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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

-१३२ ] बुद्धिमान् पुरुषके लिये शिक्षा ५५

और भी—दरिद्रता और मरना इन दोनोंमेंसे दरिद्रता बुरी कही है, क्योंकि मरना तो थोड़े क्लेशसे होता है और दरिद्रता हमेशा दुःख देती है ॥ १२८ ॥ अपरं च,— तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव । अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः स एव अन्यः क्षणेन भवतीति विचित्रमेतत्' ॥ १२९ ॥ और दूसरे—वे ही विकारसे रहित इन्द्रियां हैं, वही नाम है, वही निर्मल बुद्धि है, वही वाणी है, परन्तु धनकी उष्णतासे रहित वो ही मनुष्य क्षणभरमें कुछका कुछ हो जाता है; ॥ १२९ ॥ एतत्सर्वमाकर्ण्य मयालोचितम्-‘ममात्रावस्थानमयुक्तमिदानीम्। यच्चान्यस्मै एतद्वृत्तान्तकथनं तदप्यनुचितम् । यह सब सुन कर मैंने सोचा—‘मेरा अब यहां रहना ठीक नहीं है । और जो दूसरेसे यह समाचार कहना भी उचित नहीं है, यतः,— अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च । वञ्चनं चापमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥ १३० ॥ क्योंकि--बुद्धिमान् पुरुषको अपने धनका नाश, मनका संताप, घरका दुराचार, ठगा जाना, और अपमान, ये प्रकट न करने चाहिये ॥ १३० ॥ अपि च,— आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमैथुनभेषजम् । तपो दानापमानं च नव गोप्यानि यत्नतः ॥ १३१ ॥ औरभी—आयु, धन, घरका भेद ( रहस्य ), गुप्त बात, मैथुन, औषधि, तप, दान और अपमान, इन नौ बातोंको यत्नसे गुप्त रखना चाहिये ॥ १३१ ॥ तथा चोक्तम्,— अत्यन्तविमुखे दैवे व्यर्थे यत्ने च पौरुषे । मनस्विनो दरिद्रस्य वनादन्यत्कुतः सुखम् ? ॥ १३२ ॥

भाग्यकी अत्यन्त प्रतिकूल दशामें धीरज वाले दरिद्री मनुष्यको वनको छोड़

५६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १३३- जैसा कहा है कि—जब पुरुषार्थही में निष्फलता होने लग जाए और भाग्यकी अत्यन्त प्रतिकूल दशामें धीरज वाले दरिद्री मनुष्यको वनको छोड़ और कहां सुख धरा है ? ( याने उसको स्वस्थान छोड़ कर कहांही वनमें जाना यही उचित है ) ॥ १३२ ॥ अन्यच्च,— मनस्वी म्रियते कामं कार्पण्यं न तु गच्छति । अपि निर्वाणमायाति नानलो याति शीतताम् ॥ १३३ ॥ और दूसरे—उदार पुरुष मर जाय पर कृपणता नहीं करता है ( अपनी लाचारी नहीं बताता है ) जैसे अग्नि भले बुझ जाय, पर ठंडी नही होती है ॥ १३३ ॥ किं च,— कुसुमस्तबकस्येव द्वे वृत्ती तु मनस्विनः । सर्वेषां मूर्ध्नि वा तिष्ठेद्विशीर्येत वनेऽथवा ॥ १३४ ॥ और पुष्पके,-गुच्छेके समान उदार मनुष्यकी दो तरहकी प्रकृति होती है कि या तो सबके शिर पर रहे या वनमें कुम्हला जाय ॥ १३४ ॥ यच्चात्रैव याच्ञया जीवनं तदतीव गर्हितम् । और जो यहां याचना कर जीना है वह तो बिलकुल अच्छा नहीं है, यतः— वरं विभवहीनेन प्राणैः संतर्पितोऽनलः । नोपचारपरिभ्रष्टः कृपणः प्रार्थितो जनः ॥ १३५ ॥ क्योंकि—धनहीन मनुष्य प्राणोंको अग्निमें झोंक दे सो अच्छा, परन्तु अपने मानको छोड़ कर कृपण मनुष्यसे याचना करना अच्छा नहीं है ॥ १३५ ॥ दारिद्र्याद्ध्रियमेति ह्रीपरिगतः सत्त्वात्परिभ्रश्यते निःसत्त्वः परिभूयते परिभवान्निर्वेदमापद्यते । निर्विण्णः शुचमेति शोकनिहतो बुद्ध्या परित्यज्यते निर्बुद्धिः क्षयमेत्यहो निधनता सर्वापदामस्पदम् ॥ १३६ ॥ और निर्धनतासे मनुष्यको लज्जा होती है, लज्जासे पराक्रम नष्ट हो जाता है, पराक्रम न होनेसे अपमान होता है, अपमान होनेसे दुःख पाता है, दुःखसे शोक करता है, शोकसे बुद्धिहीन हो जाता है, और बुद्धि न होनेसे नाश हो जाता है । अहो, निर्धनता ही सब आपत्तियोंका स्थान है ॥ १३६ ॥

-१३९ ] अनुचित कार्यकी निन्दा ५७ किं च,— वरं मौनं कार्यं न च वचनमुक्तं यदनृतं वरं क्लैब्यं पुंसां न च परकलत्राभिगमनम् । वरं प्राणत्यागो न च पिशुनवाक्येष्वभिरुचि- र्वरं भिक्षाशित्वं न च परधनास्वादनसुखम् ॥ १३७ ॥ और चुप रहना अच्छा, पर मिथ्या (झूठा) वचन कहना अच्छा नहीं; मनुष्योंकी नपुंसकता अच्छी, पर पराई स्त्रीके साथ गमन अच्छा नहीं; मर जाना अच्छा, किन्तु धूर्तकी बातोंमें रुचि करना अच्छा नहीं; और भीख मांगना अच्छा, पर पराया धनसे सुस्वादु भोजनका सुख अच्छा नहीं ॥ १३७ ॥ वरं शून्या शाला न च खलु वरो दुष्टवृषभो वरं वेश्या पत्नी न पुनरविनीता कुलवधूः । वरं वासोऽरण्ये न पुनरविवेकाधिपपुरे वरं प्राणत्यागो न पुनरथमानामुपगमः ॥ १३८ ॥ सूनी गौशाला अच्छी, पर मरखना बैल अच्छा नहीं; वेश्या स्त्री अच्छी, परंतु कुलकी बहू व्यभिचारिणी अच्छी नहीं; वनमें रहना अच्छा, पर अविवेकी राजाके नगरमें रहना अच्छा नहीं; और प्राणोंको छोड़ देना अच्छा, पर दुर्जनोंका संग अच्छा नहीं ॥ १३८ ॥ अपि च,— सेवेव मानमखिलं ज्योत्स्नेव तमो जरैव लावण्यम् । हरिहरकथेव दुरितं गुणशतमप्यर्थिता हरति ॥ १३९ ॥ और भी—जैसे सेवा सब मानको, चांदनी अंधकारको, बुढ़ापा खूबसूरतीको और विष्णु तथा महादेवकी कथा पापोंको हरती है वैसेही याचना सैकड़ों गुणोंको हर लेती है ॥ १३९ ॥ इति विमृश्य 'तत्किमहं परपिण्डेनात्मानं पोषयामि ? कष्टं भोः, तदपि द्वितीयं मृत्युद्वारम् । यह विचार कर कि मैं किस प्रकार पराये भोजनसे अपनेको पालूं ? अहो, बड़े कष्टकी बात है वहभी दूसरा मृत्युका द्वार है ।

५८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १४०- यतः,- पल्लवग्राहि पाण्डित्यं क्रयकीतं च मैथुनम् । भोजनं च पराधीनं तिस्रः पुंसां विडम्बनाः ॥ १४० ॥ क्योंकि—थोड़ा पढ़ कर पण्डिताई, धन दे कर मैथुन, और पराये आसरेका भोजन, ये तीन बातें मनुष्यकी व्यर्थ हैं ॥ १४० ॥ अपरं च,- रोगी चिरप्रवासी परान्नभोजी परावसथशायी । यज्जीवति तन्मरणं यन्मरणं सोऽस्य विश्रामः' ॥ १४१ ॥ और रोगी, बहुत कालतक विदेशमें रहने वाला, दूसरेके आसरे भोजन करने वाला तथा दूसरेके घर सोने वाला इनका जीना मरणके, और मरण विश्रामके समान है ॥ १४१ ॥ इत्यालोच्यापि लोभात्पुनरप्यर्थं ग्रहीतुं ग्रहमकरवम् । यह सोच करभी लोभसे फिर उसका धन लेनेकी हठ की । यथा चोक्तम्,- लोभेन बुद्धिश्चलति लोभो जनयते तृषाम् । तृषार्तो दुःखमाप्नोति परत्रेह च मानवः ॥ १४२ ॥ जैसा कहा है—लोभसे बुद्धि चलायमान हो जाती है, लोभही तृष्णाको बढ़ाता है, और तृष्णासे दुःखी हुआ मनुष्य इस लोक और परलोकमें कष्ट पाता है ॥ १४२ ॥ ततोऽहं मन्दं मन्दमुपसर्पंस्तेन वीणाकर्णेन जर्जरवंशखण्डेन ताडितश्चाचिन्तयम्— फिर उस वीणाकर्णने धीरे धीरे मुझ चलते हुएको एक सड़े बांसका टुकड़ा मारा, और मैं चिंता करने लगा— धनलुब्धो ह्यसंतुष्टोऽनियतात्माऽजितेन्द्रियः । सर्वा एवापदस्तस्य यस्य तुष्टं न मानसम् ॥ १४३ ॥ जिसको संतोष नहीं है उसको सब आपत्तियां ही हैं, क्योंकि वह धनका लोभी, अप्रसन्न, दुच्चित्ता और अजितेन्द्री हो जाता है ॥ १४३ ॥ तथा च,- सर्वाः संपत्तयस्तस्य संतुष्टं यस्य मानसम् । उपानद्गूढपादस्य ननु चर्मावृतेव भूः ॥ १४४ ॥

  • १४९ ] प्राणियोंके लिये उचित धर्म ५९ और—जिसका मन संतुष्ट है उसको सब संपत्तियां हैं जैसे पैरमें जूता पहने हुयेको सब पृथ्वी चर्ममयी दीखती है ॥ १४४ ॥ अपरं च,— संतोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम् । कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम् ? ॥ १४५ ॥ और दूसरे—संतोषरूपी अमृतसे अघाये हुए शांतचित्त वालोंको जो सुख है, वह सुख इधर उधर फिरने वाले धनके लोभियोंको कहां रक्खा है ? ॥ १४५ ॥ किंच,— तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुष्ठितम् । येनाशाः पृष्ठतः कृत्वा नैराश्यमवलम्बितम् ॥ १४६ ॥ और—जिसने आशाको पीछे कर निराशाका सहारा लिया है, उसीने पढ़ा, उसीने सुना और उसीने सब कुछ कर लिया ॥ १४६ ॥ अपि च,— असेवितेश्वरद्वारमदृष्टविरहव्यथाम् । अनुक्तक्लीबवचनं धन्यं कस्यापि जीवनम् ॥ १४७ ॥ औरभी—जिसने धनवान्के द्वारकी सेवा नहीं की ( याने श्रीमान्के पास कभी द्रव्ययाचना नहीं की ), विरहके दुःखको नहीं देखा, और कभी दीन वचन मुखसे नहीं कहे, ऐसे किसी भी मनुष्यका जीना धन्य है ॥ १४७ ॥ यतः,— न योजनशतं दूरं वाह्यमानस्य तृष्णया । संतुष्टस्य करप्राप्तेऽप्यर्थे भवति नादरः ॥ १४८ ॥ क्योंकि—जिसको तृष्णाने घुमा रक्खा है उसे सौ योजनभी क्या दूर हैं ? और संतोषीके हाथमें धन आ जाने पर भी आदर नहीं होता है ॥ १४८ ॥ तदत्रावस्थोचितकार्यपरिच्छेदः श्रेयान् । इसलिये यहां दशाके उचित कार्यका निश्चय करना कल्याणकारी है ॥ को धर्मो भूतदया किं सौख्यमरोगिता जगति जन्तोः । कः स्नेहः सद्भावः किं पाण्डित्यं परिच्छेदः ॥ १४९ ॥

६० हितोपदेशः [ मित्रलाभः १५०- संसारमें प्राणियोंका धर्म क्या है कि जीवों पर दया करना, और सुख क्या है कि नीरोग रहना, स्नेह क्या है कि सत्कारपूर्वक मिलना, और पंडिताई क्या है कि उच्च नीच विचार कर काम करना ॥ १४९ ॥ तथा च,— परिच्छेदो हि पाण्डित्यं यदापन्ना विपत्तयः । अपरिच्छेदकर्तॄणां विपदः स्युः पदे पदे ॥ १५० ॥ और विपत्तियोंके आजाने पर, निर्णय करके काम करनाही चतुराई है, क्योंकि बिना विचारे काम करने वालोंको पद पदमें विपत्तियां हैं ॥ १५० ॥ त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे स्वात्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥ १५१ ॥ कुलकी मर्यादाके लिये एकको, गांवभरके लिये कुलको, देशके लिये गांवको और अपने लिये पृथ्वीको छोड़ देना चाहिये ॥ १५१ ॥ अपरं च,— पानीयं वा निरायासं स्वाद्वन्नं वा भयोत्तरम् । विचार्य खलु पश्यामि तत्सुखं यत्र निर्वृतिः” ॥ १५२ ॥ और दूसरे—अनायास मिला हुआ जल और भयसे मिला मीठा भोजन उन दोनोंमें विचार कर देखता हूं तो जिसमें चित्त बेखटके रहे उसीमें सुख है अर्थात् पराधीन भोजनसे स्वाधीन जलका मिलना उत्तम है ॥ १५२ ॥ इत्यालोच्याहं निर्जनवनमागतः । यह विचार कर मैं निर्जन वनमें आया हूं । यतः,— वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं द्रुमालयं पक्वफलाम्बुभोजनम् । तृणानि शय्या परिधानवल्कलं न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम् ॥ १५३ ॥ क्योंकि—सिंह और हाथियोंसे भरे हुए वनमें वृक्षके नीचे रहना, पके हुए कंद मूल फल खाकर जल पान करना तथा घासके बिछोनेपर सोना और छालके वस्त्र पहनना अच्छा है पर भाई बन्धुओंके बीचमें धनहीन जीना अच्छा नहीं है ॥ १५३ ॥

-१५७ ] संसारी पुरुषको उचित उपदेश ६१ ततोऽस्मत्पुण्योदयादनेन मित्रेणाहं स्नेहानुवृत्त्यानुगृहीतः। अधुना च पुण्यपरम्परया भवदाश्रयः स्वर्ग एव मया प्राप्तः। फिर मेरे पुण्यके उदयसे इस मित्रने परम स्नेहसे मेरा आदर किया और अब पुण्यकी रीतिसे तुम्हारा आश्रय मुझे स्वर्गके समान मिल गया. यतः,— संसारविषवृक्षस्य द्वे एव रसवत्फले । काव्यामृतरसास्वादः संगमः सुजनैः सह' ॥ १५४ ॥ क्योंकि—संसाररूपी विषवृक्षके दो ही रसीले फल हैं; अर्थात् एक तो काव्यरूपी अमृतके रसका स्वाद और दूसरा सज्जनोंका संग' ॥ १५४ ॥ मन्थर उवाच— 'अर्थाः पादरजोपमा गिरिनदीवेगोपमं यौवन- मायूष्यं जललोलबिन्दुचपलं फेनोपमं जीवितम् । धर्मं यो न करोति निन्दितमतिः स्वर्गार्गलोद्घाटनं पश्चात्तापयुतो जरापरिगतः शोकाग्निना दह्यते ॥ १५५ ॥ मंथर बोला—'धन तो चरणोंकी धूलिके समान है, यौवन पहाड़ की नदीके वेगके समान है, आयु चंचल जलकी बिन्दुके समान चपल है और जीवन फेन ( झाग ) के समान है, इसलिये जो निर्बुद्धि स्वर्गकी आगलको खोलने वाले धर्मको नहीं करता है वह पीछे बुढ़ापेमें पछता कर शोककी अग्निसे जलाया जाता है ॥ १५५ ॥ युष्माभिरतिसंचयः कृतः । तस्यायं दोषः; शृणु,— तुमने बहुतसा संचय किया था उसका यह दोष है ॥ सुनो,— उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् । तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम् ॥ १५६ ॥ गंभीर सरोवरमें भरे हुए जलके चारों ओर निकलनेके (वारंवार जल निकाल देना जैसा सरोवरकी शुद्धिका कारण है, उसीके ) समान कमाये हुए धनका सत्पात्रमें दान करना ही रक्षा है ॥ १५६ ॥ अन्यच्च,— यदधोऽधः क्षितौ वित्तं निचखान मितंपचः । तदधोनिलयं गन्तुं चक्रे पन्थानमग्रतः ॥ १५७ ॥

[Header] ६२ हितोपदेशः [मित्रलाभः १५८-

और दूसरे—लोभी जिस धनको धरतीमें अधिक नीचे गाड़ता है वह धन पातालमें जानेके लिये पहलेसेही मार्ग कर लेता है ॥ १५७ ॥ अन्यच्च,— निजसौख्यं निरुन्धानो यो धनार्जनमिच्छति । परार्थभारवाहीव क्लेशस्यैव हि भाजनम् ॥ १५८ ॥ और जो मनुष्य अपने सुखको रोक कर धनसंचय करनेकी इच्छा करता है वह दूसरोंके लिये बोझ ढोने वाले(मजदूर)के समान क्लेशही भोगने वाला है १५८ अपरं च,— दानोपभोगहीनेन धनेन धनिनो यदि । भवामः किं न तेनैव धनेन धनिनो वयम् ॥ १५९ ॥ और दूसरे—दान और उपभोगहीन धनसे जो धनी होते हैं तो क्या उसी धनसे हम धनी नहीं हैं ? अर्थात् अवश्य हैं ॥ १५९ ॥ अन्यच्च,— न देवाय न विप्राय न बन्धुभ्यो न चात्मने । कृपणस्य धनं याति वह्नितस्करपार्थिवैः ॥ १६० ॥ और जो मनुष्य धनको देवताके, ब्राह्मणके तथा भाईबन्धुके काममें नहीं लाता है उस कृपणका धन तो जल जाता है या चोर चुरा ले जाते हैं अथवा राजा छीन लेता है ॥ १६० ॥ अपि च,— दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य । यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥ १६१ ॥ औरभी—दान, भोग और नाश धनकी तीन गति होती हैं; जो न देता है और न खाता है उसकी तीसरी गति होती है, अर्थात् नाश हो जाता है ॥१६१॥ असंभोगेन सामान्यं कृपणस्य धनं परैः । 'अस्येदमिति' संबन्धो हानौ दुःखेन गम्यते ॥ १६२ ॥ औरभी; विनाभोगे कृपणका धन दूसरे मनुष्योंके धनके समान है, परन्तु हानि होने पर, धनीके दुःखी होनेसे 'यह इसका धन है' ऐसा जाना जाता है ॥ १६२ ॥

-१६५ ] अतिसंचयकी निंदा ६३ दानं प्रियवाक्सहितं ज्ञानमगर्वं क्षमान्वितं शौर्यम् । वित्तं त्यागनियुक्तं दुर्लभमेतच्चतुष्टयं लोके ॥ १६३ ॥ प्रिय वाणीके सहित दान, अहंकाररहित ज्ञान, क्षमायुक्त शूरता, और दानयुक्त धन, ये चार बातें दुनियामें दुर्लभ हैं ॥ १६३ ॥ उक्तं च,— ‘कर्तव्यः संचयो नित्यं कर्तव्यो नातिसंचयः । पश्य संचयशीलोऽसौ धनुषा जम्बुको हतः’ ॥ १६४ ॥ और संचय नित्य करना चाहिये, परं अति संचय करना योग्य नहीं है । देखो, अधिक संचय करने वाला गीदड़ धनुषसे मारा गया ॥ १६४ ॥ तावाहतुः—‘कथमेतत् ?’ । मन्थरः कथयति— वे दोनो बोले—‘यह कथा कैसे है ?’ मन्थर कहने लगा— कथा ६ [ शिकारी, मृग, शूकर और गीदड़की कहानी ६ ] आसीत्कल्याणकटकवास्तव्यो भैरवो नाम व्याधः । स चैकदा मृगमन्विष्यमाणो विन्ध्याटवीं गतवान् । ततस्तेन व्यापादितं मृग- मादाय गच्छता घोराकृतिः शूकरो दृष्टः । तेन व्याधेन मृगं भूमौ निधाय शूकरः शरेणाहतः । शूकरेणापि घनघोरगर्जनं कृत्वा स व्याधो मुष्कदेशे हतः संश्छिन्नद्रुम इव भूमौ निपपात । कल्याणकटक वस्तीमें एक भैरव नाम व्याध (शिकारी) रहता था । वह एक दिन मृगको ढूंढ़ता ढूंढ़ता विंध्याचलकी ओर गया । फिर मारे हुए मृगको ले कर जाते हुए उसने एक भयंकर शूकरको देखा । तब उस व्याधने मृगको भूमि पर रख कर शूकरको बाणसे मारा । शूकरनेभी भयंकर गर्जना करके उस व्याधके मुष्कदेशमें ऐसी टक्कर मारी कि, वह कटे हुए पेड़के समान जमीन पर गिर पड़ा । यतः,— जलमग्निर्विषं शस्त्रं क्षुद्व्याधिः पतनं गिरेः । निमित्तं किंचिदासाद्य देही प्राणैर्विमुच्यते ॥ १६५ ॥ क्योंकि-जल, अग्नि, विष, शस्त्र, भूख, रोग और पहाड़से गिरना इसमेंसे किसी न किसी बहानेको पा कर प्राणी प्राणोंसे छूटता है ॥ १६५ ॥

६४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १६६-

अथ तयोः पादास्फालनेन सर्पोऽपि मृतः। अथानन्तरं दीर्घरात्रो नाम जम्बुकः परिभ्रमन्नाहारार्थी तान्मृतान्मृगव्याधसर्पशूकरान- पश्यत्। अचिन्तयच्च — 'अहो ! अद्य महद्भोज्यं मे समुपस्थितम्। उन दोनोंके पैरोंकी रगड़से एक सर्पभी मर गया। इसके पीछे आहारको चाहने वाले दीर्घराव नाम गीदडने घूमते २ उन मृग, व्याध, सर्प और शूकरको मरे पड़े हुए देखा और विचारा कि 'आहा ! आज तो मेरे लिये बड़ा भोजन तैयार है॥ अथवा,— अचिन्तितानि दुःखानि यथैवायान्ति देहिनाम् । सुखान्यपि तथा मन्ये दैवमत्रातिरिच्यते ॥ १६६ ॥ अथवा—जैसे देहधारियोंको अनायास दुःख मिलते हैं वैसेही सुखभी मिलते हैं, परन्तु इसमें प्रारब्ध बलवान् है ऐसा मानता हूं ॥ १६६ ॥ तद्भवतु । एषां मांसैर्मासत्रयं मे सुखेन गमिष्यति । जो कुछ हो, इनके मांसोंसे मेरे तीन महीने तो सुखसे कटेंगे । मासमेकं नरो याति द्वौ मासौ मृगशूकरौ । अहिरेकं दिनं याति अद्य भक्ष्यो धनुर्गुणः ॥ १६७ ॥ एक महीनेको मनुष्य होगा, दो महीनेको हरिण और सूकर होंगे और एक दिनको सर्प होगा, और आज धनुषकी डोरी चाबनी चाहिये ॥ १६७॥ ततः प्रथमबुभुक्षायामिदं निःस्वादु कोदण्डलग्नं स्नायुबन्धनं खादामि ।' इत्युक्त्वा तथा कृते सति छिन्ने स्नायुबन्धने उत्पति- तेन धनुषा हृदि निर्भिन्नः स दीर्घरावः पञ्चत्वं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि — “कर्तव्यः संचयो नित्यम्” इत्यादि । फिर पहिली भूखमें यह स्वादरहित, धनुषमें लगा हुआ तांतका बन्धन खाऊं।' यह कह कर वैसा करने पर तांतके बंधनके टूटतेही उछटे हुए धनुषसे हृदय फट कर वह दीर्घराव मर गया । इसलिये मैं कहता हूं “संचय नित्य करना चाहिये” इत्यादि । तथा च,— यद्ददाति यदश्नाति तदेव धनिनो धनम् । अन्ये मृतस्य क्रीडन्ति दारैरपि धनैरपि ॥ १६८ ॥

-१७२ ] क्रियाशील निपुणकी प्रशंसा ६५ वैसा कहा भी है—जो कुछ दान करता है और खाता है वही धनीका धन है, नहीं तो दूसरे मनुष्य मरे हुए मनुष्यके धन तथा स्त्रियोंसे क्रीडा करते हैं ॥ १६८ ॥ किंच,— यद्ददासि विशिष्टेभ्यो यच्चाश्नासि दिने दिने । तत्ते वित्तमहं मन्ये शेषं कस्यापि रक्षसि ॥ १६९ ॥ और जो सुपात्रोंको देते हो और नित्य खाते ( उपयोग करते ) हो मैं उसीको तुम्हारा धन मानता हूं, और शेष तो दूसरेका है. तुम केवल रक्षा करते हो १६९ यातु, किमिदानीमतिक्रान्तोपवर्णनेन ? जाने दो, जो हो गया सो हो गया, उसके वर्णनसे क्या लाभ है ? यतः,— नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम् । आपत्स्वपि न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः ॥ १७० ॥ क्योंकि—चतुर मनुष्य जो दुर्लभ वस्तु है उसे चाहते नहीं हैं. जो नष्ट हो गई, उसका सोच नहीं करते हैं, और आपत्तिकालमें मोह नहीं करते हैं ॥ १७० ॥ तत्सखे ! सर्वदा त्वया सोत्साहेन भवितव्यम् । इसलिये मित्र ! अब तुमको सदा आनन्दसे रहना चाहिये । यतः,— शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् । सुचिन्तितं चौषधमातुराणां न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥ १७१ ॥ क्योंकि—शास्त्र पढ़ कर भी मूर्ख होते हैं परन्तु जो क्रियामें चतुर है वही सच्चा पण्डित है. जैसे अच्छे प्रकारसे निर्णय की हुई औषधिभी रोगियोंको केवल नाममात्रसे अच्छा नहीं कर देती है ॥ १७१ ॥ अन्यच्च,— न स्वल्पमप्यध्यवसायभीरोः करोति विज्ञानविधिर्गुणं हि । अन्धस्य किं हस्ततलस्थितोऽपि प्रकाशयत्यर्थमिह प्रदीपः ? ॥ १७२ ॥ हि० ५

६६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १७३- और दूसरे-शास्त्रकी विधि, उद्योग (पराक्रम) से डरे हुए मनुष्यको कुछ गुण (फायदा) नहीं करती है, जैसे इस संसार में हाथ पर धरा हुआभी दीपक अन्धेको वस्तु नहीं दिखाता है ॥ १७२ ॥ तदत्र सखे ! दशाविशेषे शान्तिः करणीया । एतदप्यतिकष्टं त्वया न मन्तव्यम् । इसलिये हे मित्र ! इस शेष दशामें शान्ति करनी चाहिये । और इसेभी अधिक क्लेश तुमको नहीं मानना चाहिये । यतः,— राजा कुलवधूर्विप्रा मन्त्रिणश्च पयोधराः । स्थानभ्रष्टा न शोभन्ते दन्ताः केशा नखा नराः ॥ १७३ ॥ क्योंकि—राजा, कुलकी वधू, ब्राह्मण, मंत्री, स्तन, दंत, केश, नख और मनुष्य ये अपने स्थानसे अलग हुए शोभा नहीं देते हैं ॥ १७३ ॥ इति विज्ञाय मतिमान्स्वस्थानं न परित्यजेत् । कापुरुषवचनमेतत् । यह जान कर बुद्धिमान्को अपना स्थान नहीं छोड़ना चाहिये । यह कायर पुरुषका वचन है । यतः,— स्थानमुत्सृज्य गच्छन्ति सिंहाः सत्पुरुषा गजाः । तत्रैव निधनं यान्ति काकाः कापुरुषा मृगाः ॥ १७४ ॥ क्योंकि—सिंह, सज्जन पुरुष, और हाथी, ये स्थानको छोड़ कर जाते हैं, और काक, कायर पुरुष और मृग, ये वहांही नाश होते हैं ॥ १७४ ॥ को वीरस्य मनस्विनः स्वविषयः, को वा विदेशस्तथा यं देशं श्रयते तमेव कुरुते बाहुप्रतापार्जितम् । यद्दंष्ट्रानखलाङ्गलप्रहरणः सिंहो वनं गाहते तस्मिन्नेव हतद्विपेन्द्ररुधिरैस्तृष्णां छिनत्त्यात्मनः ॥ १७५ ॥ वीर और उद्योगी पुरुषोंको देश और विदेश क्या है ? अर्थात् जैसा देश वैसाही विदेश। वे तो जिस देशमें रहते हैं उसीको अपने बाहुके प्रतापसे जीत लेते हैं, जैसे सिंह जिस वनमें दांत, नख, पूंछसे प्रहार करता हुआ फिरता है उसी वनमें (अपने बलसे) मारे हुए हाथियोंके रुधिरसे अपनी प्यास बुझाता है ॥ १७५ ॥

-१७९] पराक्रमकी महिमा ६७ अपरं च,— निपानमिव मण्डूकाः सरः पूर्णमिवाण्डजाः । सोद्योगं नरमायान्ति विवशाः सर्वसंपदः ॥ १७६ ॥ और जैसे मैण्डक कूपके पासके पानीके गढ्ढेमें और पक्षी भरे हुए सरोवरको आते हैं, वैसेही सब सम्पत्तियां परवश होकर (अपने आप) उद्योगी पुरुषके पास आती हैं ॥ १७६ ॥ अन्यच्च,— सुखमापतितं सेव्यं दुःखमापतितं तथा । चक्रवत् परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥ १७७ ॥ और, आए हुए सुख तथा दुःखको भोगना चाहिये । क्योंकि सुख और दुःख पहियेकी तरह घूमते हैं (याने सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आते जाते हैं) ॥ १७७ ॥ अन्यच्च,— उत्साहसंपन्नमदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम् । शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदं च लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः ॥ १७८ ॥ और दूसरे-उत्साही, तथा आलस्यहीन, कार्यकी रीतिको जानने वाला, द्यूतक्रीडा (जूआ) आदि व्यसनसे रहित, शूर, उपकारको मानने वाला और पक्की मित्रता वाला ऐसे पुरुषके पास रहनेके लिये लक्ष्मी आपही जाती है ॥ १७८ ॥ विशेषतश्च,— विनाप्यर्थैर्वीरः स्पृशति बहुमानोन्नतिपदं समायुक्तोऽप्यर्थैः परिभवपदं याति कृपणः । स्वभावादुद्भूतां गुणसमुदयावाप्तिविषयां द्युतिं सैंहीं किं श्वा धृतकनकमालोऽपि लभते ? ॥ १७९ ॥ और विशेष बात यह है कि-वीर पुरुष बिनाही धनके सन्मानसे उच्च पदको पाता है, और कृपण धनयुक्त होनेसेभी तिरस्कार किया जाता है. जैसे कुत्ता

६८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १८०- सोनेकी माला पहन कर भी स्वभावसे प्रकाशमान, संपूर्ण गुणोंको प्रकट करने वाली सिंहकी कांतिको कैसे पा सकता है ? ॥ १७९ ॥ धनवानिति हि मदो मे किं गतविभवो विषादमुपयामि ? । करनिहतकन्दुकसमाः पातोत्पाता मनुष्याणाम् ॥ १८० ॥ 'मैं धनवान् हूं' इस प्रकार मुझे घमण्ड क्यों हैं ? और निर्धन हो कर क्यों दुःख भोगता हूं ? निश्चयही मनुष्योंका ऊंचा नीचा होना तो हाथसे उछाली हुई गेंदके समान है ॥ ॥ १८० ॥ अपरं च,— अभ्रच्छाया खलप्रीतिर्नवसस्यानि योषितः । किंचित्कालोपभोग्यानि यौवनानि धनानि च ॥ १८१ ॥ और दूसरे—बादलीकी छाया, नीचकी प्रीति, नया अन्न, स्त्रियां, यौवन तथा धन ये थोड़े दिनके भोगनेके लिये होते हैं ॥ १८१ ॥ वृत्त्यर्थं नातिचेष्टेत सा हि धात्रैव निर्मिता । गर्भादुत्पतिते जन्तौ मातुः प्रस्रवतः स्तनौ ॥ १८२ ॥ आजीविकाके लिये बहुत उद्योग नहीं करना चाहिये, वह तो विधाताने निश्चय कर दिया है, क्योंकि प्राणीके गर्भसे निकलतेही माताके स्तनोंसे दूध निकलने लगता है ॥ १८२ ॥ अपि च सखे !,— येन शुक्लीकृता हंसाः शुकाश्च हरितीकृताः । मयूराश्चित्रिता येन स ते वृत्तिं विधास्यति ॥ १८३ ॥ और भी हे मित्र ! जिसने हंसोंको सफेद, तोतोंको हरा और मोरोंको विचित्र बनाया है वही तेरी आजीविकाको देगा ॥ १८३ ॥ अपरं च,—सतां रहस्यं शृणु; मित्र ! और दूसरे-हे मित्र ! सज्जनोंका गुप्त मंत्र सुन; जनयन्त्यर्जने दुःखं तापयन्ति विपत्तिषु । मोहयन्ति च संपत्तौ कथमर्थाः सुखावहाः ? ॥ १८४ ॥ जो कमानेमें दुःख और आपत्तियोंमें संताप करते हैं, और अधिक बढ़नेसे मदांध ( या कृतघ्न ) कर देते हैं ऐसे धन कैसे सुखदायक हो सकते हैं ? ॥१८४॥

-१८९ ] धनलाभके विचारकी निंदा ६९ अपरं च,— धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता । प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ॥ १८५ ॥ और धर्मके लिये जिसको धनकी इच्छा है, उसको धनकी लालसा न होना अच्छा है, क्योंकि कीचड़को ( छू कर ) धोनेसेभी, उसका दूरसे स्पर्श न करनाही अच्छा है ॥ १८५ ॥ यतः,— यथा ह्यामिषमाकाशे पक्षिभिः श्वापदैर्भुवि । भक्ष्यते सलिले नक्रैस्तथा सर्वत्र वित्तवान् ॥ १८६ ॥ क्योंकि—जैसे आकाशमें पक्षी, पृथ्वी पर सिंह आदि, और जलमें मगर आदि मांसको खाते हैं, वैसेही सर्वत्र धनवान् ( जुवारी चोर इत्यादिका भोजन ) है, अर्थात् ये उसे लूटते ठगते हैं ॥ १८६ ॥ राज्ञतः सलिलादग्नेश्चोरतः स्वजनादपि । भयमर्थवतां नित्यं मृत्योः प्राणभृतामिव ॥ १८७ ॥ धनवानोंको राजा, जल, अग्नि, चोर, और अपने संबंधी जनोंसे, हमेशा ऐसा भय रहता है कि जैसा प्राणियोंको मृत्युसे ॥ १८७ ॥ तथा हि,— जन्मनि क्लेशबहुले किं नु दुःखमतः परम् ? । इच्छासंपद्यतो नास्ति यच्चेच्छा न निवर्तते ॥ १८८ ॥ और ( मनुष्यको ) जन्म लेनेमेंही बहुत क्लेश है, इससे अधिक और क्या दुःख होगा कि जिसमें इच्छाके अनुसार संपत्ति नहीं है और जिसमें इच्छा नहीं दूर होती है ॥ १८८ ॥ अन्यच्च भ्रातः ! शृणु,— धनं तावदसुलभं लब्धं कृच्छ्रेण रक्ष्यते । लब्धनाशो यथा मृत्युस्तस्मादेतन्न चिन्तयेत् ॥ १८९ ॥ और दूसरे—हे भाई ! सुनो-पहिले तो धनका, मिलना कठिन और मिलभी जाय तो फिर उसकी रखवाली कष्टसे होती है । और मिले हुए धनका नाश मृत्युके समान है, इसलिये इस(धनलाभ) की चिन्ता न करनी चाहिये ॥ १८९॥

७० हितोपदेशः [ मित्रलाभः १९०- तृष्णां चेह परित्यज्य को दरिद्रः क ईश्वरः ? । तस्याश्चेत्प्रसरो दत्तो दास्यं च शिरसि स्थितम् ॥ १९० ॥ और इस संसारमें तृष्णाको त्याग देनेसे कौन दरिद्री और कौन धनवान् है ? और जिसने उसको अवकाश दिया उसके ही शिर पर दासता बैठी है ॥ १९०॥ अपरं च,— यद्यदेव हि वाञ्छेत ततो वाञ्छा प्रवर्तते । प्राप्त एवार्थतः सोऽर्थो यतो वाञ्छा निवर्तते ॥ १९१ ॥ और जब जिस वस्तुमें इच्छा होती है तब उसके लाभकी आशा होती है, और जब वह वस्तु किसी उपायसे मिल जाय तब इच्छा निवृत्त होती है ॥ १९१ किं बहुना पक्षपातेन ? मयैव सहात्र कालो नीयताम् । और मेरे अधिक पक्षपातसे क्या है ? मेरेही साथ यहां समय बिताओ; यतः,— आमरणान्ताः प्रणयाः कोपास्तत्क्षणभङ्गुराः । परित्यागाश्च निःसङ्गा भवन्ति हि महात्मनाम् ॥ १९२ ॥ क्योंकि—महात्माओंका स्नेह मरने तक, क्रोध केवल क्षणमात्र और परित्याग केवल संगरहित होता है अर्थात् वे कुछ बुराई नहीं करते हैं ॥ १९२ ॥ इति श्रुत्वा लघुपतनको ब्रूते-‘धन्योऽसि मन्थर ! सर्वथा श्लाघ्य- गुणोऽसि । यह सुन कर लघुपतनक बोला—‘हे मन्थर ! तुम धन्य हो, और तुम प्रशंसनीय गुणवाले हो । यतः,— सन्त एव सतां नित्यमापदुद्धरणक्षमाः । गजानां पङ्कमग्नानां गजा एव धुरंधराः ॥ १९३ ॥ क्योंकि—सज्जनही सज्जनोंकी आपत्तिको सर्वदा दूर करनेके योग्य होते हैं । जैसे कीचड़में फँसे हुए हाथियोंके निकालनेके लिये हाथीही समर्थ होते हैं ॥ १९३॥ यतः,— श्लाघ्यः स एको भुवि मानवानां स उत्तमः सत्पुरुषः स धन्यः ।

-१९४ ] शिकारीके भयसे मृगकी आश्रययाचना ७१ यस्यार्थिनो वा शरणागता वा नाशाविभग्नाद्विमुखाः प्रयान्ति ॥ १९४ ॥ पृथ्वी पर पुरुषोंमें वही एक प्रशंसा पानेके योग्य है, वही उत्तम सज्जन पुरुष है, और उसीको धन्य है कि जिसके पाससे याचक अथवा शरणागत लोक निराश और विमुख हो कर नहीं जाते हैं ॥ १९४ ॥ तदेवं ते स्वेच्छाहारविहारं कुर्वाणाः संतुष्टाः सुख निवसन्ति' । तब वे इस प्रकार अपनी इच्छानुसार खाते-पीते खेलते-कूदते संतोष कर सुखसे रहने लगे ॥ अथ कदाचिच्चित्राङ्गनामा मृगः केनापि त्रासितस्तत्रागत्य मि- लितः । ततः पश्चादायान्तं मृगमवलोक्य भयं संचिन्त्य मन्थरो जलं प्रविष्टः, मूषिकश्च विवरं गतः, काकोऽप्युड्डीय वृक्षमारूढः । ततो लघुपतनकेन सुदूरं निरूप्य भयहेतुर्न कोऽप्यायातीत्यालोचि- तम् । पश्चात्तद्वचनादागत्य पुनः सर्वे मिलित्वा तत्रैवोपविष्टाः । मन्थरेणोक्तम्—भद्रम्, मृग ! स्वागतम् । स्वेच्छयोदकाद्याहारो- ऽनुभूयताम् । अत्रावस्थानेन वनमिदं सनाधीक्रियताम् ।' चित्राङ्गो ब्रूते—'लुब्धकत्रासितोऽहं भवतां शरणमागतः । भवद्भिः सह सख्यमिच्छामि ।' हिरण्यकोऽवदत्—'मित्रत्वं तावदस्माभिः सह भवताऽयत्नेन मिलितम् । फिर एक दिन चित्रांग नाम मृग किसीके डरके मारे उनसे आ कर मिला. इसके पीछे मृगको आता हुआ देख भयको सोच मन्थर तो पानीमें घुस गया. चूहा बिलमें चला गया और काक भी उड़ कर पेड़ पर जा बैठा । फिर लघुपतनकने दूरसे निर्णय किया कि, भयका कोई भी कारण नहीं है यह- सोचा । पीछे उसके वचनसे आकर सब मिल कर वहांही बैठ गये । मन्थरने कहा—'कुशल हो ? हे मृग ! तुम्हारा आना अच्छा हुआ । अपनी इच्छानुसार जल आहार आदि भोग करो अर्थात् खाओ, पीओ और यहां रह कर इस वनको सनाथ करो' । चित्रांग बोला—'व्याधके डरसे मैं तुम्हारी शरण आया हूं और तुम्हारे साथ मित्रता करनी चाहता हूं' । हिरण्यक बोला—'मित्रता तो हमारे साथ तुम्हारी अनायास हो गई है;

७२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १९५- यतः,— औरसं कृतसम्बन्धं तथा वंशक्रमागतम् । रक्षितं व्यसनेभ्यश्च मित्रं ज्ञेयं चतुर्विधम् ॥ १९५ ॥ क्योंकि-मित्र चार प्रकारके होते हैं; एक तो औरस अर्थात् जन्मसेही हो जैसे पुत्रादि, और दूसरे विवाहादि संबन्धसे हो गये हों और तीसरे कुल-पर- म्परा से आए हुए हों, और चौथे वे जो आपत्तियोंसे बचावें ॥ १९५ ॥ तदत्र भवता स्वगृहनिर्विशेषं स्थीयताम्' । तच्छ्रुत्वा मृगः सानन्दो भूत्वा स्वेच्छाहारं कृत्वा पानीयं पीत्वा जलासन्नतुरुच्छायाया- मुपविष्टः । अथ मन्थरेणोक्तम्—'सखे मृग ! एतस्मिन्निर्जने वने केन त्रासितोऽसि ? कदाचित्किं व्याधाः संचरन्ति ?' । मृगेणो- क्तम्—'अस्ति कलिङ्गविषये रुक्माङ्गदो नाम नरपतिः । स च दिग्विजयव्यापारक्रमेणागत्य चन्द्रभागानदीतीरे समावासित- कटको वर्तते । प्रातश्च तेनात्रागत्य कर्पूरसरःसमीपे भवितव्य- मिति व्याधानां मुखात्किंवदन्ती श्रूयते । तदत्रापि प्रातरवस्थानं भयहेतुकमित्यालोच्य यथावसरकार्यमारभ्यताम्' । तच्छ्रुत्वा कूर्मः सभयमाह—'जलाशयान्तरं गच्छामि' । काकमृगावप्युक्त- वन्तौ—'एवमस्तु' । ततो हिरण्यको विहस्याह—'जलाशयान्तरे प्राप्ते मन्थरस्य कुशलम् । स्थले गच्छतः कः प्रतीकारः ? इसलिये यहां तुम अपने घरसेभी अधिक आनन्दसे रहो । यह सुन कर मृग प्रसन्न हो अपनी इच्छानुसार भोजन करके तथा जल पी कर जलके पास वृक्षकी छायामें बैठ गया ॥ मन्थरने कहा कि-'हे मित्र मृग ! इस निर्जन वनमें तुम्हें किसने डराया है ? क्या कभी कभी व्याध आ जाते हैं ?' । मृगने कहा-'कलिंग देशमें रुक्मांगद नाम राजा है । और वह दिग्विजय करनेके लिये आ कर चन्द्रभागा नदीके तीर पर अपनी सेनाको टिका कर ठहरा है । और प्रातःकाल वह यहां आ कर कर्पूरसरोवरके पास ठहरेगा यह उड़ती हुई बात शिकारीयोंके मुखसे सुनी जाती है । इसलिये प्रातःकाल यहां रहनाभी भयका कारण है । यह सोच कर समयके अनुसार काम करना चाहिये' । यह सुन कर कछुआ डर कर बोला-'मैं तो दूसरे सरोवरको जाता हूं' । काग और मृगनेभी कहा-'ऐसाही हो अर्थात् चलो' । फिर हिरण्यक हँस कर बोला-'दूसरे सरोवरतक पहुंचने पर मंथर जीता बचेगा । परंतु इसके पटपड़में चलनेका कौनसा उपाय है ?

-१९८ ] बुद्धिवलके लिये वीरसेन की कहानी ७३

-१९८ ] बुद्धिवलके लिये वीरसेन की कहानी ७३ यतः,— अम्भांसि जलजन्तूनां दुर्गं दुर्गनिवासिनाम् । स्वभूमिः श्वापदादीनां राज्ञां मन्त्री परं बलम् ॥ १९६ ॥ क्योंकि-जलके जन्तुओंको जलका, गढ़में रहने वालोंको गढ़का, सिंहादि वन- चरोंको अपनी भूमीका, और राजाओंको मंत्रीका, परम बल होता है ॥ १९६ ॥ सखे लघुपतनक ! अनेनोपदेशेन तथा भवितव्यम्, हे सखे लघुपतनक ! इस उपदेशसे वह गति होगी; स्वयं वीक्ष्य यथा वध्वाः पीडितं कुचकुड्मलम् । वणिक्पुत्रोऽभवद्दुःखी त्वं तथैव भविष्यसि' ॥ १९७ ॥ जैसे कि एक बनियेका पुत्र आपही अपनी स्त्रीके कमलकी कलीके समान कुच (राजाको) मसलते हुए देख कर दुःखी हुआ, वैसेही तुम भी होंगे' ॥ १९७ ॥ ते ऊचुः—'कथमेतत् ?' । हिरण्यकः कथयति— वे दोनो पूछने लगे—'यह कथा कैसी है ?'. हिरण्यक कहने लगा— कथा ७ [राजकुमार, एक सुंदर युवति और उसके पतिकी कहानी ७] अस्ति कान्यकुब्जविषये वीरसेनो नाम राजा । तेन वीरपुर- नाम्नि नगरे तुङ्गबलो नाम राजपुत्रो भोगपतिः कृतः । स च महाधनस्तरुण एकदा स्वनगरे भ्राम्यन्नतिप्रौढयौवनां लावण्य- वतीं नाम वणिक्पुत्रवधूमालोकयामास । ततः स्वहर्म्यं गत्वा स्मराकुलमतिस्तस्याः कृते दूतीं प्रेषितवान् । कान्यकुब्ज देशमें एक वीरसेन नामक राजा था । उसने वीरपुर नाम नगरमें तुंगबल नाम राजपुत्रको युवराज कर दिया था । उस बड़े धनवान् तरुणने एक दिन नगरमें फिरते हुए एक नव-यौवनवती लावण्यवती नामक बनियेकी पुत्रवधूको देखा । फिर अपने राजभवनमें जा कर कामान्ध हो उसके लिये दूती भेजी. यतः,— सन्मार्गे तावदास्ते, प्रभवति पुरुषस्तावदेवेन्द्रियाणां, लज्जां तावद्विधत्ते, विनयपि समालम्बते तावदेव । भ्रूचापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथगता नीलपक्ष्मण एते यावल्लीलावतीनां न हृदि धृतिमुषो दृष्टिबाणाः पतन्ति ॥

७४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १९९- क्योंकि-पुरुष तभी तक अच्छे मार्गमें रहता है, तभी तक इन्द्रियोंको वशमें रखता है, तभी तक लज्जा रखता है, और तभी तक नम्रताका सहारा करता है, कि, जब तक सुन्दर सुन्दर स्त्रियोंको भौंहरूपी धनुषसे खींच कर छोड़े गये और कानके मार्ग तक खींचे गये, धैर्यको तोड़ने वाले ये नीले पलकवाले नेत्र(कटाक्ष)- रूपी बाण हृदयमें नहीं लगते हैं ॥ १९८ ॥ सापि लावण्यवती तदवलोकनक्षणात्प्रभृति स्मरशरप्रहारजर्ज- रितहृदया तदेकचित्ताऽभवत् । उस लावण्यवतीनेभी जिस समयसे उसे देखा था उसी क्षणसे कामदेवके बाणोंके प्रहारसे जिसका हृदय छेद गया था ऐसी वह उसीके ध्यानमें मग्न हो गई । तथा ह्युक्तम्,— असत्यं साहसं माया मात्सर्यं चातिलुब्धता । निर्गुणत्वमशौचत्वं स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ॥ १९९ ॥ जैसा कहा भी है—झूठ, साहस, छल, ईर्ष्या, अत्यन्त लोभ, निर्गुणता और अशुद्धता, ये दोष स्त्रियोंके स्वभावहीसे होते हैं ॥ १९९ ॥ अथ दूतीवचनं श्रुत्वा लावण्यवत्युवाच—'अहं पतिव्रता कथ- मेतस्मिन्नधर्मे पतिलङ्घने प्रवर्ते ? फिर दूतीकी बात सुन कर लावण्यवती बोली-'मैं पतिव्रता हूं, पतिके अनादर ( पातिव्रत्य-भंग ) करने वाले इस अधर्ममें कैसे प्रवृत्त होऊं ? यतः,— सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रजावती । सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता ॥ २०० ॥ क्योंकि-जो गृहस्थाश्रमके कार्यमें कुशल, पुत्रवती, पतिको प्राणोंके समान समझने वाली, तथा पतिव्रता है वह 'भार्या' कहलाती है ॥ २०० ॥ न सा भार्येति वक्तव्या यस्या भर्त्ता न तुष्यति । तुष्टे भर्तरि नारीणां संतुष्टाः सर्वदेवताः ॥ २०१ ॥ १ यह श्लोक दो पक्षमें लगता है अर्थात् धनुष और स्त्रीपक्षमें । धनुष और भौंहोंकी, नीलपलक और नीले पंखकी, और नेत्र और बाणकी समता है.