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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

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में शिक्षा पाने के लिये भेज दिया था। जो दीक्षान्त (समावर्तन) के पश्चात् सबके सब सन्यासी हो गये। जब सबसे कनिष्ठ पुत्र भी सन्यासी हो गया और उसके त्यागी हो जाने की सूचना राजा ऋतुध्वज को मिली, तो उसे बड़ा ही कष्ट हुआ। वह सोचता था कि तीसरा पुत्र तो अवश्य ही राज्याधिकारी होगा। जिससे अपने ही वंश में राज्य स्थिर रहेगा, पर यह क्या उलटा हो गया, और कोई पुत्र नहीं था जिसकी आशा की जाती। अतः राजा इस दुःख से अत्यन्त दुःखित होकर रंग महल की ओर चले आये। महारानी मदालसा ने उनके असमय पधारने और उदासी आदि लक्षणों से अनुमान लगाया कि आज कुछ दाल में काला है। और झट उठ कर हाथ में मोरछल ले पति के समीप उपस्थित हो प्रणाम कर विनीत भाव से पूछने लगी कि स्वामिन आज असमय पधारने का क्या कारण है। न जाने मेरी दृष्टि में कुछ अन्तर हो, कहते हुए भय लगता है। मैं आपके चित्त को उदास, मुखड़े को मलीन-सा पाती हूँ। जिससे मुझे वेदना हो रही है। बतलाइये क्या कहीं आक्रमण की आवश्यकता पड़ गई या कोई ब्राह्मण अतिथि बिना भोजन रह गया, क्या प्रजा को किसी कर्मचारी के अन्याय व्यवहार से वेदना पहुँची है। अथवा आपके मन में कुछ वेदना है कृपया शीघ्र प्रकट कर मेरी शंका का निवारण कीजिए। तब राजा ने उत्तर दिया कि क्या कहें आज तीसरा पुत्र भी स्नातक हो गुरुकुल से निकलते ही सन्यासी हो गया। इसलिये इस परिवार से राज्य का क्षय और वंश का नाश दोनों एक ही साथ हो गये। यह वेदना है मेरे चित्त की। आज मेरी उन आशाओं पर कि एक पुत्र तो राजकाज सँभाल ही लेगा और उससे वंश भी चलेगा 'पानी फिर गया' जीवन में जब-जब यह स्मरण होगा तब-तब कुछ ना कुछ कष्ट का हेतु बना ही रहेगा।

तब मदालसा ने नम्रता, धैर्य, मधुरता और गम्भीरता से निवेदन किया कि आपकी वेदना का कारण मैं समझ गई। इस

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वीरेन्द्र गुप्तः

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संसार चक्र में न जाने किस जीव का किससे सम्बन्ध हो जाता है। मैं समझती हूँ कि आपकी इस चिन्ता को दूर कर सकूँगी। इन तीनों को सन्यासी बनाने का कारण भी मैं ही हूँ मैंने उन्हें गर्भाधान से लेकर गुरुकुल जाने पर्यन्त तक त्याग वैराग्य की ही शिक्षा दी थी। फिर किस की सामर्थ्य थी, जो उन्हें सन्यासी होने से रोक लेता। अब आपकी इच्छा पूर्ति के लिये एक बार और कष्ट सहन कर ऐसा ही पुत्र उत्पन्न करूँगी जो राज्याधिकारी ही होगा। आप इस चिन्ता को दूर कर दीजिये। आपके हर्ष में अपना हर्ष और कष्ट में अपना कष्ट, अनुभव करना अपना धर्म समझती हूँ।

उस देवी ने फिर विधि पूर्वक सन्तानार्थ गर्भाधान कराया और ईश्वर की कृपा से पुत्र ही का जन्म हुआ। और क्यों न होता जबकि युगम अयुगम रानियों का विचार कर उसी लक्ष से गर्भाधान किया गया था। उसको उसने बड़ी सावधानी से राज्याधिकारी बनाने के विचार से पालन-पोषण किया। और उसी समय जब और बालक गुरुकुल भेजे गये थे वह भी भेज दिया गया। वहाँ उसने शिक्षण समाप्त कर दीक्षान्त समावर्तन प्रतिज्ञा के समय वह कहता है कि मैं राजा बनकर संसार को सुखधाम बनाऊँगा। उसको गुरु आचार्य बताते हैं कि तेरे तीनों बड़े भाई सन्यासी हुए तू क्यों नहीं होता।

परन्तु वह राज्य सम्बन्धी लाभों को जताकर उनकी एक चलने नहीं देता। तब उसके तीनों भाइयों ने आकर उसे समझाया, पर अकेले ही उसने तीनों को निरुत्तर कर दिया और अनेक प्रमाण और युक्तियों से सबको शास्त्रार्थ में परास्त किया। तब वे तीनों भाई हार मानकर कारण जानने के अर्थ अपनी माता के पास आये। और अति श्रद्धा से माता के चरणों में शीश नवाकर प्रार्थना की, कि माता जी हम भी तीनों आपके पुत्र हैं जो एक दूसरे के पश्चात् सब सन्यासी हो गये और चौथा भी आपका ही

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वीरेन्द्र गुप्त

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पुत्र है जो बहुतेरा समझाने और शास्त्रार्थ करने पर भी सन्यासी नहीं हुआ, वरन् हम सबको परास्त कर राज्याधिकारी बनने के लिए घर आ गया। माता ने उन्हें धैर्य देकर समझाया कि आप ठहरेँ मैं आपको सन्तोष जनक उत्तर दूँगी और आपकी शंका का समाधान भले प्रकार करूँगी। फिर माता ने विधि पूर्वक तीनों का अतिथि सत्कार किया।

प्रातः जब वे शौच स्नान नित्य कर्म से निवृत्त हुए तो तीनों को एक विशाल भवन में जो वेद वेदांग त्याग वैराग्य आदि इसी प्रकार के सहस्रों ग्रन्थों से पूर्णित था साथ ले जाकर बिठला दिया कि आज आप इन ग्रन्थों का अवलोकन कीजिये और जो चित्र इसमें लटक रहे हैं उन्हें भी ध्यान से देखिये। वे चित्र सभी सन्यासियों, त्यागी, वैरागी, महान पुरुषों के जीवन चरित्र सहित थे। यह सब सारे दिन उन्हीं को देखते और विचारते रहे रात्रि में शयन किया। प्रातः निवृत्त होकर माता से पुनः कहा कि हमारी शंका का समाधान कीजिये। माता ने कहा शीघ्रता क्या है मैं उत्तर देने का वचन दे चुकी हूँ, आज तो और ठहरिये। माता ने उस दिन दूसरे भवन में जो नाना प्रकार के शस्त्रों अस्त्रों और सैनिक वीर पुरुषों योद्धाओं के चित्रों से शोभित था और उसमें अनेक ग्रन्थ राजनीति और शस्त्रादि, जल तथा आकाश यान बनाने की रीतियों से परिपूर्ण थे, जिसमें अस्त्र-शस्त्र बनाने चलाने व्यूह रचनायें और व्यूह आदि को खण्डित करने की क्रियाओं के साथ विद्यमान थीं लोजाकर बिठला दिया, और कहा कि आज का दिन इस भवन के चित्रों तथा ग्रन्थों के अवलोकन तथा मनन में व्यतीत कीजिये उन सबने वैसा ही किया। वह दिन भी समाप्त हो गया रात्रि को भोजनादि से निवृत्त होकर शयन कर प्रातःकाल उठे नित्य कर्म से निवृत्त हो माता से पुनः प्रश्न किया कि अब आप कृपया हमारी शंका का समाधान कीजिये। माता ने कहा कि मैं तो उत्तर दे चुकी। जब तुम तीनों मेरे गर्भ में थे और जब तक गुरुकुल नहीं

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वीरेन्द्र गुप्तः

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भेजा गया था मेरा सारा समय पहले कमरे में व्यतीत हुआ, वही दृश्य मेरे सामने रहे, उन्हीं ग्रन्थों को जो त्याग वैराग्य से भरपूर थे पढ़ा। उसी का तुम्हें उपदेश किया।

माता से बढ़कर अध्यापक और वेदों से बढ़कर ग्रन्थ संसार में कोई नहीं है। तो भला कैसे सम्भव था कि तुम सब सन्यासी न होते। जब तुम्हारा छोटा भाई सन्यासी हो गया। उस समय तुम्हारे पिता को खेद हुआ कि डम' वंश से राज्य जाता है और ही कोई राज्याधिकारी होगा और वंशोच्छेदन भी होता है। तब मैंने प्रतिज्ञा की कि अब मैं आपकी इच्छा पूर्ति के अर्थ एक और पुत्र उत्पन्न करने का कष्ट सहूँगी और उसे ऐसी शिक्षा दूँगी कि संसार में कोई भी बड़ी से बड़ी शक्ति उसे सन्यासी नहीं बना सकेगी। सो मेरा उस समय से गुरुकुल जाने पर्यन्त सारा समय इस दूसरे भवन में व्यतीत हुआ। इसलिए उस पर आपकी वा अन्य किसी की युक्तियाँ क्या प्रभाव डाल सकती थीं। यह कथा सुन तीनों भाई सावधान हो, चले गये और चौथा भाई राज्याधिकारी हुआ।

यवन शासक औरंगजेब का दरबार लगा हुआ है। अनेक वीर योद्धा राजपूत, पठान तथा मुगल आदि अपने अपने स्थानों पर मौन बैठे हैं। रोंब के कारण सब की दृष्टि भूमि की ओर झुकी हुई है। किसी में इतना साहस नहीं कि सर उठाकर देख सकें। हाँ! केवल एक वीर ऐसा है जो सर उठाए हुए बादशाह के पास ही एक कुर्सी पर बैठा है। उसकी मुद्रा से धैर्य, साहस और वीरता झलक रही है। तो दूसरी ओर खुशामदी टट्टू बैठे हैं। इस निर्भीक वीर का नाम है यशवन्तसिंह। जो सम्राट का दायी हाथ और साथ में हृदय का काँटा भी समझा जाता है।

कुछ कालान्तर के पश्चात् एक भयंकर सिंह दरबार में लाया गया। जिसे सम्राट ने पकड़वाकर मंगवाया था, सम्राट उसकी प्रशंसा के पुल बीधने लगे। दरबारी जन भी ही में ही मिलाने लगे।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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गर्भ के लक्षण और वृद्धि

इसी बीच बादशाह ने अहंकार सहित दरबारियों की ओर देखते हुए कहा- 'मेरे विचार में इससे भयंकर शेर संसार में दूसरा न होगा।'

दरबारियों की गर्दनें हिलने लगीं 'बेशक सही फरमाते हैं जहाँपनाह', आदि-आदि स्वर चहूँ और से सुनाई देने लगे। केवल यशवन्तसिंह चुप थे। जब सम्राट ने उनकी ओर देखा तो हँस दिये। सम्राट को भाल पर रेखायें पड़ गयीं, अपना अपमान समझ वह और क्रुद्ध हुआ। परन्तु वह कर ही क्या सकता था? वह तो स्वयं यशवन्तसिंह से घबराता था। अपनी मुद्रा को सँभाल बनावटी हँसी हँस कर कहने लगा 'क्यों? आप हँसे क्यों? क्या आप इसे भयंकर शेर नहीं मानते?'

'सम्राट! यह तो एक साधारण सिंह है ऐसे सिंहों से हमारे बच्चे खेलते हैं।' ईष्या के साथ बादशाह ने कहा 'ओह!'

'जी ही! यदि आशा हो तो मैं भी अपना सिंह दिखाऊँ।' ही अवश्य दिखाओ। कल उसे दरबार में अपने साथ लाना, तुम्हारे शेर और हमारे शेर की कुश्ती होगी। देखें कौन जीतता है। कुश्ती की ललकार स्वीकार कर यशवन्तसिंह बैठ गये।

दरबार समाप्त हुआ, यशवन्तसिंह घर गये उसी समय पुत्र पृथ्वीसिंह पाठशाला से पढ़कर आया। यशवन्तसिंह ने कहा 'बेटा कल दरबार देखने चलोगे' पृथ्वीसिंह ने प्रसन्न होकर कहा 'हाँ पिताजी मैं कल दरबार देखने अवश्य चल्गूंगा।'

पृथ्वीसिंह और दिनों की अपेक्षा आज दरबार जाने की प्रसन्नता में नित्य कर्मों से शीघ्र ही निबट कर तैयार हो गया।

अगले दिन दरबार और दिनों की अपेक्षा दर्शकों से अधिक भरा हुआ है। क्योंकि दरबार में सिंह की कुश्ती होने का समाचार सारे में फैल गया था। सम्राट के सिंह का पिंजरा दरबार में उपस्थित है, सभी दर्शकों को दीख रहा है। परन्तु सबकी लालायित दृष्टियाँ यशवन्तसिंह तथा उसके सिंह के आने की

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वीरेन्द्र गुप्तः

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प्रतीक्षा में लगी हुई हैं। कुछ ही क्षणों के पश्चात् यशवन्तसिंह अपने प्रिय पुत्र पृथ्वीसिंह को साथ लिए दरबार में उपस्थित हुए। सबकी दृष्टि यशवन्तसिंह और उनके साथ बालक पर पड़ी, परन्तु सिंह को किसी ने नहीं देखा। सिंह को साथ न देखकर उपहास और व्यंग के साथ शाहंशाह कहने लगे 'कहिए! आपका शेर कहाँ रह गया?' क्या हमारे शेर से डर गया? खुशामदी लोगों ने साथ दिया। परन्तु यशवन्तसिंह पर इस उपहास का कोई प्रभाव न पड़ा। वह मुस्कराते हुए कहने लगे- 'मेरा सिंह मेरे पास है।' सब चौंक उठे। सम्राट ने आश्चर्य से कहा- 'कहाँ है?' यशवन्तसिंह ने मधुर स्वर में कहा- 'मेरे पास बैठा है। खुशामदी दरबारी- 'यह शेर!' कहकर हँसने लगे, साथ में औरंगजेब भी खूब हँसा और कहने लगा- 'यशवन्तसिंह तुमको क्या हो गया? कहाँ यह भयंकर शेर कहाँ एक दूध पीता बालक।' परन्तु यशवन्तसिंह चुप रहे।

बच्चा पिता के संकेत को समझ गया। तत्काल ही बच्चे के हृदय में रजपूती वीरता उनड़ पड़ी, भुजाएँ फड़कने लगीं। और मुखड़े पर लालिमा छटकने लगी। उसी क्षण पृथ्वीसिंह अपने पिता की तलवार म्यान से निकाल सिंह की ओर बढ़ा। पुत्र को सिंह की ओर बढ़ता देखकर यशवन्तसिंह ने कहा- 'बेटा! निःशस्त्र पर शस्त्र लेकर सामने जाना क्षत्रियों का धर्म नहीं।' पिता का वचन सुनते ही बच्चे ने पुत्रा तलवार छोड़ खाली हाथ ही पिजरे की ओर बढ़ा। पिजरा खोल कर राजपूत सिंह का बच्चा उस हिंसक सिंह से भिड़ गया। तत्काल ही उस यशवन्तसिंह सुत ने अहंकारी यवनिक शासक सिंह के जबाड़े को पकड़ कर चीर दिया।

पाठको क्या यशवन्तसिंह ने अपने बच्चे को पहले से ही सिंह से कुश्ती लड़ने का अभ्यास करा रखा था? या दरबार में कुश्ती की चुनौती को स्वीकार कर कुछ दिन का अवकाश लेकर लड़ना सिखाया था? नहीं-नहीं! सिंह की कुश्ती अगले ही दिन थी। परन्तु यशवन्तसिंह ने अपने पुत्र को गर्भाधान से ही सिंह

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वीरेन्द्र गुप्त:

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बनाया था। उसे पूर्ण विश्वास था कि मेरा पुत्र सिंह से कुश्ती में हारेगा नहीं तभी तो निर्भय, निःसंकोच और दृढ़ता के साथ भरे दरबार में औरंगजेब की ललकार को स्वीकार किया था और विशेषता यह कि घर जाकर पुत्र से सिंह की कुश्ती के बारे में कुछ कहा भी नहीं।

गर्भाधान से लेकर ५ वर्ष की आयु तक बालक पर माता के विचार, धारणा, ध्यान, कार्य चित्रावलोकन आदि सभी बातों का प्रभाव-पड़ता है इसलिए, जिस प्रकार के बच्चे की इच्छा हो उसी प्रकार के चित्र, ग्रन्थ, गाथाओं का अवलोकन तथा मनन गर्भिणी को करना चाहिए और अपनी दिनचर्या भी उसी अनुसार रखनी चाहिए।


गर्भ के लक्षण और वृद्धि

प्रथम मास- यदि स्त्री को मासिक धर्म सम्बन्धी कोई रोग न हो, तो गर्भ धारण के पश्चात् मासिक धर्म नहीं होता। यह गर्भ का प्रथम और निश्चित लक्षण है। अधिकांश स्त्रियों का जी मिचलाता है बार-बार थूकने की इच्छा होती है, मुख से पानी अधिक निकलता है। भूख अधिक लगने लगती है, और चेहरे पर दुर्बलता के चिह्न होते हैं। स्त्रियों के मासिक धर्म का दोष, बन्ध्या दोष या अन्य व्याधि के कारण गर्भ स्थित न होने पर निम्नलिखित औषधि का प्रयोग ३ मास तक निरन्तर कराने से गर्भ सम्बन्धी सभी विकार दूर होकर गर्भ धारण करने की शक्ति प्राप्त होती है। साँठ ३ तोला, शतावर ३ तोला, असगन्ध नागौरी ३ तोला अजवायन ३ तोला, ईसबगोल १।। तोला, मिश्री १२ तोला ईसबगोल को छोड़कर सारी वस्तुओं को कूट छान लें बाद में ईसबगोल साबत ही मिला दें। मात्रा ४ माशा सुबह ४ माशा सायं दूध से

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वीरेन्द्र गुप्तः

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गर्भ में जीव पहुँचने का समय

दें। यह औषधि गर्भ स्थित होने पर ४ मास तक दे सकते हैं। द्वितीय मास- स्तन बड़े और स्थूल होने लगते हैं और उनमें कठोरता भी आ जाती है। स्तन वृत्त भी बड़े हो जाते हैं, उनके आसपास काले रंग के बिन्दु जैसे धब्बे उभरे से दिखाई देते हैं। उनमें वेदना होती है। प्रातः शय्या से उठने पर अक्सर वमन हो जाती है। स्वभाव बदल जाता है। नीली रंग प्रकट हो जाती है और नाभि प्रदेश भीतर को हो जाता है। इस मास के अन्त तक स्तनों में दूध भी आ जाता है।

तृतीय मास- गर्भवती के मूत्र को एक शीशे के पात्र में रख दिया जाये, तो उसके ऊपर सफेद रंग की मलाई जैसा हल्का द्रव तैरने लगता है।

चतुर्थ मास- गर्भवती का उदर सामने की ओर अधिक बढ़ने लगता है। स्तन वृत्त फूलने लगते हैं। नाभि ऊपर की ओर उठ आती है। गर्भाशय में भ्रूण का हिलना-डुलना स्पष्ट जान पड़ता है, जैसे-जैसे बालक का विकास होता है, वैसे-वैसे हिलना-डुलना भी अधिक अनुभव होता है।

पंचम मास- गर्भस्थ बालक के हृदय का शब्द गर्भवती के उदर पर कान रखकर या यन्त्र द्वारा सुना जा सकता है ज्यों-ज्यों प्रसव का समय निकट आता जाता है त्यों-त्यों वह शब्द अधिक स्पष्टता से सुनाई पड़ने लगता है।

छठा मास- इस मास में गर्भवती के अस्वस्थ लक्षण (जी मिचलाना, वमन, मन्दगिनी आदि) दूर हो जाते हैं। वह अब स्वस्थ प्रतीत होती है। सातवें, आठवें और नवें मास में उदर विशेष रूप से अधिक बड़ा हो जाता है और गर्भवती बड़ी सुगमता से बच्चे के हृदय गति के शब्द का अनुभव करती है।

तीसरे मास में गर्भित भ्रूण के हाथ पाँव और मस्तक ये पाँच अंग प्रकट हो जाते हैं तथा सूक्ष्म अंग प्रत्यंग और मस्तक आदि के साथ ही सुख-दुःख के अनुभव करने वाले ज्ञान तन्तु

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सन्तान का गौर वर्ण बनाना

भी प्रगट हो जाते हैं।

गर्भ की नाभि में जो नाल लगी रहती है वह गर्भिणी माता के हृदय से बँधी रहती है उसके द्वारा माता के आहारजनित रस का उपस्तेह उस गर्भ को पुष्ट करता रहता है।

चौथे मास में सम्पूर्ण अंग प्रगट हो जाते हैं। पीचवें मास में गर्भ में चेतना शक्ति आ जाती है। छठे मास में स्नायु, शिरा, रोम, कंश, वर्ण और त्वचा ये सब उत्पन्न हो जाते हैं। सातवें मास में सब भावों से सर्वांग सम्पूर्ण गर्भ पुष्ट हो जाता है।

आठवें मास में ओज माता और गर्भ के शरीर में बार-बार संचार करता है इसलिए वे दोनों कभी मुदित और कभी म्लीन हो जाते हैं। जब ओज का संचार गर्भ में होता है तब माता म्लीन और क्लान्त-सी हो जाती है तो गर्भ प्रसन्न हो जाता है। जब ओज माता में आ जाता है तो गर्भ क्लान्त हो जाता है यही कारण है कि आठवें मास में ओज स्थिर न होने के कारण आठवें मास में उत्पन्न हुआ बालक जीवित नहीं रह पाता। किन्तु स्त्री के जीवन में संशय रहता है। यदि आठवें मास में बालक की उत्पत्ति के समय ओज स्त्री को न मिल कर गर्भ के पास पहुँचता है और उस ओज सहित गर्भ निकल जाता है अर्थात् प्रसव हो जाता है तो स्त्री की मृत्यु हो जाती है अन्यथा स्त्री जीवित रहती है।

अष्टांगहृदय संहिता

शरीर स्थान

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संस्कार

गर्भ में जीव पहुँचने का समय

अधिकौश व्यक्तियों की धारणा है कि भ्रूण में जीव तीसरे मास पड़ता है, यह भ्रम है। जब कि गर्भाधान के पश्चात् गर्भ द्वार बन्द हो जाता है तो जीव तीसरे मास किस मार्ग द्वारा भ्रूण में पहुँच सकता है। दूसरे जो वस्तु चैतन्य रहित होती है वह एक जगह पड़े-पड़े सड़ने लगती है। जैसे नदी में पड़ा हुआ टापू के बीच का जल गतिहीन होकर सड़ने लगता है। तीसरे जिस प्रकार पेड़ का गुदा काट कर अलग डाल देने से नहीं फल-फूल सकता और ना ही बढ़ सकता है। इसी प्रकार गर्भाशय के मध्य चैतन्य रहित वीर्य सड़कर नष्ट हो जायेगा और जो वृद्धि को भी प्राप्त नहीं हो सकता। खुर्दबीन द्वारा वीर्य में देखने से छोटे-लम्बे आकार का कीट दीखता है। जिसके वीर्य में यह कीट नहीं होता, उस वीर्य से गर्भ स्थित नहीं हो सकता। चाहे जितना समागम करें। इसीलिये शास्त्रकारों ने कहा है, वीर्य को व्यर्थ नष्ट करने से ब्रह्म हत्या का पाप होता है। क्यों? क्योंकि वीर्य में जीव होता है। इससे स्पष्ट है कि जिस समय वीर्य रजः से मिलकर गर्भाशय में जाता है उसी समय जीव भी पहुँचता है। हम पीछे लिख, आये हैं कि जीव शरीर में भोजन द्वारा किस प्रकार वीर्य में पहुँचता है।


गर्भ में पुत्र पुत्री परीक्षा

यदि दाहिना नेत्र किन्चित बड़ा हो, दाहिनी जंघा भारी हो, दाहिना पग चलने में किन्चित देरी से उठता हो तथा प्रथम दाहिने स्तन में दुध आवे। मुख प्रसन्न और रंग उत्तम हो तो पुत्र के लक्षण जाने, इसके विपरीत पुत्री के लक्षण होते हैं। पाँचवें मास गर्भ में बालक के हृदय की ध्वनि आने लगती है। यह ध्वनि एक

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वीरेन्द्र गुप्ताः

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प्रसव

मिनट में १२० सुनाई पड़े तो पुत्र है और केवल २० या २२ की ध्वनि सुनाई पड़े तो पुत्री जानो।

गर्भ स्थिति के २॥। मास हो जाने पर प्रातः काज निहार मुंह गर्भिणी को खाण्ड के एक बताशे में बद्ध की टहनी तोड़ कर दो बूँद दूध टपका कर ताजे जल से सेवन करा दें। यदि पच जाये तो पुत्र है। वमन हो जाय तो कन्या।


सन्तान का गौर वर्ण बनाना

इसके लिए १ माशा बंसलोचन, ५ नग बादाम की मींग छिलका उतारी हुई पीसकर बूरा मिलाकर सेवन करायें। दूध की खीर का भोजन नित्य करायें। गोला मिश्री का सेवन। टमाटर बीज रहित, अमरूद, अनार, सेब, सन्तरा आदि का अधिक प्रयोग करें। शुद्ध केशर पान में रखकर या दूध में डालकर पीना चाहिए। बंसलोचन ५ तोला बबूल की पत्ती २० तोला, कमल गट्टे की मींग २० तोला। कमल गट्टे की मींग की जीभ निकाल देनी चाहिए यह मींग के बीच में पीले रंग की होती है, इसमें विष का अंश होता है। तीनों को पीस कर २ माशा दूध के साथ सेवन करें। बंसलोचन १ तोला, सितोपलादि चूर्ण १ तोला, केशर १ माशा, तीनों को बारीक पीसकर रखलें इसमें से १ माशा नित्य दूध के साथ सेवन करें। पत्ते वाले शाकों का प्रयोग करने से सन्तान का वर्ण श्याम होता है। यह सब उपचार सन्तान का गौर वर्ण करने के लिए गर्भ के छठे मास से प्रारम्भ करके अन्त तक करना चाहिए।

नोट- टमाटर का बीज सावक होता है इससे गर्भ पात हो जाता है इसलिये टमाटर का बीज गर्भणी को नहीं देना चाहिए।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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संस्कार

मानव को छोड़कर परमपिता परमात्मा ने सभी जीव जन्तुओं को उनकी प्रकृति के अनुसार जन्म से ही कुछ प्रकृतियों प्रदान की हैं। जिनमें कभी परिवर्तन नहीं होता। परन्तु उस जगत्तियन्तना ने मानव को कोई भी प्रकृति प्रदान नहीं की। मानव की प्रकृति जल रूप बनाई है। जिस प्रकार जल दूध के साथ मिलकर अपने रूप को त्याग कर दूध रूप हो जाता है। आप जल का जिस वस्तु के साथ संयोग कर देंगे, जल उसी वस्तु के अनुरूप हो जायगा और अपना अस्तित्व त्याग देगा। ठीक इसी प्रकार मानव की प्रकृति है।

एक बार मानव के बच्चे को भेड़िया उठाकर ले गया। वह मानव का बच्चा जंगल में भेड़ियों के साथ पलता रहा। वह भेड़ियों की-सी बोली बोलता, भेड़ियों का ही भोजन पाता, भेड़ियों की तरह उछल कूद करता और भेड़ियों की ही तरह नग्न रहता। किसी प्रकार वह मानव का बच्चा पकड़वा कर नगर में लाया गया। नगरवासियों ने उसे रोटी दी, वह उसे सँध कर फँक देता, पहनने के लिये वस्त्र दिये उसे भी फाड़कर फँक देता और अपनी मानवीय बोली न बोलकर भेड़ियों की ही बोली बोलता।

अब आप दूसरी ओर देखिये! इसी प्रकार एक सिंह का बच्चा भेड़ियों के झुण्ड में फँस कर उन्हीं के साथ चला गया, और भेड़ियों के साथ रहने लगा। उस सिंह के बच्चे में भी भेड़ियों जैसी उछल कूद कायरता आ गई। वह भी सिंह को देख कर भेड़ियों के साथ भयभीत होकर भाग जाता। परन्तु प्रकृति ने उसे जो अपनी बोली दी थी वह उसे न भूला और वह अपनी ही बोली बोलता। एक बार सिंह ने देखा कि हमारा एक बच्चा भेड़ियों के साथ रहकर भेड़ियों जैसा कायर हो गया है। सिंह भेड़ियों के झुण्ड पर झपटा और सिंह के बच्चे को पकड़ नदी के किनारे लाकर

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वीरेन्द्र गुप्तः

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जन्म समय

उसे जल में अपनी और उसकी छाया से छाया मिलाकर दिखाया और समझाया। बेटा यह भेड़िये तो हमारा भोजन हैं और तु इनके साथ खेलता है। वही सिंह का बच्चा जो कुछ समय पूर्व भेड़ियों के साथ खेलता था वह अब उसे अपना भोजन समझने लगा।

देखिये! एक सिंह का बच्चा जो संगत से कुछ बदल गया था पुनः अपनी प्रकृति के अनुरूप बन गया। परन्तु भेड़ियों के बीच मानव का पला हुआ बच्चा अपना भोजन, बोली रहन सहन और प्रकृति आदि सभी कुछ छोड़ बैठा। वह अनेक प्रयत्न करने पर भी नहीं सुधर पाता।

इसी कारण मानव के निर्माण में हमारे महर्षियों ने संस्कारों की रचना की। मानव के बच्चे का स्वयं कोई स्वभाव नहीं होता, उसे संस्कारों द्वारा जैसा आप बनायेंगे वैसा ही बनकर तैयार होगा।

हम पीछे लिख आये हैं कि संस्कारों से ही उत्तम सन्तान होती है। गर्भाधान के पश्चात् पुंसवन संस्कार हो तत्पश्चात् सीमन्तोन्त्यन संस्कार होना चाहिए। यह संस्कार किस प्रकार किये जायें इसको लिखने की यहीं आवश्यकता नहीं क्योंकि महर्षि दयानन्द सरस्वती की लिखित संस्कार विधि में मनुष्यों के १६ संस्कार लिखे हैं उसी में से विधि देखकर करें।

★★★

प्रसव

समय जानना-समय रहते प्रसव की उचित व्यवस्था करने के लिए ये आवश्यक है कि प्रसव का सम्भावित समय ज्ञात हो। यह समय गर्भ स्थिति से ठीक ९ मास १० दिन पश्चात् होता है। यदि गर्भ में विकार है तो इससे पूर्व तथा पश्चात् भी प्रसव हो सकता है। गर्भ में जब भ्रूण सर्व प्रथम हिलता है, तो उसके ४ मास २० दिन के पश्चात् प्रसव (बालक का जन्म) होता है। अन्तिम मासिक धर्म होने की तिथि से आगे सात दिन जोड़ने के

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वीरेन्द्र गुप्तः

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उपरान्त पीछे की ओर तीन मास गिनने से प्रसव का सम्भावित समय ज्ञात हो जाता है।

प्रसव स्थान- प्रसव काल से पूर्व ही यह निश्चय कर लेना चाहिए कि प्रसव कहाँ हो। चिकित्सालय अथवा प्रसूतिका गृह में प्रसव होना माँ और बच्चे दोनों के लिए ही हितकर है।

१- यह नहीं कहा जा सकता कि प्रसव काल में कब और कौसी आकस्मिक अवस्थायें उत्पन्न हो जायें। चिकित्सालय में ऐसी आकस्मिक अवस्थाओं की तत्काल उचित चिकित्सा हो सकती है।

२- कोई भी घर अथवा अन्य स्थान इतना स्वच्छ नहीं रहता जितना चिकित्सालय या प्रसूति का गृह आदि विशेष रूप से बनाये जाते हैं।

३- चिकित्सालय में माँ और बच्चे को हर प्रकार का आवश्यक परामर्श हर समय मिल सकता है।

४- चिकित्सालय में माँ को लगभग २ सप्ताह का पूर्ण विश्राम मिल जाता है। जो इस अवस्था में अधिक आवश्यक है।

प्रसव आरम्भ होने के लक्षण- प्रारम्भ में योनि से रक्त मिश्रित स्त्राव होता है इसके साथ साथ गर्भाशय का आर्कूचन प्रारम्भ होता है। जिसके कारण पेट में एक विशेष प्रकार की एंठन और दबाव का अनुभव होता है। जो कि पेट से चलकर रानों तक अनुभव होता है। यह एंठन पीठ से भी प्रारम्भ हो सकती है और जब पीठ से पेट की ओर, और पेट से नीचे रानों की ओर आती है। प्रारम्भ में यह एंठन बहुत अधिक नहीं होती और अधिक समय पूर्व होती है। धीरे-धीरे इसकी गति बढ़ती जाती है और यह तीव्र दर्द में परिणित होने लगती है, साथ ही बीच के अन्तर का समय भी कम होता जाता है। बस यही प्रसव का निकटतम समय है। ऐसे समय में बिलम्ब नहीं करना चाहिए, अपने जहाँ का निश्चय कर रखा हो प्रसव के लिए तत्काल ले जाना चाहिए। ***

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वीरेन्द्र गुप्तः

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जन्म समय

प्रसव के पश्चात् स्त्री को निम्नलिखित योग दस बारह दिन तक देने से शरीर की समस्त व्याधियों से छुटकारा मिल जाता है।

पीपल छोटी १॥ तोला गाय के कच्चे दूध में भिगो दें इस दूध को दूसरे दिन बदल देना चाहिए इसी प्रकार १० दिन तक पीपलें दूध में भीगी रहें। १० दिन पश्चात् जल से धोकर मोटे कपड़े से भली प्रकार मसल कर पीपलों के दाने निकाल लें। इसके अभाव में ६४ प्रहरी पीपल के चूर्ण का प्रयोग कर सकते हैं।

उपरोक्त पीपल के दाने ६ माशा, स्वर्ण भस्म ३ रत्ती, रजत भस्म ६ रत्ती, इन तीनों वस्तुओं को खरल में डालकर घोटें जब बारीक होकर एक हो जायें तो इसकी २-२ रत्ती की मात्रा से पुड़ियाँ बनालें प्रसव के पश्चात् शरद् ऋतु में प्रातः सायं और ग्रीष्म ऋतु में केवल प्रातःकाल मधु में मिलाकर सेवन करायें।

बालक को स्वच्छ कर उष्ण जल से स्नान कराकर पिता अपनी गोद में लेकर बालक की जीभ पर घृत और मधु मिलाकर सोने की शलाका से (३%) अक्षर लिखें और दहिने कान में (वेदोसीति) तेरा गुप्त नाम वेद है ऐसा कहें। इस जातकर्म (जन्म समय) के संस्कार का विवरण संस्कार विधि में देखें और वैसा ही करें।

प्रसूतिका को प्रथम दिन आवश्यकता पड़ने पर केवल साँठ ३ माशा, अजवायन १॥ माशा, देसी पान १ नग, २॥ सेर जल में डाल कर दो उबाल का देना चाहिए और निरन्तर १० दिन पर्यन्त यही जल पीने को देना चाहिए ठंडा या गर्म ऋतु अनुसार तथा इच्छा पर निर्भर है।

इसके पश्चात् दो उबाल का सादा जल १५ दिन तक दें, फिर सादा जल में लोहे की किसी वस्तु को जिस पर जंग आदि न लगी हो लेकर १० बार अग्नि में तपाकर जल में बुझायें

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प्रसूतिका का पेट बँध जाने पर

इस जल को प्रसूतिका को एक मास तक पिलायें। प्रसूतिका को कच्चा (बिना उबाले) जल नहीं पिलाना चाहिए इससे बहुत हानि होती है। और पेट आगे को निकला ही रहता है क्योंकि कच्चे जल के पीने से पेट की रंगें ठण्डी पड़ जाती हैं इस लिए सिक्कुड़ नहीं पाली प्रसव के पश्चात् प्रसूतिका के पेट पर पड़ी लगभग १० दिन तक निरन्तर बाँधनी चाहिये। इससे पेट के बड़े रहने का भय नहीं रहता पड़ी कसकर बाँधनी चाहिए।

दूसरे दिन से गुरुकुल काँगड़ी की चाय दूध मिलाकर पाँच दिन पर्यन्त देनी चाहिए।

तीसरे दिन से घी २० तोला, गुड़ २० तोला, सौंठ १॥ तोला, जीरा सफेद २ तोला, अजवायन ३माशा, पिस्ता, बादाम की मींग चिरौजी, मखाना, गींद, काजू, अखरोट की मींग, यह सब ५५ तोला सबको कूट पीस कर घी और गुड़ के साथ पाक बनालें इसे नित्य २ तोला प्रातः सायं १५ दिन तक दें।

चौथे दिन से उपरोक्त चाय में घी डाला जा सकता है और बादाम का छाँका घी डालकर एक सप्ताह तक दिया जा सकता है।

बालक को पान देसी आधा अजवायन १ माशा और नीम के पत्ते ३ नग, जल १ पाव। पकाये हुए जल में किंचित गुड़ मिलाकर ३ दिन तक दें और माता का दूध न दें। जब तीसरे चौथे दिन माता तथा बालक का पेट साफ हो जाय तो बालक को माता का दूध देना चाहिए, और माता को शनैः-शनैः हल्का अन्न देना आरम्भ कर दें। कौकड़ की छाल १ पाव, ४ सेर जल में पका कर रखें प्रसूतिका को इस जल से गर्भ द्वार (योनि) को नित्य दिन में ३-४ बार धोना चाहिए तथा छपके लगाया करें, क्योंकि प्रसव के पश्चात् गर्भद्वार अधिक फैल जाता है और उसे पूर्व स्थिति में लाने के लिये ऐसा करना उचित है। इसी प्रकार गर्भावस्था में पेट बढ़ जाता है और प्रसव के पश्चात् सिक्कुड़ने

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स्तन पान के समय कुछ ध्यान देने योग्य बातें

लगता है, पेट की त्वचा पर भुर्रियों पड़ जाती हैं। पेट की त्वचा और रंगों को सही स्थान पर लाने के लिए यह आवश्यक है कि प्रसूतिका को प्रसव के २० दिन पश्चात् टब में कौकड़ की छाल का तैयार किया हुआ गर्म जल भर लें और उसी में २ तोला फिटकरी पीस कर और मिला दें तत्पश्चात् प्रसूतिका की तेल मालिश करके टब में १५-२० मिनट बैठा लें तथा प्रसूतिका पेट को जल में लेटे-लेटे हल्के हाथ से मले जल का गर्म होना अनिवार्य है। इस क्रिया के १५ या २० दिन तक करने से प्रसूतिका का पेट और गर्भ द्वार अपने प्राकृतिक रूप में आ जाते हैं। इससे कमर और शरीर का दर्द, आलस्य आदि सब दूर होकर स्वस्थ हो जाती है। प्रसूतिका को प्रसव के ४ या ५ दिन पश्चात् देवद्वारादि क्वाथ सात दिन तक देना चाहिए इससे प्रसूतिका का ज्वर, वेदना, आलस्य को दूर करके शरीर को निरोगी करता है। इसको उपेक्षा में १ मास तक शरद् ऋतु में दशमूलारिष्ट और ग्रीष्म ऋतु में दशमूला अर्क का प्रयोग कर सकते हैं।

प्रसूतिका की मालिश सरसों के तेल की नित्य १५ या २० दिन तक अवश्य होनी चाहिए और बालक की लोई भी १ वर्ष तक होती रहनी चाहिए (गेहूँ के आटे में सरसों का तेल और पानी मिलाकर बच्चे के मलने को लोई कहते हैं)।

देवद्वारादि क्वाथ

देवद्वार, बघदूध्या, पोखर मूल, पीपल छोटी, सौठ, कायफल, नागर मोथा, चिरायता, कुटकी, धनियाँ, हर्र की बकली, गजपीपल, जवाशा, गोखरु, कटैली की जड़, अतीस, गिलोय, काकड़ा सिंगी, काला जीरा।

सारी वस्तुएँ समान भाग लेकर दरदरा कट लें। मात्रा २॥ तोला लेकर आधा सेर जल में पका कर, जब जल १ छटीक रह जाय तो छान कर पिला दें।

प्रसूतिका को 'सौभाग्य सौंठी' का सेवन कराना चाहिये। ★★★

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प्रसूतिका का पेट बढ़ जाने पर

प्रसव के २० दिन पश्चात् पीपला मूल का चूर्ण २ माशा प्रातःकाल दूध से लेने पर बढ़ा हुआ पेट ठीक हो जायेगा। एक मास तक सेवन करें।


शिशु पालन

जिस देश के शिशुओं की देखभाल दिनचर्या पर पूर्ण ध्यान दिया जाता है वह देश स्वस्थ, निरोगी और बलिष्ठ होता है।

नवजात शिशु का शरीर अत्यन्त कोमल होता है। इसलिये उसकी रक्षा के लिये अत्यन्त सावधानी की आवश्यकता है। प्रसुता स्वयं दुर्बल होती है, वह भली प्रकार बालक की देखभाल नहीं कर सकती और न सारा भार उसके ऊपर ही छोड़ना चाहिए। प्रसुता के पास चतुर स्त्री को उसकी देखभाल के लिए हर समय उपस्थित रहना चाहिए।

सबसे पहले बालक के शरीर की भली प्रकार सफाई करनी चाहिए। उसके शरीर पर मल चिपका होता है। इस लिये केवल पानी डालने से मल साफ नहीं होता इसलिये बालक के शरीर को हल्के हाथ से मल को साफ करना चाहिये। बालक को स्नान के समय हवा नहीं लगनी चाहिए, स्नान बन्द कमरे में हल्के गर्म जल से कराना चाहिए। शरीर पोछ कर ऋतु अनुसार वस्त्र पहनायें।

बालक का पेट साफ रखना आवश्यक है इसके लिए जन्म घड़ी पका कर रख लेनी चाहिए इसको गर्म करके देने से बच्चे को दस्त होकर पेट साफ हो जाता है और यदि ठन्डा ही

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रति समय बच्चे को स्तन पान कराने से हानियाँ

पिलाया जाय तो दस्त होते हों तो बन्द हो जाते हैं इससे पाचन क्रिया ठीक रहती है।

जन्म घुड़ी

४ माशा हरं छोटी, ४ माशा हरं बकली, ६ माशा सौफ, २ माशा सनाय, २ माशा अजवायन, २ नग उन्नाव, ४ माशा बायविडंग, २ नग मरोइफली, १ माशा इन्द्र जी मीठा, १ माशा सुहाग खील, १ माशा गुदा अमलतास, २ माशा गुलाब फूल, १ माशा मुलेठी, १ नग मुनक्का, १ नग ढकपन्ना, १ नग बाखुम्बा, आधा नग अंजीर, १ माशा नरकाचूर, १ माशा खुबकला।

सब को दरदरा करके इसमें से २ तोला औषधि को लेकर आध पाव जल में पकाओ जब जल २॥ तोला रह जाय तो उतार कर छान लो और शीशी में भरकर रख लो। मात्रा एक चम्मच (टीस्पून) का थोड़ा शहद मिलाकर दें।


स्तन पान के समय कुछ ध्यान देने योग्य बातें

दूध- बच्चे का सर्वोत्तम भोजन माता का दूध है। बच्चे को जन्म के चौथे दिन से स्तन पान कराना उचित है। स्तन पान के समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि बच्चे का सर ऊँचा और कमर नीची रहे जिससे दूध सीधा पेट में पहुँचता रहे।

स्तन अथवा स्तन वृत्त कठोर होने पर सुपारी को पानी में घिस कर लेप करने से स्तन कोमल हो जाते हैं और बच्चा सुगमता से दूध पीने लगता है।

स्तनों का मल, पसीना आदि धोकर साफ करके ही दूध पिलाना चाहिए। बालक को जितनी बार स्तन पान कराया जाय हर बार स्तनों को जल से धो लेना चाहिए और पहले थोड़ा-सा

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वीरेन्द्र गुप्तः

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माता का दूध कम होने पर

दूध निकाल कर भूमि पर गिरा देने के पश्चात् बालक को स्तन पान करायाँ।

देखा गया है जब कोई स्त्री अपने बालक को स्तन पान कराने को होती है और उस समय यदि उसके पास कोई बूढ़ा स्त्री हो तो वह कहती पहले एक थार भूमि माता को चढ़ा दे। वह बूढ़ी माता इसके रहस्य को नहीं जानती। जब बालक ने स्तन पान करते- करते स्तन को छोड़ दिया तो उस समय थोड़ा-सा दूध स्तन वृत्त में रह जाता है। जो बाहर की चाय लगने से जम जाता है। जब वह जमा हुआ दूध बालक के पेट में पहुँचने तो बालक को अनेक रोग हो जायेंगे। जैसे दूध का डालना, दस्तों का हो जाना, अपच आदि व्याधियाँ हो जाती हैं। इसीलिए स्तन पान कराने से पहले स्तन के अग्रभाग का जमा हुआ दूध निकालने के कारण ही भूमि पर पहले दूध की थार गिरा देने की प्रथा थी।

भोजन बनाने के पश्चात् तत्काल बालक को स्तन पान नहीं कराना चाहिए। इससे बच्चे में पित्त दोष उत्पन्न हो जाता है और स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है। इस कारण जब शरीर ठण्डक पाले तब ही बालक को स्तन पान करायाँ।

क्रोध के समय भी बालक को स्तन पान नहीं कराना चाहिए। क्रोधी व्यक्ति के रक्त को यदि खरगोश के शरीर में प्रवेश करा दिया जाय तो वह खरगोश मर जायगा। इसीलिये क्रुद्ध अवस्था में यदि बालक को स्तन पान करा दिया गया तो वह तत्काल मूर्छित हो जायगा। यदि बालक पहले से ही निर्बल है तो वह मृत्यु को भी प्राप्त हो सकता है।

स्तन के पश्चात् स्तन पान कराने से ठण्ड का विकार बालक को हो जाता है।


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