हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)
Hind Swaraj by Mahatma Gandhi
मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा
अध्याय १६-२०: सत्याग्रह, आत्मबल, शिक्षा, चरखा व उपसंहार
हिन्द स्वराज्य अस्वाभाविक बातों को दर्ज करती है। सत्याग्रह स्वाभाविक है, इसलिए उसे दर्ज करने की ज़रूरत ही नहीं है। पाठक : आपके कहे मुताबिक तो यही समझ में आता है कि सत्याग्रह की मिसालें इतिहास में नहीं लिखी जा सकतीं। इस सत्याग्रह को ज्यादा समझने की ज़रूरत है। आप जो कुछ कहना चाहते हैं, उसे ज्यादा साफ़ शब्दों में कहेंगे तो अच्छा होगा। संपादक : सत्याग्रह या आत्मबल को अंग्रेजी में 'पैसिव रेजिस्तेन्स' कहा जाता है। जिन लोगों ने अपने अधिकार पाने के लिए खुद दुःख सहन किया था, उनके दुःख सहने के ढंग के लिए यह शब्द बरता गया है। उसका ध्येय लड़ाई अगर लोग एक बार के ध्येय से उल्टा है। जब मुझे कोई काम पसन्द न सीख लें कि जो आये और वह काम मैं न करूँ, तो उसमें मैं सत्याग्रह कानून हमें अन्यायी या आत्मबल का उपयोग करता हूँ। मालूम हो उसे मानना मिसाल के तौर पर मुझे लागू होने वाला कोई नामर्दगी है, तो हमें कानून सरकार ने पास किया। वह कानून मुझे किसी का भी जुल्म पसन्द नहीं है। अब अगर मैं सरकार पर हमला बाँध नहीं सकता। यही करके यह कानून रद्द करवाता हूँ, तो कहा जाएगा स्वराज्य की कुंजी है। कि मैंने शरीर बल का उपयोग किया। अगर मैं उस कानून को मंजूर ही न करूँ और उस कारण से होने वाली सज़ा भुगत लूँ, तो कहा जाएगा कि मैंने आत्मबल या सत्याग्रह से काम लिया। सत्याग्रह में मैं अपना ही बलिदान देता हूँ। यह तो सब कहेंगे कि दूसरे का बलिदान लेने से अपना बलिदान देना ज्यादा अच्छा है। इसके सिवा सत्याग्रह से लड़ते हुए अगर लड़ाई गलत ठहरी तो सिर्फ़ लड़ाई छेड़ने वाला ही दुःख भोगता है यानी अपनी भूल की सज़ा वह खुद भोगता है। ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं जिनमें लोग गलती से शामिल हुए थे। कोई भी आदमी दावे से यह नहीं कह सकता कि फलां काम खराब ही है, लेकिन जिसे वह खराब लगा, उसके लिए तो वह खराब ही है। अगर ऐसा ही है तो फिर उसे वह काम नहीं करना चाहिए और उसके लिए दुःख भोगना, कष्ट सहन करना चाहिए। यही सत्याग्रह की कुंजी है। 115
हिन्द स्वराज्य पाठक : तब तो आप कानून के ख़िलाफ होते हैं ! यह बेवफाई कही जाएगी । हमारी गिनती हमेशा कानून को मानने वाली प्रजा में होती है । आप तो 'एक्स्ट्रीमिस्ट' से भी आगे बढ़ते दीखते हैं । 'एक्स्ट्रीमिस्ट' कहता है कि जो कानून बन चुके हैं उन्हें तो मानना ही चाहिए, लेकिन कानून खराब हो तो उनके बनाने वालों को मारकर भगा देना चाहिए । संपादक : मैं आगे बढ़ता हूँ या पीछे रहता हूँ, इसकी परवाह न आपको होनी चाहिए, न मुझे । हम तो जो अच्छा है उसे खोजना चाहते हैं और उसके मुताबिक बरतना चाहते हैं । ठगों के गाँव में अगर हम कानून को मानने वाली प्रजा हैं, इसका सही बहुत से लोग यह कहें अर्थ तो यह है कि हम सत्याग्रही प्रजा हैं । कानून जब कि ठग विद्या सीखनी पसन्द न आये तब हम कानून बनाने वालों का सिर ही चाहिए, तो क्या नहीं तोड़ते, बल्कि उन्हें रद्द कराने के लिए खुद कोई साधु ठग बन उपवास करते हैं, खुद दुःख उठाते हैं । जाएगा ? हरगिज़ नहीं । हमें अच्छे या बुरे कानून को मानना चाहिए, ऐसा अन्यायी कानून को अर्थ तो आजकल का है । पहले ऐसा नहीं था । तब मानना चाहिए, यह चाहे जिस कानून को लोग तोड़ते थे और उसकी सज़ा वहम जब तक दूर नहीं भोगते थे । होता तब तक हमारी कानून हमें पसन्द न हो तो भी उनके मुताबिक गुलामी जाने वाली नहीं चलना चाहिए, यह सिखावन मर्दानगी के ख़िलाफ है और इस वहम को है, धर्म के ख़िलाफ है और गुलामी की हद है । सिर्फ़ सत्याग्रही ही दूर सरकार तो कहेगी कि हम उसके सामने नंगे कर सकता है । होकर नाचें । तो क्या हम नाचेंगे ? अगर मैं सत्याग्रही होऊँ तो सरकार से कहूँगा “यह कानून आप अपने घर में रखिये । मैं न तो आपके सामने नंगा होने वाला हूँ और न नाचने वाला हूँ।” लेकिन हम ऐसे असत्याग्रही हो गये हैं कि सरकार के जुल्म के सामने झुककर नंगे होकर नाचने से भी ज्यादा नीच काम करते हैं । जिस आदमी में सच्ची इन्सानियत है, जो खुदा से ही डरता है, वह और किसी से नहीं डरेगा । दूसरे के बनाये हुए कानून उसके लिए बंधन कारक नहीं होते । बेचारी सरकार भी नहीं कहती कि 'तुम्हें ऐसा करना ही पड़ेगा' वह कहती है कि 'तुम ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हें सज़ा होगी ।' हम अपनी अधम दशा के कारण मान लेते हैं कि हमें 'ऐसा ही करना चाहिए,' यह हमारा 116
हिन्द स्वराज फ़र्ज है, यह हमारा धर्म है। अगर लोग एक बार सीख लें कि जो कानून हमें अन्यायी मालूम हो उसे मानना नामर्दगी है, तो हमें किसी का भी जुल्म बाँध नहीं सकता। यही स्वराज्य की कुंजी है। ज्यादा लोग जो कहें उसे थोड़े लोगों को मान लेना चाहिए, यह तो अनीश्वरी बात है, एक वहम है। ऐसी हजारों मिसालें मिलेंगी, जिनमें बहुतों ने जो कहा वह गलत निकला हो और थोड़े लोगों ने जो कहा वह सही निकला हो। सारे सुधार बहुत से लोगों के ख़िलाफ जाकर कुछ लोगों ने ही किसान किसी की तलवार दाखिल करवाए हैं। ठगों के गाँव में अगर बहुत बल के बस न तो कभी से लोग यह कहें कि ठग विद्या सीखनी ही हुए हैं और न होंगे। वे चाहिए, तो क्या कोई साधु ठग बन जाएगा ? तलवार चलाना नहीं हरगिज नहीं। अन्यायी कानून को मानना चाहिए, जानते, न किसी की यह वहम जब तक दूर नहीं होता तब तक हमारी तलवार से वे डरते हैं। वे गुलामी जाने वाली नहीं है और इस वहम को मौत को हमेशा अपना सिर्फ़ सत्याग्रही ही दूर कर सकता है। तकिया बनाकर सोने शरीर बल का उपयोग करना, गोला-बारूद वाली महान प्रजा हैं। काम में लाना, हमारे सत्याग्रह के कानून के उन्होंने मौत का डर छोड़ खिलाफ है। इसका अर्थ तो यह हुआ कि हमें जो दिया है, इसलिए सबका पसंद है वह दूसरे आदमी से हम जबरन करवाना डर छोड़ दिया है। चाहते हैं। अगर यह सही हो तो फिर वह सामने वाला आदमी भी अपनी पसंद का काम हमसे करवाने के लिए हम पर गोला-बारूद चलाने का हकदार है। इस तरह तो हम कभी एक राय पर पहुँचेंगे ही नहीं। कोल्हू के बैल की तरह आँखों पर पट्टी बाँधकर भले ही हम मान लें कि हम आगे बढ़ते हैं, लेकिन दरअसल तो बैल की तरह हम गोल-गोल चक्कर ही काटते रहते हैं। जो लोग ऐसा मानते हैं कि जो कानून खुद को नापसन्द है उसे मानने के लिए आदमी बँधा हुआ नहीं है, उन्हें तो सत्याग्रह को ही सही साधन मानना चाहिए, वरना बड़ा विकट नतीजा आयेगा। पाठक : आप जो कहते हैं उस पर से मुझे लगता है कि सत्याग्रह कमज़ोर आदमियों के लिए काफी काम का है, लेकिन जब वे बलवान बन जाएँ तब तो उन्हें तोप ही चलाना चाहिए। 117
हिन्द स्वराज्य संपादक : यह तो आपने बड़े अज्ञान की बात कही। सत्याग्रह सर्वोपरि बल है। वह जब तोप बल से ज्यादा काम करता है, तो फिर कमज़ोरों का हथियार कैसे माना जाएगा ? सत्याग्रह के लिए जो हिम्मत और बहादुरी चाहिए, वह तोप का बल रखने वाले के पास हो ही नहीं सकती। क्या आप यह मानते हैं कि डरपोक और कमज़ोर आदमी नापसन्द कानून को तोड़ सकेगा ? 'एक्स्टीमिस्ट' तोपबल-पशुबल के हिमायती हैं। वे क्यों कानून को मानने की बात कर रहे हैं ? मैं उनका दोष नहीं निकालता। वे दूसरी कोई बात कर ही नहीं सकते। वे खुद जब अंग्रेजों को मारकर राज्य करेंगे तब आपसे और हमसे जबरन् कानून मनवाना चाहेंगे। उनके तरीके के जो सत्य का सेवन नहीं लिए यही कहना ठीक है, लेकिन सत्याग्रही तो करता, वह सत्य का बल, कहेगा कि जो कानून उसे पसन्द नहीं हैं उन्हें वह सत्य की ताक़त कैसे स्वीकार नहीं करेगा, फिर चाहे उसे तोप के मुँह पर दिखा सकेगा ? इसलिए बाँधकर उसकी धज्जियाँ क्यों न उड़ा दी जाएँ। सत्य की तो पूरी- आप क्या मानते हैं ? तोप चलाकर सैकड़ों को पूरी ज़रूरत रहेगी ही। बड़े मारने में हिम्मत की ज़रूरत है या हँसते-हँसते तोप से बड़ा नुकसान होने पर के मुँह पर बँधकर धज्जियाँ उड़ने देने में हिम्मत भी सत्य को नहीं छोड़ा जा की ज़रूरत है ? खुद मौत को हथेली में रखकर जो सकता। सत्य के लिए चलता-फिरता है वह रणवीर है या दूसरों की मौत कुछ छिपाने को होता ही को अपने हाथ में रखता है वह रणवीर है ? नहीं। इसलिए सत्याग्रही यह निश्चित मानिए कि नामर्द आदमी घड़ी के लिए छिपी सेना भर के लिए भी सत्याग्रही नहीं रह सकता। की ज़रूरत नहीं होती। हाँ, यह सही है कि शरीर से जो दुबला हो वह भी सत्याग्रही हो सकता है। एक आदमी भी सत्याग्रही हो सकता है और लाखों लोग भी हो सकते हैं। मर्द भी सत्याग्रही हो सकता है, औरत भी हो सकती है। उसे अपना लश्कर तैयार करने की ज़रूरत नहीं रहती। उसे पहलवानों की कुश्ती सीखने की ज़रूरत नहीं रहती। उसने अपने मन को काबू में किया कि फिर वह वनराज सिंह की तरह गर्जना कर सकता है और जो उसके दुश्मन बन बैठे हैं उनके दिल इस गर्जना से फट जाते हैं। सत्याग्रह ऐसी तलवार है, जिसके दोनों ओर धार है। उसे चाहे जैसे काम में लिया जा सकता है। जो उसे चलाता है और जिस पर वह चलाई जाती है, वे दोनों सुखी होते हैं। वह खून नहीं निकालती, लेकिन उससे 118
हिन्द स्वराज्य भी बड़ा परिणाम ला सकती है। उसको जंग नहीं लग सकती। उसे कोई चुराकर ले नहीं जा सकता। अगर सत्याग्रही दूसरे सत्याग्रही के साथ होड़ में उतरता है, तो उसमें उसे थकान लगती ही नहीं। सत्याग्रही की तलवार को म्यान की ज़रूरत नहीं रहती। उसे कोई छीन नहीं सकता। फिर भी सत्याग्रह को आप कमज़ोरों का हथियार मानें तो उसे अंधेर ही कहा जाएगा। पाठक : आपने कहा कि वह हिन्दुस्तान का खास हथियार है। तो क्या हिन्दुस्तान में तोप के बल का कभी उपयोग नहीं हुआ है? संपादक : आप हिंदुस्तान का अर्थ मुट्ठीभर राजा कहते हैं। मेरे मन में तो हिन्दुस्तान का अर्थ वे करोड़ों किसान हैं, जिनके सहारे राजा और हम सब जी रहे हैं। राजा तो हथियार काम में लाएँगे ही। उनका जान बचाने के लिए झूठ वह रिवाज ही हो गया है। उन्हें हुक्म चलाना है, बोलना चाहिए या नहीं, लेकिन हुक्म मानने वाले को तोपबल की ज़रूरत ऐसा सवाल यहाँ मन में नहीं है। दुनिया के ज्यादातर लोग हुक्म मानने नहीं उठाना चाहिए। जिसे वाले हैं। उन्हें या तो तोप बल या सत्याग्रह का झूठ का बचाव करना है, बल सिखाना चाहिए। जहाँ वे तोपबल सीखते हैं वही ऐसे बेकार सवाल वहाँ राजा-प्रजा दोनों पागल जैसे हो जाते हैं। उठाता है। जिसे सत्य की जहाँ हुक्म मानने वालों ने सत्याग्रह करना सीखा ही राह लेनी है, उसके है वहाँ राजा का ज़ुल्म उसकी तीन गज की सामने ऐसे धर्म-संकट तलवार से आगे नहीं जा सकता और हुक्म मानने कभी आते ही नहीं। वालों ने अन्यायी हुक्म की परवाह भी नहीं की है। किसान किसी के तलवार बल के बस न तो कभी हुए हैं और न होंगे। वे तलवार चलाना नहीं जानते, न किसी की तलवार से वे डरते हैं। वे मौत को हमेशा अपना तकिया बनाकर सोने वाली महान प्रजा हैं। उन्होंने मौत का डर छोड़ दिया है, इसलिए सबका डर छोड़ दिया है। यहाँ मैं कुछ बढ़ा- चढ़ाकर तस्वीर खींचता हूँ, यह ठीक है लेकिन हम जो तलवार के बल से चकित हो गए हैं, उनके लिए यह कुछ ज्यादा नहीं है। बात यह है कि किसानों ने, प्रजा मंडलों ने अपने और राज्य के कारोबार में सत्याग्रह को काम में लिया है। जब राजा जुल्म करता है तब प्रजा रूठती है। यह सत्याग्रह ही है। 119
हिन्द स्वराज मुझे याद है कि एक रियासत में रैयत (प्रजा) को अमुक हुक्म पसन्द नहीं आया, इसलिए रैयत ने हिजरत (पलायन) करना, गाँव खाली करना शुरू कर दिया। राजा घबराये। उन्होंने रैयत से माफी माँगी और हुक्म वापस ले लिया। ऐसी मिसालें तो बहुत मिल सकती हैं। लेकिन वे ज्यादातर भारत भूमि की ही उपज होंगी। ऐसी रैयत जहाँ है वहीं स्वराज्य है। इसके बिना स्वराज्य कुराज्य है। पाठक: तो क्या आप यह कहेंगे कि शरीर को कसने की ज़रूरत ही नहीं है ?
[Margin Note / साइड बॉक्स]: जिस आदमी में सच्ची इन्सानियत है, जो खुदा से ही डरता है, वह और किसी से नहीं डरेगा। दूसरे के बनाए हुए कानून उसके लिए बंधन कारक नहीं होते।
[Main Column]: संपादक : ऐसा मैं कभी नहीं कहूँगा। शरीर को कसे बिना सत्याग्रही होना मुश्किल है। अक्सर जिन शरीरों को गलत लाड़ लड़ाकर या सहला कर कमज़ोर बना दिया गया है, उनमें रहने वाला मन भी कमज़ोर होता है और जहाँ मन का बल नहीं है वहाँ आत्मबल कैसे हो सकता है ? हमें बाल-विवाह वगैरह के कुरिवाज को और ऐश-आराम की बुराई को छोड़कर शरीर को कसना ही होगा। अगर मैं मरियल और कमज़ोर आदमी को यकायक तोप के मुँह पर खड़ा हो जाने के लिए कहूँ, तो लोग मेरी हँसी उड़ाएँगे।
पाठक : आपके कहने से तो ऐसा लगता है कि सत्याग्रही होना मामूली बात नहीं है और अगर ऐसा है तो कोई आदमी सत्याग्रही कैसे बन सकता है, यह आपको समझाना होगा। संपादक : सत्याग्रही होना आसान है, लेकिन जितना वह आसान है उतना ही मुश्किल भी है। चौदह बरस का एक लड़का सत्याग्रही हुआ है, यह मेरे अनुभव की बात है। रोगी आदमी सत्याग्रही हुए हैं, यह भी मैंने देखा है। मैंने यह भी देखा है कि जो लोग शरीर से बलवान थे और दूसरी बातों में भी सुखी थे, वे सत्याग्रही नहीं हो सके। अनुभव से मैं देखता हूँ कि जो देश के भले के लिए सत्याग्रही होना चाहता है, उसे ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए, गरीबी अपनानी चाहिए, सत्य का पालन तो करना ही चाहिए और हर हालत में अभय बनना चाहिए। ब्रह्मचर्य एक महान व्रत है, जिसके बिना मन मजबूत नहीं होता। ब्रह्मचर्य का पालन न करने से मनुष्य वीर्यवान नहीं रहता, नामर्द और 120
हिन्द स्वराज्य कमज़ोर हो जाता है। जिसका मन विषय में भटकता है, वह क्या शेर मारेगा? यह बात अनगिनत मिसालों से साबित की जा सकती है। तब सवाल यह उठता है कि घर-संसारी को क्या करना चाहिए? लेकिन ऐसा सवाल उठने की कोई ज़रूरत नहीं। घर-संसारी ने जो संग किया (स्त्री की सोहबत की) वह विषय-भोग नहीं है, ऐसा कोई नहीं कहेगा। संतान पैदा करने के लिए ही अपनी स्त्री का संग करने की बात कही गयी है और सत्याग्रही को संतान पैदा करने की इच्छा नहीं होनी चाहिए। इसलिए संसारी होने पर भी वह ब्रह्मचर्य का पालन कर सकता है। यह बात ज्यादा खोलकर लिखने की ज़रूरत नहीं। स्त्री का क्या विचार है? यह सब कैसे हो सकता है? ऐसे सत्य का सबसे विचार मन में पैदा होते हैं। फिर भी जिसे महान कार्यों बड़ा प्रमाण तो यही में हिस्सा लेना है, उसे तो ऐसे सवालों का हल ढूँढना है कि दुनिया लड़ाई ही होगा। के हंगामे के जैसे ब्रह्मचर्य की ज़रूरत है वैसे ही गरीबी को बावजूद टिकी हुई अपनाने की भी ज़रूरत है। पैसे का लोभ और सत्याग्रह है। इसलिए लड़ाई का सेवन दोनों साथ-साथ कभी नहीं चल सकते, के बल के बजाय लेकिन मेरा मतलब यह नहीं है कि जिसके पास पैसा है दूसरा ही बल वह उसे फेंक दे। फिर भी पैसे के बारे में लापरवाह रहने उसका आधार है। की ज़रूरत है। सत्याग्रह का सेवन करते हुए अगर पैसा चला जाये, तो चिन्ता नहीं करनी चाहिए। जो सत्य का सेवन नहीं करता, वह सत्य का बल, सत्य की ताक़त कैसे दिखा सकेगा? इसलिए सत्य की तो पूरी-पूरी ज़रूरत रहेगी ही। बड़े से बड़ा नुकसान होने पर भी सत्य को नहीं छोड़ा जा सकता। सत्य के लिए कुछ छिपाने को होता ही नहीं। इसलिए सत्याग्रही के लिए छिपी सेना की ज़रूरत नहीं होती। जान बचाने के लिए झूठ बोलना चाहिए या नहीं, ऐसा सवाल यहाँ मन में नहीं उठाना चाहिए। जिसे झूठ का बचाव करना है, वही ऐसे बेकार सवाल उठाता है। जिसे सत्य की ही राह लेनी है, उसके सामने ऐसे धर्म-संकट कभी आते ही नहीं। ऐसी मुश्किल हालत में आ पड़े तो भी सत्यवादी उसमें से उबर जाता है। अभय के बिना तो सत्याग्रही की गाड़ी एक कदम भी आगे नहीं चल सकती। अभय संपूर्ण और सब बातों के लिए होना चाहिए। जमीन-जायदाद 121
हिन्द स्वराज का, झूठी इज्जत का, सगे-सम्बन्धियों का, राज-दरबार का, शरीर को पहुँचने वाली चोटों और मरण का अभय हो, तभी सत्याग्रह का पालन हो सकता है। यह सब करना मुश्किल है, ऐसा मानकर इसे छोड़ नहीं देना चाहिए। जो सिर पर पड़ता है उसे सह लेने की शक्ति कुदरत ने हर मनुष्य को दी है। जिसे देश सेवा न करनी हो, उसे भी ऐसे गुणों का सेवन अभय के बिना तो करना चाहिए। सत्याग्रही की गाड़ी एक इसके सिवा हम यह भी समझ सकते हैं कि जिसे कदम भी आगे नहीं चल हथियार बल पाना होगा, उसे भी इन बातों की ज़रूरत सकती। अभय संपूर्ण रहेगी। रणवीर होना कोई ऐसी बात नहीं कि किसी ने और सब बातों के लिए इच्छा की और तुरन्त रणवीर हो गया। योद्धा को होना चाहिए। जमीन- ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा, भिखारी बनना होगा। जायदाद का, झूठी रण में जिसके भीतर अभय न हो वह लड़ नहीं इज्जत का, सगे- सकता। उस योद्धा को सत्यव्रत का पालन करने की सम्बन्धियों का, राज- उतनी ज़रूरत नहीं है, ऐसा शायद किसी को लगे, दरबार का, शरीर को लेकिन जहाँ अभय है वहाँ सत्य कुदरती तौर पर रहता पहुँचने वाली चोटों और ही है। मनुष्य जब सत्य को छोड़ता है तब किसी तरह मरण का अभय हो, के भय के कारण ही छोड़ता है। तभी सत्याग्रह का पालन इसलिए इन चार गुणों से डर जाने का कोई कारण हो सकता है। नहीं है। फिर तलवारबाज़ को और भी कुछ बेकार कोशिशें करनी पड़ती हैं, जो सत्याग्रही को नहीं करनी पड़तीं। तलवारबाज़ को जो दूसरी कोशिशें करनी पड़ती हैं, उसका कारण भय है। अगर उसमें पूरी निडरता आ जाए तो उसी पल उसके हाथ से तलवार गिर जाएगी। फिर उसे तलवार के सहारे की ज़रूरत नहीं रहती। जिसकी किसी से दुश्मनी नहीं है, उसे तलवार की ज़रूरत ही नहीं है। सिंह के सामने आने वाले एक आदमी के हाथ की लाठी अपने-आप उठ गई। उसने देखा कि अभय का पाठ उसने सिर्फ़ ज़बानी ही किया था। उसने लाठी छोड़ी और वह निर्भय- निडर बना। 122
अब जात-पांत के, ऊंच-नीच के, सम्प्रदायों के भेदभाव भूलकर सब एक हो जाइए। मेल रखिए और निडर बनिए। घर में बैठकर काम करने का समय नहीं है। बीती हुई घड़ियां ज्योतिषी भी नहीं देखता।
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शिक्षा पाठक : आपने इतना सारा कहा, परन्तु उसमें कहीं भी शिक्षा की ज़रूरत तो बताई ही नहीं। हम शिक्षा की कमी की हमेशा शिकायत करते रहते हैं। लाज़िमी तालीम देने का आन्दोलन हम सारे देश में देखते हैं। महाराजा गायकवाड़ ने अपने राज्य में लाज़िमी शिक्षा शुरू की है। उसकी ओर सबका ध्यान गया है। हम उन्हें धन्यवाद देते हैं। यह सारी कोशिश क्या बेकार ही समझनी चाहिए ? संपादक : अगर हम अपनी सभ्यता को सबसे किसान ईमानदारी से अच्छी मानते हैं, तब तो मुझे अफसोस के साथ खुद खेती करके रोटी कहना पड़ेगा कि वह कोशिश ज्यादातर बेकार कमाता है। उसे अपने ही है। महाराजा साहब और हमारे दूसरे धुरन्धर माँ-बाप, अपनी स्त्री के नेता सबको तालीम देने की जो कोशिश कर साथ, बच्चों से कैसे पेश रहे हैं, उसमें उनका हेतु निर्मल है। इसलिए उन्हें आना, जहां वह बसा धन्यवाद ही देना चाहिए, लेकिन उनके हेतु का हुआ है वहाँ उसकी जो नतीजा आने की संभावना है, उसे हम छिपा चाल-ढाल कैसी होनी नहीं सकते। चाहिए, इन सबका उसे काफी ज्ञान है। शिक्षा : तालीम का अर्थ क्या है ? अगर उसका अर्थ सिर्फ़ अक्षर ज्ञान ही हो तो वह तो एक साधन जैसी ही हुई। उसका अच्छा उपयोग भी हो सकता है और बुरा उपयोग भी हो सकता है। एक शस्त्र से चीर-फाड़ करके बीमार को अच्छा किया जा सकता है और वही शस्त्र किसी की जान लेने के लिए भी काम में लाया जा सकता है। अक्षर ज्ञान का भी ऐसा ही है। बहुत से लोग उसका बुरा उपयोग करते हैं, यह तो हम देखते ही हैं। उसका अच्छा उपयोग प्रमाण में कम ही लोग करते हैं। यह बात अगर ठीक है तो इससे यह साबित होता है कि अक्षर-ज्ञान से दुनिया को फायदे के बदले नुकसान ही हुआ है। 125
हिन्द स्वराज शिक्षा का साधारण अर्थ अक्षर ज्ञान ही होता है। लोगों को लिखना, पढ़ना और हिसाब करना सिखाना बुनियादी या प्राथमिक शिक्षा कहलाती है। एक किसान ईमानदारी से खुद खेती करके रोटी कमाता है। उसे मामूली तौर पर दुनियावी ज्ञान है। अपने माँ-बाप के साथ कैसे बरतना, अपनी स्त्री के साथ कैसे बरतना, बच्चों से कैसे पेश आना, जिस देहात में वह बसा हुआ है वहाँ उसकी चाल-ढाल कैसी होनी चाहिए, इन सबका उसे काफी ज्ञान है। तालीम का अर्थ क्या है? अगर उसका अर्थ सिर्फ़ अक्षर ज्ञान ही हो तो वह तो एक साधन जैसी ही हुई। उसका अच्छा उपयोग भी हो सकता है और बुरा उपयोग भी हो सकता है। एक शस्त्र से चीर-फाड़ करके बीमार को अच्छा किया जा सकता है और वही शस्त्र किसी की जान लेने के लिए भी काम में लाया जा सकता है। अक्षर ज्ञान का भी ऐसा ही है। बहुत से लोग उसका बुरा उपयोग करते हैं, यह तो हम देखते ही हैं। उसका अच्छा उपयोग प्रमाण में कम ही लोग करते हैं। वह नीति के नियम समझता है और उनका पालन करता है, लेकिन वह अपने दस्तखत करना नहीं जानता। इस आदमी को आप अक्षर ज्ञान देकर क्या करना चाहते हैं? उसके सुख में आप कौन सी बढ़ोतरी करेंगे? क्या उसकी झोंपड़ी या उसकी हालत के बारे में आप उसके मन में असंतोष पैदा करना चाहते हैं? ऐसा करना हो तो भी उसे अक्षर ज्ञान देने की ज़रूरत नहीं है। पश्चिम के असर के नीचे आकर हमने यह बात चलायी है कि लोगों को शिक्षा देनी चाहिए, लेकिन उसके बारे में हम आगे-पीछे की बात सोचते ही नहीं। अब ऊंची शिक्षा को लें। मैं भूगोल विद्या सीखा, खगोल विद्या सीखा, बीजगणित भी मुझे आ गया, रेखागणित का ज्ञान भी मैंने हासिल किया, भूगर्भ विद्या को भी मैं पी गया, लेकिन उससे क्या? उससे मैंने अपना कौन सा भला किया? अपने आसपास के लोगों का क्या भला किया? किस मकसद से मैंने वह ज्ञान हासिल किया? उससे मुझे क्या फायदा हुआ? एक अंग्रेज विद्वान हक्सले ने शिक्षा के बारे में यों कहा है : “उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसके शरीर को ऐसी आदत डाली गई है कि वह 126
हिन्द स्वराज्य उसके बस में रहता है, जिसका शरीर चैन से और आसानी से सौंपा हुआ काम करता है। उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसकी बुद्धि शुद्ध, शांत और न्यायदर्शी है। उसने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसका मन कुदरती कानूनों से भरा है और जिसकी इन्द्रियां उसके बस में हैं, जिसके मन की भावनाएँ बिल्कुल शुद्ध हैं, जिसे नीच कामों से नफ़रत है और जो दूसरों को अपने जैसा मानता है। ऐसा आदमी ही सच्चा शिक्षित माना जाएगा, क्योंकि वह कुदरत के कानून के मुताबिक चलता है। कुदरत उसका अच्छा उपयोग करेगी और वह कुदरत का अच्छा उपयोग करेगा। " अगर यही सच्ची शिक्षा हो तो मैं कसम खाकर कहूँगा कि ऊपर जो शास्त्र मैंने गिनाये हैं उनका उपयोग मेरे शरीर या मेरी इन्द्रियों को बस में करने के लिए मुझे नहीं करना पड़ा। इसलिए प्राथमिक शिक्षा को लीजिये या ऊंची शिक्षा को लीजिये, उसका उपयोग मुख्य बात में नहीं होता। उससे हम मनुष्य नहीं बनते, उससे हम अपना कर्तव्य नहीं जान सकते। उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसके शरीर को ऐसी आदत डाली गई है कि वह उसके बस में रहता है, जिसका शरीर चैन से और आसानी से सौंपा हुआ काम करता है। पाठक : अगर ऐसा ही है, तो मैं आपसे एक सवाल करूँगा। आप ये जो सारी बातें कह रहे हैं, वह किसकी बदौलत कह रहे हैं? अगर आपने अक्षर ज्ञान और ऊंची शिक्षा नहीं पाई होती, तो ये सब बातें आप मुझे कैसे समझा पाते ? संपादक : आपने अच्छी सुनाई, लेकिन आपके सवाल का मेरा जवाब भी सीधा ही है। अगर मैंने ऊंची या नीची शिक्षा नहीं पाई होती, तो मैं नहीं मानता कि मैं निकम्मा आदमी हो जाता। अब ये बातें कहकर मैं उपयोगी बनने की इच्छा रखता हूँ। ऐसा करते हुए जो कुछ मैंने पढ़ा उसे मैं काम में लाता हूँ और उसका उपयोग, अगर वह उपयोगी हो तो, मैं अपने करोड़ों भाइयों के लिए नहीं कर सकता, सिर्फ़ आप जैसे पढ़े-लिखों के लिए ही कर सकता हूँ। इससे भी मेरी ही बात का समर्थन होता है। मैं और आप दोनों गलत शिक्षा के पंजे में फँस गए थे। उसमें से मैं अपने को मुक्त हुआ मानता हूँ। अब वह 127
हिन्द स्वराज्य अनुभव मैं आपको देता हूँ और उसे देते समय ली हुई शिक्षा का उपयोग करके उसमें रही सड़न मैं आपको दिखाता हूँ। इसके सिवा, आपने जो बात मुझे सुनाई उसमें आप गलती खा गये, क्योंकि मैंने अक्षर ज्ञान को बुरा नहीं कहा है। मैंने तो इतना ही कहा है कि उस ज्ञान की हमें मूर्ति की तरह पूजा नहीं उस ज्ञान की हमें मूर्ति की तरह करनी चाहिए। वह हमारी कामधेनु नहीं है। पूजा नहीं करनी चाहिए। वह वह अपनी जगह पर शोभा दे सकता है और हमारी कामधेनु नहीं है। वह वह जगह यह है : जब मैंने और आपने अपनी जगह पर शोभा दे अपनी इन्द्रियों को बस में कर लिया हो, सकता है और वह जगह यह है : जब हमने नीति की नींव मजबूत बना ली जब मैंने और आपने अपनी हो, तब अगर हमें अक्षर ज्ञान पाने की इन्द्रियों को बस में कर लिया इच्छा हो, तो उसे पाकर हम उसका अच्छा हो, जब हमने नीति की नींव उपयोग कर सकते हैं। वह शिक्षा आभूषण के मजबूत बना ली हो, तब अगर रूप में अच्छी लग सकती है, लेकिन अक्षर हमें अक्षर ज्ञान पाने की इच्छा ज्ञान का अगर आभूषण के तौर पर ही हो, तो उसे पाकर हम उसका उपयोग हो, तो ऐसी शिक्षा को लाज़िमी करने अच्छा उपयोग कर सकते हैं। की हमें ज़रूरत नहीं। हमारे पुराने स्कूल ही वह शिक्षा आभूषण के रूप में काफ़ी हैं। वहां नीति को पहला स्थान दिया अच्छी लग सकती है, लेकिन जाता है। वह सच्ची प्राथमिक शिक्षा है। उस अक्षर ज्ञान का अगर आभूषण पर हम जो इमारत खड़ी करेंगे वह टिक के तौर पर ही उपयोग हो, तो सकेगी। ऐसी शिक्षा को लाज़िमी करने पाठक : तब क्या मेरा यह समझना ठीक है की हमें ज़रूरत नहीं। हमारे पुराने कि आप स्वराज्य के लिए अंग्रेजी शिक्षा का स्कूल ही काफ़ी हैं। कोई उपयोग नहीं मानते ? संपादक : मेरा जवाब ‘हाँ’ और ‘नहीं’ दोनों है। करोड़ों लोगों को अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी। उसने इसी इरादे से अपनी योजना बनाई थी, ऐसा मैं नहीं सुझाना चाहता, लेकिन उसके काम का नतीजा यही निकला है। यह कितने दुःख की बात है कि हम स्वराज्य की बात भी पराई भाषा में करते हैं? 128
हिन्द स्वराज्य जिस शिक्षा को अंग्रेजों ने ठुकरा दिया है वह हमारा सिंगार बनती है, यह जानने लायक है। उन्हीं के विद्वान कहते रहते हैं कि उसमें यह अच्छा नहीं है, वह अच्छा नहीं है। वे जिसे भूल से गए हैं, उसी से हम अपने अज्ञान के कारण चिपके रहते हैं। उनमें अपनी-अपनी भाषा की उन्नति करने की कोशिश चल रही है। वेल्स इंग्लैण्ड का एक छोटा-सा परगना है, उसकी भाषा धूल जैसी नगण्य है। ऐसी भाषा का अब जीर्णोद्धार हो रहा है। वेल्स के बच्चे वेल्श भाषा में ही बोलें, ऐसी कोशिश वहाँ चल रही हैं। इसमें इंग्लैण्ड के खजांची लॉयड जॉर्ज बड़ा हिस्सा लेते हैं और हमारी दशा कैसी है? हम एक-दूसरे को पत्र लिखते हैं तब गलत अंग्रेजी में लिखते हैं। एक साधारण एम.ए. पास आदमी भी ऐसी गलत अंग्रेजी से बचा नहीं होता। हमारे अच्छे से अच्छे विचार प्रगट करने का ज़रिया है अंग्रेजी, हमारी कांग्रेस का कारोबार भी अंग्रेजी में चलता है। अगर ऐसा लंबे अरसे तक चला तो मेरा मानना है कि आने वाली पीढ़ी हमारा तिरस्कार करेगी और उसका शाप हमारी आत्मा को लगेगा। करोड़ों लोगों को अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी। उसने इसी इरादे से अपनी योजना बनाई थी, ऐसा मैं नहीं सुझाना चाहता, लेकिन उसके काम का नतीजा यही निकला है। यह कितने दुःख की बात है कि हम स्वराज्य की बात भी पराई भाषा में करते हैं? आपको समझना चाहिए कि अंग्रेजी शिक्षा लेकर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी शिक्षा से दंभ, राग, जुल्म वगैरह बढ़े हैं। अंग्रेजी शिक्षा पाए हुए लोगों ने प्रजा को ठगने में, उसे परेशान करने में कुछ भी कसर नहीं छोड़ रखी है। अब अगर हम अंग्रेजी शिक्षा पाए हुए लोग उसके लिए कुछ करते हैं, तो उसका हम पर जो कर्ज चढ़ा हुआ है उसका कुछ हिस्सा ही हम अदा करते हैं। यह क्या कम जुल्म की बात है कि अपने देश में अगर मुझे इन्साफ़ पाना हो तो मुझे अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना चाहिए। बैरिस्टर होने पर मैं स्वभाषा में बोल ही नहीं सकता ! दूसरे आदमी को मेरे लिए तरजुमा कर देना चाहिए ! यह कुछ कम दंभ है ? यह गुलामी की हद नहीं तो और क्या है ? इसमें मैं अंग्रेजों का दोष निकालूँ या अपना ? हिन्दुस्तान को गुलाम बनाने 129
हिन्द स्वराज वाले तो हम अंग्रेजी जानने वाले लोग ही हैं। राष्ट्र की हाय अंग्रेजों पर नहीं पड़ेगी, बल्कि हम पर पड़ेगी। लेकिन मैंने आपसे कहा कि मेरा जवाब 'हाँ' और 'ना' दोनों है। 'हाँ' कैसे सो मैंने आपको समझाया। अब 'ना' कैसे यह बताता हूँ। हम सभ्यता के रोग में ऐसे फँस गये हैं कि अंग्रेजी शिक्षा अंग्रेजी शिक्षा लेकर हमने अपने बिल्कुल लिये बिना अपना काम चला सकें राष्ट्र को गुलाम बनाया है। ऐसा समय अब नहीं रहा। जिसने वह शिक्षा अंग्रेजी शिक्षा से दंभ, राग, पाई है, वह उसका अच्छा उपयोग करे। जुल्म वगैरह बढ़े हैं। अंग्रेजी अंग्रेजों के साथ के व्यवहार में, ऐसे शिक्षा पाए हुए लोगों ने प्रजा हिन्दुस्तानियों के साथ के व्यवहार में को ठगने में, उसे परेशान करने जिनकी भाषा हम समझ न सकते हों और में कुछ भी कसर नहीं छोड़ अंग्रेज खुद अपनी सभ्यता से कैसे परेशान रखी है। अब अगर हम अंग्रेजी हो गये हैं यह समझने के लिए अंग्रेजी का शिक्षा पाए हुए लोग उसके लिए उपयोग किया जाए। जो लोग अंग्रेजी पढ़े कुछ करते हैं, तो उसका हम पर हुए हैं उनकी संतानों को पहले तो नीति जो कर्ज चढ़ा हुआ है उसका सिखानी चाहिए, उनकी मातृभाषा सिखानी कुछ हिस्सा ही हम अदा करते हैं। चाहिए और हिन्दुस्तान की एक दूसरी भाषा यह क्या कम जुल्म की बात है सिखानी चाहिए। कि अपने देश में अगर मुझे बालक जब पक्की उम्र के हो जाएँ तब इन्साफ़ पाना हो तो मुझे अंग्रेजी भले ही वे अंग्रेजी शिक्षा पाएँ और वह भी भाषा का उपयोग करना चाहिए। उसे मिटाने के इरादे से, न कि उसके जरिये बैरिस्टर होने पर मैं स्वभाषा में पैसे कमाने के इरादे से। ऐसा करते हुए भी बोल ही नहीं सकता! हमें यह सोचना होगा कि अंग्रेजी में क्या सीखना चाहिए और क्या नहीं सीखना चाहिए। कौन से शास्त्र पढ़ने चाहिए, यह भी हमें सोचना होगा। थोड़ा विचार करने से ही हमारी समझ में आ जाएगा कि अगर अंग्रेजी डिग्री लेना हम बन्द कर दें, तो अंग्रेज हाकिम चौंकेंगे। पाठक : तब कैसी शिक्षा दी जाए ? संपादक : उसका जवाब ऊपर कुछ हद तक आ गया है। फिर भी इस सवाल पर हम और विचार करें। मुझे तो लगता है कि हमें अपनी सभी भाषाओं को 130
हिन्द स्वराज्य उज्ज्वल, शानदार बनाना चाहिए। हमें अपनी भाषा में ही शिक्षा लेनी चाहिए, इसके क्या मानी हैं, इसे ज्यादा समझाने का यह स्थान नहीं है। जो अंग्रेजी पुस्तकें काम की हैं, उनका हमें अपनी भाषा में अनुवाद करना होगा। बहुत से शास्त्र सीखने का दंभ और वहम हमें छोड़ना होगा। सबसे पहले तो धर्म की शिक्षा या नीति की शिक्षा दी जानी चाहिए। हर एक पढ़े-लिखे हिन्दुस्तानी हिन्दुस्तान कभी नास्तिक नहीं को अपनी भाषा का, हिन्दू को संस्कृत बनेगा। हिन्दुस्तान की भूमि में का, मुसलमान को अरबी का, पारसी को नास्तिक फल-फूल नहीं सकते। फ़ारसी का और सबको हिन्दी का ज्ञान बेशक, यह काम मुश्किल है। होना चाहिए। कुछ हिन्दुओं को अरबी धर्म की शिक्षा का ख़्याल करते और कुछ मुसलमानों और पारसियों को ही सिर चकराने लगता है। धर्म के संस्कृत सीखनी चाहिए। उत्तरी और आचार्य दंभी और स्वार्थी मालूम पश्चिमी हिन्दुस्तान के लोगों को तमिल होते हैं। उनके पास पहुँचकर हमें सीखनी चाहिए। सारे हिन्दुस्तान के लिए नम्र भाव से उन्हें समझाना होगा। जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होनी उसकी कुंजी मुल्लों, दस्तूरों और चाहिए। उसे उर्दू या नागरी लिपि में ब्राह्मणों के हाथ में है, लेकिन लिखने की छूट रहनी चाहिए। हिन्दू- उनमें अगर सद्बुद्धि पैदा न हो, मुसलमानों के संबंध ठीक रहें, इसलिए तो अंग्रेजी शिक्षा के कारण हममें बहुत से हिन्दुस्तानियों का इन दोनों जो जोश पैदा हुआ है उसका लिपियों को जान लेना जरूरी है। ऐसा होने उपयोग करके हम लोगों को नीति से हम आपस के व्यवहार से अंग्रेजी को की शिक्षा दे सकते हैं। यह कोई निकाल सकेंगे। बहुत मुश्किल बात नहीं है। और यह सब किसके लिए जरूरी है? हिन्दुस्तानी सागर के किनारे पर ही हम जो गुलाम बन गये हैं उनके लिए। मैल जमा है। उस मैल से जो गंदे हमारी गुलामी की वजह से देश की प्रजा हो गये हैं उन्हें साफ होना है। गुलाम बनी है। अगर हम गुलामी से छूट जाएँ, तो प्रजा तो छूट ही जाएगी। पाठक : आपने जो धर्म की शिक्षा की बात कही वह बड़ी कठिन है। संपादक : फिर भी उसके बिना हमारा काम नहीं चल सकता। हिन्दुस्तान कभी नास्तिक नहीं बनेगा। हिन्दुस्तान की भूमि में नास्तिक फल-फूल नहीं 131
हिन्द स्वराज्य सकते। बेशक, यह काम मुश्किल है। धर्म की शिक्षा का ख़्याल करते ही सिर चकराने लगता है। धर्म के आचार्य दंभी और स्वार्थी मालूम होते हैं। उनके पास पहुँचकर हमें नम्र भाव से उन्हें समझाना होगा। उसकी कुंजी मुल्लों, दस्तूरों और ब्राह्मणों के हाथ में है, लेकिन उनमें अगर सद्बुद्धि पैदा न हो, तो अंग्रेजी शिक्षा के कारण हममें जो जोश पैदा हुआ है उसका उपयोग करके हम लोगों को नीति की शिक्षा दे सकते हैं। यह कोई बहुत मुश्किल बात नहीं है। हिन्दुस्तानी सागर के किनारे पर ही मैल जमा है। उस मैल से जो गंदे हो गये हैं उन्हें साफ होना है। हम लोग ऐसे ही हैं और खुद ही बहुत कुछ साफ हो सकते हैं। मेरी यह टीका करोड़ों लोगों के बारे में नहीं है। हिन्दुस्तान को असली रास्ते पर लाने के लिए हमें ही असली रास्ते पर आना होगा। बाकी करोड़ों लोग तो असली रास्ते पर ही हैं। उसमें सुधार, बिगाड़, उन्नति, अवनति समय के अनुसार होते ही रहेंगे। पश्चिम की सभ्यता को निकाल बाहर करने की ही हमें कोशिश करनी चाहिए। दूसरा सब अपने-आप ठीक हो जाएगा। 132
आत्म विश्वास रावण जैसा नहीं होना चाहिए जो समझता था कि मेरी बराबरी का कोई है नहीं। आत्म विश्वास होना चाहिए विभीषण जैसा, प्रह्लाद जैसा। उनके जी में यह भाव था कि हम निर्बल हैं मगर ईश्वर हमारे साथ है और हमारी शक्ति अनन्त है। 133
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