भारतकोश
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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० ३१ ]पञ्चम स्कन्ध६१७
मृते त्वयि महाराज शत्रवस्ते मुदान्विताः ।<br>मङ्गलानि प्रगायन्तो विचरिष्यन्ति सर्वतः ॥ ६४हे महाराज ! यदि कहीं आपका निधन हो गया तो आपके शत्रु प्रसन्नतापूर्वक मंगलगान करते हुए निर्भय होकर सर्वत्र विचरण करेंगे ॥ ६४ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे युद्धात्प्रत्यागतानां रक्षसां शुम्भाय वार्तावर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥


अथैकत्रिंशोऽध्यायः

शुम्भका रणभूमिमें आना और देवीसे वार्तालाप करना, भगवती कालिकाद्वारा उसका वध, देवीके इस उत्तम चरित्रके पठन और श्रवणका फल

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>इति तेषां वचः श्रुत्वा शुम्भो दैत्यपतिस्तथा।<br>उवाच सैनिकानाशु कोपाकुलितलोचनः ॥ १व्यासजी बोले—उन सैनिकोंका यह वचन सुनकर क्रोधसे आकुलित नेत्रोंवाले दानवराज शुम्भने उनसे तुरन्त कहा ॥ १ ॥
शुम्भ उवाच<br>जाल्माः किं ब्रूत दुर्वाच्यं कृत्वा जीवितमुत्सहे।<br>निहत्य सचिवान्भ्रातृन्निर्लज्जो विचरामि किम्॥ २शुम्भ बोला—हे मूर्खों! तुम सब खोटी बात क्यों बोल रहे हो? तुम्हारे वचनोंको मानकर मैं भला अपने जीवनकी रक्षा क्यों करूँ? क्या अपने सचिवों तथा भाई-बन्धुओंका वध कराकर मैं निर्लज्ज बनकर विचरण करूँ? ॥ २ ॥
कालः कर्ता शुभानां वाशुभानां बलवत्तरः।<br>का चिन्ता मम दुर्वारे तस्मिन्नीशेऽप्यरूपके ॥ ३प्राणियोंके शुभ अथवा अशुभका कर्ता जब एकमात्र वही अति बलवान् काल है तो मुझे चिन्ता क्या? क्योंकि परोक्षरूपसे सबपर शासन करनेवाला वह काल टाला नहीं जा सकता ॥ ३ ॥
यद्भवति तद्भवतु यत्करोति करोतु तत्।<br>न मे चिन्तास्ति कुत्रापि मरणाजीवनात्तथा ॥ ४जो हो रहा है, वह होता रहे तथा काल जो कुछ भी कर रहा है, उसे करता रहे; अब तो मुझे जीवन तथा मृत्युके विषयमें किसी भी प्रकारकी चिन्ता नहीं है ॥ ४ ॥
स कालोऽप्यन्यथाकर्तुं भावितो नेशते क्वचित्।<br>न वर्षति च पर्जन्यः श्रावणे मासि सर्वथा ॥ ५<br><br>कदाचिन्मार्गशीर्षे वा पौषे माघेऽथ फाल्गुने।<br>अकाले वर्षतीवाशु तस्मान्मुख्यो न चास्त्ययम्॥ ६वह काल भी भवितव्यताको मिटा सकनेमें समर्थ नहीं है। ऐसा भी होता है कि सावनके महीनेमें मेघ सदा नहीं बरसते; अपितु कभी-कभी अगहन, पौष, माघ तथा फाल्गुनमें असमय ही तेज वृष्टि होने लगती है। अतएव [समस्त कार्योंमें] काल ही प्रधान नहीं है ॥ ५-६ ॥
कालो निमित्तमात्रं तु दैवं हि बलवत्तरम्।<br>दैवेन निर्मितं सर्वं नान्यथा भवतीत्यदः ॥ ७काल तो निमित्तमात्र है, अपितु [इसकी तुलनामें] दैव अधिक बलवान् है। सब कुछ देवनिर्मित है; इसके विपरीत कुछ नहीं होता ॥ ७ ॥
दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम्।<br>जेता यः सर्वदेवानां निशुम्भोऽप्यनया हतः ॥ ८मैं तो दैवको ही प्रधान मानता हूँ। अनर्थकारी पुरुषार्थको धिक्कार है; क्योंकि जिस निशुम्भने सभी देवताओंपर विजय प्राप्त कर ली थी, उसे इस स्त्रीने मार डाला ॥ ८ ॥
६९८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३१

| रक्तबीजो महाशूरः सोऽपि नाशं गतो यदा।<br>तदाहं कीर्तिमुत्सृज्य जीविताशां करोमि किम्॥ ९ | जब महान् शूरवीर रक्तबीज भी विनाशको प्राप्त हो गया, तब अपनी कीर्तिको कलंकित करके मैं ही जीवनकी आशा क्यों करूँ?॥ ९॥ | | प्राप्ते काले स्वयं ब्रह्मा परार्धद्वयसम्मिते।<br>निधनं याति तरसा जगत्कर्ता स्वयं प्रभुः॥ १० | जगत्के रचयिता सर्वसमर्थ स्वयं ब्रह्मा भी दो परार्धका समय बीत जानेपर तत्क्षण ही निधनको प्राप्त हो जाते हैं॥ १०॥ | | चतुर्युगसहस्रं तु ब्रह्मणो दिवसे किल।<br>पतन्ति भवनात्पञ्च नव चेन्द्रास्तथा पुनः॥ ११ | ब्रह्माजीके एक दिनमें एक हजार चतुर्युग समाप्त हो जाते हैं और इतनी ही अवधिमें चौदह इन्द्रोंका स्वर्गसे पतन हो चुकता है॥ ११॥ | | तथैव द्विगुणे विष्णुर्मरणायोपकल्पते।<br>तथैव द्विगुणे काले शङ्करः शान्तिमेति च॥ १२ | इसी प्रकार [ब्रह्माजीके जीवनकालका] दुगुना समय बीतनेपर विष्णुका अन्त हो जाता है तथा इससे भी दूने समयके पश्चात् शंकर भी समाप्त हो जाते हैं॥ १२॥ | | का चिन्ता मरणे मूढा निश्चले दैवनिर्मिते।<br>मही महीधराणाञ्च नाशः सूर्यशशाङ्कयोः॥ १३ | इसी प्रकार पृथ्वी, पर्वत, सूर्य तथा चन्द्रमा आदिका भी विनाश हो जाता है, तब हे मूर्खो! दैवकी बनायी हुई इस अटल मृत्युके विषयमें क्या चिन्ता है?॥ १३॥ | | जातस्य हि ध्रुवं मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।<br>अध्रुवेऽस्मिञ्छरीरे तु रक्षणीयं यशः स्थिरम्॥ १४ | जन्म लेनेवालेकी मृत्यु निश्चित है तथा मरनेवालेका जन्म निश्चित है। अतः इस अनित्य शरीरके द्वारा अपनी स्थिर कीर्तिकी रक्षा करनी चाहिये॥ १४॥ | | रथो मे कल्प्यतां शीघ्रं गमिष्यामि रणाजिरे।<br>जयो वा मरणं वापि भवत्वद्यैव दैवतः॥ १५ | शीघ्रतापूर्वक मेरा रथ तैयार करो। मैं समरांगणमें जाऊँगा। विजय अथवा मरण प्रारब्धानुसार जो भी होनेवाला हो, वह आज ही हो जाय॥ १५॥ | | इत्युक्त्वा सैनिकाञ्छुम्भो रथमास्थाय सत्वरः।<br>प्रययावम्बिका यत्र संस्थिता तु हिमाचले॥ १६ | सैनिकोंसे ऐसा कहकर वह शुम्भ तुरंत रथपर सवार होकर हिमालयकी ओर चल दिया, जहाँ भगवती विराजमान थीं॥ १६॥ | | सैन्यं प्रचलितं तस्य सङ्गे तत्र चतुर्विधम्।<br>हस्त्यश्वरथपादातिसंयुक्तं सायुधं बहु॥ १७ | उस समय हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल चलने-वालोंसे सुसज्जित एवं नानाविध आयुधोंसे युक्त विशाल चतुरंगिणी सेना भी उसके साथ चल पड़ी॥ १७॥ | | तत्र गत्वाचले शुम्भः संस्थितां जगदम्बिकाम्।<br>त्रैलोक्यमोहिनीं कान्तामपश्यत्सिंहवाहिनीम्॥ १८<br><br>सर्वाभरणभूषाढ्यां सर्वलक्षणसंवृताम्।<br>स्तूयमानां सुरैः खस्थैर्गन्धर्वयक्षकिन्नरैः॥ १९<br><br>पुष्पैश्च पूज्यमानाञ्च मन्दारपादपोद्भवैः।<br>कुर्वाणां शङ्खनिनदं घण्टानादं मनोहरम्॥ २० | उस पर्वतपर पहुँचकर शुम्भने त्रिभुवनको मोहित करनेवाली परम सुन्दरी सिंहवाहिनी भगवती जगदम्बिकाको वहाँ विराजमान देखा। वे सभी प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत थीं तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थीं; देवता, यक्ष तथा किन्नर आकाशमें स्थित होकर उनकी स्तुति कर रहे थे तथा मन्दारवृक्षके पुष्पोंसे पूजा कर रहे थे और वे मनोहर शंखध्वनि तथा घंटानाद कर रही थीं॥ १८-२०॥ |

अ० ३१ ]पञ्चम स्कन्ध६९९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दृष्ट्वा तां मोहमगमच्छुम्भः कामविमोहितः।<br>पञ्चबाणाहतः कामं मनसा समचिन्तयत्॥ २१उन्हें देखकर शुम्भ मोहित हो गया। कामबाणसे आहत वह शुम्भ कामासक्त होकर मन-ही-मन सोचने लगा— ॥ २१ ॥
अहो रूपमिदं सम्यगहो चातुर्यमद्भुतम्।<br>सौकुमार्यञ्च धैर्यञ्च परस्परविरोधि यत्॥ २२अहो, इसका ऐसा आकर्षक रूप तथा ऐसा अद्भुत चातुर्य है। सुकुमारता तथा धीरता—ये दोनों परस्पर विरोधीभाव इसमें एक साथ विद्यमान हैं!॥ २२॥
सुकुमारातिन्वङ्गी सद्यः प्रकटयौवना।<br>चित्रमेतदसौ बाला कामभावविवर्जिता॥ २३अत्यन्त कृश शरीरवाली इस सुकुमारीमें अभी-अभी यौवन प्रस्फुटित हुआ है, किंतु आश्चर्य है कि यह रमणी कामभावनासे रहित है॥ २३॥
कामकान्तासमा रूपे सर्वलक्षणलक्षिता।<br>अम्बिकेयं किमेतत्तु हन्ति सर्वान्महाबलान्॥ २४रूपमें कामदेवकी पत्नी रतिके समान सुन्दर तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न यह स्त्री कहीं अम्बिका ही तो नहीं, जो सभी महाबली दानवोंका संहार कर रही है॥ २४॥
उपायः कोऽत्र कर्तव्यो येन मे वशगा भवेत्।<br>न मन्त्रा वा मरालाक्षीसाधने सन्निधौ मम॥ २५इस अवसरपर मैं कौन-सा उपाय करूँ, जिससे यह मेरी वशवर्तिनी हो जाय? इस हंस-सदृश नेत्रोंवालीको वशमें करनेहेतु मेरे पास कोई मन्त्र भी नहीं है॥ २५॥
सर्वमन्त्रमयी ह्येषा मोहिनी मदगर्विता।<br>सुन्दरीयं कथं मे स्याद्वशगा वरवर्णिनी॥ २६सर्वमन्त्रमयी, सबको मोहित करनेवाली, अभिमानमें मत्त रहनेवाली तथा उत्तम लक्षणोंवाली यह सुन्दरी किस प्रकार मेरे वशमें होगी?॥ २६॥
पातालगमनं मेऽद्य न युक्तं समराङ्गणात्।<br>सामदानविभेदैश्च नेयं साध्या महाबला॥ २७अब युद्धभूमि छोड़कर पाताललोक जाना भी मेरे लिये उचित नहीं है। साम, दान तथा भेद आदि उपायोंसे भी यह महाबलशालिनी वशमें नहीं की जा सकती॥ २७॥
किं कर्तव्यं क्व गन्तव्यं विषमे समुपस्थिते।<br>मरणं नोत्तमं चात्र स्त्रीकृतं तु यशोऽपहृत्॥ २८इस विषम परिस्थितिके आ जानेपर अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? स्त्रीके हाथों मर जाना भी उचित नहीं है; क्योंकि ऐसी मृत्यु यशको नष्ट करनेवाली होती है॥ २८॥
मरणमृषिभिः प्रोक्तं सङ्गरे मङ्गलास्पदम्।<br>यत्तत्समानबलयोर्योधयोर्युध्यतोः किल॥ २९ऋषियोंने उस मृत्युको श्रेयस्कर कहा है, जो समरभूमिमें समान बलवाले योद्धाओंके साथ लड़ते-लड़ते प्राप्त हो॥ २९॥
प्राप्तेयं दैवरचिता नारी नरशतोत्तमा।<br>नाशायास्मत्कुलस्येह सर्वथातिबलाबला॥ ३०सैकड़ों वीरोंसे श्रेष्ठ, महाबलशालिनी तथा दैव-विरचित यह नारी मेरे कुलके पूर्ण विनाशके लिये यहाँ उपस्थित हुई है॥ ३०॥
वृथा किं सामवाक्यानि मया योज्यानि साम्प्रतम्।<br>हननायागता ह्येषा किं नु साम्ना प्रसीदति॥ ३१मैं इस समय सामनीतिसे युक्त वचनोंका प्रयोग व्यर्थमें क्यों करूँ? क्योंकि यह तो संहारके लिये आयी हुई है, तो फिर सामवचनोंसे यह कैसे
७००श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३१

| न दानैश्चालितुं योग्या नानाशस्त्रविभूषिता।<br>भेदस्तु विफलः कामं सर्वदेववशानुगा॥ ३२<br><br>तस्मात्तु मरणं श्रेयो न संग्रामे पलायनम्।<br>जयो वा मरणं वाद्य भवत्वेव यथाविधि॥ ३३ | प्रसन्न हो सकती है? अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे विभूषित होनेके कारण दान आदिके प्रलोभनोंसे भी यह विचलित नहीं की जा सकती। भेदनीति भी निष्फल सिद्ध होगी; क्योंकि सभी देवता इसके वशमें हैं॥ ३१-३२॥<br>अतएव संग्राममें मर जाना श्रेयस्कर है, किंतु पलायन करना ठीक नहीं है। अब तो प्रारब्धके अनुसार विजय अथवा मृत्यु जो भी होना हो, वह हो॥ ३३॥ | | व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य मनसा शुम्भः सत्त्वाश्रितोऽभवत्।<br>युद्धाय सुस्थिरो भूत्वा तामुवाच पुरःस्थिताम्॥ ३४ | व्यासजी बोले— इस प्रकार अपने मनमें विचार करके शुम्भने धैर्यका सहारा लिया। अब युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके उसने अपने सामने खड़ी भगवतीसे कहा॥ ३४॥ | | देवि युध्यस्व कान्तेऽद्य वृथायं ते परिश्रमः।<br>मूर्खासि किल नारीणां नायं धर्मः कदाचन॥ ३५ | हे देवि! युद्ध करो, किंतु हे प्रिये! इस समय तुम्हारा यह परिश्रम व्यर्थ है। तुम मूर्ख हो; क्योंकि युद्ध करना स्त्रियोंका धर्म कदापि नहीं है॥ ३५॥ | | नारीणां लोचने बाणा भ्रुवावेव शरासनम्।<br>हावभावास्तु शस्त्राणि पुमाल्लक्ष्यं विचक्षणः॥ ३६ | स्त्रियोंके नेत्र ही बाण हैं, उनकी भौंहें ही धनुष हैं, उनके हाव-भाव ही शस्त्र हैं और रसज्ञ पुरुष उनका लक्ष्य है॥ ३६॥ | | सन्नाहश्चाङ्गरागोऽत्र रथश्चापि मनोरथः।<br>मन्दप्रजल्पितं भेरीशब्दो नान्यः कदाचन॥ ३७ | अंगराग (शीतल चन्दन आदि) ही उनका कवच है, मनोकामना रथ है तथा धीरे-धीरे मधुर वाणीमें बोलना भेरी-ध्वनि है। अतएव स्त्रियोंके लिये अन्य शस्त्रोंकी कोई आवश्यकता नहीं रहती॥ ३७॥ | | अन्यास्त्रधारणं स्त्रीणां विडम्बनमसंशयम्।<br>लज्जैव भूषणं कान्ते न च धाष्टर्यं कदाचन॥ ३८ | यदि स्त्रियाँ इनके अतिरिक्त अन्य अस्त्र धारण करें तो यह निश्चितरूपसे उनके लिये विडम्बना ही है। हे प्रिये! लज्जा ही नारियोंका आभूषण है, धृष्टता उन्हें कभी भी शोभा नहीं देती॥ ३८॥ | | युध्यमाना वरा नारी कर्कशेवाभिदृश्यते।<br>स्तनौ सङ्गोपनीयौ वा धनुषः कर्षणे कथम्॥ ३९ | युद्ध करती हुई उत्तम नारी भी कर्कशाके सदृश दिखायी देती है। धनुष खींचते समय कोई स्त्री अपने दोनों स्तनोंको छिपानेमें कैसे सफल हो सकती है?॥ ३९॥ | | क्व मन्दगमनं कुत्र गदामादाय धावनम्।<br>बुद्धिदा कालिका तेऽत्र चामुण्डा परनायिका॥ ४०<br><br>चण्डिका मन्त्रमध्यस्था लालनेऽसुस्वरा शिवा।<br>वाहनं मृगराडास्ते सर्वसत्त्वभयङ्करः॥ ४१ | कहाँ नारियोंकी मन्थरगति और कहाँ युद्धमें गदा लेकर दौड़ना। इस समय यह कालिका तथा दूसरी स्त्री चामुण्डा ही तुम्हें बुद्धि देनेवाली हैं। मध्यस्थ होकर चण्डिका मन्त्रणा देती है, कर्कश स्वरवाली शिवा तुम्हारी शुश्रूषामें रहती है और सभी प्राणियोंमें भयंकर सिंह तुम्हारा वाहन है॥ ४०-४१॥ |

अ० ३१ ]पञ्चम स्कन्ध७०१
संस्कृतहिन्दी
वीणानादं परित्यज्य घण्टानादं करोषि यत्।<br>रूपयौवनयोः सर्वं विरोधि वरवर्णिनि॥ ४२हे सुन्दरि! वीणा-वादन छोड़कर तुम यह जो घण्टा-नाद कर रही हो, वह सब तुम्हारे रूप तथा यौवनके सर्वथा विपरीत है॥ ४२॥
यदि ते सङ्गरेच्छास्ति कुरूपा भव भामिनि।<br>लम्बोष्ठी कुनखी क्रूरा ध्वांक्षवर्णा विलोचना॥ ४३<br><br>लम्बपादा कुदन्ती च मार्जारनयनाकृतिः।<br>ईदृशं रूपमास्थाय तिष्ठ युद्धे स्थिरा भव॥ ४४<br><br>कर्कशं वचनं ब्रूहि ततो युद्धं करोम्यहम्।<br>ईदृशीं सुदतीं दृष्ट्वा न मे पाणिः प्रसीदति॥ ४५<br><br>हन्तुं त्वां मृगशावाक्षि कामकान्तोपमे मृधे।हे भामिनि! यदि युद्ध करना ही तुम्हें अभीष्ट है तो तुम सर्वप्रथम लम्बे ओठोंवाली, विचित्र नखोंवाली, क्रूर स्वभाववाली, कौए-जैसे वर्णवाली, विकृत आँखोंवाली, लम्बे पैरोंवाली, भयंकर दाँतोंवाली और बिल्लीसदृश नेत्रोंवाली कुरूप स्त्री बन जाओ। ऐसा ही विकराल रूप धारण करके तुम युद्धभूमिमें स्थिरतापूर्वक खड़ी हो जाओ और कर्कश वचन बोलो, तभी मैं तुम्हारे साथ युद्ध करूँगा; क्योंकि हे मृगशावक-सदृश नेत्रोंवाली! हे रतितुल्य सुन्दरि! सुन्दर दाँतोंवाली ऐसी रमणीको देखकर तुम्हें युद्धमें मारनेके लिये मेरा हाथ नहीं उठ पा रहा है॥ ४३—४५ १/२॥
व्यास उवाच<br>इति ब्रुवाणं कामार्तं वीक्ष्य तं जगदम्बिका॥ ४६<br><br>स्मितपूर्वमिदं वाक्यमुवाच भरतोत्तम।व्यासजी बोले— हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! उस कामातुर शुम्भको ऐसा बोलते हुए देखकर भगवती जगदम्बा मुसकराकर यह वचन कहने लगीं—॥ ४६ १/२॥
देव्युवाच<br>किं विषीदसि मन्दात्मन् कामबाणविमोहितः॥ ४७<br><br>प्रेक्षिकाहं स्थिता मूढ कुरु कालिकया मृधम्।<br>चामुण्डया वा कुर्वैते तव योग्ये रणाङ्गणे॥ ४८<br><br>प्रहरस्व यथाकामं नाहं त्वां योद्धुमुत्सहे।<br>इत्युक्त्वा कालिकां प्राह देवी मधुरया गिरा॥ ४९देवी बोलीं— हे मन्दबुद्धि! कामबाणसे विमोहित होकर तुम इस प्रकार विषाद क्यों कर रहे हो? हे मूढ़! तुम पहले कालिका अथवा चामुण्डाके साथ ही युद्ध कर लो। ये दोनों देवियाँ ही समरांगणमें तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें पूर्ण समर्थ हैं। मैं तो केवल दर्शक बनकर खड़ी हूँ। तुम इन दोनोंपर यथेच्छ प्रहार करो। मैं तुमसे लड़नेकी इच्छा नहीं करती॥ ४७-४८ १/२॥
जह्येनं कालिके क्रूरे कुरूपप्रियमाहवे।शुम्भसे ऐसा कहकर भगवतीने मधुर वाणीमें कालिकासे कहा—हे क्रूर कालिके! कुरूपाके साथ लड़नेकी इच्छावाले इस दानवको तुम युद्धमें मार डालो॥ ४९ १/२॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्ता कालिका कालप्रेरिता कालरूपिणी॥ ५०<br><br>गदां प्रगृह्य तरसा तस्थावाजौ कृतोद्यमा।<br>तयोः परस्परं युद्धं बभूवातिभयानकम्॥ ५१<br><br>पश्यतां सर्वदेवानां मुनीनाञ्च महात्मनाम्।व्यासजी बोले— भगवतीके इस प्रकार कहनेपर कालरूपिणी कालिका कालसे प्रेरित होकर बड़ी तेजीसे तत्काल गदा उठाकर सावधानीपूर्वक रणमें खड़ी हो गयीं। इसके बाद सभी देवताओं, मुनियों और महात्माओंके देखते-देखते उन दोनोंमें अतीव भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया॥ ५०-५१ १/२॥
७०२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गदामुद्यम्य शुम्भोऽथ जघान कालिकां रणे॥ ५२<br>कालिका दैत्यराजानं गदया न्यहनद् भृशम्।<br>बभंजास्य रथं चण्डी गदया कनकोज्ज्वलम्॥ ५३<br>खरान्हत्वा जघानाशु दारुकं दारुणस्वना।<br>स पदातिर्गदां गुर्वीं समादाय क्रुधान्वितः॥ ५४शुम्भने अपनी गदा लेकर उससे कालिकापर प्रहार किया। भगवती कालिका भी अपनी गदासे दैत्यराज शुम्भपर तेज प्रहार करने लगीं। भयानक स्वरवाली चण्डीने गदासे उस दैत्यके सुवर्णमय चमकीले रथको चूर-चूर कर डाला और [शुम्भका रथ खींचनेवाले] गदहोंको मारकर उसके सारथिको भी मार डाला॥ ५२-५३ १/२॥<br>अब क्रोधमें भरे हुए शुम्भने अपनी विशाल गदा लेकर अट्टहास करते हुए पैदल ही पहुँचकर कालिकाकी दोनों भुजाओंके मध्यभाग (वक्षःस्थल)-पर प्रहार किया॥ ५४ १/२॥
कालिकाभुजयोर्मध्ये प्रहसन्नहनत्तदा।<br>वञ्चयित्वा गदाघातं खड्गमादाय सत्वरा॥ ५५<br>चिच्छेदास्य भुजं सव्यं सायुधं चन्दनार्चितम्।<br>स छिन्नबाहुर्विरथो गदापाणिः परिप्लुतः॥ ५६तब कालिकाने उसके गदा-प्रहारको निष्फल करके शीघ्रतापूर्वक तलवार उठाकर शुम्भके चन्दनचर्चित तथा आयुधयुक्त बायें हाथको काट दिया॥ ५५ १/२॥<br>हाथ कट जाने तथा रथविहीन होनेके बावजूद भी रक्तसे लथपथ वह शुम्भ हाथमें गदा लिये हुए शीघ्रतापूर्वक कालिकाके पास पहुँचकर उनके ऊपर प्रहार करने लगा॥ ५६ १/२॥
अचिरेण समागम्य कालिकामहनत्तदा।<br>काली च करवालेन भुजं तस्याथ दक्षिणम्॥ ५७<br>चिच्छेद प्रहसन्ती सा सगदं किल साङ्गदम्।<br>कर्तुं पादप्रहारं स कुपितः प्रययौ जवात्॥ ५८तब कालीने अपने करवाल (तलवार)-से उसके गदायुक्त तथा बाजूबन्दसे सुशोभित दाहिने हाथको हँसते-हँसते काट डाला॥ ५७ १/२॥<br>इसके बाद वह शुम्भ कुपित होकर कालिकापर पैरसे प्रहार करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ा। तभी कालिकाने अपनी तलवारसे तुरंत उसके दोनों पैर भी काट डाले॥ ५८ १/२॥
काली चिच्छेद चरणौ खड्गेनास्य त्वरान्विता।<br>सच्छिन्नकरपादोऽपि तिष्ठ तिष्ठेति च ब्रुवन्॥ ५९<br>धावमानो ययावाशु कालिकां भीषयन्निव।<br>तमागच्छन्तमालोक्य कालिका कमलोपमम्॥ ६०हाथ-पैर कट जानेपर भी 'ठहरो-ठहरो' ऐसा कहता हुआ वह शुम्भ कालिकाको भयभीत करते हुए वेगपूर्वक दौड़ता हुआ उनकी ओर बढ़ा॥ ५९ १/२॥<br>उसे आते देखकर कालिकाने उसके कमलसदृश मस्तकको काट दिया, जिससे उसके कण्ठसे रक्तकी अजस्र धारा बहने लगी। मस्तक कट जानेपर पर्वततुल्य वह शुम्भ जमीनपर गिर पड़ा और उसके प्राण शरीरसे निकलकर तत्काल प्रयाण कर गये॥ ६०-६१ १/२॥
चकर्त मस्तकं कण्ठाद्रुधिरौघवहं भृशम्।<br>छिन्नेऽसौ मस्तके भूमौ पपात गिरिसन्निभः॥ ६१<br>प्राणा विनिर्ययुस्तस्य देहादुत्क्रम्य सत्वरम्।<br>गतासुं पतितं दैत्यं दृष्ट्वा देवाः सवासवाः॥ ६२<br>तुष्टुवुस्तां तदा देवीं चामुण्डां कालिकां तथा।दैत्य शुम्भको इस प्रकार प्राणविहीन होकर गिरा हुआ देखकर इन्द्रसहित सभी देवता भगवती चामुण्डा तथा कालिकाकी स्तुति करने लगे॥ ६२ १/२॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे

अ० ३२ ]पञ्चम स्कन्ध७०३

| ववुर्वाताः शिवास्तत्र दिशश्च विमला भृशम्॥ ६३<br><br>बभूवुश्चाग्नयो होमे प्रदक्षिणशिखाः शुभाः।<br>हतशेषाश्च ये दैत्याः प्रणम्य जगदम्बिकाम्॥ ६४<br><br>त्यक्त्वायुधानि ते सर्वे पातालं प्रययुर्नृप।<br>एतत्त्ते सर्वमाख्यातं देव्याश्चरितमुत्तमम्॥ ६५<br><br>शुम्भादीनां वधं चैव सुराणां रक्षणं तथा।<br>एतदाख्यानकं सर्वं पठन्ति भुवि मानवाः॥ ६६<br><br>शृण्वन्ति च सदा भक्त्या ते कृतार्था भवन्ति हि।<br>अपुत्रो लभते पुत्रान्निर्धनश्च धनं बहु॥ ६७<br><br>रोगी च मुच्यते रोगात्सर्वान्कामानवाप्नुयात्।<br>शत्रुतो न भयं तस्य य इदं चरितं शुभम्।<br>शृणोति पठते नित्यं मुक्तिभाग्जायते नरः॥ ६८ | सुखदायक पवन बहने लगा तथा सभी दिशाएँ अत्यन्त निर्मल हो गयीं। हवन करते समय [शुभ सूचनाके रूपमें] अग्निकी पवित्र ज्वालाएँ दाहिनी ओरसे उठने लगीं॥ ६३ ½॥<br><br>हे राजन्! जो दानव मरनेसे बच गये थे, वे सभी जगदम्बिकाको प्रणाम करके अपने-अपने आयुध त्यागकर पाताल चले गये॥ ६४ ½॥<br><br>देवीका उत्तम चरित्र, शुम्भ आदि दैत्योंका वध तथा देवताओंकी रक्षा—इन सबका वर्णन आपसे कर दिया। पृथ्वीपर रहनेवाले जो मनुष्य इस समस्त आख्यानका भक्तिभावसे निरन्तर पठन तथा श्रवण करते हैं, वे निश्चितरूपसे कृतार्थ हो जाते हैं। पुत्रहीनको पुत्र प्राप्त होते हैं, निर्धनको विपुल सम्पदा सुलभ हो जाती है तथा रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है। वह सभी वांछित फल प्राप्त कर लेता है और उसे शत्रुओंसे किसी प्रकारका भय नहीं रह जाता है। जो मनुष्य इस पवित्र आख्यानका नित्य पठन तथा श्रवण करता है, वह अन्तमें मोक्षका भागी हो जाता है॥ ६५—६८॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
शुम्भवधो नामैकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥


अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

देवीमाहात्म्यके प्रसंगमें राजा सुरथ और समाधि वैश्यकी कथा

जनमेजय उवाच<br>महिमा वर्णितः सम्यक्चण्डिकायास्त्वया मुने।<br>केन चाराधिता पूर्वं चरित्रत्रययोगतः॥ १जनमेजय बोले— हे मुने! आपने भगवती चण्डिकाकी महिमाका भलीभाँति वर्णन किया। अब आप यह बतानेकी कृपा करें कि तीन चरित्रोंका प्रयोग करके पहले किसने भगवतीकी आराधना की थी?॥ १॥
प्रसन्ना कस्य वरदा केन प्राप्तं फलं महत्।<br>आराध्य कामदां देवीं कथयस्व कृपानिधे॥ २वे वरदायिनी भगवती किसके ऊपर प्रसन्न हुईं? सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाली देवीकी उपासना करके किसने महान् फल प्राप्त किया? हे कृपानिधान! यह सब बताइये॥ २॥
उपासनाविधिं ब्रह्मंस्तथा पूजाविधिं वद।<br>विस्तरेण महाभाग होमस्य च विधिं पुनः॥ ३हे ब्रह्मन्! हे महाभाग! जगदम्बाकी उपासनाविधि, पूजाविधि तथा हवनविधिका भी विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये॥ ३॥

| ७०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३२ | | :--- | :--- |

| सूत उवाच<br>इति भूपवचः श्रुत्वा प्रीतः सत्यवतीसुतः।<br>प्रत्युवाच नृपं कृष्णो महामायाप्रपूजनम्॥ ४ | सूतजी बोले— राजाकी यह बात सुनकर सत्यवतीनन्दन कृष्णद्वैपायन प्रसन्न होकर उन्हें महामाया भगवतीका पूजन-विधान बताने लगे॥ ४॥ | | व्यास उवाच<br>स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं सुरथो नाम पार्थिवः।<br>बभूव परमोदारः प्रजापालनतत्परः॥ ५<br>सत्यवादी कर्मपरो ब्राह्मणानाञ्च पूजकः।<br>गुरुभक्तिरतो नित्यं स्वदारगमने रतः॥ ६<br>दानशीलोऽविरोधी च धनुर्वेदैकपारगः। | व्यासजी बोले— पूर्वकालमें स्वारोचिष-मन्वन्तरमें सुरथ नामक एक राजा हुए; जो परम उदार, प्रजापालनमें तत्पर, सत्यवादी, कर्मनिष्ठ, ब्राह्मणोंके उपासक, गुरुजनोंके प्रति भक्ति रखनेवाले, सदा अपनी ही भार्यामें अनुरक्त, दानशील, किसीके साथ विरोधभाव न रखनेवाले तथा धनुर्विद्यामें पूर्ण पारंगत थे॥ ५-६ १/२ ॥ | | एवं पालयतो राज्यं म्लेच्छाः पर्वतवासिनः॥ ७<br>बलाच्छत्रुत्वमापन्नाः सैन्यं कृत्वा चतुर्विधम्।<br>हस्त्यश्वरथपादातिसहितास्ते मदोत्कटाः॥ ८<br>कोलाविध्वंसिनः प्राप्ताः पृथ्वीग्रहणतत्पराः।<br>सुरथः सैन्यमादाय सम्मुखः समपद्यत॥ ९<br>युद्धं समभवद् घोरं तस्य तैरतिदारुणैः। | इस प्रकार प्रजापालनमें तत्पर रहनेवाले राजा सुरथसे कुछ पर्वतवासी म्लेच्छोंने अनायास ही शत्रुता ठान ली। हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सैनिकोंसे सुसज्जित चतुरङ्गिणी सेना लेकर अभिमानमें चूर वे कोलाविध्वंसी सुरथके राज्यपर अधिकार करनेकी लालसासे वहाँ आ पहुँचे। सुरथ भी अपनी सेना लेकर सामने डट गये। उन महाभयंकर म्लेच्छोंके साथ राजा सुरथका भीषण युद्ध होने लगा॥ ७-९ १/२ ॥ | | म्लेच्छानां तु बलं स्वल्पं राजंस्तद्बलमद्भुतम्॥ १०<br>तथापि तैर्जितो युद्धे दैवाद्राजा पराजितः।<br>भग्नश्च स्वपुरं प्राप्तः सुरक्षं दुर्गमण्डितम्॥ ११ | यद्यपि म्लेच्छोंकी सेना बहुत थोड़ी थी तथा राजाकी सेना अत्यन्त विशाल थी, फिर भी दैवयोगसे उन्होंने राजा सुरथको युद्धमें जीत लिया। इस प्रकार उनसे पराजित हुए राजा सुरथ हताश होकर अपने दुर्गवेष्टित सुरक्षित नगरमें आ गये॥ १०-११॥ | | चिन्तयामास मेधावी राजा नीतिविचक्षणः।<br>प्रधानान्विमना दृष्ट्वा शत्रुपक्षसमाश्रितान्॥ १२<br>स्थानं गृहीत्वा विपुलं परिखादुर्गमण्डितम्।<br>कालप्रतीक्षा कर्तव्या किं वा युद्धं वरं मतम्॥ १३<br>मन्त्रिणः शत्रुवशगा मन्त्रयोग्या न ते किल।<br>किं करोमीति मनसा भूपतिः समचिन्तयत्॥ १४<br>कदाचित्ते गृहीत्वा मां पापाचाराः पराश्रिताः।<br>शत्रुभ्योऽथ प्रदास्यन्ति तदा किं वा भविष्यति॥ १५<br>पापबुद्धिषु विश्वासो न कर्तव्यः कदाचन।<br>किन्न ते वै प्रकुर्वन्ति ये लोभवशगा नराः॥ १६<br>भ्रातरं पितरं मित्रं सुहृदं बान्धवं तथा। | पश्चात् प्रतिभासम्पन्न तथा नीतिविशारद राजा सुरथ अपने मन्त्रियोंको शत्रुपक्षके अधीन देखकर अत्यन्त खिन्नमनस्क होकर विचार करने लगे कि मैं खाई तथा किलेसे सुरक्षित किसी बड़े स्थानपर रहकर समयकी प्रतीक्षा करूँ अथवा मेरे लिये युद्ध करना उचित होगा। मेरे मन्त्री शत्रुके वशीभूत हो गये हैं, इसलिये वे अब परामर्श करनेयोग्य नहीं रह गये हैं, तो अब मैं क्या करूँ? वे राजा सुरथ पुनः मन-ही-मन विचार करने लगे। कदाचित् वे पापी तथा शत्रुके साथ मिले हुए मन्त्री मुझे पकड़कर शत्रुओंको सौंप देंगे, तब क्या होगा? पापबुद्धि पुरुषोंपर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि जो मनुष्य लोभके वशीभूत होते हैं वे क्या-क्या नहीं कर बैठते? लोभपरायण मनुष्य अपने भाई, पिता, मित्र, सुहृद्, |

अ० ३२] पञ्चम स्कन्ध ७०५

अ० ३२] पञ्चम स्कन्ध ७०५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गुरुं पूज्यं द्विजं द्वेष्टि लोभाविष्टः सदा नरः ॥ १७<br>तस्मान्मया न कर्तव्यो विश्वासः सर्वथाधुना ।<br>मन्त्रिवर्गेऽतिपापिष्ठे शत्रुपक्षसमाश्रिते ॥ १८बन्धु-बान्धव, पूजनीय गुरु तथा ब्राह्मणसे भी सदा द्वेष करता है। अतएव इस समय शत्रुपक्षके आश्रयको प्राप्त अत्यन्त पापपरायण अपने मन्त्रिसमुदायपर मुझे बिलकुल विश्वास नहीं करना चाहिये॥ १२—१८॥
इति सञ्चिन्त्य मनसा राजा परमदुर्मनाः ।<br>एकाकी हयमारुह्य निर्जगाम पुरान्नतः ॥ १९इस प्रकार अपने मनमें भलीभाँति विचार करके अत्यन्त दुःखीचित्त राजा सुरथ घोड़ेपर आरूढ होकर अकेले ही उस नगरसे निकल पड़े॥ १९॥
असहायोऽथ निर्गत्य गहनं वनमाश्रितः ।<br>चिन्तयामास मेधावी क्व गन्तव्यं मया पुनः ॥ २०वे बिना किसी सहायकको साथ लिये ही नगरसे बाहर निकलकर एक घने जंगलमें चले गये। प्रतिभासम्पन्न राजा सुरथ सोचने लगे कि अब मुझे कहाँ चलना चाहिये ? ॥ २०॥
योजनत्रयमात्रे तु मुनेराश्रममुत्तमम् ।<br>ज्ञात्वा जगाम भूपालस्तापसस्य सुमेधसः ॥ २१तपस्वी सुमेधाका पवित्र आश्रम यहाँसे मात्र तीन योजनकी दूरीपर है—यह जानकर राजा सुरथ वहाँ चले गये॥ २१॥
बहुवृक्षसमायुक्तं नदीपुलिनसंश्रितम् ।<br>निर्वैरश्वापदाकीर्णं कोकिलारावमण्डितम् ॥ २२<br>शिष्याध्ययनशब्दाढ्यं मृगयूथशतावृत्तम् ।<br>नीवारान्नसुपक्वाढ्यं सुपुष्पफलपादपम् ॥ २३<br>होमधूमसुगन्धेन प्रीतिदं प्राणिनां सदा ।<br>वेदध्वनिसमाक्रान्तं स्वर्गादपि मनोहरम् ॥ २४<br>दृष्ट्वा तमाश्रमं राजा बभूवासौ मुदान्वितः ।<br>भयं त्यक्त्वा मतिं चक्रे विश्रामाय द्विजाश्रमे ॥ २५बहुत प्रकारके वृक्षोंसे युक्त, नदीके तटपर विराजमान, वैरभावसे रहित होकर विचरण करनेवाले पशुओंसे समन्वित, कोयलोंकी मधुर ध्वनिसे मण्डित, अध्ययनरत शिष्योंके स्वरसे निनादित, सैकड़ों मृगसमूहोंसे घिरे हुए, भलीभाँति पके हुए नीवारान्नसे परिपूर्ण, सुन्दर फल-फूलसे लदे हुए पादपोंसे सुशोभित, होमके सुगन्धित धूमसे प्राणियोंको सदा आनन्दित करनेवाले, निरन्तर वेदध्वनिसे परिव्याप्त तथा स्वर्गसे भी मनोहर उस आश्रमको देखकर वे राजा अत्यन्त आनन्दित हुए और उन्होंने भय त्यागकर मुनिके आश्रममें विश्राम करनेका निश्चय कर लिया॥ २२—२५॥
आसज्य पादपेऽश्वं तु जगाम विनयान्वितः ।<br>दृष्ट्वा तं मुनिमासीनं सालच्छायासु संश्रितम् ॥ २६<br>मृगाजिनासनं शान्तं तपसातिकृशं ऋजुम् ।<br>अध्यापयन्तं शिष्यांश्च वेदशास्त्रार्थदर्शिनम् ॥ २७<br>रहितं क्रोधलोभाद्यैर्द्वन्द्वातीतं विमत्सरम् ।<br>आत्मज्ञानरतं सत्यवादिनं शमसंयुतम् ॥ २८<br>तं वीक्ष्य भूपतिर्भूमौ पपात दण्डवत्तदा ।<br>तदग्रेऽश्रुजलापूर्णनयनः प्रेमसंयुतः ॥ २९तत्पश्चात् अपने घोड़ेको एक वृक्षमें बाँधकर उन्होंने विनम्रतापूर्वक आश्रममें प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने देखा कि मुनि एक सालवृक्षकी छायामें मृगचर्मके आसनपर बैठे हुए हैं, उनकी आकृति शान्त है, तपस्या करनेके कारण उनका शरीर क्षीण हो गया है, उनका स्वभाव अति कोमल है, वे शिष्योंको पढ़ा रहे हैं, वे वेद-शास्त्रोंके तत्त्वदर्शी विद्वान् हैं, क्रोध-लोभ आदि विकारोंसे मुक्त हैं, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे परे हैं, ईर्ष्यारहित हैं, आत्मज्ञानके चिन्तनमें संलग्न हैं, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय हैं। उन्हें देखकर अश्रुपूरित नयनोंवाले राजा सुरथ प्रेमपूर्वक उनके आगे दण्डकी भाँति भूतलपर गिर पड़े॥ २६—२९॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 A

७०६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३२

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते तमुवाच तदा मुनिः।<br>शिष्यो ददौ बृसीं तस्मै गुरुणा नोदितस्तदा॥ ३०तब मुनिने उनसे कहा—उठिये-उठिये, आपका कल्याण हो। तत्पश्चात् गुरुसे आदेश पाकर एक शिष्यने उन्हें आसन प्रदान किया॥ ३०॥
उत्थाय नृपतिस्तस्यां समासीनस्तदाज्ञया।<br>अर्घ्यपाद्यार्हणं चक्रे सुमेधा विधिपूर्वकम्॥ ३१<br><br>पप्रच्छात्र कुतः प्राप्तः कस्त्वं चिन्तापरः कथम्।<br>कथयस्व यथाकामं संवृतं कारणं त्विह॥ ३२<br><br>किमागमनकृत्यं ते ब्रूहि कार्यं मनोगतम्।<br>करिष्ये वाञ्छितं काममसाध्यमपि यत्तव॥ ३३तब वे उठकर मुनिसे आज्ञा लेकर उस आसनपर बैठ गये। इसके बाद सुमेधाऋषिने अर्घ्य-पाद्य आदिसे उनका विधिपूर्वक सत्कार किया। मुनिने उनसे पूछा कि आप यहाँ कहाँसे आये हैं? आप कौन हैं तथा चिन्तित क्यों हैं? यहाँ आनेका जो भी कारण हो, उसे आप यथारुचि बतायें। आपके आगमनका प्रयोजन क्या है? आप अपने मनके विचारोंको अवश्य बताइये। आपका कोई असाध्य मनोरथ होगा तो उसे भी मैं पूर्ण करूँगा॥ ३१–३३॥
राजोवाच<br>सुरथो नाम राजाहं शत्रुभिश्च पराजितः।<br>त्यक्त्वा राज्यं गृहं भार्यामहं ते शरणं गतः॥ ३४<br><br>यदाज्ञापयसे ब्रह्मंस्तदहं भक्तितत्परः।<br>करिष्यामि न मे त्राता त्वदन्यः पृथिवीतले॥ ३५<br><br>शत्रुभ्यो मे भयं घोरं प्राप्तोऽस्म्यद्य तवान्तिकम्।<br>त्रायस्व मुनिशार्दूल शरणागतवत्सल॥ ३६राजा बोले—मैं सुरथ नामवाला राजा हूँ। शत्रुओंसे पराजित होकर मैं राज्य, महल तथा स्त्री—सब कुछ छोड़कर आपकी शरणमें आया हूँ॥ ३४॥<br><br>हे ब्रह्मन्! अब आप मुझे जो भी आज्ञा देंगे, मैं श्रद्धापूर्वक वही करूँगा। इस पृथ्वीतलपर आपके अतिरिक्त अब कोई दूसरा मेरा रक्षक नहीं है॥ ३५॥<br><br>हे मुनिराज! हे शरणागतवत्सल! शत्रुओंसे मुझे महान् भय उपस्थित है, अतएव मैं आपके पास आया हूँ; अब आप मेरी रक्षा कीजिये॥ ३६॥
ऋषिरुवाच<br>निर्भयं वस राजेन्द्र नात्र ते शत्रवः किल।<br>आगमिष्यन्ति बलिनो निश्चयं तपसो बलात्॥ ३७<br><br>नात्र हिंसा प्रकर्तव्या वनवृत्त्या नृपोत्तम।<br>कर्तव्यं जीवनं शस्तैर्नीवारफलमूलकैः॥ ३८ऋषि बोले—हे राजेन्द्र! आप निर्भीक होकर यहाँ रहिये। यह निश्चित है कि मेरी तपस्याके प्रभावसे आपके पराक्रमी शत्रु यहाँ नहीं आ सकेंगे॥ ३७॥<br><br>हे नृपश्रेष्ठ! यहाँपर आपको हिंसा नहीं करनी चाहिये और वनवासियोंकी भाँति पवित्र नीवार तथा फल-मूल आदिके द्वारा जीवन-निर्वाह करना चाहिये॥ ३८॥
व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा निर्भयः स नृपस्तदा।<br>उवासाश्रम एवासौ फलमूलाशनः शुचिः॥ ३९<br><br>कदाचित्स नृपस्तत्र वृक्षच्छायां समाश्रितः।<br>चिन्तयामास चिन्तार्तो गृह एव गताशयः॥ ४०<br><br>राज्यं मे शत्रुभिः प्राप्तं म्लेच्छैः पापरतैः सदा।<br>सम्पीडिताः स्युर्लोकास्तैर्दुराचारैर्गतत्रपैः॥ ४१व्यासजी बोले—तब मुनिकी यह बात सुनकर राजा सुरथ निर्भय हो गये। अब वे फल-मूलका आहार करते हुए पवित्रताके साथ उस आश्रममें ही रहने लगे॥ ३९॥<br><br>किसी समय उस आश्रममें एक वृक्षकी छायामें बैठे हुए चिन्ताकुल राजा सुरथका चित्त घरकी ओर चला गया और वे सोचने लगे—॥४०॥<br><br>निरन्तर पापकर्ममें लगे रहनेवाले म्लेच्छ शत्रुओंने मेरा राज्य छीन लिया है। उन दुराचारी तथा निर्लज्ज म्लेच्छोंके द्वारा मेरी प्रजा बहुत सतायी जाती होगी॥ ४१॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 B

अ० ३२ ]पञ्चम स्कन्ध७०७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गजाश्च तुरगाः सर्वे दुर्बला भक्ष्यवर्जिताः।<br>जाताः स्युर्र्नात्र सन्देहः शत्रुणा परिपीडिताः॥ ४२मेरे सभी हाथी तथा घोड़े आहार न पाने तथा शत्रुसे प्रताड़ित किये जानेके कारण अत्यन्त दुर्बल हो गये होंगे; इसमें तो कोई सन्देह नहीं है॥ ४२॥
सेवका मम सर्वे ते शत्रूणां वशवर्तिनः।<br>दुःखिता एव जाताः स्युः पालिता ये मया पुरा॥ ४३अपने जिन सेवकोंका मैंने पहले पालन-पोषण किया था, वे सब शत्रुओंके अधीन हो जानेके कारण कष्टका अनुभव करते होंगे॥ ४३॥
धनं मे सुदुराचारैरसद्व्ययपरैः परैः।<br>द्यूतासवभुजिष्यादिस्थाने स्यात्प्रापितं किल॥ ४४उन अति दुराचारी तथा अपव्यय करनेके स्वभाववाले शत्रुओंने मेरा धन द्यूत, मदिरालय एवं वेश्यालयोंमें निश्चित-रूपसे खर्च कर दिया होगा॥ ४४॥
कोशक्षयं करिष्यन्ति व्यसनैः पापबुद्धयः।<br>न पात्रदाननिपुणा म्लेच्छास्ते मन्त्रिणोऽपि मे॥ ४५वे पापबुद्धि मेरा समस्त राजकोष व्यसनोंमें नष्ट कर डालेंगे, सत्पात्रोंको दान देनेकी योग्यता भी उन म्लेच्छोंमें नहीं है और मेरे मन्त्री भी अधीनतामें रहनेके कारण उन्हींके जैसे हो गये होंगे॥ ४५॥
इति चिन्तापरो राजा वृक्षमूलस्थितो यदा।<br>तदाजगाम वैश्यस्तु कश्चिदार्तिपरस्तथा॥ ४६महाराज सुरथ वृक्षके नीचे बैठकर इसी चिन्तामें पड़े हुए थे कि उसी समय एक विषादग्रस्त वैश्य वहाँ आ पहुँचा॥ ४६॥
नृपेण पुरतो दृष्टः पार्श्वे तत्रोपवेशितः।<br>पप्रच्छ तं नृपः कोऽसि कुत एवागतो वनम्॥ ४७<br><br>कोऽसि कस्माच्च दीनोऽसि हरिणः शोकपीडितः।<br>ब्रूहि सत्यं महाभाग मैत्री साप्तपदी मता॥ ४८राजाने उस वैश्यको सामने देख लिया। उन्होंने उसे अपने समीपमें बैठा लिया और पुनः उससे पूछा—आप कौन हैं तथा इस वनमें कहाँसे आये हैं? आप कौन हैं, आप उदास क्यों हैं? चिन्ताग्रस्त रहनेके कारण आप तो पीले वर्णके हो गये हैं? हे महाभाग! सात पग एक साथ चलनेपर ही मैत्री समझ ली जाती है, अतः आप मुझे सब कुछ सच-सच बता दीजिये॥ ४७-४८॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञस्तमुवाच विशोत्तमः।<br>उपविश्य स्थिरो भूत्वा मत्वा साधुसमागमम्॥ ४९व्यासजी बोले—राजाका वचन सुनकर वह वैश्यश्रेष्ठ उनके पास बैठ गया और इसे सज्जनसमागम समझकर शान्तचित्त होकर उनसे कहने लगा॥ ४९॥
वैश्य उवाच<br>मित्राहं वैश्यजातीयः समाधिर्नाम विश्रुतः।<br>धनवान्धर्मनिपुणः सत्यवागनसूयकः॥ ५०<br><br>पुत्रदारैर्निरस्तोऽहं धनलुब्धैरर्साधुभिः।<br>(कृपणेति मिषं कृत्वा त्यक्त्वा मायां सुदुस्त्यजाम्।)<br>स्वजनेन च संत्यक्तः प्राप्तोऽस्मि वनमाशु वै॥ ५१<br>कोऽसि त्वं भाग्यवान्भासि कथयस्व प्रियाधुना।वैश्य बोला—हे मित्र! मैं वैश्यजातिमें उत्पन्न हूँ और समाधि नामसे प्रसिद्ध हूँ। मैं धनवान्, धर्मकार्योंमें निपुण, सत्यवादी और ईर्ष्यासे रहित हूँ, फिर भी धनके लोभी और कुटिल स्त्री-पुत्रोंने मुझे घरसे निकाल दिया (उन्होंने मुझे कृपण कहकर कठिनाईसे टूटनेवाला माया-बन्धन भी तोड़ दिया), अतः अपने कुटुम्बियोंसे परित्यक्त होकर मैं अभी-अभी इस वनमें आया हूँ। हे प्रिय! आप कौन हैं? मुझे बतायें; आप भाग्यवान् प्रतीत होते हैं॥ ५०-५१ १/२॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 C

| ७०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३२ | | :--- | :--- |

राजोवाचराजा बोले—
सुरथो नाम राजाहं दस्युभिः पीडितोऽभवम्॥ ५२<br><br>प्राप्तोऽस्मि गतराज्यॊऽत्र मन्त्रिभिः परिवञ्चितः।<br>दिष्ट्या त्वमत्र मित्रं मे मिलितोऽसि विशोत्तम॥ ५३<br><br>सुखेन विहरिष्यावो वनेऽत्र शुभपादपे।<br>शोकं त्यज महाबुद्धे स्वस्थो भव विशोत्तम॥ ५४<br>( अत्रैव च यथाकामं सुखं तिष्ठ मया सह।)मैं सुरथ नामका राजा हूँ, मैं दस्युओंसे पीड़ित हूँ। मन्त्रियोंके द्वारा ठगे जानेके कारण राज्यविहीन होकर मैं यहाँ आया हूँ। हे वैश्यश्रेष्ठ! भाग्यवश आप मुझे यहाँ मित्रके रूपमें मिल गये हैं। अब हम दोनों सुन्दर वृक्षोंसे युक्त इस वनमें विहार करेंगे। हे महाबुद्धिमान् वैश्यश्रेष्ठ! चिन्ता छोड़िये और प्रसन्नचित्त होइये (अब आप मेरे साथ यहींपर इच्छानुसार सुखपूर्वक रहिये)॥ ५२—५४॥
वैश्य उवाच<br>कुटुम्बं मे निरालम्बं मया हीनं सुदुःखितम्।<br>भविष्यति च चिन्तार्तं व्याधिशोकोपतापितम्॥ ५५वैश्य बोला—मेरा परिवार आश्रयरहित है, मेरे बिना परिवारके लोग अत्यन्त दुःखी होंगे। मेरे बारेमें चिन्ता करते हुए वे रोग तथा शोकसे व्याकुल हो जायँगे॥ ५५॥
भार्यादेहे सुखं नो वा पुत्रदेहे न वा सुखम्।<br>इति चिन्तातुरं चेतो न मे शाम्यति भूमिप॥ ५६हे राजन्! मेरी पत्नी तथा पुत्र शारीरिक सुख पा रहे होंगे अथवा नहीं, इसी चिन्तासे व्याकुल रहनेके कारण मेरा मन शान्त नहीं रह पाता॥ ५६॥
कदा द्रक्ष्ये सुतं भार्यां गृहं स्वजनमेव च।<br>स्वस्थं न मन्मनो राजन् गृहचिन्ताकुलं भृशम्॥ ५७हे राजन्! मैं पुत्र, पत्नी, घर और स्वजनोंको कब देख सकूँगा? गृहकी चिन्तासे अत्यन्त व्याकुल मेरा मन स्वस्थ नहीं हो पाता है॥ ५७॥
राजोवाच<br>यैर्निरस्तोऽसि पुत्राद्यैरसद्वृत्तैः सुबालिशैः।<br>तान्दृष्ट्वा किं सुखं तेऽद्य भविष्यति महामते॥ ५८<br><br>हितकारी वरः शत्रुदुर्दुःखदाः सुहृदः कुतः।<br>तस्मात्स्थिरं मनः कृत्वा विहरस्व मया सह॥ ५९राजा बोले—हे महामते! जिन दुराचारी तथा महामूर्ख पुत्र आदिके द्वारा आप घरसे निकाल दिये गये, उन्हें देखकर अब आपको कौन-सा सुख मिलेगा? दुःख देनेवाले सुहृदोंकी अपेक्षा सुख देनेवाला शत्रु श्रेष्ठ है; अतः अपने मनको स्थिर करके आप मेरे साथ आनन्द कीजिये॥ ५८-५९॥
वैश्य उवाच<br>मनो मे न स्थिरं राजन् भवत्यद्य सुदुःखितम्।<br>चिन्तयात्र कुटुम्बस्य दुस्त्यजस्य दुरात्मभिः॥ ६०वैश्य बोला—हे राजन्! दुर्जनोंके द्वारा भी अत्यन्त कठिनतासे त्यागे जानेवाले कुटुम्बकी चिन्तासे अत्यन्त दुःखित मेरा मन इस समय स्थिर नहीं हो पा रहा है॥ ६०॥
राजोवाच<br>ममापि राज्यजं दुःखं दुनोति किल मानसम्।<br>पृच्छावोऽद्य मुनिं शान्तं शोकनाशनमौषधम्॥ ६१राजा बोले—राज्यसम्बन्धी चिन्ता मेरे मनको भी दुःखी करती रहती है। अतः अब हम दोनों शान्त प्रकृतिवाले मुनिसे शोकके नाशकी औषधि पूछें॥ ६१॥
व्यास उवाच<br>इति कृत्वा मतिं तौ तु राजा वैश्यश्च जग्मतुः।<br>मुनिं तौ विनयोपेतौ प्रष्टुं शोकस्य कारणम्॥ ६२व्यासजी बोले—ऐसा विचार करके राजा और वैश्य—दोनों ही अत्यन्त विनम्र होकर शोकका कारण पूछनेके लिये मुनिके पास गये॥ ६२॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 D

अ० ३३] पञ्चम स्कन्ध [७०९

अ० ३३] पञ्चम स्कन्ध [७०९

गत्वा तं प्रणिपत्याह राजा ऋषिमनुत्तमम्।<br><br>आसीनं सम्यगासीनः शान्तं शान्तिमुपागतः॥ ६३वहाँ जाकर राजा सुरथ आसन लगाकर शान्त बैठे हुए मुनिश्रेष्ठको प्रणाम करके स्वयं भी सम्यक् रूपसे आसनपर बैठकर शान्तिपूर्वक उनसे कहने लगे॥ ६३॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितयां पञ्चमस्कन्धे सुरथराजसमाधि-<br>वैश्ययोर्मुनिंसमीपे गमनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ ३२॥


अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

मुनि सुमेधाका सुरथ और समाधिको देवीकी महिमा बताना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
राजोवाच<br>मुने वैश्योऽयमधुना वने मे मित्रतां गतः।<br>पुत्रदारैर्निरस्तोऽयं प्राप्तोऽत्र मम सङ्गमम्॥ १<br>(कुटुम्बविरहेणासौ दुःखितोऽतीव दुर्मनाः।<br>न शान्तिमुपयात्येष तथापि मम साम्प्रतम्।<br>गतराज्यस्य दुःखेन शोकार्तोऽस्मि महामते।)<br>निष्कारणञ्च मे चिन्ता हृदयान्न निवर्तते।<br>हया मे दुर्बलाः स्युः किं गजाः शत्रुवशं गताः॥ २<br>भृत्यवर्गस्तथा दुःखी जातः स्यात्तु मया विना।<br>कोशक्षयं करिष्यन्ति रिपवोऽतिबलात्क्षणात्॥ ३<br>इत्येवं चिन्तयानस्य न मे निद्रा तनौ सुखम्।<br>जानामीदं जगन्मिथ्या स्वप्नवत्सर्वमेव हि॥ ४<br>जानतोऽपि मनो भ्रान्तं न स्थिरं भवति प्रभो।<br>कोऽहं केऽश्वा गजाः केऽमी न ते मे च सहोदराः॥ ५<br>न पुत्रा न च मित्राणि येषां दुःखं दुनोति माम्।<br>भ्रमोऽयमिति जानामि तथापि मम मानसः॥ ६<br>मोहो नैवापसरति किं तत्कारणमद्भुतम्।<br>स्वामिंस्त्वमसि सर्वज्ञः सर्वसंशयनाशकृत्॥ ७<br>कारणं ब्रूहि मोहस्य ममास्य च दयानिधे।राजा बोले—हे मुने! ये वैश्य हैं, आज ही वनमें इनसे मेरी मित्रता हुई है। पत्नी और पुत्रोंने इन्हें निकाल दिया है और अब यहाँ इन्हें मेरा साथ प्राप्त हुआ है॥ १॥<br>(परिवारके वियोगसे ये अत्यन्त दुःखी और विक्षुब्ध हैं; इन्हें शान्ति नहीं मिल पा रही है और इस समय मेरी भी ऐसी ही स्थिति है। हे महामते! राज्य चले जानेके दुःखसे मैं शोकसन्तप्त हूँ।) व्यर्थकी यह चिन्ता मेरे हृदयसे निकल नहीं रही है—मेरे घोड़े दुर्बल हो गये होंगे और हाथी शत्रुओंके अधीन हो गये होंगे। उसी प्रकार सेवकगण भी मेरे बिना दुःखी रहते होंगे। शत्रुगण राजकोशको क्षणभरमें बलपूर्वक रिक्त कर देंगे॥ २-३॥<br>इस प्रकार चिन्ता करते हुए मुझे न निद्रा आती है और न मेरे शरीरको सुख मिलता है। मैं जानता हूँ कि यह सम्पूर्ण जगत् स्वप्नकी भाँति मिथ्या है, किंतु हे प्रभो! यह जानते हुए भी मेरा भ्रमित मन स्थिर नहीं होता। मैं कौन हूँ? ये हाथी-घोड़े कौन हैं? ये मेरे कोई सगे-सम्बन्धी भी नहीं हैं। न ये मेरे पुत्र हैं, और न मेरे मित्र हैं, जिनका दुःख मुझे पीड़ित कर रहा है। मैं जानता हूँ कि यह भ्रम है, फिर भी मेरे मनसे सम्बन्ध रखनेवाला मोह दूर नहीं होता, यह बड़ा ही अद्भुत कारण है! हे स्वामिन्! आप सर्वज्ञ और सभी संशयोंका नाश करनेवाले हैं, अतः हे दयानिधे! मेरे इस मोहका कारण बतायें॥ ४-७ ½ ॥
व्यास उवाच<br>इति पृष्टस्तदा राज्ञा सुमेधा मुनिसत्तमः॥ ८<br>तमुवाच परं ज्ञानं शोकमोहविनाशनम्।व्यासजी बोले—तब राजाके ऐसा पूछनेपर मुनिश्रेष्ठ सुमेधा उनसे शोक और मोहका नाश करनेवाले परम ज्ञानका वर्णन करने लगे॥ ८ ½ ॥
७१०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३३

| ऋषिरुवाच | ऋषि बोले— हे राजन्! सुनिये, मैं बताता हूँ। | | शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ ९<br>महामायेति विख्याता सर्वेषां प्राणिनामिह ।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथेशानस्तुराषाड् वरुणोऽनिलः ॥ १०<br>सर्वे देवा मनुष्याश्च गन्धर्वोरगराक्षसाः ।<br>वृक्षाश्च विविधा वल्ल्यः पशवो मृगपक्षिणः ॥ ११<br>मायाधीनाश्च ते सर्वे भाजनं बन्धमोक्षयोः ।<br>तया सृष्टमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ १२<br>तद्वशे वर्तते नूनं मोहजालेन यन्त्रितम् ।<br>त्वं कियान्मानुषेष्वेकः क्षत्रियो रजसाविलः ॥ १३ | महामायाके नामसे विख्यात वे भगवती ही सभी प्राणियोंके बन्धन और मोक्षकी कारण हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, वरुण, पवन आदि सभी देवता, मनुष्य, गन्धर्व, सर्प, राक्षस, वृक्ष, विविध लताएँ, पशु, मृग और पक्षी—ये सब मायाके अधीन हैं और बन्धन तथा मोक्षके भाजन हैं। उन महामायाने ही इस जड़-चेतनमय सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की है। जब यह जगत् सदा उन्हींके अधीन रहता है और मोहजालमें जकड़ा हुआ है, तब आप किस गणनामें हैं? आप तो मनुष्योंमें रजोगुणसे युक्त एक क्षत्रियमात्र हैं॥ ९–१३॥ | | ज्ञानिनामपि चेतांसि मोहयत्यनिशं हि सा ।<br>ब्रह्मेशवासुदेवाद्या ज्ञाने सत्यपि शेषतः ॥ १४<br>तेऽपि रागवशाल्लोके भ्रमन्ति परिमोहिताः । | वे महामाया ज्ञानियोंकी बुद्धिको भी सदा मोहित किये रहती हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि परम ज्ञानी होते हुए भी रागके वशीभूत होकर व्यामोहमें पड़ जाते हैं और संसारमें चक्कर काटा करते हैं॥ १४ १/२॥ | | पुरा सत्ययुगे राजन् विष्णुर्नारायणः स्वयं ॥ १५<br>श्वेतद्वीपं समासाद्य चकार विपुलं तपः ।<br>वर्षाणामयुतं यावद् ब्रह्मविद्याप्रसक्तये ॥ १६<br>अनश्वरसुखायासौ चिन्तयानस्ततः परम् ।<br>एकस्मिन्निर्जने देशे ब्रह्मापि परमाद्भुते ॥ १७<br>स्थितस्तपसि राजेन्द्र मोहस्य विनिवृत्तये । | हे राजन्! प्राचीन कालमें स्वयं उन भगवान् नारायणने ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति तथा अविनाशी सुखके लिये श्वेतद्वीपमें जाकर ध्यान करते हुए दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या की थी। हे राजेन्द्र! इसके साथ ही मोहकी निवृत्तिकाके लिये एक निर्जन प्रदेशमें ब्रह्माजी भी परम अद्भुत तपस्यामें संलग्न हो गये॥ १५–१७ १/२॥ | | कदाचिद्वासुदेवोऽसौ स्थलान्तरमतिर्हरिः ॥ १८<br>तस्माद्देशात्समुत्थाय जगामान्यद्दिदृक्षया ।<br>चतुर्मुखोऽपि राजेन्द्र तथैव निःसृतः स्थलात् ॥ १९<br>मिलितौ मार्गमध्ये तु चतुर्मुखचतुर्भुजौ ।<br>अन्योन्यं पृष्टवन्तौ तौ कस्त्वं कस्त्वमिति स्म ह ॥ २० | हे राजेन्द्र! किसी समय वासुदेव भगवान् श्रीहरिने दूसरे स्थानपर जानेका विचार किया और वे उस स्थानसे उठकर अन्य स्थलको देखनेकी इच्छासे चल दिये। ब्रह्माजी भी उसी प्रकार अपने स्थानसे निकल पड़े। चतुर्मुख ब्रह्माजी और चतुर्भुज भगवान् विष्णु मार्गमें मिल गये। तब वे दोनों एक-दूसरेसे पूछने लगे—तुम कौन हो, तुम कौन हो? ॥ १८–२०॥ | | ब्रह्मा प्रोवाच तं देवं कर्ताहं जगतः किल ।<br>विष्णुस्तमाह भो मूर्ख जगत्कर्ताहमच्युतः ॥ २१<br>त्वं कियान्बलहीनोऽसि रजोगुणसमाश्रितः ।<br>सत्त्वाश्रितं हि मां विद्धि वासुदेवं सनातनम् ॥ २२ | ब्रह्माजी भगवान् विष्णुसे बोले—मैं जगत्का स्रष्टा हूँ। तब विष्णुने उनसे कहा—हे मूर्ख! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाला मैं विष्णु ही जगत्का कर्ता हूँ। तुम कितने शक्तिशाली हो? तुम तो रजोगुणयुक्त और बलहीन हो! मुझे सत्त्वगुणसम्पन्न सनातन नारायण जानो॥ २१-२२॥ |

अ० ३३]पञ्चम स्कन्ध७११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मया त्वं रक्षितोऽद्यैव कृत्वा युद्धं सुदारुणम्।<br>शरणं मे समायातो दानवाभ्यां प्रपीडितः॥ २३<br>मया तौ निहतौ कामं दानवौ मधुकैटभौ।<br>कथं गर्वायसे मन्द मोहोऽयं त्यज साम्प्रतम्॥ २४<br>न मत्तोऽप्यधिकः कश्चित्संसारेऽस्मिन्नसारिते।दोनों दानवों (मधु-कैटभ)-के द्वारा पीड़ित किये जानेपर तुम मेरी ही शरणमें आये थे, उस समय अत्यन्त भीषण युद्ध करके मैंने तुम्हारी रक्षा की। मैंने ही उन मधु-कैटभ दानवोंका वध किया है, अतः हे मन्दबुद्धि! तुम क्यों गर्व करते हो? यह तुम्हारा अज्ञान है, इसका शीघ्र त्याग कर दो; क्योंकि इस सम्पूर्ण संसारमें मुझसे बढ़कर कोई नहीं है॥ २३-२४ १/२ ॥
ऋषिरुवाच<br>एवं प्रवदमानौ तौ ब्रह्मविष्णू परस्परम्॥ २५<br>स्फुरदोष्ठौ वेपमानौ लोहिताक्षौ बभूवतुः।<br>प्रादुर्बभूव सहसा तयोर्विवदमानयोः॥ २६<br>मध्ये लिङ्गं सुधाश्वेतं विपुलं दीर्घमद्भुतम्।<br>आकाशे तरसा तत्र वागुवाचाशरीरिणी॥ २७<br>तौ सम्बोध्य महाभागौ विवदन्तौ परस्परम्।<br>ब्रह्मन् विष्णो विवादं मा कुरुतां वां परस्परम्॥ २८ऋषि बोले— इस प्रकार परस्पर विवाद करते हुए उन दोनों—ब्रह्मा-विष्णुके ओठ फड़कने लगे, वे क्रोधमें काँपने लगे और उनकी आँखें रक्तवर्ण हो गयीं। तभी विवादरत उन दोनोंके मध्य अचानक एक श्वेतवर्ण, अत्यन्त विशाल तथा अद्भुत लिंग प्रकट हो गया। तदनन्तर विवाद करते हुए उन दोनों महानुभावोंको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई—हे ब्रह्मन्! हे विष्णो! तुम दोनों परस्पर विवाद मत करो॥ २५-२८॥
लिङ्गस्यास्य परं पारमधस्तादुपरि ध्रुवम्।<br>यो याति युवयोर्मध्ये स श्रेष्ठो वां सदैव हि॥ २९<br>एकः प्रयातु पातालमाकाशमपरोऽधुना।<br>प्रमाणं मे वचः कार्यं त्यक्त्वा वादं निरर्थकम्॥ ३०<br>मध्यस्थः सर्वदा कार्यों विवादेऽस्मिन्द्वयोरिह।इस लिंगके ऊपरी या निचले छोरका आप दोनोंमेंसे जो पता लगा लेगा, आप दोनोंमें वह सदैवके लिये श्रेष्ठ हो जायगा। इसलिये मेरी वाणीको प्रमाण मानकर तथा इस निरर्थक विवादका त्यागकर आपलोगोंमेंसे एक आकाश और दूसरा पातालकी ओर अभी जाय। इस विवादमें आप दोनोंको एक मध्यस्थ भी अवश्य कर लेना चाहिये॥ २९-३० १/२ ॥
ऋषिरुवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं दिव्यं सज्जीभूतौ कृतोद्यमौ॥ ३१<br>जग्मतुर्मातुमग्रस्थं लिङ्गमद्भुतदर्शनम्।<br>पातालमगमद्विष्णुर्ब्रह्माप्याकाशमेव च॥ ३२<br>परिमातुं महालिङ्गं स्वमहत्त्वविवृद्धये।ऋषि बोले— उस दिव्य वाणीको सुनकर वे दोनों चेष्टापूर्वक उद्यम करनेके लिये तैयार हो गये और अपने समक्ष स्थित उस देखनेमें अद्भुत लिंगको मापनेके लिये चल पड़े। अपने-अपने महत्त्वकी वृद्धिके लिये उस महालिंगको नापनेहेतु विष्णु पातालकी ओर और ब्रह्मा आकाशकी ओर गये॥ ३१-३२ १/२ ॥
विष्णुर्गत्वा कियद्देशं श्रान्तः सर्वात्मना यतः॥ ३३<br>न प्रापान्तं स लिङ्गस्य परिवृत्य ययौ स्थलम्।<br>ब्रह्मागच्छत्ततश्चोर्ध्वं पतितं केतकीदलम्॥ ३४<br>शिवस्य मस्तकात्प्राप्य परावृत्तो मुदावृतः।कुछ दूरतक जानेपर विष्णु पूर्णरूपसे थक गये। वे लिंगका अन्त नहीं प्राप्त कर सके और तब उसी स्थलपर वापस लौट आये। ब्रह्माजी ऊपरकी ओर गये और शिवके मस्तकसे गिरे हुए केतकी पुष्पको लेकर वे भी प्रसन्न हो लौट आये॥ ३३-३४ १/२ ॥
आगत्य तरसा ब्रह्मा विष्णवे केतकीदलम्॥ ३५<br>दर्शयित्वा च वितथमुवाच मदमोहितः।<br>लिङ्गस्य मस्तकादेतद् गृहीतं केतकीदलम्॥ ३६<br>अभिज्ञानाय चानीतं तव चित्तप्रशान्तये।तब अहंकारसे मोहित ब्रह्मा शीघ्रतापूर्वक आकर विष्णुको केतकी पुष्प दिखाकर यह झूठ बोलने लगे कि मैंने यह केतकी पुष्प इस लिंगके मस्तकसे प्राप्त किया है। आपके चित्तकी शान्तिके लिये पहचानचिह्नके रूपमें मैं इसे लेता आया हूँ॥ ३५-३६ १/२ ॥
७१२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रुत्वा तद् ब्रह्मणो वाक्यं दृष्ट्वा च केतकीदलम्॥ ३७<br>हरिस्तं प्रत्युवाचेदं साक्षी कः कथयाधुना।<br>यथार्थवादी मेधावी सदाचारः शुचिः समः॥ ३८<br>साक्षी भवति सर्वत्र विवादे समुपस्थिते।ब्रह्माजीके उस वचनको सुनकर और केतकी पुष्पको देखकर विष्णुने उनसे कहा—इसका साक्षी कौन है, बताइये। किसी विवादके उपस्थित होनेपर किसी सत्यवादी, बुद्धिमान्, सदाचारी, पवित्र और निष्पक्ष व्यक्तिको साक्षी बनाया जाता है॥ ३७-३८ १/२ ॥
ब्रह्मोवाच<br>दूरदेशात्समायाति साक्षी कः समयेऽधुना॥ ३९ब्रह्माजी बोले—इस समय इतने दूर देशसे कौन साक्षी आयेगा? जो सत्य बात है, उसे यह केतकी स्वयं कह देगी॥ ३९ १/२ ॥
यत्सत्यं तद्वचः सेयं केतकी कथयिष्यति।<br>इत्युक्त्वा प्रेरिता तत्र ब्रह्मणा केतकी स्फुटम्॥ ४०<br>वचनं प्राह तरसा शार्ङ्गिणं प्रत्यबोधयत्।<br>शिवमूर्ध्नि स्थितां ब्रह्मा गृहीत्वा मां समागतः॥ ४१<br>सन्देहोऽत्र न कर्तव्यस्त्वया विष्णो कदाचन।<br>मम वाक्यं प्रमाणं हि ब्रह्मा पारङ्गतोऽस्य ह॥ ४२ऐसा कहकर ब्रह्माजीने केतकीको [साक्ष्यके लिये] प्रेरित किया। तब उसने शीघ्रतापूर्वक विष्णुको सम्बोधित करते हुए कहा कि शिव (लिंग)के मस्तकपर स्थित मुझे ब्रह्माजी वहाँसे लेकर आये हैं। हे विष्णो! इसमें आपको किसी प्रकारका सन्देह नहीं करना चाहिये। ब्रह्माजी इस लिंगके पार गये हैं और शिवभक्तोंके द्वारा समर्पित की गयी मुझको लेकर आये हैं—यह मेरा कथन ही प्रमाण है॥ ४०—४२ १/२ ॥
गृहीत्वा मां समायातः शिवभक्तैः समर्पिताम्।<br>केतक्या वचनं श्रुत्वा हरिराह स्मयन्निव॥ ४३केतकीकी बात सुनकर भगवान् विष्णु मुसकराते हुए बोले कि मेरे लिये तो महादेव ही प्रमाण हैं। यदि वे ऐसी बात बोल दें तो मैं मान लूँगा॥ ४३ १/२ ॥
महादेवः प्रमाणं मे यद्यसौ वचनं वदेत्।<br>ऋषिरुवाच<br>तदाकर्ण्य हरेर्वाक्यं महादेवः सनातनः॥ ४४<br>कुपितः केतकीं प्राह मिथ्यावादिनि मा वद।<br>गच्छतो मध्यतः प्राप्ता पतिता मस्तकान्मम॥ ४५ऋषि बोले—तब विष्णुकी बात सुनकर सनातन भगवान् महादेवने क्रुद्ध होकर केतकीसे कहा—असत्यभाषिणि! ऐसा मत बोलो। मेरे मस्तकसे गिरी हुई तुझे ब्रह्मा बीचमें ही पा गये थे। तुमने झूठ बोला है, इसलिये अब मैंने सदैवके लिये तुम्हारा त्याग कर दिया। तब ब्रह्माजीने लज्जित होकर भगवान् विष्णुको नमस्कार किया। उसी दिनसे शिवद्वारा पुष्पोंमेंसे केतकीका त्याग कर दिया गया॥ ४४—४६ १/२ ॥
मिथ्याभिभाषिणी त्यक्ता मया त्वं सर्वदैव हि।<br>ब्रह्मा लज्जापरो भूत्वा ननाम मधुसूदनम्॥ ४६<br>शिवेन केतकी त्यक्ता तद्दिनात्कुसुमेषु वै।<br>एवं मायाबलं विद्धि ज्ञानिनामपि मोहदम्॥ ४७<br>अन्येषां प्राणिनां राजन् का वार्ता विभ्रमं प्रति।<br>देवानां कार्यसिद्ध्यर्थं सर्वदैव रमापतिः॥ ४८हे राजन्! आप यह जान लीजिये कि मायाका बल ज्ञानियोंको भी मोहमें डाल देता है, तब दूसरे प्राणियोंके मोहित हो जानेकी क्या बात? स्वयं देवाधिदेव लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये पापका भय छोड़कर दैत्योंके साथ छल करते रहते हैं। वे ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान् माधव अपने सुख और आनन्दको त्यागकर विविध योनियोंमें अवतार लेकर दैत्योंके साथ युद्ध करते हैं। देवताओंके कार्यहेतु अंशावतार ग्रहण करनेवाले सर्वज्ञ वह
अ० ३३ ]पञ्चम स्कन्ध७१३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दैत्यान्वञ्चयते चाशु त्यक्त्वा पापभयं हरिः।<br>अवतारकरो देवो नानायोनिषु माधवः॥ ४९<br>त्यक्त्वानन्दसुखं दैत्यैर्युद्धं चैवाकरोद्विभुः।<br>नूनं मायाबलं चैतन्माधवेऽपि जगद्गुरौ॥ ५०<br>सर्वज्ञे देवकार्यांशे का वार्तान्यस्य भूपते।<br>ज्ञानिनामपि चेतांसि परमा प्रकृतिः किल॥ ५१<br>बलादाकृष्य मोहाय प्रयच्छति महीपते।<br>यया व्याप्तमिदं सर्वं भगवत्या चराचरम्॥ ५२<br>मोहदा ज्ञानदा सैव बन्धमोक्षप्रदा सदा।जगद्गुरु भगवान् विष्णुमें भी यह मायाशक्ति अपना प्रभाव डालती है, तब हे राजन्! अन्यकी क्या बात! हे राजन्! वे परम प्रकृतिस्वरूपा महामाया ज्ञानियोंके मनको भी बलपूर्वक आकृष्ट करके मोहित कर देती हैं, जिन भगवतीके द्वारा स्थावर-जंगमात्मक यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है; वे ही ज्ञानदायिनी, मोहदायिनी तथा बन्धन एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं॥ ४७–५२ १/२ ॥
राजोवाच<br>भगवन्ब्रूहि मे तस्याः स्वरूपं बलमुत्तमम्॥ ५३<br>उत्पत्तिकारणं वापि स्थानं परमकं च यत्।राजा बोले— हे भगवन्! मुझे उनके स्वरूप, उत्तम बल, उनकी उत्पत्तिका कारण और उनके परम धामके विषयमें बताइये॥ ५३ १/२ ॥
ऋषिरुवाच<br>न चोत्पत्तिरनादित्वान्नृप तस्याः कदाचन॥ ५४<br>नित्यैव सा परा देवी कारणानां च कारणम्।<br>वर्तते सर्वभूतेषु शक्तिः सर्वात्मना नृप॥ ५५<br>शववच्छक्तिहीनस्तु प्राणी भवति सर्वथा।<br>चिच्छक्तिः सर्वभूतेषु रूपं तस्यास्तदेव हि॥ ५६<br>आविर्भावतिरोभावौ देवानां कार्यसिद्धये।ऋषि बोले— हे राजन्! अनादि होनेके कारण उनकी कभी उत्पत्ति नहीं होती। नित्य और सर्वोपरि वे देवी समस्त कारणोंकी भी कारण हैं। हे नृप! वे शक्तिस्वरूपा भगवती सभी प्राणियोंमें सर्वात्मारूपसे विद्यमान रहती हैं। यदि प्राणी शक्तिसे रहित हो जाय तो वह प्राणी शवतुल्य हो जाता है; क्योंकि सभी प्राणियोंमें जो चैतन्य शक्ति है, वह इन्हींका रूप है। देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये ही उनका प्राकट्य और तिरोधान होता है॥ ५४–५६ १/२ ॥
यदा स्तुवन्ति तां देवा मनुजाश्च विशाम्पते॥ ५७<br>प्रादुर्भवति भूतानां दुःखनाशाय चाम्बिका।<br>नानारूपधरा देवी नानाशक्तिसमन्विता॥ ५८<br>आविर्भवति कार्यार्थं स्वेच्छया परमेश्वरी।<br>दैवाधीना न सा देवी यथा सर्वे सुरा नृप॥ ५९हे राजन्! जब देवता या मनुष्य उनकी स्तुति करते हैं, तब प्राणियोंके दुःखका नाश करनेके लिये ये भगवती जगदम्बा प्रकट होती हैं, वे देवी परमेश्वरी अनेक रूप धारण करके अनेक प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न होकर कार्य सिद्ध करनेके लिये स्वेच्छापूर्वक आविर्भूत होती हैं। हे राजन्! अन्य देवताओंकी भाँति वे भगवती दैवके अधीन नहीं हैं। सदा पुरुषार्थका प्रवर्तन करनेवाली वे देवी कालके वशमें नहीं हैं॥ ५७–५९ १/२ ॥
न कालवशगा नित्यं पुरुषार्थप्रवर्तिनी।<br>अकर्ता पुरुषो द्रष्टा दृश्यं सर्वमिदं जगत्॥ ६०<br>दृश्यस्य जननी सैव देवी सदसदात्मिका।<br>पुरुषं रञ्जयत्येका कृत्वा ब्रह्माण्डनाटकम्॥ ६१<br>रञ्जिते पुरुषे सर्वं संहरत्यतिरंहसा।<br>तया निमित्तभूतास्ते ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः॥ ६२यह सम्पूर्ण जगत् दृश्य है, परमपुरुष इसका द्रष्टा है, वह कर्ता नहीं है। वे सत्-असत्स्वरूपा देवी ही इस दृश्यमान जगत्की जननी हैं, वे स्वयं अकेले इस ब्रह्माण्डकी रचना करके परमपुरुषको आनन्दित करती हैं और उन परमपुरुषका मनोरंजन हो जानेके बाद वे भगवती शीघ्र ही सम्पूर्ण सृष्टि-प्रपंचका संहार भी कर देती हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश तो निमित्तमात्र हैं। वे भगवती ही अपनी लीलासे
७१४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३४

| कल्पिताः स्वस्वकार्येषु प्रेरिता लीलया त्वमी।<br>स्वांशं तेषु समारोप्य कृतास्ते बलवत्तराः॥ ६३<br><br>दत्ताश्च शक्तयस्तेभ्यो गीर्लक्ष्मीर्गिरिजा तथा।<br>ते तां ध्यायन्ति देवेशाः पूजयन्ति परां मुदा॥ ६४ | उनकी रचना करती हैं और उन्हें अपने-अपने कार्यों (जगत्का सृजन, पालन और संहार)—में प्रवृत्त करती हैं। वे (देवी) उनमें अपने अंश (शक्ति)—का आरोपणकर उन्हें बलवान् बनाती हैं। उन्होंने सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वतीके रूपमें उन्हें अपनी शक्तियाँ दी हैं। अतः वे त्रिदेव उन्हीं पराम्बाको सृजन, पालन और संहार करनेवाली जानकर प्रसन्नतापूर्वक उनका ध्यान और पूजन करते हैं॥ ६०–६४१/२॥ | | ज्ञात्वा सर्वेश्वरीं शक्तिं सृष्टिस्थितिविनाशिनीम्।<br>एतत्ते सर्वमाख्यातं देवीमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>मम बुद्धयनुसारेण नान्तं जानामि भूपते॥ ६५ | हे राजन्! इस प्रकार मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार देवीका यह उत्तम माहात्म्य आपसे कह दिया, मैं इसका अन्त नहीं जानता हूँ॥ ६५॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३॥


अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

मुनि सुमेधाद्वारा देवीकी पूजा-विधिका वर्णन

राजोवाचराजा बोले—
भगवन्ब्रूहि मे सम्यक्तस्या आराधने विधिम्।<br>पूजाविधिञ्च मन्त्रांश्च तथा होमविधिं वद॥ १हे भगवन्! अब मुझे उन देवीकी आराधना-विधि भलीभाँति बताइये; साथ ही पूजा-विधि, हवनकी विधि और मन्त्र भी बताइये॥ १॥
ऋषिरुवाचऋषि बोले—
शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तस्याः पूजाविधिं शुभम्।<br>कामदं मोक्षदं नृणां ज्ञानदं दुःखनाशनम्॥ २हे राजन्! सुनिये, मैं उनके पूजनकी शुभ विधि बताता हूँ, जो मनुष्योंको काम, मोक्ष और ज्ञानको देनेवाली तथा उनके दुःखोंका नाश करनेवाली है॥ २॥
आदौ स्नानविधिं कृत्वा शुचिः शुक्लाम्बरो नरः।<br>आचम्य प्रयततः कृत्वा शुभमायतनं निजम्॥ ३<br><br>ततोऽवलिप्तभूम्यां तु संस्थाप्यासन्नमुत्तमम्।<br>तत्रोपविश्य विधिवत् त्रिराचम्य मुदान्वितः॥ ४<br><br>पूजाद्रव्यं सुसंस्थाप्य यथाशक्त्यनुसारतः।<br>प्राणायामं ततः कृत्वा भूतशुद्धिं विधाय च॥ ५<br><br>कुर्यात्प्राणप्रतिष्ठां तु सम्भारं प्रोक्ष्य मन्त्रतः।<br>कालज्ञानं ततः कृत्वा न्यासं कुर्याद्यथाविधि॥ ६मनुष्यको सर्वप्रथम विधिपूर्वक स्नान करके पवित्र हो श्वेत वस्त्र धारण कर लेना चाहिये। तत्पश्चात् वह सावधानीपूर्वक आचमन करके पूजा-स्थानको शुद्ध करनेके बाद लिपी हुई भूमिपर उत्तम आसन बिछाकर उसपर बैठ जाय और प्रसन्न होकर विधिपूर्वक तीन बार आचमन करे। अपनी शक्तिके अनुसार पूजाद्रव्यको सुव्यवस्थित ढंगसे रखकर प्राणायाम कर ले, उसके बाद भूतशुद्धि करके और पुनः मन्त्र पढ़कर समस्त पूजन-सामग्रीका प्रोक्षण करके देवीमूर्तिकी प्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिये। तत्पश्चात् देशकालका उच्चारणकर विधिपूर्वक न्यास करना चाहिये॥ ३—६॥
अ० ३४ ]पञ्चम स्कन्ध७१५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शुभे ताम्रमये पात्रे चन्दनेन सितेन च।<br>षट्कोणं विलिखेद्यन्त्रं चाष्टकोणं ततो बहिः॥ ७<br><br>° नवाक्षरस्य मन्त्रस्य बीजानि विलिखेत्ततः।<br>कृत्वा यन्त्रप्रतिष्ठाञ्च वेदोक्तां संविधाय च॥ ८<br><br>अर्चां वा धातवीं कुर्यात्पूजामन्त्रैः शिवोदितैः।<br>पूजनं पृथिवीपाल भगवत्याः प्रयत्नतः॥ ९<br><br>कृत्वा वा विधिवत्पूजामागमोक्तां समाहितः।<br>जपेन्नवाक्षरं मन्त्रं सततं ध्यानपूर्वकम्॥ १०<br><br>होमं दशांशतः कुर्याद्दशांशेन च तर्पणम्।<br>भोजनं ब्राह्मणानाञ्च तद्दशांशेन कारयेत्॥ ११<br><br>चरित्रत्रयपाठञ्च नित्यं कुर्याद्विसर्जयेत्।<br>नवरात्रव्रतं चैव विधेयं विधिपूर्वकम्॥ १२इसके बाद सुन्दर ताम्रपात्रपर श्वेत चन्दनसे षट्कोण यन्त्र तथा उसके बाहर अष्टकोण यन्त्र लिखना चाहिये। तदनन्तर नवाक्षर मन्त्रके आठ बीज अक्षर आठों कोणोंमें लिखना चाहिये और नौवाँ अक्षर यन्त्रकी कर्णिका (बीच)-में लिखना चाहिये। तदनन्तर वेदमें बतायी गयी विधिसे यन्त्रकी प्रतिष्ठा करके अथवा हे राजन्! भगवतीकी धातुमयी प्रतिमा बनाकर शिवतन्त्रोक्त पूजामन्त्रोंसे प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। अथवा सावधान होकर आगमशास्त्रमें बतायी गयी विधिसे विधानपूर्वक पूजन करके ध्यानपूर्वक नवाक्षरमन्त्रका सतत जप करना चाहिये। जपका दशांश होम करना चाहिये, होमका दशांश तर्पण करना चाहिये और तर्पणका दशांश ब्राह्मणभोजन कराना चाहिये। प्रतिदिन तीनों चरित्रों (प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र तथा उत्तर चरित्र)-का पाठ करना चाहिये। इसके बाद विसर्जन करना चाहिये॥ ७-११ १/२॥
आश्विने च तथा चैत्रे शुक्ले पक्षे नराधिप।<br>नवरात्रोपवासो वै कर्तव्यः शुभमिच्छता॥ १३हे राजन्! कल्याण चाहनेवालेको आश्विन और चैत्र माहके शुक्लपक्षमें विधिपूर्वक नवरात्रव्रत करना चाहिये। इन नवरात्रोंमें उपवास भी करना चाहिये॥ १२-१३॥
होमः सुविपुलः कार्यो जप्यमन्त्रैः सुपायसैः।<br>शर्कराघृतमिश्रैश्च मधुयुक्तैः सुसंस्कृतैः॥ १४<br><br>छागमांसेन वा कार्यो बिल्वपत्रैस्तथा शुभैः।<br>हयारिकुसुमै रक्तैस्तिलैर्वा शर्करायुतैः॥ १५<br><br>अष्टम्याञ्च चतुर्दश्यां नवम्याञ्च विशेषतः।<br>कर्तव्यं पूजनं देव्या ब्राह्मणानाञ्च भोजनम्॥ १६<br><br>निर्धनो धनमाप्नोति रोगी रोगात्प्रमुच्यते।<br>अपुत्रो लभते पुत्राञ्छुभांश्च वशवर्तिनः॥ १७<br><br>राज्यभ्रष्टो नृपो राज्यं प्राप्नोति सार्वभौमिकम्।<br>शत्रुभिः पीडितो हन्ति रिपुं मायाप्रसादतः॥ १८<br><br>विद्यार्थी पूजनं यस्तु करोति नियतेन्द्रियः।<br>अनवद्यां शुभां विद्यां विन्दते नात्र संशयः॥ १९अनुष्ठानमें जपे गये मन्त्रोंके द्वारा शर्करा, घी और मधुमिश्रित पवित्र खीरसे विस्तारपूर्वक हवन करना चाहिये अथवा उत्तम बिल्वपत्रों, लाल कनैलके पुष्पों अथवा शर्करामिश्रित तिलोंसे हवन करना चाहिये। अष्टमी, नवमी एवं चतुर्दशीको विशेषरूपसे देवीपूजन करना चाहिये और इस अवसरपर ब्राह्मणभोजन भी कराना चाहिये। ऐसा करनेसे निर्धनको धनकी प्राप्ति होती है, रोगी रोगमुक्त हो जाता है, पुत्रहीन व्यक्ति सुन्दर और आज्ञाकारी पुत्रोंको प्राप्त करता है और राज्यच्युत राजाको सार्वभौम राज्य प्राप्त हो जाता है। देवी महामायाकी कृपासे शत्रुओंसे पीड़ित मनुष्य अपने शत्रुओंका नाश कर देता है। जो विद्यार्थी इन्द्रियोंको वशमें करके इस पूजनको करता है, वह शीघ्र ही पुण्यमयी उत्तम विद्या प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ १४-१९॥

| ७१६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३४ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा भक्तिसंयुतः।<br>पूजयेज्जगतां धात्रीं स सर्वसुखभाग्भवेत्॥ २०<br><br>नवरात्रव्रतं कुर्यान्नरनारीगणश्च यः।<br>वाञ्छितं फलमाप्नोति सर्वदा भक्तितत्परः॥ २१ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र—जो भी भक्तिपरायण होकर जगज्जननी जगदम्बाकी पूजा करता है, वह सब प्रकारके सुखका भागी हो जाता है। जो स्त्री अथवा पुरुष भक्तितत्पर होकर नवरात्रव्रत करता है, वह सदा मनोवांछित फल प्राप्त करता है॥ २०–२१॥
आश्विने शुक्लपक्षे तु नवरात्रव्रतं शुभम्।<br>करोति भावसंयुक्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥ २२जो मनुष्य आश्विन शुक्लपक्षमें इस उत्तम नवरात्रव्रतको श्रद्धाभावसे करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं॥ २२॥
विधिवन्मण्डलं कृत्वा पूजास्थानं प्रकल्पयेत्।<br>कलशं स्थापयेत्तत्र वेदमन्त्रविधानतः॥ २३विधिपूर्वक मण्डलका निर्माण करके पूजा-स्थानका निर्माण करना चाहिये और वहाँपर विधिविधानसे वैदिक मन्त्रोंद्वारा कलशकी स्थापना करनी चाहिये॥ २३॥
यन्त्रं सुरुचिरं कृत्वा स्थापयेत्कलशोपरि।<br>वापयित्वा यवांश्चारून्पार्श्वतः परिवर्तितान्॥ २४<br><br>कृत्वोपरि वितानञ्च पुष्पमालासमावृतम्।<br>धूपदीपसुसंयुक्तं कर्तव्यं चण्डिकागृहम्॥ २५अत्यन्त सुन्दर यन्त्रका निर्माण करके उसे कलशके ऊपर स्थापित कर देना चाहिये। तत्पश्चात् कलशके चारों ओर परिष्कृत तथा उत्तम जौका वपन करके पूजा-स्थानके ऊपर पुष्पमालासे अलंकृत चाँदनी लगाकर देवीका मण्डप बनाना चाहिये तथा उसे सदा धूप-दीपसे सम्पन्न रखना चाहिये॥ २४–२५॥
त्रिकालं तत्र कर्तव्या पूजा शक्त्यनुसारतः।<br>वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं चण्डिकायाश्च पूजने॥ २६<br><br>धूपैर्दीपैः सुनैवेद्यैः फलपुष्पैरनेकणः।<br>गीतवाद्यैः स्तोत्रपाठैर्वेदपारायणैस्तथा॥ २७<br><br>उत्सवस्तत्र कर्तव्यो नानावादित्रसंयुतैः।<br>कन्यकानां पूजनञ्च विधेयं विधिपूर्वकम्॥ २८<br><br>चन्दनैर्भूषणैर्वस्त्रैर्भक्ष्यैश्च विविधैस्तथा।<br>सुगन्धतैलमाल्यैश्च मनसो रुचिकारकैः॥ २९<br><br>एवं सम्पूजनं कृत्वा होमं मन्त्रविधानतः।<br>अष्टम्यां वा नवम्यां वा कारयेद्विधिपूर्वकम्॥ ३०<br><br>ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चात्पारणां दशमीदिने।<br>कर्तव्यं शक्तितो दानं देयं भक्तिपरैर्नृपैः॥ ३१अपनी शक्तिके अनुसार वहाँ [प्रातः, मध्याह्न तथा सायंकाल] तीनों समय पूजा करनी चाहिये। देवीकी पूजामें धनकी कृपणता नहीं करनी चाहिये। धूप, दीप, उत्तम नैवेद्य, अनेक प्रकारके फल-पुष्प, गीत, वाद्य, स्तोत्रपाठ तथा वेदपारायण—इनके द्वारा भगवतीकी पूजा होनी चाहिये। नानाविध वाद्य बजाकर उत्सव मनाना चाहिये। इस अवसरपर चन्दन, आभूषण, वस्त्र, विविध प्रकारके व्यंजन, सुगन्धित तेल, हार—मनको प्रसन्न करनेवाले इन पदार्थोंसे विधिपूर्वक कन्याओंका पूजन करना चाहिये। इस प्रकार पूजन सम्पन्न करके अष्टमी या नवमीको मन्त्रोच्चारपूर्वक विधिवत् हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। इसके बाद दशमीको पारण करना चाहिये। भक्तिनिष्ठ राजाओंको यथाशक्ति दान भी करना चाहिये॥ २६–३१॥
एवं यः कुरुते भक्त्या नवरात्रव्रतं नरः।<br>नारी वा सधवा भक्त्या विधवा वा पतिव्रता॥ ३२इस प्रकार पुरुष अथवा पतिव्रता सधवा या विधवा स्त्री जो कोई भी भक्तिपूर्वक नवरात्रव्रत करता है, वह इस लोकमें सुख तथा मनोभिलषित