हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)
Hind Swaraj by Mahatma Gandhi
मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा
हिन्द स्वराज इन्सान नींद में से उठता है तो अंगड़ाई लेता है, इधर- उधर घूमता है और अशान्त रहता है। उसे पूरा भान आने में कुछ वक्त लगता है। उसी तरह अगर ये बंग- भंग से जागृति आई है, फिर भी बेहोशी नहीं गई है। अभी हम अंगड़ाई लेने की हालत में हैं। असंतोष होना ही चाहिए। चालू चीज से ऊब जाने पर ही उसे फेंक देने को मन करता है। ऐसा असंतोष हममें महान हिन्दुस्तानियों की और अंग्रेज़ों की पुस्तकें पढ़कर पैदा हुआ है। उस असंतोष से अशान्ति पैदा हुई और उस अशान्ति में कई लोग मरे, कई बरबाद हुए, कई जेल गये, कई को दश निकाला हुआ। आगे भी ऐसा होगा और होना चाहिए। ये सब लक्षण अच्छे माने जा सकते हैं। इनका नतीजा बुरा भी आ सकता है। 26
बंदूक का भय गोली छूटने के साथ ही समाप्त हो जाता है, लेकिन प्रेम का बंधन हमेशा बढ़ता जाता है। 27
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स्वराज्य क्या है ? पाठक : कांग्रेस ने हिन्दुस्तान को एक राष्ट्र बनाने के लिए क्या किया, बंग- भंग से जागृति कैसे हुई ? अशान्ति और असंतोष कैसे फैले ? यह सब जाना । अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि स्वराज्य के बारे में आपके क्या ख़्याल हैं । मुझे डर है कि शायद हमारी समझ में फ़र्क हो । संपादक : फ़र्क होना मुमकिन है । स्वराज्य के लिए आप-हम सब अधीर बन रहे हैं, लेकिन वह क्या है इस बारे में हम ठीक राय पर नहीं पहुँचे हैं। अंग्रेज़ों को निकाल बाहर करना चाहिए, यह विचार बहुतों के मुँह से सुना जाता है, लेकिन उन्हें क्यों निकालना चाहिए, इसका कोई ठीक ख़्याल किया गया हो ऐसा नहीं लगता । आपसे ही एक सवाल मैं पूछता हूँ। मान लीजिये कि हम माँगते हैं उतना सब अंग्रेज़ हमें दे दें तो फिर उन्हें यहाँ से निकाल देने की ज़रूरत आप समझते हैं ? [पार्श्व-उद्धरण:] मेहरबानी करके आप हमारे मुल्क से चले जाएँ। यह माँग वे कुबूल करें और हिन्दुस्तान से चले जाएँ, तब भी अगर कोई ऐसे अर्थ का अनर्थ करे कि वे यहीं रहते हैं, तो मुझे उसकी परवाह नहीं होगी। तब फिर हम ऐसा मानेंगे कि हमारी भाषा में कुछ लोग ‘जाना’ का अर्थ ‘रहना’ करते हैं। पाठक : मैं तो उनसे एक ही चीज माँगूँगा । वह है : मेहरबानी करके आप हमारे मुल्क से चले जाएँ। यह माँग वे कुबूल करें और हिन्दुस्तान से चले जाएँ, तब भी अगर कोई ऐसे अर्थ का अनर्थ करे कि वे यहीं रहते हैं, तो मुझे उसकी परवाह नहीं होगी। तब फिर हम ऐसा मानेंगे कि हमारी भाषा में कुछ लोग ‘जाना’ का अर्थ ‘रहना’ करते हैं। संपादक : अच्छा, हम मान लें कि हमारी माँग के मुताबिक अंग्रेज़ चले गये । उसके बाद आप क्या करेंगे ? पाठक : इस सवाल का जवाब अभी से ही दिया नहीं जा सकता । वे किस तरह जाते हैं, उस पर बाद की हालत का आधार रहेगा । मान लें कि आप कहते हैं, उस तरह वे चले गये, तो मुझे लगता है कि उनका बनाया हुआ 29
हिन्द स्वराज विधान हम चालू रखेंगे और राज का कारोबार चलाएँगे। कहने से ही वे चले जाएँ तो हमारे पास लश्कर तैयार ही होगा, इसलिए हमें राजकाज चलाने में कोई मुश्किल नहीं आयेगी। संपादक : आप भले ही ऐसा मानें, लेकिन मैं नहीं मानूँगा। फिर भी मैं इस बात पर ज्यादा बहस नहीं करना चाहता। मुझे तो आपके सवाल का जवाब देना है। वह जवाब मैं आपसे ही कुछ सवाल करके अच्छी तरह दे सकता हूँ। इसलिए कुछ सवाल आपसे करता हूँ। हम अंग्रेज़ों को क्यों निकालना चाहते हैं?
(बाएँ हाशिए का पाठ / Callout): यह सवाल ही बेकार है। बाघ अपना रूप पलट दे तो उसकी भाई बन्दी से कोई नुकसान है? ऐसा सवाल आपने पूछा, यह सिर्फ वक्त बरबाद करने के खातिर ही। अगर बाघ अपना स्वभाव बदल सके, तो अंग्रेज़ अपनी आदत छोड़ सकते हैं। जो कभी होने वाला नहीं है वह होगा, ऐसा मानना मनुष्य की रीत ही नहीं है।
पाठक : इसलिए कि उनके राज-कारोबार से देश कंगाल होता जा रहा है। वे हर साल देश से धन ले जाते हैं। वे अपनी ही चमड़ी के लोगों को बड़े ओहदे देते हैं, हमें सिर्फ गुलामी में रखते हैं, हमारे साथ बेअदबी का बरताव करते हैं और हमारी ज़रा भी परवाह नहीं करते। संपादक : अगर वे धन बाहर न ले जाएँ, नम्र बन जाएँ और हमें बड़े ओहदे दें, तो उनके रहने में आपको कुछ हर्ज है? पाठक : यह सवाल ही बेकार है। बाघ अपना रूप पलट दे तो उसकी भाईबन्दी से कोई नुकसान है? ऐसा सवाल आपने पूछा, यह सिर्फ वक्त बरबाद करने के खातिर ही। अगर बाघ अपना स्वभाव बदल सके, तो अंग्रेज़ अपनी आदत छोड़ सकते हैं। जो कभी होने वाला नहीं है वह होगा, ऐसा मानना मनुष्य की रीत ही नहीं है। संपादक : कैनेडा को जो राजसत्ता मिली है, बोअर लोगों को जो राजसत्ता मिली है, वैसी ही हमें मिले तो ? पाठक : यह भी बेकार सवाल है। हमारे पास उनकी तरह गोला बारूद हो तब वैसा ज़रूर हो सकता है, लेकिन उन लोगों के जितनी सत्ता जब अंग्रेज़ हमें देंगे तब हम अपना ही झंडा रखेंगे। जैसा जापान वैसा हिन्दुस्तान। अपना 30
हिन्द स्वराज्य जंगी बेड़ा, अपनी फौज और अपनी जाहोजलाली होगी और तभी हिन्दुस्तान का सारी दुनिया में बोलबाला होगा। संपादक : यह तो आपने अच्छी तस्वीर खींची। इसका अर्थ यह हुआ कि हमें अंग्रेजी राज्य तो चाहिए, पर अंग्रेज (शासक) नहीं चाहिए। आप बाघ का स्वभाव तो चाहते हैं, लेकिन बाघ नहीं चाहते। मतलब यह हुआ कि आप हिन्दुस्तान को अंग्रेज बनाना चाहते हैं और हिन्दुस्तान जब अंग्रेज बन जाएगा तब वह हिन्दुस्तान नहीं कहा जाएगा, लेकिन सच्चा इंग्लिस्तान कहा जाएगा। यह मेरी कल्पना का स्वराज्य नहीं है। पाठक : मैंने तो जैसा मुझे सूझता है वैसा आप बाघ का स्वभाव तो स्वराज्य बतलाया। हम जो शिक्षा पाते हैं वह चाहते हैं, लेकिन बाघ नहीं अगर कुछ काम की हो, स्पेन्सर, मिल वगैरह चाहते। मतलब यह हुआ महान लेखकों के जो लेख हम पढ़ते हैं वे कुछ कि आप हिन्दुस्तान को काम के हों, अंग्रेज़ों की पार्लियामेन्ट अंग्रेज बनाना चाहते हैं और पार्लियामेन्टों की माता हो, तो फिर बेशक मुझे हिन्दुस्तान जब अंग्रेज बन तो लगता है कि हमें उनकी नकल करनी जाएगा तब वह हिन्दुस्तान चाहिए, वह यहाँ तक कि जैसे वे अपने मुल्क नहीं कहा जाएगा, लेकिन में दूसरों को घुसने नहीं देते वैसे हम भी दूसरों सच्चा इंग्लिस्तान कहा को न घुसने दें। जाएगा। यह मेरी कल्पना यों तो उन्होंने अपने देश में जो किया है, का स्वराज्य नहीं है। वैसा और जगह अभी देखने में नहीं आता। इसलिए उसे तो हमें अपने देश में अपनाना ही चाहिए, लेकिन अब आप अपने विचार बतलाइए। संपादक : अभी देर है। मेरे विचार अपने आप इस चर्चा में आपको मालूम हो जाएँगे। स्वराज्य को समझना आपको जितना आसान लगता है उतना ही मुझे मुश्किल लगता है। इसलिए फिलहाल मैं आपको इतना ही समझाने की कोशिश करूँगा कि जिसे आप स्वराज्य कहते हैं वह सचमुच स्वराज्य नहीं है 31
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एक आदर्श रास्ते की खोज में हम दिनों-दिन इंतज़ार करते रहते हैं कि शायद वह अब मिलेगा। मगर हम भूल जाते हैं कि रास्ते चलने के लिए बनाये जाते हैं। इंतज़ार के लिए नहीं। 33
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इंग्लैंड की हालत पाठक : आप जो कहते हैं उस पर से तो मैं यही अंदाज़ा लगाता हूँ कि इंग्लैंड में जो राज्य चलता है वह ठीक नहीं है और हमारे लायक नहीं है। संपादक : आपका यह ख़्याल सही है। इंग्लैंड में आज जो हालत है वह सचमुच तरस खाने लायक है। मैं तो भगवान से यही माँगता हूँ कि हिन्दुस्तान की ऐसी हालत कभी न हो। जिसे आप पार्लियामेन्टों की माता कहते हैं, वह पार्लियामेन्ट तो बाँझ और बेसवा है। ये दोनों शब्द बहुत कड़े हैं, तो भी उसे अच्छी तरह लागू होते हैं। मैंने उसे बाँझ कहा, क्योंकि अब तक उस पार्लियामेन्ट ने अपने आप पार्लियामेन्ट का काम एक भी अच्छा काम नहीं किया। अगर उस पर इतना सरल होना चाहिए दबाव डालने वाला कोई न हो तो वह कुछ भी कि दिन-ब-दिन उसका न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है और वह तेज बढ़ता जाए और लोगों बेसवा है, क्योंकि जो मंत्रिमंडल उसे रखे उसके पर उसका असर होता पास वह रहती है। आज उसका मालिक जाए, लेकिन इससे उल्टे एसक्विथ है, तो कल बालफर होगा और परसों इतना तो सब क़ुबूल करते कोई तीसरा। हैं कि पार्लियामेन्ट के पाठक : आपके बोलने में कुछ व्यंग्य है। बाँझ मेम्बर दिखावटी और शब्द को अब तक आपने लागू नहीं किया। स्वार्थी पाये जाते हैं। पार्लियामेन्ट लोगों की बनी है, इसलिए बेशक लोगों के दबाव से ही वह काम करेगी। वही उसका गुण है, उसके ऊपर का अंकुश है। संपादक : यह बड़ी गलत बात है। अगर पार्लियामेन्ट बाँझ न हो तो इस तरह होना चाहिए, लोग उसमें अच्छे से अच्छे मेम्बर चुनकर भेजते हैं। मेम्बर तनख्वाह नहीं लेते, इसलिए उन्हें लोगों की भलाई के लिए पार्लियामेन्ट में जाना चाहिए। लोग खुद सुशिक्षित-संस्कारी माने जाते हैं, इसलिए उनसे भूल नहीं होती ऐसा हमें मानना चाहिए। ऐसी पार्लियामेन्ट को अर्जी की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए, न दबाव की। उस पार्लियामेन्ट का काम इतना सरल होना 35
हिन्द स्वराज्य चाहिए कि दिन-ब-दिन उसका तेज बढ़ता जाए और लोगों पर उसका असर होता जाए, लेकिन इससे उल्टे इतना तो सब कुबूल करते हैं कि पार्लियामेन्ट के मेम्बर दिखावटी और स्वार्थी पाये जाते हैं। सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं। सिर्फ डर के कारण ही पार्लियामेन्ट कुछ काम करती है। जो काम आज किया वह कल उसे रद्द करना पड़ता है। आज तक एक भी चीज को पार्लियामेन्ट ने ठिकाने लगाया हो ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती। बड़े सवालों की चर्चा जब पार्लियामेन्ट
[बायाँ स्तंभ] पार्लियामेन्ट को मैंने बेसवा | [दायाँ स्तंभ] में चलती है, तब उसके मेम्बर पैर फैलाकर [बायाँ स्तंभ] कहा, वह भी ठीक है। | [दायाँ स्तंभ] लेटते हैं या बैठे-बैठे झपकियाँ लेते हैं। [बायाँ स्तंभ] उसका कोई मालिक नहीं है। | [दायाँ स्तंभ] उस पार्लियामेन्ट में मेम्बर इतने जोरों से [बायाँ स्तंभ] उसका कोई एक मालिक | [दायाँ स्तंभ] चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान-परेशान हो [बायाँ स्तंभ] नहीं हो सकता, लेकिन मेरे | [दायाँ स्तंभ] जाते हैं। उसके एक महान लेखक ने उसे [बायाँ स्तंभ] कहने का मतलब इतना ही | [दायाँ स्तंभ] ‘दुनिया की बातूनी’ जैसा नाम दिया है। [बायाँ स्तंभ] नहीं है। जब कोई उसका | [दायाँ स्तंभ] मेम्बर जिस पक्ष के हों उस पक्ष के लिए [बायाँ स्तंभ] मालिक बनता है, जैसे | [दायाँ स्तंभ] अपना मत वे बगैर सोचे-विचारे देते हैं, देने [बायाँ स्तंभ] प्रधानमंत्री, तब भी उसकी | [दायाँ स्तंभ] को बंधे हुए हैं। अगर कोई मेम्बर इसमें [बायाँ स्तंभ] चाल एक सरीखी नहीं | [दायाँ स्तंभ] अपवाद रूप निकल आये, तो उसकी [बायाँ स्तंभ] रहती। जैसे बुरे हाल बेसवा | [दायाँ स्तंभ] कम्बख्ती ही समझिये। [बायाँ स्तंभ] के होते हैं, वैसे ही सदा | [दायाँ स्तंभ] जितना समय और पैसा पार्लियामेन्ट खर्च [बायाँ स्तंभ] पार्लियामेन्ट के होते हैं। | [दायाँ स्तंभ] करती है उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाए। ब्रिटिश पार्लियामेन्ट महज़ प्रजा का खिलौना है और वह खिलौना प्रजा को भारी खर्च में डालता है। ये विचार मेरे खुद के हैं ऐसा आप न मानें। बड़े विचारशील अंग्रेज़ ऐसा विचार रखते हैं। एक मेम्बर ने तो यहाँ तक कहा है कि पार्लियामेन्ट धर्मिष्ठ आदमी के लायक नहीं रही। दूसरे मेम्बर ने तो कहा है कि पार्लियामेन्ट एक ‘बच्चा’ है। बच्चों को कभी आपने हमेशा बच्चा ही रहते देखा है? आज सात सौ बरस के बाद भी अगर पार्लियामेन्ट बच्चा ही हो, तो वह बड़ी कब होगी? पाठक : आपने मुझे सोच में डाल दिया। यह सब मुझे तुरन्त मान लेना चाहिए, ऐसा तो आप नहीं कहेंगे। आप बिल्कुल निराले विचार मेरे मन में 36
हिन्द स्वराज्य पैदा कर रहे हैं। मुझे उन्हें हज़्म करना होगा। अच्छा, अब ‘बेसवा’ शब्द की विवेचना कीजिए। संपादक : मेरे विचारों को आप तुरन्त नहीं मान सकते, यह बात ठीक है। उसके बारे में आपको जो साहित्य पढ़ना चाहिए वह आप पढ़ेंगे तो आपको कुछ ख़्याल आयेगा। पार्लियामेन्ट को मैंने बेसवा कहा, वह भी ठीक है। उसका कोई मालिक नहीं है। उसका कोई एक मालिक नहीं हो सकता, लेकिन मेरे कहने का मतलब इतना ही नहीं है। जब कोई उसका मालिक बनता है, जैसे प्रधानमंत्री, तब भी उसकी चाल एक सरीखी नहीं रहती। जैसे बुरे हाल बेसवा के होते हैं, वैसे ही सदा पार्लियामेन्ट के होते हैं। प्रधानमंत्री को पार्लियामेन्ट की थोड़ी ही परवाह रहती है। वह तो अपनी सत्ता के मद में मस्त रहता है। अपना दल कैसे जीते इसी की लगन उसे रहती है। पार्लियामेन्ट सही काम कैसे करे? इसका वह बहुत कम विचार करता है। अपने दल को बलवान बनाने के लिए प्रधानमंत्री पार्लियामेन्ट से कैसे-कैसे काम करवाता है, इसकी मिसालें जितनी चाहिए उतनी मिल सकती हैं। यह सब सोचने लायक है। मुझे प्रधानमंत्रियों से द्वेष नहीं है, लेकिन तजुरबे से मैंने देखा है कि वे सच्चे देशाभिमानी नहीं कहे जा सकते। जिसे हम घूस कहते हैं, वह घूस वे खुल्लमखुल्ला नहीं लेते-देते, इसलिए भले ही वे ईमानदार कहे जाएँ, लेकिन उनके पास वसीला काम कर सकता है। वे दूसरों से काम निकालने के लिए उपाधि वगैरह की घूस बहुत देते हैं। पाठक : तब तो आज तक जिन्हें हम देशाभिमानी और ईमानदार समझते आए हैं, उन पर भी आप टूट पड़ते हैं। संपादक : हाँ, यह सच है। मुझे प्रधानमंत्रियों से द्वेष नहीं है, लेकिन तजुरबे से मैंने देखा है कि वे सच्चे देशाभिमानी नहीं कहे जा सकते। जिसे हम घूस कहते हैं, वह घूस वे खुल्लमखुल्ला नहीं लेते-देते, इसलिए भले ही वे ईमानदार कहे जाएँ, लेकिन उनके पास वसीला काम कर सकता है। वे दूसरों से काम निकालने के लिए उपाधि वगैरह की घूस बहुत देते हैं। मैं हिम्मत के साथ कह सकता हूँ कि उनमें शुद्ध भावना और सच्ची ईमानदारी नहीं होती। 37
हिन्द स्वराज पाठक : जब आपके ऐसे ख़्याल हैं तो जिन अंग्रेजों के नाम से पार्लियामेन्ट राज करती है उनके बारे में अब कुछ कहिये, ताकि उनके स्वराज्य का पूरा ख़्याल मुझे आ जाए। संपादक : जो अंग्रेज 'वोटर' हैं, उनकी धर्म पुस्तक (बाइबल) तो है अखबार। वे अखबारों से अपने विचार बनाते हैं। अखबार अप्रामाणिक होते हैं, एक ही बात को दो शक्लें देते हैं। एक दल वाले उसी बात को बड़ी बनाकर दिखलाते हैं, तो दूसरे दल वाले उसी को छोटी कर डालते हैं। एक अखबार वाला किसी अंग्रेज नेता को प्रामाणिक मानेगा, तो दूसरा अखबार वाला उसको अप्रामाणिक मानेगा। जिस देश में ऐसे अखबार हैं उस देश के आदमियों की कैसी दुर्दशा होगी? पाठक : यह तो आप ही बताइये। संपादक : उन लोगों के विचार घड़ी-घड़ी में बदलते हैं। उन लोगों में यह कहावत है कि सात-सात बरस में रंग बदलता है। घड़ी के लोलक की तरह वे इधर-उधर घूमा करते हैं। जमकर वे बैठ ही नहीं सकते। कोई दौर-दमाम वाला आदमी हो और उसने अगर बड़ी-बड़ी बातें कर दीं या दावतें दे दीं, तो वे नक्कारची की तरह उसी के ढोल पीटने लग जाते हैं। ऐसे लोगों की पार्लियामेन्ट भी ऐसी ही होती है, उनमें एक बात ज़रूर है। वह यह कि वे अपने देश को खोयेंगे नहीं। अगर किसी ने उस पर बुरी नजर डाली तो वे उसकी मिट्टी पलीद कर देंगे, लेकिन इससे उस प्रजा में सब गुण आ गये या उस प्रजा की नक़ल की जाए, ऐसा नहीं कह सकते। अगर हिन्दुस्तान अंग्रेज प्रजा की नक़ल करे तो हिन्दुस्तान पामाल हो जाए, ऐसा मेरा पक्का ख़्याल है। पाठक : अंग्रेज प्रजा ऐसी हो गई है, इसके आप क्या कारण मानते हैं? संपादक : इसमें अंग्रेजों का कोई ख़ास कुसूर नहीं है, पर यूरोप की आजकल की सभ्यता का कुसूर है। वह सभ्यता नुकसानदेह है और उससे यूरोप की प्रजा पामाल होती जा रही है। 38
आज तक आम लोग, लाखों की संख्या में हमारे जीवन का पोषण करने के लिए मरते आए हैं, अब उनके जीवन का पोषण करने के लिए हमें मरना होगा। बेशक, उनके मरने में और हमारे मरने में बुनियादी फ़र्क़ होगा। वे बिन-जाने और अनिच्छापूर्वक मरे हैं। उनके इस विवश बलिदान ने हमें गिराया है। अब यदि हम ज्ञानपूर्वक और इच्छापूर्वक मरेंगे तो हमारा बलिदान हमें और हमारे समूचे राष्ट्र को ऊपर उठायेगा। यदि हम एक आज़ाद और स्वावलम्बी देश की तरह जीना चाहते हैं, तो इस आवश्यक बलिदान से हमें अपना क़दम पीछे नहीं हटाना चाहिए। 39
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सभ्यता का दर्शन पाठक : अब तो आपको सभ्यता की भी बात करनी होगी। आपके हिसाब से तो यह सभ्यता बिगाड़ करने वाली है। संपादक : मेरे हिसाब से ही नहीं, बल्कि अंग्रेज लेखकों के हिसाब से भी यह सभ्यता बिगाड़ करने वाली है। उसके बारे में बहुत किताबें लिखी गई हैं। वहाँ इस सभ्यता के खिलाफ़ मंडल भी क़ायम हो रहे हैं। एक लेखक ने 'सभ्यता उसके कारण हिन्द स्वराज्य की और उसकी दवा' नाम की किताब लिखी है। उसमें सच्ची खुमारी उसी उसने यह साबित किया है कि यह सभ्यता एक तरह को हो सकती है, जो का रोग है। आत्मबल अनुभव करके शरीर बल से पाठक : यह सब हम क्यों नहीं जानते ? नहीं दबेगा और निडर रहेगा तथा सपने में संपादक : इसका कारण तो साफ है। कोई भी आदमी भी तोप बल का अपने खिलाफ़ जाने वाली बात करे ऐसा शायद ही उपयोग करने की होता है। आज की सभ्यता के मोह में फँसे हुए लोग बात नहीं सोचेगा। उसके खिलाफ़ नहीं लिखेंगे, उल्टे उसको सहारा मिले ऐसी ही बातें और दलीलें ढूँढ निकालेंगे। यह वे जान- बूझकर करते हैं ऐसा भी नहीं है। वे जो लिखते हैं उसे खुद सच मानते हैं। नींद में आदमी जो सपना देखता है, उसे वह सही मानता है। जब उसकी नींद खुलती है तभी उसे अपनी गलती मालूम होती है। ऐसी ही दशा सभ्यता के मोह में फँसे हुए आदमी की होती है। हम जो बातें पढ़ते हैं वे सभ्यता की हिमायत करने वालों की लिखी बातें होती हैं। उनमें बहुत होशियार और भले आदमी हैं। उनके लेखों से हम चौंधिया जाते हैं। यों एक के बाद दूसरा आदमी उसमें फँसता जाता है। पाठक : यह बात आपने ठीक कही। अब आपने जो कुछ पढ़ा और सोचा है, उसका ख़्याल मुझे दीजिए। संपादक : पहले तो हम यह सोचें कि सभ्यता किस हालत का नाम है। इस सभ्यता की सही पहचान तो यह है कि लोग बाहरी दुनिया की खोजों में और 41
हिन्द स्वराज्य शरीर के सुख में धन्यता, सार्थकता और पुरुषार्थ मानते हैं। इसकी कुछ मिसालें लें। सौ साल पहले यूरोप के लोग जैसे घरों में रहते थे उनसे ज्यादा अच्छे घरों में आज वे रहते हैं, यह सभ्यता की निशानी मानी जाती है। इसमें शरीर के सुख की बात है। इसके पहले लोग चमड़े के कपड़े पहनते थे और भालों का इस्तेमाल करते थे। अब वे लंबे पतलून पहनते हैं और शरीर को सजाने के लिए तरह-तरह के कपड़े बनवाते हैं और भाले के बदले एक के बाद एक पाँच गोलियाँ छोड़ सके ऐसी चक्कर वाली बन्दूक इस्तेमाल करते
सभ्यता के हिमायती साफ कहते हैं कि उनका काम लोगों को धर्म सिखाने का नहीं है। धर्म तो ढोंग है, ऐसा कुछ लोग मानते हैं और कुछ लोग धर्म का दंभ भरते हैं, नीति की बातें भी करते हैं। फिर भी मैं आपसे बीस बरस के अनुभव के बाद कहता हूँ कि नीति के नाम से अनीति सिखलाई जाती है।
हैं। यह सभ्यता की निशानी है। किसी मुल्क के लोग, जो जूते वगैरह नहीं पहनते हों, जब यूरोप के कपड़े पहनना सीखते हैं तो जंगली हालत में से सभ्य हालत में आए हुए माने जाते हैं। पहले यूरोप में लोग मामूली हल की मदद से अपने लिए जात-मेहनत करके ज़मीन जोतते थे। उसकी जगह आज भाप के यंत्रों से हल चलाकर एक आदमी बहुत सारी ज़मीन जोत सकता है और बहुत सा पैसा जमा कर सकता है। यह सभ्यता की निशानी मानी जाती है। पहले लोग कुछ ही किताबें लिखते थे और वे अनमोल मानी जाती थीं। आज हर कोई चाहे जो लिखता, छपवाता और लोगों के मन को भरमाता है। यह सभ्यता की निशानी है। पहले लोग बैलगाड़ी से रोज बारह कोस की मंजिल तय करते थे। आज रेलगाड़ी से चार सौ कोस की मंजिल मारते हैं। यह तो सभ्यता की चोटी मानी गई है। यह सभ्यता जैसे-जैसे आगे बढ़ती जाती है वैसे-वैसे यह सोचा जाता है कि लोग हवाई जहाज़ से सफ़र करेंगे और थोड़े ही घंटों में दुनिया के किसी भी भाग में जा पहुँचेंगे। लोगों को हाथ-पैर हिलाने की ज़रूरत नहीं रहेगी। एक बटन दबाया कि आदमी के सामने पहनने की पोशाक हाज़िर हो जाएगी, दूसरा बटन दबाया कि उसे अखबार मिल जाएँगे, तीसरा दबाया कि उसके लिए गाड़ी तैयार हो जाएगी, हमेशा नये भोजन मिलेंगे, हाथ-पैर का काम ही नहीं पड़ेगा, सारा काम कल (यंत्र) से ही किया जाएगा। पहले जब लोग लड़ना चाहते थे तो एक-दूसरे 42
हिन्द स्वराज का शरीर बल आज़माते थे। आज तो तोप के एक गोले से हजारों जानें ली जा सकती हैं। यह सभ्यता की निशानी है। पहले लोग खुली हवा में अपने को ठीक लगे उतना काम स्वतन्त्रता से करते थे। अब हजारों आदमी अपने गुज़रे के लिए इकट्ठा होकर बड़े कारखानों में या खानों में काम करते हैं। उनकी हालत जानवर से भी बदतर हो गई है। उन्हें सीसे वगैरह के कारखानों में जान को जोखिम में डालकर काम करना पड़ता है। इसका लाभ पैसेदार लोगों को मिलता है। पहले लोगों को मार- पीट कर गुलाम बनाया जाता था, आज लोगों को पैसे का और भोग का लालच देकर गुलाम पैगम्बर मोहम्मद साहब की बनाया जाता है। पहले जैसे रोग नहीं थे वैसे रोग सीख के मुताबिक यह आज लोगों में पैदा हो गये हैं और उसके साथ शैतानी सभ्यता है। हिन्दू धर्म डॉक्टर खोज करने लगे हैं कि ये रोग कैसे इसे निरा 'कलजुग' कहता मिटाए जाएँ। ऐसा करने से अस्पताल बढ़े हैं। है। मैं आपके सामने इस यह सभ्यता की निशानी मानी जाती है। पहले सभ्यता का हूबहू चित्र नहीं लोग पत्र लिखते थे तब खास क़ासिद उसे ले खींच सकता। यह मेरी जाता था और उसके लिए काफी खर्च लगता शक्ति के बाहर है, लेकिन था। आज मुझे किसी को गालियाँ देने के लिए आप समझ सकेंगे कि इस पत्र लिखना हो, तो एक पैसे में मैं गालियाँ दे सभ्यता के कारण अंग्रेज सकता हूँ, किसी को मुझे मुबारकबाद देना हो प्रजा में सड़न ने घर कर तो भी मैं उसी दाम में पत्र भेज सकता हूँ, यह लिया है। यह सभ्यता दूसरों सभ्यता की निशानी है। पहले लोग दो या तीन का नाश करने वाली और बार खाते थे और वह भी खुद हाथ से पकाई खुद नाशवान है। हुई रोटी और थोड़ी तरकारी। अब तो हर दो घंटे पर खाना चाहिए और वह यहाँ तक कि लोगों को खाने से फुरसत ही नहीं मिलती और कितना कहूँ? यह सब आप किसी भी पुस्तक में पढ़ सकते हैं। ये सब सभ्यता की सच्ची निशानियाँ मानी जाती हैं और अगर कोई भी इससे भिन्न बात समझाए, तो वह भोला है ऐसा निश्चय ही मानिये। सभ्यता तो मैंने जो बतायी वही मानी जाती है। उसमें नीति या धर्म की बात ही नहीं है। सभ्यता के हिमायती साफ कहते हैं कि उनका काम लोगों को धर्म सिखाने का नहीं है। धर्म तो ढोंग है, ऐसा कुछ लोग मानते हैं और कुछ लोग धर्म का दंभ भरते हैं, नीति की बातें भी करते हैं। फिर भी मैं आपसे बीस बरस के 43
हिन्द स्वराज
अनुभव के बाद कहता हूँ कि नीति के नाम से अनीति सिखलाई जाती है। ऊपर की बातों में नीति हो ही नहीं सकती, यह कोई बच्चा भी समझ सकता है। शरीर का सुख कैसे मिले, यही आज की सभ्यता ढूँढ़ती है और यही देने की वह कोशिश करती है, परंतु वह सुख भी नहीं मिल पाता। यह सभ्यता तो अधर्म है और यह यूरोप में इतने दरजे तक फैल गयी है कि वहाँ के लोग आधे पागल जैसे देखने में आते हैं। उनमें सच्ची कुव्वत नहीं है, वे नशा करके अपनी ताक़त क़ायम रखते हैं। एकान्त में वे बैठ ही नहीं सकते। जो स्त्रियां घर की रानियाँ होनी चाहिए, उन्हें गलियों में भटकना पड़ता है, या कोई मज़दूरी करनी पड़ती है। इंग्लैंड में ही चालीस लाख गरीब औरतों को पेट के लिए सख्त मज़दूरी करनी पड़ती है और आजकल इसके कारण 'सफ्रीजेट' (महिला मताधिकार) का आन्दोलन चल रहा है। यह सभ्यता ऐसी है कि अगर हम धीरज धरकर बैठे रहेंगे, तो सभ्यता की चपेट में आए हुए लोग खुद की जलायी हुई आग में जल मरेंगे। पैगम्बर मोहम्मद साहब की सीख के मुताबिक यह शैतानी सभ्यता है। हिन्दू धर्म इसे निरा 'कलजुग' कहता है। मैं आपके सामने इस सभ्यता का हूबहू चित्र नहीं खींच सकता। यह मेरी शक्ति के बाहर है, लेकिन आप समझ सकेंगे कि इस सभ्यता के कारण अंग्रेज प्रजा में सड़न ने घर कर लिया है। यह सभ्यता दूसरों का नाश करने वाली और खुद नाशवान है। इससे दूर रहना चाहिए और इसीलिये ब्रिटिश और दूसरी पार्लियामेन्ट बेकार हो गई हैं। ब्रिटिश पार्लियामेन्ट अंग्रेज प्रजा की गुलामी की निशानी है, यह पक्की बात है। आप पढ़ेंगे और सोचेंगे तो आपको भी ऐसा ही लगेगा। इसमें आप अंग्रेजों का दोष न निकालें। उन पर तो हमें दया आनी चाहिए। वे काबिल प्रजा हैं इसलिए किसी दिन उस जाल से निकल जाएँगे ऐसा मैं मानता हूँ। वे साहसी और मेहनती हैं। मूल में उनके विचार अनीति भरे नहीं हैं, इसलिए उनके बारे में मेरे मन में उत्तम ख्याल ही हैं। उनका दिल बुरा नहीं है। यह सभ्यता उनके लिए कोई अमिट रोग नहीं है, लेकिन अभी वे उस रोग में फँसे हुए हैं, यह तो हमें भूलना ही नहीं चाहिए।
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अध्याय ६-१०: सभ्यता की कसौटी, भारत की दुर्दशा व हिन्दू-मुस्लिम एकता
यह जगत का निजी अनुभव है कि आधा छटांक भर आचरण का जितना फल होता है उतना मन भर भाषणों अथवा लेखों का नहीं होता। 45