विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
| १२२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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जायस्व शीघ्रं भद्रं ते किमर्थमिह तिष्ठसि।
प्रोवाच चैनं गर्भस्था कन्या गां च दिने दिने ॥ ९ ॥
यदि दद्यां ततोऽद्याहं जाययिष्यामि तां पिता।
तथेत्युवाच तं चास्याः पिता काममपूरयत् ॥ १० ॥
'(भद्रे!) तेरा कल्याण हो, तू शीघ्र ही उत्पन्न हो, तू (इतने वर्षोंमे) किस लिये गर्भमें पड़ी हुई है।' तब उस गर्भमें स्थित कन्याने कहा—'यदि आप प्रतिदिन मुझसे गो-दान करानेका संकल्प करें तो मैं आज ही उत्पन्न हो जाऊँ।' तब पिताने उससे 'तथास्तु' कहकर उसकी कामनाको पूर्ण किया ॥ ९-१० ॥
दाता यज्वा च धीरश्च श्रुतवानतिथिप्रियः।
अक्रूरः सुषुवे तस्माच्छ्वफल्काद् भूरिदक्षिणः ॥ ११ ॥
इन श्वफल्क (और गान्दिनी) के यहाँ दान देनेवाले, यज्ञ करनेवाले, धैर्यवान्, शास्त्रोंके ज्ञाता, अतिथियोंसे प्रेम करनेवाले तथा प्रचुर दक्षिणाएँ देनेवाले अक्रूर उत्पन्न हुए ॥ ११ ॥
उपासङ्गस्तथा मद्रुर्मृदुरारिमेजयाः।
अविक्षिप्तस्तथोपेशः शत्रुघ्नोऽथारिमर्दनः ॥ १२ ॥
धर्मधृग् यतिधर्मा च गृध्रो भोजोऽन्धकस्तथा।
आवाहप्रतिवाहौ च सुन्दरी च वराङ्गना ॥ १३ ॥
तथा उपासङ्ग, मद्रु, मृदुर, अरिमेजय, अविक्षिप्त, उपेक्ष, शत्रुघ्न, अरिमर्दन, धर्मधृक्, यतिधर्मा, गृध्र, भोज, अन्धक, आवाह और प्रतिवाह (नामक अक्रूरजीके भाई) तथा वराङ्गना नामकी सुन्दरी कन्या (भी) उत्पन्न हुई॥१२-१३॥
अक्रूरेणोग्रसेनायां सुगात्र्यां कुरुनन्दन।
प्रसेनश्चोपदेवश्च जज्ञाते देववर्चसौ ॥ १४ ॥
कुरुनन्दन ! इन अक्रूरजीसे सुन्दराङ्गी उग्रसेनाके द्वारा देवताओंके समान कान्तिवाले प्रसेन तथा उपदेव नामके दो पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १४ ॥
चित्रकस्याभवन् पुत्राः पृथुर्विपृथुरेव च।
अश्वग्रीवोऽश्वबाहुश्च सुपार्श्वकगवेषणौ ॥ १५ ॥
अरिष्टनेमिरश्वश्च सुधर्मा धर्मभृत् तथा।
सुबाहुर्बहुबाहुश्च श्रविष्ठाश्रवणे स्त्रियौ ॥ १६ ॥
(अक्रूरजीके भाई) चित्रकके श्रविष्ठा और श्रवणा नामकी दो धर्मपत्नियों थीं, जिनसे पृथु, विपृथु, अश्वग्रीव, अश्व-बाहु, सुपार्श्वक, गवेषण, अरिष्टनेमि, अश्व, सुधर्मा, धर्मभृत्, सुबाहु तथा बहुबाहु नामक पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १५-१६ ॥
अश्मक्यां जनयामास शूरं वै देवमीढुषः।
महिष्यां जज्ञिरे शूराद् भोज्यायां पुरुषा दश ॥ १७ ॥
(क्रोष्टाके तृतीय पुत्र) देवमीढुषके अश्मकी नामकी पत्नीसे शूर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। शूरके भोजराजकुमारी-से दस पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १७ ॥
वसुदेवो महाबाहुः पूर्वमानकदुन्दुभिः।
जज्ञे यस्य प्रसूतस्य दुन्दुभ्यः प्राणदन् दिवि ॥ १८ ॥
पहले महाबाहु वसुदेवजी उपनाम आनकदुन्दुभि उत्पन्न हुए, इनके उत्पन्न होनेपर स्वर्गमें—आकाशमें दुन्दुभियाँ बजी थीं ॥ १८ ॥
आनकानां च संह्लादः सुमहानभवद् दिवि।
पपात पुष्पवर्षं च शूरस्य भवने महत् ॥ १९ ॥
तथा स्वर्गमें—आकाशमें नगारोंका बड़ा भारी शब्द हुआ था। (इसीसे वसुदेवजीका नाम आनकदुन्दुभि पड़ा।) साथ ही इनके उत्पन्न होनेपर शूरके घरमें पुष्पोंकी बड़ी भारी वर्षा हुई थी ॥ १९ ॥
मनुष्यलोके कृत्स्नेऽपि रूपे नास्ति समो भुवि।
यस्यासीत् पुरुषाग्र्यस्य कान्तिश्चन्द्रमसो यथा ॥ २० ॥
पुरुषोंमें अग्रगण्य वसुदेवजीकी कान्ति चन्द्रमाके समान थी, इनके समान रूपवान् सम्पूर्ण मनुष्यलोकमें और कोई नहीं था ॥ २० ॥
देवभागस्ततो जज्ञे तथा देवश्रवाः पुनः।
अनावृष्टिः कनवको वत्सावानथ गृत्स्निमः ॥ २१ ॥
श्यामः शमीको गण्डूषः पञ्च चास्य वराङ्गनाः।
पृथुकीर्तिः पृथा चैव श्रुतदेवा श्रुतश्रवाः ॥ २२ ॥
राजाधिदेवी च तथा पञ्चैता वीरमातरः।
पृथां दुहितरं वव्रे कुन्तिस्तां कुरुनन्दन ॥ २३ ॥
शूरः पूज्याय वृद्धाय कुन्तिभोजाय तां ददौ।
तस्मात् कुन्तीति विख्याता कुन्तिभोजात्मजा पृथा। २४।
कुरुनन्दन ! वसुदेवजीके बाद (शूरके यहाँ) देवभाग, देवश्रवा, अनावृष्टि, कनक, वत्सावान्, गृत्स्निम, श्याम, शमीक और गण्डूष नामक पुत्र तथा पृथुकीर्ति, पृथा, श्रुतदेवा, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी नामकी पाँच कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं, जो रमणियोंमें रत्नके समान थीं। ये पाँचों कन्याएँ वीर पुत्रोंकी माता थीं। राजा कुन्तिने पृथाको अपनी पुत्री
हरिवंशपर्व ] चतुस्त्रिंशोऽध्यायः [ १२३
बनानेके लिये माँग लिया। (इसपर) शूरसेनने पृथाको पूज्य तथा वृद्ध राजा कुन्तिभोजको दे दिया। इस कारण पृथा कुन्तिभोजकी पुत्री और कुन्ती नामसे विख्यात हुई २१-२४
अन्त्यस्य श्रुतदेवायां जगृहुः सुपुधे सुतः ।
श्रुतश्रवायां चैद्यस्य शिशुपालो महाबलः ॥ २५ ॥
हिरण्यकशिपुर्योऽसौ दैत्यराजोऽभवत् पुरा ।
अन्त्यके श्रुतदेवासे जगृहु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ तथा चेदिवंशी दमघोषके श्रुतश्रवासे महाबली शिशुपाल उत्पन्न हुआ, यह पहले जन्ममें दैत्यराज हिरण्यकशिपु था ॥ २५½ ॥
पृथुकीर्त्यां तु तनयः संजज्ञे वृद्धशर्मणः ॥ २६ ॥
करूषाधिपतिर्वीरो दन्तवक्रो महाबलः ।
वृद्धशर्मासे पृथुकीर्तिके करूष देशका स्वामी महाबली वीर दन्तवक्र उत्पन्न हुआ ॥ २६½ ॥
पृथां दुहितरं चक्रे कुन्तिस्तां पाण्डुरावहत् ॥ २७ ॥
यस्यां स धर्मविद् राजा धर्माज्जज्ञे युधिष्ठिरः ।
भीमसेनस्तथा वातादिन्द्राच्छक्रैष धनंजयः ॥ २८ ॥
लोकेऽप्रतिरथो वीरः शक्रतुल्यपराक्रमः ।
कुन्तिभोजने जिन पृथाको अपनी पुत्री बना लिया था, उनका विवाह पाण्डुके साथ हुआ। उन पृथाके धर्मके जाननेवाले राजा युधिष्ठिर धर्मसे उत्पन्न हुए और वायुसे भीमसेन तथा इन्द्रसे संसारके अनुपम वीर, इन्द्रके समान पराक्रमी धनंजय (अर्जुन) उत्पन्न हुए ॥ २७-२८½ ॥
अनमित्राच्छिनिर्जज्ञे कनिष्ठाद् वृष्णिनन्दनात् ॥ २९ ॥
शौनेयः सत्यकस्तस्माद् युयुधानश्च सात्यकिः ।
असङ्गो युयुधानस्य भूमिस्तस्याभवत् सुतः ॥ ३० ॥
भूमेर्युगंधरः पुत्र इति वंशः समाप्यते ।
क्रोष्टाके सबसे छोटे पुत्र, सकल वृष्णिवंशियोंको प्रसन्न करनेवाले अनमित्रसे शिनि उत्पन्न हुए, उनसे शैनेय उपनाम सत्यक हुए और उनसे युयुधान उपनामवाले सात्यकि हुए। युयुधानके पुत्र असङ्ग हुए और असङ्गके पुत्र भूमि हुए। भूमिके पुत्र युगंधर हुए। यहाँपर क्रोष्टाका वंश समाप्त होता है ॥ २९-३०½ ॥
उद्धवो देवभागस्य महाभागः सुतोऽभवत् ।
पण्डितानां परं प्राहुर्देवभवसमुद्धवम् ॥ ३१ ॥
(वसुदेवजीके भ्राता) देवभागके उद्धव नामक महाभाग्यवान् पुत्र उत्पन्न हुए। ये उद्धव देवताओंके समान कीर्तिवाले एवं परम पण्डितके रूपमें प्रसिद्ध हुए ॥ ३१ ॥
अश्मक्यां प्राप्तवान् पुत्रमनाधृष्टिर्यशस्विनम् ।
निवृत्तशत्रुं शत्रुघ्नं देवश्रवा व्यजायत ॥ ३२ ॥
(वसुदेवजीके तीसरे भाई) अनाधृष्टिने अश्मकीसे यशस्वी नामक पुत्रको उत्पन्न किया तथा दूसरे भाई देवश्रवाने शत्रुओंको हटानेवाले शत्रुघ्न नामक पुत्रको उत्पन्न किया॥३२॥
देवश्रवाः प्रजातस्तु नैषादिर्यः प्रतिश्रुतः ।
एकलव्यो महाराज निषादैः परिवर्धितः ॥ ३३ ॥
महाराज ! (किसी कारणवश बालकपनमें ही त्याग दिये जानेके कारण) इस देवश्रवाके पुत्रको निषादोंने पालकर बड़ा किया था, इसलिये यह निषादवंशी एकलव्यके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३३ ॥
वत्सावते त्वपुत्राय वसुदेवः प्रतापवान् ।
अद्भिर्ददौ सुतं वीरं शौरिः कौशिकमौरसम् ॥ ३४ ॥
शूरनन्दन प्रतापी वसुदेवजीने (अपने छोटे भाई) पुत्रहीन वत्सावान्को अपना औरस पुत्र कौशिक जलसे संकल्प करके दे दिया ॥ ३४ ॥
गण्डूषाय त्वपुत्राय विष्वक्सेनो ददौ सुतान् ।
चारुदेष्णं सुचारुं च पञ्चालं कृतलक्षणम् ॥ ३५ ॥
(इसी प्रकार) श्रीकृष्णने (वसुदेवजीके दूसरे छोटे भाई) अपुत्र गण्डूषको चारुदेष्ण, सुचारु, पञ्चाल और कृतलक्षण नामके अपने चार पुत्र दे दिये ॥ ३५ ॥
असंभ्रमेण यो वीरो नावर्तत कदाचन ।
रौक्मिणेयो महाबाहुः कनीयान् पुरुषर्षभ ॥ ३६ ॥
पुरुषर्षभ ! रुक्मिणीके छोटे पुत्र महाभुज चारुदेष्ण युद्ध किये बिना (रणभूमिसे) कभी नहीं लौटते थे ॥ ३६ ॥
वायसानां सहस्राणि यं यान्तं पृष्ठतोऽन्वयुः ।
चारुमांसानि भोक्ष्यामश्चारुदेष्णहतानि तु ॥ ३७ ॥
उनके पीछे हजारों कौए इस इच्छासे जाते थे कि इनके द्वारा मारे गये शत्रुओंका चारु (स्वादिष्ट) मांस हम खायेंगे, (इस प्रकार कौओंको) चारु (स्वादिष्ट) भोजन देनेवाले होनेसे ये चारुदेष्ण कहलाये ॥ ३७ ॥
तन्द्रिजस्तन्द्रिपालश्च सुतौ कनकस्य तु ।
वीरश्चाश्वहनश्चैव वीरौ तावथ गुञ्जिमौ ॥ ३८ ॥
| १२४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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(वसुदेवजीके भाई) कनककके तन्द्रिज और तन्द्रिपाल नामक दो पुत्र हुए तथा शृञ्जिमके वीर और अश्वहन नामक दो वीर पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ३८ ॥
श्यामुपुत्रः शमीकस्तु शमीको राज्यमावहत् ।
जुगुप्समानौ भोजत्वाद् राजसूयमवाप सः ।
अजातशत्रुः शत्रूणां जज्ञे तस्य विनाशनः ॥ ३९ ॥
(वसुदेवजीके भाई श्याम अपने छोटे भाई शमीकको अपने पुत्रके समान मानते थे। इस कारण) श्यामके पुत्र शमीक हुए। इन शमीकने राज्य किया था, उन्होंने भोज होनेके कारण (अर्थात् भोजवंशी एक वंशके और एक देशके ही राजा हैं—यह) निन्दा मानकर उन्होंने राजसूय (साम्राज्य) पाया था। शमीकके शत्रुनाशक अजातशत्रु नामक पुत्र हुआ ॥ ३९ ॥
वसुदेवसुतान् धीरान् कीर्तयिष्यामि ताञ्छृणु ॥ ४० ॥
अब मैं वसुदेवजीके वीर पुत्रोंका वर्णन करता हूँ, उसको आप सुनिये ॥ ४० ॥
वृष्णेस्त्रिविधमेतत् तु बहुशाखं महौजसम् ।
धारयन् विपुलं वंशं नान्यैररिष्टैर् युज्यते ॥ ४१ ॥
जो मनुष्य वृष्णिके बहुत-सी शाखाओंवाले, महापराक्रमी पुरुषोंसे सुशोभित इस तीन प्रकारके बड़े विशाल वंशके वृत्तान्तको मनमें धारण करता है, वह इस संसारके अनर्थोंसे मुक्त रहता है ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि वृष्णिवंशकीर्तनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें वृष्णिवंशका कीर्तनविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्णका अवतार लेना, श्रीकृष्णके अन्य भाई-बहिनों और कुटुम्बियोंका वर्णन तथा कालयवनकी उत्पत्ति
वैशम्पायन उवाच
याः पत्न्यो वसुदेवस्य चतुर्दश वराङ्गनाः ।
पौरवी रोहिणी नाम इन्दिरा च तथा वरा ॥ १ ॥
वैशाखी च तथा भद्रा सुनाम्नी चैव पञ्चमी ।
सहदेवा शान्तिदेवा श्रीदेवी देवरक्षिता ॥ २ ॥
वृकदेव्युपदेवी च देवकी चैव सप्तमी ।
सुतनुर्वडवा चैव द्वे एते परिचारिके ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वसुदेवजीकी जो चौदह सुन्दराङ्गी पत्नियाँ थीं, उनमें रोहिणी और रोहिणीसे छोटी इन्दिरा, वैशाखी, भद्रा तथा पाँचवीं सुनाम्नी—ये पाँच पौरव-वंशकी थीं तथा सहदेवा, शान्तिदेवा, श्रीदेवी, देवरक्षिता, वृकदेवी, उपदेवी और सातवीं देवकी—ये सात देवककी पुत्रियाँ थीं तथा सुतनु और वडवा—ये दो उनकी परिचर्या करनेवाली स्त्रियाँ थीं ॥ १-३ ॥
पौरवी रोहिणी नाम बाह्लीकस्यात्मजाभवत् ।
ज्येष्ठा पत्नी महाराज दयिताऽऽनकदुन्दुभेः ॥ ४ ॥
महाराज ! पौरव-वंशकी कुमारी रोहिणी (महाराज शन्तनुके बड़े भाई) बाह्लीककी पुत्री थीं, वे वसुदेवजीकी प्रियतमा बड़ी पत्नी थीं ॥ ४ ॥
लेभे ज्येष्ठं सुतं रामं सारणं शठमेव च ।
दुर्दं दमनं श्वभ्रं पिण्डारकमुशीनरम् ॥ ५ ॥
चित्रां नाम कुमारीं च रोहिणीतनया दश ।
चित्रा सुभद्रेति पुनर्विख्याता कुरुनन्दन ॥ ६ ॥
कुरुनन्दन ! रोहिणीके ज्येष्ठ पुत्र बलराम और (उनसे छोटे) सारण, शठ, दुर्दम, दमन, श्वभ्र, पिण्डारक और उशीनर हुए तथा चित्रा नामकी पुत्री उत्पन्न हुई । (यह चित्रा एक अप्सरा थी, जो रोहिणीके गर्भसे उत्पन्न होते ही मर गयी थी । इसने मरते समय अपनेको धिक्कारा था कि मैं यादवकुलमें जन्म धारण करके भी यदुवंशमें उत्पन्न होनेवाले भगवान्की लीलाको न देख सकी । इस वासनाके कारण) यह चित्रा ही दूसरी बार सुभद्रा बनकर उत्पन्न हुई थी । इस प्रकार रोहिणीके दस संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ५-६ ॥
वसुदेवाच्च देवक्यां जज्ञे शौरिर्महायशाः ।
रामाच्च निशाठो जज्ञे रेवत्यां दयितः सुतः ॥ ७ ॥
वसुदेवसे देवकीमें महायशस्वी श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए और बलरामजीसे रेवतीके द्वारा उनके प्रिय पुत्र निशाठ उत्पन्न हुए ॥
सुभद्रायां रथी पार्थादभिमन्युरजायत ।
अक्रूरात् काशिकन्यायां सत्यकेतुरजायत ॥ ८ ॥
हरिवंशपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः १२५
अर्जुनसे सुभद्रामें रथी अभिमन्यु उत्पन्न हुए और अक्रूर-से काशिराजकुमारीमें सत्यकेतु उत्पन्न हुए ॥ ८ ॥
वसुदेवस्य भार्यासु महाभागासु सप्तसु ।
ये पुत्रा जज्ञिरे शूरा नामतस्तान् निबोध मे ॥ ९ ॥
वसुदेवजीकी सात महाभाग्यवती पत्नियोंमें जो शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए, उनके नाम मैं आपसे कहता हूँ, सुनिये ॥ ९ ॥
भोजश्च विजयश्चैव शान्तिदेवासुतावुभौ ।
वृकदेवः सुनामायां गदश्चास्तां सुतावुभौ ॥ १० ॥
भोज और विजय—ये दो शान्तिदेवाके पुत्र थे तथा वृकदेव और गद—ये दो सुनाम्नीके पुत्र थे ॥ १० ॥
उपासङ्गरं लेभे तनयं देवरक्षिता ।
अगावहं महात्मानं वृकदेवी व्यजायत ॥ ११ ॥
देवरक्षिताके पुत्र उपासङ्कवर हुए और वृकदेवीके पुत्र महात्मा अगावह हुए ॥ ११ ॥
कन्या त्रिगर्तराजस्य भर्ता वै शैशिरायणः ।
जिज्ञासां पौरुषे चक्रे न चस्कन्देऽथ पौरुषम् ॥ १२ ॥
वृकदेवी त्रिगर्तराजकी कन्या थीं । त्रिगर्तराजका भर्ता (पुरोहित) गर्गगोत्री शैशिरायण था । उसके सालेने, जो यादवोंका पुरोहित था, यह जानना चाहा कि इसमें पुंस्त्व है अथवा नहीं, परंतु (व्रतधारी होनेसे) उसका वीर्य स्खलित नहीं हुआ (इसपर उसके सालेने हास्यवश उसको मिथ्या ही नपुंसक घोषित कर दिया) ॥ १२ ॥
कृष्णायाससमप्रख्यो वर्षे द्वादशमे तथा ।
मिथ्याभिशस्तो गार्ग्यस्तु मन्युनाभिसमीरितः ॥ १३ ॥
बारह वर्षका नियम पूर्ण होनेपर मिथ्या ही नपुंसकताका दोष लगाये जानेके कारण गर्गगोत्री शैशिरायण क्रोधमें भर गये, इससे उनके शरीरका वर्ण लोहेके समान काला दीखने लगा ॥ १३ ॥
गोपकन्यामुपादाय मैथुनायोपचक्रमे ।
गोपाली त्वप्सरास्तस्य गोपस्त्रीवेषधारिणी ॥ १४ ॥
उन्होंने एक गोपकन्याके साथ सहवास किया । वह स्त्री गोप-स्त्रीका वेश धारण करनेवाली गोपाली नामकी अप्सरा थी ॥
धारयामास गार्ग्यस्य गर्भं दुर्धरमच्युतम् ।
मानुष्यां गार्ग्यभार्यायां नियोगाच्छूलपाणिनः ॥ १५ ॥
स कालयवनो नाम जज्ञे राजा महाबलः ।
वृषपूर्यार्धकायास्तमवहन् वाजिनो रणे ॥ १६ ॥
उसने गार्ग्य शैशिरायणके अच्युत और दुर्धर वीर्यको धारण कर लिया । उस मनुष्यका वेश धारण करनेवाली गार्ग्यकी भार्यासे शिवजीकी आज्ञासे कालयवन नामक प्रसिद्ध महाबली राजा उत्पन्न हुआ था, बैलोंके समान आधे शरीरवाले घोड़े युद्धमें उसके वाहन बनते थे ॥ १५-१६ ॥
अपुत्रस्य स राज्ञस्तु ववृधेऽन्तःपुरे शिशुः ।
यवनस्य महाराज स कालयवनोऽभवत् ॥ १७ ॥
महाराज ! एक यवन राजा संतानहीन था, उसके अन्तःपुरमें वह बालक पलने लगा । इस प्रकार वह कालयवनके नामसे प्रसिद्ध * हुआ ॥ १७ ॥
स युद्धकामी नृपतिः पर्यपृच्छद् द्विजोत्तमान् ।
वृष्ण्यन्धककुलं तस्य नारदोऽकथयद् विभुः ॥ १८ ॥
वह राजा युद्ध करनेकी इच्छासे प्रेरित हो ब्राह्मणोंसे (अपने समान योद्धाओंको) पूछने लगा । सब जगह पहुँचनेवाले नारदजीने उसे वृष्णि और अन्धककुलके वीरोंको उसके समान योद्धा बताया ॥ १८ ॥
अक्षौहिण्या तु सैन्यस्य मथुरामभ्ययात् तदा ।
दूतं सम्प्रेषयामास वृष्ण्यन्धकनिवेशनम् ॥ १९ ॥
तब वह एक अक्षौहिणी सेना लेकर मथुरापुरीपर चढ़ आया । उसने वृष्णि और अन्धकोंके भवनमें दूतको भेजा ॥
ततो वृष्ण्यन्धकाः कृष्णं पुरस्कृत्य महामतिम् ।
समेता मन्त्रयामासुर्यवनस्य भयात् तदा ॥ २० ॥
तब कालयवनके डरसे वृष्णि और अन्धकोंने महामति श्रीकृष्णके सभापतित्वमें इकट्ठे होकर मन्त्रणा की ॥ २० ॥
कृत्वा च निश्चयं सर्वे पलायनपरायणाः ।
विहाय मथुरां रम्यां मानयन्तः पिनाकिनम् ॥ २१ ॥
कुशस्थलीं द्वारवतीं निवेशयितुमीप्सवः ।
तब वे सब निश्चय करके शिवजीकी मनौती मानते हुए कुशस्थली द्वारकाको बसानेकी इच्छासे रमणीय मथुरापुरीको त्यागकर भाग खड़े हुए ॥ २१½ ॥
* इससे सिद्ध होता है कि गोपाली अप्सरा शकुन्तलाकी भाँति ... कर छोड़ गयी थी ।
पर्वसु श्रावयेद् विद्वाननृणः स सुखी भवेत् ॥ २२ ॥
| १२६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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इति कृष्णस्य जन्मेदं यः शुचिर्नियतेन्द्रियः।
पर्वसु श्रावयेद् विद्वाननृणः स सुखी भवेत् ॥ २२ ॥
जो विद्वान् पुरुष इन्द्रियोंको वशमें करके पवित्र होकर श्रीकृष्णके जन्मकी इस कथाको पर्वके समय सुनाता है, उसका ऋण चुक जाता है और उसको परम सुखकी प्राप्ति होती है ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि श्रीकृष्णजन्मानुकीर्तनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें श्रीकृष्णजन्मक्रीर्तनविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
षट्त्रिंशोऽध्यायः
क्रोष्टाके वंशका वर्णन, पुरोहितके गोत्रसे क्षत्रियोंके गोत्रका बदल जाना
वैशम्पायन उवाच
क्रोष्टोरेवाभवत् पुत्रो वृजिनीवान् महायशाः।
वृजिनीवत्सुतश्चापि स्वाहिः स्वाहाकृतां वरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! (यदुके पुत्र) क्रोष्टाके ही एक वृजिनीवान् नामक महायशस्वी पुत्र हुए; वृजिनीवान्के पुत्र स्वाहि हुए, वे स्वाहा अर्थात् होम करनेवालोंमें श्रेष्ठ थे (जिस प्रकार क्रोष्टाके वंशमें श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए, उसी प्रकार क्रोष्टाके वंशमें सत्यभामा आदि भी हुईं; क्षत्रियोंमें एक कुलके होनेपर भी सात पीढ़ियाँ बीत जानेके बाद पुरोहितके गोत्रसे यजमान क्षत्रियका भी गोत्र बदल जाता है और इस प्रकार गोत्रभेदसे उनमें विवाह हो जाते हैं। इस अध्यायमें क्रोष्टाके वंशकी उस शाखाका वर्णन किया जायगा, जिसमें महालक्ष्मीकी अवतार ईश्वरीशक्ति श्रीरुक्मिणीजी उत्पन्न हुई थीं) ॥ १ ॥
स्वाहिपुत्रोऽभवद् राजा रुषद्गुर्वदतां वरः।
महाक्रतुभिरीजे यो विविधैर्भूरिदक्षिणैः ॥ २ ॥
सुतप्रसूतिमन्विच्छन् रुषद्गुः सोऽध्यमात्मजम्।
अग्रे चित्ररथस्तस्य पुत्रः कर्मभिरन्वितः ॥ ३ ॥
स्वाहिके पुत्र रुषद्गु हुए, वे अच्छे बोलनेवाले थे और बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले अनेक प्रकारके महायज्ञ करते रहते थे। उनकी यह इच्छा थी कि मेरे यहाँ पुत्र-पौत्रोंवाला श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हो; इस प्रकार पुत्रेष्टि आदि यज्ञकर्म करते-करते उनके यहाँ चित्ररथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ २-३ ॥
आसीच्चैत्ररथीर्वीरो यज्वा विपुलदक्षिणः।
शशबिन्दुः परं वृत्तं राजर्षीणामनुष्ठितः ॥ ४ ॥
चित्ररथके पुत्र वीर शशबिन्दु हुए, वे बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ करके राजर्षियोंके श्रेष्ठ आचरणका पालन करते रहते थे ॥ ४ ॥
पृथुश्रवाः पृथुयशा राजाऽऽसीच्छशबिन्दुजः।
शंसन्ति च पुराणज्ञाः पार्थश्रवसमूत्तरम् ॥ ५ ॥
शशबिन्दुके पुत्र महायशस्वी राजा पृथुश्रवा हुए; पुराणोंके जाननेवाले कहते हैं कि पृथुश्रवाके पुत्र उत्तर हुए ॥ ५ ॥
अनन्तरं सुयज्ञस्तु सुयज्ञतनयोऽभवत्।
उशतो यज्ञमखिलं स्वधर्ममुशतां वरः ॥ ६ ॥
उत्तरके पुत्र सुयज्ञ हुए; सुयज्ञके पुत्र उशत हुए; कामना करनेवालोंमें श्रेष्ठ उशत अपने सम्पूर्ण धर्मों और यशका अनुष्ठान सदा करना चाहते थे ॥ ६ ॥
शिनेयुरभवत् सूनुरुशतः शत्रुतापनः।
मरुत्तस्तस्य तनयो राजर्षिरभवन्नृप ॥ ७ ॥
राजन् ! उशतके पुत्र शत्रुओंको संतप्त करनेवाले शिनेयु हुए; उनके पुत्र राजर्षि मरुत्त हुए ॥ ७ ॥
मरुत्तोऽलभत ज्येष्ठं सुतं कम्बलवर्हिषम्।
चचार विपुलं धर्ममर्थात् प्रेत्यभागपि ॥ ८ ॥
मरुत्तके ज्येष्ठ पुत्र कम्बलवर्हिष हुए। जो धर्म मरणके अनन्तर फल देता है, अपने जीवनमें ही वह उस महान् धर्मका आचरण करने लगे ॥ ८ ॥
सुतप्रसूतिमिच्छन् वै सुतं कम्बलवर्हिषः।
बभूव रुक्मकवचः शतप्रसवतः सुतः ॥ ९ ॥
कम्बलवर्हिष बेटों-पोतोंसे समृद्ध पुत्र पाना चाहते थे, उस धर्मानुष्ठानके फलरूप उनके रुक्मकवच नामका पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सौ बालकोंमें अकेला बचा था ॥ ९ ॥
निहत्य रुक्मकवचः शतं कवचिनां रणे।
धन्विनां निशितैर्बाणैरेकाप श्रियमुत्तमाम् ॥ १० ॥
हरिवंशपर्व ] षट्त्रिंशोऽध्यायः [ १२७
रुक्मकवचने युद्धमें धनुष और कवचको धारण करने- वाले सौ योद्धाओंको मारकर बड़ी भारी कीर्ति पायी थी ॥
जज्ञेऽथ रुक्मकवचात् पराजित् परवीरहा । जज्ञिरे पञ्च पुत्रास्तु महावीर्याः पराजितः ॥ ११ ॥
रुक्मकवचके पुत्र शत्रुवीरनाशक पराजित् हुए, पराजित्- के महावीर्यवान् पाँच पुत्र हुए ॥ ११ ॥
रुक्मेषुः पृथुरुक्मश्च ज्यामघः पालितो हरिः । पालितं च हरिं चैव विदेहेभ्यः पिता ददौ ॥ १२ ॥
( उनके नाम इस प्रकार हैं— ) रुक्मेपु, पृथुरुक्म, ज्यामघ, पालित और हरि । उनके पिता पराजित्ने पालित और हरिको विदेह देशका पालन करनेके लिये वहाँके राजाको दे दिया था ॥ १२ ॥
रुक्मेषुरभवद् राजा पृथुरुक्मस्य संश्रितः । ताभ्यां प्रव्राजितो राज्याज्ज्यामघोऽवसदाश्रमे ॥ १३ ॥
रुक्मेपु पृथुरुक्मका आश्रय लेकर राजा बन गया था, उन दोनोंने ज्यामघको राज्यसे निकाल दिया, तब ज्यामघ आश्रममे रहने लगा ॥ १३ ॥
प्रशान्तः स वनस्थस्तु ब्राह्मणैश्चावबोधितः । जिगाय रथमास्थाय देशमन्यं ध्वजी रथी ॥ १४ ॥
वह (वृद्ध होनेसे) शान्त होकर वनमे पड़ा रहता था, परंतु ब्राह्मणोंने तप आदिके द्वारा उसको बलवान् बना दिया; तब रथी ज्यामघने एक ध्वजावाले रथमें बैठकर एक दूसरे देशको जीत लिया ॥ १४ ॥
नर्मदाकूलमेकाकी नगरीं मृत्तिकावतीम् । ऋक्षवन्तं गिरिं जित्वा शुक्तिमत्यामुवास सः ॥ १५ ॥
उसने अकेले ही नर्मदाके किनारेकी मृत्तिकावती नगरी और ऋक्षवान् पर्वतको जीतकर शुक्तिमतीपुरीमें अपना निवास-स्थान बनाया ॥ १५ ॥
ज्यामघस्याभवद् भार्या शैव्या बलवती सती । अपुत्रोऽपि च राजा स नान्यां भार्यामविन्दत ॥ १६ ॥
ज्यामघकी भार्या सती शैव्या बड़ी बलवती थी, इस- लिये ज्यामघने पुत्रहीन होनेपर भी दूसरा विवाह नहीं किया ॥ १६ ॥
तस्यासीद् विजयो युद्धे तत्र कन्यामवाप सः । भार्यामुवाच संत्रस्तः स्नुषेति स नरेश्वरः ॥ १७ ॥
उसने एक युद्धमें विजय होनेपर एक कन्या प्राप्त की। उस नरेश्वरने डरकर अपनी भार्यासे उस कन्याको स्नुषा (पुत्रवधू) कह दिया ॥ १७ ॥
एतच्छ्रुत्वाऽब्रवीद् देवी कस्य चेयं स्नुषेति वै । अब्रवीत् तदुपश्रुत्य ज्यामघो राजसत्तमः ॥ १८ ॥
यह सुनकर पत्नीने पूछा—'यह किसकी पुत्रवधू है?' तब राजसत्तम ज्यामघने प्रतिज्ञा करके कहा— ॥ १८ ॥
यस्ते जनिष्यते पुत्रस्तस्य भार्योपदानवी । उग्रेण तपसा तस्याः कन्यायाः सा व्यजायत । पुत्रं विदर्भं सुभगा शैव्या परिणता सती ॥ १९ ॥
तेरे जो पुत्र उत्पन्न होगा, यह उपदानवी कन्या उसकी भार्या होगी । उस उपदानवी कन्याकी उग्र तपस्याके प्रभावसे सौभाग्यवती शैव्याके बूढ़ी होनेपर भी उसके विदर्भ नामका एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १९ ॥
राजपुत्र्यां तु विद्वांसौ स्नुषायां क्रथकौशिकौ । पश्चाद् विदर्भोज्जनयच्छूरौ रणविशारदौ ॥ २० ॥
तदनन्तर विदर्भने उस राजकुमारीसे शूरवीर एवं रणविशारद क्रथ और कौशिक नामके दो विद्वान् पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ २० ॥
लोमपादं तृतीयं तु पुत्रं परमधार्मिकम् । लोमपादात्मजो बभ्रुराहूतिस्तस्य चात्मजः ॥ २१ ॥
तथा लोमपाद नामक एक तीसरे परम धार्मिक पुत्रको भी उत्पन्न किया। लोमपादके पुत्र बभ्रु हुए और उनके पुत्र हुए आहुति ॥ २१ ॥
आहुतेः कौशिकश्चैव विद्वान् परमधार्मिकः । चेदिः पुत्रः कौशिकस्य तस्माच्चैद्या नृपाः स्मृताः ॥ २२॥
आहुतिके पुत्र कौशिक हुए, वे विद्वान् और परम धार्मिक थे । कौशिकके पुत्र चेदि हुए, इस कारण उनके वंशके राजा चैद्य कहलाते हैं ॥ २२ ॥
भीमो विदर्भस्य सुतः कुन्तिस्तस्यात्मजोऽभवत्। कुन्तेर्घृष्टसुतो जज्ञे रणधृष्टः प्रतापवान् । धृष्टस्य जज्ञिरे शूरास्त्रयः परमधार्मिकाः ॥ २३ ॥ आवन्तश्च दशार्हश्च बली विषहरश्च यः । दशार्हस्य सुतो व्योमा व्योम्नो जीमूत उच्यते ॥ २४ ॥
विदर्भका (चौथा) पुत्र भीम हुआ, भीमके पुत्र कुन्ति
१२८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
हुए; कुन्तिके रणमें ढीठ एवं प्रतापवान् धृष्ट नामक पुत्र हुए। धृष्टके शूरवीर एवं परम धार्मिक आवन्त, दशार्ह और बलवान् विषहर नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए। दशार्हके पुत्र व्योम हुए और व्योमके पुत्र जीमूत हुए ॥ २३-२४ ॥
देवरतके पुत्र देवक्षत्र हुए। देवक्षत्रको आनन्द देनेवाले महायशस्वी दैवक्षत्रि हुए, वे देवताओंके बालकोंके समान तेजस्वी थे। उनका नाम मधु था, उनकी वाणी भी मधुर थी, वह मधुवंशके प्रवर्तक राजा थे। मधुके वैदर्भोंसे मरुवस नामक पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २७-२८ ॥
जीमूतपुत्रो वृहतिस्तस्य भीमरथः सुतः।
अथ भीमरथस्यासीत् पुत्रो नवरथस्तथा ॥ २५ ॥
जीमूतके पुत्र वृहति और उनके पुत्र भीमरथ हुए; भीमरथके पुत्र नवरथ हुए ॥ २५ ॥
आसीन्मरुवसः पुत्रः पुरुद्वान् पुरुषोत्तमः।
मधोर्जज्ञेऽथ वैदर्भ्यां भद्रवत्यां कुरुद्वहः ॥ २९ ॥
ऐक्ष्वाक्यामभवद् भार्या सत्त्वांस्तस्यामजायत।
सत्त्वान् सर्वगुणोपेतः सात्त्वतां कीर्तिवर्धनः ॥ ३० ॥
मरुवसके पुत्र पुरुषोत्तम पुरुद्वान् हुए। उन्हींके विदर्भ-राजकुमारी भद्रवतीसे कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाला मधु नामक पुत्र हुआ और इक्ष्वाकुवंशकी भार्यासे सत्त्वान् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। सत्त्वान् सर्वगुणसम्पन्न थे और अपने वंशमें सात्त्वतोंकी कीर्तिको बढ़ानेवाले थे ॥ २९-३० ॥
तस्य चासीद् दशरथः शकुनिस्तस्य चात्मजः।
तस्मात् करम्भः कारम्भिर्देवरतोऽभवन्नृपः ॥ २६ ॥
नवरथके पुत्र दशरथ हुए और दशरथके पुत्र शकुनि हुए। शकुनिके पुत्र करम्भ हुए और करम्भके पुत्र राजा देवरत हुए ॥ २६ ॥
देवक्षत्रोऽभवत् तस्य दैवक्षत्रिमहायशाः।
देवगर्भसमो जज्ञे देवक्षत्रस्य नन्दनः ॥ २७ ॥
मधूनां वंशकृद् राजा मधुर्मधुरवागपि।
मधोर्जज्ञेऽथ वैदर्भ्यां पुत्रो मरुवसास्तथा ॥ २८ ॥
इमां विसृष्टिं विज्ञाय ज्यामघस्य महात्मनः।
युज्यते परया कीर्त्या प्रजावांश्च भवेन्नरः ॥ ३१ ॥
मनुष्य महात्मा ज्यामघके इस वंशका परिचय प्राप्त कर परम कीर्ति पाता है और संतानवान् हो जाता है ॥ ३१ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंश पर्वमें (ज्यामघके वंशका वर्णनविषयक) छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
सप्तत्रिंशोऽध्यायः
बभ्रुवंशका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
सत्त्वतात्सत्त्वसम्पन्नान् कौशल्या सुपुवे सुतान्।
भजिनं भजमानं च दिव्यं देवावृधं नृपम् ॥ १ ॥
अन्धकं च महाबाहुं वृष्णिं च यदुनन्दनम्।
तेषां विसर्गाश्चत्वारो विस्तरेणेह तान् शृणु ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सत्त्वान् उपनाम-वाले सत्त्वतसे कौशल्याने भजिन, भजमान, दिव्य राजा देवावृध, महाभुज अन्धक और यदुनन्दन वृष्णि नामक सत्त्वसम्पन्न पुत्रोंको उत्पन्न किया ! उनके चार वंश चले, उनको आप विस्तारपूर्वक सुनिये ॥ १-२ ॥
भजमानस्य सृञ्जय्यौ बाह्याकाथोपबाह्यका।
आस्तां भार्ये तयोस्तस्माज्जज्ञिरे बहवः सुताः ॥ ३ ॥
भजमानके सृञ्जयकी पुत्री बाह्यका और उपबाह्यका नामवाली दो स्त्रियाँ थीं। उनसे उसके बहुतसे पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ३ ॥
कृमिश्च क्रमणश्चैव धृष्टः शूरः पुरंजयः।
एते बाह्याकसृञ्जयां भजमानाद् विजज्ञिरे ॥ ४ ॥
भजमानके सृञ्जयकी पुत्री बाह्यकासे कृमि, क्रमण, धृष्ट, शूर और पुरंजय नामक पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ४ ॥
अयुताजित्सहस्राजिरूच्छताजिच्चाथ दाशकः।
हरिवंशपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः १२९
उपवाह्यात्सृञ्जय्यां भजमानाद् विजज्ञिरे ॥ ५ ॥
उन्हीं भजमानके सृञ्जयकी दूसरी पुत्री उपवाह्याकासे अयुताजित्, सहस्राजित्, शताजित् और दाशक नामक पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ५ ॥
यज्वा देवावृधो राजा चचार विपुलं तपः ।
पुत्रः सर्वगुणोपेतो मम स्यादिति निश्चितः ॥ ६ ॥
यज्ञ करनेवाले राजा देवावृधने 'मेरे सर्वगुणसम्पन्न पुत्र हो' इस निश्चयके साथ बड़ा भारी तप किया ॥ ६ ॥
संयुज्यात्मानमेवं तु पर्णाशाया जलं स्पृशन् ।
सदोपस्पृशतस्तस्य चकार प्रियमापगा ॥ ७ ॥
वे राजा अपने चित्तमें ऐसा निश्चय करके पर्णाशा नदीके जलमें खड़े होकर तप करते थे। अपने जलमें सदा खड़े रहने-वाले राजाका नदीने प्रिय करना चाहा ॥ ७ ॥
चिन्तयाभिपरीता सा जगामैकाभिनिश्चयम् ।
कल्याणमन्वान्नरपतेस्तस्य सा निम्नगोत्तमा ॥ ८ ॥
नाध्यगच्छत तां नारीं यस्यामेवंविधः सुतः ।
जायेत् तस्मात् स्वयं हन्त भवाम्यस्य सहव्रता ॥ ९ ॥
उसको ऐसी कोई स्त्री नहीं दीखी, जिसके द्वारा ऐसा पुत्र उत्पन्न हो सके। तब चिन्तासे व्याप्त होकर नदियोंमें श्रेष्ठ पर्णाशाने उस राजाका कल्याण करनेके लिये एकान्तमें यह विचार किया कि 'मैं ही इनकी सहचारिणी बन जाऊँ' ८-९
अथ भूत्वा कुमारी सा बिभ्रती परमं वपुः ।
वरयामास नृपतिं तामियेष च स प्रभुः ॥ १० ॥
तदनन्तर उसने कुमारी बनकर श्रेष्ठ रूप धारण करके राजाको वरना चाहा और राजाने भी उसको पत्नी बनाना चाहा ॥ १० ॥
तस्यामाधत्त गर्भं च तेजस्विनमुदारधीः ।
अथ सा दशमे मासि सुषुवे सरितां वरा ॥ ११ ॥
पुत्रं सर्वगुणोपेतं बभ्रुं देवावृधान्नृपात् ।
तदनन्तर उन महाबुद्धिमान् राजाने उसमें तेजस्वी गर्भ-को स्थापित किया, तब उस नदियोंमें श्रेष्ठ पर्णाशाने राजा देवावृधके वीर्यसे दसवें महीनेमें सर्वगुणसम्पन्न बभ्रु नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥ ११ ॥
अत्र वंशे पुराणज्ञा गायन्तीति परिश्रुतम् ॥ १२ ॥
गुणान् देवावृधस्याथ कीर्तयन्तो महात्मनः ।
यथैवाग्रे समं दूरात् पश्याम च तथान्तिके ॥ १३ ॥
सुना है कि इस वंशके प्राचीन इतिहासको जाननेवाले लोग महात्मा देवावृधके गुणोंका इस प्रकार कीर्तन करते थे; 'महात्मा देवावृधको हम जैसे दूर देशमे देखते थे, वैसे ही उनको समीपमें देखते थे अर्थात् उनको योगवलसे अनेक रूप धारण कर सर्वत्र एक रूपमें विराजमान देखते थे' ॥ १२-१३ ॥
बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधः समः ।
षष्टिश्च षट् च पुरुषाः सहस्राणि च सप्त च ॥ १४ ॥
एतेऽमृतत्वं सम्प्राप्ता बभ्रुर्देवावृधावपि ।
बभ्रु मनुष्योंमे श्रेष्ठ हैं और देवावृध देवताके समान हैं, सात हजार छाछठ पुरुषोंसहित बभ्रु और देवावृध अमृतत्वको प्राप्त हो गये अर्थात् संग्रामभूमिमें अपने प्राणोंको त्यागकर ब्रह्मलोकमें पहुँच गये ॥ १४ ॥
यज्वा दानपतिर्विद्वान् ब्रह्मण्यः सुदृढायुधः ॥ १५ ॥
कीर्तिमांश्च महातेजाः सात्त्वतानां महावरः ।
तस्यान्ववायः सुमहान् भोजा ये मार्त्तिकावताः ॥ १६ ॥
राजा बभ्रु दानियोंमें श्रेष्ठ, यज्ञ करनेवाले, विद्वान् और ब्राह्मणभक्त थे। उनके आयुध बड़े दृढ़ थे। वे कीर्तिमान्, महातेजस्वी तथा सात्त्वतवंशियोमे परम श्रेष्ठ थे। उन बभ्रुका वंश बहुत बड़ा है, मार्त्तिकावतभोज उनकी ही संतानोंमें हैं ॥ १५-१६ ॥
अन्धकात् काश्यदुहिता चतुरोऽलभतात्मजान् ।
कुकुरं भजमानं च शमिं कम्बलबर्हिषम् ॥ १७ ॥
अन्धकसे काशिराज (दृढ़ाश्व) की पुत्रीके द्वारा कुकुर, भजमान, शमि और कम्बलबर्हिष नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १७ ॥
कुकुरस्य सुतो धृष्णुर्धृष्णोस्तु तनयस्तथा ।
कपोतरोमा तस्याथ तैत्तिरिस्तनयोऽभवत् ॥ १८ ॥
कुकुरके पुत्र धृष्णु और धृष्णुके पुत्र कपोतरोमा हुए तथा उनके पुत्र तैत्तिरि हुए ॥ १८ ॥
जज्ञे पुनर्वसुस्तस्मादभिजित् तु पुनर्वसोः ।
तस्य वै पुत्रमिथुनं बभूवाभिजितः किल ॥ १९ ॥
तैत्तिरिके पुत्र पुनर्वसु हुए, पुनर्वसुके पुत्र अभिजित् हुए; उन अभिजित्के एक पुत्र और एक पुत्री-ये दो जुड़वाँ संतानें हुईं, ऐसी बात सुनी जाती है ॥ १९ ॥
म० इ० ५-
| १३० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
आहुकश्चाहुकी चैव ख्यातौ ख्यातिमतां वरौ ।
इमां चोदाहरन्त्यत्र गाथां प्रति तमाहुकम् ॥ २० ॥
ख्यातिप्राप्त लोगोंमें श्रेष्ठ वे दोनों आहुक और आहुकीके नामसे प्रसिद्ध हुए। इन आहुकके सम्बन्धमें (मनुष्य) इस गाथाको गाया करते हैं ॥ २० ॥
श्वेतेन परिवारेण किशोरप्रतिमो महान् ।
अशीतिचर्मणा युक्तः स नृपः प्रथमं यजेत् ॥ २१ ॥
वह तरुण घोड़ेके समान उत्साही राजा जब अपने विशुद्ध परिवारके साथ चलते थे, तब उनके (काठके बने) राज-सिंहासनको अस्सी मनुष्य उठाया करते थे ॥ २१ ॥
नापुत्रवान् नाशतदो नासहस्रशतायुषः ।
नाशुद्धकर्मा नायज्वा यो भोजमभितो यजेत् ॥ २२ ॥
उन भोजके साथ उन्हें घेरकर चलनेवाले लोगोंमें ऐसा कोई नहीं था, जो पुत्रहीन हो अथवा सैकड़ोंकी दक्षिणा देनेवाला न हो अथवा सैकड़ों-सहस्रों वर्षोंकी आयुवाला न हो अथवा अशुद्ध कर्म करनेवाला हो तथा यज्ञ करने-वाला न हो ॥ २२ ॥
पूर्वस्यां दिशि नागानां भोजस्येत्यनुमोदनम् ।
सोपासङ्गानुकर्षाणां ध्वजिनां सवरूथिनाम् ॥ २३ ॥
रथानां मेघघोषाणां सहस्राणि दशैव तु ।
रूप्यकाञ्चनकक्षाणां सहस्राणि दशापि च ॥ २४ ॥
पूर्व-दिशामें राजा भोज (आहुक) का अभिनन्दन करनेके लिये चाँदी और सोनेकी साँकलोंसे बाँधे जानेवाले दस हजार हाथी आते थे तथा उपासङ्ग (जुआ), अनुकर्ष (रथके नीचेका काष्ठ) और वरूथ (रथत्राण कवच) वाले एवं मेघोंकी भाँति घोष करनेवाले ध्वजाधारी दस हजार रथ उनका स्वागत करनेके लिये आते थे ॥ २३-२४ ॥
तावन्त्येव सहस्राणि उत्तरस्यां तथा दिशि ।
आ भूमिपालान् भोजाः स्वानुपतिष्ठन्किङ्किणीकिणः ॥ २५ ॥
उतने ही हजार रथ और हाथी उत्तर तथा अन्य दिशाओंमें भी राजा आहुकका अभिनन्दन करनेके लिये आते थे। भोजवंशी यादव सब सामन्तोंको वशमें करके आहुककी उपासना करते थे। राजा आहुकने उन सबके रथ सोनेकी घंटियों-घूँघुरुओंवाले बनवा दिये थे ॥ २५ ॥
आहुकीं चाप्यवन्तिभ्यः स्वसारं ददुरन्धकाः ।
आहुकस्य तु काश्यायां द्वौ पुत्रौ सम्प्रसूवतः ॥ २६ ॥
देवकश्चोग्रसेनश्च देवपुत्रसमावुभौ ।
अन्धकवंशीयोंने आहुककी बहिन आहुकीको अवन्तिके राजवंशमें ब्याह दी। आहुकके काशिराजकी पुत्रीमें देवकुमारों-के समान सुन्दर देवक और उग्रसेन नामके दो पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २६½ ॥
देवकस्याभवन्पुत्राश्चत्वारस्त्रिदशोपमाः ॥ २७ ॥
देववानुपदेवश्च सुदेवो देवरक्षितः ।
देवकके देवकुमारों-जैसे देववान्, उपदेव, सुदेव और देवरक्षित नामके चार पुत्र थे ॥ २७½ ॥
कुमार्यः सप्त चाप्यासन् वसुदेवाय ता ददौ ॥ २८ ॥
देवकी शान्तिदेवा च सुदेवा देवरक्षिता ।
वृकदेव्युपदेवी च सुनाम्नी चैव सप्तमी ॥ २९ ॥
उन्हींके देवकी, शान्तिदेवा, सुदेवा, देवरक्षिता, वृकदेवी, उपदेवी और सातवीं सुनाम्नी—इस प्रकार सात पुत्रियाँ थीं; देवकने उन सबका विवाह वसुदेवजीके साथ कर दिया था ॥
नवोग्रसेनस्य सुतास्तेषां कंसस्तु पूर्वजः ।
न्यग्रोधश्च सुनामा च कङ्कः शङ्कुः सुभूमिपः ॥ ३० ॥
राष्ट्रपालोऽथ सुतनुरानाधृष्टिश्च पुष्टिमन् ।
तेषां स्वसारः पञ्चाऽऽसन् कंसा कंसवती तथा ॥ ३१ ॥
सुतनू राष्ट्रपाली च कङ्का चैव वराङ्गना ।
उग्रसेनः सहापत्यो व्याख्यातः कुकुरोद्भवः ॥ ३२ ॥
उग्रसेनके नौ पुत्र थे, उनमें कंस सबसे बड़ा था। शेषके नाम इस प्रकार हैं—न्यग्रोध, सुनामा, कङ्क, सुभूमिप शङ्कु, राष्ट्रपाल, सुतनु, अनाधृष्टि और पुष्टिमान्। इनकी कंसा, कंसवती, सुतनू, राष्ट्रपाली और कङ्का नामकी पाँच सुन्दराङ्गी बहिनें थीं। इस प्रकार कुकुरवंशमें उत्पन्न हुए उग्रसेन और उनकी संतानका वर्णन किया गया ॥ ३०-३२ ॥
कुकुराणामिमं वंशं धारयन्नमितौजसाम् ।
आत्मनो विपुलं वंशं प्रजावानाप्नुयान्नरः ॥ ३३ ॥
जो मनुष्य इन अमिततेजस्वी कुकुरोंके वंशका वर्णन सुनता है, वह संतान पाता है तथा उसके वंशकी बड़ी वृद्धि होती है ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें (बभ्रुवंश-वर्णन-विषयक) सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
हरिवंशपर्व ] अष्टत्रिंशोऽध्यायः [ १३१
अष्टत्रिंशोऽध्यायः
भजमानके वंशका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा
वैशम्पायन उवाच
भजमानस्य पुत्रोऽथ रथमुख्यो विदूरथः।
राजाधिदेवः शूरस्तु विदूरथसुतोऽभवत् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! अन्धकपुत्र भजमानके रथियोंमें मुख्य विदूरथ नामक पुत्र हुआ। विदूरथके पुत्र शूरवीर राजाधिदेव हुए ॥ १ ॥
राजाधिदेवस्य सुता जज्ञिरे वीर्यवत्तराः।
दत्तातिदत्तवलिनौ शोणाश्वः श्वेतवाहनः ॥ २ ॥
शमी च दण्डशर्मा च दण्डशत्रुश्च शत्रुजित्।
श्रवणा च श्रविष्ठा च स्वसारौ सम्बभूवतुः ॥ ३ ॥
राजाधिदेवके बलवान् दत्त और अतिदत्त, शोणाश्व, श्वेतवाहन, शमी, दण्डशर्मा, दण्डशत्रु और शत्रुजित् नामक परम बलवान् पुत्र उत्पन्न हुए और श्रवणा तथा श्रविष्ठा नामकी दो कन्याएँ हुई थीं ॥ २-३ ॥
शमीपुत्रः प्रतिक्षत्रः प्रतिक्षत्रस्य चात्मजः।
स्वयंभोजः स्वयंभोजाद्धृदीकः सम्बभूव ह ॥ ४ ॥
शमीके पुत्र प्रतिक्षत्र हुए, प्रतिक्षत्रके पुत्र स्वयंभोज और स्वयंभोजके पुत्र हृदीक हुए ॥ ४ ॥
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि सर्वे भीमपराक्रमाः।
कृतवर्माग्रजस्तेषां शतधन्वाथ मध्यमः ॥ ५ ॥
हृदीकके सभी पुत्र भयंकर पराक्रमी थे, उनमें कृतवर्मा सबसे पहले उत्पन्न हुए और शतधन्वा उनके मझले पुत्र थे॥
देवर्षेर्वचनात् तस्य भिषग् वैतरणश्च यः।
सुदान्तश्च विदान्तश्च कामदा कामदन्तिका ॥ ६ ॥
देवर्षि च्यवनके वचनसे शतधन्वाके भिषक्, वैतरण, सुदान्त एवं विदान्त नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए तथा कामदा और कामदन्तिका नामकी दो पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं ॥
देववांश्चाभवत् पुत्रो विद्वान् कम्बलवर्हिषः।
असमौजास्तथा वीरो नासमौजाश्च तावुभौ ॥ ७ ॥
(अन्धकपुत्र) कम्बलवर्हिपके पुत्र विद्वान् देववान् हुए तथा वीर असमौजा तथा नासमौजा नामक दो पुत्र और हुए ॥ ७ ॥
अजातपुत्राय सुतान् प्रददावसमौजसे।
सुदंष्ट्रं चारुरूपं च कृष्णमित्यन्धकास्त्रयः ॥ ८ ॥
अन्धकके (कुकुर आदिके अतिरिक्त) सुदंष्ट्र, चारुरूप और कृष्ण नामके तीन पुत्र (और) थे। अन्धकने उन तीनों पुत्रोंको पुत्रहीन असमौजाको दे दिया ॥ ८ ॥
एते चान्ये च बहवो अन्धकाः कथितास्तव।
अन्धकानामिमं वंशं धारयेद् यस्तु नित्यशः ॥ ९ ॥
आत्मनो विपुलं वंशं लभते नात्र संशयः।
इनका तथा और भी बहुत-से अन्धकवंशी राजाओंका आपसे वर्णन कर दिया। जो पुरुष नित्यप्रति अन्धकोंके इस वंशका वर्णन सुनता है, उसका वंश अति विस्तृत हो जाता है, इसमें कुछ संदेह नहीं है ॥ ९ १/२ ॥
गान्धारी चैव माद्री च क्रोष्टुभार्ये बभूवतुः ॥ १० ॥
गान्धारी जनयामास अनमित्रं महाबलम्।
माद्री युधाजितं पुत्रं ततो वै देवमीढुषम् ॥ ११ ॥
यदुपुत्र क्रोष्टाके गान्धारी और माद्री नामकी दो भार्याएँ थीं। गान्धारीके पुत्र महाबली अनमित्र हुए तथा माद्रीके पुत्र युधाजित् और देवमीढ्वान् हुए ॥ १०-११ ॥
अनमित्रममित्राणां जेतारमपराजितम्।
अनमित्रसुतो निघ्नो निघ्नतो द्वौ बभूवतुः ॥ १२ ॥
प्रसेनश्चाथ सत्राजिच्छत्रुसेनाजितावुभौ।
अपराजित अनमित्र शत्रुओंको जीतनेवाले थे। अनमित्रके पुत्र निघ्न हुए, निघ्नके प्रसेन और सत्राजित् नामके दो पुत्र उत्पन्न हुए, वे दोनों शत्रुओंकी सेनाओंको जीतनेवाले थे ॥ १२ १/२ ॥
प्रसेनो द्वारवत्यां तु निवसन्त्यां महामणिम् ॥ १३ ॥
दिव्यं स्यमन्तकं नाम समुद्रादुपलब्धवान्।
तस्य सत्राजितः सूर्यः सखा प्राणसमोऽभवत् ॥ १४ ॥
द्वारकापुरीमें बसते समय प्रसेनको स्यमन्तक नामकी दिव्य मणि समुद्रके तटपर परम्परासे प्राप्त हुई थी। प्रसेनके भाई सत्राजित्के सूर्यनारायण प्राणके समान प्रिय मित्र थे ॥
| १३२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
स कदाचिन्निशापाये रथेन रथिनां वरः।
अब्धिकूलमुपस्पृष्टुमुपस्थातुं ययौ रविम् ॥ १५ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ सत्राजित् एक समय रात्रि बीतनेपर स्नान एवं सूर्योपस्थान करनेके लिये समुद्र-तटपर गये थे ॥ १५ ॥
तस्योपविष्टतः सूर्यं विवस्वानग्रतः स्थितः।
अस्पष्टमूर्तिर्भगवान्स्तेजोमण्डलवान् प्रभुः ॥ १६ ॥
अथ राजा विवस्वन्तमुवाच स्थितमग्रतः।
वे सूर्योपस्थान कर रहे थे कि इतनेमें सूर्यनारायण उनके सामने आकर खड़े हो गये। उस समय सर्वशक्तिसम्पन्न भगवान् सूर्यदेव अपने तेजस्वी मण्डलके मध्यमें विराजमान थे, इस कारण उनका रूप स्पष्ट नहीं दीख रहा था। उस समय राजाने अपने सामने खड़े हुए भगवान् सूर्यसे कहा—॥ १६॥
यथैवं व्योम्नि पश्यामि सदा त्वां ज्योतिषाम्पते ॥ १७ ॥
तेजोमण्डलिनं देवं तथैव पुरतः स्थितम् ।
को विशेषोऽस्ति मे त्वत्तः सख्येनोपागतस्य वै ॥ १८ ॥
'ज्योतिर्मय ग्रह आदिके स्वामिन् ! मैं आपको जैसे नित्यप्रति आकाशमें देखता हूँ, वैसे ही मैं आपको तेजका मण्डल धारणकर अपने सामने खड़ा हुआ देख रहा हूँ तो फिर आप जो मेरे पास मित्रतावश पधारे, इसमें विशेषता क्या हुई ?' ॥ १७-१८ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु भगवान् मणिरत्नं स्यमन्तकम् ।
स्वकण्ठादवमुच्यैव एकान्ते न्यस्तवान् विभुः ॥ १९ ॥
इतना सुनते ही प्रभु सूर्यनारायणने अपने कण्ठसे मणिरत्न स्यमन्तकको उतारकर एकान्तमें अलग रख दिया ॥ १९ ॥
ततो विग्रहवन्तं तं ददर्श नृपतिस्तदा ।
प्रीतिमानथ तं दृष्ट्वा मुहूर्तं कृतवान् कथाम् ॥ २० ॥
तब राजा स्पष्ट अवयवोंवाले सूर्यनारायणके शरीरको देखकर प्रसन्न हुए और उन्होंने सूर्यनारायणके साथ मुहूर्त-भर (दो घड़ी) तक वार्तालाप किया ॥ २० ॥
तमपि प्रस्थितं भूयो विवस्वन्तं स सत्राजित् ।
लोकानुद्भासयस्येतान् येन त्वं सततं प्रभो ।
तदेतन्मणिरत्नं मे भगवन् दातुमर्हसि ॥ २१ ॥
बातचीत करनेके अनन्तर जब सूर्यनारायण फिर चलने लगे, तब सत्राजित्ने उनसे कहा—'भगवन् ! आप जिससे सदा इन तीनों लोकोंको प्रकाशित करते रहते हैं, उस स्यमन्तक-मणिको मुझे दे दीजिये' ॥ २१ ॥
ततः स्यमन्तकमणिं दत्त्वास्तस्य भास्करः।
स तमावद्ध्य नगरीं प्रविवेश महीपतिः ॥ २२ ॥
तब सूर्यनारायणने वह स्यमन्तक-मणि उन्हें दे दी और राजाने उसे बाँधकर नगरमें प्रवेश किया ॥ २२ ॥
तं जनाः पर्यधावन्त सूर्योऽयं गच्छतीति ह ।
पुरीं विस्मापयित्वा च राजा त्वन्तःपुरं ययौ ॥ २३ ॥
तब तो मनुष्य 'ये सूर्य जा रहे हैं' कहते हुए उनके पीछे दौड़े। इस प्रकार नगरीको विस्मित करते हुए वे राजा अपने रनवासमें चले गये ॥ २३ ॥
तत् प्रसेनजितं दिव्यं मणिरत्नं स्यमन्तकम् ।
ददौ भ्रात्रे नरपतिः प्रेम्णा सत्राजिदुत्तमम् ॥ २४ ॥
तदनन्तर राजा सत्राजित्ने मणियोंमें रत्नरूप वह दिव्य स्यमन्तक-मणि प्रेमके कारण अपने भाई प्रसेनजित्को दे दी ॥
स मणिः स्यन्दते रुक्मं वृष्ण्यन्धकनिवेशने ।
कालवर्षी च पर्जन्यो न च व्याधिभयं ह्यभूत् ॥ २५ ॥
वह मणि जिस वृष्णि और अन्धककुलवालेके घरमें रहती थी, उसके यहाँ वह सुवर्णकी वर्षा करती रहती थी। उस देशमें मेघ समयपर वर्षा करते थे और वहाँ व्याधिका भय भी नहीं होता था ॥ २५ ॥
लिप्सां चक्रे प्रसेनात्तु मणिरत्ने स्यमन्तके ।
गोविन्दो न च तल्लेभे शक्तोऽपि न जहार सः ॥२६॥
श्रीकृष्णने प्रसेनजित्से मणियोंमें रत्नके समान वह दिव्य मणि स्यमन्तक लेनी चाही, परंतु उसने नहीं दी। श्रीकृष्ण यद्यपि समर्थ थे, तथापि वह मणि उन्होंने बलपूर्वक नहीं छीनी ॥ २६ ॥
कदाचिन्मृगयां यातः प्रसेनस्तेन भूषितः ।
स्यमन्तककृते सिंहाद् वधं प्राप वनेचरात् ॥ २७ ॥
प्रसेन एक समय उस मणिसे विभूषित होकर शिकार खेलने गये और मणिके कारण ही वनमें विचरण करनेवाले सिंहके द्वारा मारे गये ॥ २७ ॥
अथ सिंहं प्रधावन्तमृक्षराजो महाबलः ।
निहत्य मणिरत्नं तदादाय विलमाविशत् ॥ २८ ॥
तदनन्तर महाबली ऋक्षराज जाम्बवान्ने उस दौड़ते
हरिवंशपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः [ १३३
हुए सिंहको मार डाला और उस मणिरत्नको लेकर वे अपने बिल (गुफा) में घुस गये ॥ २८ ॥
ततो वृष्ण्यन्धकाः कृष्णं प्रसेनवधकारणात् ।
प्रार्थनां तां मणेर्बुद्ध्वा सर्व एव शशङ्किरे ॥ २९ ॥
उस समय प्रसेनके मारे जानेसे सभी वृष्णि और अन्धकोंने यह समझा कि श्रीकृष्णने सत्राजित्से मणि माँगी थी, अतएव उन्होंने ही उसको मार डाला होगा ॥ २९ ॥
स शङ्क्यमानो धर्मात्मा नाकारी तस्य कर्मणः ।
आहरिष्ये मणिमिति प्रतिज्ञाय वनं ययौ ॥ ३० ॥
यद्यपि उन्होंने यह कार्य नहीं किया था, फिर भी उन धर्मात्मापर ऐसी शंका की जा रही थी; अतएव 'मैं मणिको लाऊँगा' यह प्रतिज्ञा करके वे वनको चले ॥ ३० ॥
यत्र प्रसेनो मृगयामाचरत् तत्र चाप्यथ ।
प्रसेनस्य पदं गृह्य पुरुषैराप्तकारिभिः ॥ ३१ ॥
उन्होंने विश्वासी मनुष्योंसे जहाँ प्रसेनने शिकार खेला था, वहाँ उनके पैरोंके चिह्नोंका पता लगाया ॥ ३१ ॥
ऋक्षवन्तं गिरिवरं विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम् ।
अन्वेषयन् परिश्रान्तः स ददर्श महामनाः ॥ ३२ ॥
उन चिह्नोंके सहारे खोज लगाते-लगाते जब महामना श्रीकृष्ण थक गये, तब उन्होंने ऋक्षवान् और विन्ध्य-नामक श्रेष्ठ पर्वतोंको देखा ॥ ३२ ॥
साश्वं हतं प्रसेनं वै नाविन्दच्चेच्छितं मणिम् ।
अथ सिंहः प्रसेनस्य शरीरस्याविदूरतः ॥ ३३ ॥
ऋक्षेण निहतो दृष्टः पादैर्ऋक्षश्च सूचितः ।
पादैरन्वेषयामास गुहामृक्षस्य माधवः ॥ ३४ ॥
श्रीकृष्णने वहाँ प्रसेनको और उसके घोड़ेको मरा हुआ पाया; परंतु जिसकी उनको इच्छा थी, वह मणि उन्हें वहाँ नहीं मिली। तदनन्तर प्रसेनकी लाशसे थोड़ी दूरपर ही रीछके द्वारा मारा हुआ सिंह उन्हें पड़ा हुआ दीखा, मारनेवालेके पैरोंसे यह पता चलता था कि यह रीछ था। तदनन्तर माधवने रीछके पदचिह्नोंसे रीछकी गुफाको ढूँढ़ना आरम्भ किया ॥ ३३-३४ ॥
महत्यृक्षबिले वाणीं शुश्राव प्रमदेरिताम् ।
धात्र्या कुमारमादाय सुतं जाम्बवतो नृप ।
क्रीडापयन्त्या मणिना मा रोदीरित्यथेरिताम् ॥ ३५ ॥
राजन् ! उस समय श्रीकृष्णने (रीछके बिलके पास पहुँचनेपर) एक स्त्रीकी वाणी सुनी। उन्हें ऐसा लगा कि धाय जाम्बवान्के बालक पुत्रको लेकर मणिसे खिलाती हुई उससे कह रही थी, तू रो मत ॥ ३५ ॥
धात्र्युवाच
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः ।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥ ३६ ॥
धाय कह रही थी—मेरे मुन्ना ! सिंहने प्रसेनको मार डाला और सिंहको जाम्बवान्ने मार डाला; अब तू रो मत, यह स्यमन्तक मणि अब तेरी ही है ॥ ३६ ॥
सुव्यक्तीकृतशब्दस्तु तूष्णीं बिलमथाविशत् ।
प्रविश्य चापि भगवांस्तमृक्षबिलमञ्जसा ॥ ३७ ॥
स्थापयित्वा बिलद्वारि यदूल्लाँङ्गलिना सह ।
शार्ङ्गधन्वा बिलस्थं तु जाम्बवन्तं ददर्श ह ॥ ३८ ॥
जब धायकी बात उन्होंने स्पष्ट सुन ली, तब भगवान्ने बलरामको तथा यादवोंको तो गुफाके द्वारपर खड़ा कर दिया और स्वयं मौन होकर सीधे बिलमें जा घुसे। इस प्रकार शार्ङ्गधनुषधारी भगवान्ने गुफामें आगे बढ़कर जाम्बवान्को देखा ॥ ३७-३८ ॥
युयुधे वासुदेवस्तु बिले जाम्बवता सह ।
बाहुभ्यामथ गोविन्दो दिवसानेकविंशतिम् ॥ ३९ ॥
वसुदेवनन्दन गोविन्द जाम्बवान्के साथ अपनी भुजाओंसे ही इक्कीस दिनतक बिलमें युद्ध करते रहे ॥ ३९ ॥
प्रविष्टे तु बिलं कृष्णे बलदेवपुरःसराः ।
पुरीं द्वारवतीमेत्य हतं कृष्णं न्यवेदयन् ॥ ४० ॥
श्रीकृष्णके बिलमें प्रवेश करनेके बाद बहुत दिनोंतक न लौटनेपर बलदेव आदिने द्वारकामें जाकर कहा कि श्रीकृष्ण मारे गये ॥ ४० ॥
वासुदेवस्तु निर्जित्य जाम्बवन्तं महाबलम् ।
भेजे जाम्बवतीं कन्यामृक्षराजस्य सम्मताम् ।
मणिं स्यमन्तकं चैव जग्राहात्मविशुद्धये ॥ ४१ ॥
(उधर) श्रीकृष्णने महाबली जाम्बवान्को जीतकर ऋक्षराजकी प्यारी पुत्री जाम्बवतीसे विवाह किया और अपनी निर्दोषता सिद्ध करनेके लिये स्यमन्तकमणिको भी ले लिया ॥ ४१ ॥
| १३४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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अनुनीयर्क्षराजानं निर्ययौ च तदा बिलात् ।
द्वारकामगमत् कृष्णः श्रिया परमया युतः ॥ ४२ ॥
तदनन्तर श्रीकृष्ण जाम्बवान्से अनुनय-विनय करके बिलसे निकल आये और परम शोभा पाते हुए द्वारकाको चल दिये ॥ ४२ ॥
एवं स मणिमाहृत्य विशोध्यात्मानमच्युतः।
ददौ सत्राजिते तं वै सर्वसात्त्वतसंसदि ॥ ४३ ॥
भगवान् अच्युतने इस प्रकार मणिको लाकर सब सात्वतोंकी सभामें अपनी विशुद्धताको प्रमाणित कर वह मणि सत्राजित्को दे दी ॥ ४३ ॥
एवं मिथ्याभिशप्तेन कृष्णेनामित्रघातिना ।
आत्मा विशोधितः पापाद् विनिर्जित्य स्यमन्तकम् ॥
शत्रुनाशक श्रीकृष्णने इस प्रकार मिथ्या दोष लगानेके कारण स्यमन्तकमणिको जीतकर लानेके बाद अपने आपको निर्दोष सिद्ध कर दिया ॥ ४४ ॥
सत्राजितो दश त्वासन् भार्यास्तासां शतं सुताः ।
ख्यातिमन्तस्त्रयस्तेषां भङ्गकारस्तु पूर्वजः ॥४५॥
वीरो वातपतिश्चैव उपस्वावांश्च ते त्रयः ।
सत्राजित्के दस भार्याएँ थीं और उनसे सौ पुत्र हुए थे; उनमें तीन प्रसिद्ध थे, जिनमें सबसे बड़ा भङ्गकार था । (दूसरा) वीर वातपति था और तीसरेका नाम उपस्वावान् था ॥ ४५½ ॥
कुमार्यश्चापि तिस्रो वै दिक्षु ख्याता नराधिप ॥ ४६ ॥
सत्यभामोत्तमा स्त्रीणां व्रतिनी च दृढव्रता ।
तथा प्रस्वापिनी चैव भार्या कृष्णाय तां ददौ ॥ ४७ ॥
राजन् ! इसी प्रकार स्त्रियोंमें रत्नस्वरूपा सत्यभामा, दृढ़-व्रतधारिणी व्रतिनी और प्रस्वापिनी—ये उनकी तीन पुत्रियाँ थीं, जो दिशा-विदिशाओंमें प्रसिद्ध थीं । इनमेंसे उसने सत्यभामाका विवाह श्रीकृष्णके साथ कर दिया ॥ ४६-४७ ॥
समाक्षो भङ्गकारस्य नारेयश्च नरोत्तमौ ।
जज्ञाते गुणसम्पन्नौ विश्रुतौ रूपसम्पदा ॥ ४८ ॥
भङ्गकारके पुत्र समाक्ष और नारेय हुए, ये दोनों अपने रूप और गुणोंके कारण मनुष्योंमें उत्तम माने जाते थे ॥ ४८ ॥
माद्रीपुत्रस्य जज्ञेऽथ पृश्निः पुत्रो युधाजितः ।
जज्ञाते तनयौ पृश्नेः श्वफल्कश्चित्रकस्तथा ॥४९॥
(अब क्रोष्टाकी छोटी रानी माद्रीके पुत्र युधाजित्के वंशका वर्णन किया जाता है—) माद्रीकुमार युधाजित्के पुत्र पृश्नि हुए तथा पृश्निके पुत्र श्वफल्क और चित्रक हुए ॥ ४९ ॥
श्वफल्कः काशिराजस्य सुतां भार्यामविन्दत ।
गान्दिनीं नाम तस्याश्च सदा गाः प्रददौ पिता ॥ ५० ॥
श्वफल्कका विवाह काशिराजकी पुत्री गान्दिनीसे हुआ था; इन गान्दिनीके पिता अपनी पुत्रीसे प्रतिदिन गोदान कराया करते थे ॥ ५० ॥
तस्यां जज्ञे महाबाहुः श्रुतवानिति विश्रुतः ।
अक्रूरोऽथ महाभागो यज्वा विपुलदक्षिणः ॥ ५१ ॥
उन गान्दिनीसे महाभाग्यवान् अक्रूरजी उत्पन्न हुए, ये महाबाहु अक्रूर शास्त्रके रूपमें प्रसिद्ध थे, इन्होंने यज्ञ करके बड़ी-बड़ी दक्षिणाएँ दी थीं ॥ ५१ ॥
उपासङ्गस्तथा मद्रुर्मुदुरश्चारिमेजयः ।
अविक्षिप्तस्तथोपेश्रः शत्रुहा चारिमर्दनः ॥ ५२ ॥
धर्मधृग् यतिधर्मा च गृध्रो भोजोऽन्धकस्तथा ।
आवाहप्रतिवाहौ च सुन्दरी च वराङ्गना ॥ ५३ ॥
गान्दिनीके अक्रूरजीके अतिरिक्त उपासङ्ग, मद्रु, मृदुर, अरिमेजय, अविक्षिप्त, उपेक्ष, शत्रुघ्न, अरिमर्दन, धर्मधृक्, यतिधर्मा, गृध्र, भोज, अन्धक, आवाह और प्रतिवाह नामक पुत्र तथा वराङ्गना नामकी सुन्दरी कन्या भी उत्पन्न हुई थी ॥ ५२-५३ ॥
विश्रुता साम्यमहिषी कन्या चास्य वसुंधरा ।
रूपयौवनसम्पन्ना सर्वसत्त्वमनोहरा ॥ ५४ ॥
वे साम्बदेशकी रानी प्रसिद्ध हैं, इनकी रूप-यौवनसे सम्पन्न एवं सब प्राणियोंके मनको मोहित करनेवाली कन्याका नाम वसुन्धरा था ॥ ५४ ॥
अक्रूरेणोग्रसेन्यां तु सुतौ द्वौ कुरुनन्दन ।
प्रसेनश्चोपदेवश्च जज्ञाते देववर्चसौ ॥ ५५ ॥
कुरुनन्दन ! अक्रूरसे उग्रसेनीके द्वारा देवताके समान कान्तिवाले प्रसेन और उपदेव नामके दो पुत्र उत्पन्न हुए थे ॥ ५५ ॥
चित्रकस्याभवन् पुत्राः पृथुर्विपृथुरेव च ।
अश्वग्रीवोऽश्वबाहुश्च सुपार्श्वकगवेषणौ ॥ ५६ ॥
हरिवंशपर्व ] एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः [ १३५
अरिष्टनेमिरश्वश्च सुधर्मा धर्मभृत्तथा।
सुबाहुर्बहुबाहुश्च श्रविष्ठाश्रवणे स्त्रियौ ॥ ५७ ॥
(अक्रूरजीके चाचा) चित्रकके श्रवणा और श्रविष्ठा नामकी दो धर्मपत्नियों थीं, उनसे पृथु, विपृथु, अश्वग्रीव, अश्वबाहु, सुपार्श्वक, गवेषण, अरिष्टनेमि, अश्व, सुधर्मा, धर्मभृत्, सुबाहु और बहुबाहु नामक पुत्र हुए ॥ ५६-५७ ॥
इमां मिथ्याभिशस्तिं यः कृष्णस्य समुदाहृताम् ।
वेद मिथ्याभिशापास्तं न स्पृशन्ति कदाचन ॥ ५८॥
जो पुरुष श्रीकृष्णके इस मिथ्या कलंककी कथाको पढ़ता है, उसको झूठे दोष कभी नहीं लगते ॥ ५८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वण्यष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें (स्यमन्तकमणिकी कथाविषयक) अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥
एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
स्यमन्तकमणिके कारण प्रसेन, सत्राजित् और शतधन्वाका मारा जाना, बलदेवजीका दुर्योधनको गदा-विद्या सिखाना, अक्रूरजीका श्रीकृष्णको मणि देना और श्रीकृष्णका पुनः अक्रूरको मणि लौटा देना
वैशम्पायन उवाच
यत् तत् सत्राजिते कृष्णो मणिरत्नं स्यमन्तकम् ।
अदात् तद्धारयामास बभ्रुर्वै शतधन्वना ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीकृष्णने सत्राजित्को जो मणियोंमें रत्नस्वरूप स्यमन्तकमणि लौटाकर दी, बभ्रु (अक्रूर) उसको शतधन्वाके द्वारा चुरवाना चाहने लगे ॥ १ ॥
सदा हि प्रार्थयामास सत्यभामामनिन्दिताम् ।
अक्रूरोऽन्तरमन्विच्छन् मणिं चैव स्यमन्तकम् ॥ २ ॥
मणि सुवर्ण देती थी, इस कारण उसको चाहते हुए अक्रूर अनिन्द्य सुन्दरी सत्यभामाको भी सदा चाहते थे ॥ २ ॥
सत्राजितं ततो हत्वा शतधन्वा महाबलः ।
रात्रौ तं मणिमादाय ततोऽक्रूराय दत्तवान् ॥ ३ ॥
एक दिन मौका पाकर महाबली शतधन्वाने रात्रिमें सत्राजित्को मारकर वह मणि लाकर अक्रूरजीको दे दी ॥ ३ ॥
अक्रूरस्तु ततो रत्नमादाय भरतर्षभ ।
समयं कारयांचक्रे नावेद्योऽहं त्वयेत्युत ॥ ४ ॥
भरतर्षभ ! उस समय अक्रूरने रत्न लेकर शतधन्वासे प्रतिज्ञा करा ली कि आप किसीको यह न बतायें कि मणि मेरे पास है ॥ ४ ॥
वयमभ्युपयास्यामः कृष्णेन त्वामभिद्रुतम् ।
ममाद्य द्वारका सर्वा वशे तिष्ठत्यसंशयम् ॥ ५ ॥
जब श्रीकृष्ण (श्वशुरके वधसे क्रोधमें भरकर) आपके पीछे पड़ेंगे, तब हम भी आपके साथमे खड़े होकर लड़ेंगे। आजकल सारी द्वारका मेरे वशमें है, इसमें आप कुछ संदेह न समझें ॥ ५ ॥
हते पितरि दुःखार्ता सत्यभामा यशस्विनी ।
प्रययौ रथमारुह्य नगरं वारणावतम् ॥ ६ ॥
यशस्विनी सत्यभामा पिताके मारे जानेपर बड़ी दुखी हुईं और रथपर चढ़कर हस्तिनापुरको चली गयीं ॥ ६ ॥
सत्यभामा तु तद्वृत्तं भोजस्य शतधन्वनः ।
भर्तुर्निवेद्य दुःखार्ता पार्श्वस्थाश्रूण्यवर्तयत् ॥ ७ ॥
वहाँ दुखिया सत्यभामाने अपने पतिसे भोजवंशी शतधन्वाकी करतूत कह सुनायी और वे उनके पास खड़ी होकर नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं ॥ ७ ॥
पाण्डवानां तु दग्धानां हरिः कृत्वोदकक्रियाम् ।
कुल्यार्थे चापि पाण्डूनां न्ययोजयत् सात्यकिम् ॥ ८ ॥
उस समय श्रीकृष्ण (हस्तिनापुरमें थे और लाक्षागृहमें) भस्म हुए पाण्डवोंकी उदक-क्रिया कर चुके थे, इसके उपरान्त उन्होंने पाण्डवोंका अस्थि-संचयन करनेका कार्य सात्यकिको सौंप दिया ॥ ८ ॥
१३६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश
ततस्त्वरितमागत्य द्वारकां मधुसूदनः।
पूर्वजं हलिनं धीमानिदं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
तदनन्तर श्रीमान् कृष्णचन्द्रने तुरंत ही द्वारकापुरीमें आकर अपने बड़े भाई हलधरसे यह बात कही—॥ ९ ॥
हतः प्रसेनः सिंहेन सत्राजिच्छतधन्वना।
स्यमन्तकः स मद्गामी तस्य प्रभुरहं विभो ॥ १०॥
'प्रभो ! प्रसेनको सिंहने मार डाला था, शतधन्वाने सत्राजित्को मार डाला। अब इस मणिका उत्तराधिकार मुझे प्राप्त होता है; अब मैं उसका स्वामी हूँ ॥ १०॥
तदारोह रथं शीघ्रं भोजं हत्वा महाबलम्।
स्यमन्तको महाबाहो ह्यस्माकं स भविष्यति ॥ ११॥
'महाबाहो ! इसलिये अब आप शीघ्र ही रथपर चढ़िये; महाबली भोज (वंशी शतधन्वा) को मारनेके बाद वह स्यमन्तकमणि निस्सन्देह हमारी होगी'॥ ११ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं भोजकृष्णयोः।
शतधन्वा ततोऽक्रूरमैक्षत् सर्वतो दिशम् ॥ १२॥
तदनन्तर भोजवंशी शतधन्वा और श्रीकृष्णमें घमासान युद्ध प्रारम्भ हुआ। उस समय शतधन्वा सब दिशाओंमें अक्रूर-को देखने लगा ॥ १२ ॥
संरब्धौ तावुभौ दृष्ट्वा तत्र भोजनार्दनौ।
शक्तोऽपि शाठ्याद्धार्दिक्यमक्रूरो नाभ्यपद्यत ॥ १३ ॥
शतधन्वा और श्रीकृष्णको क्रोधमें भरा हुआ देखकर अक्रूर समर्थ होनेपर भी शठताके कारण हृदीकके पुत्र शतधन्वाकी सहायता करने नहीं गये ॥ १३ ॥
अपयाने ततो बुद्धिं भोजश्चक्रे भयार्दितः।
योजनानां शतं साग्रं हयया प्रत्यपद्यत ॥ १४ ॥
तब तो भयसे घबराया हुआ शतधन्वा भागनेका विचार करने लगा और वह घोड़ीपर चढ़कर चार सौ कोससे अधिक दूर निकल गया ॥ १४ ॥
विख्याता हृद्या नाम शतयोजनगामिनी।
भोजस्य वडवा राजन् यया कृष्णमयोधयत् ॥ १५ ॥
राजन् ! शतधन्वाने जिस घोड़ीपर चढ़कर श्रीकृष्णके साथ युद्ध किया था, उस घोड़ीका नाम हृद्या था और वह चार सौ कोसका धावा मारनेवालीके रूपमें प्रसिद्ध थी ॥१५॥
क्षीणां जवेन च हयामध्वनः शतयोजने।
दृष्ट्वा रथस्य तां वृद्धिं शतधन्वा समत्यजत् ॥ १६ ॥
घोड़ी वेगसे चलनेके कारण चार सौ कोसका मार्ग तय करनेके बाद थकन लगी। इधर शतधन्वाने श्रीकृष्णके रथको बढ़ते देखकर घोड़ीको छोड़ दिया (और वह पैदल भागने लगा) ॥ १६ ॥
ततस्तस्या हयायास्तु श्रमात् खेदाच्च भारत।
खमुत्पेतुस्तथ प्राणाः कृष्णो राममथाब्रवीत् ॥ १७ ॥
भारत ! तदनन्तर उस घोड़ीने श्रम और खेदके कारण अपने प्राणोंको छोड़ दिया। उस समय श्रीकृष्णने बलदेवजी-से कहा—॥ १७ ॥
तिष्ठस्त्वह महाबाहो दृष्टदोषा हया मया।
पद्भ्यां गत्वा हरिष्याम मणिरत्नं स्यमन्तकम्॥ १८॥
'महाबाहो ! घोड़े थक गये हैं, उनका यह दोष मैंने देख लिया है; अतः आप यहीं ठहरिये, मैं पैदल ही जाकर मणियोंमें रत्नस्वरूप स्यमन्तक-मणिको छीन लाऊँगा' ॥
पद्भ्यामेव ततो गत्वा शतधन्वानमच्युतः।
मिथिलामभितो राजन् जघान परमास्त्रवित् ॥ १९ ॥
राजन् ! तदनन्तर अस्त्रविद्याके पारगामी श्रीकृष्णने पैदल ही जाकर शतधन्वाको मिथिलानगरीके समीप मार डाला ॥
स्यमन्तकं च नापश्यद्धत्वा भोजं महाबलम्।
निवृत्तं चाब्रवीत् कृष्णं रत्नं देहीति लाङ्गली ॥ २० ॥
महाबली भोजवंशी शतधन्वाको मारनेपर भी श्रीकृष्णको स्यमन्तक-मणि न मिली। श्रीकृष्णके वापस आनेपर बलदेवजी-ने उनसे कहा कि 'वह मणि-रत्न दीजिये' ॥ २० ॥
नास्तीति कृष्णश्चोवाच ततो रामो रुषान्वितः।
धिक्शब्दमसकृत् कृत्वा प्रत्युवाच जनार्दनम् ॥ २१ ॥
तब श्रीकृष्णने कहा—'मणि तो वहाँ नहीं मिली' तब तो बलदेवजीने क्रोधमें भरकर बारंबार 'धिक्कार है ! धिक्कार है !!' कहकर श्रीकृष्णसे कहा—॥ २१ ॥
भ्रातृत्वान्मर्षयाम्येष स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम्।
कृत्यं न मे द्वारक्या न त्वया न च वृष्णिभिः ॥ २२ ॥
'भाई होनेके कारण आपकी इस करतूतको मैं सह रह
हरिवंशपर्व ] एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः १३७
हूँ, आपका कल्याण हो ! मैं चलता हूँ। अब मुझे द्वारकासे, आपसे और वृष्णिवंशियोंसे भी कोई काम नहीं है' ॥ २२ ॥
प्रविवेश ततो रामो मिथिलामरिर्मदनः।
सर्वकामैरुपहृतैर्मैथिलेनाभिपूजितः ॥ २३ ॥
तदनन्तर शत्रुमर्दन बलदेवजी मिथिलापुरीमे चले गये। वहाँ मिथिलानरेशने बहुत-से श्रेष्ठ पदार्थोंकी भेंट देकर बलदेवजीका स्वागत किया ॥ २३ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु बभ्रुर्मतिमंतां वरः।
नानारूपान् क्रतून् सर्वानजहार निरर्गलान् ॥ २४ ॥
इसी समय बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ बभ्रु (वंशी अक्रूरजी भी) अनेक प्रकारके बहुत-से यज्ञोंको धड़ल्लेके साथ करने लगे ॥
दीक्षामयं स कवचं रक्षार्थं प्रविवेश ह।
स्यमन्तकृते प्राज्ञो गान्दीपुत्रो महायशाः ॥ २५ ॥
महायशस्वी बुद्धिमान् गान्दीपुत्रने स्यमन्तकके लिये दीक्षारूपी कवचको अपनी रक्षाके लिये पहिन लिया (अर्थात् यज्ञमें दीक्षा लेनेवालेको युद्ध करनेका अधिकार नहीं होता, इसलिये उन्होंने युद्धसे बचनेका यह मार्ग निकाल लिया) ॥
अथ रत्नानि चाग्र्याणि द्रव्याणि विविधानि च।
षष्टि वर्षाणि धर्मात्मा यज्ञेषु विनियोजयत् ॥ २६ ॥
उसके बाद धर्मात्मा अक्रूरने साठ वर्षोंतक यज्ञोंमें अनेक प्रकारके द्रव्य और उत्तम रत्न दक्षिणारूपमें दिये ॥
अक्रूरयज्ञा इति ते ख्यातास्तस्य महात्मनः।
बह्वन्नदक्षिणाः सर्वे सर्वकामप्रदायिनः ॥ २७ ॥
उन महात्माके किये हुए वे सब यज्ञ अक्रूर-यज्ञोंके नामसे प्रसिद्ध हैं, उनमें बहुत-सा अन्न और बहुत-सी दक्षिणाएँ दी गयीं तथा उन सभी यज्ञोंमें ऋत्विजोंकी सब प्रकारकी कामनाएँ पूर्ण की गयीं ॥ २७ ॥
अथ दुर्योधनो राजा गत्वा तु मिथिलां प्रभुः।
गदाशिक्षां ततो दिव्यां बलभद्रादवाप्तवान् ॥ २८ ॥
इसी समय शक्तिशाली राजा दुर्योधनने मिथिलापुरीमें जाकर बलदेवजीसे दिव्य गदा-विद्याकी शिक्षा ग्रहण की ॥२८॥
प्रसाद्य तु ततो रामो वृष्ण्यन्धकमहारथैः।
आनीतो द्वारकामेव कृष्णेन च महात्मना ॥ २९ ॥
तदनन्तर वृष्णि और अन्धकवंशी महारथी तथा महात्मा श्रीकृष्ण बलरामजीको प्रसन्न करके द्वारकामें ही बुला लाये ॥
अक्रूरस्त्वन्धकैः सार्धमपायाद् भरतर्षभ।
हत्वा सत्राजितं सुप्तं सहबन्धुं महाबलम् ॥ ३० ॥
ज्ञातिभेदभयात् कृष्णस्तमुपेक्षितवानथ ।
अपयाते तथाक्रूरे नाववर्षत् पाकशासनः ॥ ३१ ॥
भरतश्रेष्ठ ! रात्रिमें सोये हुए महाबली सत्राजित् और उनके भाइयोंको शतधन्वाके द्वारा मरवाकर अक्रूर (अपने कुटुम्बी कतिपय) अन्धकवंशियोंको साथ लेकर भाग गये थे, किंतु श्रीकृष्णने जातिमें फूट पड़नेके भयसे उनकी उपेक्षा कर दी, परंतु अक्रूरके चले जानेपर इन्द्रदेवने वर्षा करना बंद कर दिया ॥ ३०-३१ ॥
अनावृष्ट्या यदा राज्यमभवद् बहुधा कृशम्।
ततः प्रसादयामासुरक्रूरं कुकुरान्धकाः ॥ ३२ ॥
जब अनावृष्टि होनेसे राज्यके मनुष्य प्रायः दुर्बल होने लगे, तब कुकुर और अन्धकवंशियोंने अक्रूरको अनुनय-विनय करके (द्वारका लौटनेके लिये) राजी कर लिया ॥ ३२ ॥
पुनर्द्वारवतीं प्राप्ते तस्मिन् दानपतौ ततः।
प्रववर्ष सहस्राक्षः कच्छे जलनिधेस्तदा ॥ ३३ ॥
फिर क्या था, उन दानपति अक्रूरके द्वारकापुरीमें वापस आते ही सहस्राक्ष इन्द्रने समुद्रके तटवर्ती प्रदेशपर जोरोंसे वर्षा करनी आरम्भ कर दी ॥ ३३ ॥
कन्यां च वासुदेवाय स्वसारं शीलसम्मताम्।
अक्रूरः प्रददौ धीमान् प्रीत्यर्थं कुरुनन्दन ॥ ३४ ॥
कुरुनन्दन ! बुद्धिमान् अक्रूरजीने अपनी शीलवती बहिनका, जो कुमारी थी, श्रीकृष्णके साथ उनको प्रसन्न करनेके लिये विवाह कर दिया ॥ ३४ ॥
अथ विज्ञाय योगेन कृष्णो बभ्रुगतं मणिम्।
सभांमध्ये गतं प्राह तमक्रूरं जनार्दनः ॥ ३५ ॥
तदनन्तर जनार्दन श्रीकृष्णने योगके द्वारा यह जानकर कि मणि अक्रूरके पास है, सभामे बैठे हुए अक्रूरसे (एक दिन) कहा—॥ ३५ ॥
यत् तद् रत्नं मणिवरं तव हस्तगतं विभो।
तद् प्रयच्छस्व मानार्ह मयि मानार्यकं कृथाः ॥ ३६ ॥
| १३८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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‘माननीय विभो ! जो मणिरत्न स्यमन्तक आपके पास है, आप उसे दे दीजिये, अनार्यताका व्यवहार न कीजिये ॥
षष्टिवर्षे गते काले यद्रोषोऽभून्ममानघ ।
स संरूढोऽसकृत्प्राप्तस्ततः कालात्ययो महान् ॥ ३७ ॥
‘निष्पाप अक्रूरजी ! साठ वर्ष पहले (मणिके कारणसे) जो रोष मुझे चढ़ा था, वही रोष बहुत समय बीतनेपर भी मुझे फिर बार-बार आ रहा है (अतः उस मणिको मुझे दे दीजिये), ॥ ३७ ॥
ततः कृष्णस्य वचनात् सर्वसात्वतसंसदि ।
प्रददौ तं मणिं बभ्रुरक्लेशेन महामतिः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीकृष्णके कहनेपर महान्बुद्धिमान् अक्रूरजीने सम्पूर्ण सात्वतोंकी सभामें वह मणि बिना कष्ट पाये ही श्रीकृष्णको अर्पण कर दी ॥ ३८ ॥
ततस्तमार्जवप्राप्तं बभ्रोर्हस्तादरिंदमः ।
ददौ हृष्टमनाः कृष्णस्तं मणिं बभ्रुवे पुनः ॥ ३९ ॥
तदनन्तर अक्रूरजीके हाथसे सरलतापूर्वक मणि पा जानेपर अरिदमन श्रीकृष्णने मनमें प्रसन्न होकर वह मणि फिर अक्रूरजीको दे दी ॥ ३९ ॥
स कृष्णहस्तात् सम्प्राप्तं मणिरत्नं स्यमन्तकम् ।
आबध्य गान्दिनीपुत्रो विरराजांशुमानिव ॥ ४० ॥
तब श्रीकृष्णके हाथसे मिली हुई मणिरत्न स्यमन्तक-मणिको गलेमें बाँधकर गान्दिनीपुत्र अक्रूर सूर्यके समान सुशोभित हुए ॥ ४० ॥
यस्त्वेवं शृणुयान्नित्यं शुचिर्भूत्वा समाहितः ।
सुखानां सकलानां च फलभागीह जायते ॥ ४१ ॥
इस प्रकार जो मनुष्य पवित्र होकर सावधानतापूर्वक इस कथाको नित्यप्रति सुनता है, उसको फलरूपमें सम्पूर्ण सुख प्राप्त होते हैं ॥ ४१ ॥
आ ब्रह्मभुवनाञ्चापि यशःख्यातिर्न संशयः ।
भविष्यति नृपश्रेष्ठ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ४२ ॥
नृपश्रेष्ठ ! उसकी कीर्ति ब्रह्मलोकतक पहुँचती है, इसमें कुछ संदेह नहीं है, यह मैं आपसे सत्य कह रहा हूँ ॥ ४२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वण्ये-
कोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें (बलदेवजीके द्वारा दुर्योधनको गदा-विद्याकी शिक्षाविषयक) उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥
चत्वारिंशोऽध्यायः
जनमेजयका भगवान्के वराह, नृसिंह, परशुराम, श्रीकृष्ण आदि अवतारोंका रहस्य पूछना
जनमेजय उवाच
प्रादुर्भावान् पुराणेषु विष्णोरमिततेजसः ।
सतां कथयतामेष वाराह इति नः श्रुतम् ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा— ब्रह्मन् ! मैंने कथा कहनेवाले सज्जनोंके मुखसे अमिततेजस्वी विष्णुके अवतारोंमें वराह अवतारकी भी बात पुराणोंमें सुनी है (वराह शब्दका आध्यात्मिक अर्थ वर और अह अर्थात् श्रेष्ठ यज्ञ है) ॥ १ ॥
न जाने तस्य चरितं न विधिं नैव विस्तरम् ।
न कर्मगुणसंतानं न हेतुं न मनीषितम् ॥ २ ॥
परंतु मैं उन वराह भगवान्के (सर्वकार्य जनकस्वरूप) चरित्रको, (अपूर्वस्वरूपका आविष्कार करनेकी) विधिको, (अनुष्ठानकी आवश्यकता रूप) विस्तारको तथा उनके कर्म (अर्थात् उसके कर्मसे तृप्त होनेवाले देवता आदि) तथा गुण-देश-द्रव्य-काल आदि एवं संतान (प्रयोगविधि) को, हेतु अर्थात् अधिकारको और वे किस अभिप्रायसे त्यागात्मक स्वरूपको ग्रहण करते हैं, उसे मैं कुछ नहीं समझता (अतः आप मुझे ये सब बातें समझाइये) ॥ २ ॥
हरिवंशपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः [ १३९
किमात्मको वराहः स का मूर्तिः का च देवता ।
किमाचारः प्रभावो वा किं वा तेन पुरा कृतम् ॥ ३ ॥
(इस प्रकार वराहावतारके अधियज्ञस्वरूपकी बात पूछनेके अनन्तर अब राजा जनमेजय उनके आधिदैविक रूपके विषयमें पूछते हैं—) उन वराहका वास्तविक स्वरूप क्या है ? उनकी मूर्ति (बाहरी आकृति) कैसी है ? उनका (अधिष्ठातृ) देवता कौन है ? उनके कर्म क्या हैं ? उनका प्रभाव कैसा है और उन्होंने उस अवतारमें क्या किया था ? ॥ ३ ॥
यज्ञार्थं समवेतानां मिषतां च द्विजन्मनाम् ।
महावराहचरितं कृष्णद्वैपायनेरितम् ॥ ४ ॥
मैंने कृष्णद्वैपायनजीका कहा हुआ महावराहका चरित्र यज्ञमें एकत्रित हुए ब्राह्मणोंके वाद-विवादमे सुना है (परंतु उसका तत्त्व मेरी समझमें नहीं आया) ॥ ४ ॥
यथा नारायणो ब्रह्मन् वाराहं रूपमास्थितः ।
दंष्ट्रया गां समुद्रस्थामुज्जहारारिसूदनः ॥ ५ ॥
ब्रह्मन् ! भगवान् नारायणने जिस प्रकार वराहरूप धारण किया और उन अरिसूदन भगवान्ने जिस प्रकार अपनी दाँढ़से समुद्रके गर्भमें पड़ी हुई पृथ्वीका उद्धार किया, यह सब मुझे आप बतानेकी कृपा करें ॥ ५ ॥
विस्तरेणैव कर्माणि सर्वाणि रिपुघातिनः ।
श्रोतुमिच्छाम्यशेषेण हरेः कृष्णस्य धीमतः ॥ ६ ॥
मै शत्रुसंहारक परम ज्ञानी हरिरूप भगवान् श्रीकृष्णके (वराह आदि सब अवतारोंमें किये हुए) सभी चरित्रोंको विस्तारपूर्वक पूर्णरीतिसे सुनना चाहता हूँ ॥ ६ ॥
कर्मणामानुपूर्व्याच्च प्रादुर्भावाश्च ये विभोः ।
या चास्य प्रकृतिर्ब्रह्मांस्तां मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ७ ॥
ब्रह्मन् ! लीलाओंके क्रमसे इन सर्वव्यापी भगवान्के जितने भी हुए हैं अवतार उन सबकी और (उन अवतारोंके समय उनकी) जो प्रकृति थी उसकी आप कृपा करके व्याख्या कीजिये ॥ ७ ॥
कथं च भगवान् विष्णुः सुरशत्रुनिषूदनः ।
वसुदेवकुले धीमान् वासुदेवत्वमागतः ॥ ८ ॥
फिर देवताओंके शत्रुओंका नाश करनेवाले परम चतुर भगवान् विष्णु वसुदेवके कुलमें उत्पन्न होकर वासुदेव क्यों कहलाये (अर्थात् वे कर्मबन्धनसे रहित होनेपर भी उत्तम स्थानसे नीचे स्थानमें क्यों आये) ? ॥ ८ ॥
अमरैरावृतं पुण्यं पुण्यकृद्भिर्निषेवितम् ।
देवलोकं समुत्सृज्य मर्त्यलोकमिहागतः ॥ ९ ॥
वे देवताओंसे घिरे हुए एवं पुण्यात्माओंद्वारा सेवित पवित्र देवलोकको छोड़कर इस मृत्युलोकमें क्यों आये ? ॥ ९ ॥
देवमानुष्ययोर्नेता यो भुवः प्रभवो विभुः ।
किमर्थं दिव्यमात्मानं मानुष्ये संन्ययोजयत् ॥ १० ॥
जो देवता और मनुष्योंके नेता हैं और जो विभु पृथ्वीके भी उत्पत्तिस्थान हैं, उन्होंने अपने दिव्य आत्माको मनुष्य-शरीरमें क्यों स्थापित किया ? ॥ १० ॥
यच्चक्रं वर्तयत्येको मानुषाणामनामयम् ।
मानुष्ये स कथं बुद्धिं चक्रे चक्रभृतां वरः ॥ ११ ॥
जो अकेले ही सब मनुष्योंके (कर्मसे जन्म और जन्मसे पुनः कर्मरूप) चक्रको निर्विघ्नतापूर्वक चलाते हैं, उन चक्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णने मनुष्य बननेका विचार क्यों किया ? ॥ ११ ॥
गोपायनं यः कुरुते जगतः सार्धलौकिकम् ।
स कथं गां गतो देवो विष्णुर्गोपत्वमागतः ॥ १२ ॥
जो जगत्के सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा करते हैं, वे भगवान् विष्णु पृथ्वीपर आकर गोप कैसे बन गये ? ॥ १२ ॥
महाभूतानि भूतात्मा यो दधार चकार च ।
श्रीगर्भः स कथं गर्भे स्त्रिया भूचरया धृतः ॥ १३ ॥
जो समस्त भूतोंके अन्तरात्मा प्रभु स्वयं महाभूतोंको रचते और धारण करते हैं, उन श्रीगर्भको पृथ्वीपर विचरण करनेवाली स्त्रीने अपने गर्भमें किस प्रकार धारण किया ? ॥ १३ ॥
येन लोकान् क्रमैर्जित्वा त्रिभिस्त्रींस्त्रिदशेप्सया ।
स्थापिता जगतो मार्गास्त्रिवर्गप्रभवाश्रयाः ॥ १४ ॥
१४० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
जिन्होंने देवताओंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये तीन पैंड़ों-से तीनों लोकोंको जीतकर जगत्में धर्म, अर्थ और कामसे प्राप्त होनेवाले तीन मार्ग—तीन गतियाँ स्थापित कर दीं (धर्म-से स्वर्ग अर्थात् ऊर्ध्वगति, अर्थसे मर्त्यलोक अर्थात् मध्यम-गति और कामसे नरकादि अधोलोक अर्थात् अधोगति मिलती है); ॥ १४ ॥
ब्रह्मन् ! प्रत्येक युगमें जिन भगवान्को सहस्र अर्थात् अनन्त सिरवाला, अनन्त आँखोंवाला, अनन्त दान करने-वाला और अनन्त चरणोंवाला कहा जाता है, ॥ २० ॥
योऽन्तकाले जगत् पीत्वा कृत्वा तोयमयं वपुः ।
लो कमेकार्णवं चक्रे दृश्यादृश्येन वर्त्मना ॥ १५ ॥
जो भगवान् प्रलयकालमें दृश्य एवं अदृश्य रीतिसे (कारणसहित) सम्पूर्ण जगत्का पान (ग्रास) करके अपने शरीरको जलमय बनाकर सम्पूर्ण जगत्को एक जलमय ही कर देते हैं, ॥ १५ ॥
नाभ्यारण्यां समुत्पन्नं यस्य पैतामहं गृहम् ।
एकार्णवजलस्थस्य नष्टे स्थावरजङ्गमे ॥ २१ ॥
स्थावर-जङ्गमात्मक जगत्के लीन होनेपर जिन एक समुद्रमय जलमें स्थित पुरुषकी नाभिसे प्रकट होनेवाले कमल-नालरूप अरणि (मन्थनदण्ड) से पितामहका भवन (लोक-कमल) उत्पन्न हुआ, ॥ २१ ॥
यः पुराणे पुराणात्मा वाराहं रूपमास्थितः ।
विषाणाग्रेण वसुधामुज्जहारा रिसूदनः ॥ १६ ॥
प्राचीन समयमें जिन पुराणात्मा अरिसूदन भगवान्ने वराहके रूपमें अपने दाँतोंके अग्रभागसे पृथ्वीका उद्धार किया, ॥ १६ ॥
येन ते निहता दैत्याः संग्रामे तारकामये ।
सर्वदेवमयं कृत्वा सर्वायुधधरं वपुः ॥ २२ ॥
जिन्होंने तारकामय संग्राममें अपने शरीरको सर्वदेवमय और सर्वायुधधारी बनाकर दैत्योंको मार डाला, ॥ २२ ॥
यः पुरा पुरुहूतार्थे त्रैलोक्यमिदमव्ययः ।
ददौ जित्वासुरगणान् सुराणां सुरसत्तमः ॥ १७ ॥
पहले जिन अविनाशी सुरश्रेष्ठने इन्द्रके लिये असुरोंकी सेनाको जीतकर देवताओंको तीनों लोक (वापस) दिला दिये, ॥ १७ ॥
गरुडस्थेन चोत्सिक्तः कालनेमिर्निपातितः ।
निर्जितश्च मयो दैत्यस्तारकश्च महासुरः ॥ २३ ॥
जिन्होंने गरुड़पर बैठकर उद्दण्ड कालनेमिको नष्ट कर दिया तथा मय दैत्य और महान् असुर तारकको मार डाला, ॥ २३ ॥
येन सैंहं वपुः कृत्वा द्विधा कृत्वा च तत् पुनः ।
पूर्वं दैत्यो महावीर्यो हिरण्यकशिपुर्हतः ॥ १८ ॥
जिन्होंने पूर्वकालमें सिंहका रूप धारणकर और फिर उसको दो प्रकारका अर्थात् नरसिंहरूप बनाकर महान् परा-क्रमी दैत्य हिरण्यकशिपुको मार डाला, ॥ १८ ॥
उत्तरान्ते समुद्रस्य क्षीरोदस्यामृतोदधेः ।
यः शेते शाश्वतं योगमास्थाय तिमिरं महत् ॥ २४ ॥
जो क्षीरसमुद्रके उत्तर तटपर स्थित अमृत-समुद्रमे योग-मायारूप शाश्वत योगका आश्रय लेकर शयन करते हैं, ॥ २४ ॥
यः पुरा ह्यनलो भूत्वा और्वः संवर्तको विभुः ।
पातालस्थोऽर्णवगतं पपौ तोयमयं हविः ॥ १९ ॥
जिन विभुने पहले (प्रलयकालमे) पातालमें जाकर और्ववंशी संवर्तक अग्निका स्वरूप धारण कर समुद्रके जल-रूप हवि (घी) का पान कर लिया, ॥ १९ ॥
सुरारणिर्गर्भमधत्त दिव्यं
तपःप्रकर्षाददितिः पुराणम् ।
शक्रं च यो दैत्यगणावरुद्धं
गर्भावसाने निभृतं चकार ॥ २५ ॥
देवताओंको उत्पन्न करनेवाली अरणिरूपा अदितिने महा-तप करके जिन पुराणपुरुष (वामन) रूपी गर्भको धारण किया और जिन्होंने गर्भसे निकलनेके बाद दैत्योंके चक्रमें फँसे हुए इन्द्रको दैत्योंके चक्रसे मुक्त करके पूर्णकाम बना दिया, ॥ २५ ॥
सहस्रशिरसं ब्रह्मन् सहस्राक्षं सहस्रदम् ।
सहस्रचरणं देवं यमाहुर्वै युगे युगे ॥ २० ॥
पदानि यो लोकमयानि कृत्वा
चकार दैत्यान् सलिलेशयांस्तान् ।
हरिवंशपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः १४१
कृत्व च देवांस्त्रिदिवस्य देवां-
श्चक्रे सुरेशां त्रिदशाधिपत्ये ॥ २६ ॥
जिन्होंने अपने डगोंको लोकमय करके अर्थात् एक-एक डगसे एक-एक लोकको नापकर दैत्योंको पातालमें भेज दिया, देवताओंको स्वर्गका विहार करनेवाला बना दिया और देवराज इन्द्रको देवताओंके सम्राट्-पदपर स्थापित कर दिया, ॥ २६ ॥
पात्राणि दक्षिणा दीक्षा चमसोल्लूखलानि च ।
गार्हपत्येन विधिना अन्वाहार्येण कर्मणा ॥ २७ ॥
जिन्होंने गृह्यसूत्रोंमें कही हुई विधि तथा अन्वाहार्य-कर्म * के साथ (यज्ञोपयोगी) चमस, उलूखल आदि पात्र, दक्षिणा और दीक्षा आदिकी रचना की, ॥ २७ ॥
अग्निमाहवनीयं च वेदीं चैव कुशां स्रुवम् ।
प्रोक्षणीयं ध्रुवां चैव आवभृथ्यं तथैव च ॥ २८ ॥
जिन्होंने आहवनीय अग्नि, वेदी, स्रुवा, कुशाएँ, प्रोक्षणीपात्र, ध्रुवा और अवभृथ स्नानोपयोगी सामग्रीकी कल्पना की, ॥ २८ ॥
- सुधात्रीणि च यज्ञक्रे हव्यकव्यप्रदान् द्विजान् ।
हव्यादांश्च सुरान् यज्ञे क्रव्यादांस्तु पितॄनपि ॥ २९ ॥
जिन्होंने (ऊर्ध्व, मध्य और अधोगतिरूप) सुधा आदि तीन भोग्य पदार्थ बनाकर ब्राह्मणोंको हव्य-कव्य प्रदान करनेवाला, देवताओंको यज्ञमें हवि भक्षण करनेवाला और पितरोंको (श्राद्धादिमें अर्पण किये जानेवाले पिण्ड आदि) कव्य भक्षण करनेवाला बनाया, ॥ २९ ॥
भागार्थे मन्त्रविधिना यज्ञक्रे यज्ञकर्मणि ।
यूपान् समित् स्रुचं सोमं पवित्रान् परिधीनपि ॥ ३० ॥
जिन्होंने (देवताओंका) भाग निकालनेके लिये मन्त्रके प्रयोगकी विधिके साथ-साथ यज्ञकर्ममें यूप, समिधा, स्रुवा, सोम, पवित्र (पैंती) एवं परिधियोंकी कल्पना की, ॥ ३० ॥
यज्ञियानि च द्रव्याणि यज्ञांश्च सचयानलान् ।
सदस्यान् यजमानांश्च मेध्यादींश्च ऋतूत्तमान् ॥ ३१ ॥
विबभाज पुरा सर्वं पारमेष्ठयेन कर्मणा ।
युगानुरूपान् यः कृत्वा लोकाननुपराक्रमत् ॥ ३२ ॥
जिन्होंने यज्ञोपयोगी द्रव्य, यज्ञ, ईंटोंके बने अग्नि-स्थापनके स्थान तथा आहवनीय आदि तीन प्रकारकी अग्नियां, सदस्य (यज्ञकर्मका निरीक्षण करनेवाले ब्राह्मण), यजमान, उत्तम यज्ञ एवं मेध्य आदि पदार्थोंका ब्रह्माजीकी प्रचलित की हुई विधिसे विभाग किया और जिन्होंने लोकोंको युगोंके अनुरूप बनाकर फिर अपना हाथ हटा लिया, ॥ ३१-३२॥
क्षणा लवाश्च काष्ठाश्च कलाश्चैकाल्यमेव च ।
मुहूर्तास्तिथयो मासाः पक्षाः संवत्सरास्तथा ॥ ३३ ॥
ऋतवः कालयोगाश्च प्रमाणं त्रिविधं त्रिपु ।
आयुः क्षेत्राण्युपचयो लक्षणं रूपसौष्ठवम् ॥ ३४ ॥
जिन्होंने क्षण, लव, काष्ठा, कला, (प्रातः, मध्याह्न और सायंकालरूप) तीन काल, मुहूर्त, तिथि, मास, पक्ष, वर्ष, ऋतु, कालके विविध योग, (नित्य, नैमित्तिक और काम्य इन) तीन प्रकारके (प्रमेय) कर्मोंमें (श्रुति, स्मृति, शिष्टाचाररूप) तीन प्रकारका प्रमाण, आयु, क्षेत्र (स्थावर-जङ्गम शरीर), वृद्धि, (दो पैर, चार पैर आदि) लक्षण और आकृतिकी सुन्दरता रची, ॥ ३३-३४ ॥
त्रयो वर्णास्त्रयो लोकास्त्रैविद्यं पावकास्त्रयः ।
त्रैकाल्यं त्रीणि कर्माणि त्रयोऽपायास्त्रयो गुणाः ॥३५॥
जिन्होंने तीन वर्ण (शूद्रको यज्ञ करनेका अधिकार नहीं है, अतः उसका ग्रहण नहीं किया), (भू आदि) तीन लोक, (ऋक्, यजुः, सामरूप) तीन विद्याएँ, (गार्हपत्य, आहवनीय एवं दक्षिण नामकी) तीन अग्नियां, (भूत, भविष्यत्, वर्तमानरूप) तीन काल, (सात्त्विक, राजस और तामसरूप) तीन कर्म, (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणारूप) तीन अपाय और (सत्त्व, रज, तमरूप) तीन गुण रचे, ॥ ३५ ॥
त्रयो लोकाः पुरा सृष्टा येनानन्त्येन कर्मणा ।
सर्वभूतगणस्रष्टा सर्वभूतगुणात्मकः ॥ ३६ ॥
जिन्होंने (जीवोंके) अनन्त कर्मोंके कारण तीन लोकोंकी रचना की, (साथ ही) जो सब प्राणियोंको रचनेवाले हैं और जिनमें सब भूतोंके गुण रहते हैं, ॥ ३६ ॥
नृणामिन्द्रियपूर्वेण योगेन रमते च यः ।
गतागताभ्यां यो नेता सर्वत्र जगदीश्वरः ॥ ३७ ॥
जो जगदीश्वर समस्त ब्रह्माण्डमें जीवात्माको जन्म-मृत्यु देनेके कारण सबके नेता हैं और जो (जीवरूपसे) इन्द्रियोंका विषयोंके साथ संयोग करके सर्वत्र रमण करते हैं, ॥ ३७ ॥
* पितरोंके निमित्तसे प्रति अमावास्याको किया जानेवाला मासिक श्राद्ध।