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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

| अ० २१ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६४५ | | :--- | :--- |

| ततो देवा विनिर्धूता हृतराज्या हृतश्रियः।<br>सन्त्यज्य नन्दनं सर्वे निर्ययुर्गिरिगह्वरे ॥ ५१ | तब [असुरोंके द्वारा] तिरस्कृत और राज्य छिन जानेके कारण नष्ट शोभावाले सभी देवता नन्दनवन छोड़कर पर्वतोंकी गुफाओंमें चले गये ॥ ५१ ॥ | | हृताधिकारास्ते सर्वे बभ्रमुर्विजने वने।<br>निरालम्बा निराधारा निस्तेजस्का निरायुधाः ॥ ५२<br><br>विचेरुरमराः सर्वे पर्वतानां गुहासु च।<br>उद्यानेषु च शून्युषु नदीनां गह्वरेषु च ॥ ५३ | अधिकारसे वंचित होकर वे सब निर्जन वनमें भटकने लगे। अब उनका कोई सहारा नहीं रहा, उनके रहनेकी जगह नहीं रही, वे तेजहीन और आयुधविहीन हो चुके थे। इस प्रकार सभी देवता पर्वतोंकी कन्दराओं, निर्जन उद्यानों और नदियोंकी घाटियोंमें विचरण करने लगे ॥ ५२-५३ ॥ | | न प्रापुस्ते सुखं क्वापि स्थानभ्रष्टा विचेतसः।<br>लोकपाला महाराज दैवाधीनं सुखं किल ॥ ५४ | हे महाराज! स्थानभ्रष्ट हो जानेके कारण उन बेचारे लोकपालोंको कहीं भी सुख नहीं मिल रहा था, और फिर यह सुनिश्चित भी है कि सुख सदा प्रारब्धके अधीन रहता है ॥ ५४ ॥ | | बलवन्तो महाभागा बहुज्ञा धनसंयुताः।<br>काले दुःखं तथा दैन्यमाप्नुवन्ति नराधिप ॥ ५५ | हे नराधिप! बलशाली, बड़े भाग्यवान्, महान् ज्ञानी तथा धनसम्पन्न व्यक्ति भी विपरीत समय उपस्थित होनेपर दुःख तथा कष्ट पाते हैं ॥ ५५ ॥ | | चित्रमेतन्महाराज कालस्यैव विचेष्टितम्।<br>यः करोति नरं तावद्राजानं भिक्षुकं ततः ॥ ५६<br><br>दातारं याचकं चैव बलवन्तं तथाबलम्।<br>पण्डितं विकलं कामं शूरं चातीव कातरम् ॥ ५७ | हे महाराज! उस कालकी गति बड़ी ही विचित्र होती है, जो एक साधारण मनुष्यको राजा बना देता है और उसके बाद राजाको भिखारी बना देता है। वही काल दाताको याचक, बलवान्‌को निर्बल, पण्डितको अज्ञानी और वीरको अत्यन्त कायर बना देता है ॥ ५६-५७ ॥ | | मखानाञ्च शतं कृत्वा प्राप्येन्द्रासनमुत्तमम्।<br>पुनर्दुःखं परं प्राप्तं कालस्य गतिरीदृशी ॥ ५८ | सौ अश्वमेधयज्ञ करनेके बाद सर्वोत्कृष्ट इन्द्रासन प्राप्त करके भी बादमें समयके फेरसे इन्द्रको असीम कष्ट उठाना पड़ा था—कालकी ऐसी विचित्र गति होती है ॥ ५८ ॥ | | कालः करोति धर्मिष्ठं पुरुषं ज्ञानसंयुतम्।<br>तमेवातीव पापिष्ठं ज्ञानलेशविवर्जितम् ॥ ५९ | समय ही मनुष्यको धर्मात्मा तथा ज्ञानवान् बनाता है और फिर उसी व्यक्तिको पापी तथा अत्यल्प ज्ञानसे भी हीन बना देता है ॥ ५९ ॥ | | न विस्मयोऽत्र कर्तव्यः सर्वथा कालचेष्टिते।<br>ब्रह्मविष्णुहरादीनामपीदृक्कष्टचेष्टितम् ॥ ६०<br><br>विष्णुर्जननमाप्नोति सूकरादिषु योनिषु।<br>हरः कपाली सञ्जातः कालेनैव बलीयसा ॥ ६१ | अतः कालकी इस अद्भुत गतिके विषयमें कुछ भी आश्चर्य नहीं करना चाहिये। यही काल ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदिको भी इसी प्रकार संकटमें डाल देता है। बलवान् कालके ही प्रभावसे भगवान् विष्णुको सूकर आदि योनियोंमें जन्म लेना पड़ा और शिवजीको कपाली होना पड़ा ॥ ६०-६१ ॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
शुम्भनिशुम्भद्वारा स्वर्गविजयवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥

६४६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २२
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अथ द्वाविंशोऽध्यायः

देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति और उनका प्राकट्य

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व्यास उवाचव्यासजी बोले—
पराजिताः सुराः सर्वे राज्यं शुम्भः शशास ह।<br>एवं वर्षसहस्रं तु जगाम नृपसत्तम॥ १हे नृपश्रेष्ठ! सभी देवता पराजित हो गये। इसके बाद शुम्भ राज्यपर शासन करने लगा। इस प्रकार एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये॥ १॥
भ्रष्टराज्यास्ततो देवाश्चिन्तामापुः सुदुस्तराम्।<br>गुरुं दुःखातुरास्ते तु पप्रच्छुरिदमादृताः॥ २तत्पश्चात् राज्यच्युत होनेके कारण देवता महान् दुस्सह चिन्तामें पड़ गये। दुःखसे व्याकुल हुए वे देवता गुरु बृहस्पतिसे आदरपूर्वक यह पूछने लगे॥ २॥
किं कर्तव्यं गुरो ब्रूहि सर्वज्ञस्त्वं महामुनिः।<br>उपायोऽस्ति महाभाग दुःखस्य विनिवृत्तये॥ ३<br><br>उपचारपरा नूनं वेदमन्त्राः सहस्रशः।<br>वाञ्छितार्थकरा नूनं सूत्रैः संलक्षिताः किल॥ ४<br><br>इष्टयो विविधाः प्रोक्ताः सर्वकामफलप्रदाः।<br>ताः कुरुष्व मुने नूनं त्वं जानासि च तत्क्रियाः॥ ५हे गुरो! अब हम क्या करें, आप हमें बतायें। आप सर्वज्ञ महामुनि हैं। हे महाभाग! दुःखकी निवृत्तिका उपाय भी तो होता है। हजारों ऐसे वैदिक मन्त्र हैं, जो उपचारोंसे परिपूर्ण हैं और सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाले हैं। सूत्रोंने उनका भलीभाँति निदर्शन भी किया है। सभी वांछित फल प्रदान करनेवाले अनेक प्रकारके यज्ञ भी बताये गये हैं। हे मुने! आप उनका अनुष्ठान कीजिये; क्योंकि आप उनकी क्रिया-विधिको भलीभाँति जानते हैं॥ ३—५॥
विधिः शत्रुविनाशाय यथोद्दिष्टः सदागमे।<br>तं कुरुष्वाद्य विधिवद्यथा नो दुःखसंक्षयः॥ ६<br><br>भवेदांगिरसाद्यैव तथा त्वं कर्तुमर्हसि।<br>दानवानां विनाशाय अभिचारं यथामति॥ ७शत्रुओंके विनाशके लिये वेदमें जैसा उपाय बताया गया है, अब आप विधिपूर्वक उसका अनुष्ठान कीजिये, जिससे हमारे दुःखका पूर्णरूपसे नाश हो जाय। हे आंगिरस! दानवोंके विनाशके लिये आप अपनी बुद्धिके अनुसार आज ही अभिचारकर्म आरम्भ करनेकी कृपा कीजिये॥ ६-७॥
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बृहस्पतिरुवाच | बृहस्पति बोले—

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बृहस्पतिरुवाचबृहस्पति बोले—
सर्वे मन्त्राश्च वेदोक्ता दैवाधीनफलाश्र्च ते।<br>न स्वतन्त्राः सुराधीश तथैकान्तफलप्रदाः॥ ८हे देवराज! वेदोंमें बताये गये सभी मन्त्र प्रारब्धके अनुसार ही फल प्रदान करनेवाले हैं। वे स्वतन्त्र नहीं हैं और नियमके अनुसार ही फल प्रदान करते हैं॥ ८॥
मन्त्राणां देवता यूयं ते तु दुःखैकभाजनम्।<br>जाताः स्म कालयोगेन किं करोमि प्रसाधनम्॥ ९उन मन्त्रोंके देवता तो आप ही लोग हैं। जब आपलोग स्वयं समयके फेरसे कष्टमें पड़े हुए हैं तो मैं कौन-सा उपाय करूँ?॥ ९॥
इन्द्राग्निवरुणादीनां यजनं यज्ञकर्मसु।<br>ते यूयं विपदं प्राप्ताः करिष्यन्ति किमिष्टयः॥ १०यज्ञ-कर्मोंमें इन्द्र, अग्नि, वरुण आदिकी पूजा की जाती है और वे आप सब देवता ही स्वयं विपत्ति भोग रहे हैं, तब यज्ञ क्या कर सकेंगे?॥ १०॥
अवश्यम्भाविभावानां प्रतीकारो न विद्यते।<br>उपायस्त्वथ कर्तव्य इति शिष्टानुशासनम्॥ ११अवश्यम्भावी घटनाओंका कोई प्रतीकार नहीं है; फिर भी [संकटसे बचनेके लिये] उपाय तो करना ही चाहिये, यह शिष्ट पुरुषोंका उपदेश है॥ ११॥
अ० २२ ]पञ्चम स्कन्ध६४७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दैवं हि बलवत्केचित्प्रवदन्ति मनीषिणः।<br>उपायवादिनो दैवं प्रवदन्ति निरर्थकम्॥ १२<br>दैवं चैवाप्युपायश्च द्वावेवाभिमतौ नृणाम्।<br>केवलं दैवमाश्रित्य न स्थातव्यं कदाचन॥ १३<br>उपायः सर्वथा कार्यों विचार्य स्वधिया पुनः।<br>तस्माद् ब्रवीमि वः सर्वान्संविचार्य पुनः पुनः॥ १४कुछ विद्वान् कहते हैं कि दैव सबसे बलवान् होता है और उपायवादी लोग दैवको निरर्थक बताते हैं, किंतु मनुष्योंके लिये दैव और उपाय दोनों ही आवश्यक माने गये हैं। मात्र दैवका आश्रय लेकर कभी भी बैठे नहीं रहना चाहिये। अपनी बुद्धिसे विचार करके सम्यक् रूपसे प्रयत्न करनेमें तत्पर हो जाना चाहिये। इसलिये भलीभाँति बार-बार सोच-विचारकर मैं आप सभीको उपाय बता रहा हूँ॥ १२—१४॥
पुरा भगवती तुष्टा जघान महिषासुरम्।<br>युष्माभिस्तु स्तुता देवी वरदानं ददावथ॥ १५<br>आपदं नाशयिष्यामि संस्मृता वा सदैव हि।<br>यदा यदा वो देवेशा आपदो दैवसम्भवाः॥ १६<br>प्रभवन्ति तदा कामं स्मर्तव्याहं सुरैः सदा।<br>स्मृताहं नाशयिष्यामि युष्माकं परमापदः॥ १७पूर्वकालमें जब भगवती जगदम्बाने आपलोगोंपर प्रसन्न होकर महिषासुरका वध किया था, उस समय आपलोगोंके स्तुति करनेपर उन्होंने यह वरदान दिया था—‘आपलोगोंके स्मरण करनेपर मैं सदा आपलोगोंकी विपत्ति दूर करूँगी। हे देवेश्वरो! जब-जब आपलोगोंपर दैव-जन्य आपदाएँ आयें, तब-तब आप देवतागण मेरा ध्यान कीजियेगा, स्मरण करते ही मैं आपलोगोंकी बड़ी-से-बड़ी विपत्तियोंका नाश कर दूँगी’॥ १५—१७॥
तस्माद्धिमाचले गत्वा पर्वते सुमनोहरे।<br>आराधनं चण्डिकायाः कुरुध्वं प्रेमपूर्वकम्॥ १८<br>मायाबीजविधानज्ञास्तत्पुरश्चरणे रताः।<br>जानाम्यहं योगबलात्प्रसन्ना सा भविष्यति॥ १९अतः अब आपलोग परम रमणीक हिमालय-पर्वतपर जाकर प्रेमपूर्वक भगवती चण्डिकाकी आराधना कीजिये। आपलोग मायाबीजके विधानके ज्ञाता हैं, उसीके पुरश्चरणमें तत्पर हो जाइये। मैं जानता हूँ कि इस अनुष्ठानके प्रभावसे वे भगवती प्रसन्न हो जायेंगी॥ १८-१९॥
दुःखस्यान्तोऽद्य युष्माकं दृश्यते नात्र संशयः।<br>तस्मिञ्छैले सदा देवी तिष्ठतीति मया श्रुतम्॥ २०<br>स्तुता सम्पूजिता सद्यो वाञ्छितार्थान् प्रदास्यति।<br>निश्चयं परमं कृत्वा गच्छध्वं वै हिमालयम्॥ २१<br>सुराः सर्वाणि कार्याणि सा वः कामं विधास्यति।अब आपलोगोंके दुःखका अन्त दिखायी पड़ रहा है; इसमें सन्देह नहीं है। मैंने सुना है कि वे भगवती उस हिमालयपर्वतपर सदा विराजमान रहती हैं। उनकी स्तुति तथा विधिवत् पूजा करनेपर वे शीघ्र ही आपलोगोंको वांछित फल प्रदान करेंगी। अतः हे देवताओ! आपलोग दृढ़ निश्चय करके हिमालयपर्वतपर जाइये; वे भगवती आपलोगोंका कार्य अवश्य सिद्ध कर देंगी॥ २०—२१ १/२॥
व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा देवास्ते प्रययुर्गिरिम्॥ २२<br>हिमालयं महाराज देवीध्यानपरायणाः।<br>मायाबीजं हृदा नित्यं जपन्तः सर्व एव हि॥ २३<br>नमश्चक्रुर्महामायां भक्तानामभयप्रदाम्।<br>तुष्टुवुः स्तोत्रमन्त्रैश्च भक्त्या परमया युताः॥ २४व्यासजी बोले— हे महाराज! उनका वचन सुनकर देवता हिमालयपर्वतपर चले गये। वहाँ देवीके ध्यानमें लीन होकर एकाग्र मनसे निरन्तर मायाबीज-मन्त्रका जप करते हुए उन सब देवताओंने भक्तोंके लिये अभयदायिनी महामाया भगवतीको प्रणाम किया और पूर्णभक्तिसे युक्त होकर स्तोत्र-मन्त्रोंसे वे इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे॥ २२—२४॥

६४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २२

६४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २२

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नमो देवि विश्वेश्वरि प्राणनाथे<br>सदानन्दरूपे सुरानन्ददे ते।<br>नमो दानवान्तप्रदे मानवाना-<br>मनेकार्थदे भक्तिगम्यस्वरूपे ॥ २५हे विश्वेश्वरि! हे प्राणोंकी स्वामिनि! सदा आनन्दरूपमें रहनेवाली तथा देवताओंको आनन्द प्रदान करनेवाली हे देवि! आपको नमस्कार है। दानवोंका अन्त करनेवाली, मनुष्योंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाली तथा भक्तिके द्वारा अपने रूपका दर्शन देनेवाली हे देवि! आपको नमस्कार है॥ २५॥
न ते नामसंख्यां न ते रूपमीदृ-<br>क्तथा कोऽपि वेदादिदेवस्वरूपे।<br>त्वमेवासि सर्वेषु शक्तिस्वरूपा<br>प्रजासृष्टिसंहारकाले सदैव ॥ २६हे आदिदेवस्वरूपिणि! आपके नामोंकी निश्चित संख्या तथा आपके इस रूपको कोई भी नहीं जान सकता। सबमें आप ही विराजमान हैं। जीवोंके सृजन और संहारकालमें शक्तिस्वरूपसे सदा आप ही कार्य करती हैं॥ २६॥
स्मृतिस्त्वं धृतिस्त्वं त्वमेवासि बुद्धि-<br>र्जरा पुष्टितुष्टी धृतिः कान्तिशान्ती।<br>सुविद्या सुलक्ष्मीर्गतिः कीर्तिमेधे<br>त्वमेवासि विश्वस्य बीजं पुराणम् ॥ २७आप ही स्मृति, धृति, बुद्धि, जरा, पुष्टि, तुष्टि, धृति, कान्ति, शान्ति, सुविद्या, सुलक्ष्मी, गति, कीर्ति, मेधा और विश्वकी पुरातन मूल प्रकृति हैं॥ २७॥
यदा यैः स्वरूपैः करोषीह कार्यं<br>सुराणां च तेभ्यो नमामोऽद्य शान्त्यै।<br>क्षमा योगनिद्रा दया त्वं विवक्षा<br>स्थिता सर्वभूतेषु शस्तैः स्वरूपैः ॥ २८आप जिस समय जिन स्वरूपोंसे देवताओंका कार्य सम्पन्न करती हैं, हम शान्तिके लिये आपके उन स्वरूपोंको नमस्कार करते हैं। आप ही क्षमा, योगनिद्रा, दया तथा विवक्षा—इन कल्याणकारी रूपोंसे सभी जीवोंमें निवास करती हैं॥ २८॥
कृतं कार्यमादौ त्वया यत्सुराणां<br>हतोऽसौ महारिर्मदान्धो हयारिः।<br>दया ते सदा सर्वदेवेषु देवि<br>प्रसिद्धा पुराणेषु वेदेषु गीता॥ २९पूर्वकालमें आपने हम देवताओंका कार्य किया था जो कि महान् शत्रु मदान्ध महिषासुरका वध कर डाला था। हे देवि! सभी देवताओंपर आपकी दया सदैव रहती है, आपकी दया पूर्ण प्रसिद्ध है और पुराणों तथा वेदोंमें भी उसका वर्णन किया गया है॥ २९॥
किमत्रास्ति चित्रं यदम्बा सुतं स्वं<br>मुदा पालयेत्पोषयेत्सम्यगेव।<br>यतस्त्वं जनित्री सुराणां सहाया<br>कुरुष्वैकचित्तेन कार्यं समग्रम् ॥ ३०इसमें आश्चर्यकी क्या बात; क्योंकि माता प्रसन्नतापूर्वक सम्यक् प्रकारसे अपने पुत्रका पालन-पोषण करती ही है। क्योंकि आप देवताओंकी जननी हैं, अतः उनका सहायक बनकर एकाग्र मनसे हमलोगोंका सम्पूर्ण कार्य सम्पन्न करें॥ ३०॥
न वा ते गुणानामियत्तां स्वरूपं<br>वयं देवि जानीमहे विश्ववन्द्ये।<br>कृपापात्रमित्येव मत्वा तथास्मा-<br>न्भयेभ्यः सदा पाहि पातुं समर्थे॥ ३१हे देवि! हे विश्ववन्द्ये! हमलोग न आपके गुणोंकी सीमा जानते हैं और न आपका स्वरूप ही जानते हैं। अतः रक्षा करनेमें समर्थ हे देवि! हमें केवल अपना कृपापात्र मानकर आप भयोंसे निरन्तर हमारी रक्षा करती रहें॥ ३१॥
अ० २२ ]पञ्चम स्कन्ध६४९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विना बाणपातैर्विना मुष्टिघातै-<br>र्विना शूलखड्गैर्विना शक्तिदण्डैः ।<br>रिपूहन्तुमेवासि शक्ता विनोदा-<br>त्तथापीह लोकोपकाराय लीला ॥ ३२यद्यपि बिना बाण चलाये; बिना मुष्टिप्रहार किये और बिना त्रिशूल, तलवार, बर्छी, दण्ड आदिका प्रयोग किये भी आप विनोदपूर्वक शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ हैं, फिर भी जगत्के उपकारके लिये ही आपकी यह लीला दृष्टिगोचर होती है ॥ ३२ ॥
इदं शाश्वतं नैव जानन्ति मूढा<br>न कार्यं विना कारणं सम्भवेद्वा ।<br>वयं तर्कयामोऽनुमानं प्रमाणं<br>त्वमेवासि कर्तास्य विश्वस्य चेति ॥ ३३आपका यह रूप सनातन है—इस रहस्यको अविवेकी लोग नहीं जानते हैं। [हे माता!] बिना कारणके कोई कार्य नहीं होता। अतः अनुमान और प्रमाणके आधारपर हम यही जानते हैं कि इस विश्वकी रचना करनेवाली आप ही हैं ॥ ३३ ॥
अजः सृष्टिकर्ता मुकुन्दोऽवितायं<br>हरो नाशकद्वै पुराणे प्रसिद्धः ।<br>न किं त्वत्प्रसूतास्त्रयस्ते युगादौ<br>त्वमेवासि सर्वस्य तेनैव माता ॥ ३४ब्रह्मा सृष्टिकर्ता, विष्णु पालनकर्ता और शंकर संहारकर्ताके रूपमें पुराणमें प्रसिद्ध हैं, किंतु क्या वे तीनों देव आपसे उत्पन्न नहीं हुए हैं? युगके प्रारम्भमें केवल आप ही रहती हैं, अतः आप ही सबकी माता हैं ॥ ३४ ॥
त्रिभिस्त्वं पुराराधिता देवि दत्ता<br>त्वया शक्तिरुग्रा च तेभ्यः समग्रा ।<br>त्वया संयुतास्ते प्रकुर्वन्ति कामं<br>जगत्पालनोत्पत्तिसंहारमेव ॥ ३५हे देवि! पूर्वकालमें इन तीनोंने आपकी आराधना की थी, तब आपने उन्हें अपनी समस्त प्रबल शक्ति प्रदान की थी। वास्तवमें उसी शक्तिसे सम्पन्न होकर वे जगत्का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं ॥ ३५ ॥
ते किं न मन्दमतयो यतयो विमूढा-<br>स्त्वां ये न विश्वजननीं समुपाश्रयन्ति ।<br>विद्यां परां सकलकामफलप्रदां तां<br>मुक्तिप्रदां विबुधवृन्दसुवन्दिताङ्घ्रिम् ॥ ३६जो संन्यासी लोग विश्वकी जननी, परम विद्या-स्वरूपिणी, समस्त वांछित फल प्रदान करनेवाली, मुक्तिदायिनी तथा सभी देवताओंसे वन्दित चरणोंवाली आप भगवतीकी उपासना नहीं करते, क्या वे मन्दबुद्धि तथा अज्ञानी नहीं हैं? ॥ ३६ ॥
ये वैष्णवाः पाशुपताश्च सौरा<br>दम्भास्त एव प्रतिभान्ति नूनम् ।<br>ध्यायन्ति न त्वां कमलाञ्च लज्जां<br>कान्तिं स्थितिं कीर्तिमथापि पुष्टिम् ॥ ३७विष्णु, शिव तथा सूर्यकी आराधना करनेवाले जो लोग कमला, लज्जा, कान्ति, स्थिति, कीर्ति और पुष्टि नामोंसे विख्यात आप भगवतीका ध्यान नहीं करते हैं, वे निश्चितरूपसे दम्भी प्रतीत होते हैं ॥ ३७ ॥
हरिहरादिभिरप्यथ सेविता<br>त्वमिह देववरैरसुरैस्तथा ।<br>भुवि भजन्ति न येऽल्पधियो नरा<br>जननि ते विधिना खलु वञ्चिताः ॥ ३८विष्णु और शंकर आदि श्रेष्ठ देवता तथा असुर भी आपकी पूजा करते हैं। अतः हे माता! इस जगत्में जो मन्दबुद्धि मनुष्य आपकी आराधना नहीं करते, निश्चय ही विधाताने उन्हें ठग लिया है ॥ ३८ ॥
जलधिजापदपङ्कजरञ्जनं<br>जतुरसेन करोति हरिः स्वयं ।<br>त्रिनयनोऽपि धराधरजाङ्घ्रिपं-<br>कजपरागनिषेवणतत्परः ॥ ३९भगवान् विष्णु अपने पास लक्ष्मीरूपमें विराजमान आप भगवतीके चरणकमलोंमें स्वयं महावर लगाते हैं। इसी प्रकार त्रिनेत्र भगवान् शिव भी अपने पास पार्वती-रूपमें विराजमान आप भगवतीके चरणकमलकी रजके सेवनमें निरन्तर तत्पर रहते हैं; तब अन्य
६५०श्रीमद्देवीभागवत[अ० २२

| किमपरस्य नरस्य कथानकै-<br>स्तव पदाब्जयुगं न भजन्ति के।<br>विगतरागगृहाश्च दयां क्षमां<br>कृतधियो मुनयोऽपि भजन्ति ते॥ ४० | मनुष्यकी बात ही क्या! आपके चरणकमलोंकी आराधना कौन नहीं करते? घर-गृहस्थीसे विरक्त बुद्धिमान् मुनिगण भी दया और क्षमारूपमें प्रतिष्ठित आप भगवतीकी उपासना करते हैं॥ ३९-४०॥ | | देवि त्वदङ्घ्रिभजने न जना रता ये<br>संसारकूपपतिताः पतिताः किलामी।<br>ते कुष्ठगुल्मशिरआधियुता भवन्ति<br>दारिद्र्यदैन्यसहिता रहिताः सुखौघैः॥ ४१ | हे देवि! जो लोग आपके चरणोंकी उपासनामें संलग्न नहीं रहते, उन्हें निश्चय ही इस संसाररूप अगाध कूपमें गिरना पड़ता है। वे पतित लोग कुष्ठ, गुल्म और शिरोरोगसे ग्रस्त रहते हैं, दरिद्रता तथा दीनतासे युक्त रहते हैं और सुखोंसे सदा वंचित रहते हैं॥ ४१॥ | | ये काष्ठभारवहने यवसावहारे<br>कार्ये भवन्ति निपुणा धनदारहीनाः।<br>जानीमहेऽल्पमतिभिर्भवदङ्घ्रिसेवा<br>पूर्वे भवे जननि तैर्न कृता कदापि॥ ४२ | हे माता! धन और स्त्रीसे रहित जो मनुष्य लकड़ीका बोझ ढोने और तृण आदिका वहन करनेमें लगे हैं, [उनके विषयमें] हम तो यही समझते हैं कि उन मन्दबुद्धि मनुष्योंने पूर्वजन्ममें आपके चरणोंकी उपासना कभी नहीं की॥ ४२॥ | | व्यास उवाच<br>एवं स्तुता सुरैः सर्वैरम्बिका करुणान्विता।<br>प्रादुर्बभूव तरसा रूपयौवनसंयुता॥ ४३<br><br>दिव्याम्बरधरा देवी दिव्यभूषणभूषिता।<br>दिव्यमाल्यसमायुक्ता दिव्यचन्दनचर्चिता॥ ४४<br><br>जगन्मोहनलावण्या सर्वलक्षणलक्षिता।<br>अद्वितीयस्वरूपा सा देवानां दर्शनं गता॥ ४५ | व्यासजी बोले— इस प्रकार समस्त देवताओंके स्तुति करनेपर अम्बिका करुणासे ओत-प्रोत होकर तुरंत प्रकट हो गयीं। [उस समय] वे भगवती रूप तथा यौवनसे सम्पन्न थीं, उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखा था, वे अलौकिक आभूषणोंसे अलंकृत थीं, दिव्य मालाओंसे सुशोभित हो रही थीं, दिव्य चन्दनसे अनुलिप्त थीं, जगत्को मोहित कर देनेवाले सौन्दर्यसे सम्पन्न थीं और समस्त शुभ लक्षणोंसे समन्वित थीं। इस प्रकार अद्वितीय स्वरूपवाली वे भगवती देवताओंके समक्ष प्रकट हुईं॥ ४३—४५॥ | | जाह्नव्यां स्नातुकामा सा निर्गता गिरिगुहरात्।<br>दिव्यरूपधरा देवी विश्वमोहनमोहिनी॥ ४६ | दिव्य रूप धारण करनेवाली तथा विश्वको मोह लेनेमें समर्थ कामदेवको भी मोहित करनेवाली वे भगवती गंगामें स्नान करनेकी अभिलाषासे पर्वतकी कन्दरासे बाहर निकली थीं॥ ४६॥ | | देवान्स्तुतिपरानाह मेघगम्भीरया गिरा।<br>प्रेमपूर्वं स्मितं कृत्वा कोकिलामञ्जुवादिनी॥ ४७ | कोकिलके समान मधुर बोलनेवाली भगवती प्रेमपूर्ण भावसे मुसकराकर स्तुति करनेमें संलग्न देवताओंसे मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहने लगीं॥ ४७॥ | | देव्युवाच<br>भो भोः सुरवराः कात्र भवद्भिः स्तूयते भृशम्।<br>किमर्थं ब्रूत वः कार्यं चिन्ताविष्टाः कुतः पुनः॥ ४८ | देवी बोलीं— हे श्रेष्ठ देवतागण! आपलोग यहाँपर इतनी बड़ी स्तुति किसलिये कर रहे हैं? आपलोग इस प्रकार चिन्तासे व्याकुल क्यों हैं? मुझे अपना कार्य बताइये॥ ४८॥ |

अ० २२ ]पञ्चम स्कन्ध६५१

| व्यास उवाच <br> तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्या मोहिता रूपसम्पदा। <br> प्रेमपूर्वं हृदुत्साहास्तामूचुः सुरसत्तमाः॥ ४९ | **व्यासजी बोले—**भगवतीका यह वचन सुनकर उनके रूप-वैभवसे मोहित श्रेष्ठ देवताओंका हृदय उत्साहसे परिपूर्ण हो गया, जिससे वे प्रेमपूर्वक उनसे कहने लगे॥ ४९॥ | | देवा ऊचुः <br> देवि स्तुमस्त्वां विश्वेशि प्रणताः स्म कृपार्णवे। <br> पाहि नः सर्वदुःखेभ्यः संविग्नान्दैत्यतापितान्॥ ५० | **देवता बोले—**जगत्‌को नियन्त्रणमें रखनेवाली हे देवि! हम आपकी स्तुति कर रहे हैं, हम आपके शरणागत हैं। हे कृपासिन्धो! दैत्योंसे सताये गये हम देवताओंकी सम्पूर्ण दुःखोंसे रक्षा कीजिये॥ ५०॥ | | पुरा त्वया महादेवि निहत्यासुरकण्टकम्। <br> महिषं नो वरो दत्तः स्मर्तव्याहं सदापदि॥ ५१ <br><br> स्मरणाद्दैत्यजां पीडां नाशयिष्याम्यसंशयम्। <br> तेन त्वं संस्मृता देवि नूनमस्माभिरित्यपि॥ ५२ | हे महादेवि! पूर्वकालमें देवताओंके लिये कंटक बने महिषासुरका वध करके आपने हमें वर प्रदान किया था—‘आपलोग संकटमें मुझे सदा याद कीजियेगा, स्मरण करते ही मैं दैत्योंके द्वारा आपलोगोंको पहुँचायी गयी पीड़ाका निःसन्देह नाश कर दूँगी।’ हे देवि! इसीलिये हमलोगोंने आपका स्मरण किया है॥ ५१-५२॥ | | अद्य शुम्भनिशुम्भौ द्वावसुरौ घोरदर्शनौ। <br> उत्पन्नौ विघ्नकर्तारावहन्त्यौ पुरुषैः किल॥ ५३ <br><br> रक्तबीजश्च बलवांश्चण्डमुण्डौ तथासुरौ। <br> एतैरन्यैश्च देवानां हृतं राज्यं महाबलैः॥ ५४ <br><br> गतिरन्या न चास्माकं त्वमेवासि महाबले। <br> कुरु कार्यं सुराणां वै दुःखितानां सुमध्यमे॥ ५५ | इस समय शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दानव उत्पन्न हुए हैं, जो देखनेमें महाभयंकर हैं। वे [हमारे कार्योंमें] विघ्न डाला करते हैं। वे पुरुषोंसे सर्वथा अवध्य हैं। ऐसे ही बलशाली दानव रक्तबीज तथा चण्ड और मुण्ड भी हैं। इन सभी तथा अन्य महाबली दानवोंने हम देवताओंका राज्य छीन लिया है। हे महाबले! हमलोगोंका दूसरा कोई अवलम्ब नहीं, एकमात्र आप ही हमारी शरण हैं। हे सुमध्यमे! आप दुःखित देवताओंका कार्य सिद्ध करें॥ ५३—५५॥ | | देवास्त्वदङ्घ्रिभजने निरताः सदैव <br> ते दानवैरतिबलैर्विपदं सुनीताः। <br> तान्देवि दुःखरहितान्कुरु भक्तियुक्ता- <br> न्मातस्त्वमेव शरणं भव दुःखितानाम्॥ ५६ | देवता आपके चरणोंकी उपासनामें सदैव संलग्न रहते हैं। [इस समय] वे सब महान् बलशाली दैत्योंके द्वारा विपत्तिमें डाल दिये गये हैं। अतः हे देवि! आप उन भक्तिपरायण देवताओंको दुःखरहित कर दीजिये। हे माता! आप दुःखित देवताओंका आश्रय बन जाइये॥ ५६॥ | | सकलभुवनरक्षा देवि कार्या त्वयाद्य <br> स्वकृतमिति विदित्वा विश्वमेतद् युगादौ। <br> जननि जगति पीडां दानवा दर्पयुक्ताः <br> स्वबलमदसमेतास्ते प्रकुर्वन्ति मातः॥ ५७ | हे देवि! युगके आरम्भमें इस विश्वकी रचना आप भगवतीने स्वयं की थी—यह जानकर आप इस समय सम्पूर्ण भूमण्डलकी रक्षा करें। हे जननि! हे माता! अपने बलसे मदान्वित तथा अभिमानमें चूर दानव जगत्में लोगोंको पीड़ित कर रहे हैं॥ ५७॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
देवकृतदेव्याराधनवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥


६५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३

६५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३

अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

भगवतीके श्रीविग्रहसे कौशिकीका प्राकट्य, देवीकी कालिकारूपमें परिणति, चण्ड-मुण्डसे देवीके अद्भुत सौन्दर्यको सुनकर शुम्भका सुग्रीवको दूत बनाकर भेजना, जगदम्बाका विवाहके विषयमें अपनी शर्त बताना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—[हे राजन्!] तब शत्रुओंसे
एवं स्तुता तदा देवी दैवतैः शत्रुतापितैः।<br>स्वशरीरात्परं रूपं प्रादुर्भूतं चकार ह॥ १सन्त्रस्त देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवतीने अपने शरीरसे एक दूसरा रूप प्रकट कर दिया॥ १॥
पार्वत्यास्तु शरीराद्वै निःसृता चाम्बिका यदा।<br>कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु पठ्यते॥ २जब भगवती पार्वतीके विग्रहकोशसे अम्बिका प्रकट हुईं, तब वे सम्पूर्ण जगत्में ‘कौशिकी’ इस नामसे कही जाने लगीं। पार्वतीके शरीरसे उन भगवती कौशिकीके निकल जानेसे शरीर क्षीण हो जानेके कारण वे पार्वती कृष्णवर्णकी हो गयीं। अतः वे कालिका नामसे विख्यात हुईं॥ २-३॥
निःसृतायां तु तस्यां सा पार्वती तनुव्यत्ययात्।<br>कृष्णरूपाथ सञ्जाता कालिका सा प्रकीर्तिता॥ ३
मषीवर्णा महाघोरा दैत्यानां भयवर्धिनी।<br>कालरात्रीति सा प्रोक्ता सर्वकामफलप्रदा॥ ४वे कालिका स्याहीके समान काले वर्णकी थीं तथा महाभयंकर प्रतीत होती थीं। दैत्योंके लिये भयवर्धिनी तथा [भक्तोंके लिये] समस्त मनोरथ पूर्ण करनेवाली वे भगवती ‘कालरात्रि’ इस नामसे पुकारी जाने लगीं॥ ४॥
अम्बिकायाः परं रूपं विरराज मनोहरम्।<br>सर्वभूषणसंयुक्तं लावण्यगुणसंयुतम्॥ ५समस्त आभूषणोंसे मण्डित और लावण्यगुणसे सम्पन्न वह भगवतीका दूसरा रूप (कौशिकी) अत्यन्त मनोहर प्रतीत हो रहा था॥ ५॥
ततोऽम्बिका तदा देवानित्युवाच ह सस्मिता।<br>तिष्ठन्तु निर्भया यूयं हनिष्यामि रिपूनिह॥ ६तदनन्तर अम्बिकाने मुसकराकर देवताओंसे यह कहा—आपलोग निर्भय रहें, मैं आपके शत्रुओंका वध अभी कर डालूँगी। आपलोगोंका कार्य मुझे सम्यक् प्रकारसे सम्पन्न करना है। मैं समरांगणमें विचरण करूँगी और आपलोगोंके कल्याणके लिये निशुम्भ आदि दानवोंका संहार करूँगी॥ ६-७॥
कार्यं वः सर्वथा कार्यं विहरिष्याम्यहं रणे।<br>निशुम्भादीन्वधिष्यामि युष्माकं सुखहेतवे॥ ७
इत्युक्त्वा सा तदा देवी सिंहारूढा मदोत्कटा।<br>कालिकां पार्श्वतः कृत्वा जगाम नगरे रिपोः॥ ८तब ऐसा कहकर गर्वोन्मत्त वे भगवती कौशिकी सिंहपर सवार हो गयीं और देवी कालिकाको साथमें लेकर शत्रुके नगरकी ओर चल पड़ीं॥ ८॥
सा गत्वोपवने तस्थावम्बिका कालिकाान्विता।<br>जगावथ कलं तत्र जगन्मोहनमोहनम्॥ ९कालिकासहित देवी अम्बिका वहाँ पहुँचकर नगरके उपवनमें रुक गयीं। तत्पश्चात् उन्होंने जगत्‌को मोहमें डालनेवालेको भी मोहित करनेवाला गीत गाना आरम्भ कर दिया॥ ९॥
अ० २३ ]पञ्चम स्कन्ध६५३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रुत्वा तन्मधुरं गानं मोहमीयुः खगा मृगाः।<br>मुदञ्च परमां प्रापुरमरा गगने स्थिताः ॥ १०उस मधुर गानको सुनकर पशु-पक्षी भी मोहित हो गये और आकाशमण्डलमें स्थित देवतागण अत्यन्त आनन्दित हो उठे ॥ १० ॥
तस्मिन्नवसरे तत्र दानवौ शुम्भसेवकौ।<br>चण्डमुण्डाभिधौ घोरौ रममाणौ यदृच्छया ॥ ११<br><br>आगतौ ददृशाते तु तां तदा दिव्यरूपिणीम्।<br>अम्बिकां गानसंयुक्तां कालिकां पुरतः स्थिताम् ॥ १२उसी समय शुम्भके चण्ड तथा मुण्ड नामक दो सेवक जो भयंकर दानव थे, स्वेच्छापूर्वक घूमते हुए वहाँ आ गये। उन्होंने देखा कि दिव्य स्वरूपवाली भगवती अम्बिका गायनमें लीन हैं और कालिका उनके सम्मुख विराजमान हैं ॥ ११-१२ ॥
दृष्ट्वा तां दिव्यरूपान्च दानवौ विस्मयान्वितौ।<br>जग्मतुस्तरसा पार्श्वं शुम्भस्य नृपसत्तम ॥ १३हे नृपश्रेष्ठ! उन दिव्य रूपवाली भगवतीको देखकर दोनों दानव विस्मयमें पड़ गये। वे तुरंत शुम्भके पास जा पहुँचे ॥ १३ ॥
तौ गत्वा तं समासीनं दैत्यानामधिपं गृहे।<br>ऊचतुर्मधुरं वाणीं प्रणम्य शिरसा नृपम् ॥ १४अपने महलमें बैठे हुए उस दानवराज शुम्भके पास जाकर उन दोनोंने सिर झुकाकर राजाको प्रणाम करके मधुर वाणीमें कहा— ॥ १४ ॥
राजन् हिमालयात्कामं कामिनी काममोहिनी।<br>सम्प्राप्ता सिंहमारूढा सर्वलक्षणसंयुता ॥ १५हे राजन्! कामदेवको भी मोहित कर देनेवाली एक सुन्दरी हिमालयसे यहाँ आयी हुई है। वह सिंहपर सवार है तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न है ॥ १५ ॥
नेदृशी देवलोकेऽस्ति न गन्धर्वपुरे तथा।<br>न दृष्टा न श्रुता क्वापि पृथिव्यां प्रमदोत्तमा ॥ १६ऐसी उत्तम स्त्री न स्वर्गमें है और न गन्धर्वलोकमें। सम्पूर्ण पृथ्वीपर ऐसी सुन्दरी न तो कहीं देखी गयी और न सुनी ही गयी ॥ १६ ॥
गानञ्च तादृशं राजन् करोति जनरञ्जनम्।<br>मृगास्तिष्ठन्ति तत्पार्श्वे मधुरस्वरमोहिताः ॥ १७हे राजन्! वह ऐसा गाती है कि उसके गानेपर सभी मुग्ध हो जाते हैं। उसके मधुर स्वरसे मोहित होकर मृग भी उसके पास बैठे रह जाते हैं ॥ १७ ॥
ज्ञायतां कस्य पुत्रीयं किमर्थमिह चागता।<br>गृह्यतां राजशार्दूल तव योग्यास्ति कामिनी ॥ १८हे नृपश्रेष्ठ! अब आप यह पता लगाइये कि यह किसकी पुत्री है और किसलिये यहाँ आयी हुई है? [उसके बाद] उसे अपने यहाँ रख लीजिये; क्योंकि वह सुन्दरी आपके योग्य है ॥ १८ ॥
ज्ञात्वानय गृहे भार्यां कुरु कल्याणलोचनाम्।<br>निश्चितं नास्ति संसारे नारी त्वेवंविधा किल ॥ १९यह जानकारी प्राप्त करके आप उस सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रीको अपने घर ले आइये और अपनी भार्या बना लीजिये; क्योंकि ऐसी स्त्री निश्चितरूपसे संसारमें नहीं है ॥ १९ ॥
देवानां सर्वरत्नानि गृहीतानि त्वया नृप।<br>कस्मान्नेमां वरारोहां प्रगृह्णासि नृपोत्तम ॥ २०हे राजन्! आप देवताओंके सम्पूर्ण रत्न अपने अधिकारमें कर चुके हैं, तो फिर हे नृपश्रेष्ठ! इस सुन्दरीको भी आप अपने अधिकारमें क्यों नहीं कर लेते ? ॥ २० ॥
इन्द्रस्यैरावतः श्रीमान्पारिजाततरुस्तथा।<br>गृहीतोऽश्वः सप्तमुखस्त्वया नृप बलात्किल ॥ २१हे राजन्! आपने बलपूर्वक इन्द्रका ऐश्वर्ययुक्त ऐरावत हाथी, पारिजात वृक्ष और सप्तमुखवाला उच्चैःश्रवा घोड़ा छीन लिया ॥ २१ ॥
६५४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विमानं वैधसं दिव्यं मरालध्वजसंयुतम्।<br>त्वयात्तं रत्नभूतं तद्वलेन नृप चाद्भुतम्॥ २२हे नृप! आपने ब्रह्माजीके हंसध्वजसम्पन्न, दिव्य तथा रत्नमय अद्भुत विमानको बलपूर्वक अपने अधिकारमें कर लिया॥ २२॥
कुबेरस्य निधिः पद्मास्त्वया राजन् समाहृतः।<br>छत्रं जलपतेः शुभ्रं गृहीतं तत्त्वया बलात्॥ २३हे राजन्! आपने बलपूर्वक कुबेरकी पद्म नामक निधिको छीन लिया है और वरुणके श्वेत छत्रको अपने अधिकारमें कर लिया है॥ २३॥
पाशश्चापि निशुम्भेन भ्रात्रा तव नृपोत्तम।<br>गृहीतोऽस्ति हठात्कामं वरुणस्य जितस्य च॥ २४हे नृपश्रेष्ठ! आपके भाई निशुम्भने भी वरुणको पराजित करके उसके पाशको हठपूर्वक छीन लिया है॥ २४॥
अम्लानपङ्कजां तुभ्यं मालां जलनिधिर्ददौ।<br>भयात्तव महाराज रत्नानि विविधानि च॥ २५हे महाराज! आपके भयसे समुद्रने कभी भी न मुरझानेवाली कमल-पुष्पोंकी माला और विविध प्रकारके रत्न आपको प्रदान किये हैं॥ २५॥
मृत्योः शक्तिर्यमस्यापि दण्डः परमदारुणः।<br>त्वया जित्वा हतः कामं किमन्यद्वर्ण्यते नृप॥ २६<br><br>कामधेनुर्गृहीताद्य वर्तते सागरोद्भवा।<br>मेनकाद्या वशे राजंस्तव तिष्ठन्ति चाप्सराः॥ २७आपने मृत्युको जीतकर उसकी शक्तिको तथा यमराजको जीतकर उसके अति भीषण दण्डको अपने पूर्ण अधिकारमें कर लिया है। हे राजन्! आपके पराक्रमका और क्या वर्णन किया जाय? समुद्रसे प्रादुर्भूत कामधेनु आपने छीन ली, जो इस समय आपके पास विद्यमान है। हे राजन्! मेनका आदि अप्सराएँ भी आपके अधीन पड़ी हुई हैं॥ २६-२७॥
एवं सर्वाणि रत्नानि त्वयात्तानि बलादपि।<br>कस्मान्न गृह्यते कान्तरत्नमेषा वराङ्गना॥ २८इस प्रकार जब आपने सभी रत्न बलपूर्वक छीन लिये हैं, तब नारियोंमें रत्नस्वरूपा इस सुन्दरीको भी अपने अधिकारमें क्यों नहीं कर लेते?॥ २८॥
सर्वाणि ते गृहस्थानि रत्नानि विशदान्यथ।<br>अनया सम्भविष्यन्ति रत्नभूतानि भूपते॥ २९हे भूपते! आपके गृहमें विद्यमान समस्त विपुल रत्न इस सुन्दरीसे सुशोभित होकर यथार्थरूपमें रत्नस्वरूप हो जायँगे॥ २९॥
त्रिषु लोकेषु दैत्येन्द्र नेदृशी वर्तते प्रिया।<br>तस्मात्तामानयाशु त्वं कुरु भार्या मनोहराम्॥ ३०हे दैत्यराज! तीनों लोकोंमें ऐसी सुन्दरी स्त्री नहीं है। अतः आप उस मनोहारिणी स्त्रीको शीघ्र ले आइये और अपनी भार्या बना लीजिये॥ ३०॥
व्यास उवाच<br>इति श्रुत्वा तयोर्वाक्यं मधुरं मधुराक्षरम्।<br>प्रसन्नवदनः प्राह सुग्रीवं सन्निधौ स्थितम्॥ ३१व्यासजी बोले— चण्ड-मुण्डके मधुमय अक्षरोंसे युक्त यह मधुर वचन सुनकर प्रसन्न मुखमण्डल-वाला शुम्भ अपने समीपमें बैठे हुए सुग्रीवसे कहने लगा— ॥ ३१॥
गच्छ सुग्रीव दूतत्वं कुरु कार्यं विचक्षण।<br>वक्तव्यञ्च तथा तत्र यथाभ्येति कृशोदरी॥ ३२हे बुद्धिसम्पन्न सुग्रीव! तुम दूत बनकर जाओ और मेरा यह कार्य सम्पन्न करो। वहाँ तुम ऐसी बातचीत करना, जिससे वह कृशोदरी यहाँ आ जाय॥ ३२॥
उपायौ द्वौ प्रयोक्तव्यौ कान्तासु सुविचक्षणैः।<br>सामदाने इति प्राहुः शृङ्गाररसकोविदाः॥ ३३बुद्धिमान् पुरुषोंको स्त्रियोंके विषयमें साम और दान—इन दो उपायोंका प्रयोग करना चाहिये—ऐसा शृंगाररसके विद्वानोंने कहा है॥ ३३॥

अ० २३] पञ्चम स्कन्ध ६५५

अ० २३] पञ्चम स्कन्ध ६५५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भेदे प्रयुज्यमानेऽपि रसाभासस्तु जायते।<br>निग्रहे रसभङ्गः स्यात्तस्मात्तौ दूषितौ बुधैः ॥ ३४भेदनीतिका प्रयोग करनेपर रसका आभासमात्र हो पाता है और दण्डनीतिका प्रयोग करनेपर रसभंग ही हो जाता है, अतः विद्वान् पुरुषोंने इन दोनोंको दोषपूर्ण बताया है॥ ३४॥
सामदानमुखैर्वाक्यैः श्लक्ष्णैर्नर्मयुतैस्तथा।<br>का न याति वशे दूत कामिनी कामपीडिता ॥ ३५हे दूत! ऐसी कौन स्त्री होगी; जो साम, दान—इन मुख्य नीतियोंसे सम्पन्न, मधुर तथा हास-परिहाससे परिपूर्ण वाक्योंके द्वारा कामपीड़ित होकर वशमें न हो जाय॥ ३५॥
व्यास उवाच
सुग्रीवस्तु वचः श्रुत्वा शुम्भोक्तं सुप्रियं पटु।<br>जगाम तरसा तत्र यत्रास्ते जगदम्बिका ॥ ३६**व्यासजी बोले—**शुम्भके द्वारा कही गयी अत्यन्त प्रिय तथा चातुर्यपूर्ण बात सुनकर सुग्रीव बड़े वेगसे उधर चल पड़ा, जहाँ जगदम्बिका विराजमान थीं॥ ३६॥
सोऽपश्यत्सुमुखीं कान्तां सिंहस्योपरि संस्थिताम्।<br>प्रणम्य मधुरं वाक्यमुवाच जगदम्बिकाम् ॥ ३७वहाँपर उसने देखा कि एक सुन्दर मुखवाली युवती सिंहपर सवार है। तब जगदम्बिकाको प्रणाम करके वह मधुर वाणीमें कहने लगा—॥ ३७॥
दूत उवाच
वरोरु त्रिदशारातिः शुम्भः सर्वाङ्गसुन्दरः।<br>त्रैलोक्याधिपतिः शूरः सर्वजिद्राजते नृपः ॥ ३८**दूत बोला—**हे सुजघने! देवताओंके शत्रु राजा शुम्भ सर्वांगसुन्दर और पराक्रमी हैं। सबको जीतकर वे तीनों लोकोंके अधिपति हो गये हैं॥ ३८॥
तेनाहं प्रेषितः कामं त्वत्सकाशं महात्मना।<br>त्वद्रूपश्रवणासक्तचित्तेनातिविदूयता ॥ ३९आपके सौन्दर्यके विषयमें सुनकर आपपर आसक्त मनवाले उन्हीं महाराज शुम्भने व्याकुल होकर मुझे आपके पास भेजा है॥ ३९॥
वचनं तस्य तन्वङ्गि शृणु प्रेमपुरःसरम्।<br>प्रणिपत्य यथा प्राह दैत्यानामधिपस्त्वयि ॥ ४०हे तन्वंगि! दैत्यपति शुम्भने आपको प्रणाम करके जो प्रेमपूर्ण वचन कहा है, उनके उस वचनको आप सुनें—॥ ४०॥
देवा मया जिताः सर्वे त्रैलोक्याधिपतिस्त्वहम्।<br>यज्ञभागानहं कान्ते गृह्णामीह स्थितः सदा ॥ ४१हे कान्ते! मैंने सभी देवताओंको जीत लिया है, इस समय मैं तीनों लोकोंका स्वामी हूँ। मैं यहाँ रहते हुए सदा यज्ञभाग प्राप्त करता हूँ॥ ४१॥
हृतसारा कृता नूनं द्यौर्मया रत्नवर्जिता।<br>यानि रत्नानि देवानां तानि चाहृतवानहम् ॥ ४२मैंने स्वर्गलोककी सभी सार वस्तुएँ छीन ली हैं और उसे रत्नविहीन कर दिया है। देवताओंके पास जो भी रत्न थे, उन सबको मैंने हर लिया है॥ ४२॥
भोक्ताहं सर्वरत्नानां त्रिषु लोकेषु भामिनि।<br>वशानुगाः सुराः सर्वे मम दैत्याश्च मानवाः ॥ ४३हे भामिनि! तीनों लोकोंमें सभी रत्नोंका भोग करनेवाला एकमात्र मैं ही हूँ। देवता, दैत्य और मनुष्य—ये सब मेरे अधीन रहते हैं॥ ४३॥
त्वद्गुणैः कर्णमागत्य प्रविश्य हृदयान्तरम्।<br>त्वदधीनः कृतः कामं किङ्करोऽस्मि करोमि किम् ॥ ४४तुम्हारे गुणोंने कानोंके मार्गसे मेरे हृदयमें प्रवेश करके मुझे पूर्णरूपसे तुम्हारे वशमें कर दिया है। अब मैं क्या करूँ? मैं तो तुम्हारा दास बन गया हूँ॥ ४४॥
६५६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २३
श्लोकअर्थ
त्वमाज्ञापय रम्भोरु तत्करोमि वशानुगः।<br>दासोऽहं तव चार्वङ्गि रक्ष मां कामबाणतः॥ ४५हे रम्भोरु ! मैं तुम्हारे अधीन हूँ, तुम मुझे जो भी आज्ञा प्रदान करो, उसे मैं करूँगा। हे सुन्दर अंगोंवाली ! मैं तुम्हारा दास हूँ, कामबाणसे मेरी रक्षा करो॥ ४५॥
भज मां त्वं मरालाक्षि तवाधीनं स्मराकुलम्।<br>त्रैलोक्यस्वामिनी भूत्वा भुंक्ष्व भोगाननुत्तमान्॥ ४६हे मरालाक्षि ! तुम्हारे अधीन हुए मुझ कामातुरको तुम स्वीकार कर लो और तीनों लोकोंकी स्वामिनी बनकर उत्कृष्ट सुखोंका उपभोग करो॥ ४६॥
तव चाज्ञाकरः कान्ते भवामि मरणावधि।<br>अवध्योऽस्मि वरारोहे सदेवासुरमानुषैः॥ ४७<br><br>सदा सौभाग्यसंयुक्ता भविष्यसि वरानने।<br>यत्र ते रमते चित्तं तत्र क्रीडस्व सुन्दरि॥ ४८हे कान्ते ! मैं मरणपर्यन्त तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगा। हे वरारोहे ! मैं देवता, असुर तथा मनुष्योंसे अवध्य हूँ। हे सुमुखि ! [ मुझे पति बनाकर] तुम सदा सौभाग्यवती रहोगी। हे सुन्दरि ! जहाँ तुम्हारा मन लगे, वहाँ विहार करना॥ ४७-४८॥
इति तस्य वचश्चित्ते विमृश्य मदमन्थरे।<br>वक्तव्यं यद्भवत्प्रेम्णा तद् ब्रूहि मधुरं वचः॥ ४९<br><br>शुम्भाय चञ्चलापाङ्गि तद् ब्रवीम्यहमाशु वै।मदसे अलसायी हुई हे कामिनि ! [ मेरे स्वामी] उन शुम्भकी बातपर अपने मनमें भलीभाँति विचार करके तुम्हें जो कुछ कहना हो, उसे प्रेमपूर्वक मधुर वाणीमें कहो। हे चंचल कटाक्षवाली ! मैं वह सन्देश तुरंत शुम्भसे निवेदन करूँगा॥ ४९ ½॥
व्यास उवाच<br>तद्दूतवचनं श्रुत्वा स्मितं कृत्वा सुपेशलम्॥ ५०<br><br>तं प्राह मधुरां वाचं देवी देवार्थसाधिका।व्यासजी बोले—दूतका वह वचन सुनकर देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाली भगवती अत्यन्त मधुर मुसकान करके मीठी वाणीमें उससे कहने लगीं॥ ५० ½॥
देव्युवाच<br>जानाम्यहं निशुम्भं च शुम्भं चातिबलं नृपम्॥ ५१<br><br>जेतारं सर्वदेवानां हन्तारञ्चैव विद्विषाम्।<br>राशिं सर्वगुणानाञ्च भोक्तारं सर्वसम्पदाम्॥ ५२<br><br>दातारं चातिशूरं च सुन्दरं मन्मथाकृतिम्।<br>द्वात्रिंशल्लक्षणैर्युक्तमवध्यं सुरमानुषैः॥ ५३<br><br>ज्ञात्वा समागतास्म्यत्र द्रष्टुकामा महासुरम्।<br>रत्नं कनकमायाति स्वशोभाधिकवृद्धये॥ ५४देवी बोलीं—मैं महाबली राजा शुम्भ तथा निशुम्भ—दोनोंको जानती हूँ। उन्होंने सभी देवताओंको जीत लिया है और अपने शत्रुओंका संहार कर डाला है, वे सभी गुणोंकी राशि हैं और सब सम्पदाओंका भोग करनेवाले हैं। वे दानी, महापराक्रमी, सुन्दर, कामदेवसदृश रूपवाले, बत्तीस लक्षणोंसे सम्पन्न और देवताओं तथा मनुष्योंसे अवध्य हैं—यह जानकर मैं उस महान् असुरको देखनेकी इच्छासे यहाँ आयी हूँ। जैसे रत्न अपनी शोभाको और अधिक बढ़ानेके लिये सुवर्णके पास आता है, वैसे ही मैं अपने पतिको देखनेके लिये दूरसे यहाँ आयी हूँ॥ ५१—५४ ½॥
तत्राहं स्वपतिं द्रष्टुं दूरादेवागतास्मि वै।<br>दृष्टा मया सुराः सर्वे मानवा भुवि मानदाः॥ ५५<br><br>गन्धर्वा राक्षसाश्चान्ये ये चातिप्रियदर्शनाः।<br>सर्वे शुम्भभयाद्भीता वेपमाना विचेतसः॥ ५६सभी देवताओं, पृथ्वीलोकमें मान प्रदान करनेवाले सभी मनुष्यों, गन्धर्वों, राक्षसों तथा देखनेमें सुन्दर लगनेवाले जो भी अन्य लोग हैं; उन सबको मैंने देख लिया है। सब-के-सब शुम्भके आतंकसे डरे हुए हैं, भयके मारे काँपते रहते हैं और सदा व्याकुल रहते हैं॥ ५५-५६॥

अ० २४] पञ्चम स्कन्ध ६५७

अ० २४] पञ्चम स्कन्ध ६५७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रुत्वा शुम्भगुणानत्र प्राप्तास्म्यद्य दिदृक्षया।<br>गच्छ दूत महाभाग ब्रूहि शुम्भं महाबलम् ॥ ५७<br><br>निर्जने श्लक्ष्णया वाचा वचनं वचनान्मम।<br>त्वां ज्ञात्वा बलिनां श्रेष्ठं सुन्दराणां च सुन्दरम् ॥ ५८<br><br>दातारं गुणिनं शूरं सर्वविद्याविशारदम्।<br>जेतारं सर्वदेवानां दक्षं चोग्रं कुलोत्तरम् ॥ ५९<br><br>भोक्तारं सर्वरत्नानां स्वाधीनं स्वबलोन्नतम्।<br>पतिकामास्म्यहं सत्यं तव योग्या नराधिप ॥ ६०<br><br>स्वेच्छया नगरे तेऽत्र समायाता महामते।<br>ममास्ति कारणं किञ्चिद्विवाहे राक्षसोत्तम ॥ ६१<br><br>बालभावाद् व्रतं किञ्चित्कृतं राजन् मया पुरा।<br>क्रीडन्त्या च वयस्याभिः सहैकान्ते यदृच्छया ॥ ६२<br><br>स्वदेहबलदर्पेण सखीनां पुरतो रहः।<br>मत्समानबलः शूरो रणे मां जेष्यति स्फुटम् ॥ ६३<br><br>तं वरिष्याम्यहं कामं ज्ञात्वा तस्य बलाबलम्।<br>जहसुर्वचनं श्रुत्वा सख्यो विस्मितमानसाः ॥ ६४<br><br>किमेतया कृतं क्रूरं व्रतमद्भुतमाशु वै।<br>तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र ज्ञात्वा मे हीदृशं बलम् ॥ ६५<br><br>जित्वा मां स्वबलेनात्र वाञ्छितं कुरु चात्मनः।<br>त्वं वा तवानुजो भ्राता समेत्य समराङ्गणे।<br>जित्वा मां समरेणात्र विवाहं कुरु सुन्दर ॥ ६६शुम्भके गुण सुनकर उन्हें देखनेकी इच्छासे मैं इस समय यहाँ आयी हुई हूँ। हे महाभाग्यशाली दूत! तुम जाओ और महाबली शुम्भसे एकान्त स्थानमें मधुर वाणीमें मेरे शब्दोंमें यह बात कहो—हे राजन्! आपको बलवानोंमें सबसे बली, सुन्दरोंमें अति सुन्दर, दानी, गुणी, पराक्रमी, सभी विद्याओंमें पारंगत, सभी देवताओंको जीत लेनेवाला, कुशल, प्रतापी, श्रेष्ठ कुलवाला, समस्त रत्नोंका भोग करनेवाला, स्वतन्त्र तथा अपनी शक्तिसे समृद्धिशाली बना हुआ जानकर मैं आपको पति बनानेकी इच्छुक हूँ। हे नराधिप! मैं भी निश्चितरूपसे आपके योग्य हूँ। हे महामते! मैं आपके इस नगरमें अपनी इच्छासे आयी हूँ। किंतु हे राक्षसश्रेष्ठ! मेरे विवाहमें कुछ शर्त है। हे राजन्! पूर्वमें मैंने सखियोंके साथ खेलते समय बालस्वभाववश अपने शारीरिक बलके अभिमानके कारण संयोगसे उन सखियोंके समक्ष एकान्तमें यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि मेरे समान पराक्रम रखनेवाला जो वीर रणमें मुझे स्पष्टरूपसे जीत लेगा, उसके बलाबलको जानकर ही मैं पतिरूपमें उसका वरण करूँगी। मेरी यह बात सुनकर सखियोंके मनमें बड़ा विस्मय हुआ और वे जोर-जोरसे हँसने लगीं। [वे कहने लगीं] ‘इसने शीघ्रतापूर्वक यह कैसी भीषण तथा अद्भुत प्रतिज्ञा कर ली।’ अतएव हे राजेन्द्र! आप भी मेरे ऐसे पराक्रमको जानकर यहींपर अपने बलसे मुझे जीतकर अपना मनोरथ पूर्ण कर लीजिये। हे सुन्दर! आप अथवा आपका छोटा भाई समरांगणमें आकर युद्धके द्वारा मुझे जीतकर [मेरे साथ] विवाह कर लें॥ ५७—६६॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
देव्या सुग्रीवदूताय स्वव्रतकथनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
~ ० ~

अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

शुम्भका धूम्रलोचनको देवीके पास भेजना और धूम्रलोचनका देवीको समझानेका प्रयास करना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
देव्यास्तद्वचनं श्रुत्वा स दूतः प्राह विस्मितः।<br>किं ब्रूषे रुचिरापाङ्गि स्त्रीस्वभावाद्धि साहसात् ॥ १भगवतीका वह वचन सुनकर वह दूत विस्मित हो गया और उसने देवीसे कहा—हे सुन्दर कटाक्षवाली! तुम स्त्रीस्वभावके कारण साहसपूर्वक यह क्या बोल रही हो?॥ १॥
६५८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २४
श्लोकअर्थ
इन्द्राद्या निर्जिता येन देवा दैत्यास्तथापरे।<br>तं कथं समरे देवि जेतुमिच्छसि भामिनि॥ २हे भामिनि! हे देवि! जिन्होंने इन्द्र आदि देवताओं तथा अन्य दैत्योंको पराजित कर दिया है, उन्हें तुम संग्राममें जीतनेकी अभिलाषा कैसे रखती हो?॥ २॥
त्रैलोक्ये तादृशो नास्ति यः शुम्भं समरे जयेत्।<br>का त्वं कमलपत्राक्षि तस्याग्रे युधि साम्प्रतम्॥ ३त्रिलोकीमें वैसा कोई नहीं है, जो शुम्भको संग्राममें जीत सके; तब हे कमलसदृश नेत्रोंवाली! तुम कौन-सी सामर्थ्यशालिनी हो जो इस समय युद्धमें उनके सामने टिक सको?॥ ३॥
अविचार्य न वक्तव्यं वचनं क्वापि सुन्दरि।<br>बलं स्वपरयोर्ज्ञात्वा वक्तव्यं समयोचितम्॥ ४हे सुन्दरि! बिना सोचे-समझे कोई बात नहीं बोलनी चाहिये, अपितु अपने तथा शत्रुके बलको जानकर ही समयके अनुसार बोलना चाहिये॥ ४॥
त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भस्तव रूपेण मोहितः।<br>त्वाञ्च प्रार्थयते राजा कुरु तस्येप्सितं प्रिये॥ ५तीनों लोकोंके अधिपति महाराज शुम्भ तुम्हारे रूपपर मोहित हो गये हैं और तुमसे प्रार्थना कर रहे हैं। अतः हे प्रिये! उनका मनोरथ पूर्ण करो॥ ५॥
त्यक्त्वा मूर्खस्वभावं त्वं सम्मान्य वचनं मम।<br>भज शुम्भं निशुम्भं वा हितमेतद् ब्रवीमि ते॥ ६मूर्खतापूर्ण स्वभाव त्यागकर मेरी बातको मान करके तुम शुम्भ अथवा निशुम्भ किसीको [पतिरूपमें] स्वीकार कर लो; मैं तुम्हारे लिये यह हितकर बात कह रहा हूँ॥ ६॥
शृङ्गारः सर्वथा सर्वैः प्राणिभिः परया मुदा।<br>सेवनीयो बुद्धिमद्भिर्नवानामुत्तमो यतः॥ ७सभी बुद्धिमान् प्राणियोंको चाहिये कि बड़े हर्षके साथ शृंगाररसका उपभोग करें; क्योंकि यह सभी नौ रसोंमें उत्तम माना गया है॥ ७॥
नागमिष्यसि चेद् बाले संक्रुद्धः पृथिवीपतिः।<br>अन्यानाज्ञाकरान्प्रेष्य बलान्नेष्यति साम्प्रतम्॥ ८हे बाले! यदि तुम मेरे साथ नहीं चलोगी तो राजा शुम्भ अत्यन्त कुपित होकर अन्य बहुत-से सेवकोंको अभी भेजकर तुम्हें बलपूर्वक पकड़वाकर ले जायँगे॥ ८॥
केशेष्वाकृष्य ते नूनं दानवा बलदर्पिताः।<br>त्वां नयिष्यन्ति वामोरु तरसा शुम्भसन्निधौ॥ ९हे वामोरु! वे बलाभिमानी दानव तुम्हारे केश-पाश पकड़कर बलपूर्वक तुम्हें निश्चय ही शुम्भके पास ले जायँगे॥ ९॥
स्वलज्जां रक्ष तन्वङ्गि साहसं सर्वथा त्यज।<br>मानिता गच्छ तत्पार्श्वे मानपात्रं यतोऽसि वै॥ १०अतः हे कोमलांगी! अपनी लज्जाकी रक्षा करो और इस दुस्साहसको पूर्णरूपसे छोड़ दो। तुम सम्मानित होकर उनके पास चलो; क्योंकि तुम सम्मानकी पात्र हो॥ १०॥
क्व युद्धं निशितैर्बाणैः क्व सुखं रतिसङ्गजम्।<br>सारासारं परिच्छेद्य कुरु मे वचनं पटु॥ ११<br>भज शुम्भं निशुम्भं वा लप्स्यसि परमं सुखम्।कहाँ तीक्ष्ण बाणोंसे होनेवाला युद्ध और कहाँ रतिक्रीड़ासे उत्पन्न होनेवाला सुख! सार-असार बातपर सही-सही विचार करके तुम मेरे हितकर वचनको मान लो और शुम्भ अथवा निशुम्भको अपना पति स्वीकार कर लो; इससे तुम परम सुख प्राप्त करोगी॥ ११ १/२ ॥

अ० २४] पञ्चम स्कन्ध ६५९

अ० २४] पञ्चम स्कन्ध ६५९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देव्युवाच<br>सत्यं दूत महाभाग प्रवक्तुं निपुणो ह्यसि॥ १२<br><br>निशुम्भशुम्भौ जानामि बलवन्ताविति ध्रुवम्।<br>प्रतिज्ञा मे कृता बाल्यादन्यथा सा कथं भवेत्॥ १३<br><br>तस्माद् ब्रूहि निशुम्भञ्च शुम्भं वा बलवत्तरम्।<br>विना युद्धं न मे भर्ता भविता कोऽपि सौष्ठवात्॥ १४<br><br>जित्वा मां तरसा कामं करं गृह्णातु साम्प्रतम्।<br>युद्धेच्छया समायातां विद्धि मामबलां नृप॥ १५<br><br>युद्धं देहि समर्थोऽसि वीरधर्मं समाचर।<br>बिभेषि मम शूलाच्चेत्पातालं गच्छ मा चिरम्॥ १६<br><br>त्रिदिवं च धरां त्यक्त्वा जीवितेच्छा यदस्ति ते।<br>इति दूत वदाशु त्वं गत्वा स्वपतिमादरात्॥ १७<br><br>स विचार्य यथायुक्तं करिष्यति महाबलः।<br>संसारे दूतधर्मोऽयं यत्सत्यं भाषणं किल॥ १८<br><br>शत्रौ पत्यौ च धर्मज्ञ तथा त्वं कुरु मा चिरम्।देवी बोलीं—हे महाभाग दूत! तुम बात करनेमें निपुण हो; यह सत्य है। शुम्भ और निशुम्भ निश्चय ही बलवान् हैं—यह मैं जानती हूँ। किंतु मैंने बाल्यकालसे ही जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उसे मिथ्या कैसे किया जाय? अतः तुम निशुम्भसे अथवा उससे भी बलवान् शुम्भसे कह दो कि बिना युद्ध किये मात्र सौन्दर्यके बलपर कोई भी मेरा पति नहीं बन सकेगा। मुझे अपने बलसे जीतकर वह अभी पाणिग्रहण कर ले। हे राजन्! आप यह जान लीजिये कि मैं अबला होती हुई भी युद्धकी इच्छासे यहाँ आयी हूँ। यदि तुम समर्थ हो तो मेरे साथ युद्ध करो और वीरधर्मका पालन करो। इसके अतिरिक्त यदि मेरे त्रिशूलसे डरते हो और यदि जीनेकी तुम्हारी अभिलाषा है तो स्वर्ग और पृथ्वीलोकको छोड़कर अविलम्ब पाताललोक चले जाओ। हे दूत! अभी जाकर अपने स्वामीसे आदरपूर्वक ये बातें कह दो। इसके बाद वे महाबली शुम्भ विचार करके जो उचित होगा, उसे करेंगे। संसारमें यही दूतधर्म है कि जो सच्ची बात हो, उसे वैसा-का-वैसा शत्रु और स्वामी—दोनोंके प्रति अवश्य कह दे। हे धर्मज्ञ! तुम भी वैसा ही व्यवहार करो; विलम्ब मत करो॥ १२—१८ ½ ॥
व्यास उवाच<br>अथ तद्वचनं श्रुत्वा नीतिमद् बलसंयुतम्॥ १९<br><br>हेतुयुक्तं प्रगल्भञ्च विस्मितः प्रययौ तदा।<br>गत्वा दैत्यपतिं दूतो विचार्य च पुनः पुनः॥ २०<br><br>प्रणम्य पादयोः प्रह्वः प्रत्युवाच नृपञ्च तम्।<br>राजनीतिकरं वाक्यं मृदुपूर्वं प्रियं वचः॥ २१व्यासजी बोले—उस समय भगवती जगदम्बाके नीतियुक्त, शक्तिसम्पन्न, हेतुपूर्ण और ओजस्वी वचन सुनकर वह दूत आश्चर्यचकित हो गया और वहाँसे लौट गया। दैत्यपति शुम्भके पास पहुँचकर बार-बार विचार करके वह दूत विनम्र भावसे अपने राजाको प्रणाम करके उनसे नीतिपूर्ण, मधुरतासे युक्त तथा मनोहर बात कहने लगा॥ १९—२१॥
दूत उवाच<br>सत्यं प्रियं च वक्तव्यं तेन चिन्तापरो ह्यहम्।<br>सत्यं प्रियं च राजेन्द्र वचनं दुर्लभं किल॥ २२<br><br>अप्रियं वदतां कामं राजा कुप्यति सर्वथा।<br>साक्षात्कृतः समायाता कस्य वा किंबलाबला॥ २३दूत बोला—हे राजेन्द्र! सत्य और प्रिय बात कहनी चाहिये, इसीलिये मैं अत्यन्त चिन्तामें पड़ा हुआ हूँ; क्योंकि जो सत्य हो और प्रिय भी हो, वैसा वचन निश्चय ही दुर्लभ है। अप्रिय बोलनेवाले दूतोंपर राजा सर्वथा कुपित हो सकते हैं, [तथापि अपना धर्मपालन करते हुए मैं सच्ची बात कह रहा हूँ] वह स्त्री कहाँसे आयी है, किसकी पुत्री है और कितनी

| ६६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २४ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
न ज्ञानगोचरं किञ्चित्किं ब्रवीमि विचेष्टितम्।<br>युद्धकामा मया दृष्टा गर्विता कटुभाषिणी॥ २४<br><br>तया यत्कथितं सम्यक् तच्छृणुष्व महामते।<br>मया बाल्यात्प्रतिज्ञेयं कृता पूर्वं विनोदतः॥ २५<br><br>सखीनां पुरतः कामं विवाहं प्रति सर्वथा।<br>यो मां युद्धे जयेद्बद्धा दर्पञ्च विधुनोति वै॥ २६<br><br>तं वरिष्याम्यहं कामं पतिं समबलं किल।<br>न मे प्रतिज्ञा मिथ्या सा कर्तव्या नृपसत्तम॥ २७सबल अथवा निर्बल है—इनमेंसे कुछ भी मैं नहीं जान सका, तब मैं उसके मनकी बात क्या बताऊँ! मुझे तो वह घमण्डी, कटु बोलनेवाली और सदा युद्धके लिये उत्सुक दिखायी पड़ती थी॥ २२—२४॥<br><br>हे महामते! उस स्त्रीने जो कुछ कहा है, उसे आप भलीभाँति सुनें—'मैंने पहले ही बाल्यावस्थामें सखियोंके समक्ष विनोदवश विवाहके विषयमें यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि जो युद्धमें मुझे जीत लेगा और मेरे अभिमानको चूर्ण कर देगा, उसी समान बलवालेका मैं पतिरूपसे वरण करूँगी। हे नृपश्रेष्ठ! मेरी वह प्रतिज्ञा मिथ्या नहीं की जानी चाहिये। अतः हे धर्मज्ञ! मेरे साथ युद्ध करो और मुझे जीतकर अपने अधीन कर लो'॥ २५—२७ १/२॥
तस्माद्युध्यस्व धर्मज्ञ जित्वा मां स्ववशं कुरु।<br>तयेति व्याहृतं वाक्यं श्रुत्वाहं समुपागतः॥ २८<br><br>यथेच्छसि महाराज तथा कुरु तव प्रियम्।<br>सा युद्धार्थं कृतमतिः सायुधा सिंहगामिनी॥ २९<br><br>निश्चला वर्तते भूप यद्योग्यं तद्विधीयताम्।उस स्त्रीके द्वारा कही गयी यह बात सुनकर मैं आपके पास आया हूँ। हे महाराज! अब आप जैसे भी अपना हित समझते हों, वैसा ही करें। आयुधोंसे सुसज्जित तथा सिंहपर सवार वह युद्धके लिये दृढ़ संकल्प किये हुए है। हे भूप! वह अपनी बातपर अडिग है, अतः जो उचित हो उसे आप करें॥ २८–२९ १/२॥
व्यास उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्य सुग्रीवस्य नराधिपः॥ ३०<br><br>पप्रच्छ भ्रातरं शूरं समीपस्थं महाबलम्।**व्यासजी बोले—**अपने दूत सुग्रीवका यह वचन सुनकर राजा शुम्भने पासमें ही बैठे हुए शूरवीर तथा महाबली भाई निशुम्भसे पूछा॥ ३० १/२॥
शुम्भ उवाच<br>भ्रातः किमत्र कर्तव्यं ब्रूहि सत्यं महामते॥ ३१<br><br>नार्यैका योद्धुकामास्ति समाह्वयति साम्प्रतम्।<br>अहं गच्छामि संग्रामे त्वं वा गच्छ बलान्वितः॥ ३२<br><br>यद्रोचते निशुम्भात्र तत्कर्तव्यं मया किल।**शुम्भ बोला—**हे भाई! इस स्थितिमें मुझे क्या करना चाहिये, हे महामते! सच-सच बताओ। एक स्त्री युद्ध करनेकी अभिलाषा रखती है, इस समय [हमें युद्धके लिये] बुला रही है। अतः युद्धस्थलमें मैं जाऊँ अथवा सेना लेकर तुम जाओगे? हे निशुम्भ! इस विषयमें तुम्हें जो अच्छा लगेगा, निश्चय ही मैं वही करूँगा॥ ३१–३२ १/२॥
निशुम्भ उवाच<br>न मया न त्वया वीर गन्तव्यं रणमूर्धनि॥ ३३<br><br>प्रेषयस्व महाराज त्वरितं धूम्रलोचनम्।<br>स गत्वा तां रणे जित्वा गृहीत्वा चारुलोचनाम्॥ ३४<br>आगमिष्यति शुम्भात्र विवाहः संविधीयताम्।**निशुम्भ बोला—**हे वीर! अभी रणक्षेत्रमें न मुझे और न तो आपको ही जाना चाहिये। हे महाराज! शीघ्र ही धूम्रलोचनको भेज दीजिये। वहाँ जाकर युद्धमें उस सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रीको जीतकर और उसे पकड़कर वह यहाँ ले आयेगा। तत्पश्चात् हे शुम्भ! आप उसके साथ सम्यक् विवाह कर लीजिये॥ ३३–३४ १/२॥

| अ० २४ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६६१ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>तन्निशम्य वचस्तस्य शुम्भो भ्रातुः कनीयसः ॥ ३५<br>कोपात्सम्प्रेषयामास पार्श्वस्थं धूम्रलोचनम्।व्यासजी बोले—अपने छोटे भाईकी वह बात सुनकर शुम्भने पासमें ही बैठे हुए धूम्रलोचनको जानेके लिये क्रोधपूर्वक आदेश दिया॥ ३५ १/२॥
शुम्भ उवाच<br>धूम्रलोचन गच्छाशु सैन्येन महतावृत्तः ॥ ३६<br>गृहीत्वानय तां मुग्धां स्ववीर्यमदमोहिताम्।<br>देवो वा दानवो वापि मनुष्यो वा महाबलः ॥ ३७<br>तत्पार्ष्णिग्राहतां प्राप्तो हन्तव्यस्तरसा त्वया।<br>तत्पार्श्ववर्तिनीं कालीं हत्वा संगृह्य तां पुनः ॥ ३८<br>शीघ्रमत्र समागच्छ कृत्वा कार्यमनुत्तमम्।<br>रक्षणीया त्वया साध्वी मुञ्चन्ती मृदुमार्गणाम् ॥ ३९<br>यत्नेन महता वीर मृदुदेहा कृशोदरी।<br>तत्सहायाश्च हन्तव्या ये रणे शस्त्रपाणयः ॥ ४०<br>सर्वथा सा न हन्तव्या रक्षणीया प्रयत्नतः।शुम्भ बोला—हे धूम्रलोचन! तुम एक विशाल सेना लेकर अभी जाओ और अपने बलके मदमें चूर रहनेवाली उस मूढ़ स्त्रीको पकड़कर ले आओ। देवता, दानव या महाबली मनुष्य—कोई भी जो उसकी सहायताके लिये उपस्थित हो, उसे तुम तुरंत मार डालना। उसके साथमें रहनेवाली कालीको भी मारकर पुनः उस सुन्दरीको पकड़ करके और इस प्रकार मेरा यह अत्युत्तम कार्य सम्पन्नकर यहाँ शीघ्र आ जाओ। हे वीर! कोमल बाणोंको छोड़ती हुई उस सुकोमल शरीरवाली कृशोदरी साध्वी स्त्रीकी तुम प्रयत्नपूर्वक रक्षा करना। हाथमें शस्त्र धारण किये हुए उसके जो भी सहायक रणमें हों, उन्हें मार डालना, किंतु उसे मत मारना; सब तरहसे प्रयत्नपूर्वक उसकी रक्षा करना॥ ३६—४० १/२॥
व्यास उवाच<br>इत्यादिष्टस्तदा राज्ञा तरसा धूम्रलोचनः ॥ ४१<br>प्रणम्य शुम्भं सैन्येन वृतः शीघ्रं ययौ रणे।<br>असाधूनां सहस्राणां षष्ट्या तेषां वृतस्तथा ॥ ४२व्यासजी बोले—अपने राजा शुम्भका यह आदेश पाकर धूम्रलोचन उसे प्रणाम करके सेना साथ लेकर तुरंत युद्धभूमिकी ओर चल पड़ा। उसके साथमें साठ हजार राक्षस थे॥ ४१-४२॥
स ददर्श ततो देवीं रम्योपवनसंस्थिताम्।<br>दृष्ट्वा तां मृगशावाक्षीं विनयेन समन्वितः ॥ ४३<br>उवाच वचनं श्लक्ष्णं हेतुमद्रसभूषितम्।<br>शृणु देवि महाभागे शुम्भस्त्वद्विरहातुरः ॥ ४४<br>दूतं प्रेषितवान्पार्श्वे तव नीतिविशारदः।<br>रसभङ्गभयोद्विग्नः सामपूर्वं त्वयि स्वयम् ॥ ४५वहाँ पहुँचकर उसने एक मनोहर उपवनमें विराजमान भगवती जगदम्बाको देखा। हरिणके बच्चेके समान नेत्रोंवाली देवीको देखकर वह विनम्रतापूर्वक उनसे मधुर, हेतुयुक्त तथा सरस वचन कहने लगा—हे महाभाग्यवती देवि! सुनो, शुम्भ तुम्हारे विरहसे अत्यन्त व्याकुल हैं। नीतिनिपुण महाराजने रसभंग होनेके भयसे उद्विग्न होकर शान्तिपूर्वक तुम्हारे पास स्वयं एक दूत भेजा था॥ ४३—४५॥
तेनागत्य वचः प्रोक्तं विपरीतं वरानने।<br>वचसा तेन मे भर्ता चिन्ताविष्टमना नृपः ॥ ४६<br>बभूव रसमार्गज्ञे शुम्भः कामविमोहितः।<br>दूतेन तेन न ज्ञातं हेतुगर्भं वचस्तव ॥ ४७<br>यो मां जयति संग्रामे यदुक्तं कठिनं वचः।<br>न ज्ञातस्तेन संग्रामो द्विविधः खलु मानिनि ॥ ४८हे सुमुखि! उसने लौटकर विपरीत बात कह दी। उस बातसे मेरे स्वामी महाराज शुम्भके मनमें बहुत चिन्ता व्याप्त हो गयी है। हे रसतत्त्वको जाननेवाली! शुम्भ इस समय कामसे विमोहित हो गये हैं। वह दूत तुम्हारे सहेतुक वचनोंको नहीं समझ सका। तुमने जो यह कठिन वचन कहा था कि 'जो मुझे संग्राममें जीतेगा', उस संग्रामका

६६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २४

६६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २४

श्लोकअर्थ
रतिजोऽथोत्साहजश्च पात्रभेदे विवक्षितः।<br>रतिजस्त्वयि वामोरु शत्रोरुत्साहजः स्मृतः॥ ४९तात्पर्य वह नहीं जान सका। हे मानिनि! संग्राम दो प्रकारका होता है—कामजनित और उत्साहजनित। पात्रभेदसे समय-समयपर इनका अलग-अलग अर्थ किया जाता है। हे वामोरु! उन दोनोंमें आप-जैसी युवतीके साथ होनेवाले संग्रामको कामजनित संग्राम और शत्रुके साथ होनेवाले संग्रामको उत्साहजनित संग्राम कहा गया है॥ ४६—४९॥
सुखदः प्रथमः कान्ते दुःखदश्चारिजः स्मृतः।<br>जानाम्यहं वरारोहे भवत्या मानसं किल॥ ५०<br><br>रतिसंग्रामभावस्ते हृदये परिवर्तते।<br>इति तज्ज्ञं विदित्वा मां त्वत्सकाशं नराधिपः॥ ५१<br><br>प्रेषयामास शुम्भोऽद्य बलेन महतावृत्तम्।हे कान्ते! उनमें प्रथम रतिजन्य संग्राम सुखदायक और शत्रुके साथ किया जानेवाला उत्साहजन्य संग्राम दुःखदायक कहा गया है। हे सुन्दरि! मैं तुम्हारे मनकी बात जानता हूँ; तुम्हारे मनमें रतिजन्य संग्रामका भाव है। मुझको यह सब जाननेमें निपुण समझकर ही महाराज शुम्भने विशाल सेनाके साथ इस समय मुझे आपके पास भेजा है॥ ५०-५१ १/२॥
चतुरासि महाभागे शृणु मे वचनं मृदु॥ ५२<br><br>भज शुम्भं त्रिलोकेशं देवदर्पनिबर्हणम्।<br>पट्टराज्ञी प्रिया भूत्वा भुंक्ष्व भोगाननुत्तमान्॥ ५३हे महाभागे! तुम बड़ी चतुर हो। मेरे मधुर वचन सुनो। देवताओंका अभिमान चूर्ण कर देनेवाले त्रिलोकाधिपति शुम्भको [पतिरूपसे] स्वीकार कर लो और उनकी प्रिय पटरानी बनकर अत्युत्तम सुखोंका उपभोग करो॥ ५२-५३॥
जेष्यति त्वां महाबाहुः शुम्भः कामबलार्थवित्।<br>विचित्रान्कुरु भावांस्त्वं सोऽपि भावान्करिष्यति॥ ५४<br><br>भविष्यति कालिकेयं तत्र वै नर्मसाक्षिणी।<br>एवं सङ्गरयोगेन पतिर्मे परमार्थवित्॥ ५५<br><br>जित्वा त्वां सुखशय्यायां परिश्रान्तां करिष्यति।<br>रक्तदेहां नखाघातैर्दन्तैश्च खण्डिताधराम्॥ ५६<br><br>स्वेदक्लिन्नां प्रभग्नां त्वां संविधास्यति भूपतिः।<br>भविता मानसः कामो रतिसंग्रामजस्तव॥ ५७कामसम्बन्धी बलका रहस्य जाननेवाले विशालबाहु शुम्भ तुम्हें जीत लेंगे। तुम उनके साथ विचित्र हाव-भाव करो, वे भी वैसे ही हाव-भाव प्रदर्शित करेंगे। यह कालिका [उस अवसरपर] हास-विलासकी साक्षी रहेगी। इस प्रकार कामतत्त्वके परमवेत्ता मेरे स्वामी शुम्भ कामयुद्धके द्वारा तुम्हें सुखशय्यापर जीतकर शिथिल कर देंगे। वे महाराज शुम्भ अपने नखोंके आघातसे तुम्हें रक्तरंजित शरीरवाली बना देंगे, दाँतोंसे काटकर तुम्हारे ओठोंको खण्डित कर देंगे, तुम्हें पसीनेसे तर कर देंगे और मर्दित कर डालेंगे; तब तुम्हारा रतिसंग्रामसम्बन्धी मनोरथ पूर्ण हो जायगा॥ ५४—५७॥
दर्शनाद्वश एवास्ते शुम्भः सर्वात्मना प्रिये।<br>वचनं कुरु मे पथ्यं हितकृच्चापि पेशलम्॥ ५८<br><br>भज शुम्भं गणाध्यक्षं माननीयातिमानिनी।<br>मन्दभाग्याश्च ते नूनं ह्यस्त्रयुद्धप्रियाश्च ये॥ ५९हे प्रिये! तुम्हें देखते ही शुम्भ पूर्णरूपसे तुम्हारे वशीभूत हो जायेंगे। अतएव मेरी उचित, कल्याणकारी और सुखकर बात मान लो। तुम माननीयोंमें अत्यन्त मानिनी हो, अतः गणाध्यक्ष शुम्भको स्वीकार कर लो। जो शस्त्रयुद्धसे प्रेम रखते हैं, वे अवश्य ही मन्दभाग्य हैं। रतिक्रीड़ामें प्रीति रखनेवाली हे कान्ते!
अ० २५ ]पञ्चम स्कन्ध६६३

| न तदर्हासि कान्ते त्वं सदा सुरतवल्लभे।<br>अशोकं कुरु राजानं पादाघातविकासितम्॥ ६०<br><br>बकुलं सीधुसेकेन तथा कुरबकं कुरु॥ ६१ | तुम शस्त्रयुद्धके योग्य नहीं हो। जैसे कामिनीके पदप्रहारसे अशोक, मुख मदिराके सेचनसे मौलसिरी और कुरबक प्रफुल्लित हो उठता है, उसी प्रकार तुम भी महाराज शुम्भको शोकरहित और आह्लादित करो॥ ५८-६१॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीमाहात्म्ये देवीपार्श्वे धूम्रलोचनदूतप्रेषणं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥


अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

भगवती काली और धूम्रलोचनका संवाद, कालीके हुंकारसे धूम्रलोचनका भस्म होना तथा शुम्भका चण्ड-मुण्डको युद्धहेतु प्रस्थानका आदेश देना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—[हे महाराज!] यह बात कहकर धूम्रलोचन चुप हो गया। तब भगवती काली हँसकर सुन्दर वचन बोलीं—धूर्त! तुम तो पूरे विदूषक हो और नटों-जैसी बात करते हो। मधुर बोलते हुए तुम व्यर्थ ही मनमें अनेकविध कामनाएँ कर रहे हो॥ १-२॥
इत्युक्त्वा विररामासौ वचनं धूम्रलोचनः।<br>प्रत्युवाच तदा काली प्रहस्य ललितं वचः॥ १<br><br>विदूषकोऽसि जाल्म त्वं शैलूष इव भाषसे।<br>वृथा मनोरथांश्चित्ते करोषि मधुरं वदन्॥ २
बलवान्बलसंयुक्तः प्रेषितोऽसि दुरात्मना।<br>कुरु युद्धं वृथा वादं मुञ्च मूढमतेऽधुना॥ ३हे मूढमते! दुष्टात्मा शुम्भने तुझ बलवान्‌को सेनासे सुसज्जित करके युद्धहेतु भेजा है, अतः अब युद्ध करो और व्यर्थकी बातें छोड़ दो॥ ३॥
हत्वा शुम्भं निशुम्भञ्च त्वदन्यान्वा बलाधिकान्।<br>देवी क्रुद्धा शराघातैर्व्रजिष्यति निजालयम्॥ ४ये देवी कुपित होकर शुम्भ, निशुम्भ तथा तुम्हारे अन्य बलवान् दैत्योंका अपने बाणोंके प्रहारसे संहार करके अपने धामको चली जायँगी॥ ४॥
क्वासौ मन्दमतिः शुम्भः क्व वा विश्वविमोहिनी।<br>अयुक्तः खलु संसारे विवाहविधिरेतयोः॥ ५कहाँ वह मन्दमति शुम्भ और कहाँ ये विश्वमोहिनी जगदम्बा! इन दोनोंका विवाह इस संसारमें सर्वथा अनुपयुक्त है॥ ५॥
सिंही किं त्वतिकामार्ता जम्बुकं कुरुते पतिम्।<br>करिणी गर्दभं वापि गवयं सुरभिः किमु॥ ६क्या अत्यधिक कामार्त होनेपर भी सिंहिनी सियारको, हथिनी किसी गर्दभको अथवा सुरभि किसी सामान्य वृषभको अपना पति बना सकती है?॥ ६॥
गच्छ शुम्भं निशुम्भं च वद सत्यं वचो मम।<br>कुरु युद्धं न चेद्याहि पाताल तरसाधुना॥ ७अब तुम शुम्भ-निशुम्भके पास चले जाओ और उनसे मेरी यह सच्ची बात कह दो कि 'तुम मेरे साथ युद्ध करो; अन्यथा इसी समय शीघ्र पाताललोक चले जाओ'॥ ७॥
व्यास उवाच<br>कालिकाया वचः श्रुत्वा स दैत्यो धूम्रलोचनः।<br>तामुवाच महाभाग क्रोधसंरक्तलोचनः॥ ८**व्यासजी बोले—**हे महाभाग! देवी कालिकाका यह वचन सुनते ही वह दैत्य धूम्रलोचन क्रोधके मारे आँखें लाल करके उनसे कहने लगा—

६६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५

६६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दुर्दर्शं त्वां निहत्याजौ सिंहञ्च मदगर्वितम्।<br>गृहीत्वैनां गमिष्यामि राजानं प्रत्यहं किल॥ ९दुर्दर्श ! अभी तुझे तथा इस मदोन्मत्त सिंहको युद्धमें मारकर और इस स्त्रीको लेकर मैं राजा शुम्भके पास अवश्य चला जाऊँगा॥ ८-९॥
रसभङ्गभयात्कालि बिभेमि त्विह साम्प्रतम्।<br>नोचेत्त्वां निशितैर्बाणैर्हन्म्यद्य कलहप्रिये॥ १०कलहमें अनुराग रखनेवाली हे काली ! रसमें भंग पड़नेकी शंकासे मैं इस समय डर रहा हूँ, नहीं तो मैं अपने तीक्ष्ण बाणोंसे तुम्हें अभी मार डालता ॥ १०॥
कालिकोवाच<br>किं विकत्थसि मन्दात्मन्नायं धर्मो धनुष्मताम्।<br>स्वशक्त्या मुञ्च विशिखानन्तासि यमसंसदि॥ ११**कालिका बोलीं—**हे मन्दबुद्धि! तुम अनर्गल प्रलाप क्यों कर रहे हो, धनुर्धर वीरोंका यह धर्म नहीं है। तुम अपनी पूरी शक्तिसे बाण चलाओ। तुम तो अभी यमलोक जानेवाले हो॥ ११॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं दैत्यः संगृह्य कार्मुकं दृढम्।<br>कालिकां तां शरासारैर्ववर्षार्तिशिलाशितैः॥ १२**व्यासजी बोले—**यह वचन सुनकर वह दैत्य धूम्रलोचन अपना सुदृढ़ धनुष लेकर भगवती कालिकाके ऊपर पत्थरकी सानपर चढ़ाकर तेज किये गये बाणोंकी घोर वर्षा करने लगा॥ १२॥
देवास्तु प्रेक्षकास्तत्र विमानवरसंस्थिताः।<br>तां स्तुवन्तो जयेत्यूचुर्देवीं शक्रपुरोगमाः॥ १३उस समय इन्द्र आदि प्रधान देवता उत्तम विमानोंमें बैठकर यह युद्ध देख रहे थे। वे देवीकी स्तुति करते हुए उनकी जयकार कर रहे थे॥ १३॥
तयोः परस्परं युद्धं प्रवृत्तं चातिदारुणम्।<br>बाणखड्गगदाशक्तिमुसलादिभिरुत्कटम्॥ १४परस्पर उन दोनोंमें बाण, खड्ग, गदा, शक्ति तथा मुसल आदि शस्त्रोंसे अत्यन्त भीषण तथा उग्र युद्ध होने लगा॥ १४॥
कालिका बाणपातैस्तु हत्वा पूर्वं खरानथ।<br>बभञ्ज तद्रथं व्यूढं जहासा च मुहुर्मुहुः॥ १५भगवती कालिकाने पहले अपने बाण-प्रहारोंसे [उसके रथमें जुते] खच्चरोंको मारकर बादमें उसके सुदृढ़ रथको भी चूर्ण कर दिया, फिर वे बार-बार अट्टहास करने लगीं॥ १५॥
स चान्यं रथमारूढः कोपेन प्रज्वलन्निव।<br>बाणवृष्टिं चकारोग्रां कालिकोपरि भारत॥ १६हे भारत! क्रोधाग्निमें जलता हुआ-सा वह दानव धूम्रलोचन दूसरे रथपर सवार हो गया और कालिकाके ऊपर भयंकर बाण-वृष्टि करने लगा॥ १६॥
सापि चिच्छेद तरसा तस्य बाणानसङ्गतान्।<br>मुमोचान्यानुग्रवेगान्दानवोपरि कालिका॥ १७उसके बाण भगवतीके पास पहुँच भी नहीं पाते थे कि वे उन बाणोंको काट डालती थीं। तत्पश्चात् वे कालिका अन्य तीव्रगामी बाण उस दानवके ऊपर छोड़ने लगीं॥ १७॥
तैर्बाणैर्निहतास्तस्य पाष्णिग्राहाः सहस्रशः।<br>बभञ्ज च रथं वेगात्सूतं हत्वा खरानपि॥ १८<br><br>चिच्छेद तद्धनुः सद्यो बाणैरुरगसन्निभैः।<br>मुदं चक्रे सुराणां सा शङ्खनादं तथाकरोत्॥ १९उन बाणोंसे उसके हजारों सहायक सैनिक मारे गये। तत्पश्चात् देवी कालिकाने उसके खच्चरों तथा सारथिको शीघ्रतापूर्वक मारकर उस रथको भी नष्ट कर दिया। उसके बाद देवीने अपने सर्प-सदृश बाणोंसे शीघ्रतापूर्वक उसका धनुष काट डाला। ऐसा करके देवीने देवताओंको आनन्दित कर दिया और वे शंखनाद करने लगीं॥ १८-१९॥