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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

२६४- गरुडजीको श्रीकृष्णद्वारा भगवान् विष्णुकी महिमा बताना तथा प्रलयकालके अन्तमें योगनिद्रामें शयन कर रहे उन भगवान् विष्णुको सृष्टि-हेतु अनेक प्रकारकी स्तुति करते हुए जगाना

५९६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

जिस कार्यको तुरंत आरम्भ कर देना चाहिये, उसके संदर्भमें जो उद्योगहीन होकर बैठा है, जहाँ जागते रहना चाहिये, वहाँ जो सोता रहे तथा भयके स्थानपर जो आश्वस्त होकर रहता है—ऐसा वह कौन मनुष्य है, जो मारा नहीं जाता ? जलके फेनके समान इस शरीरको आक्रमण करके जीव स्थित है, यहाँ जिन प्रिय वस्तुओंके साथ संनिवास है, वे अनित्य हैं। अतः जीव कैसे निर्भय होकर नितान्त अनित्य, शरीर, भोग और पुत्र-कलत्रादिके साथ रहता है। जो अहितमें हित, अनिश्चितमें निश्चित और अनर्थमें अर्थको विशेष रूपसे जाननेवाला है, वह व्यक्ति अपने मुख्य प्रयोजनको नहीं जानता। जो देखते हुए भी गिर जाता है, जो सुनते हुए भी सद्-ज्ञानको नहीं प्राप्त कर पाता है, जो सद्ग्रन्थोंको पढ़ते हुए भी उसे नहीं समझ पाता है, वह देवमायासे विमोहित है—

प्रारब्धव्ये निरुद्योगी जागर्तव्ये प्रसुप्तकः।
विश्वस्तश्च भयस्थाने हा नरः को न हन्यते॥
तोयफेनसमे देहे जीवेनाक्रम्य संस्थिते।
अनित्यप्रियसंवासे कथं तिष्ठति निर्भयः॥
अहिते हितसंज्ञः स्यादध्रुवे ध्रुवसंज्ञकः।
अनर्थे चार्थविज्ञानः स्वमर्थं यो न वेत्ति सः॥
पश्यन्नपि प्रस्खलति शृण्वन्नपि न बुध्यति।
पठन्नपि न जानाति देवमायाविमोहितः॥
(४९। ३१—३४)

कालके इस गहरे महासागरमें यह सम्पूर्ण जगत् डूबता-उतराता रहता है। मृत्यु, रोग और बुढ़ापारूपी ग्राहोंसे जकड़े जानेपर भी किसी व्यक्तिको ज्ञान नहीं हो पाता है। मनुष्यके लिये प्रतिक्षण भय है, समय बीत रहा है, किंतु वह उसी प्रकार दिखायी नहीं देता है, जैसे जलमें पड़ा हुआ कच्चा घड़ा गलता हुआ दिखायी नहीं देता। कदाचित् वायुको बाँधकर रखा जा सकता है, आकाशका खण्डन हो सकता है, तरंगोंको किसी सूत्रादिमें पिरोया जा सकता है; किंतु आयुमें विश्वास नहीं किया जा सकता है। जिसके (प्रलयाग्निके) प्रभावसे पृथ्वी दहकती है, सुमेरु पर्वत विशीर्ण हो जाता है तथा सागरका जल सूख जाता है। फिर इस शरीरके सम्बन्धमें तो बात ही क्या ? पुत्र मेरा है, स्त्री मेरी है, धन मेरा है, बन्धु-बान्धव मेरे हैं। इस प्रकार 'में, में' चिल्लाते हुए बकरेकी भाँति कालरूपी भेड़िया बलात् मनुष्यको मार डालता है—

तन्निमज्जज्जगदिदं गम्भीरे कालसागरे।
मृत्युरोगजराग्राहैर्न कश्चिदपि बुध्यते॥
प्रतिक्षणभयं कालः क्षीयमाणो न लक्ष्यते।
आमकुम्भ इवाम्भःस्थो विशीर्णो न विभाव्यते॥
युज्यते वेष्टनं वायोराकाशस्य च खण्डनम्।
ग्रथनञ्च तरङ्गाणामास्था नायुषि युज्यते॥
पृथिवी दह्यते येन मेरुश्चापि विशीर्यते।
शुष्यते सागरजलं शरीरस्य च का कथा॥
अपत्यं मे कलत्रं मे धनं मे बान्धवाश्च मे।
जल्पन्तमिति मर्त्याजं हन्ति कालवृको बलात्॥
(४९। ३५—३९)

यह मैंने किया है, यह मुझे करना है, यह किया गया है या नहीं किया गया है—इस प्रकारकी भावनासे युक्त मनुष्यको मृत्यु अपने वशमें कर लेती है। कल किये जानेवाले कार्यको आज ही कर लेना चाहिये। जो दोपहरके बाद करना है, उसको दोपहरसे पहले ही कर लेना चाहिये, क्योंकि कार्य हो गया है अथवा नहीं हुआ है, इसकी मृत्यु प्रतीक्षा नहीं करती। वृद्धावस्था पथ-प्रदर्शक है, अत्यन्त भयंकर रोग सैनिक है, मृत्यु शत्रु है, ऐसी विषम परिस्थितिमें फँसा हुआ मनुष्य अपने रक्षक भगवान् विष्णुको क्यों नहीं देखता है। तृष्णारूपी सूईसे छिद्रित, विषयरूपी घृतमें डूबे, राग-द्वेषरूपी अग्निकी आँचमें पकाये गये मानवको मृत्यु खा लेती है। बालक, युवा, वृद्ध और गर्भमें स्थित सभी प्राणियोंको मृत्यु अपनेमें समाहित कर लेती है, ऐसा है यह जगत्। यह जीव अपने शरीरको भी छोड़कर यमलोक चला जाता है तो भला स्त्री, माता-पिता और पुत्रादिका जो सम्बन्ध है, वह किस

प्रेतकल्प ] भगवान् विष्णुद्वारा गरुडको दिये गये महत्त्वपूर्ण उपदेश ५९७


कारणसे प्रेरित होकर बनाया गया है। संसार दुःखका मूल है, वह किसका होकर रहा है अर्थात् इसकी ओर जिसका मन अधिक रम गया है, वही दुःखित है। जिसने इस सांसारिक व्यामोहका परित्याग कर दिया है, वह सुखी है। उसके अतिरिक्त कहींपर भी अन्य कोई दूसरा सुखी नहीं है—

इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत्कृताकृतम्।
एवमीहासमायुक्तं कृतान्तः कुरुते वशम्॥
श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्रिकम्।
न हि मृत्युः प्रतीक्षेत कृतं वाप्यथ वाऽकृतम्॥
जरादर्शितपन्थानं प्रचण्डव्याधिसैनिकम्।
अधिष्ठितो मृत्युशत्रुं त्रातारं किं न पश्यति॥
तृष्णासूचीविनिर्भिन्नं सिक्तं विषयसर्पिषा।
रागद्वेषानले पक्वं मृत्युरश्नाति मानवम्॥
बालांश्च यौवनस्थांश्च वृद्धान् गर्भगतानपि।
सर्वानविशते मृत्युरेवम्भूतमिदं जगत्॥
स्वदेहमपि जीवोऽयं मुक्त्वा याति यमालयम्।
स्त्रीमातृपितृपुत्रादिसम्बन्धः केन हेतुना॥
दुःखमूलं हि संसारः स यस्यास्ति स दुःखितः।
तस्य त्यागः कृतो येन स सुखी नापरः क्वचित्॥
(४९।४०–४६)

यह जगत् सभी दुःखोंका जनक, समस्त आपदाओंका घर तथा सब प्रकारके पापोंका आश्रय है। अतः क्षणभरमें ही मनुष्यको इसका त्याग कर देना चाहिये। लौह और काष्ठके जालमें फँसा हुआ पुरुष मुक्त हो सकता है; किंतु पुत्र एवं स्त्रीके मोहजालमें फँसा हुआ वह कभी मुक्त नहीं हो सकता। मनुष्य मनको प्रिय लगनेवाले जितने पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध स्थापित करता जाता है, उतनी शोककी कीलें उसके हृदयमें चुभती जाती हैं। विषयका आहार करनेवाले देहस्थित तथा सभी प्रकारके अशेष सामर्थ्यसे वञ्चित कर देनेवाले जिन इन्द्रियरूपी चोरोंके द्वारा लोक विनष्ट हो रहे हैं। हाय, यह बड़े कष्टकी बात है। जैसे मांसके लोभमें फँसी हुई मछली बंसीके काँटेको नहीं देखती है, वैसे ही सुखके लालचमें फँसा हुआ शरीरी यमकी बाधाको नहीं देखता है—

प्रभवं सर्वदुःखानामालयं सकलापदाम्।
आश्रयं सर्वपापानां संसारं वर्जयेत् क्षणात्॥
लोहदारुमयैः पाशैः पुमान् बद्धो विमुच्यते।
पुत्रदारमयैः पाशैर्मुच्यते न कदाचन॥
यावतः कुरुते जन्तुः सम्बन्धान् मनसः प्रियान्।
तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकशङ्कवः॥
वञ्चिताशेषवित्तैस्तैर्नित्यं लोको विनाशितः।
हा हन्त विषयाहारैर्देहस्थेन्द्रियतस्करैः॥
मांसलुब्धो यथा मत्स्यो लोहशंकुं न पश्यति।
सुखलुब्धस्तथा देही यमबाधां न पश्यति॥
(४९।४७–५१)

हे खगेश! अपने हित-अहितको न जानते हुए जो नित्य कुपथगामी हैं, जिनका लक्ष्य मात्र पेट भरना है, वे मनुष्य नारकीय प्राणी हैं। निद्रा, भय, मैथुन तथा आहारकी अभिलाषा सभी प्राणियोंमें समान रूपसे रहती है; उनमें ज्ञानीको मनुष्य और अज्ञानीको पशु माना गया है। मूर्ख व्यक्ति प्रातःकालमें मल-मूत्र, दोपहरमें भूख-प्यास तथा रातमें मैथुन और निद्रासे पीड़ित रहते हैं। बड़े दुःखकी बात है कि अज्ञानसे मोहित होकर सभी प्राणी अपने शरीर, धन एवं स्त्री आदिमें अनुरक्त होकर जन्म लेते हैं और मर जाते हैं। अतः व्यक्तिको उनकी ओर बढ़ी हुई अपनी आसक्तिका परित्याग करना चाहिये। यदि आसक्ति छोड़ी न जा रही हो तो महापुरुषोंके साथ उस आसक्तिको जोड़ देना चाहिये, क्योंकि आसक्ति-रूपी व्याधिकी औषधि सज्जन पुरुष ही हैं—

हिताहितं न जानन्तो नित्यमुन्मार्गगामिनः।
कुक्षिपूरणनिष्ठा ये ते नरा नारकाः खग॥
निद्राभीमैथुनाहाराः सर्वेषां प्राणिनां समाः।
ज्ञानवान् मानवः प्रोक्तो ज्ञानहीनः पशुः स्मृतः॥

२६५- नारायणसे सृष्टिका प्रादुर्भाव तथा तत्त्वाभिमानी देवोंका प्राकट्य

५९८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

प्रभाते मलमूत्राभ्यां क्षुत्तृड्भ्यां मध्यगे रवौ।
रात्रौ मदननिद्राभ्यां बाध्यन्ते मूढमानवाः॥
स्वदेहधनदारादिनिरताः सर्वजन्तवः।
जायन्ते च म्रियन्ते च हा हन्ताज्ञानमोहिताः॥
तस्मात् सङ्गः सदा त्याज्यः स चेत् त्यक्तुं न शक्यते।
महद्भिः सह कर्तव्यः सन्तः सङ्गस्य भेषजम्॥
(४९। ५२—५६)
सत्संग और विवेक—ये दो प्राणीके मलरहित, स्वस्थ दो नेत्र हैं। जिसके पास ये दोनों नहीं हैं, वह मनुष्य अन्धा है। वह कुमार्गपर कैसे नहीं जायगा? अर्थात् वह अवश्य ही कुमार्गगामी होगा—
सत्सङ्गश्च विवेकश्च निर्मलं नयनद्वयम्।
यस्य नास्ति नरः सोऽन्धः कथं न स्यादमार्गगः॥
(४९। ५७)
अपने-अपने वर्णाश्रम-धर्मको माननेवाले सभी मानव दूसरेके धर्मको नहीं जानते हैं, किंतु वे दम्भके वशीभूत हो जायँ तो अपना ही नाश करते हैं। व्रतचर्यादिमें लगे हुए प्रयासरत कुछ लोगोंसे क्या बनेगा? क्योंकि अज्ञानसे स्वयं अपने आत्मतत्त्वको ढके हुए लोग प्रचारक बनकर देश-देशान्तरमें विचरण करते हैं। नाममात्रसे स्वयं संतुष्ट कर्मकाण्डमें लगे हुए मनुष्य तथा मन्त्रोच्चार एवं होमादिसे युक्त याज्ञिक यज्ञविस्तारके द्वारा भ्रमित हैं। मेरी मायासे विमोहित मूढ़ लोग शरीरको सुखा देनेवाले एकभक्त तथा उपवासादि नियमोंसे अपने पुण्यरूप अदृष्टकी कामना करते हैं।

शरीरकी ताड़ना मात्रसे अज्ञानीजन क्या मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं? क्या वामीको पीटनेसे महाविषधारी सर्प मर सकता है? यह कदापि सम्भव नहीं है। जटाओंके भार और मृगचर्मसे युक्त वेष धारण करनेवाले दाम्भिक ज्ञानियोंकी भाँति इस संसारमें भ्रमण करते हैं और लोगोंको भ्रमित करते हैं। लौकिक सुखमें आसक्त 'मैं ब्रह्मको जानता हूँ' ऐसा कहनेवाले, कर्म तथा ब्रह्म—इन दोनोंसे भ्रष्ट, दम्भी एवं ढोंगी व्यक्तिका अन्त्यजके समान परित्याग कर देना चाहिये। घरको वनके समान मानकर निर्वस्त्र और लज्जारहित जो साधु गधे अन्य पशुओंकी भाँति इस जगत्में घूमते रहते हैं, क्या वे विरक्त होते हैं? कदापि नहीं। यदि मिट्टी, भस्म तथा धूलका लेप करनेसे मनुष्य मुक्त हो सकता है तो क्या मिट्टी और भस्ममें ही नित्य रहनेवाला कुत्ता मुक्त नहीं हो जायगा? वनवासी तापसजन घास, फूस, पत्ता तथा जलका ही सेवन करते हैं, क्या इन्हींके समान वनमें रहनेवाले सियार, चूहे और मृगादि जीवजन्तु तपस्वी हो सकते हैं? जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त गङ्गा आदि पवित्रतम नदियोंमें रहनेवाले मेढक या मछली आदि प्रमुख जलचर प्राणी योगी हो सकते हैं? कबूतर, शिलाहार और चातक पक्षी कभी भी पृथ्वीका जल नहीं पीते हैं, क्या उनका व्रती होना सम्भव है। अतः ये नित्यादिक कर्म लोकरञ्जनके कारक हैं। हे खगेश्वर! मोक्षका कारण तो साक्षात् तत्त्वज्ञान है।

हे खगेश्वर! षड्दर्शनरूपी महाकूपमें पशुके समान गिरे हुए मनुष्य पाशसे नियन्त्रित पशुकी भाँति परमार्थको नहीं जानते। वेद-शास्त्रादिके महासमुद्रमें इधर-उधरसे अनुमान लगानेवाले इस षड्दर्शनरूपी तरंगसे ग्रस्त होकर कुतर्की बन जाते हैं। जो वेद-आगम और पुराणका ज्ञाता परमार्थको नहीं जानता है, उस कपटीका सब कथन कौवेका काँव-काँव ही है। यह ज्ञान है, यह जाननेके योग्य है, ऐसी चिन्तासे भलीभाँति बेचैन तथा परमार्थतत्त्वसे दूर प्राणी दिन-रात शास्त्रका अध्ययन करता है। वाक्य ही छन्द है और उस छन्दसे गुम्फित काव्योंमें अलंकार सुशोभित होता है। इस चिन्तासे दुःखित मूर्ख व्यक्ति अत्यधिक व्याकुल हो जाता है। उस परमतत्त्वका अन्य ही अर्थ है; किंतु लोग उसका दूसरा अर्थ लगाकर दुःखित होते हैं। शास्त्रोंका सद्भाव कुछ और ही है; किंतु वे उसकी व्याख्या उससे भिन्न ही करते हैं। उपदेशादिसे रहित कुछ अहंकारी व्यक्ति उन्मनीभावकी बात

प्रेतकल्प ] भगवान् विष्णुद्वारा गरुडको दिये गये महत्त्वपूर्ण उपदेश ५९९


कहते हैं, किंतु स्वयं उसका अनुभव नहीं करते हैं। वे वेद-शास्त्रोंको पढ़ते हैं और परस्पर उसको जाननेका प्रयास करते हैं; किंतु जैसे कलछी पाकका रसास्वाद नहीं कर पाती है, वैसे ही वे परमतत्त्वको नहीं जान पाते हैं। सिर पुष्पोंको ढोता है, परंतु उसकी सुगन्धका अनुभव नासिका ही करती है। बहुत-से लोग वेद-शास्त्र पढ़ते हैं; किंतु उनके भावको समझनेवाला दुर्लभ है। अपने ही भीतर विद्यमान उस परमतत्त्वको न पहचान कर मूर्ख प्राणी शास्त्रोंमें वैसे ही व्याकुल रहता है, जैसे कछारमें आये हुए बकरी या भेंडके बच्चेको एक गोप कुएँमें खोजता है। सांसारिक मोहको विनष्ट करनेमें शब्दज्ञान समर्थ नहीं है; क्योंकि दीपककी वार्तासे कभी अन्धकारको दूर नहीं किया जा सकता है। बुद्धिरहित व्यक्तिका पढ़ना वैसे ही है, जैसे अन्धेके हाथमें दर्पण हो। अतः प्रज्ञावान् पुरुषोंके द्वारा अधीत शास्त्र तत्त्वज्ञानका लक्षण है। यह ज्ञान है, यह जाननेके योग्य है, ऐसे विचारोंमें फँसा हुआ मनुष्य सब कुछ जाननेकी इच्छा करता है, किंतु हजार दिव्य वर्षोंतक पढ़नेपर भी वह शास्त्रोंका अन्त नहीं समझ पाता है। शास्त्र तो अनेक हैं, किंतु आयु बहुत ही कम है और उसमें भी करोड़ों विघ्न-बाधाएँ हैं। इसलिये जलमें मिले हुए क्षीरको जैसे हंस ग्रहण कर लेता है, वैसे ही उनके सार-तत्त्वको ग्रहण करना चाहिये—

अनेकानि च शास्त्राणि स्वल्पायुर्विघ्नकोटयः ।
तस्मात् सारं विजानीयात् क्षीरं हंस इवाम्भसि ॥
(४९।८४)

हे तार्क्ष्य ! वेद-शास्त्रोंका अभ्यास करके जो बुद्धिमान् व्यक्ति उस परमतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, उसको उन सभीका परित्याग उसी प्रकार करना चाहिये, जिस प्रकार एक धान्यार्थी पुरुष धान ग्रहण कर लेता है और पुआलको फेंक देता है। जैसे अमृतके पानसे संतृप्त प्राणीका भोजनसे कोई सरोकार नहीं रह जाता है, वैसे ही तत्त्वको जाननेवाले विद्वान्का शास्त्रसे कोई प्रयोजन नहीं रह जाता है। हे विनतात्मज ! वेदाध्ययनसे मुक्ति सम्भव नहीं है और न तो शास्त्रोंको पढ़नेसे वह प्राप्त हो सकती है, वह कैवल्य ज्ञानसे ही सुलभ है, किसी अन्य साधनसे नहीं। आश्रम उस मोक्षका कारण नहीं हो सकता है। दर्शन भी उसकी प्राप्तिके कारण नहीं हैं। वैसे ही सभी कर्मोंको उसका कारण नहीं मानना चाहिये। उसका कारण ज्ञान है। मुक्ति देनेवाली गुरुकी एक वाणी है। अन्य सभी विद्याएँ विडम्बना करनेवाली हैं। हजार शास्त्रोंका भार सिरपर होनेपर भी प्राणीको तो संजीवन देनेवाला वह परमतत्त्व अकेला ही है। सभी प्रकारकी क्रियाओंसे रहित वह अद्वैत शिवतत्त्व कहा गया है। उसको गुरुके मुखसे प्राप्त करना चाहिये। वह करोड़ों आगम-शास्त्रोंका अध्ययन करनेसे मिलनेवाला नहीं है।

ज्ञान दो प्रकारका कहा जाता है। एक है शास्त्रकथित ज्ञान और दूसरा है विवेकसे प्राप्त हुआ ज्ञान। इसमें शब्द ही ब्रह्म है, ऐसा आगम-शास्त्र कहते हैं। वह परमतत्त्व ही ब्रह्म है, ऐसा विवेकी जन कहते हैं। कुछ लोग अद्वैतको प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं और कुछ लोग द्वैतको चाहते हैं; किंतु वे सभी यह नहीं जानते हैं कि वह परमतत्त्व समभाववाला है। वह द्वैताद्वैतसे रहित है।

बन्धन और मोक्षके लिये इस संसारमें दो ही पद हैं। एक पद है 'यह मेरा है' और दूसरा पद है 'यह मेरा नहीं है'। 'यह मेरा है' इस ज्ञानसे वह बँध जाता है और 'यह मेरा नहीं है' इस ज्ञानसे वह मुक्त हो जाता है—

द्वे पदे बन्धमोक्षाय न ममेति ममेति च ।
ममेति बध्यते जन्तुर्न ममेति प्रमुच्यते ॥
(४९।९३)

जो कर्म इस जीवात्माको बन्धनमें नहीं ले

२६६- देवताओंद्वारा नारायणकी स्तुति

६०० संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड—


जाता है, वही सत्कर्म है। जो प्राणीको मुक्ति प्रदान करनेमें समर्थवती है, वही विद्या है। इसके अतिरिक्त दूसरा कर्म तो परिश्रम करनेके लिये होता है और दूसरी विद्या कलानैपुण्यको प्रदर्शित करनेके लिये होती है। जबतक प्राणियोंको कर्म अपनी ओर आकृष्ट करते हैं, जबतक उनमें सांसारिक वासना विद्यमान है और जबतक उनकी इन्द्रियोंमें चञ्चलता रहती है, तबतक उन्हें परमतत्त्वका ज्ञान कहाँ हो सकता है—

तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तिका।
आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम्॥
यावत् कर्माणि दीप्यन्ते यावत् संसारवासना।
यावदिन्द्रियचापल्यं तावत् तत्त्वकथा कुतः॥
(४९। ९४-९५)

जबतक व्यक्तिमें शरीरका अभिमान है, जबतक उसमें ममता है, जबतक उस प्राणीमें प्रयत्नकी क्षमता रहती है, जबतक उसमें संकल्प तथा कल्पना करनेकी शक्ति है, जबतक उसके मनमें स्थिरता नहीं है, जबतक वह शास्त्र-चिन्तन नहीं करता है एवं जबतक उसपर गुरुकी दया नहीं होती है, तबतक उसको परमतत्त्व-कथा कहाँसे प्राप्त हो सकती है?

'तभीतक ही तप, व्रत, तीर्थ, जप तथा होमादिक कृत्य एवं वेद-शास्त्र तथा आगमकी कथा है, जबतक व्यक्ति उस परमार्थ-तत्त्वको नहीं जान जाता है। हे तार्क्ष्य! यदि व्यक्ति अपना मोक्ष चाहता हो तो वह सभी अवस्थाओंमें प्रयत्नपूर्वक सदैव तत्त्वनिष्ठ होकर रहे। दैहिक, दैविक और भौतिक—इन तीनों तापोंसे संतप्त प्राणीको धर्म और ज्ञान जिसका पुष्प है, स्वर्ग तथा मोक्ष जिसका फल है, ऐसे मोक्षरूपी वृक्षकी छायाका आश्रय करना चाहिये। अतः श्रीगुरुदेवके मुखसे प्राप्त ज्ञानके द्वारा आत्मतत्त्वको जानना चाहिये। ऐसा करनेसे जीव इस दुर्धर्ष संसारके बन्धनसे सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है'—

तावत् तपो व्रतं तीर्थं जपहोमार्चनादिकम्।
वेदशास्त्रागमकथा यावत् तत्त्वं न विन्दति॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन सर्वावस्थासु सर्वदा।
तत्त्वनिष्ठो भवेत् तार्क्ष्य यदिच्छेन्मोक्षमात्मनः॥
धर्मज्ञानप्रसूनस्य स्वर्गमोक्षफलस्य च।
तापत्रयादिसंतप्तश्छायां मोक्षतरोः श्रयेत्॥
तस्माज्ज्ञानेनात्मतत्त्वं विज्ञेयं श्रीगुरोर्मुखात्।
सुखेन मुच्यते जन्तुर्घोरसंसारबन्धनात्॥
(४९। ९८-१०१)

हे गरुड! उस तत्त्वज्ञका अन्तिम कृत्य सुनो, जिसके द्वारा ब्रह्मपद या निर्वाण नामवाला मोक्ष प्राप्त होता है, अब मैं उसे कहूँगा।

अन्त समय आ जानेपर पुरुष भयरहित होकर असंगरूपी शस्त्रसे देहादिकी आसक्तिको काट दे। घरसे संन्यासी बनकर निकला धीरवान् पुरुष पवित्र तीर्थमें जाकर उसके जलमें स्नान करे। तदनन्तर वहींपर एकान्त देशमें किसी स्वच्छ एवं शुद्ध भूमिमें विधिवत् आसन लगाकर बैठ जाय तथा एकाग्रचित्त होकर गायत्री आदि मन्त्रोंके द्वारा उस परम शुद्ध ब्रह्माक्षरका ध्यान करे। ब्रह्मके बीजमन्त्रको बिना भुलाये वह अपनी श्वासको रोककर मनको वशमें करे। मनरूपी घोड़ेको बुद्धिरूपी सारथीद्वारा सांसारिक विषयोंसे उसका नियन्त्रण करे। अन्य कर्मोंसे मनको रोककर बुद्धिके द्वारा शुभकर्ममें मनको लगाये।

मैं ब्रह्म हूँ। मैं परम धाम हूँ। मैं ही ब्रह्म हूँ। परमपद मैं हूँ। इस प्रकारकी समीक्षा करके आत्माको निष्कल आत्मामें प्रविष्ट करना चाहिये। 'जो मनुष्य 'ॐ' इस एकाक्षर ब्रह्मका जप करता है, वह अपने शरीरका परित्याग कर परमपद प्राप्त करता है'—

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥
(४९। १०८)

प्रेतकल्प ] भगवान् विष्णुद्वारा गरुडको दिये गये महत्त्वपूर्ण उपदेश ६०१


जहाँ ज्ञान-वैराग्यसे रहित अहंकारी प्राणी नहीं जाते हैं वहाँ सुधीजन जाते हैं। उनके विषयमें अब तुम्हें बताता हूँ—

मान-मोहसे रहित, आसक्ति-दोषसे परे, नित्य अध्यात्म-चिन्तनमें दत्तचित्त, सांसारिक समस्त कामनाओंसे रहित और सुख-दुःख नामक द्वन्द्वसे मुक्त जो ज्ञानी पुरुष हैं, वे ही उस अव्ययपदको प्राप्त करते हैं—

निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥
(४९।११०)

'जो व्यक्ति ज्ञानरूपी ह्रदमें राग-द्वेष नामवाले मलको दूर करनेवाले सत्यरूपी जलसे भरे हुए मानसतीर्थमें स्नान करता है, उसीको मोक्ष प्राप्त होता है'—

ज्ञानह्रदे सत्यजले रागद्वेषमलापहे।
यः स्नाति मानसे तीर्थे स वै मोक्षमवाप्नुयात् ॥
(४९।१११)

'प्रौढ़ वैराग्यमें स्थित होकर अनन्यभावसे जो मनुष्य मेरा भजन करता है, वह पूर्ण दृष्टिवाला प्रसन्नात्मा व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है'—

प्रौढवैराग्यमास्थाय भजते मामनन्यभाक्।
पूर्णदृष्टिः प्रसन्नात्मा स वै मोक्षमवाप्नुयात् ॥
(४९।११२)

'घर छोड़कर मरनेकी अभिलाषासे जो तीर्थमें निवास करता है और मुक्ति-क्षेत्रमें मरता है, उसे मुक्ति प्राप्त होती है। अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, काञ्ची, अवन्तिका तथा द्वारका—ये सात पुरियाँ मोक्षप्रदा हैं'—

त्यक्त्वा गृहं च यस्तीर्थे निवसेन्मरणोत्सुकः।
मुक्तिक्षेत्रेषु म्रियते स वै मोक्षमवाप्नुयात् ॥
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका।
पुरी द्वारवती ज्ञेयाः सप्तैता मोक्षदायिकाः ॥
(४९।११३-११४)


हे तार्क्ष्य! ज्ञान-वैराग्यसे युक्त यह सनातन मोक्ष-धर्म ऐसा ही है। इसको तुम्हें सुना भी दिया है। दूसरा प्राणी भी ज्ञान-वैराग्यपूर्वक इसको सुनकर मोक्ष प्राप्त करता है।

'तत्त्वज्ञ मोक्ष प्राप्त करते हैं, धर्मनिष्ठ स्वर्ग जाते हैं। पापी नरकमें जाते हैं। पक्षी आदि इसी संसारमें अन्य योनियोंमें प्रविष्ट होकर घूमते रहते हैं'—

मोक्षं गच्छन्ति तत्त्वज्ञा धार्मिकाः स्वर्गतिं नराः।
पापिनो दुर्गतिं यान्ति संसरन्ति खगादयः ॥
(४९।११६)

सूतजीने कहा—हे महर्षियो! अपने प्रश्नके उत्तरके रूपमें भगवान्‌के मुखसे इस प्रकार सिद्धान्तको सुनकर प्रसन्न शरीरवाले गरुडने जगदीश्वरको प्रणाम किया और कहा—प्रभो! आपके इन आह्लादकारी वचनोंसे मेरा बहुत बड़ा संदेह दूर हो गया। ऐसा कहकर उन्होंने भगवान् विष्णुसे जानेकी आज्ञा ली और वे कश्यपजीके आश्रममें चले गये।

हे ब्राह्मणो! जिस प्रकार प्राणी मृत्युके बाद तत्काल दूसरी योनिमें चला जाता है अथवा जैसे वह विलम्बसे देहान्तरको प्राप्त करता है, इन दोनों बातोंमें परस्पर कोई विरोध नहीं है। हे तात! जैसा मैंने भगवान्‌से सुना है, वैसा ही मैंने आपको सुना दिया है। लक्ष्मीपति भगवान् नारायणके इन वाक्योंको सुनकर मरीचिपुत्र कश्यप भी बहुत प्रसन्न हुए। ब्रह्मासे इस महापुराणको सुनकर मैंने आप लोगोंको भी वही सुनाया है। इससे आप सभीका संदेह भी दूर हो गया। गरुडके द्वारा कहा गया यह महापुराण बड़ा ही विचित्र है।

इस महापुराणको गरुडने हरिसे प्राप्त किया था। उसके बाद गरुडसे भृगुको प्राप्त हुआ। तदनन्तर भृगुसे वसिष्ठ, वसिष्ठसे वामदेव, वामदेवसे पराशरमुनि, पराशरमुनिसे व्यास और व्याससे मैंने इसे सुना है। हे ऋषियो! मेरे द्वारा अब आप सबको परम गोपनीय यह वैष्णव पुराण सुनाया गया है। जो

६०२संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—प्रेतकल्प ]

मनुष्य इस महापुराणको सुने या जो इसको पढ़े, वह इस लोक और परलोक सभीमें सुख प्राप्त करता है। संयमनी पुरीमें जाते हुए प्रेतको जो दुःख प्राप्त होता है, उसका जैसा निरूपण इस महापुराणमें किया गया है। इसे सुननेसे जो पुण्य होता है, उसके कारण वह प्रेत मुक्त हो जाता है। इस महापुराणमें कहे गये कर्म-विपाकादिको सुननेसे मनुष्यको यहींपर वैराग्य प्राप्त हो जाता है। अतः जिस प्रकारसे हो सके प्राणीको इसे अवश्य सुनना चाहिये।

हे जितेन्द्रिय ऋषियो! आप लोग मुनीश भगवान् श्रीकृष्णका भजन करें, जिनके मुखसे निकली हुई सुधासारकी धाराके मात्र एक वर्णरूपी सीकरको श्रुतिपूरकरूपी चिल्लूसे पीकर परमात्माके साथ ऐक्य प्राप्त हो जाता है।

**व्यासजीने कहा—**इस प्रकार सूतके मुखसे निकली हुई समस्त शास्त्रोंके अर्थसे सुशोभित भगवान् विष्णुकी वाणीका अमृत पान करके ऋषिगण परम संतुष्ट हुए। परस्पर उन लोगोंके बीच सर्वार्थदर्शी सूतजी महाराजकी प्रशंसा होने लगी। शौनक आदि ऋषियोंको भी अत्यन्त प्रसन्नता हुई। सूतजीके द्वारा कही गयी पक्षिराज गरुडके संदेहोंको विनष्ट करनेवाली भगवान् विष्णुकी वाणीको सुनकर जितेन्द्रिय मुनिराज शौनकने मन-ही-मन अपनेको धन्य माना। उस समय अपनी उदार वाणीसे उन मुनियोंने सूतजीको बार-बार धन्य हैं, आप धन्य हैं—कहकर धन्यवाद दिया। तदनन्तर यज्ञ समाप्त होनेपर उन्हें विदाई दी।

'यह गरुडमहापुराण बड़ा ही पवित्र और पुण्यदायक है। यह सभी पापोंका विनाशक एवं सुननेवालोंकी समस्त कामनाओंका पूरक है। इसका सदैव श्रवण करना चाहिये'—

पुराणं गारुडं पुण्यं पवित्रं पापनाशनम्।
शृण्वतां कामनापूरं श्रोतव्यं सर्वदैव हि॥
(४९।१३२)

इस महापुराणको सुननेके बाद वाचकको शय्यादि सभी प्रकारके विधिवत् दान देनेका विधान है अन्यथा कथा सुननेका लाभ उन्हें नहीं प्राप्त होता। श्रोताको सर्वप्रथम इस महापुराणकी पूजा करनी चाहिये। उसके बाद वस्त्र, अलंकार, गौ तथा दक्षिणा आदिसे वाचककी ससम्मान पूजा करनी चाहिये। अधिक पुण्य-लाभके लिये अधिकाधिक अन्नदान, स्वर्णदान और भूमिदानसे वाचककी पूजा करनी चाहिये। 'जो मनुष्य इस महापुराणको सुने या जैसे भी हो, वैसे ही उसका पाठ करे तो वह प्राणी यमराजकी भयंकर यातनाओंको तोड़कर निष्पाप होकर स्वर्गको प्राप्त करता है'—

यश्चेदं शृणुयान्मर्त्यो यश्चापि परिकीर्तयेत्।
विहाय यातनां घोरां धूतपापो दिवं व्रजेत्॥
(४९।१३६)

॥ धर्मकाण्ड—प्रेतकल्प सम्पूर्ण ॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

[ ब्रह्मकाण्ड¹ ]

भगवान् श्रीहरिकी महिमा तथा उनके सर्वेश्वरत्वका प्रतिपादन, श्रीहरिको श्रीमद्भागवत, विष्णु तथा गरुड—ये तीन पुराण विशेष प्रिय हैं, इनका निरूपण तथा गरुडपुराणका माहात्म्य

प्राचीन समयकी बात है जगत्‌के नेत्रस्वरूप उन परब्रह्म श्रीहरिका स्तवन करते हुए सभी शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ शौनक आदि ब्रह्मवादी ऋषिगण नैमिष नामक महापुण्य-क्षेत्रमें उत्तम तपस्यामें संलग्न थे। वे सभी जितेन्द्रिय, भूख-प्यासको जीत लेनेवाले, सत्यपरायण तथा संत थे। वे विशिष्ट भक्तिके साथ समस्त संसारको ज्ञान प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णुकी निरन्तर पूजा करते थे। वहाँ कोई यज्ञोंके द्वारा यज्ञपतिकी, कोई ज्ञानके द्वारा ज्ञानात्मक परब्रह्मकी और कुछ ऋषिगण परम भक्तिके द्वारा नारायणकी पूजामें लगे रहते थे।

एक बारकी बात है धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—इन चार पुरुषार्थोंकी प्राप्तिका उपाय जाननेकी इच्छासे वे महात्मागण एक स्थानपर एकत्र हुए। ऊर्ध्वरेता वे मुनिगण संख्यामें छब्बीस हजार थे एवं उनके शिष्य-प्रशिष्योंकी संख्या तो बहुत अधिक थी। संसारपर अनुग्रह करनेवाले, वीतराग एवं मात्सर्यरहित वे महातेजस्वी मुनि आपसमें विचार करने लगे कि इस संसारमें दुःखित प्राणियोंकी भगवान् हरिके प्रति अचल भक्ति कैसे हो सकेगी? और कैसे आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धि हो सकेगी? उन ऋषियोंकी इस जिज्ञासाको जानकर महामुनि शौनकने हाथ जोड़ते हुए बड़े ही विनयपूर्वक उनसे कहा—

शौनकजीने कहा— हे ऋषियो! पौराणिकोंमें उत्तम सूतजी महाराज इस समय पवित्र सिद्धाश्रममें विराजमान हैं। वे भगवान् वेदव्यासजीके शिष्य हैं और यतियोंके ईश्वर हैं। वे आपकी जिज्ञासाविषयक सभी बातोंको जानते हैं। इसलिये उन्हींके पास चलकर हमलोग पूछें। शौनक मुनिके ऐसा कहनेपर वे सभी उस पुण्य सिद्धाश्रममें गये। नैमिषारण्यवासी उन ऋषियोंने सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए सूतजीसे पूछा—

ऋषियोंने कहा— हे सुव्रत! किस उपायके द्वारा भगवान् विष्णुको प्रसन्न किया जा सकता है? और कैसे इनकी पूजा करनी चाहिये? इसे आप बतायें साथ ही यह भी बतलानेकी कृपा करें कि मुक्तिका साधनभूत तत्त्व क्या है?

इसपर सूतजी महाराजने कहा— हे ऋषिगणो! भगवान् विष्णु, देवी लक्ष्मी, वायु, सरस्वती, शेषनाग, गुरुश्रेष्ठ कृष्णद्वैपायन व्यासजीको नमस्कार कर मैं अपनी बुद्धिके अनुसार वर्णन करता हूँ, आप लोग उन श्रेष्ठ तत्त्वस्वरूप भगवान् हरिके विषयमें सुनें।

ऋषियो! नारायणके समान न कोई है, न हुआ है और न भविष्यमें ही कोई होगा।² इस सत्यवाक्यके द्वारा आप सभीके प्रयोजनको सिद्ध कर रहा हूँ।

शौनकजीने पूछा— हे मुनिश्रेष्ठ! सर्वप्रथम भगवान् विष्णुको क्यों नमस्कार करना चाहिये? हे विद्वन्! हे सुव्रत! यह आप बतानेकी कृपा करें।

सूतजी बोले— हे शौनक! सभी वेदोंके द्वारा एकमात्र वेद्य—जानने योग्य वे हरि ही हैं, वेदादि शास्त्रों तथा


¹-गरुडपुराणके कई संस्करणोंमें 'पूर्व' और 'उत्तर' केवल दो ही खण्ड दिये गये हैं। 'ब्रह्मकाण्ड' वेंकटेश्वर प्रेसद्वारा प्रकाशित संस्करणमें ही उपलब्ध है। इसका संक्षिप्त सारांश यहाँ प्रस्तुत किया गया है।
²-नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति। (१।१।८)

६०४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ ब्रह्म-

इतिहास एवं पुराणोंमें उन्हींकी महिमा गायी गयी है, इसलिये वे विष्णु सर्वप्रथम वन्दनीय हैं, वे विष्णु ही सबमें ज्ञानरूपसे प्रकाशित हैं। इसलिये हरि प्रणामके योग्य हैं। वे सभीमें प्रधान हैं और सबसे बढ़कर हैं, इसलिये भी वे हरि सर्वप्रथम नमस्कार करने योग्य हैं। भगवान् विष्णुके समान न कोई देवता है और न वायुके समान कोई गुरु। विष्णुपदीके समान कोई तीर्थ नहीं है और विष्णुभक्तके समान कोई भक्त नहीं है। कलियुगमें सभी पुराणोंमें तीन पुराण भगवान् हरिको प्रिय और मुख्य हैं। उनमें भी कलिकालमें मनुष्योंका कल्याण करनेवाला श्रीमद्भागवत महापुराण मुख्य पुराण है। इसमें जिनसे सर्वप्रथम सृष्टि हुई है उन श्रीहरिका प्रतिपादन हुआ है, इसीलिये यह भागवत पुराण श्रेष्ठ माना गया है। इस पुराणमें भगवान् विष्णुसे ही ब्रह्मा और महेश आदिकी सृष्टि बतायी गयी है, हे विप्र ! इसी प्रकार इसमें अनेक प्रकारके अर्थोंका तथा तत्त्वज्ञानका निरूपण हुआ है, इन्हीं सब विशेषताओंके कारण यह भागवत श्रेष्ठतम पुराण माना गया है। इसी प्रकार विष्णुपुराण तथा गरुडपुराणको श्रेष्ठ कहा गया है। कलियुगमें ये तीन पुराण मनुष्यके लिये प्रधान बताये गये हैं। उनमें भी गरुडपुराणकी विशेषता कुछ अधिक ही है। यह गरुडपुराण तीन अंशोंमें विभक्त है। इसके प्रथम अंशको कर्मकाण्ड, द्वितीय अंशको धर्मकाण्ड और तृतीय अंशको ब्रह्मकाण्ड कहा जाता है। उन तीनों काण्डोंमें भी अन्तिम यह ब्रह्मकाण्ड श्रेष्ठ है। हे विप्रो! इस तृतीयांश अर्थात् ब्रह्मकाण्डके श्रवणसे जो पुण्य होता है उसे भागवत-श्रवणके समान पुण्य फलवाला कहा गया है। इतना ही नहीं इस ब्रह्मखण्डके पारायणसे वेदपाठके समान फल प्राप्त होता है। इसमें संदेह नहीं है। हे विप्रगणो! इसके पाठ करनेका जो फल कहा गया है वह केवल श्रवण करनेसे भी मिल जाता है। भगवान् हरिने ही व्यासरूपमें अवतरित होकर भागवत, विष्णु, गरुड आदि पुराणोंकी रचना की है। विष्णु-धर्मका प्रतिपादन करनेमें गरुडपुराणके समान कोई भी पुराण नहीं है।<sup></sup> जैसे देवोंमें जनार्दन श्रेष्ठ हैं, आयुधोंमें सुदर्शन श्रेष्ठ है, यज्ञोंमें अश्वमेध श्रेष्ठ है, नदियोंमें गङ्गा श्रेष्ठ हैं, जलजोंमें कमल श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणोंमें यह गरुडपुराण हरिके तत्त्वनिरूपणमें मुख्य कहा गया है। गरुडपुराणमें हरि ही प्रतिपाद्य हैं, इसलिये हरि ही नमस्कार करने योग्य हैं और हरि ही शरण्य हैं तथा वे हरि ही सब प्रकारसे सेवा करने योग्य हैं।<sup></sup> (अध्याय १)


गरुडजीको श्रीकृष्णद्वारा भगवान् विष्णुकी महिमा बताना तथा प्रलयकालके अन्तमें योगनिद्रामें शयन कर रहे उन भगवान् विष्णुको सृष्टि-हेतु अनेक प्रकारकी स्तुति करते हुए जगाना

सूतजीने पुनः कहा— हे शौनकजी ! एक बार गरुडजीने भगवान् विष्णु (कृष्ण)-से किस प्रकार उन्होंने सृष्टिकी रचना की इस विषयमें प्रश्न किया था, तब उन्होंने कहा था कि हे सुव्रत ! इस सृष्टिके मूल कारण अव्यय विष्णु हैं और वे व्यापक तत्त्व हैं, वे सर्वत्र व्याप्त रहते हैं। पूर्ण होनेके कारण वे ही अवतार ग्रहण करते हैं, अनेक रूपोंवाले इस दृश्य जगत्‌को वे एक रूप बनाकर प्रलयकालमें अपनेमें लीन करके शयन करते हैं। उनके गुण, रूप, अवयव तथा वैभवादि ऐश्वर्योंमें भेदरूप दिखायी पड़नेपर भी अभेदरूपमें उनका दर्शन करना चाहिये; क्योंकि भेदरूपमें दर्शन करनेपर शीघ्र ही अन्धकारके


१-गारुडेन समं नास्ति विष्णुधर्मप्रदर्शनम् ॥ (१।७१)
२-गारुडाख्यपुराणे तु प्रतिपाद्यो हरिः स्मृतः। अतो हरिनमस्कार्यो गम्यो योग्यो हरिः स्मृतः ॥ (१।७४)

२६७- नारायणसे प्राकृत तथा वैकृत सृष्टिका विस्तार

काण्ड ] गरुडजीको श्रीकृष्णद्वारा भगवान् विष्णुकी महिमा बताना ६०५


गर्तमें पतन हो जाता है।

जिस समय प्रलयकालीन समुद्रमें व्यापक भगवान् सभी जीवोंको अपने उदरमें प्रविष्ट कराकर शयन करते हैं, ब्रह्मा तथा इन्द्र, मरुत् आदि देवोंको, मुक्तोंको तथा मुक्तिके लिये सचेष्ट जनोंको भी वे अपनेमें अवस्थित करके कल्पपर्यन्त स्थित होते हैं, उस समय सर्ववेदात्मिका लक्ष्मी भक्तिसे समन्वित हो भगवान्‌की स्तुति करती हैं। उस समय विष्णु और लक्ष्मीको छोड़कर कुछ भी नहीं रहता। पर्यङ्करूपमें वे ही देवी हो जाती हैं एवं वासरूपसे लक्ष्मीके रूपमें भी विराजमान रहती हैं; वे देवी उस समय बहुत रूपोंमें सुशोभित होती हैं।

हे शौनक! गरुडको पुनः उन परम देवकी महिमाको बताते हुए श्रीकृष्णने कहा—हे विष्णो! आप सभीमें उत्कृष्ट हैं, सभी देवोंमें उत्तम होनेके कारण आप उत्कृष्ट हैं, आपके समान अथवा आपसे अधिक बड़ा और कोई नहीं है। आप ही एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म हैं। आपमें ही ब्रह्म शब्दका मुख्य प्रयोग है। अन्य ब्रह्मा, रुद्रादिमें अमुख्य है। अनन्त गुणोंसे परिपूर्ण होनेके कारण आप हरिको ही ब्रह्म कहा जाता है। गुण आदिकी पूर्णताके अभावसे अन्यको ब्रह्म नहीं कहा जा सकता। गुण और कालसे देशका आनन्त्य होता है, किंतु देश-कालमें गुण या कार्यसे आनन्त्य नहीं होता। हे विष्णो! आपमें गुणोंकी अनन्तता है। आपको न मैं जानता हूँ न ब्रह्मा तथा रुद्रादि देव ही जानते हैं। इन्द्र, अग्नि, यम आदि देव आपके गुणोंको जाननेमें असमर्थ हैं। देवर्षि नारद आदि ऋषि, गन्धर्व आदि कोई भी आपको पूर्णरूपसे नहीं जानते; फिर सामान्य लोगोंकी तो बात ही क्या है? आपसे ही देवोंकी सृष्टि हुई है। आपकी ही शक्तिसे ब्रह्मा आदि सृष्टि करनेमें समर्थ होते हैं। ब्राह्मणोंके द्वारा वेदादिके जितने अक्षरोंका पाठ होता है, वे सभी आप हरिके नाम ही हैं, आपको वे अति प्रिय हैं। मेरे स्वामी भी आप हरि ही हैं, सभीके एकमात्र स्वामी आप ही हैं। वेदोंमें आपकी स्तुतिका गान किया गया है, ऐसा जानकर जो वेदोंका पाठ करता है वह द्विजोंमें उत्तम है। उसे वेदपाठी कहा गया है, इससे विपरीत भाव रखनेवाला वेदवादी कहलाता है।

श्रीकृष्णजीने गरुडजीको विष्णुतत्त्व बतलाते हुए पुनः कहा—हे महात्मन्! संसारमें अज्ञानी जीवद्वारा सैकड़ों-करोड़ों महान्-से-महान् अपराध बनते रहते हैं, पर वे हरि बड़े ही दयालु हैं, कृपालु हैं, उनका तीन बार नाममात्र लेनेसे ही वे उन्हें क्षमा कर देते हैं—

महापराधाः सन्ति लोके महात्मन्
सहस्रशः शतशः कोटिशश्च।
हरिश्च तान् क्षमते सदैव
नामत्रयस्मरणाद्वै कृपालुः॥
(२।६०)

कल्पान्तमें शयन कर रहे उन विष्णुको इस प्रकार स्तुति करते हुए जगाया गया—

वेदोंके द्वारा जानने योग्य यज्ञस्वरूप हे गोविन्द! आप शीघ्र ही प्रसन्न हो जायें और जगत्की रक्षा करें। हे केशव! अब आप अपनी योगनिद्राका परित्याग कर उठें। हे आनन्दस्वरूप! आप सृष्टि और प्रलय करनेमें समर्थ हैं।

हे प्रभो! ब्रह्माको प्रादुर्भूत कर आप उन्हें सृष्टि करनेके लिये प्रेरित करें और रुद्रको सृष्टिके संहारके लिये प्रेरित करें। हे हरे! हे मुरारे!

६०६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ ब्रह्म-

कल्पादिका अन्त करनेके लिये आप उठें। हे महात्मन्! जो दुःखस्वरूप अन्धकार व्याप्त है उसे दूर करें। हे देव! भक्तोंको दुःखी देखकर आप भी दुःखी हो जाते हैं।

हे नारायण! हे वासुदेव! हे कृष्ण! हे अच्युत! तथा हे माधव! अब आप उठें, हे वैकुण्ठ! हे दयामूर्ते! हे लक्ष्मीपते! आपको बार-बार नमस्कार है।

हे सरस्वतीके ईश! हे रुद्रेश! हे अम्बिकेश! हे चन्द्रेश! हे शचीपते! आप ब्राह्मणों तथा गौओंके स्वामी हैं, आपका नाम शास्त्रप्रिय है। हे ऋग्वेद और यजुर्वेदके प्रिय! हे निदानमूर्ते! हे साम तथा अथर्वप्रिय! हे मुरारे! आप पुराणमूर्ति हैं और स्तुतियाँ आपको प्रिय हैं, इसलिये आप स्तुतिप्रिय कहलाते हैं। हे विचित्रमूर्ते! आप कमला (लक्ष्मी)-के पति हैं, आप शीघ्र ही उठें, इस योगनिद्राका परित्याग कर संसारमें व्याप्त अन्धकारको दूरकर जगत्की रक्षा करें।

—इस प्रकार स्तुति करनेपर अजन्मा विष्णु योगनिद्राका परित्याग कर शीघ्र ही जाग गये।

(अध्याय २)


नारायणसे सृष्टिका प्रादुर्भाव तथा तत्त्वाभिमानी देवोंका प्राकट्य

श्रीकृष्णने कहा— हे विनतासुत गरुड! योगनिद्रासे जागनेपर भगवान् विष्णुकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई। यद्यपि इच्छाशक्ति उनमें सदा ही विद्यमान रहती है फिर भी उस समय उन्होंने उसी इच्छाशक्तिसे लौकिक स्वरूप धारण किया और अपने उस रूपके द्वारा प्रलयकालीन अन्धकारको नष्ट किया।

महाविष्णुके सभी अवतार पूर्ण कहे गये हैं। उनका परस्वरूप भी पूर्ण है और पूर्णसे ही पूर्ण उत्पन्न हुआ। विष्णुका परत्व और अपरत्व व्यक्तिमात्रसे है। देश और कालके सामर्थ्यसे परत्व और अपरत्व नहीं है। उनका पूर्ण रूप है, उस पूर्णसे पूर्णका ही विस्तार होता है और अन्तमें उस रूपको ग्रहण करके पुनः पूर्ण ही बच जाता है। पृथ्वीके भारका रक्षण आदि जो कार्य है वह उनका लौकिक व्यवहार है। अपनी गुणमयी मायामें भगवान् अपनी शक्तिका आधान करते हैं। वे वीर्यस्वरूपी भगवान् वासुदेव सभी देश तथा सभी कालमें सर्वत्र विद्यमान रहते हैं। इसी कारण वे पुरुष ईश्वर कहलाते हैं।

हे विनतापुत्र! अपनी मायामें प्रभु हरि स्वयं वीर्यका आधान करते हैं। वीर्यस्वरूप ही भगवान् वासुदेव हैं और सभी कालोंमें सभी अर्थोंसे युक्त हैं।

इनके अचिन्त्यवीर्य और चिन्त्यवीर्यके भेदसे दो रूप हैं, एक स्त्रीरूप है और दूसरा पुरुषरूप। हे खगेन्द्र! दोनों स्वरूप वीर्यवान् हैं; इनमें अभेदका चिन्तन करना चाहिये।

देवी लक्ष्मी परमात्मासे कभी वियुक्त नहीं हैं, वे नित्य उनकी सेवामें अनुरक्त रहती हैं। नारायण नामसे प्रसिद्ध हरि यद्यपि पूर्ण स्वतन्त्र हैं किंतु लक्ष्मीके बिना वे अकेले कैसे रह सकते हैं। मुकुन्द हरिके चरणारविन्दमें परम आदरसे शुश्रूषा करती हुई वे लक्ष्मी सदा विराजमान रहती हैं। हरिके बिना देवी श्री भी किसी देश और कालमें पृथक् नहीं हैं। मायामें वे वीर्यवान् परमात्मा अपनी शक्तिका आधान करते हैं। पुरुष नामक विभु उन हरिने तीनों गुणोंकी सृष्टि की है।

श्रीकृष्णने पुनः कहा— जिस प्रकार भगवान् हरिने प्रकृतिके तीन गुणोंकी सृष्टि की, उसी प्रकारसे लक्ष्मीने भी तीन रूप धारण किये, जिनका नाम है—श्री, भू और दुर्गा। इनमेंसे सत्त्वाभिमानी रूपको श्रीदेवी, रजोगुणाभिमानी रूपको भूदेवी और तमोऽभिमानी रूपको दुर्गादेवी कहा गया है। तीनों रूपोंमें अन्तर नहीं जानना चाहिये। हे खगेश्वर! गुणोंके सम्बन्धसे ही दुर्गा आदि तीन रूप हैं। इनमें अन्तर नहीं है। इनमें जो अन्तर मानते हैं, वे परम अन्धतमस् नरकमें जाते हैं। साक्षात् परमात्मा पुरुष

२६८- नारायणकी पूर्णताका वर्णन तथा पदार्थोंके सारासारका निर्णय

काण्ड ] नारायणसे सृष्टिका प्रादुर्भाव तथा तत्त्वाभिमानी देवोंका प्राकट्य ६०७

हरिने भी तीन रूप धारण किये, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहे गये हैं।

लोकोंकी वृद्धि (पालन) करनेके लिये स्वयं साक्षात् हरि सत्त्वगुणसे विष्णु नामवाले कहलाये। सृष्टि करनेके लिये साक्षात् हरिने रजोगुणके आधिक्यसे ब्रह्मामें प्रवेश किया और संहार करनेके लिये वे हरि तमोगुणसे सम्पन्न होकर रुद्रमें प्रविष्ट हुए। वे अव्यय हरि त्रिगुणमें प्रविष्ट होकर जब सृष्टि-कार्योंन्मुख होते हैं तो उनमें क्षोभ उत्पन्न होता है, फलस्वरूप तीनों गुणोंसे महत्तत्त्वका प्रादुर्भाव होता है। पुनः उस महान्‌से ब्रह्मा और वायुका प्राकट्य हुआ। यह महत्तत्त्व रजःप्रधान है। इस सृष्टिको गुणवैषम्य नामक सृष्टि जानना चाहिये।

इस प्रकारके विशिष्ट महत्तत्त्वमें लक्ष्मीके साथ स्वयं हरि प्रविष्ट हुए। हे महाभाग! उसके बाद उन्होंने उस महत्तत्त्वको क्षुब्ध किया। क्षोभके फलस्वरूप उससे ज्ञान-द्रव्य-क्रियात्मक अहम् तत्त्व उत्पन्न हुआ।

इस अहंतत्त्वसे तत्त्वाभिमानी देव शेष उत्पन्न हुए तथा गरुड और हर उत्पन्न हुए। हे खग! इस अहंतत्त्वमें साक्षात् हरि प्रविष्ट हुए। लक्ष्मीके साथ भगवान् हरिने स्वयं उस अहंतत्त्वको संक्षुब्ध किया। वैकारिक, तामस और तैजस-भेदसे अहम् तीन प्रकारका है, उस अहम्‌के नियामक रुद्र भी तीन प्रकारके हुए। वैकारिक अहम्‌में स्थित रुद्र वैकारिक कहे गये हैं। तामसमें स्थित रुद्र तामस कहे गये और तैजसमें स्थित रुद्र लोकमें तैजस कहे गये। तैजस अहंतत्त्वमें लक्ष्मीके साथ स्वयं हरिने प्रविष्ट होकर उसे संक्षुब्ध किया। इससे वह दस प्रकारका हुआ जो श्रोत्र, चक्षु, स्पर्श, रसना और घ्राण तथा वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ—इन कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियोंके रूपमें दस प्रकारका कहा जाता है। वैकारिक अहंतत्त्वमें प्रविष्ट होकर हरिने उसे संक्षुब्ध किया। महत्तत्त्वसे एकादश इन्द्रियोंके एकादश अभिमानी देवता प्रकट हुए। प्रथम मनके अभिमानी इन्द्र और कामदेव उत्पन्न हुए। अनन्तर अन्य इन्द्रियोंके अभिमानी देवोंका प्रादुर्भाव हुआ। इसी प्रकार अष्ट वसु आदिका भी प्राकट्य हुआ। द्रोण, प्राण, ध्रुव आदि ये आठ वसु देवता हैं।

रुद्रोंकी संख्या दस जाननी चाहिये। मूल रुद्र भव कहे जाते हैं। हे पक्षिश्रेष्ठ! रैवन्तेय, भीम, वामदेव, वृषाकपि, अज, समपाद, अहिर्बुध्न्य, बहुरूप तथा महान्—ये दस रुद्र कहे गये हैं। हे पक्षीन्द्र! अब आदित्योंको सुनें—उरुक्रम, शक्र, विवस्वान्, वरुण, पर्जन्य, अतिवाहु, सविता, अर्यमा, धाता, पूषा, त्वष्टा तथा भग—ये बारह आदित्य हैं। प्रभव और अतिवह आदि उनचास मरुद्गण कहे गये हैं। हे खगेश्वर! विश्वेदेव दस हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं—पुरूरवा, आर्द्रव, धुरि, लोचन, क्रतु, दक्ष, सत्य, वसु, काम तथा काल।

इन्द्रियोंके अभिमानी देवोंके समान ही स्पर्श, रूप, रस आदि तत्त्वोंके अभिमानी अपान, व्यान, उदान आदि वायुदेवोंकी उत्पत्ति हुई। ऐसे ही च्यवनको महर्षि भृगु और उतथ्यको बृहस्पतिका पुत्र कहा गया है। रैवत, चाक्षुष, स्वारोचिष, उत्तम, ब्रह्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि, दक्षसावर्णि तथा धर्मसावर्णि इत्यादि मनु कहे गये हैं। ऐसे ही पितरोंके सात गण भी प्रादुर्भूत हुए और इनसे वरुण आदिकी पत्नीरूपमें गङ्गादिका आविर्भाव हुआ। इस प्रकार परमात्मा श्रीहरिसे सभी देवोंका प्रादुर्भाव हुआ और वे नारायण लक्ष्मीके साथ उनमें प्रविष्ट हुए।

(अध्याय ३—५)

२६९- परमात्मा हरि तथा देवी महालक्ष्मीके विभिन्न अवतारोंका वर्णन

६०८संक्षिप्त गरुडपुराण[ ब्रह्म-

देवताओंद्वारा नारायणकी स्तुति

श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश्वर! अपने-अपने तत्त्वमें स्थित उन-उन तत्त्वोंके अभिमानी देवताओंने नारायण हरिकी अनेक प्रकारसे पृथक्-पृथक् स्तुति की।

सर्वप्रथम श्री (देवी लक्ष्मी)-ने स्तुति प्रारम्भ की, उस समय उन्होंने मनमें सोचा कि प्रभुके तो एक-एक करके अनन्त गुण हैं। उन गुणोंकी स्तुति करनेमें मेरी कहाँ शक्ति है! ऐसा विचार कर वे देवी लज्जासे अवनत होकर इस प्रकार कहने लगीं—

श्रीने कहा— हे नाथ! मैं आपके चरणारविन्दोंपर नतमस्तक हूँ। आपके चरणोंके अलावा अन्य मैं कुछ भी नहीं जानती। हे देवदेव! हे ईश्वर! आपमें अनन्त गुण विद्यमान हैं। हे दामोदर! हे योगेन्द्र! आप अपने शरीरमें स्थान देकर मेरी रक्षा करें। स्तुति करनेके लिये मेरे लिये आपसे अधिक और कोई प्रिय नहीं है।

ब्रह्माजीने कहा— हे लक्ष्मीपते! हे जगदाधार-स्वरूप विश्वमूर्ते! कहाँ आप ज्ञानके महासागर और कहाँ मैं अज्ञानी! आपमें असीम शक्ति है। मैं अल्पज्ञ हूँ और मेरी शक्ति भी अल्प है। हे प्रभो! हे मुरारे! आप सदैव मुझको अहंकार और ममताके भावसे दूर ही रखें। हे रमेश! मेरी इन्द्रियाँ सदा असन्मार्गपर प्रवृत्त होती हैं। वे सदा आपके चरणकमलमें अनुरक्त रहें, ऐसी कृपा करें। आपकी स्तुति करनेकी सामर्थ्य मुझमें नहीं है। इसलिये आप प्रसन्न हों। स्तुतिके अनन्तर विधाता ब्रह्मा हाथ जोड़े उनके सामने खड़े हो गये।

देवदेव ब्रह्माजीके बाद वायुदेव भगवान् नारायणके प्रेमसे विह्वल हो हाथ जोड़ते हुए गद्गद वाणीसे उनकी स्तुति करने लगे—

वायुने कहा— हे प्रभो! सभी देवगण आपके सेवक हैं और आपके चरणारविन्दोंका सांनिध्य परम दुर्लभ है। हे रमेश! हे नाथ! लोकमें जो आपकी भक्तिसे विमुख हैं, जो पापकर्म करनेवाले हैं तथा जो अत्यन्त दुःखी हैं ऐसे प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही आपका अवतरण होता है। हे वासुदेव! आप अपने अवतारोंके द्वारा गौ, ब्राह्मण और देवताओं आदिके क्षेम तथा कल्याणके लिये नाना प्रकारकी लीलाएँ किया करते हैं, आपके अवतारका अन्य दूसरा प्रयोजन नहीं है। हे पुण्यश्रेष्ठ! आपके जो चरितामृत हैं उनका गुणानुवाद करनेसे मेरा मन तृप्त नहीं होता, इसलिये हे मुकुन्द! एक अविचल भक्तिवाले भक्तके समान मुझे भक्ति प्रदान करें ताकि मेरा मन आपके पादारविन्दमें लगा रहे।

हे प्रभो! मेरी निद्रा आपकी वन्दनारूप बन जाय, मेरा सम्पूर्ण आचरण आपकी प्रदक्षिणा हो जाय और मेरा व्यवहार आपकी स्तुति बन जाय, ऐसा समझकर मैं आपके चरणोंमें स्वयंको समर्पित करता हूँ। हे देव! जितने पदार्थ हैं उन्हें देखकर 'यह हरिकी ही प्रतिमा है' ऐसा मानकर हे देवदेव! मैं उसमें स्थित हरि-रूप समझकर आपका भजन करूँ ऐसी आप कृपा करें। आप हरिके प्रसन्न होनेपर लोकमें कौन-सी वस्तु दुर्लभ रह जाती है अर्थात् उसे सब प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार स्तुति कर महात्मा वायुदेव हरिके आगे हाथ जोड़कर स्थित हो गये।

सरस्वतीने कहा— हे मुरारे! हे हरे! हे भगवन्! कौन ऐसा रसज्ञ है जो अपनी स्तुति अथवा कीर्तनसे संतुष्ट हो पायेगा अर्थात् कोई नहीं, किसीमें ऐसी बुद्धि नहीं है जो आपकी स्तुति—प्रशंसा कर सके। हे देवदेव! आपके गुणानुवादका कीर्तन ज्यों ही कानमें पहुँचता है वैसे ही वह

२७०- भगवान् शेष तथा भगवान् रुद्रके विविध अवतार

काण्ड ] देवताओंद्धारा नारायणकी स्तुति [ ६०९


सांसारिक देहानुरक्तिको नष्ट कर देता है, इतना ही नहीं वरन् जो घर, भार्या, पुत्र, पशु, धन-सम्पत्तिका व्यामोह, आसक्ति रहती है वह भी दूर हो जाती है।

हे अनन्तदेव! वेदोंसे प्रतिपादित जो आपका स्वरूप है उसे लक्ष्मी भी नहीं जानतीं, चतुर्मुख ब्रह्मा भी नहीं जानते हैं, वायुदेव भी नहीं जानते हैं, फिर मुझमें यह शक्ति कहाँ है कि मैं आपकी स्तुति कर सकूँ। इसलिये हे हरे! आप मेरी रक्षा करें।

हे खगेश्वर! इस प्रकार स्तुति कर देवी सरस्वती चुप हो गयीं। तदनन्तर भारती ने हरिकी स्तुति करना प्रारम्भ किया।

भारती ने कहा—हे ब्रह्म! हे लक्ष्मीश! हे हरे! हे मुरारे! जो आपके गुणोंमें नित्य श्रद्धा रखता है, वह उन गुणोंका गान करते हुए सांसारिक असत् विषयोंमें प्रवृत्त अपनी बुद्धिमें संसारके प्रति विराग उत्पन्न कर लेता है और उसकी आपमें दृढ़ भक्ति हो जाती है और इस भक्तिके बलपर हे देवदेव! आपकी प्रसन्नता प्राप्त हो जाती है। हरिके प्रसन्न हो जानेसे भगवान्‌का भक्तके लिये प्रत्यक्ष दर्शन हो जाता है, इसलिये हे प्रभो! आपके गुणोंके कीर्तनमें मेरी रति बनी रहे, जब ऐसी अनुरक्ति पुरुषमें हो जाती है तो वह प्रीति समस्त सांसारिक दुःखोंको काट डालती है और परमानन्दस्वरूप फलकी प्राप्ति करा देती है। हरिके गुणोंकी जो स्तुति नहीं करते उन्हें पाप लगता है और उनका पुण्य भी क्षीण हो जाता है।

हे खगेश्वर! इस प्रकार स्तुति कर भारती मौन हो गयीं। उसके बाद शेषने हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए केशवसे इस प्रकार कहा—

शेषने कहा—हे वासुदेव! मैं आपके चरणोंके प्रभावको नहीं जानता। इसे न रुद्र जानते हैं और न गरुड ही जानते हैं, मैं तो बहुत ही न्यून हूँ। अतः शरण देकर मेरी रक्षा करें।

हे खगेश्वर! इस प्रकार स्तुति करके शेष मौन हो गये। उसके बाद पक्षिराज गरुडने स्तुति करना आरम्भ किया।

गरुडने कहा—हे प्रभो! आपके चरणोंकी स्तुति मैं क्या कर सकता हूँ। मेरा मन तो आपके चरणकमलमें ही समर्पित है। मैं तो पक्षियोनिमें उत्पन्न हूँ। इस मुखसे आपकी स्तुति कैसे सम्भव है? आपके अनन्त गुणोंकी प्रशंसा करनेकी शक्ति भला मुझमें कहाँ है?

इस प्रकार विनयपूर्वक स्तुति कर गरुड मौन हो गये। इसके बाद रुद्र स्तुति करने लगे।

रुद्रने कहा—हे भूमन्! हे भगवन्! आपकी जैसी स्तुति होनी चाहिये वह मैं नहीं जानता। आपके कल्याणकारी चरणोंके मूलमें मेरी भक्ति बनी रहे। ईश! अपनेमें स्थान देकर मेरी रक्षा करें।

इस प्रकार स्तुति कर रुद्रदेव शान्त हो गये। हे पक्षिश्रेष्ठ! तदनन्तर वारुणी, सौपर्णी तथा पार्वती आदि देवियोंने भी उन हरिकी बड़े ही भावभक्तिसे स्तुति कर उनकी शरण ग्रहण की।

श्रीकृष्णने पुनः कहा—हे खगेश्वर! अनन्तर इन्द्रने उनकी स्तुति करते हुए कहा—

हे देवदेव! आपके स्वरूपको हृदयमें जानते हुए भी जो मूढ स्तवनके लिये उत्सुक होता है, हे चक्रपाणि! बिना जाने भी तुम्हारी स्तुति करना यह आपका अनादर ही है; क्योंकि आपके यथार्थ स्वरूपको, गुणोंको वाणीके द्वारा व्यक्त करना सम्भव नहीं है, फिर भी आपकी स्तुति करनेमें आपके नामका उच्चारण होगा; अतः यह पुण्य फल तो देनेवाला ही होगा। ऐसा समझकर आपकी स्तुति की ही जाती है। हे प्रभो! जब रुद्रादि देव भी आपकी स्तुति करनेकी शक्ति नहीं रखते तो मुझमें ऐसी सामर्थ्य कहाँ? इस प्रकार देवाधिदेव हरिकी स्तुति कर नतमस्तक हो अंजलि बाँधकर इन्द्र मौन हो गये।

देवी शचीने स्तुति करते हुए कहा—हे देव! वज्र, अंकुश, ध्वज तथा कमलसे चिह्नित आपके

६१० [संक्षिप्त गरुडपुराण] [ब्रह्म-

चरणकमलोंका मैं सदा चिन्तन करती हूँ। हे ईश! आपके चरणरजका मैं सदा स्मरण करती हूँ। हे कृपालु! हे भक्तवत्सल! आप मेरी रक्षा करें। इस प्रकार शची देवी स्तुतिकर चुप हो गयीं। इसके बाद रतिने स्तुति करना आरम्भ किया।

रतिने कहा— हे नर-रूप धारण करनेवाले हरे! आपने अपने सेवकोंपर अनुकम्पा करनेके लिये यह अवतार धारण किया है, मैं आपके उस मुखारविन्दका सदा चिन्तन करती हूँ। हे देव! जो कुञ्चित केशराशिसे सुशोभित है तथा ब्रह्मा, रुद्र, लक्ष्मी आदिद्वारा स्तुत्य है, मैं आपके उस श्रीनिकेतन मुखकमलका ध्यान करती हूँ, आप मेरी रक्षा करें। इस प्रकार अतिशय आदरके साथ रति स्तुति कर भगवान्‌के समीप ही स्थित हो गयीं। रतिके बाद दक्षने स्तुति आरम्भ की।

दक्षने कहा— भगवान्‌का चरणोदकरूप जो तीर्थ है, उसका मैं सदा चिन्तन करता हूँ। वह चरणजल ब्रह्माके द्वारा भलीभाँति सेवित है। ब्रह्मा आदि सभी देवोंके द्वारा वन्दनीय है। वही पवित्रतम चरणोदक गङ्गारूपी नदियोंमें श्रेष्ठ तीर्थ हुआ, जिस पवित्र पदरजमिश्रित गङ्गाको अपने जटाकलापमें धारण करनेसे अशिव भी शिव हो गये। हे करुणेश! हे विष्णो! ऐसे कृपावतार आपकी स्तुति करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है। हे निदानमूर्ते! आप सभी प्रकारसे मेरी रक्षा करें।

इस प्रकार स्तुति कर दक्ष चुप हो गये। इसके बाद बृहस्पतिने स्तुति करना आरम्भ किया।

बृहस्पतिने कहा— हे ईश! मैं आपके मुखकमलका सतत चिन्तन करता हूँ, आप मुझे सांसारिक विषयोंसे विरक्त करें। स्त्री, पुत्र, मित्र तथा पशु आदि ये सभी नाशवान् हैं, इनके प्रति मेरी जो आसक्ति है उसे आप नष्ट कर दें। हे देव! इस संसारचक्रमें भ्रमण करते हुए मैंने यह अनुभव किया है कि 'यह संसार दुःखसे परिव्याप्त है।' इसीसे मुक्ति पानेके लिये मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हे देवाधिदेव! मेरी रक्षा करें।

इस प्रकार स्तुति कर बृहस्पति मौन हो गये। तदनन्तर अनिरुद्धने स्तुति करना आरम्भ किया।

अनिरुद्धने कहा— हे हरे! आपकी रसमयी कथाके आस्वादका परित्याग करके जो स्त्रियोंके विष्ठा आदिसे परिपूर्ण शरीर-रसके आनन्दमें निमग्न रहता है, वह मन्दबुद्धि सूकरके समान है। हे मुरारे! मज्जा, अस्थि, पित्त, कफ, रक्त तथा मलसे परिव्याप्त और चर्म आदिसे आवेष्टित स्त्री-मुखमें आसक्त व्यक्तिका पतन ही होता है। हे विभो! मुझ-जैसे पापमतिके लिये आपकी मायाका ही बल है। इस अत्यन्त मात्र दुःखरूप तथा लेशमात्र सुखसे भी रहित संसार-चक्रमें भ्रमण करता हुआ मैं मल-निःसारण करनेवाले नौ छिद्रोंसे युक्त इस शरीरमें आसक्त होता हुआ अत्यन्त मूढ़बुद्धि हूँ। हे देव! आपके सत्कथामृतको छोड़कर मैं घरमें रहते हुए परिवारके पालनमें अनुरक्त तथा दान आदि शुभ कर्मोंसे विरत हो गया हूँ। हे देव! आपको नमस्कार है। आप मेरे इस संसार-मलको दूर करें और दिव्य कथामृतके पानकी शक्ति दें। मैं आपके सद्गुणोंका स्तवन करनेमें समर्थ नहीं हूँ।

हे खगेश्वर! अनिरुद्ध इस प्रकार स्तुति करके चुप हो गये। इसके बाद स्वायम्भुव मनुने स्तुतिका उपक्रम किया—

स्वायम्भुव मनुने कहा— हे देव! आपकी स्तुति करनेके लिये प्रयत्नशीलमात्र होनेसे गर्भका दुःख नहीं होता है अर्थात् उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। हे प्रभो! आपकी इसी कृपासे मैंने परम पूज्यपदको प्राप्त किया है।

तदनन्तर स्तुति करते हुए वरुणने कहा— हे प्रभो! आपकी इच्छासे रचित देहरूपी घरमें, पुत्रमें, स्त्रीमें, धनमें, द्रव्यमें 'यह मेरा है' और 'मैं इसका हूँ' इस अल्पबुद्धिके कारण मूर्खजन संसाररूपी दुःखमें निमग्न हो जाते हैं, इसलिये मेरी ऐसी कुबुद्धिका विनाश कर आप अपने चरणोंकी दासता

२७२- भद्रा तथा मित्रविन्दाद्वारा श्रीकृष्णकी भार्या बननेकी कथा

काण्ड ] देवताओंद्वारा नारायणकी स्तुति ६११

मुझे प्रदान करें। इस प्रकार स्तुति कर वरुण हाथ जोड़कर वहीं स्थित हो गये। इसके बाद देवर्षि नारदने हरिकी स्तुति की।

नारदने कहा— हे विष्णो! मेरे लिये आपके नामके श्रवण तथा कीर्तनके अतिरिक्त अन्य कोई स्वादुयुक्त तत्त्व नहीं है इसलिये आप मुझे पवित्र करें। मेरी जिह्वाके अग्रभागमें आपका नाम सदा विद्यमान रहे। जिसकी जिह्वामें हरिनाम नहीं है वह मनुष्यरूपमें गदहा ही है। हे देव! मैं आपके स्वरूपको नहीं जानता, मुझपर आप कृपा करें। इस प्रकार नारद स्तुति कर देवाधिदेवके सामने स्थित हो गये। अनन्तर महात्मा भृगु स्तुति करने लगे।

भृगुने कहा— गरुड-जैसे आसनपर आसीन होनेवाले हे देव! आपके लिये कौन-सा आसन शेष रह जाता है। कौस्तुभ-जैसा आभूषण धारण करनेवाले आपके लिये और कौन-सा भूषण रह जाता है। लक्ष्मी जिनकी पत्नी हों उनको और क्या प्राप्तव्य रह जाता है। हे वागीश! आप वाणीके ईश हैं फिर आपके विषयमें क्या कहना? इस प्रकार भगवान् हरिकी स्तुति कर भृगु मौन हो गये। इसके बाद अग्निने पुरुषोत्तमकी स्तुति की।

अग्निने कहा— जिसके तेजसे मैं तेजस्वी और आज्यसिक्त हव्यका वहन करता हूँ। जिसके तेजसे मैं उदरमें प्रविष्ट होकर पूर्णशक्तिसम्पन्न हो अन्नका परिपाक करता हूँ इसलिये मैं आपके सद्गुणोंको कैसे जान सकता हूँ?

प्रसूतिने कहा— जिसके नामके अर्थका विचार करनेमें भी मुनिगण मोहमग्न हो जाते हैं और सदा जिससे देवगण भी भयभीत रहते हैं, मान्धाता, ध्रुव, नारद, भृगु, वैवस्वत आदि जिसकी प्रेमसे स्तुति करते हैं ऐसे हितचिन्तक आप विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ।

हे खगेश्वर ! प्रसूतिने इस प्रकार स्तुति कर मौन धारण कर लिया। तदनन्तर ब्रह्मनन्दन वसिष्ठने विनयसे अवनत होकर स्तुति करना प्रारम्भ किया।

वसिष्ठने कहा— विधाता पुरुषको नमस्कार है, असत्-स्वरूपको नष्ट करनेवाले देवको पुनः-पुनः नमस्कार है। हे नाथ! मैं आपके चरणकमलोंमें सदा नतमस्तक हूँ। हे भगवन्! हे वासुदेव! मेरी सदा रक्षा करें। इस प्रकार स्तुति करके वसिष्ठ मौन हो गये। इसके बाद ब्रह्माके पुत्र महर्षि मरीचि तथा अत्रिने अतिशय भक्तिके साथ स्तुति करते हुए नारायणको प्रसन्न किया।

तदनन्तर स्तवन करते हुए महर्षि अंगिराने कहा— हे नाथ! मैं आपके अनन्त-बाहु, अनन्त-चक्षु और अनन्त मस्तक सम्पन्न विराट् स्वरूपको देखनेमें असमर्थ हूँ। आपका यह स्वरूप हजारों-हजार मुकुटोंसे अलंकृत है। अतिशय मूल्यवान् अनेक अलंकारोंसे सुशोभित ऐसे अनन्तपार-स्वरूपकी स्तुति करनेमें भी मैं असमर्थ हूँ।

हे खगेश्वर! इस प्रकार अंगिराने स्तुति कर मौन धारण किया। इसके बाद पुलस्त्य स्तुति करनेके लिये उद्यत हुए।

पुलस्त्यने कहा— हे भगवन्! आप अपने उपासकोंके लिये जैसा मङ्गलकारी स्वरूप धारण करते हैं, उसी भुवनमङ्गल स्वरूपका दर्शन मुझे भी करायें। ऐसे रूपवाले आपको नमस्कार है। आप नरकसे रक्षा करनेवाले हैं। हे देव! मैं आपके गुणोंका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हूँ। हे भगवन्! मेरी रक्षा करें।

इस प्रकार स्तुति कर पुलस्त्यजी मौन हो गये। इसके अनन्तर पुलह स्तुति करने लगे।

पुलहने कहा— हे भगवन्! महापुरुषोंका कथन है कि निष्काम तथा रूपरहित भगवान्को समर्पित स्नान, उत्तम वस्त्र, दूध, फल, पुष्प, भोज्य पदार्थ तथा आराधन आदि सब व्यर्थ ही हैं तो फिर ऐसे निष्काम आपको ये सब अर्पित न करके मैं निष्काम बुद्धिसे आपको प्रणाम समर्पित करता हूँ। हे वैकुण्ठनाथ! आपके स्तवनकी शक्ति मुझमें नहीं है।

इस प्रकार स्तुति कर पुलह मौन हो गये। इसके बाद क्रतु स्तुति करने लगे।

क्रतुने कहा— हे भगवन्! प्राणोंके निकलते

६१२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ ब्रह्म-


समय आपके नाम ही संसारजन्य दुःखोंके विनाशक हैं। जो अनेक जन्मोंके पापको सहसा विनष्ट कर निर्मल मुक्ति प्रदान करते हैं, मैं उन नामशक्तिकी शरणमें हूँ।

हे विष्णो! जो आपकी भक्ति करनेमें असमर्थ हैं और केवल आपका नाममात्र लेते हैं, वे भी मुक्तिको प्राप्त करते हैं फिर जो भक्तिपूर्वक आपका स्मरण करते हैं, उनके विषयमें तो कहना ही क्या!

ये भक्त्या विवशा विष्णो नाममात्रैकजल्पकाः ।
तेऽपि मुक्तिं प्रयान्त्याशु किमुत ध्यायिनः सदा ॥
(७। ६४)

इस प्रकार स्तुति करके क्रतु भी मौन हो गये तब वैवस्वत मनुने स्तुतिसे नारायणको प्रसन्न किया।

विश्वामित्रने स्तुति करते हुए कहा— हे भगवन्! मैंने आपके चरणकमलोंका न तो ध्यान किया और न नित्य संध्योपासना ही की। ज्ञानरूपी द्वारके किवाड़को खोलनेमें दक्ष धर्मका उपार्जन भी मैंने नहीं किया। अन्तःकरणमें व्याप्त मलके विनाश करनेमें अत्यन्त कुशल आपकी कथा भी मैंने कानोंसे नहीं सुनी, इसलिये हे देव! मुझ अनाथकी आप सदा रक्षा करें—

न ध्याते चरणाम्बुजे भगवतो संध्यापि नानुष्ठिता
ज्ञानद्वारकपाटपाटनपटुर्धर्मोऽपि नोपार्जितः ।
अन्तर्व्यासमलाभिघातकरणे पट्वी श्रुता ते कथा
नो देव श्रवणेन पाहि भगवन् मामत्रितुल्यं सदा ॥
(७।७१)

—इस प्रकार स्तुति कर महामुनि विश्वामित्र हाथ जोड़कर खड़े हो गये।

हे खगेश्वर ! क्रतुके बाद मित्रने जगत्के कारण नारायणकी स्तुति करना आरम्भ किया।

**मित्रने कहा—**संसारके बन्धनको विनष्ट करनेवाले हे देव! आप प्राणियोंको संसारसे मुक्ति दिलानेवाले हैं तथा कल्याणके निधान हैं, मैं अज्ञानी हूँ, आपके चरणारविन्दोंको मैं प्रणाम करता हूँ। आप भगवान् वासुदेव ही अपने विषयमें जानते हैं। आपके यथार्थ स्वरूपको न मैं जानता हूँ न अग्नि तथा न ब्रह्मा-विष्णु-महेश—ये तीनों देवता, न मुनीन्द्र ही जानते हैं; परम भागवत भी आपके स्वरूपको नहीं जान सकते तो अन्यकी बात ही क्या है? हे परात्पर स्वामी! आप मेरी नित्य रक्षा करें।

हे खग! इस प्रकार हरिकी स्तुति कर मित्र मौन हो गये, उसके बाद ताराने स्तुति करना प्रारम्भ किया।

**ताराने कहा—**हे विष्णो! अनन्य-भावसे जो आपके प्रति दृढ़ भक्ति करते हैं, आपके लिये जो सभी कर्मोंको त्याग देते हैं और अपने स्वजनों तथा बान्धवोंका परित्याग कर देते हैं, आपकी कथाको सुनकर जो दूसरेको सुनाते हैं और कहते हैं, इस प्रकारके ये साधुगण सभीके प्रति आसक्तिसे रहित हो जाते हैं। हे प्रभो! जैसे आप उन साधुगणों—भक्तोंकी रक्षा करते हैं वैसे ही मेरी भी सदा रक्षा करें।

**निर्ऋतिने कहा—**योगपूर्वक आपके प्रति समर्पित जन भक्तिसे परम गतिको प्राप्त कर लेते हैं। भक्त श्रद्धाभावसे की गयी सेवासे, सांसारिक विषयोंकी अनासक्ति और चित्तका निग्रह करनेसे विष्णुके परमपदको प्राप्त करते हैं, इसलिये हे प्रभो! दयापूर्वक उनके समान मेरी भी रक्षा करें।

तदनन्तर भगवान्के पार्षद वायुपुत्र महाभाग विष्वक्सेनने हरिकी स्तुति करना प्रारम्भ किया।

**विष्वक्सेनने कहा—**पूर्णानन्दस्वरूप भगवान् कृष्ण यदि सदा मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं, यदि मेरी अपरोक्ष साधनरूपा परम भक्ति है और गुरुसे लेकर ब्रह्माण्डके साधुओंके प्रति यदि मेरी निष्कपट भक्ति है साथ ही तुलसी आदिके प्रति यदि मेरी प्रीति है और इनका सदा मुझे स्मरण है तो निश्चित ही मुझे आपका आशीर्वाद प्राप्त होगा, इसमें संदेह नहीं है।

इस प्रकार स्तुति कर महाभाग विष्वक्सेन चुप हो गये।

२७३- सूर्यपुत्री कालिन्दीकी कथा

काण्ड ] नारायणके प्राकृत तथा वैकृत सृष्टिका विस्तार ६१३

हे पक्षिराज ! इस प्रकार ब्रह्मा आदि देवों तथा लक्ष्मी आदि देवियोंने भगवान् हरिकी पृथक्-पृथक् स्तुति की और वे अंजलि बाँधकर मौन हो उनके सामने स्थित हो गये।
भगवान्ने उन सभीमें प्रविष्ट होकर उन्हें अपने शरीरमें आश्रय प्रदान किया। (अध्याय ६—९)


नारायणसे प्राकृत तथा वैकृत सृष्टिका विस्तार

गरुडजीने कहा—हे प्रभो ! देवताओंके द्वारा इस प्रकार स्तुति किये गये भगवान् विष्णु उन्हें आश्रय देकर स्वयं उन्हींमें किस प्रकार प्रविष्ट हुए और किस प्रकार सृष्टि हुई ? हे कृपालो ! आप इसे भलीभाँति बतायें।

श्रीकृष्णने कहा—वे भगवान् महाप्रभु उन सम्बन्धरहित तत्त्वोंमें प्रविष्ट हुए, इससे उनमें क्षोभ उत्पन्न हुआ। सबसे पहले भगवान्ने हिरण्मयात्मक ब्रह्माण्डकी सृष्टि की, जो पचास कोटियोजनमें चारों ओर विस्तृत था। उसके ऊपर अवस्थित अत्यन्त सूक्ष्म भाग उतने ही विस्तारमें फैला था, जितनेमें उस हिरण्मय अण्डका विस्तार था। उसके भी ऊपर पचास कोटि भूतल था। वह सात आवरणोंसे चारों ओर परिधिद्वारा घिरा हुआ था। पहले आवरणका नाम कबन्ध है। दूसरा आवरण अग्निदेवका है, तीसरा आवरण महात्मा हरका है, चौथा आवरण आकाशका है, पाँचवाँ आवरण अहंकारका है, छठा आवरण महत्तत्त्वात्मक है और सातवाँ आवरण त्रिगुणात्मक है। इसके अनन्तर अव्याकृत आकाश है; इसके विस्तारकी कोई सीमा नहीं है। इसी मण्डलके मध्यमें अव्यय हरि विराजमान रहते हैं। आठवाँ आवरण आकाशका है। उसके मध्यमें विरजा नदी है। इसकी परिधि पाँच योजन विस्तीर्ण है। यह अतिशय पुण्यवती नदी है। विरजा नदीमें भलीभाँति स्नान करके लिंग-देहका भी परित्याग कर हरिके मोक्षपदकी प्राप्ति होती है। प्रारब्ध कर्मोंका क्षय हो जानेपर ही विरजा नदीमें स्नान करना सम्भव होता है।

हे खगेश्वर ! प्रलयमें भी इस विरजा नदीका लय नहीं होता, उसे लक्ष्मीस्वरूपा समझें; क्योंकि वह प्राणियोंके लिंगशरीरका नाश करनेवाली है। विरजा नदीके बाद व्याकृत आकाश है जो निःसीम है, उसकी अभिमानिनी देवता लक्ष्मी हैं। सृष्टिके समय उस ब्रह्माण्डके अभिमानी देवता ब्रह्मा थे, जो विराट् नामसे कहे गये। इस प्रकार ब्रह्माण्ड आदिका सर्जन कर अव्ययात्मा भगवान् हरि उन-उन तत्त्वाभिमानी देवताओंके साथ उस ब्रह्माण्डके ऊपर-नीचे—सर्वत्र व्याप्त होकर नित्य स्थित रहते हैं। हे पक्षिराज ! यह प्राकृत सृष्टि है, अव्यक्त आदिसे लेकर पृथ्वीतकके जो भी तत्त्व इस अण्डरूप जगत्में बाह्यरूपसे उत्पन्न हुए हैं, वे सभी प्राकृत सृष्ट कहे जाते हैं और ब्रह्माण्ड तथा ब्रह्माण्डान्तर्वर्ती सृष्टि वैकृत सृष्टि कही जाती है।

हे अण्डज ! जिन्हें पुरुष कहा गया है वे हरि तो साक्षात् भगवान् पुरुषोत्तम ही हैं। उन विष्णुने उस हिरण्मय अण्डके मध्य विद्यमान जलराशिमें एक हजार वर्षतक शयन किया था। उस समय लक्ष्मी ही जलरूपमें थीं, शय्यारूपमें विद्या थीं, तरंगरूपमें वायु थे और तम ही निद्रारूपमें था। इसके अतिरिक्त वहाँ और कोई नहीं था। उसी उदकके मध्यमें नारायण योगनिद्रामें स्थित थे। हे पक्षिश्रेष्ठ ! उस समय लक्ष्मीने उस जलगर्भमें शयन कर रहे हरिकी स्तुति की। हरिकी प्रकृति उस समय लक्ष्मी तथा धरा (भूदेवी)—इन दो रूपोंको धारण कर लेती है और शेष वेदका रूप धारण करके जलके मध्य सोये हरिकी स्तुति करते हैं। स्तुतिसे प्रसन्न हुए नित्य प्रबुद्ध वे महाविष्णु निद्राका परित्याग कर प्रबुद्ध हो उठे। उस समय

२७४- लक्ष्मणाद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त करनेकी कथा

६१४संक्षिप्त गरुडपुराण[ ब्रह्म-

उनकी नाभिसे सम्पूर्ण जगत्‌का आश्रयभूत हिरण्मय पद्म प्रादुर्भूत हुआ। इसे प्राकृत सृष्टिके रूपमें समझना चाहिये। उस सृष्टिकी अभिमानिनी देवता भूदेवी थीं। वह पद्म असंख्य सूर्योंके समान प्रकाशवाला कहा गया है। चिदानन्दमय विष्णु उससे भिन्न हैं, उस पद्मको भगवान्‌के किरीट आदि आभूषणोंके समान समझना चाहिये।

हरिके किरीट आदि भी दो प्रकारके हैं—एक स्वरूपभूत तथा दूसरे स्वरूपभिन्न। उस पद्मसे सभी लोकोंके विधायक ब्रह्माण्डकी सृष्टि हुई। उस हिरण्मय पद्मसे चतुर्मुख ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए। किसने मेरी सृष्टि की है, वह प्रभु कौन है? ऐसी जिज्ञासावश ब्रह्मा उस पद्मके नालमें प्रविष्ट हो गये। किंतु अज्ञानवश जब वे नारायणके विषयमें कुछ जान न सके तब उस समय उन्हें 'तप', 'तप' इस प्रकार ये दो शब्द सुनायी दिये। उन शब्दोंके अभिप्रायको ठीक-ठीक समझते हुए विष्णुमें एकमात्र निष्ठा रखनेवाले ब्रह्माने हरिकी प्रीति प्राप्त करनेकी इच्छासे दिव्य हजार वर्षतक तपस्या की। हे खगेन्द्र! तपस्यासे प्रसन्न होकर हरि भक्तश्रेष्ठ ब्रह्माको दिव्य वर प्रदान करनेके लिये प्रकट हो गये। भगवान्‌ चतुर्भुजधारी थे, कमलके समान उनके नेत्र थे, वक्षःस्थल श्रीवत्ससे सुशोभित था तथा गला कौस्तुभमणिकी मालासे अलंकृत था, वे अत्यन्त प्रसन्न मुद्रामें थे, उनके नेत्र करुणासे आर्द्र थे। ऐसे उन नारायणका ब्रह्माको दर्शन हुआ।

भक्तोंके वशमें रहनेवाले, अत्यन्त दयालु परब्रह्मस्वरूप नारायणको अपने समक्ष देखकर ब्रह्माने बड़ी ही श्रद्धा-भक्तिसे उनकी पूजा की और उनके पादतीर्थको मस्तकपर धारण किया। तदनन्तर भक्तिमानोंमें श्रेष्ठ तथा महाभागवतोंमें प्रधान ब्रह्माने उन हरिकी अनेक प्रकारसे स्तुति की और उनके सामने वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये।

श्रीकृष्णने पुनः कहा—ब्रह्माजीके द्वारा स्तुति किये जानेपर दयाके सागर भगवान्‌ मधुसूदन मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले—हे ब्रह्मन्‌! मेरे प्रसादसे इन देवताओंकी वैसी ही सृष्टि आप करें, जिस प्रकार पूर्वकालमें आपके द्वारा हुई थी। यद्यपि इस सृष्टि-कार्यसे आपका कोई प्रयोजन नहीं है, फिर भी मेरी प्रसन्नताके लिये आप ऐसा करें। हरिके ऐसा कहनेपर ब्रह्माने उन हरिकी स्तुति करके उनकी प्रसन्नताके लिये मनमें सृष्टि करनेका निर्णय लिया। तब महत्तत्वात्मक ब्रह्माने सर्वप्रथम जीवके अभिमानी देवता वायुदेवकी सृष्टि की। हे गरुड! वे ही प्रथम सृष्टिके पुरुषात्मा हैं। तदनन्तर ब्रह्माने अपने दाहिने हाथसे ब्रह्माणी तथा भारती नामक दो देवियोंकी सृष्टि की। बायें हाथसे सत्यके पुत्र महत्तत्वात्मक अनलको उत्पन्न किया। ब्रह्माके दाहिने हाथसे ही अहंकारात्मक हरकी सृष्टि हुई। इसी प्रकार गरुड, शेष, वायु, गायत्री, वारुणी, सौपर्णी, चन्द्र, इन्द्र, कामदेव, इन्द्रियोंके अभिमानी देवताओं, मनु-शतरूपा, दक्ष, नारदादि ऋषियों, कश्यप, अदितिदेवी, वसिष्ठ आदि ब्रह्मज्ञानी ऋषियों, कुबेर, विष्वक्सेन तथा पर्जन्य आदि देवसृष्टिका उनसे प्रादुर्भाव हुआ। हे खगेश्वर! मेरी कृपासे ही ब्रह्मा इस सृष्टि-कार्यमें समर्थ हो सके।

(अध्याय १०—१३)

काण्ड ] नारायणकी पूर्णताका वर्णन तथा पदार्थोंके सारासारका निर्णय ६१५

नारायणकी पूर्णताका वर्णन तथा पदार्थोंके सारासारका निर्णय

श्रीकृष्णने कहा—हे पक्षिराज! जो मूलस्वरूप पूर्ण गुणसम्पन्न सर्वथा स्वतन्त्र, पुरातन पूर्ण शरीरवाले आनन्दस्वरूप भगवान् अनन्त हैं उनके समान कोई भी नहीं है। उनके चरण आदि सभी अङ्ग अपनेमें पूर्ण हैं। उनके एक-एक रोममें उतना ही बल है जितना उनका समग्र बल है। इस प्रकार वे सब प्रकारसे पूर्ण हैं। अतः वे ही सबके कर्ता हैं, वे ही सबके हर्ता हैं और वे ही इस सृष्टिके सार अंशके भोक्ता भी हैं।

हे पक्षीन्द्र! वे हरि सारहीन अथवा असार-अंशका भोग नहीं करते, समस्त द्रव्य पदार्थोंके सारभागको ही ग्रहण करते हैं। वे नित्य भक्तोंके प्रति दयालु और भक्तोंके हितचिन्तक हैं। भक्तोंद्वारा निवेदित भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थों तथा उपचारोंके सारभागको वे बड़े ही आदरके साथ ग्रहण करते हैं। समयद्वारा दूषित एवं भावदुष्ट पदार्थोंको नारायण ग्रहण नहीं करते; द्राक्षा आदि जो फल उन्हें समर्पित किये जाते हैं, वे भी काल आदिके प्रभावसे दोषयुक्त हो जाते हैं इसलिये हे पक्षिश्रेष्ठ! अब आप द्रव्योंके सारासारके विषयमें सुनें—

जामुन आदिके फल अतिशय पकनेके बाद चार दिनमें सारहीन हो जाते हैं। एक मासके बाद कटहल असार हो जाता है। छः मासके बाद खजूर तिक्त पदार्थके समान हो जाता है। पवित्र नारिकेल फोड़नेके बाद एक दिन-रातके अनन्तर असार हो जाता है। सूखे नारिकेल और खजूरमें यह दोष नहीं आता।

हे पक्षिराज! एक वर्षके बाद सुपाड़ी, एक घड़ी (२४ मिनट)-के बाद ताम्बूल, तीन घंटेके बाद पके हुए अन्न और सूप आदि असार हो जाते हैं। तीन पक्षके बाद तेलमें पकाया पदार्थ और बारह घंटेके बाद घीमें पकाया हुआ पदार्थ असार हो जाता है। नौ घंटेके बाद शाक निःसार हो जाता है। जम्बीरी नीबू, शृंगवेर, आँवला, कपूर तथा आम एक वर्षके बाद निःसार हो जाते हैं। परंतु हे द्विज! तुलसी सदा सारयुत ही रहती है, एकादशीके दिन गीली हो या सूखी हो अथवा जलके साथ हो वह सदा सारवान् ही बनी रहती है—

तुलसी सर्वदा सारा एकादश्यामपि द्विज।
आर्द्रा वाप्यथवा शुष्का सार्द्रा सारवती स्मृता॥
(१४।२९)

सारयुता तुलसीको ग्रहण करना चाहिये। एकादशीके दिन अन्न निःसार हो जाता है। हे खगेश्वर! एकादशीके दिन मनुष्योंके लिये हरिका तीर्थ (चरणामृत) सार होता है। हे गरुड! आषाढ़ मासमें शाक, भाद्रपद मासमें दही, आश्विन मासमें दूध निःस्सार हो जाता है, इसी प्रकार हरिके नामोच्चारसे विहीन मुख और हरिको नैवेद्यके रूपमें अर्पित किये बिना बना हुआ समस्त भोजन निःसार हो जाता है—

हरिनाम विहीनं तु मुखं निःसारमुच्यते।
हरिनैवेद्यहीनस्तु पाको निःसार उच्यते॥
(१४।३७)

तीन दिनमें अलसीका पुष्प, एक प्रहरमें मल्लिका, आधे पहरके बाद चमेली सारहीन हो जाती है। तीन वर्षतक केसर, दस वर्षतक कस्तूरी तथा एक वर्षतक कपूर सारवान् कहा गया है, परंतु चन्दनको सदा सारवान् ही कहा गया है—

ससारमितिसम्प्रोक्तं चन्दनं सर्वदा स्मृतम्॥
(१४।४१)

(अध्याय १४)