इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
भोजन- गर्भावस्था में भोजन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि आप चाहते हैं गर्भावस्था का समय नितान्त निरापद रहे तथा माँ और भावी शिशु दोनों ही स्वस्थ रहें तो माँ को उचित भोजन मिलना आवश्यक है। इस समय स्त्री को केवल अपने शरीर के लिए ही उपयुक्त आहार की आवश्यकता नहीं होती, परन्तु उसे गर्भस्थ बालक के शरीर निर्माण के लिए भी भोजन के सभी मूल तत्वों की प्रचुर मात्रा मिलनी आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त भोजन में प्रोटीन, खनिज तथा विटामिनों की उपयुक्त मात्रा पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए।
प्रोटीन- गर्भस्थ बालक के शरीर के तन्तुकोषों के निर्माण के लिए प्रोटीन अधिक आवश्यक है।
कैलशियम- बच्चे की हड्डियों के निर्माण के लिए आवश्यक है। इसकी न्यूनता से माता तथा शिशु दोनों की हड्डियाँ तथा दंत निर्बल हो जाते हैं।
लोहा- बच्चे के रक्त कण निर्माण करता है। इसके अभाव से माता तथा बालक दोनों में रक्त अल्पता का रोग हो जाता है। जिससे बच्चों को सूखा रोग भी लग जाता है।
उपरोक्त तीनों पदार्थ दूध में अधिक पाये जाते हैं। इसलिए गर्भिणी को कम से कम १ लीटर दूध नित्य लेना चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि दूध, दूध ही रूप में पिया जाय, उसके स्थान पर दही, छाछ, दूध की खीर, दूध का दलिया आदि प्रकारों से भी प्रयोग में लिया जा सकता है। और इस प्रकार से दूध की तरफ से अरुचि भी नहीं होगी।
विटामिन- गर्भ स्थित बालक तथा माता के शरीरों के सभी अंगों को परिपुष्ट करने के लिए सभी विटामिनों की आवश्यकता है। यह विटामिन प्रचुर मात्रा में पते वाले शाक, अन्य शाक, छिलके सहित दालें और चोकर सहित आटे में मिलते हैं। इसलिए इनका प्रयोग होना आवश्यक है।
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वीरेंद्र गुप्त
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उषाः पान- शय्या से उठते ही ईश्वर का स्मरण करने के पश्चात् अच्छी प्रकार से मुख स्वच्छ करके एक गिलास ताजा जल में १ कागजी नींबू, संतरों का रस तथा टिमाटर का रस जिसकी रुचि हो और रुचि अनुसार मीठा तथा नमक भी मिलाया जा सकता है, मिलाकर पीना चाहिए। इससे वमन बेचैनी आदि में शान्ति मिलती है और पेट साफ होकर शौच खुलकर आती है।
प्रातराश- प्रातःकाल पानी में भोगे हुए या सूखे ही मुनक्का ७ नग, अंजीर २ नग, बादाम ५ नग और ऋतु अनुसार दही या दही की लससी तथा उष्ण दूध। रुचि अनुसार।
मध्याह्न भोजन- चोकर सहित आटे की रोटी, छिलकेदार दाल पत्ते वाले शाक, दही छाछ तथा मक्खन या घी।
तीसरे पहर- ऋतु अनुसार फल।
सायंकाल- उपरोक्त भोजन कुछ कम मात्रा में।
रात्रि को सोने से एक घण्टा पूर्व दूध या ऋतु अनुसार फलों का रस।
अन्य सावधानी- केवल इतना खाओ जितना रुचि पूर्वक खाया जा सके। धीरे-धीरे भली प्रकार चबा-चबा कर भोजन करो। अधिक गर्म, खट्टा, चरपरा, कबला मत खाओ। एक ही समय बहुत-सा मत खाओ जिससे पेट तन जाये। रखा हुआ और बासी खाना मत खाओ। गर्भावस्था में जल का प्रयोग अधिक करना चाहिए। दिन में कम से कम पाँच छः बार जल पीना चाहिए। परन्तु भोजन करते समय जल कम मात्रा में भोजन के मध्य में ही पीना उचित है।
प्रथम मास में गर्भिणी औंटा हुआ गाय का दूध ठण्डा करके जो किञ्चित उष्ण हो पान करे और दिन में थोड़ा-थोड़ा कई बार पान करे, प्रातः सायं सात्विक, हल्का भोजन करे। दही में सौंठ और ब्राह्मी का समान भाग चूर्ण ३ माशा का विशेष सेवन किया करें जिससे सन्तान अति बुद्धिमान रोग रहित शुभ गुण वाली होती है।
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वीरेन्द्र गुप्तः
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दूसरे मास में पलास का पंता, गिलोय, ब्रह्मी और सौठ का समान भाग चूर्ण ४ माशा दूध से सेवन करें, या इन चारों औषधियों को दूध में डाल कर पका छान कर सेवन करें।
तीसरे चौथे तथा पाँचवें मास में दूध में मधु मिलाकर पियें। छठे तथा सातवें मास में दूध में घी मिलाकर उपरोक्त चूर्ण का सेवन करें।
आठवें मास से दूध में १ माशा बादाम का शुद्ध तेल मिलाकर दें और तेल नित्य ॥ माशा बढ़ाते जायें, यहाँ तक कि तेल १० माशा तक पहुँच जाय, फिर १ माशा नित्य कम करके ४ माशे तेल नित्य देते रहें।
नवें मास में शुद्ध तिल के तेल का फोया योनि में रखें इससे बच्चा सुगमता से बिना किसी कष्ट के उत्पन्न होता है।
जब बच्चा गर्भ में बढ़ता है। उस समय स्त्री की इच्छा भिन्न-भिन्न प्रकार के भोजनों को खाने की होने लगती है। इस इच्छा को रोकने से गर्भस्थ बच्चे पर बुरा प्रभाव पड़ता है और साथ में अखाद्य और अप्राकृतिक भोजन का भी। जैसे मिट्टी आदि। हम पीछे लिख आये हैं कि वंसलोचन मिट्टी जैसा स्वाद देता है, इससे मिट्टी खाने वाली स्त्रियों की तृप्ति हो जाती है और बालक भी गौर वर्ण का और पुष्ट होता है।
वस्त्र- गर्भावस्था में स्त्री को अपने वस्त्रों पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। इन दिनों बहुत कसे वस्त्र नहीं पहनने चाहिए। चोली और पेटीकोट ढीले बाँधने चाहिए। रात्रि को चोली और पेटीकोट को खोल देना अच्छा है। वस्त्र ऋतु अनुसार होने चाहिए। शरद ऋतु में ठण्ड से बचना, ग्रीष्म ऋतु में लू आदि से बचना तथा वर्षा ऋतु में सील तथा सीले वस्त्रों से बचना आवश्यक है। इन दिनों ऊँची एड़ी की चप्पल तथा फिसलने वाली चप्पल नहीं पहनने चाहिए इससे गिर जाने का भय रहता है।
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वीरेन्द्र गुप्तः
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गर्भावस्था में मैथुन
विश्राम- गर्भावस्था में उचित विश्राम की उतनी हो आवश्यकता है जितनी नियमित भोजन की। प्रतिदिन तीसरे पहर कम से कम १ घण्टा पूर्ण विश्राम करना चाहिए। लेटते समय पैर नीचे न हों। पैरों के नीचे तकिया लगा लेना उचित है। इसके अतिरिक्त यदि किसी समय थकान अनुभव हो और विश्राम की इच्छा हो तो उस समय विश्राम अवश्य करना चाहिए।
रात्रि होने पर अधिक समय तक नहीं जागना चाहिए। और ८ घण्टे का पूर्ण निद्रा लेनी उचित है। मासिक धर्म को तिथियों में तो पूर्ण विश्राम करना चाहिए।
जो स्त्रियाँ गर्भधारण के पश्चात् आराम ही करती हैं उनके बच्चे निर्बल होते हैं और जो बराबर परिश्रम करती रहती हैं उनके भी बच्चे निर्बल होते हैं। इसलिए आरम्भ में हल्का परिश्रम अर्थात् घर का काम-काज करना परन्तु भारी वजनदार वस्तु को उठाना ऊँचे पर रखी हुई वस्तु को उचक कर उतारना, लम्बी यात्रा करना, जीने पर अधिक चढ़ना-उतरना उखरू बैठना आदि कार्य नहीं करना चाहिए और अन्त के तीन महीनों में जितना अधिक से अधिक हो सके उतना विश्राम करना चाहिए। इस प्रकार से सन्तान पुष्ट होगी। सायं समय वायु सेवन के लिए जाना चाहिए।
स्नान- नित्य ताजे जल से स्नान करना चाहिए तथा रुचि न होने पर स्नान नहीं करना चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि ठण्डे ही जल से स्नान किया जाय यदि रुचि हो तो किंचित गर्म जल से भी स्नान किया जा सकता है। ध्यान रहे गर्म जल में ठण्डा जल मिलाकर स्नान नहीं करना चाहिए।
स्तन- गर्भ स्थित होने के पश्चात् स्तनों में वृद्धि होने लगती है इस कारण चोली ढीली रखनी चाहिए और स्नान समय स्तनों को भी भली प्रकार जल से स्वच्छ करके अच्छी प्रकार पोछ लेना आवश्यक है।
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गर्भिणी स्त्री को प्रति दिन पलास (ढाक) का एक पत्ता गाँदुघं के साथ पिलाओ तो उसके अति पराक्रमी पुत्र होगा और गर्भपात होने से रोक्ता है।
जिन स्त्रियों का गर्भपात हो जाता हो या बच्चा जन्मते ही या २,३ वर्ष का होकर जाता रहता हो तो ऐसी अवस्था में गर्भ स्थित होने के दूसरे मास से अन्त तक स्त्री को पुत्र जीवक के २ फलों की माँग प्रातः निहार मुँह ताजे जल से दें।
अथवा
कस्तुरी १ माशा, वंशलोचन ३ माशा, केशर ४ माशा, गुलाब पुष्प का जीरा ४ माशा, जीरा सफेद ४ माशा, तुलसी पत्र दो तोला, जाँबुत्री २ तोला, धतुरे का बीज १ नग, सहदेई पत्र ४ तोला। समस्त औषधियों को बारीक पीसकर १,१ रत्ती की गोलियों बनाकर छाया में सुखा लें।
प्रयोग विधि- जब निश्चय हो जाय कि गर्भ स्थित हो गया है तब से स्त्री को ४० दिन पर्यन्त २-२ गोली प्रातःकाल जल से दें और बालक उत्पन्न होने तक १-१ गोली खिलाते रहें। तत्पश्चात् बालक को आधी गोली प्रति दिन जल में घिसकर उस समय तक देते रहें जब तक बालक माता का दूध पीना न छोड़े।
लाभ- गर्भपात नहीं होता, बाल्यकाल में बच्चा मृत्यु के भय से बचा रहता है, बालक स्वस्थ और प्रसन्न रहता है।
★★★
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गर्भावस्था की भावना
गर्भावस्था में मैथुन
शास्त्रों ने गर्भावस्था में समागम करने के लिए निषेध किया है। इससे गर्भ में बच्चे के अंगों को हानि पहुँचती है। जब बच्चे के अंग बन जाते हैं तो उसके अंग समागम करने से विकृत हो जाते हैं और बच्चा बुद्धिहीन होकर कामी पुरुष के रूप में सामने आता है ऐसे गर्भ के बच्चे ब्रह्मघर्ष का पालन नहीं कर सकते। यही कारण है कि भारत में ब्रह्मघर्ष के लिए स्थान नहीं। 'हमने देखा है कि हमारे देश में ऐसे-ऐसे दम्पति हैं जो बच्चे के जन्म होने से केवल २४ घण्टे पूर्व तक स्त्री समागम करते रहे हैं।' और जब बच्चा जन्म से ही रोगी होकर शरीर निर्बल, निकम्मा, जीर्ण होने के कारण उसे जीवात्मा छोड़ कर अन्तरिक्ष को चली जाती है। तो उस समय ईश्वर को दोष देते हैं या अपने भाग्य को कोसते हैं। परन्तु यह नहीं विचारते कि यह सब हमारे ही कर्म से ऐसा हुआ है। मैंने अपने कई मित्रों और अन्य कई व्यक्तियों से इस विषय पर चर्चा की, उन्होंने उत्तर दिया कि क्या करें हम अपने को वश में नहीं रख सकते जब स्त्री को देखा और हमारा रंग पलटा। स्मरण रहे जिस मास में जो जो अंग प्रत्यंग बच्चे के बनते हैं यदि उस मास में रति किया होती है तो उस-उस अंग-प्रत्यंग को क्षति पहुँचे बिना रह नहीं सकेगी।
हाय! भारतवर्ष देश तेरी यह दशा कि आजकल के दम्पति एक वर्ष के लिए भी स्त्री से अलग नहीं रह सकते। जबकि पशु भी गर्भित पशु से समागम नहीं करते। जब बुद्धिहीन योनिर्पी पशुओं में इतनी समझ है तो हम बुद्धिमान होकर भी ऐसा नहीं कर सकते। धिक्कार है ऐसे जीवन पर जो कृकर्मों द्वारा अपना शरीर, भविष्य और जीवन को नष्ट करें, और साथ में आने वाली सन्तति को भी नष्ट भ्रष्ट करें। क्या इतिहास को पढ़कर भी
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वीरेन्द्र गुप्तः
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शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकते? इस घटना को पढ़ो और विचारो, कि हमारे पूर्वज कितने दृढ़ संकल्पी थे।
आपने संस्कृति साहित्य में आचार्य कव्यट का नाम सुना होगा। जब इनका विवाह होकर पत्नी घर पर आई। आते ही आचार्य कव्यट ने अपनी पत्नी के सम्मुख यह प्रश्न रखा। 'देवी मैं महाभाव्य लिख रहा हूँ मेरी इच्छा है कि जब तक भाव्य लिखकर पूर्ण न हो जाय उस समय तक हम दोनों ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करें।' पत्नी ने उत्तर दिया प्रभु! जैसी आपकी इच्छा, मैं आपकी आज्ञा के विरुद्ध नहीं जा सकती। आचार्य कव्यट उत्तर पाकर हर्षित हुए और अपने लेखन कार्य में निर्विघ्न लग गये।
आचार्य कव्यट को भाव्य लिखते लिखते इतना अधिक समय व्यतीत हो गया कि उन दोनों के केश पक कर खेत हो गये। आचार्य कव्यट का भाव्य पूर्ण हो चुका। दोनों दम्पति भूमि की कोमल हरियाली पर लेटे हुए हैं। चन्द्रमा की चाँदनी चहूँ और छिटक रही है। इस शीतल सुन्दर चन्द्र प्रपात में दोनों के खेत केश रजत सम चमक रहे हैं। कैसा सुहावना सुन्दर और आकर्षक समय है। दोनों दम्पति के चेहरों पर प्रसन्नता शान्ति और निर्भयता छटक रही है। ऐसे सुहावने समय में आचार्य कव्यट ने प्रेम पुरित मुखड़े को पत्नी की ओर कर अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा, 'प्रिय! भाव्य पूर्ण हो गया। मैं आज तुम्हें अपना प्रेम प्रदान कर सकता हूँ।' देवी पति के यह वचन सुनकर प्रसन्न चित्त हो बोलीं- 'प्रभु! वैसे तो मेरा सर्वस्व आपका ही है, प्रभु! मेरी और आपकी थोड़ी सी ही आयु शेष रही है। मेरी इच्छा है कि इस थोड़ी सी आयु में यह शरीर यदि अक्षुता ही रहे तो उत्तम है।' आचार्य कव्यट ने इसे सहर्ष स्वीकार किया, इस प्रकार दम्पति का सारा जीवन अक्षुता ही व्यतीत हो गया।
यह था हमारे भारतवर्ष का गौरवपूर्ण जीवन, जो विवाह के पश्चात् भी दो शरीर आजीवन अक्षुत रहे। आज यह कहा
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वीरेन्द्र गुप्तः
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जाता है कि जब हमारी पत्नी हमारे कमरे में लेटी हो तो हम अपने को अंकुश में नहीं रख सकते। कितना परिवर्तन है। इसी लिए यह विश्व शिरोमणी भारतवर्ष अधोगति को पहुँच कर पराधीनता को बेड़ियों में जकड़ा गया। समय के परिवर्तन से आज हम स्वतन्त्र हो गये। अब हमें संयम के साथ अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए और कम से कम गर्भ स्थिति हो जाने के पश्चात् जब तक बच्चा माता का दूध पीता रहे अर्थात् कम से कम ४.६ मास का बच्चा न हो जाय तब तक ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करें। जिससे सन्तान निरोगी और दीर्घजीवी हो।
गर्भावस्था की भावना
गर्भवती स्त्री के प्रति पति का उत्तरदायित्व अधिक बढ़ जाता है। उसे अपनी पत्नी को हर प्रकार से सांत्वना और धैर्य देते रहने की आवश्यकता है। इन दिनों पहले की अपेक्षा सर्वाधिक प्रेम, स्नेह और सहानुभूति की आवश्यकता है। पत्नी की किसी भी प्रकार से पहले की अपेक्षा इस समय में उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। वरन् घर के अन्य सदस्यों को भी उसके साथ अधिक वात्सल्य पूर्ण व्यवहार करना चाहिए और उसे इस बात का महत्व अवगत करा देना चाहिए कि वह संसार का सर्वाधिक गौरवपूर्ण पद प्राप्त करेगी।
गर्भवती स्त्री जैसे वातावरण में जैसे चित्रों का अवलोकन करेगी, जैसी उसकी दिनचर्या होगी वैसे ही विचारों के बालक को जन्म देगी।
वीर अभिमन्यु को कौन नहीं जानता। जिसने कभी युद्ध में अस्त्र-शस्त्र नहीं उठाया। वह अभिमन्यु अकेला ही द्रोणाचार्य के रचित चक्रव्यूह को खण्डित करने के लिए निर्भय अग्रसर हुआ।
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वीरेन्द्र गुप्तः
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आप जानते हैं! उसे इतना साहस, उत्साह, वीरता और युद्ध कुशलता कहाँ से मिली? सब जानते हैं। पर ध्यान कोई नहीं देता। जिस समय अभिमन्यु गर्भ में था। उस समय एक दिन रात्रि में सुभद्रा को निद्रा नहीं आ रही थी। सुभद्रा का मन खिन्न-सा हो रहा था। वीर अर्जुन यह बात जानते थे कि इस अवस्था में स्त्री का चित्त खिन्न होने से बच्चे पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए सुभद्रा की खिन्नता दूर करने के लिये वीर अर्जुन ने चक्रव्युह के युद्ध की गाथा सुनानी आरम्भ कर दी, कि चक्रव्युह में किस प्रकार प्रवेश करके उसे खण्डित किया जाता है, इतना ही सुनकर सुभद्रा को निद्रा देवी ने अपनी शरण में ले लिया। जिस कारण अर्जुन ने गाथा यहाँ समाप्त कर दी थी। तभी तो अभिमन्यु ने चक्रव्युह को जाने से पूर्व सभा में कहा था कि मैं व्यूह में प्रवेश करना ही जानता हूँ और बाहर आना नहीं। सुभद्रा ने जितनी गाथा व्यूह की सुनी वह सब अभिमन्यु में, जन्म के ही साथ आ गई थी।
पाठकों आपके सामने एक और घटना प्रस्तुत करते हैं। वह भी ऐतिहासिक है। माता बच्चों को जैसा चाहे वैसा बना सकती है। माता के विचार संस्कार और शिक्षा का बच्चे के अन्तःकरण पर छाया चित्र की भाँति प्रभाव डालते हैं। और कच्चे घड़े की रेखा के सदृश्य अमिट हो जाते हैं। माता का डाला हुआ प्रभाव आयु पर्यन्त नहीं निकल सकता, चुम्बक से अधिक आकर्षण माता की बात-बात में विद्यमान है।
मदालसा देवी का नाम तो आपने सुना ही होगा, इस मर्म की भली प्रकार ज्ञाता थीं और जैसा चाहे वैसा पुत्र उत्पन्न कर लेने की अपने में शक्ति रखती थीं। वे सदाचार धर्मात्मा, सत्यनिष्ठ राजा ऋतुध्वज की महारानी थीं, उनके तीन पुत्र थे जिनको उन्होंने सब संस्कार पूर्ण वैदिक रीत्यानुसार किये थे। उन्होंने सब संस्कारों से संस्कृत कर नियमानुसार एक दूसरे को पश्चात् सब को गुप्तकुल
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में शिक्षा पाने के लिये भेज दिया था। जो दीक्षान्त (समावर्तन) के पश्चात् सबके सब सन्यासी हो गये। जब सबसे कनिष्ठ पुत्र भी सन्यासी हो गया और उसके त्यागी हो जाने की सूचना राजा ऋतुध्वज को मिली, तो उसे बड़ा ही कष्ट हुआ। वह सोचता था कि तीसरा पुत्र तो अवश्य ही राज्याधिकारी होगा। जिससे अपने ही वंश में राज्य स्थिर रहेगा, पर यह क्या उलटा हो गया, और कोई पुत्र नहीं था जिसकी आशा की जाती। अतः राजा इस दुःख से अत्यन्त दुःखित होकर रंग महल की ओर चले आये। महारानी मदालसा ने उनके असमय पधारने और उदासी आदि लक्षणों से अनुमान लगाया कि आज कुछ दाल में काला है। और झट उठ कर हाथ में मोरछल ले पति के समीप उपस्थित हो प्रणाम कर विनीत भाव से पूछने लगी कि स्वामिन आज असमय पधारने का क्या कारण है। न जाने मेरी दृष्टि में कुछ अन्तर हो, कहते हुए भय लगता है। मैं आपके चित्त को उदास, मुखड़े को मलीन-सा पाती हूँ। जिससे मुझे वेदना हो रही है। बतलाइये क्या कहीं आक्रमण की आवश्यकता पड़ गई या कोई ब्राह्मण अतिथि बिना भोजन रह गया, क्या प्रजा को किसी कर्मचारी के अन्याय व्यवहार से वेदना पहुँची है। अथवा आपके मन में कुछ वेदना है कृपया शीघ्र प्रकट कर मेरी शंका का निवारण कीजिए। तब राजा ने उत्तर दिया कि क्या कहें आज तीसरा पुत्र भी स्नातक हो गुरुकुल से निकलते ही सन्यासी हो गया। इसलिये इस परिवार से राज्य का क्षय और वंश का नाश दोनों एक ही साथ हो गये। यह वेदना है मेरे चित्त की। आज मेरी उन आशाओं पर कि एक पुत्र तो राजकाज सँभाल ही लेगा और उससे वंश भी चलेगा 'पानी फिर गया' जीवन में जब-जब यह स्मरण होगा तब-तब कुछ ना कुछ कष्ट का हेतु बना ही रहेगा।
तब मदालसा ने नम्रता, धैर्य, मधुरता और गम्भीरता से निवेदन किया कि आपकी वेदना का कारण मैं समझ गई। इस
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संसार चक्र में न जाने किस जीव का किससे सम्बन्ध हो जाता है। मैं समझती हूँ कि आपकी इस चिन्ता को दूर कर सकूँगी। इन तीनों को सन्यासी बनाने का कारण भी मैं ही हूँ मैंने उन्हें गर्भाधान से लेकर गुरुकुल जाने पर्यन्त तक त्याग वैराग्य की ही शिक्षा दी थी। फिर किस की सामर्थ्य थी, जो उन्हें सन्यासी होने से रोक लेता। अब आपकी इच्छा पूर्ति के लिये एक बार और कष्ट सहन कर ऐसा ही पुत्र उत्पन्न करूँगी जो राज्याधिकारी ही होगा। आप इस चिन्ता को दूर कर दीजिये। आपके हर्ष में अपना हर्ष और कष्ट में अपना कष्ट, अनुभव करना अपना धर्म समझती हूँ।
उस देवी ने फिर विधि पूर्वक सन्तानार्थ गर्भाधान कराया और ईश्वर की कृपा से पुत्र ही का जन्म हुआ। और क्यों न होता जबकि युगम अयुगम रानियों का विचार कर उसी लक्ष से गर्भाधान किया गया था। उसको उसने बड़ी सावधानी से राज्याधिकारी बनाने के विचार से पालन-पोषण किया। और उसी समय जब और बालक गुरुकुल भेजे गये थे वह भी भेज दिया गया। वहाँ उसने शिक्षण समाप्त कर दीक्षान्त समावर्तन प्रतिज्ञा के समय वह कहता है कि मैं राजा बनकर संसार को सुखधाम बनाऊँगा। उसको गुरु आचार्य बताते हैं कि तेरे तीनों बड़े भाई सन्यासी हुए तू क्यों नहीं होता।
परन्तु वह राज्य सम्बन्धी लाभों को जताकर उनकी एक चलने नहीं देता। तब उसके तीनों भाइयों ने आकर उसे समझाया, पर अकेले ही उसने तीनों को निरुत्तर कर दिया और अनेक प्रमाण और युक्तियों से सबको शास्त्रार्थ में परास्त किया। तब वे तीनों भाई हार मानकर कारण जानने के अर्थ अपनी माता के पास आये। और अति श्रद्धा से माता के चरणों में शीश नवाकर प्रार्थना की, कि माता जी हम भी तीनों आपके पुत्र हैं जो एक दूसरे के पश्चात् सब सन्यासी हो गये और चौथा भी आपका ही
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पुत्र है जो बहुतेरा समझाने और शास्त्रार्थ करने पर भी सन्यासी नहीं हुआ, वरन् हम सबको परास्त कर राज्याधिकारी बनने के लिए घर आ गया। माता ने उन्हें धैर्य देकर समझाया कि आप ठहरेँ मैं आपको सन्तोष जनक उत्तर दूँगी और आपकी शंका का समाधान भले प्रकार करूँगी। फिर माता ने विधि पूर्वक तीनों का अतिथि सत्कार किया।
प्रातः जब वे शौच स्नान नित्य कर्म से निवृत्त हुए तो तीनों को एक विशाल भवन में जो वेद वेदांग त्याग वैराग्य आदि इसी प्रकार के सहस्रों ग्रन्थों से पूर्णित था साथ ले जाकर बिठला दिया कि आज आप इन ग्रन्थों का अवलोकन कीजिये और जो चित्र इसमें लटक रहे हैं उन्हें भी ध्यान से देखिये। वे चित्र सभी सन्यासियों, त्यागी, वैरागी, महान पुरुषों के जीवन चरित्र सहित थे। यह सब सारे दिन उन्हीं को देखते और विचारते रहे रात्रि में शयन किया। प्रातः निवृत्त होकर माता से पुनः कहा कि हमारी शंका का समाधान कीजिये। माता ने कहा शीघ्रता क्या है मैं उत्तर देने का वचन दे चुकी हूँ, आज तो और ठहरिये। माता ने उस दिन दूसरे भवन में जो नाना प्रकार के शस्त्रों अस्त्रों और सैनिक वीर पुरुषों योद्धाओं के चित्रों से शोभित था और उसमें अनेक ग्रन्थ राजनीति और शस्त्रादि, जल तथा आकाश यान बनाने की रीतियों से परिपूर्ण थे, जिसमें अस्त्र-शस्त्र बनाने चलाने व्यूह रचनायें और व्यूह आदि को खण्डित करने की क्रियाओं के साथ विद्यमान थीं लोजाकर बिठला दिया, और कहा कि आज का दिन इस भवन के चित्रों तथा ग्रन्थों के अवलोकन तथा मनन में व्यतीत कीजिये उन सबने वैसा ही किया। वह दिन भी समाप्त हो गया रात्रि को भोजनादि से निवृत्त होकर शयन कर प्रातःकाल उठे नित्य कर्म से निवृत्त हो माता से पुनः प्रश्न किया कि अब आप कृपया हमारी शंका का समाधान कीजिये। माता ने कहा कि मैं तो उत्तर दे चुकी। जब तुम तीनों मेरे गर्भ में थे और जब तक गुरुकुल नहीं
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भेजा गया था मेरा सारा समय पहले कमरे में व्यतीत हुआ, वही दृश्य मेरे सामने रहे, उन्हीं ग्रन्थों को जो त्याग वैराग्य से भरपूर थे पढ़ा। उसी का तुम्हें उपदेश किया।
माता से बढ़कर अध्यापक और वेदों से बढ़कर ग्रन्थ संसार में कोई नहीं है। तो भला कैसे सम्भव था कि तुम सब सन्यासी न होते। जब तुम्हारा छोटा भाई सन्यासी हो गया। उस समय तुम्हारे पिता को खेद हुआ कि डम' वंश से राज्य जाता है और ही कोई राज्याधिकारी होगा और वंशोच्छेदन भी होता है। तब मैंने प्रतिज्ञा की कि अब मैं आपकी इच्छा पूर्ति के अर्थ एक और पुत्र उत्पन्न करने का कष्ट सहूँगी और उसे ऐसी शिक्षा दूँगी कि संसार में कोई भी बड़ी से बड़ी शक्ति उसे सन्यासी नहीं बना सकेगी। सो मेरा उस समय से गुरुकुल जाने पर्यन्त सारा समय इस दूसरे भवन में व्यतीत हुआ। इसलिए उस पर आपकी वा अन्य किसी की युक्तियाँ क्या प्रभाव डाल सकती थीं। यह कथा सुन तीनों भाई सावधान हो, चले गये और चौथा भाई राज्याधिकारी हुआ।
यवन शासक औरंगजेब का दरबार लगा हुआ है। अनेक वीर योद्धा राजपूत, पठान तथा मुगल आदि अपने अपने स्थानों पर मौन बैठे हैं। रोंब के कारण सब की दृष्टि भूमि की ओर झुकी हुई है। किसी में इतना साहस नहीं कि सर उठाकर देख सकें। हाँ! केवल एक वीर ऐसा है जो सर उठाए हुए बादशाह के पास ही एक कुर्सी पर बैठा है। उसकी मुद्रा से धैर्य, साहस और वीरता झलक रही है। तो दूसरी ओर खुशामदी टट्टू बैठे हैं। इस निर्भीक वीर का नाम है यशवन्तसिंह। जो सम्राट का दायी हाथ और साथ में हृदय का काँटा भी समझा जाता है।
कुछ कालान्तर के पश्चात् एक भयंकर सिंह दरबार में लाया गया। जिसे सम्राट ने पकड़वाकर मंगवाया था, सम्राट उसकी प्रशंसा के पुल बीधने लगे। दरबारी जन भी ही में ही मिलाने लगे।
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गर्भ के लक्षण और वृद्धि
इसी बीच बादशाह ने अहंकार सहित दरबारियों की ओर देखते हुए कहा- 'मेरे विचार में इससे भयंकर शेर संसार में दूसरा न होगा।'
दरबारियों की गर्दनें हिलने लगीं 'बेशक सही फरमाते हैं जहाँपनाह', आदि-आदि स्वर चहूँ और से सुनाई देने लगे। केवल यशवन्तसिंह चुप थे। जब सम्राट ने उनकी ओर देखा तो हँस दिये। सम्राट को भाल पर रेखायें पड़ गयीं, अपना अपमान समझ वह और क्रुद्ध हुआ। परन्तु वह कर ही क्या सकता था? वह तो स्वयं यशवन्तसिंह से घबराता था। अपनी मुद्रा को सँभाल बनावटी हँसी हँस कर कहने लगा 'क्यों? आप हँसे क्यों? क्या आप इसे भयंकर शेर नहीं मानते?'
'सम्राट! यह तो एक साधारण सिंह है ऐसे सिंहों से हमारे बच्चे खेलते हैं।' ईष्या के साथ बादशाह ने कहा 'ओह!'
'जी ही! यदि आशा हो तो मैं भी अपना सिंह दिखाऊँ।' ही अवश्य दिखाओ। कल उसे दरबार में अपने साथ लाना, तुम्हारे शेर और हमारे शेर की कुश्ती होगी। देखें कौन जीतता है। कुश्ती की ललकार स्वीकार कर यशवन्तसिंह बैठ गये।
दरबार समाप्त हुआ, यशवन्तसिंह घर गये उसी समय पुत्र पृथ्वीसिंह पाठशाला से पढ़कर आया। यशवन्तसिंह ने कहा 'बेटा कल दरबार देखने चलोगे' पृथ्वीसिंह ने प्रसन्न होकर कहा 'हाँ पिताजी मैं कल दरबार देखने अवश्य चल्गूंगा।'
पृथ्वीसिंह और दिनों की अपेक्षा आज दरबार जाने की प्रसन्नता में नित्य कर्मों से शीघ्र ही निबट कर तैयार हो गया।
अगले दिन दरबार और दिनों की अपेक्षा दर्शकों से अधिक भरा हुआ है। क्योंकि दरबार में सिंह की कुश्ती होने का समाचार सारे में फैल गया था। सम्राट के सिंह का पिंजरा दरबार में उपस्थित है, सभी दर्शकों को दीख रहा है। परन्तु सबकी लालायित दृष्टियाँ यशवन्तसिंह तथा उसके सिंह के आने की
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वीरेन्द्र गुप्तः
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प्रतीक्षा में लगी हुई हैं। कुछ ही क्षणों के पश्चात् यशवन्तसिंह अपने प्रिय पुत्र पृथ्वीसिंह को साथ लिए दरबार में उपस्थित हुए। सबकी दृष्टि यशवन्तसिंह और उनके साथ बालक पर पड़ी, परन्तु सिंह को किसी ने नहीं देखा। सिंह को साथ न देखकर उपहास और व्यंग के साथ शाहंशाह कहने लगे 'कहिए! आपका शेर कहाँ रह गया?' क्या हमारे शेर से डर गया? खुशामदी लोगों ने साथ दिया। परन्तु यशवन्तसिंह पर इस उपहास का कोई प्रभाव न पड़ा। वह मुस्कराते हुए कहने लगे- 'मेरा सिंह मेरे पास है।' सब चौंक उठे। सम्राट ने आश्चर्य से कहा- 'कहाँ है?' यशवन्तसिंह ने मधुर स्वर में कहा- 'मेरे पास बैठा है। खुशामदी दरबारी- 'यह शेर!' कहकर हँसने लगे, साथ में औरंगजेब भी खूब हँसा और कहने लगा- 'यशवन्तसिंह तुमको क्या हो गया? कहाँ यह भयंकर शेर कहाँ एक दूध पीता बालक।' परन्तु यशवन्तसिंह चुप रहे।
बच्चा पिता के संकेत को समझ गया। तत्काल ही बच्चे के हृदय में रजपूती वीरता उनड़ पड़ी, भुजाएँ फड़कने लगीं। और मुखड़े पर लालिमा छटकने लगी। उसी क्षण पृथ्वीसिंह अपने पिता की तलवार म्यान से निकाल सिंह की ओर बढ़ा। पुत्र को सिंह की ओर बढ़ता देखकर यशवन्तसिंह ने कहा- 'बेटा! निःशस्त्र पर शस्त्र लेकर सामने जाना क्षत्रियों का धर्म नहीं।' पिता का वचन सुनते ही बच्चे ने पुत्रा तलवार छोड़ खाली हाथ ही पिजरे की ओर बढ़ा। पिजरा खोल कर राजपूत सिंह का बच्चा उस हिंसक सिंह से भिड़ गया। तत्काल ही उस यशवन्तसिंह सुत ने अहंकारी यवनिक शासक सिंह के जबाड़े को पकड़ कर चीर दिया।
पाठको क्या यशवन्तसिंह ने अपने बच्चे को पहले से ही सिंह से कुश्ती लड़ने का अभ्यास करा रखा था? या दरबार में कुश्ती की चुनौती को स्वीकार कर कुछ दिन का अवकाश लेकर लड़ना सिखाया था? नहीं-नहीं! सिंह की कुश्ती अगले ही दिन थी। परन्तु यशवन्तसिंह ने अपने पुत्र को गर्भाधान से ही सिंह
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बनाया था। उसे पूर्ण विश्वास था कि मेरा पुत्र सिंह से कुश्ती में हारेगा नहीं तभी तो निर्भय, निःसंकोच और दृढ़ता के साथ भरे दरबार में औरंगजेब की ललकार को स्वीकार किया था और विशेषता यह कि घर जाकर पुत्र से सिंह की कुश्ती के बारे में कुछ कहा भी नहीं।
गर्भाधान से लेकर ५ वर्ष की आयु तक बालक पर माता के विचार, धारणा, ध्यान, कार्य चित्रावलोकन आदि सभी बातों का प्रभाव-पड़ता है इसलिए, जिस प्रकार के बच्चे की इच्छा हो उसी प्रकार के चित्र, ग्रन्थ, गाथाओं का अवलोकन तथा मनन गर्भिणी को करना चाहिए और अपनी दिनचर्या भी उसी अनुसार रखनी चाहिए।
गर्भ के लक्षण और वृद्धि
प्रथम मास- यदि स्त्री को मासिक धर्म सम्बन्धी कोई रोग न हो, तो गर्भ धारण के पश्चात् मासिक धर्म नहीं होता। यह गर्भ का प्रथम और निश्चित लक्षण है। अधिकांश स्त्रियों का जी मिचलाता है बार-बार थूकने की इच्छा होती है, मुख से पानी अधिक निकलता है। भूख अधिक लगने लगती है, और चेहरे पर दुर्बलता के चिह्न होते हैं। स्त्रियों के मासिक धर्म का दोष, बन्ध्या दोष या अन्य व्याधि के कारण गर्भ स्थित न होने पर निम्नलिखित औषधि का प्रयोग ३ मास तक निरन्तर कराने से गर्भ सम्बन्धी सभी विकार दूर होकर गर्भ धारण करने की शक्ति प्राप्त होती है। साँठ ३ तोला, शतावर ३ तोला, असगन्ध नागौरी ३ तोला अजवायन ३ तोला, ईसबगोल १।। तोला, मिश्री १२ तोला ईसबगोल को छोड़कर सारी वस्तुओं को कूट छान लें बाद में ईसबगोल साबत ही मिला दें। मात्रा ४ माशा सुबह ४ माशा सायं दूध से
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गर्भ में जीव पहुँचने का समय
दें। यह औषधि गर्भ स्थित होने पर ४ मास तक दे सकते हैं। द्वितीय मास- स्तन बड़े और स्थूल होने लगते हैं और उनमें कठोरता भी आ जाती है। स्तन वृत्त भी बड़े हो जाते हैं, उनके आसपास काले रंग के बिन्दु जैसे धब्बे उभरे से दिखाई देते हैं। उनमें वेदना होती है। प्रातः शय्या से उठने पर अक्सर वमन हो जाती है। स्वभाव बदल जाता है। नीली रंग प्रकट हो जाती है और नाभि प्रदेश भीतर को हो जाता है। इस मास के अन्त तक स्तनों में दूध भी आ जाता है।
तृतीय मास- गर्भवती के मूत्र को एक शीशे के पात्र में रख दिया जाये, तो उसके ऊपर सफेद रंग की मलाई जैसा हल्का द्रव तैरने लगता है।
चतुर्थ मास- गर्भवती का उदर सामने की ओर अधिक बढ़ने लगता है। स्तन वृत्त फूलने लगते हैं। नाभि ऊपर की ओर उठ आती है। गर्भाशय में भ्रूण का हिलना-डुलना स्पष्ट जान पड़ता है, जैसे-जैसे बालक का विकास होता है, वैसे-वैसे हिलना-डुलना भी अधिक अनुभव होता है।
पंचम मास- गर्भस्थ बालक के हृदय का शब्द गर्भवती के उदर पर कान रखकर या यन्त्र द्वारा सुना जा सकता है ज्यों-ज्यों प्रसव का समय निकट आता जाता है त्यों-त्यों वह शब्द अधिक स्पष्टता से सुनाई पड़ने लगता है।
छठा मास- इस मास में गर्भवती के अस्वस्थ लक्षण (जी मिचलाना, वमन, मन्दगिनी आदि) दूर हो जाते हैं। वह अब स्वस्थ प्रतीत होती है। सातवें, आठवें और नवें मास में उदर विशेष रूप से अधिक बड़ा हो जाता है और गर्भवती बड़ी सुगमता से बच्चे के हृदय गति के शब्द का अनुभव करती है।
तीसरे मास में गर्भित भ्रूण के हाथ पाँव और मस्तक ये पाँच अंग प्रकट हो जाते हैं तथा सूक्ष्म अंग प्रत्यंग और मस्तक आदि के साथ ही सुख-दुःख के अनुभव करने वाले ज्ञान तन्तु
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सन्तान का गौर वर्ण बनाना
भी प्रगट हो जाते हैं।
गर्भ की नाभि में जो नाल लगी रहती है वह गर्भिणी माता के हृदय से बँधी रहती है उसके द्वारा माता के आहारजनित रस का उपस्तेह उस गर्भ को पुष्ट करता रहता है।
चौथे मास में सम्पूर्ण अंग प्रगट हो जाते हैं। पीचवें मास में गर्भ में चेतना शक्ति आ जाती है। छठे मास में स्नायु, शिरा, रोम, कंश, वर्ण और त्वचा ये सब उत्पन्न हो जाते हैं। सातवें मास में सब भावों से सर्वांग सम्पूर्ण गर्भ पुष्ट हो जाता है।
आठवें मास में ओज माता और गर्भ के शरीर में बार-बार संचार करता है इसलिए वे दोनों कभी मुदित और कभी म्लीन हो जाते हैं। जब ओज का संचार गर्भ में होता है तब माता म्लीन और क्लान्त-सी हो जाती है तो गर्भ प्रसन्न हो जाता है। जब ओज माता में आ जाता है तो गर्भ क्लान्त हो जाता है यही कारण है कि आठवें मास में ओज स्थिर न होने के कारण आठवें मास में उत्पन्न हुआ बालक जीवित नहीं रह पाता। किन्तु स्त्री के जीवन में संशय रहता है। यदि आठवें मास में बालक की उत्पत्ति के समय ओज स्त्री को न मिल कर गर्भ के पास पहुँचता है और उस ओज सहित गर्भ निकल जाता है अर्थात् प्रसव हो जाता है तो स्त्री की मृत्यु हो जाती है अन्यथा स्त्री जीवित रहती है।
अष्टांगहृदय संहिता
शरीर स्थान
★★★
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संस्कार
गर्भ में जीव पहुँचने का समय
अधिकौश व्यक्तियों की धारणा है कि भ्रूण में जीव तीसरे मास पड़ता है, यह भ्रम है। जब कि गर्भाधान के पश्चात् गर्भ द्वार बन्द हो जाता है तो जीव तीसरे मास किस मार्ग द्वारा भ्रूण में पहुँच सकता है। दूसरे जो वस्तु चैतन्य रहित होती है वह एक जगह पड़े-पड़े सड़ने लगती है। जैसे नदी में पड़ा हुआ टापू के बीच का जल गतिहीन होकर सड़ने लगता है। तीसरे जिस प्रकार पेड़ का गुदा काट कर अलग डाल देने से नहीं फल-फूल सकता और ना ही बढ़ सकता है। इसी प्रकार गर्भाशय के मध्य चैतन्य रहित वीर्य सड़कर नष्ट हो जायेगा और जो वृद्धि को भी प्राप्त नहीं हो सकता। खुर्दबीन द्वारा वीर्य में देखने से छोटे-लम्बे आकार का कीट दीखता है। जिसके वीर्य में यह कीट नहीं होता, उस वीर्य से गर्भ स्थित नहीं हो सकता। चाहे जितना समागम करें। इसीलिये शास्त्रकारों ने कहा है, वीर्य को व्यर्थ नष्ट करने से ब्रह्म हत्या का पाप होता है। क्यों? क्योंकि वीर्य में जीव होता है। इससे स्पष्ट है कि जिस समय वीर्य रजः से मिलकर गर्भाशय में जाता है उसी समय जीव भी पहुँचता है। हम पीछे लिख, आये हैं कि जीव शरीर में भोजन द्वारा किस प्रकार वीर्य में पहुँचता है।
गर्भ में पुत्र पुत्री परीक्षा
यदि दाहिना नेत्र किन्चित बड़ा हो, दाहिनी जंघा भारी हो, दाहिना पग चलने में किन्चित देरी से उठता हो तथा प्रथम दाहिने स्तन में दुध आवे। मुख प्रसन्न और रंग उत्तम हो तो पुत्र के लक्षण जाने, इसके विपरीत पुत्री के लक्षण होते हैं। पाँचवें मास गर्भ में बालक के हृदय की ध्वनि आने लगती है। यह ध्वनि एक
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प्रसव
मिनट में १२० सुनाई पड़े तो पुत्र है और केवल २० या २२ की ध्वनि सुनाई पड़े तो पुत्री जानो।
गर्भ स्थिति के २॥। मास हो जाने पर प्रातः काज निहार मुंह गर्भिणी को खाण्ड के एक बताशे में बद्ध की टहनी तोड़ कर दो बूँद दूध टपका कर ताजे जल से सेवन करा दें। यदि पच जाये तो पुत्र है। वमन हो जाय तो कन्या।
सन्तान का गौर वर्ण बनाना
इसके लिए १ माशा बंसलोचन, ५ नग बादाम की मींग छिलका उतारी हुई पीसकर बूरा मिलाकर सेवन करायें। दूध की खीर का भोजन नित्य करायें। गोला मिश्री का सेवन। टमाटर बीज रहित, अमरूद, अनार, सेब, सन्तरा आदि का अधिक प्रयोग करें। शुद्ध केशर पान में रखकर या दूध में डालकर पीना चाहिए। बंसलोचन ५ तोला बबूल की पत्ती २० तोला, कमल गट्टे की मींग २० तोला। कमल गट्टे की मींग की जीभ निकाल देनी चाहिए यह मींग के बीच में पीले रंग की होती है, इसमें विष का अंश होता है। तीनों को पीस कर २ माशा दूध के साथ सेवन करें। बंसलोचन १ तोला, सितोपलादि चूर्ण १ तोला, केशर १ माशा, तीनों को बारीक पीसकर रखलें इसमें से १ माशा नित्य दूध के साथ सेवन करें। पत्ते वाले शाकों का प्रयोग करने से सन्तान का वर्ण श्याम होता है। यह सब उपचार सन्तान का गौर वर्ण करने के लिए गर्भ के छठे मास से प्रारम्भ करके अन्त तक करना चाहिए।
नोट- टमाटर का बीज सावक होता है इससे गर्भ पात हो जाता है इसलिये टमाटर का बीज गर्भणी को नहीं देना चाहिए।
इच्छानुसार सन्तान
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