देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| ७१० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३३ |
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| ऋषिरुवाच | ऋषि बोले— हे राजन्! सुनिये, मैं बताता हूँ। | | शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ ९<br>महामायेति विख्याता सर्वेषां प्राणिनामिह ।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथेशानस्तुराषाड् वरुणोऽनिलः ॥ १०<br>सर्वे देवा मनुष्याश्च गन्धर्वोरगराक्षसाः ।<br>वृक्षाश्च विविधा वल्ल्यः पशवो मृगपक्षिणः ॥ ११<br>मायाधीनाश्च ते सर्वे भाजनं बन्धमोक्षयोः ।<br>तया सृष्टमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ १२<br>तद्वशे वर्तते नूनं मोहजालेन यन्त्रितम् ।<br>त्वं कियान्मानुषेष्वेकः क्षत्रियो रजसाविलः ॥ १३ | महामायाके नामसे विख्यात वे भगवती ही सभी प्राणियोंके बन्धन और मोक्षकी कारण हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, वरुण, पवन आदि सभी देवता, मनुष्य, गन्धर्व, सर्प, राक्षस, वृक्ष, विविध लताएँ, पशु, मृग और पक्षी—ये सब मायाके अधीन हैं और बन्धन तथा मोक्षके भाजन हैं। उन महामायाने ही इस जड़-चेतनमय सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की है। जब यह जगत् सदा उन्हींके अधीन रहता है और मोहजालमें जकड़ा हुआ है, तब आप किस गणनामें हैं? आप तो मनुष्योंमें रजोगुणसे युक्त एक क्षत्रियमात्र हैं॥ ९–१३॥ | | ज्ञानिनामपि चेतांसि मोहयत्यनिशं हि सा ।<br>ब्रह्मेशवासुदेवाद्या ज्ञाने सत्यपि शेषतः ॥ १४<br>तेऽपि रागवशाल्लोके भ्रमन्ति परिमोहिताः । | वे महामाया ज्ञानियोंकी बुद्धिको भी सदा मोहित किये रहती हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि परम ज्ञानी होते हुए भी रागके वशीभूत होकर व्यामोहमें पड़ जाते हैं और संसारमें चक्कर काटा करते हैं॥ १४ १/२॥ | | पुरा सत्ययुगे राजन् विष्णुर्नारायणः स्वयं ॥ १५<br>श्वेतद्वीपं समासाद्य चकार विपुलं तपः ।<br>वर्षाणामयुतं यावद् ब्रह्मविद्याप्रसक्तये ॥ १६<br>अनश्वरसुखायासौ चिन्तयानस्ततः परम् ।<br>एकस्मिन्निर्जने देशे ब्रह्मापि परमाद्भुते ॥ १७<br>स्थितस्तपसि राजेन्द्र मोहस्य विनिवृत्तये । | हे राजन्! प्राचीन कालमें स्वयं उन भगवान् नारायणने ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति तथा अविनाशी सुखके लिये श्वेतद्वीपमें जाकर ध्यान करते हुए दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या की थी। हे राजेन्द्र! इसके साथ ही मोहकी निवृत्तिकाके लिये एक निर्जन प्रदेशमें ब्रह्माजी भी परम अद्भुत तपस्यामें संलग्न हो गये॥ १५–१७ १/२॥ | | कदाचिद्वासुदेवोऽसौ स्थलान्तरमतिर्हरिः ॥ १८<br>तस्माद्देशात्समुत्थाय जगामान्यद्दिदृक्षया ।<br>चतुर्मुखोऽपि राजेन्द्र तथैव निःसृतः स्थलात् ॥ १९<br>मिलितौ मार्गमध्ये तु चतुर्मुखचतुर्भुजौ ।<br>अन्योन्यं पृष्टवन्तौ तौ कस्त्वं कस्त्वमिति स्म ह ॥ २० | हे राजेन्द्र! किसी समय वासुदेव भगवान् श्रीहरिने दूसरे स्थानपर जानेका विचार किया और वे उस स्थानसे उठकर अन्य स्थलको देखनेकी इच्छासे चल दिये। ब्रह्माजी भी उसी प्रकार अपने स्थानसे निकल पड़े। चतुर्मुख ब्रह्माजी और चतुर्भुज भगवान् विष्णु मार्गमें मिल गये। तब वे दोनों एक-दूसरेसे पूछने लगे—तुम कौन हो, तुम कौन हो? ॥ १८–२०॥ | | ब्रह्मा प्रोवाच तं देवं कर्ताहं जगतः किल ।<br>विष्णुस्तमाह भो मूर्ख जगत्कर्ताहमच्युतः ॥ २१<br>त्वं कियान्बलहीनोऽसि रजोगुणसमाश्रितः ।<br>सत्त्वाश्रितं हि मां विद्धि वासुदेवं सनातनम् ॥ २२ | ब्रह्माजी भगवान् विष्णुसे बोले—मैं जगत्का स्रष्टा हूँ। तब विष्णुने उनसे कहा—हे मूर्ख! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाला मैं विष्णु ही जगत्का कर्ता हूँ। तुम कितने शक्तिशाली हो? तुम तो रजोगुणयुक्त और बलहीन हो! मुझे सत्त्वगुणसम्पन्न सनातन नारायण जानो॥ २१-२२॥ |
| अ० ३३] | पञ्चम स्कन्ध | ७११ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मया त्वं रक्षितोऽद्यैव कृत्वा युद्धं सुदारुणम्।<br>शरणं मे समायातो दानवाभ्यां प्रपीडितः॥ २३<br>मया तौ निहतौ कामं दानवौ मधुकैटभौ।<br>कथं गर्वायसे मन्द मोहोऽयं त्यज साम्प्रतम्॥ २४<br>न मत्तोऽप्यधिकः कश्चित्संसारेऽस्मिन्नसारिते। | दोनों दानवों (मधु-कैटभ)-के द्वारा पीड़ित किये जानेपर तुम मेरी ही शरणमें आये थे, उस समय अत्यन्त भीषण युद्ध करके मैंने तुम्हारी रक्षा की। मैंने ही उन मधु-कैटभ दानवोंका वध किया है, अतः हे मन्दबुद्धि! तुम क्यों गर्व करते हो? यह तुम्हारा अज्ञान है, इसका शीघ्र त्याग कर दो; क्योंकि इस सम्पूर्ण संसारमें मुझसे बढ़कर कोई नहीं है॥ २३-२४ १/२ ॥ |
| ऋषिरुवाच<br>एवं प्रवदमानौ तौ ब्रह्मविष्णू परस्परम्॥ २५<br>स्फुरदोष्ठौ वेपमानौ लोहिताक्षौ बभूवतुः।<br>प्रादुर्बभूव सहसा तयोर्विवदमानयोः॥ २६<br>मध्ये लिङ्गं सुधाश्वेतं विपुलं दीर्घमद्भुतम्।<br>आकाशे तरसा तत्र वागुवाचाशरीरिणी॥ २७<br>तौ सम्बोध्य महाभागौ विवदन्तौ परस्परम्।<br>ब्रह्मन् विष्णो विवादं मा कुरुतां वां परस्परम्॥ २८ | ऋषि बोले— इस प्रकार परस्पर विवाद करते हुए उन दोनों—ब्रह्मा-विष्णुके ओठ फड़कने लगे, वे क्रोधमें काँपने लगे और उनकी आँखें रक्तवर्ण हो गयीं। तभी विवादरत उन दोनोंके मध्य अचानक एक श्वेतवर्ण, अत्यन्त विशाल तथा अद्भुत लिंग प्रकट हो गया। तदनन्तर विवाद करते हुए उन दोनों महानुभावोंको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई—हे ब्रह्मन्! हे विष्णो! तुम दोनों परस्पर विवाद मत करो॥ २५-२८॥ |
| लिङ्गस्यास्य परं पारमधस्तादुपरि ध्रुवम्।<br>यो याति युवयोर्मध्ये स श्रेष्ठो वां सदैव हि॥ २९<br>एकः प्रयातु पातालमाकाशमपरोऽधुना।<br>प्रमाणं मे वचः कार्यं त्यक्त्वा वादं निरर्थकम्॥ ३०<br>मध्यस्थः सर्वदा कार्यों विवादेऽस्मिन्द्वयोरिह। | इस लिंगके ऊपरी या निचले छोरका आप दोनोंमेंसे जो पता लगा लेगा, आप दोनोंमें वह सदैवके लिये श्रेष्ठ हो जायगा। इसलिये मेरी वाणीको प्रमाण मानकर तथा इस निरर्थक विवादका त्यागकर आपलोगोंमेंसे एक आकाश और दूसरा पातालकी ओर अभी जाय। इस विवादमें आप दोनोंको एक मध्यस्थ भी अवश्य कर लेना चाहिये॥ २९-३० १/२ ॥ |
| ऋषिरुवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं दिव्यं सज्जीभूतौ कृतोद्यमौ॥ ३१<br>जग्मतुर्मातुमग्रस्थं लिङ्गमद्भुतदर्शनम्।<br>पातालमगमद्विष्णुर्ब्रह्माप्याकाशमेव च॥ ३२<br>परिमातुं महालिङ्गं स्वमहत्त्वविवृद्धये। | ऋषि बोले— उस दिव्य वाणीको सुनकर वे दोनों चेष्टापूर्वक उद्यम करनेके लिये तैयार हो गये और अपने समक्ष स्थित उस देखनेमें अद्भुत लिंगको मापनेके लिये चल पड़े। अपने-अपने महत्त्वकी वृद्धिके लिये उस महालिंगको नापनेहेतु विष्णु पातालकी ओर और ब्रह्मा आकाशकी ओर गये॥ ३१-३२ १/२ ॥ |
| विष्णुर्गत्वा कियद्देशं श्रान्तः सर्वात्मना यतः॥ ३३<br>न प्रापान्तं स लिङ्गस्य परिवृत्य ययौ स्थलम्।<br>ब्रह्मागच्छत्ततश्चोर्ध्वं पतितं केतकीदलम्॥ ३४<br>शिवस्य मस्तकात्प्राप्य परावृत्तो मुदावृतः। | कुछ दूरतक जानेपर विष्णु पूर्णरूपसे थक गये। वे लिंगका अन्त नहीं प्राप्त कर सके और तब उसी स्थलपर वापस लौट आये। ब्रह्माजी ऊपरकी ओर गये और शिवके मस्तकसे गिरे हुए केतकी पुष्पको लेकर वे भी प्रसन्न हो लौट आये॥ ३३-३४ १/२ ॥ |
| आगत्य तरसा ब्रह्मा विष्णवे केतकीदलम्॥ ३५<br>दर्शयित्वा च वितथमुवाच मदमोहितः।<br>लिङ्गस्य मस्तकादेतद् गृहीतं केतकीदलम्॥ ३६<br>अभिज्ञानाय चानीतं तव चित्तप्रशान्तये। | तब अहंकारसे मोहित ब्रह्मा शीघ्रतापूर्वक आकर विष्णुको केतकी पुष्प दिखाकर यह झूठ बोलने लगे कि मैंने यह केतकी पुष्प इस लिंगके मस्तकसे प्राप्त किया है। आपके चित्तकी शान्तिके लिये पहचानचिह्नके रूपमें मैं इसे लेता आया हूँ॥ ३५-३६ १/२ ॥ |
| ७१२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| श्रुत्वा तद् ब्रह्मणो वाक्यं दृष्ट्वा च केतकीदलम्॥ ३७<br>हरिस्तं प्रत्युवाचेदं साक्षी कः कथयाधुना।<br>यथार्थवादी मेधावी सदाचारः शुचिः समः॥ ३८<br>साक्षी भवति सर्वत्र विवादे समुपस्थिते। | ब्रह्माजीके उस वचनको सुनकर और केतकी पुष्पको देखकर विष्णुने उनसे कहा—इसका साक्षी कौन है, बताइये। किसी विवादके उपस्थित होनेपर किसी सत्यवादी, बुद्धिमान्, सदाचारी, पवित्र और निष्पक्ष व्यक्तिको साक्षी बनाया जाता है॥ ३७-३८ १/२ ॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>दूरदेशात्समायाति साक्षी कः समयेऽधुना॥ ३९ | ब्रह्माजी बोले—इस समय इतने दूर देशसे कौन साक्षी आयेगा? जो सत्य बात है, उसे यह केतकी स्वयं कह देगी॥ ३९ १/२ ॥ |
| यत्सत्यं तद्वचः सेयं केतकी कथयिष्यति।<br>इत्युक्त्वा प्रेरिता तत्र ब्रह्मणा केतकी स्फुटम्॥ ४०<br>वचनं प्राह तरसा शार्ङ्गिणं प्रत्यबोधयत्।<br>शिवमूर्ध्नि स्थितां ब्रह्मा गृहीत्वा मां समागतः॥ ४१<br>सन्देहोऽत्र न कर्तव्यस्त्वया विष्णो कदाचन।<br>मम वाक्यं प्रमाणं हि ब्रह्मा पारङ्गतोऽस्य ह॥ ४२ | ऐसा कहकर ब्रह्माजीने केतकीको [साक्ष्यके लिये] प्रेरित किया। तब उसने शीघ्रतापूर्वक विष्णुको सम्बोधित करते हुए कहा कि शिव (लिंग)के मस्तकपर स्थित मुझे ब्रह्माजी वहाँसे लेकर आये हैं। हे विष्णो! इसमें आपको किसी प्रकारका सन्देह नहीं करना चाहिये। ब्रह्माजी इस लिंगके पार गये हैं और शिवभक्तोंके द्वारा समर्पित की गयी मुझको लेकर आये हैं—यह मेरा कथन ही प्रमाण है॥ ४०—४२ १/२ ॥ |
| गृहीत्वा मां समायातः शिवभक्तैः समर्पिताम्।<br>केतक्या वचनं श्रुत्वा हरिराह स्मयन्निव॥ ४३ | केतकीकी बात सुनकर भगवान् विष्णु मुसकराते हुए बोले कि मेरे लिये तो महादेव ही प्रमाण हैं। यदि वे ऐसी बात बोल दें तो मैं मान लूँगा॥ ४३ १/२ ॥ |
| महादेवः प्रमाणं मे यद्यसौ वचनं वदेत्।<br>ऋषिरुवाच<br>तदाकर्ण्य हरेर्वाक्यं महादेवः सनातनः॥ ४४<br>कुपितः केतकीं प्राह मिथ्यावादिनि मा वद।<br>गच्छतो मध्यतः प्राप्ता पतिता मस्तकान्मम॥ ४५ | ऋषि बोले—तब विष्णुकी बात सुनकर सनातन भगवान् महादेवने क्रुद्ध होकर केतकीसे कहा—असत्यभाषिणि! ऐसा मत बोलो। मेरे मस्तकसे गिरी हुई तुझे ब्रह्मा बीचमें ही पा गये थे। तुमने झूठ बोला है, इसलिये अब मैंने सदैवके लिये तुम्हारा त्याग कर दिया। तब ब्रह्माजीने लज्जित होकर भगवान् विष्णुको नमस्कार किया। उसी दिनसे शिवद्वारा पुष्पोंमेंसे केतकीका त्याग कर दिया गया॥ ४४—४६ १/२ ॥ |
| मिथ्याभिभाषिणी त्यक्ता मया त्वं सर्वदैव हि।<br>ब्रह्मा लज्जापरो भूत्वा ननाम मधुसूदनम्॥ ४६<br>शिवेन केतकी त्यक्ता तद्दिनात्कुसुमेषु वै।<br>एवं मायाबलं विद्धि ज्ञानिनामपि मोहदम्॥ ४७<br>अन्येषां प्राणिनां राजन् का वार्ता विभ्रमं प्रति।<br>देवानां कार्यसिद्ध्यर्थं सर्वदैव रमापतिः॥ ४८ | हे राजन्! आप यह जान लीजिये कि मायाका बल ज्ञानियोंको भी मोहमें डाल देता है, तब दूसरे प्राणियोंके मोहित हो जानेकी क्या बात? स्वयं देवाधिदेव लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये पापका भय छोड़कर दैत्योंके साथ छल करते रहते हैं। वे ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान् माधव अपने सुख और आनन्दको त्यागकर विविध योनियोंमें अवतार लेकर दैत्योंके साथ युद्ध करते हैं। देवताओंके कार्यहेतु अंशावतार ग्रहण करनेवाले सर्वज्ञ वह |
| अ० ३३ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७१३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दैत्यान्वञ्चयते चाशु त्यक्त्वा पापभयं हरिः।<br>अवतारकरो देवो नानायोनिषु माधवः॥ ४९<br>त्यक्त्वानन्दसुखं दैत्यैर्युद्धं चैवाकरोद्विभुः।<br>नूनं मायाबलं चैतन्माधवेऽपि जगद्गुरौ॥ ५०<br>सर्वज्ञे देवकार्यांशे का वार्तान्यस्य भूपते।<br>ज्ञानिनामपि चेतांसि परमा प्रकृतिः किल॥ ५१<br>बलादाकृष्य मोहाय प्रयच्छति महीपते।<br>यया व्याप्तमिदं सर्वं भगवत्या चराचरम्॥ ५२<br>मोहदा ज्ञानदा सैव बन्धमोक्षप्रदा सदा। | जगद्गुरु भगवान् विष्णुमें भी यह मायाशक्ति अपना प्रभाव डालती है, तब हे राजन्! अन्यकी क्या बात! हे राजन्! वे परम प्रकृतिस्वरूपा महामाया ज्ञानियोंके मनको भी बलपूर्वक आकृष्ट करके मोहित कर देती हैं, जिन भगवतीके द्वारा स्थावर-जंगमात्मक यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है; वे ही ज्ञानदायिनी, मोहदायिनी तथा बन्धन एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं॥ ४७–५२ १/२ ॥ |
| राजोवाच<br>भगवन्ब्रूहि मे तस्याः स्वरूपं बलमुत्तमम्॥ ५३<br>उत्पत्तिकारणं वापि स्थानं परमकं च यत्। | राजा बोले— हे भगवन्! मुझे उनके स्वरूप, उत्तम बल, उनकी उत्पत्तिका कारण और उनके परम धामके विषयमें बताइये॥ ५३ १/२ ॥ |
| ऋषिरुवाच<br>न चोत्पत्तिरनादित्वान्नृप तस्याः कदाचन॥ ५४<br>नित्यैव सा परा देवी कारणानां च कारणम्।<br>वर्तते सर्वभूतेषु शक्तिः सर्वात्मना नृप॥ ५५<br>शववच्छक्तिहीनस्तु प्राणी भवति सर्वथा।<br>चिच्छक्तिः सर्वभूतेषु रूपं तस्यास्तदेव हि॥ ५६<br>आविर्भावतिरोभावौ देवानां कार्यसिद्धये। | ऋषि बोले— हे राजन्! अनादि होनेके कारण उनकी कभी उत्पत्ति नहीं होती। नित्य और सर्वोपरि वे देवी समस्त कारणोंकी भी कारण हैं। हे नृप! वे शक्तिस्वरूपा भगवती सभी प्राणियोंमें सर्वात्मारूपसे विद्यमान रहती हैं। यदि प्राणी शक्तिसे रहित हो जाय तो वह प्राणी शवतुल्य हो जाता है; क्योंकि सभी प्राणियोंमें जो चैतन्य शक्ति है, वह इन्हींका रूप है। देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये ही उनका प्राकट्य और तिरोधान होता है॥ ५४–५६ १/२ ॥ |
| यदा स्तुवन्ति तां देवा मनुजाश्च विशाम्पते॥ ५७<br>प्रादुर्भवति भूतानां दुःखनाशाय चाम्बिका।<br>नानारूपधरा देवी नानाशक्तिसमन्विता॥ ५८<br>आविर्भवति कार्यार्थं स्वेच्छया परमेश्वरी।<br>दैवाधीना न सा देवी यथा सर्वे सुरा नृप॥ ५९ | हे राजन्! जब देवता या मनुष्य उनकी स्तुति करते हैं, तब प्राणियोंके दुःखका नाश करनेके लिये ये भगवती जगदम्बा प्रकट होती हैं, वे देवी परमेश्वरी अनेक रूप धारण करके अनेक प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न होकर कार्य सिद्ध करनेके लिये स्वेच्छापूर्वक आविर्भूत होती हैं। हे राजन्! अन्य देवताओंकी भाँति वे भगवती दैवके अधीन नहीं हैं। सदा पुरुषार्थका प्रवर्तन करनेवाली वे देवी कालके वशमें नहीं हैं॥ ५७–५९ १/२ ॥ |
| न कालवशगा नित्यं पुरुषार्थप्रवर्तिनी।<br>अकर्ता पुरुषो द्रष्टा दृश्यं सर्वमिदं जगत्॥ ६०<br>दृश्यस्य जननी सैव देवी सदसदात्मिका।<br>पुरुषं रञ्जयत्येका कृत्वा ब्रह्माण्डनाटकम्॥ ६१<br>रञ्जिते पुरुषे सर्वं संहरत्यतिरंहसा।<br>तया निमित्तभूतास्ते ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः॥ ६२ | यह सम्पूर्ण जगत् दृश्य है, परमपुरुष इसका द्रष्टा है, वह कर्ता नहीं है। वे सत्-असत्स्वरूपा देवी ही इस दृश्यमान जगत्की जननी हैं, वे स्वयं अकेले इस ब्रह्माण्डकी रचना करके परमपुरुषको आनन्दित करती हैं और उन परमपुरुषका मनोरंजन हो जानेके बाद वे भगवती शीघ्र ही सम्पूर्ण सृष्टि-प्रपंचका संहार भी कर देती हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश तो निमित्तमात्र हैं। वे भगवती ही अपनी लीलासे |
| ७१४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३४ |
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| कल्पिताः स्वस्वकार्येषु प्रेरिता लीलया त्वमी।<br>स्वांशं तेषु समारोप्य कृतास्ते बलवत्तराः॥ ६३<br><br>दत्ताश्च शक्तयस्तेभ्यो गीर्लक्ष्मीर्गिरिजा तथा।<br>ते तां ध्यायन्ति देवेशाः पूजयन्ति परां मुदा॥ ६४ | उनकी रचना करती हैं और उन्हें अपने-अपने कार्यों (जगत्का सृजन, पालन और संहार)—में प्रवृत्त करती हैं। वे (देवी) उनमें अपने अंश (शक्ति)—का आरोपणकर उन्हें बलवान् बनाती हैं। उन्होंने सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वतीके रूपमें उन्हें अपनी शक्तियाँ दी हैं। अतः वे त्रिदेव उन्हीं पराम्बाको सृजन, पालन और संहार करनेवाली जानकर प्रसन्नतापूर्वक उनका ध्यान और पूजन करते हैं॥ ६०–६४१/२॥ | | ज्ञात्वा सर्वेश्वरीं शक्तिं सृष्टिस्थितिविनाशिनीम्।<br>एतत्ते सर्वमाख्यातं देवीमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>मम बुद्धयनुसारेण नान्तं जानामि भूपते॥ ६५ | हे राजन्! इस प्रकार मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार देवीका यह उत्तम माहात्म्य आपसे कह दिया, मैं इसका अन्त नहीं जानता हूँ॥ ६५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३॥
अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
मुनि सुमेधाद्वारा देवीकी पूजा-विधिका वर्णन
| राजोवाच | राजा बोले— |
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| भगवन्ब्रूहि मे सम्यक्तस्या आराधने विधिम्।<br>पूजाविधिञ्च मन्त्रांश्च तथा होमविधिं वद॥ १ | हे भगवन्! अब मुझे उन देवीकी आराधना-विधि भलीभाँति बताइये; साथ ही पूजा-विधि, हवनकी विधि और मन्त्र भी बताइये॥ १॥ |
| ऋषिरुवाच | ऋषि बोले— |
| शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तस्याः पूजाविधिं शुभम्।<br>कामदं मोक्षदं नृणां ज्ञानदं दुःखनाशनम्॥ २ | हे राजन्! सुनिये, मैं उनके पूजनकी शुभ विधि बताता हूँ, जो मनुष्योंको काम, मोक्ष और ज्ञानको देनेवाली तथा उनके दुःखोंका नाश करनेवाली है॥ २॥ |
| आदौ स्नानविधिं कृत्वा शुचिः शुक्लाम्बरो नरः।<br>आचम्य प्रयततः कृत्वा शुभमायतनं निजम्॥ ३<br><br>ततोऽवलिप्तभूम्यां तु संस्थाप्यासन्नमुत्तमम्।<br>तत्रोपविश्य विधिवत् त्रिराचम्य मुदान्वितः॥ ४<br><br>पूजाद्रव्यं सुसंस्थाप्य यथाशक्त्यनुसारतः।<br>प्राणायामं ततः कृत्वा भूतशुद्धिं विधाय च॥ ५<br><br>कुर्यात्प्राणप्रतिष्ठां तु सम्भारं प्रोक्ष्य मन्त्रतः।<br>कालज्ञानं ततः कृत्वा न्यासं कुर्याद्यथाविधि॥ ६ | मनुष्यको सर्वप्रथम विधिपूर्वक स्नान करके पवित्र हो श्वेत वस्त्र धारण कर लेना चाहिये। तत्पश्चात् वह सावधानीपूर्वक आचमन करके पूजा-स्थानको शुद्ध करनेके बाद लिपी हुई भूमिपर उत्तम आसन बिछाकर उसपर बैठ जाय और प्रसन्न होकर विधिपूर्वक तीन बार आचमन करे। अपनी शक्तिके अनुसार पूजाद्रव्यको सुव्यवस्थित ढंगसे रखकर प्राणायाम कर ले, उसके बाद भूतशुद्धि करके और पुनः मन्त्र पढ़कर समस्त पूजन-सामग्रीका प्रोक्षण करके देवीमूर्तिकी प्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिये। तत्पश्चात् देशकालका उच्चारणकर विधिपूर्वक न्यास करना चाहिये॥ ३—६॥ |
| अ० ३४ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७१५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| शुभे ताम्रमये पात्रे चन्दनेन सितेन च।<br>षट्कोणं विलिखेद्यन्त्रं चाष्टकोणं ततो बहिः॥ ७<br><br>° नवाक्षरस्य मन्त्रस्य बीजानि विलिखेत्ततः।<br>कृत्वा यन्त्रप्रतिष्ठाञ्च वेदोक्तां संविधाय च॥ ८<br><br>अर्चां वा धातवीं कुर्यात्पूजामन्त्रैः शिवोदितैः।<br>पूजनं पृथिवीपाल भगवत्याः प्रयत्नतः॥ ९<br><br>कृत्वा वा विधिवत्पूजामागमोक्तां समाहितः।<br>जपेन्नवाक्षरं मन्त्रं सततं ध्यानपूर्वकम्॥ १०<br><br>होमं दशांशतः कुर्याद्दशांशेन च तर्पणम्।<br>भोजनं ब्राह्मणानाञ्च तद्दशांशेन कारयेत्॥ ११<br><br>चरित्रत्रयपाठञ्च नित्यं कुर्याद्विसर्जयेत्।<br>नवरात्रव्रतं चैव विधेयं विधिपूर्वकम्॥ १२ | इसके बाद सुन्दर ताम्रपात्रपर श्वेत चन्दनसे षट्कोण यन्त्र तथा उसके बाहर अष्टकोण यन्त्र लिखना चाहिये। तदनन्तर नवाक्षर मन्त्रके आठ बीज अक्षर आठों कोणोंमें लिखना चाहिये और नौवाँ अक्षर यन्त्रकी कर्णिका (बीच)-में लिखना चाहिये। तदनन्तर वेदमें बतायी गयी विधिसे यन्त्रकी प्रतिष्ठा करके अथवा हे राजन्! भगवतीकी धातुमयी प्रतिमा बनाकर शिवतन्त्रोक्त पूजामन्त्रोंसे प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। अथवा सावधान होकर आगमशास्त्रमें बतायी गयी विधिसे विधानपूर्वक पूजन करके ध्यानपूर्वक नवाक्षरमन्त्रका सतत जप करना चाहिये। जपका दशांश होम करना चाहिये, होमका दशांश तर्पण करना चाहिये और तर्पणका दशांश ब्राह्मणभोजन कराना चाहिये। प्रतिदिन तीनों चरित्रों (प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र तथा उत्तर चरित्र)-का पाठ करना चाहिये। इसके बाद विसर्जन करना चाहिये॥ ७-११ १/२॥ |
| आश्विने च तथा चैत्रे शुक्ले पक्षे नराधिप।<br>नवरात्रोपवासो वै कर्तव्यः शुभमिच्छता॥ १३ | हे राजन्! कल्याण चाहनेवालेको आश्विन और चैत्र माहके शुक्लपक्षमें विधिपूर्वक नवरात्रव्रत करना चाहिये। इन नवरात्रोंमें उपवास भी करना चाहिये॥ १२-१३॥ |
| होमः सुविपुलः कार्यो जप्यमन्त्रैः सुपायसैः।<br>शर्कराघृतमिश्रैश्च मधुयुक्तैः सुसंस्कृतैः॥ १४<br><br>छागमांसेन वा कार्यो बिल्वपत्रैस्तथा शुभैः।<br>हयारिकुसुमै रक्तैस्तिलैर्वा शर्करायुतैः॥ १५<br><br>अष्टम्याञ्च चतुर्दश्यां नवम्याञ्च विशेषतः।<br>कर्तव्यं पूजनं देव्या ब्राह्मणानाञ्च भोजनम्॥ १६<br><br>निर्धनो धनमाप्नोति रोगी रोगात्प्रमुच्यते।<br>अपुत्रो लभते पुत्राञ्छुभांश्च वशवर्तिनः॥ १७<br><br>राज्यभ्रष्टो नृपो राज्यं प्राप्नोति सार्वभौमिकम्।<br>शत्रुभिः पीडितो हन्ति रिपुं मायाप्रसादतः॥ १८<br><br>विद्यार्थी पूजनं यस्तु करोति नियतेन्द्रियः।<br>अनवद्यां शुभां विद्यां विन्दते नात्र संशयः॥ १९ | अनुष्ठानमें जपे गये मन्त्रोंके द्वारा शर्करा, घी और मधुमिश्रित पवित्र खीरसे विस्तारपूर्वक हवन करना चाहिये अथवा उत्तम बिल्वपत्रों, लाल कनैलके पुष्पों अथवा शर्करामिश्रित तिलोंसे हवन करना चाहिये। अष्टमी, नवमी एवं चतुर्दशीको विशेषरूपसे देवीपूजन करना चाहिये और इस अवसरपर ब्राह्मणभोजन भी कराना चाहिये। ऐसा करनेसे निर्धनको धनकी प्राप्ति होती है, रोगी रोगमुक्त हो जाता है, पुत्रहीन व्यक्ति सुन्दर और आज्ञाकारी पुत्रोंको प्राप्त करता है और राज्यच्युत राजाको सार्वभौम राज्य प्राप्त हो जाता है। देवी महामायाकी कृपासे शत्रुओंसे पीड़ित मनुष्य अपने शत्रुओंका नाश कर देता है। जो विद्यार्थी इन्द्रियोंको वशमें करके इस पूजनको करता है, वह शीघ्र ही पुण्यमयी उत्तम विद्या प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ १४-१९॥ |
| ७१६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३४ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा भक्तिसंयुतः।<br>पूजयेज्जगतां धात्रीं स सर्वसुखभाग्भवेत्॥ २०<br><br>नवरात्रव्रतं कुर्यान्नरनारीगणश्च यः।<br>वाञ्छितं फलमाप्नोति सर्वदा भक्तितत्परः॥ २१ | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र—जो भी भक्तिपरायण होकर जगज्जननी जगदम्बाकी पूजा करता है, वह सब प्रकारके सुखका भागी हो जाता है। जो स्त्री अथवा पुरुष भक्तितत्पर होकर नवरात्रव्रत करता है, वह सदा मनोवांछित फल प्राप्त करता है॥ २०–२१॥ |
| आश्विने शुक्लपक्षे तु नवरात्रव्रतं शुभम्।<br>करोति भावसंयुक्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥ २२ | जो मनुष्य आश्विन शुक्लपक्षमें इस उत्तम नवरात्रव्रतको श्रद्धाभावसे करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं॥ २२॥ |
| विधिवन्मण्डलं कृत्वा पूजास्थानं प्रकल्पयेत्।<br>कलशं स्थापयेत्तत्र वेदमन्त्रविधानतः॥ २३ | विधिपूर्वक मण्डलका निर्माण करके पूजा-स्थानका निर्माण करना चाहिये और वहाँपर विधिविधानसे वैदिक मन्त्रोंद्वारा कलशकी स्थापना करनी चाहिये॥ २३॥ |
| यन्त्रं सुरुचिरं कृत्वा स्थापयेत्कलशोपरि।<br>वापयित्वा यवांश्चारून्पार्श्वतः परिवर्तितान्॥ २४<br><br>कृत्वोपरि वितानञ्च पुष्पमालासमावृतम्।<br>धूपदीपसुसंयुक्तं कर्तव्यं चण्डिकागृहम्॥ २५ | अत्यन्त सुन्दर यन्त्रका निर्माण करके उसे कलशके ऊपर स्थापित कर देना चाहिये। तत्पश्चात् कलशके चारों ओर परिष्कृत तथा उत्तम जौका वपन करके पूजा-स्थानके ऊपर पुष्पमालासे अलंकृत चाँदनी लगाकर देवीका मण्डप बनाना चाहिये तथा उसे सदा धूप-दीपसे सम्पन्न रखना चाहिये॥ २४–२५॥ |
| त्रिकालं तत्र कर्तव्या पूजा शक्त्यनुसारतः।<br>वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं चण्डिकायाश्च पूजने॥ २६<br><br>धूपैर्दीपैः सुनैवेद्यैः फलपुष्पैरनेकणः।<br>गीतवाद्यैः स्तोत्रपाठैर्वेदपारायणैस्तथा॥ २७<br><br>उत्सवस्तत्र कर्तव्यो नानावादित्रसंयुतैः।<br>कन्यकानां पूजनञ्च विधेयं विधिपूर्वकम्॥ २८<br><br>चन्दनैर्भूषणैर्वस्त्रैर्भक्ष्यैश्च विविधैस्तथा।<br>सुगन्धतैलमाल्यैश्च मनसो रुचिकारकैः॥ २९<br><br>एवं सम्पूजनं कृत्वा होमं मन्त्रविधानतः।<br>अष्टम्यां वा नवम्यां वा कारयेद्विधिपूर्वकम्॥ ३०<br><br>ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चात्पारणां दशमीदिने।<br>कर्तव्यं शक्तितो दानं देयं भक्तिपरैर्नृपैः॥ ३१ | अपनी शक्तिके अनुसार वहाँ [प्रातः, मध्याह्न तथा सायंकाल] तीनों समय पूजा करनी चाहिये। देवीकी पूजामें धनकी कृपणता नहीं करनी चाहिये। धूप, दीप, उत्तम नैवेद्य, अनेक प्रकारके फल-पुष्प, गीत, वाद्य, स्तोत्रपाठ तथा वेदपारायण—इनके द्वारा भगवतीकी पूजा होनी चाहिये। नानाविध वाद्य बजाकर उत्सव मनाना चाहिये। इस अवसरपर चन्दन, आभूषण, वस्त्र, विविध प्रकारके व्यंजन, सुगन्धित तेल, हार—मनको प्रसन्न करनेवाले इन पदार्थोंसे विधिपूर्वक कन्याओंका पूजन करना चाहिये। इस प्रकार पूजन सम्पन्न करके अष्टमी या नवमीको मन्त्रोच्चारपूर्वक विधिवत् हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। इसके बाद दशमीको पारण करना चाहिये। भक्तिनिष्ठ राजाओंको यथाशक्ति दान भी करना चाहिये॥ २६–३१॥ |
| एवं यः कुरुते भक्त्या नवरात्रव्रतं नरः।<br>नारी वा सधवा भक्त्या विधवा वा पतिव्रता॥ ३२ | इस प्रकार पुरुष अथवा पतिव्रता सधवा या विधवा स्त्री जो कोई भी भक्तिपूर्वक नवरात्रव्रत करता है, वह इस लोकमें सुख तथा मनोभिलषित |
| अ० ३४ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इह लोके सुखं भोगान्प्राप्नोति मनसेप्सितान् ।<br>देहान्ते परमं स्थानं प्राप्नोति व्रततत्परः ॥ ३३<br><br>जन्मान्तरेऽम्बिकाभक्तिर्भवत्यव्यभिचारिणी ।<br>जन्मोत्तमकुले प्राप्य सदाचारो भवेद्वि सः ॥ ३४ | भोगोंको प्राप्त करता है और वह व्रतपरायण व्यक्ति देह-त्याग होनेपर परम दिव्य देवीलोकको प्राप्त करता है ॥ ३२-३३ ॥<br><br>उसे जन्मान्तरमें देवी जगदम्बाकी अविचल भक्ति प्राप्त होती है और उत्तम कुलमें जन्म पाकर वह स्वभावतः सदाचारी होता है ॥ ३४ ॥ |
| नवरात्रव्रतं प्रोक्तं व्रतानामुत्तमं व्रतम् ।<br>आराधनं शिवायास्तु सर्वसौख्यकरं परम् ॥ ३५ | नवरात्रव्रतको व्रतोंमें उत्तम व्रत कहा गया है; भगवती शिवाका आराधन सब प्रकारके उत्तम सुखको देनेवाला है ॥ ३५ ॥ |
| अनेन विधिना राजन् समाराध्य चण्डिकाम् ।<br>जित्वा रिपूनस्खलितं राज्यं प्राप्स्यस्यनुत्तमम् ॥ ३६<br><br>सुखञ्च परमं भूप देहेऽस्मिन्स्वगृहे पुनः ।<br>पुत्रदारान्समासाद्य लप्स्यसे नात्र संशयः ॥ ३७ | हे राजन्! इस विधिसे भगवती चण्डिकाकी आराधना कीजिये, इससे शत्रुओंको जीतकर आप अपना उत्तम राज्य पुनः प्राप्त कर लेंगे और हे भूप! अपनी स्त्री-पुत्र आदि स्वजनोंको प्राप्तकर आप अपने भवनमें परम उत्तम सुखका इसी शरीरसे उपभोग करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३६-३७ ॥ |
| वैश्योत्तम त्वमेवाद्य समाराधय कामदाम् ।<br>देवीं विश्वेश्वरीं मायां सृष्टिंसंहारकारिणीम् ॥ ३८<br><br>स्वजनानां च मान्यस्त्वं भविष्यसि गृहे गतः ।<br>सुखं सांसारिकं प्राप्य यथाभिलषितं पुनः ॥ ३९ | हे वैश्यश्रेष्ठ! आप भी आजसे समस्त कामनाओंको देनेवाली, सृष्टि और संहारकी कारणभूता विश्वेश्वरी देवी महामायाकी आराधना कीजिये। इससे आप अपने घर जानेपर अपने लोगोंमें मान्य हो जायँगे और मनोभिलषित सांसारिक सुख प्राप्त करके अन्तमें शुभ देवीलोकमें वास करेंगे—इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३८-३९ १/२ ॥ |
| देवीलोके शुभे वासो भविता ते न संशयः ।<br>नाराधिता भगवती यैस्ते नरकभागिनः ॥ ४०<br><br>इह लोकेऽतिदुःखार्ता नानारोगैः प्रपीडिताः ।<br>भवन्ति मानवा राजञ्छत्रुभिश्च पराजिताः ॥ ४१ | हे राजन्! जो मनुष्य भगवतीकी आराधना नहीं करते, वे नरकके भागी होते हैं। वे इस लोकमें अत्यन्त दुःखी, विविध व्याधियोंसे पीड़ित, शत्रुओंद्वारा पराजित, स्त्री-पुत्रसे हीन, तृष्णाग्रस्त और बुद्धिभ्रष्ट होते हैं ॥ ४०-४१ १/२ ॥ |
| निष्कलत्रा ह्यपुत्राश्च तृष्णार्ताः स्तब्धबुद्धयः ।<br>बिल्वीदलैः करवीरैः शतपत्रैश्च चम्पकैः ॥ ४२<br><br>अर्चिता जगतां धात्री यैस्तेऽतीव विलासिनः ।<br>भवन्ति कृतपुण्यास्ते शक्तिभक्तिपरायणाः ॥ ४३ | बिल्वपत्रोंसे तथा कनैल, कमल और चम्पाके फूलोंसे जो जगज्जननीकी आराधना करते हैं, शक्तिस्वरूपा भगवतीकी भक्तिमें रत वे पुण्यशाली लोग विविध प्रकारके सुख प्राप्त करते हैं ॥ ४२-४३ ॥ |
| धनविभवसुखाढ्या मानवा मानवन्तः<br>सकलगुणगणानां भाजनं भारतीशाः ।<br>निगमपठितमन्त्रैः पूजिता यैर्भवानी<br>नृपतितिलकमुख्यास्ते भवन्तीह लोके ॥ ४४ | [हे नृपश्रेष्ठ!] जो लोग वेदोक्त मन्त्रोंसे भवानीका पूजन करते हैं, वे मानव इस संसारमें सब प्रकारके धन, वैभव तथा सुखसे परिपूर्ण, समस्त गुणोंके आगार, माननीय, विद्वान् और राजाओंके शिरोमणि होते हैं ॥ ४४ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भगवत्याः पूजाराधनविधिवर्णनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
| ७१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३५ |
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अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
सुरथ और समाधिकी तपस्यासे प्रसन्न भगवतीका प्रकट होना और उन्हें इच्छित वरदान देना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| इति तस्य वचः श्रुत्वा दुःखितौ वैश्यपार्थिवौ।<br>प्रणिपत्य मुनिं प्रीत्या प्रश्रयावनतौ भृशम्॥ १<br><br>हर्षेणोत्फुल्लनयनावूचतुर्वाक्यकोविदौ ।<br>कृताञ्जलिपुटौ शान्तौ भक्तिप्रवणचेतसौ॥ २ | उनका यह वचन सुनकर दुःखित हृदयवाले वैश्य और राजाने प्रसन्नतापूर्वक विनम्रभावसे मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया। भक्तिपरायण चित्तवाले, शान्त स्वभाववाले तथा हर्षके कारण खिले हुए नेत्रोंवाले वे दोनों वाक्य-विशारद राजा और वैश्य हाथ जोड़कर कहने लगे॥ १-२॥ |
| भगवन्पावितावद्य शान्तौ दीनौ शुचान्वितौ।<br>तव सूक्तसरस्वत्या गङ्गयेव भगीरथः॥ ३ | हे भगवन्! हम दोनों दुःखी जनोंको आपकी सूक्तिरूपिणी वाणीने उसी प्रकार शान्त तथा पवित्र कर दिया, जैसे गंगाने राजा भगीरथको कर दिया था॥ ३॥ |
| साधवः सम्भवन्तीह परोपकृतितत्पराः।<br>अकृत्रिमगुणारामाः सुखदाः सर्वदेहिनाम्॥ ४<br><br>पूर्वपुण्यप्रसङ्गेन प्राप्तोऽयमाश्रमः शुभः।<br>तवावाभ्यां महाभाग महादुःखविनाशकः॥ ५<br><br>भवन्ति मानवा भूमौ बहवः स्वार्थतत्पराः।<br>परार्थसाधने दक्षाः केचित्क्वापि भवादृशाः॥ ६<br><br>दुःखितोऽहं मुनिश्रेष्ठ वैश्योऽयं चातिदुःखितः।<br>उभौ संसारसन्तप्तौ तवाश्रमपदे मुदा॥ ७<br><br>दर्शनादेव हे विद्वन् गतं दुःखमिहावयोः।<br>देहजं मानसं वाक्यश्रवणादेव साम्प्रतम्॥ ८ | सज्जन लोग परोपकारपरायण, स्वाभाविक रूपसे गुणोंके भण्डार और सभी प्राणियोंको सुख देनेवाले होते हैं। पूर्वजन्मोंके पुण्यके कारण ही महान् दुःखका नाश करनेवाले आपके इस शुभ आश्रममें हम दोनोंका आना हुआ। पृथ्वीपर बहुत-से स्वार्थी मनुष्य होते हैं, परंतु दूसरोंके हित-साधनमें कुशल आप-जैसे कुछ ही लोग कहीं-कहीं मिलते हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! मैं दुःखी हूँ और ये वैश्य अत्यन्त दुःखी हैं। हम दोनों इस संसारसे पीड़ित हैं। हे विद्वन्! आपके इस आश्रममें आकर प्रसन्नतापूर्वक आपके दर्शन और उपदेश-श्रवणसे हमारा शारीरिक तथा मानसिक क्लेश दूर हो गया॥ ४-८॥ |
| धन्यावावां कृतकृत्यौ जातौ सूक्तिसुधारसात्।<br>पावितौ भवता ब्रह्मन् कृपया करुणार्णव॥ ९ | हे ब्रह्मन्! आपकी अमृतमयी वाणीके रससे हम दोनों धन्य और कृतकृत्य हो गये। हे करुणासागर! आपने अपनी कृपासे हम दोनोंको पवित्र कर दिया॥ ९॥ |
| गृहाणास्मत्करौ साधो नय पारं भवार्णवे।<br>मग्नौ श्रान्ताविति ज्ञात्वा मन्त्रदानेन साम्प्रतम्॥ १० | हे साधो! हम दोनों थककर इस संसाररूपी महासागरमें डूब रहे हैं—यह जानकर अब आप हम दोनोंका हाथ पकड़िये और मन्त्रदान देकर भवसागरसे पार कर दीजिये॥ १०॥ |
| अ० ३५ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७१९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तपः कृत्वातिविपुलं समाराध्य सुखप्रदाम्।<br>सम्प्राप्य दर्शनं भूयो यास्यावो निजमन्दिरम्॥ ११ | अब अत्यन्त कठोर तपस्या करके हम दोनों सुख प्रदान करनेवाली जगदम्बाका आराधन करके उनका दर्शन प्राप्तकर अपने-अपने घरोंको वापस जायँगे॥ ११॥ |
| वदनात्तव सम्प्राप्य देवीमन्त्रं नवाक्षरम्।<br>स्मरणञ्च करिष्यावो निराहारौ धृतव्रतौ॥ १२ | आपके मुखसे देवीका नवाक्षरमन्त्र ग्रहण करके हम दोनों निराहार रहकर व्रत करेंगे और उस मन्त्रका जप करेंगे॥ १२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति संचोदितस्ताभ्यां सुमेधा मुनिसत्तमः।<br>ददौ मन्त्रं शुभं ताभ्यां ध्यानबीजपुरःसरम्॥ १३ | व्यासजी बोले— इस प्रकार उन दोनोंके आग्रह करनेपर मुनिश्रेष्ठ सुमेधाने उन्हें ध्यान-बीजसहित देवीका मंगलकारी नवाक्षरमन्त्र प्रदान किया॥ १३॥ |
| तौ च प्राप्य मुनेर्मन्त्रं सम्मन्त्र्य गुरुदैवतौ।<br>जग्मतुर्वैश्यराजानौ नदीतीरमनुत्तमम्॥ १४ | वे दोनों वैश्य और राजा मुनिसे मन्त्र और उसके ऋषि, छंद, देवताका ज्ञान प्राप्त करके तथा उनसे आज्ञा लेकर नदीके अत्युत्तम तटपर चले गये॥ १४॥ |
| एकान्ते विजने स्थाने कृत्वासनपरिग्रहम्।<br>उपविष्टौ स्थिरप्रज्ञौ तावतीव कृशोदरौ॥ १५ | अत्यन्त कृशकाय वे दोनों एकान्तमें निर्जन स्थानपर आसन लगाकर स्थिरचित्त होकर बैठ गये॥ १५॥ |
| मन्त्रजाप्यरत्तौ शान्तौ चरित्रत्रयपाठकौ।<br>निन्यतुर्मासमेकं तु तत्र ध्यानपरायणौ॥ १६ | उन दोनोंने शान्तचित्त तथा ध्यानपरायण होकर मन्त्रजप और भगवतीके तीनों चरित्रोंका पाठ करते हुए एक मासका समय व्यतीत कर दिया॥ १६॥ |
| तयोर्मासव्रतेनैव जाता प्रीतिरनुत्तमा।<br>पादाम्बुजे भवान्यास्तु स्थिरा बुद्धिस्तथाप्यलम्॥ १७ | उनके एक मासके व्रतसे ही उनमें भगवती भवानीके चरणकमलमें उत्तम प्रीति उत्पन्न हो गयी और उनकी बुद्धि स्थिर हो गयी॥ १७॥ |
| कदाचित्पादयोर्गत्वा मुनेस्तस्य महात्मनः।<br>कृतप्रणामावागत्य तस्थतुश्च कुशासने॥ १८<br><br>नान्यकार्यपरौ क्वापि बभूवतुः कदाचन।<br>देवीध्यानपरौ नित्यं जपमन्त्ररतौ सदा॥ १९ | वे दोनों नित्य जाकर एक बार महात्मा [सुमेधा] मुनिके चरणोंमें प्रणाम करते थे और वहाँसे लौटकर फिर अपने कुशासनपर बैठ जाते थे। वे दोनों अन्य कोई भी कार्य नहीं करते थे और सदैव देवीके ध्यान तथा मन्त्रजपमें संलग्न रहते थे॥ १८-१९॥ |
| एवं जाते तदा पूर्णे तत्र संवत्सरे नृप।<br>बभूवतुः फलाहारं त्यक्त्वा पर्णाशनौ नृप॥ २०<br><br>वर्षमेकं तपस्तत्र चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ।<br>शुष्कपर्णाशनौ दान्तौ जपध्यानपरायणौ॥ २१ | हे राजन्! इस प्रकार एक वर्ष पूर्ण होनेपर वे फलाहारका त्याग करके पत्तेके आहारपर रहने लगे। हे नृप! उन दोनों—वैश्य और राजाने एक वर्षतक सूखे पत्ते खाकर इन्द्रियोंको वशमें करके जप और ध्यानमें रत रहते हुए तप किया॥ २०-२१॥ |
| पूर्णे वर्षद्वये जाते कदाचिद्दर्शनञ्च तौ।<br>प्रापतुः स्वप्नमध्ये तु भगवत्या मनोहरम्॥ २२<br><br>रक्ताम्बरधरां देवीं चारूभूषणभूषिताम्।<br>कदाचिन्नृपतिः स्वप्नेऽप्यपश्यज्जगदम्बिकाम्॥ २३ | इस प्रकार दो वर्ष व्यतीत होनेपर उन दोनोंको किसी समय स्वप्नमें भगवतीका मनोहारी दर्शन प्राप्त हुआ। राजाने स्वप्नमें देवी जगदम्बिकाको लाल वस्त्र धारण किये हुए तथा सुन्दर आभूषणोंसे अलंकृत देखा॥ २२-२३॥ |
७२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३५
७२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३५
| वीक्ष्य स्वप्ने च तौ देवीं प्रीतियुक्तौ बभूवतुः।<br>जलाहारैस्तृतीये तु स्थितौ संवत्सरे तु तौ ॥ २४ | स्वप्नमें देवीका दर्शन प्राप्तकर दोनों प्रेमभावसे परिपूर्ण हो गये। अब वे दोनों तीसरे वर्षमें मात्र जलके आहारपर रहने लगे ॥ २४ ॥ |
| एवं वर्षत्रयं कृत्वा ततस्तौ वैश्यपार्थिवौ।<br>चक्रतुस्तौ तदा चिन्तां चित्ते दर्शनलालसौ ॥ २५ | इस प्रकार तीन वर्षतक तपस्या करनेके पश्चात् वे दोनों—राजा और वैश्य मनमें देवीके साक्षात् दर्शनकी लालसासे चिन्तित हो उठे ॥ २५ ॥ |
| प्रत्यक्षं दर्शनं देव्या न प्राप्तं शान्तिदं नृणाम्।<br>देहत्यागं करिष्यावो दुःखितौ भृशमातुरौ ॥ २६ | अत्यन्त दुःखी तथा व्याकुल होकर उन दोनोंने निश्चय किया कि मनुष्योंको शान्ति प्रदान करनेवाली देवीका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं प्राप्त हुआ, अतः अब हम शरीरका त्याग कर देंगे ॥ २६ ॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा राजा कुण्डं चकार ह।<br>त्रिकोणं सुस्थिरं सौम्यं हस्तमात्रप्रमाणतः ॥ २७<br><br>संस्थाप्य पावकं राजा तथा वैश्योऽतिभक्तिमान्।<br>जुहावासौ निजं मांसं छित्त्वा छित्त्वा पुनः पुनः॥ २८<br><br>तथा वैश्योऽपि दीप्तेऽग्नौ स्वमांसं प्राक्षिपत्तदा।<br>रुधिरेण बलिं चास्यै ददतुस्तौ कृतोद्यमौ ॥ २९<br><br>तदा भगवती दत्त्वा प्रत्यक्षं दर्शनं तयोः।<br>प्राह प्रतिभरोद्भ्रान्तौ दृष्ट्वा तौ दुःखितौ भृशम्॥ ३० | ऐसा मनमें विचारकर राजाने एक हाथ प्रमाणका त्रिभुजाकार, सुन्दर तथा सुस्थिर अग्निकुण्ड बनाया। उसमें अग्निकी स्थापना करके राजा अपना मांस काट-काटकर बार-बार हवन करने लगे। साथ ही अत्यन्त भक्तिमान् वह वैश्य भी प्रदीप्त अग्निमें अपना मांस डालने लगा। तत्पश्चात् वे दोनों जब अपने रुधिरसे इन देवीको बलि देनेके लिये उद्यत हुए तब भगवती उन दोनोंको प्रेम-भक्तिमें तन्मय और अत्यन्त दुःखी देखकर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर उनसे कहने लगीं— ॥ २७–३० ॥ |
| देव्युवाच<br>वरं वरय भो राजन् यत्ते मनसि वाञ्छितम्।<br>तुष्टाहं तपसा तेऽद्य भक्तोऽसि त्वं मतो मम ॥ ३१<br><br>वैश्यं प्राह तदा देवी प्रसन्नाहं महामते।<br>किं तेऽभीष्टं ददाम्यद्य प्रार्थयाशु मनोगतम्॥ ३२ | **देवी बोलीं—**हे राजन्! अपना मनोभिलषित वर माँगो, मैं आज तुम्हारी तपस्यासे सन्तुष्ट हूँ। अब मैंने समझ लिया कि तुम मेरे भक्त हो। उसके बाद देवीने वैश्यसे कहा—हे महामते! मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा अभीष्ट क्या है? तुम्हारे मनमें जो भी हो माँग लो, मैं उसे दूँगी ॥ ३१-३२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राजा तामुवाच मुदान्वितः।<br>देहि मेऽद्य निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात्॥ ३३ | **व्यासजी बोले—**उनके इस वचनको सुनकर प्रसन्न मनवाले राजाने उनसे कहा कि बलपूर्वक मैं शत्रुओंका नाशकर अपना राज्य प्राप्त करूँ—मुझे आज यह वरदान दीजिये ॥ ३३ ॥ |
| तमुवाच तदा देवी गच्छ राजन् निजं गृहम्।<br>शत्रवः क्षीणसत्त्वास्ते गमिष्यन्ति पराजिताः॥ ३४<br><br>मन्त्रिणस्ते समागम्य ते पतिष्यन्ति पादयोः।<br>कुरु राज्यं महाभाग नगरे स्वं यथासुखम्॥ ३५ | तब देवीने उनसे कहा—हे राजन्! अपने घरको जाओ, तुम्हारे शत्रु शीघ्र ही क्षीण बलवाले होकर पराजित हो जायेंगे। हे महाभाग! तुम्हारे मन्त्रिगण आकर तुम्हारे पैरोंपर गिरेंगे। अब आप अपने नगरमें सुखपूर्वक राज्य करें। हे राजन्! अपने विस्तृत |
| अ० ३५ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७२१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कृत्वा राज्यं सुविपुलं वर्षाणामयुतं नृप।<br>देहान्ते जन्म सम्प्राप्य सूर्याच्च भविता मनुः॥ ३६ | साम्राज्यका दस हजार वर्षोंतक शासन करके देहत्यागके बाद सूर्यसे जन्म प्राप्त करके तुम [सावर्णि] मनु होओगे॥ ३४—३६॥ |
| व्यास उवाच<br>वैश्यस्तामप्युवाचेदं कृताञ्जलिपुटः शुचिः।<br>न मे गृहेण कार्यं वै न पुत्रेण धनेन वा॥ ३७<br>सर्वं बन्धकरं मातः स्वप्नवन्नश्वरं स्फुटम्।<br>ज्ञानं मे देहि विशदं मोक्षदं बन्धनाशनम्॥ ३८<br>असारेऽस्मिंश्च संसारे मूढा मज्जन्ति पामराः।<br>पण्डिताः सन्तरन्तीह तस्मान्नेच्छन्ति संसृतिम्॥ ३९ | **व्यासजी बोले—**शुद्धहृदय वैश्यने हाथ जोड़कर कहा—अब मुझे न घरकी आवश्यकता है, न धनकी और न पुत्रकी ही। हे माता! ये सभी बन्धनमें डालनेवाले और स्वप्नकी भाँति नश्वर हैं, अतः आप मुझे बन्धनका नाश करनेवाला और मोक्ष देनेवाला दिव्य ज्ञान प्रदान करें। इस असार संसारमें अज्ञानी डूब जाते हैं और ज्ञानी पार उतर जाते हैं, इसलिये वे संसारकी इच्छा नहीं करते॥ ३७—३९॥ |
| व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य महामाया वैश्यं प्राह पुरःस्थितम्।<br>वैश्यवर्य तव ज्ञानं भविष्यति न संशयः॥ ४० | **व्यासजी बोले—**तब अपने समक्ष खड़े वैश्यकी बात सुनकर देवी महामायाने कहा—हे वैश्यश्रेष्ठ! तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा, इसमें सन्देह नहीं है॥ ४०॥ |
| इति दत्त्वा वरं ताभ्यां तत्रैवान्तरधीयत।<br>अदर्शनं गतायां तु राजा तं मुनिसत्तमम्॥ ४१<br>प्रणम्य हयमारुह्य गमनाय मनो दधे।<br>तदैव तस्य सचिवास्तत्रागत्य नृपं प्रजाः॥ ४२<br>प्रणेमुर्विनयोपेतास्तमूचुः प्राञ्जलिस्थिताः।<br>राजंस्ते शत्रवः सर्वे पापाच्च निहता रणे॥ ४३<br>राज्यं निष्कण्टकं भूप कुरुष्व पुरमास्थितः। | इस प्रकार उन दोनोंको वरदान देकर देवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं। तब भगवतीके अन्तर्धान हो जानेपर राजा सुरथने उन मुनिश्रेष्ठको प्रणाम करके घोड़ेपर चढ़कर चलनेका निश्चय किया, तभी उनके प्रजाजनों और मन्त्रिगणोंने वहाँ आकर प्रणाम किया; वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये तथा विनम्र होकर राजासे कहने लगे—हे राजन्! आपके शत्रुगण अपने पापके कारण युद्धमें मारे गये। हे भूप! अब आप अपने नगरमें निवास करके निष्कण्टक राज्य कीजिये॥ ४१—४३ \frac{१}{२}॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं राजा नत्वा तं मुनिसत्तमम्॥ ४४<br>आपृच्छ्य निर्ययौ तत्र मन्त्रिभिः परिवारितः।<br>सम्प्राप्य च निजं राज्यं दारान्स्वजनबान्धवान्॥ ४५<br>बुभुजे पृथिवीं सर्वां ततः सागरमेखलाम्। | उनकी बात सुनकर राजा मुनिश्रेष्ठको प्रणाम करके उनसे आज्ञा लेकर मन्त्रियोंके साथ चल दिये। वे अपने राज्य, स्त्री और बन्धु-बान्धवोंको पाकर समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य भोगने लगे॥ ४४—४५ \frac{१}{२}॥ |
| वैश्योऽपि ज्ञानमासाद्य मुक्तसङ्गः समन्ततः॥ ४६<br>कालातिवाहनं तत्र मुक्तबन्धश्चकार ह।<br>तीर्थेषु विचरन्गायन्भगवत्या गुणानथ॥ ४७ | वैश्य भी ज्ञान प्राप्त करके सर्वथा आसक्तिरहित और बन्धनसे मुक्त होकर तीर्थोंमें भ्रमण करता हुआ तथा भगवतीके गुणोंका गान करता हुआ समय व्यतीत करने लगा॥ ४६—४७॥ |
| एतत्ते कथितं देव्याश्चरितं परमाद्भुतम्।<br>आराधनफलप्राप्तिस्तथाऽभून्नृपवैश्ययोः ॥ ४८<br>दैत्यानां हननं प्रोक्तं प्रादुर्भावस्तथा शुभः।<br>एवंप्रभावा सा देवी भक्तानामभयप्रदा॥ ४९ | इस प्रकार देवीकी परम अद्भुत लीला तथा राजा और वैश्यद्वारा की गयी उनकी आराधना एवं फलप्राप्तिको मैंने यथार्थ रूपसे आपसे कहा। देवीके शुभ आविर्भाव और उनके द्वारा दैत्योंके विनाशकी कथा भी मैंने आपसे कही। भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाली वे भगवती ऐसे प्रभाववाली हैं!॥ ४८—४९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे सुरथराजसमाधिवैश्ययोर्देवी-
| ७२२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३५ |
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| यः शृणोति नरो नित्यमेतदाख्यानमुत्तमम्।<br>सम्प्राप्नोति नरः सत्यं संसासुखमद्भुतम्॥ ५०<br><br>ज्ञानदं मोक्षदं चैव कीर्तिदं सुखदं तथा।<br>पावनं श्रवणान्नूनमेतदाख्यानमद्भुतम्॥ ५१<br><br>अखिलार्थप्रदं नृणां सर्वधर्मसमावृतम्।<br>धर्मार्थकाममोक्षाणां कारणं परमं मतम्॥ ५२<br><br>सूत उवाच<br>जनमेजयेन राज्ञासौ पृष्टः सत्यवतीसुतः।<br>उवाच संहितां दिव्यां व्यासः सर्वार्थतत्त्ववित्॥ ५३<br><br>चरितं चण्डिकायास्तु शुम्भदैत्यवधाश्रितम्।<br>कथयामास भगवान्कृष्णः कारुणिको मुनिः।<br>इति वः कथितः सारः पुराणानां मुनीश्वराः॥ ५४ | जो मनुष्य उनके इस उत्तम आख्यानको नित्य सुनता है, वह संसारमें अद्भुत सुख प्राप्त करता है, यह सत्य है। इस पवित्र और अद्भुत आख्यानका श्रवण करनेसे यह ज्ञान, मोक्ष, कीर्ति और सुख प्रदान करता है। यह मनुष्योंकी सभी कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला तथा समस्त धर्मोंका सार और धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिका परम कारण बताया गया है॥ ५०—५२॥<br><br>सूतजी बोले— राजा जनमेजयके पूछनेपर सभी अर्थ-तत्त्वोंको जाननेवाले सत्यवतीपुत्र व्यासने उनसे यह दिव्य देवीभागवतसंहिता कही। परम दयालु भगवान् कृष्णद्वैपायन मुनि व्यासने शुम्भदैत्यके वधकी कथापर आधारित देवी चण्डिकाके चरित्रका वर्णन किया था। हे मुनीश्वरो! समस्त पुराणोंका सारस्वरूप यह इतिहास मैंने आपलोगोंसे कह दिया॥ ५३-५४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे सुरथराजसमाधिवैश्ययोर्देवी- भक्त्येष्टप्राप्तिवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५॥
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॥ पंचमः स्कन्धः समाप्तः॥
श्रुतिस्मृती तु नेत्रे द्वे पुराणं हृदयं स्मृतम्। श्रुतिस्मृतिभ्यां हीनोऽन्धः काणः स्यादेकया विना॥
पुराणहीनाद्धृच्छून्यात् काणान्धावपि तौ वरौ। श्रुतिस्मृत्युदितो धर्मः पुराणे परिगीयते॥
यस्य धर्मेऽस्ति जिज्ञासा यस्य पापाद्भयं महत्। श्रोतव्यानि पुराणानि धर्ममूलानि तेन वै॥
चतुर्दशसु विद्यासु पुराणं दीप उत्तमः। अन्धोऽपि न तदालोकात् संसाराब्धौ क्वचित् पतेत्॥
विद्वानोंके श्रुति-स्मृति—ये दो नेत्र हैं और पुराण हृदय है। इनमेंसे जिसे श्रुति-स्मृतिमेंसे किसी एकका ज्ञान नहीं है; वह काना, दोनोंके ज्ञानसे हीन अन्धा है, किंतु जो पुराणरूपी विद्यासे हीन है वह तो हृदयहीन या शून्य होनेके कारण इन दोनोंसे भी निकृष्ट है। श्रुति तथा स्मृतियोंमें कहा गया धर्म पुराणमें प्रतिपादित है। जिसकी धर्ममें जिज्ञासा या रुचि हो, जो पापोंसे डरता हो, उसे पुराणोंका श्रवण करना चाहिये; क्योंकि वे ही धर्मके मूल हैं। चौदहों विद्याओंमें पुराण-विद्या ही उत्तम दीपक है। इसके आलोक—प्रकाशमें स्थित अन्धा भी संसार-सागरमें कभी नहीं गिरता।
[ स्कन्दपु० का० २।९६-९७, ९९-१०० ]
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
षष्ठः स्कन्धः
अथ प्रथमोऽध्यायः
त्रिशिराकी तपस्यासे चिन्तित इन्द्रद्वारा तपभंगहेतु अप्सराओंको भेजना
| ऋषय ऊचुः<br>सूत सूत महाभाग मिष्टं ते वचनामृतम्।<br>न तृप्ताः स्मो वयं पीत्वा द्वैपायनकृतं शुभम्॥ १<br><br>पुनस्त्वां प्रष्टुमिच्छामः कथां पौराणिकीं शुभाम्।<br>वेदेऽपि कथितां रम्यां प्रसिद्धां पापनाशिनीम्॥ २ | ऋषिगण बोले—हे महाभाग सूतजी! आपकी वाणीरूपी अत्यन्त मधुर सुधाका पान करके अभी हम सन्तुप्त नहीं हुए हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यासजीने जिस उत्तम श्रीमद्देवीभागवत-महापुराणका प्रणयन किया है; उस पुराणकी मंगलमयी, वेदवर्णित, मनोहर, प्रसिद्ध और पापोंका नाश करनेवाली कथाको हम आपसे पुनः पूछना चाहते हैं॥ १-२॥ |
|---|---|
| वृत्रासुर इति ख्यातो वीर्यवांस्त्वष्टुरात्मजः।<br>स कथं निहतः संख्ये वासवेन महात्मना॥ ३<br><br>त्वष्टा वै सुरपक्षीयस्तत्पुत्रो बलवत्तरः।<br>शक्रेण घातितः कस्माद् ब्रह्मयोनिर्महाबलः॥ ४<br><br>देवाः सत्त्वगुणोत्पन्ना मानुषा राजसाः स्मृताः।<br>तिर्यञ्चस्तामसाः प्रोक्ताः पुराणागमवादिभिः॥ ५<br><br>विरोधोऽत्र महान् भाति नूनं शतमखेन ह।<br>छलेन बलवान् वृत्रः शक्रेण विनिपातितः॥ ६<br><br>विष्णुः प्रेरयिता तत्र स तु सत्त्वधरः परः।<br>प्रविष्टः पविमध्ये स छद्मना भगवान् प्रभुः॥ ७<br><br>सन्धिं विधाय स ह्येवं मन्त्रितोऽसौ महाबलः।<br>हरिभ्यां सत्यमुत्सृज्य जलफेनेन शातितः॥ ८ | त्वष्टाका वृत्रासुर नामसे विख्यात पराक्रमी पुत्र महात्मा इन्द्रके द्वारा क्यों मारा गया? त्वष्टा तो देवपक्षके थे और उनका पुत्र अत्यन्त बलवान् था, ब्राह्मणवंशमें उत्पन्न उस महाबलीका इन्द्रके द्वारा क्यों वध किया गया? पुराणों और शास्त्रोंके तत्त्वज्ञलोगोंने देवताओंको सत्त्वगुणसे, मनुष्योंको रजोगुणसे और पशु-पक्षी आदि तिर्यक् योनियोंको तमोगुणसे उत्पन्न कहा है, परंतु यहाँ तो महान् विरोध प्रतीत होता है कि बलवान् वृत्रासुर सौ यज्ञोंके कर्ता इन्द्रके द्वारा छलपूर्वक मारा गया और इसके लिये भगवान् विष्णुद्वारा प्रेरणा दी गयी जो कि स्वयं महान् सत्त्वगुणी हैं तथा वे परम प्रभु छलपूर्वक वज्रमें प्रविष्ट हुए! सन्धि करके उस महाबली वृत्रको पहले आश्वस्त कर दिया गया, किंतु पुनः विष्णु और इन्द्रने सत्य (सन्धिकी बात)-को छोड़कर जलके फेनसे उसे मार डाला!॥ ३–८॥ |
| कृतमिन्द्रेण हरिणा किमेतत्सत साहसम्।<br>महान्तोऽपि च मोहेन वञ्चिताः पापबुद्धयः॥ ९ | हे सूतजी! इन्द्र और विष्णुके द्वारा ऐसा दुःसाहस क्यों किया गया? महान् लोग भी मोहमें फँसकर पापबुद्धि हो जाते हैं॥ ९॥ |
| ७२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ | | :--- | :--- |
| अन्यायवर्तिनोऽत्यर्थं भवन्ति सुरसत्तमाः।<br>सदाचारेण युक्तेन देवाः शिष्टत्वमागताः॥ १०॥<br>एवं विशिष्टधर्मेण शिष्टत्वं कीदृशं पुनः।<br>हत्वा वृत्रं तु विश्वस्तं शक्रेण छद्मना पुनः॥ ११॥<br>प्राप्तं पापफलं नो वा ब्रह्महत्यासमुद्भवम्।<br>किं च त्वया पुरा प्रोक्तं वृत्रासुरवधः कृतः॥ १२॥<br>श्रीदेव्या इति तच्चापि चित्तं मोहयतीह नः। | श्रेष्ठ देवगण भी घोर अन्याय-मार्गके अनुगामी हो जाते हैं, जबकि सदाचारके कारण ही देवताओंको विशिष्टता प्राप्त है॥ १०॥<br>इन्द्रके द्वारा विश्वासमें लेकर वृत्रासुरकी हत्या कर दी गयी—ऐसे विशिष्ट धर्मके द्वारा उनका सदाचार कहाँ रह गया? उन्हें इस ब्रह्महत्या-जनित पापका फल मिला या नहीं? आपने पहले कहा था कि वृत्रासुरका वध स्वयं देवीने ही किया था—इससे हमारा चित्त और भी मोहमें पड़ गया है॥ ११-१२½॥ | | सूत उवाच<br>शृण्वन्तु मुनयो वृत्तं वृत्रासुरवधाश्रयम्॥ १३॥<br>यथेन्द्रेण च सम्प्राप्तं दुःखं हत्यासमुद्भवम्।<br>एवमेव पुरा पृष्टो व्यासः सत्यवतीसुतः॥ १४॥<br>पारीक्षितेन राज्ञापि स यदाह च तद् ब्रुवे। | सूतजी बोले—हे मुनिगण! वृत्रासुरके वधसे सम्बन्धित और उस हत्यासे इन्द्रको प्राप्त महान् दुःखकी कथा सुनें। ऐसा ही पूर्वकालमें परीक्षित्पुत्र राजा जनमेजयने सत्यवतीनन्दन व्यासजीसे पूछा था; तब उन्होंने जो कहा, उसे मैं कहता हूँ॥ १३-१४½॥ | | जनमेजय उवाच<br>कथं वृत्रासुरः पूर्वं हतो मघवता मुने॥ १५॥<br>सहायं विष्णुमासाद्य छद्मना सात्त्विकेन ह।<br>कथं च देव्या निहतो दैत्योऽसौ केन हेतुना॥ १६॥<br>कथमेकवधो द्वाभ्यां कृतः स्यान्मुनिपुङ्गव।<br>तदेतच्छ्रोतुमिच्छामि परं कौतूहलं हि मे॥ १७॥<br>महतां चरितं शृण्वन् को विरज्येत मानवः।<br>कथयाम्बावैभवं त्वं वृत्रासुरवधाश्रितम्॥ १८॥ | जनमेजय बोले—हे मुने! सत्त्वगुणसे सम्पन्न इन्द्रने भगवान् विष्णुकी सहायता लेकर वृत्रासुरको पूर्वकालमें छलपूर्वक क्यों मारा? देवीके द्वारा उस दैत्यका क्यों और किस प्रकार वध किया गया? हे मुनिश्रेष्ठ! एक व्यक्तिका दो लोगोंके द्वारा कैसे वध किया गया—इसे मैं सुनना चाहता हूँ; मुझे महान् कौतूहल है॥ १५—१७॥<br>कौन मनुष्य महापुरुषोंके चरित्रको सुननेसे विरत होगा। अतः आप वृत्रासुरके वधपर आधारित जगदम्बाके माहात्म्यको कहिये॥ १८॥ | | व्यास उवाच<br>धन्योऽसि राजंस्तव बुद्धिरीदृशी<br>जाता पुराणश्रवणेऽतिसादरा।<br>पीत्वामृतं देववरास्तु सर्वथा<br>पाने वितृष्णाः प्रभवन्ति वै पुनः॥ १९॥<br>दिने दिने तेऽधिकभक्तिभावः<br>कथासु राजन् महनीयकीर्तेः।<br>श्रोता यदैकप्रवणः शृणोति<br>वक्ता तदा प्रीतमना ब्रवीति॥ २०॥<br>युद्धं पुरा वासववृत्रयोर्यद्<br>वेदे प्रसिद्धं च तथा पुराणे।<br>दुःखं सुरेन्द्रेण तथैव लब्धं<br>हत्वा रिपुं त्वाष्ट्रमपापमेव॥ २१॥ | व्यासजी बोले—हे राजन्! आप धन्य हैं, जो कि आपकी इस प्रकारकी बुद्धि पुराणश्रवणमें अत्यन्त आदरपूर्वक लगी हुई है। श्रेष्ठ देवगण अमृतका पान करके पूर्ण तृप्त हो जाते हैं, परंतु आप इस कथामृतका बार-बार पान करके भी अतृप्त ही हैं। हे राजन्! महान् कीर्तिवाले आपका भक्तिभाव कथाओंमें दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। श्रोता जब एकाग्रमनसे सुनता है तब वक्ता भी प्रसन्नमनसे कथा कहता है॥ १९-२०॥<br>पूर्वकालमें इन्द्र तथा वृत्रासुरका जो युद्ध हुआ था और निरपराध शत्रु वृत्रासुरका वध करके देवराज इन्द्रको जो दुःख प्राप्त हुआ था, वह वेद और पुराणमें प्रसिद्ध है॥ २१॥ |
| अ० १ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७२५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चित्रं किमत्र नृपते हरिवज्रभृद्भ्यां<br> यच्छद्मना विनिहतस्त्रिशिरोऽथ वृत्रः।<br>मायाबलेन मुनयोऽपि विमोहितास्ते<br> चक्रुश्च निन्द्यमनिशं किल पापभीताः॥ २२ | जब मायाके बलसे मुनिगण भी मोहमें पड़ जाते हैं और वे पापभीरु होकर निरन्तर निन्दनीय कर्म करने लग जाते हैं तब हे राजन्! विष्णु और वज्रधारी इन्द्रने छलसे त्रिशिरा और वृत्रासुरका वध कर दिया तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात है?॥ २२॥ |
| विष्णुः सदैव कपटेन जघान दैत्यान्<br> सत्त्वात्ममूर्तिरपि मोहमवाप्य कामम्।<br>कोऽन्योऽस्ति तां भगवतीं मनसापि जेतुं<br> शक्तः समस्तजनमोहकरीं भवानीम्॥ २३ | सत्त्वगुणके मूर्तिमान् विग्रह होते हुए भी भगवान् विष्णुने जिनकी मायासे मोहित होकर सदैव छलपूर्वक दैत्योंका संहार किया तब भला ऐसा कौन प्राणी होगा जो सब लोगोंको मोहमें डाल देनेवाली उन भगवती भवानीको अपने मनोबलसे जीतनेमें सक्षम हो सके!॥ २३॥ |
| मत्स्यादियोनिषु सहस्रयुगेषु सद्यः<br> साक्षाद्भवत्यपि यया विनियोजितोऽत्र।<br>नारायणो नरसखो भगवाननन्तः<br> कार्यं करोति विहिताविहितं कदाचित्॥ २४ | भगवतीकी ही प्रेरणासे नरऋषिके सखा नारायण भगवान् अनन्त हजारों युगोंमें मत्स्यादि योनियोंमें अवतार लेते हैं और कभी अनुकूल तथा कभी प्रतिकूल कार्य करते हैं॥ २४॥ |
| देहं धनं गृहमिदं स्वजना मदीयं<br> पुत्राः कलत्रमिति मोहमुपेत्य सर्वः।<br>पुण्यं करोत्यथ च पापचयं करोति<br> मायागुणैरतिबलैर्विकलीकृतो यत्॥ २५ | यह मेरा शरीर है, यह मेरा धन है, यह मेरा घर है, ये मेरे स्त्री-पुत्र और बन्धु-बान्धव हैं—इस मोहमें पड़कर सभी प्राणी पुण्य तथा पापकर्म करते रहते हैं; क्योंकि अत्यन्त बलशाली मायागुणोंसे वे मोहित कर दिये गये हैं॥ २५॥ |
| न जातु मोहं क्षपितुं नरः क्षमः<br> कश्चिद्भवोद्भूप परावरार्थवित्।<br>विमोहितस्तैस्त्रिभिरेव मूलतो<br> वशीकृतात्मा जगतीतले भृशम्॥ २६ | हे राजन्! इस पृथ्वीपर कार्य और कारणका विज्ञ कोई भी व्यक्ति [उन जगदम्बाकी मायाके] मोहसे छुटकारा नहीं पा सकता; क्योंकि भगवती महामायाके तीनों गुणोंसे मोहित होकर वह पूर्णरूपसे सदा उनके अधीन रहता है॥ २६॥ |
| अथ तौ मायया विष्णुवासवौ मोहितौ भृशम्।<br>जघ्नतुश्छद्मना वृत्रं स्वार्थसाधनतत्परौ॥ २७<br><br>तदहं सम्प्रवक्ष्यामि वृत्तान्तमवनीपते।<br>कारणं पूर्ववैरस्य वृत्रवासवयोर्मिथः॥ २८ | इसलिये [उन्हीं देवीकी] मायासे मोहित होकर अपना स्वार्थ साधनेमें तत्पर रहनेवाले विष्णु और इन्द्रने छलपूर्वक वृत्रासुरको मार डाला। हे पृथ्वीपते! अब मैं वृत्रासुर और इन्द्रके पारस्परिक पूर्ववैरके कारणकी कथा बताता हूँ॥ २७-२८॥ |
| त्वष्टा प्रजापतिर्ह्यासीद्देवश्रेष्ठो महातपाः।<br>देवानां कार्यकर्ता च निपुणो ब्राह्मणप्रियः॥ २९ | देवताओंमें श्रेष्ठ त्वष्टा नामके एक प्रजापति थे। वे महान् तपस्वी, देवताओंका कार्य करनेवाले, अति कुशल तथा ब्राह्मणोंके प्रिय थे॥ २९॥ |
| स पुत्रं वै त्रिशिरसमिन्द्रद्वेषात्किलासृजत् ।<br>विश्वरूपेति विख्यातं नाम्ना रूपेण मोहनम्॥ ३० | उन्होंने इन्द्रसे द्वेषके कारण तीन मस्तकोंसे सम्पन्न एक पुत्र उत्पन्न किया, जो विश्वरूप नामसे विख्यात हुआ। वह परम मनोहर रूपवाला था॥ ३०॥ |
| ७२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्रिभिः स वदनैः श्रेष्ठैर्व्यरोचत मनोहरैः ।<br>त्रिभिर्भिन्नानि कार्याणि मुखैः समकरोन्मुनिः ॥ ३१<br><br>वेदानेकेन सोऽधीते सुरां चैकेन सोऽपिबत् ।<br>तृतीयेन दिशः सर्वा युगपच्च निरीक्षते ॥ ३२ | अपने तीन श्रेष्ठ तथा मनोहर मुखोंके कारण वह अत्यन्त शोभासम्पन्न दिखायी देता था। वह मुनि अपने तीन मुखोंसे तीन भिन्न-भिन्न कार्य करता था। वह एक मुखसे वेदाध्ययन करता था, एक मुखसे मधुपान करता था और तीसरे मुखसे सब दिशाओंका एक साथ निरीक्षण करता था॥ ३१-३२॥ |
| त्रिशिरा भोगमुत्सृज्य तपश्चक्रे सुदुष्करम् ।<br>तपस्वी स मृदुर्दान्तो धर्ममेव समाश्रितः ॥ ३३ | वह त्रिशिरा भोगका त्याग करके मृदु, संयमी और धर्मपरायण तपस्वी होकर अत्यन्त कठोर तप करने लगा॥ ३३॥ |
| पञ्चाग्निसाधनं काले पादपाग्रे निवेशनम् ।<br>जलमध्ये निवासं च हेमन्ते शिशिरे तथा ॥ ३४<br><br>निराहारो जितात्मासौ त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।<br>तपश्चचार मेधावी दुष्करं मन्दबुद्धिभिः ॥ ३५ | ग्रीष्मकालमें पंचाग्नि तापते, वृक्षकी डालीमें पैरके बल अधोमुख लटके रहते एवं हेमन्त और शिशिर ऋतुमें जलमें स्थित रहते थे। सब कुछ त्याग करके जितेन्द्रिय भावसे निराहार रहकर उस बुद्धिमान् [त्रिशिरा]-ने मन्दबुद्धि प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुष्कर तपस्या आरम्भ कर दी॥ ३४-३५॥ |
| तं च दृष्ट्वा तपस्यन्तं खेदमाप शचीपतिः ।<br>विषादमगमत्तत्र शक्रोऽयं मास्मभूदिति ॥ ३६ | उसको तप करते देखकर शचीपति इन्द्र दुःखित हुए। उन्हें यह विषाद हुआ कि कहीं यह इन्द्र न बन जाय॥ ३६॥ |
| दृष्ट्वा तस्य तपो वीर्यं सत्यं चामिततेजसः ।<br>चिन्तां च महतीं प्राप ह्यनिशं पाकशासनः ॥ ३७<br><br>विवर्धमानस्त्रिशिरा मामयं शातयिष्यति ।<br>नोपेक्ष्यः सर्वथा शत्रुर्वर्धमानबलो बुधैः ॥ ३८<br><br>तस्मादुपायः कर्तव्यस्तपोनाशाय साम्प्रतम् ।<br>कामस्तु तपसां शत्रुः कामान्नश्यति वै तपः ॥ ३९<br><br>तथैवाद्य प्रकर्तव्यं भोगासक्तो भवेद्यथा । | उस अत्यन्त तेजस्वी [विश्वरूप]-का तप, पराक्रम और सत्य देखकर इन्द्र निरन्तर इस प्रकार चिन्तित रहने लगे—उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त होता हुआ यह त्रिशिरा मुझे ही समाप्त कर देगा, इसीलिये बुद्धिमानोंने कहा है कि बढ़ते हुए पराक्रमवाले शत्रु की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। इसलिये इसके तपके नाशका उपाय इसी समय करना चाहिये। कामदेव तपस्वियोंका शत्रु है, कामसे ही तपका नाश होता है। अतः मुझे वैसा ही करना चाहिये, जिससे यह भोगोंमें आसक्त हो जाय॥ ३७-३९ ½॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा बुद्धिमान्बलमर्दनः ॥ ४०<br><br>आज्ञापयत्सोऽप्सरसस्त्वाष्ट्रपुत्रप्रलोभने ।<br>उर्वशीं मेनकां रम्भां घृताचीं च तिलोत्तमाम् ॥ ४१<br><br>समाहूयाब्रवीच्छक्रस्तास्तदा रूपगर्विताः ।<br>प्रियं कुरुध्वं मे सर्वाः कार्येऽद्य समुपस्थिते ॥ ४२ | ऐसा मनमें विचारकर बल नामक दैत्यका नाश करनेवाले उन बुद्धिमान् इन्द्रने त्वष्टाके पुत्र त्रिशिराको प्रलोभनमें डालनेके लिये अप्सराओंको आज्ञा दी। उन्होंने उर्वशी, मेनका, रम्भा, घृताची, तिलोत्तमा आदिको बुलाकर कहा—अपने रूपपर गर्व करनेवाली हे अप्सराओ! आज मेरा कार्य आ पड़ा है, तुम सब मेरे उस प्रिय कार्यको सम्पन्न करो॥ ४०-४२॥ |
| यत्तो मेऽद्य महाञ्छत्रुस्तपस्तपति दुर्जयः ।<br>कार्यं कुरुत गच्छध्वं प्रलोभयत माचिरम् ॥ ४३ | मेरा एक महान् दुर्धर्ष शत्रु संयत होकर तपस्या कर रहा है। शीघ्र ही उसके पास जाओ और उसे प्रलोभित करो; इस प्रकार शीघ्र ही मेरा कार्य करो॥ ४३॥ |
| अ० १ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७२७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शृङ्गारवेशैर्विविधैर्भावैर्देहसमुद्भवैः ।<br>प्रलोभयत भद्रं वः शमयध्वं ज्वरं मम ॥ ४४ | अनेक प्रकारके शृंगार-वेशों तथा शरीरके हाव-भावोंसे उसे प्रलोभित करो और मेरे मानसिक सन्तापको शान्त करो; तुमलोगोंका कल्याण हो ॥ ४४ ॥ |
| अस्वस्थोऽहं महाभागास्तस्य ज्ञात्वा तपोबलम् ।<br>बलवानासनं मेऽद्य ग्रहीष्यत्यविलम्बितः ॥ ४५ | हे महाभागा अप्सराओ! उसके तपोबलको जानकर मैं व्याकुल हो गया हूँ, वह बलवान् शीघ्र ही मेरा पद छीन लेगा ॥ ४५ ॥ |
| भयं मे समुपायातं क्षिप्रं नाशयताबलाः ।<br>उपकुर्वन्तु सहिताः कार्येऽद्य समुपस्थिते ॥ ४६ | हे अबलाओ! मेरे सामने यह भय आ गया है, तुमलोग शीघ्र ही इसका नाश कर दो। इस कार्यके आ पड़नेपर तुम सब मिलकर आज मेरा उपकार करो ॥ ४६ ॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं नार्य ऊचुस्तं प्रणताः पुरः ।<br>मा भयं कुरु देवेश यतिष्यामः प्रलोभने ॥ ४७ | उनके इस वचनको सुनकर नारियों (अप्सराओं)-ने उन्हें नमन करते हुए कहा—हे देवराज! आप भय न करें, हम उसे प्रलोभनमें डालनेका प्रयत्न करेंगी ॥ ४७ ॥ |
| यथा न स्याद्भयं तस्मात्तथा कार्यं महाद्युते ।<br>नृत्यगीतविहारैश्च मुनेस्तस्य प्रलोभने ॥ ४८<br><br>कटाक्षैरङ्गभेदैश्च मोहयित्वा मुनिं विभो ।<br>लोलुपं वशमस्माकं करिष्यामो नियन्त्रितम् ॥ ४९ | हे महातेजस्विन्! जिस प्रकारसे आपको भय न हो, हम वैसा ही करेंगी। उस मुनिको लुभानेके लिये हम नृत्य, गीत और विहार करेंगी। हे विभो! कटाक्षों और अंगोंकी विविध भंगिमाओंसे मुनिको मोहित करके उन्हें लोलुप, अपने वशीभूत तथा नियन्त्रणमें कर लेंगी ॥ ४८-४९ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्याभाष्य हरिं नार्यो ययुस्त्रिशिरसोऽन्तिकम् ।<br>कुर्वन्त्यो विविधान्भावान्कामशास्त्रोचितानपि ॥ ५० | व्यासजी बोले—इन्द्रसे ऐसा कहकर वे अप्सराएँ त्रिशिराके समीप गयीं और कामशास्त्रमें कहे गये विभिन्न प्रकारके हाव-भावका प्रदर्शन करने लगीं ॥ ५० ॥ |
| गायन्त्यस्तालभेदैस्ता नृत्यन्त्यः पुरतो मुनेः ।<br>तं प्रलोभयितुं चक्रुर्नानाभावान्वराङ्गनाः ॥ ५१ | वे अप्सराएँ मुनिके सम्मुख अनेक प्रकारके तालोंमें गाती और नाचती हुई उन्हें मोहित करनेके लिये विविध प्रकारके हाव-भाव करती थीं ॥ ५१ ॥ |
| नापश्यत्स तपोराशिरङ्गनानां विडम्बनम् ।<br>इन्द्रियाणि वशे कृत्वा मूकान्धबधिरः स्थितः ॥ ५२ | किंतु उन तपस्वीने अप्सराओंकी चेष्टाको देखातक नहीं और इन्द्रियोंको वशमें करके वे गूँगे, अन्धे और बहरेकी तरह बैठे रहे ॥ ५२ ॥ |
| दिनानि कतिचित्तस्थुर्नार्यस्तस्याश्रमे वरे ।<br>कुर्वन्त्यो गाननृत्यादिप्रपञ्चानतिमोहदान् ॥ ५३ | वे अप्सराएँ गान, नृत्य आदि मोहित करनेवाले प्रपंच करती हुई कुछ दिनोंतक उनके श्रेष्ठ आश्रममें रहीं ॥ ५३ ॥ |
| न चचाल यदा कामं ध्यानाच्च त्रिशिरा मुनिः ।<br>परावृत्य तदा देव्यः पुनः शक्रमुपस्थिताः ॥ ५४ | जब उनकी कामचेष्टाओंसे मुनि त्रिशिराका ध्यान विचलित नहीं हुआ, तब वे अप्सराएँ पुनः लौटकर इन्द्रके सम्मुख उपस्थित हुईं ॥ ५४ ॥ |
| कृताञ्जलिपुटाः सर्वा देवराजमथाब्रुवन् ।<br>श्रान्ता दीना भयत्रस्ता विवर्णवदना भृशम् ॥ ५५ | अत्यन्त थकी हुई, दीन अवस्थावाली, भयभीत और उदास मुखवाली उन सबने हाथ जोड़कर देवराजसे इस प्रकार कहा— ॥ ५५ ॥ |
| ७२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |
| देवदेव महाराज यत्नश्च परमः कृतः।<br>न स शक्यो दुराधर्षो धैर्याच्चालयितुं विभो॥ ५६ | हे देवदेव! हे महाराज! हे विभो! हमने महान् प्रयत्न किया, परंतु हम उस दुर्धर्ष मुनिको धैर्यसे विचलित करनेमें समर्थ नहीं हो पायीं॥ ५६॥ | | उपायोऽन्यः प्रकर्तव्यः सर्वथा पाकशासन।<br>नास्माकं बलमेतस्मिंस्तापसे विजितेन्द्रिये॥ ५७ | हे पाकशासन! आपको कोई दूसरा ही उपाय करना चाहिये, उन जितेन्द्रिय तपस्वीपर हमारा कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ सकता॥ ५७॥ | | दिष्ट्या वयं न शप्ताः स्म यदनेन महात्मना।<br>मुनिना वह्नितुल्येन तपसा द्योतितेन हि॥ ५८ | हमारा बड़ा भाग्य है कि तपस्यासे अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले उन महात्मा मुनिने हमें शाप नहीं दिया॥ ५८॥ | | विसृज्याप्सरसः शक्रश्चिन्तयामास मन्दधीः।<br>तस्यैव च वधोपायं पापबुद्धिरसाम्प्रतम्॥ ५९ | अप्सराओंको विदा करके क्षुद्रबुद्धि तथा पापबुद्धि इन्द्र उसके ही वधका अनुचित उपाय सोचने लगे॥ ५९॥ | | विसृज्य लोक लज्जां स तथा पापभयं भृशम्।<br>चकार पापबुद्धिं तु तद्वधाय महीपते॥ ६० | हे राजन्! लोक-लज्जा और महान् पापके भयको छोड़कर उन्होंने उसके वधके लिये अपनी बुद्धिको पापमय बना दिया॥ ६०॥ |
<div align="center">इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
त्रिशिरसस्तपोभङ्गार्थं देवराजेन्द्रद्वारा नानोपायचिन्तनवर्णनं
नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
### अथ द्वितीयोऽध्यायः
**इन्द्रद्वारा त्रिशिराका वध, क्रुद्ध त्वष्टाद्वारा अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे**
**हवन करके वृत्रासुरको उत्पन्न करना और उसे**
**इन्द्रके वधके लिये प्रेरित करना**
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| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| अथ स लोभमुपेत्य सुराधिपः<br>समधिगम्य गजासनसंस्थितः।<br>त्रिशिरसं प्रति दुष्टमतिस्तदा<br>मुनिमपश्यदमयपराक्रमम् ॥ १ | व्यासजी बोले—इस प्रकार लोभके वशीभूत होकर पापबुद्धि देवराज इन्द्रने ऐरावत हाथीपर सवार हो त्रिशिराके पास जाकर उस अमेय पराक्रमवाले मुनिको देखा॥ १॥ |
| तमभिवीक्ष्य दृढासनसंस्थितं<br>जितगिरं सुसमाधिवशं गतम्।<br>रविविभावसुसन्निभमोजसा<br>सुरपतिः परमापदमभ्यगात् ॥ २ | उसे दृढ़ आसनपर बैठे, वाणीको वशमें किये, पूर्ण समाधिमें स्थित और सूर्य तथा अग्निके समान तेजस्वी देखकर देवराज इन्द्र बहुत दुःखित हुए॥ २॥ |
| कथमसौ विनिहन्तुमहो मया<br>मुनिरपापमतिः किल सम्मतः।<br>रिपुरयं सुसमिद्धतपोबलः<br>कथमुपेक्ष्य इहासनकामुकः ॥ ३ | यह मुनि निष्पापबुद्धि है; इसे मारनेमें मैं कैसे समर्थ हो सकूँगा? तपोबलसे अत्यन्त समृद्ध तथा मेरा आसन प्राप्त करनेकी इच्छावाले इस शत्रु की उपेक्षा भी कैसे करूँ—ऐसा सोचकर देवसंघके |
| अ० २ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७२९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| इति विचिन्त्य पविं परमायुधं<br>प्रति मुमोच मुनिं तपसि स्थितम्।<br>शशिदिवाकरसन्निभमाशुगं<br>त्रिशिरसं सुरसङ्घपतिः स्वयम्॥ ४ | स्वामी इन्द्रने अपने तीव्रगामी तथा श्रेष्ठ आयुध वज्रको सूर्य-चन्द्रमाके समान तेजस्वी, तपमें स्थित मुनि त्रिशिराके ऊपर चला दिया॥ ३-४॥ |
| तदभिघातहतः स धरातले<br>किल पपात ममार च तापसः।<br>शिखरिणः शिखरं कुलिशार्दितं<br>निपतितं भुवि चाद्भुतदर्शनम्॥ ५ | उसके प्रहारसे घायल होकर वे तपस्वी उसी प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़े और निष्प्राण हो गये, जैसे वज्रसे विदीर्ण होकर पर्वतोंके शिखर पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं; यह घटना देखनेमें बड़ी अद्भुत थी॥ ५॥ |
| तं निहत्य मुदमाप सुरेश-<br>श्चुक्रुशुश्च मुनयस्तु संस्थिताः।<br>हा हतेति भृशमार्तनिस्वनाः<br>किं कृतं शतमखेन पापिना॥ ६ | उनको मारकर इन्द्र प्रसन्न हो गये, परंतु वहाँ स्थित अन्य मुनिगण आर्तस्वरमें चिल्लाने लगे कि हाय! हाय! सौ यज्ञ करनेवाले पापी इन्द्रने यह क्या कर डाला!॥ ६॥ |
| विनापराधं तपसां निधिर्हतः<br>शचीपतिः पापमतिर्दुरात्मा।<br>फलं किलायं तरसा कृतस्य<br>प्राप्नोतु पापी हननोद्भवस्य॥ ७ | पापबुद्धि और दुष्टात्मा शचीपति इन्द्रने इस निरपराध तपोनिधिको मार डाला। इस हत्याजनित पापका फल यह पापी अब शीघ्र ही प्राप्त करे॥ ७॥ |
| तं निहत्य तरसा सुरराजो<br>निजगाम निजमन्दिरमाशु।<br>स हतोऽपि विरराज महात्मा<br>जीवमान इव तेजसां निधिः॥ ८ | उन्हें मारकर देवराज तुरंत ही अपने भवनको जानेके लिये उद्यत हुए। तेजके निधि वे महात्मा (त्रिशिरा) मर जानेपर भी जीवितकी भाँति प्रतीत होते थे॥ ८॥ |
| तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ जीवन्तमिव वृत्रहा।<br>चिन्तामापातिखिन्नाङ्गः किं वा जीवेदयं पुनः॥ ९ | उसे जीवितकी भाँति भूमिपर गिरा हुआ देखकर अति उदास मनवाले वे वृत्रहन्ता इन्द्र इस चिन्तामें पड़ गये कि कहीं यह फिर जीवित न हो जाय॥ ९॥ |
| विमृश्य मनसातीव तक्षाणं पुरतः स्थितम्।<br>मघवा वीक्ष्य तं प्राह स्वकार्यसदृशं वचः॥ १० | मनमें बहुत देरतक विचार करनेके बाद इन्द्रने सामने खड़े तक्षा (बढ़ई)-को देखकर अपने कार्यके अनुरूप बात कही॥ १०॥ |
| तक्षंश्छिन्धि शिरांस्यस्य कुरुष्व वचनं मम।<br>मा जीवतु महातेजा भाति जीवन्निव स्वयम्॥ ११<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्य तक्षोवाच विगर्हयन्। | हे तक्षन्! मेरा कहा हुआ करो; इसके सिर काट लो, जिससे यह जीवित न रहे। यह महातेजस्वी जीवित न होते हुए भी जीवितकी भाँति प्रतीत होता है। उनकी यह बात सुनकर तक्षाने धिक्कारते हुए कहा—॥ ११ १/२॥ |
| तक्षोवाच<br>महास्कन्धो भृशं भाति परशुर्न तरिष्यति॥ १२<br>ततो नाहं करिष्यामि कार्यमेतद्विगर्हितम्।<br>त्वया वै निन्दितं कर्म कृतं सद्भिर्विगर्हितम्॥ १३<br>अहं बिभेमि पापाद्वै मृतस्यैव च मारणे।<br>मृतोऽयं मुनिरस्त्येव शिरसः कृन्तनेन किम्॥ १४<br>भयं किं तेऽत्र सञ्जातं पाकशासन कथ्यताम्। | तक्षा बोला— ये अति विशाल कन्धेवाले प्रतीत हो रहे हैं। मेरा परशु इस कन्धेको काट नहीं सकेगा। अतः मैं इस निन्दनीय कार्यको नहीं करूँगा, आपने तो निन्दित और सत्पुरुषोंद्वारा गर्हित कर्म कर डाला है, मैं पापसे डरता हूँ; फिर मरे हुएको क्यों मारूँ? ये मुनि तो मर गये हैं, फिर इनका सिर काटनेसे क्या प्रयोजन? हे पाकशासन! कहिये, इनसे आपको क्या भय उत्पन्न हुआ है?॥ १२-१४ १/२॥ |