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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

अनु० ५ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३८५

एव=ही; शिरः=(मानो) सिर है; मोदः=मोद; दक्षिणः=दाहिना; पक्षः=पंख है; प्रमोदः=प्रमोद; उत्तरः=बायाँ; पक्षः=पंख है; आनन्दः=आनन्द ही; आत्मा=शरीरका मध्यभाग है; ब्रह्म=ब्रह्म; पुच्छम्=पूँछ; (एवं) प्रतिष्ठा=आधार है; तत्=उसकी महिमाके विषयमें; अपि=भी; एषः=यह; श्लोकः भवति=श्लोक है।

व्याख्या —पञ्चम अनुवाकके इस दूसरे अंशमें आनन्दमय परमपुरुषका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि पहले अंशमें कहे हुए विज्ञानमय जीवात्मासे भिन्न, उसके भी भीतर रहनेवाला एक दूसरा आत्मा है; वह है आनन्दमय परमात्मा। उससे यह विज्ञानमय पुरुष व्याप्त है अर्थात् वह इसमें भी परिपूर्ण है। बृहदारण्यक-उपनिषद् (३।७।२३) में भी परमात्माको जीवात्मारूप शरीरका शासन करनेवाला और उसका अन्तरात्मा बताया गया है। वे ही वास्तवमें समस्त पुरुषोंसे उत्तम होनेके कारण 'पुरुष' शब्दके अभिधेय हैं। वे विज्ञानमय पुरुषके समान आकारवाले हैं। उस विज्ञानमय पुरुषमें व्याप्त होनेके कारण ही वे पुरुषाकार कहे जाते हैं। पक्षीके रूपकमें उन आनन्दमय परमेश्वरके अङ्गोंकी कल्पना इस प्रकार की गयी है। प्रियभाव उनका सिर है। तात्पर्य यह कि आनन्दमय परमात्मा सबके प्रिय हैं। समस्त प्राणी 'आनन्द'से प्रेम करते हैं, सभी 'आनन्द' को चाहते हैं, परंतु न जाननेके कारण उन्हें पा नहीं सकते। यह 'प्रियता' उन आनन्दमय परमात्माका एक प्रधान अंश है; अतः यही मानो उनका प्रधान अङ्ग सिर है। मोद दाहिना पंख है, प्रमोद बायाँ पंख है, आनन्द ही परमात्माका मध्य अङ्ग है तथा स्वयं ब्रह्म ही इनकी पूँछ एवं आधार हैं। परमात्मा अवयवरहित होनेके कारण उनके स्वरूप और अङ्गोंका वर्णन वास्तविकरूपसे नहीं बन सकता। फिर ऐसी कल्पना क्यों की गयी? इसका समाधान करते हुए ब्रह्मसूत्र (३।३।१२ से ३।३।१४ तक) में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि ब्रह्मके विषयमें ऐसी कल्पना केवल उपासनाकी सुगमताके लिये की जाती है, दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है। इस प्रकरणमें विज्ञानमयका अर्थ जीवात्मा और आनन्दमयका अर्थ परमात्मा ही लेना चाहिये, यह बात

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

ब्रह्मसूत्र (१।१।१२ से १९ तकके विवेचन)में युक्तियों तथा श्रुतियोंके प्रमाणोंद्वारा सिद्ध की गयी है।

इन आनन्दमय परमात्माके विषयमें भी आगे षष्ठ अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।

॥पञ्चम अनुवाक समाप्त॥५॥

षष्ठ अनुवाक

असत्रेव स भवति। असद्व्रहोति वेद चेत्। अस्ति ब्रहोति चेद्देद। सन्तमेनं ततो विदुरिति।

चेत्=यदि; (कोई) ब्रह्म=ब्रह्म; असत्=नहीं है; इति=इस प्रकार; वेद=समझता है; (तो) सः=वह; असत्=असत्; एव=ही; भवति=हो जाता है; (और) चेत्=यदि; (कोई) ब्रह्म=ब्रह्म; अस्ति=है; इति=इस प्रकार; वेद=जानता है; ततः=तो; एनम्=इसको; (ज्ञानीजन) सन्तम्=संत—सत्पुरुष; विदुः=समझते हैं; इति=इस प्रकार यह श्लोक है।

व्याख्या —इस मन्त्रमें ब्रह्मकी सत्ता माननेका और न माननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि यदि कोई मनुष्य यह समझता है या ऐसा निश्चय करता है कि 'ब्रह्म असत् है' अर्थात् ब्रह्म या ईश्वर नामकी कोई चीज नहीं है तो वह 'असत्' हो जाता है, अर्थात् स्वेच्छाचारी होकर सदाचारसे भ्रष्ट नीच प्रकृतिका हो जाता है। यदि कोई मनुष्य ब्रह्मके यथार्थ तत्त्वको न जानकर भी यह समझता है कि 'निसंदेह ब्रह्म है', अर्थात् शास्त्र और महापुरुषोंपर दृढ़ विश्वास होनेके कारण यदि उसके मनमें ईश्वरकी सत्तापर पूरा विश्वास हो गया है तो ऐसे मनुष्यको ज्ञानी और महापुरुष 'संत' अर्थात् सत्पुरुष समझते हैं; क्योंकि परमात्माके तत्त्वज्ञानकी पहली सीढ़ी उनकी सत्तामें विश्वास ही है। परमात्माकी सत्तामें विश्वास बना रहे तो कभी-न-कभी किन्हीं महापुरुषकी कृपासे साधनमें लगकर मनुष्य उन्हें प्राप्त भी कर सकता है।

अनु० ६ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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तरयैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य।

तस्य=उस (आनन्दमय) का भी; एषः एव=यही; शारीरः=शरीरान्तर्वर्ती; आत्मा=आत्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहलेवाले (विज्ञानमय)का है।

व्याख्या —पछ अनुवाकके इस दूसरे अंशमें पहलेके वर्णनानुसार आनन्दमयका अन्तरात्मा स्वयं आनन्दमयको ही बताया गया है। भाव यह है कि उन आनन्दमय ब्रह्मके वे स्वयं ही शरीरान्तर्वर्ती आत्मा हैं; क्योंकि उनमें शरीर और शरीरीका भेद नहीं है। जो पहले बताये हुए अन्नरसमय आदि सबके अन्तर्यामी परमात्मा हैं, वे स्वयं ही अपने अन्तर्यामी हैं; उनका अन्तर्यामी कोई दूसरा नहीं है। इसीलिये इनके आगे किसी दूसरेको न बताकर उस वर्णनकी परम्पराको यहीं समाप्त कर दिया गया है।

सम्बन्ध —ऊपर कहे हुए अंशमें ब्रह्मको 'असत्' मानने और 'सत्' माननेका फल बताया गया है; उसे सुनकर प्रत्येक मनुष्यके मनमें जो प्रश्न उठ सकते हैं, उन प्रश्नोंका निर्णय करके उन ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन करनेके लिये श्रुति स्वयं ही प्रश्न उपस्थित करती हैं—

अथातोऽनुप्रश्नाः । उताविद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चन गच्छती ३ । आहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चित्समश्रुता ३ उ ।

अथ=इसके बाद; अतः=यहाँसे; अनुप्रश्नाः=अनुप्रश्न आरम्भ होते हैं; उत=क्या; अविद्वान्=ब्रह्मको न जाननेवाला; कश्चन=कोई पुरुष; प्रेत्य=मरकर; अमुम् लोकम् गच्छति=उस लोकमें (परलोकमें) जाता है; आहो=अथवा; कश्चित्=कोई भी; विद्वान्=ज्ञानी; प्रेत्य=मरकर; अमुम्=उस; लोकम्=लोकको; समश्रुते=प्राप्त होता है; उ=क्या ?

व्याख्या —अब यहाँसे अनुप्रश्न* आरम्भ करते हैं। पहला प्रश्न तो यह है कि यदि ब्रह्म हैं तो उनको न जाननेवाला कोई भी मनुष्य मरनेके अनन्तर

  • अनुप्रश्न उन प्रश्नोंको कहते हैं, जो आचार्यके उपदेशके अनन्तर किसी शिष्यके मनमें उठते हैं या जिन्हें वह उपस्थित करता है।

इस अनुवाकमें जो अनुप्रश्न पूछे गये हैं, वे दोके रूपमें तीन हैं—(१) वास्तवमें ब्रह्म है या नहीं ? (२) जब ब्रह्म आकाशकी भाँति सर्वगत तथा पक्षपातरहित—सम हैं,

३८८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

परलोकमें जाता है या नहीं? दूसरा यह प्रश्न है कि ब्रह्मको जाननेवाला कोई भी विद्वान् मरनेके बाद परलोकको प्राप्त होता है या नहीं?

सम्बन्ध —इन प्रश्नोंके उत्तरमें श्रुति ब्रह्मके स्वरूप और शक्तिका वर्णन करती है तथा पहले अनुवाकमें जो संक्षेपसे सृष्टिकी उत्पत्तिका क्रम बताया था, उसे भी विशदरूपसे समझाया जाता है—

सोऽकामयत्। बहु स्यां प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा इदः सर्वमसृजत यदिदं किं च। तत्सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत्। तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत्। निरुक्तं चानिरुक्तं च। निलयनं चानिलयनं च। विज्ञानं चाविज्ञानं च। सत्यं चानुतं च सत्यमभवत्। यदिदं किं च। तत्सत्यमित्याचक्षते। तदप्येष श्लोको भवति।

सः =उस परमेश्वरने; अकामयत् =विचार किया कि; प्रजायेयः =में प्रकट होऊँ; (और अनेक नाम-रूप धारण करके) बहु =बहुत; स्याम् इति =हो जाऊँ; सः =(इसके बाद) उसने ; तपः अतप्यत =तप किया अर्थात् अपने संकल्पका

तब वे अविद्वान् (अपना ज्ञान न रखनेवाले) को भी प्राप्त होते हैं या नहीं? (३) यदि अविद्वान्को नहीं प्राप्त होते, तब तो सम होनेके कारण वे विद्वान्को भी नहीं प्राप्त होंगे। इसलिये यह तीसरा प्रश्न है कि विद्वान् पुरुष ब्रह्मका अनुभव करता है या नहीं? इनके उत्तरमें ब्रह्मको सृष्टिका कारण बतलाकर अर्थतः उनकी सत्ता सिद्ध कर दी गयी। फिर 'तत् सत्यम् इत्याचक्षते'……' इस वाक्यद्वारा श्रुतिने स्पष्टरूपसे भी उनकी सत्ताका प्रतिपादन कर दिया। सातवें अनुवाकमें तो और भी स्पष्ट वचन मिलता है—'को होवान्यात्? कः प्राण्यात्? यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।' अर्थात् यदि ये आकाशरूप आनन्दमय परमात्मा न होते तो कौन जीवित रहता और कौन चेष्टा भी कर सकता? अर्थात् प्राणियोंका जीवन और चेष्टा परमात्मापर ही निर्भर है। दूसरे प्रश्नके उत्तरमें सप्तम अनुवाकमें यह बात कही गयी है कि जबतक मनुष्य परमात्माको पूर्णतया नहीं जान लेता, उनमें थोड़ा-सा भी अन्तर रख लेता है, तबतक वह जन्म-मरणके भयसे नहीं छूटता। तीसरे प्रश्नके उत्तरमें आठवें अनुवाकके उपसंहारमें श्रुति स्वयं कहती है—'स एर्ववित्'……' आनन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति' अर्थात् 'जो इस प्रकार (परमात्माको) जानता है, वह क्रमशः अन्तमय, प्राणमय आदिको प्राप्त करता हुआ अन्तमें आनन्दमय परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है।'

अनु० ६ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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विस्तार किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=इस प्रकार संकल्पका विस्तार करके; यत् किम् च=जो कुछ भी; इदम्=यह देखने और समझनेमें आता है; इदम् सर्वम् असृजत=इस समस्त जगत्की रचना की; तत् सूष्टा=उस जगत्की रचना करनेके अनन्तर; तत् एव=(वह स्वयं) उसीमें; अनुप्राविशत्=साथ-साथ प्रविष्ट हो गया; तत् अनुपविश्य=उसमें साथ-साथ प्रविष्ट होनेके बाद (वह स्वयं ही); सत्=मूर्त; च=और; त्यत्=अमूर्त; च=भी; अभवत्=हो गया; निरुक्तम् च अनिरुक्तम्=बतानेमें आनेवाले और न आनेवाले; च=तथा; निलयनम्=आश्रय देनेवाले; च=और; अनिलयनम्=आश्रय न देनेवाले; च=तथा; विज्ञानम्=चेतनायुक्त; च=और; अविज्ञानम्=जड पदार्थ; च=तथा; सत्यम्=सत्य; च=और; अनुत्तम्=छूट (इन सबके रूपमें); च=भी; सत्यम्=वह सत्यस्वरूप परमात्मा ही; अभवत्=हो गया; यत् किम् च=जो कुछ भी; इदम्=यह दिखायी देता है और अनुभवमें आता है; तत्=वह; सत्यम्=सत्य ही है; इति=इस प्रकार; आचक्षते=ज्ञानीजन कहते हैं; तत्=उस विषयमें; अपि=भी; एषः=यह; श्लोकः=श्लोक; भवति=है।

व्याख्या —सर्गके आदिमें परब्रह्म परमात्माने यह विचार किया कि मैं नानारूपमें उत्पन्न होकर बहुत हो जाऊँ। यह विचार करके उन्होंने तप किया अर्थात् जीवोंके कर्मानुसार सृष्टि उत्पन्न करनेके लिये संकल्प किया। संकल्प करके यह जो कुछ भी देखने, सुनने और समझनेमें आता है, उस जडचेतनमय समस्त जगत्की रचना की, अर्थात् इसका संकल्पमय स्वरूप बना लिया। उसके बाद स्वयं भी उसमें प्रविष्ट हो गये। यद्यपि अपनेसे ही उत्पन्न इस जगत्में वे परमेश्वर पहलेसे ही प्रविष्ट थे—यह जगत् जब उन्हींका स्वरूप है, तब उसमें उनका प्रविष्ट होना नहीं बनता—तथापि जडचेतनमय जगत्में आत्मारूपसे परिपूर्ण हुए उन परब्रह्म परमेश्वरके विशेष स्वरूप—उनके अन्तर््यामी स्वरूपका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ यह बात कही गयी है कि ‘इस जगत्की रचना करके वे स्वयं भी उसमें प्रविष्ट हो गये।’ प्रविष्ट होनेके बाद वे मूर्त और अमूर्तरूपसे अर्थात् देखनेमें आनेवाले पृथ्वी, जल और तेज—इन भूतोंके रूपमें तथा वायु और आकाश—इन न दिखायी देनेवाले भूतोंके रूपमें प्रकट हो गये। फिर

३९०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

जिनका वर्णन किया जा सकता है और नहीं किया जा सकता; ऐसे विभिन्न नाना पदार्थोंके रूपमें हो गये। इसी प्रकार आश्रय देनेवाले और आश्रय न देनेवाले, चेतन और जड—इन सबके रूपमें वे एकमात्र परमेश्वर ही बहुत-से नाम और रूप धारण करके व्यक्त हो गये। वे एक सत्यस्वरूप परमात्मा ही सत्य और झूठ—इन सबके रूपमें हो गये। इसीलिये ज्ञानीजन कहते हैं कि ‘यह जो कुछ देखने, सुनने और समझनेमें आता है, वह सब-का-सब सत्यस्वरूप परमात्मा ही है।’

इस विषयमें भी यह आगे सप्तम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।

॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥

सप्तम अनुवाक

असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत। तदात्मानः स्वयमकुरुत। तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति।

अग्र=प्रकट होनेसे पहले; इदम्=यह जड-चेतनात्मक जगत्; असत्=अव्यक्तरूपमें; वै=ही; आसीत्=था; ततः=उससे; वै=ही; सत्=सत् अर्थात् नामरूपमय प्रत्यक्ष जगत्; अजायत=उत्पन्न हुआ है; तत्=उसने; आत्मानम्=अपनेको; स्वयम्=स्वयं; अकुरुत=(इस रूपमें) प्रकट किया है; तस्मात्=इसीलिये; तत्=वह; सुकृतम्=‘सुकृत’; उच्यते=कहा जाता है; इति=इस प्रकार यह श्लोक है।

व्याख्या—सूक्ष्म और स्थूलरूपमें प्रकट होनेसे पहले यह जड-चेतनमय सम्पूर्ण जगत् असत्—अर्थात् अव्यक्तरूपमें ही था; उस अव्यक्तावस्थामें ही यह सत् अर्थात् नामरूपमय प्रत्यक्ष जड-चेतनात्मक जगत् उत्पन्न हुआ है। परमात्माने अपनेको स्वयं ही इस जड-चेतनात्मक जगत्के रूपमें बनाया है; इसीलिये उनका नाम ‘सुकृत’ (अपने-आप बना हुआ) है।*

  • गीतामें कई प्रकारसे इस जड-चेतनात्मक जगत्का अव्यक्तसे उत्पन्न होना और उसीमें

अनु० ७ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः। रसः होवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। को होवान्यात्मः प्राणयाद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष होवानन्दयाति।

वै=निश्चय ही; यत्=जो; तत्=वह; सुकृतम्=सुकृत है; सः वै=वही; रसः= रस है; हि=क्योंकि; अयम्=यह (जीवात्मा); रसम्=इस रसको; लब्ध्वा=प्राप्त करके; एव=ही; आनन्दी=आनन्दयुक्त; भवति=होता है; यत्=यदि; एषः= यह; आकाशः=आकाशकी भाँति व्यापक; आनन्दः=आनन्दस्वरूप परमात्मा; न स्यात्=न होता; हि=तो; कः एव=कौन; अन्यात्=जीवित रह सकता; (और) कः=कौन; प्राणयात्=प्राणोंकी क्रिया (चैष्टा) कर सकता; हि=निःसंदेह; एषः= यह परमात्मा; एव=ही; आनन्दयाति=सबको आनन्द प्रदान करता है।

व्याख्या—ये जो ऊपरके वर्णनमें ‘सुकृत’ नामसे कहे गये हैं, वे परब्रह्म परमात्मा सचमुच रसस्वरूप (आनन्दमय) हैं, ये ही वास्तविक आनन्द हैं; क्योंकि अनादिकालसे जन्म-मृत्युरूप घोर दुःखका अनुभव करनेवाला यह जीवात्मा इन रसमय परब्रह्मको पाकर ही आनन्दयुक्त होता है। जबतक इन परम प्राप्य आनन्दस्वरूप परमेश्वरसे इसका संयोग नहीं हो जाता, तबतक इसे किसी भी स्थितिमें पूर्णानन्द, नित्यानन्द, अखण्डानन्द और अनन्त आनन्द नहीं मिल सकता। इसीसे उन वास्तविक आनन्दस्वरूप परमात्माका अस्तित्व निःसंदेह सिद्ध होता है; क्योंकि यदि ये आकाशकी भाँति व्यापक आनन्दस्वरूप परमात्मा

लय होना बताया गया है (८।१८; ९।७; २।२८)। परंतु भगवान् जब स्वयं अवतार लेकर लीला करनेके लिये जगत्में प्रकट होते हैं; तब उनका वह प्रकट होना अन्य जीवोंकी भाँति अव्यक्तसे व्यक्त होने अर्थात् कारणसे कार्यरूपमें परिवर्तित होनेके समान नहीं है, वह तो अलौकिक है। इसलिये यहाँ भगवान्ने कहा है कि जो मुझे अव्यक्तसे व्यक्त हुआ मानते हैं, वे बुद्धिहीन हैं (७।२४); वहाँ जडतत्त्वोंका और उनके नियमोंका प्रवेश नहीं है। भगवान्के नाम, रूप, लीला, धाम—सब कुछ अप्राकृत हैं, चिन्मय हैं। उनके जन्म-कर्म दिव्य हैं। भगवान्के प्राकट्यका रहस्य बड़े-बड़े देवता और महर्षिलोग भी नहीं जानते (गीता १०।२)।

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

नहीं होते तो कौन जीवित रह सकता और कौन प्राणोंकी क्रिया—हिलना-डुलना आदि कर सकता ? अर्थात् समस्त प्राणी सुखस्वरूप परमात्माके ही सहारे जीते और हलन-चलन आदि चेष्टा करते हैं। इतना ही नहीं, सबके जीवन-निर्वाहकी सब प्रकारसे सुव्यवस्था करनेवाले भी वे ही हैं; अन्यथा इस जगत्की समस्त भौतिक क्रिया, जो नियमित और व्यवस्थितरूपसे चल रही है, कैसे हो सकती ? अतः मनुष्यको यह दृढ़तापूर्वक विश्वास करना चाहिये कि इस जगत्के कर्ता-हर्ता परब्रह्म परमेश्वर अवश्य हैं तथा निःसंदेह ये परमात्मा ही सबको आनन्द प्रदान करते हैं। जब आनन्दस्वरूप एकमात्र परमात्मा ही हैं, तब दूसरा कौन आनन्द दे सकता है ?

यदा ह्यैव एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति।

हि=क्योंकि; यदा एव=जब कभी; एषः=यह जीवात्मा; एतस्मिन्=इस; अदृश्ये=देखनेमें न आनेवाले; अनात्म्ये=शरीररहित; अनिरुक्ते=बतलानेमें न आनेवाले; (और) अनिलयने=दूसरेका आश्रय न लेनेवाले परब्रह्म परमात्मामें; अभयम्=निर्भयतापूर्वक; प्रतिष्ठाम्=स्थिति; विन्दते=लाभ करता है; अथ=तब; सः=वह; अभयम्=निर्भयपदको; गतः=प्राप्त; भवति=हो जाता है।

व्याख्या —क्योंकि उन परब्रह्म परमेश्वरको पानेकी अभिलाषा रखनेवाला यह जीव जब कभी देखनेमें न आनेवाले, बतलानेमें न आनेवाले और किसीके आश्रित न रहनेवाले शरीररहित परब्रह्म परमात्मामें निर्भय (अविचल) स्थिति लाभ करता है, उस समय वह निर्भयपदको प्राप्त हो जाता है—सदाके लिये भय एवं शोकसे रहित हो जाता है।

यदा ह्यैव एतस्मिन्नदृशमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति। तत्त्वेव भयं विदुषो मन्वानस्य। तदप्येष श्लोको भवति।

हि=क्योंकि; यदा एव=जबतक; एषः=यह; उदरम्=थोड़ा-सा [ बै= ] भी;

अनु० ७ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३९३

एतस्मिन् अन्तरम्=इस परमात्मासे वियोग; कुरुते=किये रहता है; अथ=तबतक; तस्य=उसको; भयम्=जन्म-मृत्युरूप भय; भवति=प्राप्त होता है; तु=तथा; तत् एव=वही; भयम्=भय; (केवल मूर्खको ही नहीं होता, किंतु) मनवानस्य=अभिमानी; विदुषः=शास्त्रज्ञ विद्वान्को भी अवश्य होता है; तत्=उसके विषयमें; अपि=भी; एषः=यह (आगे कहा हुआ); श्लोकः=श्लोक; भवति=है।

व्याख्या —क्योंकि जबतक यह जीवात्मा उन परब्रह्म परमात्मासे थोड़ा-सा भी अन्तर किये रहता है—उनमें पूर्ण स्थिति लाभ नहीं कर लेता या उनका निरन्तर स्मरण नहीं करता—उन्हें थोड़ी देरके लिये भी भूल जाता है, तबतक उसके लिये भय है, अर्थात् उसका पुनर्जन्म होना सम्भव है; क्योंकि जिस समय उसकी परमात्मामें स्थिति नहीं है, वह भगवान्को भूला हुआ है, उसी समय यदि उसकी मृत्यु हो गयी तो फिर उसका अन्तिम संस्कारके अनुसार जन्म होना निश्चित है; क्योंकि भगवान्ने गीतामें कहा है—‘जिस-जिस भावको स्मरण करता हुआ मनुष्य अन्तकालमें शरीर छोड़ता है, उसीके अनुसार उसे जन्म ग्रहण करना पड़ता है (८।६)’ और मृत्यु प्रारम्भके अनुसार किसी क्षण भी आ सकती है। इसीलिये योगभ्रष्टका पुनर्जन्म होनेकी बात गीतामें कही गयी है (६।४०—४२)। जबतक परमात्मामें पूर्ण स्थिति नहीं हो जाती अथवा जबतक भगवान्का निरन्तर स्मरण नहीं होता, तबतक यह पुनर्जन्मका भय—जन्म-मृत्युका भय सभीके लिये बना हुआ है—चाहे कोई बड़े-से-बड़ा शास्त्रज्ञ विद्वान् क्यों न हो और चाहे कोई अपनेको बड़े-से-बड़ा ज्ञानी अथवा पण्डित क्यों न माने। वे परमेश्वर सबपर शासन करनेवाले हैं, उन्हींकी शासन-शक्तिके जगत्की सारी व्यवस्था नियमितरूपसे चल रही है। इसी विषयपर यह आगे अष्टम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।

॥ सप्तम अनुवाक समाप्त ॥ ७ ॥

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३९४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

अष्टम अनुवाक

सम्बन्ध—पिछले अनुवाकमें जिस श्लोकका लक्ष्य कराया गया था, उसका उल्लेख करते हैं—

भीषास्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषास्मादग्निश्चन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चम इति।

अस्मात् भीषा=इसीके भयसे; वातः=पवन; पवते=चलता है; भीषा=(इसीके) भयसे; सूर्यः=सूर्य; उदेति=उदय होता है; अस्मात् भीषा=इसीके भयसे; अग्निः=अग्नि; च=और; इन्द्रः=इन्द्र; च=और; पञ्चमः=पाँचवाँ; मृत्युः=मृत्यु; धावति=(ये सब) अपना-अपना कार्य करनेमें प्रवृत्त हो रहे हैं; इति=इस प्रकार यह श्लोक है।

व्याख्या—इन परब्रह्म परमेश्वरके भयसे ही पवन नियमानुसार चलता है, इन्हींके भयसे सूर्य ठीक समयपर उदय होता है और ठीक समयपर अस्त होता है तथा इन्हींके भयसे अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु—ये सब अपना-अपना कार्य नियमपूर्वक सुव्यवस्थितरूपसे कर रहे हैं। यदि इन सबकी सुव्यवस्था करनेवाला इन सबका प्रेरक कोई न हो तो जगत्के सारे काम कैसे चले। इससे सिद्ध होता है कि इन सबको बनानेवाला, सबको यथायोग्य नियममें रखनेवाला कोई एक सत्य, ज्ञान और आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मा अवश्य है और वह मनुष्यको अवश्य मिल सकता है*।

सम्बन्ध—उन आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माका यह आनन्द कितना और कैसा है, इस जिज्ञासापर आनन्दविषयक विचार आरम्भ किया जाता है—

सैषाऽऽनन्दस्य मीमाः सा भवति। युवा स्यात्साधुयुवाध्यायक आशिष्टो द्रढिष्टो बलिष्ठस्तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात्। स एको मानुष आनन्दः।

सा=वह; एषा=यह; आनन्दस्य=आनन्दसम्बन्धी; मीमांसा=विचार; भवति=आरम्भ

  • इसी भावकी श्रुति कठोपनिषद्में भी आयी है (२।३।३)।

अनु० ८ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३९५

होता है; युवा=कोई युवक; स्यात्=हो; (वह भी ऐसा-वैसा नहीं) साधयुवा=श्रेष्ठ आचरणवाला युवक हो; (तथा) अध्यायक:=वेदोंका अध्ययन कर चुका हो; आशिष्ठ:=शासनमें अत्यन्त कुशल हो; द्रढिष्ठ:=उसके सम्पूर्ण अङ्ग और इन्द्रियाँ सर्वथा दृढ़ हों; (तथा) बलिष्ठ:=वह सब प्रकारसे बलवान् हो; तस्य=(फिर) उसे; इयम्=यह; वित्तय पूर्णा=धनसे परिपूर्ण; सर्वा=सब-की-सब; पृथिवी=पृथ्वी;; स्यात्=प्राप्त हो जाय; (तो) स:=वह; मानुष:=मनुष्यलोकका; एक:=एक; आनन्द:=आनन्द है।

व्याख्या —इस वर्णनमें उस आनन्दका विचार आरम्भ करनेकी सूचना देकर सर्वप्रथम मनुष्यलोकके भोगोंसे मिल सकनेवाले बड़े-से-बड़े आनन्दकी कल्पना की गयी है। भाव यह है कि एक मनुष्य युवा हो; वह भी ऐसा-वैसा मामूली युवक नहीं—सदाचारी, अच्छे स्वभाववाला, अच्छे कुलमें उत्पन्न श्रेष्ठ पुरुष हो; उसे सम्पूर्ण वेदोंकी शिक्षा मिली हो तथा शासनमें—ब्रह्मचारियोंको सदाचारकी शिक्षा देनेमें अत्यन्त कुशल हो; उसके सम्पूर्ण अङ्ग और इन्द्रियाँ रोगरहित, समर्थ और सुदृढ़ हों और वह सब प्रकारके बलसे सम्पन्न हो। फिर धन-सम्पत्तिसे भरी यह सम्पूर्ण पृथ्वी उसके अधिकारमें आ जाय तो यह मनुष्यका एक बड़े-से-बड़ा सुख है। वह मानव-लोकका एक सबसे महान् आनन्द है।

ते ये शतं मानुषा आनन्दाः । स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।

ते=वे; ये=जो; मानुषा:=मनुष्यलोक-सम्बन्धी; शतम्=एक सौ; आनन्द:=आनन्द हैं; स:=वह; मनुष्यगन्धर्वाणाम्=मानव-गन्धर्वोंका; एक:=एक; आनन्द:=आनन्द होता है; च=और (वह); अकामहतस्य=जिसका अन्तःकरण भोगोंकी कामनाओंसे दूषित नहीं हुआ है, ऐसे; श्रोत्रियस्य=वेदवेत्ता पुरुषको स्वभावसे ही प्राप्त है।

व्याख्या —जो मनुष्ययोनियोंने उत्तम कर्म करके गन्धर्वभावको प्राप्त हुए हैं, उनको ‘मनुष्य-गन्धर्व’ कहते हैं। यहाँ इनके आनन्दको उपर्युक्त मनुष्यके

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

आनन्दसे सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्य-सम्बन्धी आनन्दका पहले वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर आनन्दकी जो एक राशि होती है, उतना मनुष्य-गन्धर्वोंका एक आनन्द है। परन्तु जो पहले बताये हुए मनुष्यलोकके भोगोंकी और इस गन्धर्वलोकके भोगोंतककी कामनासे दूषित नहीं है, इन सबसे सर्वथा विरक्त है, उस श्रोत्रिय—वेदज्ञ पुरुषको तो वह आनन्द स्वभावसे ही प्राप्त है।

ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः । स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।

ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; मनुष्यगन्धर्वाणाम्=मनुष्य-गन्धर्वोंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; देवगन्धर्वाणाम्=देवजातीय गन्धर्वोंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=तथा; (वही) अकामहतस्य=कामनाओंसे अदूषित चित्तवाले; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को स्वभावतः प्राप्त है।

व्याख्या —इस वर्णनमें पहले बताये हुए मनुष्य-गन्धर्वोंकी अपेक्षा देव-गन्धर्वोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्य-गन्धर्वके आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी राशि होती है, उतना सृष्टिके आरम्भसे देवजातीय गन्धर्वरूपमें उत्पन्न हुए जीवोंका एक आनन्द है तथा जो मनुष्य इस आनन्दकी कामनासे आहत नहीं हुआ है अर्थात् जिसको इसकी आवश्यकता नहीं है तथा जो वेदके उपदेशको हृदयङ्गम कर चुका है, ऐसे विद्वान्को वह आनन्द स्वभावतः प्राप्त है।

ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः । स एकः पितूणां चिरलोकलोकानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।

ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; देवगन्धर्वाणाम्=देवजातीय गन्धर्वोंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; चिरलोकलोकानाम्=चिरस्थायी पितुलोकको

अनु० ८ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३१७

प्राप्त हुए; पितृणाम्=पितरोंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकाममहतस्य=भोगोंके प्रति निष्काम; श्रोत्रियस्य=वेदज्ञ पुरुषको स्वतः प्राप्त है।

व्याख्या —इस वर्णनमें देव-गन्धर्वोंके आनन्दकी अपेक्षा चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त दिव्य पितरोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि देव-गन्धर्वोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर आनन्दकी जो एक राशि होती है, उतना चिरस्थायी पितृलोकमें रहनेवाले दिव्य पितरोंका एक आनन्द है तथा जो उस लोकके भोग-सुखकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् जिसको उसकी आवश्यकता ही नहीं रही है, उस श्रोत्रियको—वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्तको वह आनन्द स्वतः ही प्राप्त है।

ते ये शतं पितृणां चिरलोकलोकानामानन्दः। स एक आजानजानां देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।

ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; चिरलोकलोकानाम्=चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त हुए; पितृणाम्=पितरोंके; शतम्=एक सौ; आनन्दः=आनन्द हैं; सः=वह; आजानजानाम्=आजानज नामक; देवानाम्=देवताओंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और (वह आनन्द); अकाममहतस्य=उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ)को स्वभावतः प्राप्त है।

व्याख्या —इस वर्णनमें चिरस्थायी लोकोंमें रहनेवाले दिव्य पितरोंके आनन्दकी अपेक्षा 'आजानज' नामक देवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि चिरस्थायी लोकोंमें रहनेवाले दिव्य पितरोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंकी मात्राको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना 'आजानज' नामक देवताओंका एक आनन्द है। देवलोकके एक विशेष स्थानका नाम 'आजान' है; जो लोग स्मृतियोंमें प्रतिपादित किन्हीं पुण्य-कर्मोंके कारण वहाँ उत्पन्न हुए हैं, उन्हें 'आजानज' कहते हैं। जो उस लोकतकके भोगोंकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् जो उस आनन्दको भी तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध है।

३१८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः। स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः। ये कर्मणा देवानपियन्ति श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।

ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; आजानजानाम्=आजानज नामक; देवानाम्=देवोंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; कर्मदेवानाम् देवानाम्=(उन) कर्मदेव नामक देवताओंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; ये=जो; कर्मणा=वेदोंक कर्मोंसे; देवान्=देवोंको; अपियन्ति=प्राप्त हुए हैं; च=और; (वह) अकामहतस्य=उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ)को तो स्वतः प्राप्त है।

व्याख्या —इस वर्णनमें आजानज देवोंके आनन्दकी अपेक्षा कर्मदेवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि आजानज देवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना आनन्द जो वेदोंक कर्मद्वारा मनुष्ययोनिसे देवभावको प्राप्त हुए हैं, उन कर्मदेवताओंका आनन्द है। जो उन कर्मदेवताओंतकके आनन्दकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् जिसको देवलोकतकके भोगोंकी इच्छा नहीं रही है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध है।

ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः। स एको देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।

ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; कर्मदेवानाम् देवानाम्=कर्मदेव नामक देवताओंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; देवानाम्= देवताओंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को तो स्वभावतः प्राप्त है।

व्याख्या —इस वर्णनमें कर्मदेवोंकी अपेक्षा सृष्टिके आदिकालमें जिन स्थायी देवोंकी उत्पत्ति हुई है, उन स्वभावसिद्ध देवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि कर्मदेवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया

अनु० ८]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३९९

है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना उन स्वभावसिद्ध देवताओंका एक आनन्द है। जो उन स्वभावसिद्ध देवताओंके भोगानन्दकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् उसकी भी जिसको कामना नहीं है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले निष्काम विरक्तके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध ही है।

ते ये शतं देवानामानन्दाः। स एक इन्द्रस्यानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।

ते=वे; ये=जो; देवानाम्=देवताओंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; इन्द्रस्य=इन्द्रका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=इन्द्रतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=वेदवेताको स्वतः प्राप्त है।

व्याख्या —इस वर्णनमें पहले बताये हुए स्वभावसिद्ध देवोंके आनन्दकी अपेक्षा इन्द्रके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि देवताओंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना इन्द्रभावको प्राप्त देवताका एक आनन्द है। जो इन्द्रके भोगानन्दकी कामनासे आहत नहीं हुआ है, अर्थात् जिसको इन्द्रके सुखकी भी आकाङ्क्षा नहीं है—जो उसे भी तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले निष्काम पुरुषको तो वह आनन्द स्वतः प्राप्त है।

ते ये शतमिन्द्रस्यानन्दाः। स एको बृहस्पतेरानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।

ते=वे; ये=जो; इन्द्रस्य=इन्द्रके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; बृहस्पतेः=बृहस्पतिका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=बृहस्पतितकके भोगोंमें निःस्पृह; श्रोत्रियस्य=वेदवेताको स्वतः प्राप्त है।

४००

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

व्याख्या —इस वर्णनमें इन्द्रके आनन्दकी अपेक्षा बृहस्पतिके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि इन्द्रके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है; वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना बृहस्पतिके पदको प्राप्त हुए देवताका एक आनन्द है। परंतु जो मनुष्य बृहस्पतिके भोगानन्दकी कामनासे भी आहत नहीं है, उस भोगानन्दको भी अनित्य होनेके कारण जो तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो चुका है, उस वेदके रहस्यको जाननेवाले निष्काम मनुष्यको वह आनन्द स्वतः प्राप्त है।

ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः । स एकः प्रजापतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।

ते=वे; ये=जो; बृहस्पतेः=बृहस्पतिके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; प्रजापतेः=प्रजापतिके; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=प्रजापतितकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=वेदेवेता पुरुषको स्वतः प्राप्त है।

व्याख्या —इस वर्णनमें बृहस्पतिके आनन्दकी अपेक्षा प्रजापतिके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि बृहस्पतिके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना प्रजापतिके पदपर आरूढ़ देवताका एक आनन्द है। परंतु जो मनुष्य इस प्रजापतिके भोगानन्दकी कामनासे भी आहत नहीं है, अर्थात् उससे भी जो विरक्त हो चुका है, उस वेदके रहस्यको जाननेवाले निष्काम मनुष्यको तो वह आनन्द स्वभावसे ही प्राप्त है।

ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः । स एको ब्रह्मण आनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।

ते=वे; ये=जो; प्रजापतेः=प्रजापतिके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; ब्रह्मणः=ब्रह्माका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=ब्रह्मलोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ)को स्वभावतः प्राप्त है।

अनु० ८]

तैत्तिरीयोपनिषद्

४०१

व्याख्या —इस वर्णनमें प्रजापतिके आनन्दसे भी हिरण्यगर्भ ब्रह्माके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि प्रजापतिके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो एक आनन्दकी राशि होती है, उतना सृष्टिके आरम्भमें सबसे पहले उत्पन्न होनेवाले हिरण्यगर्भ ब्रह्माका एक आनन्द है तथा जो मनुष्य उस ब्रह्माके पदसे प्राप्त भोगसुखकी कामनासे भी आहत नहीं है, अर्थात् जो उसे भी अनित्य और तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, जिसको एकमात्र परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त करनेकी ही उत्कट अभिलाषा है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषको वह आनन्द स्वतः प्राप्त है।

इस प्रकार यहाँ एकसे दूसरे आनन्दकी अधिकताका वर्णन करते-करते सबसे बढ़कर हिरण्यगर्भके आनन्दको बताकर यह भाव दिखाया गया है कि इस जगत्में जितने प्रकारके जो-जो आनन्द देखने-सुनने तथा समझनेमें आ सकते हैं, वे चाहे कितने ही बड़े क्यों न हों, उस पूर्णानन्दस्वरूप परमात्माके आनन्दकी तुलनामें बहुत ही तुच्छ हैं। बृहदारण्यकमें कहा भी है कि 'समस्त प्राणी इसी परमात्मसम्बन्धी आनन्दके किसी एक अंशको लेकर ही जीते हैं (४।३।३२)।'

स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः। स य एवंविदस्माल्लोकात्प्रेत्य। एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति। तदप्येष श्लोको भवति।

सः =वह (परमात्मा); यः =जो; अयम् =यह; पुरुषे =मनुष्यमें; =और; यः =जो; असौ =वह; आदित्ये =सूर्यमें भी है; सः =वह (सबका अन्तर््यामी); एकः =एक ही है; यः =जो; एवंवित् =इस प्रकार जाननेवाला है; सः =वह; अस्मात् लोकात् =इस लोकसे; प्रेत्य =विदा होकर; एतम् =इस; अन्नमयम् =अन्नमय; आत्मानम् =आत्माको; उपसंक्रामति =प्राप्त हो जाता है; एतम् =इस; प्राणमयम् =प्राणमय;

४०२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त होता है; एतम्=इस; मनोमयम्=मनोमय; आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त होता है; एतम्=इस; विज्ञानमयम्=विज्ञानमय; आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त होता है; एतम्=इस; आनन्दमयम्=आनन्दमय; आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त होता है; तत्=उसके विषयमें; अपि=भी; एषः=यह (आगे कहा जानेवाला); श्लोकः=श्लोक; भवति=है।

व्याख्या —ऊपर बताये हुए समस्त आनन्दोंके एकमात्र केन्द्र परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही सबके अन्तर्यामी हैं। जो परमात्मा मनुष्योंमें हैं, वे ही सूर्यमें भी हैं। वे सबके अन्तर्यामी एक ही हैं। जो इस प्रकार जान लेता है, वह मरनेपर इस मनुष्य-शरीरको छोड़कर उस पहले बताये हुए अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है। तात्पर्य यह कि इन पाँचोंके जो आत्मा हैं, वे पाँचों जिनके स्वरूप हैं, उन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। पहले इन पाँचोंका वर्णन करते समय सबका शरीरान्तर्वर्ती आत्मा अन्तर्यामी परमात्माको ही बतलाया था। फलरूपमें उन्हींकी प्राप्ति होती है और वे ही ब्रह्म हैं—यह बतलानेके लिये ही यहाँ पाँचोंको क्रमसे प्राप्त होनेकी बात कही गयी है। वास्तवमें इस क्रमसे प्राप्त होनेकी बात कहना अभीष्ट नहीं है; क्योंकि अन्नमय मनुष्यशरीरको तो वह पहलेसे प्राप्त था ही, उसे छोड़कर जानेके बाद प्राप्त होनेवाला फल परमात्मा है, शरीर नहीं। अतः यहाँ अन्नमय आदिके अन्तर्यामी परमात्माकी ही प्राप्ति बतायी गयी है। इसलिये इन सबमें परिपूर्ण, सर्वरूप, सबके आत्मा, परम आनन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाना ही इस फल-श्रुतिका तात्पर्य है। इसके विषयमें आगे नवम अनुवाकमें कहा जानेवाला यह श्लोक भी है।

॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥ ८ ॥

अनु० ९ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

४०३

नवम अनुवाक

सम्बन्ध— आठवें अनुवाकमें जिस श्लोक (मन्त्र)को लक्ष्य कराया गया है, उसका उल्लेख किया जाता है—

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति।

मनसा सह=मनके सहित; वाचः=वाणी आदि समस्त इन्द्रियाँ; यतः=जहाँसे; अप्राप्य=उसे न पाकर; निवर्तन्ते=लौट आती हैं; [ तस्य ] ब्रह्मणः=उस ब्रह्मके; आनन्दम्=आनन्दको; विद्वान्=जाननेवाला (महापुरुष); कुतश्चन=किसीसे भी; न बिभेति=भय नहीं करता; इति=इस प्रकार यह श्लोक है।

व्याख्या— इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माके परमानन्दस्वरूपको जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि मनके सहित सभी इन्द्रियाँ उसे न पाकर जहाँसे लौट आती हैं—जिस ब्रह्मानन्दको जाननेकी इन मन और इन्द्रियोंकी शक्ति नहीं है, परब्रह्म परमात्माके उस आनन्दको जाननेवाला ज्ञानी महापुरुष कभी किसीसे भी भय नहीं करता, वह सर्वथा निर्भय हो जाता है। इस प्रकार इस श्लोकका तात्पर्य है।

एतॄः ह वाव न तपति। किमहॄः साधु नाकरवम्। किमहं पापमकरवमिति। स य एवं विद्वान्ते आत्मानॄः सृणुते। उभे द्वौ वैष एते आत्मानॄः सृणुते। य एवं वेद। इत्युपनिषत्।

ह वाव=यह प्रसिद्ध ही है कि; एतम्=उस (महापुरुष)को; (यह बात) न तपति=चिन्तित नहीं करती कि; अहम्=मैंने; किम्=क्यों; साधु=श्रेष्ठ कर्म; न=नहीं; अकरवम्=किया; किम्=(अथवा) क्यों; अहम्=मैंने; पापम्=पापाचरण; अकरवम् इति=किया; यः=जो; एते=इन पुण्य-पापकर्मोंको; एवम्=इस प्रकार (संतापका हेतु); विद्वान्=जाननेवाला है; सः=वह; आत्मानम् सृणुते=आत्माकी रक्षा करता है; हि=अवश्य ही; यः=जो; एते=इन पुण्य और पाप; उभे एव=दोनों ही कर्मोंको;

४०४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

एवम्=इस प्रकार (संतापका हेतु); वेद=जानता है; [सः] एषः=वह यह पुरुष; आत्मानम् स्पृणुते=आत्माकी रक्षा करता है; इति=इस प्रकार; उपनिषत्=उपनिषद् (की ब्रह्मानन्दवल्ली) पूरी हुई।

व्याख्या —इस वर्णनमें यह बात कही गयी है कि ज्ञानी महापुरुषको किसी प्रकारका शोक नहीं होता। भाव यह है कि परमात्माको ऊपर बताये अनुसार जाननेवाला विद्वान् कभी इस प्रकार शोक नहीं करता कि ‘क्यों मैंने श्रेष्ठ कर्मोंका आचरण नहीं किया, अथवा क्यों मैंने पाप-कर्म किया।’ उसके मनमें पुण्य-कर्मोंके फलस्वरूप उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका लोभ नहीं होता और उसे पापजनित नरकादिका भय भी नहीं सताता। लोभ और भयजनित संतापसे वह ऊँचा उठ जाता है। उक्त ज्ञानी महापुरुष आसक्तिपूर्वक किये हुए पुण्य और पाप दोनों प्रकारके कर्मोंको जन्म-मरणरूप संतापका हेतु समझकर उनके प्रति राग-द्वेषसे सर्वथा रहित हो जाता है और परमात्माके चिन्तनमें संलग्न रहकर आत्माकी रक्षा करता है।

इस मन्त्रमें कुछ शब्दोंको अक्षरशः अथवा अर्थतः दुहराकर इस वल्लीके उपसंहारकी सूचना दी गयी है।

॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥

॥ ब्रह्मानन्दवल्ली समाप्त ॥ २ ॥

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