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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

१३८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १३७- दमनको ब्रूते—'देव ! दुर्जनो नार्जवं याति सेव्यमानोऽपि नित्यशः । स्वेदनाभ्यञ्जनोपायैः श्वपुच्छमिव नामितम् ॥ १३७ ॥ दमनक बोला-'महाराज ! जैसे मली गई और तैल आदि लगानेसे सीधी करी गई कुत्तेकी पूंछ सीधी नहीं होती है वैसेही दुर्जन नित्य आदर करनेसेभी सीधा नहीं होता है ॥ १३७ ॥ अपरं च,— स्वेदितो मर्दितश्चैव रज्जुभिः परिवेष्टितः । मुक्तो द्वादशभिर्वर्षैः श्वपुच्छः प्रकृतिं गतः ॥ १३८ ॥ और दूसरे—तपाई गई, मली गई, डोरीसे लपेटी गई और बारह बरसके बाद खोली गई कुत्तेकी पूंछ टेढ़ीही रहती है ॥ १३८ ॥ अन्यच्च,— वर्धनं वाथ सन्मानं खलानां प्रीतये कुतः ? । फलन्त्यमृतसेकेऽपि न पथ्यानि विषद्रुमाः ॥ १३९ ॥ ( और धन आदि दे कर ) बढ़ाना अथवा सन्मान करना दुष्टोंकी प्रसन्नताके लिये कहां हो सकता है ? अर्थात् उपकार करने पर भी वे बुराईही करेंगे ! जैसे विषके वृक्ष अमृतसे सीचनेसेभी मीठे फल नहीं देते हैं ॥ १३९ ॥ अतोऽहं ब्रवीमि— अपृष्टोऽपि हितं ब्रूयाद्यस्य नेच्छेत्पराभवम् । एष एव सतां धर्मो विपरीतमतोऽन्यथा ॥ १४० ॥ इस लिये मैं कहता हूं कि-जिसके पराजयकी इच्छा न करे उसके बिना पूछेभी हितकारक वचन कहना चाहिये, क्योंकि यही सज्जनोंका धर्म है और इसके विपरीत अधर्म है ॥ १४० ॥ तथा चोक्तम्,— स स्निग्धोऽकुशलान्निवारयति यस्तत्कर्म यन्निर्मलं सा स्त्री याऽनुविधायिनी स मतिमान् यः सद्द्भिरभ्यर्च्यते । सा श्रीर्या न मदं करोति स सुखी यस्तृष्णया मुच्यते तन्मित्रं यदकृत्रिमं स पुरुषो यः खिद्यते नेन्द्रियैः ॥ १४१ ॥

-१४४ ] गुण-दोषको जानकरही दंड देना १३९ जैसा कहा है कि-जो विपत्तिसे बचाता है वही स्नेही है, जो निर्मल अर्थात् दोषरहित है वही कर्म है, जो (पतिकी) आज्ञामें चले वही स्त्री है, जिसका सज्जन आदर करे वही बुद्धिमान् है, जो अहंकारको उत्पन्न न करे वही संपत्ति है, जो तृष्णाके रहित है वही सुखी है, जो निष्कपट है वही मित्र है और जो इन्द्रियोंके वशमें नहीं है वही पुरुष है ॥ १४१ ॥ यदि संजीवकव्यसनार्दितो विज्ञापितोऽपि स्वामी न निवर्तते तदीदृशि भृत्ये न दोषः । और जो संजीवकके स्नेहमें फँसे हुए स्वामी जताने पर भी न मानें तो मुझसे सेवक पर दोष नहीं है ॥ तथा च,— नृपः कामासक्तो गणयति न कार्यं न च हितं यथेष्टं स्वच्छन्दः प्रविचरति मत्तो गज इव । ततो मानध्मातः स पतति यदा शोकगहने तदा भृत्ये दोषान्क्षिपति न निजं वेत्त्यविनयम्' ॥ १४२ ॥ और भी कहा है कि-भोगमें आसक्त राजा कार्यको और हितकारी वचनको नहीं गिनता है और मत वाले हाथीकी तरह अपनी इच्छानुसार जो अच्छा लगता है सो करता है; और फिर घमंडके मारे जब शोकमें अर्थात् भारी आपत्तिमें गिरता है तब सेवक पर दोष पटकता है और अपने बुरे आचरणको नहीं जानता है ॥ १४२ ॥ पिङ्गलकः ( स्वगतम् ),— 'न परस्यापराधेन परेषां दण्डमाचरेत् । आत्मनावगतं कृत्वा बध्नीयात्पूजयेच्च वा ॥ १४३ ॥ पिंगलक ( अपने मनमें सोचने लगा ) कि, 'किसीके बहकानेसे दूसरोंको दंड न देना चाहिये परन्तु अपने आप जान कर उसे मारे या सन्मान करे ॥१४३॥ तथा चोक्तम्,— गुणदोषावनिश्चित्य विधिर्न ग्रहनिग्रहे । स्वनाशाय यथा न्यस्तो दर्पात्सर्पमुखे करः’ ॥ १४४ ॥ जैसा कहा है कि-घमंडसे अपने नाशके लिये सर्पके मुखमें उंगली देनेके समान गुण और दोषको बिना निश्चय करे आदर करनेकी अथवा दंड देनेकी रीति नहीं है' ॥ १४४ ॥

१४० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १४५- प्रकाशं ब्रूते—'तदा संजीवकः किं प्रत्यादिश्यताम् ?'। दमनकः ससंभ्रममाह—'देव ! मा मैवम् । एतावता मन्त्रभेदो जायते । ( प्रकट बोला ) तो संजीवकको क्या उपदेश करना चाहिये ?' दमनकने घबरा कर कहा-'महाराज ! ऐसा नहीं; इससे गुप्त बात खुल जाती है ॥ तथा ह्युक्तम्,— मन्त्रबीजमिदं गुप्तं रक्षणीयं यथा तथा । मनागपि न भिद्येत तद्भिन्नं न प्ररोहति ॥ १४५ ॥ औरभी कहा है—इस गुप्त मंत्ररूपी बीजकी जिस किसी प्रकारसे रक्षा करे और थोड़ाभी न फूटने दे, क्योंकि वह फूटा हुआ नहीं उगता है, अर्थात् रहस्यको गुप्त रक्खे; क्योंकि वह खोलनेसे सफल ( कार्य-साधक ) नहीं होता है ॥१४५॥ किंच,— आदेयस्य प्रदेयस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः । क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम् ॥ १४६ ॥ और लेना देना और करनेका काम ये शीघ्र नहीं किये जायँ तो इनका रस समय पी लेता है, अर्थात् समय पर चूक जानेसे काम बिगाड़ जाता है ॥१४६॥ तदवश्यं समारब्धं महता प्रयत्नेन संपादनीयम् । इसलिये अवश्य आरंभ किये हुए कामको बड़े यत्नसे सिद्ध करना चाहिये. किंच,— मन्त्रो योध इवाधीरः सर्वाङ्गैः संवृतैरपि । चिरं न सहते स्थातुं परेभ्यो भेदशङ्कया ॥ १४७ ॥ क्योंकि,—जैसे कवच आदिसे ढंके हुए अंग वाला भी डरपोक योद्धा पराजयके भयसे युद्धमें बहुत देर तक नहीं ठहर सकता है वैसेही उपाय आदि सब अंगोंसे गुप्त विचार भी दूसरे शत्रुओंके भेदकी शंकासे बहुत काल तक गुप्त नहीं रहता है, अर्थात् प्रकट हो जाता है, और रहस्यके खुल जाने पर कार्यहानि होती है ॥ १४७ ॥ यद्यसौ दृष्टदोषोऽपि दोषान्निवर्त्य संधातव्यस्तदतीवानुचितम् । जो इसका दोष देख लेने पर भी दोषको दूर कर फिर मेल करना तो औरभी अनुचित है;

-१४९ ] टिटहरीका जोडा और घमंडी समुद्रकी कहानी १४१

-१४९ ] टिटहरीका जोडा और घमंडी समुद्रकी कहानी १४१ यतः,— सकृद्दुष्टं तु यो मित्रं पुनः संधातुमिच्छति । स मृत्युमेव गृह्णाति गर्भमश्वतरी यथा' ॥ १४८ ॥ क्योंकि,—जो मनुष्य एक बार दुष्टपना किये हुए मित्रके साथ फिर मेल करना चाहता है वह मृत्युको ऐसे बुलाता है जैसे अश्वतरी गर्भको' ॥ १४८ ॥ सिंहो ब्रूते—'ज्ञायतां तावत्किमस्माकमसौ कर्तुं समर्थः ?' दमनक आह—'देव ! सिंह बोला-‘पहले यह तो समझलो कि वह हमारा क्या कर सकता है ?’ दमनकने कहा-‘महाराज ! अङ्गाङ्गिभावमज्ञात्वा कथं सामर्थ्यनिर्णयः ? । पश्य टिट्टिभमात्रेण समुद्रो व्याकुलीकृतः' ॥ १४९ ॥ शरीरको और शरीरधारीके कामको विना जाने कैसे सामर्थ्यका निर्णय हो सकता है ? देखो, केवल एक टिटहरीने समुद्रको व्याकुल कर दिया' ॥ १४९ ॥ सिंहः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । दमनकः कथयति— सिंह पूछने लगा-‘यह कथा कैसे है ?’ दमनक कहने लगा ।— कथा १० [ टिटहरीका जोडा और समुद्रकी कहानी १० ] 'दक्षिणसमुद्रतीरे टिट्टिभदंपती निवसतः । तत्र चासन्नप्रसवा टिट्टिभी भर्तारमाह—'नाथ ! प्रसवयोग्यस्थानं निभृतमनुसंधीय- ताम् ।' टिट्टिभोऽवदत्—भार्ये ! नन्विदमेव स्थानं प्रसूतियोग्यम् ।' सा ब्रूते—‘समुद्रवेलया व्याप्यते स्थानमेतत् ।' टिट्टिभोऽवदत्— ‘किमंहं निर्बलः समुद्रेण निग्रहीतव्यः ?' । टिट्टिभी विहस्याह— ‘स्वामिन् ! त्वया समुद्रेण च महदन्तरम् । ‘दक्षिण समुद्रके तीर पर टिटहरीका जोड़ा रहता था । और वहाँ पूरे गर्भ वाली टिटहरीने अपने पतिसे कहा-‘स्वामी ! प्रसवके अर्थात् अंडे धरनेके योग्य एकांत स्थान ढूंढ़ना चाहिये ।' टिटहरा बोला—‘प्रिये ! सचमुच यही स्थान अंडे धरनेके लिये अच्छा है ।' वह कहने लगी-‘इस स्थानमें समुद्रकी तरंग १ अश्वतरी एक प्रकारकी खच्चर गधी होती है. उसका बच्चा पेट फाड़ कर निकलता है और वह मर जाती है.

१४२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १५०- चढ़ आती है।' टिटहरेने उत्तर दिया-‘क्या मैं समुद्रसे बलमें कमती हूँ सो वह मुझे दुःख देगा ?' टिटहरी हँस कर बोली-‘स्वामी ! तुममें और समुद्रमें बड़ा अन्तर है; अथवा,- पराभवं परिच्छेत्तुं योग्यायोग्यं च वेत्ति यः । अस्तीह यस्य विज्ञानं कृच्छ्रेणापि न सीदति ॥ १५० ॥ अथवा,-इस संसारमें पराभवको निर्णय करनेके लिये जो योग्य और अयोग्य जानता है और जिसको अपने बलाबलका पूर्ण ज्ञान है वह विपत्तिमेंभी दुःख नहीं भोगता है ॥ १५० ॥ अपि च,- अनुचितकार्यारम्भः स्वजनविरोधो बलीयसि स्पर्धा । प्रमदाजनविश्वासो मृत्योर्द्वाराणि चत्वारि' ॥ १५१ ॥ और दूसरे-अनुचित कामका आरंभ, अपने इष्ट मित्रोंसे विरोध, बलवान्से बराबरी की इच्छा, और स्त्रियों पर विश्वास ये चार मृत्युके द्वार ( मार्ग ) हैं' ॥ १५१ ॥ ततः कृच्छ्रेण स्वामिवचनात्सा तत्रैव प्रसूता । एतत्सर्वं श्रुत्वा समुद्रेणापि तच्छक्तिज्ञानार्थं तदण्डान्यपहृतानि । ततष्टिट्टिभी शोकार्ता भर्तारमाह—'नाथ ! कष्टमापतितम् । तान्यण्डानि मे नष्टानि ।' टिट्टिभोऽवदत्—'प्रिये ! मा भैषीः ।' इत्युक्त्वा पक्षिणां मेलकं कृत्वा पक्षिखामिनो गरुडस्य समीपं गतः । तत्र गत्वा सकलवृत्तान्तं टिट्टिभेन भगवतो गरुडस्य पुरतो निवेदितम्—'देव ! समुद्रेणाहं स्वगृहावस्थितो विनापराधेनैव निगृहीतः ।' ततस्तद्वचनमाकर्ण्य गरुत्मता प्रभुर्भगवन्नारायणः सृष्टिस्थितिप्रलयहेतुर्विज्ञप्तः । स समुद्रमण्डदानायादिदेश । ततो भगवदाज्ञां मौलौ निधाय समुद्रेण तान्यण्डानि टिट्टिभाय समर्पितानि । अतोऽहं ब्रवीमि-“अङ्गाङ्गिभावमज्ञात्वा” इत्यादि' ॥ राजाह—'कथमसौ ज्ञातव्यो द्रोहबुद्धिरिति ?' । दमनको ब्रूते— 'यदासौ सदर्पः शृङ्गाग्रप्रहरणाभिमुखश्चकितमिवागच्छति तदा ज्ञास्यति स्वामी ।' एवमुक्त्वा संजीवकसमीपं गतः । तत्र गतश्च

-१५२] भगवान्की आज्ञासे समुद्रने टिटहरेको अंडे सौंपना १४३ मन्दं मन्दमुपसर्पन् विस्मितमिवात्मानमदर्शयत् । संजीवकेन सादरमुक्तम्—'भद्र ! कुशलं ते ?' । दमनको ब्रूते—'अनुजीविनां कुतः कुशलम् ? फिर कष्टसे स्वामीके कहनेसे उस टिटहरीने वहाँही अंडे धरे । यह सब सुन कर समुद्रभी उसकी सामर्थ्य टटोलनेके लिये उसके अंडे बहा ले गया. तब टिटहरी शोकसे खिन्न हो कर पतिसे कहने लगी-'हे स्वामी ! बड़ा कष्ट आ पड़ा, वे मेरे अंडे नष्ट हो गये।' टिटहरा बोला-'प्यारी ! डर मत।' ऐसा कह कर और सब पक्षियोंको साथ ले कर वह पक्षियोंके स्वामी गरुड़जीके पास गया । वहाँ जा कर टिटहरेने सब समाचार भगवान् गरुड़जीके सामने निवेदन कर दिया कि—'हे महाराज ! समुद्रने मुझ अपने घर बैठे हुएको बिना अपराधही सताया है।' तब उसकी बात सुन कर गरुड़जीने सृष्टि, स्थिति और प्रलयके कारण प्रभु भगवान् नारायणको जता दिया । उन्होंने समुद्रको अंडे देनेकी आज्ञा दे दी । तब भगवान्की आज्ञाको सिर पर रख कर समुद्रने उन अंडोंको टिटहरेको सौंप दिया। इसलिये मैं कहता हूं-"शरीर और शरीरधारीके कामको बिना जाने" इत्यादि।' राजा बोला-'यह कैसे जाना जाय कि वह द्रोह करने लगा है ?' दमनकने कहा— 'जब वह घमंडसे सींगोंकी नोंकको मारनेके लिये सामने करता हुआ निडर-सा आवे तब स्वामी आपही जान जायेंगे।' इस प्रकार कह कर संजीवकके पास गया और वहाँ जा कर धीरे धीरे पास खिसकता खिसकता अपनेको मन मलीन-सा दिखाया । संजीवकने आदरसे कहा-'मित्र ! कुशल तो है ?' दमनकने कहा-'सेवकोंको कुशल कहाँ ? यतः,— संपत्तयः पराधीनाः सदा चित्तमनिर्वृतम् । स्वजीवितेऽप्यविश्वासस्तेषां ये राजसेवकाः ॥ १५२ ॥ क्योंकि,—जो राजाके सेवक हैं उनकी संपत्तियाँ पराधीन, मन सदा दुःखी और तो क्या युद्ध इत्यादिकी शंकासे वे अपने जीनेकाभी भरोसा नहीं रखते हैं ॥ १५२ ॥ अन्यच्च,— कोऽर्थान्प्राप्य न गर्वितो विषयिणः, कस्यापदोऽस्तं गताः ? स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः, को वाऽस्ति राज्ञां प्रियः ? ।

१४४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १५३- कः कालस्य भुजान्तरं न च गतः, कोऽर्थी गतो गौरवं ? को वा दुर्जनवागुरासु पतितः क्षेमेण यातः पुमान् ? ॥ १५३ ॥ और दूसरे— कौनसा मनुष्य धनको पा कर अहंकारी नहीं होता है ? किस कामीको आपत्तियाँ नहीं घेरती हैं ? स्त्रियोंने किसका मन नहीं डिगाया ? राजाओंका कौन प्यारा है ? कौनसा मनुष्य कालकी भुजाओंके बीचमें नहीं गया ? कौनसे याचकका सन्मान हुआ है ? और कौनसा पुरुष दुर्जनोंके कपटमें पड़ कर सकुशल आया है ? ॥ १५३ ॥ संजीवकनेोक्तम्—'सखे ! ब्रूहि किमेतत् ?'। दमनक आह-'किं ब्रवीमि मन्दभाग्यः ? संजीवकने कहा—'मित्र ! कहो तो यह क्या बात है ?' दमनकने कहा— 'मैं मंदभागी क्या कहूँ ? पश्य,— मज्जन्नपि पयोराशौ लब्ध्वा सर्पावलम्बनम् । न मुञ्चति न चादत्ते तथा मुग्धोऽस्मि संप्रति ॥ १५४ ॥ देखो,—जैसे समुद्रमें डूबता हुआ भी मनुष्य सर्पका सहारा पा कर न तो छोड़ सकता है न पकड़ सकता है वैसाही इस समय मैं मूढ़ हूँ, याने कुछ समझ नहीं सकता हूँ कि क्या करूँ ॥ १५४ ॥ यतः,— एकत्र राजविश्वासो नश्यत्यन्यत्र बान्धवः । किं करोमि क्व गच्छामि पतितो दुःखसागरे' ॥ १५५ ॥ क्योंकि एक तरफ राजाका विश्वास और दूसरी तरफ बान्धवका विनाश होना क्या करूँ, कहाँ जाऊँ ? इस दुःखसागरमें पड़ा हूँ ॥ १५५ ॥ इत्युक्त्वा दीर्घं निःश्वस्योपविष्टः । संजीवको ब्रूते-'मित्र ! तथापि सविस्तरं मनोगतमुच्यताम् ।' दमनकः सुनिभृतमाह— 'यद्यपि राजविश्वासो न कथनीयस्तथापि भवानस्मदीय- प्रत्ययादागतः । मया परलोकार्थिनावश्यं तव हितमाख्येयम् । शृणु । अयं स्वामी तवोपरि विकृतबुद्धी रहस्युक्तवान्—'संजीव- कमेव हत्वा स्वपरिवारं तर्पयामि ।' एतच्छ्रुत्वा संजीवकः परं विषादमगमत् । दमनकः पुनराह—'अलं विषादेन । प्राप्तकाल-

-१५८] कृपण, राजा, मेघ और स्त्रीका स्वभाववर्णन १४५ कार्यमनुष्ठीयताम् ।' संजीवकः क्षणं विमृश्याह स्वगतम्— 'सुष्ठु खल्विदमुच्यते । किं वा दुर्जनचेष्टितं न वेत्येतद्व्यवहारा- न्निर्णैतुं न शक्यते । यह कह कर लंबी साँस भर कर बैठ गया । तब संजीवकने कहा-‘मित्र ! तोभी सब विस्तारपूर्वक मनकी बात कहो । दमनकने बहुत छिपाते २ कहा-‘यद्यपि राजाका गुप्त विचार नहीं कहना चाहिये तोभी तुम मेरे भरोसेसे आये हो ।-अत एव मुझे परलोककी अभिलाषाके डरसे अवश्य तुम्हारे हितकी बात कहनी चाहिये । सुनो, तुम्हारे ऊपर क्रोधित इस स्वामीने एकांतमें कहा है कि संजीवकको मार कर अपने परिवारको दूँगा ।’ यह सुनतेही संजीवकको बड़ा विषाद हुआ । फिर दमनक बोला-‘विषाद मत करो, अवसरके अनुसार काम करो.’ संजीवक छिन भर चित्तमें विचार कर कहने लगा-‘निश्चय यह ठीक कहता है; अथवा दुर्जनका यह काम है अथवा नहीं है, यह व्यवहारसे निर्णय नहीं हो सकता है. यतः,— दुर्जनगम्या नार्यः प्रायेणापात्रभृद्भवति राजा । कृपणानुसारि च धनं देवो गिरिजलधिवर्षी च ॥ १५६ ॥ क्योंकि—स्त्रियाँ दुर्जनोंके पास जाती हैं, बहुधा राजा कुपात्रोंका पालन करता है, धन कृपणके पास जाता है और इन्द्र पहाड़ और समुद्रमें बरसाता है ॥१५६॥ कश्चिदाश्रयसौन्दर्याद्धत्ते शोभामसज्जनः । प्रमदालोचनन्यस्तं मलीमसमिवाञ्जनम् ॥ १५७ ॥ कोई २ दुर्जन ( अपना ) आश्रयकी सुन्दरतासे, सुन्दर स्त्रियोंके नेत्रोंमें आँजा हुआ मैला काजलके समान, शोभा पाता है ॥ १५७ ॥ तत्र विचिन्त्योक्तम्—‘कष्टं किमिदमापतितम् ? । उसने विचार कर कहा-‘यह क्या कष्ट आ पड़ा ? । यतः,— आराध्यमानो नृपतिः प्रयत्ना- न्न तोषमायाति किमत्र चित्रम् ? । अयं त्वपूर्वप्रतिमाविशेषो यः सेव्यमानो रिपुतामुपैति ॥ १५८ ॥ हि० १०

१४६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १५९- क्योंकि—राजा बड़े यत्नसे सेवा करने पर भी प्रसन्न नहीं होता है इसमें क्या आश्चर्य है ? क्योंकि यह एक अनोखीही देवताकी मूर्ति है जो सेवा करने पर भी शत्रुता करती है ॥ १५८ ॥ तदयमशक्यार्थः प्रमेयः । इस लिये इस बातका कुछ भेद नहीं जाना जाता है । पश्य,— निमित्तमुद्दिश्य हि यः प्रकुप्यति ध्रुवं स तस्यापगमे प्रसीदति । अकारणद्वेषि मनस्तु यस्य वै कथं जनस्तं परितोषयिष्यति ? ॥ १५९ ॥ देखो—जो निश्चय करके किसी कारणसे क्रोध करता है वह उस कारणके नाश हो जाने पर अवश्य प्रसन्न हो जाता है, पर जिसका मन बिना कारणके वैर करने लगा है उसको मनुष्य कैसे प्रसन्न कर सकता है ? ॥ १५९ ॥ किं मयापकृतं राज्ञः ? अथवा निर्निमित्तापकारिणश्च भवन्ति राजानः ।' दमनको ब्रूते—'एवमेतत्, शृणु— और मैंने राजाका क्या अपकार किया? अथवा, राजा लोग विनाही कारण अपकार करने वाले होते हैं?' । दमनक बोला—'यह योंही है । सुनो,— विज्ञैः स्निग्धैरुपकृतमपि द्वेष्यतामेति कश्चित् साक्षादन्यैरपकृतमपि प्रीतिमेवोपयाति । चित्रं चित्रं किमथ चरितं नैकभावाश्रयाणां सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ॥ १६० ॥ कोई कोई मनुष्य पण्डितोंसे तथा मित्रोंसे उपकार किये जाने पर भी शत्रुता करता है, और शत्रुओंसे प्रत्यक्षमें अपकार किये जाने पर भी प्रसन्न होता है । अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुषोंका चरित्र बड़ा अद्भुत है और सेवाका काम योगियोंसेभी बड़े कष्टसे हो सकता है ॥ १६० ॥ अन्यच्च,— कृतशतमसत्सु नष्टं सुभाषितशतं च नष्टमबुधेषु । वचनशतमवचनकरे बुद्धिशतमचेतने नष्टम् ॥ १६१ ॥

-१६४ ] राजाके परिवार और चन्दनवृक्षका साम्य १४७-

और दूसरे-दुष्टोंके विषयमें सैकड़ों उपकार नष्ट हो जाते हैं, मूर्खोंके सामने सैकड़ों अच्छे २ उपदेश नष्ट हो जाते हैं, हितके वचनको नहीं मानने वालेके सामने सैकड़ों वचन नष्ट हो जाते हैं, और महामूर्खके सामने सैकड़ों बुद्धियाँ नष्ट हो जाती हैं ॥ १६१ ॥ किं च,— चन्दनतरुषु भुजंगा जलेषु कमलानि तत्र च ग्राहाः । गुणघातिनश्च भोगे खला न च सुखान्यविघ्नानि ॥ १६२ ॥ और चन्दनके वृक्षों पर सर्प, जलमें कमल और उसीमें मगर आदि होते हैं, और राजादि अथवा विषयके भोगमें गुणके नाश करने वाले दुर्जन लोग होते हैं; इसीलिये सुख विघ्नरहित नहीं है ॥ १६२ ॥ अन्यच्च,— मूलं भुजंगैः कुसुमानि भृङ्गैः शाखाः प्लवङ्गैः शिखराणि भल्लैः । नास्त्येव तच्चन्दनपादपस्य यन्नाश्रितं दुष्टतरैश्च हिंस्रैः ॥ १६३ ॥ और दूसरे-जड़ सर्पोंसे, पुष्प भँवरोंसे, डालियाँ बन्दरोंसे और चोटी बर्छीके समान पत्तोंसे, इस प्रकार चन्दनके वृक्षका ऐसा कोईसा भाग नहीं है जो दुष्ट जंतुओंसे न घिरा हो ॥ १६३ ॥ अयं तावत्स्वामी वाचि मधुरो विषहृदयो ज्ञातः । मुझे यह स्वामी वाणीमें मीठा और पेटका कपटी समझ पड़ा । यतः,— दूरादुच्छ्रितपाणिराद्र्रनयनः प्रोत्सारितार्धासनो गाढालिङ्गनतत्परः प्रियकथाप्रश्नेषु दत्तादरः । अन्तर्भूतविषो बहिर्मधुमयश्चातीव मायापटुः को नामायमपूर्वनाटकविधिर्यः शिक्षितो दुर्जनैः ? ॥१६४॥ क्योंकि—दूरसे ऊँचे हाथ उठाना, प्रीतिसे रसीले नेत्र करना, आधा आसन बैठनेके लिये देना, अच्छे प्रकारसे मिलना, प्रिय कथाके पूछनेमें आदर करना, भीतर विषयुक्त अर्थात् कपटयुक्त और बाहरसे मीठी २ बातें करना यह जिसमें

१४८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १६५- हो और अत्यन्त मायासे भरा होना-यह कौनसा अपूर्व नाटकका व्यवहार है जो दुर्जनोंने सीखा है ! ॥ १६४ ॥ तथा हि,— पोतो दुस्तरवारिराशितरणे दीपोऽन्धकारागमे निर्वाते व्यजनं मदान्धकरिणां दर्पोपशान्त्यै सृणिः । इत्थं तद्भुवि नास्ति यस्य विधिना नोपायचिन्तः कृता मन्ये दुर्जनचित्तवृत्तिहरणे धातापि भग्नोद्यमः' ॥ १६५ ॥ और-दुस्तर समुद्रके पार होनेके लिये नाव, अंधकारके आने पर दीपक, वायुरहित समयमें पंखा, और मद वाले हाथीका घमंड दूर करनेके लिये अंकुश-इस प्रकार इस संसारमें ब्रह्माने हरएक विषयके उपायकी चिंता नहीं की हो ऐसी बात नहीं है, पर मैं मानता हूँ कि दुर्जनोंके चित्तकी वृत्ति हरण(दूर) करनेमें विधाताभी उद्योगरहित (विफल-प्रयत्न) हो गया ॥ १६५ ॥ संजीवकः पुनर्निःश्वस्य—'कष्टं भोः ! कथमहं सस्यभक्षकः सिंहेन निपातयितव्यः ? संजीवक फिर साँस भर कर (बोला)—अरे ! बड़े कष्टकी बात है, कैसे सिंह मुझ घासके चरने वालेको मारेगा ? यतः,— ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं बलम् । तयोर्विवादो मन्तव्यो नोत्तमाधमयोः क्वचित् ॥ १६६ ॥ क्योंकि-जिन दोनोंका समान वित्त और समानही बल हो, उन दोनोंका विरोध हो सकता है, किंतु सबल और निर्बलका तो कदापि नहीं होता है ॥ १६६ ॥ ( पुनर्विचिन्त्य ) केनायं राजा ममोपरि विकारितो न जाने । भेदमुपगताद्राज्ञः सदा भेतव्यम् । ( फिर सोच कर) किसने इस राजाको मुझसे क्रोधित करा दिया नहीं जानता हूँ । और, स्नेह छूटे राजासे सदा डरना चाहिये । १ कोई ग्रंथमें 'तयोर्विवादो मैत्री च नोत्तमाधमयोः क्वचित्' ऐसा पाठ है; वहां पर 'उन्हीं दोनोंका वाद और स्नेह हो सकता है, उत्तम और अधमका नहीं' ऐसा अर्थ समझना.

१७१ ] संग्राममें मरनेकी प्रशंसा १४९ यतः,— मन्त्रिणा पृथिवीपालचित्तं विघटितं क्वचित् । वलयं स्फटिकस्येव को हि संधातुमीश्वरः ? ॥ १६७ ॥ क्योंकि—किसी काममें मंत्रीसे फटे हुये राजाके चित्तको कांचकी चूड़ीके समान कोन जोड़नेको समर्थ हो सकता है ? अर्थात् वह सर्वथा अशक्य है ॥ अन्यच्च,— वज्रं च राजतेजश्च द्वयमेवातिभीषणम् । एकमेकत्र पतति पतत्यन्यत् समन्ततः ॥ १६८ ॥ और दूसरे, वज्र तथा राजाका तेज ये दोनों बड़े भयंकर हैं, एक अर्थात् वज्र तो एकही स्थानमें गिरता है, और दूसरा अर्थात् राजाका तेज, चारों तरफ फैलता है ॥ १६८ ॥ ततः संग्रामे मृत्युरेव वरम् । इदानीं तदाज्ञानुवर्तनमयुक्तम् । फिर संग्राममें मरनाही अच्छा है । अब उसकी आज्ञा मानना उचित नहीं है; यतः,— मृतः प्राप्नोति वा स्वर्गं शत्रुं हत्वा सुखानि वा । उभावपि हि शूराणां गुणावेतौ सुदुर्लभौ ॥ १६९ ॥ क्योंकि—शूर युद्धमें मर कर स्वर्ग पाता है अथवा जीता बचे तो शत्रुको मार कर सुख पाता है, इसलिये शूरोंके यह दोनोंही गुण बड़ें दुर्लभ हैं ॥ १६९ ॥ युद्धकालश्चायम्,— और यह लड़नेका समय है । यत्रायुद्धे ध्रुवं मृत्युर्युद्धे जीवितसंशयः । तमेव कालं युद्धस्य प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ १७० ॥ जिस समय, बुद्धिके नहीं करनेमें मृत्युका होना निश्चय है, और युद्धमें जीनेका संदेह है, उसी कालको पण्डित लोग युद्धका समय कहते हैं ॥ १७० ॥ यतः,— अयुद्धे हि यदा पश्येन्न किंचिद्धितमात्मनः । युध्यमानस्तदा प्राज्ञो म्रियते रिपुणा सह ॥ १७१ ॥ क्योंकि—जब चतुर मनुष्य विना युद्धसे कुछभी अपना हित न देखता है तब दुश्मनके साथ लड़ कर मर जाता है ॥ १७१ ॥

१५० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १७२- जये च लभते लक्ष्मीं मृतेनापि सुराङ्गनाम् । क्षणविध्वंसिनः कायः, का चिन्ता मरणे रणे ?' ॥ १७२ ॥ और विजय होने पर स्वामित्व और मरने पर स्वर्ग मिलता है, और यह काया क्षणभंगुर है फिर संग्राममें मरनेकी क्या चिंता है ?' ॥ १७२ ॥ एतच्चिन्तयित्वा संजीवक आह-'भो मित्र ! कथमसौ मां जिघां- सुर्ज्ञातव्यः ?' । दमनको ब्रूते-'यदासौ पिङ्गलकः समुन्नतलाङ्गुल उन्नतचरणो विवृतास्यस्त्वां पश्यति तदा त्वमेव स्वविक्रमं दर्शयिष्यसि । यह सोच कर संजीवक बोला-'हे मित्र ! वह मुझे मारने वाला कैसे समझ पड़ेगा ?' तब दमनकने कहा-'जब यह पिंगलक पूंछ फटकार कर ऊंचे पंजे करके और मुख फाड़ कर देखे तब तुमभी अपना पराक्रम दिखलाना; यतः,- बलवानपि निस्तेजाः कस्य नाभिभवास्पदम् ? । निःशङ्कं दीयते लोकैः पश्य भस्मचये पदम् ॥ १७३ ॥ क्योंकि-तेजहीन बलवान्‌को कौनसा मनुष्य पराजय नहीं कर सकता है? अर्थात् सब कर सकते हैं। देखो, मनुष्य तेज(वह्नि)हीन राखके ढेरमें निडर हो कर पैर रखते हैं ॥ १७३ ॥ किंतु सर्वमेतत्सुगुप्तमनुष्ठातव्यम् । नो चेन्न त्वं नाहम्' इत्युक्त्वा दमनकः करटकसमीपं गतः । करटकेनोक्तम्-'किं निष्पन्नम् ?' दमनकेनोक्तम्-'निष्पन्नोऽसावन्योन्यभेदः ।' करटको ब्रूते- 'कोऽत्र संदेहः ? परन्तु यह सब बात गुप्त ही रखने योग्य है । नहीं तो न तुम और न मैं' यह कह कर दमनक करटकके पास गया। तब करटकने पूछा-'क्या हुआ ?' दमनकने कहा-'दोनोंके आपसमें फूट फैल गई ।' करटक बोला-'इसमें क्या संदेह है ? यतः,- बन्धुः को नाम दुष्टानां कुप्यते को न याचितः । को न दृप्यति वित्तेन कुकृत्ये को न पण्डितः ? ॥ १७४ ॥ क्योंकि-दुष्टोंका कोन बन्धु है ? माँगनेसे कोन नहीं क्रोधित होता है ? धन (पाने) से कौनसा मनुष्य घमंड नहीं करता है ? और बुरा काम करनेमें कोनसा मनुष्य चतुर नहीं है ? ॥ १७४ ॥

-१७६] धूर्त मनुष्यकी निंदा १५१ अन्यच्च,― दुर्बृत्तः क्रियते धूर्तैः श्रीमानात्मविवृद्धये । किं नाम खलसंसर्गः कुरुते नाश्रयाशवत् ?' ॥ १७५ ॥ और दूसरे-धूर्त मनुष्य अपनी बढ़तीके लिये धनवान्‌को दुराचारी कर देते हैं, इसलिये दुष्टोंका सहवास अग्निके समान क्या क्या नहीं करता है ? याने वह सब अनर्थोंकी जड़ है' ॥ १७५ ॥ ततो दमनकः पिङ्गलकसमीपं गत्वा 'देव ! समागतोऽसौ पापा- शयः । ततः सज्जीभूय स्थीयताम्' इत्युक्त्वा पूर्वोक्ताकारं कार- यामास । संजीवकॊऽप्यागत्य तथाविधं विकृताकारं सिंहं दृष्ट्वा स्वानुरूपं विक्रमं चकार । ततस्तयोर्युद्धे संजीवकः सिंहेन व्यापादितः । तब दमनकने पिंगलकके पास जा कर—'महाराज ! वह पापी आ पहुँचा है, इसलिये सम्हाल कर बैठ जाइये'—यह कह कर पहले जताए हुए आकारको करा दिया. संजीवकने भी आ कर वैसेही बदली हुई चेष्टा वाले सिंहको देख कर अपने योग्य पराक्रम किया । फिर उन दोनोंकी लड़ाईमें संजीवकको सिंहने मार डाला । अथ संजीवकं सेवकं पिङ्गलको व्यापाद्य विश्रान्तः सशोक इव तिष्ठति । ब्रूते च—'किं मया दारुणं कर्म कृतम् ? पीछे सिंह, संजीवक सेवकको मार कर थका हुआ और शोकका-सा मारा बैठ गया । और बोला—'कैसा मैंने दुष्ट कर्म किया है ? यतः,― परैः संभुज्यते राज्यं स्वयं पापस्य भाजनम् । धर्मातिक्रमतो राजा सिंहो हस्तिवधादिव ॥ १७६ ॥ क्योंकि—राजा, हाथीके मारनेसे सिंहके समान धर्मका उल्लंघन करनेसे आप केवल पापका भागी बनता है और राज्यका सुख तो दूसरेही भोगते हैं ॥ १७६ ॥

१५२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १७७- अपरं च,— भूम्येकदेशस्य गुणान्वितस्य भृत्यस्य वा बुद्धिमवतः प्रणाशः । भृत्यप्रणाशो मरणं नृपाणां नष्टापि भूमिः सुलभा, न भृत्याः' ॥ १७७ ॥ और दूसरे—राज्यके एक टुकड़ेका और बुद्धिमान् तथा गुणवान् सेवकका इन दोनोंके नाशसे भी राजाओंको सेवकका नाश मरणके समान है, क्योंकि भूमि नष्ट हुईभी सहजमें मिल सकती है परन्तु सेवक नहीं मिल सकते हैं' ॥ १७७ ॥ दमनको ब्रूते—'स्वामिन् ! कोऽयं नूतनो न्यायो यदरातिं हत्वा संतापः क्रियते ? दमनक बोला—'स्वामी ! यह कोनसा नया न्याय है कि शत्रुको मार कर पछ- तावा करते हो ? तथा चोक्तम्,— पिता वा यदि वा भ्राता पुत्रो वा यदि वा सुहृत् । प्राणच्छेदकरा राज्ञा हन्तव्या भूतिमिच्छता ॥ १७८ ॥ जैसा कहा है—संपत्तिको चाहने वाले राजाको प्राणका नाश करने वाला पिता हो, या भाई हो, पुत्र हो, अथवा मित्र हो, मार देना चाहिये ॥ १७८ ॥ अपि च,— धर्मार्थकामतत्त्वज्ञो नैकान्तकरुणो भवेत् । न हि हस्तस्थमप्यन्नं क्षमावान् भक्षितुं क्षमः ॥ १७९ ॥ और भी—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इनके सारको जानने वाले पुरुषको अत्यंत दयालु नहीं होना चाहिये; क्योंकि क्षमाशील पुरुष हाथ पर रक्खे हुए भी भोजनको नहीं खा सकता है ॥ १७९ ॥ किं च,— क्षमा शत्रौ च मित्रे च यतीनामेव भूषणम् । अपराधिषु सत्त्वेषु नृपाणां सैव दूषणम् ॥ १८० ॥ और—शत्रु तथा मित्र पर क्षमा करना केवल तपस्वियोंका ही भूषण है, और राजाओंका अपराध करने वाले प्राणियों पर क्षमा करना तो दूषणही है ॥१८०॥

-१८३ ] दयालु राजा और लोभी ब्राह्मणकी निंदा १५३ अपरं च,— राज्यलोभादहंकारादिच्छतः स्वामिनः पदम् । प्रायश्चित्तं तु तस्यैकं जीवोत्सर्गो न चापरम् ॥ १८१ ॥ और दूसरे-राज्यके लोभसे अथवा अहंकारसे स्वामीके पदको चाहने वाले सेवकका, उस पापको नाश करनेमें प्राणोंका त्यागही एक प्रायश्चित्त है, और दूसरा कोई नहीं है ॥ १८१ ॥ अन्यच्च,— राजा घृणी ब्राह्मणः सर्वभक्षः स्त्री चावशा दुष्प्रकृतिः सहायः । प्रेष्यः प्रतीपोऽधिकृतः प्रमादी त्याज्या इमे यश्च कृतं न वेत्ति ॥ १८२ ॥ और अत्यन्त दयालु राजा, सर्वभक्षी अर्थात् अत्यंत लोभी ब्राह्मण, अवश स्त्री, बुरी प्रकृति वाला सहायक, उत्तर देने वाला नोकर, असावधान अधिकारी, और पराये उपकारको नहीं मानने वाला—ये त्यागनेके योग्य हैं ॥ १८२ ॥ विशेषतश्च,— सत्यानृता सपरुषा प्रियवादिनी च हिंस्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या । नित्यव्यया प्रचुररत्नधनागमा च वाराङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा' ॥ १८३ ॥ और विशेष करके-राजाकी नीति, कभी सच्ची, कभी झूठी, कभी कड़ी, कभी नरम, कभी हिंसा करने वाली, कभी दयालु, कभी धन लेने वाली, कभी उदार, कभी सदा व्यय करने वाली, कभी अनेक रत्न और धनको इकठ्ठा करने वाली, वेश्याके समान बहुत प्रकारकी है' ॥ १८३ ॥ इति दमनकेन संतोषितः पिङ्गलकः स्वां प्रकृतिमापन्नः सिंहासने समुपविष्टः । दमनकः प्रहृष्टमनाः 'विजयतां महाराजः, शुभमस्तु सर्वजगताम्' इत्युक्त्वा यथासुखमवस्थितः । इस प्रकार जब दमनकने संतोष दिलाया तब पिंगलकका जीमें जी आया और सिंहासन पर बैठा । दमनक प्रसन्न चित्त हो कर "जय हो महाराजकी, सब संसारका कल्याण हो" यह कह कर आनन्दसे रहने लगा ।

१५४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १८४- विष्णुशर्मोवाच—'सुहृद्द्वेदः श्रुतस्तावद्भवद्भिः ।' राजपुत्रा ऊचुः—'भवत्प्रसादाच्छ्रुतः। सुखिनो भूता वयम् ।' विष्णुशर्मा बोले—'आपने सुहृद्भेद सुन लिया ?' राजकुमार बोले—'आपकी कृपासे सुना और हम बहुत सुखी हुए ।' विष्णुशर्माऽब्रवीत्—'अपरमपीदमस्तु— सुहृद्भेदस्तावद्भवतु भवतां शत्रुनिलये खलः कालाकृष्टः प्रलयमुपसर्पत्वहरहः । जनो नित्यं भूयात् सकलसुखसंपत्तिवसतिः कथारामे रम्ये सततमिह बालोऽपि रमताम्' ॥ १८४ ॥ इति हितोपदेशे सुहृद्भेदो नाम द्वितीयः कथासंग्रहः समाप्तः । विष्णुशर्मा बोले—'यह और भी हो—आपके शत्रुओंके घरमें मित्रोंमें फूट हो, दुष्ट जन कालके वशमें पड़ कर प्रतिदिन नष्ट हो, प्रजा आपके राज्यमें सदा सब सुख और संपत्तिकी खान हो, और इस रमणीय, हितोपदेशके नीतिकथा रूपी उपवनमें बालक हमेशा रमण करें' ॥ १८४ ॥ पं० रामेश्वरभट्टका किया हुआ हितोपदेश ग्रंथके सुहृद्भेद नामक दूसरे भागका भाषा अनुवाद समाप्त हुआ. शुभम्.

पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रा ऊचुः—‘आर्य ! राजपुत्रा

हितोपदेशः विग्रहः पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रा ऊचुः—‘आर्य ! राजपुत्रा वयम् । तद्विग्रहं श्रोतुं नः कुतूहलमस्ति ।’ विष्णुशर्मणोक्तम्— ‘यदेव भवद्भ्यो रोचते कथयामि । विग्रहः श्रूयतां यस्यायमाद्यः श्लोकः— फिर कथाके आरंभके समय राजपुत्रोंने कहा—‘गुरुजी ! हम राजकुमार हैं। इसलिये विग्रह सुननेकी इच्छा है।’ विष्णुशर्माने कहा—‘जो आपको अच्छा लगे वही कहता हूं । विग्रह सुनिये कि जिसका पहला वाक्य यह है— हंसैः सह मयूराणां विग्रहे तुल्यविक्रमे । विश्वास्य वञ्चिता हंसाः काकैः स्थित्वाऽरिमन्दिरे’ ॥ १ ॥ हंसोंके साथ मोरोंके तुल्य पराक्रमके युद्धमें कौओंने शत्रुके गढ़में रह कर और विश्वास उपजा कर हंसोंको ठगा’ ॥ १ ॥ राजपुत्रा ऊचुः—‘कथमेतत् ?’ । विष्णुशर्मा कथयति— राजपुत्र बोले—‘यह कहानी कैसे है ?’ विष्णुशर्मा कहने लगे— कथा १ [ राजहंस, मोर और उनके मन्त्री आदिकी कहानी १ ] अस्ति कर्पूरद्वीपे पद्मकेलिनामधेयं सरः । तत्र हिरण्यगर्भो नाम राजहंसः प्रतिवसति । स च सर्वैर्जलचरपक्षिभिर्मिलित्वा पक्षिराज्येऽभिषिक्तः । कर्पूरद्वीपमें पद्मकेलि नाम एक सरोवर है, वहाँ हिरण्यगर्भ नाम एक राजहंस रहता था और सब जलचारी पक्षियोंने मिल कर उसे पक्षियोंके राज्य पर राज- तिलक किया था । यतः,— यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ्नेता ततः प्रजा । अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव ॥ २ ॥

१५६ हितोपदेशः [ विग्रहः ३- क्योंकि—जो संसारमें अच्छा प्रजापालक राजा न हो तो प्रजा, समुद्रमें कर्णधार (खेवटिये) से रहित नावके समान डूब जाती है ॥ २ ॥ अपरं च,— प्रजां संरक्षति नृपः सा वर्धयति पार्थिवम् । वर्धनाद्रक्षणं श्रेयस्तद्भावे सदप्यसत् ॥ ३ ॥ और दूसरे-राजा प्रजाकी रक्षा करता है और वह (प्रजा) कर आदि दे कर राजाको बढ़ाती है, बढ़ानेसे रक्षा कल्याणकारी है, और रक्षाके बिना सचमुच होनाभी नहीं होनेके समान है ॥ ३ ॥ एकदाऽसौ राजहंसः सुविस्तीर्णकमलपर्यङ्के सुखासीनः परि- वारपरिवृतस्तिष्ठति । ततः कुतश्चिद्देशादागत्य दीर्घमुखो नाम बकः प्रणम्योपविष्टः । राजोवाच-‘दीर्घमुख ! देशान्तरादागतो- ऽसि । वार्तां कथय ।’ स ब्रूते—‘देव ! अस्ति महती वार्ता । तां वक्तुं सत्वरमागतोऽहम् । श्रूयताम्,—अस्ति जम्बुद्वीपे विन्ध्यो नाम गिरिः । तत्र चित्रवर्णो नाम मयूरः पक्षिराजो निवसति । तस्यानुचरैश्चरद्भिः पक्षिभिरहं दग्धारण्यमध्ये चरन्नवलोकितः पृष्टश्च—‘कस्त्वम् ? कुतः समागतोऽसि ?’ तदा मयोक्तम्— ‘कर्पूरद्वीपस्य राजचक्रवर्तिनो हिरण्यगर्भस्य राजहंसस्यानुचरो- ऽहम् । कौतुकाद्देशान्तरं द्रष्टुमागतोऽस्मि ।’ एतच्छ्रुत्वा पक्षिभि- रुक्तम्-‘अनयोर्द्देशयोः को देशो भद्रतरो राजा च ?’ । मयोक्तम्— ‘आः ! किमेवमुच्यते ? महदन्तरम् । यतः कर्पूरद्वीपः स्वर्ग एव, राजहंसश्च द्वितीयः स्वर्गपतिः । अत्र मरुस्थले पतिता यूयं किं कुरुथ ? अस्मद्देशे गम्यताम् ।’ ततोऽस्मद्वचनमाकर्ण्य सर्वे सकोपा बभूवुः । एक दिन वह राजहंस सुन्दर बिछे हुए कमलके आसन पर सुखसे बैठा हुआ था और चारों तरफ उसका परिवार बैठा था । इसके बाद किसी देशसे आकर दीर्घमुख नाम बगुला प्रणाम करके बैठ गया । राजा बोला-‘हे दीर्घमुख ! तू कोनसे प्रदेशसे आया है ? समाचार सुना ।’ वह बोला-‘महाराज ! एक बड़ी बात है । उसके सुनानेके लिये तुरंत मैं आया हूँ । सुनिये-जंबूद्वीपमें विंध्य नाम पहाड़ है । वहाँ चित्रवर्ण नाम मोर-पक्षियोंका राजा रहता है । उसके चुगते हुए

अनुचर पक्षियोंने मुझे दग्ध नाम वनमें चुगते देखा, और पूछा—'तू कौन है ? कहाँसे आया है ?' तब मैंने कहा—'कर्पूरद्वीपके चक्रवर्ती राजा हिरण्यगर्भ राज- हंसका मैं अनुचर हूँ । अभिलाषासे नये देश देखनेको आया हूँ ।' यह सुन कर पक्षियोंने कहा—'इन दोनों देशोंमेंसे कोनसा देश तथा राजा अच्छा है ?' मैंने कहा—'अजी ! क्यों ऐसे कहते हो ? इन दोनोंमें बड़ा अन्तर है, क्योंकि कर्पूरद्वीप मानों स्वर्गही है, और राजहंस मानों दूसरा इन्द्र है । इस मारवाड़ देशमें पड़े हुए तुम क्या करते हो ? हमारे देशमें चलो ।' तब मेरी बात सुन कर सब क्रोधित हो गये । तथा चोक्तम्,— पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्धनम् । उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये ॥ ४ ॥ जैसा कहा है कि—सांपोंको दूध पिलाना केवल जहरको बढानां है, मूर्खोंको उपदेश करना भी क्रोध बढानेके लिये है, शान्तिके लिये नहीं; अर्थात् सांपको दूध पिलाना जैसा विषको बढाने वाला है वैसाही मूर्खको किया हुआ उपदेश क्रोधको बढाने वाला है; शांति करने वाला नहीं ॥ ४ ॥ अन्यच्च,— विद्वानेवोपदेष्टव्यो नाविद्वांस्तु कदाचन । वानरानुपदिश्याथ स्थानभ्रष्टा ययुः खगाः' ॥ ५ ॥ और दूसरे–बुद्धिमान्‌कोही उपदेश करना चाहिये, मूर्खको कभी न करे, जैसे पक्षी बन्दरोंको उपदेश करनेसे स्थान छोड़ कर चले गये' ॥ ५ ॥ राजोवाच—'कथमेतत् ?'। दीर्घमुखः कथयति— राजा बोला—'यह कथा कैसे है?' दीर्घमुख कहने लगा— कथा २ [ पक्षी और बंदरोंकी कहानी २ ] 'अस्ति नर्मदातीरे विशालः शाल्मलीतरुः । तत्र निर्मितनीड- क्रोडे पक्षिणो निवसन्ति सुखेन । अथैकदा वर्षासु नीलपटलैरा- वृते नभस्तले धारासारैर्महती वृष्टिर्बभूव । ततो वानरांश्च तरुतलेऽवस्थिताञ्शीताकुलान् कम्पमानानवलोक्य कृपया पक्षिभिरुक्तम्—'भो भो वानराः ! शृणुत,—