गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
( ३० ) कण्डिका विषय पृष्ठ ८—होता यक्षत् होता यक्षत्-इन मन्त्रों के उच्चारण का विषय ... ३७४ ६--हिङ्कार [ प्रतिध्वनि ] के उच्चारण की महिमा और प्रमाण ... ३७७ १०--प्रातःसवन, माध्यन्दिन और तृतीय सवन में विशेषता से मन्त्रों का प्रयोग ... ... ... ३८० ११--छन्दों के साथ प्रणव का सम्बन्ध और व्याख्यान ... ... ३८३ १२--एकाह यज्ञ के प्रातःसवन में प्रजापति मृत्यु को स्तोत्रों द्वारा भगांता है : ... ... ... ... ३८५ १३--प्रातःसवन में मैत्रावरुण द्वारा मित्र और वरुण की स्तुति .. ३८७ १४-प्रातःसवन में ब्राह्मणाच्छंसी द्वारा इन्द्र और सूर्य की स्तुति ... ३८६ १५--प्रातःसवन में अच्छावाक द्वारा इन्द्र और अग्नि की स्तुति ... ३६२ १६--प्रातःसवन में ( शंसावोम् ) मन्त्र को चार-चार बार बोलें : ३६४ १७ माध्यन्दिन सवन में दक्षिणा दातव्य है ... ... ३६६ १८--दक्षिणापात्र लोगों का क्रम ... ... ... ३६८ १६--दक्षिणा में दातव्य पदार्थ और उनके गुण ... ... ३६६ २०--आख्यायिका के रूप में ऋक् और साम के सम्बन्ध का वर्णन ... ४०१ २१- स्तोत्रिय आदि यज्ञाङ्गों की आत्मा आदि से सामान्यता ... ४०४ २२-स्तोत्र इत्यादि यज्ञाङ्गों की आत्मा आदि से सदृशता का अधिक विवरण ... ... ... ... ४०५ २३--माध्यन्दिन सवन के देवता इन्द्र की महिमा ... ... ४०८ प्रपाठक ४ ॥ १--एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में मैत्रावरुण के मन्त्र प्रयोग ... ४१२ २-एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में ब्राह्मणाच्छंसी के मन्त्र प्रयोग ... ४१३ ३-एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में अच्छावाक के मन्त्र प्रयोग ... ४१६ ४-एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में ( शंसावोम् ) मन्त्र को पांच बार बोलें ... ... ... ... ४१६ ५-एकाह यज्ञ के तृतीय सवन में पत्नीवत स्तोत्र को आग्नीध्र का चुपके चुपके जपने का कारण ... ... ... ४२१ ६-तृतीयसवन में शाकला इष्टि ... ... ... ४२२ ७-अध्वर्युं और यजमान की शुद्धि और अवभृथ स्नान ... ... ४२४ ८-वेदी पर ओषधि स्थापन और सक्तुओं से होम ... ... ४२५ ६-एकाष्टका इष्टि और दो अरणियों से अग्नि समारोपण ... ४२७ १०-अग्निष्टोम सूर्य समान है, तीनों सवनों में मन्त्र बोलने का विधान सूर्य न कभी उदय और न अस्त होता है इसका विचार - ४३०
( ३१ ) कण्डिका विषय पृष्ठ ११-आख्यायिका-एकाह यज्ञ के तृतीय सवन में से सायंकाल में घुसे हुये असुर लोग इन्द्र, अग्नि, वरुण, बृहस्पति और विष्णु पांच देवताओं अथवा वाक् आदि पांच इन्द्रियों करके निकाले गये ... ... ... ... ४३३ १२-आख्यायिका-प्रजापति पांच प्राणों से पांच देवताओं को उत्पन्न करता है और पांच देवता स्तुति किये जाते हैं ... ४३५ १३-उक्थ में दो इन्द्र और अग्नि की स्तुति रहते हुये बहुत देवताओं की स्तुति का विचार ... ... .. ४३६ १४-तीन ऋत्विजों के अलग अलग उक्थ और दो दो देवता वाले उक्थ हैं ... ... ... ४३६ १५-एकाह यज्ञ के तृतीयसवन के उक्थ में मैत्रावरुण ऋत्विज् के मन्त्र ... ४३७ १६-एकाह यज्ञ के तृतीय सवन के उक्थ में ब्राह्मणाच्छंसी ऋत्विज् के मन्त्र ... ... ... ... ... ४४१ १७-एकाह यज्ञ के तृतीय सवन के उक्थ में अच्छावाक ऋत्विज् के मन्त्र ... ... ... ... ... ४४५ १८-एकाह यज्ञ के तृतीय सवन में ( शंशिसावोम् ) इस मन्त्र को चार चार बार बोलें ... ... ... ... ४४६ १६-एकाह यज्ञ में षोडशी शब्द की व्याख्या ... ... ४५१ प्रपाठक ५ ॥ १-आख्यायिका-अतिरात्र यज्ञ में से इन्द्र और छन्दों ने तीन पर्यायों में असुरों को निकाल दिया ... ... ... ४५३ २-अतिरात्र यज्ञ के तीन पर्यायों में तीन प्रकार से स्तुति ... ४५५ ३-अतिरात्र यज्ञ में पवमान आदि स्तोत्रों का विचार ... ... ४५६ ४-यज्ञ का मनुष्य के अङ्गों और ऋत्विजों का प्राणों आदि के दृष्टान्त से वर्णन ... ... ... ... ४६१ ५-यज्ञ के पर्यायों में स्तोत्रों और शस्त्रों के प्रयोग ... ... ४६३ ६-आख्यायिका-त्वष्टा का इन्द्र से सोमरस छीनना और सौत्रामणी इष्टि ... ... ... ... ४६५ ७-साम सब वेदों का रस है, सौत्रामणी यज्ञ में सामगान ... ४६७ ८-आख्यायिका-वाजपेय यज्ञ का वर्णन ... .. ४६६ ६-आख्यायिका-आप्तोर्याम यज्ञ का वर्णन ... ... ४७३ १०-आप्तोर्याम यज्ञ का अधिक वर्णन ... ... ... ४७५ ११-अनेकाहिक वा अहीन अर्थात् अनेक दिनों में होने वाले यज्ञ का वर्णन ... ... ... ... ४७७ १२-अहीन अहर्गण यज्ञ में आरम्भणीया ऋचाओं का वर्णन ... ४७८
( ३२ ) कण्डिका विषय पृष्ठ १३—अहीन वा अहर्गण यज्ञ में परिधानीया अर्थात् समाप्ति वाली ऋचाओं का वर्णन ... ... ४८१ १४—अहीन और एकाह यज्ञों में होत्रक लोगों की दो प्रकार की परि- धानीया ऋचायें ... ... ४८४ १५—यज्ञों में अच्छावाक ऋत्विज् के विशेष स्तोत्र ... ... ४८६ प्रपाठक ६ ॥ १—अहीन यज्ञ में सम्पात सूक्तों का वर्णन ... ... ४८६ २—अहीन यज्ञ में आवाप सूक्तों का वर्णन और महत्त्व ... ४६५ ३—अहीन यज्ञ में कद्वत् प्रगाथों का उपयोग और महत्त्व ... ४६६ ४—अहीन यज्ञ में विशेष मन्त्रों का प्रयोग ... ... ५०२ ५—अहीन यज्ञ की युक्ति और विमुक्ति... ... ... ५०५ ६—होताओं और होत्रक लोगों के उक्थों का वर्णन और असुरों से यज्ञ की रक्षा ... ... ... ५०७ ७—यज्ञ में उक्थों और शिल्पों का वर्णन ... ... ५११ ८—नाभानेदिष्ठ, नाराशंस, बालखिल्य, प्रगाथ, बृहती, सतोबृहती, वृषाकपि, न्यङ्ख, एवयामरुत् और याज्या विनियोग ... ५१४ ६—नाभानेदिष्ठ, बालखिल्य, वृषाकपि और एवयामरुत् सहचरणों का वर्णन तथा बुडिल और गोश्रल के प्रश्नोत्तर ... ... ५१८ १०—षडह यज्ञ में पारुच्छेपी ऋचाओं का प्रयोग ... ... ५२१ ११—देवासुर सङ्ग्राम की आख्यायिका, यज्ञों में छठे दिन के कर्म ... ५२४ १२—षडह यज्ञ में स्तोत्रिय, अनुरूप, सुकीर्ति, वृषाकपि, कुन्ताप [ अथ० २० । १२७-१३६ ], रंभी, पारिक्षिती, कारव्या, दिशां- कॢप्ति और इन्द्र गाथाओं का वर्णन ... ... ... ५२७ १३—कुन्ताप सूक्तों में ऐतश प्रलाप, प्रवह्लिका, प्रतिराध, आजिज्ञा- सेन्या और अतिवाद मन्त्रों का प्रयोग ... ... ५३३ १४—कुन्ताप सूक्तों में आदित्य और आङ्गिरसी ऋचाओं अथवा देव- नीथ सूक्त का प्रयोग, आदित्यों का अङ्गिराओं को पृथिवी दक्षिणा, पृथिवी की विषमता और भूतेच्छन्द का प्रयोग ... ५३८ १५—कुन्ताप सूक्तों में आहनस्या ऋचाओं का प्रयोग ... ५४३ १६—कुन्ताप सूक्तों में दाधिक्री, पवमानी और ऐन्द्राबार्हस्पत्य ऋचाओं का प्रयोग, षडह यज्ञ की समाप्ति ... ... ५४६ क्षेमकरणदास त्रिवेदी ५२ लूकरगंज, प्रयाग मार्गशीर्ष शुक्ला २ सं० १६८१ वि० ता० २८ नवम्बर १६२४ ॥
कण्डिका १
ओ३म् अथर्ववेदस्य गोपथब्राह्मणम् पूर्व-भागः ─::o::─ प्रथमः प्रपाठकः कण्डिका १ ओ३म् ब्रह्म ह वा इदमग्र आसीत्, स्वयन्त्वेकमेव तदैक्षत, महद्वै यक्षं, तदेकमेवास्मि, हन्ताहं मदेव मन्मात्रं द्वितीयं देवं निर्मम इति, तदभ्यश्राम्यदभ्य- तपत् समतपत्, तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य सन्तप्तस्य ललाटे स्नेहो यदार्द्रमोजा- यत तेनानन्दत्तमब्रवीत् महद्वै यक्षं सुवेदमविदामह इति । तद्यदब्रवीत् महद्वै यक्षं सुवेदमविदामह इति, तस्मात् सुवेदोऽभवत्तं वा एतं सुवेदं सन्तं स्वेद इत्या- चक्षते । परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः ॥ १ ॥ कण्डिका १ । ब्रह्म और सृष्टि की इच्छा ।। (ओ३म् ब्रह्म ह वै इदमग्रे आसीत्) ओ३म् [रक्षक परमात्मा है] ब्रह्म [सबसे बड़ा परमात्मा ] ही निश्चय करके इस [ जगत् ] के पहिले था । ( स्वयम् तु एकम् एव तत् ऐक्षत ) और अपने को अकेला ही उसने देखा ( महत् वै यक्षम्, तत् एकम् एव अस्मि ) मैं बड़ा ही पूजनीय हूँ, सो मैं अकेला ही हूं। ( हन्त अहम् मत् एव मन्मात्रं द्वितीयं देवं निर्ममे इति ) अरे ! मैं अपने से ही अपने समान दूसरा देव [दिव्य पदार्थ] बनाऊं । ( तत् अभि अश्राम्यत् अभि अतपत् सम् अतपत् ) उसने सब ओर से श्रम किया, सब ओर से तप किया, भली भांति तप किया। (तस्य श्रान्तस्य सन्तप्तस्य ललाटे स्नेहः यत् आर्द्रम् आ-अजायत ) उस श्रम किये हुए, तपे हुये, भली भांति तपे हुये के ललाट पर चिकना द्रव्य, जो गीलापन है, सब ओर से प्रकट हुआ । ( तेन अनन्दत् ) १- ओ३म्-अवतेष्टिलोपश्च (उ० १ । १४२) अव रक्षणादौ-मन्, टिलोपः । अथवा अः = विराडादिः, उः = हिरण्यगर्भादिः, मकारः = ईश्वरादिः । हे रक्षक ! परमेश्वरस्य सर्वोत्तमनाम । आरम्भः । अनुमतिः । ब्रह्म-वृंहेर्नोऽच्च (उ० ४ । १४६) बृंहि वृद्धौ-मनिन्, नकारस्य अकारः रत्वं च । ब्रह्म परिवृढं सर्वतः (निरु० १ । ८) सर्ववृद्धः परमेश्वरः (ह) निश्चयेन (वै) एव (इदमग्रे) अस्य जगतः पूर्वम्-प्रलयकाले (ऐक्षत) ईक्ष दर्शने-लङ् । अपश्यत् (यक्षम्) यक्ष पूजा-
कण्डिका २
२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० १ ॥ उससे वह प्रसन्न हुआ, (तम् अब्रवीत्) और उस [चिकने द्रव्य] से बोला--(महत् वै यक्षम् सुवेदम् अविदामहे इति) मैं बड़ा ही पूजनीय हूं, [अच्छे प्रकार जानने योग्य पदार्थ] को हमने जाना है (तत् यत् अब्रवीत्) वह जो उसने कहा-(महत् वै यक्षम् सुवेदम् अविदामहे इति) मैं बड़ा ही पूजनीय हूं सुवेद [अच्छे प्रकार जानने योग्य पदार्थ] को हमने जाना है-(तस्मात् सुवेदः अभवत्) इसलिये वह सुवेद [अच्छे प्रकार जानने योग्य पदार्थ] हुआ। (तम् वै) उस ही (एतम् सुवेदम् सन्तम्) इस सुवेद [अच्छे प्रकार जानने योग्य पदार्थ] होते हुये को (स्वेदः इति आचक्षते) स्वेद [पसीना] कहते हैं। (परोक्षेण) परोक्ष [आंख ओट प्रलय में वर्त्तमान ब्रह्म] के द्वारा (परोक्षप्रियाः इव हि) परोक्षप्रिय [आंख ओट भविष्य के प्रेमी] लोगों के समान ही (देवाः) देवता [विद्वान् लोग] (प्रत्यक्षद्विषः) प्रत्यक्ष [वर्त्तमान अवस्था] के द्वेषी [विरोधी] (भवन्ति) होते हैं [अर्थात् दूरदर्शी लोग ब्रह्म के नियमों को विचार कर, क्षणभङ्गुर वर्त्तमान को छोड़कर आगे को सुधार करके उन्नति करते हैं। योग दर्शन पाद २ सूत्र १६ में कहा है--हेयं दुःखमनागतम्--न आया हुआ अर्थात् आगे का दुःख छोड़ने योग्य है] ॥ १ ॥ भावार्थः-ऋषि लोग विचारते हैं कि प्रलय में भी वर्त्तमान अविनाशी ब्रह्म सृष्टि करने के लिए अपना ज्ञान प्रकट करता है ॥ १ ॥ विशेषः--(सुवेद और अविदामहे) पदों में यह समता मानी है कि दोनों पद एक ही धातु [विद-ज्ञाने] से बने हैं, स्वेद शब्द ष्ष्विदा गात्रप्रसरणे घञ् से पसीना अर्थ में बनता है किन्तु यहां (सुवेद) को ही स्वेद) पसीना माना है ॥ कण्डिका २ स भूयोऽश्राम्यद् भूयोऽतप्यत् भूय आत्मानं समतपत्तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य सन्तप्तस्य सर्वेभ्यो रोमगत्तेंभ्यः पृथक् स्वेदधाराः प्रास्यन्दन्त। ताभिरनन्दत्, याम्-घञ् । पूजनीयम् (हन्त) हर्षे, खेदे (मत्) मत्संकाशात् । आत्मनः (मन्मात्रम्) प्रमाणे द्वयसज्दघ्नञ्मात्रचः (पा० ५।२।३७) मत्-मात्रच् । आत्मसदृशम् (निर्ममे) माङ् माने-लडर्थे लिट् । रचयामि । (ललाटे) लल ईप्सायाम्-अच् + अट गतौ-अण् । ललम् = ईप्साम् अटति ज्ञापयतीति ललाटम् । कपाले (स्नेहः) ष्णिह प्रीतो स्नेहने च-घञ् । तैलादिरसः । स्निग्धता (आर्द्रम्) आर्द्र-ण्यञ् । सजलत्वम् (तम्) स्नेहम् (सुवेदम्) विद ज्ञाने-खल् । सुखेन ज्ञेयम् । (अविदामहे) विद ज्ञाने विदॢ लाभे वा-लङ्, छान्दसं रूपम् । वयं ज्ञातवन्तः । वयं लब्धवन्तः (स्वेदः) ष्ष्विदा गात्रप्रसरणे-घञ् । घर्मः, प्रस्रवणम् । अत्र तु सुवेद एव स्वेदः आचक्षते । चक्षिङ् व्यक्तायां वाचि-लट् । समन्तात् कथ- यन्ति परोक्षेण-परोक्षे लिङ् (पा० ३।२।११५) इति निर्देशाद् परस्योकारः । अप्रत्यक्षेण प्रलये वर्त्तमानेन ब्रह्मणा (परोक्षप्रियाः) परोक्षे भविष्ये रुचिराः (इव) यथा (देवाः) विद्वांसः (प्रत्यक्षद्विषः) वर्त्तमानावस्थाविरोधिनः ॥
कण्डिका २ ।। ब्रह्म के रोमों से पसीने की धारायें और
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २ ।। ३ तदब्रवीदाभिर्वा अहमिदं सर्वं धारयिष्यामि यदिदं किञ्चाभिर्वा अहमिदं सर्वं जनयिष्यामि यदिदं किञ्चाभिर्वा अहमिदं सर्वमाप्स्यामि यदिदं किञ्चेति । तद्यदब्रवीदाभिर्वा अहमिदं सर्वं धारयिष्यामि यदिदं किञ्चेति, तस्मात् धारा अभवंस्तद् धाराणां धारात्वं यच्चासु ध्रियते । तद्यदब्रवीदाभिर्वा अहमिदं सर्वं जनयिष्यामि यदिदं किञ्चेति, तस्माज्जाया अभवंस्तज्जायानां जायात्वं यच्चासु पुरुषो जायते, यच्च पुत्रः पुन्नामनरकमनेकशततारं तस्मात् त्राति पुत्रस्तत् पुत्रस्य पुत्रत्वम् । तद्यदब्रवीदाभिर्वा अहमिदं सर्वमाप्स्यामि यदिदं किञ्चेति तस्मादापा अभवंस्तदपामप्त्वामाप्नोति वै स सर्वान् कामान् यान् कामयते ॥ २ ॥ कण्डिका २ ।। ब्रह्म के रोमों से पसीने की धारायें और सृष्टि की इच्छा ॥ ( सः भूयः अश्राम्यत् ) उस [ परमात्मा ] ने फिर श्रम किया, ( भूयः अतप्यत् ) फिर तप किया ( भूयः आत्मानं समतपत् ) और फिर अपने को भली भांति तपाया । ( तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य सन्तप्तस्य ) उस श्रम किये हुए, तपे हुए, भली भांति तपे हुये [ परमात्मा ] के ( सर्वेभ्यः रोमगर्तेभ्यः ) सब रोम कूपों से ( पृथक् स्वेदधाराः ) अलग अलग पसीने की धारायें ( प्र अस्यन्दन्त ) बहने लगीं । ( ताभिः अनन्दत् ) उनसे वह प्रसन्न हुआ ( तत् अब्रवीत् ) तब वह बोला— ( आभिः वै अहम् इदं सर्वं धारयिष्यामि यत् इदं किञ्च ) इन [ पसीने की धाराओं ] से ही मैं इस सबको धारण करूँगा, यह जो कुछ भी [ होगा ] ( आभिः वै अहम् इदं सर्वं जनयिष्यामि यत् इदम् किञ्च ) इनसे ही मैं इस सब को उत्पन्न करूँगा, यह जो कुछ भी [ होगा ] ( आभिः वै अहम् इदम् सर्वम् आप्स्यामि यत् इदं किञ्च इति ) इनसे ही मैं इस सबमें व्यापूंगा यह जो कुछ भी [ होगा ] । ( तत् यत् अब्रवीत् ) वह जो उसने कहा—( आभिः वै अहम् इदं सर्वं धारयिष्यामि यत् इदं किञ्च इति ) इन [ पसीने की धाराओं ] से ही मैं इस सबको धारण करूंगा, यह जो कुछ भी [ होगा ] ( तस्मात् धाराः अभवन् ) उसी से वे धारायें [धारण शक्तियां] २—सः । परमात्मा । ब्रह्म भूयः । भू+यसु प्रयत्न—विवप्, भुवे भावाय यस्यति यतत इति¹ । पुनः (अस्यन्दन्त) स्यन्दू प्रस्स्रवणे—लङ् । अस्रवन् (आभिः) स्वेदधाराभिः ( धारयिष्यामि ) धृञ् धारणे—लृट् । स्थापयिष्यामि (किंच ) किमपि ( जनयिष्यामि ) जन जनने, जनी प्रादुर्भावे वा—लृट् उत्पादयिष्यामि (आप्स्यामि) आप्लृ व्याप्तौ—लृट् । व्याप्स्यामि । ( इति ) वाक्यसमाप्तौ । धाराः । धृञ् धारणे—णिच् -- अङ् । प्रवाहसन्ततयः । धारणशक्तयः ( धारात्वम् ) १. वस्तुतः व्याकरण के नियमानुसार बहु शब्द से अतिशय में ईयसुन् प्रत्यय होकर बहोलोंपो भू च बहोः (पा० ६ । ४ । १५८ ) सूत्र के अनुसार बहु को भू आदेश तथा प्रत्यय के आदि 'ई' का लोप होकर नपुंसकलिङ्ग में भूय शब्द की सिद्धि समीचीन प्रतीत होती है ।। सम्पा० ।।
४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २ ॥ हुईं । ( तत् च धाराणां धारात्वं यत् आसु ध्रियते ) और वह धाराओं का धारापन [ धारण सामर्थ्य ] है जो इन सब में धरा गया है ( तत् यत् अब्रवीत् ) वह जो उसने कहा—( आभिः वै अहम् इदं सर्वं जनयिष्यामि यत् इदं किञ्च इति ) इनसे ही मैं इन सब को उत्पन्न करूंगा यह जो कुछ भी [होगा ] ( तस्मात् जायाः अभवन् ) उससे वे [ पसीने की धारायें ] जायायें [ माताओं समान उत्पन्न करने वाली शक्तियां ] हुईं, ( तत् च जायानां जायात्वं यत् आसु पुरुषः जायते ) और वह जायाओं का जायापन [ उत्पादन सामर्थ्य ] है जो इनमें पुरुष [जीव] उत्पन्न होता है, (यत् च पुत्रः) और जो पुत्र [ संतान वा जीव ] होता है । ( पुत् नाम नरकम् ) पुत् [ जिस अवस्था में पापी लोग जाते हैं ] नाम वाला नरक ( अनेकशततारम् ) अनेक सैकड़ों दबाव वाला है, ( तस्मात् पुत्रः त्राति ) उस [नरक] से पुत्र बचाता है, (तत् पुत्रस्य पुत्रत्वम्) वह पुत्र का पुत्रपन [ नरक से बचाना ] है । ( तत् यत् अब्रवीत् ) वह जो उसने कहा —( आभिः वै अहम् इदं सर्वम् आप्स्यामि यत् इदं किञ्च इति ) इन [ पसीने की धाराओं ] से ही मैं इस सबमें व्यापूंगा यह जो कुछ भी [ होगा ]--( तस्मात् आपः अभवन् ) उससे वे आप् [ व्यापक जल ] हुये, ( तत् अपाम् अप्त्वम् ) वह जलों का जलपन [ व्यापकपन ] है । ( सः वै सर्वान् कामान् आप्नोति यान् कामयते ) वह अवश्य सब कामनायें पाता है जिन्हें वह चाहता है [जो ऐसा विद्वान् है-देखो कण्डिका ३, ४ ] ॥ २ ॥ भावार्थः- जगत् की उत्पत्ति से ब्रह्म के पसीने की तीन अवस्थायें मानी हैं, एक धारण सामर्थ्य, दूसरी उत्पादन सामर्थ्य और तीसरी ब्यापन सामर्थ्य ॥ २ ॥ विशेषः- १ इस कण्डिका के इन पदों में समता मानी है, धारयिष्यामि तथा धाराः ) दोनों पद धृञ् धारणे से, (जनयिष्यामि तथा जायाः) जन वा जनी जनने से और ( आप्स्यामि तथा आपः ) आप्लृ व्याप्तौ, प्राप्तौ से बने हैं ।। विशेषः-२ यहां कण्डिका १-२ का मिलान करो- "हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम" ।। हिरण्यगर्भ, तेज वाले लोकों का आधार, पहिले ही वर्तमान था, वही प्रकट होकर पृथिवी आदि पंचभूत का एक पति हुआ, उसने पृथिवी और सूर्य को धारण किया, उस सुखदायक प्रजापति की दिव्य गुण के लिए भक्ति के साथ हम सेवा करें--अथर्व० ४ । २ । ७ । ( आपो वत्सं धारणसामर्थ्यम् ( ध्रियते ) स्थाप्यते जायाः- जनेर्यक् ( उ० ४ । १११ ) जन जनने-यक् । मातृसदृश्य उत्पादनशक्तयः । पुरुषः । पुरः कुषन् ( उ० ४ । ७४ ) पुरः- अग्रगमने-कुषन् । जीवः । पुत्रः । पुवो ह्रस्वश्च ( उ० । ४ । १६५ ) पूञ् पवने-क्त्रः, धातोर्ह्रस्वत्वम्, अथवा पुत्+त्रैङ् पालने-कः । पुत्रः पुन्न त्रायते निपरणाद्वा पुन्नरकं ततस्त्रायत इति वा-निरु० २ । ११ । सन्तानः । जीवः (पुत्) पुत पुत्त गतौ-क्विप् । गच्छन्ति पापिनो यत्र नरकम् । नरकम् । कॄनादिभ्यः संज्ञायां बुन् ( उ० ५ । ३५ ) नॄ नये-वुन् । दुःखभोगावस्थाभेदः । ( अनेकशततारम् ) तॄ प्लवनसं तरणयोः स्वार्थे णिच्-घञ् बहुविधाभिभवयुक्तम् । त्राति । त्रायते
कण्डिका ३ ॥
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३ ॥ ५ जनयन्तीर्गर्भमग्रे समैरयन् । तस्योत जायमानस्योल्व आसीद्धिरण्मयः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥) पहिले ही पहिले बालक रूप संसार को उत्पन्न करती हुई जल धाराओं ने गर्भ, बालक रूप संसार को यथावत् प्रकट किया और उस उत्पन्न होते हुए जो [बालक, संसार] का जरायु [ गर्भ की झिल्ली ] तेजोमय परमात्मा था, उस सुखदायक प्रजापति को दिव्य गुण के लिये भक्ति के साथ हम सेवा करें-अथर्व० ४ । २ । ८ ॥ कण्डिका ३ ॥ ता अपः सृष्ट्वाऽन्वक्षत, तासू स्वां छायामपश्यत् तामस्येक्षमाणस्य स्वयं रेतोऽस्कन्दत्तदप्सु प्रत्यतिष्ठत् तास्तत्रैवाभ्यश्राम्यदभ्यतपत्, समतपत्, ताः श्रान्ता- स्तप्ताः सन्तप्ताः सार्द्धमेव रेतसा द्वैधमभवंस्तासामन्या अन्यतरा अतिलवणा अपेया अस्वाद्व्यस्ता अशान्ता रेतः समुद्रं वृत्वाऽतिष्ठन्नथेतराः पेयाः स्वाद्व्यः शान्तास्तास्तत्रैवाभ्यश्राम्यदभ्यतपत्, समतपत्, ताभ्यः श्रान्ताभ्यस्तप्ताभ्यः सन्तप्ताभ्यो यद्रेत आसीत्तदभृज्यत, यदभृज्यत तस्माद् भृगुः समभवत्, तद् भृगो- र्भृगुत्वं भृगुरिव वै स सर्वेषु लोकेषु भांति य एवं वेद ॥ ३ ॥ कण्डिका ३ । ब्रह्म के बीज का जल में गिरना, समुद्र और भृगु की उत्पत्ति ॥ ( ताः अपः सृष्ट्वा अनु ऐक्षत ) उन जलों को उत्पन्न करके उसने फिर देखा, ( तासु स्वां छायाम् अपश्यत् ) उनमें अपनी छाया [ कान्ति, तेज ] को देखा । ( ताम् ईक्षमाणस्य अस्य ) उस [ छाया ] को देखते हुये इस [ ब्रह्म ] का ( रेतः स्वयम् अस्कन्दत् ) बीज अपने आप टपका ( तत् अप्सु प्रति अतिष्ठत्) और वह जलों में ठहर गया । ( ताः तत्र एव अभि अश्राम्यत् ) उनको वहां ही उसने सब ओर से श्रम दिया [ दबाया ], ( अभि अतपत् ) सब ओर से तपाया, ( सम् अतपत् ) भली भांति तपाया । ( ताः श्रान्ताः तप्ताः सन्तप्ताः ) वे दबाये हुये, तपाये हुये, भली भांति तपाये हुये [ जल] ( रेतसा सार्द्धम् एव ) बीज के साथ ही ( द्वैधम् अभवन् ) दो प्रकार से हो गये । ( तासाम् अन्याः अन्यतराः ) उनमें से कोई, दोनों में से कोई एक [ जलधारायें ] ( अतिलवणाः ) अति खारी ( अपेयाः ) न पीने योग्य और ( अस्वाद्व्यः ) अरोचक थीं, ( ताः अशान्ताः रेतः ) वे अशान्त बीज [ होती हुयी ] ( समुद्र वृत्वा ) समुद्र [ परमात्मा] को स्वीकार करके ( अतिष्ठन् ) ठहरीं [ देखो कण्डिका ७] । ( अथ ( आपः ) आप्नोतेर्ह्रस्वश्च ( उ० २ । ५८ ) आप्लृ व्याप्तौ-क्विप्, जसि दीर्घः । व्यापनशक्तयः । जलानि ॥ ३-( अपः ) जलानि ( छायाम् ) माछाशसिभ्यो यः ( उ० । ४ । १०६ ) छो छेदने-यप्रत्ययः । प्रकाशावरणम् । कान्तिम् । प्रतिविम्बम् ( अस्य ) ब्रह्मणः ( ईक्षमाणस्य ) पश्यतः ( रेतः ) बीजम् ( अस्कन्दत् ) अक्षरत ( द्वैधम् ) द्वित्र्योश्च धमुञ् ( पां० ५ । ३ । ४५ ) द्वि-धमुञ् । द्विविधम् ( अस्वाद्व्यः ) अरुचिकराः ( समुद्रम् ) सम् + उत् + दु-डप्रत्ययः । समुद्र आदित्यः, समुद्र आत्मा-
६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३ ॥ इतराः) और दूसरी [ जलधारायें ] ( पेयाः ) पीने योग्य, (स्वाद्व्यः) रोचक और (शान्ताः) शान्त थीं, (ताः तत्र एव अभि अश्राम्यत्) उनको वहाँ ही उसने सब ओर से दबाया, (अभि अतपत्) सब ओर से तपाया, (सम् अतपत्) भली भाँति तपाया। (ताभ्यः शान्ताभ्यः तप्ताभ्यः सन्तप्ताभ्यः) उन दबाई हुई, तपाई हुई, भली भाँति तपाई हुई [ जल धाराओं ] से ( यत् रेतः आसीत् ) जो बीज हुआ, (तत् अभृज्यत) वह पक गया [ अथवा चमक उठा ] । ( यत् अभृज्यत ) जो वह पक गया [वा चमक उठा], (तस्मात्) उससे (भृगुः) वह भृगु [भर्ग वाला अर्थात् चमकीला तत्त्व विशेष ] ( सम् अभवत् ) उत्पन्न हुआ, (तत्) वह (भृगोः) भृगु का (भृगुत्वम्) भृगुपन [पक्वपन वा चमकीलापन] हैं। (भृगुः इव वै) भृगु के समान ही (सः सर्वेषु लोकेषु भाति) वह सब लोकों [जीवों] में चमकता है, (यः एवं वेद) जो ऐसा विद्वान् है ॥ ३ ॥ भावार्थः-ब्रह्म ने जल रूप तत्त्व के दो रूप किये एक अतिसूक्ष्म परमाणु रूप जिसको हम ग्रहण नहीं कर सकते, और दूसरा स्थूल रूप प्रकाश आदि ॥ विशेषः-१ अभृज्यत तथा भृगुः दोनों पद भ्रस्ज पाके दीप्तौ च इस एक ही धातु से बने हैं यह दोनों में समता है ॥ विशेषः-२ मनु महाराज म० १ श्लोक ८, ६, १२, १३ में ऐसा कहते हैं-सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥ ८ ॥ तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् । तस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥ ६ ॥ तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् । स्वयमेवात्मनो ध्यानादण्डमकरोद् द्विधा ॥ १२ ॥ ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं च निर्ममे । मध्ये व्योम दिशश्चाष्टावपां स्थानं च शाश्वतम् ॥ १३ ॥ उस [ परमात्मा ] ने अपने शरीर से अनेक प्रजावें उत्पन्न करने की इच्छा करते हुए सब ओर से ध्यान करके अप् [ जल तत्त्व ] को पहिले उत्पन्न किया और उसमें बीज छोड़ दिया ॥ ८ ॥ वह [ बीज ] सूर्य के समान प्रकाशवाला चमकीला अण्डा हो गया, उस अण्डे में सब लोगों का पितामह ब्रह्मा [ परमात्मा ] अपने आप प्रकट हुआ ॥ ६ ॥ उस अण्डे में उस भगवान् [ ऐश्वर्य्यवान् परमात्मा ] ने वर्ष भर रह कर अपने आप ही अपने ध्यान से उस अण्डे को दो टुकड़े कर दिया ॥ १२ ॥ उस [ परमात्मा ] ने उन दो टुकड़ों से सूर्य और पृथिवी, बीच में आकाश, आठ दिशाओं और जलों के निश्चय स्थायी स्थान को बनाया ॥ १३ ॥ निरु० १४ । १६ । परमात्मानम् । जलौघम् (वृत्वा) स्वीकृत्य (अभृज्यत) भ्रस्ज पाके लङ् । पक्वमभवत् । अदीप्यत (भृगुः) प्रथिम्रदिभ्रस्जो सम्प्रसारणं सलोपश्च (उ० १ । २७) भ्रस्ज पाके च-कुः, सम्प्रसारणं सलोपो न्यङ्क्वादित्वात् कुत्वं च । भृगवः, मध्यस्थानीदेवताः-निरु० ११ । १९ । भर्गयुक्तः । परिपक्वः । तेजस्वी । परमात्मरूपम् (वेद) विद ज्ञाने-लट् । वेत्ति । जानाति ॥
कण्डिका ४
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ४ ॥ ७ कण्डिका ४ स भृगुं सृष्ट्वाऽन्तरधीयत, स भृगुः सृष्टः प्राङेजत् तं वागन्ववदद्वायो वायो इति, स न्यवर्त्तत, स दक्षिणां दिशमेजत् तं वागन्ववदत् मातरिश्वन् मातरिश्वन्निति, स न्यवर्त्तत स प्रतीचीं दिशमेजत् तं वागन्ववदत् पवमानः पवमान इति, स न्यवर्त्तत स उदीचीन्दिशमेजत् तं वागन्ववदद्वात वातेति तमब्रवीन्नन्व- विदामह इति, नहीत्यथार्वाडेनेमेतास्वेवाप्स्वान्विच्छेति तद्यदब्रवोदथार्वाडेनेमेता- स्वेवाप्स्वान्विच्छेति तदथर्वाऽभवत्, तदथर्वणोऽथर्वत्वम्। तस्य ह वा एतस्य भगवतोऽथर्वण ऋषेर्यथैव ब्रह्मणो लोमानि यथाऽङ्गानि यथा प्राण एवमेवास्य सर्वं आत्मा समभवत्तमथर्वाणं ब्रह्माऽब्रवीत् प्रजापतेः प्रजाः सृष्ट्वा पालयस्वेति। तद्यदब्रवीत् प्रजापतेः प्रजाः सृष्ट्वा पालयस्वेति, तस्मात् प्रजापतिरभवत्, तत् प्रजापतेः प्रजापतित्वमथर्वा वै प्रजापतिः, प्रजापतिरिव वै स सर्व्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद ॥ ४ ॥ कण्डिका ४ । अथर्वा और प्रजापति ॥ ( स भृगुं सृष्ट्वा अन्तर् अधीयत ) वह [ परमात्मा ] भृगु [ पकाने वाले वा चमकीले तत्त्व ] को उत्पन्न करके अन्तर्धान हो गया । ( सः भृगुः सृष्टः प्राङ् एजत = ऐजत ) वह भृगु उत्पन्न होकर पूर्व को चला । (तं वाक् अनु अवदत् ) उस से वाणी [ वेद वाणी ] कहने लगी - ( वायो वायो इति ) हे वायु ! वायु ! [ चलनेवाले पवन ] । ( स न्यवर्तत ) वह लोटा । ( स दक्षिणां दिशम् एजत ) वह दक्षिण दिशा को चला । ( तं वाक् अनु अवदत् ) उससे वाणी कहने लगी - ( मातरिश्वन् मातरिश्वन् इति ) हे मातरिश्वन् ! हे मातरिश्वन् ! [ आकाश में बढ़ने वाले पवन ] । ( स न्यवर्तत ) वह लौटा । ( स प्रतीचीं दिशम् एजत ) वह पश्चिम दिशा को चला । (तं वाक् अनु अवदत् ) उससे वाणी कहने लगी-( पवमानः पवमान इति ) हे पवमान ! पवमान [ शोधने वाले पवन ] । ( सः न्यवर्तत ) वह लोटा । ( स उदीचीं दिशम् एजत ) वह उत्तर दिशा को चला । ( तं वाक् अनु अवदत् ) उससे वाणी कहने लगी ( वात वात इति ) हे वात ! वात ! [ सेवनीय पवन ] । ( तम् = ताम् ) उस [ वाणी ] से ( अब्रवीत् ) वह बोला ( ननु अविदामहे इति ) क्या [ उस परमात्मा को ] हमने जाना है ? [ वाणी ने कहा ] ४-( अन्तरधीयत) अन्तर् + डुधाञ् धारणपोषणयोः कर्मणि लङ् । अन्त- हितोऽदृष्टोऽभवत् ( प्राङ् ) प्र + अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन् । पूर्वस्यां दिशि । ( एजत ) एजृ कम्पने-लङ् । बहुलं छन्दस्यमाङ्योगेऽपि ( पा० ६ । ४ । ७५ ) आडभावः । अकम्पत । अगच्छत् । ( वाक् ) वेदवाणी ( अनु ) अनन्तरम् ( वायो ) कृवापाजिमि० ( उ० १ । १ । १) वा गतिगन्धनयोः-उण् युक् च । हे गतिशील पवन ( मातरिश्वन् ) श्वन्नुक्षन्पूषन्० ( उ० १ । १५६ ) मातरि + टुओश्वि गति- वृद्धयोः, श्वस प्राणने, शीङ् स्वप्ने वा-कनिन् । मातरिश्वा वायुर्मातर्यन्तरिक्षे श्वसिति मातर्यश्वनितीति वा - निरु० ७ । २६ । मातरि मानकर्तरि आकाशे हे वृद्धिशील
८ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ४ ॥ ( नहि इति ) नहीं [ जाना है ] ( अथ अर्वाङ् ) अब सामने ( एनम् ) इस [ पुरुष ] को ( एतासु एव ) इन ही ( अप्सु ) जलों [ भाप समान व्यापक तन्मात्राओं ] में ( अन्विच्छ इति ) खोज । ( तत् यत् ) वह जो ( अब्रवीत् ) उस [ वाणी ] ने कहा— ( अथ अर्वाङ् एनम् एतासु एव अप्सु अन्विच्छ इति ) अब सामने इस [ पुरुष ] को इन्हीं जलों [ भाप समान व्यापक तन्मात्राओं ] में खोज—( तत् अथर्वा अभवत् ) वह अथर्वा [ निश्चल परमात्मा ] हुआ [ अर्थात् अथर्वा पद अथ और अर्वाङ् से बना है ] । ( तत् अथर्वणः अथर्वत्वम् ) वह अथर्वा का अथर्वपन है [ फिर सामने होना है ] । ( यथा एव ब्रह्मणः लोमानि ) जैसे ही ब्रह्म के रोम, ( यथा अङ्गानि ) जैसे अङ्ग [ हाथ पैर आदि ] थे और ( यथा प्राणः ) जैसा प्राण था ( एवम् एव ) वैसा ही ( अस्य तस्य एतस्य ) इस बहुत प्रसिद्ध ( भगवतः ) भगवान् [ ऐश्वर्यवान् ] ( अथर्वणः ऋषेः ) अथर्वा ऋषि का ( ह ) भी ( वै ) निश्चय करके ( सर्वः आत्मा ) सब आत्मा [ शरीर ] ( सम् अभवत् ) उत्पन्न हुआ । ( तम् अथर्वाणं ब्रह्म अब्रवीत् ) उस अथर्वा से ब्रह्म बोला । ( प्रजापतेः प्रजाः सृष्ट्वा पालयस्व इति ) प्रजापति की प्रजाओं [ जीव जन्तु आदि पदार्थों ] को उत्पन्न करके पाल । ( तत् यत् अब्रवीत् ) वह जो उस [ ब्रह्म ] ने कहा — ( प्रजापतेः प्रजाः सृष्ट्वा पालयस्व इति ) प्रजापति की प्रजाओं को उत्पन्न करके पाल— ( तस्मात् प्रजापतिः अभवत् ) उससे वह प्रजापति हुआ, ( तत् प्रजापतेः प्रजापतित्वम् ) वह प्रजापति का प्रजापतित्व है । ( अथर्वा वै प्रजापतिः ) अथर्वा ही प्रजापति है । ( प्रजापतिः इव वै ) प्रजापति के समान ही ( सः सर्वेषु लोकेषु भाति ) वह पुरुष सब लोकों में चमकता है, ( यः एवं वेद ) जो ऐसा विद्वान् है ॥ ४ ॥ भावार्थः ऋषि लोग ज्ञानशक्ति से पवन द्वारा सब दिशाओं में ब्रह्म को खोजने लगे, अन्त में ब्रह्म को सब परमाणुओं में सर्वथा व्यापक पाया । ब्रह्म के ही नाम यहाँ भृगु, अथर्वा और प्रजापति हैं ॥ ४ ॥ पवन ( पवमानः ) पूञ् पवने-शानच्, मुक् च । हे शोधकं पवन ( वात ) हसिमृग्रिण्वभ्यिः० ( उ० ३ । ८६ ) वा गतिगन्धनयोः-तन् । हे सेवनीय पवन ( अर्वाङ् ) स्नामदिपद्यति० ( उ० ४ । ११३ ) ऋ गतौ--वनिप्, इति अर्वन् । ऋत्विग्- दधृग्० ( पा० ३ । २ । ५९ ) अर्वन् + अञ्चु गतिपूजनयोः—क्विन्, अर्वन्तम् अञ्चतीति । अभिमुखः । ( अथर्वा ) अथर्वाणोऽथन् १वन्तस्थर्वतिश्चरतिकर्मा तत्प्रतिषेधः- निरु० ११ । १८ । स्नामदिपद्यति० ( उ० ४ । ११३ ) अ + थर्वं चरणे = गतौ- वनिप् । यद्वा अथ + ऋ गतौ—वनिप्, अत्र तु अथ + अर्वाङ् । निश्चलः । मङ्गल- शीलः । आनन्तर्येण समीपः । परमात्मा । वेदः । वेदज्ञाता पुरुषः । ( ऋषेः ) इगुपधात् कित् ( उ० ४ । १२० ) ऋषी गतौ-इन् कित् । ऋषिर्दर्शनात् - निरु० २ । ११ । दर्शकस्य । दर्शनीयस्य ( आत्मा ) सातिभ्यां मनिन्मनिणौ ( उ० ४ । १५३ ) अत सातत्यगमने - मनिण् । स्वरूपम् । देहः । जीवः । ब्रह्म ॥ १. अथर्वणवन्तः यह समीचीन पाठान्तर है ।
कण्डिका ५ ॥ दस अथर्वा ऋषि, दस आथर्वण, वेद और ओम् ॥
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । कं० ५ ॥ ९ ॥ कण्डिका ५ ॥ तमथर्वाणमृषिमभ्यश्राम्यदभ्यतपत्, समतपत्तस्माच्छ्रान्तात्तप्तात् सन्तप्तात् दशतयानथर्वण ऋषीन्निरमिमतैकचाँन् द्व्यचाँस्तुचाँश्चतुर्ऋंचान् पञ्चर्चाम् षडर्चांन् सप्तर्चानष्टर्चाम्नवचाँन्दशर्चानिति । तानथर्वण ऋषीनभ्यश्राम्यदभ्यतपत् समतपत्, तेभ्यः श्रान्तेभ्यस्तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यो दशतयानाथर्वणानार्षेयान्निरमिम- तैकादशान् द्वादशांस्त्रयोदशांश्चतुर्दशान् पञ्चदशान् षोडशान् सप्तदशानष्टा- दशान्नवदशान् विंशानिति । तानथर्वण ऋषीनाथर्वणांश्चार्षेयानभ्यश्राम्यदभ्य- तपत् समतपत् तेभ्यः श्रान्तेभ्यस्तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यो यान् मन्त्रानपश्यत् स आथ- र्वणो वेदोऽभवत् तमाथर्वणं वेदमभ्यश्राम्यदभ्यतपत्समतपत्तस्माच्छ्रान्तात् तप्तात् सन्तप्तादोमिति मन एवोर्ध्वमक्षरमुदक्रामत्, स य इच्छेत्सर्वैरेतैरथर्वनि- श्चाथर्वणैश्च कुर्वीयेत्येतयैव तं महाव्याहृत्या कुर्वीत । सर्वैर्ह वा अस्यैतैरथर्व- भिश्चाथर्वणैश्च कृतं भवति य एवं वेद यश्चैवं विद्वानेवमेतया महाव्याहृत्या कुरुते ॥ ५ ॥ कण्डिका ५ ॥ दस अथर्वा ऋषि, दस आथर्वण, वेद और ओम् ॥ (तम् अथर्वाणम् ऋषिम्) उस अथर्वा ऋषि [अर्थात् अपने] को (अभि अश्राम्यत्) उस [ब्रह्म] ने सब ओर से दबाया, (अभि अतपत्) सब ओर से तपाया, (सम् अतपत्) भली भांति तपाया। (तस्मात् श्रान्तात् तप्तात् सन्तप्तात्) उस दबाये हुए, तपाये हुए भली भांति तपाये हुए [अथर्वा] से (दशतयान् अथर्वणः ऋषीन्) दस प्रकार वाले अथर्वा (निश्चल) ऋषियों [दर्शनीय वेदज्ञानों] को (निर् अमिमत्) उसने बनाया, [अर्थात्] (एक-ऋचान्) एक [ओम् परमात्मा] की स्तुति योग्य विद्या वाले [वेद ज्ञानों] को, (द्वि--ऋचान्) दो [स्थावर और जङ्गम संसार] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को, (तृचान्) तीन [भूत, भविष्यत्, वर्तमान] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को, (चतुर्--ऋचान्) चार [धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष,] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को, (पंच-ऋचान्) पांच [पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, पांच तत्त्वों] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को, (षट्-ऋचान्) छह [वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर, ऋतुओं] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को, (सप्त-ऋचान्) सात [दो कान, दो नयने, दो आँखें, एक मुख अथर्व १०।२।६] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को, (अष्ट-ऋचान्) आठ [यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, ५--अथर्वाणम् - गो० पू० १ । ४ निश्चलम् । ऋषिम्-गो० पू० १ । ४ । सन्मार्गदर्शकं स्वात्मानम् (दशतयान्) संख्याया अवयवे तयप् (पा० ५।२।४२) दशन्-तयप् दशप्रकारान् (ऋषीन्) दर्शनीयान् वेदमन्त्रान् (निर् अमिमत) माङ् माने-लङ् आर्षं बहुवचनम् । अमिमीत । निर्मितवान् (एकऋचान्) ऋच स्तुतौ-क्विप् । ऋग्वाङ्नाम-निघ० १ । ११ । ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे (पा० ५।४। ७४) एक+ऋच्-अप्रत्ययः समासान्तः । एकस्य ओम् इत्यस्य परमात्मनः ऋक्
१० गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ५ ॥ योग के आठ अंगों] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को (नव-ऋचान्) नव [आचारो विनयो विद्या प्रतिष्ठा तीर्थदर्शनम् । निष्ठावृत्तिस्तपो दानं नवधा कुललक्षणम्-ति शब्दकल्पद्रुमः-इन नो कुल लक्षणों] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को और (दश ऋचान्-इति) दस [दान, शील, क्षमा, वीरता, ध्यान, बुद्धि, सेना, उपाय, दूत, ज्ञान, इन दस बलों] की स्तुति योग्य विद्या वाले [वेद ज्ञानों] को [इस विषय के लिये देखो - अथर्व० १६ । २३ । २० १६. १७] (तान्) उन (अथर्वणः) अथर्वा [निश्चल] (ऋषीन्) ऋषियों [दर्शनीय वेद ज्ञानों] को (अभि अश्राम्यत्) सब ओर से दबाया, (अभि अतपत्,) सब ओर से तपाया, (सम् अतपत्) भली भांति तपाया। (तेभ्यः श्रान्तेभ्यः तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यः) उन दबाये हुये, तपाये हुये, भली भांति तपाये हुये [निश्चल वेदज्ञानों] से (दशतयान्) दस प्रकार वाले (आथर्वणान्) आथर्वण [निश्चल ब्रह्म से आये हुये] (आर्षेयान्) आर्षेयों [ऋषियो'. वेदज्ञानों में विख्यात सूक्ष्म विज्ञानों] को (निर् अभिममत) उस [ब्रह्म] ने बनाया- [अर्थात्] (एकादशान्) ग्यारहवें [प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान, नाग, कूर्म्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय, दस प्राणों' के सहित ग्यारहवें जीवात्मा] से सम्बन्ध वाले, (द्वादशान्) बारहवें [चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, अग्रहायण, पौष, माघ, ग्यारह, महीनों के सहित फाल्गुन महीने] से सम्बन्ध वाले, (त्रयोदशान्) तेरहवें [उछालना, गिराना, सिकोड़ना, फैलाना, और चलना पांच कर्म-तथा छोटाई, हलकाई, प्राप्ति, स्वतन्त्रता' बड़ाई, ईश्वरपन और जिते- न्द्रियता, इन बारह के सहित तेरहवें सत्य संकल्प] से सम्बन्ध वाले (चतुर्दशान्) चौदहवें [कान, आंख नासिका जिह्वा, त्वचा-पांच ज्ञानेन्द्रिय और वाक् हाथ, पांव, पायु, उपस्थ पांच कर्मेन्द्रिय तथा मन, बुद्धि, चित्त के सहित चौदहवें अहङ्कार] से सम्बन्ध वाले, (पञ्चदशान्) पन्द्रहवें [शुक्ल, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश, और चित्र-सात रूप, तथा मधुर, अम्ल, लवण, 'कटु, कषाय और तिक्त-छह रस और चौदहवें सुरभि गन्ध के सहित पन्द्रहवें असुरभि गन्ध] से सम्बन्ध वाले, (षोडशान्) सोलहवें [प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, प्रकाश, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक इन पन्द्रह कलाओं के सहित सोलहवीं कला के नाम] से सम्बन्ध स्तुत्या विद्या येषु तान् वेदान् (द्वि-ऋचान्) सिद्धिः पूर्ववत्। द्वयोः स्थावरजङ्गमयोः स्तुत्यविद्यायुक्तान् वेदान्। तृचान्-त्रि+ऋचान्। न संप्रसारणे संप्रसारणम् (पा० ६ । १ । ३७) अत्र वार्तिकम्-ऋषि त्रैरुत्तरपदादिलोपश्छन्दसि। ऋचि परतः त्रिशब्दस्य सम्प्रसारणम्, ऋलोपश्च। ऋक्पूरबू० (पा० ५ । ४। ७४) तृच्-समासान्तः अप्रत्ययः। त्रयाणां भूतभविष्यद्वर्तमानानां स्तुत्य- विद्यायुक्तान् वेदान्। एवम् (चतुरृचान्, पञ्चर्चाम्) इत्यादि पदेषु सिद्धि- रर्थश्च योजनीयः (आथर्वणान्) तत आगतः (पा० ४ । १ । ७४) अथर्वन्- अण्। अन् (६ । ४ । १६७) इति अणि प्रकृतिभावः। अथर्वणो निश्चलात् परमे-
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ५ ॥ ११ वाले, (सप्तदशान्) सत्रहवें [चार दिशा, चार विदिशा, एक उपर की एक नीचे की, दस दिशायें—सत्त्व, रज, और तम तथा ईश्वर, जीव और प्रकृति—इन सोलह के सहित सत्रहवें संसार] से सम्बन्ध वाले, (अष्टादशान्) अट्ठारहवें [धैर्य, सहन, मन का रोकना, चोरी न करना, शुद्धता जितेन्द्रियता, बुद्धि, विद्या, सत्य, क्रोध न करना—यह दश धर्म—तथा ब्राह्मण, गो, अग्नि, सुवर्ण, घृत, सूर्य, जल—इन सात मंगलों के सहित अठारहवें राजा], से सम्बन्ध वाले, (नवदशान्) उन्नीसवें [ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—चार वर्ण, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास—चार आश्रम, सत्संग सुनना, विचारना, ध्यान करना—चार कर्म, अप्राप्त की इच्छा, प्राप्त की रक्षा, रक्षित की वृद्धि, बढ़े हुये का सन्मार्ग में व्यय करना, चार पुरुषार्थ--मन बुद्धि इन अट्ठारह के सहित उन्नीसवें अहङ्कार] से सम्बन्ध वाले (विंशान् इति) और बीसवें [पृथिवी आदि पांच सूक्ष्मभूत, पृथिवी आदि पांच स्थूल भूत—कान, आंख, नासिका, जिह्वा, त्वचा पांच ज्ञानेन्द्रिय और वाक्, हाथ, पांव, पायु, इन उन्नीस के सहित बीसवें उपस्थेन्द्रिय] से सम्बन्ध वाले [सूक्ष्म विज्ञानों को उस ब्रह्म ने बनाया]-[इस विषय के लिये देखो अथर्व काण्ड १९ सूक्त २३ मन्त्र ८-१७]। (तान्) उन (अथर्वणः) अथर्वा [निश्चल] (ऋषीन्) ऋषियों [सन्मार्ग दर्शक वेदज्ञानों] (च) और (आथर्वणान्) आथर्वण [निश्चल ब्रह्म से आये हुये] (आर्षेयान्) आर्षेयों [ऋषियों वेदज्ञानों में विख्यात सूक्ष्म विज्ञानों) को (श्रमि-अश्राम्यत्) उस [ब्रह्म] ने सब ओर से दबाया (अभि अतपत्) सब ओर तपाया, (सम् अतपत्) भली भांति तपाया। (तेभ्यः श्रान्तेभ्यः तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यः) उन दबाये हुए, तपाये हुए, भली भांति तपाये हुये [बीसों] से (यान्) जिन (मन्त्रान्) मन्त्रों [अति-सूक्ष्म विचारों] को (अपश्यत्) उस [ब्रह्म] ने देखा, (सः) वह (आथर्वणः) आथर्वण [निश्चल ब्रह्म का] (वेदः) वेद (अभवत्) हुआ [अर्थात् समस्त चारों वेदोक्त विज्ञान प्रकट हुये] (तम्) उस (आथर्वणम् वेदम्) आथर्वण वेद [निश्चल ब्रह्म के विज्ञान] को (अभि अश्राम्यत्) उस [ब्रह्म] ने सब ओर से दबाया, (अभि अतपत्) सब ओर से तपाया, (सम् अतपत्) भली भांति तपाया। (तस्मात् श्रान्तात् तप्तात् सन्तप्तात्) उस दबाये हुये, तपाये हुये, भली भांति तपाये हुये [वेद] से (ओम् इति मनः एव) ओम् [सर्वरक्षक अर्थात्] मन [मननशील ब्रह्म] ही (ऊर्ध्वम्) श्वराद् आगतान् प्राप्तान् (आर्षेयान्) पथ्यतिथिवसतिस्वपतेढञ् (पा० ४। ४।१०४) ऋषि-ढञ्, बाहुलकात्। ऋषिषु विख्यात आर्षेयः-महीधर भाष्ये, यजु० ७।४६। आर्षेयः ऋषिषु साधुस्तत्सम्बुद्धौ-दयानन्द भाष्ये यजु० २१।६१। ऋषिषु वेदमन्त्रेषु विख्यातानि सूक्ष्मविज्ञानानि (एकादशान्) तस्य पूरणे डट् (पा० ५।२।४८) एकादशन्-डट्। अंशंआदिभ्योऽच् (पा० ५। २।१२७) एकादश-अच्। प्राणापानोदानव्यानसमानागकूर्म्मकृकलदेवदत्त धनञ्जयाः-इति दशभिः प्राणैः सहितस्यैकादशस्य जीवात्मनः सम्बद्धानि विज्ञानानि (द्वादशान्) आदीनि पदान्येवमेव साधनीयानि योजनीयानि च
कण्डिका ६ ॥
१२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ६ ॥ ऊंचा [ उत्कृष्ट ] (अक्षरम्) अक्षर [ अविनाशी ब्रह्म शब्द ] ( उद् अक्रामत् ) निकला । ( सः यः ) वह पुरुष जो ( इच्छेत् ) चाहे-( एतैः सर्वैः ) इन सब ( अथर्वभिः ) अथर्वाओं [ निश्चल वेद ज्ञानों ] से ( च ) और भी ( आथर्वणैः ) आथर्वणों [ निश्चल ब्रह्म के विज्ञानों ] से ( कुर्वीय इति ) मैं [ पुरुषार्थ ] करूँ-वह ( एतया एव ) इस ही ( महाव्याहृत्या ) महाव्याहृति [ महावाक्य ओम् ] से ( तम् ) उस [ पुरुषार्थ ] को ( कुर्यात् ) करे । ( अस्य ) उस [ पुरुष ] का ( एतैः सर्वैः ) इन सब ( अथर्वभिः ) अथर्वाओं [ निश्चल वेदज्ञानों ] से ( च च ) और भी ( आथर्वणैः ) आथर्वणों [ निश्चल ब्रह्म के विज्ञानों ] से ( ह वै ) ही अवश्य ( कृतम् ) कर्म ( भवति ) होता है, ( यः एवम् वेद ) जो ऐसा विद्वान् है, ( च यः ) और जो ( एवम् विद्वान् ) ऐसा विद्वान् [ जानकार होकर ] ( एवम् ) इस प्रकार से ( एतया महाव्याहृत्या ) इस महाव्याहृति [ ओम् ] से ( कुरुते ) कर्म करता है ॥ ५ ॥ भावार्थः-ऋषि महात्माओं ने ब्रह्म को उसके प्रकट किए हुए ज्ञानों और विज्ञानों द्वारा सब ज्ञानों और विज्ञानों का सार एक ओ३म् को सर्वरक्षक सर्वव्यापक परमात्मा माना है ॥ ५ ॥ कण्डिका ६ ॥ स भूयोऽश्राम्यद् भूयोऽतप्यद् भूय आत्मानं समतपत् स आत्मन एवं त्रींल्लोकान्निरमिमत पृथिवीमन्तरिक्षन्दिवमिति । स खलु पादाभ्यामेव पृथिवीं निरमिमतोदरादन्तरिक्षम्, मूर्ध्नोदिवम् । स तांस्त्रींल्लोकानभ्यश्राम्यदभ्यतपत्स- मतपत्तेभ्यः श्रान्तेभ्यस्तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यस्त्रीन् देवान् निरमिमताग्निं वायुमादि- त्यमिति । स खलु पृथिव्या एवाग्निं निरमिमान्तरिक्षाद्वायुन्दिव आदित्यम् । स तांस्त्रीन् देवानभ्यश्राम्यदभ्यतपत् समतपत्तेभ्यः श्रान्तेभ्यस्तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्य- स्त्रीन् वेदान्निरमिमत ऋग्वेदं यजुर्वेदं सामवेदमिति, अग्ने ऋग्वेदं, वायोर्यजुर्वेदं आदित्यात्सामवेदम् । स तांस्त्रीन् वेदानभ्यश्राम्यदभ्यतपत् समतपत् तेभ्यः श्रान्ते- भ्यस्तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यस्तिस्रो महाव्याहृतीर्निरमिमत भूर्भुवः स्वरिति । भूरि- त्युग्वेदात्, भुव इति यजुर्वेदात्, स्वरिति सामवेदात् । स य इच्छेत्सर्वैरैतैस्त्रिभि- र्वेदैः कुर्वीयेत्येताभिरेव तं महाव्याहृतिभिः कुर्वीत सर्वैर्ह वा अस्यैतैस्त्रिभिर्वेदैः कृतं भवति य एवं वेद यश्चैवं विद्वानेवमेताभिर्महाव्याहृतिभिः कुरुते ॥ ६ ॥ ( ओम् ) पृ० १ । १ । सर्वरक्षकः परमेश्वरः ( मनः ) सर्वधातुभ्योऽसुन् ( उ० ४ । १८६ ) मन ज्ञाने-असुन् । मननशीलं ज्ञानस्वरूपं ब्रह्म ( ऊर्ध्वम् ) उत्कृष्टम् ( अक्षरम् ) न क्षरतीति । अविनाशि ब्रह्म ( उद् अक्रामत् ) उदगच्छत् ( कुर्वीय ) अहं पुरुषार्थं कुर्याम् ( तम् ) पुरुषार्थम् ( महाव्याहृत्या ) महती चासौ व्याहृति- श्चेति । महावाक्येन ( कुर्वीत ) कुर्यात् ( कुरुते ) कर्म करोति ॥ ६-( पृथिवीम् ) प्रथैः ष्वन्ष्वन्ष्वनः संप्रसारणं च ( उ० १ । १५० ) प्रथ ख्यातो विस्तारे च--ष्वन्, संप्रसारणं, ङीष् । सर्व विस्तारकं परमात्म-
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ६ ॥ १३ कंडिका ६ ॥ तीन लोक, तीन देवता, तीन वेद और तीन महाव्याहृति ( सः भूयः आत्मानम् अश्राम्यत् ) उस [ परमात्मा ] ने फिर अपने को दबाया, ( भूयः अतप्यत् ) फिर तपाया, ( भूयः सम् अतपत् ) फिर भली भांति तपाया । ( सः आत्मनः एव त्रीन् लोकान् निर् अमिमत ) उसने अपने में से ही तीन लोक बनाये [ अपने तीन रूप प्रकट किये ] ( पृथिवीम्, अन्तरिक्षम्, दिवम् इति ) पृथिवी [ सब का फैलाने वाला ] अन्तरिक्ष [ सब के भीतर देखने वाला ] और प्रकाश लोक [ सर्व प्रकाशक रूप ] । ( स खलु पादाभ्याम् एव पृथिवीं निर् अमिमत ) उसने निश्चय करके दोनों पावों से ही पृथिवी [ सर्व प्रसारक रूप ] को बनाया. (उदरात् अन्तरिक्षम्) पेट से अन्तरिक्ष [ सब के भीतर दीखने वाला रूप ] और ( मूर्द्ध्नः दिवम् ) मस्तक से प्रकाश लोक [ सर्व प्रकाशक रूप ] को (सा तान् त्रीन् लोकान्) उसने तीनों लोकों [ अपने तीनों रूपो] को ( अभि अश्राम्यत् अभि अतपत् सम् अतपत् ) सब ओर से दबाया. सब ओर से तपाया और भली भांति तपाया । ( तेभ्यः श्रान्तेभ्यः तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यः ) उन दबाये हुए तपाये हुए, भली भांति तपाये हुओं से ( त्रीन् देवान् निर् अमिमत ) तीन देवता [ अपने दिव्यरूप ] बनाये, ( अग्निम् ) अग्नि [ सर्वज्ञ ] ( वायुम् ) वायु [ सर्वव्यापक ] और ( आदित्यम् इति ) आदित्य [ सब प्रकाशस्वरूप ] । ( सः खलु ) उसने निश्चय करके ( पृथिव्याः एव ) पृथिवी [ अपने सर्व विस्तारक स्वरूप ] से ही ( अग्निम् ) अग्नि [ अपना सर्वज्ञ स्वरूप ] ( निर् अमिमत ) बनाया, ( अन्तरिक्षात् ) अन्तरिक्ष [ सब में दीखने वाले स्वरूप ] से ( वायुम् ) वायु [ सर्वव्यापक स्वरूप ] और ( दिवः ) प्रकाश लोक [ प्रकाशक स्वरूप ] से ( आदित्यम् ) आदित्य [ सर्व प्रकाशक स्वरूप ] ( सः तान् त्रीन् देवान् ) उसने उन तीन देवताओं [ दिव्य स्वरूपों ] को ( अभि अश्राम्यत् अभि अतपत् सम् अतपत् ) सब ओर से दबाया, सब ओर से तपाया और भली भांति तपाया । ( तेभ्यः श्रान्तेभ्यः तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यः ) उन दबाए हुए, तपाये हुए, भली भांति तपाये हुओं से ( त्रीन् वेदान् ) तीनों वेदों को ( निर् अमिमत ) बनाया-( ऋग्वेदम् ) ऋग्वेद [ पदार्थों की गुण प्रकाशक विद्या ], ( यजुर्वेदम् ) यजुर्वेद [ सत्कर्मों की विद्या ] और ( सामवेदम् इति ) सामवेद [ मोक्ष विद्या-अर्थात् अथर्ववेद सहित चारों वेदोक्त परमेश्वर के कर्म, उपासना, ज्ञान रूप त्रयी विद्या को बनाया ] ( अग्नेः ) अग्नि [ अपने सर्वज्ञ स्वरूप ] से ( ऋग्वेदम् ) ऋग्वेद [ पदार्थों की गुण प्रकाशक विद्या ] ( वायोः ) वायु [ सर्वव्यापक स्वरूप ] से ( यजुर्वे-
रूपम् । भूमिम् । ( अन्तरिक्षम् ) अन्तर् + ईक्ष दर्शने-घञ् । सर्वमध्ये दृश्यमानं रूपम् । आकाशम् ( दिवम् ) दिवु क्रीडाविजिगीषाकान्तिगत्यादिषु- क्विप् । सर्वप्रकाशकं रूपम् । सूर्यम्-( अग्निम् ) अङ्गेर्नलोपश्च ( उ० ४ । ५० ) अगि गतौ-निः, नलोपः । सर्वज्ञरूपम् । वह्निम् ( वायुम् ) क० ३ । सर्वा- धारकं रूपम् ( आदित्यम् ) अण्तेरादबश्च ( उ० ४ । ११२ ) आङ् + दुदा. दाने वा दीपि दीप्तौ-यक्, निपातनात् सिद्धिः । आदीप्यमानम् । सर्वप्रकाशकं,
१४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ६ ॥ दम्) यजुर्वेद [सत्कर्मों की विद्या] और (आदित्यात्) आदित्य [सर्व प्रकाशक स्वरूप] से (सामवेदम्) सामवेद [मोक्षविद्या] को । (सः तान् त्रीन् वेदान्) उसने उन तीनों वेदों को (अभि अश्राम्यत् अभि अतपत् सम् अतपत्) सब ओर से दबाया, सब ओर से तपाया और भली भांति तपाया. (तेभ्यः श्रान्तेभ्यः तप्तेभ्यः संतप्तेभ्यः) उन दबाये हुए, तपाये हुए. भली भांति तपाये हुओं से (तिस्रः महाव्याहृतीः) तीन महाव्याहृतियों [महावाक्यों] को (निर् अमिमत) उस [परमात्मा] ने बनाया- (भूः) भूः [सर्वाधार] (भुवः) भुवः [सर्वव्यापक] और (स्वः इति) स्वः [सुख स्वरूप परमात्मा है-इनको]-(भूः इति) भूः को (ऋग्वेदात्) ऋग्वेद से (भुवः इति) भुवः को (यजुर्वेदात्) यजुर्वेद से और (स्वः इति) स्वः को (साम- वेदात्) सामवेद से। (सः यः) वह पुरुष जो (इच्छेत्) चाहे-(एतैः सर्वैः) इन सब (त्रिभिर्वेदैः) तीनों वेदों से (कुर्वीय इति) मैं [पुरुषार्थ] करूँ-(तम्) उस [पुरुषार्थ] को (एताभिः एव महाव्याहृतिभिः) इन ही महाव्याहृतियों से (कुर्वीत) वह करे। (अस्य) उस [पुरुष] का (एतैः सर्वैः) इन सब (त्रिभिः वेदैः) तीनों वेदों से (ह वै) ही अवश्य (कृतम्) कर्म (भवति) होता है, (यः एवम् वेद.) जो ऐसा जानता है, (च यः) और जो (एवम् विद्वान्) ऐसा विद्वान् [होकर] (एताभिः महाव्याहृतिभिः) इन महाव्याहृतियों से (कुरुते) कर्म करता है॥ ६॥ भावार्थः-परमेश्वर ने अपने सर्वशक्तिमत्ता, सर्वज्ञता और सर्वव्यापकता से कर्म, उपासना, ज्ञान त्रयी विद्या और भूर्भुवः स्वः इन तीन महाव्याहृतियों को मनुष्यों के सुख के लिए प्रकाशित किया है। पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, अग्नि वायु आदित्य आदि परमेश्वर के नाम हैं और तीन वेदों अर्थात् त्रयी विद्या कहने से अथर्ववेद सहित चारों वेदों का ग्रहण है। पृथिवी आदि बहुत से शब्द ईश्वर नाम वाची महर्षि दयानन्द कृत सत्यार्थ प्रकाश प्रथम समुल्लास में व्याख्यात हैं। अग्नि आदि ईश्वर के नाम हैं। इसका प्रमाण-तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः ॥ यजु० ३२।१। अर्थः - (तत् एव) वही [ब्रह्म] (अग्निः) स्वरूपम्। (वेदान्) हलश्च (पा० ३।३।१२१) विद ज्ञाने, विद सत्तायां विद विचारणे-घञ् । त्रयीविद्यायुक्तान् परमेश्वरीयबोधान् (ऋग्वेदम्) ऋचन्ति स्तुवन्ति पदार्थानां गुणान् अनया सा ऋक्, ऋक् चासौ वेदश्च ऋग्वेदः। पदार्थगुणप्रकाशिकां विद्याम् (यजुर्वेदम्) अत्तिपूवपियजि० (उ० २।११७) यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु-उसिः । सत्कर्मप्रकाशिकां विद्याम् (साम- वेदम्) सातिभ्यां मनिन्मनिणो (उ० ४। १५३) -षो अन्तकर्मणि-मनिन् । दुःखनाशिकां मोक्षविद्याम् (भूः) भू सतायां प्राप्तौ-क्विप् । सर्वाधारः परमेश्वरः (भुवः) भूरिञ्जिभ्यां कित् (उ० ४। ११७) भू सत्तायां प्राप्तौ-असुन्। सर्व- व्यापकः शुद्धस्वरूपः परमेश्वरः (स्वः) अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते (पा० ३।२।७५) सु+ऋ गतौ विच्, यद्वा स्वृ शब्दोपतापयो :-विच् । सुखस्वरूपः । परमेश्वरः ।।
कण्डिका ७ ।।
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ७ ।। १५ अग्नि [ ज्ञान स्वरूप ] [ तत् आदित्यः ] वही आदित्य [ सर्वप्रकाशक ], ( तत् वायुः ) वही वायु [ अनन्त बलवान् और सर्वधर्त्ता ] ( तत् उ चन्द्रमाः ) वही चन्द्रमा [ आनन्दकारक ] तत् एव शुक्रम् ) वही शुक्र [ शुद्ध स्वभाव वाला ] ( तत् ब्रह्म ) वही ब्रह्म [ सब से बड़ा ] ( ताः आपः ) वही आप [ सर्वव्यापक ] और ( सः प्रजापतिः ) वही प्रजापति [ उत्पन्नो' का पालन करने वाला ] है । चारों वेद ईश्वर कृत हैं, इसका प्रमाण ( तस्मात् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत ) ऋ० १० । ६० । ६ । यजु० ३१ । ७. तथा अथर्व० १६ । ६ । १३ । ( तस्मात् यज्ञात् ) उस पूजनीय ( सर्वहुतः ) सबके दाता परमात्मा से ( ऋचः ) ऋग्वेद [ पदार्थों की गुण प्रकाशक विद्या ] के मन्त्र और ( सामानि ) सामवेद [ मोक्ष विद्या ] के मन्त्र ( जज्ञिरे ) उत्पन्न हुये । ( तस्मात् ) उससे ( छन्दांसि ) अथर्ववेद [ आनन्द दायक विद्या ] के मन्त्र ( जज्ञिरे ) उत्पन्न हुये, और ( तस्मात् ) उससे (यजुः) यजुर्वेद [ सत् कर्मों का ज्ञान ] ( अजायत ) उत्पन्न हुआ ।। ६ ।। विशेषः—इस कण्डिका का मिलान करो—ऐतरेय ब्राह्मण ५ । ३९ ।। कण्डिका ७ ।। ता या अमू रेतः समुद्रं वृत्वाऽतिष्ठंस्ताः प्राच्यो दक्षिणाच्यः प्रतीच्य उदीच्यः समवद्रवन्त । तद्यत्समवद्रवन्त तस्मात्समुद्र उच्यते । ता भीता अब्रुवन् भगवन्तमेव वयं राजानं वृणीमह इति । यच्चं वृत्वाऽतिष्ठंस्तद्वरुणोऽभवत् तं वा एतं वरणं सन्तं वरुण इत्याचक्षते । परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः । स समुद्रादमुच्यत स मुच्युरभवत्तं वा एतं मुच्युं सन्तं मृत्युरित्या- चक्षते । परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः । तं वरुणं मृत्यु- मभ्यश्राम्यदभ्यतपत्समत्तपत्तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य सन्तप्तस्य सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यो रसोऽक्षरत् सोऽङ्गरसोऽभवत् तं वा एतमङ्गरसं सन्तमङ्गिरा इत्याचक्षते । परो- क्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः ।। ७ ।। कण्डिका ७ ।। समुद्र, वरुण, मृत्यु और अङ्गिरा ।। ( ताः या अमूः ) वे जो कुछ [ व्यापक तन्मात्रायें जल की भाप समान ] ( रेतः ) बीज [ होकर ] ( समुद्रम् ) समुद्र [ सर्वव्यापक परमात्मा ] को (वृत्वा) लेकर ( अतिष्ठन् ) ठहरीं [ कण्डिका ३ देखो ], ( ताः ) वे सब ( प्राच्यः ) सामने वाली वा पूर्व, ( दक्षिणाच्यः ) दाहिनी वा दक्षिण, ( प्रतीच्यः ) पीछे वाली वा पश्चिम ओर ( उदीच्यः ) बाईं वा उत्तर दिशा से ( सम् अवद्रवन्त = अव अद्रवन्त ) बह कर आयीं । ( तत् यत् सम् अव अद्रवन्त ) वे जो बह कर आयीं, ( तस्मात् ) ७—( वृणीमहे ) स्वीकुर्मः ( वरणः ) हुवृवृञ्भ्यो षण् ( उ० १ । ७४ ) वृञ् वरणे—युच् । स्वीकरणीयः ( वरुणः ) कृवृदारिभ्य उनन् ( उ० ३ । ५३, वृञ् वरणे—उनन् । वरणीयः स्वीकरणीयः ( मुच्युः ) मुचिमुट्द्भ्याम् कुक्लुकौ ( उ० ३ ।
१६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ७ ॥ इसलिये (समुद्रः) समुद्र [सर्वं व्यापक परमात्मा] (उच्यते) कहा जाता है। (ताः भीताः) वे डरी हुई (अब्रुवन्) बोलीं-(भगवन्तम् एव) भगवान् [श्रीमान् आप] को ही (वयम्) हम (राजानम्) राजा (वृणीमहे इति) ग्रहण करती हैं। (यत् च) और जो (वृत्वा) ग्रहण करके (अतिष्ठन्) वे ठहरीं, (तत्) उस से (वरणः अभवत्) वह वरण [ग्रहण योग्य] हुआ । (तं वै एतं वरणं सन्तम्) उस ही ऐसे वरण [ग्रहण योग्य] होते हुये को-(वरुणः इति आचक्षते) यह वरुण [स्वीकरणीय] है-ऐसा वे कहते हैं (परोक्षेण) परोक्ष [आंख ओट प्रलय में वर्त्तमान ब्रह्म] के द्वारा (परोक्षप्रियाः इव हि) परोक्ष प्रिय [आंख ओट भविष्य के प्रेमी] लोगों के समान ही (देवाः) देवता [विद्वान् लोग] (प्रत्यक्षद्विषः) प्रत्यक्ष [वर्त्तमान अवस्था] के द्वेषी (भवन्ति) होते हैं । [देखो कण्डिका १]। (सः) वह [वरुण परमेश्वर] (समुद्रात्) समुद्र [सर्वव्यापक परमेश्वर से (अमुच्यत) छूटा, (सः) वह (मुच्युः) मुच्यु [छुटा हुआ ईश्वर] (अभवत्) हुआ। (तम्) उस [दूरवर्ती] (वै) निश्चय करके (एतम्) इस [समीपवर्ती] · मुच्यु सन्तम्) मुच्यु [छुटे हुये ईश्वर] होते हुवे को (मृत्युः इति आचक्षते) यह मृत्यु [छुटा हुआ वा छुड़ाने वाला मारने वाला वा वियोग करने वाला ईश्वर] है-ऐसा वे कहते हैं। (परोक्षेण) परोक्ष [आंख ओट प्रलय में वर्त्तमान ब्रह्म] के द्वारा (परोक्षप्रियाः इव हि) परोक्षप्रिय [आंख ओट भविष्य के प्रेमी] लोगों के समान ही (देवाः) देवता [विद्वान् लोग] (प्रत्यक्षद्विषः) प्रत्यक्ष [वर्त्तमान अवस्था] के द्वेषी (भवन्ति) होते हैं-[देखो कण्डिका १]। (तं वरुणम्) उस वरुण [स्वीकरणीय] (मृत्युम्) मृत्यु [छूटने वा छुड़ाने वाले स्वरूप] को (अभि अश्राम्यत्) उस [परमात्मा] ने सब ओर से दबाया, (अभि अतपत्) सब ओर से तपाया (सम् अतपत्) भली भाँति तपाया, (तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य संतप्तस्य) उस दबाये हुये, तपाये हुये, भली भाँति तपाये हुये के (सर्वेभ्यः अङ्गेभ्यः) सब अङ्गों से (रसः अक्षरत) रस बहा। (सः अङ्गरसः अभवत्) वह अङ्गरस [सब के अङ्गों का रस] हुआ, (तम् वै एतम्) उस निश्चय करके समीप और दूरवर्ती (अङ्गरसं सन्तम्) अङ्गों का रस होते हुये को-(अङ्गिरा इति आचक्षते) यह अङ्गिरा [सर्वव्यापक] है- ऐसा वे कहते हैं। (परोक्षेण) परोक्ष [आंख ओट प्रलय में वर्त्तमान ब्रह्म] के द्वारा (परोक्षप्रियाः इव हि) परोक्ष प्रिय [आंख ओट भविष्य के प्रेमी] लोगों के समान ही (देवाः) देवता [विद्वान् लोग] (प्रत्यक्षद्विषः) प्रत्यक्ष [वर्त्तमान अवस्था] के द्वेषी (भवन्ति) होते हैं [देखो कण्डिका १] ॥ ७ ॥ २१) मुञ्च्लृ मोक्षणे-युक् । मुक्तः । प्राप्तमोक्षः (मृत्युः) भुजिमृद्भ्याम् युक्त्युको मृङ् प्राणत्यागे-त्युक् । सर्वस्मात् त्यक्तः पृथग्भूतः । सर्वेषां त्याजयिता । मारयिता । वियोजकः (अक्षरत्) क्षर संचलने-लङ् । संचलितवान् (अङ्गरसः) सर्वभूतानामङ्गानां रसः सारो वीर्यं वा (अङ्गिराः) अङ्गेरेसिः (उ० ४ । २३६) अगि गतौ असिः, तस्य च इरुडागमः । सर्वव्यापकः । महाज्ञानी ॥
कण्डिका ८
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ८ ।। १७ भावार्थः—सब परमाणुओं का संयोग वियोग परमात्मा की शक्ति से होता है और परमात्मा के अलग अलग अङ्गो की कल्पना करने पर भी वह इतना बड़ा सर्वव्यापो है कि सब पदार्थों के बाहर भीतर वर्तमान रहने पर वह कुछ नहीं घटता, जैसा कि इसका वेद में वर्णन है । ( पूर्णात् पूर्णमुदचति पूर्णं पूर्णेन सिच्यते । उतो तदद्य विद्याम यतस्तत् परिषिच्यते ) अथर्व० १० । ८ । २६ । ( पूर्णात् ) पूर्ण [ ब्रह्म ] से ( पूर्णम् ) सम्पूर्ण [ जगत् ] ( उत् अंचति ) उदय होता है । ( पूर्णेन ) पूर्ण [ ब्रह्म ] करके ( पूर्णम् ) सम्पूर्ण [ जगत् ] ( सिच्यते ) सींचा जाता है । ( उतो ) और भी ( तत् ) उस [ कारण ] को ( अद्य ) आज ( विद्याम ) हम जानें ( यतः ) जिस [ कारण ] से ( तत् ) वह [ सम्पूर्ण जगत् ] ( परिषिच्यते ) सब प्रकार सींचा जाता है ॥ ७ ॥ कण्डिका ८ तमङ्गिरसमभ्यश्राम्यदभ्यतपत्तसमतपत्तस्माच्छ्रान्तात्तप्तात्सन्तप्ताद्विशि- नोऽङ्गिरस ऋषीन्निरमिमत, तान् विंशिनोऽङ्गिरस ऋषीनभ्यश्राम्यदभ्यतपत्तसमत- पत्, तेभ्यः श्रान्तेभ्यस्तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यो दशत्यानाङ्गिरसानाषेर्यानन्निरमिमत, षोडशिनोऽष्टादशिनो द्वादशिन एकचांस्तृचांश्चतुरृचां पञ्चर्चां षडचां द्व्यूचां सप्तर्चामिति । तानङ्गिरस ऋषीनाङ्गिरसांश्चार्षेयानभ्यश्राम्यदभ्यतपत्तसमतप्तेभ्यः श्रान्तेभ्यस्तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यो यं.न् मन्त्रानपश्यत्स आङ्गिरसो वेदोऽभवत्तमाङ्गिरसं वेदमभ्यश्राम्यदभ्यतपत्तसमतपत्तस्माच्छान्तात्तप्तात् सन्तप्ताज्जनदिति द्वैतमक्षरं व्यभवत् । स य इच्छेत्सर्वैरेतैराङ्गिरोभिश्चाङ्गिरसैश्च कुर्वीयेत्येतयैव तं महाव्याहृत्या कुर्वीत सर्वैर्ह वा अस्यैतैराङ्गिरोभिश्चाङ्गिरसैश्च कृतं भवति य एवं वेद यश्चैवं विद्वानेवमेतया महाव्याहृत्या कुरुते ॥ ८ ॥ कण्डिका ८ ॥ बीस अङ्गिरा, दश आङ्गिरस, वेद और जनत् महाव्याहृति ॥ ( तम् ) उस [ अपने ] ( अङ्गिरसम् ) अङ्गिरा [ सर्वव्यापक ] ( ऋषिम् ) ऋषि [ सन्मार्ग दर्शक स्वरूप ] को ( अभि अश्राम्यत् ) उस [ ब्रह्म ] ने सब ओर से दबाया, ( अभि अतपत् सम् अतपत् ) सब ओर से तपाया, भली भांति तपाया । ( तस्मात् श्रान्तात् तप्तात् संतप्तात् ) उस दबाये हुये, तपाये हुये, भली भांति तपाये हुये से ( विंशिनः ) बीसवें [ पृथिवी आदि पांच सूक्ष्म भूत, पृथिवी आदि पांच स्थूल भूत, कान, आंख, नासिका, जिह्वा, त्वचा, पांच ज्ञानेन्द्रिय और वाक्, हाथ, पांव, पायु इन उन्नीस के सहित बीसवें उपस्थेन्द्रिय ] से सम्बन्ध वाले ( अङ्गिरसः ) अङ्गिरा ८—( विंशिनः ) तस्य पूरणे डट् ( पा० ५ । २ । ४८ ) विंशति—डट् । अत इनिठनौ ( पा० ५ । २ । ११५ ) विंश—इनिः । भाषोक्तपृथिव्याद्येकोन- विंशतिपदार्थैः सहितस्य विंशस्य उपस्थेन्द्रियस्य सम्बद्धानि वेदज्ञानानि ( अङ्गिरसः ) क० ७ । सर्वव्यापकानि ( ऋषीन् ) सन्मार्गदर्शकानि वेदज्ञानानि २