देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
पञ्चमः स्कन्धः
अथ प्रथमोऽध्यायः
व्यासजीद्वारा त्रिदेवोंकी तुलनामें भगवतीकी उत्तमताका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>भवता कथितं सूत महदाख्यानमुत्तमम्।<br>कृष्णस्य चरितं दिव्यं सर्वपातकनाशनम्॥ १ | ऋषिगण बोले—हे सूतजी! आपने यह बहुत ही उत्तम कथा कही, जिसमें भगवान् श्रीकृष्णके सर्वपापविनाशक तथा अलौकिक चरित्रका वर्णन है॥ १॥ |
| सन्देहोऽत्र महाभाग वासुदेवकथानके।<br>जायते नः प्रोच्यमाने विस्तरेण महामते॥ २ | हे महाभाग! हे महामते! [आपके द्वारा] विस्तारपूर्वक कहे जा रहे श्रीकृष्णके इस कथानकमें हमें सन्देह हो रहा है॥ २॥ |
| वने गत्वा तपस्तप्तं वासुदेवेन दुष्करम्।<br>विष्णोरंशावतारेण शिवस्याराधनं कृतम्॥ ३<br><br>वरप्रदानं देव्या च पार्वत्या यत्कृतं पुनः।<br>जगन्मातुश्च पूर्णायाः श्रीदेवीव्या अंशभूतया॥ ४<br><br>ईश्वरेणापि कृष्णेन कुतस्तौ सम्प्रपूजितौ।<br>न्यूनता वा किमस्त्यस्य तदेवं संशयो मम॥ ५ | [एक तो] विष्णुके अंशावतार श्रीकृष्णने वनमें जाकर घोर तप किया और शिवकी आराधना की; पुनः जगज्जननी श्रीदेवी भगवती पूर्णाकी अंशस्वरूपा देवी पार्वती ने श्रीकृष्णको जो वरदान दिया; ईश्वर होते हुए भी श्रीकृष्णने शिव तथा पार्वतीकी उपासना क्यों की? क्या श्रीकृष्णमें शिवकी अपेक्षा कोई न्यूनता थी? यही हमारा सन्देह है॥ ३—५॥ |
| सूत उवाच<br>शृणुध्वं कारणं तत्र मया व्यासश्रुतञ्च यत्।<br>प्रब्रवीमि महाभागाः कथां कृष्णगुणान्विताम्॥ ६ | सूतजी बोले—हे महाभाग मुनिगण! व्यासजीसे इसका जो कारण मैंने सुना है, उसे आपलोग सुनिये। अब मैं भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंसे परिपूर्ण कथा कहता हूँ॥ ६॥ |
| वृत्तान्तं व्यासतः श्रुत्वा वैराटीसुतजस्तदा।<br>पुनः पप्रच्छ मेधावी सन्देहं परमं गतः॥ ७ | व्यासजीसे यह वृत्तान्त सुनकर प्रतिभावान् राजा जनमेजय और भी अधिक सन्देहमें पड़ गये; तब उन्होंने फिर पूछा॥ ७॥ |
| जनमेजय उवाच<br>सम्यक्सत्यवतीसूनो श्रुतं परमकारणम्।<br>तथापि मनसो वृत्तिः संशयं न विमुञ्चति॥ ८ | जनमेजय बोले—हे सत्यवतीतनय व्यासजी! मैंने परमकारणस्वरूपा भगवतीके विषयमें सुना। फिर भी मनकी वृत्ति संशयसे मुक्त नहीं हो पा रही है॥ ८॥ |
| कृष्णेनाराधितः शम्भुस्तपस्तप्त्वातिदारुणम्।<br>विस्मयोऽयं महाभाग देवदेवेन विष्णुना॥ ९ | हे महाभाग! मुझे यह महान् विस्मय है कि देवोंके भी देव विष्णुके अंशसे उत्पन्न श्रीकृष्णने अति उग्र तपस्या करके भगवान् शिवकी आराधना की। जो |
| ५३२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ ] |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यः सर्वात्मापि सर्वेशः सर्वसिद्धिप्रदः प्रभुः।<br>स कथं कृतवान्घोरं तपः प्राकृतवद्धरिः॥ १०<br>जगत्कर्तुं क्षमः कृष्णस्तथा पालयितुं क्षमः।<br>संहर्तुमपि कस्मात्स दारुणं तप आचरत्॥ ११ | सभी जीवोंकी आत्मा, सभीके ईश्वर और सभी प्रकारकी सिद्धियाँ देनेवाले हैं—उन भगवान् कृष्णने भी सामान्य प्राणियोंकी भाँति घोर तप क्यों किया? भगवान् श्रीकृष्ण तो जगत्का सृजन, पालन तथा संहार करनेमें समर्थ हैं; तब भी उन्होंने इतनी उग्र तपस्या किसलिये की?॥ ९—११॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| सत्यमुक्तं त्वया राजन् वासुदेवो जनार्दनः।<br>क्षमः सर्वेषु कार्येषु देवानां दैत्यसूदनः॥ १२<br>तथापि मानुषं देहमाश्रितः परमेश्वरः।<br>कृतवान्मानुषान्भावान्वर्णाश्रमसमाश्रितान्॥ १३<br>वृद्धानां पूजनं चैव गुरुपादाभिवन्दनम्।<br>ब्राह्मणानां तथा सेवा देवताराधनं तथा॥ १४<br>शोके शोकाभियोगश्च हर्षे हर्षसमुन्नतिः।<br>दैन्यं नानापवादाश्च स्त्रीषु कामोपसेवनम्॥ १५<br>कामः क्रोधस्तथा लोभः काले काले भवन्ति हि।<br>तथा गुणमये देहे निर्गुणत्वं कथं भवेत्॥ १६ | हे राजन्! आपने सत्य कहा है। दैत्यदमन भगवान् वासुदेव देवताओंके सभी कार्य करनेमें समर्थ थे; फिर भी उन परमेश्वर श्रीकृष्णने मानव-देह धारण करनेके कारण वर्णाश्रमधर्मसे सम्बन्धित मानवोचित कार्य सम्पादित किये थे। उन्होंने वृद्धजनोंकी पूजा, गुरु-जनोंकी चरण-वन्दना, ब्राह्मणोंकी सेवा तथा देवताओंकी आराधना की। शोकके अवसरपर वे शोकाकुल हुए तथा हर्षकी स्थितिमें हर्षित हुए। [अवसरके अनुसार] उन्होंने दीनताका प्रदर्शन किया, नानाविध लोकापवादोंको सहन किया तथा अपनी स्त्रियोंके साथ लीला-विहार किया। जिस प्रकार मानवमें समय-समयपर काम, क्रोध तथा लोभ होते रहते हैं, उसी प्रकारके भाव उनके भी मनमें जाग्रत् हुए; क्योंकि गुणमय देहमें निर्गुणत्व कैसे हो सकता है?॥ १२—१६॥ |
| सौबलीशापजाद्दोषत्तथा ब्राह्मणशापजात्।<br>निधनं यादवानां तु कृष्णदेहस्य मोचनम्॥ १७ | सुबलसुता गान्धारी तथा ब्राह्मण अष्टावक्रके शापजनित दोषके कारण यादवोंका विनाश हुआ और भगवान् कृष्णको देह-त्याग करना पड़ा॥ १७॥ |
| हरणं लुण्ठनं तद्वत्तत्पत्नीनां नराधिप।<br>अर्जुनस्यास्त्रमोक्षे च क्लीबत्वं तस्करेषु च॥ १८ | हे राजन्! उसी प्रकार उनकी स्त्रियोंका हरण हुआ, उनका धन लूट लिया गया तथा अर्जुन उन लुटेरोंपर अपना अस्त्र चलानेमें पुरुषार्थहीन हो गये॥ १८॥ |
| अज्ञत्वं हरणे गेहात्तत्प्रद्युम्नानिरुद्धयोः।<br>एवं मानुषदेहेऽस्मिन्मानुषं खलु चेष्टितम्॥ १९ | श्रीकृष्णको अपने घरसे प्रद्युम्न तथा अनिरुद्धके हरणकी जानकारी नहीं हो पायी। इस प्रकार यह मानव-शरीर पाकर उन्होंने साधारण प्राणीकी भाँति सभी मानवीय चेष्टाओंका प्रदर्शन किया॥ १९॥ |
| विष्णोरंशावतारेऽस्मिन्नारायणमुनेस्तथा ।<br>अंशजे वासुदेवेऽत्र किं चित्रं शिवसेवने॥ २० | तब भगवान् विष्णुके अंशावतार तथा साक्षात् नारायणके अंशसे उत्पन्न इन श्रीकृष्णने यदि शिवजीकी उपासना की तो इसमें आश्चर्य क्या?॥ २०॥ |
| स हि सर्वेश्वरो देवो विष्णोरपि च कारणम्।<br>सुषुप्तस्थाननाथः स विष्णुना च प्रपूजितः॥ २१ | वे प्रभु सबके ईश्वर हैं तथा विष्णुकी भी उत्पत्तिके कारण हैं। वे सुषुप्तस्थान (कारण-देह)-के स्वामी हैं। इसीलिये वे विष्णुके द्वारा भी पूजित |
| अ० १ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५३३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तदंशभूताः कृष्णाद्यास्तैः कथं न स पूज्यते।<br>अकारो भगवान्ब्रह्माप्युकारः स्याद्धरिः स्वयम्॥ २२<br><br>मकारो भगवान् रुद्रोऽप्यर्धमात्रा महेश्वरी।<br>उत्तरोत्तरभावेनाप्युत्तमत्वं स्मृतं बुधैः॥ २३ | हैं। कृष्ण आदि उन्हीं विष्णुके अंशसे अवतीर्ण हैं तब वे शिवकी पूजा क्यों नहीं करेंगे? ॐकारका 'अ' ब्रह्माका रूप है, 'उ' विष्णुका रूप है, 'म्' भगवान् शिवका रूप है और अर्धमात्रा (चन्द्रबिन्दु) भगवती महेश्वरीका रूप है। ये उत्तरोत्तर क्रमसे एक-दूसरेसे उत्तम हैं—ऐसा विद्वानोंने कहा है॥ २१—२३॥ |
| अतः सर्वेषु शास्त्रेषु देवी सर्वोत्तमा स्मृता।<br>अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः॥ २४ | अतएव समस्त शास्त्रोंमें देवी सर्वोत्तम मानी गयी हैं। वे भगवती बिन्दुरूप नित्य अर्धमात्रामें स्थित हैं, जो [अर्धमात्रा] विशेषरूपसे उच्चारित नहीं की जा सकती॥ २४॥ |
| विष्णोरप्यधिको रुद्रो विष्णुस्तु ब्रह्मणोऽधिकः।<br>तस्मान्न संशयः कार्यः कृष्णेन शिवपूजने॥ २५ | ब्रह्माजीसे भी बढ़कर विष्णु तथा विष्णुसे भी बढ़कर भगवान् शिव हैं। अतः श्रीकृष्णद्वारा शिवकी आराधनामें किसी प्रकारका सन्देह नहीं करना चाहिये॥ २५॥ |
| इच्छया ब्रह्मणो वक्त्राद्वरदानार्थमुद्बभौ।<br>मूलरुद्रस्यांशभूतो रुद्रनामा द्वितीयकः॥ २६<br><br>सोऽपि पूज्योऽस्ति सर्वेषां मूलरुद्रस्य का कथा।<br>देवीतत्त्वस्य सान्निध्यादुत्तमत्वं स्मृतं शिवे॥ २७ | सृजन-कार्यके लिये जब ब्रह्माजीने शिवकी उपासना की तब इच्छापूर्वक उन्हें वरदान देनेके लिये शिवजी उन्हींके मुखसे प्रकट हो गये, जो मूलरुद्र कहलाये। पुनः उन मूलरुद्रके अंशसे द्वितीय रुद्र उत्पन्न हुए। वे रुद्रदेव भी सबके पूजनीय हैं तो फिर मूलरुद्रके विषयमें कहना ही क्या? देवीतत्त्वके सांनिध्यमें रहनेके कारण ही शिवजीमें उत्तमता कही गयी है॥ २६-२७॥ |
| अवतारा हरेरेवं प्रभवन्ति युगे युगे।<br>योगमायाप्रभावेण नात्र कार्या विचारणा॥ २८ | भगवती योगमायाके ही प्रभावसे प्रत्येक युगमें भगवान् विष्णुके विभिन्न अवतार होते रहते हैं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ २८॥ |
| या नेत्रपक्ष्मपरिसञ्चलनेन सम्य-<br> ग्विश्वं सृजत्यवति हन्ति निगूढभावा।<br>सैषा करोति सततं द्रुहिणाच्युतेशान्<br> नानावतारकलने परिभूयमानान्॥ २९ | अत्यन्त निगूढ रहस्योंवाली जो भगवती अप्रत्यक्षरूपसे नेत्रकी पलक झँपनेमात्रमें भलीभाँति जगत्की उत्पत्ति, पालन तथा संहार कर देती हैं; वे ही ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवको अनेकविध रूपोंमें अवतार ग्रहण करनेमें निरन्तर दुःखोंसे व्याकुल करती रहती हैं॥ २९॥ |
| सूतीगृहाद् व्रजनमप्यनया नियुक्तं<br> संगोपितश्च भवने पशुपालराज्ञः।<br>सम्प्रापितश्च मथुरां विनियोजितश्च<br> श्रीद्वारकाप्रणयने ननु भीतचित्तः॥ ३० | इन्हीं योगमायाके द्वारा श्रीकृष्णको प्रसूतिगृहसे निकालकर गोपराज नन्दके भवनमें पहुँचाकर उनकी रक्षा की गयी। वे योगमाया ही कंसके विनाशार्थ श्रीकृष्णको मथुरा ले गयीं। जरासन्धसे अत्यन्त भयाक्रान्त चित्तवाले श्रीकृष्णको द्वारका बनानेकी प्रेरणा भी उन्हीं भगवतीने दी॥ ३०॥ |
५३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १
५३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निर्माय षोडशसहस्रशतार्धकास्ता<br>नार्योऽष्टसम्मततराः स्वकलासमुत्थाः।<br>तासां विलासवशगं तु विधाय कामं<br>दासीकृतो हि भगवाननयाप्यनन्तः॥ ३१॥ | उन्होंने ही अपनी कला-शक्तिसे सोलह हजार पचास रानियों तथा आठ पटरानियोंकी रचना करके पुनः भगवान् श्रीकृष्णको उनके विलासके वशीभूत करके उन अनन्त शक्तिसम्पन्न श्रीकृष्णको उनका वशवर्ती बना दिया॥ ३१॥ |
| एकापि बन्धनविधौ युवती समर्था<br>पुंसो यथा सुदृढलोहमयं तु दाम।<br>किं नाम षोडशसहस्रशतार्धकाश्च<br>तं स्वीकृतं शुकमिवातिनिबन्धयन्ति॥ ३२॥ | केवल एक ही युवती अपने लौहमय सुदृढ़ पाशमें पुरुषको बाँध सकनेमें समर्थ है तो फिर जिसकी सोलह हजार पचास भार्याएँ हों उसके विषयमें क्या कहना? वे सब तो उस पुरुषको पालित तोतेकी भाँति अपनी इच्छाके अनुरूप नियन्त्रित कर ही सकती हैं॥ ३२॥ |
| सत्राजितीवशगतेन मुदान्वितेन<br>प्राप्तं सुरेन्द्रभवनं हरिणा तदानीम्।<br>कृत्वा मृधं मघवता विहृतस्तरूणा-<br>मीशः प्रियासदनभूषणतां य आप॥ ३३॥ | सत्राजित्की पुत्री सत्यभामाके वशीभूत श्रीकृष्ण उसके कहनेपर प्रसन्नतापूर्वक इन्द्रके भवनमें पहुँच गये। वहाँपर इन्द्रके साथ युद्ध करके उन्होंने तरुराज कल्पवृक्ष छीन लिया और उससे अपनी प्रिया सत्यभामाके महलको सुशोभित किया॥ ३३॥ |
| यो भीमजां हि हृतवाञ्छिशुपालकादी-<br>ञ्जित्वा विधिं निखिलधर्मकृतो विधित्सुः।<br>जग्राह तां निजबलेन च धर्मपत्नीं<br>कोऽसौ विधिः परकलत्रहृतौ विजातः॥ ३४॥ | समस्त धार्मिक अनुष्ठानोंको विधिपूर्वक करनेकी इच्छावाले भगवान् श्रीकृष्णने शिशुपाल आदि वीरोंको जीतकर [पूर्वतः वाग्दत्ता] रुक्मिणीका हरण कर लिया और अपने बलके प्रभावसे उसे अपनी धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण किया। किसी दूसरेकी भार्या हरण करनेकी यह कौन-सी विधि निर्मित हो गयी?॥ ३४॥ |
| अहङ्कारवशः प्राणी करोति च शुभाशुभम्।<br>विमूढो मोहजालेन तत्कृतेनातिपातिना॥ ३५॥ | अत्यन्त दारुण अधःपतन करानेवाले मोहजालसे विमोहित तथा अहंकारके वशीभूत मनुष्य नानाविध शुभ तथा अशुभ कार्य करता है॥ ३५॥ |
| अहङ्काराद्धि सञ्जातमिदं स्थावरजङ्गमम्।<br>मूलाद्धरिहरादीनामुग्रात्प्रकृतिसम्भवात् ॥ ३६॥ | मूलप्रकृतिजन्य उग्र अहंकारसे ही इस स्थावर-जंगमात्मक जगत्की उत्पत्ति हुई है और इसीसे विष्णु, शिव आदि देवोंका भी प्रादुर्भाव हुआ है॥ ३६॥ |
| अहङ्कारपरित्यक्तो यदा भवति पद्मजः।<br>तदा विमुक्तो भवति नोचेत्संसारकर्मकृत्॥ ३७॥ | जब ब्रह्माजी पूर्णरूपसे अहंकारसे रहित होते हैं, तब वे सृष्टिके निर्माण-कार्यसे मुक्त हो जाते हैं; अन्यथा अहंकारके वशवर्ती होकर वे सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त रहते हैं॥ ३७॥ |
| तन्मुक्तस्तु विमुक्तो हि बद्धस्तद्वशतां गतः।<br>न नारी न धनं गेहं न पुत्रा न सहोदराः॥ ३८॥ | उस अहंकारसे मुक्त प्राणी सांसारिक बन्धनसे छूट जाता है और उसके वशीभूत हुआ प्राणी सांसारिक बन्धनमें पड़ जाता है। हे राजन्! स्त्री, धन, घर, पुत्र तथा सहोदर भाई—ये सब बन्धनके मूल |
अ० १ ] पञ्चम स्कन्ध ५३५
| बन्धनं प्राणिनां राजन्नहङ्कारस्तु बन्धकः।<br>अहं कर्ता मया चेदं कृतं कार्यं बलीयसा ॥ ३९<br><br>करिष्यामि करोम्येवं स्वयं बध्नाति प्राणभृत्।<br>कारणेन विना कार्यं न सम्भवति कर्हिचित् ॥ ४०<br><br>यथा न दृश्यते जातो मृत्पिण्डेन विना घटः। | कारण नहीं हैं, अपितु अहंकार ही प्राणियोंके लिये बन्धनकारी वस्तु है। मैं ही कर्ता हूँ, यह कार्य मैंने अपने ही सामर्थ्यसे पूरा किया है, यह कार्य पूरा कर लूँगा, यह कार्य अभी कर लेता हूँ—इन भावनाओंके कारण प्राणी स्वयं बँधता चला जाता है। कोई भी कार्य बिना कारणके कदापि नहीं होता है, जैसे मिट्टीके पिण्डके बिना घड़ा न तो बन सकता है, न दिखायी पड़ सकता है॥ ३८—४० १/२ ॥ |
| विष्णुः पालयिता विश्वस्याहङ्कारसमन्वितः ॥ ४१<br><br>अन्यथा सर्वदा चिन्ताम्बुधौ मग्नः कथं भवेत्। | जब भगवान् विष्णु अहंकारके वशवर्ती होते हैं तभी वे विश्वका पालन करनेमें समर्थ होते हैं। नहीं तो वे सदा [सृष्टिपालनके] चिन्तारूपी समुद्रमें डूबे क्यों रहते ? ॥ ४१ १/२ ॥ |
| अहङ्कारविमुक्तस्तु यदा भवति मानवः ॥ ४२<br><br>अवतारप्रवाहेषु कथं मज्जेच्छुभाशयः। | अहंकारमुक्त होकर यदि वे मनुष्यरूप ग्रहण करें तो निर्मलचित्त हुए वे अवतार-प्रवाहमें होनेवाले (सुख-दुःखादि)-में कैसे डूबें-उतराएँ? ॥ ४२ १/२ ॥ |
| मोहमूलमहङ्कारः संसारस्तत्समुद्भवः ॥ ४३<br><br>अहङ्कारविहीनानां न मोहो न च संसृतिः। | अहंकार ही अज्ञानका मूल कारण है तथा उसीसे इस जगत्की उत्पत्ति हुई है। अहंकारसे विहीन प्राणीको अज्ञानता तथा सांसारिक बन्धन—दोनों ही नहीं होते ॥ ४३ १/२ ॥ |
| त्रिविधः पुरुषः प्रोक्तः सात्त्विको राजसस्तथा ॥ ४४<br><br>तामसस्तु महाराज ब्रह्मविष्णुशिवादिषु।<br>त्रिविधस्त्रिषु राजेन्द्र काजेशादिषु सर्वदा ॥ ४५<br><br>अहङ्कारः सदा प्रोक्तो मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।<br>अहङ्कारेण तेनैव बद्धा एते न संशयः ॥ ४६ | हे महाराज! इस जगत्में सत्त्वगुणी, रजोगुणी तथा तमोगुणी—ये तीन प्रकारके पुरुष कहे गये हैं। हे राजेन्द्र! सृष्टि, पालन तथा संहारकार्य सम्पन्न करनेवाले ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि तीनों देवताओंमें भी ये तीन गुण सदा विद्यमान रहते हैं। तत्त्वदर्शी मुनियोंने अहंकारको ही जगत्की उत्पत्तिका परम कारण बताया है। अतएव इसमें सन्देह नहीं है कि ये ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश भी उसी अहंकारसे आबद्ध हैं ॥ ४४—४६ ॥ |
| मायाविमोहिता मन्दाः प्रवदन्ति मनीषिणः।<br>करोति स्वेच्छया विष्णुरवताराननेकणः ॥ ४७<br><br>मन्दोऽपि दुःखगहने गर्भवासेऽतिसङ्कटे।<br>न करोति मतिं विद्वान्कथं कुर्यात्स चक्रभृत् ॥ ४८ | मायासे विमोहित मन्द बुद्धिवाले कुछ मनीषी कहते हैं कि भगवान् विष्णु अपनी इच्छासे नानाविध अवतार ग्रहण करते हैं, किंतु जब कोई मन्दमति प्राणी भी अतिशय दुःखप्रद गर्भमें निवास करना पसन्द नहीं करता तो फिर सर्वविद्या-सम्पन्न वे चक्रधारी भगवान् विष्णु अवतार ग्रहण करना क्यों चाहेंगे? ॥ ४७-४८ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे योगमायाप्रभाववर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
| ५३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ |
|---|
| कौसल्यादेवकीगर्भे विष्ठामलसमाकुले।<br>स्वेच्छया प्रवदन्त्यद्धा गतो हि मधुसूदनः॥ ४९<br><br>वैकुण्ठसदनं त्यक्त्वा गर्भवासे सुखं नु किम्।<br>चिन्ताकोटिसमुत्थाने दुःखदे विषसम्मिते॥ ५० | कुछ लोग कहते हैं कि भगवान् विष्णु अपनी इच्छासे कौसल्या तथा देवकीके मल-मूत्रसे परिपूर्ण गर्भमें आये थे। किंतु वैकुण्ठ-भवन छोड़कर करोड़ों चिन्ताओंके आगार विषतुल्य दुःखदायक गर्भवासमें आनेसे उन्हें कौन-सा सुख प्राप्त हुआ होगा?॥ ४९-५०॥ | | तपस्तप्त्वा क्रतून्कृत्वा दत्त्वा दानान्यनेकशः।<br>न वाञ्छन्ति यतो लोका गर्भवासं सुदुःखदम्॥ ५१<br><br>स कथं भगवान्विष्णुः स्ववशश्चेज्जनार्दनः।<br>गर्भवासरुचिर्भूयाद्भवेत्स्ववशता यदि॥ ५२ | जब साधारण प्राणी भी तपस्या करके, विविध प्रकारके यज्ञ सम्पन्न करके तथा नाना प्रकारके दान देकर अत्यन्त दुःखद गर्भवास नहीं चाहते तब यदि भगवान् विष्णु स्वतन्त्र होते तो उस गर्भवासको क्यों चाहते? यदि वे अपने वशमें होते तो गर्भवासके प्रति उनकी रुचि क्यों होती?॥ ५१-५२॥ | | जानीहि त्वं महाराज योगमायावशे जगत्।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं देवमानुषतिर्यगम्॥ ५३ | अतः हे महाराज! आप यह जान लीजिये कि ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्, सभी देव, मानव तथा पशु-पक्षी योगमाया आदिशक्ति भगवतीके वशमें हैं॥ ५३॥ | | मायातन्त्रीनिबद्धा ये ब्रह्मविष्णुहरादयः।<br>भ्रमन्ति बन्धमायान्ति लीलया चोर्णनाभवत्॥ ५४ | मकड़ीके तन्तुजालमें फँसे कीटकी भाँति ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश आदि ये सभी देव उन भगवतीकी लीलासे मायारूपी बन्धनमें पड़ जाते हैं और आवागमनके चक्रमें भ्रमण करते रहते हैं॥ ५४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे योगमायाप्रभाववर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः
महिषासुरके जन्म, तप और वरदान-प्राप्तिकी कथा
| राजोवाच<br>योगेश्वर्याः प्रभावोऽयं कथितश्चातिविस्तरात्।<br>ब्रूहि तच्चरितं स्वामिञ्छ्रोतुं कौतूहलं मम॥ १<br><br>महादेवीप्रभावं वै श्रोतुं को नाभिवाञ्छति।<br>यो जानाति जगत्सर्वं तदुत्पन्नं चराचरम्॥ २ | राजा बोले—हे स्वामिन्! आपने भगवती योगेश्वरीका यह प्रभाव विस्तारपूर्वक कहा। अब आप उन महामायाका चरित्र कहिये, उसे सुननेकी मेरी बड़ी उत्सुकता है। जो मनुष्य इस बातको भलीभाँति जानता है कि यह स्थावर-जंगमात्मक संसार उन्हींसे उत्पन्न हुआ है, वह उन महादेवीके प्रभावको क्यों नहीं सुनना चाहेगा?॥ १-२॥ | | व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि विस्तरेण महामते।<br>श्रद्दधानाय शान्ताय न ब्रूयात्स तु मन्दधीः॥ ३ | व्यासजी बोले—हे राजन्! सुनिये, मैं विस्तारके साथ वर्णन करूँगा। हे महामते! जो वक्ता श्रद्धालु एवं शान्तचित्त श्रोतासे भगवतीकी कथा नहीं कहता, वह तो मन्द बुद्धिका होता है॥ ३॥ |
| अ० २ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५३७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुरा युद्धमभूद् घोरं देवदानवसेनयोः।<br>पृथिव्यां पृथिवीपाल महिषाख्ये महीपतौ ॥ ४ | हे राजन्! प्राचीन कालकी बात है, जिस समय भूतलपर महिषासुर नामक राजा राज्य करता था, उस समय देवताओं और दैत्योंकी सेनाओंमें भीषण युद्ध छिड़ गया॥ ४॥ |
| महिषो नाम राजेन्द्र चकार तप उत्तमम्।<br>गत्वा हेमगिरौ चोग्रं देवविस्मयकारकम् ॥ ५<br>वर्षाणामयुतं पूर्णं चिन्तयन्हृदि देवताम्। | हे राजेन्द्र! उन्हीं दिनों सुमेरुपर्वतपर जाकर उस महिष नामक दानवने हृदयमें अपने इष्ट देवताका ध्यान करते हुए पूरे दस हजार वर्षोंतक देवताओंंतकको चकित कर देनेवाला उत्तम तथा कठोर तप किया॥ ५ १/२ ॥ |
| तस्य तुष्टो महाराज ब्रह्मा लोकपितामहः॥ ६<br>तत्रागत्याब्रवीद्वाक्यं हंसारूढश्चतुर्मुखः।<br>वरं वरय धर्मात्मन्ददामि तव वाञ्छितम्॥ ७ | हे महाराज! उसकी तपस्यासे लोकपितामह ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये, अतः हंसपर सवार होकर वे चतुर्मुख ब्रह्मा वहाँ प्रकट होकर उससे बोले—हे धर्मात्मन्! वर माँगो, मैं तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण करूँगा॥ ६-७॥ |
| महिष उवाच<br>अमरत्वं देवदेव वाञ्छामि द्रुहिण प्रभो।<br>यथा मृत्युभयं न स्यात्तथा कुरु पितामह॥ ८ | महिष बोला—हे देवदेव! हे ब्रह्मन्! हे प्रभो! मैं अमरत्व चाहता हूँ। हे पितामह! आप ऐसा वर दीजिये, जिससे मुझे मृत्युका भय न रहे॥ ८॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>उत्पन्नस्य ध्रुवं मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।<br>सर्वथा मरणोत्पत्ती सर्वेषां प्राणिनां किल॥ ९<br>नाशः कालेन सर्वेषां प्राणिनां दैत्यपुङ्गव।<br>महामहीधराणां च समुद्राणां च सर्वथा॥ १० | ब्रह्माजी बोले—[इस जगत्में] उत्पन्न हुएका मरना और मरे हुएका जन्म लेना निश्चित है। समस्त जीवोंका जन्म और मरण अनिवार्यरूपसे होता रहता है। हे दैत्यप्रवर! समयानुसार सम्पूर्ण प्राणियोंका नाश हो जाता है, यहाँतक कि बड़े-बड़े पर्वतों एवं समुद्रोंका भी नाश हो जाता है॥ ९-१०॥ |
| एकं स्थानं परित्यज्य मरणस्य महीपते।<br>प्रब्रूहि तं वरं साधो यस्ते मनसि वर्तते॥ ११ | अतः हे राजन्! मृत्युसम्बन्धी अपनी यह धारणा छोड़कर हे साधो! दूसरा जो भी वर तुम्हारे मनमें हो, वह माँग लो॥ ११॥ |
| महिष उवाच<br>न देवान्मानुषाद्दैत्यान्मरणं मे पितामह।<br>पुरुषान्न च मे मृत्युर्योषा मां का हनिष्यति॥ १२<br>तस्मान्मे मरणं नूनं कामिन्याः कुरु पद्मज।<br>अबला हन्त मां हन्तुं कथं शक्ता भविष्यति॥ १३ | महिष बोला—हे पितामह! देव, दानव और मानव—इनमें किसी भी पुरुषसे मेरी मृत्यु न हो। इस प्रकार जब पुरुषसे मेरी मृत्यु नहीं होगी, तब भला कौन-सी स्त्री मुझे मार सकेगी? अतएव हे कमलयोने! मेरी मृत्यु किसी स्त्रीके हाथ होनेका वरदान दीजिये; क्योंकि कोई अबला भला मुझे मारनेमें कैसे समर्थ हो सकेगी?॥ १२-१३॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>यदा कदापि दैत्येन्द्र नार्यास्ते मरणं ध्रुवम्।<br>न नरेभ्यो महाभाग मृतिस्ते महिषासुर॥ १४ | ब्रह्माने कहा—हे दानवेन्द्र! जब भी तुम्हारी मृत्यु होगी किसी स्त्रीसे ही होगी। हे महाभाग महिषासुर! पुरुषसे तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी॥ १४॥ |
| ५३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ |
|---|
| व्यास उवाच<br>एवं दत्त्वा वरं तस्मै ययौ ब्रह्मा निजालयम्।<br>सोऽपि दैत्यवरः प्राप निजं स्थानं मुदान्वितः॥ १५ | व्यासजी बोले—हे राजन्! इस प्रकार उसे वरदान देकर ब्रह्माजी अपने लोकको चले गये और वह दैत्यश्रेष्ठ महिषासुर भी प्रसन्न होकर अपने घर लौट गया॥ १५॥ | | राजोवाच<br>महिषः कस्य पुत्रोऽसौ कथं जातो महाबली।<br>कथं च माहिषं रूपं प्राप्तं तेन महात्मना॥ १६ | राजा बोले—वह महिषासुर किसका पुत्र था, वह महान् बलशाली कैसे हो गया था और उस महान् दैत्यको महिषका रूप कैसे मिला था?॥ १६॥ | | व्यास उवाच<br>दनोः पुत्रौ महाराज विख्यातौ क्षितिमण्डले।<br>रम्भश्चैव करम्भश्च द्वावास्तां दानवोत्तमौ॥ १७ | व्यासजी बोले—हे महाराज! दनुके रम्भ और करम्भ—नामक दो पुत्र थे। वे दोनों दानवश्रेष्ठ भूमण्डलपर बहुत प्रसिद्ध थे॥ १७॥ | | तावपुत्रौ महाराज पुत्रार्थं तेपतुस्तपः।<br>बहून्वर्षगणान्कामं पुण्ये पञ्चनदे जले॥ १८<br><br>करम्भस्तु जले मग्नश्चकार परमं तपः।<br>वृक्षं रसालवटं प्राप्य रम्भोऽग्निमसेवत॥ १९ | हे महाराज! वे दोनों सन्तानहीन थे, अतः वे पुत्र-प्राप्तिके लिये तपस्या करने लगे। उनमें करम्भने पवित्र पंचनदके जलमें डूबकर अनेक वर्षोंतक कठोर तप किया और रम्भ दूधवाले वटवृक्षके नीचे जाकर पंचाग्निका सेवन करने लगा॥ १८-१९॥ | | पञ्चाग्निसाधनासक्तः स रम्भस्तु यदाभवत्।<br>ज्ञात्वा शचीपतिर्दुःखमुद्ययौ दानवौ प्रति॥ २० | बहुत कालतक जब रम्भ पंचाग्नि-साधना करता रह गया, तब यह जानकर इन्द्र बहुत चिन्तित हुए और वे उन दोनों दानवोंके पास पहुँच गये॥ २०॥ | | गत्वा पञ्चनदे तत्र ग्राहरूपं चकार ह।<br>वासवस्तु करम्भं तं तदा जग्राह पादयोः॥ २१ | पंचनदके जलमें प्रविष्ट होकर इन्द्रने ग्राहका रूप धारण कर लिया और उस करम्भको दोनों पैरोंसे पकड़ लिया। इस प्रकार वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्रने उस करम्भको मार डाला॥ २१ १/२॥ | | निजघान च तं दुष्टं करम्भं वृत्रसूदनः।<br>भ्रातरं निहतं श्रुत्वा रम्भः कोपं परं गतः॥ २२<br><br>स्वशीर्षं पावके होतुमैच्छच्छित्त्वा करेण ह।<br>केशपाशे गृहीत्वाशु वामेन क्रोधसंयुतः॥ २३<br><br>दक्षिणेन करेणोग्रं गृहीत्वा खड्गमुत्तमम्।<br>छिनत्ति शीर्षं तत्तावद्वह्निना प्रतिबोधितः॥ २४ | तब अपने भाईका वध सुनकर रम्भ अत्यधिक कुपित हुआ। उसने अपने हाथसे अपना सिर काटकर उसे अग्निमें होम कर देनेकी इच्छा की। तदुपरान्त वह तत्काल अत्यन्त क्रोधके साथ बायें हाथसे अपने केशपाश पकड़कर दाहिने हाथमें तीक्ष्ण तलवार लेकर जैसे ही अपना सिर काटनेको उद्यत हुआ, तभी अग्निदेव [प्रकट होकर] उसे समझाने लगे॥ २२—२४॥ | | उक्तश्च दैत्य मूर्खोऽसि स्वशीर्षं छेत्तुमिच्छसि।<br>आत्महत्यातिदुःसाध्या कथं त्वं कर्तुमुद्यतः॥ २५ | [अग्निदेव उससे] बोले—हे दैत्य! तुम अपना ही सिर काटना चाहते हो; तुम तो बड़े मूर्ख हो। आत्महत्या अत्यन्त ही दुःसाध्य कर्म है। इसे करनेके लिये तुम कैसे तैयार हो गये?॥ २५॥ | | वरं वरय भद्रं ते यस्ते मनसि वर्तते।<br>मा म्रियस्व मृतेनाद्य किं ते कार्यं भविष्यति॥ २६ | तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनमें जो हो, वह वरदान माँग लो। मरो मत, मरनेसे तुम्हारा कौन-सा कार्य हो जायगा?॥ २६॥ |
| अ० २ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५३९ |
|---|
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं रम्भः पावकस्य सुभाषितम्।<br>ततोऽब्रवीद्वचो रम्भस्त्यक्त्वा केशकलापकम्॥ २७<br><br>यदि तुष्टोऽसि देवेश देहि मे वाञ्छितं वरम्।<br>त्रैलोक्यविजयी पुत्रः स्यान्मः परबलार्दनः॥ २८<br><br>अजेयः सर्वथा स स्याद्देवदानवमानवैः।<br>कामरूपी महावीर्यः सर्वलोकाभिवन्दितः॥ २९<br><br>पावकस्तं तथेत्याह भविष्यति तवेप्सितम्।<br>पुत्रस्तव महाभाग मरणाद्विरमाधुना॥ ३०<br><br>यस्यां चित्तं तु रम्भ त्वं प्रमदायां करिष्यसि।<br>तस्यां पुत्रो महाभाग भविष्यति बलाधिकः॥ ३१<br><br>व्यास उवाच<br>इत्युक्तो वह्निना रम्भो वचनं चित्तरञ्जनम्।<br>श्रुत्वा प्रणम्य प्रययौ वह्निं तं दानवोत्तमः॥ ३२<br><br>यक्षैः परिवृतं स्थानं रमणीयं श्रियान्वितम्।<br>दृष्ट्वा चक्रे तदा भावं महिष्यां दानवोत्तमः॥ ३३<br><br>मत्तायां रूपपूर्णायां विहायान्याञ्च योषितम्।<br>सा समागाच्च तरसा कामयन्ती मुदान्विता॥ ३४<br><br>रम्भोऽपि गमनं चक्रे भवितव्यप्रणोदितः।<br>सा तु गर्भवती जाता महिषी तस्य वीर्यतः॥ ३५<br><br>तां गृहीत्वाथ पातालं प्रविवेश मनोहरम्।<br>महिषेभ्यश्च तां रक्षन्प्रियामनुमतां किल॥ ३६<br><br>कदाचिन्महिषश्चान्यः कामार्तस्तामुपाद्रवत्।<br>स्वयमागत्य तं हन्तुं दानवः समुपाद्रवत्॥ ३७ | व्यासजी बोले— अग्निदेवका सुन्दर वचन सुनकर रम्भने अपना केशपाश छोड़कर कहा—हे देवेश! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे यही वांछित वरदान दीजिये कि मुझे तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करनेवाला तथा शत्रु-सेनाका विनाश करनेवाला पुत्र प्राप्त हो। वह देवता, दानव तथा मनुष्य—इन सभीसे सर्वथा अजेय हो। वह महापराक्रमी, अपने इच्छानुसार कोई भी रूप धारण करनेमें समर्थ तथा सभी लोगोंके लिये वन्दनीय हो॥ २७—२९॥<br><br>अग्निदेवने उससे कहा कि जैसी तुम्हारी अभिलाषा है, वैसा ही होगा। हे महाभाग! तुम्हें वैसा ही पुत्र प्राप्त होगा, किंतु अब तुम मरनेका विचार छोड़ दो॥ ३०॥<br><br>हे महाभाग! हे रम्भ! जिस भी स्त्रीके प्रति तुम्हारे मनमें आसक्ति-भाव आ जायगा, उसीसे तुम्हें वह महाबलशाली पुत्र उत्पन्न होगा॥ ३१॥<br><br>व्यासजी बोले— हे राजन्! अग्निदेवने उससे ऐसा कहा। तब उनका मनमोहक वचन सुनकर दानवश्रेष्ठ रम्भ अग्निको प्रणाम करके वहाँसे चला गया और एक ऐसे स्थानपर जा पहुँचा जो रमणीक, समृद्धियोंसे सम्पन्न तथा यक्षोंसे घिरा हुआ था॥ ३२ १/२ ॥<br><br>वहाँ एक रूपवती तथा मदमत्त महिषीको देखकर वह दानवश्रेष्ठ किसी अन्य स्त्रीको छोड़कर उसीपर आसक्त हो गया। वह महिषी भी उसे प्रसन्नतापूर्वक चाहती हुई तत्काल उसके साथ रमणके लिये तैयार हो गयी। होनहारसे प्रेरित होकर रम्भने उसके साथ समागम किया और उसके वीर्यसे वह महिषी गर्भवती हो गयी॥ ३३—३५॥<br><br>तत्पश्चात् उसे अपने साथ लेकर रम्भने मनोहर पाताललोकमें प्रवेश किया और वहाँपर महिषोंसे अपने मनोनुकूल उस प्रियतमाकी रक्षा करता हुआ वह सुखपूर्वक रहने लगा॥ ३६॥<br><br>किसी दिन एक दूसरे महिषने कामासक्त होकर उस महिषीको दौड़ा लिया। यह देखकर दानव रम्भ स्वयं वहाँ आकर उसे मारनेके लिये दौड़ा और उसके पास पहुँचकर |
५४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २
५४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| स्वरक्षार्थं समागत्य महिषं समताडयत्।<br>सोऽपि तं निजघानाशु शृङ्गाभ्यां काममोहितः॥ ३८ | अपनी रक्षाके लिये रम्भने उस महिषपर कठोर प्रहार किया। तब उस कामातुर महिषने भी अपनी सींगोंसे रम्भपर शीघ्रतासे प्रहार करना आरम्भ कर दिया॥ ३७-३८॥ |
| ताडितस्तेन तीक्ष्णाभ्यां शृङ्गाभ्यां हृदये भृशम्।<br>भूमौ पपात तरसा ममार च विमूर्च्छितः॥ ३९ | उस महिषके द्वारा तीक्ष्ण सींगोंसे हृदयस्थलमें गहरी चोट पहुँचानेके कारण रम्भ शीघ्र ही मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और मर गया॥ ३९॥ |
| मृते भर्तरि सा दीना भयार्ता विद्रुता भृशम्।<br>सा वेगात्तं वटं प्राप्य यक्षाणां शरणं गता॥ ४० | पतिके मर जानेपर अत्यन्त शोकाकुल तथा भयग्रस्त वह महिषी वहाँसे भाग चली। वेगपूर्वक भागती हुई वह एक वटवृक्षके नीचे पहुँचकर वहाँ रहनेवाले यक्षोंकी शरणमें जा पहुँची॥ ४०॥ |
| पृष्ठतस्तु गतस्तत्र महिषः कामपीडितः।<br>कामयानस्तु तां कामी बलवीर्यमदोद्धतः॥ ४१ | वह कामार्त और बल तथा वीर्यसे मदोन्मत्त कामासक्त महिष भी उसकी कामना करता हुआ उसके पीछे-पीछे गया॥ ४१॥ |
| रुदती सा भृशं दीना दृष्टा यक्षैर्भयातुरा।<br>धावमानं च तं वीक्ष्य यक्षास्त्रातुं समाययुः॥ ४२ | यक्षोंने उस महिषसे पीड़ित तथा भयभीत होकर रोती हुई उस महिषीको देख लिया और महिषको दौड़ता हुआ देखकर उस महिषीकी रक्षाके लिये वे यक्ष वहाँ आ गये॥ ४२॥ |
| युद्धं समभवद् घोरं यक्षाणां च हयारिणा।<br>शरेण ताडितस्तूर्णं पपात धरणीतले॥ ४३ | अब उस महिषके साथ यक्षोंका विकराल युद्ध होने लगा और अन्तमें बाणसे आहत होकर वह महिष शीघ्र ही भूमिपर गिर पड़ा॥ ४३॥ |
| मृतं रम्भं समानीय यक्षास्ते परमं प्रियम्।<br>चितायां रोपयामासुस्तस्य देहस्य शुद्धये॥ ४४<br><br>महिषी सा पतिं दृष्ट्वा चितायां रोपितं तदा।<br>प्रवेष्टुं सा मतिं चक्रे पतिना सह पावकम्॥ ४५ | तदनन्तर उन यक्षोंने परम प्रिय मृत रम्भको लाकर उसकी देह-शुद्धिके लिये उसे चितापर रख दिया। तब उस महिषीने अपने पतिको चितापर रखा हुआ देखकर उसके साथ स्वयं भी अग्निमें प्रवेश करनेका निश्चय किया॥ ४४-४५॥ |
| वार्यमाणापि यक्षैः सा प्रविवेश हुताशनम्।<br>ज्वालामालाकुलं साध्वी पतिमादाय वल्लभम्॥ ४६ | यक्षोंके मना करनेपर भी अपने प्रिय पतिके साथ वह महिषी विकराल लपटोंवाली अग्निमें प्रविष्ट हो गयी॥ ४६॥ |
| महिषस्तु चितामध्यात्समुत्तस्थौ महाबलः।<br>रम्भोऽप्यन्यद्वपुः कृत्वा निःसृतः पुत्रवत्सलः॥ ४७<br><br>रक्तबीजोऽप्यसौ जातो महिषोऽपि महाबलः।<br>अभिषिक्तस्तु राज्येऽसौ हयारिरसुरोत्तमैः॥ ४८ | उसी समय एक महाबली महिष चिताके मध्यसे प्रकट हो गया तथा अन्य शरीर धारण करके वह पुत्रप्रेमी रम्भ भी चिताके मध्यभागसे निकल पड़ा। इस प्रकार रक्तबीज तथा महान् बलशाली महिषासुर उत्पन्न हुए। तदनन्तर श्रेष्ठ दानवोंने उस महिषासुरका राज्याभिषेक कर दिया॥ ४७-४८॥ |
| एवं स महिषो जातो रक्तबीजश्च वीर्यवान्।<br>अवध्यस्तु सुरैर्दैत्यैर्मानवैश्च नृपोत्तम॥ ४९ | हे नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार महिषासुर तथा पराक्रमी रक्तबीज उत्पन्न हुए। वह महिषासुर देवताओं, दानवों तथा मनुष्योंसे अवध्य था॥ ४९॥ |
| अ० ३ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५४१ |
|---|
| इत्येतत्कथितं राजन् जन्म तस्य महात्मनः।<br>वरप्रदानञ्च तथा प्रोक्तं सर्वं सविस्तरम्॥ ५० | हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपको उस महान् महिषासुरके जन्म तथा उससे सम्बन्धित वरदान-प्राप्तिका प्रसंग विस्तारपूर्वक बता दिया॥ ५०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषासुरोत्पत्तिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
अथ तृतीयोऽध्यायः
महिषासुरका दूत भेजकर इन्द्रको स्वर्ग खाली करनेका आदेश देना, दूतद्वारा इन्द्रका युद्धहेतु आमन्त्रण प्राप्तकर महिषासुरका दानववीरोंको युद्धके लिये सुसज्जित होनेका आदेश देना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| एवं स महिषो नाम दानवो वरदर्पितः।<br>प्राप्य राज्यं जगत्सर्वं वशे चक्रे महाबलः॥ १ | इस प्रकार वरदान पानेके कारण अभिमानयुक्त उस महाबली दानव महिषासुरने राज्य प्राप्त करके सम्पूर्ण जगत्को अपने अधीन कर लिया॥ १॥ |
| पृथिवीं पालयामास सागरान्तां भुजार्जिताम्।<br>एकच्छत्रां निरातङ्कां वैरिवर्गविवर्जिताम्॥ २ | उसने समुद्रपर्यन्त सारी पृथिवीको अपने बाहुबलसे जीतकर शत्रु-समुदायसे रहित कर दिया तथा वह निर्भय होकर एकच्छत्र राज्य करने लगा॥ २॥ |
| सेनानीश्चिक्षुरस्तस्य महावीर्यो मदोत्कटः।<br>धनाध्यक्षस्तथा ताम्रः सेनायुतसमावृतः॥ ३ | उसका सेनाध्यक्ष चिक्षुर महापराक्रमी एवं मदमत्त था। ताम्र उसका कोषाध्यक्ष था, जिसके पास दस हजार सैनिक थे॥ ३॥ |
| असिलोमा तथोदर्को बिडालाख्यश्च बाष्कलः।<br>त्रिनेत्रोऽथ तथा कालबन्धको बलदर्पितः॥ ४<br><br>एते सैन्ययुताः सर्वे दानवा मेदिनीं तदा।<br>आवृत्य संस्थिताः काममृद्धां सागरमेखलाम्॥ ५ | उस समय असिलोमा, उदर्क, बिडालाख्य, बाष्कल, त्रिनेत्र तथा बलोन्मत्त कालबन्धक—इन दानवोंने अपनी-अपनी विशाल सेनाओंके साथ सागरान्त समृद्धिशालिनी पृथिवीको घेरकर राज्य स्थापित किया॥ ४-५॥ |
| करदाश्च कृताः सर्वे भूमिपालाः पुरातनाः।<br>निहता ये बलोदग्राः क्षात्रधर्मव्यवस्थिताः॥ ६ | जो पुराने नरेश थे, वे भी अब महिषासुरको कर देने लगे। उनमें भी जो स्वाभिमानी थे और क्षात्र-धर्मानुसार जिन्होंने उसका सामना किया, वे मार डाले गये॥ ६॥ |
| ब्राह्मणा वशगा जाता यज्ञभागसमर्पकाः।<br>महिषस्य महाराज निखिले क्षितिमण्डले॥ ७ | हे महाराज! सम्पूर्ण भूमण्डलपर ब्राह्मणलोग महिषासुरके अधीन हो गये और उसे यज्ञभाग देने लगे॥ ७॥ |
| एकातपत्रं तद्राज्यं कृत्वा स महिषासुरः।<br>स्वर्गं जेतुं मनश्चक्रे वरदानेन गर्वितः॥ ८ | इस प्रकार एकच्छत्र राज्य स्थापित करके वरदानसे गर्वित वह महिषासुर स्वर्गपर भी विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषा करने लगा॥ ८॥ |
५४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३
५४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३
| प्रणिधिं प्रेषयामास हयारिस्तु शचीपतिम्।<br>स सन्देशहरं शीघ्रमाहूयोवाच दैत्यराट् ॥ ९<br><br>गच्छ वीर महाबाहो दूतत्वं कुरु मेऽनघ ।<br>ब्रूहि शक्रं दिवं गत्वा निःशङ्कः सुरसन्निधौ ॥ १०<br><br>मुञ्च स्वर्गं सहस्राक्ष यथेष्टं गच्छ मा चिरम्।<br>सेवां वा कुरु देवेश महिषस्य महात्मनः ॥ ११ | महिषासुरने इन्द्रके पास अपना एक दूत भेजा। उस दैत्यराजने दूतको बुलाकर उससे कहा—हे वीर! जाओ, हे महाबाहो! तुम मेरा दूतकार्य करो। हे अनघ! तुम निडर होकर स्वर्गमें देवताओंके पास जाकर वहाँ इन्द्रसे कहो—हे सहस्राक्ष! तुम स्वर्ग छोड़ दो और अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ चाहो, शीघ्र चले जाओ। अथवा हे देवेश! महान् महिषासुरकी सेवा करो॥ ९-११॥ |
|---|---|
| स त्वां संरक्षयेन्नूनं राजा शरणमागतम्।<br>तस्मात्त्वं शरणं याहि महिषस्य शचीपते ॥ १२ | यदि तुम राजा महिषासुरकी शरणागति स्वीकार कर लो तो वे तुम्हारी रक्षा अवश्य करेंगे। अतएव हे इन्द्र! तुम महिषासुरकी शरणमें चले जाओ ॥ १२ ॥ |
| नोचेद्वज्रं गृहाणाशु युद्धाय बलसूदन।<br>पूर्वैर्जितोऽसि चास्माकं जानामि तव पौरुषम् ॥ १३ | अन्यथा हे बलसूदन! युद्धके लिये शीघ्र ही अपना वज्र उठा लो। हमारे पूर्वजोंने तुम्हें पराजित किया है, अतएव हम तुम्हारा पुरुषार्थ जानते हैं॥ १३॥ |
| अहल्याजार विज्ञातं बलं ते सुरसङ्घप ।<br>युध्यस्व व्रज वा कामं यत्र ते रमते मनः ॥ १४ | अहल्याके साथ अनाचार करनेवाले तथा देवसमुदायके अधिपति हे इन्द्र! मैं तुम्हारे बलसे भलीभाँति परिचित हूँ। तुम मेरे साथ युद्ध करो अथवा जहाँ तुम्हारा मन करे, वहाँ चले जाओ ॥ १४॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य शक्रः क्रोधसमन्वितः ।<br>उवाच तं नृपश्रेष्ठ स्मितपूर्वं वचस्तदा ॥ १५<br><br>न जानेऽहं सुमन्दात्मन् यतस्त्वं मददर्पितः।<br>चिकित्सां संकरिष्यामि रोगस्यास्य प्रभोस्तव ॥ १६<br><br>अतः परं करिष्यामि मूलस्यास्य निर्मूलनम् ।<br>गच्छ दूत तथा ब्रूहि तस्याग्रे मम भाषितम् ॥ १७ | **व्यासजी बोले—**हे नृपश्रेष्ठ! दूतका वचन सुनकर इन्द्र कुपित हो उठे; फिर भी उन्होंने मुसकराकर दूतसे कहा—हे मन्दबुद्धि! मैं यह नहीं जान पा रहा हूँ कि तुम अभिमानके मदमें इतना चूर क्यों हो गये हो! मैं तुम्हारे स्वामी महिषासुरके अभिमानरूपी इस रोगकी चिकित्सा अवश्य करूँगा। इसके बाद मैं इस रोगको जड़से नष्ट कर दूँगा। हे दूत! अब तुम जाओ और उस महिषासुरसे मेरी कही गयी बात बता दो। शिष्टजनोंको चाहिये कि दूतोंका वध न करें, अतः मैं तुम्हें छोड़ दे रहा हूँ॥ १५-१७\frac{१}{२}॥ |
| शिष्टैर्दूता न हन्तव्यास्तस्मात्त्वां विसृजाम्यहम् ।<br>युद्धेच्छा चेत्समागच्छ त्वरितो महिषीसुत ॥ १८ | [वहाँ जाकर मेरी तरफसे उससे कह देना—]<br>हे महिषीपुत्र! यदि तुम्हारी युद्ध करनेकी इच्छा हो तो शीघ्र आ जाओ। |
| हयारे त्वद्बलं ज्ञातं तृणादस्त्वं जडाकृतिः ।<br>शृङ्गायोस्ते करिष्यामि सुदृढं च शरासनम् ॥ १९ | हे महिषासुर! तुम तो घास खानेवाले जड प्रकृतिके जीव हो। अतः मुझे तुम्हारा बल ज्ञात है। मैं तुम्हारी सींगोंसे एक सुदृढ़ धनुष बनाऊँगा। |
| दर्पः शृङ्गबलात्तेऽस्ति विदितं कारणं मया ।<br>विषाणे ते परिच्छिद्य संहरिष्यामि तद् बलम् ॥ २० | तुम्हारे अभिमानका कारण मुझे विदित है। तुम्हें अपनी सींगोंके बलपर गर्व है, अतएव तुम्हारी सींगोंको काटकर मैं उस अभिमानबलको समाप्त कर |
| अ० ३ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५४३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यद् बलेनातिपूर्णस्त्वं जातोऽसि बलदर्पितः।<br>कुशलस्त्वं तदाघाते न युद्धे महिषाधम॥ २१ | दूँगा। हे महिषाधम! जिन सींगोंके बलपर तुम गर्वोन्मत्त हो तथा अपनेको सर्वसमर्थ समझते हो, केवल उन्हींसे आघात करनेमें तुम कुशल हो; युद्ध करनेमें तुम दक्ष नहीं हो सकते॥ १८-२१॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्तोऽसौ सुरेन्द्रेण स दूतस्त्वरितो गतः।<br>जगाम महिषं मत्तं प्रणम्य प्रत्युवाच ह॥ २२ | व्यासजी बोले—देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर वह दूत तत्काल वहाँसे चल दिया। वह उन्मत्त महिषासुरके पास पहुँचा और उसे प्रणाम करके कहने लगा—॥ २२॥ |
| दूत उवाच<br>राजन्देवाधिपः कामं न त्वां विगणयत्यसौ।<br>मन्यते स्वबलं पूर्णं देवसैन्यसमावृतः॥ २३ | दूत बोला—हे राजन्! वह देवराज इन्द्र आपको कुछ भी नहीं समझ रहा है। देवसेनासे सम्पन्न होनेके कारण वह अपनेको पूर्ण बलवान् मानता है॥ २३॥ |
| यदुक्तं तेन मूर्खेण कथमन्यद् ब्रवीम्यहम्।<br>प्रियं सत्यं च वक्तव्यं भृत्येन पुरतः प्रभोः॥ २४ | उस मूर्खने जो कुछ कहा है, उसके अतिरिक्त दूसरी बात मैं कैसे कहूँ? सेवकको अपने स्वामीके समक्ष सत्य तथा प्रिय वाणी बोलनी चाहिये॥ २४॥ |
| प्रियं सत्यं च वक्तव्यं प्रभोरग्रे शुभेच्छुना।<br>इति नीतिर्महाराज जागर्ति शुभकारिणी॥ २५ | कल्याणकी इच्छा रखनेवाले सेवकको अपने स्वामीके आगे सदा सत्य तथा प्रिय वचन बोलना चाहिये। हे महाराज! यही नीति संसारमें सदासे कल्याणप्रद होती आयी है॥ २५॥ |
| केवलं चेत्प्रियं ब्रूयान्न ते कार्यं भविष्यति।<br>परुषं च न वक्तव्यं कदाचिच्छुभमिच्छता॥ २६ | किंतु यदि केवल प्रिय लगनेवाली बात ही कहूँ तो इससे आपका कार्य सिद्ध नहीं होगा। साथ ही अपना कल्याण चाहनेवाले सेवकको अपने स्वामीसे कठोर बात कभी नहीं कहनी चाहिये॥ २६॥ |
| यथा रिपुमुखाद्वाचः प्रसरन्ति विषोपमाः।<br>तथा भृत्यमुखान्नाथ निःसरन्ति कथं गिरः॥ २७ | हे नाथ! शत्रुके मुखसे जिस तरहकी विषतुल्य बातें निकलती हैं, उस तरहकी बातें सेवकके मुखसे कैसे निकल सकती हैं?॥ २७॥ |
| यादृशानीह वाक्यानि तेनोक्तानि महीपते।<br>तादृशानि न मे जिह्वा वक्तुमर्हति कर्हिचित्॥ २८ | हे पृथ्वीपते! इन्द्रने जिस प्रकारके वाक्य बोले हैं, उन्हें कह सकनेमें मेरी जिह्वा कभी भी समर्थ नहीं है॥ २८॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हेतुगर्भं तृणाशनः।<br>भृशं कोपपरीतात्मा बभूव महिषासुरः॥ २९ | व्यासजी बोले—उस दूतका रहस्यपूर्ण वचन सुनकर घास खानेवाले महिषासुरका मन पूर्णरूपसे क्रोधके वशीभूत हो गया॥ २९॥ |
| समाहूयाब्रवीद्दैत्यान्क्रोधसंरक्तलोचनः ।<br>लाङ्गूलं पृष्ठदेशे च कृत्वा मूत्रं परित्यजन्॥ ३०<br><br>भो भो दैत्याः सुरेन्द्रोऽसौ युद्धकामोऽस्ति सर्वथा।<br>बलोद्योगं कुरुध्वं वै जेतव्योऽसौ सुराधमः॥ ३१ | सभी दैत्योंको बुलाकर क्रोधके मारे लाल आँखोंवाला महिषासुर अपनी पूँछ पीठपर रख करके मूत्र त्याग करते हुए उनसे कहने लगा—हे दैत्यो! वह इन्द्र निश्चय ही युद्ध करना चाहता है। अतः तुमलोग सेना संगठित करो। हमें उस देवाधमको जीतना है॥ ३०-३१॥ |
५४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३
५४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मदग्रे को भवेच्छूरः कोटिशश्चेत्तथाविधाः।<br>न बिभेम्येकतः कामं हनिष्याम्यद्य सर्वथा॥ ३२ | मेरे सम्मुख भला कौन पराक्रमी बन सकता है? यदि उस इन्द्रके समान करोड़ों लोग मेरे सामने आ जायँ तो भी मैं नहीं डरूँगा, तब उस अकेले इन्द्रसे कैसे डर सकता हूँ? उसको तो मैं अब निश्चितरूपसे मार डालूँगा॥ ३२॥ |
| शूरः शान्तेष्वसौ नूनं तपस्विषु बलाधिकः।<br>बलकर्ता हि कुहको लम्पटः परदारहृत्॥ ३३ | वह इन्द्र शान्त स्वभाववाले लोगोंपर अपने पराक्रमका प्रदर्शन तथा तपस्वियोंपर अपने बलका प्रयोग करता है। वह मायावी, व्यभिचारी तथा दूसरेकी स्त्रीका हरण करनेवाला है॥ ३३॥ |
| अप्सरोबलसम्मतस्तपोविघ्नकरः खलः।<br>छिद्रप्रहरणः पापो नित्यं विश्वासघातकः॥ ३४ | वह दुष्ट अपनी अप्सराओंके बलबूते दूसरोंकी तपस्यामें विघ्न डालता है, शत्रु की कमजोरी देखकर अवसरवादिताका लाभ उठाकर उसपर प्रहार करता है, वह सदासे पापकृत्योंमें रत रहनेवाला तथा घोर विश्वासघात करनेवाला है॥ ३४॥ |
| नमुचिर्निहतो येन कृत्वा सन्धिं दुरात्मना।<br>शपथान्विविधानादौ कृत्वा भीतेन छद्मना॥ ३५ | भयके मारे उस छली इन्द्रने पहले विश्वास-प्रदर्शनके लिये अनेक प्रकारकी शपथें खाकर नमुचि नामक दैत्यसे सन्धि स्थापित की, किंतु बादमें उस दुष्टात्माने छलपूर्वक नमुचिको मार डाला॥ ३५॥ |
| विष्णुस्तु कपटाचार्यः कुहकः शपथाकरः।<br>नानारूपधरः कामं बलकृद्दम्भपण्डितः॥ ३६<br><br>कृत्वा कोलाकृतिं येन हिरण्याक्षो निपातितः।<br>हिरण्यकशिपुर्येन नृसिंहेन च घातितः॥ ३७ | विष्णु तो कपटका आचार्य, मायावी, झूठी प्रतिज्ञाएँ करनेमें बड़ा ही कुशल, बहुरूपिया, सैन्य-बलका संचय करनेवाला तथा महान् पाखण्डी है। उसीने सूकरका रूप धारणकर हिरण्याक्षका वध कर डाला और नृसिंहका रूप धारणकर हिरण्यकशिपुका संहार किया॥ ३६-३७॥ |
| नाहं तद्वशगो नूनं भवेयं दनुनन्दनाः।<br>विश्वासं नैव गच्छामि देवानां कुत्र कर्हिचित्॥ ३८ | अतएव हे दनुके वंशजो! मैं उसका वशवर्ती कभी भी नहीं होऊँगा और देवताओंका कहीं भी कदापि विश्वास नहीं करूँगा॥ ३८॥ |
| किं करिष्यति मे विष्णुरिन्द्रो वा बलवत्तरः।<br>रुद्रो वापि न मे शक्तः प्रतिकर्तुं रणाङ्गणे॥ ३९<br><br>त्रिविष्टपं ग्रहीष्यामि जित्वेन्द्रं वरुणं यमम्।<br>धनदं पावकं चैव चन्द्रसूर्यौ विजित्य च॥ ४० | विष्णु तथा इन्द्र—ये दोनों मेरा क्या कर लेंगे? यहाँतक कि उनसे भी अधिक शक्तिशाली रुद्र भी युद्ध-भूमिमें मेरा प्रतीकार कर पानेमें समर्थ नहीं हैं। इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर, अग्नि, चन्द्रमा तथा सूर्यको जीतकर मैं स्वर्गपर अधिकार कर लूँगा॥ ३९-४०॥ |
| यज्ञभागभुजः सर्वे भविष्यामोऽद्य सोमपाः।<br>जित्वा देवसमूहञ्च विहरिष्यामि दानवैः॥ ४१ | अब हमलोग यज्ञका भाग प्राप्त करेंगे तथा सोमरसका पान करनेवाले होंगे। मैं देवसमुदायको जीतकर दानवोंके साथ विहार करूँगा॥ ४१॥ |
| न मे भयं सुरेभ्यश्च वरदानेन दानवाः।<br>मरणं न नरेभ्यश्च नारी किं मे करिष्यति॥ ४२ | हे दानवो! वरदानके कारण मुझे देवताओंका भय नहीं है। पुरुषसे मेरी मृत्यु हो ही नहीं सकती; तब भला स्त्री मेरा क्या कर लेगी?॥ ४२॥ |
| अ० ३ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५४५ | | :--- | :--- |
| पातालपर्वतेभ्यश्च समाहूय वरान्वरान्।<br>दानवान्मम सैन्येशान्कुर्वन्तु त्वरिताश्चराः॥ ४३ | हे गुप्तचरो! पातालमें तथा पर्वतोंपर रहनेवाले बड़े-बड़े दानव-वीरोंको तत्काल यहाँ बुलाकर उन्हें मेरी सेनाओंका अध्यक्ष बना दो॥ ४३॥ | | एकोऽहं सर्वदेवान्किजेतुं दानवाः क्षमः।<br>शोभार्थं वः समाहूय नयामि सुरसङ्गमे॥ ४४ | हे दानवो! मैं तो अकेला ही समस्त देवताओंको जीतनेमें समर्थ हूँ, फिर भी शोभा बढ़ानेकी दृष्टिसे आप सबको भी बुलाकर देवताओंके साथ होनेवाले संग्राममें ले चलूँगा॥ ४४॥ | | शृङ्गाभ्यां च खुराभ्यां च हनिष्येऽहं सुरान्किल।<br>न मे भयं सुरेभ्यश्च वरदानप्रभावतः॥ ४५ | मैं अपनी सींगों तथा खुरोंसे देवताओंको निश्चितरूपसे मार डालूँगा। वरदानके प्रभावसे मुझे देवताओंसे भय नहीं है॥ ४५॥ | | अवध्योऽहं सुरगणैरसुरैर्मानवैस्तथा।<br>तस्मात्सज्जा भवन्त्वद्य देवलोकजयाय वै॥ ४६ | देवता, दानव तथा मनुष्य—सभीसे मैं अवध्य हूँ, अतः आप सब देवलोकपर विजय प्राप्त करनेके लिये अब तैयार हो जायँ॥ ४६॥ | | जित्वा सुरालयं दैत्या विहरिष्यामि नन्दने।<br>मन्दारकुसुमापीडा देवयोषित्समन्विताः॥ ४७<br>कामधेनुपयोत्सिक्ताः सुधापानप्रमोदिताः।<br>देवगन्धर्वगीतादिनृत्यलास्यसमन्विताः ॥ ४८ | हे दैत्यो! देवलोकको जीतकर मैं नन्दनवनमें विहार करूँगा। मन्दारपुष्पकी मालाएँ धारण करके आपलोग देवांगनाओंके साथ रहेंगे, कामधेनुके दुग्धका सेवन करेंगे, प्रसन्नतापूर्वक अमृत-पान करेंगे और देवताओं तथा गन्धर्वोंके गीतों तथा मनमोहक हाव-भाव-युक्त नृत्योंका आनन्द लेंगे॥ ४७-४८॥ | | उर्वशी मेनका रम्भा घृताची च तिलोत्तमा।<br>प्रम्लोचा महासेना मिश्रकेशी मदोत्कटा॥ ४९<br>विप्रचित्तिप्रभृतयो नृत्यगीतविशारदाः।<br>रञ्जयिष्यन्ति वः सर्वान्नानासवनिषेवणैः॥ ५० | उर्वशी, मेनका, रम्भा, घृताची, तिलोत्तमा, प्रम्लोचा, महासेना, मिश्रकेशी, मदोत्कटा, विप्रचित्ति आदि नृत्य तथा गायन-कलामें अति निपुण अप्सराएँ विविध प्रकारके मद्य पिलाकर आप सभीका मनोरंजन करेंगी॥ ४९-५०॥ | | सर्वे सज्जा भवन्त्वद्य रोचतां गमनं दिवि।<br>संग्रामार्थं सुरैः सार्धं कृत्वा मङ्गलमुत्तमम्॥ ५१ | देवताओंके साथ युद्ध करनेके लिये देवलोकके लिये प्रस्थान करना यदि आपलोगोंको उचित लगे तो आप सब उत्तम मंगलाचार सम्पन्न करके आज ही चलनेके लिये तैयार हो जाइये॥ ५१॥ | | रक्षणार्थं च सर्वेषां भार्गवं मुनिसत्तमम्।<br>समाहूय च सम्पूज्य स्थाप्य यज्ञे गुरुं परम्॥ ५२ | समस्त दानवोंकी रक्षाके लिये मुनिश्रेष्ठ शुक्राचार्यको बुलाकर उनका पूजन करके उन परम गुरुको यज्ञ-कार्यमें नियुक्त कीजिये॥ ५२॥ | | व्यास उवाच<br>इति संदिश्य दैत्येन्द्रान्महिषः पापधीस्तदा।<br>जगाम त्वरितो राजन्भवनं स्वं मुदान्वितः॥ ५३ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! इस प्रकार दानववीरोंको आदेश देकर वह पापबुद्धि महिषासुर प्रसन्नताके साथ शीघ्र ही अपने भवनको चला गया॥ ५३॥ |
<div align="center">इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
भगवतीमाहात्म्ये दैत्यसैन्योद्योगो नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
o
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 18 A
अथ चतुर्थोऽध्यायः
| ५४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
|---|
अथ चतुर्थोऽध्यायः
इन्द्रका देवताओं तथा गुरु बृहस्पतिसे परामर्श करना तथा बृहस्पतिद्वारा जय-पराजयमें दैवकी प्रधानता बतलाना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| गते दूते सुरेन्द्रोऽपि समाहूय सुरानथ।<br>यमवायुधनाध्यक्षवरुणानिदमूचिवान् ॥ १ | हे राजन्! दूतके चले जानेपर इन्द्रने भी यम, वायु, कुबेर तथा वरुण—इन देवताओंको बुलाकर यह बात कही॥ १॥ |
| महिषो नाम दैत्येन्द्रो रम्भपुत्रो महाबलः।<br>वरदर्पमदोन्मत्तो मायाशतविचक्षणः॥ २ | रम्भका पुत्र महाबली दैत्यराज महिषासुर इस समय वरदानके अभिमानमें मदोन्मत्त हो गया है। वह सैकड़ों प्रकारकी माया रचनेमें पारंगत है॥ २॥ |
| तस्य दूतोऽद्य सम्प्राप्तः प्रेषितस्तेन भोः सुराः।<br>स्वर्गकामेन लुब्धेन मामुवाचेदृशं वचः॥ ३ | हे देवताओ! स्वर्ग-प्राप्तिकी कामना करनेवाले उस लोभी महिषासुरके द्वारा भेजा गया दूत आज ही यहाँ आया था। उसने मुझसे इस प्रकारकी बात कही—॥ ३॥ |
| त्यज देवालयं शक्र यथेच्छं व्रज वासव।<br>सेवा वा कुरु दैत्यस्य महिषस्य महात्मनः॥ ४ | हे शक्र! तुम तत्काल देवलोक छोड़ दो और अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ जाना चाहो, वहाँ चले जाओ; अथवा हे वासव! महान् महिषासुरका सेवकत्व स्वीकार कर लो॥ ४॥ |
| दयावान्दानवेन्द्रोऽसौ स ते वृत्तिं विधास्यति।<br>नतेषु भृत्यभूतेषु न कुप्यति कदाचन॥ ५ | वे दैत्यराज महिषासुर बड़े दयालु हैं। वे आपके लिये किसी जीविकाका प्रबन्ध अवश्य कर देंगे। विनम्र सेवकोंपर वे कभी भी क्रोध नहीं करते हैं॥ ५॥ |
| नोचेद्युद्धाय देवेश सेनोद्योगं कुरु स्वयम्।<br>गते मयि स दैत्येन्द्रस्त्वरितः समुपेष्यति॥ ६ | हे देवेश! यदि आपको यह स्वीकार नहीं है तो युद्धके लिये सेनाके संगठनमें जुट जाइये। मेरे वहाँ पहुँचते ही वे दैत्येन्द्र महिषासुर [देवलोकपर आक्रमणके लिये] यहाँ शीघ्र आ पहुँचेंगे॥ ६॥ |
| इत्युक्त्वा स गतो दूतो दानवस्य दुरात्मनः।<br>किं कर्तव्यमतः कार्यं चिन्तयध्वं सुरोत्तमाः॥ ७ | ऐसा कहकर दुष्टात्मा दानव महिषासुरका वह दूत यहाँसे चला गया। हे श्रेष्ठ देवगण! आपलोग विचार कीजिये कि अब क्या करना चाहिये?॥ ७॥ |
| दुर्बलोऽपि न चोपेक्ष्यः शत्रुर्वलवता सुराः।<br>विशेषेण सदोद्योगी बलवान्बलदर्पितः॥ ८ | हे देवताओ! स्वयं बलवान् होते हुए भी अत्यन्त दुर्बल शत्रुको भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। अपने बलका अभिमान करनेवाले, बलशाली तथा सदा उद्यमशील शत्रुको तो विशेषरूपसे उपेक्षा नहीं करनी चाहिये॥ ८॥ |
| उद्यमः किल कर्तव्यो यथाबुद्धि यथाबलम्।<br>दैवाधीनो भवेन्नूनं जयो वाथ पराजयः॥ ९ | अतः हमलोगोंको अपने बल तथा विवेकके अनुसार पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिये। जीत अथवा हार तो दैवके अधीन रहती है॥ ९॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 18 B
| अ० ४ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५४७ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सन्धियोगो न चात्रास्ति खले सन्धिर्निरर्थकः।<br>सर्वथा साधुभिः कार्यं विचार्य च पुनः पुनः॥ १० | इस परिस्थितिमें सन्धिकी भी सम्भावना नहीं है; क्योंकि नीचके साथ की गयी सन्धि व्यर्थ सिद्ध होती है। अतएव बार-बार विचार करके केवल सज्जनोंके साथ ही सन्धि करनी चाहिये॥ १०॥ |
| यानमप्यधुना नैव कर्तव्यं सहसा पुनः।<br>प्रेक्षकाः प्रेषणीयाश्च शीघ्रगाः सुप्रवेशकाः॥ ११<br><br>इङ्गितज्ञाश्च निःसङ्गा निःस्पृहाः सत्यवादिनः।<br>सेनाभियोगं प्रस्थानं बलसंख्यां यथार्थतः॥ १२<br><br>वीराणां च परिज्ञानं कृत्वायान्तु त्वरान्विताः।<br>ज्ञात्वा दैत्यपतेस्तस्य सैन्यस्य च बलाबलम्॥ १३<br><br>करिष्यामि ततस्तूर्णं यानं वा दुर्गसंग्रहम्।<br>विचार्य खलु कर्तव्यं कार्यं बुद्धिमता सदा।<br>सहसा विहितं कार्यं दुःखदं सर्वथा भवेत्॥ १४<br><br>तस्माद्विमृश्य कर्तव्यं सुखदं सर्वथा बुधैः।<br>नात्र भेदविधिर्न्याय्यो दानवेषु च सर्वथा॥ १५ | इस समय अचानक आक्रमण करना भी उचित नहीं है। अतएव सर्वप्रथम शीघ्रगामी तथा सुगमतासे प्रवेश करनेमें दक्ष गुप्तचर वहाँ भेजे जाने चाहिये, जो शत्रुओंके अभिप्राय समझनेमें समर्थ, किसीके साथ अधिक भावासक्ति न रखनेवाले, निर्लोभी तथा सत्यवादी हों। वे गुप्तचर शत्रु-सेनाकी गतिविधि, प्रस्थान, सेनाकी ठीक-ठीक संख्या और शत्रुदलके वीरोंकी वास्तविक जानकारी करके शीघ्रतापूर्वक वापस आ जाएँ। इस प्रकार दैत्यपति महिषासुरकी सेनाके बलाबलको भलीभाँति जान लेनेके पश्चात् मैं शीघ्र ही आक्रमण अथवा किलेबन्दी करनेका प्रबन्ध करूँगा। सर्वदा भलीभाँति सोच-समझकर बुद्धिमान् मनुष्यको कार्य करना चाहिये; क्योंकि बिना विचार किये अचानक किया गया कार्य हर तरहसे दुःखदायक ही होता है। अतएव बुद्धिमान् मनुष्योंको सम्यक् रूपसे विचार-विमर्श करके ऐसा कार्य करना चाहिये, जो सुखकर हो॥ ११—१४ १/२ ॥ |
| एकचित्तेषु कार्येऽस्मिंस्तस्माच्चारा व्रजन्तु वै।<br>ज्ञात्वा बलाबलं तेषां पश्चान्नीतिर्विचार्य च॥ १६<br><br>विधेया विधिवत्तज्ज्ञैस्तेषु कार्यपरेषु च।<br>अन्यथा विहितं कार्यं विपरीतफलप्रदम्॥ १७<br><br>सर्वथा तद्भवेन्नूनमज्ञातमौषधं यथा। | दानवोंमें मतभेद पैदा करनेवाली भेदनीतिका आश्रय लेना भी उचित नहीं जान पड़ता; क्योंकि उनमें पूर्ण मतैक्य है। अतएव इस कार्यके लिये पहले गुप्तचर भेजे जाएँ। उनके द्वारा उन दानवोंके बलाबलको जाननेके पश्चात् श्रेष्ठ नीतिविदोंसे भलीभाँति विचार करके उन कार्योंके लिये नीति निर्धारित की जानी चाहिये। नीतिसे हटकर किया गया कार्य अज्ञात औषधिके सेवनसे उत्पन्न होनेवाले कष्टकी भाँति विपरीत फल देनेवाला होता है॥ १५—१७ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य तैः सर्वैः प्रणिधिं कार्यवेदिनम्॥ १८ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! इस प्रकार उन सभी देवताओंसे विचार-विमर्श करके देवराज इन्द्रने शत्रुपक्षके रहस्योंकी जानकारीके उद्देश्यसे एक कार्यकुशल गुप्तचर भेजा॥ १८ १/२ ॥ |
| प्रेषयामास देवेन्द्रः परिज्ञानाय पार्थिव।<br>दूतस्तु त्वरितो गत्वा समागम्य सुराधिपम्॥ १९ | उस दूतने तत्काल पहुँचकर शत्रुपक्षके सैन्य-बलाबलकी जानकारी प्राप्त की और पुनः इन्द्रके पास वापस आकर उनको सब कुछ बता दिया। शत्रुसेनाकी |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—18 C
| ५४८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
|---|
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निवेदयामास तदा सर्वसैन्यबलाबलम्।<br>ज्ञात्वा तद्बलमुद्योगं तुराषाडतिविस्मितः॥ २०<br>देवानचोदयत्तूर्णं समाहूय पुरोहितम्।<br>मन्त्रं मन्त्रविदां श्रेष्ठं चकार त्रिदशेश्वरः॥ २१<br>उवाचाङ्गिरसश्रेष्ठं समासीनं वरासने। | तैयारीके विषयमें जानकर इन्द्रको महान् आश्चर्य हुआ और उन्होंने देवताओंको तैयारीमें लगनेकी आज्ञा दे दी। तत्पश्चात् मन्त्रविदोंमें श्रेष्ठ पुरोधा देवगुरु बृहस्पतिको बुलाकर इन्द्र उनके साथ परामर्श करने लगे। उत्तम आसनपर विराजमान श्रेष्ठ अंगिरापुत्र बृहस्पतिसे इन्द्रने कहा॥ १९—२१ १/२॥ |
| इन्द्र उवाच<br>भो भो देवगुरो विद्वन्किं कर्तव्यं वदस्व नः॥ २२<br>सर्वज्ञोऽसि समुत्पन्ने कार्ये त्वं गतिरद्य नः।<br>दानवो महिषो नाम महावीर्यो मदान्वितः॥ २३<br>योद्धुकामः समायाति बहुभिर्दानवैर्वृतः।<br>तत्र प्रतिक्रिया कार्या त्वया मन्त्रविदाधुना॥ २४<br>तेषां शुक्रस्तथा त्वं मे विघ्नहर्ता सुसंयतः। | इन्द्र बोले—हे देवगुरो! हे विद्वन्! हमलोगोंको क्या करना चाहिये, हमें बताइये। आप सर्वज्ञ हैं। आज उत्पन्न इस विषम परिस्थितिमें एकमात्र आप ही हमारे अवलम्ब हैं। महाबली तथा मदोन्मत्त दानव महिषासुर बहुतसे दानवोंको अपने साथ लेकर हम सबसे युद्ध करनेके लिये यहाँ आ रहा है। आप मन्त्रणाविद् हैं, अतएव इस समय कोई प्रतिक्रियात्मक युक्ति बतानेकी कृपा करें। जैसे शुक्राचार्य दानवोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार हम देवताओंके कष्टका निवारण करने हेतु आप सदा उद्यत रहते हैं॥ २२—२४ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं प्राह तुरासाहं बृहस्पतिः॥ २५<br>विचिन्त्य मनसा कामं कार्यसाधनतत्परः। | व्यासजी बोले—यह वचन सुनकर अपने मनमें भलीभाँति सोचकर सदा कार्यसिद्धिके लिये तत्पर रहनेवाले बृहस्पति इन्द्रसे कहने लगे॥ २५ १/२॥ |
| गुरुरुवाच<br>स्वस्थो भव सुरेन्द्र त्वं धैर्यमालम्ब्य मारिष॥ २६<br>व्यसने च समुत्पन्ने न त्याज्यं धैर्यमाशु वै।<br>जयाजयौ सुराध्यक्ष दैवाधीनौ सदैव हि॥ २७<br>स्थातव्यं धैर्यमालम्ब्य तस्माद् बुद्धिमता सदा।<br>भवितव्यं भवत्येव जानन्नेव शतक्रतो॥ २८<br>उद्यमः सर्वथा कार्यो यथापौरुषमात्मनः।<br>मुनयोऽपि हि मुक्त्यर्थमुद्यमैकरताः सदा॥ २९<br>दैवाधीनं च जानन्तो योगध्यानपरायणाः।<br>तस्मात्सदैव कर्तव्यो व्यवहारोदितोद्यमः॥ ३० | गुरु बोले—हे देवेन्द्र! आप निश्चिन्त हो जाइये। हे महानुभाव! धैर्य धारण कीजिये, विषम परिस्थिति आ जानेपर सहसा धैर्य नहीं खोना चाहिये। हे सुराध्यक्ष! हार तथा जीत सदा दैवाधीन होती हैं, अतएव बुद्धिमान् प्राणीको चाहिये कि वह सदैव धैर्य धारण करके स्थित रहे। हे शतक्रतो! होनी होकर रहती है, ऐसा समझते हुए मनुष्यको अपनी सामर्थ्यके अनुसार सदा उद्यम करना चाहिये। सब कुछ दैवके अधीन है—यह जानते हुए भी योगध्यानपरायण मुनिगण भी मुक्ति-प्राप्ति हेतु निरन्तर उद्यमशील रहते हैं। अतएव मनुष्यको अपने सामर्थ्यानुसार सदैव उद्योग करते रहना चाहिये॥ २६—३०॥ |
| सुखं भवतु वा मा वा दैवे का परिदेवना।<br>विना पुरुषकारेण कदाचित्सिद्धिमाप्नुयात्॥ ३१ | सुख मिले अथवा न मिले—इस दैवाधीन विषयमें चिन्ताकी क्या आवश्यकता? बिना पुरुषार्थ किये ही संयोगसे सिद्धि मिल जाय—ऐसा मानकर अन्धे तथा |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—18 D
अ० ४ ] पञ्चम स्कन्ध ५४९
अ० ४ ] पञ्चम स्कन्ध ५४९
| अन्धवत्पङ्गुवत्कामं न तथा मुदमावहेत्।<br>कृते पुरुषकारेऽपि यदि सिद्धिर्न जायते॥ ३२<br><br>न तत्र दूषणं तस्य दैवाधीने शरीरिणि।<br>कार्यसिद्धिर्न सैन्येऽस्ति न मन्त्रे न च मन्त्रणे॥ ३३ | लँगड़ेकी भाँति अकर्मण्य होकर प्रसन्नतापूर्वक पड़े रहना उचित नहीं है। पुरुषार्थ करनेपर भी यदि सिद्धि नहीं मिलती है तो इसमें उस व्यक्तिका कोई अपराध नहीं है; क्योंकि प्रत्येक शरीरधारी सदा दैवके अधीन रहता है। कार्यकी सिद्धि न सेनासे, न मन्त्रसे, न मन्त्रणासे, न रथसे और न तो आयुधसे ही मिलती है। हे सुरेन्द्र! सफलता तो निश्चितरूपसे दैवके अधीन रहती है॥ ३१—३३ १/२॥ |
| न रथे नायुधे नूनं दैवाधीना सुराधिप।<br>बलवान्क्लेशमाप्नोति निर्बलः सुखमश्नुते॥ ३४<br><br>बुद्धिमाञ्क्षुधितः शेते निर्बुद्धिर्भोगवान्भवेत्।<br>कातरो जयमाप्नोति शूरो याति पराजयम्॥ ३५<br><br>दैवाधीने तु संसारे कामं का परिदेवना।<br>उद्यमे योजयेन्नूनं भवितव्यं सुराधिप॥ ३६ | [ऐसा भी देखा जाता है कि] बलशाली कष्ट पाता है तथा बलहीन सुखोपभोग करता है, बुद्धिमान् भूखा ही सो जाता है तथा बुद्धिहीन अनेक उत्तम भोज्य पदार्थोंका सेवन करता है, कायर व्यक्तिकी जीत हो जाती है तथा वीर पराजित हो जाता है। हे सुराधिप! यह समस्त जगत् ही दैवके अधीन है, तो फिर चिन्ताकी आवश्यकता ही क्या? ऐसा दृढ़ विश्वास करके भाग्यको उद्योगके साथ संयोजित कर देना चाहिये॥ ३४—३६॥ |
| दुःखदे सुखदे वापि तत्र तौ न विचिन्तयेत्।<br>दुःखे दुःखाधिकान्पश्येत्सुखे पश्येत्सुखाधिकम्॥ ३७ | उद्योग करनेके बाद सुख प्राप्त हो अथवा दुःख—इन दोनोंके विषयमें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। दुःख आनेपर अपनेसे अधिक दुःखीजनोंको तथा सुख आनेपर अधिक सुखी व्यक्तिको देखना चाहिये॥ ३७॥ |
| आत्मानं हर्षशोकाभ्यां शत्रुभ्यामिव नार्पयेत्।<br>धैर्यमेवावगन्तव्यं हर्षशोकोद्भवे बुधैः॥ ३८ | अपने आपको शत्रुतुल्य हर्ष तथा शोकको अर्पित नहीं करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषोंको हर्ष या शोकके उपस्थित होनेपर धैर्यका अवलम्बन करना चाहिये॥ ३८॥ |
| अधैर्याद्यादृशं दुःखं न तु धैर्येऽस्ति तादृशम्।<br>दुर्लभं सहनत्वं वै समये सुखदुःखयोः॥ ३९ | अधीर हो जानेसे जैसा दुःख प्राप्त होता है, वैसा दुःख धैर्य धारण करनेसे कभी नहीं होता। किंतु सुख तथा दुःखके अवसरपर सहनशील बने रहना अति दुर्लभ है॥ ३९॥ |
| हर्षशोकोद्भवो यत्र न भवेद् बुद्धिनिश्चयात्।<br>किं दुःखं कस्य वा दुःखं निर्गुणोऽहं सदाव्ययः॥ ४० | जब हर्ष अथवा शोक उत्पन्न हों तब अपनी बुद्धिसे निश्चय करके उनसे अप्रभावित बने रहना चाहिये। वैसी परिस्थितिमें सोचना चाहिये कि दुःख क्या है; और यह दुःख किसे होता है? मैं तो सदा |
५५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४ ]
| चतुर्विंशातिरिक्तोऽस्मि किं मे दुःखं सुखञ्च किम्।<br>प्राणस्य क्षुत्पिपासे द्वे मनसः शोकमूर्च्छने॥ ४१<br><br>जरामृत्यू शरीरस्य षडूर्भिरहितः शिवः।<br>शोकमोहौ शरीरस्य गुणौ किं मेऽत्र चिन्तने॥ ४२ | गुणोंसे रहित और अविनाशी हूँ। मैं तो चौबीस तत्त्वोंसे भिन्न आत्मतत्त्व हूँ, तब सुख अथवा दुःखसे मेरा क्या प्रयोजन? भूख तथा प्यासका सम्बन्ध प्राणसे, शोक तथा मोहका सम्बन्ध मनसे एवं जरा तथा मृत्युका सम्बन्ध शरीरसे है। मैं तो इन छहों ऊर्मियोंसे रहित कल्याणस्वरूप हूँ। शोक तथा मोह शरीरके गुण हैं; इनके विषयमें सोचनेकी मुझे क्या आवश्यकता?॥ ४०—४२॥ |
|---|---|
| शरीरं नाहमथवा तत्सम्बन्धी न चाप्यहम्।<br>सप्तैकषोडशादिभ्यो विभिन्नोऽहं सदा सुखी॥ ४३<br><br>प्रकृतिर्विकृतिर्नाहं किं मे दुःखं सदा पुनः।<br>इति मत्वा सुरेश त्वं मनसा भव निर्ममः॥ ४४<br><br>उपायः प्रथमोऽयं ते दुःखनाशे शतक्रतो।<br>ममता परमं दुःखं निर्ममत्वं परं सुखम्॥ ४५ | मैं न शरीर हूँ और न तो इससे मेरा कोई सम्बन्ध है। मैं तो महदादि सात विकृतियों, एक प्रकृति तथा सोलह विकारोंसे पृथक् रहनेवाला सदा सुखस्वरूप हूँ। मैं न प्रकृति हूँ और न तो विकृति हूँ; तब मुझे दुःख किस बातका? हे देवेश! अपने मनमें ऐसा निश्चय करके आप ममतारहित हो जाइये। हे शतयज्ञकर्ता इन्द्र! आपके दुःखनाशका यही प्रधान उपाय है; क्योंकि ममता सबसे बड़ा दुःख है तथा निर्ममता सबसे बड़ा सुख है॥ ४३—४५॥ |
| सन्तोषादपरं नास्ति सुखस्थानं शचीपते।<br>अथवा यदि न ज्ञानं ममत्वनाशने किल॥ ४६<br><br>ततो विवेकः कर्तव्यो भवितव्ये सुराधिप।<br>प्रारब्धकर्मणां नाशो नाभोगाल्लक्ष्यते किल॥ ४७ | हे शचीपते! सन्तोषसे बढ़कर सुखका कोई भी स्थान नहीं है। अथवा हे देवराज! यदि आपके पास ममताको नष्ट करनेवाले ज्ञानका अभाव हो तो प्रारब्धके विषयमें विवेकका आश्रय लेना परमावश्यक है। बिना भोगके प्रारब्ध कर्मोंका नाश कभी नहीं हो सकता॥ ४६-४७॥ |
| यद्भावि तद्भवत्येव का चिन्ता सुखदुःखयोः।<br>सुरैः सर्वैः सहायैर्वा बुद्ध्या वा तव सत्तम॥ ४८ | हे आर्य! सभी देवता आपके सहायक हों अथवा केवल आपकी बुद्धि सहायक बने—जो होना है वह होकर रहेगा, तब सुख अथवा दुःखके विषयमें चिन्ता क्या?॥ ४८॥ |
| सुखं क्षयाय पुण्यस्य दुःखं पापस्य मारिष।<br>तस्मात्सुखक्षये हर्षः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः॥ ४९ | हे महाभाग! सुखके उपभोगसे पुण्यका क्षय होता है और दुःख भोगनेसे पापका नाश होता है। अतएव बुद्धिमान् पुरुषोंको सुख-क्षयकी स्थितिमें हर प्रकारसे प्रसन्नताका अनुभव करना चाहिये॥ ४९॥ |
| अथवा मन्त्रयित्वाद्य कुरु यत्नं यथाविधि।<br>कृते यत्ने महाराज भवितव्यं भविष्यति॥ ५० | अथवा हे महाराज! यदि आपकी इच्छा हो तो विधिवत् परामर्श करके आप यत्न करनेमें तत्पर हो जाइये। प्रयत्न करनेपर भी जो होना होगा, वही होगा॥ ५०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भयात्तुरेन्द्रादिदेवैः सुरगुरुणा सह परामर्शवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥ $\sim\sim\circ\sim\sim$