विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
विष्णुपर्र्व ] त्रयोविंशोऽध्यायः २८७
असाधुमद्भिर्वाक्यैश्च त्वया साध्विति भाषितैः ।
न चाप्यासादितं कार्यमात्मा च विवृतः कृतः ॥ १० ॥
'तुमने निन्दायुक्त वचनोंको उत्तम मानकर जो यहाँ कहा है, उनसे कोई कार्य तो सिद्ध हुआ नहीं; केवल तुम्हारे स्वरूपका स्पष्टीकरण हो गया है (इन बातोंसे सब लोग यह जान गये कि तुम कितने ओछे हो !) ॥ १० ॥
गुरोरनवलिप्तस्य मान्यस्य महतामपि ।
क्षेपणं कः शुभं मन्ये द्विजस्येव वधे कृते ॥ ११ ॥
'जो अहंकाररहित तथा महापुरुषोंके लिये भी माननीय गुरुजन हैं, उनपर आक्षेप करना ब्रह्महत्याके समान है। उसे करके कौन अपने लिये कल्याणकी आशा कर सकता है ॥
मान्याश्चैवाभिगम्याश्च वृद्धास्तात यथाग्नयः ।
क्रोधो हि तेषां प्रदहेल्लोकानन्तर्गतानपि ॥ १२ ॥
'तात ! वृद्ध पुरुष अग्नियोंके समान आदरणीय तथा सेव्य होते हैं; उनका क्रोध आन्तरिक साधनाओंसे प्राप्त हुए लोकोंको भी जलाकर भस्म कर सकता है ॥ १२ ॥
बुधेन तात दान्तेन नित्यमभ्युच्छितात्मना ।
धर्मस्य गतिरन्वेष्या मत्स्यस्य गतिरप्स्विव ॥ १३ ॥
'तात ! जिसका आत्मा उन्नतिके पथपर अग्रसर है तथा जो जितेन्द्रिय एवं विवेकशील विद्वान् है, उस पुरुषको धर्मकी गतिका सदा ही अन्वेषण करना चाहिये; जैसे जलमे मछलीकी गति अत्यन्त सूक्ष्म या अव्यक्त होती है, उसी प्रकार धर्मकी गति भी सूक्ष्म है ॥ १३ ॥
केवलं त्वं तु दर्पेण वृद्धानग्निसमानिह ।
वाचा तुदसि मर्मघ्न्या अमन्त्रोक्ता यथाऽऽहुतिः ॥ १४।
'तुम तो केवल अहंकारवश यहाँ बैठे हुए अग्निके समान तेजस्वी वृद्ध पुरुषोंको अपनी मर्मभेदिनी वाणीद्वारा पीड़ा दे रहे हो। जैसे मन्त्रका उच्चारण किये बिना दी हुई आहुति व्यर्थ होती है, उसी प्रकार तुम्हारी यह आक्षेपपूर्ण बातें निष्फल हैं ॥ १४ ॥
वसुदेवं च पुत्रार्थे यदिमं परिगर्हसि ।
तत्र मिथ्या प्रलापं ते निन्दामि कृपणं वचः ॥ १५ ॥
'वसुदेवने अपने पुत्रकी रक्षाके लिये जो कुछ किया है, उसके लिये जो तुम इनपर आक्षेप करते हो, वह सब तुम्हारा मिथ्या प्रलाप है। उस विषयमें कही गयी तुम्हारी इन कायरतापूर्ण बातोंकी मैं निन्दा करता हूँ ॥ १५ ॥
दारुणे च पिता पुत्रे नैव दारुणतां व्रजेत् ।
पुत्रार्थे ह्यापदः कष्टाः पितरः प्राप्नुवन्ति हि ॥ १६ ॥
'पुत्र क्रूर स्वभावका हो जाय तो भी पिता उसके प्रति निष्ठुर नहीं हो सकता; क्योंकि पुत्रोंके लिये पिताओंको कितनी ही कष्टदायिनी विपत्तियाँ झेलनी पड़ती हैं ॥ १६ ॥
छादितो वसुदेवेन यदि पुत्रः शिशुस्तदा ।
मन्यसे यद्यकर्तव्यं तत् पृच्छ पितरं स्वकम् ॥ १७ ॥
'यदि वसुदेवने उस समय अपने शिशु पुत्रको उसकी रक्षाके लिये छिपा दिया था तो यह कोई अनुचित कर्म नहीं किया। यदि तुम इसे न करनेयोग्य बुरा कर्म मानते हो तो इस विषयमें अपने पितासे ही पूछो ॥ १७ ॥
गर्हता वसुदेवं च यदुवंशं च निन्दता ।
त्वया यादवपुत्राणां वैरं विपमर्जितम् ॥ १८ ॥
'वसुदेवपर आक्षेप और यादवकुलकी निन्दा करके तुमने यहाँ यादवकुमारोंके वैरजनित विषका ही उपार्जन किया है ॥
अकर्तव्यं यदि कृतं वसुदेवेन पुत्रजम् ।
किमर्थमुग्रसेनेन शिशुस्त्वं न विनाशितः ॥ १९ ॥
'यदि वसुदेवने अपने पुत्रके प्राण बचाकर अनुचित कर्म किया है तो उग्रसेनने शैशवावस्थामें तुम्हें क्यों नहीं मार डाला ॥ १९ ॥
पुन्नाम्नो नरकात् पुत्रो यस्मात्त्राता पितुस्तदा ।
तस्माद् ब्रुवन्ति पुत्रेति पुत्रं धर्मविदो जनाः ॥ २० ॥
'पुत्र पुत् नामक नरकसे पितरोंकी रक्षा करता है, इसलिये धर्मज्ञ पुरुष पुत्रको पुत्र कहते हैं ॥ २० ॥
जात्यां हि यादवः कृष्णः स च संकर्षणो युवा ।
त्वं चापि विधुतस्ताभ्यां जातवैरेण चेतसा ॥ २१ ॥
'श्रीकृष्ण और नवयुवक संकर्षण भी यादव ही हैं, किंतु तुमने उनके उत्पन्न होते ही उनसे वैर बाँध लिया; फिर उन दोनोंने मनमें वैरभावको स्थान देकर तुमसे शत्रुता बाँध ली है (अतः इस वैर-भावमें प्रथम अपराध तुम्हारा ही है) ॥ २१॥
उद्धूतानीह सर्वेषां यदूनां हृदयानि वै ।
वसुदेवे त्वयाऽऽक्षिप्ते वासुदेवे च कोपिते ॥ २२ ॥
'तुमने वसुदेवपर आक्षेप किया और वसुदेवपुत्र श्रीकृष्णके मनमें अपने प्रति क्रोध उत्पन्न कर दिया, इससे समस्त यादवोंके हृदय यहाँ कम्पित हो उठे हैं ॥ २२ ॥
कृष्णे च भवतो द्वेष्ये वसुदेवविगर्हणात् ।
शंसन्ति चेमानि भयं निमित्तान्यशुभानि ते ॥ २३ ॥
'एक तो श्रीकृष्णके प्रति तुम्हारा द्वेष था ही, दूसरे तुमने वसुदेवकी भरपूर निन्दा भी कर डाली, इससे ये अशुभसूचक अपशकुन प्रकट होकर तुम्हारे लिये भयकी प्राप्ति बता रहे हैं ॥ २३ ॥
सर्पाणां दर्शनं तीव्रं दुःखप्नानां निशाक्षये ।
पुर्यां वैधव्यशंसीनि कारणैरनुमीमहे ॥ २४ ॥
'जब रात समाप्त हो रही हो, उस समय सर्पों और बुरे स्वप्नोंका दर्शन अत्यन्त कष्टदायक होता है। ये जो शकुन दिखायी देते हैं, वे इस नगरीके भावी वैधव्यकी सूचना देनेवाले हैं। अबतक जो कारण प्राप्त हुए हैं, उनसे हमें ऐसा ही अनुमान होता है ॥ २४ ॥
एष घोरो ग्रहः स्वातीमुल्लिखन् खे गभस्तिभिः ।
वक्रमङ्गारकश्चक्रे चित्रायां घोरदर्शनः ॥ २५ ॥
'यह भयंकर ग्रह राहु आकाशमे अपनी किरणोंद्वारा स्वातिका वेध कर रहा है तथा भयानक दिखायी देनेवाला मंगल सर्वतोभद्रचक्रमे वक्रीभूत होकर चित्रा नक्षत्रपर स्थित है* ॥
* ज्योतिषके अनुसार सर्वतोभद्र नामक चक्रमें मृगशिरा कंसका जन्म-नक्षत्र है, उनसे दशम नक्षत्र चित्रा है, जो उसीका कर्मनक्षत्र -
| २८८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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बुधेन पश्चिमा संध्या व्याप्ता घोरेण तेजसा ।
वैश्वानरपथे शुक्लो ह्यतिचारं चचार ह ॥ २६ ॥
'बुधने भयानक तेजसे पश्चिम संध्याको व्याप्त कर रखा है (अर्थात् वह पश्चिम दिशामें उदित हो रहे हैं, ऐसा होना राज्यभंगका सूचक है) तथा शुक्रने वैश्वानरपथ (सूर्यमार्ग) पर अतिचार गतिसे चलना आरम्भ किया है (सूर्यको लाँघ-कर जाना ही अतिचार है) ॥ २६ ॥
केतुना धूमकेतोस्तु नक्षत्राणि त्रयोदश ।
भरण्यादीनि भिन्नानि नानुयान्ति निशाकरम् ॥ २७ ॥
'धूमकेतु नामक उत्पात-ग्रहके पुच्छभागसे भरणी आदि तेरह नक्षत्र विद्ध हो गये हैं, इसलिये वे चन्द्रमाका अनुसरण नहीं करते हैं ॥ २७ ॥
प्राक्संध्या परिघग्रस्ता भाभिर्बाधति भास्करम् ।
प्रतिलोमं च यान्त्येव व्याहरन्तो मृगद्विजाः ॥ २८ ॥
'पूर्वकालकी संध्या परिघ^१से ग्रस्त है। वह अपनी प्रभाओं-द्वारा सूर्यदेवको बाधा पहुँचाती है तथा पशु और पक्षी अपनी बोली बोलते हुए प्रतिकूल दिशासे होकर जाते हैं ॥ २८ ॥
शिवा श्मशानान्निष्क्रम्य निःश्वासाङ्गारवर्षिणी ।
उभे संध्ये पुरीं घोरा पर्यति बहु वाशती ॥ २९ ॥
'दोनों संध्याओके समय एक भयानक गीदड़ी श्मशान-भूमिसे निकलकर अपने निःश्वाससे अङ्गारकी वर्षा करती और बहुत बोलती हुई मथुरापुरीके चारों ओर चक्कर लगाती है।२९।
उल्का निर्घातनादेन पपात धरणीतले ।
चलत्यपर्वणि मही गिरीणां शिखराणि च ॥ ३० ॥
'कुछ ही समय पहले वज्रपातकी-सी ध्वनिके साथ पृथ्वी-पर उल्कापात हुआ है । यह पृथ्वी तथा पर्वतोंके शिखर अकस्मात् काँपने लगते हैं ॥ ३० ॥
ग्रस्तः स्वर्भानुना सूर्यो दिवा नक्तमजायत ।
धूमोत्पातैर्दिशो व्याप्ताः शुष्काशानिसमाहताः ॥ ३१ ॥
'अभी पिछले दिनों राहुने सूर्यपर ग्रहण लगा दियाथा, जिससे दिनमें ही रात हो गयी थी। धूम और उत्पातोंसेसम्पूर्ण दिशाएँ व्याप्त हैं। सूखेमें ही बिजलियाँ गिरती हैं ॥ ३१॥
प्रस्रवन्ति घना रक्तं साशनिस्तनयित्नवः ।
चलिता देवताः स्थानात् त्यजन्ति विहगा नगान् ॥३२॥
'मेघ बिजली और गड़गड़ाहट के साथ रक्तकी वर्षा करते हैं। देवताओंकी प्रतिमाएँ अपने स्थानसे हट जाती हैं और पक्षी वृक्षोंको त्याग देते हैं ॥ ३२ ॥
यानि राजविनाशाय दैवज्ञाः कथयन्ति ह ।
तानि सर्वाणि पश्यामो निमित्तान्यशुभानि वै ॥ ३३ ॥
'ज्योतिषी लोग राजाके विनाशकी सूचना देनेवाले जो-जो अशुभ निमित्त (अपशकुन) बताते हैं, उन सबको हम लोग देख रहे हैं ॥ ३३ ॥
त्वं चापि स्वजनद्वेषी राजधर्मपराङ्मुखः ।
अनिमित्तागतक्रोधः संनिकृष्टभयो ह्यसि ॥ ३४ ॥
'तुम भी स्वजनोंसे द्वेष रखते हो, राजधर्मसे विमुख हो चुके हो और अकारण ही तुम्हें क्रोध आ जाता है, इससे जान पड़ता है, निकट-भविष्यमें ही तुम्हारे ऊपर भय आनेवाला है ॥
यस्त्वं देवोपमं वृद्धं वसुदेवं वसूपमम् ।
मोहात् क्षिपसि दुर्बुद्धे कुतस्ते शान्तिरात्मनः ॥ ३५ ॥
'दुर्बुद्धे ! तुम जो देवताओं तथा वसुओंके समान तेजस्वी बूढ़े वसुदेवपर मोहवश आक्षेप कर रहे हो, इससे तुम्हारे आत्माको शान्ति कैसे मिल सकती है ॥ ३५ ॥
त्वद्गतो यो हि नः स्नेहस्तं त्यजामोऽद्य वै वयम् ।
अहितं स्वस्य वंशस्य न त्वां क्षणमुपास्महे ॥ ३६ ॥
'तुम्हारे प्रति जो हमारा स्नेह रहा है, उसे हमलोग आज त्याग देते हैं। तुम अपने वंशका अहित करनेवाले हो, अतः अब हम एक क्षण भी तुम्हारे पास नहीं बैठेंगे ॥
स हि दानपतिर्धन्यो यो द्रक्ष्यति वने गतम् ।
पुण्डरीकविशालाक्षं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ॥ ३७ ॥
'वे दानपति अक्रूर धन्य हैं, जो आज वनमें गये हुए अनायास ही महान् कर्म करनेवाले कमलनयन श्रीकृष्णको अपनी आँखोंसे देखेंगे ॥ ३७ ॥
छिन्नमूलो ह्ययं वंशो यदूनां त्वत्कृते कृतः ।
कृष्णो ज्ञातीन् समानाय्य स संधानं करिष्यति ॥ ३८ ॥
'तुम्हारे कारण इस यदुवंशकी जड़ कट गयी है। अब श्रीकृष्ण ही आकर समस्त भाई-बन्धुओको जुटायेंगे और उनमें मेल करायेंगे ॥ ३८ ॥
क्षान्तमेव तवानेन वसुदेवेन धीमता ।
कालसम्यक्परिज्ञाने ब्रूहि त्वं यद्यदिच्छसि ॥ ३९ ॥
'इन बुद्धिमान् वसुदेवने तो तुम्हारे अपराधको क्षमा ही कर दिया है। कालने तुम्हारी विवेकशक्ति नष्ट कर दी, अतः तुम जो-जो चाहो, बकते रहो ॥ ३९ ॥
मह्यं तु रोचते कंस वसुदेवसहायवान् ।
गच्छ कृष्णस्य निलयं संधिस्तेन च रोचताम् ॥४०॥
'कंस ! मुझे तो यही अच्छा लगता है, कि 'तुम वसुदेव-को साथ लेकर श्रीकृष्णके स्थानपर जाओ और उनके साथ संधि करना स्वीकार करो' ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अन्धकवचने त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अन्धकका वचनविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥
है । वहीं भयंकर ग्रह राहु, जो क्रूर ग्रह माना गया है, स्थित है । मंगल भी वक्रगतिसे वहीं आ गया है । इन दोनोंने कर्मनक्षत्रको व्याप्त करके जन्मनक्षत्रको विद्ध कर दिया है। इसका फल बताते हुए अन्धक कहते हैं—'कंस तुम्हारा जीवित रहनेके लिये जो प्रयत्न है, वह निष्फल होगा और तुम्हारे देहका भी नाश हो जायगा।' ( नीलकण्ठी )
१. सूर्यमण्डलमें उगा हुआ तिरछा डंडा परिघ कहलाता है।
[विष्णुपर्व ] चतुर्विंशोऽध्यायः २८९
चतुर्विंशोऽध्यायः
केशीके अत्याचार और श्रीकृष्णद्वारा उसका वध
वैशम्पायन उवाच
अन्धकस्य वचः श्रुत्वा कंसः संरक्तलोचनः ।
न किंचिदब्रवीत् क्रोधाद् विवेश स्वं निकेतनम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अन्धककी बातें सुनकर कंसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वह उनसे कुछ नहीं बोला और रोषपूर्वक उठकर अपने महलमें चला गया ॥ १ ॥
ते च सर्वे यथावेश्म यादवाः श्रुतविस्तराः ।
जग्मुर्विगतसंकल्पाः कंसवैकृतशंसिनः ॥ २ ॥
फिर वे सब यादव, जो वहाँकी सारी बातें विस्तारपूर्वक सुन चुके थे, निराश होकर अपने-अपने घरको लौट गये। वे मार्गमें यह चर्चा कर रहे थे कि कंसका मस्तिष्क खराब हो गया है ॥ २ ॥
अक्रूरोऽपि यथाऽऽज्ञप्तः कृष्णदर्शनलालसः ।
जगाम रथमुख्येन मनसा तुल्यगामिना ॥ ३ ॥
अक्रूरके मनमें भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनकी लालसा जाग उठी थी, अतः वे भी कंसकी आज्ञाके अनुसार उठे और मनके समान शीघ्रगामी श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो वहाँसे चल दिये ॥ ३ ॥
कृष्णस्यापि निमित्तानि शुभान्यङ्गगतानि वै ।
पितृतुल्येन शंसन्ति बान्धवेन समागमम् ॥ ४ ॥
उधर श्रीकृष्णको भी अपने अङ्गोंमें ही कुछ ऐसे शुभ लक्षण दिखायी देते थे, जो पिता-जैसे बान्धवसे भेंट होनेकी सूचना दे रहे थे ॥ ४ ॥
प्रागेव च नरेन्द्रेण माथुरेणोग्रसेनिना ।
केशिनः प्रेषितो दूतो वधायोपेन्द्रकारणात् ॥ ५ ॥
(अक्रूरको भेजनेसे) पहले ही मथुराके राजा उग्रसेन-कुमार कंसने केशीके पास दूत भेजा और कहलाया कि तुम श्रीकृष्णका वध कर डालो ॥ ५ ॥
स च दूतवचः श्रुत्वा केशी क्लेशकरो नृणाम् ।
वृन्दावनगतो गोपान् बाधते स्म दुरासदः ॥ ६ ॥
दूतकी बात सुनकर मनुष्योंको क्लेश प्रदान करनेवाला दुर्जय दैत्य केशी वृन्दावनमें जाकर गोपोंको सताने लगा ॥ ६ ॥
मानुषं मांसमश्नन् क्रुद्धो दुष्टपराक्रमः ।
दुर्दान्तो वाजिदैत्योऽसावकरोत् कदनं महत् ॥ ७ ॥
केशी घोड़ेके रूपमें रहनेवाला दुर्दान्त दैत्य था और मनुष्यका मांस खाता था। उस दुष्ट पराक्रमी असुरने कुपित होकर वहाँ महान् संहार आरम्भ कर दिया ॥ ७ ॥
निघ्नन् गा वै सगोपालान् गवां पिशितभोजनः ।
दुर्मदः कामचारी च स केशी निरवग्रहः ॥ ८ ॥
वह ग्वालोंसहित गौओंको मार डालता और गौओंका मांस खाया करता था। मदमत्त केशी स्वच्छन्द विचरनेवाला और उच्छृङ्खल था ॥ ८ ॥
तदरण्यं श्मशानाभं नृणां मांसास्थिभिर्वृतम् ।
यत्रास्ते स हि दुष्टात्मा केशी तुरगदानवः ॥ ९ ॥
अश्वरूपधारी दुष्टात्मा दानव केशी जहाँ रहता था, वह वन मनुष्योंके मांस और हड्डियोंसे व्याप्त होकर श्मशान-भूमिके समान प्रतीत होता था ॥ ९ ॥
खुरैर्दारयते भूमिं वेगेनाभ्रजते द्रुमान् ।
ह्रेषितैः स्पर्धते वायुं प्लुतैर्लङ्घयते नभः ॥ १० ॥
वह टापोंसे पृथ्वीको विदीर्ण कर देता और वेगसे वृक्षोंको भी तोड़ डालता था, हाँसते या हिनहिनाते समय प्रचण्ड वायुके कोलाहलसे होड़ लगाता था और उछलकर आकाशको भी लाँघ जाता था ॥ १० ॥
अतिप्रवृद्धो मत्तश्च दुष्टोऽश्वो वनगोचरः ।
आकम्पितसटो रौद्रः कंसस्य चरितानुगः ॥ ११ ॥
वह वनमें विचरनेवाला दुष्ट अश्व बहुत बड़ा और मतवाला था। उसके अयाल कुछ हिलते रहते थे। वह, भयंकर दैत्य कंसके चरित्रका अनुसरण करनेवाला था ॥ ११ ॥
ईरिणं तद् वनं सर्वं तेनासीत् पापकर्मणा ।
कृतं तुरगदैत्येन सर्वान् गोपाञ्जिघांसता ॥ १२ ॥
समस्त गोपोंको मार डालनेकी इच्छावाले उस पापाचारी अश्वरूपधारी दैत्यने वह सारा वन मनुष्योंसे सूना कर दिया था ॥ १२ ॥
तेन दुष्टप्रचारेण दूषितं तद् वनं महत् ।
न नृभिर्गोधनैर्वापि सेव्यते वनवृत्तिभिः ॥ १३ ॥
उस दुराचारीने वह विशाल वन दूषित कर डाला था। वनसे ही जीवन निर्वाह करनेवाले मनुष्य और गोधन भी कभी उस वनका सेवन नहीं करते थे ॥ १३ ॥
निःसम्पातः कृतः पन्थास्तेन तद्विषयाश्रयः ।
मदात्स्खलितवृत्तेन नृमांसान्यश्नता भृशम् ॥ १४ ॥
मदके कारण वह सदाचारसे भ्रष्ट हो चुका था और अधिकतर मनुष्योंके ही मांस खाता था। उसके निवास-स्थानमें होकर जो रास्ता जाता था, उसे उसने अगम्य बना दिया था। १४।
नृशब्दानुसरः क्रुद्धः स कदाचिद् वनागमे ।
जगाम घोषसंवासं चोदितः कालधर्मणा ॥ १५ ॥
म० ह० १०
| २९० | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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एक समय मनुष्योंके शब्दका अनुसरण करता हुआ केशी क्रोधमें भरकर वृन्दावनके भीतर गोपोंकी बस्तीमे गया, उस समय उसपर काल सवार था ॥ १५ ॥
तं दृष्ट्वा दुद्रुवुर्गोपाः स्त्रियश्च शिशुभिः सह ।
क्रन्दमाना जगन्नाथं कृष्णं नाथमुपाश्रिताः ॥ १६ ॥
उसे देखते ही गोप और गोपाङ्गनाएँ शिशुओंको साथ लेकर भागीं तथा करुण क्रन्दन करती हुई जगत्के रक्षक, अपने स्वामी श्रीकृष्णकी शरणमें आ पहुँचीं ॥ १६ ॥
तासां रुदितशब्देन गोपानां क्रन्दितेन च ।
दत्त्वाभयं तु कृष्णो वै केशिनं सोऽभ्यदुद्रुवे ॥ १७ ॥
गोपाङ्गनाओंके रोदन और गोपोंके क्रन्दनसे द्रवित होकर श्रीकृष्णने उन्हें अभय कर दिया। फिर वे केशीपर टूट पड़े ॥१७॥
केशी चाप्युन्नतग्रीवः प्रकाशदशनेक्षणः ।
ह्रेषमाणो जवोदग्रो गोविन्दाभिमुखो ययौ ॥ १८ ॥
केशी भी अपनी गर्दन ऊपर उठाये हींसता हुआ बड़े वेगसे श्रीकृष्णकी ओर चला । उस समय वह दाँत दिखाता हुआ आँखें फाड़-फाड़कर उनकी ओर देख रहा था ॥१८॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य केशिनं हयदानवम् ।
प्रत्युज्जगाम गोविन्दस्तोयदः शशिनं यथा ॥ १९ ॥
उस अश्वरूपधारी दानव केशीको अपनी ओर आते देख भगवान् श्रीकृष्ण उसका सामना करनेके लिये आगे बढ़े, मानो श्याम मेघ चन्द्रमाकी ओर जा रहा हो ॥ १९ ॥
केशिनस्तु तमभ्याशे दृष्ट्वा कृष्णमवस्थितम् ।
मनुष्यबुद्धयो गोपाः कृष्णमूचुर्हितैषिणः ॥ २० ॥
श्रीकृष्णको केशीके निकट खड़ा हुआ देख उनके प्रति मनुष्य-बुद्धि रखनेवाले हितैषी गोप उनसे इस प्रकार बोले-।२०।
कृष्ण तात न खल्वेष सहसा ते हयाधमः ।
उपसर्प्यो भवान् बालः पापश्चैष दुरासदः ॥ २१ ॥
'तात श्रीकृष्ण ! तुम सहसा इस नीच अश्वके पास न चले जाना; क्योंकि तुम अभी बालक हो और यह पापात्मा एक दुर्धर्ष दैत्य है ॥ २१ ॥
एष कंसस्य सहजः प्राणस्तात बहिश्चरः ।
उत्तमश्च हयेन्द्राणां दानवोऽप्रतिमो युधि ॥ २२ ॥
'तात ! यह कंसका बाहर विचरनेवाला सहज प्राण है, बड़े-बड़े अश्वराजोंमें उत्तम है। युद्धमें इस दानवकी समानता करनेवाला कोई नहीं है ॥ २२ ॥
त्रासनः सर्वभूतानां तुरगाणां महाबलः ।
अवध्यः सर्वभूतानां प्रथमः पापकर्मणाम् ॥ २३ ॥
'समस्त प्राणियोंको त्रास देनेवाला यह दैत्य घोड़ोंमें सबसे अधिक बलवान् है। सम्पूर्ण भूतोंमेंसे किसीके लिये भी यह वध्य नहीं है। पापाचारियोंमें यह सबसे अग्रगण्य है' ॥ २३ ॥
गोपानां तद् वचः श्रुत्वा वदतां मधुसूदनः ।
केशिना सह युद्धाय मतिं चक्रेऽरिसूदनः ॥ २४ ॥
उपर्युक्त बातें कहनेवाले गोपोंका वह कथन सुनकर शत्रुसूदन भगवान् मधुसूदनने केशीके साथ युद्धके लिये विचार किया ॥ २४॥
ततः सव्यं दक्षिणं च मण्डलं स परिभ्रमन् ।
पद्भ्यामुभाभ्यां स हयः क्रोधेनारुजते द्रुमान् ॥ २५ ॥
तदनन्तर वह अश्व दायें-बायें चक्कर काटता हुआ अपने दोनों पैरोंसे क्रोधपूर्वक वृक्षोंको तोड़ने लगा ॥ २५ ॥
मुखे लम्बसटे चास्य स्कन्धे केशघनावृते ।
वलयोऽभ्रतरङ्गाभाः सुस्रुवुः क्रोधजं जलम् ॥ २६ ॥
उसके लंबे अयालवाले मुख और घने केशोंसे ढके हुए कंधेपर जो मेघोंकी लहरोंके समान वलियाँ (चमड़ोंके सिकुड़नेसे बनी हुई रेखाएँ) थीं, वे क्रोधजनित जल (पसीना) टपकाने लगीं ॥ २६ ॥
स फेनं वक्त्रजं चैव ववर्ष रजसावृतम् ।
हिमकाले यथा व्योम्नि नीहारमिव चन्द्रमाः ॥ २७ ॥
वह अपने मुखसे पैदा हुए धूलिमिश्रित फेनकी वर्षा करने लगा। मानो हेमन्त ऋतुमें चन्द्रमा आकाशमें कुहासा गिरा रहा हो ॥ २७ ॥
गोविन्दमरविन्दाक्षं हेषितोद्गारशीकरैः ।
स फेनैर्वक्त्रनिगीर्णैः प्रोक्षयामास भारत ॥ २८ ॥
भरतनन्दन ! उसने अपने हींसनेके साथ निकले हुए जलकणों तथा मुखसे गिरते हुए फेनोद्गारों द्वारा कमलनयन श्रीकृष्णको नहला दिया ॥ २८ ॥
खुरोद्धूतावतंसिकेन मधुकक्षोदपाण्डुना ।
रजसा स हयः कृष्णं चकारारुणमूर्धजम् ॥ २९ ॥
अपनी टापोंसे उठकर फैली हुई धूलसे, जो मुलेठीके चूर्णकी भाँति कुछ-कुछ पीले रंगकी थी, उस घोड़ेने श्रीकृष्ण-के मस्तकके बालोंको कुछ लाल-सा कर दिया ॥ २९ ॥
प्लुतवल्गितपादस्तु तक्षमाणो धरां खुरैः ।
दन्तान् निर्दशमानस्तु केशी कृष्णमुपाद्रवत् ॥ ३० ॥
केशीके पैर वहाँ उछल-कूद मचा रहे थे। वह अपनी टापोंसे पृथिवीको खोदता और दाँतोंको पीसता हुआ श्रीकृष्णकी ओर दौड़ा ॥ ३० ॥
स संसक्तस्तु कृष्णेन केशी तुरगसत्तमः ।
पूर्वाभ्यां चरणाभ्यां वै कृष्णं वक्षस्यताडयत् ॥ ३१ ॥
अश्वोंमें श्रेष्ठ केशी श्रीकृष्णके साथ उलझ गया। उसने
विष्णुपर्व ] चतुर्विंशोऽध्यायः २९१
अपने दोनों आगेवाले पैरोंसे उनकी छातीमें प्रहार किया ॥ ३१ ॥
पुनः पुनः स च बली प्राहिणोत् पार्श्वतः खुरान् ।
कृष्णस्य दानवो घोरं प्रहारममितौजसः ॥ ३२ ॥
उस बलवान् दानवने अगल-बगलसे भी बारंबार अपनी टाप चलायी और अमित तेजस्वी श्रीकृष्णपर घोर प्रहार किया ॥ ३२ ॥
वक्त्रेण चास्य घोरेण तीक्ष्णदंष्ट्रायुधेन वै।
अदशद् बाहुशिखरं कृष्णस्य रुषितो हयः ॥ ३३ ॥
तीखी दाढ़ ही जिसका आयुध थी, उस भयानक मुखके द्वारा रोषमें भरे हुए उस घोड़ेने श्रीकृष्णकी भुजाके अग्रभागको दाँत गड़ाकर घायल कर दिया ॥ ३३ ॥
स लम्बकेसरसटः कृष्णेन सह सङ्गतः ।
रराज केशी मेघेने संसक्तः ख इवांशुमान् ॥ ३४ ॥
लंबे-लंबे अयालसे सुशोभित केशी श्रीकृष्णके साथ जूझता हुआ उसी तरह शोभा पाने लगा, जैसे आकाशमें अंशुमाली सूर्य मेघके साथ उलझ गये हों ॥ ३४ ॥
उरस्तस्योरसा हन्तुमियेप बलवान् हयः ।
वेगेन वासुदेवस्य क्रोधाद् द्विगुणविक्रमः ॥ ३५ ॥
उस बलवान् घोड़ेका पराक्रम उसके क्रोधके कारण दूना बढ़ गया था। उसने श्रीकृष्णकी छातीपर अपनी छातीसे वेगपूर्वक चोट पहुँचानेका विचार किया ॥ ३५ ॥
तस्योत्सिक्तस्य बलवान् कृष्णोऽप्यमितविक्रमः ।
बाहुमाभोगिनं कृत्वा मुखे क्रुद्धः समादधत् ॥ ३६ ॥
तब अमित पराक्रमी बलवान् श्रीकृष्णने भी कुपित होकर उस घमंडी दैत्यके मुखमें अपनी एक बाँहको बहुत बड़ी करके डाल दिया ॥ ३६ ॥
स तं बाहुमशको वै खादितुं भेत्तुमेव च ।
दशनैर्मूलनिर्मुक्तैः सफेनं रुधिरं वमन् ॥ ३७ ॥
वह उनकी उस बाँहको अपने दाँतोंसे चबाने या विदीर्ण करनेमें समर्थ न हो सका, उलटे उसके दाँत ही जड़से उखड़ गये; साथ ही वह मुखसे फेनसहित रक्त वमन करने लगा ॥
विपाटिताभ्यामोष्ठाभ्यां कटाभ्यां विदलीकृतः ।
अक्षिणी विवृते चक्रे विसृते मुक्तबन्धने ॥ ३८ ॥
उसके ओठ और गलफर फटकर दो दलोंमें विभक्त हो गये । स्नायुबन्धनके ढीले हो जानेसे केशीकी आँखें फटकर बाहर निकल आयीं ॥ ३८ ॥
निरस्तहनुराविष्टः शोणिताक्तविलोचनः ।
उत्कर्णो नष्टचेतास्तु स केशी बह्वचेष्टत ॥ ३९ ॥
उसके होठोंका निचला भाग फटकर निकल गया । उस बाँहसे आविष्ट होनेके कारण उसके फटे हुए दोनों नेत्रोंसे रक्त बहने लगा । उसके कान भी उखड़कर गिर पड़े तथा चेतना नष्ट हो गयी । उस अवस्थामें केशी बारंबार छटपटाने लगा ॥
उत्पतन्नसकृत्पादैः शकृन्मूत्रं समुत्सृजन् ।
खिन्नाङ्गरोमा श्रान्तस्तु निर्यलचरणोऽभवत् ॥ ४० ॥
वह बार-बार पैरोंको उछालने और मल-मूत्र छोड़ने लगा । उसका एक-एक अङ्ग और रोम-रोम खिन्न हो उठा था। अन्तमें वह थक गया और उसके पैर निश्चेष्ट हो गये ॥ ४० ॥
केशिवक्त्रविलग्नस्तु कृष्णबाहुरशोभत ।
व्याभुग्न इव घर्मान्ते चन्द्रार्धकिरणैर्धनः ॥ ४१ ॥
केशीके मुखमें लगी हुई श्रीकृष्णकी वह बाँह उसके मुखमण्डलसे आधी आवेष्टित-सी होकर वर्षाकालमें आधे चन्द्रमाकी किरणोंसे घिरे हुए बादलके समान शोभा पाती थी ॥ ४१ ॥
केशी च कृष्णसंसक्तः शान्तगात्रो व्यरोचत ।
प्रभातावनतश्चन्द्रः श्रान्तो मेरुमिवाश्रितः ॥ ४२ ॥
श्रीकृष्णसे सटे हुए केशीका शरीर शान्त हो गया था । उस समय वह उसी तरह शोभा पा रहा था, जैसे प्रभात-कालमें अस्ताचलके शिखरपर पहुँचा हुआ चन्द्रमा थककर मेरुका आश्रय लेनेपर सुशोभित होता है ॥ ४२ ॥
तस्य कृष्णभुजोद्धूताः केशिनो दशना मुखात् ।
पेतुः शरदि निस्तोयाः सिताभ्रावयवा इव ॥ ४३ ॥
श्रीकृष्णकी भुजासे टकराकर केशीके सारे दाँत मुखसे बाहर गिर पड़े । वे ऐसे प्रतीत होते थे, मानो शरद्ऋतुके जलशून्य श्वेत बादलोंके टुकड़े बिखरे हुए हों ॥ ४३ ॥
स तु केशी भृशं शान्तः कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ।
स्वभुजं स्वायतं कृत्वा पाटितो वलवत् तदा ॥ ४४ ॥
जब केशी भलीभाँति शान्त हो गया, तब अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णने अपनी बाँहको बहुत बड़ी करके उस दैत्यके शरीरको बलपूर्वक बीचसे चीर डाला ॥ ४४ ॥
स पाटितो भुजेनाजौ कृष्णेन विकृताननः ।
केशी नदन्महानादं दानवो व्यथितस्तदा ॥ ४५ ॥
उस युद्धस्थलमें श्रीकृष्णकी भुजाद्वारा फाड़े गये केशीका मुख विकराल हो उठा । वह दानव व्यथित होकर बड़े जोर-जोरसे आर्तनाद करने लगा ॥ ४५ ॥
विघूर्णमानस्त्रस्ताङ्गो मुखाद् रुधिरमुद्वमन् ।
भृशं व्यङ्गीकृतवपुर्निकृत्तार्ध इवाचलः ॥ ४६ ॥
उसके सारे अङ्ग शिथिल हो गये थे । वह चक्कर काटता हुआ मुँहसे खून उगल रहा था । उसका शरीर कई अङ्गोंसे हीन हो चुका था । वह ऐसा दिखायी देता था, मानो किसी पर्वतको बीचसे चीर डाला गया हो ॥ ४६ ॥
| २९२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
व्यादितास्यो महारौद्रः सोऽसुरः कृष्णबाहुना ।
निपपात यथा कृत्तो नागो हि द्विद्लीकृतः ॥ ४७ ॥
श्रीकृष्णकी भुजासे जिसका मुँह फट गया था, वह दो भागोंमें बँटा हुआ महाभयंकर असुर दो टुकड़ोंमें कटे हुए हाथीके समान पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ४७ ॥
बाहुना कृत्तदेहस्य केशिनो रूपमाबभौ ।
पशोरिव महाघोरं निहतस्य पिनाकिना ॥ ४८ ॥
श्रीकृष्णकी भुजासे कटे हुए शरीरवाले केशीका रूप पिनाकपाणि भगवान् रुद्रद्वारा मारे गये पशु (महिषासुर) के समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होता था ॥ ४८ ॥
द्विपादपृष्ठपुच्छार्द्धं श्रवणैकाक्षिनासिके ।
केशिनस्तद्विधाभूते द्वे चार्धे रेजतुः क्षितौ ॥ ४९ ॥
केशीके शरीरके वे दोनों खण्ड दो पाँव, आधी पीठ, आधी पूँछ तथा एक-एक कान, आँख और नासिकारन्ध्रसे युक्त हो पृथ्वीपर पड़े-पड़े (अनुपम) शोभा पा रहे थे॥४९॥
केशिदन्तक्षतस्यापि कृष्णस्य शुशुभे भुजः ।
वृद्धः साल इवारण्ये गजेन्द्रदशनाङ्कितः ॥ ५० ॥
केशीके दाँतोंसे घायल हुई श्रीकृष्णकी वह बाँह ऐसी सुशोभित हो रही थी, मानो वनमें गजराजके दाँतोंके आघात-चिह्नसे अङ्कित कोई बहुत बड़ा शालका वृक्ष हो ॥ ५० ॥
तं हत्वा केशिनं युद्धे कल्पयित्वा च भागशः ।
कृष्णः पद्मपलाशाक्षो हसंस्तत्रैव तस्थिवान् ॥ ५१ ॥
इस प्रकार युद्धमें केशीको मारकर उसके शरीरके टुकड़े-टुकड़े करके कमलनयन श्रीकृष्ण वहीं हँसते हुए खड़े रहे॥
तं हतं केशिनं दृष्ट्वा गोपा गोपस्त्रियस्तथा ।
बभूवुर्मुदिताः सर्वे हतविघ्ना गतक्लमाः ॥ ५२ ॥
उस केशीको मारा गया देख गोप और गोपाङ्गनाएँ बहुत प्रसन्न हुईं। सबके विघ्न नष्ट हो गये, कष्ट दूर हो गये॥५२॥
दामोदरं तु श्रीमन्तं यथास्थानं यथावयः ।
अभ्यनन्दन् प्रियैर्वाक्यैः पूजयन्तः पुनः पुनः ॥ ५३ ॥
स्थान और अवस्थाके अनुसार सभी गोप बारंबार श्रीमान् दामोदरका पूजन करते हुए प्रिय वचनोंद्वारा उनका अभिनन्दन करने लगे ॥ ५३ ॥
गोपा ऊचुः
अहो तात कृतं कर्म हतोऽयं लोककण्टकः ।
दैत्यः क्षितिचरः कृष्ण हयरूपं समास्थितः ॥ ५४ ॥
गोप बोले—तात ! तुमने अद्भुत कर्म किया है। यह समस्त जगत्के लिये कंटकरूप दैत्य आज तुम्हारे हाथसे मारा गया । श्रीकृष्ण ! यह इस भूतलपर घोड़ेका रूप धारण करके बिचरता था ॥ ५४ ॥
कृतं वृन्दावनं क्षेमं सेव्यं नृमृगपक्षिणाम् ।
हता पापमिमं तात केशिनं हयदानवम् ॥ ५५ ॥
तात ! इस अश्वरूपधारी पापी दानव केशीका वध करके तुमने वृन्दावनको मनुष्यों तथा पशु-पक्षियोंके लिये सेव्य और क्षेमकारक बना दिया ॥ ५५ ॥
हता नो बहवो गोपा गावो वत्सेषु वत्सलाः ।
नैके चान्ये जनपदा हतानेन दुरात्मना ॥ ५६ ॥
इस दुरात्माने हमारे बहुत-से गोप मार डाले थे। बछड़ों-पर वात्सल्य रखनेवाली बहुत-सी गौओंका भी वध कर डाला था; इसके सिवा और भी कितने ही जनपद इसके हाथों नष्ट हो चुके थे ॥ ५६ ॥
एष संवर्तकं कर्तुमुद्यतः खलु पापकृत् ।
नृलोकं निर्नरं कृत्वा चर्तुकामो यथासुखम् ॥ ५७ ॥
यह पापाचारी दानव निश्चय ही संसारका प्रलय करनेके लिये उद्यत हुआ था। मनुष्य-लोकको मनुष्योंसे सूना करके यहाँ सुखपूर्वक विचरनेकी इच्छा रखता था ॥ ५७ ॥
नैतस्य प्रमुवे स्थातुं कश्चिच्छक्तो जिजीविषुः ।
अपि देवसमूहेषु किं पुनः पृथिवीतले ॥ ५८ ॥
जीवित रहनेकी इच्छावाला कोई भी पुरुष इसके सामने खड़ा नहीं हो सकता था। देवताओंके समूहमेंसे भी कोई इसका सामना नहीं कर सकता था, फिर भूतल-निवासियोंकी तो बात ही क्या है ? ॥ ५८ ॥
वैशम्पायन उवाच
अथाहान्तर्हितो विप्रो नारदः खगमो मुनिः ।
प्रीतोऽस्मि विष्णो देवेश कृष्ण कृष्णेति चाब्रवीत् ५९
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर आकाशचारी मुनि विप्रवर नारदजी आकाशमें अदृश्य भावसे खड़े हो बोले--'देवेश्वर विष्णो ! कृष्ण ! कृष्ण !! मैं आप-पर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ ५९ ॥
नारद उवाच
यदिदं दुष्करं कर्म कृतं केशिजिघांसया ।
त्वय्येव केवलं युक्तं त्रिदिवे त्र्यम्बकस्य वा ॥ ६० ॥
नारदजी फिर बोले—प्रभो ! आपने केशीको मार डालनेकी इच्छासे जो यह दुष्कर कर्म किया है, यह केवल आपके ही योग्य था अथवा देवलोकमें केवल त्रिनेत्रधारी रुद्र ही ऐसा पराक्रम कर सकते थे ॥ ६० ॥
अहं युद्धोत्सुकस्तात त्वद्गतेनान्तरात्मना ।
इदं नरहयं युद्धं द्रष्टुं स्वर्गादिहागतः ॥ ६१ ॥
तात ! मैं युद्ध देखनेको सदा ही उत्सुक रहता हूँ। अतः अपनी अन्तरात्मासे आपका ही चिन्तन करता हुआ यह
विष्णुपर्व ]
चतुर्विंशोऽध्यायः
२९३
मनुष्य और अश्वका संग्राम देखनेके लिये स्वर्गलोकसे यहाँ आया था॥ ६१ ॥
पूतनानिधनादीनि कर्माणि तव दृष्टवान्।
अहं त्वनेन गोविन्द कर्मणा परितोषितः ॥ ६२ ॥
गोविन्द ! आपके 'पूतनावध' आदि कर्मोंको भी मैं देख चुका हूँ। किंतु इस केशीके वधरूप कर्मसे मुझे विशेष संतोष हुआ है ॥ ६२ ॥
हयादस्मान्महेन्द्रोऽपि बिभेति बलसूदनः।
कुर्वाणाच्च वपुर्घोरं केशिनो दुष्टचेतसः ॥ ६३ ॥
भयानक रूप धारण करनेवाले इस दुरात्मा अश्व केशीसे बलसूदन देवराज इन्द्र भी डरते थे ॥ ६३ ॥
यत्त्वया पाटितो देहो भुजेनायतपर्वणा।
एषोऽस्य मृत्युरन्ताय विहितो विश्वयोनिना ॥ ६४ ॥
आपने अपनी बाँहके एक भागको बड़ा करके उसके द्वारा जो इसके शरीरको फाड़ डाला है, विश्वयोनि ब्रह्माजीने इसकी मृत्युके लिये ऐसा ही विधान बनाया था ॥ ६४ ॥
यस्मात् त्वया हतः केशी तस्मान्मच्छासनं शृणु।
केशवो नाम नाम्ना त्वं ख्यातो लोके भविष्यसि ॥ ६५ ॥
अब आप मेरा यह अनुशासन सुनें—आपने केशीका वध किया है, इसलिये संसारमें 'केशव' नामसे विख्यात होंगे।
स्वस्त्यस्तु भवतो लोके साधु याम्यहमाशुगः।
कृत्यशेषं च ते कार्यं शक्तस्त्वमसि मा चिरम् ॥ ६६ ॥
जगत्में आपका (या आपसे जगत्का) कल्याण हो। आपको साधुवाद देकर मैं शीघ्र चला जाता हूँ। अब जो (कंस-वध आदि) कृत्य शेष रह गये हैं, उन्हें आपको पूर्ण करना है। आप इसमें समर्थ हैं, अतः शीघ्र कर डालें; विलम्ब न होने दें ॥ ६६ ॥
त्वयि कार्यान्तरगते नरा इव दिवौकसः।
विडम्बयन्तः क्रीडन्ति लीलां त्वद्बलमाश्रिताः ॥ ६७ ॥
जब आप भूभार-हरण आदि अन्य कार्योंके लिये यहाँ (अवतार लेनेके लिये) चले आते हैं, तब आपके ही बलका आश्रय लेनेवाले देवता भी मनुष्योंकी भाँति आपकी लीलाका अनुकरण (अभिनय) करते हुए (नाटक आदि) खेलते हैं।६७।
अभ्याशे वर्तते कालो भारतस्याहवोदधेः।
हस्तप्राप्तानि युद्धानि राज्ञां त्रिदिवगामिनाम् ॥ ६८ ॥
समुद्रतुल्य महाभारतयुद्धका समय अब बहुत निकट है। मरकर स्वर्गमें जानेवाले राजाओंके लिये युद्धके अवसर हाथमें आ गये हैं ॥ ६८ ॥
पन्थानः शोधिता व्योम्नि विमानाना रोहोर्ध्वगाः।
अवकाशा विभज्यन्ते शक्रलोके महीक्षिताम् ॥ ६९ ॥
विमानोंके आरोहणके लिये आकाशमें जो ऊर्ध्वगामी मार्ग हैं, उनका शोधन कर दिया गया है (रुकावटें दूर कर दी गयी हैं)। इन्द्रलोकमें आनेवाले राजाओंके लिये पृथक्-पृथक् अवकाश (निवास-स्थान) बनाये जाते हैं ॥ ६९ ॥
उग्रसेनसुते शान्ते पदस्थे त्वयि केशव।
अभितस्तन्महद् युद्धं भविष्यति महीक्षिताम् ॥ ७० ॥
केशव ! उग्रसेनकुमार कंसके मारे जानेपर जब आप यादवोंके संरक्षणके रूपमें मुख्य पदपर प्रतिष्ठित होंगे; तब सब ओर राजाओंका वह महान् युद्ध आरम्भ हो जायगा ॥७०।
त्वां चाप्रतिमकर्माणं संश्रयिष्यन्ति पाण्डवाः।
भेदकाले नरेन्द्राणां पक्षग्राहो भविष्यसि ॥ ७१ ॥
आपके कर्म (या पराक्रम) की कहीं तुलना नहीं है, अतः पाण्डवलोग आपकी ही शरण लेंगे। राजाओंमें भेदके अवसरपर जब युद्ध उपस्थित होगा, उस समय आप पाण्डवोंका ही पक्ष लेंगे ॥ ७१ ॥
त्वयि राजासनस्थे हि राजश्रियमनुत्तमाम्।
शुभां त्यक्ष्यन्ति राजानस्त्वत्प्रभावात्र संशयः ॥ ७२ ॥
जब आप राजासनपर बैठेंगे, तब आपके प्रभावसे राजा लोग अपनी उत्तम एवं शुभ राज्यलक्ष्मीको त्याग देंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ७२ ॥
एष मे कृष्ण संदेशः श्रुतिभिः ख्यातिमेष्यति।
देवतानां दिविस्थानां जगतश्च जगत्पते ॥ ७३ ॥
जगदीश्वर श्रीकृष्ण ! यह मेरा तथा स्वर्गवासी देवताओंका संदेश है, जो श्रुतियोंद्वारा गूढ़ रूपसे प्रतिपादित है।* अब यह जगत्में भी विख्यात हो जायगा ॥ ७३ ॥
दृष्टं मे भवतः कर्म दृष्टश्वासि मया प्रभो।
कंसं भूयः समेष्यामि साधिते साधु याम्यहम् ॥ ७४ ॥
* उन संदेशप्रतिपादक श्रुतियोंमेंसे एक श्रुति, जो महाभारतयुद्धपर प्रकाश डालती है, इस प्रकार है—"अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च विवर्तेते रजसी वेद्याभिः। वैश्वानरो जायमानो न राजावातिरज्ज्योतिषाग्निस्तमांसि" अर्थात् एक युद्धयज्ञका सम्बन्ध श्रीकृष्णसे है और दूसरे युद्धयज्ञका अर्जुनसे। उन दोनोंने एक साथ होकर जब कार्य किया, तब उनके द्वारा दो युद्ध-यज्ञ सम्पादित हुए। वे दोनों युद्धयज्ञ रजोगुणी थे; क्योंकि प्राप्य पैतृक सम्पत्तिको निमित्त बनाकर किये गये थे। वैश्वानर अर्थात् धर्म संसारमें जन्म ग्रहण करके (श्रीकृष्ण और अर्जुनकी सहायतासे) निश्चय ही राजा हुआ। उसने प्रकाशमान अग्निकी सहायतासे असुरोंका अन्धकार तिरोहित कर दिया था (अर्थात् धर्मराजने खाण्डव-दाहके समय अग्निके दिये हुए चक्र और गाण्डीवकी सहायतासे श्रीकृष्ण और अर्जुनके पराक्रमद्वारा असुरोंका विध्वंस कराया। (नीलकण्ठीसे)
| २९४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
प्रभो ! मैंने आपका पराक्रम देखा, आपका भी दर्शन किया। साधुवाद ! अब मैं जाता हूँ, कंसके मारे जानेपर मैं फिर आपसे मिलूँगा ॥ ७४ ॥
एवमुक्त्वा तु स तदा नारदः खं जगाम ह ।
नारदस्य वचः श्रुत्वा देवसंगीतयोनिनः ॥ ७५ ॥
तथेति स समाभाष्य पुनर्गोपान् समासद्त् ।
गोपाः कृष्णं समासाद्य विविशुर्व्रजमेव ह ॥ ७६ ॥
ऐसा कहकर नारदजी तत्काल आकाशमें चले गये। देवसङ्गीतके उत्पत्तिके स्थान नारदजीका पूर्वोक्त वचन सुनकर श्रीकृष्णने 'तथास्तु' कहकर उनकी बात मान ली, फिर वे गोपोंसे मिले। गोपगण श्रीकृष्णसे मिलकर उनके साथ ही पुनः ब्रजमें प्रविष्ट हुए ॥ ७५-७६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि केशिवधे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें केशीका वधविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥
पञ्चविंशोऽध्यायः
अक्रूरका ब्रजमें आकर भगवान् श्रीकृष्णको देखना और उनके विषयमें अनेक प्रकारकी बातें सोचना
वैशम्पायन उवाच
अथास्तं गच्छति तदा मन्दरश्मौ दिवाकरे ।
संध्यारक्ततले व्योम्नि शशाङ्के पाण्डुमण्डले ॥ १ ॥
नीडस्थेषु विहङ्गेषु सत्सु प्रादुष्कृताग्निषु ।
ईषत्तमःसंवृतासु दिक्षु सर्वासु सर्वशः ॥ २ ॥
घोषवासिषु सुप्तेषु वाशन्तीषु शिवासु च ।
नक्तंचरेषु हृष्टेषु पिशिताशनकाङ्क्षिषु ॥ ३ ॥
शक्रगोपाह्वयामोदे प्रदोषेऽभ्यासत्तस्करे ।
संध्यामयीमिव गुहां सम्प्रतिष्ठे दिवाकरे ॥ ४ ॥
अधिश्रयणवेलायां प्राप्तायां गृहमेधिनाम् ।
वन्यैर्वैखानसैर्मन्त्रैर्हूयमाने हुताशने ॥ ५ ॥
उपावृत्तासु वै गोषु दुह्यमानासु च व्रजे ।
असकृद्व्याहरन्तीषु बद्धवत्सासु धेनुषु ॥ ६ ॥
प्रकीर्णदामनीकेषु गास्तथैवाह्वयत्सु च ।
सनिनादेषु गोषेषु काल्यमाने च गोधने ॥ ७ ॥
करीषेषु प्रक्लप्तेषु दीप्यमानेषु सर्वशः ।
काष्ठभारानतस्कन्धैर्गोपैरभ्यागतैस्तथा ॥ ८ ॥
किंचिदभ्युद्गते सोमे मन्दरश्मौ विराजति ।
ईषद्विगाहमानायां रजन्यां दिवसे गते ॥ ९ ॥
प्राप्ते दिनव्युपरमे प्रवृत्ते क्षणदामुखे ।
भास्करे तेजसि गते सौम्ये तेजस्युपस्थिते ॥ १० ॥
अग्निहोत्राकुले काले सौम्येन्दौ समुपस्थिते ।
अग्नीषोमात्मके संधौ वर्तमाने जगन्मये ॥ ११ ॥
पश्चिमेनाग्निदीप्तेन पूर्वेणोत्पलवर्चसा ।
दग्धाद्रिसदृशे व्योम्नि किंचित्तारागणाकुले ॥ १२ ॥
वयोभिर्वासमुपगतैर्बन्धुभिश्च समागमम् ।
शंसद्भिः स्यन्दनेनाशु प्राप्तो दानपतिर्व्रजम् ॥ १३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस दिन जब सूर्यदेव अस्ताचलको जाने लगे, उनकी किरणें मन्द हो गयीं, पश्चिमके आकाशमें संध्याकी लाली छा गयी, चन्द्रमाका श्वेत-पीत मण्डल उदित होने लगा, पक्षी अपने नीडों (घोसलों) में विश्राम करने लगे, श्रेष्ठ याज्ञिकोंने जब अग्नि प्रज्वलित कर दी, सम्पूर्ण दिशाएँ सब ओरसे जब कुछ-कुछ अन्धकारसे आवृत हो गयीं, व्रजवासी सोनेकी तैयारी करने लगे, गीदड़ियाँ बोलने लगीं, मांसाहारकी अभिलाषा रखनेवाले निशाचर हर्षमें भर गये, धूपसे तपे हुए इन्द्रगोप नामक कीड़ोंको आनन्द देनेवाला और वेदोंके स्वाध्यायको बंद करनेवाला प्रदोषकाल जब आ पहुँचा, जब सूर्यदेव संधारूपिणी गुफामें प्रविष्ट हो गये, जब गृहस्थोंके लिये हवनीय घृत या दुग्धको आगपर रखनेकी वेला आ पहुँची, वनवासी वैखानस (वानप्रस्थ) जब मन्त्रोंद्वारा अग्निमें आहुति देने लगे, जब गौएँ वनसे लौटकर ब्रजमें आ गयीं और उनका दूध दुह लिया गया, जिनके बछड़े बँधे थे और जो स्वयं भी लंबी रस्सियोंमें आबद्ध थीं, वे धेनुएँ जब बार-बार रँभाने लगीं, गौओंको बुलाते हुए गोपगण जब सब ओर कोलाहल करने लगे, जब बाँधनेके लिये गौओंको हाँककर ले जाया जाने लगा; काष्ठके भारसे झुके हुए कंधोंवाले गोप जब घर आकर सब ओर फैले हुए सूखे गोबरके चूरोंको सुलगाने या प्रज्वलित करने लगे, किंचित् उदित हुए चन्द्रदेव जब अपनी मन्द किरणोंसे ही प्रकाशित हो रहे थे, दिन चले जानेपर थोड़ी-सी ही रातका आगमन हुआ था, दिनकी पूर्ण समाप्ति होकर रात्रिके प्रथम प्रहरका अभी आरम्भ ही हुआ था, सूर्यका उष्ण प्रकाश अस्त होकर चन्द्रमाका शीतल प्रकाश उपस्थित हुआ था, जिस समय अग्निहोत्रकी सुगन्धि सब ओर व्याप्त हो रही थी, स्वभावतः सौम्य चन्द्रदेव उदित हुए, जब सम्पूर्ण जगत्में अग्नीषोमात्मक संधिका समय वर्तमान था, जब पश्चिममें अग्निके समान संध्याकालका अरुण प्रकाश फैला था तथा पूर्वमें भी लाल कमलके समान कान्तिवाले चन्द्रमाकी कुङ्कुम-
[विष्णुपर्व.] पञ्चविंशोऽध्यायः २९५
जैसी प्रभा फैली हुई थी और उन दोनों दिशाओंके अरुण प्रकाशसे जब आकाश उभयपार्श्वसे दग्ध हुए पर्वतके समान प्रतीत हो रहा था और उसमें कुछ-कुछ तारे प्रकट हो गये थे, ऐसे समयमें घर लौटनेकी इच्छावाले पथिकोंको बन्धुओंसे समागम होनेकी सूचना-सी देनेवाले पक्षियोंके साथ-साथ दानपति अक्रूर अपने रथके द्वारा शीघ्र ही ब्रजमें आ पहुँचे ॥ १-१३ ॥
प्रविशन्नेव पप्रच्छ सांनिध्यं केशवस्य सः।
रौहिणेयस्य चाक्रूरो नन्दगोपस्य चासकृत् ॥ १४ ॥
ब्रजमें प्रवेश करते ही अक्रूर वहाँके लोगोंसे बारंवार श्रीकृष्ण, रोहिणीनन्दन बलराम तथा नन्दगोपका निवास-स्थान पूछने लगे ॥ १४ ॥
स नन्दगोपस्य गृहं वासाय विबुधोपमः।
अवतीर्य ततो यानात् प्रविवेश महाबलः ॥ १५ ॥
तत्पश्चात् देवोपम कान्तिसे युक्त महाबली अक्रूर उस रथसे उतरकर निवासके लिये नन्दगोपके घरमें प्रविष्ट हुए ॥ १५ ॥
हर्षपूर्णेन वक्त्रेण साश्रुनेत्रेण चैव हि।
प्रविशन्नेव च द्वारि ददर्शादोहने गवाम् ॥ १६ ॥
वत्समध्ये स्थितं कृष्णं सवत्समिव गोवृषम्।
उस समय उनके मुखपर पूर्ण हर्ष छा रहा था, नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बह रहे थे, नन्दके द्वारपर पदार्पण करते ही उन्होंने देखा, गौओंके दुहनेके स्थानमें श्रीकृष्ण बहुत-से बछड़ोंके बीचमें खड़े हैं। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो बछड़ों-सहित साँड़ खड़ा हो ॥ १६३ ॥
स तं हर्षपरीतेन वचसा गद्गदेन वै ॥ १७ ॥
एहि केशव तातेति प्रव्याहरत धर्मवित्।
उन्हें देखते ही धर्मज्ञ अक्रूर हर्षभरी गद्गद वाणीद्वारा बोले—‘तात केशव ! यहाँ आओ !’ ॥ १७३ ॥
उत्तानशायिनं दृष्ट्वा पुनर्हृष्ट्वा श्रिया वृतम् ॥ १८ ॥
अव्यक्तयौवनं कृष्णमक्रूरः प्रशशंस ह।
(कुछ ही वर्ष पहले) जिन्हें शैशवावस्थामें उत्तान सोते देखा-सुना था, उन्हीं श्रीकृष्णको पुनः अनुपम शोभासे सम्पन्न अव्यक्त यौवन-अवस्थामें देखकर अक्रूर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ १८३ ॥
अयं स पुण्डरीकाक्षः सिंहशार्दूलविक्रमः।
सम्पूर्णजलमेघाभः पर्वतप्रवराकृतिः ॥ १९ ॥
ये ही वे सिंह और व्याघ्रके समान पराक्रमी कमलनयन श्रीकृष्ण दिखायी देते हैं, जिनकी अङ्गकान्ति जलसे भरे हुए जलधरकी भाँति श्याम है और शरीरकी ऊँचाई श्रेष्ठ पर्वतके समान प्रतीत होती है ॥ १९ ॥
मृधेष््वप्यधर्षणीयेन सश्रीवत्सेन वक्षसा।
द्विपन्निधनदक्षाभ्यां भुजाभ्यां साधु भूषितः ॥ २० ॥
इनका श्रीवत्सविभूषित वक्षःस्थल युद्धमें अजेय है और भुजाएँ शत्रुओंका संहार करनेमें कुशल हैं। इन भुजाओं तथा वक्षःस्थलसे इनके श्रीविग्रहकी बड़ी शोभा हो रही है ॥
मूर्तिमान् स रहस्यात्मा जगतोऽग्र्यस्य भाजनम्।
गोपवेषधरो विष्णुरुद्द्योतयन्नूरुहः ॥ २१ ॥
ये ही वे मूर्तिमान् रहस्यात्मा (उपनिषदोंमें प्रतिपादित पुरुषोत्तम) हैं, जो इस संसारकी अग्रपूजा पानेके प्रथम अधिकारी हैं। वे भगवान् विष्णु ही यहाँ गोप-वेश धारण करके प्रकट हुए हैं। इनकी रोमावलि ऊपरकी ओर उठी हुई और परम पवित्र है (अर्थात् यह प्रेमी भक्तोंको देखते ही रोमाञ्चित हो उठते हैं) ॥ २१ ॥
किरीटलाञ्छनेनापि शिरसा छत्रवर्चसा।
कुण्डलोत्तमयोग्याभ्यां श्रवणाभ्यां विभूषितः ॥ २२ ॥
जिसपर किरीट धारण करनेका चिह्न है तथा जहाँ छत्राकार कान्ति प्रकाशित हो रही है, उस मस्तकसे और उत्तम कुण्डल पहनने योग्य दोनों कानोंसे ये विभूषित हो रहे हैं ॥
हारार्हेण च पीनेन सुविस्तीर्णेन वक्षसा।
द्वाभ्यां भुजाभ्यां वृत्ताभ्यां दीर्घाभ्यामुपशोभितः ॥ २३ ॥
हार पहनने योग्य ऊँची और चौड़ी छातीसे तथा गोलाकार दो विशाल भुजाओंसे इनकी बड़ी शोभा हो रही है ॥
स्त्रीसहस्रोपचर्येण वपुषा मन्मथाधिना।
पीते वसानो वसने सोऽयं विष्णुः सनातनः ॥ २४ ॥
इनका श्रीविग्रह उस यौवन और पौगण्ड अवस्थाकी संधिमे पहुँचा हुआ है, जहाँ कामदेवको आश्रय मिलता है। यह विग्रह सहस्रों स्त्रियोंद्वारा परिचर्या प्राप्त करने योग्य है, ऐसे दिव्य शरीरपर दो पीत-वस्त्र धारण किये ये वे ही सनातन विष्णु यहाँ विराजमान हैं ॥ २४ ॥
धरण्याश्रयभूताभ्यां चरणाभ्यामरिंदमः।
त्रैलोक्याक्रान्तिभूताभ्यां भुवि पद्भ्यां व्यवस्थितः ॥ २५ ॥
जो पृथ्वीके आश्रयभूत हैं तथा तीनों लोकोंको आक्रान्त करनेमें समर्थ हैं, ऐसे संचरणशील युगल चरणोंसे यह शत्रुदमन श्रीकृष्ण इस भूमिपर खड़े हैं ॥ २५ ॥
रुचिराग्रकरश्चास्य चक्राङ्कित इवेक्ष्यते।
द्वितीय उद्यतश्चापि गदासंयोगमिच्छति ॥ २६ ॥
इनका एक हाथ, जिसका अग्रभाग बहुत ही सुन्दर है, चक्रसे चिह्नित-सा दिखायी देता है। दूसरा उठा हुआ हाथ गदासे संयुक्त होना चाहता है ॥ २६ ॥
अवतीर्णो भवायेह प्रथमं पदमात्मनः।
शोभतेऽद्य भुवि श्रेष्ठस्त्रिदशानां धुरंधरः ॥ २७ ॥
| २९६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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ये ही परब्रह्म परमात्माके प्रथम पद^१ (तुरीय ब्रह्म) हैं, जो यहाँ जगत्के कल्याणके लिये अवतीर्ण हुए हैं। देवताओंकी रक्षाका भार वहन करनेवाले वे सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर आज भूतलपर अवतीर्ण होकर शोभा पाते हैं॥ २७ ॥
अयं भविष्ये कथितो भविष्यकुशलैर्नरैः ।
गोपालो यादवं वंशं क्षीणं विस्तारयिष्यति ॥ २८ ॥
इन्हींके विषयमें भविष्यकी बात बतानेमें कुशल मनुष्योंने कहा है कि गोपाल श्रीकृष्ण भविष्यमें क्षीण हुए यादववंशका विस्तार करेंगे ॥ २८ ॥
तेजसा यादवाश्चास्य शतशोऽथ सहस्रशः ।
वंशमापूरयिष्यन्ति ह्रदा इव महार्णवम् ॥ २९ ॥
जैसे नदियोंके बहुत-से जलप्रवाह महासागरको पूर्ण करते रहते हैं, उसी प्रकार सैकड़ों और हजारों यदुवंशी इनके प्रभावसे अपने वंशकी वृद्धि करेंगे ॥ २९ ॥
अस्येदं शासने सर्वं जगत् स्थास्यति शाश्वतम् ।
निहतामित्रसामन्तं स्फीतं कृतयुगे तथा ॥ ३० ॥
यह सारा जगत्, जो सनातनकालसे चला आ रहा है, इनके शासनमें स्थित होगा। उस समय इसको कष्ट देनेवाले शत्रु और सामन्त नष्ट हो जायेंगे और यह विश्व सत्ययुगकी भाँति सुख-शान्ति एवं समृद्धिसे सम्पन्न हो जायगा ॥ ३० ॥
अयमास्थाय वसुधां स्थापयित्वा जगद् वशे ।
राज्ञां भविष्यत्युपरि न च राजा भविष्यति ॥ ३१ ॥
ये इस वसुधापर रहकर जगत्को अपने वशमें स्थापित करके समस्त राजाओंके ऊपर प्रतिष्ठित हो जायेंगे, परंतु स्वयं राजा नहीं बनेंगे ॥ ३१ ॥
नूनं त्रिभिः क्रमैर्जित्वा यथायेन प्रभुः कृतः ।
पुरा पुरंदरो राजा देवतानां त्रिविष्टपे ॥ ३२ ॥
तथैव वसुधां जित्वा जितपूर्वां त्रिभिः क्रमैः ।
स्थापयिष्यति राजानमुग्रसेनं न संशयः ॥ ३३ ॥
निश्चय ही पूर्वकालमें जिस प्रकार इन्होंने अपने तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको जीतकर स्वर्गमें पुरन्दर इन्द्रको देवताओंका राजा बनाया था, उसी प्रकार पहलेकी तीन पगोंद्वारा जीती हुई इस वसुधाको फिर जीतकर यह उग्रसेनको राजाके आसनपर बैठायेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ३२-३३ ॥
प्रसृतवैरघातोऽयं प्रश्नैश्च बहुभिः श्रुतः ।
ब्राह्मणैर्ब्रह्मवादैश्च पुराणोऽयं हि गीयते ॥ ३४ ॥
यह फैले हुए वैरका अन्त करनेवाले हैं, प्रश्नोपनिषद्में बहुत-से (छः) प्रश्नोंद्वारा इन्हींके तत्त्वका प्रतिपादन सुना गया है। ब्रह्मवादी ब्राह्मणोंद्वारा ये पुराण-पुरुष कहे जाते हैं ॥ ३४ ॥
स्पृहणीयो हि लोकस्य भविष्यति च केशवः ।
तथा ह्यास्योत्थिता बुद्धिर्मानुष्यमुपजीवितुम् ॥ ३५ ॥
यह भगवान् केशव समस्त जगत्के लिये स्पृहणीय होंगे, क्योंकि इनकी बुद्धिमें मानवताको नया जीवन देनेका विचार उठ खड़ा हुआ है ॥ ३५ ॥
अहं त्वस्याद्य वसतिं पूजयिष्ये यथाविधि ।
विष्णुत्वं मनसा चैव पूजयिष्यामि मन्त्रवत् ॥ ३६ ॥
आज मैं इनके निवासस्थानका विधिपूर्वक पूजन करूँगा, फिर मन-ही-मन इनके विष्णुरूपकी भावना करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसकी अर्चना करूँगा ॥ ३६ ॥
यच्च ज्ञातिपरिज्ञानं प्रादुर्भावश्च वै नृषु ।
अमानुषं वेद्मि चैनं ये चान्ये दिव्यचक्षुषः ॥ ३७ ॥
इनमें जो अपने बन्धु-बान्धवोंको पहचाननेकी शक्ति है और जो इनका मनुष्योंमें अवतार हुआ है, वह सब मेरे लिये आदरणीय है। मैं तो इन्हें अमानव (अलौकिक परमात्मा) समझता ही हूँ, दूसरे दिव्य नेत्रधारी महापुरुष भी इन्हें ऐसा ही मानते हैं ॥ ३७ ॥
सोऽहं कृष्णेन वै रात्रौ सम्मन्त्र्य विदितात्मना ।
सहानेन गमिष्यामि सब्रजो यदि मंस्यते ॥ ३८ ॥
अतः मैं इन आत्मवेत्ता श्रीकृष्णके साथ रातमें भलीभाँति सलाह करके यदि ब्रजवासियोंसहित ये मेरी बात मान लेंगे तो इनके साथ ही कल मथुराकी यात्रा करूँगा ॥ ३८ ॥
एवं बहुविधं कृष्णं दृष्ट्वा हेत्वर्थकारणैः ।
विवेश नन्दगोपस्य कृष्णेन सह संसदम् ॥ ३९ ॥
इस प्रकार युक्तियुक्त कार्य-कारणका विचार करते हुए अक्रूरने श्रीकृष्णको बारंबार देखा और उनके साथ नन्दगोपकी बैठकमें प्रवेश किया ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अक्रूरागमने पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अक्रूरका आगमनविषयक पच्चीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥
१. माण्डूक्य उपनिषद्में प्रणवकी मात्राओंपर विचार करते हुए ब्रह्मके चार पाद बताये गये हैं—विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तुरीय। इनमें तुरीय साक्षात् पूर्ण परब्रह्मका बोधक है। उत्पत्ति-क्रमसे गणना करनेपर यह तुरीय ही प्रथम पाद हो सकता है। इसीलिये यहाँ प्रथम पदका अर्थ तुरीय ब्रह्म किया गया है।
[विष्णुपर्व.] षड्विंशोऽध्यायः २९७
षड्विंशोऽध्यायः
अक्रूरका गोपोंके लिये कंसका आदेश सुनाना और वसुदेव-देवकीकी दयनीय दशा बताकर श्रीकृष्ण-बलरामको मथुरा चलनेके लिये प्रेरित करना, मार्गमें अक्रूरको यमुनाजीके जलमें आश्चर्यमय नागलोक एवं भगवान् अनन्त तथा उनकी गोदमें श्रीकृष्णका दर्शन
वैशम्पायन उवाच
स नन्दगोपस्य गृहं प्रविष्टः सहकेशवः।
गोपवृद्धान् समानीय प्रोवाचामितदक्षिणः॥ १ ॥
कृष्णं चैवाब्रवीत् प्रीत्या रौहिणेयेन सङ्गतम्।
श्वः पुरीं मथुरां तात गमिष्यामः सुखाय वै॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! श्रीकृष्णके साथ नन्दके गृहमें प्रवेश करके अनन्त दान-दक्षिणा देनेवाले अक्रूरने बड़े-बूढ़े गोपोंको बुलवाया और उनसे तथा बलरामसहित श्रीकृष्णसे प्रसन्नतापूर्वक यों कहा—‘तात! कल सबेरे हमलोग मथुरापुरीको चलेंगे। वहाँ चलकर तुम सुखी होओगे॥
यास्यन्ति च व्रजाः सर्वे गोपालाः सपरिग्रहाः।
कंसाज्ञया समुचितं करमादाय वार्षिकम्॥ ३ ॥
‘समस्त व्रजवासी गोप कंसकी आज्ञासे समुचित वार्षिक कर लेकर सपरिवार वहाँ चलेंगे॥ ३ ॥
समृद्धस्तत्र कंसस्य भविष्यति धनुर्महः।
तं द्रक्ष्यथ समृद्धं च स्वजनैश्च समेष्यथ॥ ४ ॥
‘वहाँ कंसका धनुर्यज्ञ बड़ी धूम-धामसे सम्पन्न होगा। उस समृद्धिशाली यज्ञको तुमलोग देखोगे और स्वजनोंसे भी मिलोगे॥ ४ ॥
पितरं वसुदेवं च सततं दुःखभाजनम्।
दीनं पुत्रवधभ्रान्तं युवामद्य समेष्यथः॥ ५ ॥
‘तुम दोनों भाई पुत्रोंके वधसे अत्यन्त दीन-दुर्बल होकर सदा दुःख ही भोगनेवाले अपने पिता वसुदेवजीसे वहाँ मिलोगे॥
सततं पीड्यमानं च कंसेनाशुभबुद्धिना।
दशान्ते शोषितं वृद्धं दुःखैः शिथिलतां गतम्॥ ६ ॥
‘अशुभ बुद्धिवाले कंसने उन्हें सदा ही पीड़ा दी है। इस बुढ़ापेमें उनके शरीरका रक्त-मांस सूख गया है। बूढ़े वसुदेव अनेक प्रकारके दुःखोंसे भी बहुत शिथिल हो गये हैं॥ ६ ॥
कंसस्य भयसंत्रस्तं भवद्भ्यां च विना कृतम्।
दह्यमानं दिवा रात्रौ सोत्कण्ठेनान्तरात्मना॥ ७ ॥
‘एक तो कंसका भय उन्हें आतङ्कित किये रहता है, दूसरे तुम दोनोंसे वे बिछुड़ गये हैं; अतः तुम्हारे लिये उत्कण्ठितचित्त होकर दिन-रात चिन्ताकी आगमें जलते रहते हैं॥ ७ ॥
तां च द्रक्ष्यसि गोविन्द पुत्रैरमृदितस्तनीम्।
देवकीं देवसंकाशां सीदन्तीं विहतप्रभाम्॥ ८ ॥
पुत्रशोकेन शुष्यन्तीं त्वद्दर्शनपरायणाम्।
वियोगशोकसंतप्तां विवत्सामिव सौरभीम्॥ ९ ॥
‘गोविन्द! तुम वहाँ चलकर अपनी माता देवकीका भी दर्शन करोगे, जिसके स्तनोंसे उसके पुत्रोंने कभी मुँह नहीं लगाया है। वह देवियों-जैसी नारी इस समय प्रभाहीन होकर दुःख भोग रही है। तुम्हारे दर्शनकी आशा लिये पुत्रशोकसे सूखती जा रही है। बिना बछड़ेकी गायके समान वह पुत्र-वियोगके शोकसे संतप्त रहती है॥ ८-९ ॥
उपप्लुतेक्षणां दीनां नित्यं मलिनवाससम्।
खर्भानुवदनग्रस्तां शशाङ्कस्य प्रभामिव॥ १० ॥
‘उस दुखियाके नेत्रोंमें निरन्तर आँसू भरे रहते हैं। उसके वस्त्र मैले हो गये हैं। वह राहुके मुखमें पड़ी हुई चन्द्रमाकी प्रभाके समान जान पड़ती है॥ १० ॥
त्वद्दर्शनपरां नित्यं तवागमनकाङ्क्षिणीम्।
त्वत्प्रवृत्तेन शोकेन सीदन्तीं वै तपस्विनीम्॥ ११ ॥
‘उसे सदा यही चिन्ता रहती है कि कब तुम्हारा दर्शन होगा। वह प्रतिदिन तुम्हारे शुभागमनकी अभिलाषा रखती है। वह तपस्विनी नारी तुम्हारे शोकसे शिथिल हो गयी है॥
त्वत्प्रलापेष्वकुशलां त्वया बाल्ये वियोजिताम्।
अरूपज्ञां तव विभो वक्त्रस्यास्येन्दुवर्चसः॥ १२ ॥
‘प्रभो! बाल्यावस्थामें ही वह तुमसे बिछुड़ गयी, अतः तुम्हारी मीठी-मीठी बातोंमें क्या रस है, इसको समझनेकी चतुरता उसमें नहीं आ सकी है। वह तुम्हारे रूपको नहीं जानती, चन्द्रमाके समान कान्तिमान् इस मुखके दर्शनसे भी वञ्चित रह गयी है॥ १२ ॥
यदि त्वां जनयित्वा सा देवकी तात तप्यते।
अपत्यार्थो नु कस्तस्या वरं ह्येवानपत्यता॥ १३ ॥
‘तात! यदि तुम्हें जन्म देकर देवकी इतना संताप सह रही है तो उसे संतानका क्या फल मिला? इससे तो उसका संतानहीन होना ही अच्छा था॥ १३ ॥
अपुत्राणां हि नारीणामेकः शोको विधीयते।
सपुत्रा त्वफले पुत्रे धिक्प्रजातेन तप्यते॥ १४ ॥
‘जिन नारियोंके पुत्र नहीं हुआ है, उन्हें एक ही शोक रहता है; परंतु जो पुत्रवती होकर भी पुत्रका फल न पा सके, वह उस धिक्कार पानेके योग्य संतानसे सदा ही संतप्त होती रहती है॥ १४ ॥
२९८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
त्वं तु शक्रसमः पुत्रो यस्यास्त्वत्सदृशो गुणैः ।
परेषामप्यभयदो न सा शोचितुमर्हति ॥ १५ ॥
'जिसके तुम्हारे समान गुणवान्, इन्द्रतुल्य तेजस्वी तथा दूसरोंको भी अभयदान देनेवाला पुत्र हो, उस माताको शोककी भागिनी नहीं होना चाहिये ॥ १५ ॥
वृद्धौ तवाम्बापितरौ परभृत्यत्वमागतौ ।
भर्त्सितौ त्वत्कृते नित्यं कंसेनाशुभबुद्धिना ॥ १६ ॥
'भैया ! तुम्हारे बूढ़े माता-पिता दूसरेके दासभावको प्राप्त हो गये हैं। पापपूर्ण विचार रखनेवाला कंस उन्हें प्रति-दिन तुम्हारे कारण डाँटता-फटकारता रहता है ॥ १६ ॥
यदि ते देवकी मान्या पृथिवीवात्मधारिणी ।
तां शोकसलिले मग्नामुत्तारयितुमर्हसि ॥ १७ ॥
'तुम्हारे शरीरको अपने गर्भमें धारण करनेवाली माता देवकी यदि लोकधारिणी पृथ्वीके समान माननीय है तो तुमने जैसे पृथ्वीका जलसे उद्धार किया था, उसी प्रकार शोक-सागरके जलमें डूबी हुई उस देवकीका भी तुम्हें उद्धार करना चाहिये ॥ १७ ॥
तं च वृद्धं प्रियसुतं वसुदेवं सुखोचितम् ।
पुत्रयोगेन संयोज्य कृष्ण धर्ममवाप्स्यसि ॥ १८ ॥
'श्रीकृष्ण ! जिन्हें अपने पुत्र बहुत ही प्रिय हैं तथा जो सुख भोगनेके योग्य हैं, उन बूढ़े वसुदेवको पुत्र-संयोगका सुख देकर तुम धर्मके भागी होओगे ॥ १८ ॥
यथा नागः सुदुर्वृत्तो दमितो यमुनाह्रदे ।
विमूलः स कृतः शैलो यथा वै भूधरस्त्वया ॥ १९ ॥
दर्पोत्सिक्तश्च बलवानरिष्टो विनिपातितः ।
परप्राणहरः केशी दुष्टात्मा च हयो हतः ॥ २० ॥
एतेनैव प्रयत्नेन वृद्धावुद्धृत्य दुःखितौ ।
यथा धर्ममवाप्नोषि तत् कृष्ण परिचिन्त्यताम् ॥ २१ ॥
'श्रीकृष्ण ! जैसे तुमने यमुनाके कुण्डमे रहनेवाले उस दुराचारी नागका दमन किया, जैसे गोवर्धन पर्वतको जड़से उखाड़ दिया, जिस प्रकार बलवान् एवं मदमत्त अरिष्टासुरको मार गिराया तथा जिस तरह दूसरोंके प्राण लेनेवाले अश्वरूप-धारी दुष्टात्मा केशीका वध किया, वैसे ही प्रयत्नके द्वारा उन दुखी एवं वृद्ध माता-पिताका उद्धार करके तुम जैसे भी धर्मके भागी हो सको, उस उपायको सोचो ॥ १९-२१ ॥
निर्भर्त्स्यमानो यैर्दृष्टः पिता ते कंससंसदि ।
ते सर्वे चक्रुरश्रूणि नेत्रैर्दुःखान्विता भृशम् ॥ २२ ॥
'जिन लोगोंने कंसकी सभामें तुम्हारे पितापर डाँट पड़ती देखी थी, वे सब-के-सब अत्यन्त दुखी होकर नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे थे ॥ २२ ॥
गर्भावकर्तनादीनि दुःखानि सुबहून्यपि ।
माता ते देवकी कृष्ण कंसस्य सहतेऽवशा ॥ २३ ॥
'कृष्ण ! तुम्हारी माता देवकी विवश होकर कंसके द्वारा दिये गये गर्भोच्छेद आदि बहुत-से दुःख सहती चली आ रही है ॥ २३ ॥
मातापितृभ्यां सर्वेण जातेन तनयेन वै ।
ऋणं वै प्रतिकर्तव्यं यथायोगमुदाहृतम् ॥ २४ ॥
'माता-पितासे उत्पन्न हुए सभी पुत्रोंको यथायोग्य सेवा करके उनके ऋणोंको उतार देना चाहिये, यह शास्त्रकी आज्ञा है ॥ २४ ॥
एवं ते कुर्वतः कृष्ण मातापित्रोरनुग्रहम् ।
परित्यजेतां तौ शोकं स्याच्च धर्मस्त्वानघ ॥ २५ ॥
'निष्पाप श्रीकृष्ण ! यदि इस प्रकार तुमने माता-पितापर अनुग्रह किया तो वे दोनों अपने बीते हुए शोकको त्याग देंगे और तुम्हें धर्मकी प्राप्ति होगी' ॥ २५ ॥
वैशम्पायन उवाच
कृष्णः सुविदितार्थो वै तमाहामितविक्रमम् ।
बाढमित्येव तेजस्वी न च क्रोधवशं गतः ॥ २६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! इन सब बातों-को अच्छी तरह जान लेनेपर तेजस्वी श्रीकृष्णने अमित-पराक्रमी अक्रूरसे कहा - 'बहुत अच्छा ! हमलोग आपके साथ चलेंगे।' वे क्रोधके वशीभूत नहीं हुए ॥ २६ ॥
ते च गोपाः समागम्य नन्दगोपपुरःसराः ।
अक्रूरवचनं श्रुत्वा चेलुः कंसस्य शासनात् ॥ २७ ॥
नन्द आदि सभी गोप वहाँ एकत्र हो अक्रूरजीकी बात सुनकर कंसकी आज्ञासे मथुरा चलनेको उद्यत हो गये ॥ २७ ॥
गमनाय च ते सज्जा बभूवुर्व्रजवासिनः ।
सज्जं चोपायनं कृत्वा गोपवृद्धाः प्रतस्थिरे ॥ २८ ॥
वे ब्रजवासी गोप यात्राके लिये सुसज्जित हो गये। भेंटकी सामग्रीको सजाकर बड़े-बूढ़े गोप वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ २८ ॥
करं चानडुहः सर्पिर्महिषांश्चोपनायिकान् ।
यथासारं यथायूथमुपानीय पयो दधि ॥ २९ ॥
तं सञ्जयित्वा कंसस्य करं चोपायनानि च ।
ते सर्वे गोपपतयो गमनायोपतस्थिरे ॥ ३० ॥
वार्षिक कर, गाड़ीका बोझ ढोनेवाले बैल, भैंसें, घी, दूध और दही आदि उपहार-सामग्रियोंको अपनी-अपनी शक्ति और यूथके अनुसार लेकर एकत्र किया, फिर कंसकी उस उपायन-सामग्री और वार्षिक करको छकड़ेमें सजाकर वे सभी गोप सरदार यात्रा करनेके लिये नन्दके द्वारपर उपस्थित हुए ॥
अक्रूरस्य कथाभिश्च सह कृष्णेन जाग्रतः ।
रौहिणेयतृतीयस्य सा निशा व्यत्यवर्तत ॥ ३१ ॥
विष्णुपर्व ] षड्विंशोऽध्यायः २९९
श्रीकृष्णके साथ बातचीत करनेमें अक्रूरकी वह सारी रात जागते ही बीती। उनके साथ तीसरे व्यक्ति रोहिणीनन्दन बलरामजी थे ॥ ३१ ॥
ततः प्रभाते विमले पक्षिव्याहारसंकुले ।
नैशाकरे रश्मिजाले क्षणदाक्षयसंहृते ॥ ३२ ॥
नभस्यरुणसंस्तीर्णे पर्यस्ते ज्योतिषां गणे ।
प्रत्यूषपवनासारैः क्लेदिते धरणीतले ॥ ३३ ॥
क्षीणाकारासु तारासु सुप्तनिष्प्रतिभासु च ।
नैशमन्तर्दधे रूपमुद्गच्छति दिवाकरे ॥ ३४ ॥
तदनन्तर पक्षियोंके कलरवोंसे व्याप्त निर्मल प्रभातकाल उपस्थित हुआ। रात्रिकी समाप्तिके साथ ही चन्द्रदेवने अपने किरण-जालको समेट लिया। आकाशमें अरुणोदयकी लाली छा गयी। नक्षत्रोंका समुदाय अस्त हो गया। प्रातःकालकी वायुके साथ मिले हुए ओस-कणोंसे पृथ्वी गीली-सी हो गयी। तारिकाएँ क्षीण हो गयीं। वे सोयी हुईकी भाँति अपनी प्रभा खो बैठीं। सूर्योदय होनेके साथ ही निशाका रूप अदृश्य हो गया ॥ ३२-३४ ॥
शीतांशुः शान्तकिरणो निष्प्रभः समपद्यत ।
एको नाशयते रूपमेको वर्धयते वपुः ॥ ३५ ॥
शीतरश्मि चन्द्रमाकी किरणें शान्त हो जानेके कारण वे प्रभाहीन हो गये। एक (चन्द्रमा) अपने रूपको अदृश्य करने लगा और दूसरा (सूर्य) अपने तेजको बढ़ाने लगा ॥
गोभिश्च समकीर्णासु व्रजनिर्याणभूमिषु ।
मन्थानावर्तपूर्णेषु गर्जरेषु नदत्सु च ॥ ३६ ॥
दामभिर्दम्यमानेषु वत्सेषु तरुणेषु च ।
गोपैरापूर्यमाणासु घोषरथ्यासु सर्वशः ॥ ३७ ॥
तत्रैव गुरुकं भाण्डं शकटारोपितं बहु ।
त्वरिताः पृष्ठतः कृत्वा जग्मुः स्यन्दनवाहनाः ॥ ३८ ॥
व्रजसे बाहर जानेके मार्गोंकी भूमिपर गौएँ सब ओर फैल गयीं। मथानी घुमानेसे दहीके भरे मटकोंमें घर-घर ध्वनि होने लगी। नौजवान बछड़े रस्सियोंसे बाँधकर सधाये जाने लगे। व्रजकी गलियाँ सब ओरसे गोपोंद्वारा भर गयी थीं। ऐसे समयमें छकड़ेपर रखे गये दही-दूधके भारी-भारी भाण्डोंको पीछे करके गाड़ी हाँकनेवाले गोप तीव्र गतिसे चल दिये ॥ ३६-३८ ॥
कृष्णोऽथ रौहिणेयश्च स चैवामितदक्षिणः ।
त्रयो रथगता जग्मुस्त्रिलोकपतयो यथा ॥ ३९ ॥
श्रीकृष्ण, बलराम और अमित दक्षिणा देनेवाले दानपति अक्रूर—ये तीनों त्रिलोकपतियोंके समान रथपर बैठकर चल रहे थे ॥ ३९ ॥
अथाह कृष्णमक्रूरो यमुनातीरमाश्रितः ।
स्यन्दनं चात्र रक्षस्व यत्नं च कुरु वाजिषु ॥ ४० ॥
यमुनाजीके तटपर पहुँचकर अक्रूरने श्रीकृष्णसे कहा—'भैया ! रथको यहीं खड़ा रखो और घोड़ोंको काबूमें रखनेका प्रयत्न करो ॥ ४० ॥
हयेभ्यो यवसं दत्त्वा ह्यभाण्डे रथे तथा ।
प्रगाढं यत्नमास्थाय क्षणं तात प्रतीक्ष्यताम् ॥ ४१ ॥
'तात ! घोड़ोंको दान-घास देकर, इनके आभूषण और रथकी विशेष यत्नपूर्वक देख-भाल करते हुए एक क्षणतक मेरी प्रतीक्षा करो ॥ ४१ ॥
यमुनाया हृदे ह्यस्मिन् स्तोष्यामि भुजंगेश्वरम् ।
दिव्यैर्भागवतैर्मन्त्रैः सर्वलोकप्रभुं यतः ॥ ४२ ॥
'तबतक मैं यमुनाजीके इस कुण्डमें प्रवेश करके दिव्य भागवत मन्त्रोंद्वारा सम्पूर्ण जगत्के स्वामी नागराज अनन्तकी स्तुति कर लूँ ॥ ४२ ॥
गुह्यं भागवतं देवं सर्वलोकस्य भावनम् ।
श्रीमत्स्वस्तिकमूर्द्धानं प्रणमिष्यामि भोगिनम् ।
सहस्रशिरसं देवमनन्तं नीलवाससम् ॥ ४३ ॥
'वे गुह्यरूप भागवत देवता हैं, सम्पूर्ण लोकोंके उत्पादक एवं उन्नायक हैं। उनका मस्तक कान्तिमान् स्वस्तिक चिह्नसे अलंकृत है। वे सर्प-विग्रहधारी भगवान् अनन्त देव सहस्र सिरोंसे सुशोभित तथा नील वस्त्र धारण करनेवाले हैं। मैं उन्हें प्रणाम करूँगा ॥ ४३ ॥
धर्मदेवस्य तस्याथ यद् विषं प्रभविष्यति ।
सर्वं तदमृतप्रख्यमशिष्याम्यमरो यथा ॥ ४४ ॥
स्वस्तिकायतनं दृष्ट्वा द्विजिह्वं श्रीविभूषितम् ।
समाजस्तत्र सर्पाणां शान्त्यर्थं वै भविष्यति ॥ ४५ ॥
'स्वस्तिकके आश्रयभूत श्रीविभूषित नागराज शेषका दर्शन करके मैं उन धर्मदेवका जो विष होगा, उसे अमृतके समान मानकर पी जाऊँगा। ठीक उसी तरह, जैसे देवतालोग अमृत पीते हैं। वहाँ भगवान् शेषके समीप सर्पोंका समुदाय शान्तिके लिये उपस्थित होगा ॥ ४४-४५ ॥
आस्तां मां समुदीक्षन्तौ भवन्तौ सङ्गतावुभौ ।
निवृत्तो भुजगेन्द्रस्य यावदस्मि हृदोत्तमात् ॥ ४६ ॥
'मैं नागराजके इस उत्तम हृदसे लौटकर जबतक आ न जाऊँ, तबतक तुम दोनों भाई एक साथ मेरी राह देखते रहो '॥ ४६ ॥
तमाह कृष्णः संहृष्टो गच्छ धर्मिष्ठ मा चिरम् ।
आवां खलु न शक्तौ स्वस्त्वया हीनावुपासितुम् ॥४७॥
तब श्रीकृष्णने हर्षमें भरकर उनसे कहा—'धर्मिष्ठ महापुरुष ! जल्दी जाओ और लौटो। हम दोनों तुम्हारे बिना यहाँ (देरतक) नहीं बैठे रह सकेंगे' ॥ ४७ ॥
३०० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
स हृदे यमुनायास्तु ममज्जामितदक्षिणः।
रसातले स ददृशे नागलोकमिमं यथा ॥ ४८ ॥
तब अमित दक्षिणा देनेवाले अक्रूरने यमुनाजीके जलमें जाकर गोता लगाया । वहाँ उन्हें इसी लोककी भाँति रसातल-वर्ती नाग-लोकका स्पष्ट दर्शन होने लगा ॥ ४८ ॥
तस्य मध्ये सहस्रास्यं हेमतालोच्छ्रितध्वजम्।
लाङ्गलासक्तहस्ताग्रं मुसलोपाश्रितोदरम् ॥ ४९ ॥
उस लोकके मध्यभागमें सहस्र सिरोंसे सुशोभित शेषका दर्शन हुआ । उनके पास सुवर्णमय ताल-चिह्नसे युक्त ऊँची ध्वजा फहराती थी । उनके एक हाथका अग्रभाग हलसे सटा हुआ था और उदर मुसलसे टिका हुआ था ॥ ४९ ॥
असिताम्बरसंवीतं पाण्डुरं पाण्डुरासनम् ।
कुण्डलैकधरं मत्तं सुप्तमम्बुरुहेक्षणम् ॥ ५० ॥
उनका शरीर गौर और आसन श्वेत वर्णका था । उनके श्रीअङ्ग नील वस्त्रसे आवृत थे । उन्होंने एक ही कानमें एक कुण्डल धारण कर रखा था । वे मतवाले-से होकर सोये थे । उनके नेत्र विकसित कमल दलके समान मनोहर थे ॥ ५० ॥
भोगोत्करासने शुभ्रे स्वेन देहेन कल्पिते ।
स्वासीनं स्वस्तिकाभ्यां च वराहाभ्यां महीधरम् ॥ ५१ ॥
वे अपनी ही देहसे कल्पित सर्प-शरीरमय विस्तृत एवं शुभ्र आसनपर सुन्दर ढंगसे विराजमान थे । पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त दो स्वस्तिक एवं वराह-चिह्नसे विभूषित थे ॥ ५१ ॥
किंचित् सव्यापवृत्तेन मौलिना हेमचूलिना ।
जातरूपमयैः पद्मैर्मालयाच्छाद्यवक्षसम् ॥ ५२ ॥
उनके मस्तकपर सोनेकी कलँगीसे विभूषित मुकुट बायीं ओर कुछ झुका हुआ शोभा दे रहा था । वक्षःस्थल सुवर्णमय कमलोंकी मालासे आच्छादित था ॥ ५२ ॥
रक्तचन्दनदिग्धाङ्गं दीर्घबाहुमरिंदमम् ।
पद्मनाभसिताभ्राभं भाभिर्ज्वलिततेजसम् ॥ ५३ ॥
सारे अङ्गोंमें रक्त चन्दनका लेप लगा हुआ था । उनकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं । वे शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ थे । उनकी अङ्गकान्ति श्वेत वर्णवाले विष्णुकी शुक्ल प्रभा तथा श्वेत बादलोंकी आभाके समान थी । अपने ही प्रकाशसे उनका तेज प्रज्वलित हो रहा था ॥ ५३ ॥
ददर्श भोगिनां नाथं स्थितमेकार्णवेश्वरम् ।
पूज्यमानं द्विजहेन्द्रैर्वासुकिप्रमुखैः प्रभुम् ॥ ५४ ॥
अक्रूरने देखा, एकार्णवके स्वामी तथा सर्पोंके रक्षक भगवान् शेष विराज रहे हैं और वासुकि आदि नागराज उन प्रभुकी पूजा कर रहे हैं ॥ ५४ ॥
कम्बलाश्वतरौ नागौ तौ चामरकरावुभौ ।
अवीजयेतां तं देवं धर्मासनगतं प्रभुम् ॥ ५५ ॥
कम्बल और अश्वतर नाग हाथोंमें चँवर लेकर धर्मासन-पर विराजमान भगवान् अनन्तदेवको हवा कर रहे थे ॥ ५५ ॥
तस्याभ्याशगतो भाति वासुकिः पन्नगेश्वरः ।
वृतोऽन्यैः सचिवैः सर्वैः कर्कोटकपुरःसरैः ॥ ५६ ॥
उनके निकट कर्कोटक आदि अन्य सर्पजातीय मन्त्रियोंसे घिरे हुए नागराज वासुकि सुशोभित हो रहे हैं ॥ ५६ ॥
तं घटैः काञ्चनैर्दिव्यैः पङ्कजच्छन्नमस्तकैः ।
राजानं स्नापयामासुः स्नातमेकार्णवाम्बुभिः ॥ ५७ ॥
उन्हें क्रमशः यह दिखायी दिया किसेवकोंने कमलसे ढके हुए मुखवाले दिव्य सुवर्णमय घटोंद्वारा एकार्णवके जलसे नहाये हुए नागराज शेषको पुनः नहलाया है ॥ ५७ ॥
तस्योत्सङ्गे घनश्यामं श्रीवत्साच्छादितोरसम् ।
पीताम्बरधरं विष्णुं सूपविष्टं ददर्श ह ॥ ५८ ॥
उन शेषजीकी गोदमें उन्होंने पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) को सुखपूर्वक विराजमान देखा । उनके श्रीअङ्गों-की कान्ति मेघके समान श्याम थी तथा उनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे आच्छादित था ॥ ५८ ॥
अपरं चैव सोमेन तुल्यसंहननं प्रभुम् ।
संकर्षणमिवासीनं तं दिव्यं विष्टरं विना ॥ ५९ ॥
वहीं चन्द्रमाके समान गौर विग्रहवाले दूसरे प्रभावशाली देवता दिखायी दिये, जो संकर्षणसे मिलते-जुलते थे । वे उस दिव्य विस्तरके बिना ही वहाँ बैठे थे ॥ ५९ ॥
स कृष्णं तत्र सहसा व्याहर्तुमुपचक्रमे ।
तस्य संस्तम्भयामास वाक्यं कृष्णः स्वतेजसा ॥ ६० ॥
अक्रूरने सहसा वहाँ श्रीकृष्णसे बातचीत करनेकी चेष्टा की, परंतु श्रीकृष्णने अपने तेजसे उनकी वाणीको स्तम्भित कर दिया ॥ ६० ॥
सोऽनुभूय भुजङ्गानां तं भागवतमव्ययम् ।
उदतिष्ठत् पुनस्तोयाद् विस्मितोऽमितदक्षिणः ॥ ६१ ॥
सर्पोंके स्वामी उन अविनाशी भागवत देवकी महिमाका अनुभव करके अमित दक्षिणा देनेवाले दानपति अक्रूर आश्चर्य-चकित होकर पुनः जलसे ऊपर उठे ॥ ६१ ॥
स तौ रथस्थावासीनौ तत्रैव बलकेशवौ ।
निरीक्ष्यमाणावन्योन्यं ददर्शाद्भुतरूपिणौ ॥ ६२ ॥
उठकर उन्होंने देखा कि बलराम और श्रीकृष्ण दोनों वहीं रथपर बैठे हैं और एक दूसरेकी ओर देख रहे हैं; उन दोनोंके रूप अद्भुत हैं ॥ ६२ ॥
अथामज्जत् पुनस्तत्र तदाक्रूरः कुतूहलात् ।
दृश्यते यत्र देवोऽसौ नीलवासाः सिताननः ॥ ६३ ॥
विष्णुपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः ३०१
तब अक्रूरने पुनः कौतूहलवश वहाँ जलमें गोता लगाया और पुनः वे वहीं जा पहुँचे, जहाँ उज्ज्वल (गौर) मुखवाले नीलाम्बरधारी भगवान् अनन्तदेव पूजित हो रहे थे॥
तथैवासीनमुत्सङ्गे सहस्रास्यधरस्य वै।
ददर्श कृष्णमक्रूरः पूज्यमानं तदा प्रभुम् ॥ ६४ ॥
फिर उसी प्रकार उन सहस्र मुखधारी शेषनागकी गोदमें बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णको भी अक्रूरने देखा, जो उस समय पूजित हो रहे थे॥ ६४॥
भूयश्च सहसोत्थाय तं मन्त्रं मनसा जपन्।
रथं तेनैव मार्गेण जगामामितदक्षिणः ॥ ६५ ॥
तब मन-ही-मन उसी मन्त्रका जप करते हुए पुनः सहसा उठकर अमित दक्षिणा देनेवाले अक्रूर उसी मार्गसे रथके समीप चले गये॥ ६५॥
तमाह केशवो हृष्टः स्थितमक्रूरमागतम्।
कीदृशं नागलोकस्य वृत्तं भागवते ह्रदे ॥ ६६ ॥
तब हर्षमें भरे हुए श्रीकृष्ण वहाँ खड़े हुए अक्रूरके पास आये और पूछने लगे—'कहिये, उस भागवत ह्रदमें नागलोकका वृत्तान्त कैसा रहा ? ॥ ६६ ॥
चिरं च भवता कालो व्याक्षेपेण विलम्बितः।
मन्ये दृष्टं त्वयाश्चर्यं हृदयं ते यथाचलम् ॥ ६७ ॥
'आपने तो ध्यानके ही व्यासङ्गसे बहुत देर लगा दी। मैं समझता हूँ, आपको वहाँ कोई आश्चर्यकी बात दिखायी दी है, तभी आपका हृदय स्थिरभावसे ध्यानमें लगा रहा है' ॥
प्रत्युवाच स तं कृष्णमाश्चर्यं भवता विना।
किं भविष्यति लोकेषु स्थावरेषु चरेषु च ॥ ६८ ॥
तब अक्रूरने श्रीकृष्णसे उनकी बातका उत्तर देते हुए कहा—'इस चराचर जगत्में तुम्हारे सिवा दूसरा कौन-सा आश्चर्यका विषय होगा ? ॥ ६८ ॥
तत्राश्चर्यं मया दृष्टं कृष्ण यद् भुवि दुर्लभम्।
तदिहापि यथा तत्र पश्यामि च रमामि च ॥ ६९ ॥
'श्रीकृष्ण ! मैंने वहाँ वह आश्चर्य देखा है, जो भूतलपर दुर्लभ है। जैसा वहाँ देखा था, वैसा ही आश्चर्य यहाँ भी देखता हूँ और उसीमें रम रहा हूँ॥ ६९॥
संगतश्चापि लोकानामाश्चर्येणेह रूपिणा।
अतः परतरं कृष्ण नाश्चर्यं द्रष्टुमुत्सहे ॥ ७० ॥
'श्रीकृष्ण ! यहाँ तीनों लोकोंके मूर्तिमान् आश्चर्यसे मेरी भेंट हो गयी है। अब इससे बढ़कर कोई आश्चर्य मैं नहीं देख सकता ॥ ७० ॥
तदागच्छ गमिष्यामः कंसराजपुरीं प्रभो।
यावन्नास्तं व्रजत्येष दिवसान्ते दिवाकरः ॥ ७१ ॥
'अतः प्रभो ! अब आओ, कंसराजकी मथुरा नगरीमें चलें। ये सूर्यदेव दिनके अन्तमें जबतक अस्त न हों, तभीतक हमें वहाँ पहुँच जाना चाहिये' ॥ ७१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अक्रूरकृतनागलोककथने षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अक्रूरद्वारा नागलोकके वृत्तान्तका कथनविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥
सप्तविंशोऽध्यायः
श्रीकृष्ण और बलरामका मथुरामें प्रवेश, उनके द्वारा रजकका वध, मालीको वरदान, कुब्जापर कृपा और कंसके धनुषका भञ्जन
वैशम्पायन उवाच
ते तु युङ्क्त्वा रथवरं सर्व एवामितौजसः।
कृष्णेन सहिताः प्रायंस्तथा संकर्षणेन च ॥ १ ॥
आसेदुस्ते पुरीं रम्यां मथुरां कंसपालिताम्।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वे सभी अमित तेजस्वी यात्री अपने श्रेष्ठ रथको जोतकर श्रीकृष्ण और संकर्षणके साथ राजा कंसके द्वारा सुरक्षित रमणीय मथुरापुरीमें जा पहुँचे ॥ १½ ॥
विविशुस्ते पुरीं रम्यां काले रक्तदिवाकरे ॥ २ ॥
तौ तु स्वभवनं वीरौ कृष्णसंकर्षणावुभौ।
प्रवेशितौ बुद्धिमता ह्यक्रूरेणार्कवर्चसौ ॥ ३ ॥
संध्या-कालमें जब कि सूर्यदेव लाल हो गये थे, उन सबने उस रमणीय मथुरा नगरीमें प्रवेश किया। बुद्धिमान् अक्रूर सूर्यतुल्य तेजस्वी श्रीकृष्ण और संकर्षण दोनों वीरोंको पहले अपने घरमें ले गये ॥ २-३ ॥
तावाह वरवर्णाभौ भीतो दानपतिस्तदा।
त्यक्तव्या तात गमने वसुदेवगृहे स्पृहा ॥ ४ ॥
वे दोनों भाई उत्तम कान्तिसे प्रकाशित हो रहे थे। उस समय दानपति अक्रूरने कंससे भयभीत होकर उनसे कहा—'तात ! तुम दोनोंको अभी वसुदेवके घरमें जानेकी इच्छा त्याग देनी चाहिये ॥ ४ ॥
युवयोर्हि कृते वृद्धः कंसेन स निरस्यते।
३०२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
भर्त्स्यते च दिवा रात्रौ नेह स्थातव्यमित्यपि ॥ ५ ॥ 'क्योंकि तुम्हारे कारण ही कंस बूढ़े वसुदेवको घरसे निकालता है और 'तुम्हें यहाँ नहीं रहना चाहिये' ऐसा कह-कर उन्हें दिन-रात डाँटता रहता है ॥ ५ ॥
तद् युवाभ्यां हि कर्तव्यं पित्र्यर्थं सुखमुत्तमम्। यथा सुखमवाप्नोति तद् वै कार्यं हितान्वितम् ॥ ६ ॥ 'अतः तुम दोनोंको पिताके लिये उत्तम सुखकी व्यवस्था करनी चाहिये। जिस तरह उन्हें सुख मिले, जैसे उनका हित हो, वही कार्य करना चाहिये' ॥ ६ ॥
तमुवाच ततः कृष्णो यास्यावावामतर्कितौ। प्रेक्षन्तौ मथुरां वीर राजमार्गं च धार्मिक। तस्यैव तु गृहं साधो गच्छावो यदि मन्यसे ॥ ७ ॥ तब श्रीकृष्णने उनसे कहा—'धर्मनिष्ठ वीर ! साधुपुरुष ! यदि आप स्वीकार करें तो हम दोनों भाई मथुरा नगर और इसके राजमार्गको देखते हुए यहाँसे जायँ और अतर्कित रूपसे कंसके ही घर पहुँच जायँ' ॥ ७ ॥
वैशम्पायन उवाच
अक्रूरोऽपि नमस्कृत्य मनसा कृष्णमव्ययम्। जगाम कंसपार्श्वं तु प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अक्रूर भी मनसे ही अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार करके प्रसन्न चित्तसे कंसके पास गये ॥ ८ ॥
अनुज्ञातौ च तौ वीरौ प्रस्थितौ प्रेक्षकावुभौ। आलानाभ्यामिवोन्मुक्तौ कुञ्जरौ युद्धकाङ्क्षिणौ ॥ ९ ॥ अक्रूरकी आज्ञा लेकर वे दोनों वीर श्रीकृष्ण और बलराम नगर देखनेके लिये वहाँसे इस तरह प्रस्थित हुए, मानो युद्ध-की इच्छा रखनेवाले दो गजराज आलान^१से छूट निकले हों ॥
तौ तु मार्गगतं दृष्ट्वा रजकं रङ्गकारकम्। अयाचेतां ततस्तौ तु वासांसि रुचिराणि वै ॥ १० ॥ उन दोनोंने रास्तेमें एक रजक (धोबी) को देखा, जो कपड़ोंमें रंग कर रहा था। उसे देखकर वे दोनों भाई उससे सुन्दर वस्त्र माँगने लगे ॥ १० ॥
रजकः स तु तौ प्राह युवां कस्य वनेचरौ। राजवासांसि यौ मौढ्याद् याचेथां निर्भयावुभौ ॥ ११ ॥ रजकने उन दोनोंसे कहा—'अरे ! तुम दोनों किसके (और कहाँके) वनेचर हो ? जो मूर्खतावश निर्भय होकर राजाके कपड़े माँग रहे हो ! ॥ ११ ॥
अहं कंसस्य वासांसि नानादेशोद्भवानि वै। कामरागाणि शतशो रञ्जयामि विशेषतः ॥ १२ ॥
^१. जिसमें हाथी बाँधा जाता है, उस खम्भेको आलान कहते हैं।
'मैं तो विभिन्न देशोंके बने हुए राजा कंसके सैकड़ों वस्त्रोंको रँगता हूँ और उन वस्त्रोंपर विशेषतः उनकी इच्छा-के अनुसार रंग देता हूँ ॥ १२ ॥
युवां कस्य वने जातौ मृगैः सह विवर्द्धितौ। जातरागाविदं दृष्ट्वा रक्तमाच्छादनं बहु ॥ १३ ॥ 'तुम दोनों किसके बेटे हो ? तुम तो वनमें पैदा हुए और वन्य पशुओंके साथ ही बढ़े हो। आज इन बहुत-से रंगीन कपड़ोंको देखकर तुम्हारे मनमें इनके प्रति लोभ उत्पन्न हो गया है ? ॥ १३ ॥
अहो वां जीवितं त्यक्तं यौ भवन्ताविहागतौ। मूर्खौ प्राकृतविज्ञानौ वासो याचितुमिच्छतः ॥ १४ ॥ 'अहो ! यह बड़े आश्चर्यकी बात है। जान पड़ता है, तुमने अपने जीवनका मोह त्याग दिया है, तभी तो यहाँ आ गये। तुम दोनों मूर्ख हो। तुम्हारी बुद्धि गवाँरों-जैसी है, इसीलिये तो राजाके कपड़े माँगनेकी इच्छा करते हो' ॥ १४ ॥
तस्मै चुकोप वै कृष्णो रजकायाल्पमेधसे। प्राप्तारिष्टाय मूर्खाय सृजते वाङ्मयं विषम् ॥ १५ ॥ यह सुनकर श्रीकृष्ण उस मन्दबुद्धि, अरिष्टग्रस्त, मूर्ख तथा जहरीली बात बोलनेवाले रजकपर कुपित हो उठे ॥
तलेनाशनिकल्पेन स तं मूर्द्धन्यताडयत्। स गतासुः पपातोर्व्यां रजको व्यस्तमस्तकः ॥ १६ ॥ उन्होंने उसके माथेपर एक तमाचा जड़ दिया। वह तमाचा क्या था, वज्र था। उसके लगते ही रजकका मस्तक फट गया और वह प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥
तं हतं परिदेवन्त्यो भार्यास्तस्य विचुक्रुशुः। त्वरितं मुक्तकेश्यश्च जग्मुः कंसनिवेशनम् ॥ १७ ॥ उसे मारा गया देख उसकी स्त्रियाँ चीखने-चिल्लाने लगीं। वे बाल खोले विलाप करती हुई तुरंत राजा कंसके दरबारमें गयीं ॥ १७ ॥
तावप्युभौ सुवसनौ जग्मतुर्माल्यकारणात्। वीथीमाल्यापणानां वै गन्धाघ्रातौ द्विपाविव ॥ १८ ॥ इधर वे दोनों भाई सुन्दर वस्त्र धारण करके फूलोंकी माला लेनेके लिये उस गलीमें गये, जहाँ मालाएँ बिकती थीं। वे ऐसे लगते थे, मानो दो गजराज उन फूलोंकी सुगन्ध पाकर वहाँ जा पहुँचे हों ॥ १८ ॥
गुणको नाम तत्रासीन्माल्यवृत्तिः प्रियंवदः। प्रभूतमाल्यापणवाँल्लक्ष्मीवान् प्रियदर्शनः ॥ १९ ॥ उस गलीमे गुणक नामसे प्रसिद्ध एक माली था, जो माला बेचकर ही जीविका चलाता था। उसकी बातें बड़ी प्रिय लगती थीं। उसकी दूकानमें बहुत-सी मालाएँ सजाकर
विष्णुपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः ३०३
रखी गयी थीं। वह धनवान् होनेके साथ ही देखनेमें सुन्दर भी था ॥ १९ ॥
तं कृष्णः श्लक्ष्णया वाचा माल्यार्थमभिसूद्रया । देहीत्युवाच तत्काले मालाकारमकातरम् ॥ २० ॥
उस समय श्रीकृष्णने मालके लिये ही मुखसे निकली हुई अपनी मधुर वाणीद्वारा उस निर्भय मालाकारसे कहा—'हम दोनोंके लिये मालाएँ दे दो' ॥ २० ॥
ताभ्यां प्रीतो ददौ माल्यं प्रभूतं माल्यजीवनः । भवतोः स्वमिदं चेति प्रोवाच प्रियदर्शनौ ॥ २१ ॥
मालासे ही जीवन-निर्वाह करनेवाले उस मालीने प्रसन्न होकर उन दोनों भाइयोंको बहुत-सी मालाएँ अर्पित कीं। वे दोनों देखनेमें बड़े प्रिय लगते थे। मालीने उनसे कहा—'यह सब आपकी ही सम्पत्ति है' ॥ २१ ॥
प्रीतः सुमनसा कृष्णो गुणकाय वरं ददौ । श्रीस्त्वां मत्सम्भवा सौम्य धनौघैरभिपत्स्यते ॥ २२ ॥
उसकी बात सुनकर श्रीकृष्ण बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने संतुष्ट-चित्तसे गुणकको यह वर दिया—'सौम्य ! मेरी प्रसन्नता-से प्रकट होनेवाली लक्ष्मी तुम्हें धन-राशिसे सम्पन्न कर देगी'॥
स लब्ध्वा वरमव्यग्रो माल्यवृत्तिरधोमुखः । कृष्णस्य पतितो मूर्ध्ना प्रतिजग्राह तं वरम् ॥ २३ ॥
माली उस वरको पाकर शान्त-भावसे नतमस्तक हो गया। उसने श्रीकृष्णके चरणोंमें मस्तक रख दिया और उस वरको सादर शिरोधार्य किया ॥ २३ ॥
यक्षाविमाविति तदा स मेने माल्यजीवकः । स भृशं भयसंविग्नो नोत्तरं प्रत्यपद्यत ॥ २४ ॥
उस समय मालीने यही समझा कि ये दोनों यक्ष हैं; उसने कंससे अत्यन्त भयभीत होकर उन्हें कुछ उत्तर नहीं दिया ॥ २४ ॥
वसुदेवसुतौ तौ च राजमार्गगतावुभौ । कुब्जां ददृशतुर्भूयः सानुलेपनभाजनाम् ॥ २५ ॥
तदनन्तर सड़कपर जाते हुए उन दोनों वसुदेव-पुत्रोंने कुब्जाको देखा, जो हाथोंमें अनुलेपन (अङ्गराग) का पात्र लिये हुए थी ॥ २५ ॥
तामाह कृष्णः कुब्जेति कस्येदमनुलेपनम् । नयस्यम्बुजपत्राक्षि क्षिप्राख्यातुमर्हसि ॥ २६ ॥
सस्मिता सम्मुखी भूत्वा प्रत्युवाचाम्बुजेक्षणम् । कृष्णं जलदगम्भीरं विद्युत्कुटिलगामिनी ॥ २७ ॥
उसे देखकर श्रीकृष्णने कहा—'कमलनयने कुब्जे ! तुम यह किसके लिये अनुलेपन लिये जा रही हो, शीघ्र बताओ !' यह सुनकर कुब्जा मुसकराती हुई उनके सामने हो गयी। वह बिजलीके समान कुटिल गतिसे चलनेवाली थी। उसने कमल-नयन श्रीकृष्णसे मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा—॥२६-२७॥
राज्ञः स्नानगृहं यामि तद् गृहाणानुलेपनम् । दृष्ट्वैव त्वारविन्दाक्ष विस्मितास्मि वरानन ॥ २८ ॥ यस्यमिच्छसि मे वीर त्वं गृहाणानुलेपनम् । स्थितास्म्यागच्छ भद्रं ते हृदयस्यासि मे प्रियः ॥ २९॥
'कमलनयन ! मनोहर मुखवाले वीर ! मैं तो राजाके स्नान-गृहको जा रही हूँ। तुम्हें अङ्गराग चाहिये तो ले लो। तुम्हें देखते ही मैं विस्मयसे विमुग्ध हो उठी हूँ। तुम्हें जैसा अङ्गराग चाहिये, वही ग्रहण करो। मैं तुम्हारे लिये ठहर गयी हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, आओ मेरे घर। तुम मेरे हृदय-वल्लभ हो ॥ २८-२९ ॥
कुतश्चागम्यते सौम्य यन्मां त्वं नावबुध्यसे । महाराजस्य दयितां नियुक्तामनुलेपने ॥ ३० ॥
'सौम्य ! तुम कहाँसे आते हो कि मुझे नहीं जानते। मैं तो महाराज कंसकी प्यारी दासी हूँ। उन्होंने मुझे अङ्गरागके ही कार्यमे लगा रखा है' ॥ ३० ॥
तामुवाच हसन्तीं तु कृष्णः कुब्जामवस्थिताम् । आवयोर्गात्रसदृशं दीयतामनुलेपनम् ॥३१॥ वयं हि देशातिथयो मल्लाः प्राप्ता वरानने । द्रष्टुं धनुर्महद् दिव्यं राष्ट्रे चैव महर्द्धिमत् ॥ ३२ ॥
वहाँ खड़ी होकर हँसती हुई कुब्जासे श्रीकृष्णने कहा—'सुमुखि ! तुम हम दोनों भाइयोंके शरीरके अनुरूप अङ्गराग दे दो। हम पहलवान हैं और इस देशमें अतिथिके रूपमें आये हैं। इस राज्यमें जो अत्यन्त समृद्धिशाली, विशाल दिव्य धनुष है, उसे ही देखनेके लिये हमलोगोंका यहाँ आना हुआ है' ॥ ३१-३२ ॥
प्रत्युवाचाथ सा कृष्णं प्रियोऽसि मम दर्शने । राजार्हमिदमव्यग्रं तद् गृहाणानुलेपनम् ॥ ३३ ॥
तब कुब्जाने श्रीकृष्णसे कहा—'मेरी दृष्टिमें तुम परम प्रिय हो, अतः शान्तभावसे यह राजोचित अङ्गराग ग्रहण करो ॥
तावुभावन्गुलिप्ताङ्गौ चारुगात्रौ विरेजतुः । तीर्थगौ पङ्कदिग्धाङ्गौ यमुनायां यथा वृषौ ॥ ३४ ॥
अङ्गोंमें अङ्गराग लग जानेपर मनोहर शरीरवाले वे दोनों भाई बड़ी शोभा पाने लगे। उस समय वे ऐसे प्रतीत होते थे, जैसे दो साँड़ यमुनाजीके जलमें गोता लगाकर सारे अङ्गोंमें कीचड़ लपेटे आ रहे हों ॥ ३४ ॥
तां च कुब्जां स्थगोर्मध्ये द्व्यङ्गुलेनाग्रपाणिना । शनैः सम्पीडयामास कृष्णो लीलाविधानवित् ॥ ३५॥
तदनन्तर लीलाविधिको जाननेवाले श्रीकृष्णने अपने
३०४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
हाथकी दो अँगुलियोंसे कुब्जाके कूबड़के मध्यभागमें धीरेसे दबाया (इससे कूबड़ सीधा हो गया) ॥ ३५ ॥
सा च मग्नं स्थगुं मत्वा स्वायताङ्गी शुचिस्मिता।
जहासोच्चैः स्तनतटी ऋजुयष्टिलता यथा ॥ ३६॥
मेरा कूबड़ बैठ गया, ऐसा जानकर सुन्दर एवं उन्नत अङ्गवाली कुब्जा पवित्र मुस्कानसे सुशोभित हो हँसने लगी। उसके स्तन प्रान्त उभरकर ऊँचे हो गये और वह सीधी लकड़ीपर चढ़ी हुई लताके समान शोभा पाने लगी ॥ ३६ ॥
प्रणयाच्चापि कृष्णं सा बभाषे मत्तकाशिनी।
क्व यास्यसि मया रुद्धः कान्त तिष्ठ गृहाण माम् ॥ ३७॥
फिर तो मतवाली-सी होकर वह श्रीकृष्णसे प्रेमपूर्वक बोली—'प्रियतम! अब तुम कहाँ जाओगे? मैंने तुम्हें रोक लिया, यहीं रहो और मुझे अंगीकार करो' ॥ ३७ ॥
तौ जातहासावन्योन्यं सतलाक्षेपमव्ययौ।
वीक्षमाणौ प्रहसितौ कुब्जायाः श्रुतविस्तरौ ॥ ३८ ॥
यह सुनकर उन्हें हँसी आ गयी। फिर तो वे अविनाशी बन्धु एक दूसरेकी ओर देखते हुए ताली पीट-पीटकर जोर-जोरसे हँसने लगे। कुब्जाके कानोंने उन दोनों भाइयोंके गुण विस्तारपूर्वक सुने थे ॥ ३८ ॥
कृष्णस्तु कुब्जां कामार्तां सस्मितं विससर्ज ह।
ततस्तौ कुब्जया मुक्तौ प्रविष्टौ राजसंसदम् ॥ ३९॥
श्रीकृष्णने मुस्कराते हुए कामपीड़ित कुब्जाको वहीं छोड़ दिया और उससे छूटकर वे दोनों बन्धु राज-भवनमें प्रविष्ट हुए ॥ ३९ ॥
तावुभौ व्रजसंवृद्धौ गोपवेषविभूषितौ।
गूढचेष्टाननौ भूत्वा प्रविष्टौ नृपवेश्म तत् ॥ ४० ॥
व्रजमें बड़े होकर गोपवेषसे विभूषित हुए उन दोनों वीरोंने जब उस राजभवनमें प्रवेश किया, उस समय उनकी प्रत्येक चेष्टा गूप्तरूपसे होती थी। उनके मुखका भाव ही ऐसा गूढ़ था कि उससे आन्तरिक चेष्टाका पता नहीं लगता था ॥
धनुःशालां गतौ तत्र बालावपरितर्कितौ।
हिमवद्वनसम्भूतौ सिंहाविव मदोत्कटौ ॥ ४१ ॥
हिमालयके वनमें उत्पन्न हुए दो मदमत्त सिंहोंके समान वे दोनों बालक वहाँ धनुषशालामें जा पहुँचे। उस समय वहाँ उनके पहुँचनेकी सम्भावना किसीको नहीं थी ॥ ४१ ॥
दिदृक्षन्तौ महत्तत्र धनुरार्योगभूषितम्।
पप्रच्छतुश्च तौ वीरावायुधागारिकं तदा ॥ ४२ ॥
वे वहाँ रखे हुए विशाल धनुषको, जो पुष्पमालासे विभूषित था, देखना चाहते थे; अतः उन दोनों वीरोंने उस समय शस्त्रागारके संरक्षकसे पूछा— ॥ ४२ ॥
भोः कंसधनुषां पाल श्रूयतामावयोर्र्वचः।
कतरत् तद् धनुः सौम्य महोऽयं यस्य वर्तते ॥ ४३ ॥
आयोगभूतं कंसस्य दर्शयस्व यदीच्छसि।
'राजा कंसके धनुषोंकी रक्षा करनेवाले अस्त्र-संरक्षक ! तुम हम दोनोंकी बातें सुनो। सौम्य ! जिसका यह उत्सव होने जा रहा है, वह धनुष कौन-सा है? यदि तुम्हारी इच्छा हो तो कंसके इस उत्सवका जो प्रधान निमित्त है, उस धनुषका हमें दर्शन कराओ' ॥ ४३½ ॥
स तयोर्दर्शयामास तद् धनुः स्तम्भसंनिभम् ॥ ४४ ॥
अनारोप्यमसम्भेद्यं देवैरपि सवासवैः।
उसने उन दोनों भाइयोंको वह खम्भ-जैसा मोटा धनुष दिखा दिया। उस धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाना या उसे तोड़ना इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी असम्भव था ॥४४½॥
तद् गृहीत्वा तदा कृष्णस्तोलयामास वीर्यवान् ॥४५॥
दोर्भ्यां कमलपत्राक्षः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।
पराक्रमी कमलनयन श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्तसे दोनों हाथोंद्वारा उस धनुषको उठाकर तौला ॥ ४५½ ॥
तोलयित्वा यथाकामं तद् धनुर्दैत्यपूजितम् ॥ ४६ ॥
आरोपयामास बली नामयामास चासकृत्।
आनाम्यमानं कृष्णेन प्रकर्षादुरगोपमम् ॥ ४७ ॥
द्विधाभूतमभून्मध्ये धनुरार्योगभूषितम्।
दैत्योंद्वारा पूजित हुए उस धनुषको इच्छानुसार तौलकर बलवान् श्रीकृष्णने कई बार उसको झुकाया और उसके ऊपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी। श्रीकृष्णके द्वारा बहुत अधिक झुका दिये जानेके कारण वह पुष्पहारोंसे विभूषित सर्पाकार धनुष बीचसे टूटकर दो भागोंमें विभक्त हो गया ॥ ४६-४७½ ॥
भङ्क्त्वा तु तद् धनुः श्रेष्ठं कृष्णस्त्वरितविक्रमः।
निष्क्राम महावेगः स च संकर्षणो युवा ॥४८॥
उस श्रेष्ठ धनुषको तोड़कर श्रीकृष्ण तथा वे नवयुवक संकर्षण शीघ्रतापूर्वक कदम बढ़ाते हुए बड़े वेगसे उस भवनसे बाहर निकल गये ॥ ४८ ॥
धनुषो भङ्गनादेन वायुनिर्घोषकारिणा।
चचाचान्तःपुरं सर्वं दिशश्चैव पुपूरिरे ॥ ४९ ॥
उस धनुषके टूटनेसे जो धड़ाका हुआ, वह सहसा उठी हुई प्रचण्ड आँधीके समान गम्भीर घोष करनेवाला था। उससे सारा अन्तःपुर काँप उठा और सम्पूर्ण दिशाओंमें वह आवाज गूँज उठी ॥ ४९ ॥
निर्गम्य त्वायुधागाराज्जग्मतुर्गोपसंनिधौ।
वेगेनायुधपालस्तु गच्छन् सम्भ्रान्तमानसः ॥ ५० ॥
समीपं नृपतेर्गत्वा काकोच्छ्वासोऽभ्यभाषत।
विष्णुपर्व ] १ सप्तविंशोऽध्यायः ३०५ शस्त्रागारात्से निकलकर दोनों भाई ब्रजसे आये हुए गोपों- 'उस बालकने उस विशाल धनुषको लोहयन्त्रकी भाँति के निकट चले गये। इधर आयुधोंकी रक्षा करनेवाला वह बलात् हाथमें लेकर वेगपूर्वक उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और सिपाही मन-ही-मन घबरा उठा और बड़े वेगसे राजदरवारकी खेल-खेलमें ही उसे झुकाना आरम्भ किया॥ ५६॥ ओर चल दिया। राजाके निकट जाकर कौएकी तरह आकृष्यमाणं तत् तेन विव्राणं बाहुशालिना । चकित हो लम्बी साँस खींचता हुआ वह इस प्रकार मुष्टिदेशे विकूजित्वा द्विधाभूतमभज्यत ॥ ५७ ॥ बोला—॥ ५०३ ॥ 'उस बाहुशाली वीरके खींचनेपर वह बाणरहित धनुष श्रूयतां मम विज्ञाप्यमाश्चर्यं धनुषो गृहे ॥ ५१ ॥ मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे धड़ाकेके साथ टूटकर दो टूक हो निर्वृत्तमस्मिन् काले यज्जगतः सम्भ्रमोपमम् । गया ॥ ५७ ॥ 'महाराज ! मैं जो बात बताना चाहता हूँ, उसे ध्यान ततः प्रचलिता भूमिनैंव भाति च भास्करः । देकर सुनिये । इस समय धनुष-शालामें एक आश्चर्यजनक धनुषो भङ्गनादेन भ्रमतीव नभस्तलम् ॥ ५८ ॥ घटना घटित हुई है, जो सम्पूर्ण जगत्के प्रलयकी भाँति प्रतीत 'धनुष टूटनेकी आवाजसे धरती हिलने लगी, सूर्यकी होती है ॥ ५१३ ॥ प्रभा फीकी पड़ गयी और आकाश घूमता-सा प्रतीत नरौ कस्याप्यसदृशौ शिखाचिततमूर्द्धजौ ॥ ५२ ॥ होने लगा ॥ ५८ ॥ नीलपीताम्बरधरौ पीतश्वेतानुलेपनौ । तदद्भुतं महत् दृष्ट्वा विस्मयं परमं गतः । तावन्तःपुरमज्ञातौ प्रविष्टौ कामवेषिणौ ॥ ५३ ॥ भयाद् भयदशत्रुभ्यस्तदिहाख्यातुमागतः ॥ ५९ ॥ 'वहाँ दो मनुष्य आये थे, जिनकी तुलना किसीसे भी 'वह महान् अद्भुत दृश्य देखकर मैं अत्यन्त विस्मयमें नहीं हो सकती। उनके मस्तकके सभी बाल शिखा (चोटी) के पड़ गया और भयदायक शत्रुओंकी ओरसे भय प्राप्त होनेकी समान बड़े-बड़े थे। एकने नील वस्त्र पहन रखा था और दूसरे- आशङ्कासे आपको यह समाचार बतानेके लिये यहाँ आ ने पीला। एकके अङ्गोंमें पीला अङ्गराग था, तो दूसरेके अङ्गों- गया ॥ ५९ ॥ में श्वेत। वे दोनों इच्छानुसार वेष धारण करनेमे कुशल थे, न जानामि महाराज कौ तावमितविक्रमौ । सहसा अन्तःपुरमे घुस आये और किसीको पता न चला॥५२-५३ एकः कैलाससंकाश एकोऽञ्जनगिरिप्रभः ॥ ६० ॥ देवपुत्रोपमौ वीरौ बालाविब हुताशनौ । 'महाराज ! मैं नहीं जानता, वे दोनों अमित पराक्रमी स्थितौ धनुर्गृहे सौम्यौ सहसा खादिवागतौ । वीर कौन थे ? उनमेंसे एक तो कैलासपर्वतके समान श्वेत- मया दृष्टौ परित्यक्तं रुचिराच्छादनस्रजौ ॥ ५४ ॥ वर्णका था और दूसरा अञ्जनगिरिके समान श्याम ॥ ६० ॥ 'वे दोनों वीर देवकुमारोंके समान प्रतीत होते थे। उनकी स तु तच्चापरत्नं वै भङ्क्त्वा स्तम्भमिव द्विपः । आकृति बड़ी सौम्य थी। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, निष्पपातानिलगतिः सानुगोऽमितविक्रमः । मानो बालरूपधारी अग्नि सहसा आकाशसे आकर धनुषशाला- अगमत्तं द्विधा कृत्वा न जाने कोऽप्यसौ नृप ॥ ६१॥ में खड़े हो गये हों। उन दोनोंके वस्त्र और पुष्पहार बड़े 'हाथी बाँधनेके खम्भेकी भाँति अत्यन्त सुदृढ़ उस सुन्दर थे। मैंने उनको स्पष्टरूपसे देखा है ॥५४॥ धनुषरत्नको तोड़कर वह अमित पराक्रमी वीर अपने सहायकके तयोरेकस्तु पद्माक्षः श्यामः पीताम्बरस्रजः । साथ ही वायुके समान तीव्रगतिका आश्रय ले वहाँसे जग्राह तद् धनूरत्नं दुर्ग्राह्यं दैवतैरपि ॥ ५५ ॥ निकल गया। नरेश्वर ! न जाने वह कौन था, जो धनुषके 'उनमेंसे एककी आँखें कमलके समान सुन्दर थीं, शरीर- दो टुकड़े करके चला गया' ॥ ६१ ॥ का वर्ण श्याम था। उसके वस्त्र और हार पीले रंगके थे। जिसे श्रुत्वैव धनुषो भङ्गं कंसो विदितविस्तरः । हाथमें लेना देवताओंके लिये भी कठिन है, उसी धनुषरत्नको विसर्जयायुधपालं वै प्रविवेश गृहोत्तमम् ॥ ६२ ॥ उस श्यामसुन्दर वीरने अनायास ही उठा लिया ॥ ५५ ॥ कंसको सब बातें विस्तारपूर्वक विदित थीं। उसने धनुष- तत् स बालो महच्चापं बलाद् यन्त्रमिवायसम् । भङ्गका समाचार सुनते ही शस्त्ररक्षकको विदा कर दिया और आरोपयित्वा वेगेन नामयामास लीलया ॥ ५६ ॥ स्वयं अपने उत्तम भवनमें प्रवेश किया ॥ ६२ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कंसधनुर्भङ्गे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कंसके धनुषका भङ्गविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥
३७६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
अष्टाविंशोऽध्यायः
कंसकी चिन्ता, उसका रंगशालाको देखना और उसे सुसज्जित करनेका आदेश देना, चाणूर एवं मुष्टिकको तथा कुवलयापीडके महावतको श्रीकृष्ण-बलरामके वधके लिये आज्ञा देना, महावत-से द्रुमिलके द्वारा अपनी उत्पत्तिकी कथा कहना—उसकी माताका सुयामुन पर्वतपर द्रुमिलके साथ समागम तथा उन दोनोंका परस्पर वरदान एवं शाप
वैशम्पायन उवाच
स चिन्तयित्वा धनुषो भङ्गं भोजविवर्धनः।
बभूव विमना राजा चिन्तयन् भृशदुःखितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भोजवंशकी वृद्धि करनेवाला राजा कंस धनुषके टूटनेकी घटनापर विचार करके मन-ही-मन खिन्न हो उठा। वह ज्यों-ही-ज्यों उसका चिन्तन करता, त्यों-ही-त्यों अत्यन्त दुःखमें निमग्न होता जाता था ॥ १ ॥
कथं बालो विगतभीरवमत्य महाबलम्।
प्रेक्ष्यमाणस्तु पुरुषैर्धनुर्भङ्क्त्वा विनिर्गतः ॥ २ ॥
वह सोचने लगा, 'अहो! वह बालक कैसे निर्भय हो महाबली रक्षककी अवहेलना करके दूसरे लोगोंके देखते देखते धनुष तोड़कर निकल गया ॥ २ ॥
यस्यार्थे दारुणं कर्म कृतं लोकविगर्हितम्।
पितृष्वस्त्रात्मजान् धीरान् षडेवाहं न्यपोथयम् ॥ ३ ॥
'यह वही बालक है, जिसे मारनेके लिये मैंने लोक-निन्दित क्रूरतापूर्ण कर्म किया। अपनी चचेरी बहिनके छः वीर पुत्रोंको शिलापर दे मारा ॥ ३ ॥
दैवं पुरुषकारेण न शक्यमतिवर्तितुम्।
नारदोक्तं च वचनं नूनं मह्यमुपस्थितम् ॥ ४ ॥
'सचमुच ही पुरुषार्थसे दैवके विधानका उल्लङ्घन नहीं किया जा सकता। नारदजीने मेरे लिये जो बात कही थी, वह अवश्य आकर उपस्थित हो गयी ॥ ४ ॥
एवं राजा विचिन्त्याथ निष्क्रम्य स्वगृहोत्तमात्।
प्रेक्षागारं जगामाशु मञ्चानामवलोककः ॥ ५ ॥
इस प्रकार चिन्ता करके राजा कंस अपने उत्तम भवनसे निकला और शीघ्र ही प्रेक्षागृह<sup>१</sup> (रङ्गशाला) मे वहाँ लगे हुए मञ्चोंका निरीक्षण करनेके लिये गया ॥ ५ ॥
स दृष्ट्वा सर्वानिर्यूहं प्रेक्षागारं नृपोत्तमः।
श्रेणीनां दृढनिर्यूहैर्मञ्चवाटैर्निरन्तरम् ॥ ६ ॥
सोत्तमागारयुक्ताभिर्बलभीभिर्विभूषितम् ।
छदीभिः सप्तषट्द्वाभिरेकस्तम्भैर्विभूषितम् ॥ ७ ॥
उस श्रेष्ठ नरेशने प्रेक्षागृहको सब प्रकारसे सम्पन्न हुआ देखा। वहाँ एकमात्र शिल्पसे जीवननिर्वाह करनेवाले शिल्पियों-ने लगातार बहुत-से मञ्चोंके बाड़े बना रखे थे। वे सब-के-सब दृढ़तापूर्वक बाँधे गये थे। उत्तमोत्तम गृहोंसे लगे हुए छज्जे भी बनाये गये थे। उन छज्जोंमें कहीं तो छः-छः खम्भे एक साथ लगे थे, जिनसे उनकी विशालता बढ़ गयी थी और कहीं-कहीं एक-एक संख्यावाले ही खम्भे लगाये गये थे। इन खम्भों, छजो और मञ्चवाटोने उस प्रेक्षागृहको विभूषित कर रखा था ॥ ६-७ ॥
सर्वतः सारनिर्यूहं स्वायतं सुप्रतिष्ठितम्।
उद्ग्राक्लिष्टसुक्लिष्टमश्वारोहणमुत्तमम् ॥ ८ ॥
वहाँ सब ओर दीवारोंमें मजबूत खूटियाँ लगी थीं। वह भवन बहुत विशाल बना था। उसकी अच्छी प्रकार प्रतिष्ठा की गयी थी। उसके भीतर मञ्चोंपर चढ़नेके लिये ऊँची असंकीर्ण (चौड़ी) तथा परस्पर सटी हुई सीढ़ियाँ बनी थीं। इससे वह रंगभवन बहुत ही उत्तम दिखायी देता था ॥
नृपासनपरिक्षिप्तं संचारपथसंकुलम्।
छन्नं तद् वेदिकाभिश्च मानुषौघभरक्षमम् ॥ ९ ॥
वहाँ राजाओंके बैठनेके लिये चारों ओर सिंहासन रखे गये थे। उस रङ्गशालामें सब ओर आने-जानेके लिये बहुत-से मार्ग थे। सारा भवन बहुसंख्यक वेदियोँसे व्याप्त था। उसमें मनुष्योंकी बहुत बड़ी भीड़को अपने भीतर सुगमतापूर्वक भर लेनेकी क्षमता थी ॥ ९ ॥
स दृष्ट्वा भूषितं रङ्गमाज्ञापयत बुद्धिमान्।
श्वः सचित्रः समाल्याश्च सपताकास्तथैव च ॥ १० ॥
सुवासिता वपुष्मन्त उपनीतोत्तरच्छदाः।
क्रियन्तां मञ्चवाटाश्च वलभ्यो वीथयस्तथा ॥ ११ ॥
बुद्धिमान् कंसने उस रङ्गभवनको सब प्रकारसे सजा हुआ देख कार्यकर्ताओंको इस प्रकार आज्ञा दी—'कल सबेरे यहाँके मञ्चवाटों, छज्जों तथा गलियोंको चित्रों, मालाओं और पताकाओंसे सजा दिया जाय; सुगन्धित जल छिड़ककर इन सबको सुवासित किया जाय, मनोहर रूप दिया जाय, मञ्चों-पर सुन्दर चाँदनी बिछा दी जाय ॥ १०-११ ॥
रङ्गवाटे करीषस्य कल्प्यन्तां राशयोऽन्यतः।
पटास्तरणशोभाश्च वलयश्चानुरूपतः ॥ १२ ॥
१. धनुर्यज्ञका उत्सव देखनेके लिये बना हुआ विशाल स्थान।