गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| काण्ड ] | वर्णधर्म-निरूपण | १५७ |
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वर्णधर्म-निरूपण
याज्ञवल्क्यजीने कहा—गर्भधारण अथवा जन्म-ग्रहणके आठवें वर्षमें ब्राह्मण, ग्यारहवें वर्षमें क्षत्रिय तथा बारहवें वर्षमें वैश्यका उपनयन-संस्कार गुरु करे अथवा कुल-परम्पराके अनुसार करे। गुरु इस उपनीत शिष्यको महाव्याहृतियोंके सहित वेद पढ़ाये और शौचाचारकी शिक्षा प्रदान करे।
द्विजोंको दिन और संध्याकालमें उत्तराभिमुख तथा रात्रिके समय दक्षिणाभिमुख होकर मल-मूत्रका परित्याग करना चाहिये। तदनन्तर मिट्टीसे एवं जलसे* मल-मूत्रके गन्ध एवं लेपका निवारण जबतक न हो तबतक इन्द्रियोंका परिमार्जन करे।
तत्पश्चात् शुद्ध स्थानमें जाकर दोनों पाँवोंको भलीभाँति धोकर दोनों जानुओंके मध्य अपने हाथोंको अवस्थित करके उत्तराभिमुख या पूर्वाभिमुख बैठे और दाहिने हाथमें स्थित ब्राह्मतीर्थ (अर्थात् अंगुष्ठका मूल स्थान)-से आचमन करे। कनिष्ठा, तर्जनी एवं अंगुष्ठ अंगुलिके मूल स्थान तथा हाथके अग्रभागमें क्रमशः प्रजापतितीर्थ, पितृतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ और देवतीर्थका अधिष्ठान होता है।
कूप एवं तड़ागादिके शुद्ध जलसे तीन बार आचमन करके अंगुष्ठमूलसे दो बार ओठोंका मार्जन करना चाहिये। द्विजातियोंको चाहिये कि वे फेन और बुद्बुदोंसे रहित प्रकृतिद्वारा प्रदत्त शुद्ध-स्वाभाविक जलसे अपनी इन्द्रियोंका स्पर्श यथाविधि करें। हृदय, कण्ठ एवं तालुतक पहुँचनेवाले जलसे ही क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य आचमन करके शुद्ध होते हैं। स्त्री एवं शूद्रकी तालुतक पहुँचनेवाले शुद्ध जलसे एक बार आचमन करनेसे ही शुद्धि हो जाती है। जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ है, उनके लिये भी इसी प्रकार आचमनकी व्यवस्था है।
प्रातःस्नान, जलदैवत 'ॐ आपो हि ष्ठा०' आदि मन्त्रोंसे मार्जन, प्राणायाम, सूर्योपस्थान एवं गायत्रीमन्त्रका जप प्रतिदिन अपने अधिकारके अनुसार यथाविधि करना चाहिये।
'ॐ आपो ज्योती०' आदि मन्त्र ही गायत्रीमन्त्रका शिरोभाग हैं। इस शिरोभागसे युक्त प्रतिमहाव्याहृति एक-एक बार प्रणव जोड़कर तीनों महाव्याहृतियोंके साथ गायत्रीमन्त्रका मानस-जप करते हुए मुख एवं नासिकामें संचरणशील वायुका नियमन करना ही प्राणायाम है।
प्राणायाम करनेके पश्चात् तीन बार जल देवताके मन्त्रसे प्रोक्षणकर प्रतिदिन सायंकाल नक्षत्रदर्शनतक पश्चिममुख बैठकर गायत्रीमन्त्रका जप करे। इसी प्रकार प्रातःकालकी संध्या करके पूर्वमुख होकर गायत्रीमन्त्रका जप करते हुए सूर्यदर्शनके समयतक स्थिर रहे। उन दोनों संध्याओंमें अपने गृह्यसूत्रके अनुसार अग्निहोत्र करे।
तदनन्तर 'मैं अमुक हूँ' इस प्रकार कहते हुए वृद्धजनों (गुरु आदि बड़े लोगों)-को प्रणाम करे। इसके बाद संयमी ब्रह्मचारी स्वाध्यायके लिये एकाग्रचित्त होकर गुरुकी सेवामें उनके अधीन सदा रहे। तत्पश्चात् गुरुके द्वारा बुलानेपर उनके पास जाकर अध्ययन करे (गुरुको स्वयं अध्यापनके लिये प्रेरित न करे) और भिक्षामें जो कुछ प्राप्त हो, उसे गुरुके चरणोंमें समर्पित करे। मन, वाणी और शरीरके द्वारा गुरुके हितकारी कार्योंमें सदा संलग्न रहे।
ब्रह्मचारीको दण्ड, मृगचर्म, यज्ञोपवीत और मूँजमेखलाका धारण यथाशीघ्र करना चाहिये तथा
* कूप आदिसे बाहर निकाले गये जलके द्वारा शुद्धिका विधान है। जलके मध्य शौच आदि क्रिया निषिद्ध है।
१५८ [ आचार- संक्षिप्त गरुडपुराण
अपनी जीविकाके लिये अनिन्दित श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके घरसे भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। भिक्षा ग्रहण करते समय ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य-वर्णके ब्रह्मचारीको क्रमशः आदिमें, मध्यमें तथा अन्तमें 'भवति' शब्दका प्रयोग करना चाहिये। इसके अनुसार 'भवति भिक्षां देहि', 'भिक्षां भवति देहि' और 'भिक्षां देहि भवति'—इस प्रकार वाक्यप्रयोग यथाक्रम ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य ब्रह्मचारीको करना विहित है। इस वाक्यका अर्थ है—आप भिक्षा दें। 'भवति' यह माताओंके लिये सम्बोधन है।
अग्निकार्य (अग्निहोत्र) करके गुरुकी आज्ञासे विनयपूर्वक आपोऽशान¹-क्रिया करके सम्मानके सहित उस भिक्षासे प्राप्त भोज्यान्नको बिना निन्दा किये ही मौन होकर ग्रहण करना चाहिये। ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए आपित्तरहित कालमें, रोग आदिके अभावमें अनेकका अन्न ग्रहण करे (एक घरका अन्न न ग्रहण करे)। अपने व्रतका संयमपूर्वक पालन करता हुआ ब्राह्मण ब्रह्मचारी श्राद्धमें आदरपूर्वक आहूत होनेपर इच्छानुसार भोजन कर सकता है, किंतु उसे श्राद्धकाल या अन्य अवसरोंमें मधु, मद्य, मांस अथवा उच्छिष्ट अन्न भोजनके रूपमें ग्रहण नहीं करना चाहिये।
जो विधि-विहित क्रियाओंको सम्पन्न कराके ब्रह्मचारीको वेदकी शिक्षा प्रदान करता है, वही 'गुरु' है। जो केवल यज्ञोपवीत-संस्कार कराके ब्रह्मचारीको वेदकी शिक्षा देता है, वह 'आचार्य' कहा गया है। जो वेदके एक देशका² अध्ययन कराता है, वह 'उपाध्याय' है। जो वरण लेकर यजमानके यज्ञको सम्पन्न करता है, उसे 'ऋत्विक्' कहा जाता है। यथाक्रम ये सभी—गुरु, आचार्य, उपाध्याय और ऋत्विक् ब्रह्मचारीके लिये मान्य हैं, किंतु इन सभीसे माता श्रेष्ठ है।
प्रत्येक वेदके अध्ययनके लिये बारह-बारह वर्षतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करना चाहिये। अशक्तावस्थामें प्रत्येक वेदके अध्ययनके लिये पाँच-पाँच वर्षतक भी ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया जा सकता है। कुछ लोगोंका यह भी मत है कि वेदाध्ययन पूर्ण होनेतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन होना चाहिये। केशान्त³-संस्कार गर्भसे सोलहवें वर्षमें ब्राह्मणका, गर्भसे बाईसवें वर्षमें क्षत्रियका तथा गर्भसे चौबीसवें वर्षमें वैश्यका होना चाहिये।
ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यवर्णके लिये क्रमशः सोलह, बाईस और चौबीस वर्षतक उपनयनकाल रहता है। इस कालतक उपनयन न होनेपर ये सभी पतित हो जाते हैं, सर्वधर्मच्युत हो जाते हैं। उनका किसी भी धर्मकार्यमें अधिकार नहीं रहता। व्रात्यस्तोम नामके क्रतुका अनुष्ठान करके ही ये यज्ञोपवीत-संस्कारके लिये योग्य होते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य सबसे पहले माताके उदरसे उत्पन्न होते हैं, उसके बाद पुनः मौञ्जीबन्धन अर्थात् यज्ञोपवीत-संस्कारसे उनका द्वितीय जन्म होता है। अतः ये द्विजाति कहलाते हैं।
श्रौत-स्मार्त यज्ञ, तपस्या (चान्द्रायण आदि व्रत) और शुभकर्मों (उपनयन आदि संस्कारों)-का बोधक एकमात्र वेद है। अतः द्विजातियोंके लिये वेद ही परम कल्याणका साधन है। इससे वेदमूलक स्मृतियोंका भी उपयोग स्पष्ट है।
जो द्विज प्रतिदिन ऋग्वेदका अध्ययन करता है, वह देवताओंको मधु एवं दुग्धसे तथा पितरोंको
१-भोजनके पूर्व तथा अन्तमें एक बार जलसे आचमन करना 'आपोऽशान-क्रिया' है। इसमें 'अमृतोपस्तरणमसि' इस वाक्यका प्रयोग विहित है।
२-मन्त्र एवं ब्राह्मणरूपमें वेदके दो भाग हैं। इनमेंसे केवल एक भागका अध्यापन अथवा वेदके अङ्गमात्रका अध्यापन वेदके एक देशका अध्यापन है।
३-केशान्त-संस्कारसे ही श्मश्रु (दाढ़ी) बनवानेका आरम्भ होता है।
काण्ड ] गृहस्थधर्म-निरूपण [ १५९
मधु एवं घृतसे प्रतिदिन तृप्त करता है। जो द्विज प्रतिदिन यजुर्वेद, सामवेद अथवा अथर्ववेदका अध्ययन करता है, वह घृत एवं अमृतसे पितरों तथा देवताओंको प्रतिदिन तृप्त करता है। ऐसे ही जो द्विज प्रतिदिन वाकोवाक्य<sup>१</sup>, पुराण, नाराशंसी<sup>२</sup>, गाथिका<sup>३</sup>, इतिहास<sup>४</sup> तथा विद्याका<sup>५</sup> अध्ययन करता है, वह पितरों एवं देवताओंको मांस (फल), दूध और ओदन (भात)-से प्रतिदिन तृप्त करता है। संतृप्त ये देवता और पितृजन भी इस स्वाध्यायशील द्विजको समस्त अभीष्ट शुभ फलोंसे संतुष्ट करते हैं। द्विज जिस-जिस यज्ञके प्रतिपादक वेद-भागका अध्ययन करता है, उस-उस यज्ञके फलको प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त भूमिदान, तपस्या और स्वाध्यायके फलका भी भागी होता है।
नैष्ठिक ब्रह्मचारीको अपने आचार्यके सांनिध्यमें रहना चाहिये। आचार्यके अभावमें आचार्यपुत्र और उसके अभावमें आचार्य-पत्नी तथा उसके भी अभावमें वैश्वानर-अग्निके आश्रयमें (अपनेद्वारा उपास्य अग्निकी शरणमें) रहना चाहिये। इस प्रकार अपने देहको क्षीण करता हुआ जितेन्द्रिय द्विज ब्रह्मचारी ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। उसका पुनः जन्म नहीं होता। (अध्याय ९४)
गृहस्थधर्म-निरूपण
याज्ञवल्क्यजीने कहा—हे यतव्रत मुनियो! आप सभी अब गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन सुनें।
(विद्याध्ययनकी समाप्तिके पश्चात्) गुरुको दक्षिणा प्रदान करके उन्हींकी अनुज्ञासे स्नानकर शिष्यको ब्रह्मचर्यव्रतकी समाप्ति करनी चाहिये। तदनन्तर वह सुलक्षणा, अत्यन्त सुन्दर मनोरमा, असपिण्डा, अवस्थामें छोटी, अरोगा, भ्रातृमती, भिन्न प्रवर एवं गोत्रवाली कन्यासे विवाह करे।
सभी असपिण्डा कन्याको विवाहयोग्य बताया गया है। इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि सपिण्डा कन्यासे विवाह नहीं करना चाहिये। महर्षि याज्ञवल्क्यने यहाँ सपिण्डाके बारेमें यह बताया है—मातासे लेकर उनके पिता, पितामह आदिकी गणनामें पाँचवीं परम्परात्तक तथा पितासे लेकर उनके पिता, पितामह आदिकी गणनामें सातवीं परम्परात्तक सपिण्ड्य समझना चाहिये। इसके मध्यमें आनेवाली कन्या सपिण्ड्य तथा इसके मध्यमें न आनेवाली कन्या असपिण्डा होगी। इसके अनुसार विवाहके लिये असपिण्डा कन्याका चयन होना चाहिये। ऐसे ही उसी कन्यासे विवाह उचित है, जिसका मातृकुल तथा पितृकुलमें पाँच-पाँच परम्परात्तक सदाचार, अध्ययन एवं पुत्र-पौत्रादिकी समृद्धिकी दृष्टिसे विख्यात हो। ऐसे ही कन्याके लिये समानवर्णमें उत्पन्न श्रोत्रिय एवं विद्वान् पुरुष श्रेष्ठ होता है। अन्य विद्वानोंने जो यह कहा है कि द्विजातियोंके लिये शूद्रकुलमें उत्पन्न हुई कन्या भी ग्रहण करने योग्य होती है, यह मेरा अभिमत नहीं है, क्योंकि उस कन्यामें उससे विवाह करनेवाला उसका पति ही स्वयं उत्पन्न होता है<sup>६</sup>। तीनों वर्ण तीन, दो, एक इस क्रमसे वर्णोंमें विवाह कर सकते हैं। शूद्र-वर्णको अपने ही वर्णसे कन्या प्राप्त करनी चाहिये।
अपने घरपर वरको बुलाकर उसे यथाशक्ति अलंकृत अपनी कन्या प्रदान करना 'ब्राह्मविवाह'
<sup>१</sup>-वाकोवाक्य—प्रश्नोत्तररूप वेद-वाक्य। <sup>२</sup>-नाराशंसी—रुद्रदैवत्य मन्त्र। <sup>३</sup>-गाथिका—यज्ञ-सम्बन्धी इन्द्र आदिकी गाथाएँ। <sup>४</sup>-इतिहास—महाभारत आदि। <sup>५</sup>-विद्या—वारुणी आदि विभिन्न विद्याएँ। <sup>६</sup>-'आत्मा वै जायते पुत्रः' के अनुसार पिता ही पुत्रके रूपमें जन्म लेता है।
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है। इस विधिसे विवाहित स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न होनेवाली संतान दोनों कुलोंके इक्कीस पीढ़ियोंको पवित्र करती है। यज्ञदीक्षित ऋत्विक् ब्राह्मणको अपनी कन्या देना 'दैवविवाह' है तथा वरसे एक जोड़ा गौ (स्त्री गौ एवं पुरुष गौ) लेकर उसको कन्या प्रदान करना 'आर्षविवाह' कहा जाता है। इस प्रथम (ब्राह्मविवाह) विधिसे विवाहित स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न पुत्र अपनी प्रथमकी सात तथा बादकी सात—इस तरह चौदह पीढ़ियोंको पवित्र करता है। आर्षविधिके विवाहसे उत्पन्न पुत्र तीन पूर्व तथा तीन बादकी—इस तरह छः पीढ़ियोंको पवित्र करता है।
'तुम इस कन्याके साथ धर्मका आचरण करो'—यह कहकर विवाहकी इच्छा रखनेवाले वरको पिताके द्वारा जब कन्या प्रदान की जाती है, तब ऐसे विवाहको 'काय (प्राजापत्य)-विवाह' कहते हैं। इस विवाह-विधिसे उत्पन्न पुत्र अपनेसहित पूर्वकी छः तथा बादकी छः पीढ़ियों—इस तरह कुल तेरह पीढ़ियोंको पवित्र करता है। कन्याके पिता या बन्धु-बान्धव अथवा कन्याको ही यथाशक्ति धन देकर यदि कोई वर उससे विवाह करता है तो इस विवाहको 'असुरविवाह' और वर एवं कन्याके बीच पहले ही पारस्परिक सहमति हो जानेके बाद जो विवाह होता है, उसको 'गान्धर्वविवाह' कहते हैं। कन्याकी इच्छा नहीं है, तब भी बलात् युद्ध आदिके द्वारा अपहृत उस कन्याके साथ विवाह करना 'राक्षसविवाह' है। स्वाप (शयन) आदि अवस्थामें अपहरणकर उसके साथ जो विवाह किया जाता है, उसको 'पैशाचविवाह' कहते हैं।
इन उपर्युक्त आठ विवाहोंमें प्रथम चार प्रकारके विवाह अर्थात् ब्राह्म, दैव, आर्ष और प्राजापत्यविवाह ब्राह्मणवर्णके लिये उपयुक्त हैं। गान्धर्वविवाह तथा राक्षसविवाह क्षत्रियवर्णके लिये उचित है। असुरविवाह वैश्यवर्ण और अन्तिम गर्हित पैशाच नामक विवाह शूद्रवर्णके लिये (उचित) माना गया है।
समान वर्णवाले वर-कन्याके विवाहमें कन्याओंके द्वारा गृह्यसूत्रकी विधिके अनुसार वरका पाणिग्रहण अर्थात् हाथ पकड़ना चाहिये। क्षत्रियकन्या ब्राह्मणवरसे विवाह करते समय ब्राह्मणवरके दाहिने हाथमें विद्यमान शर (बाण)-के एकदेशको ग्रहण करे। वैश्यकन्या ब्राह्मण अथवा क्षत्रियवरसे विवाह करते समय वरके हाथमें विद्यमान चाबुकके एकदेशको ग्रहण करे। ऐसे ही शूद्रकन्या ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्यवरसे विवाह करते समय वरके उत्तरीय वस्त्र (ऊपर ओढ़े हुए चादर)-के किनारेको ग्रहण करे^२।
पिता, पितामह, भ्राता, सकुल्य^३ (बन्धु-बान्धव) अथवा माता कन्यादान करनेके अधिकारी हैं। पूर्वके अभावमें उत्तरोत्तर कन्यादानके अधिकारी हैं, यदि उन्माद आदि दोषसे ग्रस्त नहीं हैं। यदि कन्यादानका अधिकारी समयपर कन्यादान न करे तो कन्याके ऋतुमती हो जानेपर कन्यादानके अधिकारीको कन्याके प्रति ऋतुकालमें एक-एक भ्रूणहत्याका पाप लगता है। कन्यादानके दाताके अभावमें कन्याको स्वयं उपयुक्त वरका वरण कर लेना चाहिये।
कन्या एक बार दी जाती है, इसलिये कन्या एक बार देकर पुनः उसका अपहरण करनेवाला
^१-कन्याका पिता वरसे गौका जोड़ा मूल्यके रूपमें नहीं लेता, आवश्यकतावश धर्मकार्य (याग आदि) सम्पन्न करनेके लिये होता है। इसीलिये मनुस्मृति (३। २९)-के अनुसार जितनासे धर्मकार्य हो सके, उतना ही (एक ही गौ या गौका जोड़ा) कन्या-पिताको वरसे लेना चाहिये।
^२-दूसरे वर्णसे विवाह करनेकी यह व्यवस्था कलियुगके लिये नहीं है।
^३-सकुल्य—आठवीं पीढ़ीसे दसवीं पीढ़ीतक 'सकुल्य' कहा जाता है।
७८- द्रव्यशुद्धि
| काण्ड ] | गृहस्थधर्म-निरूपण | १६१ |
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चौरकर्मके समान दण्डका भागी होता है। निर्दुष्ट अर्थात् सौम्य सुशीला पत्नीका परित्याग करनेपर पति दण्डनीय है, किंतु अत्यन्त दुष्ट (महापातक आदिसे दुष्ट) पत्नीका उपायान्तरके अभावमें परित्याग किया जा सकता है।
यदि कन्याका किसी वरके साथ विवाह करनेके लिये वाग्दानमात्र किया गया हो, अनन्तर विवाहके पूर्व ही वरका मरण हो गया तो कलियुगसे अन्य युगोंमें ऐसी कन्याको पुत्र प्राप्त करनेका उपाय यह है—ऐसी कन्या पुत्र चाहती है तो उसका देवर अथवा कोई सपिण्ड या कोई सगोत्र बड़ोंकी आज्ञा प्राप्त होनेपर अपने सभी अङ्गोंमें घृतलेप कर ऋतुकालमात्रमें उस कन्याके पास तबतक जा सकता है, जबतक गर्भ-धारण न हो। गर्भ-धारणके बाद यदि वह ऐसी कन्याके पास जाता है तो पतित हो जाता है। इस विधिसे इस कन्यासे उत्पन्न पुत्र जिस वरको कन्याका वाग्दान किया गया था, उसका क्षेत्रज पुत्र माना जाता है।
जो स्त्री व्यभिचारिणी है, बहुत प्रयत्न करनेपर भी व्यभिचारसे विरत नहीं हो रही है, उसको अपने गर्हित जीवनके प्रति वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये अपने घरमें ही रखते हुए समस्त अधिकारोंसे अलग कर देना चाहिये तथा उसे मलिनदशामें ही रखकर उतना ही भोजन देना चाहिये, जितनासे उसकी प्राणरक्षामात्र हो सके। साथ ही उसके निन्दनीय कर्मके लिये उसकी भर्त्सना करनी चाहिये और भूमिपर ही उसके शयनकी व्यवस्था करनी चाहिये।
स्त्रियोंको विवाहसे पूर्व चन्द्रने शुचिता, गन्धर्वने सुन्दर मधुर वाणी एवं अग्निने सब प्रकारकी पवित्रता प्रदान की है। इसीलिये स्त्रियाँ पवित्र ही होती हैं। अतएव उनके लिये अल्प प्रायश्चित्तकी व्यवस्था है। पर इतनेसे यह नहीं समझना चाहिये कि स्त्रियोंमें दोषका संक्रमण नहीं होता है। यदि कोई स्त्री केवल मनसे पर पुरुषकी इच्छा करती है तो यह भी एक तरहका व्यभिचार ही है। ऐसे ही अन्य पुरुषसे सम्पर्क करनेका संकल्पमात्र कोई स्त्री कर लेती है तो यह भी किसी रूपमें व्यभिचार ही है। ऐसा व्यभिचार यदि प्रकाशमें नहीं आया है तो इससे उत्पन्न दोषका मार्जन उस स्त्रीके ऋतुकालमें रजोदर्शनसे हो जाता है। यदि पर पुरुष शूद्रके साथ सम्पर्क कर कोई स्त्री गर्भधारण कर लेती है तो इस पापका प्रायश्चित्त उस स्त्रीका त्याग ही है। ऐसे ही गर्भबध, पतिका वध, ब्रह्महत्या आदि महापातकसे ग्रस्त होनेपर तथा शिष्य आदिके साथ गमन करनेवाली स्त्रीका त्याग ही कर देना चाहिये।
मदिरापान करनेवाली, दीर्घ रोगिणी, द्वेष रखनेवाली, वन्ध्या, अर्थका नाश करनेवाली, अप्रियवादिनी (निष्ठुरभाषिणी), कन्याको ही उत्पन्न करनेवाली एवं पतिका अहित ही करनेवाली भार्याका परित्याग कर दूसरा विवाह किया जा सकता है। प्रथम विवाहिता (परित्यक्ता) स्त्रीका भी दान, मान, सत्कार आदिके द्वारा भरण करना चाहिये, अन्यथा उस स्त्रीके पतिको महापाप होता है। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान देने योग्य है कि जिस घरमें पति-पत्नीके मध्य किसी भी प्रकारका विरोध नहीं होता, उस घरमें धर्म-अर्थ और काम—इस त्रिवर्गकी अभिवृद्धि होती है। अतः प्रथम विवाहिता एवं वर्तमान भार्यामें, अस्वीकृत स्त्री भी पूर्वमें भार्या रही है। इस दृष्टिसे उससे विरोध नहीं ही करना चाहिये। उसे पूर्ण प्रसन्न रखना चाहिये। जो स्त्री पतिकी मृत्युके पश्चात् अथवा उसके जीवित रहते हुए अन्य पुरुषका आश्रय नहीं लेती, वह इस लोकमें यश प्राप्त करती है और अपने पातिव्रत्य-पुण्यके प्रभावसे परलोकमें
७९- दान-धर्मकी महिमा
| १६२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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जाकर पार्वतीके साहचर्यमें आनन्द प्राप्त करती है।
यदि पति अपनी स्त्रीका परित्याग करता है तो उस स्त्रीको भरण-पोषणके लिये अपनी सम्पत्तिका तृतीयांश दे देना चाहिये।
स्त्रियोंको अपने पतिकी आज्ञाका पालन करना चाहिये—यही उनका परम धर्म है। स्त्रियोंमें ऋतु अर्थात् रजोदर्शनके प्रथम दिनसे सोलह रात्रितक उनका ऋतुकाल होता है। अतः पुरुषको उक्त सोलह रात्रियोंकी युग्म रात्रियोंमें अपनी पत्नीके साथ पुत्र-प्राप्तिके लिये संसर्ग करना चाहिये¹। पर्वोंकी तिथियोंमें² तथा ऋतुकालकी प्रारम्भिक चार तिथियोंमें सहवास नहीं करना चाहिये। अपनी अपेक्षा क्षाम (दुर्बल) स्त्रीका सहवास पुत्र-प्राप्तिमें सहायक होता है। मघा और मूल नक्षत्रमें सहवास वर्जित है।
इन नियमोंका पालन करके ही अपनी स्त्रीसे सुन्दर, सबल, उत्तम लक्षणोंवाले नीरोग पुत्रको उत्पन्न किया जा सकता है। स्त्रियोंको इन्द्रने जो वर³ दिया है, उसे ध्यानमें रखते हुए पुरुष यथाकामी (पत्नीकी इच्छानुसार ऋतुकालकी रात्रियोंसे अतिरिक्त अनिषिद्ध रात्रियोंमें भी अपनी पत्नीके साथ सहवास करनेवाला) भी हो सकता है। पुरुषके यथाकामी होनेमें दो कारण हैं—(१) पुरुषको अपनी पत्नीमें ही रति रखनी चाहिये और (२) स्त्रियोंकी रक्षा करना पुरुषका धर्म है। पति, भ्राता, पिता, पितृव्य, सास, श्वशुर, देवर तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंको स्त्रियोंका आभूषण-वस्त्र एवं भोजनादिके द्वारा पर्याप्त आदर करना चाहिये।
स्त्रीको घरकी सामग्री संयमित रूपमें रखनी चाहिये, कार्यकुशल होना चाहिये, प्रसन्न रहना चाहिये, मितव्ययी (अधिक खर्चीली नहीं) होना चाहिये तथा सर्वदा अपने सास-श्वशुरके चरणोंका वन्दन करना चाहिये।
जो स्त्री प्रोषितपतिका है अर्थात् जिसका पति परदेश चला गया है, उसके लिये किसी प्रकारकी क्रीड़ा (खेल-तमाशा), शरीरकी सजावट, सामाजिक उत्सवोंका दर्शन, हास-परिहास तथा दूसरेके घरमें गमन करना वर्जित है।
बाल्यावस्थामें पिता, यौवनकालमें पति, वृद्धावस्थामें पुत्र, पुत्रके अभावमें अन्य सम्बन्धियोंको नारीकी रक्षा करनी चाहिये। दिन हो अथवा रात्रि हो, कभी भी स्त्री अपने पतिके बिना एकान्तमें निवास न करे। पतिको सदैव धर्म-कार्यमें अपनी ज्येष्ठा पत्नीको ही संलग्न करना चाहिये। कनिष्ठा भार्या धर्म-कार्यके लिये उपयुक्त नहीं मानी गयी है। सदाचारिणी स्त्रीके मृत्यु होनेपर पतिको चाहिये कि वह अग्निहोत्रमें प्रयुक्त अग्निसे उसका दाह-संस्कार करे। तदनन्तर अविलम्ब अन्य स्त्रीके साथ पाणिग्रहण करके पुनः अग्निका संचयन करे। पतिहितैषिणी पत्नी इस लोकमें यश अर्जित करके अन्तमें स्वर्गलोकको प्राप्त करती है। (अध्याय ९५)
१-इन नियमोंका पालन करनेवालेको 'ब्रह्मचारी' कहा गया है।
२-पर्व-तिथि चार हैं—अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या और पूर्णिमा (मनु० ४। १५६)।
३-एक बार स्त्रियोंने पुरुषकी अपेक्षा आठगुनी अपनी कामभावनासे बाध्य होकर इन्द्रदेवकी शरणमें जाकर अपने मनोभावको उनसे स्पष्ट किया। इन्द्रदेवने स्त्रियोंके भावको जानकर उन्हें वर दिया—'भवतीनां कामविहन्ता पातकी स्यात्' ('आप लोगोंकी कामभावनाका हनन करनेवाला पुरुष पातकी होगा')। इसी वरके अनुसार पत्नीकी इच्छाके अनुसार ऋतुकालसे अन्य कालकी अनिषिद्ध रात्रियोंमें भी पत्नीगमन अनुज्ञात है।
८०- श्राद्धके अवसर तथा अधिकारी, श्राद्धकी संक्षिप्त विधि, महिमा और फल
काण्ड ] वर्णसंकर जातियोंका प्रादुर्भाव, गृहस्थधर्म, वर्णधर्म तथा सैंतीस प्रकारके अनध्याय १६३
वर्णसंकर जातियोंका प्रादुर्भाव, गृहस्थधर्म, वर्णधर्म तथा सैंतीस प्रकारके अनध्याय
**याज्ञवल्क्यजीने कहा—**अब मैं संकर जातियोंकी उत्पत्ति एवं गृहस्थादिके श्रेष्ठ धर्मोंका वर्णन करता हूँ।
ब्राह्मण पुरुषसे विवाहिता क्षत्रिय कन्यामें मूर्धावसिक्त, विवाहिता वैश्य कन्यामें अम्बष्ठ और विवाहिता शूद्रामें पारशव निषाद नामक संकरका जन्म होता है¹। क्षत्रिय पुरुषसे वैश्य कन्यामें माहिष्य तथा शूद्रामें म्लेच्छकी उत्पत्ति होती है। वैश्य पुरुषसे शूद्रवर्णा स्त्रीमें करण नामक संकर जातिकी संतानका जन्म होता है³। क्षत्रिय पुरुषसे ब्राह्मण स्त्रीमें सूत, वैश्य पुरुषसे ब्राह्मणीमें वैदेहक तथा शूद्र पुरुषसे ब्राह्मणीमें सर्ववर्णनिन्दनीय चाण्डालकी उत्पत्ति होती है। क्षत्रिय स्त्रीमें वैश्यसे मागध और शूद्रसे क्षत्ता नामक संकर संतानका जन्म होता है। इसी प्रकार वैश्य स्त्री शूद्र पुरुषके संसर्गसे आयोगव⁴ नामक वर्णसंकर पुत्रको जन्म देती है। क्षत्रिय पुरुषसे वैश्य कन्यामें उत्पन्न हुए माहिष्य संकरके द्वारा करणी (वैश्यसे शूद्रामें उत्पन्न) स्त्रीके साथ संसर्ग होनेपर रथकारका जन्म होता है।
जो उच्चवर्णीय पुरुषसे निम्नवर्णा स्त्रीमें संतान उत्पन्न होती है, वह अप्रतिलोमज अथवा अनुलोमज संतान है और जो निम्नवर्गीय पुरुषसे उच्चवर्णा स्त्रीमें संतान जन्म ग्रहण करती है, वह प्रतिलोमज संतान है। प्रतिलोमज असत् हैं और अनुलोमज सत् हैं।
जातिका उत्कर्ष सातवें, पाँचवें अथवा छठे जन्ममें होता है। यहाँ जाति शब्दसे अभी वर्णित मूर्धावसिक्त आदि जातियाँ ली गयी हैं। प्रकृतमें संक्षेपसे यह समझना चाहिये—ब्राह्मणसे शूद्रामें उत्पन्न संतान निषाद कही जाती है। यह संतान यदि कन्या है तो इसे निषादी कहा जाता है। इसका यदि ब्राह्मणसे विवाह हो और उससे उत्पन्न कन्याका पुनः ब्राह्मणसे विवाह हो, आगे उससे भी उत्पन्न कन्याका पुनः ब्राह्मणसे ही विवाह हो—इसी क्रमसे उत्पन्न छठी कन्यासे विवाहित ब्राह्मणके द्वारा उत्पादित सातवीं संतान शुद्ध ब्राह्मणवर्णकी होगी। ऐसे ही ब्राह्मणसे वैश्य जातीय कन्यामें उत्पन्न अम्बष्ठ जातिकी पाँचवीं कन्याकी छठी संतान शुद्ध ब्राह्मण होगी। मूर्धावसिक्ता कन्याकी भी इसी क्रमसे उत्पन्न चौथी कन्याकी पाँचवीं संतान शुद्ध ब्राह्मण ही होगी। ठीक यही स्थिति उग्रा और माहिष्याकी है। ये दोनों उग्र एवं माहिष्य जातिकी कन्याएँ यदि क्षत्रियसे ही विवाहित होती गयीं तो इनकी छठी और पाँचवीं संतति शुद्ध क्षत्रिय ही होगी। ऐसे ही करण जातिकी कन्या वैश्यवर्णके पुरुषसे विवाहित होकर यथाक्रम पाँचवें संतानको शुद्ध वैश्यरूपमें ही उत्पन्न करेगी।
इसके अतिरिक्त यह भी जानने योग्य है कि कर्मका व्यत्यय होनेसे भी जिस वर्णका कर्म किया जा रहा है, वही वर्ण सातवें, छठे तथा पाँचवें जन्मकी संतानका हो जाता है। स्पष्टरूपमें इस प्रकार समझा जा सकता है—धर्मशास्त्रके अनुसार ब्राह्मणको अपनी मुख्यवृत्ति याजन तथा अध्यापन आदिसे जीविका चलानी चाहिये। आपत्कालमें अपनी मुख्यवृत्तिसे जीविका न चल पानेपर क्षत्रियवृत्ति,
१-ये अनुलोम संकर कहे जाते हैं।
२-याज्ञवल्क्यस्मृति (४।९२)-के अनुसार क्षत्रियसे शूद्रामें उग्र नामकी संकर जातिकी संतान उत्पन्न होती है।
३-मूर्धावसिक्त, अम्बष्ठ, निषाद, माहिष्य, उग्र एवं करण—ये छः अनुलोमज पुत्र हैं।
४-सूत, वैदेहक, चाण्डाल, मागध, क्षत्ता एवं आयोगव—ये छः प्रतिलोमज पुत्र हैं।
| १६४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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वैश्यवृत्ति या शूद्रवृत्ति भी ब्राह्मण स्वीकार कर सकता है। यही क्षत्रिय एवं वैश्यके बारेमें भी व्यवस्था है। जब कोई वर्ण अपनी मुख्यवृत्तिका परित्याग कर अन्य द्वितीय, तृतीय वर्णकी वृत्ति स्वीकार करता है तो यह हीनवर्णकी वृत्ति मानी जाती है और यह हीनवर्णकी वृत्ति स्वीकार करना ही ‘कर्म-व्यत्यय' है। इस प्रकारके कर्म-व्यत्यय होनेपर आपत्तिकालके अभावमें भी यदि कोई हीनवर्णकी वृत्तिका परित्याग नहीं करता है तो उसकी सातवीं, छठी, पाँचवीं कुल-परम्परामें उत्पन्न संतति उस हीनवर्णकी ही होगी जिस हीनवर्णकी वृत्ति स्वीकार कर जीविका निर्वाह किया जा रहा है। दृष्टान्तके रूपमें यह कहा जा सकता है—यदि कोई ब्राह्मण शूद्रवृत्तिसे जीविका चला रहा है और उसका परित्याग बिना किये पुत्र उत्पन्न कर रहा है तथा यह पुत्र भी शूद्रवृत्तिसे अपना जीवन चलाता हुआ अपना पुत्र उत्पन्न कर रहा है एवं यह तीसरा पुत्र भी शूद्र-वृत्तिमें रहकर ही अपना पुत्र उत्पन्न कर रहा है तो ऐसी परम्परामें सातवें जन्ममें शूद्र ही उत्पन्न होगा। वैश्यवृत्तिसे जीविका निर्वाहकी दशामें छठे जन्ममें वैश्य ही उत्पन्न होगा। क्षत्रियवृत्तिसे जीविका निर्वाहकी स्थितिमें पाँचवें जन्ममें क्षत्रिय ही उत्पन्न होगा। क्षत्रिय भी शूद्रवृत्तिसे जीविका निर्वाह करनेपर छठे वंशमें शूद्रवर्णकी एवं वैश्यवृत्तिसे जीविका निर्वाह करनेपर पाँचवें वंशमें वैश्यवर्णकी संतान उत्पन्न करेगा। ऐसे ही वैश्य भी शूद्रवृत्तिसे जीविका निर्वाह करते हुए अपनी पुत्र-परम्पराके पाँचवें जन्ममें शूद्रको ही उत्पन्न करेगा।
इसी प्रसंगसे यह भी ज्ञातव्य है—तीन प्रकारकी जातियाँ हैं—१-संकर जाति, २-संकीर्ण संकर जाति तथा ३-वर्ण संकीर्ण संकर जाति। संकर जातिके मूर्धावसिक्त अम्बष्ठ आदि छः भेद ऊपर बताये गये हैं। इन्हें अनुलोमज कहा जाता है। ऐसे ही सूत, वैदेहक आदि भी छः संकर जातिके भेद पहले ही कहे जा चुके हैं। ये प्रतिलोमज हैं। संकीर्ण संकर जातिके जो लोग होते हैं, उनका निर्देश पहले रथकारकी उत्पत्ति बताकर किया गया है। अब वर्ण संकीर्ण संकर जातिके लोगोंको इस प्रकार समझनी चाहिये—मूर्धावसिक्ता स्त्रीमें क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्रसे जो उत्पादित हैं, ऐसे ही अम्बष्ठ जातिकी स्त्रीमें वैश्य अथवा शूद्रके द्वारा जो उत्पादित हैं और पारशव निषाद जातिकी स्त्रीमें शूद्रके द्वारा जो उत्पादित हैं, वे वर्ण संकीर्ण संकर जातिके होते हैं। इन्हें, अधर प्रतिलोमज कहते हैं। इसी प्रकार मूर्धावसिक्त, अम्बष्ठ एवं पारशव निषाद जातिकी स्त्रियोंमें ब्राह्मणके द्वारा जो उत्पादित हैं, माहिष्य एवं उग्रजातिकी स्त्रियोंमें ब्राह्मण अथवा क्षत्रियसे जो उत्पादित हैं और करणजातिकी स्त्रीमें ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्यसे जो उत्पादित हैं, उन्हें उत्तर अनुलोमज कहते हैं। उनमें अधर प्रतिलोमज असत् तथा उत्तर प्रतिलोमज सत् माने जाते हैं।
गृहस्थाश्रमीको प्रतिदिन विवाहाग्निमें अथवा सम्पत्ति विभागके समय स्वयं लायी गयी संस्कृत-अग्निमें स्मार्तकर्म वैश्वदेव आदि सम्पन्न करना चाहिये। श्रौतकर्मानुष्ठान अग्निहोत्र आदि वैतानाग्नि (आहवनीय आदि अग्नियों)-में करना चाहिये। शरीर चिंता (प्रातः-सायं अवश्य करणीय मल-मूत्र विसर्जन)-को शास्त्रीय विधिसे सम्पन्न कर, गन्ध-लेपनिवृत्तिपर्यन्त शुद्धि प्राप्तकर दन्तधावन एवं स्नानकर द्विजको प्रातःकाल संध्योपासन करना चाहिये तथा अनन्तर अग्निमें हवन (अग्निहोत्र) करके समाहितचित्तसे सूर्यदेवताके मन्त्रोंका* जप
* 'उदु त्यं जातवेदसं०' आदि।
काण्ड ] वर्णसंकर जातियोंका प्रादुर्भाव, गृहस्थधर्म, वर्णधर्म तथा सैंतीस प्रकारके अनध्याय १६५
करना चाहिये। उसके बाद गृहस्थाश्रमी वेदार्थ (निरुक्त, व्याकरण आदि) तथा अन्य विविध प्रकारके शास्त्रोंका अध्ययन करे। योगक्षेम आदिकी सिद्धिके लिये उसको ईश्वरकी उपासना करनी चाहिये।
वह स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण तथा पूजन करे। तदनन्तर उसको वेद, पुराण तथा इतिहासका यथाशक्ति अध्ययन एवं आध्यात्मिकी विद्याका जप (चिन्तन) करना चाहिये। तत्पश्चात् भूत, पितर, देव, ब्रह्म और मनुष्य जातिके लिये गृहस्थ बलिकर्म*, स्वधा, होम, स्वाध्याय तथा अतिथि-सत्कार करे। देवताओंके लिये अग्निमें हवन करना चाहिये। भूतबलि, श्वान (कुत्ता), चाण्डाल एवं काक आदिके लिये पका हुआ अन्न भूमिपर दे। पितृगण एवं मनुष्योंको अन्नके सहित जल भी प्रतिदिन प्रदान करना चाहिये। प्रतिदिन स्वाध्याय करे, केवल अपने लिये अन्नपाक न करे। स्ववासिनी (अपने पितृगृहमें रहनेवाली विवाहिता स्त्री), वृद्ध, गर्भिणी, व्याधिपीड़ित, कन्या, अतिथि तथा भृत्योंको भोजन प्रदानकर गृहस्वामिनी और उसका पति शेष बचे हुए अन्नका भोजन करे। अग्निमें पञ्चप्राणाहुति देकर अन्नकी निन्दा न करते हुए भोजन करना चाहिये।
भोजनके आदि और अन्तमें आपोऽशान-विधिसे आचमन करे तथा सम्यक् प्रकारसे पका हुआ, हितकारी, स्वल्प भोजन बालकोंके साथ करना चाहिये।
पात्रादिसे आच्छादित अमृततुल्य भोजन द्विजको कराना चाहिये। यथाशक्ति अतिथि एवं अन्य वर्णोंको क्रमशः भोजन देना चाहिये। सायंकाल भी आये हुए अतिथिको लौटाना नहीं चाहिये। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। सुव्रत! (ब्रह्मचारी एवं संन्यासी) भिक्षुकको सत्कारपूर्वक भिक्षा प्रदान करनी चाहिये। द्वारपर पधारे सभीको भोजन कराना चाहिये। प्रतिवर्ष स्नातक, आचार्य एवं राजाकी पूजा करनी चाहिये। ऐसे ही मित्र, जामाता एवं ऋत्विक् प्रतिवर्ष पूजनीय हैं। पथिकको अतिथि तथा वेदपारंगतको श्रोत्रिय कहा जाता है। ब्रह्मलोककी कामना करनेवाले गृहस्थजनोंके लिये ये दोनों मान्य हैं।
ससम्मान आमन्त्रणके बिना ब्राह्मणको दूसरेके यहाँ बने हुए पक्वान्नको प्राप्त करनेकी अभिलाषा नहीं करनी चाहिये। गृहस्थको वाणी, हाथ, पैरकी चञ्चलता एवं अतिभोजन करनेसे बचना चाहिये। संतुष्ट श्रोत्रिय तथा अतिथिको विदा करते समय ग्रामकी सीमातक उनका अनुगमन करना चाहिये।
गृहस्थ अपने इष्ट-मित्र एवं बन्धुओंके साथ दिनका शेष भाग व्यतीत करे। तदनन्तर सायंकालीन संध्योपासना करके वह पुनः अग्निहोत्रकर भोजन ग्रहण करे। इसके बाद उसको अपने सुबुद्ध भृत्योंके साथ बैठकर अपने हितका विचार करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्ममुहूर्तमें निद्राका परित्यागकर वह धनादिसे ब्राह्मणको संतुष्ट करे तथा वृद्ध, दुःखी एवं भार ढोनेवाले पथिकोंको भलीभाँति मार्ग दिखाकर प्रसन्न करे।
यज्ञानुष्ठान, अध्ययन और दान वैश्य तथा क्षत्रियका कर्म माना गया है। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणके लिये याजन, अध्यापन तथा प्रतिग्रह—ये तीन कर्म अधिक बताये गये हैं।
क्षत्रियका प्रधान कर्म प्रजापालन है। वैश्यवर्णके लिये कुसीद (सूद), कृषि, वाणिज्य और पशुपालन मुख्य कर्म कहा गया है। शूद्रवर्णका प्रधान कर्म ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यकी सेवा करना है। द्विजोंको यज्ञादि कर्तव्योंमें प्रमाद नहीं करना चाहिये। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, इन्द्रियसंयम,
* बलिकर्म—भूतयज्ञ, स्वधा—पितृयज्ञ, होम—देवयज्ञ, स्वाध्याय—ब्रह्मयज्ञ, अतिथि-सत्कार—मनुष्य-यज्ञ।
८१- विनायकशान्ति-स्नान
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दम, क्षमा, सरलता और दान सभीके लिये धर्मके साधन हैं। अपने वर्णधर्मानुसार जीविकाका आश्रयणकर कुटिल और दुष्टवृत्तिका परित्याग करना चाहिये—
प्रधानं क्षत्रियं कर्म प्रजानां परिपालनम्॥ कुसीदकृषिवाणिज्यं पशुपाल्यं विशः स्मृतम्। शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा द्विजो यज्ञान् न हापयेत्॥ अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियसंयमः। दमः क्षमार्जवं दानं सर्वेषां धर्मसाधनम्॥ आचरेत् सदृशीं वृत्तिमजिह्मामशठां तथा। (९६। २७–३०)
जो मनुष्य तीन वर्षसे अधिक कालतकके लिये अन्नका भण्डारण करता है, वह सोमरस पान करनेकी योग्यता रखता है। जिसके पास मात्र एक वर्षभरके लिये ही अन्न रहता है, उसे मुख्यतः सोमयागकी प्राक्क्रिया<sup>१</sup> करनी चाहिये। द्विजको प्रतिवर्ष सोमयाग, पशुयाग, आग्रायणेष्टि<sup>२</sup> तथा चातुर्मास्ययाग यत्नपूर्वक करना चाहिये। यदि इन यागोंको करना प्रतिवर्ष असम्भव हो तो इन यागोंके कालमें वैश्वानरी इष्टि ही कर लेनी चाहिये।
मुख्य कल्पके सम्पादनमें असमर्थके लिये जो द्वितीय कल्प विहित है, वह हीन कल्प है। सोमयाग, आग्रायणेष्टि आदि मुख्य कल्प हैं। वैश्वानरी इष्टि हीनकल्प है। यदि मुख्यकल्पके सम्पादनयोग्य द्रव्य है तो हीनकल्पका सम्पादन नहीं करना चाहिये। जितने भी फलप्रद (काम्य) अनुष्ठान हैं, फलकी कामना रहनेपर उन्हींका सम्पादन करना होगा। उनको न कर हीनकल्पका सम्पादन करनेपर फल नहीं प्राप्त हो सकता।
ब्राह्मणको अपनी जीविकाके लिये उस अप्रतिषिद्ध अर्थकी भी इच्छा नहीं करनी चाहिये जो स्वाध्याय-विरोधी हो। ऐसे जिस-किसी भी व्यक्तिसे अर्थ पानेकी इच्छा नहीं करनी चाहिये, जिसका आचरण संदिग्ध हो। विरुद्धवृत्ति (अयाज्य याजन आदि)-से भी अर्थ-अर्जन नहीं करना चाहिये। ऐसे ही नृत्य, गीत आदि (प्रसंग)-से भी अर्थ-अर्जन नहीं करना चाहिये। जो द्विज यज्ञके लिये शूद्रसे धनकी याचना करता है, वह मृत्युके पश्चात् चाण्डाल-योनिमें जन्म लेता है। यज्ञके लिये लाये हुए अन्नको जो सम्पूर्णरूपसे यज्ञमें नहीं लगाता, वह कुक्कुर, गृध्र अथवा काकयोनिमें जन्म ग्रहण करता है।
ब्राह्मणको एक कुसूल<sup>३</sup> (कोष्ठक)-भर, एक मटका-भर, तीन दिनतकके लिये या एक दिनतकके लिये अन्न संग्रह करना चाहिये। अथवा वह शिलोञ्छवृत्तिसे अपना जीवन-निर्वाह करे। इन वृत्तियोंमें उत्तरोत्तर वृत्ति श्रेष्ठ है।
यदि वह भूखसे पीड़ित है तो उसको राजा, अपने छात्र या यज्ञ करनेवाले यजमानसे ही अन्न-धनकी याचना करनी चाहिये और दाम्भिक<sup>५</sup>, हैतुक<sup>६</sup>, पाखण्डिक<sup>७</sup> एवं बकवृत्तिवालेका<sup>८</sup> सभी लौकिक-शास्त्रीय कर्ममें सर्वथा परित्याग करना
<sup>१</sup>-प्राक्क्रिया—सोमयागके पूर्व करणीय अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, आग्रायण, चातुर्मास्य आदि।
<sup>२</sup>-नया सस्य उत्पन्न होनेपर आग्रायणेष्टिका विधान है।
<sup>३</sup>-कुसूलधान्य बारह दिनके लिये अन्न, कुम्भीधान्य छः दिनके लिये अन्न।
<sup>४</sup>-'शिलोञ्छवृत्ति' भरण-पोषणकी एक ब्राह्मण-वृत्ति (साधन) है। 'शिलवृत्ति' उसे कहते हैं, जिसमें ब्राह्मण फसल कट जानेके बाद खेतमें गिरे हुए अन्नकी वल्लरी (बाल)-को एकत्र करके अपने कुटुम्बका भरण-पोषण करता है। 'उञ्छवृत्ति' उसे कहते हैं, जिसमें अन्नकी वल्लरी छोड़कर एक-एक कणमात्र एकत्र कर उसीसे अपने कुटुम्बका भरण-पोषण करता है। 'शिल' और 'उञ्छ'—यही 'शिलोञ्छवृत्ति' है।
<sup>५</sup>-दाम्भिक—केवल किसीको प्रसन्न करनेके लिये ही धर्मानुष्ठान।
<sup>६</sup>-हैतुक—निराधार तर्कोंसे धार्मिक कृत्योंमें संशयकर्ता।
<sup>७</sup>-पाखण्डिक—वेदशास्त्रोंके विरुद्ध अनेक प्रकारके लुभावने वेशका धारक।
<sup>८</sup>-बकवृत्ति—बकके समान वर्तन (व्यवहार) करनेवाला।
काण्ड ] वर्णसंकर जातियोंका प्रादुर्भाव, गृहस्थधर्म, वर्णधर्म तथा सैंतीस प्रकारके अनध्याय १६७
चाहिये। वह स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण करे। सिर, दाढ़ी आदिके केश एवं नखोंको यथा-विधान कटवाये रहे। भार्याके साथ भोजन नहीं करना चाहिये। एक वस्त्र धारण कर तथा खड़े होकर भोजन नहीं करना चाहिये।
कभी भी अप्रिय वचन नहीं बोलना चाहिये। यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मणको विनीत होना चाहिये। दण्ड और कमण्डलु धारण करना चाहिये। देव आदिको अपने दाहिने करके चलना चाहिये। वह नदी, वृक्षच्छाया, भस्म, गोष्ठ, जल तथा मार्गके मध्यमें मूत्रका परित्याग न करे। अग्नि, सूर्य, गौ, चन्द्र, संध्या, जल, स्त्री और द्विजोंके सम्मुख भी मूत्रका त्याग करना वर्जित है। वह अग्नि एवं उदय तथा अस्त हो रहे सूर्यका दर्शन न करे। उसके लिये नग्न तथा मैथुनासक्त स्त्री, मूत्र और विष्ठाका दर्शन भी त्याज्य है। पश्चिम सिर करके नहीं सोना चाहिये। थूक, रक्त, विष्ठा, मूत्र और विषको जलमें छोड़ना अनुचित है। आगपर पैरोंको सेंकना तथा उसे लाँघना निषिद्ध है।
अञ्जलिद्वारा जल नहीं पीना चाहिये और निद्रा-निमग्न व्यक्तिको जगाना नहीं चाहिये। धूर्त-वञ्चकका साथ नहीं करना चाहिये। रोगी जनोंके साथ शयन नहीं करना चाहिये। धर्म-विरुद्ध कर्मोंका परित्याग कर देना चाहिये। चिताग्निका धुआँ तथा नदीमें तैरना वर्जित है। केशपर, भस्मपर, भूसीपर, प्रज्वलित अग्निके अंगारेपर और कपालपर स्थित नहीं होना चाहिये। किसीसे बछड़ेको दूध पिलाती हुई गायको बताना नहीं चाहिये और किसीके घरमें द्वारके अतिरिक्त अन्य गवाक्षादि मार्गोंसे प्रवेश नहीं करना चाहिये। लोभी तथा शास्त्र-विरुद्ध कर्म करनेवाले राजासे प्रतिग्रह नहीं लेना चाहिये।
वेद तथा धर्म-शास्त्रादिका अध्ययन करनेवालोंका उपाकर्म-संस्कार श्रवणनक्षत्रसे युक्त श्रावणी पूर्णिमाको होना चाहिये। संस्कार-विहित औषधियों-सामग्रियोंके उपलब्ध रहनेपर यह कार्य श्रावणमासकी हस्तनक्षत्रसे युक्त पञ्चमी-तिथिमें भी सम्पन्न हो सकता है। पौषमासके रोहिणीनक्षत्रमें अथवा अष्टकाके दिन ग्रामसे बाहर जलाशयके पास वेदोंका उत्सर्ग-कर्म गृह्यसूत्रके अनुसार करना चाहिये।
शिष्य, ऋत्विक्, गुरु तथा बन्धु-बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर तीन दिनका अनध्याय उपाकर्म तथा उत्सर्ग-कर्म करनेपर होता है। ऐसे ही अपनी शाखाके श्रोत्रिय ब्राह्मणकी मृत्यु होनेपर तीन दिनका अनध्याय होता है। संध्याके समय मेघ-गर्जन होनेपर, आकाशमें उत्पातकी ध्वनि होनेपर, भूकम्प होनेपर तथा उल्कापात होनेपर अनध्याय रखना चाहिये। वेद और आरण्यकका अध्ययन पूर्ण होनेपर एक दिन एवं एक रात्रि (अहोरात्र)-का अनध्याय होता है।
अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा, चन्द्र-सूर्यग्रहण, ऋतुसंधिकी प्रतिपदमें तथा श्राद्ध-भोजन अथवा श्राद्धका प्रतिग्रह लेनेपर एक दिन और एक रात्रि (अहोरात्र)-का अनध्यायकाल मानना चाहिये*। पशु, मेढक, नेवला, कुत्ता, सर्प, बिडाल और सूअरके बीचमें आनेपर तथा शक्रध्वजके अवरोपणका दिन आनेपर एवं उत्सवका दिन होनेपर भी एक ही दिन-रात्रिका अनध्यायकाल होता है।
कुत्ता, सियार, गर्दभ, उलूक, सामवेद तथा बच्चोंके कोलाहल और पीड़ितजनोंकी दुःखभरी ध्वनि होनेपर, अपवित्र वस्तु, शव, शूद्र, अन्त्यज, श्मशान और पतित व्यक्तिका सामीप्य होनेपर तत्काल अनध्याय होता है। अपवित्र देशमें, अपवित्रावस्थामें,
* यह व्यवस्था एकोद्दिष्ट श्राद्धसे अतिरिक्त श्राद्धके लिये है। एकोद्दिष्ट श्राद्धका भोजन अथवा प्रतिग्रहमें तीन रात्रिका अनध्याय होता है।
(याज्ञवल्क्य मिताक्षरा आचाराध्याय श्लोक १४६)
८२- ग्रहशान्ति-निरूपण
| १६८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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बार-बार बिजली चमकनेपर, दो प्रहरतक बार-बार मेघ-गर्जन होनेपर, भोजन करनेके बाद हाथ गीला रहनेपर, जलके मध्यमें, अर्धरात्रिमें तथा मध्यके दो प्रहरमें और आँधी-तूफानके बीच भी उतने कालतक अध्ययन नहीं होना चाहिये। दिग्<sup>१</sup>दाह होनेपर, उत्पात-जैसी धूलिकी वर्षा होनेपर, संध्याकालीन कोहरा होनेपर अथवा चोर, राजा आदिके कारण होनेवाले उपद्रवोंके समयमें तत्काल अनध्याय होता है। स्वयं दौड़ते हुए, अपवित्र मदिरा आदिका गन्ध आनेपर तथा शिष्ट व्यक्तिके घर आ जानेपर अध्ययन करना वर्जित है। गधा, ऊँट, वाहन (रथ), हाथी, घोड़ा, नौका, वृक्ष और पर्वतारोहणका काल अनध्यायका ही काल होता है। उपर्युक्त सैंतीस अनध्यायोंको तात्कालिक अनध्याय माना गया है अर्थात् ये निमित्त जिस समय हों, उस समय अनध्याय समझना चाहिये।
देवताकी मूर्ति, ऋत्विक्, स्नातक, आचार्य एवं राजाकी छाया, पर-स्त्रीकी छाया, रक्त, विष्ठा, मूत्र, थूक और उबटनकी सामग्रीका अतिक्रमण नहीं करना चाहिये। बहुश्रुत ब्राह्मण, सर्प, क्षत्रिय (नृपति)-की अवमानना कदापि न करे। ऐसे ही अपनी भी अवमानना न करे। उच्छिष्ट (जूठन), विष्ठा, मूत्र और चरण-प्रक्षालित जल दूरसे ही त्यागने योग्य हैं। श्रुति और स्मृतिमें कहे गये सदाचारका पालन करना चाहिये। किसीके गोपनीय रहस्यको प्रकाशित कर उसे कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिये। किसीकी निन्दा या ताड़ना नहीं करनी चाहिये, किंतु पुत्र अथवा शिष्यको दण्ड देना चाहिये। मनुष्यको सर्वदा धर्मका ही आचरण करना चाहिये। धर्मविरुद्ध आचरण उसके लिये त्याज्य है। गृहस्थ व्यक्तिको माता-पिता, अतिथि और धनी पुरुषके साथ विवाद नहीं करना चाहिये।
दूसरेके सरोवरमेंसे पाँच पिण्ड मिट्टी बिना निकाले उसमें स्नान नहीं करना चाहिये। नदी, झरना, देव-सरोवर और पोखर-तालाबमें स्नान करना चाहिये।
दूसरेकी शय्यापर शयन नहीं करना चाहिये। अनापत्तिकालमें परान्न भोजन नहीं करना चाहिये। कृपण, बन्दी, चोर, अग्निहोत्र न करनेवाले ब्राह्मण, बाँसका काम करनेवाले, न्यायालयमें जिसका दोष सिद्ध हो चुका है, सूदखोर, वेश्या, सामूहिक दीक्षा देनेवाला, चिकित्सक, रोगी, क्रोधी, नपुंसक, रंगमंचसे जीविका चलानेवाला, उग्र, निर्दय, पतित, व्रात्य, दम्भी, उच्छिष्टभोजी, शस्त्र-विक्रेता, स्त्रीके वशमें रहनेवाला, ग्राम्य-याजक (ग्रामके देवताओंकी शान्तिके लिये अनुष्ठान करनेवाला), निर्दयी राजा, धोबी, कृतघ्न, कसाई, चुगलखोर, झूठ बोलनेवाला, सोम-विक्रेता, वन्दी तथा स्वर्णकार—इनका अन्न कदापि नहीं खाना चाहिये। बाल तथा कृमि (कीड़े) आदिसे युक्त भोजन एवं मांस नहीं खाना चाहिये।
बासी, उच्छिष्ट, शुक्त (पका हुआ वह अन्न जो अधिक काल बीतनेके कारण विकृत हो गया है), कुत्तेद्वारा स्पृष्ट, पतितद्वारा देखा हुआ, रजस्वलासे स्पृष्ट, संधुष्ट<sup>२</sup> तथा पर्यायान्न<sup>३</sup>-भोजन त्याज्य है। गायसे सूँघा गया, पक्षियोंके द्वारा उच्छिष्ट और जानकर पैरसे छुआ गया अन्न भी त्यागने योग्य होता है। यद्यपि शूद्रका अन्न नहीं लेना चाहिये,
१-दिग्दाह—दिशाएँ यदि जलती हुई प्रतीत होती हों।
२-संधुष्ट—'भोजन बचा हुआ है, जो भोजन करना चाहे वह आकर ले ले'। इस प्रकारकी घोषणा करके जो भोजन दिया जाता है, वह 'संधुष्ट' कहा जाता है।
३-पर्यायान्न—किसी दूसरेके उद्देश्यसे रखा भोजन यदि बिना उसकी स्वीकृतिके दूसरेको दिया जाय तो ऐसे अन्नको 'पर्यायान्न' कहा जाता है।
८४- संन्यास-धर्म-निरूपण
काण्ड ] द्रव्यशुद्धि १६९
तथापि जो शूद्र परम्परासे ही अपने यहाँ सेवक है, गोपालन करनेवाला है, कुल-परम्परासे ही जो मित्रके समान व्यवहार करनेवाला है, परम्परासे अपने यहाँ हलवाहेका काम करनेवाला है, कुल-परम्परासे जो निर्धारित नाई है—इनके अतिरिक्त वह शूद्र जिसने मन, वाणी, शरीर एवं कर्मसे सर्वथा अपनेको समर्पित कर रखा है—ऐसे शूद्रोंका अन्न स्वीकार किया जा सकता है। घी आदि स्निग्ध पदार्थोंसे युक्त अन्न यदि बासी है या बहुत कालसे रखा हुआ है तो भी ग्रहण करने योग्य होता है। किंतु घृत या तेल आदिसे संमिश्रित न होनेपर भी गेहूँ, जौ और गोरससे तैयार किये गये पदार्थ यदि बहुत देरतक रखे गये हैं, तब भी ग्रहण किये जा सकते हैं; यदि विकृत न हुए हों।
देव और अतिथिको बिना समर्पित किया हुआ तिल-तण्डुलमिश्रित पदार्थ, यवागू, खीर, पुआ तथा पूड़ीका भोजन व्यर्थ हो जाता है।
पलाण्डु (प्याज) और लहसुन आदि उग्र पदार्थोंका सेवन करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। जो पुरुष पशु-हत्या करता है, वह पशुके रोम-परिमित कालतक घोर यातनाओंको सहन करते हुए नरकमें वास करता है। अभोज्य पदार्थोंका परित्याग करके अपनी सद्गतिकी भावनासे प्रभुसे क्षमा-याचना और प्रार्थना करता हुआ व्यक्ति भगवान्को प्राप्त करता है। (अध्याय ९६)
द्रव्यशुद्धि
याज्ञवल्क्यजीने कहा—हे श्रेष्ठ मुनिजनो! अब मैं द्रव्य-शुद्धिका वर्णन कर रहा हूँ। आप सब उसका ज्ञान प्राप्त करें।
सोने, चाँदी, अब्ज (मुक्ताफल, शंख, शुक्ति आदि), शाक, रस्सी तथा बकरे आदिके चमड़ेसे बनाये गये पात्र, होतृ, चमस आदि यदि किसी चिकने पदार्थके लेपसे रहित हैं और उच्छिष्ट हाथ आदिसे ही केवल स्पृष्ट हैं तो इनकी शुद्धि जलसे प्रक्षालनमात्र करनेपर हो जाती है। यज्ञमें प्रयुक्त स्रुक् एवं स्रुवाकी शुद्धि उष्ण जलसे तथा धान्यादिका शुद्धीकरण जलके प्रोक्षणसे होता है।
काष्ठ और सींग आदिसे विनिर्मित पात्रादिकी शुद्धि छिलनेसे होती है। मार्जन करनेसे यज्ञका पात्र पवित्र हो जाता है। उष्ण जल और उष्ण गोमूत्रसे धोनेपर ऊनी और रेशमी वस्त्र शुद्ध हो जाते हैं। ब्रह्मचारीके हाथमें विद्यमान भिक्षा-प्राप्त अन्न, बाजारमें विक्रयके लिये रखा अन्न तथा स्त्रीका मुख पवित्र होता है। मिट्टीका पात्र अग्निमें पुनः पकानेपर शुद्ध होता है, यदि चाण्डाल आदिसे स्पृष्ट नहीं है। गौके द्वारा सूँघे जानेपर और केश, मक्षिका एवं कीटादिसे दूषित होनेपर अन्नकी शुद्धि यथायोग्य जल, भस्म तथा मिट्टी डालनेसे हो जाती है। भूमिका पवित्रीकरण मार्जनादि करनेपर होता है। राँगा, सीसा तथा ताम्रपात्रकी शुद्धि क्षार और अम्लमिश्रित जलसे होती है। कांस्य और लौहपात्रोंकी शुद्धि भस्म तथा जलसे मार्जन करनेपर होती है। अज्ञात वस्तुएँ तो सदैव पवित्र ही रहती हैं।
अमेध्य (शरीरसे निकलनेवाले मल, वसा, शुक्र और श्लेष्मा आदि)-से लिप्त पात्रकी शुद्धि मिट्टी और जलके द्वारा परिमार्जित कर उसमें व्याप्त गन्ध एवं लेपको दूर करनेसे होती है। प्रकृतिद्वारा भूमिमें एकत्र जल जो गौको संतृप्त करनेमें पर्याप्त हो, सदैव शुद्ध होता है।
सूर्य-रश्मि, अग्नि, धूलि, वृक्ष-छाया, गौ,
८५- कर्मविपाक-निरूपण
| १७० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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अश्व, पृथ्वी, वायु तथा ओसकी बूँदें पवित्र ही होती हैं।
मनुष्यको स्नान करनेके बाद, जल पीनेके बाद, छींक आनेके बाद, शयनोपरान्त, भोजन करनेपर, मार्गमें चलनेपर तथा वस्त्र बदलनेपर पुनः आचमन करना चाहिये।
जम्हाई लेनेपर, निष्ठीवन (थूकनेपर), शयन करनेपर, वस्त्र-धारण करनेपर और अश्रुपात होनेपर—इन पाँच अवस्थाओंमें आचमन नहीं करे, अपितु दक्षिण कानका स्पर्श कर ले। ब्राह्मणके दक्षिण कानपर अग्नि आदि देवता सदैव विराजमान रहते हैं।
(अध्याय ९७)
दान-धर्मकी महिमा
याज्ञवल्क्यजीने पुनः कहा— हे ऋषियो! अब मैं दान-धर्मकी महिमाका वर्णन करता हूँ, उसे सुनें।
अन्य वर्णोंकी अपेक्षा ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, उनमें भी जो सक्रियावान् (कर्मनिष्ठ) ब्राह्मण हैं वे श्रेष्ठ हैं। उन कर्मनिष्ठोंमें भी विद्या तथा तपस्यासे युक्त ब्रह्म-तत्त्ववेत्ता श्रेष्ठ तथा सत्पात्र हैं। गृहस्थके द्वारा गौ, भूमि, धान्य तथा सुवर्ण आदिका दान सत्पात्रको उसका पूजन करके दिया जाना चाहिये।
विद्या एवं तपस्यासे हीन ब्राह्मणको प्रतिग्रह (दान) स्वीकार नहीं करना चाहिये। इस प्रकार दान लेनेपर वह प्रदाता और स्वयंको अधोगामी बना देता है। प्रतिदिन उपयुक्त पात्रको दान देना चाहिये। निमित्त (सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण आदि विशेष अवसर) उपस्थित होनेपर विशेष रूपसे अधिक दान देना चाहिये। किसीके याचना करनेपर भी यथाशक्ति अपनी श्रद्धाके अनुसार दान देना चाहिये। सुवर्णसे अलंकृत सींगोंवाली, चाँदीसे मढ़े हुए खुरोंवाली, सुन्दर वस्त्राच्छादित, अधिक दूध देनेवाली, सुशील गौका यथाशक्ति दक्षिणाके साथ दान करना चाहिये और दान देते समय साथमें कांस्यपात्र भी देना चाहिये।
सींगमें दस सौवर्णिक (एक सौ साठ माशा) सोना तथा खुरमें सात पल चाँदी लगाना चाहिये एवं दोहन-पात्र पचास पल काँसेका होना चाहिये।
गौका बछड़ा भी अलंकृत होना चाहिये। गौ रोगरहित तथा सवत्सा होनी चाहिये। यदि बछड़ा न हो तो स्वर्ण या पिप्पलकाष्ठका बाछा या बाछी बनाकर देना चाहिये। ऐसा करनेसे प्रदाता बछड़ेके शरीरमें स्थित रोम-संख्याके अनुसार उतने ही वर्षपर्यन्त स्वर्गका उपभोग करता है। यदि गौ कपिला (भूरे रंगकी) होती है तो वह दाताके सात कुलोंका उद्धार कर देती है।
जबतक प्रसव कर रही गौकी योनिमें बछड़ेके दोनों पैरोंसहित मुख दिखायी देता है और जबतक वह गर्भका प्रसव नहीं कर देती है, तबतक गौको पृथ्वीके समान ही मानना चाहिये।
सामर्थ्यके अभावमें स्वर्णमय सींग आदिसे युक्त गौका दान यदि न किया जा सके तो भी रोगरहित, हृष्ट-पुष्ट, दूध देनेवाली धेनु अथवा दूध न देनेवाली गर्भिणी गौका जो दान करता है, वह स्वर्गलोकमें महिमामण्डित होकर निवास करता है।
थके हुए प्राणीकी आसनादिक दानके द्वारा थकान दूर करना, रोगीकी सेवा करना, देवपूजन करना, ब्राह्मणका पाद-प्रक्षालन करना तथा ब्राह्मणद्वारा उच्छिष्ट किये गये स्थान और पात्रका मार्जन-कृत्य विधिवत् दिये गये गोदानके समान फलदायक होता है। ब्राह्मणके लिये जो अभीष्ट हो, उसे वह
काण्ड ] * श्राद्धके अवसर तथा अधिकारी; श्राद्धकी संक्षिप्त विधि, महिमा और फल * १७१
वस्तु प्रदानकर प्रदाताको स्वर्ग-लाभ लेना चाहिये।
भूमि, दीप, अन्न, वस्त्र और घृतके दानसे प्रदाता लक्ष्मी प्राप्त कर सकता है। घर, धान्य, छाता, माला, उपयोगी वृक्ष, यान (सवारी), घृत, जल, शय्या, कुंकुम, चन्दन आदि प्रदान करनेसे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
सत्पात्रको विद्या प्रदान करनेवाला देवदुर्लभ ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। मूल्य लेकर भी वेदोंके अर्थ, यज्ञोंकी विभिन्न विधियोंको सम्पादित करनेवाले तथा शास्त्र और धर्म-शास्त्रोंको लिखनेवाले ब्रह्मलोकको प्राप्त करते हैं। वेद-शास्त्र ही संसारके मूल (व्यवस्थापक) हैं। इसी कारण ईश्वरने सबसे पहले इन्हींकी सृष्टि की। अतः सब प्रकारका सत्प्रयत्न करके वेदोंका अर्थ-संग्रह करना चाहिये अर्थात् वेदोंके तात्पर्यको समझनेके लिये भलीभाँति प्रयास करना चाहिये। जो अधिकारी इतिहास अथवा पुराण लिखकर दान देता है, वह ब्रह्मदानके समान प्राप्त पुण्यका द्विगुणित पुण्य प्राप्त करता है।
द्विजको नास्तिकोंके वचन, कुतर्क तथा प्राकृत और म्लेच्छ-भाषा-भाषित वचन नहीं सुनने चाहिये, क्योंकि ये शब्द द्विजको अधोगतिमें ले जाते हैं।
दान ग्रहण करनेका सामर्थ्य रहनेपर भी जो लोग दान ग्रहण नहीं करते, वे लोग उन्हीं लोकोंको प्राप्त करते हैं, जो दान-दाताको प्राप्त होते हैं।
कुश, शाक, दूध, गन्ध तथा जल—ये वस्तुएँ बिना माँगे यदि कुलटा, पतित, नपुंसक एवं शत्रुके अतिरिक्त किसी दुष्कृतीके द्वारा भी दी जा रही हों तो भी इनका प्रत्याख्यान नहीं करना चाहिये। यदि कोई सुकृती इन्हें बिना याचनाके दे रहा है, तब तो इनके प्रत्याख्यानका कोई प्रसंग ही नहीं है। देवता तथा अतिथिकी पूजा करनेके लिये, अपने माता-पिता आदिके भरण-पोषणके लिये तथा अपने जीवनकी रक्षाके लिये पतित आदि अत्यन्त कुत्सितको छोड़कर अन्य सभीसे जितना अत्यावश्यक है, उतना प्रतिग्रह लिया जा सकता है।
(अध्याय ९८)
श्राद्धके अवसर तथा अधिकारी; श्राद्धकी संक्षिप्त विधि, महिमा और फल
याज्ञवल्क्यजीने कहा—ऋषिगणो! अब मैं सर्वपाप-विनाशिनी श्राद्ध-विधिका वर्णन करता हूँ।
अमावास्या, अष्टका*, वृद्धि (पुत्रजन्म आदि), कृष्णपक्ष, उत्तरायण, दक्षिणायन, द्रव्य (अन्नादि)-लाभ होना, श्राद्ध-योग्य ब्राह्मणकी प्राप्ति होना, विषुवत्-संक्रान्ति (सूर्यके तुला और मेषराशिपर संक्रमण करनेका समय), मकर-संक्रान्ति, व्यतीपात, गजच्छाया-योग, चन्द्र-सूर्यग्रहण तथा कर्ताकी श्राद्धके प्रति अभिरुचि होना—ये सब श्राद्धके काल (अवसर) कहे गये हैं।
जो ब्राह्मण युवा (मध्यम वयस्क) होते हुए सभी वेदोंमें अग्र्य (सतत अस्खलित अध्ययनमें समर्थ), श्रोत्रिय, ब्रह्मवित्, मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेदके तात्पर्यके वेत्ता, ज्येष्ठ साम नामक साम-विशेषके अध्ययनके लिये विहित व्रतके आचरणके साथ ज्येष्ठ सामके अध्येता, त्रिमधु नामके ऋग्वेदके एकदेशके अध्ययनके लिये विहित व्रतके आचरणके साथ त्रिमधुके अध्येता तथा ऋक् और यजुके एकदेश त्रिसुपर्णके अध्ययनके लिये विहित व्रतके आचरणके साथ त्रिसुपर्णके अध्येता ब्राह्मण हैं, ये
* हेमन्त-ऋतु एवं शिशिर-ऋतुके महीनोंमें आनेवाली कृष्णपक्षकी अष्टमीमें 'अष्टका' होती है।
| १७२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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श्राद्धकी सम्पत्ति माने जाते हैं, अर्थात् इन्हें भोजन कराने या दान देनेसे अक्षय फलकी प्राप्ति होती है। ऐसे ही भानजा, श्राद्ध-योग्य ब्राह्मणोंके लक्षणोंसे विशिष्ट ऋत्विक्, यजुर्वेदके एकदेश-विशेषके अध्ययनके अङ्ग व्रतके आचरणके साथ उस एकदेशके अध्येता, दौहित्र, शिष्य तथा अन्य सम्बन्धी—बन्धु-बान्धव एवं कर्मनिष्ठ, तपोनिष्ठ पञ्चाग्नि¹-विद्याके अध्येता, ब्रह्मचारी, मातृ-पितृभक्त एवं ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मण श्राद्धकी सम्पत्ति (श्राद्धमें भोजनीय एवं दान देने योग्य) हैं।
जो रोगी (महारोगसे युक्त), अङ्गहीन, अधिकाङ्ग, काण, पौनर्भव² (विधवाके पुनर्विवाहके अनन्तर उत्पन्न पुत्र), अवकीर्णी³ आदि⁴ आचारभ्रष्ट तथा अवैष्णव हैं, वे श्राद्धके योग्य नहीं हैं।
श्राद्धके एक दिन पूर्व ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करना चाहिये। निमन्त्रित ब्राह्मणोंको उस दिन संयम रखना चाहिये। श्राद्ध-दिवसके पूर्वाह्नकालमें उपस्थित उन ब्राह्मणोंको आचमन कराकर आसनोंपर बैठा दे। विश्वेदेव अथवा आभ्युदयिक श्राद्धके लिये दो ब्राह्मण तथा पितृपात्रके स्थानपर यथाशक्ति ब्राह्मणको बैठाना चाहिये अथवा इनमें दो ब्राह्मणोंको विश्वेदेवपात्रके आसनपर पूर्वाभिमुख तथा तीन ब्राह्मणोंको पितृपात्रके आसनपर उत्तराभिमुख अथवा दोनों (देव-पितर)-के लिये एक-एक ब्राह्मण आसनपर बैठाना चाहिये। इसी प्रकार मातामहादिके श्राद्धमें व्यवस्था करनी चाहिये और मातामह-श्राद्धमें विश्वेदेव-सम्बन्धी कृत्य अलग-अलग या एक साथ किया जा सकता है।
इसके बाद ब्राह्मणोंको हस्त-प्रक्षालनके लिये जल (हस्तार्घ्य) और आसनके लिये कुश प्रदानकर उन्हींकी अनुज्ञासे 'विश्वे देवास०' इस मन्त्रसे विश्वेदेवका आवाहन करके भोजन-पात्रमें यव विकीर्ण करे। तदनन्तर पवित्रकयुक्त अर्घ्यपात्रमें 'शं नो देवी०' इस मन्त्रसे उसमें जल तथा 'यवोऽसि०' मन्त्रद्वारा यव डालकर 'या दिव्या०' मन्त्रसे ब्राह्मणके हाथमें अर्घ्योदक प्रदानकर गन्ध, दीपक, माला, हार आदि आभूषण तथा वस्त्र दान करे।
तत्पश्चात् अपसव्य होकर पितरोंको अप्रदक्षिण (वाम)-क्रमसे स्थान (कुशरूपी आसन) प्रदान करे और (आसनके लिये मोटकरूप) द्विगुणित कुश देकर 'उशन्तस्त्वा०' मन्त्रसे उन पितरोंका आवाहन करे। उसके बाद पितृ-स्थानपर विराजमान ब्राह्मणकी आज्ञा लेकर 'आयन्तु नः पितरः०' इस मन्त्रका जप करे।
पितृकार्यमें यवके स्थानपर तिलोंका प्रयोग करना चाहिये और तिलके साथ उन पितृगणोंको पूर्ववत् अर्घ्यादि प्रदान करे। उन अर्घ्यों (अर्घ्यपात्रों)-के संस्रव (ब्राह्मणके हाथमें दिये गये अर्घ्योदकका नीचे गिरा हुआ जल)-को पितृपात्रमें रखकर और दक्षिणाग्र कुशस्तम्बको भूमिपर रखकर उसके ऊपर 'पितृभ्यः स्थानमसि०' इस मन्त्रके द्वारा उक्त अर्घ्यपात्र (पितरोंके वामभागमें) भूमिपर उलटकर रख दे। उसके बाद घृत-सम्मिश्रित अन्नको अग्निमें प्रदान करनेके लिये आचार्यसे श्राद्धकर्ता अग्नौकरणकी आज्ञा प्राप्त करे। जब आचार्य 'ऐसा ही करो' यह
१-पञ्चाग्नि—सभ्य, आवसथ्य, आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि—ये पाँच अग्नियाँ हैं।
२-पौनर्भव—पुनर्भूसे उत्पन्न। पुनर्भू उस स्त्रीको कहते हैं, जो विवाहके पहले किसी दूसरे पुरुषसे विवाहित हो चुकी है अथवा किसी दूसरे पुरुषके संसर्गसे दूषित हो चुकी है।
३-अवकीर्णी—ब्रह्मचर्याश्रममें रहते हुए जिसका वीर्य स्खलित हो गया है।
४-आदिसे कुण्ड, गोलक, कुनखी एवं काले दाँतवाले ब्राह्मण समझे जाने चाहिये। पति जीवित रहते हुए दूसरे पुरुषसे उत्पन्न कुण्ड एवं पतिके निधनके बाद दूसरे पुरुषसे उत्पन्न गोलक होता है।
काण्ड ] श्राद्धके अवसर तथा अधिकारी; श्राद्धकी संक्षिप्त विधि, महिमा और फल १७३
कह दें तो उन्हें पितृयज्ञके समान ही उस अग्निमें युक्त घृताक्त हव्यका हवन करके आहुति करनेसे शेष बचे हुए अन्नको समाहित मनसे पितरोंके भोजन-पात्रोंमें रख दे। पितरोंके भोजन-पात्रोंके रूपमें यथाशक्ति चाँदीके पात्रोंका प्रयोग करना चाहिये।
‘पृथिवी ते पात्रं०’ मन्त्रसे पात्रको अभिमन्त्रित करे। ‘इदं विष्णुः’ मन्त्रका पाठ करे और ब्राह्मणके अंगुष्ठको पितरोंके लिये परिवेशित अन्नमें प्रवेशित करे। व्याहृतियोंके सहित ‘गायत्री’ एवं ‘मधुवाता०’ मन्त्रका जप करके सुखपूर्वक भोजन करें, इस प्रकार ब्राह्मणोंसे निवेदन करे और ब्राह्मण मौन होकर भोजन करें। श्राद्धकर्ता क्रोधादिसे रहित होकर बड़े ही श्रद्धा-भावसे उन ब्राह्मणोंको बिना शीघ्रता किये उनका अभीष्ट अन्न तथा हविष्यान्न उन्हें प्रदान करे और ब्राह्मणोंकी तृप्तितक ‘पुरुषसूक्त’ तथा ‘पवमानसूक्त’ आदिका जप करता रहे। उसके बाद पुनः पहलेके समान ‘मधुवाता०’ मन्त्रका पाठ करे और शेषान्नको लेकर उन संतृप्त ब्राह्मणोंके द्वारा ‘हम तृप्त हो गये’, इस प्रकार कहनेपर उन ब्राह्मणोंकी अनुज्ञासे श्राद्धकर्ता दक्षिणाभिमुख होकर तिलसहित उस शेषान्नको ब्राह्मणोंके उच्छिष्ट पात्रोंके समीपमें ही भूमिपर जलके साथ रख दे और प्रत्येक ब्राह्मणको मुख-प्रक्षालनके लिये अलग-अलग जल प्रदान करे।
उच्छिष्टके समीपमें पितर आदिके लिये पिण्डदान करके उसी प्रकार मातामहादिके लिये भी पिण्डदान करे। उसके बाद ब्राह्मणोंको आचमन कराये। तदनन्तर ब्राह्मणोंके ‘स्वस्ति’ ऐसा कहनेपर श्राद्धकर्ता ‘अक्षय्यमस्तु’ कहकर ब्राह्मणोंके हाथमें जल प्रदानकर यथासामर्थ्य दक्षिणा दे और ‘स्वधां वाचयिष्ये’ ऐसा कहे। ‘वाच्यताम्’ के द्वारा ब्राह्मण श्राद्धकर्ताको आज्ञा प्रदान करें। उनकी अनुज्ञा प्राप्तकर श्राद्धकर्ता पितृजनोंके लिये ‘स्वधा’ इस वाक्यका प्रयोग करे। पुनः उन ब्राह्मणोंके द्वारा ‘स्वधा’ ऐसा कह देनेके पश्चात् श्राद्धकर्ता पृथ्वीपर जलसिञ्चन करे।
‘विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम्’ यह कहकर श्राद्धकर्ता विश्वेदेवोंको जल अर्पितकर उन्हें विसर्जित करे। तदनन्तर पितरोंसे इस प्रकारकी प्रार्थना करे—
दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः संततिरेव च॥
श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहु देयं च नोऽस्त्विति।
(९९। २६-२७)
पितृगण! हमारे यहाँ दाताओं, वेदों और संतानोंकी वृद्धि हो, हमारी श्रद्धा कभी न घटे, देनेके लिये हमारे पास बहुत सम्पत्ति हो। तदनन्तर ‘वाजे वाजे०’ इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए श्राद्धकर्ता प्रसन्नताके साथ यथाक्रम पितरोंका विसर्जन करे। जिस अर्घ्यपात्रमें पहले संस्रव-जल रखा गया था, उस पितृपात्र (अर्घ्यपात्र)-को सीधा कर दे तथा श्राद्धकर्ता उन आमन्त्रित ब्राह्मणोंका प्रदक्षिणाके साथ अनुगमन करते हुए उन्हें विदा करे। इसके पश्चात् श्राद्धसे अवशिष्ट अन्नका भोजन करके उस रात्रिमें सपत्नीक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करे।
विवाहादिक माङ्गलिक अवसरोंपर पितरोंका नान्दीमुख श्राद्ध करना चाहिये। उनके लिये दधि, कर्कन्धू (बदरी फल)-मिश्रित यवान्नका पिण्डदान करना चाहिये।
एकोद्दिष्ट* श्राद्ध विश्वेदेवसे रहित एकान्न और एक पवित्रकसे युक्त होता है। इस श्राद्धमें आवाहन और अग्नौकरण नहीं किया जाता। इस श्राद्धका सम्पूर्ण कृत्य अपसव्य अर्थात् दक्षिण कन्धेपर यज्ञोपवीत धारण करके करना चाहिये। श्राद्धकर्ता इस श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणोंको पवित्र भूमिपर रखे हुए आसनपर ‘उपतिष्ठताम्’ कहकर बैठनेके लिये निवेदन करे। उसी प्रकार ‘अभिरम्यताम्’ कहकर विसर्जन करे। ब्राह्मणोंको भी ‘अभिरताः स्म’ यह वचन कहना चाहिये।
सपिण्डीकरण श्राद्धमें श्राद्धकर्ता तिल एवं
*एक व्यक्ति (पिता)-के उद्देश्यसे किया जानेवाला श्राद्ध एकोद्दिष्ट है।
| १७४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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गन्धमिश्रित जलसे चार पात्रोंको परिपूर्ण करे। उन पितृपात्रोंमेंसे एक पात्रको अर्घ्य प्रदान करनेके लिये प्रेतपात्रके रूपमें कल्पित करे। तदनन्तर श्राद्धकर्ता प्रेतपात्रमें रखे हुए अर्घ्य-जलके कुछ भागको पिता आदिके तीन पात्रोंमें मिलाकर पूर्ववत् अर्घ्यादि क्रियाका सम्पादन करे। 'ये समाना०' इन दो मन्त्रोंके द्वारा प्रेतपिण्डको तीन भागोंमें विभक्तकर पितरोंके पिण्डोंमें मिला दे। इसके अनन्तर विहित एकोद्दिष्ट श्राद्ध स्त्री (माता)-का भी करना चाहिये। जिसका सपिण्डीकरण एक वर्षसे पूर्व होता है, उसके उद्देश्यसे भी एक वर्षपर्यन्त सान्नोदक कुम्भ प्रतिदिन, प्रतिमाह यथाशक्ति ब्राह्मणको देना चाहिये। पितरोंको समर्पित पिण्डोंको गौ, अज, ब्राह्मण, अग्नि अथवा जलको अर्पित कर दे।
हविष्यान्न (तिल, व्रीहि, यव आदि)-से श्राद्ध करनेपर पितृगणोंको एक मास तथा पायससे श्राद्ध करनेपर उन्हें एक वर्षपर्यन्त संतुष्टि प्राप्त होती है।
मृत व्यक्तियोंके लिये कृष्ण चतुर्दशी तिथिमें श्राद्ध करना चाहिये। ऐसा करनेपर श्राद्धकर्ताको मृत्युके पश्चात् स्वर्ग तो प्राप्त होता ही है, जीवनकालमें भी उन (श्राद्धकर्ता)-को उत्साह, शौर्य, क्षेत्र तथा शक्तिकी प्राप्ति होती है।
जो विधिवत् अपने पितृजनोंके लिये श्राद्ध करता है, वह पुत्र, सर्वजनश्रेष्ठता, सौभाग्य, समृद्धि, प्रमुखता, माङ्गलिक दक्षता, अभीष्ट कामना-पूर्ति, वाणिज्यमें लाभ, निरोगता, यश, शोकराहित्य, परम गति, धन, विद्या, वाक्-सिद्धि, पात्र, गौ, अज, आविक (भेंड़), अश्व और दीर्घायु प्राप्तकर अन्तकालमें मोक्ष-लाभ प्राप्त करता है। कृत्तिकादिसे भरणीपर्यन्त प्रत्येक नक्षत्रमें श्राद्ध करनेवाले व्यक्तिको भी इन सभी सुखोंकी प्राप्ति होती है। सुन्दर-सुन्दर वस्त्र तथा भवन आदि सुख-साधन स्वयं ही श्राद्धकर्ताको सुलभ होते हैं अर्थात् इस प्रकारका श्राद्धकर्ता भोजन, वस्त्र तथा भवन आदिसे परिपूर्ण रहता है।
पिता-पितामहादि पितर संतुष्ट होकर श्राद्धकर्ताको नित्य आयु, संतति, धन, विद्या, राज्य, सभी प्रकारके सुख, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करते हैं।
(अध्याय ९९)
विनायकशान्ति-स्नान
याज्ञवल्क्यजीने कहा— हे ऋषियो! अब आप सभी विनायककी अप्रसन्नतासे ग्रस्त (आविष्ट) पुरुषके लक्षणोंका श्रवण करें।
विनायकसे ग्रस्त व्यक्ति स्वप्नावस्थामें बहुत अधिक स्नान करता है। उसे स्वप्नमें मरे हुए प्राणियोंके सिरोंका दर्शन होता है। वह उद्विग्नमन रहता है। उसके सारे प्रयत्न निष्फल रहते हैं। बिना कारण उसे पीड़ा होती है। विनायककी अप्रसन्नतासे युक्त होनेपर राजा राज्यसे वञ्चित रहता है, कुमारी पतिसे वञ्चित रहती है तथा गर्भिणी स्त्री पुत्र-लाभसे वञ्चित रहती है। अतएव विनायककी शान्तिके लिये किसी पवित्र दिन एवं शुभ मुहूर्तमें उसे विधिपूर्वक स्नान कराना चाहिये। स्नानकी विधि संक्षेपमें इस प्रकार है— भद्रासनपर बिठाकर ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचनपूर्वक स्नान कराना चाहिये। पीली सरसों पीसकर उसे घृत-मिश्रित करके उबटन बनाये और उस व्यक्तिके सम्पूर्ण शरीरमें मले। फिर उसके मस्तकपर सर्वौषधिसहित सब प्रकारके सुगन्धित द्रव्यका लेप करे। सर्वौषधियुक्त चार कलशोंके जलसे स्नान कराना चाहिये। सरोवर
१-ये चार पात्र पितरोंके लिये अलग-अलग विहित हैं। इनके अतिरिक्त विश्वेदेवके दो पात्र तो होते ही हैं।
२-इस एकोदिष्टका तात्पर्य यह है कि पार्वण श्राद्धमें माताका श्राद्ध अलगसे करना चाहिये (या० मिताक्षरा, श्रा० प्र० अ० श्लोक २५४)।
८७- अशौच तथा आपद्वृत्ति-निरूपण
काण्ड ] विनायकशान्ति-स्नान [ १७५
आदि पाँच स्थानोंकी मिट्टी, गोरोचन, गन्ध और गुग्गुल—ये वस्तुएँ भी उन कलशोंके जलमें छोड़े।
प्रथम कलशको लेकर आचार्य निम्नलिखित मन्त्रसे उसे स्नान कराये—
सहस्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं स्मृतम्॥
तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्यः पुनन्तु ते।
(१००। ६-७)
जो सहस्रों नेत्र (अनेक प्रकारकी शक्तियों)-से युक्त हैं, जिनकी सैकड़ों धाराएँ (प्रवाह) हैं और जिसे महर्षियोंने पवित्र करनेवाला बताया है, उस पवित्र जलसे मैं (विनायकग्रस्त) तुम्हारा (उपद्रवकी शान्तिके लिये) अभिषेक करता हूँ। यह पावन जल तुम्हें पवित्र करे।
द्वितीय कलशके जलसे निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए अभिषेक करे—
भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः॥
भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः।
(१००। ७-८)
राजा वरुण तथा भगवान् सूर्य एवं देवगुरु बृहस्पति आपके सौभाग्यकी अभिवृद्धि करें; इसी प्रकार देवराज इन्द्र, वायुदेव तथा सप्तर्षिगण भी आपके सौभाग्यकी अभिवृद्धि करते रहें।
तृतीय कलशके जलसे निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए अभिषेक करे—
यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्द्धनि॥
ललाटे कर्णयोरक्षणोरापस्तद्घ्नन्तु ते सदा।
(१००। ८-९)
तुम्हारे केशोंमें, सीमन्तमें, मस्तकपर, ललाटमें, कानोंमें और नेत्रोंमें भी जो दुर्भाग्य है, उसे जलदेवता सदाके लिये शान्त करें।
तदनन्तर पहले कहे गये तीनों मन्त्रोंसे चतुर्थ कलशके जलसे स्नान कराये। इसके बाद बाँयें हाथमें कुशा लेकर स्नान किये हुए प्राणीके सिरको कुशसे स्पर्श करते हुए ब्राह्मणको संयमित होकर गूलरकी लकड़ीसे निर्मित स्रुवाके द्वारा सार्षपतैल (सरसोंका तेल)-से अग्निमें आहुति प्रदान करनी चाहिये। आहुति देनेके लिये ये मन्त्र विहित हैं— 'मिताय स्वाहा', 'सम्मिताय स्वाहा', 'शालाय स्वाहा', 'कटङ्कटाय स्वाहा', 'कूष्माण्डाय स्वाहा', 'राजपुत्राय स्वाहा' ('स्वाहा' के पूर्व प्रयुक्त सभी नाम विनायकके हैं। या० मि० ग० प्र० अ० श्लोक २८५)।
इसके अनन्तर लौकिक अग्निमें स्थालीपाक-विधिसे चरु पकाकर उससे सभी निर्दिष्ट विनायक नामवाले 'स्वाहा' युक्त छः मन्त्रोंसे उसी लौकिक अग्निमें ही हवनकर अवशिष्ट हविशेषके द्वारा इन्द्र, अग्नि, यम आदिको बलि देनी चाहिये। तत्पश्चात् किसी चतुष्पथ (चौराहे)-पर कुशोंका आसन बिछाकर उसमें पुष्प, गन्ध, उण्डेरककी माला, कच्चे-पक्के चावल, घृतमिश्रित पुलाव, मूली, पूड़ी, पुआ, दही, पायस, घृत, गुड़पिष्ट, लड्डू तथा इक्षु—इन सभी सामग्रियोंको एकत्र करके रख दे। तदनन्तर विनायकजननी भगवती अम्बिकाका उपस्थान करे और हाथ जोड़कर अर्घ्य प्रदान करे।
पुत्रजन्मकी कामना करनेवाली स्त्रीको दूर्वा और सरसोंके पुष्पोंसे भगवती दुर्गाकी अर्चना करके स्वस्ति-वाचनके साथ इस प्रकार उनकी प्रार्थना करनी चाहिये—
रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि मे।
पुत्रान्देहि श्रियं देहि सर्वान्कामांश्च देहि मे॥
(१००।१६)
हे भगवति! आप मुझे रूप, यश और ऐश्वर्य प्रदान करें। हे देवि! आप मेरे लिये पुत्र दें, लक्ष्मी दें और मेरी सभी कामनाओंको परिपूर्ण करें।
तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन प्रदानकर संतुष्ट करे। अपने गुरुको दो वस्त्र प्रदानकर अन्य ग्रहोंकी पूजा करके सूर्यार्चनमें निरत रहे। इस प्रकार विनायक और ग्रहोंका पूजन करके मनुष्य अपने सभी कार्योंमें सफलता प्राप्त करता है।
(अध्याय १००)
| १७६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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ग्रहशान्ति-निरूपण
याज्ञवल्क्यजीने कहा— हे मुनियो! लक्ष्मी एवं सुख-शान्तिके इच्छुक तथा ग्रहोंकी दृष्टिसे दुःखित जनोंको ग्रहशान्तिके लिये तत्सम्बन्धित यज्ञ करना चाहिये। विद्वानोंके द्वारा सूर्य, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु—ये नौ ग्रह बताये गये हैं। इनकी अर्चाके लिये इनकी मूर्ति क्रमशः इन द्रव्योंसे बनानी चाहिये—ताम्र, स्फटिक, रक्तचन्दन, स्वर्ण, सुवर्ण, रजत, अयस् (लोहा), सीसा तथा कांस्य। अर्थात् सूर्यग्रहके लिये ताम्र धातु, चन्द्रके लिये स्फटिक, मंगलके लिये रक्तचन्दन, बुध एवं बृहस्पतिके लिये स्वर्ण, शुक्रके लिये रजत, शनिके लिये लोहा, राहुके लिये सीसा तथा केतुके लिये कांस्य धातु प्रशस्त है।
सूर्यका वर्ण लाल, चन्द्रमाका सफेद, मंगलका लाल, बुध तथा बृहस्पतिका पीला, शुक्रका श्वेत, शनि, राहु और केतुका काला वर्ण होता है। इसी वर्णके इनके द्रव्य भी होते हैं। एक पाटेपर वस्त्र बिछाकर ग्रहवर्णोंके अनुसार निर्दिष्ट द्रव्योंके द्वारा विधिपूर्वक उनकी स्थापना तथा पूजा-होम करे। उन्हें सुवर्ण, वस्त्र तथा पुष्प समर्पित करे। उनके लिये गन्ध, बलि, धूप, गुग्गुल भी देना चाहिये। तत्पश्चात् मन्त्रोंके द्वारा प्रत्येक ग्रह-देवताके निमित्त चरु पदार्थ अर्पित करना चाहिये।
उसके बाद यथाक्रम ‘ॐ आकृष्णेन रजसा०’ इस मन्त्रके द्वारा सूर्य, ‘ॐ इमं देवा०’ मन्त्रसे चन्द्र, ‘ॐ अग्निमूर्धादिवः ककुत्०’ मन्त्रके द्वारा मंगल, ‘ॐ उद्बुध्यस्व०’ मन्त्रसे बुध, ‘ॐ बृहस्पते०’ इस मन्त्रके द्वारा बृहस्पति, ‘ॐ अन्नात्परिस्रुतम०’ मन्त्रसे शुक्र, ‘ॐ शं नो देवी०’ मन्त्रके द्वारा शनि, ‘ॐ कयानश्चि०’ मन्त्रसे राहु तथा ‘ॐ केतुं कृण्वन्०’ मन्त्रके द्वारा केतु ग्रहके लिये आहुति देनी चाहिये।
इन ग्रहोंके लिये इसी क्रमसे मन्दार, पलाश, खैर, अपामार्ग (चिचड़ा), पिप्पल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुशकी समिधाएँ विहित हैं। इन समिधाओंको घृत, दधि तथा मधुसे मिश्रितकर हवन करना चाहिये। तदनन्तर क्रमानुसार उपर्युक्त मन्त्रोंके द्वारा पदार्थोंकी आहुति प्रदान करे। यथा—सूर्यके लिये गुड़, चन्द्रके लिये भात, मंगलके लिये पायस, बुधके लिये साठी चावलकी खीर, बृहस्पतिके लिये दही-भात, शुक्रके लिये घृत, शनिके लिये अपूप (पुआ), राहुके लिये फलका गूदा और केतुके लिये अनेक वर्णके पकाये हुए धान्यकी आहुति देनी चाहिये।
द्विजको चाहिये कि इसी क्रमसे प्रत्येक ग्रहके लिये अन्न भी दानरूपमें दे। तदनन्तर प्रत्येक ग्रहके निमित्त यथाक्रम—धेनु, शंख, बैल, सुवर्ण, वस्त्र, अश्व, कृष्णा गौ, अयस् (शस्त्र आदि) तथा छागकी दक्षिणा देनी चाहिये। इस प्रकार ग्रहोंकी सदैव पूजा करनेसे मनुष्यको राज्यादि फल प्राप्त होते हैं।
(अध्याय १०१)
वानप्रस्थ-धर्म-निरूपण
याज्ञवल्क्यजीने कहा— हे महर्षियो! अब मैं वानप्रस्थाश्रमके धर्मका वर्णन कर रहा हूँ, आप सभी इसका श्रवण करें।
वानप्रस्थ-आश्रममें प्रविष्ट पुरुषको अपनी पत्नीके संरक्षणका भार पुत्रोंके ऊपर छोड़कर अथवा पत्नीके सहित वनमें जाना चाहिये।
वानप्रस्थ-धर्मका पालन करनेवाला ब्रह्मचर्य-व्रतका निर्वाह करते हुए अपनी श्रौत-अग्नि एवं