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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

( २२८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- ग्रहणीरोग, बवासीर, भगंदर, अरोचक, गुल्मरोग, प्रमेह, शूल, पथरी, कृमिरोग, पांडुरोग, इनको हरती हैं ॥ ९६ ॥ श्रेष्ठ रसायन हैं, वलियोंको नाशती हैं, वीर्य और बलको देती हैं, वर्ण और इंद्रियोंको प्रकाशित करती हैं, दुःखको नाशती हैं, और सबकालमें कुष्ठको और भ्रमको नाशती हैं ॥ ९७ ॥ अथ अभयाद्यवलेह । हरीतकीपञ्चशतानि धीमान् द्रोणेन गोमूत्रशतेन पाच्यम् ॥ मृद्व- ग्निना यावदशेषमेव मूत्रं विजीर्णे विधिवद्विहिज्ञः ॥ ९८ ॥ नि- र्वाप्य चूर्णे प्रतिशोष्यशीतं छायाविशुष्कान् प्रविदार्य चाष्टीः ॥ चूर्णं च शुण्ठीमगधाविषाश्च सुगन्धिमूर्वाचविकान्विताश्च॥९९॥ निष्क्काथ्य कल्कः कुटजस्य तावद्द्व्योपलेपी भवतीति यावत् ॥ तस्यार्द्धभागेन गुडं विमथ्यात्क्षीरं तदर्द्धेन गवाऽजकं वा ॥१००॥ निर्वापितं तं घृतभाजने च संस्थापितं प्राङ्मुदितेन तेन॥सिन्धू- त्थवह्नित्रिकटुं त्रिसुगन्धियुक्तं चूर्णं पुनर्गुडयुतं घृतमिश्रितं च ॥ १०१ ॥ चूर्णेन तेन सकलग्रहणीयपाण्डुशोषाश्मरी कृमि- जगुल्ममथातिसारान् ॥ प्लीहायकृच्छ्वासिषु मानवेषु विषूचिका पीनसमस्तकार्त्तिम् ॥ १०२ ॥ विनाशनःसद्यस्तथा ज्वराणा- मध्वश्रमक्षीणबलोदराणाम् ॥ ऐकाहिकादिज्वरनाशनःस्याल्ले- होऽभयाद्योऽमृतवन्नराणाम् ॥ १०३ ॥ इत्यभयाद्योऽवलेहः ॥ ५०० बड़ी हरड़ोंको १०० द्रोण गोमूत्रमें पकावे, कोमल अग्निसे पकनेमें जब चौथाई भाग शेष रहे ॥ ९८ ॥ तब अग्निसे उतार उन हरड़ोंको छायामें सुखाके चीर गुठलियोंको दूर करे, पीछे सूंठ, पीपल, अतीश, सफेद चंदन, मरोडफली, चव्य इनके चूर्णको यथायोग्य मिला ॥ ९९ ॥ फिर अग्निपै पकावे और कडछीसे चलावे, जब कड़छीपे चिपने लगे तब उस संपूर्ण औषधके समान गायका अथवा बकरीका दूध मिला ॥ १०० ॥ अग्निसे उतार घीके चिकने वर्त्तनमें स्थापन करे, फिर सेंधानमक, चीता सूंठ, मिर्च, पीपल, दालचीनी, इलायची, तेजपात, गुड़, घृत इन्होंको मिलाके खावे ॥ १०१ ॥ यह सब प्रकारकी संग्रहणी, पांडु- रोग, शोषरोग, पथरीरोग, कृमिरोग, पेटका गोला, सबप्रकारके अतिसार, तिल्लीरोग, जिगर- रोग, श्वास, हैजा, जुखाम, पीनस, मस्तकरोग इनको नाशता है ॥ १०२ ॥ और सबप्रकारके ज्वरवाले मार्गमें गमन करनेसे क्षीण बलवाले और उदररोगियोंको हित है और ऐका- हिकआदि ज्वरोंको नाशता है । यह अभयाद्यवलेह मनुष्योंको अमृतके समान है ॥ १०३ ॥

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( २२९ ) अथ द्राक्षादिपिंडी । द्राक्षाक्षीरेण पक्त्वा यावद्धनं दर्व्युपलेपि च ॥ दृष्ट्वा पश्चात्तैः समालोड्य चेमान्यौषधानि मतिमान् ॥ १०४॥ पर्पटातिविषा मूर्वा पटोलं घनवालकम् ॥ तथाभयानां चूर्ण तु समशर्करया युतम् ॥१०५॥ तेन क्षीरेण संयोज्य विदार्य्याः कन्दमेव च ॥ घृतेन नवनीतेन पिण्डं कृत्वाऽथ भक्षयेत् ॥१०६॥ सपित्तग्रह- णीपाण्डुकामलार्तितृषापहम् ॥ भ्रमं मूर्छां तथा हिक्कां तमको- न्मादमश्मरीम् ॥ १०७ ॥ मेहपित्तासृजं कुष्ठं नाशयत्याशु निश्चितम् ॥ १०८ ॥ इति द्राक्षादिक्षीरम् ॥ इति आत्रेयभा- षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने अतीसारचिकित्सानाम तृतीयो- ऽध्यायः ॥ ३ ॥ दाखोंको दूधमें मिला पकावे जब कड़ा होके कडछीपै चिपकने लगे तब बुद्धिमान् वैद्य इन औषधोंको डाले ॥ १०४ ॥ पित्तपापड़ा, अतीस, मरोडफली, परवल, नागरमोथा, नेत्रवाला, हरडे इनके चूर्णको और बराबरकी खांडको मिलावे ॥ १०५ ॥ पीछे उस दूधमें विदारीकंद और नौनीघृत मिला गोली बनाके खावे ॥ १०६ ॥ यह पित्तकी संग्रहणी पांडुरोग, कामला, तृषारोग, भ्रम, मूर्छा, हिचकी, तमक, श्वास, उन्माद, पथरी ॥ १०७ ॥ प्रमेह, रक्तपित्त, कुष्ठ इनको शीघ्र नाशता है ॥ १०८ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहाय- सूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने अतिसारचिकित्सानाम तृती- योऽध्यायः ॥ ३ ॥ चतुर्थोऽध्यायः ४. अथ गुल्मचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि गुल्मानां चैव लक्षणम् ॥ तस्मात्तेषां प्रतीकारमौषधानि विशेषतः ॥ १॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे पुत्र ! सुन, गुल्मोंके लक्षणको कहता हूं और उनकी चिकित्सा और औषधको भी विशेषकर कहता हूं ॥ १ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( २३० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने ] अथ गुल्मके भेद । पञ्चधा संभवन्त्येते गुल्मा जठरसंमृताः॥हृत्कुक्षौ नाभिबस्तौ च मध्ये च पञ्चमः स्मृतः॥२॥हृदयस्थो यकृन्नाम कुक्षौ साष्ठी- लकोच्यते॥मध्ये प्लीहा समाख्यातो बस्तौ चण्डविवृद्धकः॥३॥ नाभौ संलक्ष्यते ग्रन्थी नामान्येषां पृथक् पृथक् ॥ उदरमें फैले हुए गुल्म पांच प्रकारके हैं । हृदयमें एक, कुक्षिमें दूसरा, नाभिमें तीसरा, बस्ति- स्थानमें चौथा, मध्यभागमें पांचवाँ ऐसे गुल्म होते हैं ॥ २ ॥ हृदयमें उपजनेवाले गुल्मका यकृत् नाम है, कुक्षिमें होनेवाले गुल्मका अष्ठीला नाम है, मध्यभागमें प्लीहानामसे विख्यात है, बस्तिस्थानमें चण्डविवृद्धकनामवाला होता है ॥ ३ ॥ नाभिमें ग्रंथिनामसे लक्षित है । इनके नाम अलग अलग हैं ॥ अथ गुल्मके निदान । अतः प्रकोपं वक्ष्यामि येन कुर्वन्ति बाधकम् ॥४॥ स्वभावा- त्पित्तरक्तोत्थे सेविताम्लविदाहिनम् ॥ उष्णं च क्षारमद्यं वा चोष्णपानातिसेवनात् ॥५॥ तथा शोकः श्रमोऽध्वनां शोषो- त्संक्षोभनादपि ॥ उच्चभाषणगानेन धनुर्ज्याकरणेन च ॥ ६॥ पृष्ठे मुष्ट्यभिघातेन हृदयात्ताडनेन वा ॥भारणोद्धारणाद्वापि रक्तं शोषयते हृदि ॥ ७ ॥ तेन गुल्मेति नाम तु जायते रक्तपित्तकम्॥ कदाचित्त्रिषु दोषेषु सम्भवश्चास्य दृश्यते ॥८॥ वातेनोदीरितं चैव कफेन च घनीकृतम् ॥ पित्तेन पाकतां प्राप्तं त्रिदोषसंसृतं यकृत् ॥ ९ ॥ अब इनके प्रकोपको कहता हूं, जिसकरके पीड़ाको करते हैं ॥ ४ ॥ स्वभावसे रक्तपित्तके बिगड़ने पर अम्ल और विदाही पदार्थको सेवनेसे और गरम पदार्थ खार, मदिरा इनको सेवनेसे और गर्मपानके अतिसेवनेसे ॥ ५ ॥ शोक, श्रम, मार्गमें अत्यंत चलना, शोष, क्षोभ, ऊंचा बोलना, ऊंचे प्रकारसे गाना और धनुषकी टंकोरके करनेसे ॥ ६॥ पृष्ठभागमें मुक्केके लगनेसे और हृदयमें चोट आदिके लगनेसे, बोझके उठानेसे मनुष्यके हृदयमें रक्त सूख जाता है ॥ ७ ॥ इससे रक्तपित्त करके गुल्मरोग उपजता है और कभी तीनों दोषोंसे भी गुल्म उपजता है॥८॥ वातसे बढ़ा हुआ और कफसे कठिन हुआ और पित्तसे पाकभावको प्राप्त हुआ यकृत् त्रिदोषसे फैलता है ॥ ९ ॥

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । (२३१) अथ यकृद्गुल्मका लक्षण । लक्षणं तस्य वक्ष्यामि येन तच्चापि लक्ष्यते॥ क्षीयते येन मनुजो मृत्युमाशु प्रपद्यते॥१०॥ वमिः क्लमस्तथोद्गारो हृल्लासः श्वसनं भ्रमः॥ दाहोऽरुचिस्तृषा मूर्च्छा कण्ठे दाहः शिरोव्यथा॥११॥ हृच्छूलं च प्रतिश्यायःष्ठीवनं कटुकैः सह ॥ सशल्यं हृदि शूलं च निद्रानाशः प्रलापतः ॥ १२ ॥ हृदये मन्यते दार्ढ्यमुदरं गर्जति भृशम्॥ एतैर्लिङ्गैर्विजानीयाद्यकृत्कोष्ठान्तवक्षसि ॥१३॥ उस गुल्मके लक्षणको कहूंगा, जिस करके वह भी लक्षित हो सकता है। इस रोगसे मनुष्य सूख जाता है और शीघ्र ही मृत्युको प्राप्त हो जाता है ॥ १० ॥ छर्दि आवे, ग्लानि उपजे, डकार आवे, थुकथुकी हो, श्वास और भ्रम उपजे और दाह, अरुचि, तृषा, मूर्च्छा, ये भी उपजें, कंठमें दाह हो और शिरमें पीड़ा हो ॥ ११ ॥ हृदयमें शूल हो, जुखाम कड़ुआईके साथ थूके, शल्यसहित शूल हृदयमें होवे नींदका नाश होवे, बकवाद करनेसे ॥ १२ ॥ और हृदयमें दृढ़ता माने और उदर अत्यंत गर्जे इन लक्षणोंसे कोष्ठके समीप छातीमें यकृत्संज्ञक गुल्म जानना ॥ १३ ॥ अथ शुण्ठ्यादि चूर्ण । शुण्ठ्यादिचूर्णं कटुकत्रयं च कुष्ठं तथा पञ्चमकं यवानीम्॥ षष्ठं च सिन्धूत्थविमिश्रितं च सूक्ष्मं च चूर्णं सह रामठेन॥ भक्षञ्च तस्योपरि तक्रपानं निष्क्वाथ्य तोयं च पिबेच्च वाम्लम्॥१४॥ सौवीरकं वा विनिहन्ति शीघ्रं यकृत्समानोदरशूलकासान् ॥ विसूचिकाजीर्णकफामयघ्नं पाण्डामयार्त्तिग्रहणीं सगुल्माम् ॥१५॥ शुण्ठ्यादिचूर्णं त्वरितं निहन्ति ॥ सोंठ, मिर्च, पीपल, कूठ, अजवायन, सेंधानमक, हींग, इनका महीन चूर्ण बना खावे ऊपर तक्र पीवे अथवा खट्टा जल क्वाथ बनाकर पीवे ॥ १४ ॥ अथवा कांजीका अनुपान करे। यह शुंठ्यादि चूर्ण यकृद्रोग, उदरशूल, खांसी, विसूचिका (हैजा) अजीर्ण, कफरोग, पांडु, संग्रहणी, गुल्मरोग इनकी शीघ्र नाशता है ॥ १५ ॥ अथ क्षारमृत । क्षारं मुष्कककिंशुकार्जुनधवापामार्गरम्भातिला जीवन्तीकन- काह्वयश्चरजनी कूष्माण्डवल्ली तथा ॥ वासासूरणमेव तीव्रदहने

( २३२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- प्रज्वाल्य भस्मीकृतं तोयेन प्रतिसेव्य संभृतपयःपानं विधेयं यकृत् ॥ १६ ॥ शूलानाहविबन्धनांश्च कफजान्रोगाञ्जयेत् कामलां शूलं पाण्डुसुविप्रधींश्च ग्रहणीशोफार्शासां पीनसान् ॥ अग्नेर्मांद्यमजीर्णकृम्यलसता मोहो गुदभ्रंशता कासोद्गार- वमिक्षतोद्गतगदावृद्धिरस्तथा नश्यति ॥ १७ ॥ पूयाभः पतते श्लेष्मा पूतिगन्धोऽतिविस्रकः ॥ रक्ताभस्तत्र सङ्काशः ष्ठीवते स मुहुर्मुहुः ॥ तथातिसार्य्यते रक्तं श्रमः संक्षीयते वपुः ॥ १८॥ क्षतजाः संसृता गात्रे यकृद्वक्षसि संसृतः ॥ १९ ॥ “असाध्ययकृद्रोगलक्षणम्” श्वासस्तृषा वमिर्मोहः शोफः स्यात्करपादयोः॥रुचिबन्धोऽति- सारश्च यकृद्दूरं परित्यजेत् ॥ २० ॥ अतो वक्ष्यामि भेषज्यं येन संपद्यते सुखम् ॥ यकृद्रोगपर पाचन । तस्यादौ लङ्घनं चैकं पाचनं तदनन्तरम् ॥२१॥ शुण्ठ्योपकुल्या तिमिरं शठीनां यवानिकाभीरुहरीतकीनाम् ॥ क्वाथोथकल्क- पाचनके प्रशस्त आनाहगुल्मार्त्तिविषूचिकानाम् ॥ २२ ॥ भद्रोपकुल्याभयशृङ्गवेरं पथ्या त्रिभागा च कणाचतुर्था॥२३॥ मोक्षावृक्षं१, अण्डकोष या कठपाढारिबूंटी, टेसू, अर्जुनवृक्ष, धव, लटजीरा, केला, तिल, महुआ, धतूरा, हलदी, लालतुंबी, बांसा, जमीकंद, इनको तेजअग्निसे जला, भस्म बना, पानीमें मिला खार बनावे, इसको लेनेसे यकृतरोग ॥ १६ ॥ शूल, अफारा, बंधा, कफका रोग, कामला, विद्रधि, हृदयशूल, पांडु, संग्रहणी, शोजा, बवासीर, पीनस, मन्दाग्नि, अजीर्ण, कृमि, आलस्य, गुदभ्रंश, मोह, क्षतजरोग, वृद्धिरोग, दाह, शूल, खांसी, डकार, छर्दि इनका नाश होता है ॥ १७ ॥ राधके समान कफ पड़े दुर्गंधसे और कचे गन्धसे संयुक्त और रक्तके समान वारंवार थूके और रक्तका ही अतीसार जावे शरीरमें परिश्रम होवे शरीर सूखता जावे॥१८॥और क्षतसे उपजे रोग होवें ये लक्षण होवें तब छातीमें फैला हुआ यकृतरोग जानना ॥१९॥ श्वास, तृषा, छर्दि, मोह, ये उपजें हाथ और पैरोंमें शोजा होवे, रुचिबन्ध होवे और अतिसार होवें, १ मोक्षवृक्ष पर्वतोंमें पलाशके सदृश होता है। आ० श० ।

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( २३३) ऐसे यकृतरोगको दूरसे त्यागे ॥ २० ॥ अब औषधको कहता हूँ-जिसकरके सुख- की प्राप्ति हो इस रोगकी आदिमें एक लंघन कर पीछे पाचन देना हित है ॥ २१ ॥ सोंठ, पीपल, लोहाका मैल, कचूर, अजवायन, शतावरी, हरडा इन्होंका क्वाथ अथवा कल्करूपी पाचन हित है। यह अफारा, गुल्म, विषूचिका (हैजा) इन्होंको नाशता है ॥ २२ ॥ नागरमोथा, पीपल, हरडै, अदरख ये ले परंतु इनमें तीन भाग हरड़ेके ले और पीपल इनका पाचनइस रोग- को नाशता है ॥ २३ ॥ अथ यकृद्गुल्मपथ्य । क्षतक्षये यकृत्पूर्वे तूपवासं च पाचनम् ॥ न देयं हिङ्गुसंयुक्तं चूर्णं नैव हितं यतः ॥ २४ ॥ क्षतक्षय रोगसे संयुक्त हुए यकृत् रोगमें लंघन और पाचन हित नहीं है और इस रोगवा- लेको हींगसे संयुक्त किया चूरन नहीं देना, क्योंकि वह हित नहीं है॥ २४ ॥ अथ निम्बादि क्वाथ । निम्बनीपधरवेतसं निशा काश्मरी च तुलसी च सिंहिका ॥ क्वाथ एष हृदयामयापहः शूलमाशु यकृतश्च नाशकृत्॥२५॥ नींबकी छाल, कदम्बकी छाल, बिनोलाकी गिरी, मन नामक वनकी ओषधि विशेष, हलदी, कंभारी, तुलसी, कटेहली इनका क्वाथ हृदयरोग, कफ, शूल, मुखका रोग और यकृत्- को नाशता है ॥ २५ ॥ अथ सौराष्ट्रिकादि क्वाथ । सौराष्ट्रिकासीसमहौषधानि दुरालभाजातिप्रवालकं च ॥ दार्बी यवानी ककुभं समङ्गा क्वाथः ससर्पिर्यकृदाशु हन्ति॥२६॥ फिटकरी, कसीस , सोंठ, जवासा, चमेलीकी कोंपल, दारुहलदी, अजवायन, अर्जुनवृक्षकी छाल, मंजीठ इनका क्वाथ घृत मिलाकर पीनेसे यकृतरोगका नाश होता है ॥ २६ ॥ अथ धवादि क्वाथ । धवार्जनकदम्बानां शिरीषबदरीषु च ॥ निष्क्वाथ्य पानमामघ्नं विषूच्या शूलवारणम् ॥ २७ ॥ धवके फूल, अर्जुन और कंदबवृक्षकी छाल, मौलशिरी और बेरकी छाल, इनका क्वाथ बना पीवे । यह आमदोष, विषूचिका (हैजा) शूल इनको दूर करता है ॥ २७ ॥ अथ कदलीजलपानक । कदलीक्षारमादाय शंखक्षारमथापि वा ॥ प्रस्त्राव्य जलपानं तु

( २३४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- हिङ्गुसौवर्चलान्वितम् ॥ २८ ॥ आमं हरति विसृष्टं शूलं चाशु नियच्छति॥विषूचिकानां शमनमजीर्णं जरयत्यपि ॥ २९ ॥ केलाका खार, शखका खार, हींग, कालानमक इनको पानीमें मिलाकर पीवे ॥ २८ ॥ यह आमको हरता है और शूलको हरता है और विषूचिका (हैजा)को शांत करता है और अजीर्णको जराता है ॥ २९ ॥ अथ विजौरा आदिक पान । मातुलुङ्गरसं ग्राह्यं द्विगुणं तत्र काञ्जिकम् ॥ हिङ्गुसौवर्चलयुतं पानं हन्ति विषूचिकाम् ॥ ३० ॥ विजौराके रसमें दूनी कांजी मिलावे, हींग और कालानमकसे संयुक्त कर पीवे । यह विषूचि- काको हरता है ॥ ३० ॥ अथ खारका सेवन । क्षारं तोयं च पानाय दाहस्योपरि पाचयेत् ॥ शूलाध्मानं निहन्त्याशु कुरुते चाग्निदीपनम् ॥ ३१ ॥ खारके पानीको अग्निपै पकाके पीवे । यह शूल और अफाराको हरता है और अग्निको शीघ्र जगाता है ॥ ३१ ॥ अथ आमाजीर्णका उपाय । आमेषु वमनं कुर्य्याद्विपक्वे चैव लंघनम् ॥ विशिष्टस्वेदनं निद्रा रसशेषे विरेचनम् ॥ ३२ ॥ आमसंज्ञक अजीर्णमें वमन कराना और पके हुए अजीर्णमें लंघन, पसीना, नींद इनको सेवे । रस शेष अजीर्णमें विरेचन हित है ॥ ३२ ॥ अथ दिवास्वापविधान । उन्मत्ते चातिसारे च वमिक्रोधातुरेषु च ॥ अजीर्णे तु वि- षूच्यां च दिवास्वप्नं हितं भवेत् ॥ ३३ ॥ न हितं श्लेष्मणि चैव हृद्रोगे तु शिरोरुजि ॥ हृल्लासे च प्रतिश्याये दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ॥ ३४ ॥ उन्माद, अतीसार, छर्दि, क्रोध, अजीर्ण, विषूचिका ( हैजा ) इनमें दिनका सोना हित है ॥ ३३ ॥ कफरोग, हृद्रोग, शिरकी पीड़ा थुक्थुकी, जुखाम इन रोगोंमें दिनके शय- नको वर्जे ॥ ३४ ॥

अ० ५ ] भाषाटीकासमेता । ( २३५ ) अथ विषूचिकापर हरीतक्यादि अञ्जन । फलत्रयं त्र्यूषणकरञ्जबीजं रसं तथा दाडिममातुलुंग्यः ॥ निशायुतं पेष्यकृता च वर्त्तिस्तदञ्जने हन्ति विषूचिकां च॥३५॥ हरडा, बहेड़ा, आंवला, सोंठ, मिर्च, पीपल, करंजुआके बीज, अनार, बिजौराका रस और हलदी, इनको पीस बत्ती बना नेत्रोंमें आंजे । यह विषूचिका (हैजा) को हरता है ॥ ३५ ॥ अथ रास्नादि भक्षण । रास्ना विशाला च सुराब्दशिग्रुकुष्ठं वचा नागरकं शताह्वम् ॥ आग्नेयपिष्टाहपुषाविदार्य्यः खल्लीं विषूचीं च निवारयन्ति ३६॥ रास्ना, इन्द्रायण, देवदारु, नागरमोथा, सहिंजना, कूट, वच, सोंठ, शतावरी, हाउबेर, विदारीकन्द इन सबोंको चीताके रसमें पीस खानेसे खल्लीरोग और विषूचिका (हैजा) दूर होती है ॥ ३६ ॥ अथ स्वेदका उपयोग । स्वेदो विधेयो घटकस्य बाष्पमेकैर्घटाभिर्वसनेन चोष्णः ॥ तथोष्णपाणिं प्रतिसेक एवं जयेद्विषूचीं जठरामयानाम् ॥३७॥ कलशेमें अग्निको छोड़कर उसकी भापोंसे अथवा गरम किये वस्त्रसे अथवा गरम किये हाथसे पसीना देवे तो विषूचिका (हैजा) और पेटका रोग दूर होता है ॥ ३७ ॥ अथ गन्धकादिभक्षण । गन्धकं सैन्धवं त्र्यूषं निम्बूरसविमर्दितम्॥आतुरो भक्षयेच्छीघ्रं विषूचीनां निवारणम् ॥ ३८ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने गुल्मचिकित्सा नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ गन्धक, सेंधानमक, सोंठ, मिर्च, पीपल इनको नींबूके रसमें खरलकर प्रमाणसे रोगी खावें यह विषूचिका (हैजा) को जल्दी दूर करता है ॥ ३८ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहा- यसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने गुल्मचिकित्सा नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पञ्चमोऽध्यायः ५. अथ कृमिरोगके प्रकार और उन्होंकें भेद । आत्रेय उवाच॥ क्रिमयो द्विविधाः प्रोक्ता बाह्याभ्यन्तरसम्भवाः॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( २३६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- बाह्ययूकाः प्रसिद्धाः स्युराभ्यन्तराश्च किञ्चुकाः ॥ १ ॥ सप्त- विधो भवेद्वाह्यः षड्विधोऽन्तःसमुद्भवः ॥ तेषां वक्ष्यामि सम्भू- तिं बाह्याभ्यन्तरे नृणाम् ॥ २ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-बाह्य और आभ्यंतरभेदसे कृमि दो प्रकारके कहे हैं। जूमआदि बाह्यकृमि कहाते हैं, चुन्नाआदि आभ्यंतर कृमि कहाते हैं ॥ १ ॥ बाह्यकृमि सात प्रकारके हैं, आभ्यंतर कृमि छःप्रकारके हैं, अब उनकी उत्पत्तिकों कहता हूं ॥ २ ॥ अथ जूमकी उत्पत्ति । रौक्ष्यादतिमलात्स्वेदाच्चिन्तया शोचनादपि ॥ कफधातुसमुद्भू- तास्तीक्ष्णा यूका भवन्ति हि ॥ ३ ॥ यूकाः कृष्णाः पराः श्वेतास्तृतीया चर्मणि स्थिता ॥ सूक्ष्मातिविकटा रूक्षा चर्मभा चर्मयूकिका ॥ ४ ॥ चतुर्थी बिन्दु की नाम वर्चुला मूत्रसम्भवा ॥ पञ्चमी मत्कुणा स्याच्च बाह्योपद्रवकारिणी ॥ ५ ॥ यूकामस्तकसंस्थाने श्वेता शिरोनिवासिनी ॥ चर्मयूका नेत्रचर्मे सूक्ष्मे रोमणि यष्टिका ॥ ६ ॥ रौक्ष्यसे, अत्यंत मलसे, पसीनासे, चिंता और शोचसे, कफ और धातु करके उपजी हुई तीक्ष्ण जूम होती हैं ॥ ३ ॥ पहली कृष्णा, दूसरी श्वेता और तीसरी चर्ममें स्थित, सूक्ष्म, अतिविकट, रूखी, चर्मसरीखी कांतिवाली होती है ॥ ४ ॥ चर्मयूकिकानामवाली चौथी और बिंदुकी नामवाली पांचमी है और मूत्रसे उपजी वर्तुलकानामवाली छठी है और शरीरके बाहर उपद्रव करनेवाली मत्कुणा सातमी है ॥ ५ ॥ मस्तकके स्थानमें यूका जूम होती है और सूक्ष्मरोमोंमें भी जूम होती है और नेत्रके चाममें चर्मयूका जूम होती है (इसे कुटकी कहते हैं) और सूक्ष्मरोमोंमें चर्ममें भी जूम होती है। उसे यष्टिका कहते हैं ॥ ६ ॥ अथ कृमि उत्पन्न होनेका कारण । रूक्षान्नगोधूमयवान्नपिष्टैर्गुडेन वा क्षीरविपर्य्ययेण ॥ दिवाशया- नेन सपिच्छलेन घर्मेण तापोदकसेवनेन ॥ ७ ॥ संजायते तेन मलाशयेषु क्रिमिव्रजं कोष्ठविकारकारि ॥ ८ ॥ रूखा अन्न, गेहूँ, जब, पीठी, गुड़, दूधका पदार्थ, दिनका सोना, कफकारी पदार्थ, घाम और गरमपानीके सेवनेसे ॥ ७ ॥ मलाशयमें कृमियोंका समूह उपजता है। यह कोष्ठमें विकारको करता है ॥ ८ ॥

अ० ५ ] भाषाटीकासमेता । ( २३७ ) अथ छः प्रकारके अंतर्गत कृमि । षड्विधास्ते समुद्दिष्टास्तेषां वक्ष्यामि लक्षणम्॥ कफकोष्ठे मला- धाराः विसर्पन्ति सुसर्पवत्॥९॥ पृथुमुण्डा भवन्त्येके केचित्कि- ञ्चुकसन्निभाः॥ धान्याङ्कुरनिभाः केचित्केचित्सूक्ष्मास्तथाणवः ॥१०॥ सूचीमुखाः परिज्ञेयाश्चान्त्राणि सीदयन्ति ते॥ वक्ष्यामि लक्षणं तेषां चिकित्साञ्च शृणुष्व मे ॥ ११ ॥ जो छः प्रकारके बाह्यकृमि कहे हैं उनके लक्षणोंको कहता हूं, मलके आधारवाले कफके कोष्ठमें कृमि सर्पकी तरह चलते हैं ॥ ९ ॥ कितनेक पृथुमुंडनामसे विख्यात हैं और कितनेक केंचुवोंके समान कांतिवाले होते हैं, कितनेक अन्नके अंकुरके समान कांतिवाले होते हैं, कितनेक सूक्ष्म होते हैं, कितनेक अत्यंत सूक्ष्म होते हैं ॥ १० ॥ कितनेक सूचीमुख नामसे विख्यात हैं ये आंत्रोंको शिथिल करते हैं, उनके लक्षण और चिकित्साको कहता हूं सुनो ॥ ११ ॥ अथ कृमिरोगका लक्षण । ज्वरो हृद्रोगशूलं वा वमिहृत्क्लेदनं भ्रमः ॥ रुचिबन्धो विवर्णत्व- मतीसारः सफेनिलः॥१२॥ गर्जनं जठरे चैव मन्दाग्नित्वं च जायते॥ पिपासा पीतता नेत्रे किञ्चुकैः पीडितस्य च ॥१३॥ ज्वर हो, हृदयरोग, शूल, छर्दि, हृदयमें ग्लानि, भ्रम ये उपजें और रुचिबंध हो जावे, वर्ण बदल जावे, झागोंवाले मलसे सहित अतिसार उपजे ॥ १२ ॥ पेटमें शब्द होवे, मंदाग्नि उपजे और अत्यंत तृषा होवे और नेत्रोंमें पीलापन हो ये सब लक्षण हों तब समझना कि पेटमें केंचुवे हो गये ॥ १३ ॥ अथ सूचीमुखकृमिका लक्षण । सूचीवत्तुद्यतेऽन्त्राणि रक्तं चैवातिसार्यते ॥ यकृद्वा भक्षय- न्त्यन्ये रक्तं वा वमते भृशम् ॥१४॥ क्लेदो मुखेऽरुचिर्जाड्यं मन्दाग्नित्वं च वेपथुः ॥ क्षुत्तृष्णा च ज्वरो ज्ञेयाः सूचीमुख- कृमीरुजः ॥ १५ ॥ सूईकी तरह आंत्रोंको पीडित करे और रक्तको अत्यंत गुदाके द्वारा निकाले और यकृत् स्थानको भक्षण करे और रक्तकी अत्यंत छर्दि आवे ॥ १४ ॥ मुखमें ग्लानि हो, अरुचि और जड़पना उपजे ।मंदाग्नि और कंप उपजे और भूख,तृषा,ज्वर ये भी उपजें ये सब लक्षण हों तब सूचीमुखकृमिरोगके लक्षण जानिये ॥ १५ ॥

( २३८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ धान्यांकुरकृमिका लक्षण । ये च धान्याङ्कुरास्तेषां वक्ष्याम्यथ च लक्षणम्॥मलाशयस्थाः क्रिमयो मलं जग्धन्ति ते भृशम् ॥१६॥ तैस्तु संजायते देहे विद्रधिर्भेद्वनं तथा ॥ पारुष्यं कार्श्यमङ्गानां रुजत्वं हृत्क्कु- मोद्भवः ॥ १७॥ धान्यके अंकुरके समान कृमिके लक्षणको कहता हूँ। मलाशयमें स्थित हुए ये कृमि मलको खाते हैं ॥१६॥उनसे देहमें कृशपना, विद्रधि,हड़फोड़,कठोरपना, शूल ये उपजते हैं ॥ १७॥ हारीतका प्रश्न । हारीतः संशयापन्नः पादौ संगृह्य पृच्छति॥कथं देहे मनुष्यस्य मलमूत्ररसाशये ॥१८॥ संभवन्ति कथं चादौ वर्द्धयन्ति कथं पुनः॥ कथं च शीर्णेऽन्नरसे नानाहारविभक्षणे ॥१९॥ जायन्ते केन क्रिमयःसूक्ष्मा वाप्यधोगामिनः॥नानामपक्वं भक्ष्यान्नं दहते वा हुताशनः ॥ २० ॥ कथं ते क्रिमयश्चान्ते न दह्यन्तैऽन्तरा- ग्निना ॥ एवं पृष्टो महाचार्य्यः प्रोवाच मुनिपुङ्गवः ॥ २१ ॥ संशयको प्राप्त हुआ हारीतमुनि आत्रेयजीके पैरोंको ग्रहण कर पूछता है,हे भगवन् ! मनुष्यके मल मूत्र और रस आशयमें किस भांति पहिले कृमि उपजते हैं और फिर कैसे बढ़जाते हैं तथा अनेक विधिके आहारोंके खाने और अन्नके रसके पकनेपर सूक्ष्म और अधोगामी कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं ? अनेक अन्नोंको अग्नि जला देता है ॥ १८ ॥ १९ ॥ २० ॥ परंतु वे कृमि समीपमें स्थित हुए भी उसी अग्निसे क्यों नहीं दग्ध होते ? ऐसे पूछे हुए महा आचार्य्य और मुनियोंमें श्रेष्ठ आत्रेयजी कहने लगे ॥ २१ ॥ अथ आत्रेयजीका उत्तर । आत्रेय उवाच ॥ शृणु पुत्र महाबाहो क्रिमिसम्भवकारणम् ॥ विरुद्धात्नरसैः पुत्र रक्तं चैवास्य कुप्यति ॥ २२॥ कफेनैक- दिनं याति शुक्रेण कारणं व्रजेत्॥पञ्चभूतात्मके काये ते तु जाताः सचेतनाः ॥२३॥ कोष्ठाग्निना न दह्यन्ते न जीर्य्यन्ते रसैस्तथा॥ विषे जातो यथा कीटो न विषेण मृतिं व्रजेत् ॥ २४ ॥ तथा हुताशनोद्भूतं न हुताशेन जीर्य्यते॥ २५ ॥भेषजं संप्रवक्ष्यामि

अ० ५ ] भाषाटीकासमेता । ( २३९ ) येन तेऽपि तरन्ति वै ॥ पतन्ति वा शमं यान्ति भेषजानि शृणुष्व मे ॥ २६ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे पुत्र ! हे महाबाहो ! कृमिकी उत्पत्तिके कारणको सुनो, हे पुत्र! विरुद्ध अन्न और रसोंकरके मनुष्यका रक्त कुपित होता है ॥ २२ ॥ कफ और शुक्रके कारणसे एक ही दिनमें उत्पन्न होकर फिर पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश इनसे संयुक्त हुए शरीरमें चैतन्यरूप होके उपजते हैं ॥ २३॥ कोष्ठकी अग्निसे नहीं दग्ध होते हैं और रसोंके साथ जीर्ण नहीं होते। जैसे विषसे उपजा कीड़ा विषकरके मृत्युको प्राप्त नहीं होता ॥ २४ ॥ वैसे अग्नि- करके उपजे कृमि अग्निसे दग्ध नहीं होते हैं ॥ २५ ॥ अब औषधको मैं कहता हूँ जिस करके वे कीड़े नहीं उपजते हैं अथवा गिर पड़ते हैं अथवा शांत होजाते हैं मुझसे सो सुनो ॥२६॥ अथ कृमिपातनका औषध । वचाजमोदा क्रिमिजित्पलाशबीजं शटी रामठकं त्रिविश्याः ॥ उष्णोदके तत्परिपेष्य पेयं पतन्ति शीघ्रं शतधामलौकाः॥२७॥ वच, अजमोद, वायविडंग, टेसूके बीज, कचूर, हींग ये सब एक एक भाग और सोंठ ३ भाग इनको गर्मपानीसे पीस पीवे । यह सौ १०० प्रकारसे कृमियोंको निकालता है ॥२७॥ अथ कृमि नष्ट करनेकी औषध । शटीयवानीपिचुमन्दपुत्रान् विडङ्गकृष्णातिविषारसानाम् ॥ स- पेष्य मूत्रेण त्रिवृत्प्रयुक्तं विनाशनं सर्वकृमीरूजानाम् ॥ २८ ॥ मरिचं पिप्पलिमूलं विडङ्गशिग्रुजवानिकात्रिवृतः ॥ गोमूत्रेण तु पेष्यं पानं शीघ्रं क्रिमीन् हन्ति ॥२९॥ मुस्ताविशालात्रि- फलासुपर्णाशिग्रुसुराह्वं सलिलेन कल्कः ॥ पानं सकृष्णाक्रिमि- शत्रुचूर्ण विनाशनं सर्वकृमीरूजां च ॥ ३० ॥ सुदेवकाष्ठं सुरसा च मागधी विडङ्गकं पिप्पलिका च दन्तिनी । त्रिवृद्रसोंनं सलिलेन सेवितं जयेच्च कम्पिल्लकताडकैः कृमीन् ॥ ३१ ॥ मातुलुङ्गस्य मूलानि रसोनःक्रिमिजित्रिवृत्॥ अजमोदानिम्ब- पत्रं गोमूत्रेण तु पेषयेत् ॥३२॥ पानमेतत्प्रशंसन्ति क्रिमिदोष-

( २४० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-

निवारणम् ॥ ज्वरप्रोक्तानि पथ्यानि क्रिमिदोषे प्रदापयेत् ३३ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने क्रिमिचिकित्सा नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ कचूर, अजवायन, नींवकी कोंप, वायविडंग, पीपल, अतीश, शोधा पारा, निशोत, इनको गोमूत्रमें पीसकर सेवनेसे, सबप्रकारके कृमिरोग नष्ट हो जाते हैं ॥ २८ ॥ मिर्च, पीपलामूल वायविडंग, सहींजना, अजवायन, निशोत, इनको गोमूत्रमें पीस पीवे यह कृमिरोगको शीघ्र नाशता है ॥ २९ ॥ नागरमोथा, इंद्रायन, हरड़ें, बहेड़ा, आंवला, सांतविण, सहींजना, देवदार इनका कल्क अथवा पीपल और वायविडंगका चूर्ण खानेसे उसप्रकारके कृमिरो- गको नाशता है ॥ ३० ॥ वनतुलसी, देवदार, पीपल, वायविडंग, कपिला ओषध, जमा- लगोटेकी जड़, निशोत, ताड़, लहसुन इनके चूर्णको पानीके साथ सेवे यह कृमिरोगको नाशता है ॥ ३१ ॥ बिजौराकी जड़, लहसुन, निशोत, अजमोद, नींवके पत्ते इनको गोमूत्रसे पीसे ॥ ३२ ॥ कृमिदोषको दूर करनेवाले इस पानको वैद्य सराहते हैं । ज्वरमें कहे हुए पथ्योंको कृमिदोषमें प्रयुक्त करे ॥ ३३ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिव- सहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने कृमिचिकित्सानाम- पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


षष्ठोऽध्यायः ६. अथ मंदाग्निआदि अग्नियोंके निदान और चिकित्सा । आत्रेय उवाच॥ अग्निश्चतुर्विधः प्रोक्तः समो विषम तीक्ष्णकः ॥ मन्दस्तदपरः प्रोक्तः शृणु चिह्नानि साम्प्रतम् ॥१॥ वातपित्त- कफसाम्यात्समः संजायतेऽनलः॥ तैरेवं विषमं प्राप्ते विषमो जा- यतेऽनलः ॥२॥ तीक्ष्णः पित्ताधिकत्वेन जायते जठराग्निकः ॥ आत्रेयजी कहते हैं—सम, विषम, तीक्ष्ण, मंद इन भेदोंसे अग्नि चार प्रकारका कहा है अब उनके लक्षणोंको सुन ॥ १ ॥ वात, पित्त, कफ, ये समान होवें तब सम अग्नि होता है और ये ही वातादिक दोष विषम हो जावें तब विषम अग्नि होता है ॥ २ ॥ पित्त अधिक होवे तब तीक्ष्ण अग्नि होता है ॥ अथ चार प्रकारके अग्निका लक्षण । वातश्लेष्माधिकत्वेन जायते मन्दसंज्ञकः ॥ ३ ॥ यद्भुक्तं प्रकृति- स्थं तु पाचयेत्यन्नसंचयम् ॥ स समो नाम निर्दोषः सर्वधातु-

अ० ६ ] भाषाटीकासमेता । ( २४१ ) विवर्द्धनः ॥ ४ ॥ किञ्चित्पाचयते भक्ष्यं कदाचिद्विपक्ककः ॥ वातेन वा न विषमं करोत्यपि विषूचिकाम् ॥ ५ ॥ अश्नात्य- धिकं प्रकृत्यापि तृप्तिं न लभतेऽपि च ॥ सदाहपीतता नेत्रे तीक्ष्णो वै क्षयकृद्बले॥६॥यद्भोक्तुं नैव शक्नोति यत्तु श्लेष्मबला- धिकात् ॥ सोऽपि मन्दानलो नाम गुल्मोदरपरो मतः॥ ७ ॥ वात कफ ये अधिक हो जावें तब मंदाग्नि होता है ॥ ३ ॥ और जो स्वभावके योग्य अन्नका भोजन किये हुएको पका देता है वह सम अग्नि कहाता है, सब दोषोंसे रहित है और सब धातुओंको बढ़ाता है ॥ ४ ॥ विषम अग्नि भोजन किये हुएको कछुक पकाता है और कभी नहीं पकाता है और वातसे विषम हुआ अग्नि विषूचिका अर्थात् हैजाविशेषको करता है ॥ ५ ॥ अपनी प्रकृतिसे अधिक भोजन करे तब भी तृप्ति नहीं होवे और सदा पीले नेत्र रहें, दाह हो, बलका नाश हो वह तीक्ष्ण अग्नि कहाता है ॥ ६ ॥ कफके अधिक बली होनेसे जो भोजन करनेको समर्थ न रहे वह मंदाग्नि कहाता है और गुल्मोदररोगको करता है ॥ ७ ॥

अथ चार प्रकारके अग्निका परिणामविशेष । समेन समता देहे देहधातुबलेन्द्रियैः ॥ हृष्टः संपूर्णगात्रस्तु सचे- ष्टो वर्त्तते नरः ॥ ८ ॥ विषम वानिलाद्याश्च ग्रहणी चाति- सारकाः ॥ प्लीहा गुल्मो विषूची च शूलोदावर्त्तसंज्ञकः ॥९॥ आनाहो मन्दचेष्टत्वं जायते विषमाग्निना॥वातकफावुभौ क्षीणौ तीव्रॊ भवति पित्तकः ॥१०॥ भोजने लभते प्रीतिं भुक्त्वा चैव च जीर्य्यते ॥ तेन भस्मकसंज्ञस्तु जायते जठरानलः ॥ ११ ॥ पाण्डुः पित्तातिसारस्तु राजयक्ष्मा हलीमकः॥भ्रमः क्लमोऽति- वैकल्यं यकृद्वापि प्रमेहकाः ॥ १२ ॥ शूलमूर्च्छा रक्तपित्तं पित्ताम्लं मूत्रकृच्छ्रकम् ॥ तेन संक्षीयते गात्रं जायतेऽन्नस्य लौल्यता ॥ १३ ॥ भक्षिताः काष्ठपाषाणा जीर्य्यन्ते तस्य देहिनः ॥ इति प्रोक्तं निदानं च नरस्याग्निप्रकोपनम् ॥ १४ ॥ बहुधापि न वोक्तं तु ग्रन्थविस्तारशङ्कया ॥ १५ ॥ समान अग्नि होवे तब शरीरमें धातु, बल, इंद्रिय इनकी समानता रहे और सदा प्रसन्न रहे और शरीर हृष्टपुष्टहो ऐसा मनुष्य श्रेष्ठ होता है और कान्तियुक्त होता है ॥ १६

( २४२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- ॥ ८ ॥ विषम अग्नि होवे तो वातआदिकरोग और ग्रहणीरोग, अतिसार, प्लीहा, गुल्मरोग, विषूचिका, शूल, उदावर्त्त ॥ ९ ॥ अफारा और मन्द चेष्टा रहती है और वात कफ ये दोनों क्षीण और पित्त तीक्ष्ण होता है ॥ १० ॥ भोजनमें प्रीति रहे, भोजन किया हुआ जर जावे वह जठरानल भस्मक रोग कहाता है ॥ ११ ॥ उस भस्मक रोगसे, पांडुरोग, पित्तका अतिसार, राजयक्ष्मा, हलीमक, भ्रम, ग्लानि, अतिविकल्पना, यकृतरोग, प्रमेह ॥ १२ ॥ शूल, मूर्च्छा, रक्तपित्त, अम्लपित्त, मूत्रकृच्छ्र ये उपद्रव और शरीर क्षीण हो जाता है, अन्नमें अत्यन्त इच्छा रहती है ॥ १३ ॥ और उस भस्मरोगवाले मनुष्यके भक्षण किये हुए काष्ठ, पत्थर भी जल जाते हैं। इस प्रकार मनुष्यके अग्निकोप होनेके लक्षण कहे हैं ॥ १४ ॥ ग्रन्थके विस्तार होनेकी शंकासे यहां बहुतसा विस्तार नहीं कहा है ॥ १५ ॥ अथ जठराग्निकी चिकित्सा । अतो वक्ष्ये समासेन भेषजानि पृथक्पृथक् ॥ पाचनं शमनं चैव दीपनञ्च तथोपरि ॥ १६ ॥ अब विस्तारसे जुदी २ औषधोंको कहते हैं। पाचन अर्थात् पकानेवाली, शमन और दीपन अर्थात् अग्निको दीप्त करनेवाली ऐसी औषधोंको कहते हैं ॥ १६ ॥ अथ विषमाग्निकी चिकित्सा । रास्ना शटी प्रतिविषा सुरसा च शुण्ठी सिन्धूत्थहिङ्गु मगधा च सुवर्चलं च ॥ चूर्णं कृतं सगुडमोदकभक्ष्यमाणं वातात्मकन्तु विषमाग्निसमीकरणञ्च ॥ १७॥ शूलानजीर्णविषमाग्निविषूचिकासु वातादयः सकलगुल्मविनाशनं स्यात् ॥ भुक्तोपरि क्वथितमेव पिबेत्सुखोष्णं श्रेष्ठं तथोपरि समस्तरसानुभोज्यम् ॥ १८ ॥ रास्ना, कचूर, काला अतीश, सौंफ, सोंठ, सेंधानमक, कालानमक, हींग, पीपल इनका चूर्ण बना उसमें गुड़ मिला गोली बना खानेसे वातसे उपजा हुआ विषमाग्निरोग दूर होता है ॥ १७ ॥ शूल, अजीर्ण, विषमाग्नि, विषूचिका इन रोगोंको तथा वातसे उपजे हुए रोगोंको और गुल्म रोगको नाशती है और इसके खानेके ऊपर औटाया हुआ सुखसे सुहाता हुआ गरम जलको पीवे और इसके ऊपर सब प्रकारके रस खाने श्रेष्ठ हैं ॥ १८ ॥ अथ तीक्ष्णाग्निकी चिकित्सा । द्राक्षाभया तिक्तकरोहिणी च विदारिका चन्दनवासकं च ॥ मुस्ता पटोलं च किरातकानां कृष्णा बला च विकचावि-

अ० ६.] भाषाटीकासमेता । (२४३) षाणा ॥ १९ ॥ पलालवङ्गालसपद्मकं च योज्या च भृंगी धनिका समांशा ॥ चूर्णं सखर्जूरसितासमेतं घृतेन तदर्द्धबल- प्रमाणम् ॥ २०॥ भक्षेतप्रभाते पयसा मनुष्यो निष्क्वाथ्य पानं सघृतं विधेयम्॥करोति तीव्राग्निसमं प्रकृष्टं कृशस्य पुष्टिं तनुते- ऽपि नूनम् ॥ २१ ॥ कुमभ्रमशोषविनाशनं स्यात्तृष्णातिलौ- ल्यप्रशमं करोति ॥ सरक्तपित्तं क्षयपाण्डुरोगं हलीमकं कामल- माशु नश्येत् ॥ २२ ॥ दाख, हरड़े, कुटकी, बिदारीकंद, चन्दन, वासा, नागरमोथा, परवल, चिरायता, पीपल, खरेहटी, गोरखमुंडी, अतीस ॥१९ ॥ वालछड़, लौंग, पद्माख, भंगरा, धनियां, खजूरिया इनको समान भागसे चूर्ण बना उसमें मिश्री मिला पीछे घृतके संग इस चूर्णको आधी मात्रा प्रमाण ॥ २० ॥ प्रातःकालमें खावे और इसके ऊपर औटाया हुआ दूधको घृतके संग पीवे. यह तीक्ष्ण अग्निको समान करता है और कृश शरीरको अत्यंत पुष्ट करता है ॥ २१ ॥ ग्लानि, भ्रम, शोष इनको दूर करता है और अत्यंत दाहको शांत करता है। रक्तपित्त, क्षयरोग, पांडुरोग, हलीमक, कामला इनको शीघ्र ही नाशता है ॥ २२ ॥ तण्डुलारक्तशालीनां भागद्वयेन धीमताम् ॥भृष्ट्वा तिलांश्च संकु- ट्य तदर्द्धेन विमिश्रितान्॥२३॥भृष्ट्वा तत्सममुद्गांश्च चक्रीकृत्य तु साधयेत्॥सिद्धां च कृशरां सम्यग्घृतेन सह भोजयेत्॥२४॥ एकाहान्तरितो यस्तु तीव्राग्निस्तस्य नश्यति ॥ २५ ॥ लाल चावल २ भाग, भूने हुए तिल १ भाग इनको कूटके फिर इनके बराबर भूने हुए मूंग मिला ॥ २३ ॥ इनको पकाके खिचड़ी बनावे पीछे इसको घृतके संग भोजन करे ॥ ॥ २४ ॥ इसको एकदिन खावे और एक दिन नहीं खावे इस क्रमसे खानेसे तीक्ष्ण अग्नि शांत होती है ॥ २५ ॥ अथ हरीतक्यादिवटी । हरीतकी हरिरतुल्यषड्गुणा चतुर्गुणा चतुर्विशालपिप्पली ॥ हुताशनं संयुतहिङ्गुसैन्धवं रसायनं कुरुनृप वह्निदीपनम्॥२६॥ हरड़े ६ भाग, चार भाग पीपल, चार भाग गजपीपल, चीता, हींग, सेंधानमक इनको एक जगह पानीमें खरलकर गोली बांध लेवे यह अग्निको दीप्त करनेमें रसायन कहाता है ॥ २६ ॥

( २४४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ यवानीखांडवचूर्ण । जवानिकामिश्र हरीतकी तथा यथोत्तरं वृद्धिमवाप्य चूर्णयत्॥ सतित्तिडीकं च सकोलदाडिमं तथाम्लवेतं रुचिरं च मेलयेत् ॥ २७ ॥ समानि चेमानि च कर्षमात्रं कर्षाद्विभागेष्वितरे बलानि ॥ जाजी वराङ्गं च सुवर्चलं च कणाशतैकं मरिचं तदर्द्धम्॥२८॥पलानि चत्वार्य्यपि शर्करायाः समं विचूर्योदरगा- न् प्रमाष्टि॥ भक्षयेदेदं रुचिकृद्विबन्धं प्लीहं सशूलं जयते सका- सम्॥ २९ ॥ श्वासं विनश्येद्धृदयामयघ्नं जिह्वागदं कण्ठगदं निहन्ति॥ग्राहग्रहण्यार्शविकारमन्दानलस्य सन्दीपनमेव चूर्णम् ॥ ३० ॥ यवानिकाखंडविकामिधानमरोचकानां शमने प्रश- स्तम् ॥३१ ॥ अजवायन १ भाग, चीता २ भाग, हरड ३ भाग ऐसे इनके यथोत्तर वृद्धि भाग लेके चूर्ण बनावे और अम्लवेत, बेर, अनारदाना, अमली ॥ २७ ॥ इन सब औषधोंको समान भाग एक एक तोला प्रमाण लेवे और जीरा, दालचीनी, कालानमक ये सब दो तोला प्रमाण लेवे और पीपल १०० सौ, काली मिर्च ५० ले ॥ २८ ॥ मिश्री १६ तोले ऐसे इन सब औषधोंको ले एक जगह चूर्ण बनावे इस चूर्णके खानेसे उदररोगोंका नाश होता है और यह रुचिको करनेवाला है, मलका बंधन, तिल्ली, शूल, खांसी ॥ २९ ॥ श्वास रोग, हृदयरोग, जिह्वारोग, कंठरोग इनको दूर करता है और संग्रहणी, बवासीर इनको दूर करता है, मंदा- ग्निको दीप्त करता है ॥ ३० ॥ यह यवानीखांडवनामवाला चूर्ण अरोचकरोगको दूर करनेमें श्रेष्ठ कहा है ॥ ३१ ॥ अथ अरोचक चिकित्सा । यवागूः पञ्चकोलस्य कुलत्थाढक्ययूषकम्॥मुद्गयूषेण वा सम्य- ग्भक्तानां भोजनं हितम् ॥३२॥ सहिङ्गु त्र्यूषणाढ्यं च व्यञ्जनं संप्रशस्यते ॥ अगस्त्यघृतवच्छ्रेष्ठं भोजनारोचकेष्वपि॥ ३३ ॥ कारवेल्लं पटोलञ्च पलाण्डुः सूरणं शटी ॥ लवणं धान्यकं श्रेष्ठं प्रलेहश्च कटुत्रिकम् ॥ ३४ ॥ शटी सर्षपवास्तूकं शतपुष्पा च माचिका ॥ तुण्डीरकस्य मूलानां शाकं श्रेष्ठं प्रशस्यते ॥

॥ ३५ ॥ गोधूमपोलिकाः श्रेष्ठा भृष्टाङ्गारैररोचके ॥ जाङ्ग्लानि च मांसानि भोजयेद्भिषगुत्तमः ॥३६॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे तृतीयस्थाने मन्दाग्निचिकित्सा नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ पंचकोल अर्थात् पीपली, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ इनकी यवागूको तथा कुलथी, अरहरकी दाल इनके यूषको भोजन करे, अथवा मूंगोंके यूषके संग चावलोंका भोजन करना हित है ॥ ३२ ॥ हींग, सोंठ, मिर्च, पीपल इनसे संयुक्त किया हुआ शाक भोजनकी अरु- चिमें अगतिसंज्ञक घृतकी तरह श्रेष्ठ कहा है ॥३३॥ करेला, परवल, प्याज, जमी- कंद, कचूर, इनका शाक श्रेष्ठ कहा है और नमक, धनियां, सोंठ, मिर्च, पीपल इनकी चटनी श्रेष्ठ है ॥ ३४ ॥ कचूर, सिरसम, बथुआ, सौंफ, मकोह, मीठीतोरी मूली, इनका शाक अरोचक रोगमें श्रेष्ठ कहा है ॥ ३५ ॥ अंगारोंपै सेकी हुई गेहूंकी रोटी जांगल- देशके जीवोंका मांस इनको वैद्यजन अरोचकरोगवालेको भोजन करवावे ॥ ३६ ॥ इति वेरीनिवासीसुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने मंदाग्निचिकित्सानाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥


सप्तमोऽध्यायः ७ अथ शूलनिदान । आत्रेय उवाच ॥ व्यायामपाननिशिजागरणव्यवायशोकातिभा- रगतिधावनकश्रमेण ॥ वैषम्यपानशयनेन च भोजनेन शीतेन वायुःकुपितः प्रकरोति शूलम् ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-कसरत, पान, रात्रिमें जागना, मैथुन, शोक, अतिबोझ, गमन, भागने और श्रमसे तथा विषम पान, विपरीत शयन, विपरीत भोजन और शीतल वस्तुके सेवनसे कुपित हुआ वायु शूलको करता है ॥ १ ॥ अथ वातशूलकी उत्पत्ति । विष्टम्भीरूक्षयवमाषकलायमुद्गनिष्पावकास्त्रिपुटकोद्रवको मसूरः गोधूमक्षुद्रकफलेक्षविभोजनेन चैतच्च पानमलरोधनमूत्ररोधैः ॥२॥ वायुस्त्वधोगतपथं प्रविरुह्य शूलं वातात्मको भवति चान्तरव-

( २४६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-

ह्निमांश्च ॥ तस्मादिति प्रबलताकुपितः प्रकोष्ठे शूलं करोति गुद- मार्गनिरोधितोऽपि ॥ ३ ॥ गात्रेऽपि तोदविरतिर्मलिनातिदीना वातार्तिपीडितनरस्य महामते स्यात् ॥ ४ ॥ विष्टंभी अर्थात् मलको बंद करनेवाला, सूखा भोजन, जव, उड़द, मोठ, मूंग, मटर, कोदूधान्य, चौला, मसूर, गेहूं, कफको पैदा करनेवाला और रूखा अन्नके भोजनोंसे और जलपान, मल, मूत्र, इनके रोकनेसे ॥ २ ॥ वायु अधोमार्गके मूलमार्गको रोक देता है । यह वातसे उत्पन्न हुआ शूल कहाता है और उदरके भीतर अग्नि दाह कर देता है । कोष्ठ- स्थानमें प्रबल होके कुपित हुआ शूलको उपजाता है और गुदाके मार्गको रोक देता है ॥ ३ ॥ शरीरमें भी पीड़ा, ग्लानि, मलीनता, दीनपना ये उपद्रव वातसे पीड़ित हुए मनुष्यके उत्पन्न होते हैं ॥ ४ ॥ अथ पित्तशूलनिदान । क्रोधातपादनलसेवनहेतुना च शोकाद्भयार्त्तिगतिधावनघर्मयो- गात्॥क्षाराम्लमद्यकटूकोष्णविदाहिरूक्षसौवीर¹शुष्कपललेख- नराजिकाभिः ॥ ५ ॥ वातः प्रकोपमयते किल तत्तु पित्तं शूलं करोति जठरेमनुजस्य तीव्रम्॥तेनाङ्गदाहारतिघर्मतृषार्त्ति- मूर्च्छा नाभ्यन्तरे दहति शोषणतास्य पैत्त्यम् ॥ ६ ॥ क्रोधसे, घाम और अग्निके सेवनसे, शोक, भय, पीड़ा, गमन करना, भागना और पसीना- के योगसे, खारा, खट्टा, मदिरा, चर्चरा, कुछ गरम, विदाही, रूक्ष पदार्थ, वेर, कांजी, सूखा पदार्थ, मांस, लेखन पदार्थ, राई ॥ ५ ॥ इनके खानेसे वायु कुपित होके पित्तको कुपित करता है, फिर वह पित्त मनुष्यके उदरमें दारुणशूल उत्पन्न करता है उससे अंगमें दाह, ग्लानि, पसीना, तृषा और मूर्च्छा ये उपद्रव होते हैं और नाभिके समीपमें दाह, शरीरमें शोष होता है और मुख पीला रहता है ॥ ६ ॥ अथ कफशूलकी उत्पत्ति । अव्यायामेऽस्निग्धसंसेवनेन लौल्याहारे चेक्षुतैलैः पयोभिः ॥ अल्पाहारे निद्रया सेवनैस्तु योगैरैतैः कुप्यते श्लेष्मकस्तु ॥७॥ माषातिशीतलपयोदधिभिः सुशीतैर्मत्स्यैस्त्वनूपपललैरतिसे- वितैस्तु॥श्लेष्मा भृशं शमयतेऽनलमाशु शूलं कोष्ठे करोति मनु-


१ 'सौवीरं वदरं घोटाप्यथ स्यात् स्वाडुकंटकः' इत्यमरः ।

अ० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( २४७ ) जस्य विकारमुग्रम् ॥ ८ ॥ हल्लासकासवमिजाड्यशिरोगुरुत्वं स्तैमित्यशीतलतनूरुचिबन्धनं च ॥ भुक्तप्रसेकमधुरास्यमथा- भिरामं स्निग्धं मुखं भवति यस्य कफात्मकोऽसौ ॥ ९ ॥ चिह्नानि चैतानि भवन्ति यस्य कफात्मकं शूलमवेहि तस्य ॥ सपैत्तिकानीव भवन्ति यस्य वदन्त्यजीर्णेन च शूल- मस्य ॥ १० ॥ कसरत नहीं करना, चिकना नहीं खाना, पिच्छल भोजन करना, ईखका रस, तेल, दूध इन्होंका भोजन करना, अल्प भोजन करना, निद्राका सेवन करना इन योगों करके कफ कुपित होता है ॥७॥ उड़द, अत्यंत शीतल पदार्थ, शीतल दूध, दही, मच्छी और अनूपदेशके जीवोंका मांस इनके सेवन करनेसे कफ जठराग्निको शांत कर देता है और शीघ्रही शूलको उत्पन्न कर देता है, मनुष्यके कोष्ठस्थानमें अति उग्र विकार करता है ॥ ८ ॥ हल्लास अर्थात् थुकथुकी, खाँसी, वमन, जड़ता, शिर भारी, गीलापन, शीतल शरीर होना, रुचिबंध होनी, भोजन करे पीछे थूक आना, मीठा मुख रहे, आलस्य रहे, चिकना मुख रहे जिसके ये उपद्रव हों वह कफसे उपजा शूल जानना ॥९॥ जिसके ये लक्षण हों वह कफका शूल होता है और जिसके पित्तके लक्षण मिलते हों उसको वैद्यजन अजीर्णसे उपजा हुआ भी शूल कहते हैं ॥ १० ॥ अथ द्विदोषजशूलकी उत्पत्ति । हृत्कण्ठपार्श्वे सकफः सपित्तः हृन्नाभिमध्ये कफपित्तशूलः ॥ बस्तौ च नाभौ प्रकरोति पीडां देहेऽखिले यः स तु वातपित्तात् ११ कफसे उपजा शूल, हृदय, कंठ, पसली, इनमें पीड़ा करता है और पित्तसे उपजा शूल हृदय, नाभि इनमें पीड़ा करता है और कफपित्तसे उपजा शूल बस्तिस्थान और नाभिमें पीड़ा करता है और जो सब शरीरमें पीड़ा हो वह वातपित्तसे उपजा शूल जानना ॥ ११ ॥ अथ दशप्रकारके शूल । अथ शूलोंकी साध्यासाध्य परीक्षा । एकोऽपि सुखसाध्योऽसौ द्वन्द्वः कष्टेन सिध्यति ॥ त्रिदोषजस्त्वसाध्यस्तु बहूपद्रवसंयुतः ॥ १२ ॥ एक दोषसे उत्पन्न हुआ शूल सुखसाध्य होता है, दो दोषोंसे उपजा हुआ शूल कष्टसाध्य कहाता है, त्रिदोषसे उपजा और बहुत उपद्रवोंसे संयुक्त शूल असाध्य होता है ॥१२ ॥ अथ शूलोंकी संख्या और पृथक्करण । निदानैः कुपितो वायुर्वर्त्तते जठरान्तरे ॥ तेन शूला हि दशधा भिषग्भिः परिगीयते ॥१३॥ त्रयो वातादिका ज्ञेया द्वन्द्वजास्तु