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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

१६४ [ २.२.१६३ सोने की ध्वजाओं के साथ सुनहरी जालों से ढक कर खड़ा किया गया । राजा- ङ्गण अलङ्कृत हुआ । ब्राह्मण लोग प्रसन्नचित्त सजधज कर खड़े थे कि हम हस्ती-मङ्गल वरेंगे, हम करेंगे । सुसीम राजा भी गहने और भाण्डे लिवा जाकर मङ्गल-स्थान पर खड़ा हुआ । बोधिसत्त्व ने भी एक कुमार के लिए जिस ढंग से अलङ्कृत होना उचित है, उस तरह अलङ्कृत हो, अपनी परिषद का नेता बन राजा के पास जाकर पूछा—"महाराज ! क्या आपने सचमुच ऐसी बात कही है कि हमारे यश को नाश करके, दूसरे ब्राह्मणों से हस्ती-मङ्गल करवा, हाथियों के अलङ्कार तथा दूसरे सामान उनको देंगे ?" इतना कह, पहली गाथा कही— काळा मिगा सेतदन्ता तव इमे परोसतं हेमजालाभिसञ्छन्ना ते ते ददामीति सुसीम ! ब्रूसि अनुस्सरं पेत्तिपितामहानं ॥ [ सुसीम ! क्या तुम अपने और हमारे पूर्वजों को याद करके भी यह कहते हो कि सोने के जाल से ढके हुए सौ से अधिक काले हाथी, जिनके दांत सफ़ेद हैं, तुमको देंगे, तुमको देंगे ? ] ते ते ददामीति सुसीम ! ब्रूसि, वंह यह अथवा तुम्हारे पास के, काळा मिगा सेत दन्ता, ऐसे नाम वाले सौ से अधिक सब अलङ्कारों से सजे हाथी दूसरे ब्राह्मणों को देता हूँ, हे सुसीम ! क्या तू यह सचमुच कहता है । अनुस्सरं पेत्ति पितामहानं, हमारे और अपने यश के पिता-पितामह आदि को याद करते हुए । महाराज ! सात पीढ़ियों से हमारे पिता-पितामह हस्ती-मङ्गल करते रहे हैं । सो आप इसे याद करके भी क्या सचमुच हमारे और अपने वंश (के सम्बन्ध) को नष्ट करके ऐसा कहते हैं ? सुसीम ने बोधिसत्त्व की बात सुन दूसरी गाथा कही— काळा मिगा सेतदन्ता मम इमे परोसतं हेमजालाभि सञ्छन्ना

सुसीम ] १६५ ते ते वदामीति वदामि माणव । अनुस्सरं पेत्तिपितामहानं ॥ [ माणव ! हाँ अपने और तुम्हारे पूर्वजों को याद करके भी यह कहता हूँ कि यह अपने स्वर्ण-जाल से ढके हुए सौ से अधिक हाथी, जिनके सफेद दाँत हैं, तुमको देता हूँ । ] ते ते वदामि, ये यह हाथी दूसरे ब्राह्मणों को देता हूँ । माणव ! यह मैं सत्य ही कहता हूँ । अथवा तेरे हाथी ब्राह्मणों को देता हूँ, यह भी अर्थ है । अनुस्सर, पिता पितामह की कृति भी याद है, नहीं याद है सो नहीं । हमारे पिता पितामह के हस्ती मङ्गल को तुम्हारे पिता पितामह करते थे, इसे याद करता हुआ भी यह कहता हूँ । बोधिसत्त्व ने कहा—"महाराज ! हमारे और अपने यश को याद रखते हुए आप क्यों मुझे छोड़ दूसरो से हस्ती मङ्गल करवाते हैं ?" "तात ! मुझे कहा गया है कि तू तीन वेद और हस्ती-सूत्र नहीं जानता है । इसीलिए मैं दूसरे ब्राह्मणो से करवाता हूँ । बोधिसत्त्व सिंह की तरह गरज कर बोला—"तो महाराज ! इतन ब्राह्मणो म जो एक भी ब्राह्मण मेरे साथ तीनो वेद तथा हस्ती-सूत्र का कुछ हिस्सा भी कह सकता हो, वह उठे । तीन वेदो और हस्ती-सूत्र के साथ हस्ती- मङ्गल करनेवाला मुझे छोड कोई दूसरा सारे जम्बूद्वीप में नहीं।" एक ब्राह्मण भी प्रतिपक्षी बनकर खड़ा नहीं हो सका । बोधिसत्त्व ने अपने कुल-वश को प्रतिष्ठित कर हस्ती-मङ्गल किया और बहुत धन ले अपने घर गए । शास्ता ने यह धर्म-देशना ला आर्य (सत्यों) को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । कोई श्रोतापन्न हुए। कोई सकृदागामी, कोई अनागामी और कोई अर्हत् । तब माँ महामाया थी । पिता शुद्धोदन महाराज थे । सुसीम राजा आनन्द था । चारो दिशाओ में प्रसिद्ध आचार्य्य सारिपुत्र था । माणव ता मैं ही था ।

१६४. गिज्झ जातक

१६६ [ २२।६४

१६४. गिज्झ जातक "यं ननु गिज्झो योजनसतं···" यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय माता पिता का पोषण करने वाले एक भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा इसकी कथा साम जातक¹ मे आएगी। शास्ता ने उस भिक्षु से पूछा— 'भिक्षु ! क्या तू सचमुच गृहस्थो का पोषण करता है ?' 'हाँ ! सचमुच' कहने पर पूछा—'वह तेरे क्या लगते हैं ? "भन्ते ! वे मेरे माता पिता हैं।" "बहुत अच्छा ! बहुत अच्छा !" कह अन्य भिक्षुओं को शास्ता ने मना किया—"भिक्षुओ ! इस भिक्षु पर क्रोध न करें। पुराने समय में पण्डित- जन गुणों का ख्याल करके भी रिश्तेदारो का उपकार करते रहे हैं। इसका तो कर्तव्य है कि यह माता पिता की सेवा करे" कह पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पुराने समय मे वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व गृद्ध-पर्वत पर गृध्र होकर पैदा हो माता पिता का पोषण करते थे। एक बार बडा आंधी-पानी आया। गृध्र आंधी-पानी न सह सकने के कारण शीत से डर कर वाराणसी जा वहाँ चारदीवारी के पास, खाई के निकट सर्दी से कांपते हुए बैठे। वाराणसी-सेठ नगर से निकल कर नहाने जा रहा


¹ साम जातक (५४०)

गिद्ध ] १६७ था । उसने उन गृध्रों को कष्ट में देखकर एक ऐसी जगह पहुँचा दिया जहाँ वर्षा नहीं हो रही थी। फिर वहाँ आग जलवाई। मुर्दा गौ फेंकने के स्थान से गो-मांस मँगवा कर उन्ह दिलवाया। उनकी रक्षा का प्रबन्ध किया। आँधी-पानी के बन्द होने पर गृध्र स्वस्थ शरीर हो पर्वत को ही लौट गए। उन्होने वहाँ इकट्ठे हो, इस प्रकार मन्त्रणा की। 'वाराणसी सेठ ने हमारा उपकार किया। उपकार करने वाले का प्रत्युपकार करना चाहिए। इसलिए अब से तुम म से जिस किसी का जो वस्त्र वा आभरण मिले, उसे चाहिए कि वह वाराणसी-सेठ के घर में खुले आँगन में गिरा दे।' उस समय से गृध्र, आदमियो के धूप में सुखाने के लिए डाले हुए वस्त्रा- भरणों को, उन्हें लापरवाह देख, जिस तरह से चील मांस के टुकड़े को एक दम उठा ले जाती हैं, उसी तरह उठा ले जाकर वाराणसी-सेठ के खुले आँगन में गिरा देते । सेठ ने यह मालूम करके कि यह वस्त्राभूषण गृध्र ला लाकर डालते हैं, उन्हें पृथक एक ओर रक्खा । राजा के पास खबर पहुँची कि गृध्र नगर उजाड़ रहे हैं। उसने कहा कि किसी एक गृध्र को पकड़ लो। सब माल मँगवा लूँगा। राजा ने जहाँ तहाँ जाल और पाश फैलवाए । माता पिता का पोषण करने वाला गृध्र जाल में . फँस गया। उसे पकड़कर राजा को दिखाने के लिए ले चले। वाराणसी-सेठ ने राजा की सेवा में जाते समय उन मनुष्यो को गृध्र पकड़ कर ले जाते हुए देखा। उसने सोचा कि यह इस गृध्र को कष्ट न दें, इसलिए साथ हो लिया। गृध्र को राजा के पास ले गए। राजा ने पूछा— "तुम नगर पर छापा डालकर वस्त्र आदि ले जाते हो ?" "महाराज ! हाँ ।" "वह किसे दिए है ?" "वाराणसी-सेठ को ।" "क्यो ?" "हमें उसने जीवन-दान दिया था। उपकार करने वाले का प्रत्युपकार करना चाहिए। इसलिए दिए।" राजा ने उसे यह कहते हुए कि गृध्र तो सौ योजन की दूरी से लाश को

१६८ [ २.२.१६४ देख लेते हैं, तूने अपने लिए फैलाए फंदे को क्यो नहीं देखा, (यह) पहली गाथा कही— यं ननु गिज्झो योजनसतं कुणपानि अवेक्खति, कस्मा जालं च पासं च आसज्जापि न बुज्झसि ॥ [ गृध्र तो सौ योजन दूरी पर से भी लाश को देख लेता है। तू पास से भी जाल और फंदे को क्यो नहीं देख सका ? ]

यं निपात मात्र है। नु, निपात ही है। गिज्झो योजनसतं (गृध्र सौ योजन) दूर पर पड़ी हुई कुणपानि अवेक्खति देखता है। आसज्जापि, पास आकर भी, पहुँच कर भी, तू अपने लिए फैलाए जाल और फंदे के पास पहुँच कर भी उसे क्यो न बुज्झसि (यह) पूछा।

गृध्र ने उसकी बात सुन दूसरी गाथा कही— यदा पराभवो होति पोसो जीवितसङ्खये, अथ जालं च पासं च आसन्नापि न बुज्झति ॥ [ जब विनाश का समय आता है, जब जीवन पर सङ्कट आता है, तब प्राणी पास में पड़े हुए जाल और फंदे को भी नहीं देखता ।]

पराभवो, विनाश। पोसो, प्राणी।

शास्ता ने यह धर्म-देशना ला आर्य(-सत्यो) को प्रकाशित कर जातक

नकुल ] १६५ शास्ता ने यह धर्म-देशना ला आर्य(-सत्यो) को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर माता पिता का पोषण करने वाला भिक्षु श्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय राजा आनन्द था। वाराणसी सेठ सारिपुत्र था। माता पिता का पोषण करने वाला गृध्र तो मैं ही था। १६५. नकुल जातक "सन्धि कत्वा अमित्तेन..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय दो श्रेणियों के कलह के बारे में कही। क. वर्तमान कथा इसकी कथा उपरोक्त उरग जातक' की तरह ही है। इसमें शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ ! इन दो महा-मन्त्रियों का न केवल अभी मैने मेल कराया है। पहले भी मैने इन दोनो का मेल कराया है।" यह कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बडे होने पर तक्षशिला जाकर सब विद्याएँ सीखी। फिर गृहस्थी छोड ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रज्या ली। अभिज्ञा 'उरग जातक (१५४)

२०० [ २.२.१६५ तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर फल-मूल चुग चुग कर खाते हुए हिमालय-प्रदेश में रहने लगे। उनके चङ्क्रमण करने के स्थान के एक सिरे पर धाम्बी में एक नेवला और उसीके पास वृक्ष की खोह मे एक सर्प रहता था। वह दोनो नेवला और साँप हमेशा आपस में झगडते रहते थे। बोधिसत्त्व ने उनको झगड़ने का दुष्परिणाम और मैत्री-भावना का लाभ समझा कर कहा कि कलह न करके मिलकर रहना चाहिए। इस प्रकार उन दोनो का मेल करा दिया। साँप के बाहर निकलने के समय नेवला चङ्क्रमण-भूमि के सिरे पर बांबी के द्वार में से सिर निकाल मुंह खोल श्वास-प्रश्वास लेता हुआ लेट कर सो रहा। बोधिसत्त्व ने उसे इस प्रकार सोते हुए देख 'तुझे किस कारण से भय लगा है ?' पूछते हुए यह पहली गाथा कही— सन्धिं कत्वा अमित्तेन अण्डजेन जलाबुज ! विवरिय दाढं सयसि कुतो तं भयमागतं ॥ [ हे नकुल ! तू सांप से दोस्ती करके भी मुंह खोले पड़ा है। तेरे भयभीत होने का क्या कारण है ? ] ————— सन्धि कत्वा मैत्री करके, अण्डजेन, अण्डे से पैदा हुए नाग से, जलाबुज¹ ! नकुल को पुकारता है। वह गर्भ से पैदा होने के कारण जलाबुज कहलाया। विवरिय, खोलकर। ————— इस प्रकार बोधिसत्त्व के कहने पर नेवला बोला—आर्य्य ! शत्रु की ओर से असावधान नही होना चाहिए। सशंकित ही रहना चाहिए। यह कहते हुए नेवले ने दूसरी गाथा कही— सङ्केथेव अमित्तस्मिं मित्तस्मिं पि न विस्ससे अभया भयमुप्पन्नं अपि मूलं निकन्तति ॥ ————— ¹ ज्राबुज (=जरायुज)

उपसाळ्हक ] २०१ [ शत्रु से सशङ्कित रहे। मित्र पर भी विश्वास न करे। अभय से जो भय पैदा होता है वह जड़ भी खोद देता है।] अभया भयमुप्पन्न यहाँ से तुझे भय नहीं है, ऐसा अभय (देने वाला) कौन है ? मित्र ! मित्र मे भी विश्वास करने पर उससे जो भय उत्पन्न होता है, वह जड़ भी खोद देता है। मित्र को सब छिद्र मालूम होते हैं, इसलिए वह जड़ खोदने का काम करता है। बोधिसत्त्व ने कहा—"डर मत। मैने ऐसा वर दिया है कि सर्प अब तुझसे द्वेष नहीं करेगा। तू अब से उससे सशङ्कित मत रह।" इस प्रकार उपदेश दे, चारो ब्रह्म विहारो की भावना कर बोधिसत्त्व ब्रह्मलोकगामी हुए। वे भी कर्मानुसार (परलोक) सिधारे। शास्ता ने यह धर्मोपदेश दे जातक का मेल बैठाया। उस समय सर्प और नेवला यह दोनो प्रधान थे। तपस्वी तो मैं ही था। १६६. उपसाळ्हक जातक उपसाळ्हक नामानं, यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय उप- साळ्हक नाम के एक ब्राह्मण के बारे में जिसे श्मशान की शुद्धि का बहुत ख्याल था कही। क. वर्तमान कथा वह ब्राह्मण बड़ा धनवान् था। लेकिन क्योंकि वह एक मिथ्या-मत का शिकार था, इसलिए वह पास के विहार में रहने वाले बुद्धो की भी सेवा नहीं करता था। हाँ, उसका पुत्र पण्डित था, ज्ञानी था।

२०२ [ २-२ १६६ उस ब्राह्मण ने बूढा होने पर पुत्र को कहा—'तात ! मुझे किसी ऐसे श्मशान में मत जलाना जहाँ कोई चाण्डाल जलाया गया हो। मुझे किसी ऐसे ही श्मशान में जलाना जहाँ पहले कभी कोई न जलाया गया हो।” “तात ! मैं नही जानता कि आपको मुझे वहाँ जलाना चाहिए। बहुत अच्छा हो, मुझे साथ ले जाकर आप बता दें कि मुझे तुम इस जगह जलाना।” ब्राह्मण ने 'तात ! अच्छा' कह, और उसे ले जा नगर से निकल गृध्र- कूट पर्वत पर चढ कहा—'तात ! यहाँ पहले कोई चाण्डाल नहीं जलाया गया है। मुझे यहाँ जलाना।” फिर वह पुत्र के साथ पर्वत से उतरने लगा। शास्ता ने प्रात काल ही ऐसे लोगो का विचार करते हुए जिनकी उस दिन ज्ञानप्राप्ति की सम्भावना थी उन पिता-पुत्र की श्रोतापत्ति-मार्गारूढ होने की सम्भावना को देखा। इसलिए मार्ग पकड एक शिकारी की तरह पर्वत की तराई में पहुँच उनके पर्वत से उतरते समय उनकी प्रतीक्षा करते हुए बैठे। उन्होने उतरते समय शास्ता को देखा। शास्ता ने कुशल-क्षेम पूछते हुए कहा—"ब्राह्मण ! कहाँ गए थे ?” माणवक ने वह बात कही। शास्ता ने कहा—'तो आओ, तुम्हारे पिता ने जो स्थान बताया है, वहाँ चलें।' उन दोनो को साथ लेकर पर्वत के शिखर पर चढ पूछा—'कौनसी जगह है?' माणवक ने कहा—"भन्ते ! इन तीनो चोटियो के बीच में बताया है।” शास्ता बोले—'माणवक ! तेरे पिता केवल अभी श्मशान की शुद्धि मानने वाले नही है, पहले भी श्मशान की शुद्धि मानने वाले रहे हैं। न केवल अभी इसने तुझे कहा है कि मुझे इस स्थान पर जलाना, पहले भी इसने इसी स्थान पर जलाने के लिए कहा है।” इतना कह, माणवक के प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में इसी राजगृह में यही उपसाल्हक ब्राह्मण था, यही इसका पुत्र था।

उपसाळ्हक ] २०३ उस समय बोधिसत्व मगध देश में ब्राह्मण कुल में पैदा हो, सब विद्याएँ सीख, ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो अभिज्ञा और समापत्तियाँ प्राप्त कर ध्यान-क्रीडा करते हुए हिमालय प्रदेश में चिरकाल तक रहे । फिर नमक- खटाई खाने के लिए गृध्रकूट पर पर्ण-कुटी में रहने लगे । उस समय उस ब्राह्मण ने इसी तरह से पुत्र को कह, पुत्र के यह कहने पर • कि 'तुम्ही मुझे उस तरह का स्थान बता दो' यही स्थान बताया । फिर पत्र के साथ उतरते हुए ब्राह्मण बोधिसत्त्व को देख उनके पास पहुँचा । बोधिसत्त्व ने इसी तरह पूछ माणवक की बात सुन, कहा—'आ, तेरे पिता द्वारा बताए गए स्थान की परीक्षा करें कि वहाँ पहले कोई जलाया गया है, वा नहीं ?' फिर उनके साथ पर्वत-शिखर पर चढ़, जब माणवक ने कहा कि यह तीनो चोटियो के बीच का स्थान ऐसा है जहाँ कोई नहीं जलाया गया, कहा—"माणवक ! इसी स्थान पर जलाए गयो का हिसाब नहीं है। तेरा पिता इसी राजगृह में ब्राह्मण कुल में ही पैदा होकर, उपसाळ्हक नाम से ही इन्ही चोटियो के बीच में चौदह हजार बार जलाया गया है। पृथ्वी में ऐसी कोई जगह नहीं है, जहाँ कोई न कोई जलाया न गया हो, जहाँ श्मशान न बना हो, जहाँ सिर न कटे हो। पूर्व-जन्मो का ज्ञान होने से, उघाड कर यह दो गाथाएँ कही— उपसाळ्हक नामान सहस्सानि चतुद्दस अस्मिं पदेसे दट्ठानि नत्थि लोके अनामंतं ॥ यम्हि सच्चं च धम्मो च अहिंसा सयमो दमो एतदरिया सेवन्ति एतं लोके अनामंतं । [ उपसाळ्हक नाम से ही चौदह हजार व्यक्ति इसी स्थान में जलाए गए। लोक में ऐसी जगह नहीं है जहाँ कोई न कोई मरा न हो। जिसमे सत्य है, धर्म है, अहिंसा है, सयम है उसे आर्य्य-जन सेवन करते हैं। यही लोक में नहीं मरता है ।] ——— अनामंतं, मृत-स्थान को ही व्यवहार से अमृत-स्थान कहा गया है। उसका प्रतिषेध करते हुए अनामंत कहा है। अनमतं, भी पाठ है। लोक में

[ २.२.१६७

री जगह नहीं है जहाँ श्मशान न बना हो, जहाँ कोई न मरा हो। यम्हि च्चं च धम्मो च, जिस व्यक्ति में चार आर्य-सत्य, पूर्व-भाग-सत्य ज्ञान¹ तथा कुत्तर धर्म हैं, अहिंसा, दूसरो को कष्ट न देना, संयमो, सदाचार, दमो न्द्रियो का दमन। जिस आदमी में यह गुण है, एतदरिया सेवन्ति बुद्ध, प्रत्येक र तथा बुद्ध श्रावक आर्य-जन इस स्थान का सेवन करते हैं। इस प्रकार आदमी के पास जाते हैं, उसकी संगति करते हैं। एत लोके अनामृतं, यही र लोक में अमृतत्व का साधन होने से अमृत कहलाते है।

इस प्रकार बोधिसत्त्व पिता तथा पुत्र को धर्मोपदेश दे चारो ब्रह्मविहारो भावना कर ब्रह्मलोकगामी हुए। शास्ता ने इस धर्मोपदेश को ला (आर्य-)सत्यों को प्रकाशित कर जातक मेल बैठाया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर दोनो पिता पुत्र तापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुए। उस समय के पिता पुत्र ही अब के पिता पुत्र हुए। तपस्वी तो मैं ही था।

१६७. समिद्धि जातक

"अभुत्वा भिक्खसि भिक्खु..." यह शास्ता ने राजगृह के तपोदाराम मे ार करते हुए समिद्धि स्थविर के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

एक दिन आयुष्मान् समिद्धि सारी रात योगाभ्यास करके अरुणोदय के य स्नान कर अपने स्वर्ण-वर्ण शरीर को सुखा रहे थे। उन्होने अन्तरवासक


¹ मार्ग प्राप्ति से पहले का आर्य-सत्यों का ज्ञान।

समिद्धि ] २०५ पहन लिया था और उत्तरासंग उनके हाथ में था। वे सोने की सुन्दर प्रतिमा की तरह प्रतीत होते थे। उनका शरीर समृद्ध होने से ही उनका नाम समिद्धि था। उनके शरीर का सौन्दर्य देख एक देव-कन्या उन पर आसक्त हो गई और बोली—"भिक्षु ! तू तरुण है, तू युवा है, तेरे केश सुन्दर तथा काले है, तू श्रेष्ठ यौवन से युक्त हैं, तू मनोरम है, तू दर्शनीय है, तू मन को प्रसन्न करने वाला हैं। तेरे ऐसे शरीर वाले को काम-भोगो को न भोग प्रव्रजित होने में क्या लाभ ? अभी तू काम-भोगो को भोग। पीछे प्रव्रजित होकर श्रमण-धर्म का पालन करना।" उसे स्थविर ने उत्तर दिया—"हे देव-कन्या ! मैं नही जानता कि मैं किस आयु में मरूँगा। मेरी मृत्यु मुझसे छिपी है। इसलिए तरुणाई की अवस्था में ही श्रमण-धर्म करके दुःख का अन्त करूँगा।" स्थविर ने उसका स्वागत नही किया। वह वही अन्तर्ध्यान हो गई। स्थविर ने शास्ता के पास जाकर यह बात कही। शास्ता बोले— "समिद्धि ! न केवल तुझे ही अब देव-कन्या ने प्रलोभित किया है ? पूर्व में भी देव-कन्याओ ने प्रव्रजितों को प्रलोभित किया है।" शास्ता ने उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व काशी-गाँव में ब्राह्मण कुल में पैदा हो, बडे होने पर सब विद्याओ में पारङ्गत हो, ऋषि प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित हो, अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर हिमालय प्रदेश में एक तालाब के पास रहने लगे। वह सारी रात योगाभ्यास करते रहे। अरुणोदय होने पर स्नान किया। फिर एक वल्कल चीर पहन, एक हाथ में ले शरीर को सुखाने लगे। उसका सुन्दर शरीर देख एक देव-कन्या उस पर आसक्त हो बोधिसत्व को ललचाती हुई यह पहली गाथा बोली—

[२२।६७] अभुत्वा भिक्खसि भिक्खु ! नहि भुत्वान भिक्खसि । भुत्वान भिक्खु ! भिक्खसु मा त कालो उपच्चगा ॥१ [ भिक्षु ! तू बिना काम भोगो को भोगे भिक्षु बना है। काम भोगो को भोग कर भिखारी नहीं बना है। भिक्षु ! काम भोगो का भोग करके तू भिखारी बन। यह तेरा काम भोगो को भोगने का समय न बीत जाए ॥] अभुत्वा भिक्खसि भिक्खु, भिक्षु ! तू तरुणाई में काम भोगो को न भोग कर भिक्षाचार करता है। नहि भुत्वान भिक्खसि, क्या पांच प्रकार के काम- भोगो को भोग कर ही भिखारी नहीं बनना चाहिए ? तू काम भोगो को न भोग कर ही भिखारी बना है। भुत्वान भिक्खु ! भिक्खसु, भिक्षु ! अभी तरुणाई में काम भोगो को भोग। काम भोगो को भोग कर पीछे वृद्ध होने पर भिखारी बनना। मा तं कालो उपच्चगा, यह काम भोगो के उपभोग करने की आयु यह तरुणाई यूँ ही न बिता। बोधिसत्व ने देव-कन्या की बात सुन अपना विचार प्रकट करने के लिए दूसरी गाथा कही— काल वोह न जानामि, छन्नो कालो न दिस्सति तस्मा अभुत्वा भिक्खामि, मा म कालो उपच्चगा ॥ [ मैं मृत्यु के समय को नहीं जानता। छिपा हुआ समय दिखाई नहीं देता। इसलिए बिना काम भोगा का उपभोग किए ही भिक्षु बना हूँ। मेरा यह समय न बीत जाए।] काल वोह न जानामि, 'वो' केवल निपात है। मै प्रथम आयु में मरूँगा, मध्यम-आयु में अथवा आखिरी में—अपना मरन का समय नहीं जानता हूँ। अत्यन्त पण्डित आदमी को भी— १ देवता संयुत्त, संयुक्त निकाय।

सकुणिग्घि ] २०७ जीवित ब्याधि कालो च देहनिक्खेपन गति पञ्चेते जीवलोकस्मि अनिमित्ता न नायरे । [ जीव-लोक में इन पाँच बातो का पता नही लगता—(१) जीने की आयु, (२) रोग, (३) मृत्यु-समय, (४) शरीर के पतन का स्थान, (५) मरने पर क्या गति होगी ? ] छन्नो कालो न दिस्सति, इसलिए इस आयु में अथवा इस समय वा हेमन्त आदि ऋतुओ में से इस ऋतु में मुझे मरना होगा, यह मुझसे भी छिपा हुआ मृत्यु-समय मुझे दिखाई नहीं देता। अच्छी प्रकार ढका होने से प्रकट नही है। तस्मा अभुत्वा भिक्खामि इसलिए काम-भोगो को न भोग भिखारी बना हूँ। मा म कालो उपच्चगा, मेरा श्रमण धर्म करने का समय बीत न जाए। इसलिए तरुणाई में ही प्रव्रजित होकर श्रमण धर्म करता हूँ। देव-कन्या बोधिसत्त्व की बात सुन वही अन्तर्ध्यान हो गई। शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला जातक का मेल बैठाया। उस समय देव-कन्या यही देव-कन्या थी। मैं ही उस समय तपस्वी था। १६८. सकुग्णग्घि जातक सेनो बलसा पतमानो, यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय अपने विचार के द्योतक सकुगोवाद सूत्र१ के बारे में कही। १ महावग्ग ।

क. वर्तमान कथा

[२०८] [ २.२.१६८

क. वर्तमान कथा एक दिन शास्ता ने भिक्षुओं को सम्बोधन कर उपदेश दिया "भिक्षुओ ! जो तुम्हारे योग्य हो उसमें विचरो। जो तुम्हारा पैतृक विषय हो उसमें।" यह संयुक्त निकाय के महावर्ग का सूत्र है।' इसका उपदेश करते हुए कहा- "तुम अपनी बात रहने दो। पूर्व समय में जानवर भी अपने पैतृक विषय को छोड़ अयोग्य-स्थान में विचरने से शत्रुओं के हाथ में पड़, अपनी बुद्धि तथा उपाय-कौशल से शत्रुओं के हाथ से मुक्त हुए।" इतना कह शास्ता ने पूर्व- जन्म की कथा कही।

ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्व बटेर होकर पैदा हुआ। वह हल चलाने की जगह पर ढेलों में रहता था। एक दिन अपनी गोचर-भूमि को छोड़ दूसरे की गोचर भूमि में जाने की इच्छा से वह जंगल तक चला गया। उसे वहाँ घूमता देख एक बाज ने यकायक आकर पकड़ लिया। जब उसे बाज पकड़ कर ले जा रहा था, तो वह इस प्रकार रोने लगा- "हम अत्यन्त अभाग्यवान् हैं। हमारा पुण्य बहुत कम है। हम दूसरों के स्थान में चरने गए। यदि आज हम अपने पैतृक स्थान में ही चरते तो यह बाज मेरे साथ युद्ध करने में समर्थ न होता"। "लापक ! तेरा स्वकीय पैतृक स्थान कौन सा है ?" "यही जहाँ हल चलाने की जगह पर ढेले हैं।" बाज ने अपने दल को ढीला कर उसे छोड़ दिया और कहा- 'ह बटेर तू जा। मैं तुझे वहाँ भी जाकर पकड़ लूँगा।' बटेर ने वहाँ जा एक बड़े से ढेले पर चढ बाज को ललकारा- 'बाज ! अब तू आ।' बाज ने अपना बल सँभाल, दो पक्षों को उठा बटेर को एकदम घेर लिया।

१ सतिपट्ठान सयुत्त, अम्बपालि वर्ग ।

शास्ता ने यह अतीत-कथा सुना कहा—‘भिक्षुओ ! इस प्रकार जानवर

सकुणग्घि ] २०६ जब उस बटेर ने समझा कि बाज मेरे बहुत समीप आगया, तो वह पलट कर उस ढेले के अन्दर चला गया। बाज अपने जोर को न रोक सका। उसकी छाती ढेले से टकराई। इस प्रकार उसका कलेजा चूर चूर हो गया। आँखें निकल आईं। यह मर गया। शास्ता ने यह अतीत-कथा सुना कहा—‘भिक्षुओ ! इस प्रकार जानवर भी अयोग्य स्थान पर चरने से शत्रु के हाथ मे पड जाते है। योग्य स्थान में, अपने पैतृक स्थान में चरते हुए शत्रुओ को जीत लेते हैं। इसलिए तुम भी अयोग्य स्थान में, जो तुम्हारा विषय नही है, मत विचरो। अयोग्य-स्थान में, जो अपना विषय नही है विचरने वाले पर भिक्षुओ ! मार आक्रमण करता है। वह मार का निशाना बनता है। भिक्षुओ ! भिक्षुओ के लिए अयोग्य-स्थान, जो उनका विषय नही है, क्या है ? जो यह पाँच प्रकार के कामोपभोग हैं। कौन से पाँच ? आँख से देखे जाने वाले (प्रिय) रूप, कान से सुने जाने वाले शब्द, नाक से सूंघी आने वाली सुगन्धियाँ, जिह्वा से मजा लिए जानेवाले रस और शरीर से छुए जाने वाले स्पर्श—भिक्षुओ, यह भिक्षुओ के लिए अयोग्य- स्थान हैं। यह उनका विषय नही है।" इतना कह सम्यक सम्बुद्ध हुए रहने की अवस्था में प्रथम गाथा कही— सेनो बलसा पतमानो लापं गोचरठायिनं,१ सहसा अज्झपत्तो मरण तेनुपागमि ॥ [ बाज अपने बल को न रोक करके अपने योग्य-स्थान पर विचरन वाले बटेर पर झपटा। इसीसे वह मर गया।] बलसा पतमानो, बटेर को पकडन की इच्छा से जोर से गिरने वाला, गोचरठायिनं, अपने विषय (=प्रदेश) से निकल जगल तक चरने के लिए स्थित। अज्झपत्तो, पहुँचा। मरण तेनुपागमि, इस कारण से मर गया। १ अगोचर ठायिनं के स्थान पर गोचर ठायिन श्रेयस्कर प्रतीत होता है। १४

२१० [ २.२.१६६ उसके मरने पर बटेर ने निकल कर शत्रु की पीठ देख कर सन्तुष्ट हो उसकी छाती पर खड़े हो उल्लास पूर्वक दूसरी गाथा कही— सोहं नयेन सम्पद्यो पेत्तिके गोचरे रतो अपेतसत्तु मोदामि सम्पस्स अत्यमत्तनो ॥ [ में उपाय से अपने पैतृक-प्रदेश में चरता हुआ, अपनी उन्नति देखता हुआ प्रसन्न हूँ, क्योंकि मेरा शत्रु नहीं रहा है।] नयेन, उपाय से, अत्यमत्तनो, अपनी आरोग्य नामक उन्नति। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर बहुत से भिक्षुओं ने श्रोतापत्ति आदि फल प्राप्त किए। उस समय बाज देवदत्त था। बटेर तो मैं ही था। १६६. अरक जातक "यो वे मेत्तेन चित्तेन " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय मेत्तसूत्त¹ के बारे में कही। क. वर्तमान कथा एक समय शास्ता ने भिक्षुओं को सम्बोधन कर कहा—"भिक्षुओ, मैत्री- भावना जो कि चित्त की विमुक्ति (का साधन) है का सेवन करने से, की ¹अंगुत्तर निकाय, एकादसक निपात।

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भावना करने से, को बढ़ाने से, को जारी रखने से, का अभ्यास करने से, का अनुष्ठान करने से, का अच्छी तरह आरम्भ करने से ग्यारह लाभो की आशा करनी चाहिए। कौन से ग्यारह ? सुख पूर्वक सोता है, सुख से जागता है, बुरा स्वप्न नही देखता, मनुष्यो का प्रिय होता है, अ-मनुष्यों का प्रिय होता है, देवता रक्षा करते हैं, इस पर अग्नि, विष, या शस्त्र का आक्रमण नही होता, चित्त जल्दी शान्त हो जाता है, मुख-वर्ण सुन्दर होता है, होश रखकर शरीर छोड़ता है तथा अधिक कुछ (निर्वाण-मार्ग) न प्राप्त कर सकने पर ब्रह्मलोकगामी अवश्य होता है। भिक्षुओ मैत्री भावना जो कि चित्त की विमुक्ति (का साधन) है, का सेवन करने से.. .इन ग्यारह लाभो की आशा करनी चाहिए।" इन ग्यारह लाभो वाली मैत्री-भावना की प्रशंसा कर आगे कहा—"भिक्षुओ, भिक्षु को सभी प्राणियो के प्रति खास तौर पर, साधारण तौर पर मैत्री-भावना करनी चाहिए। हितैषी का भी हित- चिन्तक होना चाहिए, जो हितैषी न हो उसका भी हित-चिन्तक होना चाहिए, जो मध्यस्थ-वृत्ति हो उसका भी हित-चिन्तक होना चाहिए। इस प्रकार सभी प्राणियो के प्रति खास तौर पर, तथा साधारण तौर पर मैत्री-भावना करनी चाहिए । करुणा-भावना की भावना करनी चाहिए । मुदिता-भावना की भावना करनी चाहिए। उपेक्षा-भावना की भावना करनी चाहिए। इन चारो ब्रह्म-विहारो का अभ्यास करना ही चाहिए। इस प्रकार अभ्यास करने से यदि मार्ग तथा फल की प्राप्ति न भी हो तो भी ब्रह्मलोकगामी होता है । पुराने समय में भी पण्डित लोग सात वर्ष तक मैत्री-भावना करके सात सबत- विवर्त्त कल्प तक ब्रह्मलोक में ही रहे।" इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा

पूर्व समय में एक कल्प में बोधिसत्त्व एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए । बड़े होने पर काम-भोगो को छोड़ ऋषि-प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित हो चारो ब्रह्म-विहारो को प्राप्त कर अरक नाम से उपदेशक हुए। वह हिमालय प्रदेश में रहते थे। उनके बहुत अनुयाई थे। वे ऋषि-गणो को उपदेश देते हुए कहते —"प्रव्रजित को मैत्री-भावना का अभ्यास करना चाहिए। करुणा-भावना,

२१२ [ २.२.१६६ मुदिता-भावना तथा उपेक्षा-भावना का अभ्यास करना चाहिए। मैत्री-पूर्ण चित्त अर्पणा-समाधि तथा ब्रह्मलोक-परायणता तक को प्राप्त कराता है।" इस प्रकार मैत्री-भावना की प्रशंसा करते हुए उन्होने यह गाथा कही— यो वे मेत्तेन चित्तेन सब्ब लोकानुकम्पति उद्धं अधो च तिरियं च अप्पमाणेन सब्बसो अप्पमाणं हितं चित्तं परिपुण्णं सुभावितं यं पमाण कतं कम्मं न तं तत्रावसिस्सति [ जो अप्रमाण मैत्री चित्त से ऊपर-नीचे तथा तिर्यक् दिशा में सारे लोको पर अनुकम्पा करता है, उसके प्रमाण रहित, परिपूर्ण अच्छी तरह से भावना किए गए मैत्री-चित्त के (फल) के आगे जो सीमित कर्म है उसका फल नहीं ठहरता।] यो वे मेत्तेन चित्तेन सब्ब लोकानुकम्पति, क्षत्रिय आदि में अथवा श्रमण- ब्राह्मण आदि में जो कोई अर्पणा-प्राप्त चित्त से सारे प्राणियो पर अनुकम्पा करता है, उद्धं पृथिवी से नेवसञ्ञानासञ्ञायतन ब्रह्मलोक तक अधो पृथ्वी से नीचे उस्सद नाम के महानरक तक, तिरियं, मनुष्य लोक में जितने चक्रवाल हैं उन सब में जितने प्राणी है वह सभी वैर-रहित हो, क्रोध-रहित हो, दुःख- रहित हो; इस प्रकार भावना किए गए मैत्री-चित्त से। अप्पमाणेन अप्रमाण प्राणियो के कारण असीम आलम्बन होने से अप्रमाण। सब्बसो सब तरह से ऊपर, नीचे तथा तिर्यक् इस प्रकार सब सुगति तथा दुर्गति में। अप्पमाणं हितं चित्तं सभी प्राणियों के प्रति मैत्री की असीम भावना। परिपुण्णं सम्पूर्ण सुभावितं अच्छी प्रकार उन्नत, इसका मतलब है अर्पणा-चित्त। यं पमाण कतं कम्मं जो यह अप्पमाण-अप्पमाणारम्मण, परित्तं-अप्पमाणारम्मण तथा अप्प माणं-परित्तारम्मणं तीन प्रकार के आरम्मण पर पूर्ण अधिकार करते हुए उसे न बढा कर जो सीमित कामावचर कर्म किया जाता है। न तं तत्रावसिस्सति वह सीमित (परित्त) कर्म जो अप्रमाण मैत्री-चित्त रूपी रूपावचर धर्म है, उसके सामने नहीं ठहरता। जैसे बाढ़ के आने पर सीमित पानी उससे पृथक नहीं रह सकता है, नहीं ठहरता है; वह बाढ़ में ही मिल जाता है। उसी प्रकार

ककण्टक ] २१३ वह सीमित कर्म उस महान् कर्म के अन्दर, उस महान् कर्म में मिलकर, फल देने में असमर्थ हो रहता है, अपना फल नहीं दे सकता। वह महान् कर्म ही उसे ढक देता है, महान् कर्म ही फल देने वाला रहता है। इस प्रकार बोधिसत्त्व अपने शिष्यो को मैत्री-भावना का फल कह ध्यान में अवस्थित रह ब्रह्मलोक में पैदा हो सात सवत्तं-विवत्तं कल्प तक फिर इस लोक में नहीं आए। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।• उस समय ऋषि-गण बुद्ध-परिषद थी। अरक नाम का उपदेशक तो मै ही था। १७०. ककण्टक जातक “नायं पुरे श्रोनमति' •” यह ककण्टक जातक महाउम्मग जातक१ में आएगी। १ महाउम्मग जातक (५४६)