=क्योकि इस प्रकरणमे बताये हुए द्रष्टापन आदि धर्म प्रकृतिके नहीं है । व्याख्या—सांख्य-स्मृतिद्वारा प्रतिपादित जड प्रकृतिके धर्मोंका वर्णन वहाँ अन्तर्यामीके लिये नहीं हुआ है; अपितु चेतन परब्रह्मके धर्मोंका ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । इस कारण वहाँ कहा हुआ अन्तर्यामी प्रकृति नहीं हो सकती । अतः यही सिद्ध होता है कि इस प्रकरणमे 'अन्तर्यामी' के नामसे पर- ब्रह्म परमात्माका ही वर्णन हुआ है । सम्बन्ध—यह ठीक है कि जड होनेके कारण प्रकृतिको अन्तर्यामी नहीं कहा जा सकता । परन्तु जीवात्मा तो चेतन है तथा वह शरीर और इन्द्रियोंके भीतर रहनेवाला और उनका नियमन करनेवाला भी प्रत्यक्ष है । अतः उसीको अन्तर्यामी मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते है— शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॥ १ । २ । २० ॥ शारीरः=शरीरमे रहनेवाला जीवात्मा; च=भी; ( न= ) अन्तर्यामी नहीं है; हि=क्योकि; उभयेऽपि=माध्यन्दिनी तथा काण्व दोनो ही शाखावाले; एनम्=इस जीवात्माको; भेदेन=अन्तर्यामीसे भिन्न समझते हुए; अधीयते=अध्ययन करते है । व्याख्या—माध्यन्दिनी और काण्व—दोनो शाखाओवाले विद्वान् अन्तर्यामीको पृथिवी आदिकी भाँति जीवात्माके भी भीतर रहकर उसका नियमन करनेवाला मानते है । वहाँ जीवात्माको नियम्य और अन्तर्यामीको नियन्ता बताया गया है । इस प्रकार दोनोका पृथक्-पृथक् वर्णन होनेके कारण वहाँ 'अन्तर्यामी' पद परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, जीवात्माका नहीं । १. 'य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मान- मन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।' (शतपथब्रा० १४ । ५ । ३० ) २. 'यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञान५ शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।' ( बृ० उ० ३ । ७ । २२ ) 'जो जीवात्मामे रहनेवाला, जीवात्माके भीतर है, जिसे जीवात्मा नही जानता, जीवात्मा जिसका शरीर है और जो उसके भीतर रहकर जीवात्माका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ।'

सूत्र २०-२१ ] अध्याय १ ३७

सूत्र २०-२१ ] अध्याय १ ३७ सम्बन्ध—उन्नीसवें सूत्रमे यह बात कही गयी है कि द्रष्टापन आदि चेतनके धर्म जड प्रकृतिमे नहीं घट सकते; इसलिये वह अन्तर्यामी नहीं हो सकती । इसपर यह जिज्ञासा होती है कि मुण्डकोपनिषद्में जिसको अदृश्यता, अग्राह्यता आदि धर्मोंसे युक्त बतलाकर अन्तमे भूतोंका कारण बताया गया है, वह तो प्रकृति हो सकती है; क्योंकि उस जगह बताये हुए सभी धर्म प्रकृतिमें पाये जाते हैं। इसपर कहते हैं— अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ॥ १ । २ । २१ ॥ अदृश्यत्वादिगुणकः=अदृश्यता आदि गुणोंवाला परब्रह्म परमेश्वर ही है; धर्मोक्तेः=क्योंकि उस जगह उसीके सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है । व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्मे यह प्रसङ्ग आया है कि महर्षि शौनक विधि- पूर्वक अङ्गिरा ऋषिकी शरणमे गये । वहाँ जाकर उन्होने पूछा—'भगवन् ! किसको जान लेनेपर यह सब कुछ जाना हुआ हो जाता है ?' इसपर अङ्गिराने कहा—'जानने योग्य विद्याएँ दो हैं, एक अपरा, दूसरी परा । उनमेसे अपरा विद्या तो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष है और परा वह है, जिससे उस अक्षर ब्रह्मको जाना जाता है ।' यह कहकर उस अक्षरको समझानेके लिये अङ्गिराने उसके गुण और धर्मोंका वर्णन करते हुए ( मु० १ । १ । ६ मे ) कहा— 'यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं तद् भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥' अर्थात् 'जो इन्द्रियोंद्वारा अगोचर है, पकड़नेमे आनेवाला नहीं है, जिसका कोई गोत्र नहीं है, वर्ण नहीं है, जो आँख, कान तथा हाथ-पैरसे रहित है, नित्य, व्यापक, सर्वत्र परिपूर्ण, अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वथा अविनाशी है । उसको धीर पुरुष देखते है, वह समस्त भूतोका परम कारण है ।' फिर नवम मन्त्रमे कहा है— 'यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥'

३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ 'जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, ज्ञान ही जिसका तप है, उसीसे यह विराट्रूप समस्त जगत् तथा नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते हैं।' यहाँ जिन सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है, वे परब्रह्म परमेश्वरके ही हैं। तथा एक ब्रह्मको जान लेनेपर ही सब कुछ जाना हुआ हो सकता है, अन्य किसीके जाननेसे नहीं। इसलिये उस प्रकरणमें जिसे अदृश्यता आदि गुणोंवाला बताया गया है, वह परब्रह्म परमात्मा ही है, जीवात्मा या प्रकृति नहीं। सम्बन्ध—इसी बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ॥ १ । २ । २२ ॥ विशेषणभेदव्यपदेशाभ्याम् = परमेश्वरसूचक विशेषणोंका कथन होनेसे तथा प्रकृति और जीवात्मासे उसको भिन्न बताये जानेके कारण; च = भी; इतरौ = जीवात्मा और प्रकृति; न = अदृश्यता आदि गुणोंवाला जगत्कारण नहीं हो सकते। व्याख्या—इस प्रकरणमे जिसको अदृश्यता आदि गुणोसे युक्त और सब भूतोंका कारण बताया गया है, उसके लिये 'सर्वज्ञ' आदि विशेषण दिये गये हैं, जो न तो प्रधान (जड प्रकृति) के लिये उपयुक्त हो सकते हैं और न अल्पज्ञ जीवात्माके लिये ही। इसके सिवा, उन दोनोको ब्रह्मसे भिन्न कहा गया है। मुण्डकोपनिषद् (३। १। ७) मे उल्लेख है कि—'पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम्।' अर्थात् वह देखनेवालोके शरीरके भीतर यहीं हृदय-गुफामे छिपा हुआ है।' इसके अनुसार जीवात्मासे परमात्माकी भिन्नता स्वतः स्पष्ट हो जाती है। इसके सिवा, मुण्डक० ३। १। २ मे भी कहा है कि— 'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः। जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥' 'शरीररूप वृक्षपर रहनेवाला यह जीवात्मा शरीरमे आसक्त होकर डूब रहा है। अपनेको असमर्थ समझकर मोहित हो शोक करता रहता है। परन्तु वह जब वहीं स्थित तथा भक्तजनोद्वारा सेवित अपनेसे भिन्न परमेश्वरको देख लेता है और उसकी महिमाको समझ लेता है, तब सर्वथा शोकरहित हो जाता है।' इस प्रकार इस मन्त्रमे स्पष्ट शब्दोद्वारा परमेश्वरको जीवात्मासे तथा शरीररूपी वृक्षसे भी भिन्न बताया गया है। अतः यहाँ जीव और

सूत्र २२-२४ ] अध्याय १ ३९

सूत्र २२-२४ ] अध्याय १ ३९ प्रकृति दोनोंमेंसे कोई भी अदृश्यता आदि गुणोंसे युक्त जगत्-कारण नहीं हो सकता । सम्बन्ध-इस प्रकरणमें जिसे समस्त भूतोंका कारण बताया गया है, वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, इसकी पुष्टिके लिये दूसरा प्रमाण उपस्थित करते हैं— रूपोपन्यासाच्च ॥ १ । २ । २३ ॥ रूपोपन्यासात् = श्रुतिमे उसीके निखिल लोकमय विराट् स्वरूपका वर्णन किया गया है, इससे; च = भी (वह परमेश्वर ही समस्त भूतोका कारण सिद्ध होता है)। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् (२ । १ । ४) में परब्रह्म परमेश्वरके सर्वलोकमय विराट्स्वरूपका वर्णन इस प्रकार किया गया है— 'अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥' 'अग्नि इस परमेश्वरका मस्तक है, चन्द्रमा ओर सूर्य दोनों नेत्र है, सब दिशाएँ दोनो कान हैं और प्रकट हुए वेद उसकी वाणी हैं । वायु इसका प्राण और संपूर्ण विश्व हृदय है । इसके पैरोंसे पृथिवी उत्पन्न हुई है । यही समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा है।' इस प्रकार परमात्माके विराट् स्वरूपका उल्लेख करके उसे सबका अन्तरात्मा बताया गया है; इसलिये उक्त प्रकरणमे 'भूतयोनि'के नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है, यह निश्चय होता है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद् (५ । १८ । २) में 'वैश्वानर'के स्वरूपका वर्णन करते हुए 'द्युलोक'को उसका मस्तक बताया है । 'वैश्वानर' शब्द जठराग्निका वाचक है । अतः यह वर्णन जठरानलके विषयमें है या अन्य किसीके ? इस शङ्काका निवारण करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है— वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॥ १ । २ । २४ ॥ वैश्वानरः = ( वहाँ ) 'वैश्वानर' नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है; साधारणशब्दविशेषात् = क्योकि उस वर्णनमे 'वैश्वानर' और 'आत्मा' इन साधारण शब्दोकी अपेक्षा ( परब्रह्मके बोधक ) विशेष शब्दोका प्रयोग हुआ है ।

४० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्मे पाँचवे अध्यायके ग्यारहवे खण्डसे जो प्रसङ्ग आरम्भ हुआ है, वह इस प्रकार है—'प्राचीनशाल, सत्ययज्ञ, इन्द्रद्युम्न, जन तथा बुडिल—ये पाँचो ऋषि श्रेष्ठ गृहस्थ और महान् वेदवेत्ता थे। इन्होंने एकत्र होकर परस्पर विचार किया कि 'हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्मका क्या स्वरूप है ?' जब वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सके तो यह निश्चय किया कि 'इस समय महर्षि उद्दालक वैश्वानर आत्माके ज्ञाता हैं, हमलोग उन्हींके पास चले।' इस निश्चयके अनुसार वे पाँचो ऋषि उद्दालक मुनिके यहाँ गये। उन्हें देखते ही मुनिने अनुमान कर लिया कि 'ये लोग मुझसे कुछ पूछेंगे, किन्तु मैं इन्हें पूर्णतया उत्तर नहीं दे सकूँगा। अतः अच्छा हो कि मैं इन्हें पहलेसे ही दूसरा उपदेष्टा बतला दूँ।' यह सोचकर उद्दालकने उनसे कहा— 'आदरणीय महर्षियो ! इस समय केवल राजा अश्वपति ही वैश्वानर आत्माके ज्ञाता हैं। आइये, हम सब लोग उनके पास चले।' यों कहकर उन सबके साथ उद्दालक मुनि वहाँ गये। राजाने उन सबका यथोचित सत्कार किया और दूसरे दिन उनसे यज्ञमे सम्मिलित होनेके लिये प्रार्थना करते हुए उन्हें पर्याप्त धन देनेकी बात कही। इसपर उन महर्षियोंने कहा--'हमें धन नहीं चाहिये, हम जिस प्रयोजनसे आपके पास आये हैं, वही दीजिये। हमें पता लगा है, आप वैश्वानर आत्माको जानते हैं, उसीका हमारे लिये उपदेश करे।' राजाने दूसरे दिन उन्हें अपने पास बुलाया और एक-एकसे क्रमशः पूछा, 'इस विषयमे आपलोग क्या जानते हैं ?' उनमेंसे उपमन्युपुत्र प्राचीनशालने उत्तर दिया— 'मैं 'द्युलोक'को आत्मा समझकर उसकी उपासना करता हूँ।' फिर सत्ययज्ञ बोले—'मैं सूर्यकी उपासना करता हूँ।' इन्द्रद्युम्नने कहा—'मैं वायुकी उपासना करता हूँ।' जनने अपनेको आकाशका और बुडिलने जलका उपासक बताया। इन सबकी बात सुनकर राजाने कहा--'आपलोग उस विश्वके आत्मा वैश्वानरकी उपासना तो करते हैं; परन्तु उसके एक-एक अङ्गकी ही उपासना आपके द्वारा होती है; अतः यह सर्वाङ्गपूर्ण नहीं है; क्योंकि—'तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः।' अर्थात् 'उस इस विश्वके आत्मा वैश्वानरका द्युलोक मस्तक है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, आकाश शरीरका मध्यभाग है, जल वस्ति-स्थान है,

सूत्र २५-२६ ] अध्याय १ ४१

सूत्र २५-२६ ] अध्याय १ ४१ पृथिवी दोनो चरण है, वेदी वक्षःस्थल है, दर्भ लोम है, गार्हपत्य अग्नि हृदय है अन्वाहार्यपचन अग्नि मन है और आहवनीय अग्नि मुख है।' इस वर्णनसे मालूम होता है कि यहाँ विश्वके आत्मारूप विराट् पुरुषको ही वैश्वानर कहा गया है; क्योकि इस प्रकरणमे जठराग्नि आदिके वाचक साधारण शब्दोकी अपेक्षा, परब्रह्मके वाचक विशेष शब्दोका जगह-जगह प्रयोग हुआ है। सम्बन्ध-इसी बातको दृढ करनेके लिये दूसरा कारण प्रस्तुत करते हैं— स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ॥ १ । २ । २५ ॥ स्मर्यमाणम्=स्मृतिमे जो विराट्स्वरूपका वर्णन है, वह; अनुमानम्= मूलभूत श्रुतिके वचनका अनुमान कराता हुआ वैश्वानरके 'परमेश्वर' होनेका निश्चय करानेवाला है; इति स्यात्=इसलिये इस प्रकरणमे वैश्वानर परमात्मा ही है। व्याख्या-महाभारत, शान्तिपर्व ( ४७ । ७० ) मे कहा है— 'यस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः । सूर्यश्चक्षु. दिशः श्रोत्रं तस्मै लोकात्मने नमः ॥' 'अग्नि जिसका मुख, द्युलोक मस्तक, आकाश नाभि, पृथिवी दोनो चरण, सूर्य नेत्र तथा दिशाएँ कान है, उस सर्वलोकस्वरूप परमात्माको नमस्कार है।' इस प्रकार इस स्मृतिमे परमेश्वरका अखिल विश्वके रूपमें वर्णन आया है। स्मृति- के वचनसे उसकी मूलभूत किसी श्रुतिका होना सिद्ध होता है। उपर्युक्त छान्दोग्य-श्रुतिमे जो वैश्वानरके स्वरूपका वर्णन है, वही पूर्वोक्त स्मृतिवचनका मूल आधार है। अतः यहाँ उस परब्रह्मके विराट्स्वरूपको ही वैश्वानर कहा गया है, यह बात स्मृतिसे भी सिद्ध होती है। अतएव जहाँ-जहाँ आत्मा या परमात्माके वर्णनमे 'वैश्वानर' शब्दका प्रयोग आवे, वहाँ उसे परब्रह्मके विराट्स्वरूपका ही वाचक मानना चाहिये, जठरानल या जीवात्माका नहीं। माण्डूक्योपनिषद्मे ब्रह्मके चार पादोका वर्णन करते समय ब्रह्मका पहला पाद वैश्वानरको बताया है। वहाँ भी वह परमेश्वरके विराट्स्वरूपका ही वाचक है; जठराग्नि या जीवात्माका नहीं। सम्बन्ध-उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उपस्थित करके उसका समाधान करते हैं— शब्दादिभ्योऽन्तःप्रतिष्ठानाच्च नेति चेन्न तथा दृष्ट्युपदेशाद- संभवात्पुरुषमपि चैनमधीयते ॥ १ । २ । २६ ॥

प्रकरणमे वैश्वानर शब्द परब्रह्मका ही वाचक है )।

४२ वेदान्त-दर्शन [पाद २ चेत्=यदि कहो; शब्दादिभ्यः=शब्दादि हेतुओंसे अर्थात् अन्य श्रुतिमे वैश्वानर शब्द अग्निके अर्थमे विशेषरूपमें प्रयुक्त हुआ है और इस मन्त्रमे गार्हपत्य आदि अग्नियोंको वैश्वानरका अङ्ग बताया गया है, इसलिये; च=तथा; अन्तः- प्रतिष्ठानात्=श्रुतिमें वैश्वानरको शरीरके भीतर प्रतिष्ठित कहा गया है, इसलिये भी; न=(यहाँ वैश्वानर शब्द परब्रह्म परमात्माका वाचक) नहीं है; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं है; तथा दृष्ट्युपदेशात्=क्योंकि वहाँ वैश्वानरमें ब्रह्मदृष्टि 'करनेका उपदेश है; असंम्भवात्=इसके सिवा, केवल जठरानलका विराट्रूपमें वर्णन होना संभव नहीं है, इसलिये; च=तथा; एनम्=इस वैश्वानरको; पुरुषम्=‘पुरुष’ नाम देकर; अपि=भी; अधीयते=पढ़ते है ( इसलिये उक्त प्रकरणमे वैश्वानर शब्द परब्रह्मका ही वाचक है )। व्याख्या—यदि कहो कि अन्य श्रुतिमे ‘स यो हैतमेवमग्निं वैश्वानरं पुरुषविधं पुरुषेऽन्तःप्रतिष्ठितं वेद ।’ ( शतपथब्रा० १०।६।१।११) अर्थात् ‘जो इस वैश्वानर अग्निको पुरुषके आकारका तथा पुरुषके भीतर प्रतिष्ठित जानता है ।’ इस प्रकार वैश्वानर शब्द अग्निके विशेषणरूपसे प्रयुक्त हुआ है, तथा जिस श्रुतिपर विचार चल रहा है, इसमे भी गार्हपत्य आदि तीनो अग्नियोको वैश्वानरका अङ्ग बताया गया है । इसी प्रकार भगवद्गीतामें भी कहा है कि ‘मैं ही वैश्वानररूपसे प्राणियोंके शरीरमे स्थित हो चार प्रकारके अन्नका पाचन करता हूँ।’ (१५।१४) इन सब कारणोंसे यहाँ वैश्वानरके नामसे जठराग्निका ही वर्णन है, परमात्माका नहीं, तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योकि शतपथब्राह्मणकी श्रुतिमें जो वैश्वानर अग्निको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्म- दृष्टि करानेके उद्देश्यसे ही है । यदि ऐसा न होता तो उसको पुरुष नहीं कहा जाता । तथा श्रीमद्भगवद्गीतामे भी जो वैश्वानर अग्निको सब प्राणियोंके शरीरमें स्थित बताया है, वहाँ भी उसमे परमात्मबुद्धि करानेके लिये भगवान्ने अपनी विभूतिके रूपमे ही कहा है । इसके सिवा, जिसपर विचार चल रहा है, उस श्रुतिमे समस्त ब्रह्माण्डको ‘वैश्वानर’ का शरीर बताया है, सिरसे लेकर पैरतक उसके अङ्गोमे समस्त लोकोंकी कल्पना की गयी है । यह जठराग्निके लिये असम्भव भी है । एवं शतपथब्राह्मणमें तथा यहाँ भी इस वैश्वानरको पुरुषके आकारवाला और पुरुष कहा गया है; जो कि जठराग्निके उपयुक्त नहीं है । इन सब कारणोंसे इस प्रकरणमे कहा हुआ वैश्वानर परब्रह्म परमेश्वर ही है । जठराग्नि या अन्य कोई नहीं ।

सूत्र २७-२८ ] अध्याय १ ४३

सूत्र २७-२८ ] अध्याय १ ४३ सम्बन्ध—इस प्रसङ्गमें पृथक्-पृथक् उपास्यरूपसे आये हुए 'दिव्', 'आदित्य', 'वायु,' 'आकाश', 'जल' तथा 'पृथिवी' भी वैश्वानर नहीं है; यह सिद्ध करनेके लिये कहते हैं— अत एव न देवता भूतं च ॥ १ । २ । २७ ॥ अतः=उपर्युक्त कारणोंसे; एव=ही ( यह भी सिद्ध होता है कि ); देवता=द्यौ, सूर्य आदि लोकोंके अधिष्ठाता देवगण; च=और; भूतम्=आकाश आदि भूतसमुदाय ( भी ); न=वैश्वानर नहीं है। व्याख्या—उक्त प्रकरणमे 'द्यौ' 'सूर्य' आदि लोकोकी तथा आकाश, वायु आदि भूतसमुदायकी अपने आत्माके रूपमे उपासना करनेका प्रसङ्ग आया है। इसलिये सूत्रकार स्पष्ट कर देते हैं कि पूर्वसूत्रमे बताये हुए कारणोसे यह भी समझ लेना चाहिये कि उन-उन लोकोके अभिमानी देवताओ तथा आकाश आदि भूतोंका भी 'वैश्वानर' शब्दसे ग्रहण नहीं है; क्योकि समस्त ब्रह्माण्डको वैश्वानरका शरीर बताया गया है। यह कथन न तो देवताओके लिये सम्भव हो सकता है और न भूतोके लिये ही। इसलिये यही मानना चाहिये कि 'जो विश्वरूप भी है और नर ( पुरुष ) भी, वह वैश्वानर है।' इस व्युत्पत्तिके अनुसार परब्रह्म परमेश्वरको ही वैश्वानर कहा गया है। सम्बन्ध—पहले २६वें सूत्रमें यह बात बतायी गयी है कि शतपथब्राह्मणके मन्त्रमे जो वैश्वानर अग्निको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्मदृष्टि करानेके उद्देश्यसे है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शालग्राम-शिलामें विष्णुकी उपासनाके सदृश यहाँ 'वैश्वानर' नामक जठराग्निमें परमेश्वरकी प्रतीकोपासना बतलानेके लिये 'वैश्वानर' नामसे उस परब्रह्मका वर्णन है; अतः इसपर सूत्रकार आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं— साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॥ १ । २ । २८ ॥ साक्षात्='वैश्वानर' शब्दको साक्षात् परब्रह्मका वाचक माननेमे; अपि=भी; अविरोधम्=कोई विरोध नहीं है, ऐसा; जैमिनिः ( आह )=आचार्य जैमिनि कहते हैं। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कथन है कि वैश्वानर शब्दको साक्षात् विश्वरूप ३*