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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

काण्ड ] \hfill छन्द-विधान ( समवृत्तलक्षण ) \hfill ३७५


जगण (।ऽ।) और एक गुरु (ऽ)-से सन्निहित होता है, उसको रुचिरा कहा गया है। इसमें यति चार तथा नौ वर्णोंपर होती है। मत्तमयूर नामक छन्दको मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), यगण (।ऽऽ), सगण (।।ऽ) और एक गुरु (ऽ)-से युक्त माना गया है। इसके प्रत्येक पादमें चार तथा नौ वर्णोंपर यति होती है।

मञ्जुभाषिणी छन्दके प्रत्येक चरणमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) और एक गुरु (ऽ) होता है। सुनन्दिनी नामक छन्दके प्रत्येक चरणमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ) होते ही हैं, किंतु अन्तिम जगणके स्थानपर इसमें मगण (ऽऽऽ) होता है। अन्तमें एक गुरु (ऽ) रहता है और जो छन्द नगण (।।।), नगण (।।।), तगण (ऽऽ।), तगण (ऽऽ।) तथा एक गुरु (ऽ)-से युक्त है, उसका नाम चन्द्रिका है। इसमें सात और छः वर्णोंपर यति होती है। ये तेरह वर्णवाले अतिजगती छन्दके अवान्तर भेद हैं।

मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), नगण (।।।), सगण (।।ऽ) और दो गुरु (ऽ ऽ)-से युक्त छन्दको असम्बाधा कहते हैं, इसमें पाँच और नौ वर्णोंपर यति होती है। जिस छन्दमें नगण (।।।), नगण (।।।), रगण (ऽ।ऽ), सगण (।।ऽ), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ) हो, उसे अपराजिता छन्द कहा गया है। इसमें सात-सात वर्णोंपर यति होती है। यदि प्रत्येक चरणमें नगण (।।।), नगण (।।।), भगण (ऽ।।), नगण (।।।), एक लघु (।) तथा एक गुरु (ऽ) हो, तो उसे प्रहरणकलिका के नामसे जाना जाता है। इसमें भी सात-सात वर्णपर ही यति होती है। वसन्ततिलका छन्दमें सभी चरण क्रमशः तगण (ऽऽ।), भगण (ऽ।।), दो जगण (।ऽ।, ।ऽ।), दो गुरु (ऽऽ)-से युक्त होते हैं। इसीको सिंहोन्नता और उद्धर्षिणी भी कहते हैं। जिस छन्दके प्रत्येक पादमें भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), नगण (।।।) तथा दो गुरु (ऽऽ) हों उसका नाम इन्दुवदना होता है। जिसका प्रत्येक चरण नगण (।।।), रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।), रगण (ऽ।ऽ), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ)-से संयुक्त होता है, उसीको सुकेशी छन्द कहते हैं। यहाँतक चौदह वर्णोंके चरणवाले शर्करी छन्दके अवान्तर भेदोंका वर्णन प्रतिपादित किया गया।

जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें चौदह लघु (चार नगण फिर दो लघु वर्ण) और अन्तमें एक गुरु हो, वह शशिकला छन्द है। इसी छन्दमें जब यति छः और नौ वर्णोंपर हो तो वह स्रक् अर्थात् माला नामक छन्द हो जाता है। जब वह यति आठ एवं सात वर्णोंपर हो तो वह मणिगुणनिकर नामक छन्द बन जाता है। मालिनी छन्द अपने प्रत्येक चरणमें नगण (।।।), नगण (।।।), मगण (ऽऽऽ), यगण (।ऽऽ), यगण (।ऽऽ)-से सन्निहित होता है। इसमें आठ और सात वर्णोंपर यति होती है। प्रभद्रक नामक छन्दके प्रत्येक चरणमें नगण (।।।), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।) और रगण (ऽ।ऽ) होता है। इसमें सात और आठ वर्णोंपर यति होती है। एला नामका छन्द सगण (।।ऽ), यगण (।ऽऽ), नगण (।।।), नगण (।।।) और यगण (।ऽऽ)-से संयुक्त होता है। चित्रलेखा छन्दके प्रत्येक चरणमें मगण (ऽऽऽ), रगण (ऽ।ऽ), मगण (ऽऽऽ), यगण (।ऽऽ) तथा यगण (।ऽऽ) होता है, यति सात और आठ वर्णोंपर होती है। यहाँतक पंद्रह वर्णोंके चरणवाले अतिशर्करी छन्दके अवान्तर भेदोंका वर्णन बताया गया है।

जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें भगण (ऽ।।),

३७६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।), नगण (।।।), नगण (।।।) तथा एक गुरु (ऽ) होता है और जिसमें सात तथा नौ वर्णोंपर यति हो तो उसे वृषभगजजृम्भित छन्द कहते हैं। जिसके सभी चरणोंमें नगण (।।।), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) और एक गुरु (ऽ) हो, उसका नाम वाणिनी छन्द है। यति चरणकी समाप्तिपर होती है। पिङ्गलद्वारा इन दोनों छन्दोंको अष्टि श्रेणीके छन्दके अन्तर्गत स्वीकार किया गया है।

यगण (।ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), नगण (।।।), सगण (।।ऽ), भगण (ऽ।।), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ)-से संयुक्त चरणवाले छन्दका नाम शिखरिणी है। इसमें यति छः तथा ग्यारह वर्णोंपर होती है। पृथ्वी छन्दके प्रत्येक चरणमें जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), यगण (।ऽऽ), एक लघु (।) तथा एक गुरु (ऽ) होता है। इसकी यति आठ और नौ वर्णोंपर होती है। जिस छन्दके चरण भगण (ऽ।।), रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।), नगण (।।।), भगण (ऽ।।), एक लघु (।) तथा एक गुरु (ऽ)-से संयुक्त होते हैं और जिनमें दस एवं सात वर्णोंपर यति होती है, उसे वंशपत्रपतित कहा गया है।

हरिणी छन्द नगण (।।।), सगण (।।ऽ), मगण (ऽऽऽ), रगण (ऽ।ऽ), सगण (।।ऽ), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ)-से संसृष्ट होता है। इसमें यति क्रमशः छः, चार तथा सात वर्णोंपर होती है। मगण (ऽऽऽ), भगण (ऽ।।), नगण (।।।), तगण (ऽऽ।), तगण (ऽऽ।), दो गुरु (ऽऽ)-से युक्त चरणोंवाले छन्दको मन्दाक्रान्ता कहते हैं। इसमें चार, छः और सात वर्णोंपर यति होती है। नर्द्दटक छन्द नगण (।।।), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।), जगण (।ऽ।), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ)-से संयुक्त होता है। इसमें यति सात और दस वर्णोंपर होती है। यदि यही यति सात, छः और चार वर्णोंपर हो तो छन्दका नाम कोकिलक हो जाता है। शिखरिणीसे कोकिलकतक इन छन्दोंको सत्रह वर्णोंवाले अत्यष्टि छन्द-वर्गमें समझना चाहिये।

जिस छन्दमें मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), नगण (।।।), यगण (।ऽऽ), यगण (।ऽऽ), यगण (।ऽऽ) होता है और पाँच, छः तथा सात वर्णोंपर यति होती है, उसको कुसुमितलता छन्द कहते हैं। इसे अठारह अक्षरोंके चरणवाले धृति छन्दका अवान्तर भेद कहा गया है।

यगण (।ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), नगण (।।।), सगण (।।ऽ), रगण (ऽ।ऽ), रगण (ऽ।ऽ) और एक गुरु (ऽ)-से युक्त छन्दका नाम मेघविस्फूर्जिता है। इसमें छः, छः और सात वर्णोंपर यति होती है। शार्दूलविक्रीडित नामक जो छन्द है, उसके प्रत्येक चरणमें मगण (ऽऽऽ), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), दो तगण (ऽऽ।, ऽऽ।) तथा एक गुरु (ऽ) होता है। इसमें बारह और सात वर्णोंपर यतिका विधान है। ये दोनों उन्नीस वर्णोंके चरणवाले अतिधृति छन्द-वर्गके भेद कहे गये हैं।

इसके बाद बीस वर्णोंके चरणवाले कृति नामवाले छन्दोंका निरूपण किया जा रहा है—

जिसके प्रत्येक चरणमें भगण (ऽ।।), रगण (ऽ।ऽ), मगण (ऽऽऽ), नगण (।।।), यगण (।ऽऽ), भगण (ऽ।।), एक लघु (।), एक गुरु (ऽ) होता है और क्रमशः सात, सात तथा छः वर्णोंपर यति होती है, उसे सुवदना छन्द कहते हैं। जिसके प्रत्येक पादमें रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), एक लघु (।), एक गुरु (ऽ) हो और

काण्ड ] छन्द-विधान (समवृत्तलक्षण) ३७७


पादान्तमें यति होती हो, उसे वृत्त छन्द कहते हैं।

जिस छन्दमें मगण (SSS), रगण (S।S), भगण (SII), नगण ( । । ।), यगण ( । SS), यगण ( । SS), यगण ( । SS) हो और प्रत्येक चरणमें सात-सात वर्णोंपर यति होती हो, वह स्रग्धरा छन्द है। प्रत्येक चरणमें इक्कीस वर्णोंवाले इस छन्दको प्रकृति वर्गका छन्द माना गया है।

जिसके सभी पाद क्रमशः भगण (SII), रगण (S।S), नगण ( । । ।), रगण (S।S), नगण ( । । ।), रगण (S।S), नगण ( । । ।) तथा एक गुरु (S)-से संयुक्त हों और उनमें दस तथा बारह वर्णोंपर यति हो, उसे सुभद्रक छन्द कहते हैं। यह बाईस वर्णोंवाले आकृति छन्दके अन्तर्गत है।

जो नगण ( । । ।), जगण ( । S ।), भगण (SII), जगण ( । S ।), भगण (SII), जगण ( । S ।), भगण (SII), एक लघु ( । ) तथा एक गुरु (S)-से युक्त छन्द हो और उसमें ग्यारह तथा बारह वर्णोंपर यति हो, उसका नाम अश्वललित है। इसे अन्य ग्रन्थोंमें अद्रितनया भी कहा गया है। जिस छन्दमें मगण (SSS), मगण (SSS), तगण (SSI), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), एक लघु ( । ) तथा एक गुरु (S) होता है और जिसमें आठ, पाँच तथा दस वर्णोंपर यति होती है, उसको मत्ताक्रीड कहा जाता है। ये दोनों छन्द तेईस वर्णोंवाले विकृति छन्द-वर्गके अन्तर्गत हैं।

जिस छन्दका प्रत्येक पाद भगण (SII), तगण (SSI), नगण ( । । ।), सगण ( । । S), भगण (SII), भगण (SII), नगण ( । । ।), यगण ( । SS)-से संयुक्त होता है और उसमें पाँच, सात तथा बारह वर्णोंपर यति होती है, उसको तन्वी छन्द कहते हैं। यह तन्वी छन्द चौबीस वर्णोंके चरणवाले संकृति छन्द-वर्गका अवान्तर भेद है।

क्रौञ्चपदा नामका जो छन्द है, उस छन्दमें भगण (SII), मगण (SSS), सगण ( । । S), भगण (SII) एवं नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), एक गुरु (S) होता है और पाँच-पाँच, आठ तथा सात वर्णोंपर यति होती है। यह पच्चीस वर्णोंवाले अतिकृति छन्दके अन्तर्गत है।

अब छब्बीस वर्णोंवाले उत्कृति वर्गके छन्दको कहा जा रहा है, आप उसे सुनें—

जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें मगण (SSS), मगण (SSS), तगण (SSI), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), रगण (S।S) तथा सगण ( । । S) हों और आठ, ग्यारह एवं सात वर्णोंपर यति होती है, उसे भुजङ्गविजृम्भित कहते हैं। यह छब्बीस वर्णवाले उत्कृति छन्द-वर्गका एक भेद है।

जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें एक मगण (SSS), छह नगण ( । । ।, । । ।, । । ।, । । ।, । । ।, । । ।), एक सगण ( । । S) और दो गुरु (SS) हों, साथ ही नौ, छः-छः तथा पाँच वर्णोंपर यति हो तो उसको अपहाव कहते हैं। यह उत्कृति वर्गका ही दूसरा भेद है।

जिसके प्रत्येक चरणमें दो नगण ( । । ।, । । ।) और सात रगण (S।S, S।S, S।S, S।S, S।S, S।S, S।S) हों तो उसका नाम चण्डवृत्तप्रपात छन्द है। उसे दण्डक* भी कहा जाता है। यदि इस छन्दमें दो नगणको छोड़कर शेष रगण वर्णोंके साथ क्रमशः एक और दो अन्य रगण पदोंकी वृद्धि हो तो उसीसे व्याल और जीमूत आदि नामवाले दण्डक छन्द बनते हैं।

(अध्याय २०९)


* जिन वृत्तोंके प्रत्येक चरणमें सत्ताईस या इससे अधिक वर्ण होते हैं, उनका सामान्य नाम दण्डक है। चण्डवृत्तप्रपात आदि इसीके भेद हैं।

३७८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

छन्द-विधान (अर्द्धसमवृत्त लक्षण)

श्रीसूतजीने कहा—यदि छन्दके विषमपादमें तीन सगण (।।ऽ), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ) वर्ण—इस प्रकार ग्यारह अक्षर हों एवं समपादमें तीन भगण (ऽ।।) और दो गुरु (ऽऽ) हों तो उसे उपचित्रक कहते हैं। जिस छन्दके विषमपादमें तीन भगण (ऽ।।), दो गुरु (ऽऽ) हों और उसके समपादमें एक नगण (।।।), दो जगण (।ऽ।) और एक यगण (।ऽऽ) हो, उसे द्रुतमध्या नामक छन्द माना गया है। जिस छन्दके विषम-पादमें तीन सगण (।।ऽ), एक गुरु और समपादमें तीन भगण (ऽ।।) एवं दो गुरु (ऽऽ) होते हैं, उसका नाम वेगवती है। जिस छन्दके विषमपादमें एक तगण (ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।), एक रगण (ऽ।ऽ), एक गुरु (ऽ) हो और समपादमें एक मगण (ऽऽऽ), एक सगण (।।ऽ), एक जगण (।ऽ।) तथा दो गुरु (ऽऽ) हों, वह भद्रविराट् नामक छन्द होता है।

यदि विषमपादमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), एक गुरु (ऽ) तथा समपादमें भगण (ऽ।।), रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।) और दो गुरु (ऽऽ) हों तो उस छन्दको केतुमती कहा जाता है। जिस छन्दके विषमपादमें दो तगण (ऽऽ।, ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।) और दो गुरु (ऽऽ) तथा समपादमें जगण (।ऽ।), तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।) एवं दो गुरु (ऽऽ) होते हैं, उसको आख्यानिकी कहते हैं। यदि विषमपादमें जगण (।ऽ।), तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।) और दो गुरु (ऽऽ) तथा समपादमें दो तगण (ऽऽ।, ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।) एवं दो गुरु (ऽऽ) हों तो उसे विपरीताख्यानक छन्द कहा जाता है। ऐसा पिङ्गल मुनिका अभिमत है।

जब छन्दके विषमपादमें दो नगण (।।।, ।।।), एक रगण (ऽ।ऽ), एक यगण (।ऽऽ) और समपादमें एक नगण (।।।) दो जगण (।ऽ।, ।ऽ।), एक रगण (ऽ।ऽ) तथा एक गुरु (ऽ) होता है तो उसे पुष्पिताग्रा कहते हैं। यदि विषमपादमें रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ), यगण (।ऽऽ) हो और समपादमें जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) तथा एक गुरु (ऽ) हो तो उस छन्दका नाम वाङ्मती है।

(अध्याय २१०)


छन्द-विधान (विषमवृत्तलक्षण)

सूतजीने कहा—जिस छन्दके प्रथम पादमें आठ अक्षर, द्वितीय पादमें बारह अक्षर, तृतीय पादमें सोलह अक्षर तथा चतुर्थ पादमें बीस अक्षर होते हैं, वह पदचतुरूर्ध्व नामक छन्द है, यह इस छन्दका सामान्य लक्षण है। तात्पर्य यह है कि इस छन्दमें अनुष्टुप् छन्दके प्रथम पादके बाद प्रत्येक पादमें क्रमशः चार-चार अक्षर बढ़ते जाते हैं। इसी छन्दके चारों चरणोंमें जब दो अक्षर गुरु (ऽऽ) हों तो उसे आपीड छन्द कहते हैं। अन्तिम अक्षरोंको छोड़कर शेष अक्षर लघु (।) ही होते हैं। पदचतुरूर्ध्व नामक छन्दके प्रथम पादका द्वितीय आदि पादोंके साथ परिवर्तन होनेपर अनेक छन्द बनते हैं, यथा—प्रथम पादमें बारह और द्वितीय पादमें अठारह अक्षर होनेसे जो छन्द बनता है, वह कलिका (मञ्जरी) कहलाता है। इसमें प्रथम पादके स्थानमें द्वितीय पाद और द्वितीय पादके स्थानमें प्रथम पाद हो जाता है। जब प्रथम पाद (आठ अक्षर)-के स्थानमें तृतीय पाद (सोलह अक्षर)

काण्ड ] * छन्द-विधान (विषमवृत्तलक्षण) * ३७९


और तृतीय पादके स्थानमें प्रथम पाद हो तो लवली नामक छन्द होता है। इसी प्रकार जब प्रथम पाद (आठ अक्षर)-के स्थानपर चतुर्थपाद (बीस अक्षर) और चतुर्थपादके स्थानपर प्रथम पाद हो तो उसे अमृतधारा नामक छन्द कहते हैं। यहाँतक पदचतुरूर्ध्व छन्दके अवान्तर भेदोंको बतलाया गया है।

जब प्रथम पादमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ) और एक लघु (।) — इस प्रकार दस अक्षर होते हैं, द्वितीय पादमें नगण (।।।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) और एक गुरु (ऽ) — इस प्रकार दस अक्षर होते हैं, तृतीय पादमें भगण (ऽ।।), नगण (।।।), जगण (।ऽ।), एक लघु (।) तथा एक गुरु (ऽ) — ये ग्यारह अक्षर होते हैं और चतुर्थ पादमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) तथा एक गुरु (ऽ) — इस प्रकार तेरह अक्षर होते हैं तो वह उद्गता नामक छन्द कहलाता है। इसी उद्गता छन्दके तीसरे चरणमें जब रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।), यगण (।ऽऽ) और एक गुरु (ऽ) — इस प्रकार तेरह अक्षर हों और शेष तीन पाद पूर्ववत् अर्थात् उद्गता छन्दके समान ही हों तो सौरभक नामक छन्द होता है। इसी उद्गता छन्दके तीसरे चरणमें जब दो नगण (।।।, ।।।), दो सगण (।।ऽ, ।।ऽ) हों तथा शेष तीनों चरण उद्गताके ही समान हों तो ललित नामक छन्द होता है। ये सब उद्गता छन्दके अवान्तर भेद हैं।

जिसके प्रथम पादमें मगण (ऽऽऽ), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।) और दो गुरु (ऽऽ) — इस प्रकार चौदह अक्षर होते हैं, द्वितीय चरणमें सगण (।।ऽ), नगण (।।।), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) तथा एक गुरु (ऽ) — इस प्रकार तेरह अक्षर होते हैं, तीसरे चरणमें दो नगण (।।।, ।।।) और एक सगण (।।ऽ) — इस प्रकार नौ अक्षर होते हैं तथा चौथे चरणमें तीन नगण (।।।, ।।।, ।।।), एक जगण (।ऽ।) तथा एक यगण (।ऽऽ) — इस प्रकार पन्द्रह अक्षर होते हैं तो ऐसा छन्द उपस्थितप्रचुपित नामवाला छन्द कहलाता है। इसी उपस्थितप्रचुपित छन्दके जब तीन चरण वैसे ही हों, केवल तृतीय चरणमें परिवर्तन हो, अर्थात् उसमें दो नगण (।।।, ।।।), एक सगण (।।ऽ), पुनः दो नगण (।।।, ।।।) तथा एक सगण (।।ऽ) — इस प्रकार अठारह अक्षर हों तो वह वर्धमान नामक छन्द होता है। उसी उपस्थितप्रचुपित नामक छन्दके जब तीन पाद (प्रथम, द्वितीय तथा चतुर्थ) समान हों, किंतु तृतीय पादमें तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।) और रगण (ऽ।ऽ) — इस प्रकार नौ अक्षर हों तो वह आर्षभ नामक छन्द होता है। इसी प्रकार उपस्थितप्रचुपित नामक छन्दका जब पहला पाद वही हो और शेष तीन पादोंमें तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।), तथा रगण (ऽ।ऽ) — इस प्रकार नौ अक्षर हों तो ऐसा छन्द शुद्धविराट् कहलाता है। ये छन्द उपस्थितप्रचुपित नामक छन्दके अवान्तर भेदोंमें आते हैं।

(अध्याय २११)

३८०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

छन्द-विधान (प्रस्तार-निरूपण)

सूतजीने कहा—अब प्रस्तारके* विषयमें बतला रहा हूँ। ऊपरके पादमें आदि अक्षर गुरु हो तथा उसके नीचेके पादमें लघु अक्षर हो, वह एकाक्षर प्रस्तार है। उसके बाद इसी क्रमसे वर्णोंकी स्थापना करे अर्थात् पहले गुरु और उसके नीचे लघु अक्षरकी स्थापना करे, यह द्वयक्षर-प्रस्तार है। प्रस्तारके अनन्तर नष्टका निरूपण इस प्रकार है—नष्ट संख्याको आधी करनेपर जब वह दो भागोंमें बराबर बँट जाय तब एक लघु लिखना चाहिये, यदि आधा करनेपर विषम संख्या प्राप्त हो तो उसमें एक जोड़कर सम बना ले और इस प्रकार पुनः आधा करे। ऐसी अवस्थामें एक गुरु अक्षरकी प्राप्ति होती है, उसे भी अन्यत्र लिख ले। जितने अक्षरवाले छन्दके भेदको जानना हो, उतने अक्षरोंकी पूर्ति होनेतक पूर्वोक्त प्रणालीसे गुरु-लघुका उल्लेख करता रहे।

अब उद्दिष्टके विषयमें बतलाया जा रहा है—उद्दिष्टकी प्रक्रिया जाननेके लिये छन्दके गुरु-लघु क्रमशः एक पंक्तिमें लिखकर उनके ऊपर क्रमशः एकसे लेकर दूने-दूने अङ्क रखता जाय अर्थात् प्रथम अक्षरपर एक, द्वितीयपर दो, तृतीयपर तीन—इस क्रमसे संख्या होगी। बिना प्रस्तारके ही वृत्त-संख्या जाननेके उपायको संख्या कहते हैं। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है—जितने अक्षरके छन्दकी संख्या जाननी हो, उसका आधा भाग निकालनेसे दोकी उपलब्धि होगी। उसे अलग रख ले। विषम संख्यामें एक घटाकर शून्यकी प्राप्ति होगी, उसे दोके नीचे रखकर शून्यके स्थानमें दुगुना करे, इससे प्राप्त हुए अङ्कको ऊपरके अर्धस्थानमें रखे और उतनेसे ही गुणा करे।

एकद्वयादिलगक्रियाकी सिद्धिके लिये मेरुप्रस्तारको बतलाया जा रहा है। किसी छन्दमें कितने लघु, कितने गुरु तथा एकाक्षरादि छन्दोंके कितने वृत्त होते हैं, इसका ज्ञान मेरुप्रस्तारसे होता है। मेरुप्रस्तारमें नीचेसे ऊपरकी ओर आधा-आधा अंगुल विस्तार कम होता जाता है। छन्दकी संख्याको दूनी करके एक-एक घटा दिया जाय तो उतने ही अंगुलका उसका अध्वा (प्रस्तारदेश) होता है। इस प्रकार छन्दःशास्त्रका सार बतलाया गया।

(अध्याय २१२)


सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण

सूतजीने कहा—हे शौनक! श्रीहरिसे सुनकर ब्रह्माजीने व्याससे सब कुछ देनेवाले ब्राह्मणादि वर्णोंके सदाचारको जैसे कहा है, उसी प्रकार मैं कहता हूँ।

श्रुति (वेद) और स्मृति (धर्मशास्त्र)-का भली प्रकारसे अध्ययन करके श्रुतिप्रतिपादित कर्मका पालन करना चाहिये। (क्योंकि श्रुति ही सब कर्मोंका मूल है।) यदि (उपलब्ध) श्रुतियोंमें कोई कर्म ज्ञात नहीं हो रहा है तो उसको स्मृतिशास्त्रके अनुसार जानकर करना चाहिये (क्योंकि स्मृतिशास्त्र भी श्रुतिमूलक होनेके कारण ही कर्मके बोधमें प्रमाण माने जाते हैं) और स्मार्तधर्मके पालनमें असमर्थ होनेपर विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि वह सदाचारका पालन करे। कर्ममार्गका दर्शन करानेके लिये श्रुति तथा स्मृति—ये नेत्रस्वरूप हैं।


* किस छन्दके कितने भेद हो सकते हैं, सामान्यरूपसे इसका ज्ञान करानेवाली प्रणालीको 'प्रस्तार' कहा जाता है। प्रस्तार, नष्ट, उद्दिष्ट, एकद्वयादिलगक्रिया, संख्या तथा अध्वयोग —ये छः प्रणालियाँ हैं।

काण्ड ] सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण ३८१


श्रुतिमें कहा गया धर्म परम धर्म है। स्मृति और शास्त्रसे प्रतिपादित धर्म अपर धर्म है। इस प्रकार श्रुति, स्मृति और शिष्टाचारसे प्राप्त धर्म— ये तीन प्रकारके सनातनधर्म हैं।

सत्य, दान, दया, निर्लोभता, विद्या, यज्ञ, पूजा और इन्द्रियदमन—ये शिष्टाचारके आठ पवित्र लक्षण कहे गये हैं। पूर्व कालमें लोगोंके शरीर और इन्द्रिय सत्त्वगुणप्रधान एवं तेजोमय होते थे, अतः जिस प्रकार कमलपत्रपर जल नहीं रुकता उसी प्रकारसे उनके शरीर तथा इन्द्रियोंमें पाप नहीं टिक पाते थे।

सत्त्वगुणके विकासके लिये सनातनधर्म (वर्णाश्रम-धर्म, सदाचार आदि)-के पालनका सर्वाधिक महत्त्व है और इनकी प्रमुखता युगविशेष, स्थानविशेष (भारतवर्ष आदि)-की दृष्टिसे निर्धारित होती है, इसी दृष्टिसे यहाँ इतना निरूपण किया जा रहा है। सत्य, यज्ञ, तप तथा दान—ये धर्मके लक्षण हैं। बिना दिये गये द्रव्यको ग्रहण न करना, दान, अध्ययन, जप, विद्या, धन, तपस्या, पवित्रता, श्रेष्ठ कुलमें जन्म, निरोगता और संसारके बन्धनसे मुक्ति आदिके मूलमें धर्मका आचरण ही प्रधान है। धर्मसे सुख तथा तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति होती है और इस तत्त्वज्ञानसे ही मोक्ष प्राप्त होता है।

शास्त्रोंके अनुसार पालन किये जाने योग्य तथा सनातन कालसे चले आ रहे यज्ञ, अध्ययन और दान—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके सामान्य धर्म हैं। यज्ञ कराना, अध्यापन तथा सदाचारवान् विशुद्ध अधिकृत व्यक्तिसे प्रतिग्रह (दान) लेना— ये तीन प्रकारकी वृत्ति (जीविका) मुनियोंने श्रेष्ठ (ब्राह्मण) वर्णके लिये कही है। शस्त्रोपजीवी होना तथा प्राणियोंकी रक्षा करना क्षत्रियवर्णका धर्म है। पशुपालन, कृषिकर्म तथा व्यापार वैश्यवर्णकी वृत्ति कही गयी है। द्विजातिमें भी आनुपूर्वी क्रमसे सेवा करनेका विधान* है। शूद्रका तो एकमात्र कर्तव्य है द्विजातिकी सेवा करना।

गुरुके सान्निध्यमें रहना, अग्निकी शुश्रूषा (अग्निहोत्र) करना तथा स्वाध्याय करना—यह ब्रह्मचारीका धर्म है। वह तीनों संध्याओंमें स्नानकर संध्याकालीन व्रतका पालन करे। स्नानकर्मसे निवृत्त होकर भिक्षाचरण करे। तदनन्तर गुरुके प्रति दत्तचित्त रहकर उनकी ही सेवामें आजीवन लगा रहे। वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी कटिप्रदेशमें मूँजकी मेखला, सिरपर जटा, हाथमें दण्ड धारण करे। वह जटाओंको धारण न करके सिरका मुण्डन भी करा सकता है, किंतु उसको गुरुके आश्रयमें तो रहना ही चाहिये।

अग्निहोत्र-धर्मका पालन तथा कहे गये अपने विहित कर्मोंके अनुसार जीविकाका पालन, पर्वकी रात्रिको छोड़कर अन्य रात्रियोंमें धर्मपत्नीके साथ रति, (यथाशास्त्र) देवता, पितर तथा अतिथिगणोंकी विधिवत् पूजामें अहर्निश संलग्न रहना और श्रुतियों एवं स्मृतियोंमें कहे गये धर्मोंके अनुसार अर्थोपार्जन करना—यह गृहस्थोंका धर्म है।

जटाधारण, अग्निहोत्रका पालन, पृथ्वीपर शयन, मृगचर्मका धारण, वनमें निवास, दूध, मूल, फल तथा नीवारका भक्षण, निषिद्ध कर्मका परित्याग, तीनों संध्याओंमें स्नान, ब्रह्मचर्यका पालन और देवता तथा अतिथिकी पूजा—यह वानप्रस्थीका धर्म है।

सभी प्रकारके आरम्भोंका परित्याग, भिक्षासे प्राप्त अन्नका भोजन, वृक्षकी छायामें निवास, अपरिग्रह, अद्रोह, सभी प्राणियोंमें समानभाव,


*इसका आशय यह है—क्षत्रिय ब्राह्मणकी सेवा करे तथा वैश्य ब्राह्मण और क्षत्रियकी सेवा करे। (वैश्यके द्वारा क्षत्रियकी सेवाकी मर्यादा शास्त्रोंमें निर्धारित है।)

१८८- स्नान तथा संक्षेपमें संध्या-तर्पणकी विधि

३८२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

प्रिय तथा अप्रियकी प्राप्तिमें एवं सुख और दुःखमें समान स्थिति, शरीरकी बाह्य और आभ्यन्तरिक शुद्धता, वाणीमें संयम, परमात्माका ध्यान, सभी इन्द्रियोंका निग्रह, धारणा तथा ध्यानमें तत्परता और भावशुद्धि—ये सभी परिव्राजक अर्थात् संन्यासीके धर्म कहे गये हैं।

अहिंसा, प्रिय और सत्यवचन, पवित्रता, क्षमा तथा दया सभी आश्रमों और वर्णोंका सामान्य धर्म है।* जैसा पूर्वमें कहा गया है उसीके अनुसार शास्त्रविहित अपने-अपने धर्मोंका पालन करनेवाले सभी लोग परमगति अर्थात् मोक्षको प्राप्त करते हैं।

हे शौनक! अब मैं प्रातःकाल जागनेसे लेकर रात्रिमें सोनेतक पालन करने योग्य गृहस्थके धर्मका वर्णन करता हूँ। गृहस्थको ब्राह्ममुहूर्तमें निद्राका परित्याग करके धर्म और अर्थका भली प्रकार चिन्तन करना चाहिये तथा शारीरिक कष्ट, उसकी उत्पत्तिके कारण और वेदोंमें कहे गये तत्त्वार्थका भी विचार करना चाहिये। ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर शौचादिक क्रियाओंसे निवृत्त होकर, स्नान करना चाहिये और निरलस भावसे समाहितचित्त होकर संध्योपासन करना चाहिये। दन्तधावन एवं स्नानके अनन्तर ही प्रातःकालिक संध्योपासन करना चाहिये। दिनमें मूत्र और मलका परित्याग उत्तराभिमुख होकर करे। रात्रिमें दक्षिणाभिमुख होकर करे। दोनों संध्याकालमें दिनके समान ही उत्तराभिमुख होकर मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये। रात्रि और दिनमें छाया अथवा अन्धकारके कारण यदि दिशाविशेषका ज्ञान नहीं हो पा रहा है, अथवा कोई ऐसा भय उपस्थित है, जिसके कारण मरणकी सम्भावना है तो अपनी सुविधाके अनुसार जिस किसी भी दिशामें मुख करके मल-मूत्रका त्याग किया जा सकता है। गोमय, अग्निके दहकते अंगार, दीमककी बाँबी, जुते हुए खेत, जल, पवित्र स्थान, मार्ग और मार्गमें विद्यमान विधानयोग्य वृक्षकी छायामें न तो मूत्रका परित्याग करना चाहिये और न तो मलविसर्जन ही।

शौचके पश्चात् मिट्टीसे हाथ-पैर आदि साफ करनेके लिये जलके अन्दरसे, देवगृह, बाँबी, चूहेके बिल, दूसरेके उपयोगमें आयी हुई मिट्टीसे अवशिष्ट तथा श्मशान भूमिकी मिट्टी ग्रहण न करे। लघुशंका करनेपर लिंगमें एक बार, बायें हाथमें दो बार और दोनों हाथोंमें दो बार मिट्टी लगाकर जलसे प्रक्षालन करनेपर ही शुद्धि होती है। मलका परित्याग करनेपर लिंगमें एक बार, गुदामें तीन बार, बायें हाथमें दस बार तथा दोनों हाथोंमें सात बार, पैरोंमें पाँच बार और दायें हाथमें दस बार मिट्टीका लेप करके उन्हें जलसे स्वच्छ करे। प्रथम बार उपयोगमें लायी जानेवाली मिट्टीकी मात्रा आधा पसर होनी चाहिये। दूसरे और तीसरे बार जो मिट्टी उपयोगमें आती है उसकी मात्रा आधे पसरकी आधी हो जाती है। जो मनुष्य अस्वस्थताके कारण विष्ठा और मूत्रका परित्याग बैठकर नहीं कर सकता है, वह अभी बतायी गयी शास्त्रीय शुद्धिका आधा भागमात्र अपना सकता है। दिनमें विहित शुद्धिका आधा या चौथाई भाग रात्रिमें शुद्धिके लिये धर्मसम्मत है।

यह शुद्धिकी प्रक्रिया स्वस्थ व्यक्तिको लक्ष्य करके कही गयी है। जो व्यक्ति अस्वस्थताके कारण आर्त है, उसको यथासामर्थ्य ही शुद्धिकी प्रक्रिया अपनानी चाहिये। वसा, शुक्र, रक्त, मज्जा, लार, विष्ठा, मूत्र, कानका मैल, कफ, आँसू, आँखका मैल (कीचड़) और पसीना—ये मनुष्यके शरीरके बारह मल हैं। जबतक मनमें शुद्धताकी अवधारणा न हो जाय, तबतक इनके कारण अनुभवमें आनेवाली


* अहिंसा सूनृता वाणी सत्यशौचे क्षमा दया। वर्णिनां लिंगिनां चैव सामान्यो धर्म उच्यते॥ ( २१३। २२)

काण्ड ]
सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण
३८३


अशुद्धिके निराकरणमें लगे रहना चाहिये। यहाँपर शुद्धिकी संख्याका जो प्रमाण दिया गया है, वह श्रुतियों और स्मृतियोंके आदेशानुसार है।

शुद्धि दो प्रकारकी है—एक बाह्य और दूसरी आभ्यन्तरिक। मिट्टी तथा जलसे की जानेवाली शुद्धि बाह्य और भावोंकी शुद्धि ही आभ्यन्तरिक शुद्धि मानी गयी है। शुद्धिका प्रमुख अङ्ग आचमन है, यह तीन बार करना चाहिये। इसके बाद दो बार जलसे मुखका मार्जन, तदनन्तर अंगुष्ठके मूलसे मुखको धोकर तीन बार मुखका स्पर्श करना चाहिये। इसके बाद अंगुष्ठ और तर्जनीसे नासिकाका स्पर्शकर अंगुष्ठ तथा अनामिकासे नेत्र और कानका स्पर्श करना चाहिये। तत्पश्चात् कनिष्ठा और अंगुष्ठके द्वारा नाभिका स्पर्शकर हथेलीसे हृदयका स्पर्श करना चाहिये। इसके बाद अपनी सभी अंगुलियोंसे सिर और उनके (अंगुलियोंके) अग्रभागसे दोनों बाहुओंका स्पर्श करना चाहिये।

(अब आचमन तथा अंगोंके स्पर्शका फल बताया जाता है।) तीन बार जलका आचमन करके ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद—इन तीनों वेदोंको प्रसन्न करना चाहिये। पहले दो बार मुखका प्रक्षालन करनेसे अथर्वा (वेदविद् ब्राह्मण) और आङ्गिरस (बृहस्पति)-का मुखमें सन्निधान होता है। मुखभागका स्पर्श करनेपर आकाश, नासिका-भागका स्पर्श करनेपर वायु, नेत्रभागका स्पर्श करनेपर सूर्य, कानोंका स्पर्श करनेपर सभी दिशाओंका स्पर्श समझना चाहिये।* मुख तथा नासिका आदिका यथाविधि स्पर्श करनेसे इन अङ्गोंमें यथाक्रम इतिहास, पुराण एवं वेदाङ्ग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष) प्रतिष्ठित होते हैं। नाभिप्रदेशका स्पर्शकर प्राणग्रन्थिका और हृदयभागका स्पर्शकर ब्रह्माका स्पर्श समझना चाहिये। मूर्धाके स्पर्शसे रुद्र और शिखाके स्पर्शसे ऋषियोंको प्रसन्न किया जाता है। दोनों बाहुओंको स्पर्श करके यम, इन्द्र, वरुण, कुबेर, पृथिवी तथा अग्निदेवके सान्निध्यका लाभ प्राप्त होता है। अपने दोनों चरणोंमें जलका अभ्युक्षण भगवान् विष्णु और इन्द्र तथा दोनों हाथोंका प्रोक्षण करनेसे भगवान् विष्णुदेवका सांनिध्य प्राप्त होता है।

धार्मिक विधिके अनुसार पृथिवीका जलसे प्रोक्षण करनेसे वासुकि आदि नाग प्रसन्न होते हैं। धार्मिक विधिके मध्यमें जलका शास्त्रीय उपयोग करते समय उसके बिन्दुओंके गिरनेसे भूतोंके समूह तृप्ति प्राप्तकर प्रसन्न होते हैं। अंगुलियोंके पर्वोंपर अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र और पर्वतसमूह निवास करते हैं। द्विजके हाथोंमें जो रेखाएँ होती हैं, उनमें गङ्गा आदि पवित्र नदियाँ स्थित रहती हैं। हाथके तलभागमें सभी तीर्थोंके साथ सोमका निवास है। इसीलिये हाथको पवित्र माना जाता है।

उषाकाल (सूर्योदयसे पूर्व रात्रिशेष) होनेपर यथाविधि शौच-क्रिया करनी चाहिये। तदनन्तर दन्तधावन (दतुअन) करके स्नान करे। मुखके पर्युषित (बासी) रहनेपर मनुष्य निश्चित ही अपवित्र रहता है। अतः मनुष्यको प्रातःकाल अवश्य ही दन्तधावन करना चाहिये। दन्तधावनके लिये कदम्ब, बिल्व, खैर, कनेर, बरगद, अर्जुन, यूथी, वृहती, जाती, करंज, अर्क, अतिमुक्तक, जामुन, महुआ, अपामार्ग (चिचड़ा—लटजीरा), शिरीष, गूलर, बाण तथा दूधवाले और कँटीले अन्य वृक्ष प्रशस्त होते हैं। कडुवे, तीते तथा कसैले काष्ठके जो वृक्ष हैं, उनकी दतुअन धन-धान्य, आरोग्य और सुखसे सम्पन्न करनेवाली होती है। पवित्र स्थानमें मनुष्य ऐसे वृक्षोंकी दतुअनको लेकर सबसे पहले उसको जलसे धो डाले। उसको दाँतोंसे चबा-चबाकर मुख


* मुख और नासिका आदिमें यथाक्रम आकाश तथा वायु आदिके अधिष्ठाता देवता सन्निहित हैं।

१८९- तर्पण-विधिको वर्णन

३८४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

साफ करे और अवशिष्ट दतुअनको किसी एकान्त स्थानमें छोड़ दे। तदनन्तर भली प्रकारसे आचमनकर मुखशोधन करे। अमावास्या, षष्ठी, नवमी, प्रतिपदा तिथि तथा रविवारके दिन दतुअन नहीं करनी चाहिये; क्योंकि ये सभी दिन इस कार्यके लिये निषिद्ध माने गये हैं। दतुअनके न होनेपर तथा निषिद्ध तिथिके आ जानेपर मनुष्यको बारह कुल्ला जलके द्वारा मुखको पवित्र कर लेना चाहिये।

दृष्ट और अदृष्ट दोनों प्रकारका हित-सम्पादन होनेके कारण प्रातःकालके स्नानकी प्रशंसा की गयी है। जो व्यक्ति शुद्धात्मा है, जो प्रातःकाल स्नान करता है, वह जपादिक समस्त (ऐहिक और पारलौकिक सुख प्रदान करनेवाली) क्रियाओंको सम्पन्न करनेका अधिकारी है। शरीर अत्यन्त मलिन है। उसमें स्थित नवछिद्रोंसे सदैव मल निकलता ही रहता है। अतः प्रातःकालका स्नान शरीरकी शुद्धिका हेतु, मनको प्रसन्न रखनेवाला तथा रूप और सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला है। यह शोक और दुःखका विनाशक है। अतः मनुष्य प्रातःकाल गङ्गास्नानके समान ही स्नानकी क्रिया सम्पन्न करे। ज्येष्ठमासके शुक्लपक्षकी हस्त नक्षत्रसे युक्त दशमी तिथिमें दस पापोंको हरण करनेकी सामर्थ्य है। इस पुण्यतिथिमें स्नान करनेसे 'दान न देनेका पाप, विरुद्ध आचरण, हिंसा, परदारोपसेवन, कटु और झूठ भाषण, चुगलखोरी, असम्बद्ध प्रलाप, परद्रव्यापहरण और मनसे अनिष्टचिन्तन करनेसे होनेवाला पाप—इन पापोंके विनाशके लिये आज मैं गङ्गा-स्नान कर रहा हूँ'—यह संकल्प लेकर मनुष्य प्रातःकाल स्नान करे। वानप्रस्थी तथा गृहस्थको प्रातःकाल संक्षिप्त स्नान करना चाहिये। संन्यासीके लिये दिनकी तीनों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) संध्याओंमें स्नान करना अपेक्षित है। ब्रह्मचारीको सकृत्<sup></sup> स्नान करना चाहिये। आचमन करके, तीर्थोंका आवाहन करके, अव्यय भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिये।

शास्त्रोंमें तीन करोड़ मन्देह नामक राक्षस माने गये हैं। वे दुरात्मा राक्षस सदैव प्रातःकाल उदित हो रहे सूर्यदेवको खा जानेकी इच्छा करते हैं। अतः (सूर्योदयसे पूर्व) स्नान करके संध्योपासनकर्म नहीं करना सूर्यदेवका ही घातक है। जो लोग यथाविधि स्नानकर यथाधिकार संध्योपासन करते हैं, वे मन्त्रसे पवित्र किये गये अनलरूपी अर्घ्य (जल)-से उन मन्देह राक्षसोंको जला देते हैं।

दिन और रात्रिका जो संधिकाल है, वही संध्याकाल (४५ मिनट) होता है। यह संध्याकाल सूर्योदयसे पूर्व दो घड़ीपर्यन्त रहता है। संध्या-कर्मके समाप्त हो जानेपर यथाधिकार स्वयं हवन-कार्य करना चाहिये। स्वयं हवन करनेसे जितना फल प्राप्त होता है, उतना अन्य किसीके द्वारा करानेसे नहीं होता। ऋत्विक्, पुत्र, गुरु, भाई, भाँजा और दामादके द्वारा यह कार्य हो सकता है। क्योंकि उन लोगोंके द्वारा किया गया हवन, स्वयंका ही माना गया है।

गार्हपत्य-अग्निको ब्रह्मा, दक्षिणाग्निको शिव और आहवनीय-अग्निको विष्णु तथा कुमार<sup></sup>को सत्यस्वरूप कहा जाता है। यथोचित समयपर हवन करके सूर्यमन्त्रका जप करना चाहिये। तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर सावित्री और प्रणव (ॐकार)-मन्त्रका जप करना चाहिये। प्रणव, सप्त-व्याहृति


<sup></sup>सकृत् स्नानका तात्पर्य है—दण्डवत् स्नान। अर्थात् जैसे दण्ड जलमें डालकर निकाल लिया जाता है, वैसे ही स्नान करना चाहिये। गृहस्थकी तरह सुखपूर्वक स्नान नहीं करना चाहिये। सायं, प्रातः अवश्य करणीय अग्निहोत्र आदिके लिये दोनों समय (सायं-प्रातः) स्नानका विधान ब्रह्मचारीके लिये है। (मनु० २। १७६ कुल्लूक भट्टकी टीका)
<sup></sup>यहाँ कुमारका अर्थ हवनकर्ता (ब्रह्मचारी)-को समझना चाहिये।

१९०- बलिवैश्वदेवनिरूपण

काण्ड ] | सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण | ३८५

और त्रिपदा सावित्री मन्त्रका निरन्तर यथासमय नियतरूपसे जप करनेसे संसारमें किसी भी प्रकारका भय नहीं रहता है। जो उपासक प्रातःकाल उठकर नित्य गायत्री-मन्त्रका जप करता है, वह कमलपत्रकी भाँति पापसे संलिप्त नहीं होता। (देवी गायत्रीका स्वरूप इस प्रकार है—)

श्वेतवर्णा समुद्दिष्टा कौशेयवसना तथा।
अक्षसूत्रधरा देवी पद्मासनगता शुभा॥ (२१३। ७०)

अर्थात् गायत्रीदेवी श्वेतवर्णवाली हैं, कौशेय (रेशमी)-वस्त्र तथा अक्ष (माला) एवं सूत्र (यज्ञसूत्र—यज्ञोपवीत)-से विभूषित होकर सुन्दर पद्मासनपर विराजमान रहती हैं। इसी रूपमें विधिवत् ध्यान करके 'तेजोसि०'<sup></sup> इस यजुर्वेदके मन्त्रसे आवाहनकर गायत्रीदेवीकी उपासना करनी चाहिये। प्राचीनकालमें देववर्ग तथा मन्त्रोंका साक्षात्कार करनेकी इच्छा रखनेवाले ऋषिगण यजुर्वेदके इसी मन्त्रका प्रयोग करते थे। अतः सूर्यमण्डलके मध्य विराजमान तथा ब्रह्मलोकमें भी निवास करनेवाली देवीका आवाहन करके गायत्री-मन्त्रका जप करना चाहिये। तत्पश्चात् नमस्कार करके उनका (गायत्रीदेवीका) विसर्जन करना चाहिये। पूर्वाह्नकालमें देवताओंका पूजन करना चाहिये। भगवान् विष्णुसे बढ़कर अन्य कोई देव नहीं है। अतएव साधकको सदैव उनकी पूजा करनी चाहिये। विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन देवोंके प्रति पृथक्-भाव (भेदबुद्धि) न रखे।

इस संसारमें आठ मङ्गल हैं—ब्राह्मण, गौ, अग्नि, हिरण्य (सोना), घृत, सूर्य, जल और राजा। सदैव इनका दर्शन एवं पूजन करना चाहिये और यथासम्भव इन्हें अपने दाहिने करके ही चलना चाहिये। ब्राह्मण पहले वेदका अध्ययन करे, उसके बाद चिन्तन, अभ्यास तथा जप करके उसका दान शिष्योंको दे, अर्थात् अपने शिष्योंको वेदाध्ययन कराये। वेदाभ्यासका यही पाँच प्रकार है।

वेदार्थ, यज्ञकर्मप्रतिपादक शास्त्र और धर्मशास्त्रकी पुस्तकोंका पारिश्रमिक देकर जो लेखनकार्य कराता है और उसे योग्य अधिकारीको प्रदान करता है, वह वैदिक (वेदमें उक्त) लोकको प्राप्त करता है। जो इतिहास-पुराणके ग्रन्थोंको लिखकर दान देता है, वह ब्रह्म (वेद)-दानसे होनेवाले पुण्यका दुगुना पुण्य प्राप्त करता है।

दिनके तीसरे भागमें अपने पोष्य वर्गके प्रयोजनको पूर्ण करना चाहिये। माता, पिता, गुरु, भ्राता, प्रजा, दीन, दुःखी, आश्रितजन, अभ्यागत<sup></sup>, अतिथि<sup></sup> और अग्नि—ये पोष्य वर्ग कहे गये हैं। पोष्य वर्गका भरण-पोषण करना स्वर्गका प्रशस्त साधन है। अतः मनुष्यको पोष्य वर्गका पालन-पोषण प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। इस संसारमें उसी व्यक्तिका जीवन श्रेष्ठ है, जो बहुतोंके जीवनका साधक बनता है। अर्थात् बहुतोंका पालन-पोषण करता है। जो मात्र अपने भरण-पोषणमें लगे रहते हैं, वे जीवित रहते हुए भी मरे हुएके समान हैं; क्योंकि अपना पेटपालन तो कुत्ता भी करता है।<sup></sup>


१-तेजोऽसि तेजो मयि धेहि वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि बलमसि बलं मयि धेह्योजोऽस्योजो मयि धेहि मन्युरसि मन्युं मयि धेहि सहोऽसि सहो मयि धेहि॥ (शु०यजु० १९।९)
२-जो अकस्मात् अपने घर आ जाय वह अभ्यागत है।
३-अतिथि उस सन्तको कहते हैं जो तिथि, पर्व, उत्सव आदिका विवेक नहीं करता है और सदा चलता ही रहता है। यहाँ यमका वचन द्रष्टव्य है—तिथि पर्वोत्सवाः सर्वे त्यक्ता येन महात्मना। सोऽतिथिः सर्वभूतानां शेषानभ्यागतान् विदुः॥
४-माता पिता गुरुर्भ्राता प्रजा दीनाः समाश्रिताः॥
अभ्यागतोऽतिथिश्चाग्निः पोष्यवर्गा उदाहृताः। भरणं पोष्यवर्गस्य प्रशस्तं स्वर्गसाधनम्॥
भरणं पोष्यवर्गस्य तस्माद्यत्नेन कारयेत्। स जीवति वरश्चैको बहुभिर्योपजीव्यति॥
जीवन्तो मृतकास्त्वन्ये पुरुषाः स्वोदरम्भराः। स्वकीयोदरपूर्तिश्च कुक्कुरस्यापि विद्यते॥ (२१३। ७९–८२)

१९१- संध्याविधि

३८६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

व्यवहारमें अर्थका महत्त्व है। जैसे नदियोंके मूल पर्वत हैं, वैसे ही समस्त कार्योंका मूल अर्थ है; इसीलिये अर्थको उत्पन्न करना एवं बढ़ाना आवश्यक होता है। अर्थ उसे ही कहते हैं, जो हमारे सभी कार्योंकी सम्पन्नतामें अनिवार्यरूपसे उपयोगी हो। इसी दृष्टिसे सभी रत्नोंकी निधि पृथ्वी, धान्य, पशु, स्त्रियाँ आदि अर्थ माने जाते हैं। इस तरह अर्थका महत्त्व होनेपर भी इसके अर्जनमें संयम आवश्यक है; अतएव विशेषकर ब्राह्मणको अपनी जीविकाके लिये अर्थार्जन करते समय यह ध्यानमें रखना चाहिये कि यदि आपत्तिकाल नहीं है तो किसी भी प्राणीके साथ द्रोह न करना पड़े अथवा कम-से-कम द्रोह करना पड़े।

धन तीन प्रकारका माना गया है—शुक्ल, शबल (मिश्रित) और कृष्ण। उस धनके सात विभाग हैं। सभी वर्णोंको प्राप्त होनेवाला धन तीन प्रकारका होता है—१-दायभागके अनुसार वंशपरम्परासे यथाधिकार प्राप्त धन, २-प्रेमके कारण किसीके द्वारा दिया गया धन और ३-यथाविधि विवाहित पत्नीके साथ प्राप्त धन। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणके लिये तीन प्रकारके विशेष धन हैं— याजन (यज्ञ करानेसे प्राप्त), अध्यापनसे प्राप्त तथा विशुद्ध प्रतिग्रह (सत्पात्रसे लिया गया दान)। क्षत्रिय वर्णका विशेष धन भी तीन प्रकारका कहा गया है—करसे प्राप्त धन उसका पहला धन है, दूसरा धन दण्डद्वारा प्राप्त तथा तीसरा धन वह है जो विजयद्वारा प्राप्त हो। वैश्यका भी तीन प्रकारका विशेष धन है—खेतीसे प्राप्त, गोपालनसे प्राप्त तथा व्यापारसे प्राप्त। शूद्रका विशेष धन एक ही प्रकारका है, जो उपर्युक्त वर्णोंकी कृपासे उसको प्राप्त होता है। आपत्तिकालमें ब्राह्मण एवं क्षत्रिय स्वयं ब्याजसे, खेतीसे तथा व्यापारसे धन अर्जित कर सकते हैं, आपत्तिकालमें ऐसा करनेपर पाप नहीं होता है।

ऋषियोंके द्वारा जीवनयापनके लिये बहुत-से उपाय बताये गये हैं, उनमें कुसीद (ब्याज) सभी वर्णोंके लिये बताये गये विशेष उपायोंकी अपेक्षा अधिक है। अनावृष्टि, राजभय तथा चूहा आदि जीव-जन्तुओंके उपद्रवोंसे कृषि आदिमें बाधा आ जाती है, किंतु कुसीद-वृत्तिमें यह बाधा नहीं आती। शुक्लपक्ष हो, कृष्णपक्ष हो, रात्रि हो, दिन हो, गर्मी हो, वर्षा अथवा शीत हो—सभी दशाओंमें कुसीदसे होनेवाली धनवृद्धि रुकती नहीं है। अर्थात् सूदपर दिया गया धन बढ़ता ही रहता है। नाना प्रकारके व्यापारिक कार्योंमें संलग्न वणिक्-जनोंकी जो धनकी अभिवृद्धि दूसरे देशमें जानेसे होती है, वही अभिवृद्धि कुसीद-वृत्ति करनेसे घरमें बैठे-ही-बैठे प्राप्त हो जाती है।

शास्त्रसम्मत विधिसे अर्जित धनके लाभांशसे सभी लोगोंको पितृगण, देवगण तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। ये संतुष्ट होकर धन-अर्जनमें अज्ञानवश हुए दोषको निःसंदेह शान्त कर देते हैं। जो वणिक् ब्याजके द्वारा (धनार्जनके लिये) वस्त्र, गौ तथा स्वर्णादि देता है और जो किसान अन्न, पेय पदार्थ, सवारी, शय्या तथा आसन आदि (ब्याज-वृत्तिमें) देता है, वह (उपार्जित धनका) बीसवाँ भाग और पशु-स्वर्णादिका १००वाँ भाग राजाको देकर शेष बचे हुए धनके चतुर्थांशसे जौ (यव) आदि विभिन्न वस्तुओंका सञ्चय करे। दो-चौथाई अर्थात् आधे धनका उपयोग अपने भरण-पोषण तथा नित्य-नैमित्तिक कार्यके लिये होना चाहिये। जो एक-चौथाई धन शेष बचे, उसका उपयोग मूलधनकी वृद्धिमें करना चाहिये।

विद्या, शिल्प, वेतन, सेवा, गोरक्षा, व्यापार, कृषि, वृत्ति*, भिक्षा और ब्याज—ये दस जीवनयापनके


* वृत्ति—सहायताके रूपमें प्रतिमास दी जानेवाली धनराशि।

काण्ड ] सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण ३८७

साधन हैं। ब्राह्मणको सत्पात्र व्यक्तिसे दानरूपमें प्राप्त धनसे अपना निर्वाह करना चाहिये। क्षत्रिय वर्ण अपने शस्त्रास्त्रोंसे धनार्जन करे। वैश्य वर्ण न्यायोचित ढंगसे धनसंग्रह कर अपना कार्य पूर्ण करे और शूद्र सेवा-भावसे धन अर्जितकर अपने सभी कार्योंको सम्पन्न करे। प्रचुर जलराशिसे परिपूर्ण नदी, शाक, मृत्तिका, समिधा, कुश, पलाश, केला आदिके पत्र, अग्निदेवकी आराधनाके उपकरण और ब्रह्मघोष (स्वाध्याय)—ये ब्राह्मणोंके श्रेष्ठतम धन हैं। यदि अयाचित (स्वतःप्राप्त) धनको ब्राह्मण स्वीकार करे तो दोष नहीं है। देवताओोंने ऐसे धनको अमृतके समान कहा है। अतः बिना याचना किये ही आये धनका परित्याग ब्राह्मणको नहीं करना चाहिये।

गुरुके धनका उद्धार करनेकी इच्छासे देवता और अतिथिकी पूजा करते हुए सभीसे प्रतिग्रह लेना चाहिये, पर उसका उपयोग अपनी तुष्टिके लिये नहीं करना चाहिये। साधुसे अथवा असाधुसे भी केवल उसके कल्याणके लिये प्रतिग्रह लेना चाहिये। यदि प्रतिग्रहीता ब्राह्मण (आचारहीन) कर्मनिष्ठ है तो अल्प दोष होगा। यदि निर्गुण है तो दोषमें डूब जायगा। इस प्रकार तस्करवृत्ति (अपने पुण्यको क्षीण करनेवाली वृत्ति)—से अपना भरण करनेके बाद उत्तम द्विजको अपनी शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करना चाहिये। दिनके चौथे भागमें मिट्टी, तिल, पुष्प तथा कुशादि सामग्री लाकर प्रकृतिप्रदत्त जलमें स्नान करना चाहिये।

नित्य, नैमित्तिक, काम्य, क्रियाङ्ग, मलापकर्षण, मार्जन, आचमन और अवगाहन—ये आठ प्रकारके स्नान बताये गये हैं। बिना स्नान किया पुरुष जप, अग्नि और हवन आदि करनेका अधिकारी नहीं है। प्रातःस्नान पूजा-पाठ आदि धार्मिक कृत्यके लिये करना चाहिये। इसीको नित्य-स्नान कहा गया है। चाण्डाल, शव, विष्ठा तथा रजस्वला आदिका स्पर्श करनेके पश्चात् जो स्नान किया जाता है, वह नैमित्तिक-स्नान कहलाता है। ज्योतिषशास्त्रके अनुसार पुष्य आदि नक्षत्रोंमें जो स्नानादिक कृत्य किया जाता है, उसे काम्य-स्नान कहते हैं। निष्काम व्यक्तिको इस प्रकारका स्नान नहीं करना चाहिये। जप-होमादिक कृत्योंको सम्पन्न करनेकी इच्छासे प्रेरित होकर अथवा अन्य अनेक पवित्र कृत्य, देवता तथा अतिथि आदिका पूजन करनेकी इच्छासे जो स्नान किया जाता है, उसको क्रियाङ्ग-स्नानके नामसे अभिहित किया गया है। शारीरिक मलको दूर करनेके लिये सरोवर, देवकुण्ड, तीर्थ और नदियोंमें जो स्नान किया जाता है, वह मलापकर्षण-स्नान है। सामान्य जलसे स्नान करनेपर केवल शरीरकी शुद्धि होती है। तीर्थमें स्नान करनेपर विशिष्ट फलकी प्राप्ति होती है। मज्जन (स्नान)—के लिये विहित मन्त्रोंसे मार्जन करनेसे मनुष्यका पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाता है। नित्य, नैमित्तिक, क्रियाङ्ग तथा मलापकर्षण नामक जो स्नान बताये गये हैं, उन स्नानोंको तीर्थका अभाव होनेपर उष्ण जल अथवा अन्य किसी प्रकारसे प्राप्त कृत्रिम जलसे सम्पन्न कर लेना चाहिये।

भूमिसे निकला हुआ जल पवित्र होता है। इस जलकी अपेक्षा पर्वतसे निकलनेवाले झरनेका जल पवित्र होता है। इससे भी बढ़कर पवित्र जल सरोवरका है और उसकी अपेक्षा नदीका जल पवित्र है। नदीके जलकी अपेक्षा भी तीर्थका जल पवित्र है। इन सभी जलोंकी अपेक्षा गङ्गाका जल परम पवित्र है। गङ्गाका श्रेष्ठतम जल तो जीवनपर्यन्त किये गये प्राणीके सभी पापोंका विनाश अतिशीघ्र ही कर देता है। गया तथा कुरुक्षेत्र नामक तीर्थोंके जलसे भी बढ़कर पवित्र एवं पुण्यदायक जल गङ्गाजीका है—

३८८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

भूमिष्ठादुद्धृतं पुण्यं ततः प्रस्त्रवणोदकम् ॥
ततोऽपि सारसं पुण्यं तस्मान्नादेयमुच्यते ।
तीर्थतोयं ततः पुण्यं गाङ्गं पुण्यं तु सर्वतः ॥
गाङ्गं पयः पुनात्याशु पापमामरणान्तिकम् ।
गयायां च कुरुक्षेत्रे यत्तोयं समुपस्थितम् ॥
तस्मात्तु गाङ्गमपरं जानीयात्तोयमुत्तमम् ।
(२१३ । ११६-११९)

पुत्रजन्म, कतिपय विशिष्ट योग, मकर आदि राशियोंपर सूर्यकी संक्रान्ति तथा चन्द्र और सूर्यग्रहण होनेपर ही रात्रिमें स्नान करना प्रशस्त है। अन्यथा रात्रिमें स्नान नहीं करना चाहिये। प्रतिदिन उषःकालमें, संध्याकालमें और सूर्यका उदय होते ही जो स्नान किया जाता है, वह स्नान प्राजापत्य यज्ञकी भाँति महापातकका नाश करनेवाला है। बारह वर्षतक प्राजापत्य यज्ञ करनेपर जो फल प्राप्त होता है, वह फल श्रद्धापूर्वक एक वर्षतक प्रातःकाल स्नान करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। जो व्यक्ति सूर्य और चन्द्र नामक श्रेष्ठ ग्रहोंके समान प्रचुर भोगोंको प्राप्त करनेकी इच्छा करता है, वह माघ तथा फाल्गुन—इन दो मासोंमें नित्य प्रातःकाल स्नान करे। जो श्रद्धालु माघमास आनेपर प्रातःकाल स्नान करके हविष्यान्न ग्रहण करता है, वह एक ही मासमें अपने महाघोर और अतिपापोंका विनाश कर देता है। माता, पिता, भ्राता, मित्र अथवा गुरु आदिको उद्देश्य बनाकर जो प्रातःकाल स्नान करता है, उसे शास्त्रनिर्दिष्ट पुण्यका द्वादश गुणित अधिक पुण्य प्राप्त होता है। भगवान् विष्णु एकादशी तिथिको आमलक (आँवला)-के समर्पण एवं दानसे विशेषरूपसे तुष्ट होते हैं। लक्ष्मीकी कामना करनेवाले मनुष्यको सर्वदा आमलकसे स्नान करना चाहिये।

सन्ताप, कीर्ति, अल्पायु, धन, मृत्यु, आरोग्य तथा सभी कामनाओंकी पूर्ति क्रमशः रविवार आदिको तैलका अभ्यङ्ग करनेसे प्राप्त होती है। अर्थात् रविवारको शरीरमें तैलका अभ्यङ्ग करनेपर सन्ताप, सोमवारको तैल-अभ्यङ्गसे कीर्ति, मंगलवारको तैल-अभ्यङ्गसे अल्पायु, बुधवारको तैल-अभ्यङ्गसे धन, बृहस्पतिवारको ऐसा करनेसे मृत्यु, शुक्रवारको तैल-अभ्यङ्गसे आरोग्य और शनिवारको तैल-अभ्यङ्ग करनेपर मनुष्यका सम्पूर्ण अभीष्ट पूर्ण होता है। उपवास करनेवाले व्रतीसे तथा नाईके द्वारा क्षौरकर्म करानेके पश्चात् मनुष्यसे तबतक ही लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं, जबतक वह तैलका स्पर्श नहीं करता है। अतः तैलस्पर्श करनेके पश्चात् मनुष्यको तत्काल स्नान कर लेना चाहिये। व्रतके दिन तो तैलस्पर्श नहीं ही करना चाहिये।

स्नान करनेके बाद मनुष्यको यथाविधान पितृगण, देवगण और मनुष्योंका तर्पण करना चाहिये। नाभिपर्यन्त जलमें स्थित होकर एकाग्र मनसे पितरोंका आवाहन करना चाहिये—

आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्त्वपोऽञ्जलिम् ॥

हे मेरे पितृगण! आप सब इस तीर्थस्थानपर आकर विराजमान हों और मेरे द्वारा दी जा रही जलाञ्जलिको स्वीकार करें।

इस प्रकार आवाहन करके आकाश और दक्षिण दिशामें स्थित पितृगणोंको तीन-तीन जलाञ्जलि प्रदान करे। यदि जलसे बाहर निकलकर तर्पण करना हो तो तर्पणकी विधि जाननेवाले लोगोंको सूखे और स्वच्छ वस्त्र पहनकर समूल कुशाओंपर तर्पण करना चाहिये। पात्र (बर्तन)-में तर्पण नहीं करना चाहिये।

तर्पण-कृत्यमें रक्षोगण प्रतिबन्ध न कर सकें, इसके लिये तर्पण आरम्भ करते समय बायें हाथमें जल लेकर नैर्ऋत्य कोणमें उसे छोड़ना चाहिये और जल छोड़ते समय निम्नलिखित मन्त्र बोलना चाहिये—

यदपां क्रूरमांसाबु यदमेध्यं तु किञ्चन ॥
अशान्तं मलिनं यच्च तत्सर्वमपगच्छतु ।
(२१३ । १३१-१३२)

कांड ] सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण ३८९

कूरमांसके कारण, अपवित्रताके कारण अथवा तर्पणके जलमें अज्ञानवश विद्यमान अशान्तिजनक किसी तत्त्व या मलिनताके कारण जो कुछ भी प्रतिबन्ध है, वह दूर हो जाय।

अन्तमें तर्पणका संक्षेप (उपसंहार) करते समय तीन जलाञ्जलि निम्नलिखित मन्त्रोंसे देनी चाहिये—

निषिद्धभक्षणाद्यत्तु पापाद्यच्च प्रतिग्रहात्॥
दुष्कृतं यच्च मे किञ्चिद्वाङ्मनःकायकर्मभिः।
पुनातु मे तदिन्द्रस्तु वरुणः सबृहस्पतिः॥
सविता च भगश्चैव मुनयः सनकादयः।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं जगत् तृप्यत्विति ब्रुवन्॥
(२१३। १३३-१३५)

निषिद्ध भक्षणसे, जन्मान्तरीय दुष्कर्मोंसे, प्रतिग्रह (दान) लेनेसे और इस जन्ममें शरीर, वाणी एवं कर्मसे जो निषिद्ध आचरण हो गये हैं, उनसे उत्पन्न पापोंके कारण मुझमें जो अपवित्रता है, उसे दूर करके बृहस्पति, इन्द्र तथा वरुण मुझे पवित्र करें। सूर्य, यम (देवताविशेष), सनकादि ऋषि और ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब (अति लघु कीट या तृण) समस्त संसार—ये सभी मेरे तर्पणसे तृप्त हों।

इस प्रकार पितृतर्पण करके संयमी व्यक्तिको ईर्ष्या, द्वेष आदिसे रहित होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि अभीष्ट देवोंकी पूजा करनी चाहिये। विभिन्न देवतालिङ्गक ब्राह्म, वैष्णव, रौद्र, सावित्र एवं मैत्रावरुण-मन्त्रोंसे सभी देवताओंकी नमस्कारपूर्वक अर्चा करनी चाहिये। तदनन्तर पुनः नमस्कारपूर्वक अर्चित देवोंको पृथक्-पृथक् पुष्पाञ्जलियाँ देनी चाहिये। पुनः सर्वदेवमय भगवान् विष्णु और सूर्यकी पूजा करनेका विधान है। इस पूजामें जो अधिकारी मनुष्य पुरुषसूक्तसे भगवान् विष्णुको पुष्प तथा जल समर्पित करता है, वह सम्पूर्ण चराचर विश्वकी पूजाको सम्पन्न कर लेता है। इन देवोंकी पूजा अन्य तान्त्रिक मन्त्रोंसे भी की जा सकती है। पूजामें सबसे पहले आराध्यदेव जनार्दनको अर्घ्य प्रदान करना चाहिये और सुगन्धित पदार्थसे उनके विग्रहका विलेपन करना चाहिये। तत्पश्चात् उन्हें पुष्पाञ्जलि, धूप, उपहार और फलका नैवेद्य समर्पित करना चाहिये।

जलके मध्य स्नान, जलके द्वारा मार्जन, आचमन, जलमें तीर्थका अभिमन्त्रण तथा अघमर्षण-सूक्तके द्वारा मार्जन नित्य तीन बार करना चाहिये। महात्माओंको स्नानविधिके विषयमें यही अभीष्ट है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको मन्त्रसहित स्नान करना चाहिये। शूद्रवर्णको मौन होकर नमस्कारपूर्वक स्नान करना चाहिये। अध्यापन ब्रह्मयज्ञ, तर्पण पितृयज्ञ, होम देवयज्ञ, बलिवैश्वदेव भूतयज्ञ तथा अथितिका पूजन मनुष्ययज्ञ है। गौओंके गोष्ठमें दस गुना, अग्निशालामें सौ गुना, सिद्धक्षेत्र-तीर्थ तथा देवालयोंमें क्रमशः एक हजार गुना, एक लाख गुना और एक करोड़ गुना फल इन कर्मोंको करनेसे प्राप्त होता है। जब ये ही कर्म भगवान् विष्णुके सान्निध्यमें किये जाते हैं तो इनसे अनन्त गुना फलोंकी प्राप्ति होती है।

दिनका यथायोग्य पाँच विभाग करके पितृगण, देवगणकी अर्चा और मानवके कार्य करने चाहिये। जो मनुष्य अन्नदान करके सर्वप्रथम ब्राह्मणको भोजन कराकर अपने मित्रजनोंके साथ स्वयं भोजन करता है, वह देहत्यागके बाद स्वर्गलोकके सुखका अधिकारी बन जाता है।

मनुष्यको सर्वप्रथम मधुर, मध्यभागमें नमकीन और अम्लसे युक्त पदार्थ, उसके बाद कडुवा, तीता तथा कसैला भोजन करना चाहिये। भोजनके अनन्तर दुग्धपान करना चाहिये। रातमें शाक तथा कन्दादिक पदार्थोंको अधिक नहीं खाना चाहिये। एक ही प्रकारके रसमें आसक्ति अच्छी नहीं होती है।

३९०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ब्राह्मणका अन्न अमृतके समान, क्षत्रियका अन्न दुग्धके समान, वैश्यका अन्न अन्नके समान और शूद्रका अन्न रक्तके समान होता है। जो अमावास्याका व्रत एक वर्षतक करता है, उसके यहाँ ऐश्वर्य और लक्ष्मीका (अविचल्रूपसे) निवास होता है। द्विजातिके उदरभागमें गार्हपत्याग्नि, पृष्ठभागमें दक्षिणाग्नि, मुखमें आहवनीयाग्नि, पूर्वमें सत्याग्नि और मस्तकमें सर्वाग्निका वास रहता है। जो इन पञ्चाग्नियोंको जान लेता है उसको आहिताग्नि कहा जाता है। शरीरको जल, चन्द्र तथा विविध प्रकारके अन्नके द्वारा साध्य माना गया है। इस शरीरका उपभोग करनेवाले प्राण अग्नि और सूर्य हैं। ये तीनों पृथक्-पृथक् तीन रूपोंमें भी अवस्थित रहकर एक ही हैं।

(भोजनके समय यह भावना करनी चाहिये कि) पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायुतत्त्वसे युक्त इस मेरे स्थूल शरीरकी पुष्टिके लिये प्रयुक्त अन्न शक्ति-सञ्चयके लिये होता है। शरीरमें पहुँचकर जब यह अन्न भूमि, जल, अग्नि और वायुतत्त्वके रूपमें परिणत हो जाता है तो अप्रतिहत—असीम सुखकी अनुभूति होती है।

इसके (भोजनके) बाद मनुष्यको अपने हाथसे मुख आदि स्वच्छकर ताम्बूल अर्थात् पानका भक्षण करना चाहिये। तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर इतिहासका श्रवण करना चाहिये। इतिहास और पुराणादिकी कथाओंके द्वारा मनुष्यको दिनके छठे और सातवें भागका समय व्यतीत करना चाहिये। तत्पश्चात् स्नान करके पश्चिम दिशाकी ओर मुख करके सायंकालीन संध्योपासन करना चाहिये।

हे ब्राह्मणदेव ! मेरे द्वारा कहे गये इस विधानके अनुसार अपने कर्त्तव्योंका पालन करना चाहिये। जो मनुष्य इस सदाचारके अध्यायका पाठ करता है अथवा अपने पुरोहित आदिके द्वारा इसका श्रवण करता है, वह निश्चित ही अपनी मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकको जाता है। हे द्विज ! इन सभी सदाचार एवं धर्मका पालन करनेवाला अधिकारी मनुष्य केशव (साक्षात् विष्णु) ही माना गया है।

(अध्याय २१३)


स्नान तथा संक्षेपमें संध्या-तर्पणकी विधिं

ब्रह्माजीने कहा—अब मैं स्नानकी विधि कहता हूँ, क्योंकि सभी क्रियाएँ स्नानमूलक हैं अर्थात् स्नानके बिना कोई भी क्रिया सफल नहीं हो सकती। स्नानार्थी व्यक्तिको स्नानके पूर्व मिट्टी, गोमय, तिल, कुश, सुगन्धित पुष्प—ये सभी द्रव्य एकत्र कर लेना चाहिये। गन्ध आदि स्नानोपयोगी पदार्थोंको जलके समीप स्वच्छ स्थान—भूमिपर रखना चाहिये।

तदनन्तर विद्वान् व्यक्ति एकत्र किये हुए मिट्टी और गोमयको तीन भागोंमें विभक्त करके मिट्टी और जलके द्वारा दोनों पैर तथा दोनों हाथका प्रक्षालन करे। बायें कंधेपर यज्ञोपवीत रखकर शिखाबन्धनपूर्वक मौन होकर आचमन करे। 'ॐ उरुं हि राजा०'<sup></sup> इत्यादि मन्त्रोंसे दक्षिणभागमें जलको स्थापित करे। फिर 'ॐ ये ते शतं०'<sup></sup> इत्यादि मन्त्रोंका पाठ करके उस जलका अभिमन्त्रण करे। 'ॐ सुमित्रिया न आप०'<sup></sup> इस मन्त्रसे


१-इस अध्यायमें मन्त्रोंके प्रतीकमात्र दिये गये हैं। जिज्ञासु विभिन्न मन्त्रसंहिताओंसे मन्त्रोंको जान लें।
२-ॐ उरुं हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थानमन्वेत वाउ। प्रतिधाता च वक्तारस्ताहृदयाविपश्वित्। नमोऽग्न्यरुणाया भिष्टुतोवरुणस्य पाशः। वरुणाय नमः॥ (२१४।६)
३-ॐ ये ते शतं वरुणये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः। तेभिर्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा॥ (२१४।७)
४-ॐ सुमित्रिया न आप ओषधयः सन्तु। दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्द्वेष्टि यञ्च वयं द्विष्मः॥ (२१४।७)

१९३- नित्यश्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध एवं एकोद्दिष्टश्राद्धका वर्णन

काण्ड ] स्नान तथा संक्षेपमें संध्या-तर्पणकी विधि ३९१


अञ्जलिमें जल लेकर पहले मार्जन करे, फिर शेष जलको बाहर फेंके। तदनन्तर दोनों चरण, जंघा और कटिप्रदेशमें तीन-तीन बार मिट्टी लगाये। इसके पश्चात् दोनों हाथ धोकर आचमन करके जलको नमस्कार करे। इसके बाद 'ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे०' का पाठ करके 'ॐ भूः स्वाहा, ॐ भुवः स्वाहा, ॐ स्वः स्वाहा' इत्यादि महाव्याहृतिमन्त्रसे आचमन और 'ॐ इदं विष्णु०' आदि मन्त्रसे मिट्टीद्वारा अङ्गोंका मार्जन करे। फिर सूर्याभिमुख होकर 'ॐ आपो अस्मान्०' इत्यादि मन्त्रसे जलमें डुबकी लगाये। तदनन्तर शरीरको मल-मलकर स्वच्छ करे और धीरे-धीरे डुबकी लगाते हुए स्नान करे।

इसके बाद 'ॐ मा नस्तोके तनये मा न०' इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करके गोमयके द्वारा अङ्गका लेपन करे। फिर 'ॐ इमं मे वरुण०' इत्यादि वारुणमन्त्रसे यथाक्रम अपने मस्तक आदिका अभिषेक करे। पूर्वोक्त मन्त्रोंसे विधिवत् आत्माभिषेक करके जलमें डुबकी लगाकर पुनः आचमन करे। 'ॐ आपो हि ष्ठा०', 'ॐ इदं आपो हविष्मती०', 'ॐ देवी राप०', 'ॐ द्रुपदादिव०' तथा 'ॐ शं नो देवी०' इत्यादि पावमानी मन्त्रोंसे समाहित होकर मार्जन करे। 'ॐ हिरण्यवर्णा०', 'ॐ पवमानसूक्तम्०', 'ॐ तरत्सामाः०' तथा 'ॐ शुद्धवत्यः०' आदि पवित्र करनेवाले मन्त्रों एवं वारुणमन्त्रोंसे यथाशक्ति जलाभिषेक करे।

ओंकार और व्याहृतिसमन्वित गायत्री-मन्त्रका पाठ करते हुए स्नानके आदि और अन्तमें जलाभिषेक करे। जलके मध्यमें रहकर ही मार्जन करनेका विधान है। जलमें डूबकर अघमर्षण-मन्त्रको तीन बार पढ़ना चाहिये। इसके बाद 'ॐ द्रुपदा०' इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करके 'ॐ आयं गौः०' इत्यादि तीन ऋचाओंका पाठ करे। तदनन्तर स्मृतियोंमें निर्दिष्ट स्नानाङ्ग-मन्त्रोंका समाहितचित्तसे पाठ करे अथवा महाव्याहृति और प्रणवसे युक्त गायत्रीका जप करे या प्रणवकी आवृत्ति करे अथवा अव्यय विष्णुका स्मरण करे। जल ही विष्णुका आयतन है। विष्णु ही जलके अधिपति कहे गये हैं। जलमें विष्णुका स्मरण करे। 'ॐ तद् विष्णोः परमं पदम्०' इत्यादि कहकर बार-बार स्नान करे। यह वैष्णवी गायत्री विष्णुके सर्वाङ्ग-स्मरणमें निमित्त है। 'ॐ इदमपः प्रवहतः०' इत्यादि पवित्र मन्त्रोंसे अपने मलका निवारण करते हुए मार्जन करे और अपनेको निर्मल शरीरवाला बना ले। फिर 'ॐ तद्विष्णोः परमं पदम्०' इत्यादि मन्त्रोंका पाठ करे।

यथाविधि स्नानक्रियाको सम्पन्नकर धोये हुए अखण्डित पवित्र दो वस्त्रोंको पहनकर मिट्टी और जलके द्वारा हाथ तथा पैरका प्रक्षालन करके संध्या एवं तर्पण करना चाहिये। स्नान और भोजनके आरम्भमें आचमनकर पुनः मन्त्रके द्वारा अन्तमें आचमन करना चाहिये। आचमनके बाद तीन बार 'ॐ द्रुपदादिव०' इत्यादि मन्त्रका पाठकर जलद्वारा मूर्धाभिषेक तथा अघमर्षण करे। पुनः आचमन और मार्जन तथा तीन बार आचमनकर धीरे-धीरे प्राणायाम करे। इसके बाद अञ्जलिमें जल एवं पुष्प धारण करके सूर्यार्घ्य दे और ऊर्ध्वबाहु होकर समाहितचित्त हो सूर्यका निरीक्षण करते हुए 'ॐ उदु त्यं०', 'ॐ चित्रं देवानां०', तथा 'ॐ तच्चक्षुर्देवहितं०' एवं 'ॐ हंसः शुचिषद्०' इत्यादि मन्त्रोंका पाठ करते हुए सूर्योपस्थापन करे। इस प्रकार सूर्योपस्थापन करके यथाशक्ति गायत्रीका जप करना चाहिये। इसके पश्चात् 'ॐ बिभ्राट्०' अनुवाक, पुरुषसूक्त, शिवसंकल्पसूक्त, मण्डलब्राह्मण इत्यादि सूर्यके मन्त्रोंका सभी देवताओंकी प्रसन्नताके लिये यथाशक्ति जप करे अथवा जपकी साङ्गोपाङ्ग

१९४- सपिण्डीकरणश्राद्धकी विधि

३१२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

पूर्णताके लिये विधिवत् अध्यात्मविद्याका जप करे। तदनन्तर सव्य होकर तीन बार आचमनकर श्री, मेधा, धृति, क्षिति, वाक्, वागीश्वरी, पुष्टि, तुष्टि, उमा, अरुन्धती, शची, मातृगण, जया, विजया, सावित्री, शान्ति, स्वाहा, स्वधा, धृति, श्रेष्ठ अदिति, ऋषिपत्नियों, ऋषिकन्याओं और अन्य काम्य देवताओंका तर्पण करे। इसके बाद समाहितचित्त होकर सभीकी मङ्गलकामनासे सर्वमङ्गलादेवीको तृप्त करे और ‘ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं जगत् तृप्यत्विति’ इस मन्त्रसे तीन अञ्जलि जल देते हुए तर्पण-क्रियाकी सम्पन्नताकी कामना करे।

(अध्याय २१४)


तर्पण-विधिका वर्णन

ब्रह्माजीने कहा—इसके बाद तर्पणविधिका वर्णन करता हूँ। इस विधिके अनुसार तर्पण करनेसे देवगण और पितृगण तुष्ट होते हैं। सर्वप्रथम ‘ॐ मोदास्तृप्यन्ताम्’ इत्यादि मन्त्रोंसे एक-एक अञ्जलि जल प्रदान करे। तर्पणके मन्त्र इस प्रकार हैं—

ॐ मोदास्तृप्यन्ताम्। ॐ प्रमोदास्तृप्यन्ताम्। ॐ सुमुखास्तृप्यन्ताम्। ॐ दुर्मुखास्तृप्यन्ताम्। ॐ विघ्नास्तृप्यन्ताम्। ॐ विघ्नकर्तारस्तृप्यन्ताम्। ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम्। ॐ वेदास्तृप्यन्ताम्। ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम्। ॐ सनातनस्तृप्यताम्। ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ संवत्सरस्सावयवस्तृप्यताम्। ॐ देवास्तृप्यन्ताम्। ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम्। ॐ देवान्धकास्तृप्यन्ताम्। ॐ सागरास्तृप्यन्ताम्। ॐ नागास्तृप्यन्ताम्। ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम्। ॐ सरिन्मनुष्या यक्षास्तृप्यन्ताम्। ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम्। ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम्। ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम्। ॐ भूतानि तृप्यन्ताम्। ॐ भूतग्रामाश्चतुर्विधास्तृप्यन्ताम्। ॐ दक्षस्तृप्यताम्। ॐ प्रचेतास्तृप्यताम्। ॐ मरीचिस्तृप्यताम्। ॐ अत्रिस्तृप्यताम्। ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम्। ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम्। ॐ पुलहस्तृप्यताम्। ॐ क्रतुस्तृप्यताम्। ॐ नारदस्तृप्यताम्। ॐ भृगुस्तृप्यताम्। ॐ विश्वामित्रस्तृप्यताम्। ॐ कश्यपस्तृप्यताम्। ॐ जमदग्निस्तृप्यताम्। ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम्। ॐ स्वायम्भुवस्तृप्यताम्। ॐ स्वारोचिषस्तृप्यताम्। ॐ तामसस्तृप्यताम्। ॐ रैवतस्तृप्यताम्। ॐ चाक्षुषस्तृप्यताम्। ॐ महातेजास्तृप्यताम्। ॐ वैवस्वतस्तृप्यताम्। ॐ ध्रुवस्तृप्यताम्। ॐ धवस्तृप्यताम्। ॐ अनिलस्तृप्यताम्। ॐ प्रभासस्तृप्यताम्।

इसके बाद निवीती होकर अर्थात् यज्ञोपवीतको मालाके रूपमें गलेमें धारणकर ‘ॐ सनकस्तृप्यताम्’ इत्यादि निम्न मन्त्रोंसे तर्पण करे—

ॐ सनकस्तृप्यताम्। ॐ सनन्दनस्तृप्यताम्। ॐ सनातनस्तृप्यताम्। ॐ कपिलस्तृप्यताम्। ॐ आसुरिस्तृप्यताम्। ॐ वोढुस्तृप्यताम्। ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम्। ॐ मनुष्याणां कव्यवाहस्तृप्यताम्। ॐ अनलस्तृप्यताम्। ॐ सोमस्तृप्यताम्। ॐ यमस्तृप्यताम्। ॐ अर्यमा तृप्यताम्।

तदनन्तर प्राचीनावीती होकर अर्थात् दाहिने कंधेपर यज्ञोपवीत धारणकर अधोलिखित मन्त्रोंसे तर्पण करे—

ॐ अग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यन्ताम्। ॐ सोमपाः पितरस्तृप्यन्ताम्। ॐ बर्हिषदः पितरस्तृप्यन्ताम्।


* इस अध्यायमें तर्पणकी अवश्यकर्तव्यता एवं उसकी दिशाका संकेतमात्र किया गया है। तर्पणक्रम एवं विधिका ज्ञान अपनी शाखाके ग्रन्थोंसे करना चाहिये। माध्यन्दिन शाखाके लोगोंको ‘नित्यकर्म-पूजाप्रकाश’ (प्रकाशित गीताप्रेस)-से सरलतम प्रामाणिक तर्पणविधि जान लेनी चाहिये।

काण्ड ] बलिवैश्वदेवनिरूपण ३१३


ॐ यमाय नमः। ॐ धर्मराजाय नमः। ॐ मृत्यवे नमः। ॐ अन्तकाय नमः। ॐ वैवस्वताय नमः। ॐ कालाय नमः। ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः। ॐ औदुम्बराय नमः। ॐ दध्नाय नमः। ॐ नीलाय नमः। ॐ परमेष्ठिने नमः। ॐ वृकोदराय नमः। ॐ चित्राय नमः। ॐ चित्रगुप्ताय नमः। ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगत्तृप्यतु। ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः। ॐ पितामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रपितामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ मातृभ्यः स्वधा नमः। ॐ पितामहीभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रपितामहीभ्यः स्वधा नमः। ॐ मातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ वृद्धप्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। तृप्यतामिति।

अधोलिखित मन्त्रोंका पारायण पितरोंका ध्यान करते हुए करे—

'ॐ उदीरतामवर०', 'ॐ अग्निरसो नः०', 'ॐ आयन्तु नः०', 'ॐ ऊर्जां०', 'ॐ पितृभ्य०', 'ॐ ये चेह०' तत्पश्चात् 'ॐ मधुवाता०' इसके बाद 'ॐ नमो वः पितरो०' इत्यादि मन्त्रसे ध्यान करते हुए अधोलिखित मन्त्रसे जल दे—

ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः नमः। ॐ पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। ॐ मातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ वृद्धप्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। आदि·····।

ये चास्माकं कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः।
ते तृप्यन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम्॥

इस मन्त्रका पाठकर वस्त्रनिष्पीडित जलसे अपने कुलमें उत्पन्न पुत्र-हीनजनोंके लिये तर्पण करे।

(अध्याय २१५)


बलिवैश्वदेवनिरूपण

ब्रह्माजीने कहा— अब मैं वैश्वदेव-बलिविधिक विधान बतलाता हूँ। यह होमका एक प्रारम्भिक उत्तम स्वरूप है। पहले अग्निको जलाकर अग्निका पर्युक्षण करे, तदनन्तर 'ॐ कव्यादमग्निं०' इत्यादि मन्त्रसे अग्निके लिये कुछ हव्यांशका परित्याग करे। इसके बाद 'ॐ पावक वैश्वानर०' मन्त्रको पढ़कर अग्निका आवाहन करे और ॐ प्रजापतये स्वाहा। ॐ सोमाय स्वाहा। ॐ बृहस्पतये स्वाहा। ॐ अग्निषोमाभ्यां स्वाहा। ॐ इन्द्राग्निभ्यां स्वाहा। ॐ द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा। ॐ इन्द्राय स्वाहा। ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा। ॐ ब्रह्मणे स्वाहा। ॐ अद्भ्यः स्वाहा। ॐ ओषधिवनस्पतिभ्यः स्वाहा। ॐ गृहाय स्वाहा। ॐ देवदेवताभ्यः स्वाहा। ॐ इन्द्राय स्वाहा। ॐ इन्द्रपुरुषेभ्यः स्वाहा। ॐ यमाय स्वाहा। ॐ यमपुरुषाय स्वाहा। ॐ सर्वेभ्यो भूतेभ्यो दिवाचारिभ्यः स्वाहा। ॐ वसुधापितृभ्यः स्वाहा—इन मन्त्रोंसे अग्निमें आहुति दे। तदनन्तर 'ॐ ये भूता॑ प्रचरन्ति०'<sup></sup> का पाठ करते हुए बलि और पुष्टि प्रदान करनेकी प्रार्थना करे। अन्तमें 'ॐ आचाण्डालपतितवायसेभ्यो नमः' इस मन्त्रसे भी काक आदिको बलि प्रदान करे<sup></sup>

(अध्याय २१६)


१-ये भूताः प्रचरन्ति दीनाश्च निमिहन्तो भुवनस्य मध्ये। तेभ्यो बलिं पुष्टिकामो ददामि मयि पुष्टिं पुष्टिपतिर्दधातु॥ (२१६।२)
२-इस अध्यायमें बलिवैश्वदेवकी विधि अन्य शाखाके अनुसार है। माध्यन्दिन शाखाके लोगोंके लिये 'पारस्करगृह्यसूत्र' के अनुसार संक्षिप्त एवं प्रामाणिक 'बलिवैश्वदेवविधि' गीताप्रेससे प्रकाशित 'नित्यकर्म-पूजाप्रकाश' में द्रष्टव्य है।

१९५- धर्मसारका कथन

३९४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

संध्याविधि<sup></sup>

श्रीब्रह्माजीने कहा— अब द्विजातियोंके लिये संध्या-विधिका वर्णन करता हूँ। सर्वप्रथम इस मन्त्रसे बाह्य तथा आभ्यन्तर शुद्धि करे— ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
अर्थात् पवित्र हो या अपवित्र किसी भी अवस्थामें क्यों न हो, पुण्डरीकाक्ष भगवान् विष्णुका स्मरण करनेसे बाह्य और आभ्यन्तर दोनों प्रकारकी शुद्धि हो जाती है।

उपनयन-संस्कारके समय जिस गायत्रीमन्त्रका उपदेश प्राप्त होता है, उसीका जप संध्योपासनमें होता है। उपनयनकालमें गायत्रीमन्त्रका विनियोग इस प्रकार होता है—'ॐ गायत्री छन्दः, विश्वामित्र ऋषिस्त्रिष्टुप्, समुद्राः कुक्षिः, चन्द्रादित्यौ लोचनौ, अग्निर्मुखम्, विष्णुर्हृदयम्, ब्रह्मरुद्रौ शिरः, रुद्रः शिखा उपनयने विनियोगः'।

संध्योपासनके समय गायत्रीमन्त्रके जपसे पहले 'ॐ भूः' से पैरमें, 'ॐ भुवः' से जानुओंमें, 'ॐ स्वः' से हृदयमें, 'ॐ महः' से सिरमें, 'ॐ जनः' से शिखामें, 'ॐ तपः' से कण्ठमें और 'ॐ सत्यम्' से ललाटमें न्यास करना चाहिये। आगेके मन्त्रोंसे हृदय, सिर, शिखा, कवच, अस्त्र आदिमें न्यास करे—ॐ हृदयाय नमः, ॐ भूः शिरसे स्वाहा, ॐ भुवः शिखायै वौषट्, ॐ स्वः कवचाय हुम्, ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट्। इसके बाद ॐ भूः, ॐ भुवः इत्यादि सप्तव्याहृतियोंके साथ गायत्रीके तृतीय पाद 'ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतम् भूर्भुवः स्वरोम्' का जप करते हुए प्राणायाम करे। प्राणायामके बाद 'ॐ सूर्यश्च०' इस मन्त्रसे प्रातःकालकी, 'ॐ आपः पुनन्तु०' इस मन्त्रसे मध्याह्नकालकी तथा 'ॐ अग्निश्च०' इस मन्त्रसे सायंकालीन संध्यामें आचमन करे। तत्पश्चात् आवाहनपूर्वक भगवती गायत्रीके प्रातः, मध्याह्न तथा सायं-स्वरूपोंका ध्यान करे। फिर 'ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः०' और 'ॐ सुमित्रिया न आपः०' एवं 'ॐ द्रुपदादिव०' इत्यादि मन्त्रोंके द्वारा जलसे मार्जन करे और 'ॐ ऋतं च सत्यं०' इस मन्त्रसे अघमर्षण करे। तदनन्तर गायत्रीजपसे पूर्व गायत्रीमन्त्रका विनियोग इस प्रकार करे—'ॐ गायत्र्या विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता जपे विनियोगः'। 'ॐ उदु त्यं जातवेदसं०', 'ॐ चित्रं देवानां०', 'ॐ तच्चक्षुः०'—ये सूर्योपस्थानके मन्त्र हैं। गायत्रीका जप करनेके अनन्तर 'ॐ विश्वतश्चक्षु०', 'ॐ देवागातु०' तथा 'ॐ उत्तरे शिखरे०' इन मन्त्रोंसे जपसमर्पणपूर्वक गायत्रीदेवीका विसर्जन करे।
(अध्याय २१७)


पार्वणश्राद्धविधि<sup></sup>

श्रीब्रह्माजीने कहा— हे व्यास! अब मैं श्राद्धविधिका वर्णन करता हूँ। इस विधिके अनुसार पितरोंका श्राद्ध करनेसे भोग एवं मोक्षकी प्राप्ति होती है। श्राद्धकर्ता श्राद्धके एक दिन पहले ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। ब्रह्मचारीको निमन्त्रित करनेसे विशेष फल होता है।


<sup></sup>इस अध्यायमें संध्याकी विधि अत्यन्त संक्षिप्त दी गयी है। अतः सविधि विस्तारपूर्वक 'संध्योपासनविधि' जाननेके लिये गीताप्रेससे प्रकाशित 'नित्यकर्म-पूजाप्रकाश' पुस्तक देखना चाहिये।
<sup></sup>श्राद्ध दो प्रकारका होता है—सपात्रकश्राद्ध तथा अपात्रकश्राद्ध। सपात्रकश्राद्धमें विश्वेदेव एवं पितरोंके रूपमें साक्षात् ब्राह्मणोंको ही आसनपर बिठाकर समस्त श्राद्धविधि सम्पन्न की जाती है। यहाँ इसी सपात्रकश्राद्धकी विधिका निर्देश किया गया है। ऐसे श्राद्धके लिये पूर्ण सात्त्विक, जाति, विद्या, तप आदिकी दृष्टिसे अति पवित्र एवं उत्कृष्ट ब्राह्मण ही उपादेय है। कलियुगमें ऐसे ब्राह्मण दुर्लभ हैं। इसीलिये अपात्रक-श्राद्ध ही वर्तमानमें किया जाता है। अपात्रकश्राद्धमें साक्षात् ब्राह्मण आसनपर नहीं बिठाये जाते हैं। विश्वेदेव एवं पितरोंके आसनोंपर उनके प्रतिनिधिरूपमें कुश (दण्ड-विधान त्रिकुश, पटवेल एवं मोटक) ही रखा जाता है।