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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

गीताप्रेस, गोरखपुर


विदेहराज जनक तथा परम विरक्त श्रीशुकदेवजी

परीक्षित्-पुत्र महाराज जनमेजयके सर्पयज्ञमें आस्तीकका प्रवेश

गीताप्रेस, गोरखपुर

गीताप्रेस, गोरखपुर

भगवान् हयग्रीवद्वारा वेदोंका उद्धारकर ब्रह्माजीको प्रदान करना

श्रीजगदम्बाका देवताओंको दर्शन देना

(चित्र)

गीताप्रेस, गोरखपुर


नमः शिवायै कल्याण्यै शान्त्यै पुष्ट्यै नमो नमः। भगवत्यै नमो देव्यै रुद्राण्यै सततं नमः ॥
कालरात्र्यै तथाम्बायै इन्द्राण्यै ते नमो नमः। सिद्ध्यै बुद्ध्यै तथा वृद्ध्यै वैष्णव्यै ते नमो नमः ॥

गीताप्रेस, गोरखपुर

शुम्भासुरके दूत सुग्रीवका भगवती कौशिकीके पास पहुँचना

शिव-पार्वतीद्वारा श्रीकृष्णको वरदान

गीताप्रेस, गोरखपुर

श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्यम्

॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥

श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्यम्

अथ प्रथमोऽध्यायः

सूतजीके द्वारा ऋषियोंके प्रति श्रीमद्देवीभागवतके श्रवणकी महिमाका कथन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सृष्टौ या सर्गरूपा जगदवनविधौ<br>  पालनी या च रौद्री<br>संहारे चापि यस्या जगदिदमखिलं<br>  क्रीडनं या पराख्या।<br>पश्यन्ती मध्यमाथो तदनु भगवती<br>  वैखरी वर्णरूपा<br>सास्मद्वाचं प्रसन्ना विधिहरिगिरिशा-<br>  राधितालङ्करोतु ॥ १॥जगत्के सृष्टिकार्यमें जो उत्पत्तिरूपा, रक्षाकार्यमें पालनशक्तिरूपा, संहारकार्यमें रौद्ररूपा हैं, सम्पूर्ण विश्व-प्रपंच जिनके लिये क्रीडास्वरूप है, जो परा-पश्यन्ती-मध्यमा तथा वैखरी वाणीमें अभिव्यक्त होती हैं और जो ब्रह्मा-विष्णु-महेशद्वारा निरन्तर आराधित हैं, वे प्रसन्न चित्तवाली देवी भगवती मेरी वाणीको अलंकृत (परिशुद्ध) करें॥ १॥
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।<br>देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥ २[बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि] श्रीनारायण तथा नरोंमें श्रेष्ठ श्रीनर, भगवती सरस्वती और महर्षि वेदव्यासको प्रणाम करनेके पश्चात् ही जय (इतिहासपुराणादि सद्ग्रन्थों)-का पाठ-प्रवचन करना चाहिये॥ २॥
ऋषय ऊचुः<br>सूत जीव समा बह्वीर्यस्त्वं श्रावयसीह नः।<br>कथा मनोहराः पुण्या व्यासशिष्य महामते॥ ३**ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! हे महामते! हे व्यासशिष्य! आप दीर्घजीवी हों; आप हमलोगोंको नानाविध पुण्यप्रदायिनी एवं मनोहारिणी कथाएँ सुनाते रहते हैं॥ ३॥
सर्वपापहरं पुण्यं विष्णोश्चरितमद्भुतम्।<br>अवतारकथोपेतमस्माभिर्भक्तितः श्रुतम्॥ ४भगवान् विष्णुके सर्वपापविनाशक, परम पवित्र एवं उन अवतार-कथाओंसे सम्बन्धित अद्भुत चरित्रोंको हमने भक्तिपूर्वक सुना और इसी प्रकार हमने भगवान् शिवके अलौकिक चरित्र तथा भस्म और रुद्राक्षके ऐतिहासिक माहात्म्यका श्रवण आपके मुखारविन्दसे किया॥ ४-५॥
शिवस्य चरितं दिव्यं भस्मरुद्राक्षयोस्तथा।<br>सेतिहासञ्च माहात्म्यं श्रुतं तव मुखाम्बुजात्॥ ५
अधुना श्रोतुमिच्छामः पावनात् पावनं परम्।<br>भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणामनायासेन सर्वशः॥ ६हमलोग अब ऐसी परम पावन कथा सुनना चाहते हैं, जो बिना प्रयासके ही मनुष्योंको भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेमें पूर्णरूपसे सहायक हो॥ ६॥
तत् त्वं ब्रूहि महाभाग येन सिध्यन्ति मानवाः।<br>कलावपि परं त्वत्तो न विद्मः संशयच्छिदम्॥ ७हे महाभाग! अतः आप उस कथाका वर्णन करें, जिसके द्वारा मानव कलियुगमें भी सिद्धियाँ प्राप्त कर लें; क्योंकि हम आपसे बढ़कर किसी अन्यको नहीं जानते हैं, जो हमारी शंकाओंका निवारण कर सके॥ ७॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—2 A

३४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १

| सूत उवाच<br>साधु पृष्टं महाभागा लोकानां हितकाम्यया।<br>सर्वशास्त्रस्य यत् सारं तद्वो वक्ष्याम्यशेषतः॥ ८ | **सूतजी बोले—**हे महाभाग ऋषियो! आपलोगोंने लोककल्याणकी भावनासे अत्यन्त उत्तम प्रश्न किया है, अतः मैं आप सभीके लिये समस्त शास्त्रोंका जो सार है, उसे पूर्णरूपसे बताऊँगा॥ ८॥ | | तावद् गर्जन्ति तीर्थानि पुराणानि व्रतानि च।<br>यावन्न श्रूयते सम्यग् देवीभागवतं नरैः॥ ९ | समस्त तीर्थ, पुराण और व्रत [अपनी श्रेष्ठताका वर्णन करते हुए] तभीतक गर्जना करते हैं, जबतक मनुष्य श्रीमद्देवीभागवतका सम्यक्रूपसे श्रवण नहीं कर लेते॥ ९॥ | | तावत् पापाटवी नृणां क्लेशदादभ्रकण्टका।<br>यावन्न परशुः प्राप्तो देवीभागवताभिधः॥ १० | मनुष्योंके लिये पापरूपी अरण्य तभीतक दुःखप्रद एवं कंटकमय रहता है, जबतक श्रीमद्देवीभागवतरूपी परशु (कुठार) उपलब्ध नहीं हो जाता॥ १०॥ | | तावत् क्लेशावहं नृणामुपसर्गमहातमः।<br>यावन्नैवोदयं प्राप्तो देवीभागवतोष्णगुः॥ ११ | मनुष्योंको उपसर्ग (ग्रहण)-रूपी घोर अन्धकार तभीतक कष्ट पहुँचाता है, जबतक श्रीमद्देवीभागवतरूपी सूर्य उनके सम्मुख उदित नहीं हो जाते॥ ११॥ | | ऋषय ऊचुः<br>सूत सूत महाभाग वद नो वदतां वर।<br>कीदृशं तत्पुराणं हि विधिश्चाच्छ्रवणे च कः॥ १२<br><br>कतिभिर्वासरैरेतच्छ्रोतव्यं किञ्च पूजनम्।<br>कैर्मानवैः श्रुतं पूर्वं कान्कान्कामानवाप्नुयुः॥ १३ | **ऋषिगण बोले—**हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाभाग सूतजी! आप हमें बतायें कि वह श्रीमद्देवीभागवतपुराण कैसा है और उसके श्रवणकी विधि क्या है? उस पुराणको कितने दिनोंमें सुनना चाहिये, [उसके श्रवणकी अवधिमें] पूजन-विधान क्या है, प्राचीन कालमें किन-किन मनुष्योंने इसे सुना और उनकी कौन-कौनसी कामनाएँ पूर्ण हुईं?॥ १२-१३॥ | | सूत उवाच<br>विष्णोरंशो मुनिर्जातः सत्यवत्यां पराशरात्।<br>विभज्य वेदांश्चतुरः शिष्यानध्यापयत्पुरा॥ १४ | **सूतजी बोले—**प्राचीन कालमें पराशरऋषिद्वारा सत्यवतीके गर्भसे विष्णुके अंशस्वरूप मुनि व्यास उत्पन्न हुए, जिन्होंने वेदोंका चार विभाग करके उन्हें अपने शिष्योंको पढ़ाया॥ १४॥ | | व्रात्यानां द्विजबन्धूनां वेदेष्वनधिकारिणाम्।<br>स्त्रीणां दुर्मेधसां नृणां धर्मज्ञानं कथं भवेत्॥ १५<br><br>विचार्यैतत् तु मनसा भगवान् बादरायणः।<br>पुराणसंहितां दध्यौ तेषां धर्मविवित्सया॥ १६ | पतितों, ब्राह्मणाधमों, वेदाध्ययनके अनधिकारियों, स्त्रियों एवं दूषित बुद्धिवाले मनुष्योंको धर्मका ज्ञान कैसे हो—मनमें ऐसा विचार करके भगवान् बादरायण व्यासजीने उनके धर्मज्ञानार्थ पुराण-संहिताका प्रणयन किया॥ १५-१६॥ | | अष्टादश पुराणानि स कृत्वा भगवान् मुनिः।<br>मामेवाध्यापयामास भारताख्यानमेव च॥ १७ | उन भगवान् व्यासमुनिने अठारह पुराणों एवं महाभारतका प्रणयन करके सर्वप्रथम मुझे ही पढ़ाया॥ १७॥ | | देवीभागवतं तत्र पुराणं भोगमोक्षदम्।<br>स्वयं तु श्रावयामास जनमेजयभूपतिम्॥ १८ | उन पुराणोंमें श्रीमद्देवीभागवतपुराण भोग एवं मोक्षको देनेवाला है। व्यासजीने राजा जनमेजयको यह पुराण स्वयं सुनाया था॥ १८॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—2 B

अ० १ ] माहात्म्य ३५

अ० १ ] माहात्म्य ३५


पूर्वमस्य पिता राजा परीक्षित् तक्षकाहिना ।<br>सन्दष्टस्तस्य संशुद्ध्यै राज्ञा भागवतं श्रुतम् ॥ १९<br><br>नवभिर्दिवसैः श्रीमद्वेदव्यासमुखाम्बुजात् ।<br>त्रैलोक्यमातरं देवीं पूजयित्वा विधानतः ॥ २०पूर्वकालमें इन जनमेजयके पिता राजा परीक्षित् तक्षक-नागद्वारा काट लिये गये। अतः पिताकी संशुद्धि (शुभगति)-के लिये राजाने तीनों लोकोंकी जननी देवी भगवतीका विधिवत् पूजन-अर्चन करके नौ दिनोंतक व्यासजीके मुखारविन्दसे इस श्रीमद्देवीभागवत-पुराणका श्रवण किया ॥ १९-२० ॥
नवाहयज्ञे सम्पूर्णे परीक्षिदपि भूपतिः ।<br>दिव्यरूपधरो देव्याः सालोक्यं तत्क्षणादगात् ॥ २१इस नवाहयज्ञके सम्पूर्ण हो जानेपर राजा परीक्षित्ने उसी समय दिव्यरूप धारण करके देवीका सालोक्य प्राप्त किया ॥ २१ ॥
पितुर्दिव्यां गतिं राजा विलोक्य जनमेजयः ।<br>व्यासं मुनिं समभ्यर्च्य परां मुदमवाप ह ॥ २२राजा जनमेजय अपने पिताकी दिव्य गति देखकर और महर्षि वेदव्यासकी विधिवत् पूजा करके परम प्रसन्न हुए ॥ २२ ॥
अष्टादशपुराणानां मध्ये सर्वोत्तमं परम् ।<br>देवीभागवतं नाम धर्मकामार्थमोक्षदम् ॥ २३सभी अठारह पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवतपुराण सर्वश्रेष्ठ है और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षको प्रदान करनेवाला है ॥ २३ ॥
ये शृण्वन्ति सदा भक्त्या देव्या भागवतीं कथाम् ।<br>तेषां सिद्धिर्न दूरस्था तस्मात् सेव्या सदा नृभिः ॥ २४जो लोग सदा भक्ति-श्रद्धापूर्वक श्रीमद्देवीभागवतकी कथा सुनते हैं, उन्हें सिद्धि प्राप्त होनेमें रंचमात्र भी विलम्ब नहीं होता। इसलिये मनुष्योंको इस पुराणका सदा पठन-श्रवण करना चाहिये ॥ २४ ॥
दिनमर्धं तदर्धं वा मुहूर्तं क्षणमेव वा ।<br>ये शृण्वन्ति नरा भक्त्या न तेषां दुर्गतिः क्वचित् ॥ २५पूरे दिन, दिनके आधे समयतक, चौथाई समयतक, मुहूर्तभर अथवा एक क्षण भी जो लोग भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करते हैं, उनकी कभी भी दुर्गति नहीं होती ॥ २५ ॥
सर्वयज्ञेषु तीर्थेषु सर्वदानेषु यत् फलम् ।<br>सकृत् पुराणश्रवणात् तत् फलं लभते नरः ॥ २६मनुष्य सभी यज्ञों, तीर्थों तथा दान आदि शुभ कर्मोंका जो फल प्राप्त करता है, वही फल उसे केवल एक बार श्रीमद्देवीभागवतपुराणके श्रवणसे प्राप्त हो जाता है ॥ २६ ॥
कृतादौ बहवो धर्माः कलौ धर्मस्तु केवलम् ।<br>पुराणश्रवणादन्यो विद्यते नापरो नृणाम् ॥ २७सत्ययुग आदि युगोंमें तो अनेक प्रकारके धर्मोंका विधान था, किंतु कलियुगमें पुराण-श्रवणके अतिरिक्त मनुष्योंके लिये अन्य कोई सरल धर्म विहित नहीं है ॥ २७ ॥
धर्माचारविहीनानां कलावल्पायुषां नृणाम् ।<br>व्यासो हिताय विदधे पुराणाख्यं सुधारसम् ॥ २८कलियुगमें धर्म एवं सदाचारसे रहित तथा अल्प आयुवाले मनुष्योंके कल्याणार्थ महर्षि वेदव्यासने अमृतरसमय श्रीमद्देवीभागवतनामक पुराणकी रचना की ॥ २८ ॥
सुधां पिबन्नेक एव नरः स्यादजरामरः ।<br>देव्याः कथामृतं कुर्यात् कुलमेवाजरामरम् ॥ २९अमृतके पानसे तो केवल एक ही मनुष्य अजर-अमर होता है, किंतु भगवतीका कथारूप अमृत सम्पूर्ण कुलको ही अजर-अमर बना देता है ॥ २९ ॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 2 C

| ३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ | | :--- | :--- |

मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
मासानां नियमो नात्र दिनानां नियमोऽपि न।<br>सदा सेव्यं सदा सेव्यं देवीभागवतं नरैः॥ ३०श्रीमद्देवीभागवतके कथा-श्रवणमें महीनों तथा दिनोंका कोई भी नियम नहीं है। अतएव मानवोंद्वारा इसका सदा ही सेवन (पठन-श्रवण) किया जाना चाहिये॥ ३०॥
आश्विने मधुमासे वा तपोमासे शुचौ तथा।<br>चतुर्षु नवरात्रेषु विशेषात् फलदायकम्॥ ३१आश्विन, चैत्र, माघ तथा आषाढ़—इन महीनोंके चारों नवरात्रोंमें इस पुराणका श्रवण विशेष फल प्रदान करता है॥ ३१॥
अतो नवाहयज्ञोऽयं सर्वस्मात् पुण्यकर्मणः।<br>फलाधिकप्रदानेन प्रोक्तः पुण्यप्रदो नृणाम्॥ ३२अतएव श्रीमद्देवीभागवतका यह नवाहयज्ञ समस्त पुण्यकर्मोंसे अधिक फलदायक होनेके कारण मनुष्योंके लिये विशेष पुण्यप्रद कहा गया है॥ ३२॥
ये दुर्हृदः पापरता विमूढा<br>मित्रद्रुहो वेदविनिन्दकाश्च।<br>हिंसारता नास्तिकमार्गसक्ता<br>नवाहयज्ञेन पुनन्ति ते कलौ॥ ३३जो कलुषित हृदयवाले, पापी, मूर्ख, मित्रद्रोही, वेदोंकी निन्दा करनेवाले, हिंसामें रत और नास्तिक मार्गका अनुसरण करनेवाले मनुष्य हैं, वे भी कलियुगमें इस नवाहयज्ञके अनुष्ठानसे पवित्र हो जाते हैं॥ ३३॥
परस्वदाराहरणेऽतिलुब्धा<br>ये वै नराः कल्मषभारभाजः।<br>गोदेवताब्राह्मणभक्तिहीना<br>नवाहयज्ञेन भवन्ति शुद्धाः॥ ३४जो मनुष्य दूसरोंके धन तथा परायी स्त्रियोंके लिये लालायित रहते हैं, पापके बोझसे दबे हुए हैं और गो-ब्राह्मण-देवताओंकी भक्तिसे रहित हैं, वे भी इस नवाहयज्ञसे शुद्ध हो जाते हैं॥ ३४॥
तपोभिरुग्रैर्व्रततीर्थसेवनै-<br>र्दानैरनेकैर्नियमैर्मखैश्च ।<br>हुतैर्जपैर्यच्च फलं न लभ्यते<br>नवाहयज्ञेन तदाप्यते नृणाम्॥ ३५जो फल कठिन तपस्याओं, व्रतों, तीर्थसेवन, अनेकविध दान, नियमों, यज्ञों, हवन एवं जप आदिके करनेसे प्राप्त नहीं होता है, वह फल मनुष्योंको श्रीमद्देवी-भागवतके नवाहयज्ञसे प्राप्त हो जाता है॥ ३५॥
तथा न गङ्गा न गया न काशी<br>न नैमिषं नो मथुरा न पुष्करम्।<br>पुनाति सद्यो बदरीवनं नो<br>यथा हि देवीमख एष विप्राः॥ ३६हे विप्रो! गंगा, गया, काशी, नैमिषारण्य, मथुरा, पुष्कर तथा बदरिकारण्य भी मनुष्योंको उतना शीघ्र पवित्र नहीं कर पाते हैं, जितना कि श्रीमद्देवीभागवतका यह नवाहयज्ञ लोगोंको पवित्र कर देता है॥ ३६॥
अतो भागवतं देव्याः पुराणं परतः परम्।<br>धर्मार्थकाममोक्षाणामुत्तमं साधनं मतम्॥ ३७अतएव श्रीमद्देवीभागवतपुराण सभी पुराणोंमें श्रेष्ठतम है। इसे धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षकी प्राप्तिका उत्तम साधन माना गया है॥ ३७॥
आश्विनस्य सिते पक्षे कन्याराशिगते रवौ।<br>महाष्टम्यां समभ्यर्च्य हैमसिंहासनस्थितम्॥ ३८<br><br>देवीप्रीतिप्रदं भक्त्या श्रीभागवतपुस्तकम्।<br>दद्याद् विप्राय योग्याय स देव्याः पदवीं लभेत्॥ ३९जो आश्विन महीनेके शुक्लपक्षमें सूर्यके कन्या-राशिमें पहुँचनेपर महाष्टमी तिथिको स्वर्ण-सिंहासनपर स्थित देवीके प्रीतिप्रद श्रीमद्देवीभागवत-ग्रन्थका पूजन करके उसे किसी योग्य ब्राह्मणको श्रद्धापूर्वक देता है, वह देवीके परमपदको प्राप्त करता है॥ ३८-३९॥
देवीभागवतस्यापि श्लोकं श्लोकार्धमेव वा।<br>भक्त्या यश्च पठेन्नित्यं स देव्याः प्रीतिभाग्भवेत्॥ ४०जो मनुष्य प्रतिदिन श्रीमद्देवीभागवतपुराणके एक अथवा आधे श्लोकका भी भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह जगदम्बाका कृपापात्र हो जाता है॥ ४०॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—2 D

अ० १ ]माहात्म्य३७
श्लोकअर्थ
उपसर्गभयं घोरं महामारीसमुद्भवम्।<br>उत्पातानखिलांश्चापि हन्ति श्रवणमात्रतः॥ ४१महामारीसे उत्पन्न उपद्रवोंके भीषण भय तथा समस्त प्रकारके उत्पात (उल्कापात, भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि) इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणके श्रवण-मात्रसे विनष्ट हो जाते हैं॥ ४१॥
बालग्रहकृतं यच्च भूतप्रेतकृतं भयम्।<br>देवीभागवतस्यास्य श्रवणाद् याति दूरतः॥ ४२बालग्रहों* (स्कन्दग्रह, स्कन्दापस्मार, शकुनी, रेवती, पूतना, अन्धपूतना, शीतपूतना, मुखमण्डिका और नैगमेष) तथा भूत-प्रेत आदिसे उत्पन्न भय इस श्रीमद्देवीभागवत-पुराणके श्रवणसे बहुत दूरसे ही भाग जाते हैं॥ ४२॥
यस्तु भागवतं देव्याः पठेद् भक्त्या शृणोति वा।<br>धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं च लभते नरः॥ ४३जो व्यक्ति भक्ति-भावसे देवीके इस भागवत-पुराणका पाठ अथवा श्रवण करता है; वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त कर लेता है॥ ४३॥
श्रवणाद्वसुदेवोऽस्य प्रसेनान्वेषणे गतम्।<br>चिरायितं प्रियं पुत्रं कृष्णं लब्ध्वा मुमोद ह॥ ४४इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणके श्रवणसे वसुदेवजी प्रसेनको खोजनेके लिये गये हुए और बहुत समयतक न लौटे हुए अपने प्रिय पुत्र श्रीकृष्णको प्राप्त करके प्रसन्न हुए॥ ४४॥
य एतां शृणुयाद् भक्त्या श्रीमद्भागवतीं कथाम्।<br>भुक्तिं मुक्तिं स लभते भक्त्या यश्च पठेदिमाम्॥ ४५जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणकी कथाको पढ़ता है तथा इसका श्रवण करता है, वह भोग तथा मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता है॥ ४५॥
अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो धनवान् भवेत्।<br>रोगी रोगात् प्रमुच्येत श्रुत्वा भागवतामृतम्॥ ४६अमृतस्वरूप इस श्रीमद्देवीभागवतके श्रवणसे पुत्रहीन मनुष्य पुत्रवान् हो जाता है, दरिद्र व्यक्ति धनसे सम्पन्न हो जाता है तथा रोगग्रस्त मनुष्य रोगसे मुक्त हो जाता है॥ ४६॥
वन्ध्या वा काकवन्ध्या वा मृतवत्सा च याङ्गना।<br>देवीभागवतं श्रुत्वा लभेत् पुत्रं चिरायुषम्॥ ४७वन्ध्या स्त्री, एक सन्तानवाली स्त्री अथवा वह स्त्री जिसकी सन्तान पैदा होकर मर जाती हो—वे भी श्रीमद्देवीभागवतपुराण सुनकर दीर्घ आयुवाला पुत्र प्राप्त करती हैं॥ ४७॥
पूजितं यद्गृहे नित्यं श्रीभागवतपुस्तकम्।<br>तद्गृहं तीर्थभूतं हि वसतां पापनाशकम्॥ ४८जिस घरमें नित्य श्रीमद्देवीभागवतपुराणका पूजन किया जाता है, वह घर तीर्थस्वरूप हो जाता है तथा उसमें निवास करनेवाले लोगोंके पापोंका नाश हो जाता है॥ ४८॥
अष्टम्यां वा चतुर्दश्यां नवम्यां भक्तिसंयुतः।<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि स सिद्धिं लभते पराम्॥ ४९जो मनुष्य अष्टमी, नवमी अथवा चतुर्दशी तिथियोंको श्रद्धापूर्वक इसे पढ़ता या सुनता है, वह परम सिद्धिको प्राप्त करता है॥ ४९॥

* सुश्रुतसंहित उत्तरतन्त्र २७।४-५

इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये देवीभागवत-श्रवणमाहात्म्यवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

३८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २

| पठन् द्विजो वेदविदग्रणीर्भवेद्<br>  बाहुप्रजातो धरणीपतिः स्यात्।<br>वैश्यः पठन् वित्तसमृद्धिमेति<br>  शूद्रोऽपि शृण्वन् स्वकुलोत्तमः स्यात्॥ ५० | इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणका पाठ करनेवाला ब्राह्मण वेदवेत्ताओंमें अग्रगण्य हो जाता है, क्षत्रिय राजा हो जाता है, वैश्य धन-सम्पदासे सम्पन्न हो जाता है और शूद्र भी इसके श्रवणमात्रसे अपने कुल (बन्धु-बान्धवों)-के बीच श्रेष्ठता प्राप्त कर लेता है॥ ५०॥ |

इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये देवीभागवत-श्रवणमाहात्म्यवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥


अथ द्वितीयोऽध्यायः

श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें स्यमन्तकमणिकी कथा

ऋषय ऊचुः<br>वसुदेवो महाभागः कथं पुत्रमवाप्तवान्।<br>प्रसेनः कुत्र कृष्णेन भ्रमतान्वेषितः कथम्॥ १<br><br>विधिना केन कस्माच्च देवीभागवतं श्रुतम्।<br>वसुदेवेन सुमते वद सूत कथामिमाम्॥ २**ऋषिगण बोले—**महाभाग वसुदेवजीने अपने पुत्रको किस प्रकार प्राप्त किया और वनमें भ्रमण करते हुए श्रीकृष्णने प्रसेनको कैसे खोजा? हे सुमते! हे सूतजी! किस विधिसे और किससे वसुदेवजीने श्रीमद्देवीभागवतपुराणका श्रवण किया; आप हमलोगोंको यह कथा बतायें॥ १-२॥
<br>    सूत उवाच<br>सत्राजिद् भोजवंशीयो द्वारवत्यां सुखं वसन्।<br>सूर्यस्याराधने युक्तो भक्तश्च परमः सखा॥ ३**सूतजी बोले—**भोजवंशी सत्राजित् द्वारकापुरीमें आनन्दपूर्वक निवास करता हुआ सूर्यकी आराधनामें तत्पर रहता था। वह सूर्यका परम भक्त एवं उनका मित्र था॥ ३॥
अथ कालेन कियता प्रसन्नः सविताभवत्।<br>स्वलोकं दर्शयामास तद्भक्त्या प्रणयेन च॥ ४कुछ समयके पश्चात् सूर्यदेव उसके ऊपर प्रसन्न हो गये और उन्होंने उसे अपने लोकका दर्शन कराया। उसकी भक्ति तथा प्रेमसे अत्यन्त प्रसन्न हुए भगवान् सूर्यने सत्राजित्को स्यमन्तकमणि दे दी और वह उस मणिको अपने गलेमें धारण किये हुए द्वारका आ गया॥ ४-५॥
तस्मै प्रीतश्च भगवान् स्यमन्तकमणिं ददौ।<br>स तं बिभ्रन्मणिं कण्ठे द्वारकामाजगाम ह॥ ५
दृष्ट्वा तं तेजसा भ्रान्ता मत्वादित्यं पुरौकसः।<br>कृष्णमूचुः समभ्येत्य सुधर्मायामवस्थितम्॥ ६उसे देखकर मणिके तेजसे भ्रमित नागरिकोंने सत्राजित्को सूर्य समझकर सुधर्मा नामक अपनी सभामें विराजमान श्रीकृष्णके पास पहुँचकर उनसे कहा॥ ६॥
एष आयाति सविता दिदृक्षुस्त्वां जगत्पते।<br>श्रुत्वा कृष्णस्तु तद्वाचं प्रहस्योवाच संसदि॥ ७हे जगत्पते! आपके दर्शनकी अभिलाषासे भगवान् सूर्य स्वयं आपके पास आ रहे हैं। यह बात सुनकर सभामें श्रीकृष्ण हँसकर बोले॥ ७॥
सविता नैष भो बालाः सत्राजिन्मणिना ज्वलन्।<br>स्यमन्तकेन चायाति भास्वद्दत्तेन भास्वता॥ ८हे बाल-स्वभाव नागरिको! ये सूर्यभगवान् नहीं हैं; बल्कि सत्राजित् है, जो स्वयं सूर्यद्वारा प्रदत्त स्यमन्तक-मणिसे दीप्तिमान् होता हुआ यहाँ आ रहा है॥ ८॥

अ० २] माहात्म्य ३९

अथ विप्रान् समाहूय स्वस्तिवाचनपूर्वकम्।<br>प्रावेशयत् समभ्यर्च्य सत्राजित् स्वगृहे मणिम्॥ ९उसके पश्चात् ब्राह्मणोंको बुलाकर सत्राजित्ने स्वस्तिवाचन कराया और भलीभाँति पूजन करके उस मणिको अपने घरमें स्थापित किया॥ ९॥
न तत्र मारी दुर्भिक्षं नोपसर्गभयं क्वचित्।<br>यत्रास्ते स मणिर्नित्यमष्टभारसुवर्णदः॥ १०वह मणि जहाँ रहती थी, वहाँ किसी प्रकारकी महामारी, दुर्भिक्ष तथा उपसर्ग (भूकम्प आदि प्राकृतिक संकट)-का भय उत्पन्न नहीं होता था और (उस मणिकी एक विशेषता यह भी थी कि) वह नित्य आठ भार* स्वर्ण दिया करती थी॥ १०॥
अथ सत्राजितो भ्राता प्रसेनो नाम कर्हिचित्।<br>कण्ठे बद्ध्वा मणिं सद्यो हयमारुह्य सैन्धवम्॥ ११<br><br>मृगयार्थं वनं यातस्तमद्राक्षीन्मृगाधिपः।<br>प्रसेनं सहयं हत्वा सिंहो जग्राह तं मणिम्॥ १२तदनन्तर एक दिन सत्राजित्के भाई प्रसेनने उस मणिको गलेमें धारणकर सिन्धुदेशीय घोड़ेपर सवार होकर आखेटके लिये वनकी ओर प्रस्थान किया। वहाँ वनमें किसी सिंहने उसे देखा और घोड़ेसहित प्रसेनको मारकर सिंहने वह मणि स्वयं ले ली॥ ११-१२॥
जाम्बवानृक्षराजोऽथ दृष्ट्वा मणिधरं हरिम्।<br>हत्वा च तं बिलद्वारि मणिं जग्राह वीर्यवान्॥ १३इसके पश्चात् महाबली ऋक्षराज जाम्बवान्ने मणि धारण करनेवाले उस सिंहको अपनी गुफाके द्वारपर देखकर और उसे मारकर मणि स्वयं ले ली॥ १३॥
स तं मणिं स्वपुत्राय क्रीडनार्थमदात् प्रभुः।<br>अथ चिक्रीड बालोऽपि मणिं सम्प्राप्य भास्वरम्॥ १४पराक्रमी ऋक्षराजने वह मणि खेलनेके लिये अपने पुत्रको दे दी और वह बालक भी उस प्रदीप्त मणिको पाकर उसके साथ खेलने लगा॥ १४॥
प्रसेनेऽनागते चाथ सत्राजित् पर्यतप्यत।<br>न जाने केन निहतः प्रसेनो मणिमिच्छता॥ १५कुछ काल बीतनेपर भी प्रसेनके वापस न लौटनेपर सत्राजित् अत्यन्त दुःखी हुआ और सोचने लगा कि मणि लेनेकी इच्छासे न जाने किसने प्रसेनको मार डाला॥ १५॥
अथ लोकमुखोद्गीर्णा किंवदन्ती पुरेऽभवत्।<br>कृष्णेन निहतो नूनं प्रसेनो मणिलिप्सुना॥ १६इसी बीच द्वारकापुरमें नागरिकोंकी पारस्परिक बात-चीतसे किसी प्रकार यह किंवदन्ती फैल गयी कि मणिके लोभके वशीभूत श्रीकृष्णने ही प्रसेनका वध किया है॥ १६॥
स तं शुश्राव कृष्णोऽपि दुर्यशो लिप्तमात्मनि।<br>मार्ष्टुं तत्तस्य पदवीं पुरौकोभिस्सहगमत्॥ १७श्रीकृष्णने भी जब अपने विषयमें अपयशकी वह बात सुनी तो उन्होंने अपने ऊपर लगे हुए कलंकके परिमार्जनहेतु प्रसेनके अन्वेषणार्थ नागरिकोंके साथ प्रस्थान किया॥ १७॥

* भारका परिमाण इस प्रकार है—
चतुर्भिर्व्रीहिभिर्गुञ्जं गुञ्जाभ्यञ्च पणं पलम्। अष्टौ धरणमष्टौ च कर्षं तांश्चतुरः पलम्।
तुलां पलशतं प्राहुर्भारं स्याद्विंशतिस्तुलाः॥
अर्थात् 'चार व्रीहि (धान)-की एक गुंजा, पाँच गुंजाका एक पण, आठ पणका एक धरण, आठ धरणका एक कर्ष, चार कर्षका एक पल, सौ पलकी एक तुला और बीस तुलाका एक भार कहलाता है।'

| ४० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गत्वा स विपिनेऽपश्यत् प्रसेनं हरिणा हतम्।<br>ययौ मृगेन्द्रमन्विष्यनसृग्बिन्द्वङ्किताध्वना ॥ १८वनमें पहुँचनेपर श्रीकृष्णने सिंहद्वारा मारे गये प्रसेनको देखा और तदनन्तर गिरे हुए रक्त-बिन्दुओंसे चिह्नित मार्गका अनुसरण करके सिंहको खोजते हुए वे कुछ दूर गये ॥ १८ ॥
अथ कृष्णो हतं सिंहं बिलद्वारि विलोक्य च।<br>उवाच भगवान् वाचं कृपया पुरवासिनः ॥ १९<br><br>तिष्ठध्वं यूयमत्रैव यावदागमनं मम।<br>प्रविशामि बिलं त्वेतन्मणिहारकलब्धये ॥ २०इसके पश्चात् एक गुफाके द्वारपर मरे हुए सिंहको देखकर भगवान् श्रीकृष्ण करुणायुक्त वाणीमें नागरिकोंसे बोले—मणिका हरण करनेवालेको खोजनेके लिये मैं इस गुफाके भीतर प्रवेश कर रहा हूँ। जबतक मैं वापस न आ जाऊँ, तुम लोग यहींपर ठहरो ॥ १९-२० ॥
तथेत्युक्त्वा तु ते तस्थुस्तत्रैव द्वारकौकसः।<br>जगामान्तर्बिलं कृष्णो यत्र जाम्बवतो गृहम् ॥ २१वे द्वारकावासी 'ठीक है'—ऐसा बोलकर वहींपर ठहर गये और श्रीकृष्ण गुफाके भीतर प्रविष्ट हुए, जहाँ जाम्बवान्‌का घर था ॥ २१ ॥
ऋक्षराजसुतं दृष्ट्वा कृष्णो मणिधरं तदा।<br>हर्तुमैच्छन्मणिं तावद् धात्री चुक्रोश भीतवत् ॥ २२तत्पश्चात् वहाँ पहुँचनेपर श्रीकृष्णने ऋक्षराजके पुत्रको मणि धारण किये देखकर मणिको छीनना चाहा, इसपर उसकी धात्री (धाय) भयभीत होकर चिल्लाने लगी ॥ २२ ॥
श्रुत्वा धात्रीरवं सद्यः समागत्यर्क्षराट् तदा।<br>युयुधे स्वामिना साकमविश्रममहर्निशम् ॥ २३तब धात्रीकी आवाज सुनकर जाम्बवान् तुरंत वहाँ आ गया और वह अपने [पूर्व] स्वामी श्रीकृष्णके साथ दिन-रात निरन्तर युद्ध करने लगा ॥ २३ ॥
एवं त्रिनवरात्रं तु महद्युद्धमभूत्तयोः।<br>कृष्णागमं प्रतीक्षन्तस्तस्थुर्द्वारि पुरौकसः ॥ २४<br><br>द्वादशाहं ततो भीत्या प्रतिजग्मुर्निजालयम्।<br>तत्र ते कथयामासुर्वृत्तान्तं सर्वमादितः ॥ २५इस प्रकार उन दोनोंके बीच सत्ताईस दिनोंतक भयंकर युद्ध हुआ। इधर द्वारकावासी गुफाके द्वारपर बारह दिनोंतक तो श्रीकृष्णके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए ठहरे रहे, किंतु इसके बाद वे भयभीत होकर अपने-अपने घर चले गये और वहाँ पहुँचकर उन्होंने लोगोंसे सारा वृत्तान्त कहा ॥ २४-२५ ॥
सत्राजितं शपन्तस्ते सर्वे शोकाकुला भृशम्।<br>वसुदेवो महाभागः श्रुत्वा पुत्रस्य तां कथाम् ॥ २६<br><br>मुमोह सपरीवारस्तदा परमया शुचा।<br>चिन्तयामास बहुधा कथं श्रेयो भवेन्मम ॥ २७द्वारकापुरीके सभी नागरिक यह सब सुनकर सत्राजित्‌की भर्त्सना करते हुए अत्यन्त शोकविह्वल हो गये। महाभाग वसुदेवजी अपने पुत्रका वह समाचार सुनकर परिवारसहित महान् शोकसे मूर्च्छित हो गये और बार-बार सोचने लगे कि मेरा कल्याण किस प्रकारसे हो ? ॥ २६-२७ ॥
अथाजगाम भगवान् देवर्षिर्ब्रह्मलोकतः।<br>उत्थाय तं प्रणम्यासौ वसुदेवोऽभ्यपूजयत् ॥ २८उसी समय ब्रह्मलोकसे देवर्षि नारद वहाँ आ गये। वसुदेवजीने उठकर उन्हें प्रणाम करके विधिवत् उनकी पूजा की ॥ २८ ॥
नारदोऽनामयं पृष्ट्वा वसुदेवं महामतिम्।<br>पप्रच्छ च यदुश्रेष्ठं किं चिन्तयसि तद् वद ॥ २९देवर्षि नारद महामति यदुश्रेष्ठ वसुदेवजीसे कुशल-क्षेम पूछकर उनसे बोले—आप क्यों चिन्तित हैं, यह मुझे बताइये ॥ २९ ॥
अ० २ ]माहात्म्य४१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वसुदेव उवाच<br>पुत्रो मेऽतिप्रियः कृष्णः प्रसेनान्वेषणाय तु।<br>पौरैः साकं वनं गत्वा निहतं तं तदैक्षत॥ ३०<br>प्रसेनघातकं दृष्ट्वा बिलद्वारे मृतं हरिम्।<br>द्वारि पौरानधिष्ठाप्य बिलान्तर्गतवान् स्वयं॥ ३१<br>बहवो दिवसा याता नायात्यद्यापि मे सुतः।<br>अतः शोचामि तद् ब्रूहि येन लप्स्ये सुतं मुने॥ ३२वसुदेवजी बोले—मेरा अतिशय प्रिय पुत्र श्रीकृष्ण प्रसेनको खोजनेके लिये द्वारकाके नागरिकोंके साथ वनमें गया था, जहाँ उसने प्रसेनको मरा हुआ देखा। इसके पश्चात् प्रसेनको मारनेवाले सिंहको भी एक गुफाके द्वारपर मरा देखकर श्रीकृष्ण नागरिकोंको द्वारपर ही रोककर स्वयं गुफाके अन्दर चले गये। बहुत दिन व्यतीत हो चुके हैं, किंतु मेरा पुत्र अभीतक नहीं लौटा, जिससे मैं चिन्तित हूँ, अतः हे मुने! आप कोई ऐसा उपाय बताइये, जिससे मैं अपने प्रिय पुत्रको प्राप्त कर सकूँ॥ ३०–३२॥
नारद उवाच<br>पुत्रप्राप्त्यै यदुश्रेष्ठ देवीमाराधयाम्बिकाम्।<br>तस्या आराधनैनैव सद्यः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि॥ ३३नारदजी बोले—हे यदुश्रेष्ठ! आप पुत्रकी प्राप्तिके लिये अम्बिकादेवीकी आराधना कीजिये। उनकी आराधनासे शीघ्र ही आपका कल्याण होगा॥ ३३॥
वसुदेव उवाच<br>भगवन् का हि सा देवी किंप्रभावा महेश्वरी।<br>कथमाराधनं तस्या देवर्षे कृपया वद॥ ३४वसुदेवजी बोले—हे भगवन्! वे देवी कौन हैं, वे महेश्वरी किस प्रकारके प्रभाववाली हैं तथा उनकी आराधना किस प्रकार की जाती है? हे देवर्षे! कृपा करके यह बतायें॥ ३४॥
नारद उवाच<br>वसुदेव महाभाग शृणु संक्षेपतो मम।<br>देव्या माहात्म्यमतुलं को वक्तुं विस्तरात् क्षमः॥ ३५नारदजी बोले—हे महाभाग वसुदेव! देवीके अतुलित माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेमें कौन समर्थ है? अतः मैं संक्षेपमें ही कह रहा हूँ, आप उसे सुनें॥ ३५॥
या सा भगवती नित्या सच्चिदानन्दरूपिणी।<br>परात्परतरा देवी यया व्याप्तमिदं जगत्॥ ३६<br>यदाराधनतो ब्रह्मा सृजतीदं चराचरम्।<br>यां च स्तुत्वा विनिर्मुक्तो मधुकैटभजाद् भयात्॥ ३७<br>विष्णुर्यत्कृपया विश्वं बिभर्ति भगवानिदम्।<br>रुद्रः संहरते यस्याः कृपापाङ्गनिरीक्षणात्॥ ३८<br>संसारबन्धहेतुर्या सैव मुक्तिप्रदायिनी।<br>सा विद्या परमा देवी सैव सर्वेश्वरेश्वरी॥ ३९जो भगवती शाश्वत, सच्चिदानन्दस्वरूपा और परात्परतरा देवी हैं तथा जिनके द्वारा यह जगत् व्याप्त है, जिनकी आराधनाके प्रभावसे ही ब्रह्मा इस चराचर सृष्टिकी रचना करते हैं, जिनका स्तवन करके भगवान् विष्णु मधु-कैटभके भयसे मुक्त हुए तथा जिनकी कृपासे वे विश्वका पालन-पोषण करते हैं, जिनके कृपा-कटाक्षमात्रसे भगवान् शंकर जगत्का संहार करते हैं और जो संसारके बन्धनकी कारणरूपा हैं, वे ही मुक्ति प्रदान करनेवाली हैं, वे ही परम विद्यास्वरूपा हैं और वे ही समस्त ईश्वरोंकी भी ईश्वरी हैं॥ ३६–३९॥
नवरात्रविधानेन सम्पूज्य जगदम्बिकाम्।<br>नवाहोभिः पुराणं च देव्या भागवतं शृणु॥ ४०<br>यस्य श्रवणमात्रेण सद्यः पुत्रमवाप्स्यसि।<br>भुक्तिर्मुक्तिर्न दूरस्था पठतां शृण्वतां नृणाम्॥ ४१अतः आप नवरात्रविधानके अनुसार जगदम्बाकी विधिवत् पूजा करके नौ दिनोंमें इस श्रीमद्देवीभागवत-पुराणका श्रवण कीजिये, जिसके श्रवणमात्रसे आप शीघ्र ही अपने पुत्रकी प्राप्ति कर लेंगे। इस पुराणका पाठ तथा श्रवण करनेवाले मनुष्योंसे भोग एवं मोक्ष दूर नहीं रहते॥ ४०–४१॥

| ४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इत्युक्तो नारदेनासौ वसुदेवः प्रणम्य तम्।<br>उवाच परया प्रीत्या नारदं मुनिसत्तमम्॥ ४२नारदजीके ऐसा कहनेपर वे वसुदेवजी मुनि-श्रेष्ठ नारदको प्रणाम करके अत्यन्त प्रेमपूर्वक कहने लगे॥ ४२॥
वसुदेव उवाच<br>भगवंस्तव वाक्येन संस्मृतं वृत्तमात्मनः।<br>श्रूयतां तच्च वक्ष्यामि देवीमाहात्म्यसम्भवम्॥ ४३वसुदेवजी बोले— हे भगवन्! आपके इस कथनसे देवी-माहात्म्यसे सम्बन्धित एक अपना वृत्तान्त मुझे याद आ गया; मैं उसे कह रहा हूँ, आप सुनिये॥ ४३॥
पुरा नभोगिरा कंसो देवक्यष्टमगर्भतः।<br>ज्ञात्वात्ममृत्युं पापो मां सभार्यं न्यरुणद्धिया॥ ४४पूर्वकालमें पापी कंसने आकाशवाणीके माध्यमसे देवकीके आठवें गर्भसे अपनी मृत्यु जानकर भयभीत हो भार्यासहित मुझको बन्दी बना लिया॥ ४४॥
कारागारेऽहमवसं देवक्या सह भार्यया।<br>जातं जातं समवधीत्पुत्रं कंसोऽपि पापकृत्॥ ४५तदनन्तर मैं अपनी पत्नी देवकीके साथ कारागारमें रहने लगा और पापी कंस भी मेरे पैदा होनेवाले पुत्रोंको एक-एक करके मारता रहा॥ ४५॥
षट् पुत्रा निहतास्तेन तदा शोकाकुला भृशम्।<br>अतप्यद् देवकी देवी नक्तन्दिवमनिन्दिता॥ ४६इस प्रकार जब कंसके द्वारा मेरे छः पुत्र मार डाले गये तब मेरी निर्दोष भार्या देवी देवकी अत्यन्त शोकाकुल हो उठीं और दिन-रात दुखी रहने लगीं॥ ४६॥
तदाहं गर्गमाहूय मुनिं नत्वाभिपूज्य च।<br>निवेद्य देवकीदुःखमवोचं पुत्रकाम्यया॥ ४७<br><br>भगवन् करुणासिन्धो यादवानां गुरुर्भवान्।<br>आयुष्मत्पुत्रसम्प्राप्तिसाधनं वद मे मुने॥ ४८<br><br>ततो गर्गः प्रसन्नात्मा मामुवाच दयानिधिः।तत्पश्चात् गर्गमुनिको बुलाकर उनका अभिवादन तथा पूजन करके पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे मैंने उनसे देवकीका दुःख बताकर कहा—हे भगवन्! हे दयासिन्धो! हे मुनिवर! आप यदुकुलके गुरु हैं, अतः मुझे आयुष्मान् पुत्रकी प्राप्तिका कोई उपाय बताइये। इसके अनन्तर दयानिधान गर्गजी प्रसन्न होकर मुझसे कहने लगे॥ ४७-४८ १/२॥
गर्ग उवाच<br>वसुदेव महाभाग शृणु तत् साधनं परम्॥ ४९<br><br>या सा भगवती दुर्गा भक्तदुर्गतिहारिणी।<br>तामाराधय कल्याणीं सद्यः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि॥ ५०<br><br>यदाराधनतः सर्वे सर्वान् कामानवाप्नुयुः।<br>न किञ्चिद् दुर्लभं लोके दुर्गार्चनवतां नृणाम्॥ ५१गर्गजी बोले— हे महाभाग वसुदेव! अब आप उस सर्वश्रेष्ठ साधनको सुनिये। जो भगवती दुर्गा अपने भक्तोंकी दुर्गति का विनाश कर देती हैं, आप उन कल्याणकारिणी देवीकी आराधना कीजिये। इससे शीघ्र ही आपका कल्याण होगा; क्योंकि उनकी आराधनासे सभी लोगोंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। दुर्गाकी उपासना करनेवाले मनुष्योंके लिये संसारमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥ ४९-५१॥
इत्युक्तोऽहं मुदा युक्तः सभार्यो मुनिपुङ्गवम्।<br>प्रणम्य परया भक्त्या प्रावोचं विहिताञ्जलिः॥ ५२गर्गमुनिके ऐसा कहनेपर मैं प्रसन्न हो गया और अपनी पत्नीसहित मुनिश्रेष्ठ गर्गको परम श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर मैंने उनसे कहा॥ ५२॥
वसुदेव उवाच<br>यद्यस्ति भगवन् प्रीतिर्मयि ते करुणानिधे।<br>तदा गुरो मदर्थे त्वं समाराधय चण्डिकाम्॥ ५३वसुदेवजी बोले— हे भगवन्! हे करुणासागर! हे गुरो! यदि आप मुझपर स्नेह रखते हैं तो मेरे कल्याणके निमित्त आप ही उन भगवती चण्डिकाकी
अ० २ ]माहात्म्य४३
संस्कृतहिन्दी
निरुद्धः कंसगेहेऽहं न किञ्चित् कर्तुमुत्सहे।<br>अतस्त्वमेव दुःखाब्धेर्मामुद्धर महामते॥ ५४आराधना कर दें। मैं तो कंसके घरमें बन्दी रहनेके कारण कुछ भी कर सकनेमें समर्थ नहीं हूँ। अतः हे महामते! अब आप ही इस दुःखसागरसे मेरा उद्धार कीजिये॥ ५३-५४॥
इत्युक्तस्तु मया प्रीतः प्रोवाच मुनिपुङ्गवः।<br>वसुदेव तव प्रीत्या करिष्यामि हितं तव॥ ५५मेरे इस प्रकार कहनेपर वे मुनिश्रेष्ठ प्रसन्न होकर बोले—हे वसुदेव! आपकी प्रीतिके कारण मैं आपका कल्याण करूँगा॥ ५५॥
अथ गर्गमुनिः प्रीत्या मया सम्प्रार्थितोऽगमत्।<br>आरिराधयिषुदुर्गां विन्ध्याद्रिं ब्राह्मणैः सह॥ ५६मेरे द्वारा प्रीतिपूर्वक प्रार्थना किये जानेके उपरान्त गर्गमुनि देवी दुर्गाकी आराधनाकी इच्छासे ब्राह्मणोंके साथ विन्ध्यपर्वतपर चले गये॥ ५६॥
तत्र गत्वा जगद्धात्रीं भक्ताभीष्टप्रदायिनीम्।<br>आराधयामास मुनिर्जपपाठपरायणः॥ ५७वहाँ जाकर जप एवं पाठमें तत्पर रहते हुए गर्गमुनि जगत्की मातृस्वरूपा और भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली भगवतीकी आराधना करने लगे॥ ५७॥
ततः समाप्ते नियमे वागुवाचाशरीरिणी।<br>प्रसन्नाहं मुने कार्यसिद्धिस्तव भविष्यति॥ ५८जप-पूजनादि अनुष्ठानोंकी समाप्तिके पश्चात् आकाशवाणी हुई कि हे मुने! मैं प्रसन्न हो गयी हूँ, अतएव तुम्हारे कार्यकी सिद्धि होगी॥ ५८॥
भूभारहरणार्थाय मया सम्प्रेरितो हरिः।<br>वसुदेवस्य देवक्यां स्वांशेनावतरिष्यति॥ ५९[समस्त प्रकारके पाप एवं अनाचारस्वरूप] पृथ्वीके भारका नाश करनेके लिये मुझसे प्रेरणा प्राप्तकर स्वयं भगवान् विष्णु अपने अंशसे वसुदेवकी भार्या देवकीके गर्भसे अवतार लेंगे॥ ५९॥
कंसभीत्या तमादाय बालमानकदुन्दुभिः।<br>प्रापयिष्यति सद्यस्तु गोकुले नन्दवेश्मनि॥ ६०कंसके भयसे वसुदेवजी उस शिशुको लेकर शीघ्र ही गोकुलमें नन्दके घर पहुँचा देंगे और वहाँसे
यशोदातनयां नीत्वा स्वगृहे कंसभूपुजे।<br>दास्यत्यथ च तां हन्तुं कंस आक्षेप्स्यति क्षितौ॥ ६१यशोदाकी कन्याको लाकर अपने घरमें राजा कंसको दे देंगे। तब कंस उस कन्याको मारनेके लिये उसे पृथ्वीपर पटक देगा॥ ६०-६१॥
सा तद्धस्ताद् विनिर्गत्य सद्यो दिव्यवपुर्धरा।<br>मदंशभूता विन्ध्याद्रौ करिष्यति जगद्धितम्॥ ६२तदनन्तर उसके हाथसे छूटकर मेरी अंशस्वरूपा वह कन्या तत्क्षण अलौकिक रूप धारण करके विन्ध्यपर्वतपर चली जायगी और निरन्तर जगत्का कल्याण करेगी॥ ६२॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा प्रणम्य जगदम्बिकाम्।<br>गर्गा मुनिः प्रसन्नात्मा मथुरामागमत् पुरीम्॥ ६३इस प्रकार उस आकाशवाणीको सुनकर गर्गमुनि भगवती जगदम्बाको प्रणाम करके प्रसन्न मनसे मथुरापुरी आ गये॥ ६३॥
वरदानं महादेव्या गर्गाचार्यमुखादहम्।<br>श्रुत्वा सभार्यः सम्प्रीतः परां मुदमथागमम्॥ ६४आचार्य गर्गके मुखसे महादेवीके वरदानकी बात सुनकर मैं पत्नीसहित अत्यन्त प्रसन्न हुआ और परम आनन्दविभोर हो उठा॥ ६४॥

४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २

तदारभ्य परं जाने देवीमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>अधुनापि हि देवर्षे श्रुतं तव मुखाम्बुजात्॥ ६५तभीसे मैं देवीके अत्युत्तम माहात्म्यको जान रहा हूँ और हे देवर्षे ! आज भी आपके मुखारविन्दसे मैंने वही देवीमाहात्म्य सुना है॥ ६५॥
अतो भागवतं देव्यास्त्वमेव श्रावय प्रभो।<br>मद्भाग्यादेव देवर्षे सम्प्राप्तोऽसि दयानिधे॥ ६६अतः हे प्रभो ! अब आप ही मुझे श्रीमद्देवीभागवत सुनाइये। हे दयानिधान ! मेरे सौभाग्यसे ही आप यहाँ पधारे हुए हैं॥ ६६॥
वसुदेववचः श्रुत्वा नारदः प्रीतमानसः।<br>सुदिने शुभनक्षत्रे कथारम्भमथाकरोत्॥ ६७वसुदेवजीका वचन सुनकर प्रसन्न मनवाले नारदजीने शुभ दिन एवं शुभ नक्षत्रमें श्रीमद्देवीभागवतकी कथा आरम्भ की॥ ६७॥
कथाविघ्नविघातार्थं द्विजा जेपुर्नवाक्षरम्।<br>मार्कण्डेयपुराणोक्तं पेठुर्देव्याः स्तवं तथा॥ ६८कथामें आनेवाली विघ्न-बाधाओंके शमनार्थ ब्राह्मण देवीके नवाक्षर (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे)-मन्त्रका जप तथा मार्कण्डेयपुराणमें वर्णित देवीस्तोत्रका पाठ करने लगे॥ ६८॥
प्रथमस्कन्धमारभ्य श्रीनारदमुखोद्गतम्।<br>शुश्राव वसुदेवश्च भक्त्या भागवतामृतम्॥ ६९प्रथम स्कन्धके आरम्भसे ही वसुदेवजी देवर्षि नारदके मुखसे निःसृत अमृतरूप श्रीमद्देवीभागवत-पुराणका भक्तिपूर्वक श्रवण करने लगे॥ ६९॥
नवमेऽह्नि कथापूर्तौ पुस्तकं वाचकं तथा।<br>प्रसन्नः पूजयामास वसुदेवो महामनाः॥ ७०नौवें दिन कथाकी समाप्ति होनेपर महामनस्वी वसुदेवजीने श्रीमद्देवीभागवतग्रन्थ तथा कथावाचक दोनोंकी प्रसन्नतापूर्वक पूजा की॥ ७०॥
अथ तत्र बिलस्यान्तः कृष्णाजाम्बवतोर्मृधे।<br>कृष्णमुष्टिविनिष्पातश्लथाङ्गो जाम्बवानभूत्॥ ७१उधर कन्दरामें श्रीकृष्ण तथा जाम्बवान्के बीच चल रहे युद्धमें श्रीकृष्णके मुष्टिकाप्रहारोंसे जाम्बवान्का शरीर अत्यन्त शिथिल पड़ गया था॥ ७१॥
अथागतस्मृतिः सोऽपि भगवन्तं प्रणम्य च।<br>उवाच परया भक्त्या स्वापराधं क्षमापयन्॥ ७२उसी समय जाम्बवान्‌को भी पूर्वकालकी घटनाएँ याद आ गयीं और भगवान् श्रीकृष्णको परम भक्तिके साथ प्रणाम करके अपने अपराधके लिये क्षमा-याचना करते हुए उसने श्रीकृष्णसे कहा—अब मुझे
ज्ञातोऽसि रघुवर्यस्त्वं यद्रोषात् सरितांपतिः।<br>क्षोभं जगाम लङ्का च रावणः सानुगो हतः॥ ७३ज्ञात हो गया कि आप रघुश्रेष्ठ श्रीराम ही हैं, जिनके भयंकर कोपसे सागर तथा लंकानगरी—दोनों क्षुब्ध हो गये थे और रावण अपने बन्धु-बान्धवोंसहित मारा गया था॥ ७२-७३॥
स एवासि भवान् कृष्ण मद्दौरात्म्यं क्षमस्व भोः।<br>ब्रूहि यत् करणीयं मे भृत्योऽहं तव सर्वथा॥ ७४हे श्रीकृष्ण! वे राम आप ही हैं, अतः मेरी धृष्टताको क्षमा करें। मैं आपका सर्वथा सेवक हूँ, अतएव मेरेयोग्य जो भी कार्य हो, उसके लिये मुझे आदेश दीजिये॥ ७४॥
श्रुत्वा जाम्बवतो वाचमब्रवीज्जगदीश्वरः।<br>मणिहेतोरिह प्राप्ता वयमृक्षपते बिलम्॥ ७५जाम्बवान्का वचन सुनकर जगत्पति श्रीकृष्ण बोले—हे ऋक्षराज! मणि प्राप्त करनेके लिये हमलोग इस कन्दरामें आये हुए हैं॥ ७५॥

अ० ३ ] माहात्म्य ४५

अ० ३ ] माहात्म्य ४५

ऋक्षराजस्ततः प्रीत्या कन्यां जाम्बवतीं निजाम्।<br>ददौ कृष्णाय सम्पूज्य स्यमन्तकमणिं तथा॥ ७६तत्पश्चात् ऋक्षराज जाम्बवान्‌ने श्रीकृष्णकी विधिवत् पूजा करके स्यमन्तकमणि तथा अपनी पुत्री जाम्बवती उन्हें प्रसन्नतापूर्वक अर्पित कर दी॥ ७६॥
स तां पत्नीं समादाय मणिं कण्ठे तथादधत्।<br>अभिमन्त्र्यर्क्षराजञ्च प्रतस्थे द्वारकां प्रति॥ ७७श्रीकृष्णने जाम्बवतीको पत्नीके रूपमें अंगीकार करके मणिको गलेमें धारण कर लिया और ऋक्षराज जाम्बवान्‌से विदा लेकर वे द्वारकापुरीके लिये प्रस्थित हुए॥ ७७॥
कथासमाप्तिदिवसे वसुदेव उदारधीः।<br>ब्राह्मणान् भोजयामास दक्षिणाभिरतोषयत्॥ ७८उधर द्वारकामें उदारहृदय श्रीवसुदेवजीने श्रीमद्देवीभागवतपुराण-कथाकी समाप्तिके दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराया तथा नानाविध दक्षिणाओंसे उन्हें सन्तुष्ट किया॥ ७८॥
आशीर्वाचं प्रयुञ्जाना द्विजा यत्समये हरिः।<br>आजगाम क्षणे तस्मिन् पत्न्या सह मणिं दधत्॥ ७९जिस समय वे ब्राह्मण वसुदेवको आशीर्वचन प्रदान कर रहे थे, उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण मणि धारण किये हुए पत्नी जाम्बवतीके साथ वहाँ आ पहुँचे॥ ७९॥
भार्यया सहितं कृष्णं वसुदेवपुरोगमाः।<br>दृष्ट्वा हर्षाश्रुपूर्णाक्षाः समवापुः परां मुदम्॥ ८०भार्यासहित भगवान् श्रीकृष्णको देखकर वसुदेवजी तथा उपस्थित जनसमूहकी आँखें हर्षातिरेकके अश्रुसे परिपूर्ण हो गयीं और वे परम आनन्दित हुए॥ ८०॥
देवर्षिर्नारदश्चाथ कृष्णागमनहर्षितः।<br>आमन्त्र्य वसुदेवं च कृष्णं ब्रह्मसभां ययौ॥ ८१देवर्षि नारद भी श्रीकृष्णके आगमनसे हर्षित हुए और उन्होंने वसुदेवजी तथा श्रीकृष्णसे विदा लेकर ब्रह्मसभाके लिये प्रस्थान किया॥ ८१॥
हरिचरितमिदं यत्कीर्तितं दुर्यशोघ्नं<br>पठति विमलभक्त्या शुद्धचित्तः शृणोति।<br>स भवति सुखपूर्णः सर्वदा सिद्धकामो<br>जगति च वपुषोऽन्ते मुक्तिमार्गं लभेच्च॥ ८२जो मनुष्य निष्कपट भक्ति एवं शुद्ध हृदयसे भगवान्‌के इस विख्यात तथा कलंकनाशक चरित्रका पाठ एवं श्रवण करता है, वह पूर्ण सुखी हो जाता है, जगत्‌में उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं तथा मृत्युके अनन्तर वह मोक्षपद प्राप्त करता है॥ ८२॥

इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये वसुदेवस्य देवीभागवतनवाह-
श्रवणात्पुत्रप्राप्तिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥


### अथ तृतीयोऽध्यायः
#### श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें राजा सुद्युम्नकी कथा

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| **सूत उवाच**<br>अथेतिहासमन्यच्च शृणुध्वं मुनिसत्तमाः।<br>देवीभागवतस्यास्य माहात्म्यं यत्र गीयते॥ १ | **सूतजी बोले—** हे मुनिवरो! अब आपलोग एक अन्य इतिहास सुनिये, जिसमें इस देवीभागवतके माहात्म्यका वर्णन किया गया है॥ १॥ |
| एकदा कुम्भयोनिस्तु लोपामुद्रापतिर्मुनिः।<br>गत्वा कुमारमभ्यर्च्य पप्रच्छ विविधाः कथाः॥ २ | एक बार कुम्भयोनि लोपामुद्रापति महर्षि अगस्त्यने कुमार कार्तिकेयके पास जाकर उनकी भलीभाँति पूजा करके उनसे विविध प्रकारकी बातें पूछीं॥ २॥ |
४६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३
स तस्मै भगवान् स्कन्दः कथयामास भूरिशः।<br>दानतीर्थव्रतादीनां माहात्म्योपचिताः कथाः॥ ३<br>वाराणस्याश्च माहात्म्यं मणिकर्णीभवं तथा।<br>गङ्गायाश्चापि तीर्थानां वर्णितं बहुविस्तरम्॥ ४भगवान् कार्तिकेयने दान-तीर्थ-व्रतादिके माहात्म्यसे परिपूर्ण अनेक कथाओंका वर्णन उनसे किया। उन्होंने वाराणसी, मणिकर्णिका, गंगा तथा अनेक तीर्थोंके माहात्म्यका अत्यन्त विस्तारपूर्वक वर्णन किया॥ ३-४॥
श्रुत्वाथ स मुनिः प्रीतः कुमारं भूरिवर्चसम्।<br>पुनः पप्रच्छ लोकानां हितार्थं कुम्भसम्भवः॥ ५उसे सुनकर अगस्त्यमुनि परम प्रसन्न हुए और उन्होंने महातेजसम्पन्न कुमार कार्तिकेयसे लोक-कल्याणके लिये पुनः पूछा॥ ५॥
अगस्त्य उवाच<br>भगवंस्तारकाराते देवीभागवतस्य तु।<br>माहात्म्यं श्रवणे तस्य विधिं चापि वद प्रभो॥ ६अगस्त्यजी बोले—हे तारकरिपु! हे भगवन्! हे प्रभो! आप मुझे देवीभागवतके माहात्म्य तथा उसके श्रवणकी विधि भी बतायें॥ ६॥
देवीभागवतं नाम पुराणं परमोत्तमम्।<br>त्रैलोक्यजननी साक्षाद् गीयते यत्र शाश्वती॥ ७श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण सभी पुराणोंमें अतिश्रेष्ठ है, जिसमें तीनों लोकोंकी जननी साक्षात् सनातनी भगवतीकी महिमा गायी गयी है॥ ७॥
स्कन्द उवाच<br>श्रीभागवतमाहात्म्यं को वक्तुं विस्तरात् क्षमः।<br>शृणु संक्षेपतो ब्रह्मन् कथयिष्यामि साम्प्रतम्॥ ८कार्तिकेय बोले—हे ब्रह्मन्! श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यको विस्तारपूर्वक कहनेमें कौन समर्थ है? मैं इस समय संक्षेपमें इसे कहूँगा, आप सुनिये॥ ८॥
या नित्या सच्चिदानन्दरूपिणी जगदम्बिका।<br>साक्षात् समाश्रिता यत्र भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी॥ ९जो शाश्वती, सच्चिदानन्दस्वरूपा, भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली जगदम्बा हैं, वे स्वयं इस पुराणमें विराजमान रहती हैं॥ ९॥
अतस्तद्वाङ्मयी मूर्तिर्देवीभागवते मुने।<br>पठनाच्छ्रवणाद्यस्य न किञ्चिदिह दुर्लभम्॥ १०अतएव हे मुने! यह श्रीमद्देवीभागवत उन जगदम्बिकाकी वाङ्मयी मूर्ति है, जिसके पठन एवं श्रवणसे इस लोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥ १०॥
आसीद्विवस्वतः पुत्रः श्राद्धदेव इति श्रुतः।<br>सोऽनपत्योऽकरोदिष्टं वसिष्ठानुमतो नृपः॥ ११विवस्वान्‌के एक पुत्र हुए, जो श्राद्धदेव नामसे प्रसिद्ध थे। सन्तानरहित होनेके कारण उन राजा श्राद्धदेवने वसिष्ठमुनिकी अनुमतिसे पुत्रेष्टि यज्ञ किया॥ ११॥
होतारं प्रार्थयामास श्रद्धाथ दयिता मनोः।<br>कन्या भवतु मे ब्रह्मंस्तथोपायो विधीयताम्॥ १२तत्पश्चात् मनु श्राद्धदेवकी भार्या श्रद्धाने यज्ञके होतासे प्रार्थना की—हे ब्रह्मन्! आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे मुझे कन्याकी प्राप्ति हो॥ १२॥
मनसा चिन्तयन् होता कन्यामेवाजुहोद्धविः।<br>ततस्तद्व्यभिचारेण कन्येला नाम चाभवत्॥ १३अतः होताने मनमें कन्या-प्राप्तिका संकल्प करते हुए आहुति डाली और उसके विपरीत भावके फलस्वरूप एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम 'इला' रखा गया॥ १३॥
अथ राजा सुतां दृष्ट्वा प्रोवाच विमना गुरुम्।<br>कथं सङ्कल्पवैषम्यमिह जातं प्रभो तव॥ १४इसके बाद पुत्रीको देखकर उदास मनवाले राजा श्राद्धदेवने गुरु वसिष्ठसे कहा—हे प्रभो! पुत्र-प्राप्तिके आपके संकल्पके विपरीत यह कन्या कैसे उत्पन्न हो गयी?॥ १४॥