विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
| १४२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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यो गतिर्धर्मयुक्तानामगतिः पापकर्मणाम्।
चातुर्वर्ण्यस्य प्रभवश्चातुर्होत्रस्य रक्षिता ॥ ३८ ॥
जो धर्म करनेवालोंकी गति (गन्तव्य स्थान) हैं और पापकर्म करनेवालोंकी अगति हैं अर्थात् पापकर्म करनेवाले जिनको नहीं पा सकते, जो चारों वर्णोंके उत्पत्तिस्थान हैं (यह बात ‘ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्’ आदि श्रुतिको लक्ष्य करके कही गयी है) और जो (जिसमें चार ऋत्विज् हवन करते हैं ऐसे) चातुर्होत्र (यज्ञ) के रक्षक हैं, ॥ ३८ ॥
चातुर्विद्यस्य यो वेत्ता चातुराश्रम्यसंश्रयः ।
दिगन्तरो नभोभूतो वायुरापो विभावसुः ॥ ३९ ॥
जो (आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीतिरूप) चार विद्याओंके ज्ञाता हैं, जो (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यासरूप) चारों आश्रमोंके आश्रय हैं (अर्थात् जिनकी प्राप्तिके लिये चारों आश्रमोंके धर्मोंका पालन किया जाता है) और दिशाएँ जिनके गर्भमें रहती हैं (अर्थात् जो दिशाओंको भी अवकाश देते हैं) तथा जो वायु, आकाश, जल, अग्नि और पृथिवीरूप हैं, ॥ ३९ ॥
यश्चन्द्रसूर्ययोर्ज्योतिर्योगीशः क्षणदान्तकः ।
यत् परं श्रूयते ज्योतिर्यत् परं श्रूयते तपः ॥ ४० ॥
जो चन्द्रमा और सूर्यको भी ज्योति देनेवाले हैं, योगीश्वर हैं, (मोहरूपी) रात्रिका अन्त करनेवाले हैं, जो परम ज्योतिःस्वरूप सुने जाते हैं अर्थात् जिनका ज्योतिःस्वरूप नेत्र सर्वत्र सब कुछ देखता है और जो परम तपःस्वरूप सुने जाते हैं अर्थात् जो परम तपस्याके द्वारा प्राप्त होते हैं, ॥ ४० ॥
यं परं प्राहुरपरं यः परः परमात्मवान् ।
नारायणपरा वेदा नारायणपराः क्रियाः ॥ ४१ ॥
जिनको पर (सूत्रात्मा) और अपर (विराट्) भी कहते हैं और जो परात्पर हैं अर्थात् सूत्रात्मासे भी पर माया सम्पन्न महेश्वर सगुण ब्रह्म हैं, आत्मवान् हैं अर्थात् आत्माके समान ही मायारूपी शरीरवाले हैं। वेद नारायणका ही निरूपणकरते हैं। सभी क्रियाओंका पर्यवसान भी नारायणमें ही होता है ॥ ४१ ॥
नारायणपरो धर्मो नारायणपरा गतिः ।
नारायणपरं सत्यं नारायणपरं तपः ॥ ४२ ॥
धर्मका लक्ष्य भी नारायण हैं, सम्पूर्ण गतियोंकी परम गति नारायण हैं, नारायण ही सत्यके आधार हैं और नारायण ही तपके द्वारा प्राप्य हैं ॥ ४२ ॥
नारायणपरो मोक्षो नारायणपरायणम् ।
आदित्यादिस्तु यो दिव्यो यश्च दैत्यान्तको विभुः ॥ ४३ ॥
नारायण ही मोक्षके आधार हैं। नारायण ही परम आश्रयरूप हैं। जो प्रभु आकाशमें विचरण करनेवाले आदित्य आदि ग्रहोंके स्वरूपमें स्थित हैं और दैत्योंका संहार करनेवाले हैं ॥ ४३ ॥
युगान्तेध्वन्तको यश्च यश्च लोकान्तकान्तकः ।
सेतुर्यो लोकसेतूनां मेध्यो यो मेध्यकर्मणाम् ॥ ४४ ॥
जो प्रलयके समय कालका रूप धारण कर लेते हैं, संसारका अन्त करनेवाले यमके भी यम हैं, मृत्युकी भी मृत्यु हैं, लोकोंकी मर्यादा बाँधनेवाले (मनु आदिके भी) सेतु हैं अर्थात् मनु आदिको भी मर्यादामें रखनेवाले हैं और पवित्र करनेवाले (गङ्गा आदि तीर्थों) को भी पवित्र करनेवाले हैं ॥
वेद्यो यो वेदविदुषां प्रभुर्यः प्रभवात्मनाम् ।
सोमभूतस्तु सौम्यानामग्निभूतोऽग्निवर्चसाम् ॥ ४५ ॥
जो वेदके ज्ञाताओंद्वारा जानने योग्य हैं, प्रभुत्व स्वभाववाले (मरीचि आदि) के भी प्रभु हैं और जो सौम्य पुरुषोंमें चन्द्रमाकी भाँति प्रियदर्शन हैं, जो अग्निके समान तेजस्वी पुरुषोंमें अग्निस্বরূপ हैं ॥ ४५ ॥
मनुष्याणां मनोभूतस्तपोभूतस्तपस्विनाम् ।
विनयो नयवृत्तीनां तेजस्तेजस्विनामपि ।
सर्गाणां सर्गकारश्च लोकहेतुरनुत्तमः ॥ ४६ ॥
जो मनुष्योंके मनरूप हैं, तपस्वियोंके तपरूप हैं, जो नीतिमान् पुरुषोंमें नम्रतारूपसे विराजमान रहते हैं और तेजस्वियोंमें तेजःस्वरूप हैं और जो सृष्टियोंके रचनेवाले तथा संसारके सर्वश्रेष्ठ कारण हैं ॥ ४६ ॥
विग्रहो विग्रहार्हाणां गतिर्गतिमत्तामपि ।
आकाशप्रभवो वायुर्वायुप्राणो हुताशनः ॥ ४७ ॥
जो शरीर धारण करके अवतार लेनेवाले देवताओंके विग्रहरूप हैं, गतिमानोंकी गति हैं, आकाशमे उत्पन्न होनेवाले वायु हैं तथा वायुसे जीनेवाले अग्निस্বরূপ हैं ॥ ४७ ॥
देवा हुताशनप्राणाः प्राणोऽग्नेर्मधुसूदनः ।
रसाद् वै शोणितं जातं शोणितान्मांसमुच्यते ॥ ४८ ॥
[ हरिवंशपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः १४३
अग्नि देवताओंके प्राण हैं और मधुसूदन अग्निके भी प्राण हैं। (ये अग्निके प्राण बनकर अग्निके द्वारा क्या करते हैं, इसको स्पष्ट करते हुए कहते हैं, अग्निके द्वारा पृथक् किये हुए अन्नके साररूप) रससे रक्त बनता है (और उससे क्रमशः वीर्य बनकर गर्भ रहता है, इस प्रकार वह अग्निके प्राण बनकर अग्निके द्वारा सारा सृष्टिकार्य चलाते हैं) और रक्तसे मांस बनता है ॥ ४८ ॥
मांसात्तु मेदसो जन्म मेदसोऽस्थीनि चैव हि ।
अस्थ्नो मज्जा समभवन्मज्जातः शुक्रमेव च ॥ ४९ ॥
मांससे मेद (चर्बी) की उत्पत्ति होती है और मेदसे अस्थियोंकी उत्पत्ति होती है, हड्डियोंसे मज्जा बनती है और मज्जासे वीर्यकी उत्पत्ति होती है ॥ ४९ ॥
शुक्राद् गर्भः समभवद् रसमूलेन कर्मणा ।
तत्रापां प्रथमो भागः स सौम्यो राशिरुच्यते ॥ ५० ॥
गर्भोष्मसम्भवोऽग्निर्यो द्वितीयो राशिरुच्यते ।
शुक्रं सोमात्मकं विद्यादार्तवं विद्धि पावकम् ॥ ५१ ॥
रसमूल कर्मके द्वारा वीर्यसे गर्भ रहता है, उसमें प्रथम भाग जलका अंश (वीर्य होता है, वह श्वेत होनेसे) सौम्य होता है, जलप्रधान सोमका अंश होता है और गर्भकी गरमी-से अर्थात् जठराग्निसे उत्पन्न हुआ (रक्तरूप) जो दूसरा भाग उसमें रहता है, वह (रक्त-राशि) अग्निका अंश कहलाता है। (इस प्रकार) वीर्यको सोमका अंश और रज-को अग्निका अंश समझना चाहिये ॥ ५०-५१ ॥
भागौ रसात्मकौ ह्येषां वीर्ये च शशिपावकौ ।
कफवर्गे भवेच्छुक्रं पित्तवर्गे च शोणितम् ॥ ५२ ॥
कफस्य हृदयं स्थानं नाभ्यां पित्तं प्रतिष्ठितम् ।
(पूर्वोक्त रीतिसे) ये दोनों रसके ही भाग हैं, क्योंकि शशि और पावक अर्थात् शुक्र और शोणित इन रस आदिके ही सार हैं। (अब जगत्के अग्निषोमात्मकस्वरूपको सिद्ध करते हैं) शुक्र (वीर्य) कफवर्गमें है और रक्त पित्तवर्गमें है। (वीर्यके आश्रयसे रहनेवाले और जिसका देवता सोम है, ऐसे) कफका स्थान हृदय है। (रक्तके आश्रयसे रहनेवाले और जिसका देवता अग्नि है, ऐसे) पित्तका स्थान नाभि है ॥ ५२½ ॥
देहस्य मध्ये हृदयं स्थानं तन्मनसः स्मृतम् ।
नाभिकोष्ठान्तरं यत् तु तत्र देवो हुताशनः ॥ ५३ ॥
देहके मध्यमें जो हृदय है, वही मनका स्थान कहलाता है और नाभिकोष्ठके भीतर (वाणीका अधिष्ठातृ-देवता) अग्नि रहता है ॥ ५३ ॥
मनः प्रजापतिर्ज्ञेयः कफः सोमो विभाव्यते ।
पित्तमग्निः स्मृतं ह्येतदग्नीषोमात्मकं जगत् ॥ ५४ ॥
(मनका अधिष्ठातृ-देवता प्रजापति होनेके कारण) मनको प्रजापति समझना चाहिये, कफको सोम समझना चाहिये और पित्तको अग्नि कहा गया है। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत् अग्नीषोमात्मक है ॥ ५४ ॥
एवं प्रवर्तिते गर्भे वर्द्धितेऽम्बुदसन्निभे ।
वायुः प्रवेशं संचक्रे सङ्गतः परमात्मना ॥ ५५ ॥
जैसे धुएँ, ज्योति, जल और पवनसे मेघ बढ़ता है, उसी प्रकार गर्भ भी अन्न, अग्नि, जल और प्राणसे बढ़ता है, अतएव अचेतन है, उसके बढ़नेपर (प्राणवायुका सहचर होनेसे जीवरूप) वायु ईश्वरके साथ उसमें प्रवेश करता है (और उसीके साथ उत्क्रमण करता है) ॥ ५५ ॥
ततोऽङ्गानि विसृजति बिभर्ति परिवर्द्धयन् ।
स पञ्चधा शरीरस्थो भिद्यते वर्द्धते पुनः ॥ ५६ ॥
देहमें प्रवेश करनेके अनन्तर वह (प्राणोपाधिक) जीव (सिर आदि) अङ्गोंको रचता है और उनको बढ़ाता हुआ उनको पुष्ट भी करता रहता है। वह (प्राणके पाँच प्रकारका होनेसे स्वयं भी) पाँच भागोंमें बँटकर बढ़ता रहता है ॥ ५६ ॥
प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च ।
प्राणः स प्रथमं स्थानं वर्द्धयन् परिवर्तते ॥ ५७ ॥
वे पाँच भेद इस प्रकार हैं—प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। इनमें प्राण प्रथम-स्थान (हृत्-पिण्ड-हृदय) को पुष्ट करता हुआ चलता रहता है ॥ ५७ ॥
अपानः पश्चिमं कायमुदानोर्ध्वं शरीरिणः ।
व्यानो व्यायच्छते येन समानः संनिवर्तयेत् ।
भूतावाप्तिस्ततस्तस्य जायतेन्द्रियगोचरात् ॥ ५८ ॥
अपान प्राणीके (जङ्घासे लेकर चरणतक) अधः-शरीर-को और उदान प्राणीके (जङ्घाओंसे ऊपरके) ऊर्ध्व-शरीरको बढ़ाता है और व्यान व्यायाम अर्थात् बल-साध्य कर्म करता है (अतएव वह शरीरकी सब संधियोंमें वर्तमान रहता है) और समान (नाभिमें रहकर) खायी और पीयी हुई वस्तुओंको
१४४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे · [ हरिवंशे
समान करता है (यथास्थान पहुँचा देता है)। इस प्रकार प्राणके कर्मोंका विभाग होनेके अनन्तर जीवको इन्द्रियोंके विषय (रूप आदि) के द्वारा उनके आश्रय (अग्नि आदि) भूतोंका साक्षात्कार होता है ॥ ५८ ॥
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । तस्येन्द्रियाणि विप्राणि स्वं स्वं योगं प्रचक्रिरे ॥ ५९ ॥
(इसका कारण यह है कि) पृथ्वी, जल, तेज, वायु और पाँचवाँ आकाश—ये सब इन्द्रियोंके रूपमें परिणत होकर शरीरके अन्तर्गत अपने-अपने नेत्र-गोलक आदि स्थानोंमें प्रविष्ट हो जाते हैं, इस प्रकार वे अपने-अपने सजातीयको ग्रहण करते हैं (अर्थात् पार्थिव घ्राणेन्द्रिय पृथ्वीके गुण गन्धको ग्रहण करती है, जलीय रसनेन्द्रिय जलके गुण रसको ग्रहण करती है, तैजस चक्षु तेजके गुण रूपको ग्रहण करती है, वायवीय त्वगिन्द्रिय वायुके गुण स्पर्शको ग्रहण करती है और आकाशीय श्रोत्रेन्द्रिय आकाशके गुण शब्दको ग्रहण करती है) ॥ ५९ ॥
पार्थिवं देहमाहुस्तं प्राणात्मानं च मारुतम् । छिद्राण्याकाशयोनीनि जलात् स्रावः प्रवर्तते ॥ ६० ॥
देहको अर्थात् इकट्ठे हुए कठिनांशको पृथ्वीका विकार कहते हैं, प्राणको वायुका, शरीरमें स्थित नौ छिद्रोंको आकाशका विकार कहते हैं और शरीरसे निकलनेवाले (मूत्र, पसीना वीर्य, आदि) सभी स्राव जलके विकार हैं ॥ ६० ॥
ज्योतिश्चक्षुश्च तेजात्मा तेषां यन्ता मनः स्मृतः । ग्रामाश्च विषयाश्चैव यस्य वीर्यात् प्रवर्तिताः ॥ ६१ ॥
चक्षुरिन्द्रिय तेजःस्वरूप है, इन सब पृथ्वी आदिके (सम्मिलित) तेजका अंश मन है, यह सभी इन्द्रियोंका नियामक है—इन सबको वशमें रखता है (मनके संयोगसे ही ये सब कार्यक्षम होती हैं)। इस मनके वीर्य-शक्तिसे ही (रूप आदिके आश्रय) पृथ्वी आदिका समूह और गन्ध आदि विषय प्रत्यक्ष होते हैं अथवा ग्राम-नगर आदि सब मनके लगनेपर ही बनाये जाते हैं ॥ ६१ ॥
इत्येवं पुरुषः सर्वान् सृजँल्लोकान् सनातनान् । कथं लोके नैधनेऽस्मिन् नरत्वं विष्णुरागतः ॥ ६२ ॥
पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु इस प्रकार इन सनातन लोकोंको रचते रहते हैं। ऐसे विष्णु भगवान् इस मरणशील संसारमें मनुष्य क्यों बने ? ॥ ६२ ॥
एष मे संशयो ब्रह्मन्नेवं मे विस्मयो महान् । कथं गतिर्गतिमत्तामापन्नो मानुषीं तनुम् ॥ ६३ ॥
ब्रह्मन् ! मुझे यही संदेह और बड़ा भारी विस्मय हो रहा है कि गतिमानोंको भी गति देनेवाले भगवान्ने मनुष्य-शरीर किसलिये धारण किया ? ॥ ६३ ॥
श्रुतो मे स्वस्य वंशस्य पूर्वेषां चैव सम्भवः । श्रोतुमिच्छामि विष्णोस्तु वृष्णीनां च यथाक्रमम् ॥
मैंने अपने वंशकी और अपने पूर्वजोंकी उत्पत्ति सुन ली, अब मैं विष्णुकी और वृष्णिवंशियोंकी उत्पत्तिको क्रमानुसार सुनना चाहता हूँ ॥ ६४ ॥
आश्चर्यं परमं विष्णोर्देवैर्दैत्यैश्च कथ्यते । विष्णोरुत्पत्तिमाश्चर्यं ममाचक्ष्व महामुने ॥ ६५ ॥
महामुने ! देवता और दैत्य विष्णुको परम अचरजभरा बताते हैं, अतः आप विष्णुकी अचरजसे भरी हुई उत्पत्तिका मुझसे वर्णन कीजिये ॥ ६५ ॥
एतदाश्चर्यमाख्यानं कथयस्व सुखावहम् । प्रख्यातबलवीर्यस्य विष्णोरमिततेजसः । कर्म चाश्चर्यभूतस्य विष्णोस्तत्त्वमिहोच्यताम् ॥ ६६ ॥
आप बल और वीर्यके लिये प्रसिद्ध अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुके इस सुख देनेवाले आश्चर्यजनक आख्यानको सुनाइये और आश्चर्यस्वरूप विष्णुके कर्मोंको तथा तत्त्वको भी मुझे सुनाइये ॥ ६६ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि वराहोत्पत्तिवर्णने चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें वराहोत्पत्तिवर्णनविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥
हरिवंशपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः [ १४५
एकचत्वारिंशोऽध्यायः
भगवान् विष्णुके वराह, नृसिंह, वामन, दत्तात्रेय, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, व्यास तथा कल्कि-अवतारोंकी संक्षिप्त कथा
वैशम्पायन उवाच
प्रश्नभारो महांस्तात त्वयोक्तः शार्ङ्गधन्वनि ।
यथाशक्ति तु वक्ष्यामि श्रूयतां वैष्णवं यशः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—तात ! तुमने शार्ङ्ग धनुष धारण करनेवाले भगवान् विष्णुके विषयमें यह प्रश्नका महान् भार मेरे ऊपर रख दिया। तथापि मैं यथाशक्ति तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर दूँगा। तुम श्रीहरिकी यशोगाथा—लीलाकथाका श्रवण करो ॥ १ ॥
विष्णोः प्रभावश्रवणे दिष्ट्या ते मतिरुत्थिता ।
हन्त विष्णोः प्रवृत्तिं च शृणु दिव्यां मयेरिताम् ॥२॥
भगवान् विष्णुके प्रभावको सुननेमें जो तुम्हारे मनकी प्रवृत्ति हुई है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है। अतः मैं हर्षपूर्वक श्रीहरिकी दिव्य लीला-कथाका वर्णन करता हूँ। तुम ध्यान देकर उसे सुनो ॥ २ ॥
सहस्राक्षं सहस्रास्यं सहस्रचरणं च यम् ।
सहस्रशिरसं देवं सहस्रकरमव्ययम् ॥ ३ ॥
सहस्रजिह्वं भास्वन्तं सहस्रमुकुटं प्रभुम् ।
सहस्रदं सहस्रादिं सहस्रभुजमव्ययम् ॥ ४ ॥
सवनं हवनं चैव हव्यं होतारमेव च ।
पात्राणि च पवित्राणि वेदिं दीक्षां चरुं स्रुवम् ॥ ५ ॥
स्रुक्सोमं शूर्पमुसलं प्रोक्षणं दक्षिणायनम् ।
अध्वर्युं सामगं विप्रं सदस्यं सदनं सदः ॥ ६ ॥
यूपं समित्कुशं दर्वी चमसोलूखलानि च ।
प्राग्वंशं यज्ञभूमिं च होतारं चयनं च यत् ॥ ७ ॥
ह्रस्वान्यतिप्रमाणानि चराणि स्थावराणि च ।
प्रायश्चित्तानि चार्थं च स्थण्डिलानि कुशांस्तथा ॥८॥
मन्त्रं यज्ञवहं वह्निं भागं भागवहं च यत् ।
अग्रेभुजं सोमभुजं घृतार्चिषमुदायुधम् ॥ ९ ॥
आहुर्वेदविदो विप्रा यं यज्ञे शाश्वतं विभुम् ।
तस्य विष्णोः सुरेशस्य श्रीवत्साङ्कस्य धीमतः ॥ १० ॥
प्रादुर्भावसहस्राणि अतीतानि न संशयः ।
भूयश्चैव भविष्यन्तीत्येवमाह प्रजापतिः ॥ ११ ॥
वेदवेत्ता ब्राह्मण जिन्हें सहस्रमुख, सहस्रनेत्र, सहस्र-चरण, सहस्र-शिर, सहस्र-कर, अविनाशी देव, सहस्रों जिह्वाओंसे युक्त, प्रकाशमान, सहस्रों मुकुटोंसे सुशोभित; प्रभु, सहस्रोंका दान करनेवाले, सहस्रों प्राणियोंके आदिस्रष्टा, सहस्रबाहु, अविकारी, सवन (यज्ञोपयोगी काल), हवनरूप कर्म, हव्य (हवनीय पदार्थ), होता (यजमान), यज्ञपात्र, पवित्रक, वेदी, दीक्षा, चरु, स्रुवा, स्रुक्, सोम, सूप, मूसल, प्रोक्षणी (पात्र), दक्षिणायन, अध्वर्यु (यजुर्वेदी), साम गान करनेवाला ब्राह्मण, सदस्य, पत्नीशाला, सभा, यूप, समिधा, कुशा, दर्वी, चमस, ऊखल, प्राग्वंश (यज्ञमण्डपमें स्थित यजमान-गृह), यज्ञभूमि, होता (ऋत्विज्), चयन (ईंटोंकी बनी हुई वेदी), छोटे-बड़े चराचर जीव, प्रायश्चित्त, प्रयोजन या फल, स्थण्डिल (वेदी), कुश, मन्त्र, यज्ञवाहक अग्नि, देवताओंका भाग, भागवाहक, अग्रासनभोजी, सोमभोक्ता, घीकी आहुतिसे उठनेवाली ज्वाला, उदायुध (यज्ञ-समाप्तिके समय की जानेवाली उदयनीय नामक इष्टि) तथा यज्ञमें विद्यमान सनातन प्रभु कहते हैं, उन श्रीवत्सचिह्नविभूषित देवेश्वर बुद्धिमान् भगवान् विष्णुके सहस्रों अवतार हो चुके हैं और भविष्यमें भी समय-समयपर बारंबार होते रहेंगे—इसमें संशय नहीं है। ऐसा प्रजापति ब्रह्माजीका कथन है ॥ ३—११ ॥
यत् पृच्छसि महाराज पुण्यां दिव्यां कथां शुभाम् ।
यदर्थं भगवान् विष्णुः सुरेशो रिपुसूदनः ।
देवलोकं समुत्सृज्य वसुदेवकुलेऽभवत् ॥ १२ ॥
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वमशेषतः ।
वासुदेवस्य माहात्म्यं चरितं च महाद्युतेः ॥ १३ ॥
महाराज ! तुम जिस पवित्र, दिव्य एवं मङ्गलमयी कथाको पूछ रहे हो, उसका तथा जिस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये देवताओंके स्वामी शत्रुनाशक भगवान् विष्णु देवलोकको त्यागकर वसुदेवके कुलमें अवतीर्ण हुए थे, उसका भी मैं तुमसे भलीभाँति वर्णन करूँगा, तुम वह सब प्रसङ्ग पूर्णरूपसे सुनो। साथ ही महातेजस्वी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णका माहात्म्य एवं चरित्र भी श्रवण करो ॥ १२-१३ ॥
हितार्थं सुरमर्त्यानां लोकानां प्रभवाय च ।
बहुशः सर्वभूतात्मा प्रादुर्भवति कार्यतः ॥ १४ ॥
समस्त भूतोंके आत्मा भगवान् श्रीहरि देवता और मनुष्योंका कल्याण तथा लोकोंका अभ्युदय करनेके लिये आवश्यकतावश बारंबार अवतीर्ण होते हैं ॥ १४ ॥
प्रादुर्भावांश्च वक्ष्यामि पुण्यान् दिव्यगुणैर्युतान् ।
छान्दसीभिरुदाराभिः श्रुतिभिः समलंकृतान् ॥१५॥
मैं भगवान्के उदार वैदिक श्रुतियोंद्वारा वर्णित दिव्य गुणवाले पवित्र अवतारोंका वर्णन करूँगा ॥ १५ ॥
शुचिः प्रयतवाग् भूत्वा निबोध जनमेजय ।
| १४६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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इदं पुराणं परमं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम् ॥ १६॥
हन्त ते कथयिष्यामि विष्णोर्दिव्यां कथां शृणु।
जनमेजय ! यह पवित्र एवं श्रेष्ठ पुराण वेदोंके समान सम्मानित है। तुम पवित्र एवं मौन होकर इसे सुनो। मैं बड़े हर्षके साथ तुमसे भगवान् विष्णुकी यह दिव्य कथा कहता हूँ। इसे श्रवण करो ॥ १६½ ॥
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
धर्मसंस्थापनार्थाय तदा सम्भवति प्रभुः ॥ १७॥
भारत ! जब-जब धर्मका ह्रास होता है, तब-तब प्रभु धर्मको दृढ़ रूपमें स्थापित करनेके लिये अवतार ग्रहण करते हैं ॥ १७ ॥
तस्य ह्येका महाराज मूर्त्तिर्भवति सत्तमा ।
नित्यं दिविष्ठा या राजंस्तपश्चरति दुष्करम् ॥ १८॥
राजन् ! महाराज ! उनकी एक श्रेष्ठतम सात्त्विकी मूर्ति है, जो दिव्यलोकमें रहकर सदा दुष्कर तप करती है ॥ १८ ॥
द्वितीया चास्य शयने निद्रायोगमुपाययौ ।
प्रजासंहारसर्गार्थं किमध्यात्मविचिन्तकम् ॥ १९॥
उनकी दूसरी मूर्ति प्रजाके संहार और सृष्टिके लिये योगनिद्राका आश्रय ले शेषशय्यापर शयन करती है। वह योगनिद्रा अध्यात्मचिन्तकोंकी समाधिसे भी उत्कृष्ट है ॥ १९॥
सुप्त्वा युगसहस्रं स प्रादुर्भवति कार्यवान् ।
पूर्णे युगसहस्रे तु देवदेवो जगत्पतिः ॥ २० ॥
पितामहो लोकपालाश्चन्द्रादित्यौ हुताशनः ।
ब्रह्मा च कपिलश्चैव परमेष्ठी तथैव च ॥ २१ ॥
देवाः सप्तर्षयश्चैव त्र्यम्बकश्च महायशाः ।
वायुः समुद्राः शैलाश्च तस्य देहं समाश्रिताः ॥ २२॥
एक सहस्र चतुर्युगोंतक शयन करके वे सृष्टिसंचालनके कार्यसे पुनः विभिन्न (देवता आदिके) रूपोंमें प्रकट होते हैं। सहस्र युग पूर्ण हो जानेपर वे देवाधिदेव जगदीश्वर विष्णु ही पितामह ब्रह्मा, इन्द्रादि लोकपाल, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, कपिल, परमेष्ठी (दक्ष), देवता, सप्तर्षि और महायशस्वी त्रिनेत्रधारी शिव आदिके रूपमें प्रादुर्भूत होते हैं। वायु, समुद्र और पर्वत—ये सब-के-सब उन्हींके विराट् रूपका आश्रय लेकर स्थित हैं ॥ २०-२२ ॥
सनत्कुमारश्च महानुभावो
मनुर्महात्मा भगवान् प्रजाकरः ।
पुराणदेवोऽथ पुराणि चक्रे
प्रदीप्तवैश्वानरतुल्यतेजाः ॥ २३ ॥
महान् प्रभावशाली सनत्कुमार और प्रजाकी सृष्टि करने-वाले ऐश्वर्यशाली महात्मा मनु भी उन्हींके स्वरूप हैं। प्रदीप्त अग्निके समान तेजस्वी उन पुराणदेव श्रीहरिने ही समस्त देहधारियोंके शरीरोंकी रचना की है ॥ २३ ॥
येन चार्णवमध्यस्थौ नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
नष्टे देवासुरगणे प्रणष्टोरगराक्षसे ॥ २४ ॥
योद्धुकामौ सुदुर्धर्षौ दानवौ मधुकैटभौ ।
हतौ प्रभवता तेन तयोर्दत्त्वामृतं वरम् ॥ २५ ॥
महाप्रलयके समय जब कि देवता, असुरगण, नाग तथा राक्षस आदि समस्त चराचर प्राणी नष्ट हो गये थे, एकार्णवके जलमें दो अत्यन्त दुर्धर्ष दानव प्रकट हुए। उनके नाम थे मधु और कैटभ । वे दोनों युद्ध चाहते थे । सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने ही उन दोनोंको मोक्षका अनुपम वर देकर मार डाला था ॥ २४-२५ ॥
पुरा कमलनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि ।
पुष्करे गत्र सम्भूता देवाः सर्षिगणाः पुरा ॥ २६ ॥
पूर्वकालमें जब कमलनाभ भगवान् विष्णु समुद्रके जलमें शयन कर रहे थे, उनकी नाभिसे एक कमल प्रकट हुआ, जिसमें पहले ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवताओंका प्रादुर्भाव हुआ ॥ २६॥
एष पौष्करको नाम प्रादुर्भावो महात्मनः ।
पुराणे कथ्यते यत्र वेदः श्रुतिसमाहितः ॥ २७॥
पुराणमें यह परमात्मा विष्णुका पौष्कर नामका अवतार या सर्ग कहा जाता है । पुराण वह विद्या है, जिसमें मन्त्र एवं ब्राह्मण-भागकी श्रुतियोंसे सम्पन्न सम्पूर्ण वेद ही प्रतिष्ठित हैं (पुराणोंमें वेदार्थका ही विस्तार किया गया है) ॥ २७ ॥
वाराहस्तु श्रुतिमुखः प्रादुर्भावो महात्मनः ।
यत्र विष्णुः सुरश्रेष्ठो वाराहं रूपमास्थितः ।
महीं सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम् ॥ २८ ॥
उन परमात्माका जो वाराह नामक अवतार है, वह श्रुतिमे वर्णित है। उस अवतारके समय सुरश्रेष्ठ भगवान् विष्णुने वाराहरूप धारणकर पर्वत और वनसहित समुद्रतककी सारी पृथ्वीका जलसे उद्धार किया था ॥ २८ ॥
वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदन्तश्चितीमुखः ।
अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः ॥ २९ ॥
चारों वेद उनके चार चरण और यूप उनकी दाढ़ें हैं। यज्ञ दाँत और श्येनचित् आदि चिति (इष्टिका-चयन) मुख है। साक्षात् अग्नि ही उनकी जिह्वा, कुशा रोमावलि और ब्रह्म मस्तक है। उनका तप महान् है ॥ २९ ॥
अहोरात्रेक्षणो दिव्यो वेदाङ्गः श्रुतिभूषणः ।
आज्यनासः स्रुवातुण्डः सामघोषस्वनो महान् ॥३०॥
दिन और रात्रि उनके नेत्र हैं, वे दिव्यस्वरूप हैं । वेद उनका अङ्ग और श्रुतियाँ आभूषण हैं । हविष्य (घृत) नासिका, स्रुवा थूथुन और सामवेदका गम्भीर घोष ही उनका स्वर है। वे महान् हैं ॥ ३० ॥
हरिवंशपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः १४७
धर्मसत्यमयः श्रीमान् क्रमविक्रमसत्कृतः ।
प्रायश्चित्तनखो धीरः पशुजानुर्महाभुजः ॥ ३१ ॥
धर्म और सत्य उनका स्वरूप है। वे श्रीसम्पन्न तथा क्रम (गति) और विक्रम (पराक्रम) के द्वारा सम्मानित हैं। प्रायश्चित्त उनके नख और पशु उनके घुटने हैं। वे धीर तथा विशाल भुजाओंसे युक्त हैं ॥ ३१ ॥
उद्गात्रन्त्रो होमलिङ्गः फलवीजमहौषधिः ।
वाय्वन्तरात्मा मन्त्रस्फिग्विकृतः सोमशोणितः ॥ ३२ ॥
उद्गाता अन्त्र (आँत), होम लिङ्ग तथा बड़ी-बड़ी ओषधियाँ उनके अण्डकोश और वीर्य हैं। वायु अन्तरात्मा, मन्त्र नितम्ब और निचोड़कर निकाला हुआ सोमरस ही उनका रक्त है ॥ ३२ ॥
वेदस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यातिवेगवान् ।
प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरार्चितः ॥ ३३ ॥
वेदी ही कंधा, हविष्य गन्ध तथा हव्य और कव्य उनका प्रचण्ड वेग है। प्राग्वंश (यजमान-गृह) उनका शरीर है। वे परम कान्तिमान् और नाना प्रकारकी दीक्षाओंसे सम्पन्न हैं ॥ ३३ ॥
दक्षिणाहृदयो योगी महासत्रमयो महान् ।
उपाकर्मोष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः ॥ ३४ ॥
दक्षिणा ही उनका हृदय है। महान् सत्र (लंबे काल-तक चलनेवाले यज्ञ) उन महान् योगीका स्वरूप है। वेदोंका स्वाध्याय उनके ओठोंका आभूषण है और प्रवर्ग्य नामक कर्मकी आवृत्ति ही उनका भूषण है ॥ ३४ ॥
नानाच्छन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः ।
छायापत्नीसहायो वै मेरुशृङ्ग इवोच्छ्रितः ॥ ३५ ॥
अनेक प्रकारके छन्दोंकी गति उनका मार्ग है और वे गोपनीय उपनिषदरूपी आसनपर विराजमान रहते हैं। जलमें पड़नेवाली छाया (परछाईं) ही पत्नीकी भाँति उस समय उनकी सहायिका थी और वे मेरुपर्वतके शिखरके समान ऊँचे जान पड़ते थे ॥ ३५ ॥
महीं सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम् ।
एकार्णवजले भ्रष्टामेकार्णवगतः प्रभुः ॥ ३६ ॥
दंष्ट्रया यः समुद्धृत्य लोकानां हितकाम्यया ।
सहस्रशीर्षो देवादि श्चकार पृथिवीं पुनः ॥ ३७ ॥
उन सहस्रों सिरवाले भगवान् वराहने, जो देवताओंके आदिकारण हैं, एकार्णवके जलमे प्रवेश करके उसमें डूबी हुई पर्वत, वन और काननोंसहित समुद्रतककी सारी पृथ्वीको अपनी दाढ़से ऊपर उठाकर सम्पूर्ण लोकोंके हितकी कामनासे पुनः उसे जलके ऊपर स्थिरतापूर्वक स्थापित कर दिया ॥
एवं यज्ञवराहेण भूत्वा भूतहितार्थिना ।
उद्धृता पृथिवी सर्वा सागराम्बुधरा पुरा ॥ ३८ ॥
इस प्रकार प्रकट होकर समस्त प्राणियोंका हित चाहनेवाले यज्ञात्मा भगवान् वराहने समुद्र-जलको धारण करनेवाली समूची पृथ्वीका पूर्वकालमें उद्धार किया था ॥ ३८ ॥
वाराह एष कथितो नारसिंहमतः शृणु ।
यत्र भूत्वा मृगेन्द्रेण हिरण्यकशिपुर्हतः ॥ ३९ ॥
यह वाराह-अवतारकी कथा कही गयी। इसके बाद नरसिंह-अवतार हुआ, उसका वर्णन सुनो। उस अवतारमें भगवान्ने नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपु नामक दैत्य-का वध किया था ॥ ३९ ॥
पुरा कृतयुगे राजन् सुरारिर्बलदर्पितः ।
दैत्यानामादिपुरुषश्चचार तप उत्तमम् ॥ ४० ॥
दश वर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च ।
जपोपवासनिरतः स्थानमौनदृढव्रतः ॥ ४१ ॥
राजन् ! पहले सत्ययुगमें देवताओंका शत्रु हिरण्यकशिपु समस्त दैत्योंका आदि पुरुष था। उसे अपने बलका बड़ा घमंड था। उसने साढ़े ग्यारह हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। वह सदा जप और उपवासमे संलग्न रहता था। दृढ़ आसन लगाकर मौनावलम्बनपूर्वक दृढ़ताके साथ उत्तम व्रतका पालन करता था ॥ ४०-४१ ॥
ततः शमदमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चानघ ।
ब्रह्मा प्रीतोऽभवत् तस्य तपसा नियमेन च ॥ ४२ ॥
निष्पाप नरेश ! तदनन्तर उसके इन्द्रिय-संयम, मनो-निग्रह, ब्रह्मचर्य, तपस्या और शौच-संतोषादि नियमोंके पालनसे ब्रह्माजी उसके ऊपर बहुत प्रसन्न हुए ॥ ४२ ॥
तं वै स्वयम्भूर्भगवान् स्वयमागत्य भूपते ।
विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता ॥ ४३ ॥
भूपाल ! स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजी हंससे युक्त सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा स्वयं वहाँ पधारे ॥ ४३ ॥
आदित्यैर्वसुभिः साध्यैर्मरुद्भिर्देवदैवतैः सह ।
रुद्रैर्विश्वेस्सहायैश्च यक्षराक्षसकिन्नरैः ॥ ४४ ॥
दिशाभिर्विदिशाभिश्च नदीभिः सागरैस्तथा ।
नक्षत्रैश्च मुहूर्तैश्च खेचरैश्च महाग्रहैः ॥ ४५ ॥
देवर्षिभिस्तपोवृद्धैः सिद्धैः सप्तर्षिभिस्तथा ।
राजर्षिभिः पुण्यतमैर्गन्धर्वाप्सरोगणैः ॥ ४६ ॥
उनके साथ आदित्य, वसु, साध्य, मरुद्गण, अन्य देवगण, रुद्रगण, विश्वेदेव, यक्ष, राक्षस, किन्नर, दिशाएँ, विदिशाएँ, नदियों, समुद्र, नक्षत्र, मुहूर्त, आकाशचारी महान् ग्रह, तपस्यामें बढ़े-चढ़े देवर्षि, सिद्ध, सप्तर्षि, परम पुण्यात्मा राजर्षि, गन्धर्व तथा अप्सराएं भी थीं ॥ ४४-४६ ॥
१४८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
चराचरगुरुः श्रीमान् वृतः सर्वैः सुरैस्तथा ।
ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यं वचनमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ चराचर-गुरु श्रीमान् ब्रह्मा उस दैत्यसे इस प्रकार बोले—॥ ४७ ॥
प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत ।
वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥ ४८ ॥
'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दैत्यराज ! तुम मेरे भक्त हो। तुम्हारी इस तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारा भला हो। तुम कोई वर माँगो और मनोवाञ्छित भोग प्राप्त करो' ॥ ४८ ॥
हिरण्यकशिपुरुवाच
न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः ।
न मानुषाः पिशाचाश्च निहन्युर्मां कथंचन ॥ ४९ ॥
ऋषयो वा न मां शापैः क्रुद्धा लोकपितामह ।
शपेयुस्तपसा युक्ता वरमेतं वृणोम्यहम् ॥ ५० ॥
हिरण्यकशिपु बोला—लोकपितामह ! मुझे देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच किसी तरह मार न सकें। तपस्वी ऋषि-महर्षि कुपित होकर मुझे शाप न दें, मैं आपसे यही वर माँगता हूँ ॥ ४९-५०॥
न शस्त्रेण न चास्त्रेण गिरिणा पादपेन वा ।
न शुष्केण न चार्द्रेण स्यान्न चान्येन मे वधः ॥ ५१ ॥
न शस्त्रसे, न अस्त्रसे, न पर्वत अथवा वृक्षसे, न सूखे-से, न गीलेसे और न दूसरे ही किसी आयुधसे मेरा वध हो ॥ ५१ ॥
पाणिप्रहारेणैकेन सभृत्यबलवाहनम् ।
यो मां नाशयितुं शक्तः स मे मृत्युर्भविष्यति ॥ ५२ ॥
जो मेरे सेवक, सेना और वाहनोंसहित मुझे एक ही थप्पड़से मार डालनेमें समर्थ हो, उसीके हाथसे मेरी मृत्यु हो ॥ ५२ ॥
भवेयमहमेवार्कः सोमो वायुर्हुताशनः ।
सलिलं चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश ॥ ५३ ॥
मैं ही सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, आकाश, नक्षत्र और दसों दिशाओंके रूपमें स्थित रहूँ ॥ ५३ ॥
अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वासवो यमः ।
धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किं पुरुषाधिपः ॥ ५४ ॥
मैं ही काम और क्रोधका अधिष्ठाता होऊँ। मैं ही वरुण, इन्द्र, यम, धनाध्यक्ष कुबेर, यक्ष एवं किम्पुरुषोंका स्वामी होऊँ ॥ ५४ ॥
एवमुक्तस्तु दैत्येन स्वयम्भूर्भगवान्स्तदा ।
उवाच दैत्यराजं तं प्रहसन् नृपसत्तम ॥ ५५ ॥
नृपश्रेष्ठ ! उस दैत्यके यों कहनेपर स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा ठठाकर हँस पड़े और उस समय उस दैत्यराजसे इस प्रकार बोले ॥ ५५ ॥
ब्रह्मोवाच
एते दिव्या वरास्तात मया दत्तास्तवाद्भुताः ।
सर्वान् कामानिमांस्तात प्राप्स्यसि त्वं न संशयः ॥ ५६॥
ब्रह्माजीने कहा—तात ! ये दिव्य और अद्भुत वर मैंने तुम्हें दे दिये। तुम इन सम्पूर्ण अभीष्टोंको प्राप्त कर लोगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ५६ ॥
एवमुक्त्वा तु भगवाञ्जगामाकाशमेव हि ।
वैराजं ब्रह्मसदनं ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ ५७ ॥
यों कहकर भगवान् ब्रह्मा आकाशमें स्थित, ब्रह्मर्षिगणों-से सेवित वैराजपद नामक ब्रह्मधामको चले गये ॥ ५७ ॥
ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा मुनयस्तथा ।
वरप्रदानं श्रुत्वा ते पितामहमुपस्थिताः ॥ ५८ ॥
तदनन्तर देवता, नाग, गन्धर्व और मुनि वह वरदान सुनकर पितामह ब्रह्माजीके पास गये ॥ ५८ ॥
विभुं विज्ञापयामासुर्देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥ ५९ ॥
वहाँ पहुँचकर इन्द्र आदि देवताओंने भगवान् ब्रह्मासे अपने मानसिक भयको इस प्रकार सूचित किया ॥ ५९ ॥
देवा ऊचुः
वरेणानेन भगवन् बाधयिष्यति नोऽसुरः ।
ततः प्रसीद भगवन् वधोऽप्यस्य विचिन्त्यताम् ॥ ६० ॥
भवान् हि सर्वभूतानां स्वयम्भूरादिकृद् विभुः ।
स्रष्टा च हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्ध्रुवः ॥ ६१ ॥
देवता बोले—भगवन् ! इस वरके प्रभावसे तो वह असुर हमलोगोंको सदा ही महान् कष्ट पहुँचाता रहेगा। अतः आप प्रसन्न होइये और उसके वधका भी कोई उपाय सोचिये; क्योंकि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके आदिस्रष्टा, स्वयम्भू, सर्वव्यापी, हव्य-कव्यके निर्माता, अव्यक्तप्रकृति और ध्रुवस्वरूप हैं ॥ ६०-६१ ॥
ततो लोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः ।
प्रोवाच भगवान् वाक्यं सर्वान् देवगणांस्तदा ॥ ६२ ॥
उस समय देवताओंका यह लोकहितकारी वचन सुन-कर उन प्रजापतिदेव भगवान् ब्रह्माने समस्त देवताओंसे इस प्रकारकी बात कही—॥ ६२ ॥
अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम् ।
तपसोऽन्तेऽस्य भगवान् वधं विष्णुः करिष्यति ॥ ६३ ॥
'देवताओ ! उस असुरको अपनी तपस्याका फल अवश्य
हरिवंशपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः १४९
प्राप्त होगा । (फल-भोगके द्वारा) जब तपस्याकी समाप्ति हो जायगी, तब भगवान् विष्णु स्वयं ही उसका वध करेंगे॥६३॥
एतच्छ्रुत्वा सुराः सर्वे वाक्यं पङ्कजसम्भवात्।
स्वानि स्थानानि दिव्यानि जग्मुस्ते वै मुदान्विताः॥ ६४॥
कमलयोनि ब्रह्माजीके मुखसे यह बात सुनकर समस्त देवता प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने दिव्य स्थानोंको चले गये ॥ ६४ ॥
लब्धमात्रे वरे चापि सर्वाः सोऽबाधत प्रजाः।
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः ॥ ६५॥
वह वर पाते ही दैत्य हिरण्यकशिपु समस्त प्रजाको कष्ट देने लगा; क्योंकि ब्रह्माजीके उस वरदानसे उसका घमंड बहुत बढ़ गया था ॥ ६५ ॥
आश्रमेषु महाभागान् मुनीन् वै शंसितव्रतान्।
सत्यधर्मरतान् दान्तान् पुरा धर्षितवांस्तु सः ॥ ६६॥
सबसे पहले आश्रमोंमें रहनेवाले उत्तम व्रतके पालक, सत्य-धर्मपरायण तथा जितेन्द्रिय महाभाग मुनियोंको उसने पीड़ा देना आरम्भ किया ॥ ६६ ॥
देवांस्त्रिभुवनस्थांस्तु पराजित्य महासुरः।
त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः ॥ ६७॥
तीनों लोकोंमें रहनेवाले देवताओंको हराकर त्रिलोकीके राज्यको अपने वशमें करके वह महान् असुर दानव स्वर्गमें रहने लगा ॥ ६७ ॥
यदा वरमदोन्मत्तो न्यवसद् दानवो दिवि ।
यज्ञियान् कृतवान् दैत्यान् देवांश्चैवाप्ययज्ञियान् ॥ ६८॥
वरदानके मदसे उन्मत्त हुआ वह दानव जब देवलोकमें निवास करता था, उन दिनों उसने दैत्योंको तो यज्ञका भागी बनाया और देवताओंको उससे वञ्चित कर दिया ॥
आदित्याश्च ततो रुद्रा विश्वे च मरुतस्तथा ।
शरण्यं शरणं विष्णुमुपाजग्मुर्महाबलम् ॥ ६९॥
वेदयज्ञमयं ब्रह्म ब्रह्मदेवं सनातनम् ।
भूतं भव्यं भविष्यं च प्रभुं लोकनमस्कृतम् ।
नारायणं विभुं देवाः शरणं शरणागताः ॥ ७०॥
तब आदित्य, रुद्र, विश्वेदेव और मरुद्गण आदि मिलकर शरणागतवत्सल, वेद एवं यज्ञस्वरूप, ब्रह्माजीके भी आराध्यदेव, सनातन ब्रह्मरूप महाबली भगवान् विष्णुकी शरणमें गये । भूत, वर्तमान और भविष्य जिनका स्वरूप है, जो सब कुछ करनेमें समर्थ तथा समस्त लोकोंद्वारा वन्दित हैं, उन्हीं सर्वव्यापी नारायणकी उन शरणागत देवताओंने शरण ली॥६९-७०॥
देवा ऊचुः
त्रायस्व नोऽद्य देवेश हिरण्यकशिपोर्भयात् ।
त्वं हि नः परमो धाता ब्रह्मादीनां सुरोत्तम ॥ ७१ ॥
देवता बोले---देवेश्वर ! आप हिरण्यकशिपुके भयसे अब हमारी रक्षा करें । सुरश्रेष्ठ ! आप हम ब्रह्मा आदि देवताओंके भी परम पालक हैं ॥ ७१ ॥
त्वं हि नः परमो देवस्त्वं हि नः परमो गुरुः ।
उत्फुल्लाम्बुजपत्राक्षः शत्रुपक्षभयंकरः ।
क्षयाय दितिवंशस्य शरण्यस्त्वं भवस्व नः ॥ ७२ ॥
आप ही हमारे परम देवता और आप ही हमारे परम गुरु हैं । आपके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान शोभा पाते हैं । आप शत्रुपक्षको भय देनेवाले हैं । प्रभो ! आप दैत्योंके विनाशके लिये हमारे शरणदाता हों ॥ ७२ ॥
विष्णुरुवाच
भयं त्यजध्वममरा ह्यभयं वो ददाम्यहम् ।
तथैवं त्रिदिवं देवाः प्रतिपत्स्यथ माचिरम् ॥ ७३ ॥
भगवान् विष्णुने कहा--देवताओ ! भय छोड़ दो । मैं तुम्हें अभय देता हूँ । तुम शीघ्र ही पहलेकी भाँति स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे ॥ ७३ ॥
एष तं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम् ।
अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम् ॥ ७४ ॥
जो वरदान पाकर घमंडमें भर गया है तथा जो देवेश्वरोंके लिये अवध्य हो गया है, उस दितिपुत्र दानवराज हिरण्यकशिपुको उसके सेवकोंसहित मार डालता हूँ ॥ ७४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स भगवान् विसृज्य त्रिदशेश्वरान् ।
हिरण्यकशिपो राजन्नाजगाम हरिः सभाम् ॥ ७५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन् ! यों कहकर भगवान् विष्णुने उन देवेश्वरोंको तो विदा कर दिया और स्वयं हिरण्यकशिपुके सभाभवनमें पधारे ॥ ७५ ॥
नरस्य कृत्वाधंतनुं सिंहस्यार्धतनुं प्रभुः ।
नार्सिंहेण वपुषा पाणि निष्पिष्य पाणिना ॥ ७६ ॥
उस समय उन प्रभुने अपना आधा शरीर मनुष्यका-सा बना लिया था और आधा सिंहका-सा । इस प्रकार नृसिंहरूप धारण करके वे एक हाथसे दूसरे हाथको रगड़ते हुए वहाँ आये ॥ ७६ ॥
जीमूतघनसंकाशो जीमूतघननिःस्वनः ।
जीमूतघनदीप्तौजा जीमूत इव वेगवान् ॥ ७७ ॥
उनके शरीरका वर्ण सजल मेघके समान श्याम था । उनका शब्द भी जलपूर्ण मेघकी गर्जनाके समान ही गम्भीर था । उनके उद्दीप्त तेज और वेग भी बरसनेवाले बादलके ही तुल्य थे ॥ ७७ ॥
दैत्यं सोऽतिबलं दीप्तं दृप्तशार्दूलविक्रमम् ।
दृप्तैर्दैत्यगणैर्गुप्तं हतवानेकपाणिना ॥ ७८ ॥
| १५० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश |
|---|
यद्यपि दैत्य हिरण्यकशिपु अत्यन्त बलवान्, तेजस्वी, दर्पमें भरे हुए सिंहके समान पराक्रमी तथा बलाभिमानी दैत्योंद्वारा सुरक्षित था, तो भी भगवान् नृसिंहने उसे एक ही थप्पड़से मारकर यमलोक पहुँचा दिया ॥ ७८ ॥
नृसिंह एष कथितो भूयोऽयं वामनोऽपरः ।
यत्र वामनमाश्रित्य रूपं दैत्यविनाशकृत् ॥ ७९ ॥
यह नृसिंहावतारकी कथा कही गयी । अब दूसरे वामन-अवतारका वर्णन सुनो, जिसमें वामनरूप धारण करके भगवान्ने दैत्योंका विनाश किया था ॥ ७९ ॥
बलेर्बलवतो यज्ञे वलिना विष्णुना पुरा ।
विक्रमैस्त्रिभिरक्षोभ्याः क्षोभितास्ते महासुराः ॥ ८० ॥
पूर्वकालमें सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णु (वामनरूप धारणकर ) बलवान् बलिके यज्ञमें गये और वहाँ उन्होंने अपने तीन ही पगोंसे ( त्रिलोकीको नापकर ) किसीसे क्षुब्ध न होनेवाले बड़े-बड़े असुरोंको क्षुब्ध कर डाला ॥ ८० ॥
विप्रचित्तिः शिविः शङ्कुरयःशङ्कुस्तथैव च ।
अयःशिराः शङ्कुशिरा हयग्रीवश्च वीर्यवान् ॥ ८१ ॥
वेगवान् केतुमांनुग्रः सोमव्यग्रो महासुरः ।
पुष्करः पुष्कलश्चैव वेपनश्च महारथः ॥ ८२ ॥
बृहत्कीर्तिर्महाजिह्वः साश्वोऽश्वपतिरेव च ।
प्रह्रादोऽश्वशिराः कुम्भः संह्लादो गगनप्रियः ।
अनुह्लादो हरिहरौ वराहः शंकरो रुजः ॥ ८३ ॥
शरभः शलभश्चैव कुपनः कोपनः क्रथः ।
वृहतकीर्तिर्महाजिह्वः शङ्कुकर्णो महास्वनः ॥ ८४ ॥
दीर्घजिह्वोऽर्कनयनो मृदुचापो मृदुप्रियः ।
वायुर्यविष्ठो नमुचिः शम्बरो विज्वरो महान् ॥ ८५ ॥
चन्द्रहन्ता क्रोधहन्ता क्रोधवर्धन एव च ।
कालकः कालकेयश्च वृत्रः क्रोधो विरोचनः ॥ ८६ ॥
गरिष्ठश्च वरिष्ठश्च प्रलम्बन नरकावुभौ ।
इन्द्रतापनवातापी केतुमान् बलदर्पितः ॥ ८७ ॥
असिलोमा पुलोमा च वाकलः प्रमदो मदः ।
खस्रमः कालवदनः करालः कौशिकः शरः ॥ ८८ ॥
एकाक्षश्चन्द्रहा राहुः संह्रादः सुमरः खनः ।
शतघ्नीचक्रहस्ताश्च तथा परिघपाणयः ॥ ८९ ॥
महाशिलाप्रहरणाः शूलहस्ताश्च दानवाः ।
अश्मयन्त्नायुधोपेता भिन्दिपालायुधास्तथा ॥ ९० ॥
शूलोलूखलहस्ताश्च परश्वधधरास्तथा ।
पाशमुद्गरहस्ता वै तथा मुसलपाणयः ॥ ९१ ॥
नानाप्रहरणा घोरा नानावेषा महाजवाः ।
कूर्मकुक्कुटवक्त्राश्च शशोल्लूकमुखास्तथा ॥ ९२ ॥
खरोष्ट्रवदनाश्चैव वराहवदनास्तथा ।
भीमा मकरवक्त्राश्च क्रोष्टुवक्त्राश्च दानवाः ।
आखुद्दुर्दुरवक्त्राश्च घोरा वृकमुखास्तथा ॥ ९३ ॥
मार्जारगजवक्त्राश्च महावक्त्रास्तथापरे ।
नक्रमेषाननाः शूरा गोऽजाविमहिषाननाः ॥ ९४ ॥
गोधामल्यकवक्त्राश्च क्रौञ्चवक्त्राश्च दानवाः ।
गरुडाननाः खड्गमुखा मयूरवदनास्तथा ॥ ९५ ॥
गजेन्द्रचर्मवसनास्तथा कृष्णाजिनाम्बराः ।
चीरसंवृतदेहाश्च तथा वल्कलवाससः ॥ ९६ ॥
उष्णीषिणो मुकुटिनस्तथा कुण्डलिनोऽसुराः ।
किरीटिनो लम्बशिखाः कम्बुग्रीवाः सुवर्चसः ।
नानावेषधरा दैत्या नानामाल्यानुलेपनाः ॥ ९७ ॥
खान्ययुधानि संगृह्य प्रदीप्तान्यतितैजसा ।
क्रममाणं हृषीकेशमुपावर्तन्त सर्वशः ॥ ९८ ॥
जिस समय भगवान् हृषीकेश अपने डग बढ़ा रहे थे, उस समय विप्रचित्ति, शिवि, शङ्कूरय और शङ्कु, अयःशिरा तथा शङ्कुशिरा, पराक्रमी हयग्रीव, वेगवान्, केतुमान्, उग्र, महान् असुर सोमव्यग्र, पुष्कर और पुष्कल तथा महारथी वेपन, बृहत्कीर्ति, महाजिह्व तथा अश्वसहित अश्वपति, प्रह्लाद, अश्वशिरा, कुम्भ, संह्राद, गगनप्रिय, अनुह्लाद, हरि और हर, वराह, शंकर, रुज, शरभ तथा शलभ, कुपन, कोपन, क्रथ, बृहत्कीर्ति, महाजिह्व, शङ्कुकर्ण, महास्वन, दीर्घजिह्व, अर्कनयन, मृदुचाप, मृदुप्रिय, वायु, यविष्ठ, नमुचि, शम्बर, महाकाय विज्वर, चन्द्रहन्ता, क्रोधहन्ता एवं क्रोधवर्धन, कालक तथा कालकेय, वृत्र, क्रोध, विरोचन, गरिष्ठ और वरिष्ठ, प्रलम्ब और नरक नामक दो दैत्य, इन्द्रतापन और वातापि, बलाभिमानी केतुमान्, असिलोमा तथा पुलोमा, वाकल, प्रमद, मद, खस्रम, कालवदन, कराल, कौशिक, शर, एकाक्ष, चन्द्रहा, राहु, संह्राद, सुमर और खन आदि दैत्य चारों ओरसे भगवान्को घेरकर खड़े हो गये। उनमेंसे किसीके हाथमें शतघ्नी (बंदूक) थी और किसीके हाथमें चक्र। बहुततेरे अपने हाथोंमें परिघ लिये खड़े थे। कुछ दानव बड़ी-बड़ी शिलाओंसे प्रहार करते थे। कितनोंके हाथोंमें शूल थे। कितने ही पत्थरके गोले फेंकनेवाले यन्त्ररूपी आयुधसे सम्पन्न थे। बहुततेरे भिन्दिपाल नामक अस्त्रका प्रयोग करते थे। कितने ही दैत्योंने अपने हाथोंमें शूल, ऊखल, फरसे, पाश, मुद्गर और मुसल ले रखे थे। इस प्रकार वे भाँति-भाँतिके आयुध धारण किये हुए थे। उनके वेष भी कई तरहके थे। वे सब-के-सब महान् वेगशाली और भयंकर थे। किन्हींके मुख कछुओं और मुर्गोंके समान थे तो किन्हींके खरहे और घुघूओंके सदृश। कितने ही दानवोंके मुख गदहे, ऊँट, सूअर, मगर और सियारोंके समान थे। वे सभी बड़े भयानक जान पड़ते थे। कुछ घोर रूपधारी दैत्योंके मुख चूहों और मेढकोंके समान थे। कितनोंके मुख भेड़ियोंसे मिलते-जुलते थे। किन्हींके मुख बिलाव-जैसे थे तो किन्हींके हाथियोंके समान। कोई-कोई इससे भी बड़े मुखवाले थे।
हरिवंशपर्व] एकचत्वारिंशोऽध्यायः १५१
बहुतोंके मुख नक्र (नाके), मेढ़े, बैल, बकरे, मेड़, भैंसे, गोह, साही, क्रौंच (कुरर), गरुड़, गैंडे और मोरोंके मिलते-जुलते थे। कुछ दैत्योंने गजराजके चमड़े ओढ़ रखे थे और कितनोंने वस्त्रकी जगह काले मृगचर्मको ही लपेट रखा था। बहुतोंके शरीर चीरसे ढके थे, और कितने ही वल्कल वस्त्र पहने थे; किन्हींके मस्तकपर पगड़ी शोभा पाती थी और किन्हींके मुकुट। कितने ही असुर किरीट और कुण्डलोंसे सुशोभित थे, किन्हींके सिरपर लंबी शिखाएँ शोभा पाती थीं। बहुत-से दैत्योंकी गर्दनें शङ्खके समान थीं। वे अत्यन्त तेजस्वी दैत्य नाना प्रकारके वेष धारण किये भाँति-भाँतिकी मालाओं और चन्दनोंसे अलंकृत थे। वे अत्यन्त तेजसे चमकते हुए अपने-अपने आयुध लिये खड़े थे ॥ ८१--९८॥
प्रमथ्य सर्वान् दैतेयान् पादहस्ततलैः प्रभुः।
रूपं कृत्वा महाभीमं जहाराशु स मेदिनीम् ॥ ९९ ॥
उन सर्वशक्तिमान् भगवान्ने महाभयानक रूप धारण करके समस्त दैत्योंको लातों और थप्पड़ोंसे मथ डाला और शीघ्र ही इस पृथ्वीको उनसे छीन लिया ॥ ९९ ॥
तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे।
नभः प्रक्रममाणस्य नाभ्यां किल समास्थितौ ॥ १००॥
कहते हैं—जब वे भूमिको नाप रहे थे, उस समय चन्द्रमा और सूर्य उन विराट्रूपधारी भगवान्के स्तनोंके बीचमें आ गये थे और जब वे आकाश (स्वर्गलोक) को नापने लगे, तब चन्द्रमा और सूर्य उनकी नाभिमें आ गये ॥ १००॥
परं प्रक्रममाणस्य जानुदेशे स्थितावुभौ।
विष्णोरतुलवीर्यस्य वदन्त्येवं द्विजातयः ॥ १०१॥
वे अतुलपराक्रमी भगवान् विष्णु जब स्वर्गसे भी ऊपर-के (मह, जन, तप और सत्य नामक) लोकोंको नाप रहे थे, उस समय सूर्य और चन्द्रमा उनके दोनों घुटनोंमें स्थित दिखायी दिये--इस प्रकार ब्राह्मणलोग कहते हैं ॥ १०१ ॥
हृत्वास पृथिवीं कृत्स्नां जित्वा चासुरपुंगवान्।
ददौ शक्राय त्रिदिवं विष्णुर्बलवतां वरः ॥ १०२॥
इस प्रकार बलवानोंमें श्रेष्ठ श्रीविष्णुने सारी पृथ्वीका अपहरण करके बड़े-बड़े असुरोंको हराकर स्वर्गलोकका राज्य इन्द्रको दे दिया ॥ १०२ ॥
एष ते वामनो नाम प्रादुर्भावो महात्मनः।
वेदविद्भिर्द्विजैरेवं कथ्यते वैष्णवं यशः ॥ १०३॥
जनमेजय ! इस प्रकार मैंने तुम्हें परमात्मा श्रीहरिके वामन नामक अवतारकी कथा सुनायी। वेदवेत्ता ब्राह्मण इसी तरह भगवान् विष्णुके यश (लीला-चरित्र) का वर्णन करते हैं ॥ १०३ ॥
भूयो भूतात्मनो विष्णोः प्रादुर्भावो महात्मनः।
दत्तात्रेय इति ख्यातः क्षमया परया युतः ॥ १०४ ॥
इसके बाद भूतात्मा परमात्मा विष्णुका फिर जो अवतार हुआ, वह दत्तात्रेयके नामसे विख्यात है। भगवान् दत्तात्रेय बड़े ही क्षमाशील थे ॥ १०४ ॥
तेन नष्टेषु वेदेषु प्रक्रियासु मखेषु च।
चातुर्वर्ण्यं तु संकीर्णे धर्मे शिथिलतां गते ॥ १०५॥
अभिवर्धति चाधर्मे सत्ये नष्टेऽनृते स्थिते।
प्रजासु शीर्यमाणासु धर्मे चाकुलतां गते ॥ १०६॥
उस समय वेद लुप्त हो गये थे, वैदिकी प्रक्रिया और यज्ञ भी नष्टप्राय हो गये थे, चारों वर्णोंमें संकरता आ गयी थी, धर्म शिथिल हो चला था, अधर्म बड़े जोरोंके साथ बढ़ रहा था। सत्य मिटता जा रहा था और सब ओर असत्यका बोलबाला था। प्रजा क्षीण हो रही थी और धर्म पाखण्डसे मिश्रित हो गया था ॥ १०५-१०६ ॥
सहयज्ञक्रिया वेदाः प्रत्यानीता हि तेन वै।
चातुर्वर्ण्यमसंकीर्णं कृतं तेन महात्मना ॥ १०७॥
ऐसे समयमें भगवान् दत्तात्रेयने यज्ञों और क्रियाओंसहित वेदोंका पुनरुद्धार किया और चारों वर्णोंको पृथक्-पृथक् करके उन्हें व्यवस्थित रूप दिया ॥ १०७ ॥
तेन हैहयराजस्य कार्तवीर्यस्य धीमतः।
वरदेन वरो दत्तो दत्तात्रेयेण धीमता ॥ १०८॥
वरदायक एवं ज्ञाननिष्ठ भगवान् दत्तात्रेयने हैहयवंशी बुद्धिमान् राजा कार्तवीर्यको यह वर दिया था—॥ १०८ ॥
एतत् बाहुद्वयं यत्ते मृधे मम कृतेऽनघ।
शतानि दश बाहूनां भविष्यन्ति न संशयः ॥ १०९॥
‘निष्पाप नरेश ! ये जो तुम्हारी दो भुजाएँ हैं, मेरे वरदानके प्रभावसे युद्धके समय निस्सन्देह एक हजार भुजाओंके रूपमें परिणत हो जायँगी ॥ १०९ ॥
पालयिष्यसि कृत्स्नां च वसुधां वसुधाधिप।
दुर्निरीक्ष्योऽरिवृन्दानां धर्मज्ञश्च भविष्यसि ॥ ११०॥
‘पृथ्वीनाथ ! तुम सारी पृथ्वीका पालन करोगे, शत्रुओंके समुदाय तुम्हारी ओर बड़ी कठिनतासे देख सकेंगे तथा तुम धर्मके ज्ञाता होओगे’ ॥ ११० ॥
एष ते वैष्णवः श्रीमान् प्रादुर्भावोऽद्भुतः शुभः।
कथितो वै महाराज यथाश्रुतमरिंदम ॥ १११॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले महाराज ! मैंने जैसा सुना था, उसके अनुसार तुमसे भगवान् विष्णुके इस अद्भुत, शुभ एवं तेजस्वी अवतारका वर्णन किया है ॥ १११॥
भूयश्च जामदग्न्योऽयं प्रादुर्भावो महात्मनः।
| १५२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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यन्न बाहुसहस्रेण विस्मितं दुर्जयं रणे।
रामोऽर्जुनमनीकस्थं जघान नृपतिं प्रभुः ॥११२॥
फिर परमात्मा श्रीहरिका जमदग्निनन्दन परशुरामके रूपमें अवतार हुआ। उस अवतारमें भगवान् परशुरामने सेनाके बीचमें खड़े हुए उस राजा अर्जुनका वध किया था, जो अपनी सहस्र भुजाओंके कारण घमंडमें भरा रहता था और समराङ्गणमें शत्रुओंके लिये दुर्जय बना हुआ था ॥
रथस्थं पार्थिवं रामः पातयित्वार्जुनं भुवि।
धर्षयित्वा यथाकामं क्रोशमानं च मेघवत् ॥११३॥
कृत्स्नं बाहुसहस्रं च चिच्छेद भृगुनन्दनः।
परश्वधेन दीप्तेन ज्ञातिभिः सहितस्य वै ॥११४॥
राजा अर्जुन रथपर बैठा था, परंतु भृगुनन्दन परशुरामजीने उसे धरतीपर गिरा दिया और इच्छानुसार छातीपर चढ़कर चमकते हुए फरसेसे उसकी सम्पूर्ण सहस्रों भुजाएँ काट डालीं। यद्यपि वह जाति-भाइयों एवं कुटुम्बीजनोंके साथ था, तो भी उसकी यह दशा हो गयी। उस समय कार्तवीर्य मेघके समान गम्भीर स्वरमें जोर-जोरसे चीखता-चिल्लाता रहा ॥ ११३-११४ ॥
कीर्णा क्षत्रियकोटीभिर्मेरुमन्दरभूषणा।
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी तेन निःक्षत्रिया कृता ॥११५॥
उन्होंने मेरु और मन्दराचलसे विभूषित समस्त पृथ्वीपर करोड़ों क्षत्रियोंकी लाशें बिछा दीं तथा इक्कीस बार भूतलको क्षत्रियोंसे शून्य कर दिया ॥ ११५ ॥
कृत्वा निःक्षत्रियां चैव भार्गवः सुमहातपाः।
सर्वपापविनाशाय वाजिमेधेन चेष्टवान् ॥११६॥
पृथ्वीको क्षत्रियहीन करके महातपस्वी भृगुनन्दन परशुरामने अपने सम्पूर्ण पापोंका नाश (प्रायश्चित्त) करनेके लिये अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया ॥ ११६ ॥
तस्मिन् यज्ञे महादाने दक्षिणां भृगुनन्दनः।
मारीचाय ददौ प्रीतः कश्यपाय वसुंधराम् ॥११७॥
जिसमें बड़ा भारी दान दिया जाता है, उस अश्वमेध यज्ञमें भृगुनन्दन परशुरामने प्रसन्न होकर मरीचिकुमार कश्यपको दक्षिणारूपसे यह सारी पृथ्वी दे दी थी ॥ ११७ ॥
वारुणांस्तुरगाञ्छीघ्रान् रथं च रथिनां वरः।
हिरण्यमक्षयं धेनूर्गजेन्द्रांश्च महामनाः।
ददौ तस्मिन् महायज्ञे वाजिमेधे महायशाः ॥११८॥
महायशस्वी, महामनस्वी, रथियोंमें श्रेष्ठ परशुरामने उस अश्वमेध नामक महायज्ञमें वरुणके यहाँसे प्राप्त हुए शीघ्रगामी घोड़े, रथ, अक्षय सुवर्णराशि, धेनु और गजराज भी दानमें दिये थे ॥ ११८ ॥
अद्यापि च हितार्थाय लोकानां भृगुनन्दनः।
चरमाणस्तपो दीप्तं जामदग्न्यः पुनः पुनः।
तिष्ठते देववद् धीमान् महेन्द्रे पर्वतोत्तमे ॥११९॥
आज भी समस्त लोकोंके हितके लिये बारंबार तीव्र तपस्या करते हुए भृगुकुलनन्दन जमदग्निकुमार बुद्धिमान् परशुराम उत्तम महेन्द्रपर्वतपर देवताओंके समान निवास करते हैं ॥ ११९ ॥
एष विष्णोः सुरेशस्य शाश्वतस्याव्ययस्य च।
जामदग्न्य इति ख्यातः प्रादुर्भावो महात्मनः ॥१२०॥
जनमेजय ! समस्त देवताओंके स्वामी सनातन एवं अविनाशी पुरुष परमात्मा विष्णुके इस परशुराम नामक अवतारका वर्णन किया गया ॥ १२० ॥
चतुर्विंशे युगे चापि विश्वामित्रपुरस्सरः।
राज्ञो दशरथस्याथ पुत्रः पद्मायतेक्षणः ॥१२१॥
चौबीसवें त्रेतायुगमें भगवान् विष्णु राजा दशरथके पुत्र कमलनयन श्रीरामके रूपमें प्रकट हुए और कुछ कालतक विश्वामित्रके अनुयायी रहे ॥ १२१ ॥
कृत्वाऽऽत्मानं महाबाहुश्चतुर्धा प्रभुरीश्वरः।
लोके राम इति ख्यातस्तेजसा भास्करोपमः ॥१२२॥
उस समय सर्वसमर्थ महाबाहु भगवान् अपनेको चार रूपोंमें प्रकट करके स्वयं श्रीराम नामसे विख्यात हुए। वे श्रीराम सूर्यके समान तेजस्वी थे ॥ १२२ ॥
प्रसादनार्थं लोकस्य रक्षसां निधनाय च।
धर्मस्य च विवृद्धयर्थं जज्ञे तत्र महायशाः ॥१२३॥
महायशस्वी श्रीराम सब लोगोंको प्रसन्न रखने, राक्षसोंको मारने और धर्मकी वृद्धि करनेके लिये उस समय अवतीर्ण हुए थे ॥ १२३ ॥
तमप्याहुर्मनुष्येन्द्रं सर्वभूतपतेस्तनुम्।
यस्मै दत्तानि शस्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता ॥१२४॥
वधार्थं देवशत्रूणां दुर्धराणि सुरैरपि।
ज्ञानी पुरुष उन नरेन्द्र श्रीरामको समस्त भूतोंके स्वामी भगवान् विष्णुका अवतार-विग्रह बताते हैं, जिन्हें परम बुद्धिमान् विश्वामित्रजीने देव-द्रोही असुरोंका वध करनेके लिये ऐसे दिव्यास्त्र प्रदान किये थे, जिन्हें धारण करना देवताओंके लिये भी कठिन था ॥ १२४ १/२ ॥
यज्ञविघ्नकरो येन मुनीनां भावितात्मनाम् ॥१२५॥
मारीचश्च सुबाहुश्च बलेन बलिनां वरौ।
निहतौ च निराशौ च कृतौ तेन महात्मना ॥१२६॥
महात्मा श्रीरामने पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंके यज्ञमें विघ्न डालनेवाले बलवानोंमें श्रेष्ठ मारीच और सुबाहुको अपने
हरिवंशपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः [ १५३
बाणोंका निशाना बनाया और उनकी आशा पूर्ण होने नहीं दी॥ १२५-१२६ ॥
वर्तमाने मखे येन जनकस्य महात्मनः।
भग्नं माहेश्वरं चापं क्रीडता लीलया पुरा ॥१२७॥
पूर्वकालमें जब महात्मा राजा जनकके यहाँ यज्ञ हो रहा था, उस समय उन्हीं श्रीरामने खेल-सा करते हुए महा-देवजीके धनुषको अनायास ही तोड़ डाला था ॥ १२७ ॥
यः समाः सर्वधर्मज्ञश्चतुर्दश वनेऽवसत्।
लक्ष्मणानुचरो रामः सर्वभूतहिते रतः॥ १२८॥
वे सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता तथा समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले थे। उन्होंने लक्ष्मणको साथ ले चौदह वर्षों-तक वनमें निवास किया ॥ १२८ ॥
रूपिणी यस्य पार्श्वस्था सीतेति प्रथिता जनैः।
पूर्वोचिता तस्य लक्ष्मीर्भर्तारमनुगच्छति ॥१२९॥
उस समय उनके साथ मूर्तिमती लक्ष्मी भी थीं, जो लोगोंमें 'सीता' के नामसे प्रसिद्ध थीं। वे उनकी पूर्वोचित पत्नी थीं और पतिके पीछे-पीछे वनमें गयी थीं॥ १२९॥
चतुर्दश तपस्तप्त्वा वने वर्षाणि राघवः।
जनस्थाने वसन् कार्यं त्रिदशानां चकार ह ॥१३०॥
चौदह वर्षोंतक वनमें तपस्या करके जनस्थानमें निवास करते हुए रघुनन्दन श्रीरामने देवताओंका अभीष्ट कार्य सिद्ध किया ॥ १३० ॥
सीतायाः पदमन्विच्छंल्लक्ष्मणानुचरो विभुः।
विराधं च कबन्धं च राक्षसौ भीमविक्रमौ।
जघान पुरुषव्याघ्रौ गन्धर्वौ शापविक्षतौ ॥१३१॥
उन भगवान् श्रीरामने (रावणके द्वारा अपहृत) सीताका पता लगाते हुए लक्ष्मणके साथ जाकर भयानक-पराक्रमी राक्षस विराध और कबन्धको मार डाला। वे दोनों वास्तवमे पुरुषसिंह गन्धर्व थे, किंतु शाप-ग्रस्त होकर राक्षस हो गये थे॥ १३१॥
हुताशनाकॆन्दुसडिद्धनाभैः प्रतप्तजाम्बूनदचित्रपुङ्खैः।
महेन्द्रवज्राशनितुल्यसारैः शरैः शरीरेण वियोजितौ बलात् ॥१३२॥
इन राक्षसोंपर श्रीरामचन्द्रजीने ऐसे बाणोंद्वारा प्रहार किया, जो अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, बिजली और मेघके समान प्रकाशित होते थे, जिनके विचित्र पंख तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णके बने हुए थे और जो इन्द्रके वज्र तथा विद्युत्-के समान शक्तिशाली थे। उन बाणोंद्वारा उन्होंने बलपूर्वक उन दोनों राक्षसोंको शरीरसे विलग कर दिया ॥ १३२ ॥
सुग्रीवस्य कृते येन वानरेन्द्रो महाबलः।
वाली विनिहतो युद्धे सुग्रीवश्चाभिषेचितः ॥१३३॥
श्रीरामने अपने मित्र सुग्रीव (की भलाई) के लिये युद्धमें महाबली वानरराज वालीको मार डाला और उसके राज्यपर सुग्रीवका अभिषेक कर दिया ॥ १३३ ॥
देवासुरगणानां हि यक्षगन्धर्वभोगिनाम्।
अवध्यं राक्षसेन्द्रं तं रावणं युद्धदुर्मदम् ॥१३४॥
युक्तं राक्षसकोटीभिर्नीलाञ्जनचयोपमम्।
त्रैलोक्यरावणं घोरं रावणं राक्षसेश्वरम् ॥१३५॥
दुर्जयं दुर्धरं दृप्तं शार्दूलसमविक्रमम्।
दुर्निरीक्ष्यं सुरगणैर्वरदानेन दर्पितम् ॥१३६॥
जघान सचिवैः सार्द्धं ससैन्यं रावणं युधि।
महाभ्रघनसङ्काशं महाकायं महाबलम् ॥१३७॥
उन दिनों राक्षसराज रावण देवता, असुर, यक्ष, गन्धर्व और नागोंके लिये अवध्य हो रहा था। युद्धमें वह उन्मत्त होकर लड़ता था। करोड़ों राक्षस उसके सहायक थे। उसका शरीर काले अञ्जनके ढेरके समान था। त्रिलोकीको रुलाने-वाला वह भयंकर राक्षसराज रावण दुर्जय और दुर्धर्ष था। उसका पराक्रम सिंहके समान था। उसका घमंड बहुत बढ़ा हुआ था। वरदानके कारण वह और भी घमंडी हो गया था। देवताओंके लिये उसकी ओर देखना भी कठिन था। उसका शरीर मेघोंकी घटाके समान काला था। भगवान् श्रीरामने उस महाकाय महाबली रावणका युद्धमें मन्त्रियों तथा सेनाओंसहित संहार कर डाला ॥ १३४-१३७ ॥
तमागस्कारिणं घोरं पौलस्त्यं युधि दुर्जयम्।
सभ्रातृपुत्रसचिवं ससैन्यं क्रूरनिश्चयम् ॥१३८॥
रावणं निजघानाशु रामो भूतपतिः पुरा।
पुलस्त्य-पौत्र रावण भयानक अपराधी था, उसका प्रत्येक निश्चय क्रूरतासे पूर्ण होता था; युद्धमें उसपर विजय पाना कठिन था। तो भी सम्पूर्ण भूतोंके पालक भगवान् श्रीरामने पूर्वकालमें उसे भाई, पुत्र, मन्त्री और सेनाओंसहित शीघ्रता-पूर्वक मार डाला ॥ १३८ ॥
मधोश्च तनयो दृप्तो लवणो नाम दानवः ॥१३९॥
हतो मधुवने वीरो वरदृप्तो महासुरः।
समरे युद्धशौण्डेन तथा चान्येऽपि राक्षसाः ॥१४०॥
उन्हीं दिनो मधुवन (मथुरा) में लवण नामक दानव रहता था, जो मधुका पुत्र था। वह महान् असुर वीर तो था ही, मनोवाञ्छित वर पा जानेके कारण और भी घमंडमे भर गया था। वह श्रीरामके ही स्वरूपभूत शत्रुघ्नके हाथसे मारा गया। युद्धकुशल श्रीराम (तथा उनके भाइयों) ने समराङ्गणमे और भी बहुत-से राक्षसोंका सहार किया ॥ १३९-१४० ॥
१५४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
एतानि कृत्वा कर्माणि रामो धर्मभृतां वरः। दशाश्वमेधाञ्जारूढ्यानाजहार निरर्गलान् ॥१४१॥ इन सब (पराक्रमपूर्ण) कर्मोंका सम्पादन करके धर्मत्माओं- में श्रेष्ठ श्रीरामने तीनगुनी दक्षिणासे युक्त दस अश्वमेध यज्ञ किये, जो बिना किसी विघ्न बाधाके पूर्ण हो गये ॥ १४१ ॥
नाश्रूयन्ताशुभा वाचो नाकुलं मारुतो ववौ । न वित्तहरणं त्वासीद् रामे राज्यं प्रशासति ॥१४२॥ श्रीरामचन्द्रजी जब राज्यका शासन करते थे, उन दिनों कहीं अशुभ बातें नहीं सुनी जाती थीं, वायु प्रचण्ड वेगसे नहीं चलती थी तथा कोई किसीके धनका अपहरण नहीं करता था ॥ १४२ ॥
पर्यदेवन्न विधवा नानर्थाश्चाभवंस्तदा । सर्वमासीज्जगद् दान्तं रामे राज्यं प्रशासति ॥१४३॥ श्रीरामके राज्य-शासनकालमें कभी विधवाओंका करुण क्रन्दन नहीं सुना गया। कहीं भी अनर्थपूर्ण घटनाएँ नहीं घटित हुईं। सारे जगत्के लोग (मन और इन्द्रियोंका संयम रखकर) विनीत एवं अनुशासित रहते थे॥ १४३ ॥
न प्राणिनां भयं चापि जलानलनिघातजम् । न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते ॥१४४॥ श्रीरामके राज्यकालमें प्राणियोंको जल और अग्निसे मृत्युका भय कभी नहीं होता था और वृद्धोंको बालकोंकी प्रेतक्रिया नहीं करनी पड़ती थी ॥ १४४ ॥
ब्रह्म पर्यचरत् क्षत्रं विशः क्षत्रमनुव्रताः । शूद्राश्चैव हि वर्णांस्त्रीञ्छुश्रूषन्त्यनहंकृताः । नार्यो नात्यचरन् भर्तॄन् भार्या नात्यचरन् पतिः ॥१४५॥ क्षत्रिय ब्राह्मणोंकी परिचर्या करते थे, वैश्य क्षत्रियोंके प्रति श्रद्धा रखते थे और शूद्र अहंकार छोड़कर ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंकी सेवा करते थे । श्रीरामके राज्यमें स्त्रियाँ अपने पतिको छोड़कर दूसरे किसी पुरुषमें आसक्त नहीं होती थीं और पुरुष भी अपनी पत्नीके सिवा दूसरी किसी स्त्रीपर आसक्तिपूर्ण दृष्टि नहीं डालते थे ॥ १४५ ॥
सर्वमासीज्जगद् दान्तं निर्दस्युरभवन्मही । राम एकोऽभवद् भर्त्ता रामः पालयिताभवत् ॥१४६॥ उस समय सारा जगत् जितेन्द्रिय था । पृथ्वीपर डाकुओंका कहीं नाम भी नहीं था। एकमात्र श्रीराम ही सबके स्वामी और संरक्षक थे ॥ १४६ ॥
आयुर्वर्षसहस्राणि तथा पुत्रसहस्रिणः । अरोगाः प्राणिनश्चासन् रामे राज्यं प्रशासति ॥१४७॥ श्रीरामके शासनकालमें मनुष्योंकी आयु हजारों वर्षकी होती थी । वे सहस्रों पुत्रोंके पिता होते थे और किसी भी प्राणीको रोग नहीं सताता था ॥ १४७ ॥
देवतानामृषीणां च मनुष्याणां च सर्वशः । पृथिव्यां समवायोऽभूद् रामे राज्यं प्रशासति ॥१४८॥ भगवान् श्रीराम जब यहाँ राज्यशासन करते थे, उन दिनों इस भूतलपर देवता, ऋषि और मनुष्योंका सब ओर समागम होता रहता था ॥ १४८ ॥
गाथा अप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः । रामे निबद्धतत्त्वार्था माहात्म्यं तस्य धीमतः ॥१४९॥ श्रीरामके विषयमें 'वे ही परम तत्त्व हैं' ऐसी दृढ़ आस्था रखनेवाले पुराणवेत्ता पुरुष इस प्रसङ्गमें निम्नाङ्कित गाथाएँ गाया करते हैं, जो उन बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजीके माहात्म्यको सूचित करती हैं—॥ १४९ ॥
श्यामो युवा लोहिताक्षो दीप्तास्यो मितभाषिता । आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः ॥१५०॥ दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च । अयोध्याधिपतिर्भूत्वा रामो राज्यमकारयत् ॥१५१॥ 'श्रीरामचन्द्रजीका वर्ण श्याम था, वे सदा तरुण दिखायी देते थे, उनके नेत्र (कुछ-कुछ) लालिमा लिये हुए थे, मुखसे तेज बरसता रहता था, वे बहुत कम बोलते थे, उनकी लंबी भुजाएँ घुटनोंतक पहुँचती थीं, उनका मुख बड़ा सुन्दर था, कंधे सिंहके-से जान पड़ते थे, महाबाहु श्रीरामने अयोध्याके अधिपति होकर ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य किया था॥ १५०-१५१ ॥
ऋक्सामयजुषां घोषो ज्याघोषश्च महात्मनः । अव्युच्छिन्नोऽभवद्राज्ये दीयतां भुज्यतामिति ॥१५२॥ 'उनके राज्यमें सदा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदका घोष सुनायी देता था। धनुषकी प्रत्यञ्चा खींचनेसे उसकी टंकार-ध्वनि भी सदा श्रवणगोचर होती रहती थी तथा दान देने और भोजन करानेका उपदेश कभी बंद नहीं होता था ॥ १५२ ॥
सत्त्ववान् गुणसम्पन्नो दीप्यमानः स्वतेजसा । अति चन्द्रं च सूर्यं च रामो दाशरथिर्बभौ ॥१५३॥ 'दशरथनन्दन श्रीराम सत्त्ववान् और गुणवान् होनेके साथ ही सदा अपने तेजसे देदीप्यमान रहते थे। उनकी सूर्य और चन्द्रमासे भी अधिक शोभा होती थी ॥ १५३ ॥
ईजे क्रतुशतैः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः । हित्वायोध्यां दिवं यातो राघवः समहाबलः ॥१५४॥ 'श्रीरघुनाथजीने पर्याप्त एवं उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त सैकड़ों पवित्र यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। अन्तमें वे अयोध्याके महान् जन-समुदायको साथ ले अपनी उस पुरीको छोड़कर साकेत धामको पधारे' ॥ १५४ ॥
| हरिवंशपर्व ] | एकचत्वारिंशोऽध्यायः | १५५ |
|---|
एवमेष महाबाहुरिक्ष्वाकुकुलनन्दनः ।
रावणं सगणं हत्वा दिवमाचक्रमे प्रभुः ॥ १५५॥
इस प्रकार इक्ष्वाकुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले ये महाबाहु भगवान् श्रीराम दलवलसहित रावणका संहार करके अपने परमधामको चले गये ॥ १५५ ॥
वैशम्पायन उवाच
अपरः केशवस्यायं प्रादुर्भावो महात्मनः ।
विख्यातो माथुरे कल्पे सर्वलोकहिताय वै ॥ १५६॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—(जनमेजय !) इसके बाद परमात्मा भगवान् केशवका 'श्रीकृष्ण' नामक अवतार माथुर कल्प (मथुराकाण्ड) में हुआ, जो सर्वत्र विख्यात है। भगवान्का यह अवतार सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये हुआ था॥
यत्र शाल्वं च मैन्दं च द्विविदं कंसमेव च ।
अरिष्टमृषभं केशिं पूतनां दैत्यदारिकाम् ॥ १५७॥
नागं कुवलयापीडं चाणूरं मुष्टिकं तथा ।
दैत्यान् मानुषदेहस्थान् सूदयामास वीर्यवान् ॥ १५८॥
इस अवतारमें परम पराक्रमी हरिने शाल्व, मैन्द, द्विविद, कंस, अरिष्ट, ऋषभ, केशी, दैत्य-कन्या पूतना, कुवलयापीड हाथी, चाणूर तथा मुष्टिक आदि मनुष्य-शरीरधारी दैत्योंका संहार किया था ॥ १५७-१५८ ॥
छिन्नं बाहुसहस्रं च बाणस्याद्भुतकर्मणः ।
नरकश्च हतः संख्ये यवनश्च महाबलः ॥ १५९॥
इसके अतिरिक्त उन्होंने अद्भुत कर्म करनेवाले बाणासुरकी सहस्र भुजाएँ काट डालीं, युद्धमें नरकासुरका नाश किया और महाबली कालयवनको भस्म करा दिया ॥ १५९॥
हृतानि च महीपानां सर्वरत्नानि तेजसा ।
दुराचाराश्च निहताः पार्थिवाश्च महीतले ॥ १६०॥
इतना ही नहीं, उन्होंने अपने तेजसे भूमिपालोंके सभी रत्न छीन लिये और भूतलके दुराचारी राजाओंको मौतके घाट उतार दिया ॥ १६० ॥
नवमे द्वापरे विष्णुरष्टाविंशे पुराभवत् ।
वेदव्यासस्तथा जज्ञे जातूकर्ण्यपुरस्सरः ॥ १६१॥
(यहाँतक जो सात अवतार बताये गये, उनमें मत्स्य-कच्छप अवतारोंका भी अन्तर्भाव करके उन्हें नौ समझना चाहिये।) अट्ठाईसवें द्वापरमें भगवान् विष्णुका यह (श्रीकृष्ण नामक) नवम अवतार हुआ था। इससे कुछ पहले ही उनका दसवाँ अवतार भी हो गया था, जो जातूकर्ण्यके साथ प्रकट हुआ था। वह वेदव्यासके नामसे प्रसिद्ध है॥
एको वेदश्चतुर्धा तु कृतस्तेन महात्मना ।
जनितो भारतो वंशः सत्यवत्याः सुतेन च ॥ १६२॥
उन सत्यवतीपुत्र महात्मा व्यासने एक वेदके चार विभाग किये और उन्होंने ही भरतवंशकी लुप्त हुई परम्पराको पुनः प्रचलित किया ॥ १६२ ॥
एते लोकहितार्थाय प्रादुर्भावा महात्मनः ।
अतीताः कथिता राजन् कथ्यन्ते चाप्यनागताः ॥ १६३॥
राजन् ! समस्त जगत्का कल्याण करनेके लिये प्रकट हुए परमात्मा श्रीहरिके जो उक्त (दस) अवतार बीत गये हैं, उनकी चर्चा यहाँ की गयी। अब उनके भविष्यमें होनेवाले अवतार बताये जाते हैं ॥ १६३ ॥
कल्किर्विष्णुयशा नाम शाम्भले ग्रामके द्विजः ।
सर्वलोकहितार्थाय भूयश्चोत्पत्स्यते प्रभुः ॥ १६४॥
(भावी अवतारोंमें पहले 'बुद्ध' का प्राकट्य होगा।) इसके बाद विष्णुयशा नामसे प्रसिद्ध कल्कि अवतार होनेवाला है। भगवान् विष्णु शाम्भल नामक ग्राममें सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये पुनः एक ब्राह्मणके रूपमें प्रकट होंगे ॥ १६४ ॥
दशमे भाव्यसम्पन्नो याज्ञवल्क्यपुरस्सरः ।
क्षपयित्वा च तान् सर्वान् भाविनाथेन चोदितान् १६५
गङ्गायमुनयोर्मध्ये निष्ठां प्राप्स्यति सानुगः ।
पूर्वोक्त दशम अवतारका समय बीत जानेपर याज्ञवल्क्य ऋषिको साथ लेकर प्रकट होनेवाला यह अवतार भावी प्रयोजन (दुष्टोंके संहार और धर्मकी संस्थापना) को सिद्ध करनेकी शक्तिसे सम्पन्न होगा। भगवान् कल्कि भवितव्यतासे प्रेरित होकर अधर्मके पथपर चलनेवाले उन समस्त पापाचारियोंका संहार करके अपने अनुयायियोंसहित गङ्गा और यमुनाके मध्यवर्ती देशमें अपने अवतारकार्यको समाप्त करेंगे ॥
ततः कुले व्यतीते तु सामात्ये सहसैनिके ॥ १६६॥
नृपेष्वथ प्रणष्टेषु तदा त्वप्रग्रहाः प्रजाः ।
तदनन्तर मन्त्री और सैनिकोंसहित राजवंशके विनष्ट हो जानेपर जब कोई शासक नरेश नहीं रह जायगा, तब सारी प्रजा बेलगाम होकर स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त हो जायगी ॥१६६ १/२॥
क्षणे विनिवृत्ते च हत्वा चान्योन्यमाहवे ॥ १६७॥
परस्परहृतस्वाश्च निराक्रन्दाः सुदुःखिताः ।
रक्षाकी राजकीय व्यवस्था समाप्त हो जानेपर लोग (आपसमें लड़ेंगे और) उस युद्धमें एक दूसरेको मारकर नष्ट हो जायेंगे। आपसमें एक-दूसरेका धन लूटकर असहाय एवं अत्यन्त दुःखी हो जायेंगे ॥ १६७ १/२ ॥
एवं कष्टमनुप्राप्ताः कलिसंध्यांशके तदा ।
प्रजाः क्षयं प्रयास्यन्ति सार्द्धं कलियुगेन ह ॥ १६८॥
उस समय कलियुगका संध्यांश बीत रहा होगा, उन दिनों इस प्रकार कष्टमें पड़ी हुई सारी प्रजा कलियुगके साथ ही नष्ट हो जायगी—ऐसी बात कही जाती है ॥ १६८ ॥
| १५६ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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क्षीणे कलियुगे तस्मिंस्ततः कृतयुगं पुनः ।
प्रपत्स्यते यथान्यायं स्वभावादेव नान्यथा ॥ १६९ ॥
कलियुगके समाप्त हो जानेपर फिर स्वभावसे ही सत्ययुगकी यथोचितरूपसे प्रवृत्ति होगी, दूसरे किसी प्रकारसे नहीं ॥
एते चान्ये च बहवो दिव्या देवगुणैर्युताः ।
प्रादुर्भावाः पुराणेषु गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः ॥ १७० ॥
राजन् ! ये तथा और भी भगवान्के बहुत-से दिव्य अवतार हुए हैं, जो देवोचित गुणोंसे सम्पन्न थे। ब्रह्मवादी मुनियोंने पुराणोंमे उनका गान किया है ॥ १७० ॥
यत्र देवाश्च मुह्यन्ति प्रादुर्भावानुकीर्तने ।
पुराणं वर्तते यत्र वेदश्रुतिसमाहितम् ॥ १७१ ॥
भगवान्के इन अवतारोंका वर्णन करनेमें देवता भी चकरा जाते हैं—इस विषयमे पुराण ही प्रमाण है, जिसका वैदिक श्रुतियोंद्वारा समर्थन होता है ॥ १७१ ॥
एतदुद्देशमात्रेण प्रादुर्भावानुकीर्तनम् ।
कीर्तितं कीर्तनीयस्य सर्वलोकगुरोः प्रभोः ॥ १७२ ॥
सम्पूर्ण जगत्के गुरु तथा कीर्तन करनेयोग्य सर्वशक्तिमान् भगवान्के अवतारोंका यह वर्णन संक्षेपसे ही किया गया है ॥ १७२ ॥
प्रीयन्ते पितरस्तस्य प्रादुर्भावानुकीर्तनात् ।
विष्णोरतुलवीर्यस्य यः शृणोति कृताञ्जलिः ॥ १७३ ॥
अनुपम-शक्तिशाली भगवान् विष्णुके अवतारोंकी वारंवार चर्चा करनेसे पितरोंको प्रसन्नता होती है। जो हाथ जोड़कर आदरपूर्वक इस अवतार-कथाको सुनता है, उसके पितरोंको भी अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है ॥ १७३ ॥
एतास्तु योगेश्वरयोगमायाः
श्रुत्वा नरो मुच्यति सर्वपापैः ।
ऋद्धिं समृद्धिं विपुलांश्च भोगान्
प्राप्नोति सर्वं भगवत्प्रसादात् ॥ १७४ ॥
जो मनुष्य योगेश्वर भगवान् श्रीहरिकी योगमाया द्वारा प्रकट हुए अवतारोंकी इन लीला-कथाओंको सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा भगवान्की कृपासे शीघ्र ही उसे ऋद्धि, समृद्धि एवं प्रचुर भोग—सबकी प्राप्ति हो जाती है ॥ १७४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि प्रादुर्भावानुसंग्रहो नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें अवतारोंका संग्रहनामक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
भगवान् विष्णुके ईश्वरत्वका वर्णन एवं अद्भुततारकामय संग्रामकी कथा
वैशम्पायन उवाच
विश्वत्वं शृणु मे विष्णोर्हरित्वं च कृते युगे ।
वैकुण्ठत्वं च देवेषु कृष्णत्वं मानुषेषु च ॥ १ ॥
ईश्वरत्वं च तस्येदं गहनां कर्मणां गतिम् ।
सम्प्रत्यतीतां भव्यां च शृणु राजन् यथातथम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन् ! अब तुम मुझसे सत्ययुगमे विष्णुके विश्वत्वको (उनके अभयदायक आश्वासक रूपको), हरित्वको (पापहारी रूपको), देवताओंमे भगवान्के वैकुण्ठत्वको (सर्वसमर्थताको) और पुरुषोंमें उनके श्रीकृष्णत्वको (सच्चिदानन्दताको) तथा उनके ईश्वरत्वको (दण्ड देने और कृपा करनेकी सामर्थ्यको) और उनके भूत, भविष्य एवं वर्तमान कर्मों (लीलाओं) की गहन गति (दुर्बोध स्वरूप) को यथार्थरूपसे सुनो ॥ १-२ ॥
अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो यत्रैव भगवान् प्रभुः ।
नारायणो ह्यनन्तात्मा प्रभवोऽव्यय एव च ॥ ३ ॥
वे सर्वशक्तिमान् प्रभु अव्यक्त होनेपर भी (अवतार-विग्रह धारण करते समय) अपनी मूर्तिको प्रकट किये रहते हैं, वे नारायण, अनन्तस्वरूप, सबके उत्पत्तिस्थान और अव्यय (अविनाशी) हैं ॥ ३ ॥
एष नारायणो भूत्वा हरिरासीत् कृते युगे ।
ब्रह्मा शक्रश्च सोमश्च धर्मः शुक्रो वृहस्पतिः ॥ ४ ॥
कृतयुगमे ये नारायणरूप होकर हरि—मोक्षदायक बने और ये ही ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्रमा, धर्म, शुक्र और वृहस्पति-के रूपमे प्रकट हुए ॥ ४ ॥
अदितेरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दनः ।
एष विष्णुरिति ख्यात इन्द्रादवरजोऽभवत् ॥ ५ ॥
इसके अनन्तर ये यादवनन्दन (श्रीकृष्णरूपसे अवतार लेनेवाले भगवान्) ही विष्णुके नामसे अदितिके पुत्र बनकर उत्पन्न हुए। उस जन्ममे ये इन्द्रके छोटे भाई बने थे ॥ ५ ॥
प्रसादजं ह्यस्य विभोरदित्याः पुत्रजन्म तत् ।
वधार्थं सुरशत्रूणां दैत्यदानवरक्षसाम् ॥ ६ ॥
देवताओंके शत्रु दैत्य, दानव और राक्षसोंका संहार करनेके लिये भगवान् विष्णु अदितिके यहाँ पुत्र बनकर उत्पन्न हुए। यह उन विभुका प्रसाद (वरदान) रूप जन्म था ॥ ६ ॥
हरिवंशपर्व ] द्विचत्वारिंशोऽध्यायः १५७
प्रधानात्मा पुरा ह्येष ब्रह्माणमसृजत् प्रभुः।
सोऽसृजत् पूर्वपुरुषः पुरा कल्पे प्रजापतीन् ॥ ७ ॥
सृष्टिके आदिमे इन प्रधानात्मा—प्रकृतिके संचालक प्रभुने ही ब्रह्माको उत्पन्न किया और इन्हीं पुराणपुरुषने पूर्वकल्पमें (मरीचि आदि) प्रजापतियोंकी सृष्टि की ॥ ७ ॥
ते तन्वानास्तनूस्तत्र ब्रह्मवंशाननुत्तमान् ।
तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो बहुधा ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ८ ॥
उन प्रजापतियोंने (कश्यप आदिके रूपसे) अपने स्वरूपका विस्तार करके श्रेष्ठ ब्रह्मवंशों (गोत्रों) को उत्पन्न किया और उन महात्माओंसे सनातन वेद अनेक शाखाओंमे विभक्त हो गया ॥ ८ ॥
एतदाश्चर्यभूतस्य विष्णोर्नामानुकीर्तनम् ।
कीर्तनीयस्य लोकेषु कीर्त्यमानं निबोध मे ॥ ९ ॥
लोकोंमे कीर्तनीय आश्चर्यमय विष्णुके इस (वेदरूप) नामकीर्तनका उल्लेख मेरे द्वारा किया जा रहा है, तुम इसे सुनो ॥
वृत्ते वृत्रवधे तात वर्तमाने कृते युगे ।
आसीत् त्रैलोक्यविख्यातः संग्रामस्तारकामयः ॥१०॥
तात ! वर्तमान सत्ययुगमें वृत्रासुरका वध हो चुकनेपर त्रिलोकीमें प्रसिद्ध तारकामय संग्राम हुआ ॥ १० ॥
तत्रासन् दानवा घोराः सर्वे संग्रामदर्पिताः ।
घ्नन्ति देवगणान् सर्वान् सयक्षोरगराक्षसान् ॥ ११ ॥
उस समय सब-के-सब दानव संग्राममें दर्प भरे एवं भयकर दिखायी देते थे । उन्होंने यक्ष, राक्षस और सर्पों-सहित समस्त देवताओंको मारना आरम्भ कर दिया था ॥११॥
ते वध्यमाना विमुखाः क्षीणप्रहरणा रणे ।
त्रातारं मनसा जग्मुर्देवं नारायणं हरिम् ॥ १२ ॥
मार खाते-खाते जब उनके आयुध क्षीण हो गये, तब वे रणसे विमुख हो गये और सबकी रक्षा करनेवाले नारायणदेव श्रीहरिके ही मनसे शरण हो गये ॥ १२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे मेघा निर्वाणाङ्गारवर्षिणः ।
सार्कचन्द्रग्रहगणं छादयन्तो नभस्तलम् ॥ १३ ॥
इसी बीचमे मेघ तपे हुए लोहेके समान ज्वालारहित अँगारे बरसाने लगे । वे सूर्य, चन्द्रमा आदि ग्रहोंसहित आकाशको ढकते हुए दिखायी देते थे ॥ १३ ॥
चञ्चद्विद्युद्गणाविद्धा घोरा निर्ह्रादकारिणः ।
अन्योऽन्यवेगाभिहताः प्रववुः सप्त मारुताः ॥ १४ ॥
कौधती हुई बिजलियोंसे व्याप्त हो वे भयंकर बादल बड़े जोरसे गर्जने और परस्पर वेगसे टकराने लगे; क्योकि उस समय प्रवह आदि सात प्रकारकी हवाएँ चल रही थीं ॥ १४ ॥
दीप्ततोयाशनीपातैर्वज्रवेगानिलाकुलैः ।
ररास घोरैरुत्पातैर्दह्यमानमिवाम्बरम् ॥ १५ ॥
बिजली और तपे हुए जलके गिरने तथा वज्रके समान वेगवाली वायुके चलने आदि भयंकर उत्पातोंसे जलता हुआ-सा आकाश मानो कराहने लगा ॥ १५ ॥
पेतुरुल्कासहस्राणि मुहुराकाशगान्यपि ।
न्युब्जानि च विमानानि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च ॥ १६ ॥
उस समय हजारो उल्काएँ गिरती और फिर आकाशमे पहुँच जाती थीं तथा विमान नीचेको मुख करके गिरते और फिर उलटे ही उड़ जाते थे ॥ १६ ॥
चतुर्युगान्तपर्याये लोकानां यद् भयं भवेत् ।
तादृशान्येव रूपाणि तस्मिन्नुत्पातलक्षणे ॥ १७ ॥
हजार चतुर्युगोंके अन्तमे होनेवाले प्रलयके समय लोकों-को जो भय प्राप्त होता है, इस उत्पातके समय भी वैसे ही चिह्न दीखने लगे ॥ १७ ॥
तमसा निष्प्रभं सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ।
तिमिरौघपरिक्षिप्ता न रेजुश्च दिशो दश ॥ १८ ॥
सारा संसार अन्धकारसे व्याप्त हो जानेके कारण प्रभाहीन प्रतीत होने लगा; कुछ भी सूझता न था । अन्धकारसमूहसे आच्छादित हुई दसो दिशाएँ ज्ञात ही नहीं होती थीं ॥१८॥
निशेव रूपिणी काली कालमेघावगुण्ठिता ।
द्यौर्न भात्यभिभूताऽर्का घोरेण तमसा वृता ॥ १९ ॥
जैसे काले मेघोके घिर आनेपर अमावास्याकी रात्रि मूर्ति-मती-सी दीख पड़ती है, वैसे ही अन्धकारसे सूर्यके तिरोहित होनेपर घोर अन्धकारसे भरा हुआ आकाश शोभायमान नहीं लगता था ॥ १९ ॥
तान् घनौघान् सतिमिरान् दोर्भ्यामुत्क्षिप्य स प्रभुः ।
वपुः संदर्शयामास दिव्यं कृष्णवपुर्हरिः ॥ २० ॥
उस समय श्यामवर्ण भगवान् श्रीहरिने अपनी दोनों भुजाओंद्वारा अन्धकारसे व्याप्त उन मेघसमूहोंको ऊपरकी ओर ठेलकर अपने दिव्य स्वरूपका साक्षात्कार कराया ॥ २० ॥
बलाहकाञ्जननिभं बलाहकतनूरुहम् ।
तेजसा वपुषा चैव कृष्णं कृष्णमिवाचलम् ॥ २१ ॥
दीप्तपीताम्बरधरं तप्तकाञ्चनभूषणम् ।
धूमान्धकारवपुषा युगान्ताग्निमिवोत्थितम् ॥ २२ ॥
चतुर्द्विगुणपीनांसं बलाकापङ्क्तिभूषणम् ।
चामीकरकराकारैरायुधैरुपशोभितम् ॥ २३ ॥
चन्द्रार्ककिरणोद्द्योतं गिरिकूटं शिलोच्चयम् ।
नन्दकानन्दितकरं शराशीविषधारिणम् ॥ २४ ॥
शक्तिचित्रं हलोदग्रं शङ्खचक्रगदाधरम् ।
विष्णुशैलं क्षमामूलं श्रीवृक्षं शार्ङ्गधन्विनम् ॥ २५ ॥
हर्यश्वरथसंयुक्तं सुपर्णध्वजशोभिते ।
चन्द्रार्कचक्ररुचिरे मन्दराक्षधृतान्तरे ॥ २६ ॥
१५८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अनन्तरश्मिसंयुक्ते ददृशे मेरुकूबरे।
तारकाचित्रकुसुमे ग्रहनक्षत्रबन्धुरे ॥ २७ ॥
भयेष्वभयदं व्योम्नि देवा दैत्यपराजिताः।
ददृशुस्ते स्थितं देवं दिव्यलोकमये रथे ॥ २८ ॥
भगवान्के श्रीविग्रहका वर्ण मेघ और अञ्जनके समान था। उनके केश भी मेघके समान (काले) थे। उनका शरीर तो काले पर्वतके समान कृष्णवर्ण था ही, उससे तेज भी कृष्णवर्ण निकल रहा था। वे चमकता हुआ पीताम्बर धारण किये हुए थे और तपे हुए सुवर्णके आभूषण पहने थे। उस समय वे ऐसे लगते थे, जैसे धूमके समान अन्धकारमय शरीरसे आवेष्टित होकर प्रलयकालकी अग्नि प्रकट हुई हो। वे (अष्टभुज होनेके कारण) आठ मांसल बाहुमूलोंसे सुशोभित थे। चमकते हुए आभूषणोंसे युक्त उनका श्रीविग्रह ऐसी शोभा देता था, जैसे बगुलोंकी पंक्तिसे विभूषित मेघ हों। वे सुवर्णकी बनी मूठवाले आयुधोंसे सुशोभित तथा चन्द्रमा और सूर्यकी किरणोंसे दमकते हुए पर्वतके समान अचल थे। कटिप्रदेशमें मैनसिलके समान पीले रंगका नारा बाँधे हुए थे।* उनका एक हाथ नन्दक नामके खड्गसे सुशोभित था, वे दूसरे हाथमें सर्पाकार (लहरदार) बाण धारण किये हुए थे। शक्तिसे उनकी विचित्र शोभा हो रही थी। तीसरे हाथमें हल लिये रहनेके कारण वे बहुत ऊँचे दिखायी दे रहे थे। अन्य तीन हाथोंमें उन्होंने शङ्ख, चक्र और गदा धारण कर रखी थी। एक हाथमें उनके शार्ङ्ग (सींगका बना) धनुष था। भगवान् विष्णु एक पर्वतके समान दीख रहे थे। उनके अङ्गोंमें जो श्री हैं, वे ही वृक्ष स्थानीय थीं। जैसे पर्वतका मूलभाग क्षमा (पृथ्वी) पर प्रतिष्ठित है, उसी तरह श्रीहरिकी प्रीतिका मूल क्षमाभाव है। भयके अवसरोंपर अभयदान देनेवाले पर्वतके समान अटल भगवान् विष्णुको दैत्योंसे हारे हुए देवताओंने आकाशके बीच दिव्यलोकमय रथमें बैठे देखा। उस रथमें हरे रंगके घोड़े जुते हुए थे। वह गरुड़की ध्वजासे शोभित था। सूर्य और चन्द्रमारूपी पहियोंसे वह सुन्दर दिखायी देता था। उसके भीतरी भागको मन्दराचलरूपी धुरेने धारण कर रखा था। भगवान् शेष ही उसमें रश्मि (लगाम) बने हुए थे। मेरु पर्वत उसका कूबर (आगेका भाग) था। तारे ही उसमें रंग-बिरंगे फूलोंके रूपमें सजे थे तथा ग्रह-नक्षत्र उसमें डोरीके रूपमें लगे थे ॥ २१–२८ ॥
ते कृताञ्जलयः सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः।
जयशब्दं पुरस्कृत्य शरण्यं शरणं गताः ॥ २९ ॥
उस समय इन्द्र आदि समस्त देवताओंने जय-जय शब्दका उच्चारण किया और हाथ जोड़कर शरण देनेवाले विष्णु-भगवान्की शरण ग्रहण की ॥ २९ ॥
स तेषां ता गिरः श्रुत्वा विष्णुर्दयितदेवतः।
मनश्चक्रे विनाशाय दानवानां महामृधे ॥ ३० ॥
विष्णुको देवता प्रिय हैं, अतएव उन्होंने देवताओंकी उस वाणीको सुनकर महायुद्धमें दानवोंके नाश करनेका अपने मनमें विचार किया ॥ ३० ॥
आकाशे तु स्थितो विष्णुः सोत्तमे पुरुषोत्तमः।
उवाच देवताः सर्वाः सप्रतिज्ञमिदं वचः ॥ ३१ ॥
उत्तम आकाशमें विराजमान उन पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने सब देवताओंसे प्रतिज्ञापूर्वक यह बात कही—॥ ३१ ॥
शान्तिं भजत भद्रं वो मा भैष्ट मरुतां गणाः।
जिता मे दानवाः सर्वे त्रैलोक्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ ३२ ॥
‘देवताओ ! तुम्हारा कल्याण हो ! अब तुम शान्त हो जाओ, डरो मत। मेरे द्वारा सारे दानव जीत लिये गये—यों समझना चाहिये। (अब) तुम त्रिलोकीका राज्य अपना ही मानो और उसपर अधिकार करो’ ॥ ३२ ॥
ते तस्य सत्यसंघस्य विष्णोर्वाक्येन तोषिताः।
देवाः प्रीतिं परां जग्मुः प्राप्येवामृतमुत्थितम् ॥ ३३ ॥
सत्यप्रतिज्ञ भगवान् विष्णुके वाक्यसे आश्वासित हो देवता अत्यधिक प्रसन्न हुए, मानो उनको क्षीरसागरसे प्रकट हुआ अमृत मिल गया ॥ ३३ ॥
ततस्तमः संहियते विनेशुंश्च वलाहकाः।
प्रववुश्च शिवा वाताः प्रसन्नाश्च दिशो दश ॥ ३४ ॥
उस समय अन्धकार दूर हो गया, मेघ विलीन हो गये; सुखदायक वायु चलने लगी और दसों दिशाएँ निर्मल हो गयीं ॥ ३४ ॥
सुप्रभाणि च ज्योतींषि चन्द्रं चक्रुः प्रदक्षिणम्।
दीप्तिमन्ति च तेजांसि चक्रुरर्कं प्रदक्षिणम् ॥ ३५ ॥
सुन्दर प्रभावाले नक्षत्र चन्द्रमाकी और प्रकाशमान ग्रह सूर्यकी प्रदक्षिणा करने लगे ॥ ३५ ॥
न विग्रहं ग्रहाश्चक्रुः प्रसन्नाश्चापि सिन्धवः।
नीरजस्का बभुर्मार्गा नाकमार्गादयस्त्रयः ॥ ३६ ॥
ग्रहोंने आपसमें टकराना छोड़ दिया, नदियोंका जल निर्मल हो गया तथा देवयान, पितृयान और मोक्षमार्ग नामक तीनों मार्ग भी रज (धूल या रजोगुण) से रहित हो गये ॥ ३६ ॥
यथार्थमूहूः सरितो नापि चुक्षुभिरेऽर्णवाः।
आसञ्छुभानीन्द्रियाणि नराणामन्तरात्मसु ॥ ३७ ॥
* यहाँ नीलकंठजीने शिलाका अर्थ मैनसिल और उच्चयका अर्थ नीवीबन्ध या नारा किया है।
हरिवंशपर्व ] त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः [ १५९
नदियाँ ठीक ढंगसे बहने लगीं, समुद्रोंका क्षुब्ध होना बंद हो गया, मनुष्योंके मनोंमें इन्द्रियोंको शुभ कार्योंमें लगानेकी इच्छा होने लगी ॥ ३७ ॥
महर्षयो वीतशोका वेदानुच्चैरधीयते । यज्ञेषु च हविः स्वादु शिवमश्नन्ति पावकः ॥ ३८ ॥
महर्षि शोकरहित होकर उच्चस्वरसे वेदध्वनि करने लगे, अग्निदेव भी यज्ञोंमें पवित्र और स्वादु हविका भक्षण करने लगे ॥ ३८ ॥
प्रवृत्तधर्माः संवृत्ता लोका मुदितमानसाः । प्रीत्या परमया युक्ता देवदेवस्य भूपते । विष्णोः सत्यप्रतिज्ञस्य श्रुत्वारिनिधने गिरम् ॥ ३९ ॥
पृथ्वीनाथ ! सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाले देवपूज्य भगवान् विष्णुके द्वारा की गयी शत्रुनाशकी प्रतिज्ञा सुनकर प्राणी अपने मनमें प्रसन्न होकर परम प्रीतिसे यज्ञ आदि धर्मानुष्ठानमें प्रवृत्त हो गये ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आश्चर्यतारकामये द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आश्चर्यतारकामय संग्रामविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः
देवताओंके साथ युद्धके लिये उद्यत हुई दैत्यसेनाका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
ततो भयं विष्णुमयं श्रुत्वा दैतेयदानवाः ।
उद्योगं विपुलं चक्रुर्युद्धाय युधि दुर्जयाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर मुख्यतः भगवान् विष्णुकी ओरसे भय प्राप्त हुआ है, यह सुनकर रण-दुर्जय दैत्यों और दानवोंने युद्धके लिये बड़ा भारी उद्योग किया ॥ १ ॥
मयस्तु काञ्चनमयं त्रिनल्वान्तरमव्ययम् ।
चतुश्चक्रं विक्रमन्तं सुकल्पितमहायुधम् ॥ २ ॥
किङ्किणीजालनिर्घोषं द्वीपिचर्मपरिष्कृतम् ।
खचितं रत्नजालैश्च हेमजालैश्च भूषितम् ॥ ३ ॥
स्वक्षं रथवरोद्वग्नं सूपस्थानमगोपमम् ।
ईहामृगगणाकीर्णं पक्षिभिश्च विराजितम् ।
दिव्यास्त्रतूणीरधरं पयोधरनिनादितम् ॥ ४ ॥
गदापरिघसम्पूर्णं मूर्तिमन्तमिवार्णवम् ।
हेमकेयूरवलयं स्वर्णमण्डलकूवरम् ॥ ५ ॥
सपताकध्वजोदग्रं सादित्यमिव मन्दरम् ।
गजेन्द्राभोदसद्दशं लम्बकेसरवर्चसम् ॥ ६ ॥
युक्तमृक्षसहस्रेण सहस्राम्बुदनादितम् ।
दीप्तमाकाशगं दिव्यं रथं पररथारुजम् ॥ ७ ॥
अध्यतिष्ठद्रणाकाङ्क्षी मेरुं दीप्तमिवांशुमान् ।
मयासुर एक सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हुआ, जिसका विस्तार बारह सौ हाथका था। उसमें चार पहिये लगे थे। वह रथ टूटने या बिगड़नेवाला नहीं था। कैसी ही विषम भूमि क्यों न हो, उसमें वह आगे बढ़ जाता था। उस रथमें बड़े-बड़े आयुध सुन्दर ढंगसे सजाकर रखे गये थे। उसमें छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरें लगी थीं, जिनसे मधुर ध्वनिका विस्तार होता रहता था। रथके ऊपरी भागमें उसकी रक्षाके लिये चीतेकी खाल मढ़ी गयी थी। उस रथमें भाँति-भाँतिके रत्न जड़े गये थे तथा सोनेकी जालियाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। उसका धुरा बहुत अच्छा था। वह रथ अच्छी श्रेणीके रथोंमें भी सबसे अच्छा था। उसकी बैठक बड़ी सुन्दर थी। वह देखनेमें पर्वत-जैसा जान पड़ता था। उसमें जीव-जन्तुओंके चित्र अङ्कित थे। भाँति-भाँतिके पक्षियोंके चित्र भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके भीतर दिव्यास्त्र और तरकस रखे गये थे। उस रथसे मेघगर्जनाके समान गम्भीर घर्घर-शब्द होता रहता था। गदाओं और परिघोंसे परिपूर्ण वह विशाल रथ मूर्तिमान् समुद्र-सा जान पड़ता था। उस रथमें जहाँ-जहाँ संधिस्थलोंको बाँध रखनेके लिये पट्टियाँ लगी थीं, वहाँ-वहाँ वे पट्टिकाएँ सुवर्ण निर्मित केयूर और वलयके सदृश शोभा पाती थीं। उसका कूवर सोनेका मण्डल-सा जान पड़ता था। ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित वह ऊँचा रथ सूर्यमण्डलसे विभासित मन्दराचल-सा जान पड़ता था। दूरसे देखनेपर उसका रंग बड़े-बड़े गजराजों, मेघोंकी घटाओं तथा भालुओंके समान जान पड़ता था। उसमें एक हजार रीछ जुते हुए थे। उसकी घरघराहट सहस्रों मेघोंकी गर्जनाको तिरस्कृत किये देती थी। वह दीप्तिमान् दिव्य रथ आकाशमें भी चल सकता था और शत्रु-पक्षके रथोंको तोड़-फोड़ डालनेमें समर्थ था। युद्धकी आकांक्षा रखनेवाला मयासुर उस रथपर सवार हुआ मानो अंशुमाली सूर्य दीप्तिमान् मेरु पर्वतपर आरूढ़ हुए हों॥
तारस्तु क्रोशविस्तारमायसं वायसध्वजम् ॥ ८ ॥
शैलोत्करसमाकीर्णं नीलाञ्जनचयोपमम् ।
काललोहाष्टचरणं लोहेषायुगकूवरम् ।
तिमिराङ्गारकिरणं गर्जन्तमिव तोयदम् ॥ ९ ॥
लोहजालेन महता सगवाक्षेण दंशितम् ।
१६० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
आयसैः परिघैः कीर्णं क्षेपणीयैस्तथाश्मभिः ॥ १० ॥ प्रासैः पाशैश्च विततैरवसक्तैश्च मुद्गरैः । शोभितं त्रासनीयैश्च तोमरैः सपरश्वधैः ॥ ११ ॥ उद्यन्तं द्विषतां हेतोर्द्वितीयमिव मन्दरम् । युक्तं खरसहस्रेण सोऽध्यारोहद्रथोत्तमम् ॥ १२ ॥
तारनामक दैत्य लोहेके बने हुए उत्तम रथपर आरूढ हुआ, जिसका विस्तार एक कोसका था; उसके ऊपर कौएके चिह्नसे सुशोभित ध्वजा फहरा रही थी। उसके भीतर शिलाखण्डोंके समूह भरे हुए थे। वह नीली कज्जलराशिके समान प्रतीत होता था। उसमें काले लोहेके आठ पहिये लगे थे। उसके ईपादण्ड (हरसे या बम), जुआ और कूबर भी लोहेके ही बने हुए थे। उसकी कान्ति काले कोयलेके समान काली थी, वह अपनी घरघराहटसे गरजता हुआ मेघ-सा जान पड़ता था। उसके ऊपर लोहेकी बहुत बड़ी जाली लगी हुई थी, जिसमें झरोखे शोभा पाते थे। वह रथ लोहेके परिघों तथा फेंकने योग्य पत्थरोंके गोलोंसे भरा था। बहुत-से भाले, विस्तृत पाश, बहुसंख्यक लटकते हुए मुद्गर, डरावने तोमर और फरसे उसकी शोभा बढ़ाते थे। वह शत्रुओंके लिये दूसरे मन्दराचलकी भाँति उदित हुआ था, उस श्रेष्ठ रथमें एक हजार गधे जुते हुए थे ॥ ८-१२ ॥
विरोचनस्तु संक्रुद्धो गदापाणिरवस्थितः । प्रमुखे तस्य सैन्यस्य दीप्तशृङ्ग इवाचलः ॥ १३ ॥
क्रोधमें भरा हुआ विरोचन नामक दैत्य हाथमें गदा लिये उस सेनाके मुहानेपर खड़ा हो गया। वह देखनेमें ऐसा जान पड़ता था, मानो कान्तिमान् शिखरसे युक्त कोई पर्वत खड़ा हो ॥ १३ ॥
युक्तं हयसहस्रेण हयग्रीवस्तु दानवः । स्यन्दनं वाहयामास सपत्नानीकमर्दनः ॥ १४ ॥
दानव हयग्रीव शत्रुओंकी सेनाको कुचल डालनेमें समर्थ था। उसने एक हजार घोड़ोंसे जुते हुए रथको अपना वाहन बनाया ॥ १४ ॥
व्यायतं बहुसाहस्रं धनुर्विस्फारयन् महत् । वराहः प्रमुखे तस्थौ सावरोह इवाचलः ॥ १५ ॥
वराह नामक दानव कई हजार हाथ लंबा विशाल धनुष टंकारता हुआ दैत्य-सेनाके अग्रभागमें खड़ा हो गया, उस समय वह वरोहों (जटाओं) से युक्त बरगदके समान प्रतीत होता था ॥ १५ ॥
खरस्तु विक्षरन् दर्पान्नेत्राभ्यां रोषजं जलम् । स्फुरद्दन्तौष्ठवदनः संग्रामं सोऽभ्यकाङ्क्षत ॥ १६ ॥
खर नामक दैत्य अपने नेत्रोंसे रोषजनित आँसू बहाता हुआ बड़े दर्पके साथ आया और युद्धकी इच्छासे डट गया, उस समय उसके दाँत, ओठ और मुख क्रोधसे फड़क रहे थे ॥ १६ ॥
त्वष्टा त्वष्टादशहयं यानमास्थाय दानवः । व्यूहितो दानवैर्व्यूहैः परिचक्राम वीर्यवान् ॥ १७ ॥
त्वष्टा नामक बलशाली दानव अठारह घोड़ोंसे जुते हुए रथपर सवार होकर आया और व्यूहमें खड़े हुए दानवोंके साथ स्वयं भी व्यूहका एक अङ्ग बनकर सब ओर घूमने लगा ॥
विप्रचित्तिसुतः श्वेतः श्वेतकुण्डलभूषणः । श्वेतशैलप्रतीकाशो युद्धायाभिमुखः स्थितः ॥ १८ ॥
विप्रचित्तिका पुत्र श्वेत सफेद कुण्डलोंसे विभूषित हो युद्धके लिये सामने आकर डट गया, वह श्वेत-पर्वतके समान दिखायी देता था ॥ १८ ॥
अरिष्टो बलिपुत्रस्तु वरिष्ठोऽद्रिशिलायुधैः । युद्धायातिष्ठदायस्तो धराधर इवापरः ॥ १९ ॥
बलिक्रा ज्येष्ठ पुत्र अरिष्ट पर्वतीय शिलाखण्डोंको आयुधके रूपमें धारण किये शत्रुओंका सामना करनेके लिये खड़ा हुआ, उसने युद्धकी कलामें विशेष परिश्रम किया था। वह दूसरे पर्वतके समान प्रतीत होता था ॥ १९ ॥
किशोरस्त्वतिसंरम्भात् किशोर इव चोदितः । अभवद् दैत्यसैन्यस्य मध्ये रविरिवोदितः ॥ २० ॥
किशोर नामक दैत्य चाबुकसे हाँके गये बछेड़ेके समान बड़े हर्ष और उत्साहके साथ आकर दैत्यसेनाके मध्यभागमें खड़ा हो गया। वह नवोदित सूर्यके समान शोभा पा रहा था ॥
लम्बस्तु लम्बमेघाभः प्रलम्बाम्बरभूषणः । दैत्यव्यूहगतो भाति सनीहार इवांशुमान् ॥ २१ ॥
लम्ब नामक दानव बरसनेके लिये झुके हुए मेघोंकी काली घटाके समान काला दिखायी देता था, उसके वस्त्र और आभूषण बड़े-बड़े थे। दैत्य-सेनाके व्यूहमें खड़ा होकर वह कुहासेसे ढँके हुए सूर्यके समान सुशोभित होता था ॥
स्वर्भानुर्वक्रयोधी तु दशनौष्ठेक्षणायुधः । हसंस्तिष्ठति दैत्यानां प्रमुखे स महाग्रहः ॥ २२ ॥
वक्र रीतिसे युद्ध करनेवाला राहु नामक महान् ग्रह हँसता हुआ आकर दैत्य-सेनाके मुहानेपर डट गया। वह अपने दाँतों, नेत्रों और ओठोंसे भी आयुधका काम लेता था ॥ २२ ॥
अन्ये हयगता भान्ति नागस्कन्धगताः परे । सिंहव्याघ्रगताश्चान्ये वराहर्क्षगताः परे ॥ २३ ॥
कुछ दानव घोड़ोंपर सवार दिखायी देते थे और कुछ गजराजोंकी पीठपर। दूसरे बहुत-से दैत्य सिंह, व्याघ्र, सूअर और रीछोंपर चढ़े हुए थे ॥ २३ ॥
-हरिवंशपर्व ] चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः [ १६१
केचित् खरोष्ट्रयातारः केचित् तोयदवाहनाः।
नानापक्षिगताश्चान्ये केचित् पवनवाहनाः ॥ २४ ॥
कोई गधों और ऊँटोंपर चढ़कर जा रहे थे, तो कोई बादलोंको ही अपना वाहन बनाये हुए थे। दूसरे दैत्य नाना प्रकारके पक्षियोंपर बैठे थे और कितने ही दानव वायुके सहारे ही उड़ रहे थे ॥ २४ ॥
पत्त्यश्चापरे दैत्या भीषणा विकृताननाः।
एकपादा द्विपादाश्च नर्दन्तो युद्धकाङ्क्षिणः ॥ २५ ॥
दूसरे विकराल मुखवाले भीषण दैत्य पैदल ही चल रहे थे। किन्हींके एक पैर थे तो किन्हींके दो पैर, वे सभी युद्धकी अभिलाषासे गरज रहे थे ॥ २५ ॥
प्रस्वेदमाना बहवः स्फोटयन्तश्च ते भुजान्।
दृप्तशार्दूलनिर्घोषा नेदुर्दानवपुङ्गवाः ॥ २६ ॥
बहुत-से दानवराज उछलते-कूदते और ताल ठोंकते हुए बलोन्मत्त सिंहोंके समान दहाड़ रहे थे ॥ २६ ॥
ते गदापरिघैरुग्रैर्धनुर्व्यायामशालिनः।
बाहुभिः परिघाकारैस्तर्जयन्ति स्म देवताः ॥ २७ ॥
धनुष खींचनेके परिश्रमसे सुशोभित होनेवाले वे दैत्य अपनी गदाओं, भयंकर परिघों तथा परिघ जैसी मोटी एवं बलिष्ठ भुजाओंद्वारा देवताओंको डाँट बता रहे थे ॥ २७ ॥
प्रासैः पाशैश्च खड्गैश्च तोमराङ्कुशपट्टिशैः।
चिक्रीडुस्ते शतघ्नीभिः शतधारैश्च मुद्गरैः ॥ २८ ॥
वे भालों, पाशों, खड्गों, तोमरों, अंकुशों, पट्टिशों, शतघ्नियों और सौ धारवाले मुद्गरोंसे खेल रहे थे ॥ २८ ॥
गण्डशैलैश्च शैलैश्च परिघैश्चोत्तमायुधैः।
चक्रैश्च दैत्यप्रवराश्चक्रुरानन्दितं बलम् ॥ २९ ॥
वे श्रेष्ठ दैत्यवीर पहाड़ोंसे टूटकर गिरी हुई बड़ी-बड़ी चट्टानों, शैल-शिखरों, परिघों, चक्रों तथा अन्य उत्तमोत्तम आयुधोंसे अपनी सेनाको आनन्दित कर रहे थे ॥ २९ ॥
एवं तद् दानवं सैन्यं सर्वं युद्धबलोत्कटम्।
देवताभिमुखं तस्थौ मेघानीकमिवोत्थितम् ॥ ३० ॥
इस प्रकार युद्धके लिये बलाभिमानसे उन्मत्त हुई वह दानवोंकी सम्पूर्ण सेना मेघोंकी घिरी हुई घटाके समान देवताओंके सम्मुख डटकर खड़ी थी ॥ ३० ॥
तदद्भुतं दैत्यसहस्रगाढं वाय्वग्नितोयाम्बुदशैलकल्पम्।
बलं रणौघाम्युदयावकीर्णं युयुत्सयोन्मत्तमिवावभासे ॥ ३१ ॥
वह अद्भुत दैत्य-सेना सहस्रों दैत्यवीरोंसे ठसाठस भरी थी। वायु, अग्नि, जल, मेघ एवं पर्वतमालाओंके समान दिखायी देती थी। युद्धके प्रवाहको बढ़ानेके लिये सब ओर फैली हुई थी और लड़नेकी इच्छासे उन्मत्त हुई-सी प्रतीत होती थी ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥
चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः
आश्चर्यतारकामय संग्राममें देवसेनाकी युद्धके लिये तैयारी
वैशम्पायन उवाच
श्रुतस्ते दैत्यसैन्यस्य विस्तरस्तात विग्रहे।
सुराणां सर्वसैन्यस्य विस्तरं वैष्णवं शृणु ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—तात ! उस युद्धके समय दैत्य-सेनाका जो विस्तार था, वह तुमने सुन लिया। अब देवताओंकी सम्पूर्ण सेनाका विस्तार, जो भगवान् विष्णुके आश्रित है, सुनो ॥ १ ॥
आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च महाबलौ।
सबलाः सानुगाश्चैव संनह्यन्त यथाबलम् ॥ २ ॥
आदित्य, वसु, रुद्र और महाबली अश्विनीकुमार—ये अपने दल-बल और अनुयायियोंको साथ ले यथाशक्ति युद्ध करनेके लिये कवच आदिसे सुसज्जित हो गये ॥ २ ॥
पुरुहूतस्तु पुरतो लोकपालः सहस्रदृक्।
ग्रामणीः सर्वदेवानामारुरोह सुरद्विपम् ॥ ३ ॥
सबसे पहले समस्त देवताओंके नेता सहस्र नेत्रधारी इन्द्र देवताओंके हाथी ऐरावतपर आरूढ़ हुए ॥ ३ ॥
सव्ये चास्य रथः पार्श्वे पक्षिप्रवरवेगवान्।
सुचारुचक्रचरणो हेमवज्रपरिष्कृतः ॥ ४ ॥
उनकी बायीं ओर बहुत ही सुन्दर चक्ररूपी चरणोंसे गरुड़के समान वेगपूर्वक चलनेवाला सुवर्ण और हीरोंसे जड़ा हुआ उनका रथ चल रहा था ॥ ४ ॥
देवगन्धर्वयक्षौघैरनुयातः सहस्रशः।
दीप्तिमद्भिः सदस्यैश्च ब्रह्मर्षिभिरभिष्टुतः ॥ ५ ॥
उनके पीछे देवता, गन्धर्व और यक्षोंकी मण्डलियाँ चल
म० ह० ६—