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जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

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मानते हैं। इन्हीं कष्टों के कारण ही मानव जीव को वाहिगुरु का स्मरण होता है। मनुष्य को माया-मोह के बंधन से छुटकारा भी ईश्वर की आज्ञा में रहने से ही मिलता है। इसके लिए कोई अन्य विधि हो, कोई भी नहीं कह सकता; अर्थात्-ईश्वर की आज्ञा में रहने के अतिरिक्त माया के मोह-बंधन से छुटकारा पाने की कोई अन्य विधि कोई नहीं बता सकता। यदि अज्ञानता वश कोई व्यक्ति इसके बारे में कथन करने की चेष्टा करे तो फिर उसे ही मालूम पड़ेगा कि उसे अपने मुँह पर यमों आदि की कितनी चोटें खानी पड़ी हैं। परमात्मा संसार के समस्त प्राणियों की जरूरतों को जानता है और उन्हें स्वयं ही प्रदान भी करता है। संसार में सभी जीव कृतघ्न ही नहीं हैं, कई व्यक्ति ऐसे भी हैं जो इस बात को मानते हैं परमात्मा प्रसन्न होकर जिस व्यक्ति को अपनी स्तुति को गाने की शक्ति प्रदान करता है। हे नानक ! वह बादशाहों का भी बादशाह हो जाता है ; अर्थात्- उसे ऊँचा व उत्तम पद प्राप्त हो जाता है॥ २५ ॥ अमुल गुण अमुल वापार ॥ अमुल वापारीए अमुल भंडार ॥ अमुल आवह अमुल लै जाहे ॥ अमुल भाए अमुला समाहे ॥

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अमुल धरम अमुल दीबाण ॥ अमुल तुल अमुल परवाण ॥ अमुल बखसीस अमुल नीसाण ॥ अमुल करम अमुल फुरमाण ॥ अमुलो अमुल आखिआ न जाए ॥ आख आख रहे लिव लाए ॥ आखहे वेद पाठ पुराण ॥ आखहे पड़े करह वखिआण ॥ आखहे बरमे आखहे इंद ॥ आखहे गोपी तै गोविंद ॥ आखहे ईसर आखहे सिध ॥ आखहे केते कीते बुध ॥ आखहे दानव आखहे देव ॥ आखहे सुर नर मुन जन सेव ॥ केते आखहे आखण पाहे ॥ केते कह कह उठ उठ जाहे ॥ एते कीते होर करेहे ॥ ता आख न सकह केई केए ॥ जेवड भावै तेवड होए ॥ नानक जाणै साचा सोए ॥

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM जे को आखै बोलुविगाड़ ॥ ता लिखीऐ सिर गावारा गावार ॥२६॥ निरंकार के जिन गुणों को कथन नहीं किया जा सकता वे अमूल्य हैं, और इस निरंकार का सुमिरन अमूल्य व्यापार है । यह सुमिरन रूपी व्यापार का मार्गदर्शन करने वाले संत भी अमूल्य व्यापारी हैं और उन संतों के पास जो सद्गुणों का भण्डार है वह भी अमूल्य है । जो व्यक्ति इन संतों के पास प्रभु-मिलाप हेतु आते हैं वे भी अमूल्य हैं और इनसे जो गुण ले जाते हैं वे भी अमूल्य हैं । परस्पर गुरु-सिख का प्रेम अमूल्य है, गुरु के प्रेम से आत्मा को प्राप्त होने वाला आनंद भी अमूल्य है । अकाल-पुरुष का न्याय भी अमूल्य है, उसका न्यायालय भी अमूल्य है । अकाल पुरुष की न्याय करने वाली तुला अमूल्य है, और जीवों के अच्छे-बुरे कर्मों को तोलने हेतु परिमाण (तौल) भी अमूल्य है । अकाल पुरुष द्वारा प्रदान किए जाने वाले पदार्थ भी अमूल्य हैं और उन पदार्थों का चिन्ह भी अमूल्य है । निरंकार की जीव पर होने वाली कृपा भी अमूल्य है तथा उसका आदेश भी अमूल्य है । वह परमात्मा अति अमूल्य है उसका कथन घनिष्ठता से कर पाना असम्भव है । परंतु फिर भी अनेक भक्त जन उसके गुणों का व्याख्यान करके अर्थात् उसकी स्तुति कर-करके भूत, भविष्य व वर्तमान काल में उसमें लिवलीन 37 | Page sikhizm.com

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हो रहे हैं। चारों वेद व अठ्ठारह पुराणों में भी उसकी महिमा कही गई है। उनको पढ़ने वाले भी अकाल-पुरुष का व्याख्यान करते हैं । सृष्टिकर्ता ब्रह्मा व स्वर्गाधिपति इन्द्र भी उसके अमूल्य गुणों को कथन करते हैं। गिरिधर गोपाल कृष्ण तथा उसकी गोपियाँ भी उस निरंकार का गुणगान करती हैं। महादेव तथा गोरख आदि सिद्ध भी उसकी कीर्ति को कहते हैं। उस सृष्टिकर्ता ने इस जगत् में जितने भी बुद्धिमान किए हैं वे भी उसके यश को कहते हैं। समस्त दैत्य व देवतादि भी उसकी महिमा को कहते हैं। संसार के सभी पुण्य-कर्मी मानव, नारद आदि ऋषि-मुनि तथा अन्य भक्त जन उसकी प्रशंसा के गीत गाते हैं। कितने ही जीव वर्तमान में कह रहे हैं, तथा कितने ही भविष्य में कहने का यत्न करेंगे। कितने ही जीव भूतकाल में कहते हुए अपना जीवन समाप्त कर चुके हैं। इतने तो हम गिन चुके हैं यदि इतने ही और भी साथ मिला लिए जाएँ। तो भी कोई किसी साधन से उसकी अमूल्य स्तुति कह नहीं सकता। जितना स्व-विस्तार चाहता है उतना ही विस्तृत हो जाता है। श्री गुरु नानक देव जी कहते हैं कि वह सत्य स्वरूप निरंकार ही अपने अमूल्य गुणों को जानता है। यदि कोई निरर्थक बोलने वाला परमेश्वर का अंत कहे कि वह इतना है तो उसे महामूर्खों में अंकित किया जाता है॥ २६ ॥

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JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM सो दर केहा सो घर केहा जित बह सरब समाले ॥ वाजे नाद अनेक असंखा केते वावणहारे ॥ केते राग परी सिओ कहीअन केते गावणहारे ॥ गावह तुहनो पौण पाणी बैसंतर गावै राजा धरम दुआरे ॥ गावह चित गुपत लिख जाणह लिख लिख धरम वीचारे ॥ गावह ईसर बरमा देवी सोहन सदा सवारे ॥ गावह इंद इदासण बैठे देवतेआ दर नाले ॥ गावह सिध समाधी अंदर गावन साध विचारे ॥ गावन जती सती संतोखी गावह वीर करारे ॥ गावन पंडित पड़न रखीसर जुग जुग वेदा नाले ॥ गावहे मोहणीआ मन मोहन सुरगा मछ पयाले ॥ गावन रतन उपाए तेरे अठसठ तीरथ नाले ॥ गावहे जोध महाबल सूरा गावह खाणी चारे ॥ गावहे खंड मंडल वरभंडा कर कर रखे धारे ॥ सेई तुधनो गावह जो तु भावन रते तेरे भगत रसाले ॥ होर केते गावन से मै चित न आवन नानक क्या वीचारे ॥ सोई सोई सदा सच साहिब साचा साची नाई ॥ है भी होसी जाए न जासी रचना जिन रचाई ॥ रंगी रंगी भाती कर कर जिनसी माया जिन उपाई ॥ कर कर वेखै कीता आपणा जिव तिस दी वडिआई ॥ 39 | Page sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM जो तिस भावै सोई करसी हुकम न करणा जाई ॥ सो पातसाहो साहा पातसाहिब नानक रहण रजाई ॥२७॥ उस प्रतिपालक ईश्वर का द्वार तथा घर कैसा है, जहाँ बैठकर वह सम्पूर्ण सृष्टि को सम्भाल रहा है ? (यहाँ पर सतिगुरु जी इस प्रश्न की निवृति में उत्तर देते हैं) हे मानव! उसके द्वार पर नाना प्रकार के असंख्य वादन गूंज रहे हैं और कितने ही उनको बजाने वाले विद्यमान हैं। कितने ही राग हैं जो रागिनियों के संग वहाँ गान किए जा रहे हैं और उन रागों को गाने वाले गंधर्व आदि रागी भी कितने ही हैं। उस निरंकार का यश पवन, जल तथा अग्नि देव गा रहे हैं तथा समस्त जीवों के कर्मों का विश्लेषक धर्मराज भी उसके द्वार पर खड़ा उसकी महिमा को गाता है। जीवों द्वारा किए जाने वाले कर्मों को लिखने वाले चित्र-गुप्त भी उस अकाल-पुरुष का यशोगान करते हैं तथा धर्मराज चित्रगुप्त द्वारा लिखे जाने वाले शुभाशुभ कर्मों का विचार करता है। परमात्मा द्वारा प्रतिपादित शिव, ब्रह्मा व उनकी देवियों (शक्ति) जो शोभायमान हैं, सदैव उसका स्तुति-गान करते हैं। हे निरंकार ! समस्त देवताओं व स्वर्ग का अधिपति इन्द्र अपने सिंहासन पर बैठा अन्य देवताओं के साथ मिलकर तुम्हारे द्वार पर खड़ा तुम्हारा यश गा रहे हैं। सिद्ध लोग समाधियों में स्थित हुए तुम्हारा यश गाते हैं, जो विचारवान 40 | P a g e sikhizm.com

साधु हैं वे विवेक से यशोगान करते हैं। तुम्हारा स्तुतिगान यति, सती और संतोषी व्यक्ति भी गाते हैं तथा पराक्रमी योद्धा भी तुम्हारी महिमा का गान करते हैं। संसार के समस्त विद्वान व महान् जितेन्द्रिय ऋषि-मुनि युगों-युगों से वेदों को पढ़-पढ़ कर उस अकाल पुरुष का यशोगान कर रहे हैं। मन को मोह लेने वाली समस्त सुन्दर स्त्रियां स्वर्ग लोक, मृत्यु लोक व पाताल लोक में तुम्हारा गुणगान कर रही हैं। निरंकार द्वारा उत्पन्न किए हुए चौदह रत्न, संसार के अठसठ तीर्थ तथा उन में विद्यमान संत जन (श्रेष्ठ जन) भी उसके यश को गाते हैं। सभी योद्धा, महाबली, शूरवीर अकाल पुरुष का यश गाते हैं, उत्पत्ति के चारों स्रोत (अण्डज, जरायुज, स्वेदज व उदभिज्ज) भी उसके गुणों को गाते हैं। नवखण्ड, मण्डल व सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, जो उस सृजनहार ने बना- बना कर धारण कर रखे हैं, वे सभी तेरी स्तुति गाते हैं। वास्तव में वे ही तेरी कीर्ति को गा सकते हैं जो तेरी भक्ति में लीन हैं, तेरे नाम के रसिया हैं, और जो तुझे अच्छे लगते हैं। अनेकानेक और भी कई ऐसे जीव मुझे स्मरण नहीं हो रहे हैं, जो तुम्हारा यशोगान करते हैं, हे नानक ! मैं कहाँ तक उनका विचार करूँ, अर्थात् यशोगान करने वाले जीवों की गणना मैं कहाँ तक करूँ। वह सत्यस्वरूप अकाल पुरुष भूतकाल में था, वही सद्गुणी निरंकार वर्तमान में भी है। वह भविष्य में सदैव रहेगा, वह सृजनहार

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM परमात्मा न जन्म लेता है और न ही उसका नाश होता है । जिस सृष्टि रचयिता ईश्वर ने रंग-बिरंगी, तरह-तरह के आकार वाली व अनेकानेक जीवों की उत्पत्ति अपनी माया द्वारा की है । अपनी इस उत्पत्ति को कर-करके वह अपनी रुचि अनुसार ही देखता है अर्थात् उनकी देखभाल अपनी इच्छानुसार ही करता है । जो भी उस अकाल पुरुष को भला लगता है वही कार्य वह करता है और भविष्य में करेगा, इसके प्रति उसको आदेश करने वाला उसके समान कोई नहीं है । गुरु नानक जी का फुरमान है कि हे मानव ! वह ईश्वर शाहों का शाह अर्थात् शहंशाह है, उसकी आज्ञा में रहना ही उचित है॥ २७ ॥ मुंदा संतोख सरम पत झोली ध्यान की करह बिभूत ॥ खिंथा काल कुआरी काया जुगत डंडा परतीत ॥ आई पंथी सगल जमाती मन जीतै जग जीत ॥ आदेस तिसै आदेस ॥ आद अनील अनाद अनाहत जुग जुग एको वेस ॥२८॥ गुरु जी कहते हैं कि हे मानव योगी ! तुम संतोष रूपी मुद्राएँ, दुष्कर्मों से लाज रूपी पात्र, पाप रहित होकर लोक-परलोक में बनाई जाने वाली प्रतिष्ठा रूपी चोली ग्रहण कर तथा शरीर को 42 | Page sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM प्रभु की नाम-सिमरन रूपी विभूति लगाकर रख । मृत्यु का स्मरण करना तेरी गुदड़ी है, शरीर का पवित्र रहना योग की युक्ति है, अकाल पुरुष पर दृढ़ विश्वास तुम्हारा डण्डा है । इन सब सदाचारों को ग्रहण करना ही वास्तविक योगी भेष है । संसार के समस्त जीवों में तुम्हारा प्रेम हो अर्थात् उनके दुख-सुख को तुम अपना दुख-सुख अनुभव करो, यही तुम्हारा आई पंथ (योगियों का श्रेष्ठ पंथ ) है । काम आदिक विकारों से मन को जीत लेना जगत् पर विजय प्राप्त कर लेने के समान है । नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है । जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है॥ २८ ॥ भुगत ज्ञान दया भंडारण घट घट वाजह नाद ॥ आप नाथ नाथी सभ जा की रिध सिध अवरा साद ॥ संजोग विजोग दुए कार चलावहे लेखे आवहे भाग ॥ आदेस तिसै आदेस ॥ आद अनील अनाद अनाहत जुग जुग एको वेस ॥२९॥ हे मानव ! निरंकार की सर्व-व्यापकता के ज्ञान का भण्डार होना तुम्हारा भोजन है, तुम्हारे हृदय की दया भण्डारिन होगी, क्योंकि 43 | Page sikhizm.com

दया-भाव रखने से ही सद्गुणों की प्राप्ति होती है। घट-घट में जो चेतन सत्ता प्रकट हो रही है वह नाद बजने के समान है। जिसने सम्पूर्ण सृष्टि को एक सूत्र में बांध रखा है, वही सृजनहार परमात्मा नाथ है, सभी ऋद्धियों-सिद्धियाँ अन्य प्रकार का स्वाद हैं। संयोग व वियोग रूपी नियम दोनों मिलकर इस सृष्टि का कार्य चला रहे हैं, कर्मानुसार ही जीवों को अपने-अपने भाग्य की प्राप्ति होती है। नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है। जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है॥ २९ ॥ एका माई जुगत विआई तेन चेले परवाण ॥ इक संसारी इक भंडारी इक लाए दीबाण ॥ जिव तिस भावै तिवै चलावै जिव होवै फुरमाण ॥ ओहो वेखै ओना नदर न आवै बहुता एहो विडाण ॥ आदेस तिसै आदेस ॥ आद अनील अनाद अनाहत जुग जुग एको वेस ॥३०॥ एक ब्रह्म की किसी रहस्यमयी युक्ति द्वारा माया की प्रसूति से तीन पुत्र पैदा हुए। इन में से एक ब्रह्मा सृष्टि रचयिता, एक विष्णु संसार का पोषक, और एक शिव संहारक के रूप में दरबार लगाकर बैठ 44 | P a g e sikhizm.com

५. पौड़ी ३१-३८: ज्ञान, सरम, करम व सच खण्ड तथा श्लोक

गया। जिस तरह उस अकाल पुरुष को भला लगता है उसी तरह वह इन तीनों को चलाता है और जैसा उसका आदेश होता है वैसा ही कार्य ये देव करते हैं। वह अकाल पुरुष तो इन तीनों को आदि व अन्त समय में देख रहा है किंतु इनको वह अदृश्य स्वरूप निरंकार नज़र नहीं आता, यह अत्याश्चर्यजनक बात है। नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है। जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है॥ ३०॥

आसण लोए लोए भंडार ॥ जो किछ पाया सु एका वार ॥ कर कर वेखै सिरजणहार ॥ नानक सचे की साची कार ॥ आदेस तिसै आदेस ॥ आद अनील अनाद अनाहत जुग जुग एको वेस ॥३१॥

उसका आसन प्रत्येक लोक में है तथा प्रत्येक लोक में उसका भण्डार है। उस परमात्मा ने सभी भण्डारों को एक ही बार परिपूर्ण कर दिया है। वह सृजनहार रचना कर करके सृष्टि को देख रहा है। हे नानक ! उस सत्यस्वरूप निरंकार की सम्पूर्ण रचना भी सत्य है।

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है। जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है॥ ३१॥ इक दू जीभौ लख होहे लख होवह लख वीस ॥ लख लख गेड़ा आखीअह एक नाम जगदीस ॥ एत राहे पत पवड़ीआ चड़ीऐ होए इकीस ॥ सुण गला आकास की कीटा आई रीस ॥ नानक नदरी पाईऐ कूड़ी कूड़ै ठीस ॥३२॥ एक जिव्हा से लाख जिव्हा हो जाएँ, फिर लाख से बीस लाख हो जाएँ। फिर एक-एक जिव्हा से लाख-लाख बार उस जगदीश्वर का एक नाम उच्चारण करें, अर्थात् निशदिन उस प्रभु का नाम सिमरन किया जाए। इस मार्ग से पति-परमेश्वर को मिलने हेतु बनी नाम रूपी सीढ़ियों पर चढ़ कर ही उस अद्वितीय प्रभु से मिलन हो सकता है। वैसे तो ब्रह्म-ज्ञानियों की बड़ी-बड़ी बातें सुनकर निकृष्ट जीव भी देहाभिमान में अनुकरण करने की इच्छा रखते हैं। परंतु गुरु नानक जी कहते हैं कि उस परमात्मा की प्राप्ति तो उसकी कृपा से ही होती है, वरन् ये तो मिथ्या लोगों की मिथ्या ही बातें है ॥ ३२ ॥ 46 | P a g e sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM आखण जोर चुपै नह जोर ॥ जोर न मंगण देण न जोर ॥ जोर न जीवण मरण नह जोर ॥ जोर न राज माल मन सोर ॥ जोर न सुरती ज्ञान वीचार ॥ जोर न जुगती छुटै संसार ॥ जिस हथ जोर कर वेखै सोए ॥ नानक उतम नीच न कोए ॥३३॥ अकाल पुरुष की कृपा-दृष्टि के बिना इस जीव में कुछ भी कहने व चुप रहने की शक्ति नहीं है अर्थात् रसना को चला पाना जीव के वश में नहीं है। माँगने की भी इसमें ताकत नहीं है और न ही कुछ देने की समर्था है। यदि जीव चाहे कि मैं जीवित रहूँ तो भी इसमें बल नहीं है, क्योंकि कई बार मनुष्य उपचाराधीन ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, मरना भी उसके वश में नहीं है। धन, सम्पत्ति व वैभव प्राप्त करने में भी इस जीव का कोई बल है, जिन के लिए मन में जो जुनून होता है। श्रुति वेदों के ज्ञान का विचार करने का भी इसमें बल नहीं है। संसार से मुक्त होने की षट्-शास्त्रों में दी गई युक्तियाँ धारण कर लेने की शक्ति भी इसमें नहीं है। जिस अकाल 47 | P a g e sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM पुरुष के हाथ में ताकत है वही रचना करके देख रहा है। गुरु नानक जी कहते हैं कि फिर तो यही जानना चाहिए कि इस संसार में न कोई स्वेच्छा से नीच है, न उत्तम है, वह प्रभु जिस को कर्मानुसार जैसा रखता है वैसा ही वह रहता है॥ ३३॥ राती रुती थिती वार ॥ पवण पाणी अगनी पाताल ॥ तिस विच धरती थाप रखी धरम साल ॥ तिस विच जीअ जुगत के रंग ॥ तिन के नाम अनेक अनंत ॥ करमी करमी होए वीचार ॥ सचा आप सचा दरबार ॥ तिथै सोहन पंच परवाण ॥ नदरी करम पवै नीसाण ॥ कच पकाई ओथै पाए ॥ नानक गया जापै जाए ॥३४॥ रात्रियों, ऋतुओं, तिथियों, सप्ताह के वारों, वायु, जल, अग्नि व पाताल आदि यावत प्रपंच हैं। स्रष्टा प्रभु ने उस में पृथ्वी रूपी धर्मशाला स्थापित करके रखी हुई है, इसी को कर्मभूमि कहते हैं। 48 | P a g e sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM उस धर्मशाला में नाना प्रकार के जीव हैं, जिनकी अनेक भांति की धर्म-कर्म की उपासना की युक्ति है और उनके श्वेत-श्यामादि अनेक प्रकार के वर्ण हैं। उनके अनेक प्रकार के अनंत नाम हैं। संसार में विचरण कर रहे उन अनेकानेक जीवों को अपने शुभाशुभ कर्मों के अनुसार ही उन पर विचार किया जाता है। विचार करने वाला वह निरंकार स्वयं भी सत्य है और उसका दरबार भी सत्य है। वही उसके दरबार में शोभायमान होते हैं जो प्रामाणिक संत हैं, जिनके माथे पर कृपालु परमात्मा की कृपा का चिन्ह अंकित होता है। प्रभु के दरबार में कच्चे-पक्के होने का परीक्षण होता है। हे नानक ! इस तथ्य का निर्णय वहाँ जाकर ही होता है॥ ३४ ॥ धरम खंड का एहो धरम ॥ ज्ञान खंड का आखहो करम ॥ केते पवण पाणी वैसंतर केते कान्ह महेस ॥ केते बरमे घाड़त घड़ीअह रूप रंग के वेस ॥ केतीआ करम भूमी मेर केते केते धू उपदेस ॥ केते इंद चंद सूर केते केते मंडल देस ॥ केते सिध बुध नाथ केते केते देवी वेस ॥ केते देव दानव मुन केते केते रतन समुंद ॥ केतीआ खाणी केतीआ बाणी केते पात नरिंद ॥ केतीआ सुरती सेवक केते नानक अंत न अंत ॥३५॥ 49 | P a g e sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM (कर्मकाण्ड में) धर्मखण्ड का यही नियम है; जो पूर्व पंक्तियों में कथन किया गया है। (गुरु नानक जी) अब ज्ञान खण्ड का व्यवहार वर्णन करते हैं। (इस संसार में) कितने प्रकार के पवन, जल, अग्नि हैं, और कितने ही रूप कृष्ण व रुद्र (शिव) के हैं। कितने ही ब्रह्मा इस सृष्टि में अनेकानेक रूप-रंगों के भेष में जीव पैदा करते हैं। कितनी ही कर्म भूमियों, सुमेर पर्वत, धुव भक्त व उनके उपदेष्टा हैं। इन्द्र व चंद्रमा भी कितने हैं, कितने ही सूर्य, कितने ही मण्डल व मण्डलांतर्गत देश हैं। कितने ही सिद्ध, विद्वान व नाथ हैं, कितने ही देवियों के स्वरूप हैं। कितने ही देव, दैत्य व मुनि हैं और रत्नों से भरपूर कितने ही समुद्र हैं। कितने ही उत्पत्ति के स्रोत हैं (अण्डज-जरायुजादि), कितनी प्रकार की वाणी है (परा, पश्यन्ती आदि) कितने ही बादशाह हैं और कितने ही राजा हैं। कितनी ही वेद-श्रुतियाँ हैं, उनके सेवक भी कितने ही हैं, गुरु नानक जी कहते हैं कि उसकी रचना का कोई अन्त नहीं है; इन सबके अन्त का बोध ज्ञान-खण्ड में जाने से होता है, जहाँ पर जीव ज्ञानयान हो जाता है॥ ३५ ॥ ज्ञान खंड मह ज्ञान परचंड ॥ तिथै नाद बिनोद कोड अनंद ॥ 50 | P a g e sikhizm.com

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सरम खंड की बाणी रूप ॥ तिथै घाड़त घड़ीऐ बहुत अनूप ॥ ता कीआ गला कथीआ ना जाहे ॥ जे को कहै पिछै पछुताए ॥ तिथै घड़ीऐ सुरत मत मन बुध ॥ तिथै घड़ीऐ सुरा सिधा की सुध ॥३६॥

ज्ञान खण्ड में जो ज्ञान कथन किया है वह प्रबल है। इस खण्ड में रागमयी, प्रसन्नतापूर्ण व कौतुकी आनंद विद्यमान है।(श्रम खंड में परमेश्वर की भक्ति को प्रमुख माना गया है) परमेश्वर की भक्ति करने का उद्यम करने वाले संतजनों की वाणी मधुर है। वहाँ (श्रम खण्ड में) पर अद्वितीय सुन्दरता वाले स्वरूप की गढ़न की जाती है। उनकी बातों का कथन नहीं किया जा सकता। यदि कोई उनकी महिमा कथन करने की चेष्टा करता भी है तो उसे बाद में पछताना पड़ता है। वहाँ पर वेद-श्रुति, ज्ञान, मन और बुद्धि गढ़े जाते हैं। वहाँ पर दिव्य बुद्धि वाले देवों व सिद्ध अवस्था की प्राप्ति वाली सूझ गढ़ी जाती है॥ ३६॥

करम खंड की बाणी जोर ॥ तिथै होर न कोई होर ॥

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तिथै जोध महाबल सूर ॥ तिन मह राम रहिआ भरपूर ॥ तिथै सीतो सीता महिमा माहे ॥ ता के रूप न कथने जाहे ॥ ना ओह मरह न ठागे जाहे ॥ जिन कै राम वसै मन माहे ॥ तिथै भगत वसह के लोअ ॥ करह अनंद सचा मन सोए ॥ सच खंड वसै निरंकार ॥ कर कर वेखै नदर निहाल ॥ तिथै खंड मंडल वरभंड ॥ जे को कथै त अंत न अंत ॥ तिथै लोअ लोअ आकार ॥ जिव जिव हुकम तिवै तिव कार ॥ वेखै विगसै कर वीचार ॥ नानक कथना करड़ा सार ॥३७॥ जिन उपासकों पर परमेश्वर की कृपा हुई उनकी वाणी शक्तिवान हो जाती है। जहाँ पर ये उपासक विद्यमान होते हैं वहाँ पर कोई और नहीं होता। उन उपासकों में देह को जीतने वाले योद्धा, इन्द्रियों को

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM जीतने वाले महाबली तथा मन को जीतने वाले शूरवीर होते हैं। उन में प्रभु राम परिपूर्ण रहते हैं। उन निर्गुण स्वरूप राम के साथ महिमा रूपी सीता चन्द्रमा समान प्रकाशमान व मन को शीतल करने वाली है। ऐसा स्वरूप प्राप्त करने वालों के गुण कथन नहीं किए जा सकते। वे उपासक न तो मरते हैं और न ही ठगे जाते हैं, जिनके हृदय में परमात्मा राम का स्वरूप विद्यमान होता है। वहाँ कई लोकों के भक्त निवास करते हैं। जिनके हृदय में सत्यस्वरूप निरंकार वास करता है, वे आनंद प्राप्त करते हैं। सत्य धारण करने वालों के हृदय (सचखण्ड) में वह निरंकार निवास करता है; अर्थात् वैकुण्ठ लोक, जहाँ सद्गुणी व्यक्तियों का वास हैं, में वह सर्गुण स्वरूप परमात्मा रहता है। यह सृजनहार परमात्मा अपनी सृजना को रच-रचकर कृपा-दृष्टि से देखता है अर्थात् उसका पोषण करता है। उस सचखण्ड में अनन्त ही खण्ड, मण्डल व ब्रह्माण्ड है। यदि कोई उसके अन्त को कथन करे तो अन्त नहीं पा सकता, क्योंकि वह असीम है। वहाँ अनेकानेक लोक विद्यमान है और उनमें रहने वालों के अस्तित्व भी अनेक हैं। फिर जिस तरह वह सर्वशक्तिमान परमात्मा आदेश करता है उसी तरह वे कार्य करते हैं। अपने इस रचे हुए प्रपंच को देख कर व शुभाशुभ कर्मों को विचार कर वह प्रसन्न होता है। गुरु नानक जी कहते हैं कि उस 53 | P a g e sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM निरंकार के मूल-तत्व का जो मैंने उल्लेख किया है उसे कथन करना अत्यंत कठिन है॥ ३७॥ जत पाहारा धीरज सुनिआर ॥ अहरण मत वेद हथीआर ॥ भओ खला अगन तप ताओ ॥ भांडा भाओ अमृत तित ढाल ॥ घड़ीऐ सबद सची टकसाल ॥ जिन कओ नदर करम तिन कार ॥ नानक नदरी नदर निहाल ॥३८॥ इंद्रिय-निग्रह रूपी भट्ठी हो, संयम रूपी सुनार हो। अचल बुद्धि रूपी अहरन हो, गुरु ज्ञान रूपी हथौड़ा हो। निरंकार के भय को धौंकनी तथा तपोमय जीवन को अग्नि ताप बनाओ। हृदय - प्रेम को बर्तन बनाकर उसमें नाम - अमृत को गलाया जाए। इसी सच्ची टकसाल में नैतिक जीवन को गढ़ा जाता है। अर्थात्-ऐसी टकसाल से ही सद् गुणी जीवन बनाया जा सकता है। जिन पर अकाल पुरुष की कृपा-दृष्टि होती है, उन्हीं को ये कार्य करने को मिलते हैं। हे नानक ! ऐसे सद् गुणी जीव उस कृपासागर परमात्मा की कृपा-दृष्टि के कारण कृतार्थ होते हैं। ॥ ३८ ॥ 54 | P a g e sikhizm.com