हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)
Hind Swaraj by Mahatma Gandhi
मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा
मशीनें पाठक : आप पश्चिम की सभ्यता को निकाल बाहर करने की बात कहते हैं, तब तो आप यह भी कहेंगे कि हमें कोई भी मशीन नहीं चाहिए। संपादक : मुझे जो चोट लगी थी उसे यह सवाल करके आपने ताजा कर दिया है। मि. रमेशचन्द्र दत्त की पुस्तक 'हिन्दुस्तान का आर्थिक इतिहास' जब मैंने पढ़ी, तब भी मेरी ऐसी हालत हो गई थी। उसका फिर से विचार करता हूँ, तो मेरा दिल भर आता है। मशीन की झपट लगने से ही हिन्दुस्तान पामाल हो गया है। मैन्चेस्टर ने मुम्बई की मिलों में हमें जो नुकसान पहुँचाया है, उसकी तो कोई हद ही जो मजदूर काम करते नहीं है। हिन्दुस्तान से कारीगरी जो क़रीब-क़रीब खत्म हैं, वे गुलाम बन गए हो गई, वह मैन्चेस्टर का ही काम है। हैं, जो औरतें उनमें लेकिन मैं भूलता हूँ। मैन्चेस्टर को दोष कैसे दिया काम करती हैं, उनकी जा सकता है? हमने उसके कपड़े पहने तभी तो उसने हालत देखकर कोई कपड़े बनाए। बंगाल की बहादुरी का वर्णन जब मैंने भी काँप उठेगा। जब पढ़ा तब मुझे हर्ष हुआ। बंगाल में कपड़े की मिलें नहीं मिलों की वर्षा नहीं हैं, इसलिए लोगों ने अपना असली धंधा फिर से हाथ हुई थी तब वे औरतें में ले लिया। बंगाल मुम्बई की मिलों को बढ़ावा देता भूखों नहीं मरती थीं। है वह ठीक ही है, लेकिन अगर बंगाल ने तमाम मशीनों से परहेज किया होता, उनका बहिष्कार किया होता तो और भी अच्छा होता। मशीनें यूरोप को उजाड़ने लगी हैं और वहाँ की हवा अब हिन्दुस्तान में चल रही है। यंत्र आज की सभ्यता की मुख्य निशानी हैं और वह महापाप है, ऐसा मैं तो साफ देख सकता हूँ। मुम्बई की मिलों में जो मजदूर काम करते हैं, वे गुलाम बन गये हैं, जो औरतें उनमें काम करती हैं, उनकी हालत देखकर कोई भी काँप उठेगा। जब मिलों की वर्षा नहीं हुई थी तब वे औरतें भूखों नहीं मरती थीं। मशीन की यह हवा अगर ज्यादा चली, तो हिन्दुस्तान की बुरी दशा होगी। मेरी बात आपको कुछ मुश्किल मालूम होती होगी, लेकिन मुझे कहना चाहिए कि हम हिन्दुस्तान में मिलें कायम करें, उसके बजाय हमारा भला इसी में है कि हम 135
हिन्द स्वराज्य मैन्वेस्टर को और भी रुपये भेजकर उसका सड़ा हुआ कपड़ा काम में लें, क्यों कि उसका कपड़ा काम में लेने से सिर्फ़ हमारे पैसे ही जाएँगे। हिन्दुस्तान में अगर हम मैन्चेस्टर कायम करेंगे तो पैसा हिन्दुस्तान में ही रहेगा, लेकिन वह पैसा हमारा खून चूसेगा, क्योंकि वह हमारी नीति को बिल्कुल खत्म कर देगा। जो लोग मिलों में काम करते हैं उनकी नीति कैसी है, यह उन्हीं से पूछा जाए। उनमें से जिन्होंने रुपये जमा किये हैं, उनकी नीति दूसरे पैसे वालों से अच्छी नहीं हो सकती। अमेरिका के रॉकफेलर से हिन्दुस्तान के रॉकफेलर कुछ कम हैं, ऐसा मानना निरा अज्ञान है। गरीब हिन्दुस्तान तो गुलामी से छूट सकेगा, लेकिन अनीति से पैसे वाला बना हुआ हिन्दुस्तान गुलामी से कभी नहीं छूटेगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि अंग्रेजी राज्य को यहाँ टिकाये रखने वाले ये धनवान लोग ही हैं। ऐसी स्थिति में ही उनका स्वार्थ सधेगा। पैसा आदमी को दीन बना देता है। ऐसी दूसरी चीज दुनिया में विषय योग है। ये दोनों विषय विषमयं हैं। जब पैसा या विषय काटता है तब वह शरीर, ज्ञान, मन सब कुछ ले लेता है। मुझे तो लगता है कि हमें यह स्वीकार करना होगा कि अंग्रेजी राज्य को यहाँ टिकाये रखने वाले ये धनवान लोग ही हैं। ऐसी स्थिति में ही उनका स्वार्थ सधेगा। पैसा आदमी को दीन बना देता है। ऐसी दूसरी चीज दुनिया में विषय योग है। ये दोनों विषय विषमयं हैं। उनका डंक साँप के डंक से ज्यादा ज़हरीला है। जब साँप काटता है तो हमारा शरीर लेकर हमें छोड़ देता है। जब पैसा या विषय काटता है तब वह शरीर, ज्ञान, मन सब कुछ ले लेता है, तो भी हमारा छुटकारा नहीं होता। इसलिए हमारे देश में मिलें कायम हों, इसमें खुश होने जैसा कुछ नहीं है। पाठक : तब क्या मिलों को बन्द कर दिया जाए ? संपादक : यह बात मुश्किल है। जो चीज स्थायी या मजबूत हो गई है, उसे निकालना मुश्किल है। इसीलिए काम शुरू न करना पहली बुद्धिमानी है। मिल मालिकों की ओर हम नफ़रत की निगाह से नहीं देख सकते। हमें उन पर दया करनी चाहिए। वे यकायक मिलें छोड़ दें, यह तो मुश्किल नहीं है, लेकिन हम उनसे ऐसी बिनती कर सकते हैं कि वे अपने इस साहस को बढ़ाएँ नहीं। अगर वे देश का भला करना चाहें, तो खुद अपना काम धीरे-धीरे कम कर सकते हैं। वे खुद पुराने, प्रौढ़, पवित्र चरखे देश के हजारों घरों में दाखिल कर सकते हैं और लोगों का बुना हुआ कपड़ा लेकर उसे बेच सकते हैं। 136
हिन्द स्वराज्य अगर वे ऐसा न करें तो भी लोग खुद मशीनों का कपड़ा इस्तेमाल करना बन्द कर सकते हैं। पाठक : यह तो कपड़े के बारे में हुआ, लेकिन यंत्र की बनी तो अनेक चीजें हैं। वे चीजें या तो हमें परदेस से लेनी होंगी या ऐसे यंत्र हमारे देश में दाखिल करने होंगे। संपादक : सचमुच हमारे देव (मूर्तियाँ) भी जर्मनी के यंत्रों में बनकर आते हैं, तो फिर दियासिलाई या ऑलपिन से लेकर काँच के झाड़-फानूस की तो बात ही क्या ? मेरा अपना जवाब तो एक ही है। जब ये सब चीजें यंत्र से नहीं बनती थीं तब हिन्दुस्तान क्या करता था ? वैसा ही वह आज भी कर सकता है। जब तक हम हाथ से ऑलपिन नहीं बनायेंगे तब तक उसके बिना हम अपना काम चला लेंगे। झाड़- फानूस को आग लगा देंगे। मिट्टी के दीये में तेल डालकर और हमारे खेत में पैदा हुई रुई की बत्ती बनाकर दीया जलाएँगे। ऐसा करने से हमारी आँखें खराब होने से बचेंगी, पैसे बचेंगे और हम स्वदेशी रहेंगे, बनेंगे और स्वराज्य की धूनी जगाएँगे। एक ही समय में कुछ लोग यंत्र की सब चीजें छोड़ देंगे, यह संभव नहीं है, लेकिन अगर यह विचार सही होगा, तो हम हमेशा शोध-खोज करते रहेंगे और हमेशा थोड़ी-थोड़ी चीजें छोड़ते जाएँगे। अगर हम ऐसा करेंगे तो दूसरे लोग भी ऐसा करेंगे। पहले तो यह विचार जड़ पकड़े यह जरूरी है, बाद में उसके मुताबिक काम होगा। पहले एक ही आदमी करेगा। यह सारा काम सब लोग एक ही समय में करेंगे या एक ही समय में कुछ लोग यंत्र की सब चीजें छोड़ देंगे, यह संभव नहीं है, लेकिन अगर यह विचार सही होगा, तो हम हमेशा शोध-खोज करते रहेंगे और हमेशा थोड़ी-थोड़ी चीजें छोड़ते जाएँगे। अगर हम ऐसा करेंगे तो दूसरे लोग भी ऐसा करेंगे। पहले तो यह विचार जड़ पकड़े यह जरूरी है, बाद में उसके मुताबिक काम होगा। पहले एक ही आदमी करेगा, फिर दस, फिर सौ-यों नारियल की कहानी की तरह लोग बढ़ते ही जाएँगे। बड़े लोग जो काम करते हैं, उसे छोटे भी करते हैं और करेंगे। समझें तो बात छोटी और सरल है। आपको और मुझे दूसरों के करने की राह नहीं देखना है। हम तो ज्यों ही समझ लें त्यों ही उसे शुरू कर दें। जो नहीं करेगा वह खोएगा। समझते हुए भी जो नहीं करेगा, वह निरा दंभी कहलायेगा। 137
हिन्द स्वराज पाठक : ट्रॉमगाड़ी और बिजली की बत्ती का क्या होगा ? संपादक : यह सवाल आपने बहुत देर से किया। इस सवाल में अब कोई जान नहीं रही। रेल ने अगर हमारा नाश किया है, तो क्या ट्रॉम नहीं करती ? यंत्र तो साँप का ऐसा बिल है, जिसमें एक नहीं बल्कि सैकड़ों साँप होते हैं। एक के पीछे दूसरा लगा ही रहता है। जहाँ यंत्र होंगे वहाँ बड़े शहर होंगे। जहाँ बड़े शहर होंगे वहाँ ट्रॉमगाड़ी और रेलगाड़ी होगी, वहीं बिजली की बत्ती की ज़रूरत रहती है। आप जानते होंगे कि विलायत में भी देहातों में बिजली की बत्ती या ट्रॉम नहीं है। प्रामाणिक वैद्य और डॉक्टर आपको बताएँगे कि जहाँ रेलगाड़ी, ट्रॉमगाड़ी वगैरह साधन बढ़े हैं, वहाँ लोगों की तन्दुरुस्ती गिरी हुई होती है। मुझे याद है कि यूरोप के एक शहर में जब पैसे की तंगी हो गई थी तब ट्रॉमों, वकीलों और डॉक्टरों की आमदनी घट गयी थी, लेकिन लोग तन्दुरुस्त हो गये थे। यंत्र का गुण तो मुझे एक भी याद नहीं आता, जबकि उसके अवगुणों से मैं पूरी किताब लिख सकता हूँ। पाठक : यह सारा लिखा हुआ यंत्र की मदद से छापा जाएगा और उसकी मदद से बाँटा जाएगा, यह यंत्र का गुण है या अवगुण ? संपादक : यह ‘जहर की दवा जहर है’ की मिसाल है। इसमें यंत्र का कोई गुण नहीं है। यंत्र मरते-मरते कह जाता है कि ‘मुझसे बचिये, होशियार रहिए, मुझसे आपको कोई फायदा नहीं होने का।’ अगर ऐसा कहा जाए कि यंत्र ने इतनी ठीक कोशिश की, तो यह भी उन्हीं के लिए लागू होता है जो यंत्र की जाल में फँसे हुए हैं। लेकिन मूल बात न भूलिएगा। मन में यह तय कर लेना चाहिए कि यंत्र खराब चीज है। बाद में हम उसका धीरे-धीरे नाश करेंगे। ऐसा कोई सरल रास्ता कुदरत ने ही बनाया नहीं है कि जिस चीज़ की हमें इच्छा हो वह तुरन्त मिल जाए। यंत्र के ऊपर हमारी मीठी नज़र के बजाय जहरीली नज़र पड़ेगी तो आख़िर वह जाएगा ही। 138
भारत में यदि कोई ग्रंथ झोंपड़ियों से महलों तक में स्थान पा सका है, तो वह तुलसीकृत रामायण है। भारतीय संस्कृति को अगर एक शब्द में वर्णित करना हो, तो वह शब्द है 'राम'।
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छुटकारा पाठक : आपके विचारों से ऐसा लगता है कि आप एक तीसरा ही पक्ष कायम करना चाहते हैं। आप एक्स्ट्रीमिस्ट भी नहीं हैं और मॉडरेट भी नहीं हैं। संपादक : यहाँ आपकी भूल होती है। मेरे मन में तीसरे पक्ष का कोई ख़्याल नहीं है। सबके विचार एक से नहीं रहते। मॉडरेटों में भी सब एक ही विचार के हैं, ऐसा नहीं मानना चाहिए। जिसे लोगों की सेवा ही करनी है, उसके लिए पक्ष जो लोग उनके दबाव से चुप रहे कैसा ? मैं तो मॉडरेटों की सेवा करूँगा और होंगे वे लड़ेंगे, फोड़े को एक्स्ट्रीमिस्टों की भी करूँगा। जहाँ उनके दबाकर रखने से कोई फायदा विचार से मेरी राय अलग पड़ेगी वहाँ मैं नहीं। उसे तो फूटना ही चाहिए। उन्हें नम्रता से बताऊंगा और अपना काम इसलिये अगर हमारे भाग्य में करता चलूँगा। आपस में लड़ना ही लिखा होगा पाठक : अगर आप दोनों से कहना चाहें तो तो हम लड़ मरेंगे। उसमें कमजोर क्या कहेंगे ? को बचाने के बहाने किसी दूसरे संपादक : एक्स्ट्रीमिस्टों से मैं कहूँगा कि को बीच में पड़ने की ज़रूरत आपका हेतु हिन्दुस्तान के लिए स्वराज्य नहीं है। इसी से तो हमारा हासिल करने का है। स्वराज्य आपकी सत्यानाश हुआ है। इस तरह कोशिश से मिलने वाला नहीं है। स्वराज्य कमज़ोर को बचाना उसे और तो सबको अपने लिए पाना चाहिए और भी कमज़ोर बनाने जैसा है। सबको उसे अपना बनाना चाहिए। दूसरे मॉडरेटों को इस बात पर अच्छी लोग जो स्वराज्य दिला दें वह स्वराज्य नहीं तरह विचार करना चाहिए। है, बल्कि परराज्य है। इसलिए सिर्फ़ अंग्रेजों को बाहर निकाला कि आपने स्वराज्य पा लिया, ऐसा अगर आप मानते हों तो वह ठीक नहीं है। सच्चा स्वराज्य जो मैंने पहले बताया वही होना चाहिए। उसे आप गोला-बारूद से कभी नहीं पायेंगे। गोला-बारूद हिन्दुस्तान को सधेगा नहीं। इसलिए सत्याग्रह पर ही भरोसा रखिए। मन में ऐसा शक भी पैदा न 141
हिन्द स्वराज्य होने दीजिए कि स्वराज्य पाने के लिए हमें गोला-बारूद की ज़रूरत है। मॉडरेटों से मैं कहूँगा कि हम खाली आजिजी करना चाहें, यह तो हमारी हीनता होगी। उसमें हम अपना हल्कापन कुबूल करते हैं। 'अंग्रेजों से सम्बन्ध रखना हमारे लिए ज़रूरी है।' ऐसा कहना हमारे लिए, ईश्वर के चोर बनने जैसा हो जाता है। हमें ईश्वर के सिवा और किसी की ज़रूरत है, ऐसा कहना स्वराज्य तो सबको ठीक नहीं है और साधारण विचार करने से भी हमें लगेगा अपने लिए पाना कि 'अंग्रेजों के बिना आज तो हमारा काम चलेगा ही चाहिए और सबको नहीं,' ऐसा कहना अंग्रेजों को अभिमानी बनाने जैसा उसे अपना बनाना होगा। चाहिए। दूसरे लोग अंग्रेज बोरिया-बिस्तर बाँधकर अगर चले जाएँगे, जो स्वराज्य दिला तो हिन्दुस्तान अनाथ हो जाएगा ऐसा नहीं मानना चाहिए। दें वह स्वराज्य नहीं अगर वे गये तो संभव है कि जो लोग उनके दबाव से है, बल्कि परराज्य चुप रहे होंगे वे लड़ेंगे, फोड़े को दबाकर रखने से कोई है। फायदा नहीं। उसे तो फूटना ही चाहिए। इसलिये अगर हमारे भाग्य में आपस में लड़ना ही लिखा होगा तो हम लड़ मरेंगे। उसमें कमज़ोर को बचाने के बहाने किसी दूसरे को बीच में पड़ने की ज़रूरत नहीं है। इसी से तो हमारा सत्यानाश हुआ है। इस तरह कमज़ोर को बचाना उसे और भी कमज़ोर बनाने जैसा है। मॉडरेटों को इस बात पर अच्छी तरह विचार करना चाहिए। इसके बिना स्वराज्य नहीं प्राप्त हो सकता। मैं उन्हें एक अंग्रेज पादरी के शब्दों की याद दिलाऊंगा: "स्वराज्य में अंधाधुंधी बरदाश्त की जा सकती है, लेकिन परराज्य की व्यवस्था हमारी कंगाली को बताती है।" सिर्फ़ उस पादरी के स्वराज्य का और हिन्दुस्तान के स्वराज्य का अर्थ अलग है। हम किसी का भी जुल्म या दबाव नहीं चाहते, चाहे वो गोरा हो या हिन्दुस्तानी हो। हम सबको तैरना सीखना और सिखाना है। अग़र ऐसा हो तो एक्स्ट्रीमिस्ट और मॉडरेट दोनों मिलेंगे, मिल सकेंगे, दोनों को मिलना चाहिए दोनों को एक-दूसरे का डर रखने की या अविश्वास करने की ज़रूरत नहीं है। पाठक : इतना तो आप दोनों पक्षों से कहेंगे, परन्तु अंग्रेजों से क्या कहेंगे ? संपादक : उनसे मैं विनय से कहूँगा कि आप हमारे राजा ज़रूर हैं। आप अपनी तलवार से हमारे राजा हैं या हमारी इच्छा से, इस सवाल की चर्चा मुझे 142
हिन्द स्वराज्य करने की ज़रूरत नहीं। आप हमारे देश में रहें इसका भी मुझे द्वेष नहीं है, लेकिन राजा होते हुए भी आपको हमारे नौकर बनकर रहना होगा। आपका कहा हमें नहीं, बल्कि हमारा कहा आपको करना होगा। आज तक आप इस देश से जो धन ले गये, वह भले आपने हज़्म कर लिया, लेकिन अब आगे आपका ऐसा करना हमें पसन्द नहीं होगा। आप हिन्दुस्तान में सिपाहीगरी करना चाहें तो रह सकते हैं। हमारे साथ व्यापार करने का लालच आपको छोड़ना होगा। जिस सभ्यता की आप हिमायत करते हैं, उसे हम नुकसानदेह मानते हैं। अपनी सभ्यता को हम आपकी सभ्यता से कहीं ज्यादा ऊंची समझते हैं आपको भी ऐसा लगे तो उसमें आपका लाभ ही हैं, लेकिन ऐसा न लगे तो भी आपको, आपकी कहावत के मुताबिक, हमारे देश में हिन्दुस्तानी होकर रहना होगा। आपको ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, जिससे हमारे धर्म को बाधा पहुँचे। राजकर्ता होने के नाते आपका फ़र्ज है कि हिन्दुओं की भावना का आदर करने के लिए आप गाय का माँस खाना छोड़ दें और मुसलमानों की खातिर बुरे जानवर (सुअर) का माँस खाना छोड़ दें। हम दब गये थे इसलिए बोल नहीं सके, लेकिन आप ऐसा न समझें कि आपके इस बर्ताव से हमारी भावनाओं को चोट नहीं पहुँची है। हम स्वार्थ या दूसरे भय से आज तक कह नहीं सके, लेकिन अब यह कहना हमारा फ़र्ज हो गया है। हम मानते हैं कि आपकी क़ायम की हुई शालाएँ और अदालतें हमारे किसी काम की नहीं हैं। उनके बजाय हमारी पुरानी असली शालाएँ और अदालतें ही हमें चाहिए। हिन्दुस्तान की आम भाषा अंग्रेजी नहीं बल्कि हिन्दी है। वह आपको सीखनी होगी और हम तो आपके साथ अपनी भाषा में ही व्यवहार करेंगे। आप रेलवे और फ़ौज के लिए बेशुमार रुपये ख़र्च करते हैं, यह हमसे देखा नहीं जाता। हमें उसकी ज़रूरत नहीं मालूम होती। रूस का डर आपको होगा, हमें नहीं है। रूसी आएँगे तब हम उनसे निबट लेंगे, आप होंगे तो हम दोनों मिलकर उनसे निबट लेंगे। हमें विलायती या यूरोपीय कपड़ा नहीं चाहिए। इस देश में पैदा होने वाली चीजों से ही हम अपना काम चला लेंगे। 143
दाहिनी ओर बॉक्स का पाठ: स्वराज्य में अंधाधुंधी बरदाश्त की जा सकती है, लेकिन परराज्य की व्यवस्था हमारी कंगाली को बताती है।' 'सिर्फ़ उस पादरी के स्वराज्य का और हिन्दुस्तान के स्वराज्य का अर्थ अलग है। हम किसी का भी जुल्म या दबाव नहीं चाहते, चाहे वो गोरा हो या हिन्दुस्तानी हो। हम सबको तैरना सीखना और सिखाना है।
हिन्द स्वराज्य आपकी एक आँख मैन्चेस्टर पर और दूसरी हम पर रहे, यह अब नहीं पुसायेगा। आपका और हमारा स्वार्थ एक ही है, इस तरह आप बरतेंगे तभी हमारा साथ बना रह सकता है। हम दब गये थे आपसे यह सब हम बेअदबी से नहीं कह रहे हैं। इसलिए बोल नहीं आपके पास हथियार-बल है, भारी जहाजी सेना है। सके, लेकिन आप उसके ख़िलाफ़ वैसी ही ताक़त से हम नहीं लड़ ऐसा न समझें कि सकते, लेकिन आपको अगर ऊपर कही गई बात आपके इस बरताव से मंजूर न हो, तो आपसे हमारी नहीं बनेगी। आपकी हमारी भावनाओं को मर्जी में आये तो और मुमकिन हो तो आप हमें तलवार चोट नहीं पहुँची है। हम से काट सकते हैं, मर्जी में आये तो हमें तोप से उड़ा स्वार्थ या दूसरे भय से सकते हैं। हमें जो पसंद नहीं है वह अगर आप करेंगे, आज तक कह नहीं तो हम आपकी मदद नहीं करेंगे और बगैर हमारी मदद सके, लेकिन अब यह के आप एक कदम भी नहीं चल सकेंगे। कहना हमारा फ़र्ज हो संभव है कि अपनी सत्ता के मद में हमारी इस बात गया है। को आप हँसी में उड़ा दें। आपका हँसना बेकार है, ऐसा आज शायद हम नहीं दिखा सकें, लेकिन अगर हममें कुछ दम होगा तो आप देखेंगे कि आपका मद बेकार है और आपका हँसना विनाश की निशानी है। हम मानते हैं कि आप स्वभाव से धार्मिक राष्ट्र की प्रजा हैं। हम तो धर्म स्थान में ही बसे हुए हैं। आपका और हमारा कैसे साथ हुआ, इसमें उतरना फ़िजूल है, लेकिन अपने इस सम्बन्ध का हम दोनों अच्छा उपयोग कर सकते हैं। आप हिन्दुस्तान में आने वाले जो अंग्रेज हैं वे अंग्रेज प्रजा के सच्चे नमूने नहीं हैं और हम जो आधे अंग्रेज जैसे बन गये हैं वे भी सच्ची हिन्दुस्तानी प्रजा के नमूने नहीं कहे जा सकते। अंग्रेज प्रजा को अगर आपकी करतूतों के बारे में सब मालूम हो जाए, तो वह आपके कामों के ख़िलाफ़ हो जाए। हिन्द की प्रजा ने तो आपके साथ संबंध थोड़ा ही रखा है। आप अपनी सभ्यता को, जो दरअसल बिगाड़ करने वाली है, छोड़कर अपने धर्म की छानबीन करेंगे, तो आपको लगेगा कि हमारी माँग ठीक है। इसी तरह आप हिन्दुस्तान में रह सकते हैं। अगर उस ढंग से आप यहाँ रहेंगे तो आपसे हमें जो थोड़ा सीखना है वह हम सीखेंगे और हमसे आपको जो बहुत सीखना है वह आप 144
हिन्द स्वराज सीखेंगे। इस तरह हम एक-दूसरे से लाभ उठायेंगे और सारी दुनिया को लाभ पहुँचायेंगे, लेकिन यह तो तभी हो सकता है जब हमारे संबंध की जड़ धर्म क्षेत्र में जमे। पाठक : राष्ट्र से आप क्या कहेंगे ? हम मानते हैं कि संपादक : राष्ट्र कौन ? आपकी क़ायम की पाठक : अभी तो आप जिस अर्थ में यह शब्द काम हुई शालाएँ और अदालतें हमारे किसी में लेते हैं उसी अर्थ वाला राष्ट्र यानी जो लोग यूरोप काम की नहीं हैं। की सभ्यता में रंगे हुए हैं, वो स्वराज्य की आवाज़ उठा उनके बजाय हमारी रहे हैं। पुरानी असली संपादक : इस राष्ट्र से मैं कहूँगा कि जिस शालाएँ और अदालतें हिन्दुस्तानी को स्वराज्य की सच्ची खुमारी यानी मस्ती ही हमें चाहिए। चढ़ी होगी, वही अंग्रेजों से ऊपर की बात कह सकेगा और उनके रौब से नहीं दबेगा। सच्ची मस्ती तो उसी को चढ़ सकती है, जो ज्ञान पूर्वक समझ बूझकर यह मानता हो कि हिन्द की सभ्यता सबसे अच्छी है और यूरोप की सभ्यता चार दिन की चाँदनी है। वैसे सभ्यताएँ तो आज तक कई हो गयीं और मिट्टी में मिल गयीं, आगे भी कई होंगी और मिट्टी में मिल जाएँगी। सच्ची खुमारी उसी को हो सकती है, जो आत्मबल अनुभव करके शरीर बल से नहीं दबेगा और निडर रहेगा तथा सपने में भी तोप बल का उपयोग करने की बात नहीं सोचेगा। सच्ची खुमारी उसी हिन्दुस्तानी को रहेगी, जो आज की लाचार हालत से बहुत ऊब गया होगा और जिसने पहले से ही ज़हर का प्याला पी लिया होगा। ऐसा हिन्दुस्तानी अगर एक ही होगा तो वह भी ऊपर की बात अंग्रेजों से कहेगा और अंग्रेजों को उसकी बात सुननी पड़ेगी। ऊपर की माँग माँग नहीं है, वह हिन्दुस्तानियों के मन की दशा को बताती है। माँगने से कुछ नहीं मिलेगा, वह तो हमें खुद लेना होगा। उसे लेने की हममें ताक़त होनी चाहिए। यह ताक़त उसी में होगी : ■ जो अंग्रेजी भाषा का उपयोग लाचारी से ही करेगा। ■ जो वकील होगा तो अपनी वकालत छोड़ देगा और खुद घर में चरखा चलाकर कपड़े बुन लेगा। 145
हिन्द स्वराज ■ जो वकील होने के कारण अपने ज्ञान का उपयोग सिर्फ़ लोगों को समझाने और लोगों की आँखें खोलने में करेगा। ■ जो वकील होकर वादी-प्रतिवादी, मुद्दई और मुद्दालय के झगड़ों में नहीं पड़ेगा, अदालतों को छोड़ देगा और अपने अनुभव से दूसरों को अदालतें छोड़ने के लिए समझाएगा। ■ जो वकील होते हुए भी जैसे वकालत छोड़ेगा वैसे न्यायाधीशपन भी छोड़ेगा। ■ जो डॉक्टर होते हुए भी अपना पेशा छोड़ेगा और समझेगा कि लोगों की चमड़ी चोंथने के बजाय बेहतर है कि उनकी आत्मा को छुआ जाए और उसके बारे में शोध-खोज करके उन्हें तंदुरुस्त बनाया जाए। ■ जो डॉक्टर होने से समझेगा कि खुद चाहे जिस धर्म का हो, लेकिन अंग्रेजी फार्मेसियों में जीवों पर जो निर्दयता की जाती है, वैसी निर्दयता से बनी हुई दवाओं से शरीर को चंगा करने के बजाय बेहतर है कि शरीर रोगी रहे। ■ जो डॉक्टर होने पर भी खुद चरखा चलायेगा और जो लोग बीमार होंगे उन्हें उनकी बीमारी का सही कारण बताकर उसे दूर करने के लिए कहेगा, निकम्मी दवाएँ देकर उन्हें गलत लाड़ नहीं लड़ायेगा। वह तो यही समझेगा कि निकम्मी दवाएँ न लेने से बीमार की देह अगर गिर भी जाए, तो उससे दुनिया अनाथ नहीं हो जाएगी और यही मानेगा कि उसने बीमार पर सच्ची दया की है। ■ जो धनी होने पर भी धन की परवाह किये बिना अपने मन में होगा वही कहेगा और बड़े से बड़े सत्ताधीश की भी परवाह न करेगा। ■ जो धनी होने से अपना रुपया चरखे चालू करने में खरचेगा और खुद सिर्फ़ स्वदेशी माल का इस्तेमाल करके दूसरों को भी ऐसा करने के लिए बढ़ावा देगा। ■ दूसरे हर हिन्दुस्तानी की तरह जो यह समझेगा कि यह समय पश्चाताप का, प्रायश्चित्त का और शोक का है। ■ जो दूसरे हर हिन्दुस्तानी की तरह यह समझेगा कि अंग्रेजों का क़ुसूर निकालना बेकार है। हमारे क़ुसूर की वजह से वे हिन्दुस्तान में आये, हमारे क़ुसूर के कारण ही वे यहां रहते हैं और हमारा क़ुसूर दूर होगा तब वे यहाँ 146
हिन्द स्वराज्य से चले जाएँगे या बदल जाएँगे। ■ दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह जो यह समझेगा कि मातम के वक्त मौज- शौक नहीं हो सकते। जब तक हमें चैन नहीं है तब तक हमारा जेल में रहना या देश निकाला भोगना ही ठीक है। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह यह समझेगा कि लोगों को समझाने के बहाने जेल में न जाने की खबरदारी रखना निरा मोह है। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह यह समझेगा कि कहने से करने का असर अद्भुत होता है, हम निडर होकर जो मन में है वही कहेंगे और इस तरह कहने का जो नतीजा आये उसे सहेंगे, तभी हम अपने कहने का असर दूसरों पर डाल सकेंगे। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह यह समझेगा कि हम दुःख सहन करके ही बंधन यानी गुलामी से छूट सकेंगे। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह समझेगा कि अंग्रेजों की सभ्यता को बढ़ावा देकर हमने जो पाप किया है, उसे धो डालने के लिए अगर हमें मरने तक भी अंडेमान में रहना पड़े, तो वह कुछ ज्यादा नहीं होगा।
स्वराज्य की सच्ची खुमारी उसी को हो सकती है, जो आत्मबल अनुभव करके शरीर बल से नहीं दबेगा और निडर रहेगा तथा सपने में भी तोप बल का उपयोग करने की बात नहीं सोचेगा। सच्ची खुमारी उसी हिन्दुस्तानी को रहेगी, जो आज की लाचार हालत से बहुत ऊब गया होगा और जिसने पहले से ही जहर का प्याला पी लिया होगा।
■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह समझेगा कि कोई भी राष्ट्र दुःख सहन किये बिना ऊपर चढ़ा नहीं है। लड़ाई के मैदान में भी दुःख ही कसौटी होता है, न कि दूसरे को मारना। सत्याग्रह के बारे में भी ऐसा ही है। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह समझेगा कि यह कहना कुछ न करने के लिए एक बहाना भर है कि ‘जब सब लोग करेंगे तब हम भी करेंगे’। हमें ठीक लगता है इसलिए हम करें, जब दूसरों को ठीक लगेगा तब वे करेंगे, यही करने का सच्चा रास्ता है। अगर मैं स्वादिष्ट भोजन देखता हूँ, तो उसे खाने के लिए दूसरे की राह नहीं देखता। ऊपर कहे मुताबिक प्रयत्न करना, दुःख सहना यह स्वादिष्ट भोजन है। ऊब कर लाचारी से करना या दुःख सहना निरी बेगार है। 147
हिन्द स्वराज्य पाठक : सब ऐसा कब करेंगे और कब उसका अंत आयेगा ? संपादक : आप फिर भूलते हैं। सबकी न तो मुझे परवाह है, न आपको होनी चाहिए। 'आप अपना देख लीजिए, मैं अपना देख लूँगा' यह स्वार्थ वचन माना जाता है, लेकिन यह परमार्थ वचन भी है। मैं अपना उजालूँगा, अपना भला करूँगा, तभी दूसरे का भला कर सकूँगा। अपना कर्तव्य मैं कर लूँ, इसी में काम की सारी सिद्धियाँ समाई हुई हैं। आपको विदा करने से पहले फिर एक बार मैं यह दोहराने की इजाजत चाहता हूँ कि : ■ अपने मन का राज्य स्वराज्य है। ■ उसकी कुंजी सत्याग्रह, आत्मबल या करुणा बल है। ■ उस बल को आजमाने के लिए स्वदेशी को पूरी तरह अपनाने की ज़रूरत है। ■ हम जो करना चाहते हैं वह अंग्रेजों के लिए हमारे मन में द्वेष है इसलिए या उन्हें सजा देने के लिए नहीं करें, बल्कि इसलिए करें कि ऐसा करना हमारा कर्तव्य है। मतलब यह कि अंग्रेज अगर नमक महसूल रद्द कर दें, लिया हुआ धन वापस कर दें, सब हिन्दुस्तानियों को बड़े-बड़े ओहदे दे दें और अंग्रेजी लश्कर हटा लें, तो हम उनकी मिलों का कपड़ा पहनेंगे या अंग्रेजी भाषा काम में लायेंगे या उनके हुनर का उपयोग करेंगे सो बात नहीं है। हमें यह समझना चाहिए कि वह सब दरअसल नहीं करने जैसा है, इसलिए हम उसे नहीं करेंगे। मैंने जो कुछ कहा है वह अंग्रेजों के लिए द्वेष होने के कारण नहीं, बल्कि उनकी सभ्यता के लिए द्वेष होने के कारण कहा है। मुझे लगता है कि हमने स्वराज्य का नाम तो लिया, लेकिन उसका स्वरूप हम नहीं समझे हैं। मैंने उसे जैसा समझा है वैसा यहाँ बताने की कोशिश की है। मेरा मन गवाही देता है कि ऐसा स्वराज्य पाने के लिए मेरा यह शरीर समर्पित है। 148
भविष्य में लोग इस आधार पर हमारा मूल्यांकन नहीं करेंगे कि हम किस सिद्धांत का दावा करते हैं या कौन सा 'लेबल' धारण करते हैं या कौन से नारे लगाते हैं, हमारा मूल्यांकन वे हमारे उद्यम, त्याग, ईमानदारी और चरित्र की शुद्धता से करेंगे। वे जानना चाहेंगे कि हमने वास्तव में उनके लिए क्या किया है। लेकिन अगर आप नहीं सुनेंगे, अगर आप लोगों के मौजूदा दुःख और असंतोष से लाभ उठाकर उसे दलीय स्वार्थों के लिए बढ़ाएंगे और उसका दुरुपयोग करेंगे, तो यह दुःख और असंतोष पलट कर आपके ही सिर पर पड़ेगा और जनता से इस विश्वासघात के लिए ईश्वर भी आपको क्षमा नहीं करेगा।