चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
४८८ चरकसंहिता [ अ० १ सात्म्य—उस को कहते हैं कि जो अपनी देह के लिये सुखकारक या अनुकूल होता है। क्योंकि 'सात्म्य' का अर्थ 'उपशय' है । तत् त्रिविधं—प्रवरावरमध्यविभागेन । सप्तविधं च रसैकैकत्वेन, सर्वरसोपयोगाच्च ॥ १८॥ तत्र सर्वरसं प्रवरं, अवरमेकरसं, मध्यमं तु प्रवरावरमध्यस्थम् । तत्रावरमध्याभ्यां सात्म्याभ्यां क्रमेण प्रवरमुपपादयेत्सात्म्यम् । सर्वरस- मपि च द्रव्यं सात्म्यमुपपन्नं प्रकृत्याद्युपयोक्तृष्टमानि सर्वाण्याहारविधि- विशेषायतनान्यभिसमीक्ष्य हितमेवानुरुच्येत ॥ १६ ॥ सात्म्य के भेद—यह सात्म्य तीन प्रकार का है । ( १ ) प्रवर ( २ ) मध्यम और ( ३ ) अवर । अथवा सात प्रकार का है । जैसे एक एक रस से छः प्रकार का और सब रसों के उपयोग से सात प्रकार का है । इन सातों में सब रसों का सात्म्य 'प्रवर' है । 'एक रस का सात्म्य 'अवर' निकृष्ट है । प्रवर और अवर के मध्य में स्थित सात्म्य को 'मध्यम' कहते हैं । इन में अवर और मध्यम सात्म्य को क्रमशः प्रवर सात्म्य में परिवर्तित करने का प्रयत्न करना चाहिये । सब रसों का सात्म्य होने पर भी अर्थात् आहार-विधि के विशेष उपयोग और प्रकृति आदि सब प्रकार के आठों अंगों को देखकर हितकारक पदार्थों का सेवन करना चाहिये ॥ १८-१६ ॥ तत्र खल्विमान्यष्टावाहारविधिविशेषायतनानि भवन्ति । तद्यथा प्रकृति- करण-संयोग-राशि-देश-कालोपयोग-संस्थोपयोक्त्रष्टमानि भवन्ति ॥२०॥ आहार-विधि—ये निम्नलिखित आठ शर्ते आहार विधि में विशेष कारण या उसके अंग होती हैं । ( १ ) प्रकृति, ( २ ) करण, ( ३ ) संयोग, ( ४ ) राशि, (५) देश, (६) काल, (७) उपयोग-संस्था और (८) उपयोक्ता ॥ २० ॥ तत्र प्रकृतिरुच्यते । स्वभावो यः स पुनराहारौषधद्रव्याणां स्वाभा- विको गुर्वादिशुणयोगः । तद्यथा—माषमुद्गयोः, शूकरैणयोश्च ॥२१॥ उन में से प्रकृति का वर्णन करते हैं—( १ ) प्रकृति स्वभाव को कहते हैं । आहार-द्रव्य और औषध-द्रव्यों में जो गुरु, लघु आदि गुण स्वभाव से रहते हैं उन का नाम प्रकृति है । जैसे माष ( उड़द ) और शूकर के मांस स्वभाव से ही गुरु हैं और मूंग तथा हरिण के मांस स्वभाव से ही लघु होते हैं ॥ २१ ॥ करणं पुनः स्वाभाविकानां द्रव्याणामभिसंस्कारः, संस्कारो हि_ १.करीब सब रस के पदार्थ खाती है, इसलिये इस का मांस निर्दोष माना है ।
अ० १ ] विमानस्थानम् ४८१
अ० १ ] विमानस्थानम् ४८१ गुणान्तराधानमुच्यते । ते गुणाश्च तोयाग्निसंनिकर्षशौचमन्थनदेश- काल-वशेन भावनादिभिः कालप्रकर्षभाजनादिभिश्चाऽऽधीयन्ते ॥२२॥ ( २ ) करण—स्वाभाविक द्रव्यों के संस्कार का नाम 'करण' है । स्वा- भाविक गुण से भिन्न दूसरे गुण को उत्पन्न कर देने का नाम 'संस्कार' है । ये गुण जल, अग्नि के संयोग से, शौच ( धोने आदि से ), मन्थन ( बिलोने से ), देश, काल और स्वरस आदि की भावना से, समय की अधिकता से, ( पात्र आदि की भिन्नता से ), उत्पन्न कर दिये जाते हैं १। बिलोने पर दही के गुण भिन्न हो जाते हैं । दूध को मिट्टी के बर्त्तन और लोहे के बर्त्तन में पकाने पर उसके स्वाद में अन्तर आ जाता है ॥ २२ ॥ संयोगस्तु द्वयोर्बहूनां द्रव्याणां संहतीभावः, स विशेषमारभते यन्नैकैकशो द्रव्याण्यारभन्ते । तद्यथा मधुसर्पिषोः, मधुमत्स्यपयसां च संयोगः ॥ २३ ॥ ( ३ ) संयोग—दो या दो से अधिक पदार्थों का मिलना 'संयोग' कहाता है । संयोग विशेष कार्य उत्पन्न करता है जब कि अकेला २ द्रव्य वह कार्य उत्पन्न नहीं करता । जैसे, मधु और घी का समान मात्रा में संयोग मारक है, पृथक् पृथक् नहीं । इसी प्रकार मछली और दूध का संयोग कुछ रोग को उत्पन्न करता है, पृथक् पृथक् नहीं ॥२३॥ राशिस्तु सर्वग्रहपरिग्रहौ, मात्रामात्राफलविनिश्चयार्थः प्रकृतः । तत्र सर्वस्याऽऽहारस्य प्रमाणग्रहणमेकपिण्डेन सर्वग्रहः । परिग्रहश्च पुनः प्रमाणग्रहणमेकैकत्वेनाऽऽहारद्रव्याणाम् । सर्वस्य हि ग्रहः सर्वग्रहः । सर्वतश्च ग्रहः परिग्रह उच्यते ॥ २४ ॥ ( ४ ) राशि—दो प्रकार की होती है । ( १ ) सर्वग्रह और ( २ ) परिग्रह । राशि का प्रयोजन मात्रा और अमात्रा अर्थात् कम या अधिक मात्रा में भोजन या औषध के लेने से उत्पन्न अच्छे या बुरे परिणाम का निश्चय करना है । सम्पूर्ण आहार को एक पिण्ड की मात्रा में ग्रहण करने का नाम 'सर्वग्रह' है । आहार द्रव्यों को एक एक करके नियत प्रमाण में १. पानी से बार बार धोने पर पदार्थ के गुण बदल जाते हैं । यथा— 'सुधौतः, प्रस्रुतः, स्विन्नः, संतप्तश्चौदनो लघुः ।' मथने से—दधि शोथ करती है, [ मथने पर स्नेह होने पर भी शोथघ्न है । पात्र में—चांदी के पात्र में दही, [ के पात्र में पानी रखना उत्तम है । काल के कारण पन्द्रह दिन के पीछे या पिये । देशमें—राख के ढेर में रक्खे ।
४९० चरकसंहिता [अ० १ ग्रहण करने का नाम 'परिग्रह' है। सब भोज्य पदार्थों के समुदाय रूप में एक साथ मिलाकर उस में से ग्रहण करना 'सर्वग्रह' है और सब में से प्रत्येक से पृथक् पृथक् ग्रहण करना 'परिग्रह' है। (आहार मात्रा—अग्नि और आहार- द्रव्य की अपेक्षा करती है। इसलिये अग्नि बल की अपेक्षा से सर्वग्रह' और द्रव्य की अपेक्षा से परिग्रह समझना चाहिये ) ॥ २४ ॥ देशः पुनः स्थानं द्रव्याणामुत्पत्तिप्रचारौ देशसात्म्यं चाऽऽचष्टे ॥ २५॥ (५) देश का अर्थ है स्थान । यह स्थान (स्थावर और जंगम) द्रव्यों की उत्पत्ति, प्रचार के साथ साथ देश-सात्म्य को भी बताता है । उत्पत्ति से जैसे—हिमालय में उत्पन्न अन्नादि गुरु और मरु में लघु होता है। प्रचार से जैसे—लघु पदार्थ खाने वाले, मरु भूमि में विचरने वाले, बहुत फिरने वाले प्राणियों का मांस लघु होता है, अन्यों का गुरु । देशसात्म्य जैसे अनूप देश में उष्ण, रूक्ष और मरुभूमि में शीत स्निग्ध पदार्थ हितकारी हैं ॥ २५ ॥ कालो हि नित्यगश्चाऽऽवस्थिकश्च । तत्राऽऽवस्थिको विकारमपेक्षते, नित्यगस्तु खल्वृतुसात्म्यापेक्षः ॥ २६ ॥ (६) काल दो प्रकार का है। नित्यग और आवस्थिक । रोगी की अवस्थानुरूप इन में आवस्थिक-काल विकार को अपेक्षा करता है। नित्यग काल ऋतु, सात्म्य, शीत, उष्ण, वर्षा आदि की अपेक्षा करता है ॥ २६ ॥ उपयोगसंस्था तु उपयोगनियमः, स जीर्णलक्षणापेक्षः ॥ २७ ॥ (७) उपयोग संस्था—उपयोग-व्यवस्था या उपयोग-नियम को उपयोग- संस्था कहते हैं। यह भोजन के पचने की अपेक्षा करता है । 'जीर्णेऽश्नीयात्' यह आगे कहेंगे ॥ २७ ॥ उपयोक्ता पुनः यस्तमाहारमुपयुङ्क्ते यदायत्तमोकसात्म्यम् ॥ २८ ॥ (८) उपयोक्ता—जो उस आहार का उपयोग करता है, उस भोक्ता को 'उपयोक्ता' कहते हैं । जिस के अधीन अभ्यास-सात्म्य है ॥ २८ ॥ इत्यष्टावाहारविधिविशेषायतनानि भवन्ति । एषां विशेषाः शुभाशुभफलप्रदाः परस्परोपकारका भवन्ति, तान् बुभुत्सेत । बुद्ध्वा च हितेप्सुरेव स्यात्, न च मोहात्प्रमादाद्वा प्रियमहितमसुखोदर्कमु- पसेव्यं किञ्चिदाहारजातमन्यद्वा ॥ २९ ॥ १ सर्वग्रह-एक मनुष्य का भोजन आठ छटांक होना चाहिये। परिग्रह- चावल, दो छटांक, आटा-५ छटांक, दाल एक छटांक, शाक-एक प्रकार से आठ छटांक ।
अ० १ ] विमानस्थानम् ४९१
अ० १ ] विमानस्थानम् ४९१
इस प्रकार से आहार विधि के विशेष आठ आयतन कह दिये हैं। ये
प्रकृति आदि आठों आयतन शुभ और अशुभ फल (स्वास्थ्य एवं अस्वास्थ्य)
को उत्पन्न करने में परस्पर एक दूसरे के सहायक होते हैं। इस लिये वैद्य
इन को भी जाने। इन में जो सम-धातुओं को प्रकृति में रक्खें और विषम
धातुओं को समान करें उन को जानकर हितकारक का सेवन करे। मोह,
अज्ञान अथवा लापरवाही से आपातप्रिय (सेवन के समय अतिप्रिय), परन्तु
उत्तरकाल में परिणाम में दुःख विकार वा रोगकारक अहित आहार पदार्थों या
अन्य इस प्रकार के विहार का सेवन नहीं करना चाहिये ॥ २९ ॥
तत्रेद्माहारविधिविधानमरोगाणामातुराणां च केषाञ्चित्काले प्रकृ-
त्यैव हिततमं भुञ्जानानां भवति । उष्णं स्निग्धं मात्रावज्जीर्णे वीर्या-
विरुद्धमिष्टे देशे इष्टसर्वोपकरणं नातिद्रुतं नातिविलम्बितमजल्पन्नह-
संस्तन्मना भुञ्जीताऽऽत्मानमभिसमीक्ष्य सम्यक् ॥ ३० ॥
यहां आगे कही जाने वाली आहार विधि स्वस्थ एवं रोगी दोनों के लिये
उचित समय में स्वभाव से हितकारक होती है।
आहार विधि-उष्ण (गरम) भोजन खावे, स्निग्ध भोजन करे, मात्रानु-
सार खाये, पूर्व भोजन के जीर्ण होने पर खाये, अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को
खाये, मनोवाञ्छित स्थान पर, मन के अनुकूल उपकरणों के साथ, न बहुत
जल्दी, न बहुत धीरे, बिना बोले, बिना हँसे, पूर्ण मन देकर, आत्मा के सात्म्य
या अपनी शक्ति को देखकर भली भांति विचार कर खाये ॥ ३० ॥
तस्य साद्गुण्यमुपदेक्ष्यामः-उष्णमश्नीयात् । उष्णं हि भुज्यमानं
स्वदते, भुक्तं चाग्निमौदर्यमुदीरयति, क्षिप्रं च जरां गच्छति, वातं
चानुलोमयति, श्लेष्माणं च परिशोषयति, तस्मादुष्णमश्नीयात् ॥३१॥
इस प्रकार भोजन करने के सद्गुणों का उपदेश करते हैं-गरम, जितना-
गरम मुख में सहन हो सके, उतना गरम भोजन करे। गरम भोजन रुचि उत्पन्न
करता है, खाने में अच्छा लगता है। खाने पर जाकर अग्नि को बढ़ाता है,
शीघ्र पाचन हो जाता है। वायु का अनुलोमन करता है, कफ को सुखाता है।
इस लिये गरम भोजन खावे ॥ ३१ ॥
स्निग्धमश्नीयात् । स्निग्धं हि भुज्यमानं स्वदते, युक्तमौदर्यमग्नि-
न्ति, क्षिप्रं जरां गच्छति, वातमनुलोमयति, दृढीकरोति शरीरो-
पचाभिवृद्धिं चाभिजमयति, वर्णप्रसादमपि चाभिनिर्वर्तयति
यात् ॥ ३२ ॥
स्निग्ध भोजन करे। स्निग्ध भोजन खाने में अच्छा लगता है। खाने पर निर्बल जाठराग्नि को बढ़ाता है। शीघ्र परिपाक होता है। वायु का अनुलोमन करता है, शरीर को बढ़ाता है, इन्द्रियों को बलवान् बनाता है, शरीर में बलकी वृद्धि करता है, रंग में कान्ति, चिकनाई उत्पन्न करता है, इसलिये स्निग्ध भोजन करे ॥ ३२ ॥ मात्रावदश्नीयात् । मात्रावद्धि भुक्तं वात-पित्त-कफानप्रपीडयदायुरेव विवर्धयति केवलं, सुखं गुदमनुपर्येति, न चोष्माणमुपहन्ति, अव्यथं च परिपाकमेति, तस्मान्मात्रावदश्नीयात् ॥ ३३ ॥ मात्रा में खावे। मात्रा में खाया हुआ अन्न वात, पित्त और कफ को कुपित नहीं करता, केवल आयु को ही बढ़ाता है। परिपाक होकर सुखपूर्वक गुदा मार्ग से बाहर निकल आता है। शरीर की अन्तराग्नि को नहीं बिगाड़ता, बिना कष्ट के परिपाक हो जाता है, इसलिये मात्रा में भोजन करे ॥ ३३ ॥ जीर्णेऽश्नीयात् । अजीर्णे हि भुञ्जानस्याभ्यवहृतमाहारजातं पूर्वस्याऽऽहारस्य रसमपरिणतमुत्तरेणाऽऽहाररसेनोपसृजत् सर्वान्दो- षान् प्रकोपयत्याशु, जीर्णे तु भुञ्जानस्य स्वस्थानस्थेषु दोषेष्वग्नौ चोदीर्णे, जातायां च बुभुक्षायां, विवृतेषु च स्रोतसां मुखेषु, चोद्गारे विशुद्धे, विशुद्धे च हृदये, वातानुलोम्ये, विसृष्टेषु च वात-मूत्र-पुरीष-वेगेष्वभ्य- वहृतमाहारजातं सर्वशरीरधातूनप्रदूषयदायुरेवाभिवर्धयति केवलम्, तस्माज्जीर्णेऽश्नीयात् ॥ ३४ ॥ पूर्व-भुक्त भोजन के जीर्ण होने पर खावे। अजीर्ण अवस्था में भोजन करने से पूर्व में खाये हुए भोजन के अपरिपक्व रस से नवीन आहार का रस मिलकर शीघ्र ही दोषों को प्रकुपित कर देता है। इसलिये पूर्व भुक्त भोजन के जीर्ण होने पर, दोषों के अपने स्थान में स्थित होने पर, अग्नि के उदीप्त होने पर, भूख लगने पर, अन्नवह स्रोतों के मुखों के खुल जाने पर, डकार के विशुद्ध होने पर, हृदय ( आमाशय ) के साफ होने पर, वायु के अनुकूल होने पर वायु, मूत्र, मल के वेगों के साफ होने पर किया हुआ भोजन शरीर के सब धातुओं को समान अवस्था में रखता हुआ, केवल आयु को ही बढ़ाता है, इस लिये जीर्ण अवस्था में भोजन करे ॥ ३४ ॥ वीर्याविरुद्धमश्नीयात् । अविरुद्धवीर्यमश्नन् हि न विरुद्ध- जैर्विकारैरुपसृज्यते, तस्माद्वीर्याविरुद्धमश्नीयात् ॥ ३५ ॥ अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को खावे। अविरुद्ध
वाले पदार्थ के सेवन करने से, विरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों के सेवन से उत्पन्न होने वाले (कुष्ठ, वीसर्प आदि) रोगों से मनुष्य बचा रहता है, इसलिये अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को खावे ॥ ३५ ॥ इष्टे देशेऽश्नीयात् । इष्टे हि देशे भुञ्जानो नानिष्टदेशजैर्मनोवि- घातकरैर्भावैर्मनोविघातं प्राप्नोति, तथेष्टैः सर्वोपकरणैः, तस्मादिष्टे देशे तथेष्टसर्वोपकरणं चाश्नीयात् ॥ ३६ ॥ अभिमत प्रदेश में मनोनुकूल उपकरणों के साथ भोजन करे । मनो- वाञ्छित स्थान में भोजन करने से, अनिष्ट देश में उत्पन्न होने वाले, मन को दुःखी करने वाले भावों से मनुष्य दुःखी नहीं होता है। यही बात मन के अनुकूल उपकारणों के साथ भी जाने । इसलिये इष्ट स्थान में और अभिमत उपकरणों के साथ भोजन करें ॥ ३६ ॥ नातिद्रुतमश्नीयात्, अतिद्रुतं हि भुञ्जानस्योत्स्नेहनमवसादनं, भोज- नस्याप्रतिष्ठानं, भोज्यदोषसाद्गुण्यौपलब्धिश्च न नियता, तस्मान्नाति- द्रुतमश्नीयात् ॥ ३७ ॥ बहुत जल्दी जल्दी भोजन नहीं करे। बहुत जल्दी भोजन खाने से भोजन उन्मार्ग अर्थात् विरुद्ध मार्ग में जाने लगता है। जल्दी खाया हुआ भोजन अवसन्नता पैदा करता है, तथा भोजन आमाशय में नहीं रहता, वमन हो जाता है। जल्दी खाने से भोजन के गुण दोष की पहिचान भी नहीं होती, इसलिये बहुत जल्दी भोजन नहीं करे ॥ ३७ ॥ नातिविलम्बितमश्नीयात् । अतिविलम्बितं हि भुञ्जानो न तृप्तिम- धिगच्छति, बहु भुङ्क्ते, शीतीभवति चाऽऽहारजातं, विषमपाकं च भवति, तस्मान्नातिविलम्बितमश्नीयात् ॥ ३८ ॥ बहुत धीरे रुक रुक कर भी भोजन नहीं करे। बहुत धीरे धीरे खाने से पुरुष को कभी तृप्ति नहीं होती, इसलिये बहुत खा जाता है। भोजन भी ठण्डा पड़ जाता है, भोजन विषम रूप में पचता है, इसलिये बहुत धीरे धीरे भोजन नहीं करे ॥ ३८ ॥ अञ्जल्पन्नहसंस्तन्मना भुञ्जीत—जल्पतो हसतोऽन्यमनसो वा भुञ्जा- नस्य त एव हि दोषा भवन्ति य एवातिद्रुतमश्नतः, तस्मादजल्पन्नह- संस्तन्मना भुञ्जीत ॥ ३९ ॥ बातें न करते हुए या न हंसते हुए मनोयोग के साथ भोजन करे। बातें हुए और हंसते हुए अथवा दूसरी तरफ अन्य कार्य में मन को लगाये
४६४ चरकसंहिता [ अ० २ हुए भोजन करने पर वे ही दोष उत्पन्न होते हैं जो जल्दी खाने में उत्पन्न होते हैं । इसलिये बिना बोले, बिना हंसे, पूर्ण मनोयोग के साथ भोजन करे ॥ ३९ ॥ आत्मानमभिसमीक्ष्य भुञ्जीत सम्यक् । इदं ममोपशेते, इदं नोपशेते इति, विदितं ह्यस्य आत्मन आत्मसात्म्यं भवति, तस्मादात्मानमभि- समीक्ष्य भुञ्जीत सम्यगिति ॥ ४० ॥ अपनी रुचि वा हित-अहित को देखकर भोजन करे । मेरी आत्मा को यह अनुकूल है, यह प्रतिकूल है, यह मेरे सात्म्य है, यह मेरे असात्म्य है, ऐसा विचार कर खावे । इस प्रकार खाने से आत्मसात्म्य का ज्ञान रहता है । इसलिये अपनी शक्ति और हित-अहित का विवेचन करके खाना चाहिये ॥४०॥ भवति चात्र—रसान् द्रव्याणि दोषांश्च विकारांश्च प्रभावतः । वेद यो देशकालौ च शरीरं च स नो भिषक् ॥ ४१ ॥ जो पुरुष रस, द्रव्य, दोष, विकार, प्रभाव, देश, काल, शरीर ( प्रकृति, सत्त्व और सात्म्य ) इन को भली प्रकार जानता है वही हम में से वैद्य होने योग्य है ॥ ४१ ॥ तत्र श्लोकौ—विमानार्थो रसद्रव्यदोषरोगाः प्रभावतः । द्रव्याणि नातिसेव्यानि त्रिविधं सात्म्यमेव च ॥ ४२ ॥ आहारायतनान्यष्टौ भोज्यसाद्गुण्यमेव च । विमाने रससंख्याते सर्वमेतत्प्रकाशितम् ॥ ४३ ॥ विमानस्थान का प्रयोजन, रस, द्रव्य, दोष और रोग इन चारों का प्रभाव, बहुत अधिक सेवन न करने योग्य द्रव्य, तीन प्रकार का सात्म्य, आठ आहार विधि के आयतन, भोजन का साद्गुण्य, ये सब बातें इस 'रस' संज्ञक विमान में भगवान् आत्रेय ने प्रकाशित कर दी हैं ॥ ४२-४३ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने रसविमानं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः । —०*०— अथातस्त्रिविधकुक्षीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इसके आगे 'त्रिविध कुक्षीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करें जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
अ० २ ] विमानस्थानम् ४६५
अ० २ ] विमानस्थानम् ४६५ त्रिविधं कुक्षौ स्थापयेदवकाशांशमाहारस्याऽऽहारमुपयुञ्जानः; तद्यथा- कमवकाशांशं मूर्तानामाहारविकाराणामेकं द्रवाणामेकं पुनर्वातपित्त- श्लेष्मणाम् । एतावती ह्याहारमात्रामुपयुञ्जानो नामात्राहारजं किञ्चि- दशुभं प्राप्नोति ॥ ३ ॥ आहार करने वाले मनुष्य को चाहिये कि वह भोजन के निमित्त पेट में तीन विभागों की कल्पना करे । एक स्थान मूर्त्त (स्थूल) आहार के लिये, दूसरा द्रव (पेय) पदार्थों के लिये और तीसरा वात, पित्त और कफ के लिये । इस प्रकार तीन विभाग करके आहार मात्रा का उपयोग करनेवाले पुरुष को आहार की अमात्रा से उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रकार के अशुभ परिणाम नहीं होते ॥ ३ ॥ न च केवलं मात्रावत्त्वादेवाऽऽहारस्य कृत्स्नमाहारफलसौष्ठवमवाप्तुं शक्यं, प्रकृत्यादीनामष्टानामाहारविधिविशेषायतनानां प्रविभक्त- फलत्वात् ॥ ४ ॥ तत्र तावदाहारराशिमधिकृत्य मात्रामात्राफलविनिश्चयार्थः प्रकृतः। एतावानेव ह्याहारराशिविधिविकल्पो यावन्मात्रावत्त्वममात्रा- वत्त्वं च ॥ ५ ॥ केवल आहार की मात्रा से ही सम्पूर्ण आहार फल की उच्चमता प्राप्त नहीं हो सकती, क्योंकि प्रकृति आदि जो आठ आहार-विधि के विशेष अंग हैं, इन का भी भिन्न भिन्न फल होता है । यहां पर प्रकृति आदि आठ आहार-विधि विशेषों में आहार की राशि को लेकर मात्रा और अमात्रा के फल का निश्चय करने के लिये यह प्रकरण है । आहार की राशि-विधि का भेद इतना ही है कि मात्रा का परिमाण इतना और अमात्रा का परिमाण इतना है ॥४-५॥ तत्र मात्रावत्त्वं पूर्वमुपदिष्टं कुक्ष्यंशविभागेन, तद् भूयो विस्तरे- णानुव्याख्यास्यामः । तद्यथा—कुक्षेरप्रपीड़नमाहारेण, हृदयस्यानव- रोधः, पार्श्वयोरविपाटनं, अनतिगौरवमुदरस्य, प्रीणनमिन्द्रियाणां, क्षुत्पिपासोपरमः, स्थानासन-शयन-गमन-प्रश्वासोच्छ्वास-हास-संकथासु च सुखानुवृत्तिः, सायं प्रातश्च सुखेन परिणमनं, बलवर्णोपचयकरत्वं चेति मात्रावतो लक्षणमाहारस्य भवति ॥ ६ ॥ इन में मात्रावत्त्व (मात्रा) को कुक्षि के विभाग से प्रथम संक्षेप में कह चुके हैं। अब मात्रा और अमात्रा दोनों को विस्तार से कहते हैं। जैसे— आहार से कोष्ठ का पीड़ित (दबना) न होना, हृदय (श्वास प्रश्वास) का
४८६ चरकसंहिता [ अ. २
न रुकना, भोजन के भार से पाश्र्वों का न फटना ( फटते हुए प्रतीत न होना, अधिक न तनना ), पेट में बहुत भारीपन का प्रतीत न होना, आंख आदि इन्द्रियों का पूर्ण सन्तुष्ट होना, भूख और प्यास का शान्त होना, स्थान ( सीधा खड़ा होने में ) आसन ( बैठने में ), सोने में, चलने में, श्वास लेने एवं छोड़ने में, हास्य और बातचीत में सुखपूर्वक प्रवृत्ति, दिन में किये भोजन का सायंकाल और रात्रि में किये भोजन का प्रातःकाल तक सुखपूर्वक जीर्ण हो जाना, बल, वर्ण, उपचय ( पुष्टि ) का शरीर से होना ये सब मात्रा में किये भोजन के लक्षण हैं ॥ ६ ॥ अमात्रावत्त्वं पुनर्द्विविधमाचक्षते । हीनमधिकं चेति । तत्रै हीन- मात्रमाहारराशिं बलवर्णोपचयक्षयकरमतृप्तिकरमुदावर्त्तकरमवृष्यम- नायुष्यमनौजस्यं शरीरमनोबुद्धीन्द्रियोपघातकरं सारविधमनमलक्ष्म्य- वहमशीतेश्च वातविकाराणामायतनमाचक्षते ॥ ७ ॥ अमात्रा-आहार की अमात्रा दो प्रकार की बतलाते हैं । ( १ ) हीन और ( २ ) अधिक । इन में आहार राशि की हीन मात्रा बल और वर्ण को पुष्ट नहीं करती, न मनुष्य को तृप्त करती है, वह उदावर्त्त-रोग को उत्पन्न करती है, आयु, वीर्य एवं ओज के लिये हितकारी नहीं है, मन, बुद्धि, इन्द्रिय ( आंख आदि ) को नष्ट करने वाली है । सार ( त्वग् रक्त आदि ) को नष्ट करती है । अलक्ष्मी ( गरीबी ) को पैदा करती है । हीनमात्रा अस्सी प्रकार के वायु रोगों का कारण होती है ऐसा वैद्य लोग बतलाते हैं ॥ ७ ॥ अतिमात्रं पुनः सर्वदोषप्रकोपणमिच्छन्ति सर्वकुशलाः ॥ ८ ॥ यो हि मूर्तानामाहारविकाराणां सौहित्यं गत्वा पश्चाद् द्रवैस्तृप्ति- मापद्यते भूयस्तस्याऽऽमाशयगता वातपित्तश्लेष्माणोऽभ्यवहारेणातिमात्रे- णातिप्रपीड्यमानाः सर्वे युगपत्प्रकोपमापद्यन्ते ॥ ६ ॥ ते प्रकुपितास्तमेवाऽऽहारराशिमपरिणतमाविश्य कुक्ष्यैकदेशमाश्रिता विष्टम्भयन्तः सहसा वाऽप्युत्तराधराभ्यां मार्गाभ्यां प्रच्यावयन्तः पृथक् पृथगिमान् विकारानभिनिर्वर्तयन्त्यतिमात्रभोक्तुः ॥ १० ॥ आहार राशि की अतिमात्रा से सब दोष प्रकुपित होते हैं, ऐसा कुशल चिकित्सक मानते हैं। जो मनुष्य मूर्त्त ( स्थूल ) आहार पदार्थों से पेट भर लेता है और ऊपर से पेय पदार्थों को पूर्णरूप से पी लेता है; उसके आमाशयमें स्थित वात, पित्त और कफ दोष इस अति अधिक भार से पीड़ित होकर साथ कुपित हो जाते हैं। वे प्रकुपित हुए दोष इस कच्ची ( अपरिपु
अ० २ ] ३२ विमानस्थानम् ४३७
अ० २ ] ३२ विमानस्थानम् ४३७ राशि के साथ मिलकर इस आहार राशि को उदर के एक भाग में रोक देते हैं अथवा सहसा ऊपर या नीचे के ( ऊर्ध्व या अधः ) मार्गों से बाहर निकालने लगते हैं। अधिक खानेवाले, पुरुष में भिन्न २ नाना रोग पृथक् २ रूप से उत्पन्न करते हैं ॥ ६-१० ॥ तत्र वातः शूलानाहाङ्गमर्द-मुखशोष-मूर्च्छा-भ्रमाग्निवैषम्य-सिरासं- कोचन-संस्तम्भनानि करोति । पित्तं पुनर्ज्वरातीसारमन्तर्दाहं तृष्णा- मदभ्रमप्रलपनानि । श्लेष्मा तु छर्द्यरोचकाविपाकशीतज्वरालस्यगात्रगौ- रवाभिनिर्वृत्तिकरः संपद्यते ॥ ११ ॥ वायु, शूल, अफारा, अंगमर्द (अंगों का टूटना), मुख का शुष्क होना, मूर्च्छा, भ्रम, अग्नि की विषमता, पार्श्वग्रह, पृष्ठग्रह, कटिग्रह, शिराओं का आकुञ्चन (संकोच) और स्तम्भन (जड़ता), इन विकारों को उत्पन्न करता है। पित्तज्वर, अतिसार, अन्तर्दाह (शरीर में जलन), तृष्णा, मद, भ्रम और प्रलाप को उत्पन्न करता है और कफ छर्दि (वमन), अरुचि, अविपाक, शीतज्वर, आलस्य और शरीर में भारीपन पैदा करता है ॥ ११ ॥ न खलु केवलमतिमात्रमेवाऽऽहारराशिमामप्रदोषकरमिच्छन्ति, अपि तु खलु गुरु-रूक्ष-शीत-शुष्क-द्विष्ट विष्टम्भि-विदाह्यशुचि-विरुद्धनामकाले चान्नपानानामुपसेवनं, काम-क्रोध-लोभ-मोहेर्ष्या-ह्री-शोक-मानोद्वेग-भयो- पतप्तेन मनसा वा यदन्नपानमुपयुज्यते तदप्या ममेव प्रदूषयति ॥१२॥ कुशल वैद्य केवल आहार राशि की अतिमात्रा को ही आमदोष का कारण नहीं मानते। किन्तु प्रकृति से भारी, रूक्ष, शीत, शुष्क, द्वेषयुक्त (मन के प्रति- कूल), विष्टम्भी (वायु, दर्द के होने पर भी मल का न आना), दाह (जलन) करने वाले, अपवित्र, प्रकृति, संस्कार, राशि में विरोधी खान-पान का सेवन अथवा हितकारी अन्न को भी अनुचित काल में वा वमन, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, लज्जा, शोक, मन के उद्वेग, भय आदि अवस्था में किया हुआ अन्न-पान भी आम को ही दूषित करता है ॥ १२ ॥ भवति चात्र—मात्रयाऽप्यभ्यवहृतं पथ्यं चान्नं न जीर्यति । चिन्ता-शोक-भय-क्रोध-दुःख-शय्या-प्रजागरैः ॥ १३ ॥ तं द्विविधमामप्रदोषमाचक्षते भिषजो विसूचिकामलसकं च । तत्र विसूचिकामूर्ध्वं चाधश्च प्रवृत्तामदोषां यथोक्तरूपां विद्यात् ॥१४॥ हितकारी, पथ्य अन्न मात्रा से खाने पर भी चिन्ता, शोक, भय, क्रोध, दुःख, शय्या में सोने, रात्रि में जागने से जीर्ण नहीं होता है। इस आम-
४६८ चरकसंहिता [ अ० २ प्रदोष ( भोजन के इस प्रकार न पचने ) को वैद्य दो प्रकार का मानते हैं । ( १ ) विसूचिका और ( २ ) अलसक । इन में विसूचिका के अन्दर आम दोष ( भोजन का न पचा अंश ) ऊपर और नीचे दोनों मार्गों से बाहर निकलता है ॥ १३-१४ ॥ अलसकमुपदेक्ष्यामः—दुर्बलस्याल्पाग्नेर्बहुश्लेष्मणो वात-मूत्र-पुरीष- वेग-विधारिणः स्थिर-गुरु-बहु-रूक्ष-शीत-शुष्कान्नसेविनस्तदन्नपानमनि- लप्रपीडितं श्लेष्मणा च विबद्धमार्गमतिमात्रलीनमलसत्वान्न बहिर्मुखी भवति, ततश्छर्द्यतीसारवर्ज्यान्यामप्रदोषलिङ्गानि यथोक्तान्यभिदर्शय- त्यतिमात्राणि । अतिमात्रप्रदुष्टाश्च दोषाः प्रदुष्टामबद्धमार्गास्तिर्यग्गच्छ- न्तः कदाचित्केवलमेवास्य शरीरं दण्डवत्स्तम्भयन्ति, ततस्तमलसकम- साध्यं ब्रुवते ॥ १५ ॥ अलसक का उपदेश करते हैं--दुर्बल, अल्पाग्नि, बहुत कफयुक्त, वात आदि के वे के स्वभाव के, स्थिर, गुरु, बहुत, रूक्ष, शीत, शुष्क इस प्रकार के अन्न को सेवन करने वाले पुरुष में वायु खान-पान को पीड़ित करता है और कफ से मार्ग रुके होने से वह बाहर नहीं निकलता । यही आमाशय में बहुत अधिक मात्रा में व्याप्त हो जाता है । और आलस्य ( मन्दता ) के कारण बाहर भी नहीं आता । इसलिये इस को 'अलसक' कहते हैं । बाहर न होने से वमन और अतिसार को छोड़कर शेष अन्य आमदोष के लक्षण बहुत अधिक मात्रा में स्पष्ट होते हैं । असाध्य अलसक—बहुत अधिकमात्रा में दूषित हुए वात आदि दोष दुष्ट आम-द्वारा मार्गों के रुक जाने पर तिरछे गति करते हुए कभी अकस्मात् इस बहुत खाने वाले पुरुष के सम्पूर्ण शरीर को दण्डे की भांति स्तब्ध कर ( जकड़ ) देते हैं । इसलिये इस अलसक को असाध्य कहते हैं ॥ १५ ॥ विरुद्धमध्यशनाजीर्णाशनशीलिनः पुनरामदोषमामविषमित्याचक्षते भिषजो विषसदृशलिङ्गत्वात् । तत्परमसाध्यमाशुकारित्वाद्विरुद्धोप- क्रमत्वाच्चेति ॥ १६ ॥ विरुद्ध भोजी, अध्यशन ( खाने के ऊपर खाना खाने ) और अजीर्णाव- स्था में भोजन करने वाले पुरुष के दोष को वैद्य 'आमविष' कहते हैं, क्योंकि इसके लक्षण विष के समान होते हैं । ( आम दोष में भी विष के खाने के समान मुख से लालास्राव होता है ) । यह भी बहुत असाध्य है । विषरूप होने से शीघ्र मारने वाला है और इसमें जो उपचार !
अ० २ ] विमानस्थानम् ४६९
अ० २ ] विमानस्थानम् ४६९ वह विरोधी रहता है। अर्थात् विष में शीतक्रिया और आम एवं अजीर्ण में उष्णक्रिया करनी अपेक्षित है, ये दोनों परस्पर विरोधी होती हैं ॥ १६ ॥ तत्र साध्यमामं प्रदुष्टमलसीभूतमुल्लेखयेदादौ पाययित्वा लवणमुष्णं च वारि । ततः स्वेदनवर्तिप्रणिधानाभ्यामुपाचरेदुपवासयेच्चैनम् ॥ १७ ॥ साध्य अलसक की चिकित्सा—दुष्ट हुए एवं अलस ( क्रियाहीन ) बने आम-दोष में लवण मिश्रित गरम पानी पिलाकर वमन कारक दोष को बाहर निकालना चाहिये । पीछे से स्वेदन ( फलवर्ति ) का उपयोग करे और रोगी को उपवास करावे ॥ १७ ॥ विसूचिकायां तु लङ्घनमेवाग्रे विरिक्तवच्चास्यानुपूर्वी ॥ १८ ॥ विसूचिका की अवस्था में सबसे प्रथम लंघन ही करवाना चाहिये । इसके पीछे विरेचन दिये पुरुष की भांति पेयादि की व्यवस्था ( उपकल्पनीय अध्याय [ सूत्र० अ० १५ ] में कहे अनुसार ) करनी चाहिये ॥ १८ ॥ आमप्रदोषेषु त्वन्नकाले जीर्णाहारं पुनर्दोषावलिप्तामाशयं स्तिमित- गुरुकोष्ठमनन्नाभिलाषिणमभिसमीक्ष्य पाययेद्दोषशेषपाचनार्थमौषधमग्नि- संधुक्षणार्थं च, न त्वेवाजीर्णाशनम् । आमप्रदोषदुर्बलो ह्यग्नियुगपद्दोष- मौषधमाहारजातं चाशक्तः पक्तुम्, अपि चाऽऽमप्रदोषाहारौषधविभ्र- मोऽतिबलवत्त्वादुपरतकायाग्निं सहसैवाऽऽतुरमबलमतिपातयेत् ॥१९॥ आम प्रदोष में औषध प्रयोग—जब भोजन जीर्ण हो गया हो, जिस का कोष्ठ जड़ और भारी हो, जो अन्न की इच्छा न करता हो, ऐसे पुरुष के शेष अपक्व दोषों के पाचन के लिये और उसके अग्नि को बढ़ाने के लिये भोजन के समय में औषध देनी चाहिये, किन्तु अजीर्ण अवस्था में भोजन के जीर्ण हुए बिना औषध नहीं देनी चाहिये । क्योंकि आम-प्रदोष के कारण दुर्बल हुई अग्नि आम दोष, औषध और भोजन इन सबको एक साथ पचाने में समर्थ नहीं होती । इसके अतिरिक्त आमदोष, आहार और औषध में परस्पर विषमता अधिक बलवान् होने से शरीर की अग्नि को नष्ट करके ये निर्बल रोगी को सहसा शीघ्र ही मार सकते हैं ॥१९॥ आमप्रदोषजानां पुनर्विकाराणामपतर्पणेनैवोपरमो भवति, सति त्वनुबन्धे कृतापतर्पणानां व्याधीनां निग्रहे निमित्तविपरीतमुपास्यौष- धं तद्विपरीतमेवावचारयेद्यथास्वम् । सर्वविकाराणामपि च निग्रहे विधिर्विपरीतमौषधमिच्छन्ति कुशलाः, तदर्थकारि वा ॥२०॥
५०० चरकसंहिता [ अ० २ सम्पूर्ण आमदोषजन्य रोगों की शान्ति अपतर्पण ( उपवास ) से होती है१। संतर्पण से उत्पन्न रोगों में अपतर्पण क्रिया कारण के विपरीत है। परन्तु अप- तर्पण करने पर भी जहाँ अनुबन्ध हो वहां पर निदान के विपरीत औषध को छोड़ कर रोग के विपरीत ( जो जिस रोग के विपरीत हो ) वही औषध देनी चाहिये। यह बात केवल आमदोषजन्य रोगों के लिये ही नहीं है; अपितु सब रोगों के शमन के लिये निदान और रोग दोनों के विपरीत औषध देनी चाहिये ऐसा कुशल चिकित्सकों का मत है२ ॥ २० ॥ विशुद्धामप्रदोषस्य पुनः परिपक्वदोषस्य दीप्ते चाग्नावभ्यङ्गास्था- पनानुवासन विधिवत्स्नेहपानं च युक्त्या प्रयोज्यं प्रसमीक्ष्य दोष- भेषज·देश·काल·बल·शरीराहार·सात्म्य·सत्त्व·प्रकृति·वयसामवस्थान्त- राणि विकारांश्च सम्यगिति ॥२१॥ जब आम प्रदोष शान्त हो जाये, दोषों का परिपाक हो जाय, अग्नि प्रदीप्त हो जाय तब दोष, देश, औषध, काल, बल, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति और आयु आदि अवस्थाओ को तथा विकारों को भली प्रकार देखकर अभ्यंग, आस्थापन, अनुवासन आदि कर्म और विधिपूर्वक स्नेह-पान युक्ति से कराना चाहिये ॥२१॥ भवन्ति चात्र—अशितं खादितं पीतं लीढं च क्व विपच्यते । एतत्त्वां धीर ! पृच्छामस्तन्न आचक्ष्व बुद्धिमन् ! ॥२२॥ इत्यग्निवेशप्रमुखैः शिष्यैः पृष्टः पुनर्वसुः । आचचक्षे ततस्तेभ्यो यत्राऽऽहारो विपच्यते ॥ २३ ॥ नाभिस्तनान्तरं जन्तोरामाशय इति स्मृतः । अशितं खादितं पीतं लीढं चात्र विपच्यते ॥ २४ ॥ आमाशयगतः पाकमाहारः प्राप्य केवलम् । पक्वः सर्वाश्रयं पश्चाद्धमनीभिः प्रपद्यते ॥ २५ ॥ १. अपतर्पण दोष बल की अपेक्षा से तीन प्रकार का है । ( १ ) लंघन, ( २ ) लंघन·पाचन और ( ३ ) दोषावसेचन । अल्पदोष में लंघन, मध्य दोष में लंघन·पाचन और बहुदोष मे दोषावसेचन करना चाहिये । २. गुरु और स्निग्ध पदार्थों से उत्पन्न रोग में लघु रूक्ष चिकित्सा । स्नेह- स्वेदजन्य रोग में लंघन-बृंहण । वमन में और अधिक वमन कराना तदर्थकारी चिकित्सा है ।
[अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०१
[अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०१
खाये, चबाये, पीये या चाटे सब अन्न-पान कहाँ पर पचते हैं, हे धीर गुरो ! यह हम आप से पूछते हैं, हे बुद्धिमन् ! यह आप हम को बताइये । इस प्रकार अग्निवेश आदि शिष्यों के पूछने पर पुनर्वसु ने उन को उपदेश किया । मनुष्य के नाभि और स्तनों के मध्यवर्त्ती प्रदेश को 'आमाशय' कहते हैं । स्तनो से नीचे और नाभि से ऊपर 'आमाशय' और नाभि से नीचे गुदा से ऊपर 'पक्वाशय' है । आमाशय में अशित, खादित, पीत और लीढ यह चारों प्रकार का अन्न पचता है । आमाशय में पहुंचा सब प्रकार का अन्न यहाँ पर परिपक्व होकर धमनी-स्रोतों द्वारा सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होता है ॥ २२-२५॥ तत्र श्लोकौ—तस्य मात्रावतो लिङ्गं फलं चोक्तं यथायथम् । अमात्रस्य तथा लिङ्गं फलं चोक्तं विभागशः ॥ २६ ॥ आहारविध्यायतनshapeानि चाष्टौ सम्यक्परीक्ष्याऽऽत्महितं विदध्यात् । अन्यच्च यः कश्चिदिहास्ति मार्गो हितोपयोगेषु भजेत तं च ॥२७॥ मात्रावाले आहार के लक्षण और फल पूर्ण रूप में कह दिये हैं। इसी प्रकार अमात्रा अर्थात् हीन और अधिक रूप में सेवन किये आहार के लक्षण और फल पृथक् २ करके कह दिये हैं। आहार-विधि के आठ आयतन (कारणों, अंगो) की ठीक २ परीक्षा करके अपना हित करें और भी जो कोई उत्तम मार्ग जिसका उपदेश नहीं किया हो उस को भी हित पदार्थों के उपयोग के अवसरों में प्रयोग करे ॥ २७ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने त्रिविधकुक्षीयविमानं नाम द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः । अथातो जनपदोद्ध्वंसनीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इसके आगे 'जनपद-उद्ध्वंसनीय' नाम विमान का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥ जनपदमण्डले पञ्चालक्षेत्रे द्विजातिवराध्युषितायां काम्पिल्यराज- धान्यां भगवाञ्पुनर्वसुरात्रेयोऽन्तेवासिगणपरिवृतः पश्चिमे घर्ममासे ...तीरे ...विचारमनुविचरन् शिष्यमग्निवेशमब्रवीत् ॥ ३ ॥
५०२ चरकसंहिता [ अ० ३ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन द्विज वर्णों से बसे पांचाल क्षेत्र ( पंजाब ) के जनपद-मण्डल ( प्रान्त ) में, काम्पिल्य नाम राजधानी में शिष्यगण सहित भगवान् आत्रेय पुनर्वसु ग्रीष्म काल के द्वितीय अर्थात् ज्येष्ठ मांस में गंगा के किनारे वन में विहार करते हुए शिष्य अग्निवेश को बोले ॥ ३ ॥ दृश्यन्ते हि खलु सौम्य ! नक्षत्र-ग्रह-चन्द्र-सूर्यानिलानलानां दिशां चाऽप्रकृतिभूतानामृतुवैकारिका१ भावाः, अचिरादितो भूरपि च न यथा- वद्रस-वीर्य-विपाक-प्रभावमोषधीनां प्रतिविधास्यति,तद्वियोगाच्चाऽऽतङ्क- प्रायता नियता । तस्मात्प्रागुद्ध्वंसात्प्राक् च भूमेर्विरसीभावादुद्धरध्वं सौम्य ! भैषज्यानि यावन्नोपहत-रस-वीर्य-विपाक-प्रभावाणि भवन्ति । वयं चैषां रसवीर्यविपाकप्रभावानुपयोक्ष्यामहे, ये चास्माननुकाङ्क्षन्ति यांश्च वयमनुकाङ्क्षामः, नहि सम्यगुद्धृतेषु भैषज्येषु सम्यग्विहितेषु सम्यग्विचारितेषु जनपदोद्ध्वंसकराणां विकाराणां किंचित्प्रतीकारगौ- रवं भवति ॥ ४ ॥ हे सौम्य ! नक्षत्र ( अश्विनी आदि ), ग्रह ( बृहस्पति आदि ), चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि और दिशाओं के प्रकृति अर्थात् स्वाभाविक दशा में न होने पर ऋतु-विकार से उत्पन्न होनेवाले नाना परिणाम देखे जाते हैं। इधर पृथ्वी भी ओषधियो में रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव को शीघ्र उत्पन्न नहीं कर सकती, इसलिये प्रायः भयंकर रोगों का होना सम्भव होता है । अतः हे सौम्य ! जन- पदोद्ध्वंस अर्थात् देश भर को नाश कर देने वाले रोग होने से पूर्व तथा पृथ्वी के विरस ( रसहीन या विपरीत रसवाली ) होने से पूर्व ही औषधियों का संग्रह कर लो; जिस से कि इन ओषधियों के रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव सुरक्षित बने रहें, नष्ट न हों। हम इन ओषधियों के रस,वीर्य,विपाक और प्रभावका उपयोग करते हैं, जिन को हम चाहते हैं और जो हम को चाहते हैं, उनके लिये इन औषधियों का उपयोग करेंगे । ठीक समय पर ओषधियों के उखाड़ लेने पर, ठीक प्रकार से बना लेने पर और ठीक प्रकार से दोष आदि की अपेक्षा से प्रयोग करने पर जनपद-नाशक रोगों के प्रतीकार करने में कुछ भी कठिनाई नहीं होती ॥ ४ ॥ १. सुश्रुत में इस विकार को 'मरक' कहा है । यथा— शीतोष्णवर्षाणि खलु विपरीतान्योषधीर्व्यापादयन्ति, तासामुपयोगाद् विविध रोगप्रादुर्भावो मरको वा भवेत् ॥ सु० सूत्र० अ० ६
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०३
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०३ एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच-उद्धृतानि खलु भगवन् ! भेषज्यानि विहितानि च सम्यक् सम्यग्विचारचारितानि च । अपि तु खलु जनपदोद्ध्वंसनमेकेनैव व्याधिना युगपदसमानप्रकृत्याहार-देह- बल-सात्म्य-सत्त्व-वयसां मनुष्याणां कस्माद्भवतीति ॥ ५ ॥ इस प्रकार से कहते हुए भगवान् आत्रेय को अग्निवेश बोले ! हे भगवन् ! ओषधियां ठीक प्रकार से इकट्ठी की गईं, ठीक प्रकार से बना ली जायेंगी और भली प्रकार से विचार कर ही ओषधियां दी जायेंगी । परन्तु भिन्न भिन्न प्रकृति, आहार, देह, बल, सात्म्य, सत्त्व और आयुवाले अनेक मनुष्यों का, देश भर को ध्वंस कर देने वाला एक ही प्रकार का रोग क्यों हो जाता है ॥५॥ तमुवाच भगवानात्रेयः-एवमसामान्यानामेभिरप्यग्निवेश ! प्रकृ- त्यादिभिर्भावैर्मनुष्याणां येऽन्ये भावाः सामान्यास्तद्वैगुण्यात्समानका- लाः समानलिङ्गाश्च व्याधयोऽभिनिर्वर्त्तमाना जनपदमूद्ध्वंसयन्ति । ते तु खल्विमे भावाः सामान्यजनपदेषु भवन्ति । तद्यथा-वायुरुदकं देशः काल इति ॥ ६ ॥ भगवान् आत्रेय ने कहा । हे अग्निवेश ! इन प्रकृति आदि की भिन्नता होने पर भी जो अन्य कारण सब मनुष्यों में समान रूप से रहते हैं, उन में विकार आने से एक ही समय में, एक ही लक्षणोंवाले रोग उत्पन्न होकर जन- पद का नाश कर देते हैं । जनपदों में निम्न कारण समान रूप से होते हैं । जैसे-वायु, जल, देश और काल ॥ ६ ॥ तत्र वातमेवंविधमनारोग्यकरं विद्यात् । तद्यथा-यथर्तुविषममति- स्तिमितमतिचलमतिपरुषमतिशीतमत्युष्णमतिरूक्षमत्यभिष्यन्दिनमति- भैरवारावमतिप्रतिहतपरस्परगतिमतिकुण्डलिनमसात्म्य - गन्ध - बाष्प- सिकता-पांशु-धूमोपहतमिति ॥ ७ ॥ इन में निम्न लक्षणोंवाले वायु को आरोग्यनाशक समझना चाहिये । जैसे-ऋतु के विपरीत, सर्वथा गतिरहित, बहुत वेग वाला, अति कर्कश, अति शीत, अति उष्ण, अतिरूक्ष, दोष, धातु, मल, स्रोतों में अति क्लिन्नता उत्पन्न करनेवाला, बहुत भीषण शब्द करनेवाला, परस्पर वायु से वायु का वेग खण्डित होता हो, आवर्त्त ( भंवरों ) वाला, हानिकारक-दुर्गन्ध वाला, बाष्प, सिकता ( रेत ), पांशु ( धूलि ) और धुंए से व्याप्त हो, तब वायु को अनारो- ग्यकारक. ( रोगकारक ) समझना चाहिये ॥ ७ ॥
उदकं तु खल्वत्यर्थ-विकृत-गन्ध-वर्ण-रस-स्पर्श-क्लेदबहुलमपक्रान्त- जलचरविहङ्गममुपक्षीणजलाशयमप्रीतिकरमपगतगुणं विद्यात् ॥ ८ ॥ जल—जिस पानी का गन्ध, रस, वर्ण और स्पर्श बहुत अधिक विकृत हो गया हो, जिस में क्लेद (सडांद) बहुत उठे, जिस पानी को जलचारी पक्षी छोड़कर चले गये हों, जिस पानी में रहने वाली मछलियां नष्ट हो गई हों और जलाशय भी कमती हो गया हो, इस प्रकार के पानी को अप्रिय और गुणरहित जाने ॥८॥ देशं पुनर्विंकृत-वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्श-क्लेद-बहुलमुपसृष्टं सरीसृप-व्याल- मशक-शलभ-मक्षिका-मूषकोलूक-श्मशानिक-शकुनि-जम्बुकादिभिरूष्णो- तृणोपवनवन्तं लताप्रतानादिबहुलमपूर्ववदवपतितं शुष्कनष्टशस्यं धूम्रप- वनं प्रभातपतत्रिगणमुत्कृष्टश्वगणमुद्भ्रान्त-व्यथित-विविध-मृग-पक्षि- सङ्घमुत्सृष्ट-नष्ट-धर्म-सत्य-लज्जाचार-शील-गुण-जनपदं शश्वत्क्षुभितो- दीर्णसलिलाशयं प्रतताल्कापातनिर्घातभूमिकम्पमतिभयाराबरूपं रूक्ष- ताम्रारुणसिताभ्र-जाल-संवृतार्क-चन्द्र-तारकमभीक्ष्णं ससंभ्रमोद्वेगमिव सत्रासरुदितमिव सतमस्कमिव गुह्यकाचरितमिवाऽऽक्रन्दितशब्दबहु- लमिव चाहितं विद्यात् ॥ ६ ॥ देश—जिस स्थान का वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श विकृत हो गया हो, क्लेद बहुल हो, जिस स्थान में सरीसृप (सरकने वाले सांप आदि जन्तु), व्याल (सिंह, चीते आदि), मशक (मच्छर) शलभ (पतंगे), मक्खियां मूषक (चूहे), उलूक (उल्लू), श्मशान में रहने वाले पक्षी गीध, चील, गीदड़ आदि का उपद्रव हो, जहां पर ये बहुत हों, जहां पर तृण, घास, लता आदि बहुत हों, जो पहिले से एकदम नया ही दीखे, जहां पर अनाज के खेत सूख या नष्ट हो गये हों, जहां की वायु धुंवाली हों, जहां पर पक्षीगण घोर शब्द करते हों, जहां पर कुत्ते मुंह उठा कर रोते हों, जहां पर घबराये और पीड़ित नाना प्रकार के मृग-पशु-पक्षीसमूह हों, जिन नगरों में से धर्म, सत्य, लज्जा, आचार, शील, दया, दाक्षिण्य आदि गुण नष्ट हो गये हों, जहाँ के तालाबों का पानी बिना वायु के भी निरन्तर क्षुभित और तरंगों वाला रहे, जहां पर उल्कापात, बिजली आदि का गिरना, भूकम्प आदि लगातार हों और भयंकर शब्द उत्पन्न होता हो, जहां पर सूर्य, चन्द्र और तारे रूखे, तांबे के से, लाल, काले, बादलों से ढंपे दिखाई देवे, जहां पर बार बार भ्रम, उद्वेग, के साथ, भय के साथ रोने का सा शब्द सुने, अन्धकार सा हो, जो गुह्यक (यक्ष) आदि देवयोनियों से आक्रान्त सा हो, तथा रोने के से शब्दों से व्याप्त हो देश को अनारोग्यकारक समझना चाहिये ॥ ६ ॥
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०५
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०५ कालं तु खलु यथर्तुलिङ्गाद्विपरीतलिङ्गमधिकलिङ्गं हीनलिङ्गं वाहितं व्यवस्येत् ॥ १० ॥ काल—शीत, उष्ण और वर्षा इन ऋतुओं के अपने लक्षणों से विपरीत होना या उन लक्षणों का अधिक होना या कम होना ( मिथ्यायोग, अतियोग और अयोग ) अनारोग्यकारक होता है ॥ १० ॥ इमानेवं दोषयुक्तांश्चतुरो भावान् जनपदोद्ध्वंसकरान् वदन्ति कुशलाः । अतोऽन्यथाभूतांस्तु हितानाचक्षते ॥ ११ ॥ विगुणेष्वपि तु खल्वेतेषु जनपदोद्ध्वंसनकरेषु भेषजेनोपपाद्यमा- नानामभयं भवति रोगेभ्य इति ॥ १२ ॥ निपुण वैद्य इस प्रकार के दोषों वाले वायु, जल, देश और काल इन चारों को जनपद-नाश का कारण मानते हैं । इनसे विपरीत लक्षणों वाले इन चारों को आरोग्यकारक गिनते हैं । इन चारों के विगुण होने व जनपद के नाशक कारणों के उपस्थित होने पर भी, दोष और दूष्य की अपेक्षा करके औषध द्वारा चिकित्सा करने पर पुरुषों को रोग नहीं होते, वे पुरुष रोगों से बचे रहते हैं ॥ ११-१२ ॥ भवन्ति चात्र—वैगुण्यमुपपन्नानां देशकालानिलाम्भसाम् । गरीयस्त्वं विशेषेण हेतुमत्संप्रचक्ष्यते ॥ १३ ॥ वाताज्जलं जलाद्देशं, देशात्कालं, स्वभावतः । विद्याद् दुष्परिहार्यत्वाद् गरीयस्तरमर्थवित् ॥ १४ ॥ वाय्वादिषु यथोक्तानां दोषाणां तु विशेषवित् । प्रतीकारस्य सौकर्ये विद्याल्लाघवलक्षणम् ॥ १५ ॥ विकृत हुए देश, काल, वायु, और जल इनमें कारण के विचार-अनुसार- किसका उत्कर्ष है इसका वर्णन करते हैं । यथार्थ तत्त्व को जानने वाला वैद्य स्वभाव से वायु से जल को, जल से देश को, देश से काल को बढ़ कर समझे । क्योंकि इनका त्याग नहीं किया जा सकता । यदि वायु खराब हो तो दूसरे स्थान पर सुगमता से जाया जा सकता है । जल तो जीवन के लिये सेवन करना आवश्यक है । यदि प्रयत्न से जल को भी छोड़ दें, देश से बचना कठिन है । देश से भी यदि देशान्तर में जायें तो काल से बचना अशक्य है । इसलिये सबसे अधिक प्रबल काल है । वायु, जल, देश और काल इन चारों के दोषों को दूर करने के उपाय जाने और दोषों के प्रतिकार के सुगम होने के कारक वैद्य इनके शान्ति के लक्षण भी जाने ॥ १३-१५ ॥
५०६ चरकसंहिता [ अ० ३ चतुर्ष्वपि तु दुष्टेषु कालान्तेषु यदा नराः । भेषजेनोपपाद्यन्ते न भवन्त्यातुरास्तदा ॥ १६ ॥ वायु आदि इन चारों के विकृत होने पर भी जब पुरुष औषध सेवन करते हैं तब रोगी नहीं होते ॥ १६ ॥ येषां न मृत्युसामान्यं सामान्यं न च कर्मणाम् । कर्म पञ्चविधं तेषां भेषजं परमुच्यते ॥ १७ ॥ रसायनानां विधिवच्चोपयोगः प्रशस्यते । शस्यते देहवृत्तिश्च भेषजैः पूर्वमुद्धृतैः ॥ १८ ॥ जिन पुरुषों में मरण की समानता नहीं और न कर्मों की समानता है, उनके लिये तो वमन, विरेचन आदि पञ्च कर्म सबसे श्रेयस्कर उपाय हैं । इसके साथ में विधिपूर्वक रसायन (वृष्य प्रयोगों) का सेवन करना चाहिये । तथा व्यापत्ति से पूर्व एकत्र की हुई औषधियो (अन्न आदि) से शरीर का पालन करना चाहिये ॥ १७-१८ ॥ सत्यं भूते दया दानं बल्यो देवतार्चनम् । सद्वृत्तस्यानुवृत्तिश्च प्रशमो गुप्तिरात्मनः ॥ १९ ॥ हितं जनपदानां च शिवानामुपसेवनम् । सेवनं ब्रह्मचर्यस्य तथैव ब्रह्मचारिणाम् ॥ २० ॥ संस्कथा धर्मशास्त्राणां महर्षीणां जितात्मनाम् । धार्मिकैः सात्त्विकैर्नित्यं सहास्या वृद्धसंमतैः ॥ २१ ॥ इत्येतद्भेषजं प्रोक्तमायुषः परिपालनम् । येषामनियतो मृत्युस्तस्मिन् काले सुदारुणे ॥ २२ ॥ सत्य, प्राणियों में दया, दान, बलि, देवता की अर्चना, सद् वृत्त का पालन, इन्द्रियों को विषयों से रोकना, अपनी रक्षा, अविकृत (अच्छे, जहाँ बीमारी न हो) जनपदों (देशों) का सेवन करना, ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मचारियों का सेवन करना, उनके पास रहना, धर्मशास्त्रों की कथा तथा जितात्मा महर्षियों से बात- चीत करना, धार्मिक सत्त्वप्रकृति के वृद्धों के पास उठना-बैठना, (तथा दैव- व्यपाश्रय कर्म का सेवन), आयु की रक्षा के लिये औषध है। जिन लोगों की मृत्यु इस दारुण काल में निश्चित (अवश्यम्भावी) नहीं है, उन के लिये उप- रोक्त कर्म औषध हैं ॥१९-२२॥ इति श्रुत्वा जनपदोद्ध्वंसने कारणान्यात्रेयस्य भगवतः पुनरपि भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—अथ खलु भगवन् ! कुतो मूलमेषां वाय्वादीनां वैगुण्यमुत्पद्यते, येनोपपन्ना जनपदमुद्ध्वंसयन्तीति ॥२
अ० ३] विमानस्थानम् ५०७
अ० ३] विमानस्थानम् ५०७ जनपद-नाश के इन कारणों को सुन कर भी अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय से पूछा—हे भगवन् ! वायु आदि में किस कारण से विगुणता उत्पन्न होती है, जिस से विकृत होकर ये जनपदों को नाश करते हैं ॥२३॥ तमुवाच भगवानात्रेयः—सर्वेषामप्यग्निवेश ! वाय्वादीनां यद्वैगु- ण्यमुत्पद्यते तस्य मूलमधर्मः, तन्मूलं वाऽसत्कर्म पूर्वकृतम् । तयोर्योनिः प्रज्ञापराध एव । तद्यथा—यदा देश-नगर-निगम-जनपद-प्रधाना धर्म- मुत्क्रम्याधर्मेण प्रजां वर्तयन्ति, तदाश्रितोपाश्रिताः पौरजनपदा व्यवहा- रोपजीविनश्च तमधर्ममभिवर्धयन्ति, ततः सोऽधर्मः प्रसह्य धर्ममन्त- र्धत्ते, ततस्तेऽन्तर्हितधर्माणो देवताभिरपि त्यज्यन्ते, तेषां तथाऽन्तर्हित- धर्माणामधर्मप्रधानानामपक्रान्तदेवतानामृतवो व्यापाद्यन्ते, तेन नापो यथाकालं देवो वर्षति, न वा वर्षति, विकृता वा वर्षति, वाता न सम्यगभिवान्ति, क्षितिर्व्यापद्यते, सलिलान्युपशुष्यन्ति, ओषधयः स्वभावं परिहायाऽऽपद्यन्ते विकृतिम्, तत उद्ध्वंसन्ते जनपदाः स्पर्शाभ्य- वहार्यदोषात् ॥ २४ ॥ अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा । इन वायु आदि सब में जो विगु- णता उत्पन्न होती है, उसका मूल कारण अधर्म है । इस अधर्म का मूल कारण पूर्व किये और असत् कर्म ( अहित कर्म ) हैं । इन दोनों अधर्म और असत् कर्मों की उत्पत्ति का कारण प्रज्ञापराध अर्थात् बुद्धि का दोष है । जिस समय देश, नगर, प्रान्त और जनपद के अध्यक्ष ( प्रधान शासक जन ) धर्मका अति- क्रमण करके अधर्म से प्रजाजनों के साथ व्यवहार करने लगते हैं, तब इन प्रधान जनों के आश्रित एवं पीछे चलने वाले नगर और जनपद वासी लोग तथा वाणिज्य व्यवहार वा अदालत द्वारा जीविका प्राप्त करने वाले मनुष्य इस अधर्म को और भी बढ़ाते हैं । इस प्रकार से बढ़ा हुआ अधर्म बलात् धर्म का लोप कर देता है । इस धर्म के लोप हो जाने से देवता लोग नागरिकों के लोगों का साथ छोड़ देते हैं, इस प्रकार से अधर्म की प्रधानता होने और देवता आदि का सहयोग छूट जाने पर ऋतुएं ( शीत, उष्ण आर वर्षा ) विकृत हो जाती हैं । इस से देव ( मेघ ) ठीक समय पर वर्षा नहीं करता, सर्वथा नहीं करता अथवा विकृत रूप में जल बरसता है, वायुएँ भी भली प्रकार नहीं चलतीं, भूमि बिगड़ जाती है, पानी सूख जाते हैं । औषधियां अपनी प्रकृति को छोड़ कर विकृति को प्राप्त हो जाती हैं । तब स्पर्श और आहार के दोष से जनपद नष्ट होने लगते हैं ॥ २४ ॥