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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

कटाहक ] ६१

पूछा—'अम्म ! क्या मेरा पुत्र तेरे दुःख-सुख मे आलस्य रहित हो साथ देता हैं ? दोनो जने मिलकर प्रसन्नता-पूर्वक रहते हो न ?'' "तात ! सेठ के पुत्र में और कोई दोष नही। केवल आहार की निन्दा करता है।" "अम्म ! वह सदैव से दुख देनेवाला है। लेकिन मै तुझे उसका मुंह बन्द करने का मन्त्र देता हूँ। तू उसे अच्छी तरह सीख। मेरे पुत्र के भोजन की निन्दा करने के समय, जैसे सीखा वैसे ही उसके सामने खडी होकर कहना'— इस प्रकार एक गाथा सिखा कुछ दिन रह वाराणसी चले गए। कटाहक भी बहुत सा खाद्य-भोज्य ले, उनके पीछे पीछे जा बहुत सा धन देकर लौट आया। बोधिसत्त्व के जाने के बाद से कटाहक और भी अभिमानी हो गया। एक दिन जब सेठ की लडकी नाना प्रकार के अच्छे अच्छे भोजन ले कडछी से परोस रही थी उसने भोजन की निन्दा आरम्भ की। सेठ की लडकी ने जैसे बोधिसत्त्व से सीखी थी, उसी प्रकार यह गाथा कही— बहुम्पि सो विकत्थेय्य अञ्ञ जनपद गतो, अन्वागन्त्वान दूसेय्य भुञ्ज भोगे कटाहक ॥ [ दूसरे देश में जाकर वह बहुत बकता है। फिर आकर उसे दोषी ठहरा दे, (इसका ख्याल कर) कटाहक जो भोग मिल रहा है, उसका उपभोग कर । ]

बहुम्पि सो विकत्थेय्य अञ्ञ जनपद गतो, जो अपने जन्म-स्थान से किसी ऐसे दूसरे देश मे गया रहता है, जहाँ उसकी जाति नही जानते, वह बहुत बकता हैं। धोका देने की ठगने की बात करता है। अन्वागन्त्वान दूसेय्य, इस वार स्वामी की अगवानी करके दास कर्म करने के कारण चाबुक से पीटे जा कर पीठ की चमडी उधेडी जाने से और दाग दिए जाने से बच गया। यदि अनाचार करेगा तो दोबारा आने पर तेरा स्वामी तुझे दोषी ठहरायेगा, इस डर से आकर चाबुक से सजा देगा। दाग देकर तथा तेरी जाति प्रकट करके तुझे खराब करेगा, पीटेगा। इसलिए इस अनाचार को छोड भुञ्ज भोगे कटाहक ! फिर बाद

६२ [ १.१३ १२६ में अपना दासत्व प्रगट कराकर मत पछताना, यही यहाँ सेठ के कहने का मतलब है । —•— सेठ की लड़की यह सब नही जानती थी । वह जैसे सीखा था वैसे शब्द- मात्र कहती थी । कटाहक ने सोचा, निश्चय से सेठ ने मेरा नाम बताकर इसे सब कह दिया होगा । उसके बाद से फिर उसकी भोजन की निन्दा करने की हिम्मत न हुई । मान-मर्दित होकर वह यथा प्राप्त भोजन करता हुआ कर्मानुसार परलोक सिधारा । शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय कटाहक बकवादी भिक्षु था । वाराणसी सेठ तो में ही था ।

१२६. असिलक्खण जातक

"तथेवेकस्स कल्याण" यह (धर्मोपदेश) शास्ता ने जेतवन में रहते समय कोशल-नरेश के तलवार के लक्षण कहनेवाले ब्राह्मण के बारे में दिया ।

क. वर्तमान कथा

यह (ब्राह्मण) राजा के पास लोहारों के तलवार लाने के समय तलवार को सूंघकर तलवार का लक्षण बताता था । जिनके हाथ से कुछ प्राप्त हो जाता उन की तलवार को वह सुलक्षण और माङ्गलिक कहता, जिनके हाथ से कुछ न मिलता उनकी तलवार को अमाङ्गलिक बता निन्दा करता । एक शिल्पी तलवार बना उसके म्यान में मिर्चों का बारीक चूर्ण भर राजा के पास तलवार लाया । राजा ने ब्राह्मण को बुलवाकर कहा—तलवार की परीक्षा कर ।

असिलक्खण ] ६३ जब ब्राह्मण तलवार निकालकर सूँघने लगा तो मिर्चों के चूर्ण के उसकी नाक को लगने से उसे छींक आई । छींक आने से उसकी नाक तलवार से लगी; और उसके दो टुकड़े हो गए । उसकी इस तरह नाक कटने की बात भिक्षु-सघ में प्रकट हो गई । एक दिन धर्म-सभा मे बैठे हुए भिक्षुओं ने बात चलाई—आयुष्मानो ! राजा के तलवार का लक्षण बतानेवाले ने तलवार का लक्षण बताते हुए नाक कटवा ली। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, इस ब्राह्मण ने न केवल अभी तल- वार सूँघते हुए नाक कटवाई, पहले भी कटवाई है' कह पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय, उसके यहाँ तलवार का लक्षण कहनेवाला एक ब्राह्मण था। (इसके आगे की सारी कथा 'वर्तमान-कथा' की तरह ही है) । राजा ने उसे वैद्य के पास भेजकर उसकी नाक की चिकित्सा कराई । फिर लाख से उसकी नाक के सदृश ही एक नाक बनवाकर उसे फिर अपनी सेवा में नियुक्त किया । वाराणसी नरेश को कोई पुत्र न था । एक लडकी और एक भानजा था । उन दोनो को भी उसने अपने पास ही रखकर पाला था । एक साथ रहने के कारण वह् परस्पर प्रेम में बँध गए । राजा ने आमात्यों को बुलाकर सलाह की कि मेरा भानजा राज्य का उत्तराधिकारी है ही, इसे ही लडकी देकर इसका राज्याभिषेक कर दिया जाए । लेकिन फिर सोचा, भानजा तो हर तरह से आत्मीय है ही, इसके लिए कोई दूसरी राजकुमारी लाकर दी जाए । फिर इसका अभिषेक किया जाए । और अपनी लडकी किसी दूसरे राजा को दी जाए । इस प्रकार हमारे रिश्तेदार बहुत होगे; और हम ही दोनो राज्यो के स्वामी होगे । उसने मन्त्रियो की सलाह से निश्चय किया कि दोनो को पृथक पृथक रखना चाहिए; एक को एक घर में दूसरे को दूसरे में रक्खा । सोलह वर्ष की अवस्था होने पर उनका परस्पर का आकर्षण और भी बढ गया ।

६४ [ १-१३ १२६ राजकुमार सोचने लगा कि किस उपाय से मामा की लड़की को राज घर से निकलवाया जा सकता है ? उसे एक उपाय सूझा । एक भाग्य बतानेवाली को बुलवाकर उसने उसे एक हजार मुद्राएँ दीं। भाग्य बतानेवाली ने पूछा— "मैं क्या कर सकती हूँ ?" "अम्ब ! तेरे करने से सफलता निश्चित है। कोई बात कहकर ऐसी विधि लगा जिससे मेरा मामा राज-कन्या को घर से बाहर लाए।" "स्वामी, अच्छा मैं राजा के पास जाकर कहूँगी कि तुम्हारी कन्या पर ग्रह है। इतने समय के बाद नहीं रहेगा। मैं अमुक दिन राज-कन्या को रथ पर चढ़ाकर हथियार बन्द बहुत से आदमियो को साथ ले, अनेक अनुयायियो सहित श्मशान में जाऊँगी। वहाँ मण्डल-चौकी के नीचे श्मशानशय्या पर मुर्दे को लिटा, ऊपर की शय्या पर राज-कन्या को बिठा सुगन्धित जल के एक सौ आठ घडा से स्नान करवाकर ग्रह उतारूँगी, ऐसा कह कर मैं राजकन्या को श्मशान ले जाऊँगी। तू हमारे वहाँ जाने के दिन हमसे भी पहले ही थोड़ा मिर्चों का चूर्ण लेकर, हथियार बन्द अपने आदमियो के साथ रथ पर चढ़कर श्मशान-भूमि में जाना। वहाँ पहुँच रथ को श्मशान-द्वार पर ही एक तरफ छोड़, हथियार बन्द आदमियों को श्मशान-वन में छिपा, स्वयं श्मशान में जाकर वहाँ मण्डतपीठ के पास मुर्दे की तरह पट पड रहना। मैं वहाँ आकर तेरे ऊपर मञ्च बिछा राजकन्या को उठा उस पर सुलाऊँगी । त उस समय मिर्च-चूर्ण को दो तीन बार नाक पर लगा छींकना। तेरे छींकने के समय हमलोग राजकन्या को छोड़कर भाग जाएँगे। तब आकर राजकन्या को सिर से नहला, अपने भी नहा उसे लेकर अपने घर जाना।" उसने अच्छा कह स्वीकार किया। राजा को जाकर जब उसने सब बात कही, तो राजा ने भी स्वीकार किया। राजकन्या से भी वह रहस्य कहा तो वह भी मान गई। उसने बाहर निकलने के दिन राजकुमार को सूचना दे अनेक अनुयायियो के साथ जाते हुए पहरेदार आदमियों को डराने के लिए कहा— मेरु, राजकन्या को चारपाई पर लिटाने के समय चारपाई के नीचे पड़ा हुआ मुर्दा छींकेगा, और छींकने के बाद चारपाई के नीचे से निकल जिसे पहले देखेगा उसे ही पकड़ेगा। इसलिए होशियार रहना। राजकुमार पहले ही पहुँचकर जैसे कहा गया था, वैसे ही लेट रहा।

असिलक्खण ] ६५ भाग्य बतानेवाली ने राजकन्या को मण्डलपीठ की जगह पर जाते हुए 'डर मत' इशारा कर चारपाई पर लिटाया । उसी समय कुमार ने मिर्च-चूर्ण नाक पर फेंक छींक मारी । उसके छींक मारते ही (वह) भाग्य बतानेवाली राजकन्या को छोड़ बड़ा शोर मचाती हुई सबसे पहले भागी । उसके भागने पर एक भी न ठहर सका । जिसके पास जो शस्त्र थे उन्हें छोड़ सभी भाग गए । राजकुमार जैसे निश्चय किया गया था उसके अनुसार सब करके राजकन्या को अपने घर ले गया । भाग्य बतानेवाली ने जाकर राजा को सब हाल कहा । राजा ने स्वीकार किया, बोला—यूँ भी मैने उसे उसी के लिए पाला था । दूध म घी पड़ने जैसा हुआ। आगे चलकर भानजे को राज्य दे अपनी कन्या को उसकी पटरानी बनाया । वह उसके साथ मेल से रहता हुआ धर्म-पूर्वक राज्य करता रहा । वह तलवार के लक्षण बतानेवाला भी उसी की सेवा में रहता था । एक दिन राज्य-सेवा में आ सूर्य के सामने खड़े हो सेवा-कार्य करते हुए उसकी नाक की लाख पिघल गई । नकली नाक जमीन पर गिर पड़ी । वह शर्म के मारे सिर नीचा करके खड़ा हुआ । राजा ने हँसते हुए कहा—आचार्य्य सोच मत करो । छींकना एक के लिए कल्याणकर होता है, दूसरे के लिए बुरा । तुम्हारे छींकने पर नाक पृथक हो गई, लेकिन हमने छींका तो हमें मामा की लड़की और राज्य मिला। इतना कह यह गाथा कही— तथेवेकस्स कल्याणं तथेवेकस्स पापकं, तस्मा सब्बं न कल्याणं सब्बं वापि न पापकं ॥ [ वही किसी के लिए कल्याणकारक है, वही किसी के लिए बुरा । इस लिए न सब कल्याणकारक ही है, न सब बुरा ही है।] तथेवेक्स्स तवेवेकस्स—यह भी पाठ है । दूसरे पद में भी ऐस ही । इस प्रकार इस गाथा द्वारा उसने यह बात कही । फिर दान आदि पुण्यकर्म करके यथाकर्म परलोक सिधारा । ५

हैं उन सबका अनैकान्तिक होना प्रकाशित करके जातक का मेल बैठाया।

६६ [ १.१३.१२७ शास्ता ने इस धर्मोपदेश द्वारा लोक में जो बहुत सी अच्छी बुरी मान्यताएँ हैं उन सबका अनैकान्तिक होना प्रकाशित करके जातक का मेल बैठाया। उस समय का तलवार के लक्षण पढनेवाला तो यह अब का तलवार के लक्षण पड़नेवाला ही था। हाँ भानजा-राजा मैं ही था। १२७. कलण्डुक जातक "ते देसा तानि वत्थूनि..." यह (धर्मदेशना) शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक बकवादी भिक्षु के बारे में कही। दोनो कथाएँ (अतीत कथा तथा वर्तमान कथा) कटाहक जातक १ की कथा की तरह ही हैं। हाँ, इस जातक में वाराणसी के सेठ का नाम कलण्डुक था। उसके भाग कर प्रत्यन्त सेठ की लड़की से विवाह कर बड़े ठाट-बाट के साथ रहने के समय, वाराणसी के सेठ के उसे ढुंढवाने पर भी उसके न मिलने पर, वाराणसी सेठ ने अपना पाला-पोसा एक तोते का बच्चा भेजा कि जा कलण्डुक को खोज। तोते का बच्चा इधर-उधर घूमता हुआ उस नगर में पहुँचा। उस समय कलण्डुक जल क्रीडा करने की इच्छा से बहुत सारे माला-गन्ध- विलेपन तथा खाद्य-भोज्य ले नदी पर जा सेठ कन्या के साथ एक नौका पर बैठ पानी में खेलता था। उस देश में ऐश्वर्यशाली लोग जब जल-क्रीडा करते तो कोई तेज औषध मिला हुआ दूध पीते थे। उससे उनके सारा दिन भी जल में क्रीडा करते रहने पर उन्हें शीत नही लगता था। यह कलण्डुक उस दूध से मुँह भर उससे कुरला कर उसे थूक देता, लेकिन उसे जल में न थूककर उस सेठ-कन्या के सिर पर थूकता था। १कटाहक जातक (१२५) ।

कलण्डुक ] ६७ उस तोते के बच्चे ने भी नदी के किनारे एक गूलर की शाखा पर बैठ कलण्डुक को पहचान लिया और देखा कि वह सेठ-कन्या के सिर पर थूक रहा है। उसने कहा—"अरे ! कलण्डुक ! दास ! अपनी जाति और (पूर्व) निवास-स्थान को याद कर। दूध से मुँह भर, उसका कुल्ला कर ऊँची जाति- वाली सुख में पली हुई सेठ की कन्या के सिर पर मत थूक। तू अपनी हैसियत को नहीं देखता ?" फिर यह गाथा कही— ते देसा तानि यत्थूनि अहञ्च वनगोचरो, अनुविच्च खो त गण्हेय्यु पिव खीरं कलण्डुक ॥ [वह देश और वस्तुएँ (=कोख)। मैं वनचर पक्षी। तुझे पहचान कर पकड़ लगे। कलण्डुक दूध पी।] ते देसा तानि यत्थूनि, यह माता की कोख के बारे म कहा है। भावार्थ यह है—जहाँ तू रहा है वह क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है, अथवा जहाँ तू प्रतिष्ठित रहा है वह भी क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है। तू दासी की कोख मे रहा और प्रतिष्ठित हुआ। अहञ्च वन गोचरो—मै तिरश्चीन योनि में पैदा होकर भी यह सब जानता हूँ, यह प्रकट करता है। अनुविच्च खो त गण्हेय्यु, इस प्रकार अनाचार करते हुए को देख जब मैं जाकर कहूँगा तो पहचानकर वह तेरे स्वामी आकर तुझे ताड़कर और दाग देकर पकड कर ले जायेगें। इसलिए अपनी हैसियत देखकर सेठ की लडकी के सिर पर बिना थूके हुए पिव खीर कलण्डुक, नाम से सम्बोधन करता है कि (हे कलण्डुक दूध पी)। कलण्डुक ने भी तोते के बच्चे को पहचानकर 'यह मुझे प्रकट कर रहा है' सोच भयभीत हो कहा—आइए ! स्वामी ! कब आए ? तोते के बच्चे ने सोचा यह मेरा हित चिन्तक होकर नही बुला रहा है। यह मेरी गरदन मरोड़कर मार डालना चाहता है। यह समझकर कहा कि मुझे तुझसे काम नहीं है। तब वह उड़कर बाराणसी गया और जैसे जैसे देखा था सेठ को विस्तार- पूर्वक सब कहा।

हैं उन सबका भलीभाँति विवेचन प्रकाशित करके जातक का मेल बैठाया।

६६ [ १-१३-१२७ शास्ता ने इस धर्मोपदेश द्वारा लोक में जो बहुधा भी अच्छी बुरी भावनाएं हैं उन सबका भलीभाँति विवेचन प्रकाशित करके जातक का मेल बैठाया। उस समय का तलवार से लक्षण पढ़नेवाला तो यह अब का तलवार के लक्षण पढ़नेवाला ही था। मैं भानन्द-राजा में ही था। १२७. कलण्डुक जातक "से ऐसा सानि थल्पूनि..." यह (धर्मदेशना) शास्ता ने जेतवन म रहने समय एक थरवादी भिक्षु के बारे में कही। दोनो कथाएँ (अतीत कथा तथा वर्तमान कथा) कटाहक जातक¹ की कथा की तरह ही हैं। हाँ, इस जातक में वाराणसी के सेठ का नाम कलण्डुक था। उसने भाग कर प्रत्यन्त सेठ की लडकी से विवाह कर बडे ठाट-बाट के साथ रहने के समय, वाराणसी के सेठ के उसे ढुंढवाने पर भी उसके न मिलने पर, वाराणसी सेठ ने अपना पाला-पोसा एक तोते का बच्चा भेजा कि जा कलण्डुक को खोज। तोते का बच्चा इधर-उधर घूमता हुआ उस नगर में पहुँचा। उस समय कलण्डुक जल-क्रीडा करने की इच्छा से बहुत सारे माला-गन्ध- विलेपन तथा खाद्य-भोज्य ले नदी पर जा सेठ कन्या के साथ एक नौका पर बैठ पानी म खेलता था। उस देश में ऐश्वर्य्यशाली लोग जब जल-क्रीडा करते तो कोई तेज औषध मिला हुआ दूध पीते थे। उससे उनके सारा दिन भी जल म क्रीडा करते रहने पर उन्हें शीत नही लगता था। यह कलण्डुक उस दूध से मुंह भर उससे कुरला कर उसे थूक देता, लेकिन उसे जल में न थूककर उस सेठ-कन्या के सिर पर थूकता था। ¹ कटाहक जातक (१२५) ।

कलण्डुक ] ६७ उस तोते के बच्चे ने भी नदी के किनारे एक गूलर की शाखा पर बैठ कलण्डुक को पहचान लिया और देखा कि वह सेठ-कन्या के सिर पर थूक रहा है। उसने कहा—"अरे ! कलण्डुक ! दास ! अपनी जाति और (पूर्व) निवास-स्थान को याद कर। दूध से मुंह भर, उसका कुरला कर ऊँची जाति- वाली कुल में पली हुई सेठ की कन्या के सिर पर मत थूक। तू अपनी हैसियत को नहीं देखता ?" फिर यह गाथा कही— ते देसा तानि वत्थूनि अहञ्च वनगोचरो, अनुविच्च खो त गण्हेय्यु पिव खीर कलण्डुक ॥ [ वह देश और वस्तुएँ (=कोख) । मैं वनचर पक्षी । तुझे पहचान कर पकड़ लगे । कलण्डुक दूध पी ।] ते देसा तानि वत्थूनि, यह माता की कोख के बारे मे कहा है। भावार्थ यह है—जहाँ तू रहा है वह क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है, अथवा जहाँ तू प्रतिष्ठित रहा है वह भी क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है। तू दासी की कोख मे रहा और प्रतिष्ठित हुआ। अहञ्च वन गोचरो—में तिरश्चीन योनि में पैदा होकर भी यह सब जानता हूँ, यह प्रकट करता है। अनुविच्च खो त गण्हेय्यु, इस प्रकार अनाचार करते हुए को देख जब मैं जाकर कहूँगा तो पहचानकर वह तेरे स्वामी आकर तुझे ताड़कर और दाग देकर पकड़ कर ले जायेंगे। इसलिए अपनी हैसियत देखकर सेठ की लड़की के सिर पर बिना थूके हुए पिव खीर कलण्डुक; नाम से सम्बोधन करता है कि (हे कलण्डुक दूध पी) । कलण्डुक ने भी तोते के बच्चे को पहचानकर 'यह मुझे प्रकट कर रहा है' सोच भयभीत हो कहा—आइए ! स्वामी ! कब आए ? तोते के बच्चे ने सोचा यह मेरा हित चिन्तक होकर नही बुला रहा है। यह मेरी गरदन मरोड़कर मार डालना चाहता है। यह समझकर कहा कि मुझे तुझसे काम नही है। तब वह उड़कर बाराणसी गया और जैसे जैसे देखा था सेठ को विस्तार- पूर्वक सब कहा।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का

६८ [ १.१३ १२८ सेठ बोला—उसने अनुचित किया। और आज्ञा दे उसे वाराणसी मँगवा दास बनाकर रक्खा। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का कटण्डुक यह भिक्षु था। वाराणसी सेठ तो मैं ही था। १२८. बिळारवत जातक “यो चे धम्मं धजं कत्वा ..” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ढोंगी भिक्षु के बारे म कही। क. वर्तमान कथा उस समय शास्ता ने उसके ढोंग की चर्चा चलने पर 'भिक्षुओ, केवल अब ही नहीं, पहल भी यह ढोगी ही रहा है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करन के समय बोधिसत्त्व ने चूहे का जन्म ग्रहण किया। बड़े होने पर वह बढ़कर सूअर के बच्चे की तरह हो अनेक सौ चूहों के साथ जंगल म रहने लगा। इधर उधर घूमते हुए एक शृगाल ने उस चूहों के समूह को देखकर सोचा कि इन चूहों को ठगकर खाऊँगा। यह सोच वह चूहों के बिल से थोड़ी ही दूर पर सूर्याभिमुख हो, मुंह खोल हवा पीते हुए की तरह एक ही पाँव से खड़ा हुआ। इधर उधर भोजन के लिए ढूंढ़ते हुए बोधिसत्त्व ने उसे देख सोचा यह सदाचारी होगा और उसके पास आकर पूछा—

बिळारवत ] ६६ "आपका, भन्ते ! क्या नाम है ?" "मेरा नाम है धार्मिक ।" "चारो पैर पृथ्वी पर न रख, एक ही पैर से क्या खड़े हैं ?" "मेरे चारो पैर पृथ्वी पर रखने से पृथ्वी के लिए दूभर होगा, इस लिए एक ही पैर से खडा होता हूँ।" "मुँह खोले क्यो खड़े हैं ?" "हम हवा के अतिरिक्त और कुछ नही खाते ?" "सूर्य की ओर मुंह करके क्यो खडे है ?" 'सूर्य को नमस्कार कर रहा हूँ।" बोधिसत्त्व ने सोचा, यह सदाचारी है । उसके बाद से चूहों के समूह के साथ प्रात साय उसकी सेवा में जाने लगे । उसकी सेवा कर लौटने के समय शृगाल सबसे पिछले चूहे को पकड़कर मास खा, निगल कर, मुंह पोछ खडा हो जाता । क्रम से चूहों का दल कम पड गया । चूहे सोचने लगे कि पहले हम यह बिल पर्याप्त नही होता था, सट सट कर खड़े होते थे, अब खुलकर खड़े होते हैं तब भी बिल नही भरता । क्या मामला है ? उन्होने बोधिसत्त्व से सारा हाल कहा । बोधिसत्त्व ने 'चूहे किस कारण कम हो गए' सोचते हुए शृगाल पर शक किया । फिर जांच करने के लिए (शृगाल की) सेवा (से लौटने) के समय बाकी चूहों को आगे कर स्वय पीछे रहा । शृगाल उस पर उछला । अपने को पकडने के लिए शृगाल को उछलता देख बोधिसत्त्व ने रुककर कहा— भो शृगाल ! तेरा यह व्रत धार्मिक नहीं है । तू दूसरो की हिंसा करने के लिए ही धर्म को आगे करके रहता है । इतना कह यह गाथा कही— यो वे धम्मं धजं कत्वा निगूळ्हो पापमाचरे, विस्सासयित्वा भूतानि बिळार नाम तं वतं ॥ [जो धर्म की ध्वजा बनाकर, प्राणियो में विश्वास उत्पादन कर छिप कर पाप करता है, उसका व्रत बिलाल-व्रत है ।] यो वे, क्षत्रिय आदियों में कोई भी । धम्मं धजं कत्वा, दस कुशल धर्मों की ध्वजा बनाकर, उन्ह करता हुआ उठाकर दिखाता हुआ, विस्सासयित्वा, यह

७० [ १.१३ १२६ सदाचारी है, ऐसा विश्वास पैदा करके विडार नाम त व्रत, इस प्रकार धर्म की ध्वजा बनाकर छिपकर पाप करनेवाले का व्रत ढोंग कहलाता है। चूहों के राजा ने इस प्रकार कहते ही कहते उछलकर उसकी गरदन पर चढ, ठोडी के नीचे की अन्दर की गले की नाली को डसकर गले की नली को फाड मार डाला। चूहों के दल ने रुक कर शृगाल को मुर मुर करके खा डाला। पहले आए हुओ को ही शृगाल का मांस मिला, पीछे आए हुओ को नही मिला। उसके बाद से चूहों का दल निर्भय हो गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का शृगाल यह ढोगी भिक्षु था। चूहों का राजा तो मै ही था। १२६. अग्गिक जातक “नाय सिखा पुञ्जहेतु .” यह (गाथा) भी शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ढोगी भिक्षु के ही बारे में कही— ख. अतीत कथा पुराने समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व चूहों के राजा हो जगल में रहते थे। एक शृगाल जगल में आग लगने पर जब भागने में असमर्थ रहा, तो एक वृक्ष से सिर टिकाकर खडा हो गया। उसके सारे शरीर के बाल जल गए। वृक्ष से लगे हुए सिर पर शिखा की तरह से कुछ बाल बच गए। उसने एक दिन एक पर्वतीय तालाब में पानी पीते हुए अपनी छाया के साथ शिखा को देखकर सोचा अब मुझे पूंजी मिल गई। फिर जगल में घूमते हुए चूहों के बिल

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय भी

७२ [ १.१३.१३० न खा पाएगा। अथवा हमारे साथ तुम्हारा रहना बन्द हुआ; अब हम तेरे साथ न बसेंगे। शेष पहले ही की तरह से है। ————— शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय भी शृगाल यही भिक्षु था। चूहों का राजा तो मैं ही था। १३०. कोसिय जातक "यथाधाचाव भुञ्जस्सु..." यह (गाथा) शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय श्रावस्ती-निवासी एक स्त्री के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह एक श्रद्धालु ब्राह्मण उपासक की ब्राह्मणी थी; बहुत दुश्चरित्र, पापिन। रात को दुराचार करती। दिन में कुछ न कर रोग का बहाना बना बड़बड़ाती हुई लेट रहती। वह ब्राह्मण उससे पूछता—"भद्रे ! तुझे क्या कष्ट है?" "मुझे वायु बींधती है।" "तो तुझे क्या क्या चाहिए?" "चिकने, मीठे, अच्छे, स्वादिष्ट यागु-भात-तेल आदि।" जो जो वह इच्छा करती, ब्राह्मण ला लाकर देता। दास की तरह सब काम करता। लेकिन वह ब्राह्मण के घर आने के समय लेट रहती, बाहर जाने के समय जारों के साथ गुजारती। ब्राह्मण सोचता कि इसके शरीर में चुभनेवाली वायु का अन्त ही होता दिखाई नहीं देता। एक दिन वह गन्ध माला आदि से जेतवन जा शास्ता की वन्दना तथा पूजा

कोसिय ] ७३ पर एक ओर बैठा। शास्ता ने पूछा- "क्यों ब्राह्मण दिखाई नहीं देता ?" "भन्ते ! मेरी ब्राह्मणी के शरीर को वायु बीधती है। सो मैं उसके लिए घी-तेल तथा अच्छे अच्छे भोजन योजता हूँ। उसका शरीर मोटा गया है। चमड़ी निखर आई है। लेकिन वात-रोग का अन्त होता नहीं दिखाई देता। मैं उसकी सेवा में ही लगा रहता हूँ। इसी लिए यहाँ आने का अवकाश नहीं मिलता।" शास्ता ने ब्राह्मणी के दुश्चरित्र होने की बात जान कहा- "ब्राह्मण ! इस प्रकार पड़ी हुई स्त्री के रोग के न शान्त होने पर पूर्व-जन्म में भी तुझे बुद्धिमानो ने बताया था कि यह यह ओषधि करनी चाहिए, लेकिन यह पूर्व-जन्म की बात होने के कारण तू उस पर ध्यान नहीं देता।" - उस ब्राह्मण के पूछने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व ब्राह्मणो के एक बड़े कुल में पैदा हुए। सयाने होने पर तक्षशिला जा, यहाँ सब विद्याएँ सीख लौटकर बनारस में प्रसिद्ध आचार्य्य हुए। एक सौ राज- धानियो के क्षत्रिय ब्राह्मण कुमार प्रायः उसी के पास विद्याएँ सीखने । एक जनपदवासी ब्राह्मण ने बोधिसत्त्व से तीनो वेद और अट्ठारह विद्याएँ सीखीं। वह वाराणसी में ही बस कर प्रतिदिन दो तीन बार बोधिसत्व के पास आता। उसकी ब्राह्मणी दुश्चरित्र थी, पापिन थी। शेष सारी कथा वर्तमान कथा ही की तरह है। हाँ, बोधिसत्व ने यह सुन कि 'इस कारण से उपदेश सुनने आने का समय नहीं मिलता' और यह समझकर कि वह लडकी उसे धोखा देकर लेट रहती है, उसके अनुकूल औषधि बताने का विचार कर कहा— "तात ! अब से तू उसे दूध, घी, रस आदि मत दे। गोमूत्र में त्रिफला आदि और पांच प्रकार के पत्ते रगड़कर उनका काढ़ा बनाकर ओषधि में ताँबे की गन्ध आने तक ताँबे के नए वर्तन में रख रस्सी, जोत या किसी वृक्ष की ही लता ले उसे जाकर कहना—यह तेरे रोग के लिए उचित दवाई है। या तो इसे पी; नही तो जो भोजन तू करती है उसके अनुसार काम कर। और यह गाथा भी कहना। यदि दवाई न पीए तो उसे रस्सी से या जोत से अथवा लता से कुछ

७४ [ १.१३.१३० प्रहार लगाकर, केसो से पकड़कर, खींचकर कोहनी से पीटना। उसी समय उठकर वह काम करने लगेगी।" . उसने 'अच्छा' कह स्वीकार कर कथनानुसार ओषधि बना कहा—भद्रे ! यह ओषधि पी।' “यह ओषधि तुझे किसने कही ?” “आचार्य ने, भद्रे !” “इसे ले जाओ, नहीं पीऊँगी।” ब्राह्मण ने कहा, तू स्वेच्छा से नहीं पीएगी। रस्सी लेकर बोला, या तो रोग के अनुसार दवाई पी अथवा यवागु-भात के अनुसार काम कर। इतना कह यह गाथा कही— यथावाचाय भुञ्जस्सु यथाभुतञ्च व्याहर, उभयं ते न समेति वाचा भुतञ्च कोसिये ॥ [ जैसे कहती है, वैसे दवाई पी, अथवा जैसे खाती है वैसे काम कर,। कोसिये ! तेरी वाणी और तेरे भोजन का मेल नहीं बैठता ।]

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय के

कोसिय ] ७५ ली। अब मैं ऐसा नहीं कर सकती। आचार्य के प्रति गौरव होने से उसने पाप-कर्म करना छोड़ दिया और शीलवान् हो गई। उस ब्राह्मणी ने भी सोचा कि अब मुझे सम्यक् सम्बुद्ध ने जान लिया। उसने भी फिर शास्ता के प्रति गौरव का भाव होने से दुराचार नहीं किया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय के पति-पत्नी अब के पति-पत्नी थे। आचार्य मैं ही था।

१३१. असम्पदान जातक

पहला परिच्छेद १४. असम्पदान वर्ग १३१. असम्पदान जातक "असम्पदानेनितरीतस्स..." यह (गाथा) शास्ता ने वेळुवन में रहते समय देवदत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उस समय भिक्षु धर्मसभा में बैठे बातचीत कर रहे थे—आयुष्मानो ! देवदत्त अकृतज्ञ है। तथागत के सद्गुणो को नही जानता। शास्ता न आकर पूछा— "भिक्षुओ ! अब बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत।" "भिक्षुओ, देवदत्त केवल अभी अकृतज्ञ नहीं है, पहले भी अकृतज्ञ ही रहा है।" —इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्वकाल मे मगधदेश के राजगृह नगर में किसी मगधनरेश के राज्य करते समय बोधिसत्त्व उस (राजा) के ही सेठ थे। उनके पास अस्सी करोड धन था। नाम था सङ्घसेठ। वाराणसी मे भी पिल्लिय सेठ नामक सेठ था। उसके पास भी अस्सी करोड धन था। वे दोनो परस्पर मित्र थे। उनमें से वाराणसी के पिल्लिय सेठ को किसी कारण से कोई खतरा आ पडा। तमाम जायदाद नष्ट हो गई। वह दरिद्र हो गया। आश्रयरहित

असम्यदान ] ७७

रह गया। तब वह अपनी स्त्री को ले, सङ्गसेठ के पास आने के विचार से वाराणसी से निकल पैदल ही राजगृह पहुँच सङ्गसेठ के घर गया। उसने उसे देखते ही 'मेरा मित्र आया है' पहचान गले मिल आदर सत्कार करवाया। फिर कुछ दिन बिताकर पूछा—"मित्र कैसे आए?" "सौम्य, मुझ पर खतरा आ पडा। मेरा सब धन नष्ट हो गया। मुझे सहारा दे।" "मित्र, अच्छा डरें मत" कह उसने खजाना खुलवा चालीस करोड हिरण्य दिलवा उसके साथ अपने पास जो कुछ भी वस्त्र आदि तथा जानदार और बेजान वस्तु थी सभी बांटकर आधी आधी दी। वह उस धन को ले फिर वारा- णसी लौट रहने लगा। आगे चलकर सङ्गसेठ पर भी वैसा ही खतरा आ पडा। उसने अपने लिए सहारा ढूंढते हुए सोचा—मैने अपने मित्र का बहुत उपकार किया। आधी जायदाद दे दी। वह मुझे देखकर त्यागेगा नही। मैं उसके पास चलूँ। उसने अपनी स्त्री के साथ पैदल ही वाराणसी पहुँचकर कहा—भद्रे, तेरे लिए यह अच्छा नही है कि तू मेरे साथ गली गली भटके। मै जाकर सवारी भेजूंगा, तू पीछे उस पर बडे ठाट से आना। उसे एक शाला में बिठा स्वय नगर में दाखिल हुआ। सेठ के घर पहुँच सूचना भिजवाई कि राजगृह से तुम्हारा मित्र आया है। सेठ बोला—आ जाए। उसे देखकर न वह आसन से उठा न स्वागत ही किया, केवल इतना पूछा—"क्यो आया है?" "तुम्हें देखने आया हूँ।" "निवास स्थान कहीं ठीक किया है?" "अभी कही ठीक नही हुआ है। सेठानी को शाला में बिठाकर आया हूँ।" "यहाँ तुम्हारे ठहरने को जगह नही। सीधा लेकर किसी जगह पका खाकर चले जाओ। फिर मेरे पास न आना"—इतना कह अपने एक दास को आज्ञा दी कि मेरे मित्र के पल्ले में एक तूम्बा भर भूसा बाँध दो। उसी दिन उसने एक हजार गाडी लाल चावल छटवाकर कोठे भरे थे। चालीस करोड धन लेकर आए अकृतज्ञ महाचोर ने मित्र को केवल एक तूम्बा भर भुस दिलवाया। दास एक टोकरी मे तूम्बा भर भुस डाल वोधिसत्व के पास गया।

७८ [ १.१४.१३१ बोधिसत्व ने सोचा—यह असत्पुरुष मेरे पास से चालीस करोड़ धन पाकर अब तूम्बा भर भूसा दे रहा है। इसे लूँ अथवा न लूँ ? उसे विचार हुआ— यह तो अकृतज्ञ है, मित्रद्रोही है, कृत उपकार को भूलकर इसने मेरे साथ मैत्री- सम्बन्ध तोड़ डाला है। यदि में इसका दिया तूम्बा भर भूसा बुरा होने के कारण नही ग्रहण करता हूँ, तो में भी मैत्री सम्बन्ध को तोडनेवाला होता हूँ । इसलिए मै इसके दिए तूम्बा भर भूसे को ग्रहण कर अपनी ओर से मैत्री-भाव की प्रतिष्ठा करूँगा । उसने तूम्बा भर भूसे को अपने पल्ले में बांध लिया और महल से उतर शाला को गया । स्त्री न पूछा—आर्य्य, तुम्हें क्या मिला ? "भद्रे ! हमारे मित्र पिल्लिय सेठ ने हमें तूम्बा भर भूसा दे आज ही विदा कर दिया ।” उसने रोना प्रारम्भ किया—आर्य्य ! इसे लिया ही क्यो ? क्या चालीस करोड़ धन का बदला यही है ? बोधिसत्त्व ने कहा—भद्रे, रो मत । मैने अपनी ओर से मैत्री-सम्बन्ध न टूटने देने के लिए, अपनी ओर से उसे बनाए रखने के लिए ग्रहण किया है । तू क्यों सोच करती हैं । —इतना कह यह गाथा कही— असम्पदानेनितरीतरस्स बालस्स मित्तानि कती भवन्ति, तस्मा हरामि भुसं अद्धमानं मा मे मित्ति ओपिय सस्सतायं ॥ [ऐसी वैसी वस्तु स्वीकार न करने से मूर्ख आदमी के मित्र मित्र नहीं रहते । इसीलिए में अर्धमान भूसा ले आया हूँ । मेरा मैत्री-सम्बन्ध न टूटे । यह शास्वत बना रहे ।] असम्पदानेन, परस्पर का लोप होकर सन्धि हुई है, अर्थ है ग्रहण न करने से । इतरीतरस्स, जिस किसी अच्छी बुरी चीज के । बालस्स मित्तानि कसी भवन्ति, मूढ, अप्रज्ञावान् के मित्र स्खलित हो जाते हैं, मनहूस से हो जाते हैं,

धम्मपददान ] ७६ मतलब टूट जाते हैं। तस्मा हरामि भुसं अटुठमानं, इसी कारण रो प्रकट करता हूँ कि मैं मित्र का दिया हुआ तूम्बा भर भुस ले आया हूँ। आठ नाळि को मान कहते हैं। चार नाळियों को अर्ध-मान; और चार ही नाळियो को तूम्बा; इसी लिए कहा तूम्बा भर भूसा। मा ने मित्ति जीयित्य सस्मताय, मेरे मित्र से मेरा मैत्री भाव न टूटे। हमेशा बना रहे। ऐसा कहने पर भी सेठानी रोती ही रही। उसी समय सङ्घसेठ द्वारा पीळिय सेठ को दिया गया एक दास शाला के दरवाजे के पास से गुजर रहा था। उसने सेठानी के रोने की आवाज सुनी। अन्दर जाकर जब उसने देखा कि उसके स्वामी है तो पैरो पर गिर पडा और रोने-चिल्लाने लगा। उसने पूछा- "स्वामी ! यहाँ कैसे आए ?" सेठ ने सब हाल कह दिया। दास बोला -स्वामी, हो, चिन्ता न करें। इस प्रकार दोनों को दिलासा दे अपने घर ले गया। वहाँ सुगन्धित जल से नहलाया, खिलाया। फिर अन्य सब दासों को खबर कर दी कि स्वामी आए हैं। कुछ दिन बिताकर सभी दासो की राय से वह राजा के यहाँ पहुँचा और शोर किया। राजा ने बुलवाकर पूछा- यह क्या है ? उन्होंने यह सब हाल राजा को कह दिया। राजा ने उनकी बात सुन दोनो सेठो को बुलवा सङ्घसेठ को पूछा- "महासेठ ! क्या तूने सचमुच पिळिय सेठ को चालीस करोड धन दिया ?" "महाराज ! मेरी आशा लगा जब मेरा मित्र मेरे पास राजगृह आया तो मैंने उसे न केवल चालीस करोड धन ही दिया बल्कि जितना भी मेरे पास धन था, चाहे जानदार चाहे बेजान सभी के दो बराबर हिस्से कर एक हिस्सा दिया।" राजा ने पिळिय सेठ से पूछा- क्या यह सच है ? "देव ! हाँ ठीक है।" "तेरी ही आशा लगाकर तेरे पास आनेपर तूने भी इसका कोई सत्कार सम्मान किया ?" वह चुप रहा। "तूने तूम्बा भर भूसा इसके पल्ले में ढलवाकर दिया है ?"