ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
प्रथम उद्योतः १६५ लोचनम् यत्तु वाक्यभेदः स्यादिति केनचिदुक्तम्, तदनभिज्ञतया। शास्त्रं हि सकृदुच्चा- रितं समयबलेनार्थं प्रतिपादयद्युगपद्विरुद्धानेकसमयस्मृत्ययोगात्कथमर्थद्वयं प्रत्याययेत्। अविरुद्धत्वे वा तावानेको वाक्यार्थः स्यात्। क्रमेणापि विरम्य- व्यापारायोगः। पुनरुच्चारितेऽपि वाक्ये स एव, समयप्रकरणादेस्तादवस्थ्यात्। प्रकरणसमयप्राप्यार्थतिरस्कारेणार्थान्तरप्रत्यायकत्वे नियमाभाव इति तेन 'अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः' इति श्रुतौ 'खादेच्छ्वमांसमित्येष नार्थ इत्यत्र का प्रमे'ति प्रसज्यते। तत्रापि न काचिदियत्तेत्यनाश्वासता इत्येवं वाक्यभेदो दूषणम्। इह तु विभावाद्येव प्रतिपाद्यमानं चर्वणाविषयतोन्मुखमिति समया- द्युपयोगाभावः। न च नियुक्तोऽहमत्र करवाणि, कृतार्थोऽहमिति शास्त्रीयप्रती- तिसदृशमदः। तत्रोत्तरकर्तव्योन्मुख्येन लौकिकत्वात्। इह तु विभावादिचर्व- णाद्भूतपुष्पवत्तत्कालसारैवोदिता न तु पूर्वापरकालानुबन्धिनीति लौकिकादा- स्वादाद्योगिविषयाच्चान्य एवायं रसास्वादः। अत एव 'शिखरिणि' इत्यादावपि मुख्यार्थबाधादिक्रममनपेक्ष्यैव सहृदया वक्त्रभिप्रायं चाटुप्रीत्यात्मकं संवेदयन्ते। है। अतएव उसकी अलक्ष्यक्रमता है। जो कि वाक्यभेद होगा (अर्थात् एक ही काव्य- वाक्य के वाच्य और व्यंग्य दोनों अर्थों के बोधक होने के कारण वाक्यभेद होगा) यह किसी ने कहा है, वह अनभिज्ञता के कारण है, क्योंकि शास्त्र एक बार उच्चरित होकर समय (संकेत) के बल से अर्थ का प्रतिपादन करता हुआ एक ही काल में विरुद्ध अनेक संकेतों की स्मृति के न होने के कारण कैसे दो अर्थों का प्रत्यायन करेगा ! अविरुद्ध होने पर उतना एक ही वाक्यार्थ होगा। क्रम से भी, एक व्यापार के विरत हो जाने के पश्चात् व्यापार नहीं होता। यदि पुनः वाक्य का उच्चारण कीजिएगा तब भी वही समय (संकेत) और प्रकरण आदि उसी प्रकार बने रहेंगे। प्रकरण और समय (संकेत) से प्राप्त होनेवाले अर्थ को तिरस्कार करके दूसरे अर्थ के प्रत्यायक (बोधक) होने में कोई नियम नहीं है। इस कारण 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' इस वेदवाक्य में 'श्वमांस का भक्षण करे' यह अर्थ नहीं है, यहाँ कौन प्रमा है यह बात प्रसक्त होगी। वहाँ दूसरे अर्थ में भी कोई इयत्ता नहीं है, इस प्रकार (अनिश्चितार्थक होने के कारण वाक्य में बोधकता नहीं, इस प्रकार) वाक्यभेद दोष ठहरता है। यहाँ (काव्य में) विभावादि ही प्रतिपाद्यमान होकर चर्वणा के विषय होने के लिए उन्मुख हैं, ऐसी स्थिति में संकेत आदि का कोई उपयोग नहीं। 'मैं इसमें नियुक्त हूँ', 'मैं कर रहा हूँ', 'मैं कर चुका' इस प्रकार की शास्त्रीय प्रतीति के समान काव्यजन्य प्रतीति नहीं है, क्योंकि शास्त्रीय प्रतीति में उत्तरकाल में जो कर्त्तव्य है उसके प्रति उन्मुखता होने के कारण लौकिकता है। परन्तु यहाँ (काव्य में) ऐन्द्रजालिक पुष्प की भाँति विभावादि चर्वणा उसी समय ही पूर्णरूप से उदित होती है, न कि पूर्वापरकाल की अनुबन्धिनी है, इस प्रकार यह रसास्वाद लौकिक आस्वाद से और योगी के विषय से दूसरा ही है। इसीलिए 'शिखरिणि०' इत्यादि पद्य में भी मुख्यार्थ के बाध आदि की
१६६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् अत एव ग्रन्थकारः सामान्येन विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ भक्तेरभावमभ्य- धात्। अस्माभिस्तु दुर्दुरूढं प्रत्याययितुमुक्तम्-भवत्वत्र लक्षणा, अलक्ष्यक्रमे तु कुपितोऽपि किं करिष्यसीति । यदि तु न कुप्यते 'सुवर्णपुष्पाम्' इत्यादावविव- क्षितवाच्येऽपि मुख्यार्थबाधादिलक्षणासामग्रीमनपेक्ष्यैव व्यङ्ग्यार्थविश्रान्तिरि- त्यलं बहुना । उपसंहरति—तस्माद्भक्तिरिति ॥ १८ ॥ अपेक्षा न करके ही सहृदय लोग चाटुप्रतीतिरूप वक्ता के अभिप्राय को समझते हैं। अतएव ग्रन्थकार ने सामान्यरूप से विवक्षितान्यपरवाच्य¹ ध्वनि में भक्ति का अभाव कहा है। हमने तो नास्तिकता की वाणी के ग्रह से ग्रस्त व्यक्ति को समझाने के लिए कहा है—'हो यहाँ लक्षणा, परन्तु अलक्ष्यक्रमध्वनि में कुपित होकर भी क्या करोगे ? यदि कुपित नहीं होते हो तो 'सुवर्णपुष्पाम्०' इत्यादि अविवक्षितवाच्य ध्वनि में भी मुख्यार्थबाध आदि लक्षणा की सामग्री की अपेक्षा न करके ही व्यङ्ग्य अर्थ की विश्रान्ति हो जाती है। बहुत कहना व्यर्थ है। उपसंहार करते हैं—इसलिए भक्ति—। १. विस्तृत 'लोचन' का कुछ स्पष्टीकरण यह है कि लक्षणा का वही विषय हो सकता है जहाँ किसी प्रकार का बाधक उपस्थित होता है। जैसे 'गङ्गा में घोष' इस स्थल में गङ्गा और घोष में आधाराधेयभाव की अनुपपत्तिरूप बाधक का योग है अतः यहाँ लक्षणा व्यापार क्रियाशील होता है। अब यदि चतुर्थ व्यञ्जना व्यापार के विषय प्रयोजन को भी तृतीय लक्षणा व्यापार का विषय बनाने की चेष्टा करते हैं तो कहिए कि यहाँ बाधक का योग या स्खलद्गति क्या है ? स्वयं 'प्रयोजन' शब्द ही इस बात का सूचक है कि यहाँ कोई बाधा नहीं, क्यों कि जिस उद्देश्य को सूचित करने के लिए कोई बाधित बात कही जाय तो स्वयं उद्देश्य कैसे बाधक-योग से युक्त होगा ? किसी प्रकार यदि 'प्रयोजन' में भी लक्षणा को ही मानते हैं तब प्रयोजन के प्रयोजन की बात उपस्थित होती है, इस प्रकार अनवस्था होगी अतः 'प्रयोजन' को एक मात्र व्यञ्जना का ही विषय मानना होगा, न कि लक्षणा का। यह विषय 'काव्यप्रकाश' में भी निर्दिष्ट है। लक्षणा को अभिधा का 'पुच्छभूत' कहा है। क्योंकि जब अभिधा मुख्य अर्थ में बाधक से रोक दी जाती है तब स्वयं एक प्रकार से अचरितार्थ हो कर अन्य अर्थ की ओर चल पड़ती है। इस प्रकार लक्षणा उपस्थित होकर अमुख्य अर्थ को बोधित करती है। वहाँ भी अमुख्य रूप से संकेत ग्रहण होता है। ऐसी स्थिति में बिना अभिधा के लक्षणा का कोई अवसर ही नहीं, इस कारण लक्षणा अभिधापुच्छभूत कही जाती है। कहने का तात्पर्य यह कि जब लक्षणा अभिधा की पूंछ बन कर रहती है तब वह व्यञ्जन रूप ध्वनि का मुकाबला क्या कर सकती है? अतः लक्षणा (भक्ति) को ध्वनि का लक्षण नहीं माना जा सकता। ध्वनि का विषय भिन्न होता है और लक्षणा का भिन्न। इस प्रकार लक्ष्य से अतिरिक्त स्थल में भी लक्षण की प्राप्तिरूप अतिव्याप्ति दोष ध्वनि का लक्षण 'भक्ति' को मानने पर होगा। तथा ऐसा करने पर लक्ष्य में अप्राप्तिरूप अव्याप्ति भी होगी। जैसे विवक्षितान्यपरवाच्य रूप ध्वनि में लक्षणा का प्रसंग न होने के कारण ध्वनि का 'भक्ति' रूप लक्षण अव्याप्त होगा। पुनश्च, 'लोचन' में लक्षणा के इन पाँच रूपों का निर्देश आचार्य ने उदाहरण के साथ किया है—
प्रथम उद्योतः १६७ ध्वन्यालोकः कस्यचिद् ध्वनिभेदस्य सा तु स्यादुपलक्षणम् । वह ध्वनि के किसी भेद का उपलक्षण हो सकती है। लोचनम् ननु मा भूद् ध्वनिरिति भक्तिरिति चैकं रूपम्। मा च भूद्भक्तिर्ध्वनेर्लक्षणम्। उपलक्षणं तु भविष्यति; यत्र ध्वनिर्भवति, तत्र भक्तिरप्यस्तीति भक्त्युपलक्षितो ध्वनिः। न तावदेतत्सर्वत्रास्ति, इयता च किं परस्य सिद्धं ? किं वा नः त्रुटितम् ? शङ्का है कि ध्वनि और भक्ति दोनों एकरूप न हों और 'भक्ति' ध्वनि का लक्षण भी न हो, परन्तु उपलक्षण तो होगी ? जहाँ ध्वनि है वहाँ भक्ति भी है, इस प्रकार ध्वनि भक्ति से उपलक्षित है । ( इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि ) यह ( उपलक्षण ) अभिधेयेन सामीप्यात् संयोगात्समवायतः । वैपरीत्यात् क्रियायोगाल्लक्षणा पञ्चधा मता ॥ इस प्रकार 'शिखरिणि०' इस श्लोक में आकस्मिक प्रश्न-विशेष आदि रूप बाधक को लेकर सादृश्य से लक्षणा होगी, ऐसी स्थिति में लक्षणा या भक्ति को विवक्षितान्यपरवाच्य रूप में ध्वनि के स्थल में भी व्याप्त होने पर अव्याप्ति न होगी । इस पर 'लोचनकार' ने विशेष रूप से अन्त में यह कहा है कि यहाँ यद्यपि मुख्यार्थ का बाध सम्भव है किन्तु सहृदय को उसकी अपेक्षा ही नहीं होती, बल्कि वे लोग यहाँ वक्ता के—चाटु प्रीति रूप अभिप्राय को ही यहाँ विदित करते हैं। अतः यहाँ लक्षणा के प्रसंग की कल्पना अनावश्यक है। असल में ध्वनि के जिस स्थल में लक्षणा का कोई सम्पर्क सम्भावित नहीं, वह है असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य, अर्थात् रसादि ध्वनि । काव्य द्वारा विभावानु- भाव का जो प्रतिपादन होता है वहाँ रंचमात्र भी बाधक का अनुप्रवेश नहीं। ऐसी स्थिति में 'भक्ति' रूप लक्षण अपने लक्ष्य में प्राप्त न होने से अव्याप्त होगा । तब मीमांसक-पक्ष से शङ्का करते हैं, कि हमें 'लक्षणा' पूर्वोक्त स्वरूप की मान्य नहीं, बल्कि, लक्षणा अभिधेय की अविनाभूतप्रतीति है। अर्थात् अभिधेय के साथ किसी न किसी सम्बन्ध से सम्बद्ध की प्रतीति ही लक्षणा है। इस प्रकार अभिधेय रूप विभाव-अनुभाव के अविनाभूत रसादि लक्षणा का विषय होंगे। फिर यह समस्या नहीं जाती है कि असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य में लक्षणा की प्राप्ति नहीं है । उसके उत्तर में आचार्य ने पहले 'लक्षणा' के इस लक्षण का ही खण्डन किया । उनके अनुसार जब अभिधेय की अविनाभूतप्रतीति ही लक्षणा होगी तब तो 'धूम' शब्द से धूम के ज्ञान होने पर उससे अविनाभूत अग्निस्मृति को भी आप लक्षणा का कार्य ही स्वीकार करेंगे और तत्पश्चात् अग्नि से शीतापनोदन की स्मृति को भी 'धूम' का शब्दार्थ मानेंगे, इस प्रकार इतने शब्दार्थों की कल्पना करनी पड़ेगी कि जिसका कोई अन्त नहीं । अन्ततोगत्वा आपको मुख्यार्थ बाध को लक्षणा का बीज मानना ही पड़ेगा। इस प्रकार विभाव आदि में बाधक का अभाव होने से लक्षणा का सम्पर्क नहीं है, यह बात तदवस्थ रहती है ।
१६८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सा पुनर्भक्तिर्वक्ष्यमाणप्रभेदमध्यादन्यतमस्य भेदस्य यदि नामोप- लक्षणतया सम्भाव्येत; यदि च गुणवृत्त्यैव ध्वनिborderर्लक्ष्यत इत्युच्यते तदभिधाव्यापारेण तदितरोऽलङ्कारवर्गः समग्र एव लक्ष्यत इति प्रत्येक- मलङ्काराणां लक्षणकरणवैय्यर्थ्यप्रसङ्गः । किं च वह भक्ति वक्ष्यमाण प्रभेदों में से किसी एक भेद के यदि उपलक्षण रूप से सम्भावित हो सके; और यदि 'गुणवृत्ति से ही ध्वनि लक्षित होता है' यह कहते हैं तो अभिधा व्यापार से ही समग्र अलङ्कार वर्ग लक्षित हो सकता है, ऐसी स्थिति में अलग-अलग अलङ्कारों का लक्षण करना व्यर्थ होगा । और भी, लोचनम् इति तदाह—कस्यचिदित्यादि । ननु भक्तिस्तावच्चिरन्तनैरुक्ता, तदुपलक्षणमुखेन च ध्वनिमपि समग्रभेदं लक्षयिष्यन्ति ज्ञास्यन्ति च । किं तल्लक्षणेनेत्याश- ङ्कयाह—यदि चेति । अभिधानाभिधेयभावो ह्यलङ्काराणां व्यापकः; ततश्चाभि- सर्वत्र नहीं है, इतने से ( अर्थात् भक्ति के उपलक्षणमात्र हो जाने से ) भक्तिवादी का क्या मतलब सिद्ध हो गया ? और हमारा क्या बिगड़ गया ? इसी को कहते हैं—वह ध्वनि के इत्यादि । फिर शङ्का करते हैं कि भक्ति को प्राचीनों ने कहा है, उसके उपलक्षणरूप से समग्र भेदसहित ध्वनि को भी लक्षित करेंगे और ज्ञान करेंगे। अतः उस (ध्वनि) के लक्षण से क्या ? यह आशङ्का करके कहते हैं—और यदि—। अलङ्कारों का इस प्रकार अपनी बात के कट जाने से चिढ़ कर मीमांसक यह कह उठता है कि रत्यादि चित्तवृत्ति के ज्ञान में हम शब्द-व्यापार को ही नहीं मानते, बल्कि जिस प्रकार धूम के ज्ञान से अग्नि का स्मरण करते हैं उसी प्रकार विभावादि की प्रतीति के पश्चात् रसादि चित्तवृत्ति की प्रतीति होती है । इस पर लोचनकार का कहना है कि तब तो परचित्तवृत्तिज्ञान ही रस का ज्ञान आप स्वीकार करते हैं । किन्तु यह तो दूसरे की चित्तवृत्ति का अनुमान मात्र है इसमें रसत्व कैसा ? बल्कि काव्यगत विभावादि की चर्वणा के कारण जो अलौकिक चमत्काररूप रसास्वाद है उसे स्मरण और अनुमान आदि की कोटि में लाकर हीन बनाना ठीक नहीं । रस की अनुभूति के लिए अनुमान और स्मरण आदि की कोई कैद नहीं है । केवल दर्शक दृश्यमान के साथ हृदयसंवाद का अनुभव करता हुआ चर्वणा के बल से विल्कुल तन्मय हो जाता है और तब उसे पता नहीं रहता कि वह किसी भिन्न या तटस्थ व्यक्ति के सुख से सुखी या दुःख से दुःखी हो रहा है। यही रसभूमि की अलौकिकता है। यहाँ दुःख का भी आनन्द के रूप में ही अनुभव होता हैं। इस प्रकार आलङ्कारिक आचार्यों ने 'चर्वणा' को रस की अनुभूति के लिए अनिवार्य माना है, बल्कि यहाँ तक वे लोग कहते हैं कि चर्वणा और रसानुभूति में कोई अन्तर नहीं होता । अब यदि कोई कहे कि 'चर्वणा' किसी प्रभाव से उत्पन्न होती है तब यही उत्तर है कि वह अलौकिक है अतः वहाँ लौकिक प्रत्यक्ष
प्रथम उद्योतः १६९ ध्वन्यालोकः लक्षणेऽन्यैः कृते चास्य पक्षसंसिद्धिरैव नः ॥ १९ ॥ कृतेऽपि वा पूर्वमेवान्यैर्ध्वनिलक्षणे पक्षसंसिद्धिरैव नः; यस्माद्- ध्वनिरस्तीति नः पक्षः । स च प्रागेव संसिद्ध इत्ययत्नसम्पन्न- अगर दूसरे लोगों ने ध्वनि का लक्षण कर दिया है तो हमारे पक्ष की सिद्धि ही होती है ॥ १९ ॥ पहले ही दूसरों द्वारा ध्वनि के लक्षण कर दिए जाने पर हमारे पक्ष की सिद्धि ही है, क्योंकि 'ध्वनि है' यह हमारा पक्ष है, और वह पहले से ही सिद्ध हो चुका, इस लोचनम् धावृत्ते वैयाकरणमीमांसकैर्निरूपिते कुत्रेदानीमलङ्कारकाराणां व्यापारः । तथा हेतुबलात्कार्यं जायत इति तार्किकैरुक्ते किमिदानीमीश्वरप्रभृतीनां कर्तॄणां ज्ञातॄणां वा कृत्यमपूर्वं स्यादिति सर्वो निरारम्भः स्यात् । तदाह—लक्षणाकरण- वैय्यर्थ्यप्रसङ्ग इति । मा भूद्धाऽपूर्वोन्मीलनं पूर्वोन्मीलितमेवास्माभिः सम्यङ्नि- रूपितं, तथापि को दोष इत्यभिप्रायेणाह—किं चेत्यादि । प्रागेवेति । अस्मत्प्रय- अभिधानाभिधेयभाव व्यापक है, ऐसी स्थिति में वैयाकरण और मीमांसक आचार्यों द्वारा अभिधा व्यापार के निरूपण कर दिये जाने पर आलंकारिक आचार्यों का व्यापार क्या महत्त्व रखता है। उसी प्रकार हेतु के बल से कार्य होता है ऐसा तार्किकों के कह देने पर ईश्वर प्रभृति कर्त्ताओं और ज्ञाताओं का कार्य क्यों अपूर्व होगा ? इस प्रकार निरारम्भ होने लगेगा । उसे कहते हैं—लक्षण करना व्यर्थ होगा— । तब शङ्का करते हैं कि अपूर्व वस्तु का उन्मीलन न हो, जो पहले से उन्मीलित है उसे ही हमने सम्यक् प्रकार से निरूपण किया, तब भी क्या दोष है ? इस अभिप्राय से कहते हैं—और भी— । इत्यादि । पहले ही— । अर्थात् हमारे प्रयत्न से । इस प्रकार तीन प्रकार के अभाववाद को, और ध्वनि के भक्ति में अन्तर्भूतत्व का निराकरण आदि प्रमाणों का कोई उपयोग नहीं रह जाता । लोक में जो कारण और कार्य होते हैं वेही अलौकिक काव्य में विभाव और अनुभाव हो जाते हैं । चर्वणा स्थायी भाव को रस्यमान बनाती है, इसका यह अभिप्राय नहीं चर्वणा प्रमाण के व्यापार की भांति ज्ञापन अथवा हेतु के व्यापार की भांति उत्पादन रूप है, बल्कि वह अभिव्यञ्जन है । चर्वणा के माध्यम से विभावादि रस का हेतु अवश्य है कि अलौकिक है अतः उसे न तो ज्ञापक हेतु कह सकते और न तो कारक । रस जब कि स्वसंवेदनसिद्ध है तो उसकी सिद्धि के लिए किसी अतिरिक्त प्रमाणरहित कहने से कुछ भी बिगड़ता नहीं । अस्तु, जब कि आप लक्षणा से रस के बोध की बात करते हैं तो यह कहना है कि जहाँ अर्थाभिधान का अनुपयोगी अनुप्रास भी रस का व्यञ्जक है वहाँ तो अभिधा का भी प्रसंग नहीं फिर लक्षणा की शङ्का भी क्या हो सकती है ?
१७० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः समीहितार्थाः संवृत्ताः स्मः । येऽपि सहृदयहृदयसंवेद्यमनाख्येयमेव ध्वनेरात्मानमाम्नासिषुस्तेऽपि न परीक्ष्य वादिनः । यत उक्तया नीत्या वक्ष्यमाणया च ध्वनेः सामान्यविशेषलक्षणे प्रतिपादितेऽपि यद्यनाख्ये- प्रकार बिना यत्न के हमारा अभीष्ट कार्य सिद्ध हो गया । जिन लोगों ने सहृदय जनों के हृदय द्वारा संवेद्य एवं अनिर्वचनीय ध्वनि के स्वरूप को आम्नात किया है वे भी परीक्षा करके कहने वाले नहीं हैं । क्योंकि कथित और वक्ष्यमाण नीति के अनुसार ध्वनि के सामान्य एवं विशेष लक्षण के प्रतिपादित होने पर भी यदि उसका अनि- लोचनम् तादिति शेषः । एवं त्रिप्रकारमभाववादं, भक्त्यन्तर्भूततां च निराकुर्वता अलक्ष- णीयत्वमेतन्मध्ये निराकृतमेव । अत एव मूलकारिका साक्षात्तन्निराकरणार्था न श्रूयते । वृत्तिकृत्तु निराकृतमपि प्रमेयशय्यापूरणाय कण्ठेन तत्पक्षमनूद्य निरा- करोति—येऽपीत्यादिना । उक्तया नीत्या 'यत्रार्थः शब्दो वा' इति सामान्यलक्षणं प्रतिपादितम् । वक्ष्यमाणया तु नीत्या विशेषलक्षणं भविष्यति 'अर्थान्तरे सङ्क्रमितम्' इत्यादिना । तत्र प्रथमोद्द्योते ध्वनेः सामान्यलक्षणमेव कारिका- कारेण कृतम् । द्वितीयोद्द्योते कारिकाकारोऽवान्तरविभागं विशेषलक्षणं च विदधदनुवादमुखेन मूलविभागं द्विविधं सूचितवान् । तदाशयानुसारेण तु करते हुए उसके अलक्षणीयत्व का भी इसमें निराकरण किया ही। अत एव मूलकारिका साक्षात् रूप से अलक्षणीयत्व के निराकरण के सम्बन्ध की नहीं श्रुत है, परन्तु वृत्तिकार स्वतः निराकृत उस पक्ष को प्रमेय के सन्निवेश विशेष की पूर्ति के लिए कण्ठतः अनुवाद करके निराकरण करते हैं—जिन लोगों ने— । इत्यादि द्वारा । उक्त नीति के अनुसार 'यत्रार्थः शब्दो वा०' यह सामान्य लक्षण प्रतिपादित है, वक्ष्यमाण नीति के अनुसार विशेष लक्षण होगा—'अर्थान्तरे सङ्क्रमितम्०' इत्यादि द्वारा । प्रथम 'उद्योत' में कारिकाकार ने ध्वनि का सामान्य लक्षण ही किया है । दूसरे 'उद्योत' में कारिका- कार ने अवान्तर विभाग और विशेष लक्षण को करते हुए अनुवाद द्वारा मूल का द्विविध विभाग सूचित किया है । उनके आशय के अनुसार वृत्तिकार ने इसी उद्योत में अन्त में, आचार्य ने किसी की यह शङ्का उद्भावित की है कि काव्य को वाच्य और व्यङ्ग्य दो अर्थों का बोधक मानते हैं, इस प्रकार हम 'वाक्यभेद' करेंगे । इसके उत्तर में आचार्य अभिनव गुप्त का कहना है कि वाक्यार्थ कभी दो नहीं हो सकता, क्योंकि एक काल में दो वाक्यार्थ का ज्ञान नहीं हो सकता । प्रकरण आदि की सहायता दूसरे वाक्य में भी लेनी ही पड़ेगी, क्योंकि ऐसा न करने से काम नहीं चलेगा । और भी यदि आप प्रकरण आदि को नियामक स्वीकार नहीं करेंगे तो 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' इस श्रुति वाक्य का अर्थ 'कुत्ते के मांस को खाना चाहिए' यह
प्रथम उद्योतः १७१ ध्वन्यालोकः यत्त्वं तत्सर्वेषामेव वस्तूनां तत्तत्सक्तम्। यदि पुनर्ध्वनेरतिशयोक्त्यानया काव्यान्तरातिशायि तैः स्वरूपमाख्यायते तत्तेऽपि युक्ताभिधायिन एव॥ वचनीयत्व है तब तो वह (अनिर्वचनीयत्व) समग्र वस्तुओं के सम्बन्ध में प्राप्त है। पुनः यदि वे लोग इस अतिशयोक्ति द्वारा ध्वनि का कोई दूसरे काव्यों से बढ़ कर स्वरूप कहते हैं तो वे भी ठीक ही कहते हैं। इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके प्रथम उद्योतः॥ लोचनम् वृत्तिकृदत्रैवोद्द्योते मूलविभागमवोचत्—‘स च द्विविधः’ इति। सर्वेषामिति। लौकिकानां शास्त्रीयाणां चेत्यर्थः। अतिशयोक्त्येति। यथा ‘तान्यक्षराणि हृदये किमपि स्फुरन्ति’ इतिवदतिशयोक्त्यानाख्येयतोक्ता साररूपतां प्रतिपादयितु- मिति दर्शितमिति शिवम्॥ १९॥ किं लोचनं विनालोको भाति चन्द्रिकयापि हि। तेनाभिनवगुप्तोऽत्र लोचनोन्मीलनं व्यधात्॥ मूल का विभाग कहा है—‘स च द्विविधः’ (‘और वह दो प्रकार का है’)। समग्र वस्तुओं का—। अर्थात् लौकिक एवं शास्त्रीय वस्तुओं का। अतिशयोक्ति द्वारा—। जैसे—‘तान्यक्षराणि हृदये किमपि स्फुरन्ति’ (‘वे अक्षर हृदय में कुछ स्फुरित हो रहे हैं) इसके समान अतिशयोक्ति द्वारा साररूपता के प्रतिपादनार्थ अनाख्येयता (अनिर्वचनीयत्व) कही गई है, यह दिखाया गया। (शिवम्) क्या लोचन के बिना लोक (संसार) चन्द्रिका से भी उद्भासित होता है? (व्यङ्ग्य यह कि क्या ‘लोचन’ व्याख्या के बिना आलोक—ध्वन्यालोक—‘चन्द्रिका’ व्याख्या से स्फुरित होता है?) उस कारण अभिनवगुप्त ने यहाँ ‘लोचन’ का उन्मीलन किया है। किया जाय तो आपके सामने क्या प्रमाण होगा? आपको विवश होकर प्रकरण को स्वीकार करके ही इसका अर्थ करना होगा। अतः ‘वाक्यभेद’ की बात दोषपूर्ण है। रसास्वाद की स्थिति में लौकिक स्थितियों की भाँति पूर्वापर-काल की चिन्ता नहीं होती, वह सर्वथा अलौकिक स्थिति है। जैसा कि वृत्तिकारने सामान्यतः ‘विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि’ में भक्ति के अभाव का निर्देश किया है उस पर लोचनकार कहते हैं कि माना कि विवक्षितान्यपरवाच्य के संलक्ष्यक्रम रूप भेद में लक्षणा को हम किसी प्रकार स्वीकार कर भी लें, किन्तु रसादि रूप अलक्ष्यक्रम में क्या उपाय निकालैंगे और यदि अपना हठ छोड़ कर वादी आचार्य की बात सुने तो वह भी कहते हैं कि
१७२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् यदुन्मीलनशक्त्यैव विश्वमुन्मीलति क्षणात्। स्वात्मायतनविश्रान्तां तां वन्दे प्रतिभां शिवाम् ॥ इति श्रीमहामाहेश्वराचार्यवर्याभिनवगुप्तोन्मीलिते सहृदयालोकलोचने ध्वनिसङ्केते प्रथम उद्योतः ॥ जिसकी उन्मीलन-शक्ति से ही क्षण में विश्व उन्मीलित हो जाता है उस अपने आयतन में स्थित शिवा प्रतिभा की वन्दना करता हूँ।१ महामाहेश्वराचार्यवर्य अभिनवगुप्त द्वारा उन्मीलित सहृदयालोकलोचन रूप ध्वनिसङ्केत में प्रथम उद्योत समाप्त हुआ। विवक्षितान्यपरवाच्य ही क्या, अविवक्षितवाच्य ध्वनि, जो लक्षणामूल है, में भी मुख्यार्थ-बाध आदि लक्षणा की सामग्री की अपेक्षा न करके ही व्यङ्ग्य अर्थ में विश्रान्ति होती है। यह बात सिद्ध हुई कि 'भक्ति' किसी प्रकार ध्वनि का लक्षण नहीं हो सकती। १. आचार्य अभिनवगुप्त ने अपने शैव-दर्शन की कल्पनाओं के अनुसार यहाँ प्रतिभा रूप शिवाख्या परा शक्ति की वन्दना की है। शैव कल्पना के अनुसार परमशैव कूटस्थ तत्त्व हैं, किन्तु उन्हें आयतन बना कर विश्रान्त रहने वाली परा शक्ति ही अपनी उन्मीलन-शक्ति से विश्व का उन्मीलन क्षण भर में कर देती है। प्रस्तुत काव्य-पक्ष में इसका अर्थ यह व्यञ्जित होता है कि कवि की प्रतिभा या नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा है, उसे प्रणाम है; जो कि वह नित्य अपने आयतन कवि में विराजती है और अपनी शक्ति द्वारा एक अलग ही संसार का उन्मीलन करती रहती है। यह आकलनीय है कि आचार्य अभिनवगुप्त ने अपनी 'लोचन' टीका के प्रत्येक 'उद्योत' के अन्त में क्रमशः परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी को नमन किया है।
द्वितीय उद्योतः ध्वन्यालोकः एवमविवक्षितवाच्यविवक्षितान्यपरवाच्यत्वेन ध्वनिद्विप्रकारः प्रका- शितः । तत्राविवक्षितवाच्यस्य प्रभेदप्रतिपादनायेदमुच्यते— इस प्रकार अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य के रूप से ध्वनि दो प्रकार से प्रकाशित है । उनमें अविवक्षितवाच्य के प्रभेद के प्रतिपादन के लिए यह कहते हैं— लोचनम् या स्मर्यमाणा श्रेयांसि सूते ध्वंसयते रुजः । तामभीष्टफलोदारकल्पवल्लीं स्तुवे शिवाम् ॥ वृत्तिकारः सङ्गतिमुद्द्योतस्य कुर्वाण उपक्रमते—एवमित्यादि । प्रकाशित इति । मया वृत्तिकारेण सतेति भावः । न चैतन्मयोत्सूत्रमुक्तम्, अपि तु कारि- काकाराभिपायेणोत्याह—तत्रेति । तत्र द्विप्रकारप्रकाशने वृत्तिकारकृते यन्निमित्तं बीजभूतमिति सम्बन्धः । यदि वा—तत्रेति पूर्वशेषः । तत्र प्रथमोद्द्योते वृत्तिका- रेण प्रकाशितः अविवक्षितवाच्यस्य यः प्रभेदोऽवान्तरप्रकारस्तत्प्रतिपादनाये- दमुच्यते । तदवान्तरभेदप्रतिपादनद्वारेणैव चानुवादद्वारेणाविवक्षितवाच्यस्य यः प्रभेदो विवक्षितान्यपरवाच्यात्प्रभिन्नत्वं तत्प्रतिपादनायेदमुच्यते । भवति जो शिवा (शिव की शक्ति) [लोगों द्वारा] स्मर्यमाण होकर कल्याणों को उत्पन्न करती है और आपदाओं को नष्ट करती है उस अभीष्ट फल की उदार कल्पलता को स्तवन करता हूँ । वृत्तिकार उद्योत की सङ्गति बैठाते हुए आरम्भ करते हैं—इस प्रकार— । इत्यादि । प्रकाशित— । भाव यह कि मैंने वृत्तिकार के रूप में (ध्वनि के दो प्रकारों को प्रकाशित किया है) । मैंने इस सूत्र (कारिका) की सीमा के बाहर होकर नहीं कहा है, बल्कि कारिकाकार के अभिप्राय से कहा है—वहाँ— । सम्बन्ध (पूर्वापर की संगति) यह है कि वृत्तिकार द्वारा ध्वनि के दो प्रकारों के प्रकाशन में जो निमित्त है या बीजभूत है (उसे कहते हैं) । अथवा—'वहाँ' यह प्रथम उद्योत में कहे हुए का शेष है । वहाँ प्रथम उद्योत में वृत्तिकार ने अविवक्षित वाच्य का जो प्रभेद (विवक्षितान्यपरवाच्य से भिन्नत्व) प्रकाशित किया था उसके अवान्तर प्रकार के प्रतिपादनार्थ यह कहते हैं । उसके अवान्तर भेद के प्रतिपादन के द्वारा ही और अनुवाद के द्वारा अविवक्षित वाच्य का जो प्रभेद अर्थात् विवक्षितान्यपरवाच्य से प्रभिन्नत्व है, उसके प्रतिपादन के लिए यह कहते हैं । भाव यह कि मूलरूप से दो भेद होना
१७४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अर्थान्तरे सङ्क्रमितमत्यन्तं वा तिरस्कृतम् । अविवक्षितवाच्यस्य ध्वनेर्वाच्यं द्विधा मतम् ॥ १ ॥ तथाविधाभ्यां च ताभ्यां व्यङ्ग्यस्यैव विशेषः । अर्थान्तर में सङ्क्रमित और अत्यन्त तिरस्कृत, इस रूप से अविवक्षितवाच्य ध्वनि का वाच्य दो प्रकार का माना गया है ॥ १ ॥ क्योंकि उन (दोनों प्रकार के वाच्यों) से व्यङ्ग्य का ही विशेष (उत्कर्ष) है। लोचनम् मूलतो द्विभेदत्वं कारिकाकारस्यापि सम्मतमेवेति भावः । सङ्क्रमितमिति णिचा व्यञ्जना व्यापारे यः सहकारिवर्गस्तस्यायं प्रभाव इत्युक्तं तिरस्कृतशब्देन च । येन वाच्येनाविवक्षितेन सताऽविवक्षितावाच्यो ध्वनिर्व्यपदिश्यते तद्वाच्यं द्विधेति सम्बन्धः । योऽर्थ उपपद्यमानोऽपि तावतैवानुपयोगाद्धर्मान्तरसंवलन- यान्यतामिव गतो लक्ष्यमाणोऽनुगतधर्मी सूत्रन्यायेनास्ते स रूपान्तरपरिणत उक्तः । यस्त्वनुपपद्यमान उपायतामात्रेणार्थान्तरप्रतिपत्तिं कृत्वा पलायत इव स तिरस्कृत इति । ननु व्यङ्ग्यात्मनो यदा ध्वनेर्भेदो निरूप्यते तदा वाच्यस्य द्विधेति भेदकथनं न सङ्गतमित्याशङ्क्याह—तथाविधाभ्यां चेति । चो यस्मा- कारिकाकार को भी सम्मत ही है। 'सङ्क्रमित' इस 'णिच्' प्रत्यय से और 'तिरस्कृत' शब्द से व्यञ्जना व्यापार में जो सहकारी वर्ग है उसका प्रभाव है, यह कहा¹ है। सम्बन्ध यह है कि जिस वाच्य के अविवक्षित होने से अविवक्षितवाच्य ध्वनि कहा जाता है वह वाच्य दो प्रकार का है। जो अर्थ उपपन्न होता हुआ भी, उतने ही अंश में उपयोग के न होने से धर्मान्तर के मिल जाने के कारण, दूसरा बना—जैसा मालूम पड़ता हुआ, धर्मी के अनुगत होने की स्थिति में सूत्र की भाँति, होता है, वह रूपान्तर-परिणत (अर्थान्तरसङ्क्रमित) कहा गया है। परन्तु जो कि अनुपपन्न होता हुआ, उपायमात्र होने के कारण (क्योंकि मुख्यार्थ का सम्बन्ध भी लक्षण का निमित्त है) दूसरे अर्थ की प्रतीति उत्पन्न करके जैसे पलायन कर जाता है, वह तिरस्कृत कहा जाता है। (शंका) जब कि व्यङ्ग्य रूप ध्वनि का भेद-निरूपण करते हैं, तब वाच्य का 'द्विधा' यह भेदकथन सङ्गत नहीं होता है, यह आशङ्का करके कहते हैं—उन दोनों प्रकार के—। 'च' 'और' का प्रयोग ('यस्मात्') य! १. वाच्य अर्थान्तर में सङ्क्रान्त नहीं होता, प्रत्युत सङ्क्रान्त कराया जाता है अर्थात् 'सङ्क्रमित' होता हैं, इस प्रकार यहाँ 'णिच्' प्रत्यय के प्रयोग से प्रयोजक कर्ता की अपेक्षा है, यहाँ प्रयोजक कर्ता है व्यञ्जना-व्यापार में सहकारिवर्ग, अर्थात् लक्षणा और वक्ता की विवक्षा आदि। बिना इनकी सहायता से वाच्य अर्थान्तर में सङ्क्रान्त नहीं होता। यही स्थिति 'तिरस्कृत' शब्द की भी है। प्रस्तुत अविवक्षित वाच्य ध्वनि को इसी कारण 'लक्षणामूल ध्वनि' भी कहते हैं। लक्षणा के आधार पर ही अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ये दो भेद
द्वितीय उद्योतः १७५ ध्वन्यालोकः तत्रार्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यो यथा— स्निग्धश्यामलकान्तिलिप्तवियतो वेल्लद्बलाका घना वाताः शीकरिणः पयोदसुहृदामानन्दकेकाः कलाः। अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य, जैसे— स्निग्ध एवं श्यामल कान्ति से आकाश को लिप्त कर देने वाले और वेल्लित होती हुई बकपङ्क्तियों वाले मेघ, फुहारों वाले वायु और मेघ के साथ मयूरों की अव्यक्त- लोचनम् दर्थे। व्यञ्जकवैचित्र्याद्धि युक्तं व्यङ्ग्यवैचित्र्यमिति भावः। व्यञ्जके त्वर्थे यदि ध्वनिशब्दस्तदा न कश्चिद्दोष इति भावः। भेदप्रतिपादकेनैवान्वर्थनाम्ना लक्षणमपि सिद्धमित्यभिप्रायेणोदाहरणमे- वाह—अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यो यथेति। अत्र श्लोके रामशब्द इति सङ्गतिः। स्निग्धया जलसम्बन्धसरसया श्यामलया द्रविडवनितोचितासितवर्णया कान्त्या चाकचक्येन लिप्तमाच्छुरितं वियन्नभो यैः। वेल्लन्त्यो विजृम्भमाणास्तथा चलन्त्यः परभागवशात्प्रहर्षवशाच्च बलाकाः सितपक्षिविशेषा येषु त एवंविधा 'क्योंकि' के अर्थ में है। भाव यह कि व्यञ्जक के वैचित्र्य से व्यङ्ग्य का वैचित्र्य बनता है। परन्तु यदि व्यञ्जक के अर्थ में 'ध्वनि' शब्द का प्रयोग हो, तब कोई दोष नहीं। भेद का प्रतिपादन करने वाले यथार्थ नाम से लक्षण भी सिद्ध हो गया है, इस अभिप्राय से उदाहरण को ही कहते हैं—अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य, जैसे—। इस श्लोक में 'राम' 'शब्द' है, यह सङ्गति है। स्निग्ध अर्थात् जल के सम्बन्ध के कारण सरस, श्यामल अर्थात् द्रविड़ देश की स्त्रियों के समान वर्ण वाली कान्ति अर्थात् चाकचिक्य या चमक उससे लिप्त अर्थात् आच्छुरित आकाश है जिन मेघों से। वेल्लित होती हुई अर्थात् विजृम्भमाण तथा परभाग के कारण (मेघों के श्याम वर्ण होने और अपने सित वर्ण होने के कारण) और प्रहर्ष के कारण चलती हुई बलाकायें होते हैं। इसे स्पष्ट समझने के लिए प्रस्तुत में 'लक्षणा' के सम्बन्ध में कुछ और भी विदित करना आवश्यक है। कहा जा चुका है कि 'लक्षणा' शब्द की वह आरोपित शक्ति है जिससे मुख्यार्थ के बाध, मुख्यार्थ के योग एवं रूढ़ि अथवा प्रयोजन में अन्यतर के होने पर अन्य अर्थ लक्षित होता है। यह लक्षणा दो प्रकार की है—उपादान लक्षणा और लक्षणलक्षणा। जहाँ अपनी सिद्धि के लिए दूसरे का आक्षेप होता है वह उपादान लक्षणा और जहाँ दूसरे अर्थ की सिद्धि के लिए अपने अर्थ का त्याग (समर्पण) होता है वह लक्षणलक्षणा है। 'कुन्ताः प्रविशन्ति' यह उपादानलक्षणा है, क्योंकि कुन्त अपने प्रवेश की सिद्धि के लिये कुन्तधारी पुरुषों का आक्षेप करते हैं। 'गङ्गायां घोषः' यह उदाहरण लक्षणलक्षणा का है, क्योंकि आधाराधेयभाव की सिद्धि के लिए यहाँ 'गङ्गा' शब्द अपने अर्थ का त्याग कर देता है। इस प्रकार पहले में कुन्तधारियों के आक्षेप से एवं दूसरे में 'गङ्गा' के प्रवाह रूप अर्थ के त्याग से अन्वयानुपपत्ति दूर होती है। ये दोनों लक्षणा के भेद क्रमशः
१७६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कामं सन्तु दृढं कठोरहृदयो रामोऽस्मि सर्वं सहे वैदेही तु कथं भविष्यति हहा हा देवि धीरा भव ॥ मधुर केका, ये सब जितना चाहें खूब हों, मैं तो राम हूँ, सब कुछ सहन करता हूँ, परन्तु विदेहपुत्री सीता कैसे होगी ? हा हा, देवि, तुम धैर्य धारण करो । लोचनम् मेघाः । एवं नभस्तावद् दुरालोकं वर्तते । दिशोऽपि दुःसहाः । यतः सूक्ष्मजल- कणोद्गारिणो वाता इति मन्दमन्दत्वमेषामनियतदिगागमनं च बहुवचनेन सूचितम् । तर्हि गुहासु क्वचित्प्रविश्यास्यतामित्यत आह—पयोदानां ये सुहृद- स्तेषु च सत्सु ये शोभनहृदया मयूरास्तेषामानन्देन हर्षेण कलाः षड्जसंवा- दिन्यो मधुराः केकाः शब्दविशेषाः ताश्च सर्वं पयोदवृत्तान्तं दुस्सहं स्मारयन्ति; स्वयं च दुस्सहा इति भावः । एवमुद्दीपनविभावोद्बोधितविप्रलम्भः परस्पराधि- ष्ठानत्वादृतेः विभावानां साधारणतामभिमन्यमानः इत एव प्रभृति प्रियतमां हृदये विधायैव स्वात्मवृत्तान्तं तावदाह—कामं सन्विति । दृढमिति सातिश- यम् । कठोरहृदय इति । रामशब्दार्थध्वनिविशेषावकाशदानाय कठोरहृदयपदम् । अर्थात् उज्ज्वल पांखों वाली बकपंकतियां जिनमें हैं वे, इस प्रकार के मेघ । इस प्रकार आकाश बिलकुल दिखाई नहीं देता है और दिशाएं भी दुःसह हो रही हैं । क्योंकि जब जल में फुहारों को फैलाने वाले वायु हैं, यह कह कर उनका मन्द-मन्द और अनियत दिशा से आगमन को 'बहुवचन' द्वारा सूचित किया । ऐसी स्थिति में कहीं कन्दराओं में घुस कर बैठना चाहिए, इस कारण से कहते हैं—मेघों के जो मित्र हैं, उनके विद्यमान होने पर जो शोभनहृदय वाले मयूर हैं उनके आनन्द या हर्ष से षड्ज- कायें स्वर से मेल खाती हुई अव्यक्त-मधुर के मांस ( शब्द-विशेष ), वे मेघ के समस्त दुःसह वृत्तान्त को याद दिलाती हैं और स्वयं दुःसह हैं, यह भाव है । इस प्रकार उद्दीपन विभाव के कारण विप्रलम्भ के उद्बोधित हो जाने पर एक-दूसरे नायक-नायिका में अधिष्ठित रति के होने से विभावों के साधारण्य को मानते हुए ( नायक ) यहाँ से ही लेकर प्रियतमा को हृदय में रखकर ही अपना वृतान्त कहता है—जो चाहे हो—। दृढ अर्थात् बहुत कुछ । कठोर हृदय वाला— । 'राम' शब्द के अर्थ को ध्वनि-विशेष के अवकाश देने के लिए 'कठोर हृदय' पद को रखा है । जैसे 'तद्गेहम्' यह कहकर भी
अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्य और अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य ध्वनियों के मूल में होते हैं । पहले में आक्षेप अर्थात् अर्थान्तर में सङ्क्रमण और दूसरे में अपना त्याग ( तिरस्कार ) होता है । इस प्रकार 'सङ्क्रमित' इस णिजन्त प्रयोग से व्यञ्जना की सहकारिणी लक्षणा के प्रभाव को ग्रन्थकार ने सूचित किया है, यह लोचनकार के कथन का तात्पर्य है । आगे दोनों ध्वनियों के उदाहरणों से यह विषय और भी स्पष्ट हो जायगा । स्वयं लोचनकार ने दोनों ध्वनियों के स्वरूप को कण्ठोक्त कर दिया है ।
द्वितीय उद्योतः १७७ ध्वन्यालोकः इत्यत्र रामशब्दः । अनेन हि व्यङ्ग्यधर्मान्तरपरिणतः सञ्ज्ञी प्रत्याय्यते, न संज्ञिमात्रम् । यह 'राम' शब्द । इस ( 'राम' शब्द ) से व्यञ्जित होते हुए दूसरे धर्म से परिणत व्यक्ति प्रतीत कराया जाता है, केवल व्यक्ति नहीं । लोचनम् यथा 'तद्गेहम्' इत्युक्तेऽपि 'नतभित्ति' इति । अन्यथा रामपदं दशरथकुलोद्भव- त्वकौसल्यास्नेहपात्रत्वबाल्यचरितजानकीलाभादिधर्मान्तरपरिणतमर्थं कथं न ध्वनेदिति । अस्मीति । स एवाहं भवामीत्यर्थः । भविष्यतीति क्रियासामान्यम् । तेन किं करिष्यतीत्यर्थः । अथ च भवनमेवास्या असम्भाव्यमिति । उक्तप्रका- रेण हृदयनिहितां प्रियां स्मरणशब्दाविकल्पपरस्परया प्रत्यक्षीभावितां हृदयस्फो- टनोन्मुखीं ससंभ्रममाह—हहा हेति । देवीति । युक्तं तव धैर्यमित्यर्थः । अनेनेति । रामशब्देनानुपयुज्यमानार्थेनेति भावः । व्यङ्ग्यं धर्मान्तरं प्रयोजन- रूपं राज्यनिर्वासनाद्यसङ्ख्येयम् । तच्चासङ्ख्यत्वादभिधाव्यापारेणाशक्यसम- र्पणम् । क्रमेणार्प्यमाणमप्येकधीविषयभावाभावान्न चित्रचर्वणापदमिति न चारुत्वातिशयकृत् । प्रतीयमानं तु तदसङ्ख्यमनुद्भिन्नविशेषत्वेनैव किं किं रूपं न सहत इति चित्रपानकरसापूपगुडमोदकस्थानीयविचित्रचर्वणापदं भवति । यथोक्तम्—'उक्त्यन्तरेणाशक्यं यत्' इति । एष एव सर्वत्र प्रयोजनस्य प्रतीय- 'नतभित्ति' कहा है । अन्यथा 'राम' पद दशरथ के कुल में उत्पन्न होना, कौसल्या के स्नेह का पात्र होना, बाल्यचरित और जानकीलाभ आदि धर्मान्तर में परिणत अर्थ को कैसे नहीं ध्वनित करता ! 'हूँ' अर्थात् वही मैं हूँ । 'होगी' यह क्रिया सामान्य है, इससे अर्थ है कि फिर क्या करेगी ? और ऐसी स्थिति में उसका होना ( अस्तित्व ) ही असम्भव हो जायगा । कहे प्रकार के अनुसार ( मेघ आदि उद्दीपकों का प्रियतमा के पास भी होने का ) स्मरण, ( 'वैदेही' यह ) शब्द ओर 'कैसे होगी' यह विकल्प या वितर्क, इन सबों की परम्परा से प्रत्यक्ष हुई एवं हृदय के स्फोटनार्थ उन्मुख प्रियतमा से सम्भ्रम-सहित कहते हैं—हा हा देवि— । अर्थात् तुम्हें धैर्य धारण करना ठीक है । इससे— । भाव यह कि जिसका अर्थ उपयोग में नहीं आ रहा है ऐसे 'राम' शब्द से । व्यङ्ग्य धर्मान्तर अर्थात् राज्य से निर्वासन आदि असङ्ख्येय प्रयोजन रूप धर्मान्तर । और वह असंख्य होने के कारण अभिधाव्यापार से समर्पित ( अवगत ) होना सम्भव नहीं । क्रम से अर्प्यमाण ( अवगत ) होने पर भी, एक बुद्धि की विषयता के अभाव में चित्र ( विलक्षण ) चर्वणा के स्थान ( विषय ) को नहीं पहुँच सकता, ऐसी स्थिति में अतिशय चारुत्व को नहीं करता है । परन्तु वह असङ्ख्य प्रतीयमान अनुद्भिन्न होने की विशेषता के कारण ही क्या-क्या रूप नहीं सहन ( धारण ) करता ? इस प्रकार वह चित्रपानकरस, अपूप, गुड़ और मोदक की भाँति विचित्र चर्वणा का पद ( अधिष्ठान ) १२ ध्व०
१७८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा च ममैव विषमबाणलीलायाम्— ताला जाअन्ति गुणा जाला दे सहिअएहिं घेप्पन्ति । रइकिरणानुग्गहिआइँ होन्ति कमलाइँ कमलाइँ ॥ ( तदा जायन्ते गुणा यदा ते सहृदयैर्गृह्यन्ते । रविकिरणानुगृहीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि ॥ इति च्छाया) इत्यत्र द्वितीयः कमलशब्दः । और जैसे, मेरा ही ( उदाहरण श्लोक ) 'विषमबाणलीला' में— तब गुण होते हैं जब सहृदय लोग ग्रहण करते हैं, सूर्य की किरणों से अनुगृहीत होकर ही कमल कमल होते हैं । यहाँ दूसरा 'कमल' शब्द । लोचनम् मानत्वेनोत्कर्षहेतुर्मन्तव्यः । मात्रग्रहणेन संज्ञी नात्र तिरस्कृत इत्याह । यथा चेत्यादि । ताला तदा । जाला यदा । घेप्पन्ति गृह्यन्ते । अर्थान्तरन्यासमाह— रविकिरणेति । कमलशब्द इति । लक्ष्मीपात्रत्वादिधर्मान्तरशतचित्रतापरिणतं संज्ञिनमाहेत्यर्थः । तेन शुद्धेऽर्थे मुख्ये बाधानिमित्तं तत्रार्थे तद्धर्मसमवायः । तेन निमित्तेन रामशब्दो धर्मान्तरपरिणतमर्थं लक्षयति । व्यङ्ग्यान्यसाधारणा- न्यशब्दवाच्यानि धर्मान्तराणि । एवं कमलशब्दः । गुणशब्दस्तु संज्ञिमात्रमा- हेति । तत्र यद्बलात्कैश्चिदारोपितं तदप्रातीतिकम् । अनुप्रयोगबाधितो ह्यर्थोऽस्य ध्वनेर्विषयो लक्षणा मूलं ह्यस्य । होता है । जैसा कि कहा है—दूसरी उक्ति से अशक्य जिस चारुत्व को०— । प्रयोजन के प्रतीयमान होने के कारण उत्कर्ष का हेतु इसे ( अर्थात् विचित्र चर्वणा विषयत्व ) ही मानना चाहिए । 'मात्र' ग्रहण से कहते हैं कि संज्ञी (राम) यहाँ तिरस्कृत नहीं है । और जैसे— । ताला तब । जाला जब । घेप्पन्ति ग्रहण किए जाते हैं ( सामान्य के समर्थन रूप ) 'अर्थान्तरन्यास' को कहते हैं—सूर्य की किरणों से— । 'कमल' शब्द— । अर्थात् लक्ष्मी या शोभा का पात्रत्व—आश्रय होना आदि धर्मान्तरों की सैकड़ों विचित्रताओं में परिणत संज्ञावान् ( कमल ) को कहता है । इस लिए शुद्ध मुख्य अर्थ में बाधा का कारण उस अर्थ में (अर्थात् 'राम' पद के मुख्यार्थ के धर्मी राम में ) उन धर्मों का समवाय (सम्बन्ध) है । उस निमित्त से 'राम' शब्द धर्मान्तर में परिणत अर्थ को लक्षित करता है । असाधारण एवं अशब्दवाच्य धर्मान्तर ( निर्वेद, ग्लानि आदि )—व्यङ्ग्य हैं । इसी प्रकार 'कमल' शब्द है । ( दूसरे श्लोक में ) 'गुण' शब्द केवल संज्ञी को अभिहित करता है । उक्त उदाहरणों में जो बल-पूर्वक कुछ
द्वितीय उद्योतः १७९ लोचनम् यत्तु हृदयदर्पण उक्तम्—‘हहा हेति संरम्भार्थोऽयं चमत्कारः’ इति । तत्रापि संरम्भः आवेगो विप्रलम्भव्यभिचारीति रसध्वनिस्तावदुपगतः । न च राम- शब्दाभिव्यक्तार्थसाहायकेन विना संरम्भोल्लासोऽपि । अहं सहे तस्याः किं वर्तत इत्येवमात्मा हि संरम्भः । कमलपदे च कः संरम्भ इत्यास्तां तावत् । अनुपयोगात्मिका च मुख्यार्थबाधात्रास्तीति लक्षणामूलत्वादविवक्षितवाच्यभेद- लोगों ने आरोप करके कहा है', वह प्रतीतिसिद्ध नहीं । क्योंकि अनुपयोग रूप बाधा के कारण अर्थ रस ध्वनि का विषय होता है, उसका मूल लक्षणा है । जो कि ‘हृदयदर्पण' में कहा है—‘हहा हा' यह ‘संरम्भ’२ के अर्थ में यह चमत्कार व्यक्त किया है ।’ वहाँ भी संरम्भ या आवेग विप्रलम्भ का व्यभिचारी है इस प्रकार ‘रसध्वनि' स्वीकार किया है । ‘राम’ शब्द से अभिव्यक्त अर्थों की सहायता के बिना संरम्भ का उल्लास भी नहीं होगा । ‘मैं तो सह लेता हूँ' परन्तु उसका क्या होगा ? इस प्रकार का संरम्भ है । ‘कमल’ पद में कौन ‘संरम्भ’ है ? अतः इसे रहने दीजिए ! अनुपयोगरूप मुख्यार्थ बाधा यहाँ है, इस लिए लक्षणामूल होने के कारण इसका अविवक्षितवाच्य ध्वनि का भेद होना उपपन्न ही है क्योंकि शुद्ध ( मुख्य अर्थ ) की १. जैसा कि प्रस्तुत उदाहरणों में ‘राम' शब्द और ‘कमल’ शब्द अनुपयुक्त होने के कारण बाधितार्थ होकर लक्षणा के द्वारा धर्मान्तर में परिणत अर्थ को लक्षित करते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि व्यञ्जित होते-होते सभी धर्मान्तरों को लक्षणा के द्वारा ही प्रतीत किया जाय । कुछ लोगों ने बलात् लक्षणा द्वारा ही प्रतीत करने की कोशिश की थी । किन्तु यह प्रकार सहृदय जनों की प्रतीति के विरुद्ध है । कारण यह है कि लक्षणा से एक ही धर्म से अन्वित की प्रतीति हो सकती है, क्योंकि लक्षणा की इसी अंश में सार्थकता है कि वह शब्द के ‘अनुपयोग’ को हटा दे और उपयुक्त अर्थ को प्रस्तुत कर दे । किन्तु लक्षणा द्वारा उपयुक्त अर्थ के प्रतीत होने के पश्चात् भी जब अनेक धर्मान्तर प्रतीत होने लगते हैं तब उन्हें भी विरत-व्यापार लक्षणा का विषय किसी प्रकार नहीं माना जा सकता । अतः यहाँ अनेक धर्मान्तरों को प्रस्तुत अविवक्षितवाच्यध्वनि का विषय मानते हैं, जिसका मूल लक्षणा है । इस प्रकार लक्षणा यहाँ सहकारिणी शक्ति है । २. ‘हहा हा’ इस चमत्कार के प्रयोग से संरम्भ या आवेग व्यक्त होता है । यही श्लोक का विशेष लक्ष्य है । यह बात ‘हृदयदर्पण’ में कही गई है । इसका यह अभिप्राय है कि जो यहाँ ‘राम’ शब्द की व्यञ्जकता की चर्चा है वह अनावश्यक है । इस पर लोचनकार का कहना है कि जो यहाँ ‘संरम्भ’ या आवेग का आप अनुभव करते हैं, वह भी तो विप्रलम्भ-शृङ्गार का व्यभिचारी है ! अतः आप ने स्वयं ‘रसध्वनि' को स्वीकार कर लिया है । और साथ ही, यह संरम्भ भी ‘राम’ शब्द से अभिव्यक्त अर्थों की सहायता के बिना उल्लसित नहीं होगा । क्योंकि राम में आवेग तभी आ सकता है जब वह अपनी समर्थता को और सीता की असमर्थता को अनुभव करेंगे । अतः ‘राम’ पद की व्यञ्जना यह ‘संरम्भ’ के उल्लास की सहायिका है । और, माना कि यह यहाँ ‘संरम्भ’ है किन्तु दूसरे उदाहरण के ‘कमल’ पद में कौन सा ‘संरम्भ’ है ? अन्ततः यह मानना ही पड़ेगा । कि इन उदाहरणों में अनुपयोगात्मक मुख्यार्थ बाधा है, अतः लक्षणामूलक अविवक्षितवाच्य ध्वनि का यह अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य रूप एक भेद है । यहाँ ‘राम’ और ‘कमल’ शब्द के केवल शुद्ध या वाच्य अर्थ की विवक्षा ही नहीं ।
१८० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यो यथादिकवेर्वाल्मीकेः— रविसंक्रान्तसौभाग्यस्तुषारावृतमण्डलः । निःश्वासान्ध इवादर्शश्चन्द्रमा न प्रकाशते ॥ इति । अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य, जैसे आदिकवि वाल्मीकि का— सूर्य में जिसका सौभाग्य संक्रान्त हो गया है, एवं तुषार से जिसका मण्डल ढँक गया है, ऐसा चन्द्रमा निःश्वास से अन्ध आइने की भांति प्रकाशवान् नहीं है। लोचनम् तास्योपपन्नैव, शुद्धार्थस्याविवक्षणात् । न च तिरस्कृतत्वं धर्मिरूपेण, तस्यापि तावत्यनुगमात् । अत एव च परिणतवाचोयुक्त्या व्यवहृतम्–आदिकवेरिति । ध्वनेर्लक्ष्यप्रसिद्धतामाह–रवीति । हेमन्तवर्णने पञ्चवट्यां रामस्योक्तिरियम् । अन्ध इति चोपहतदृष्टिः । जात्यन्धस्यापि गर्भे दृष्ट्युपघातात् । अन्धोऽयं पुरोऽपि न पश्यतीत्यत्र तिरस्कारोऽन्धार्थस्य न त्वत्यन्तम् । इह त्वादृशस्यान्ध- त्वमारोप्यमाणमपि न सह्यमिति । अन्धशब्दोऽत्र पदार्थस्फुटीकरणाशक्तत्वं नष्टदृष्टिगतं निमित्तीकृत्यादर्शं लक्षणया प्रतिपादयति । असाधारणविच्छायत्वा- नुपयोगित्वादिधर्मजातमसंख्यं प्रयोजनं व्यनक्ति । भट्टनायकेन तु यदुक्तम्— विवक्षा यहाँ नहीं है। (अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य ध्वनि में) धर्मी (व्यक्ति) रूप से तिरस्कार नहीं है, क्योंकि उस धर्मी (व्यक्ति) का भी अनुगम (ज्ञान) होता है। इसीलिए 'परिणत' इस वाचोयुक्ति से व्यवहार किया है। आदिकवि— । 'ध्वनि' की लक्ष्य में प्रसिद्धि को कहते हैं—सूर्य— । हेमन्तवर्णन के प्रसङ्ग में पञ्चवटी में राम की यह उक्ति है। 'अन्ध' अर्थात् जिसकी दृष्टि नष्ट हो गई हो। क्योंकि जो जात्यन्ध होता है, उसकी भी दृष्टि का गर्भ में उपघात (नाश) हो जाता है। 'यह अन्धा आगे भी नहीं देखता है' इस कथन में 'अन्ध' शब्द के अर्थ का तिरस्कार है, किन्तु अत्यन्त रूप से (तिरस्कार) नहीं है। किन्तु यहाँ आइने का अन्धत्व आरोप्यमाण होकर भी सह्य नहीं। यहाँ 'अन्ध' शब्द नष्टदृष्टि पुरुष में रहने वाले किसी पदार्थ के स्फुटीकरण में अशक्यत्वरूप धर्म को निमित्त करके, आदर्श की लक्षणा से प्रतिपादन करता है; इस प्रकार असाधारण छायाहीनत्व और अनुपयोगित्व आदि असङ्ख्य धर्म-समूह रूप प्रयोजन को (वह) व्यक्त करता है। परन्तु भट्टनायक ने जो कहा है—'इव' शब्द के योग के कारण गौणता' (गौणी १. 'अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य' का यह अर्थ नहीं है कि धर्मी का तिरस्कार होता है, बल्कि लक्ष्य और व्यङ्ग्य अर्थों के ज्ञान में धर्मी का भी ज्ञान अनुप्रविष्ट होता है, अतः 'तिरस्कार' धर्म का ही अभीष्ट है, न कि धर्मी का। इसी लिए 'परिणतः' शब्द का प्रयोग आचार्य ने किया है, अर्थात् धर्मी स्वयं स्थित रहता हुआ अनेक व्यङ्ग्य धर्मान्तरों से परिणत रूप में प्रतीत होता है। २. अन्धा वह होता है जिसकी दोनों आँखें फूट गई हों और जो जन्मान्ध होता है उसकी
द्वितीय उद्योतः १८१
ध्वन्यालोकः
अत्रान्धशब्दः ।
गअणं च मत्तमेहं धाराळुलिअज्जणाईं अ वणाईं ।
णिरहङ्कारमिअङ्का हरन्ति नीलाओ वि णिसाओ ॥
अत्र मत्तणिरहङ्कारशब्दौ ॥ १ ॥
यहाँ 'अन्ध' शब्द ।
मत्त मेघों से भरा आकाश भी, धारावृष्टि से कम्पित अर्जुन वृक्षों वाले वन भी
और निरहङ्कार चन्द्रवाली काली रातें भी मन को हर लेती हैं ॥
यहाँ 'मत्त' और 'निरहङ्कार' शब्द ।
लोचनम्
‘इवशब्दाप्रयोगाद् गौणताप्यत्र न काचित्’ इति, तच्छ्लोकार्थमपरामृश्य । आद-
र्शचन्द्रमसोर्हि सादृश्यमिवशब्दो द्योतयति । निःश्वासान्ध इति चादर्शविशेष-
णम् । इवशब्दान्धार्थेन योजने आदर्शश्चन्द्रमा इत्युदाहरणं भवेत् । योजनं
चैतदिवशब्दस्य क्लिष्टम् । न च निःश्वासेनान्ध इवादर्शः स इव चन्द्र इति
कल्पना युक्ता । जैमिनीये सूत्रे ह्येवं योज्यते न काव्येऽपीत्यलम् । गअणमिति ।
लक्षणा) भी यहाँ नहीं सम्भव है', वह श्लोकार्थ को विचार करके नहीं (कहा है)।
आदर्श (आइना) और चन्द्रमा इन दोनों का सादृश्य 'इव' शब्द द्योतित करता है।
और 'निःश्वासान्ध' यह आदर्श (आइना) का विशेषण है। 'इव' शब्द को 'अन्ध'
अर्थ के साथ जोड़ने में 'आदर्श रूप चन्द्रमा' यह उदाहरण होगा। लेकिन 'इव' शब्द का
यह योजना क्लिष्ट है। 'निःश्वास से अन्ध के समान आदर्श और उसके समान चन्द्रमा'
यह कल्पना भी ठीक नहीं । 'जैमिनीयसूत्र' में इस प्रकार योजना होती है, न कि
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आँखें गर्भ में ही फूट गई होती हैं। किन्तु आदर्श का अन्धत्व कदापि सम्भव नहीं, यदि आदर्श
पर अन्धत्व का आरोप भी किया जाय तब भी सह्य नहीं। अतः इस अर्थ का तिरस्कार कर देते हैं
और जिसके पास आँखें नहीं होती हैं वह किसी भी पदार्थ को नहीं स्पष्ट कर सकता इस पदार्थ-
स्फुटीकरणाशक्यत्व रूप अर्थ को निमित्त करके वही 'अन्ध' शब्द आदर्श को लक्षणा से बोधन
करता है। इस प्रकार यहाँ छायाहीनत्व, अनुपयोगित्व आदि अनेक धर्मसमूह प्रयोजन के रूप
में प्रतीयमान हैं। यहाँ 'अन्ध' शब्द के अर्थ के तिरस्कृत हो जाने के कारण प्रस्तुत ध्वनि को
'अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य' कहा है।
भट्टनायक ने 'अन्ध' अर्थ के से 'इव' शब्द को जोड़ कर यहाँ गौणी लक्षणा का भी निषेध
किया है। क्योंकि आदर्श अन्धा के समान हो ही सकता है, ऐसी स्थिति में मुख्यार्थ-बाध न होने
के कारण लक्षणा का प्रसंग नहीं होगा। किन्तु उन्होंने श्लोक के अर्थ का विचार नहीं किया है।
यहाँ 'निःश्वासान्ध' शब्द आदर्श का विशेषण है, ऐसी स्थिति में 'इव' का योग उसके साथ नहीं
होगा, यदि करते हैं तो यह योजना क्लिष्ट एवं अनुपयुक्त है। ऐसी कल्पना तो भट्टनायक अपने
'मीमांसा शास्त्र' में ही करें तो अच्छा है, काव्य में इसे अच्छा नहीं समझा जाता। अतः यहाँ
१८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् गगनं च मत्तमेघं धारालुलितार्जुनानि च वनानि । निरहङ्कारमृगाङ्का हरन्ति नीला अपि निशाः ॥ इति च्छाया । चशब्दोऽपिशब्दार्थे । गगनं मत्तमेघमपि न केवलं तार- कितम् । धारालुलितार्जुनवृक्षाण्यपि वनानि न केवलं मलयमारुतान्दोलितसह- काराणि । निरहङ्कारमृगाङ्का नीला अपि निशा न केवलं सितकरकरधवलिताः । हरन्ति उत्सुकयन्तीत्यर्थः । मत्तशब्देन सर्वथैवेहासम्भवत्स्वार्थेन बाधितमद्यो- पयोगक्षीबात्मकमुख्यार्थेन सादृश्यान्मेघाँल्लक्षयताऽसमञ्जसकारित्वदुर्निवारत्वा- दिधर्मसहस्रं ध्वन्यते । निरहङ्कारशब्देनापि चन्द्रं लक्षयता तत्पारतन्त्र्यविच्छा- यत्वोज्जिगमिषारूपजिगीषात्यागप्रभृतिः ॥ १ ॥ अविवक्षितवाच्यस्य प्रभिन्नत्वमिति यदुक्तं तत्कृतः ? न हि स्वरूपादेव भेदो भवतीत्याशङ्क्य विवक्षितवाच्यादेवाश्य भेदो भवति, विवक्षा तदभावयो- काव्य में भी— । अलम् । आकाश— । 'और' ( च ) शब्द 'भी' ( अपि ) शब्द के अर्थ में है । मतवाले मेघों वाला भी आकाश, न केवल तारों भरा । धारावृष्टि से कम्पित अर्जुन वृक्षों वाले वन, न केवल मलयमारुत से कम्पित सहकार वृक्षों वाले । अहङ्कार- हीन चन्द्रवाली काली भी रातें, न केवल चन्द्र की किरणों से धवलित । हर लेती हैं अर्थात् उत्सुक करती हैं । यहाँ 'मत्त'१ शब्द, जिसका अर्थ सर्वथा ही सम्भव नहीं हो रहा है और जिसका मुख्य अर्थ मद्य ( मदिरा ) के उपयोग से क्षीब ( पागल ) रूप होने के कारण बाधित है, सादृश्य सम्बन्ध से मेघों को लक्षित कर रहा है, जिससे असमञ्जसकारित्व दुर्निवारत्व आदि हजारों धर्म ध्वनित होते हैं । चन्द्र को लक्षित करता हुआ 'निरहङ्कार' शब्द भी उसमें पारतन्त्र्य, छायाहीनत्व, उदय लेने की इच्छा रूप जिगमिषा का त्याग प्रभृति को ध्वनित करता है ॥ १ ॥ जो कि ( आरम्भ के वृत्तिग्रन्थ में ) 'अविवक्षितवाच्य का प्रभेद' यह कहा है वह कैसे ? क्योंकि स्वरूप से ही ( स्वयं अपने से ही अपना ) भेद नहीं होता, ऐसी आशङ्का करके इस अभिप्राय से, कि विवक्षितवाच्य से ही इस ( अविवक्षितवाच्य ) का भेद है, क्योंकि विवक्षा के भाव और अभाव दोनों का विरोध है, कहते हैं— लक्षणा सर्वथा उपपन्न है । तात्पर्य यह कि 'इव' शब्द 'चन्द्रमा' के साथ अन्वित होगा । यहाँ चन्द्रमा आदर्श के समान है, न कि अन्ध के समान आदर्श है । इस प्रकार 'अन्ध' शब्द अपने वाच्यार्थ के बाधित होने पर लक्षणा से आदर्श का बोधन करता है और प्रयोजन रूप छायाहीनत्व आदि अनेक धर्म प्रतीयमान होते हैं । १. 'मत्त' और 'अहङ्कार' के मुख्य अर्थ प्रस्तुत में अनुपपन्न हैं, क्योंकि मेघ तो जड़ है मत्त कैसे होगा और चन्द्रमा भी अहङ्कार कैसे करेगा ? इस प्रकार ये शब्द सादृश्य से लक्षणा द्वारा क्रमशः मेघ और चन्द्र को लक्षित करते हैं और तब उनसे अनेक निर्दिष्ट धर्म प्रतीयमान होते हैं । यहाँ भी मुख्यार्थ का तिरस्कार है ।
द्वितीय उद्योतः १८३
ध्वन्यालोकः
असंलक्ष्यक्रमोद्द्योतः क्रमेण द्योतितः परः ।
विवक्षिताभिधेयस्य ध्वनेरात्मा द्विधा मतः ॥ २ ॥
मुख्यतया प्रकाशमानो व्यङ्ग्योऽर्थो ध्वनेरात्मा । स च वाच्यार्था-
पेक्षया कश्चिदलक्ष्यक्रमतया प्रकाशते, कश्चित्क्रमेणेति द्विधा मतः ॥२॥
तत्र
रसभावतदाभासतत्प्रशान्त्यादिरक्रमः ।
ध्वनेरात्माङ्गिभावेन भासमानो व्यवस्थितः ॥ ३ ॥
जिसका अभिधेय विवक्षित है, ऐसा ध्वनि दो प्रकार का होता है, एक वह जिसके
व्यङ्ग्य का क्रम संलक्षित नहीं होता है, दूसरी वह जिसके व्यङ्ग्य का क्रम संलक्षित
होता है ॥ २ ॥
मुख्य रूप से प्रकाशमान व्यङ्ग्य अर्थ ध्वनि का आत्मा है । वह कोई वाच्य अर्थ
की अपेक्षा अलक्ष्यक्रम रूप से प्रकाशित होता है और कोई क्रम से, इस प्रकार दो
प्रकार भी माना गया है । वहाँ—
अङ्गी रूप से भासमान ध्वनि का आत्मा ( स्वरूप ) रस, भाव, रसाभास, भावा-
भास, भावप्रशम, भावशान्ति, आदि अक्रम ( असंलक्ष्यक्रम ) रूप से व्यवस्थित है ।
लोचनम्
विरोधादित्यभिप्रायेणाह—असंलक्ष्येति । सम्यङ् न लक्षयितुं शक्यः क्रमो यस्य
तादृश उद्द्योत उद्द्योतनव्यापारोऽस्येति बहुव्रीहिः । ध्वनिशब्दसान्निध्याद्विव-
क्षिताभिधेयत्वेनान्यपरत्वमत्राक्षिप्तमिति स्वकण्ठेन नोक्तम् । ध्वनेरिति । व्यङ्ग्य-
स्येत्यर्थः । आत्मेति । पूर्वश्लोकेन व्यङ्ग्यस्य वाच्यमुखेन भेद उक्तः । इदानीं तु
द्योतनव्यापारमुखेन द्योत्यस्य स्वात्मनिष्ठ एवेत्यर्थः । व्यङ्ग्यस्य ध्वनेर्द्योतने
स्वात्मनि कः क्रम इत्याशङ्क्याह—वाच्यार्थापेक्षयेति । वाच्योऽर्थो विभावादिः ॥
तत्रेति । तयोर्मध्यादित्यर्थः । यो रसादिरर्थः स एवाक्रमो ध्वनेरात्मा न
असंलक्ष्य— । सम्यक् प्रकार से लक्षित न किया जा सके क्रम जिसका उस प्रकार का
उद्योत अर्थात् उद्योतनव्यापार वाला, यह ‘बहुव्रीहि’ समास है । ‘ध्वनि’ शब्द के
सान्निध्य से, अभिधेय के विवक्षित होने के कारण ‘अन्यपरत्व’ आक्षेपतः यहाँ आ
जाता है, अतः उसे कण्ठतः नहीं कहा है । ध्वनि का— । अर्थात् व्यङ्ग्य का ।
आत्मा— । पहले श्लोक से व्यङ्ग्य का वाच्य के प्रकार से भेद कहा है । किन्तु अब
द्योतन व्यापार के प्रकार से द्योत्य अर्थात् व्यङ्ग्य का स्वात्मनिष्ठ भेद ही कहते हैं,
यह अर्थ है । व्यङ्ग्य ध्वनि के द्योतन में, स्वयं में कौन—सा क्रम है ? यह आशङ्का
करके कहते हैं—वाच्य अर्थ की अपेक्षा से । वाच्य अर्थ विभाव आदि ।
वहाँ— । अर्थात् उन दोनों में से । जो रसादिरूप अर्थ है वही अक्रम होकर
१८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् त्वक्रम एव सः । क्रमत्वमपि हि तस्य कदाचिद्भवति । तदा चार्थशक्त्युद्द्भवा- नुस्वानरूपभेदेतेति वक्ष्यते । आत्मशब्दः स्वभाववचनः प्रकारमाह । तेन रसादिर्योऽर्थः स ध्वनेरक्रमो नाम भेदः । असंलक्ष्यक्रम इति यावत् । ननु किं सर्वदैव रसादिरर्थो ध्वनेः प्रकारः ? नेत्याह; किं तु यदाङ्गित्वेन प्रधानत्वे- नावभासमानः । एतच्च सामान्यलक्षणे 'गुणीकृतस्वार्थावि'त्यत्र यद्यपि निरू- पितम्, तथापि रसवदाद्यलङ्कारप्रकाशनावकाशदानायानूदितम् । स च रसा- दिर्ध्वनिर्व्यवस्थित एव; न हि तच्छून्यं काव्यं किञ्चिदस्ति । यद्यपि च रसेनेव सर्वं जीवति काव्यम्, तथापि तस्य रसस्यैकघनचमत्कारात्मकस्यापि कुतश्चिदं- शात्प्रयोजकीभूतादधिकोऽसौ चमत्कारो भवति । तत्र यदा कश्चिदुद्रिक्तावस्थां प्रतिपन्नो व्यभिचारी चमत्कारातिशयप्रयोजको भवति, तदा भावध्वनिः । यथा- तिष्ठेत्कोपवशात्प्रभावपिहिता दीर्घं न सा कुप्यति स्वर्गायोत्पतिता भवेन्मयि पुनर्भावार्द्रमस्या मनः । तां हर्तुं विबुधद्विषोऽपि न च मे शक्ताः पुरोवर्तिनीं सा चात्यन्तमगोचरं नयनयोर्यातेति कोऽयं विधिः ॥ अत्र हि विप्रलम्भरससद्भावेऽपीति वितर्काख्यव्यभिचारिचमत्क्रियाप्रयुक्त आस्वादातिशयः । व्यभिचारिण उदयस्थित्यपायत्रिधर्मकाः । यदाह—'विविध- ध्वनि का आत्मा है, न कि वह अक्रम ही है, क्योंकि उसका कभी क्रमत्व भी होता है । तब अर्थ रूप शक्ति से उत्पन्न अनुरणन रूप भेद होता है, यह कहेंगे । स्वभाव के अर्थ में 'आत्मा' शब्द प्रकार बताता है । उससे, रसादि रूप जो अर्थ है वह ध्वनि का अक्रम नामक भेद है, अर्थात् असंलक्ष्यक्रम है । शङ्का है कि क्या रसादि अर्थ हमेशा ही ध्वनि का प्रकार है ? उत्तर में कहते हैं कि, नहीं । किन्तु जब अङ्गी या प्रधान रूप से प्रतीत होता है, ( तब ध्वनि का प्रकार है) । इस बात को यद्यपि ( ध्वनि के ) सामान्य लक्षण में 'गुणीकृतस्वार्थों०' इस स्थल पर निरूपण कर दिया है, तथापि रसवत् आदि अलङ्कारों के प्रकाशन का अवकाश देने के लिए अनुवाद किया है। वह रस आदि ध्वनि के रूप में व्यवस्थित ही है, क्योंकि उससे शून्य काव्य कोई चीज नहीं है । यद्यपि रस से ही सारा काव्य जीवित रहता है, तथापि एकघन चमत्कार रूप भी उस रस के कहीं प्रयोजक अंश से अधिक चमत्कार होता है । वहाँ जब कोई व्यभिचारी भाव उद्रिक्त या निष्पन्न अवस्था को प्राप्त करके अतिशय चमत्कार का प्रयोजक होता है, तब भावध्वनि होता है । जैसे— वह ( उर्वशी ) भले ही कुछ कोप से अन्तर्हित हो जाय पर वह अधिक कुपित नहीं होती, भले ही वह स्वर्ग चली गई हो, फिर भी उसका मन मेरे प्रति भावार्द्र है, मेरे सामने स्थित उसे असुर भी हरण नहीं कर सकते, और वह आँखों के अत्यन्त अविषय हो गई है, यह कैसा प्रकार है ? यहाँ विप्रलम्भ रस के होने पर भी वितर्क नामक व्यभिचारी भाव के चमत्कार से प्रयुक्त अतिशय आस्वाद हो रहा है । व्यभिचारी भावों के तीन धर्म हैं—उदय,