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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

( २११ )

ज्ञानी सों कहिये उपदेशा । मूरख सों जिन कहौ संदेशा ॥ संशय कीन्ह सकल जग भंगा । काहु न चीन्हा संशय अंगा ॥

साखी-कहैं कबीर सो बाचि है, गुरु चरण चित दीन्ह ॥ अमर मूल निज शब्द है, हंसा चित गहि लीन्ह ॥

चौपाई

धर्मदास तुम करो विचारा । विना शब्द नहिं उत्तरौ पारा ॥ सार शब्द सों सब उपजावा । नारि पुरुष दोई निरमावा ॥ सूरज पुरुष चन्द्र है नारी । यह घटमें द्वै रूप सँवारी ॥ जैसे धातु कनककी एका । साँचा माही रूप अनेका ॥ पाप पुण्य रूपहि सों बांधी । कीन्ह धर्म यह अगम अगाधी ॥ पाप रू पुण्य भर्म है भाई । धर्म राय सब भर्म उपाई ॥ भर्म अमल तबही मिट जाई । सत्य नाम जब रहै समाई ॥ जब लग भर्म अमल है भाई । तब लग नाम बूझ नहिं जाई ॥ बूझ सीख गावै बहु भाँती । सुमरन भर्म करै दिनराती ॥ आप न चीन्हे मूढ़ गँवौरा । भर्मी भ्रम भूला संसारा ॥ धर्मदास तुम भर्महि छाड़ौ । निर्भय होय नाम चित माड़ौ ॥ जो तुम भर्म करो जो माहीं । तौ कस हंसन लोक कह जाहीं ॥ भर्म छोड़के भक्ति दढावहु । यह विधि हंसनलोक पठावहु ॥ तुम कहैं दीन्ह जक्तकी भारा । तुम्हरी मुहर चलै संसारा ॥ हाथ तुम्हार जीव सब तरहीं । भवसागर तैं हंस उबरहीं ॥ धर्मदास जग पारस देहू । जीव छुड़ाय काल सों लेहू ॥ पारस नाम कहेउ उपदेशा । मूरख सो जिन कहो संदेशा ॥

छन्द-ज्ञानी कहैं यह भेद धर्मनि देहु तुम समुझायकै ।

रहन गहन विवेक बानी कहहु सकल बुझायकै ॥

( २१२ )

अमरमूल

नाम पारस परस घट महाँ काग होय मराल हो । अमर लोकहिं बास कर तहाँ नाहिं काल कराल हो ॥ सोरठा-करलेहु आप समान, गुरुभृंगी यह जीव को । देखकर नाम निशान, रूप बरख पल्टायकै ॥ इति श्री अमरमूल ग्रंथ नाममहिमा वर्णन तृतीय विश्राम ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास उठ बिनती लाई । तुम पर ताप हंस मुक्ताई ॥ किहिंविधिपलटै जिवकी काया । सो समुझाय करौ मोहे दाया ॥ हो सतगुरु तुम अन्तर्यामी । पारस भेद कहो मोहे स्वामी ॥

सतगुरु वचन-चौपाई

कहै कबीर सुन सन्त सुजाना । पारस भेद सुनाऊँ ज्ञाना ॥ ज्ञानी काहिं कहैं शब्द है सारा । यह पारस तैं हंस उबारा ॥ पारस पान बालक कहैं दीजे । तातैं हंस काल नहिं छीजे ॥ कामिनी कहैं पारस है सेवा । धर्मदास लखियो यह भेवा ॥ यही रहन तुम पंथ चलाओ । जीवन बोथ लोक पहुँचाओ ॥ तीनहु विधि यह कहै बुझाई । जो मानैं सो लोक सिधार्ई ॥ पुरुष होय शब्द नहिं जाना । निश्चय हुइहै नरक निदाना ॥ बालक हो वीरा नहिं पावै । कैसे कै वह लोक सिधावै ॥ कामिनि हो पारस नहिं लेही । गुरु सोई जो पारस देही ॥ कामिनि जो सो पारस लेही । कैसे मुक्ति होय पुनि तेही ॥ यासे गुरु जो अन्तर करई । धर्मराय के फन्दा परई ॥ गुरु नहिं शिष कहैं ज्ञान बतावा । यद गुरुमें फिर धोख समावा ॥ शिष्य जो गुरुसों अन्तर राखा । शिष्यमहैं धोखा सत हम भाखा ॥ गुरु सोई जो शिष्य समुझावै । शिष्य सोई जो गुरु मन लावै ॥

बोधसागर

( २१३ )

गुरु कहैं पेट करै अधिकार्ई । निश्चय नरक जाय रे भाई ॥ तुम सों भेद कही निहंतता । निश्चय वचन सुनो मतिमंता ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिनवैं कर जोरी । स्वामी सुनिये विन्ती मोरी ॥ नारी नाम नरक की खानी । सो गुरुको किमि दीजे आनी ॥ सकल नरक नारी ढिग कहिये । सोई नरक गुरु कैसे चहिये ॥ गुरुतो ब्रह्म रूप हम जाना । नर्क भोगे सो कौने ज्ञाना ॥ गुरुकी महिमा अगम बताई । नीच वचन कैसे कहैं साई ॥ नीच सोई जो नीची कहै । नीच पंथ सों पार न लहै ॥ ऊँचा होय सो गुरु पद धारा । नीचा छोड़ ऊंच भव पारा ॥ नीचे कर्म काट गुरु दीन्हा । गुरुका वचन मान मैं लीन्हा ॥

दोहा—सो अब मोहि बतावहु, तुम गुरु अगम अपार ।

धर्मदास की बीनती, सुनियो हो करतार ॥

साखी—रहित ज्ञान तुम भाखिया, सत्य शब्द ठहराय ।

व्यभिचारी महाँ सत कहौं, कहौ गुरु समुझाय ॥

सतगुरु वचन चौपाई

कहैं कबीर सुनो धर्मदासू । अब यह भेद कहौं तुम पासू ॥ हम जानी तुम संशय छूटा । काल कठिन भव तुम कहैं लूटा ॥ काल केरि गति तुम नहि जाना । झूठी मायामें लिपटाना ॥ जब जाना निज ब्रह्म स्वरूपा । ता कहैं नाहि रं क अरु भूपा ॥ नाम अमल रस छाके अंका । ताको कहा नरककी शंका ॥ तुम कहैं जीव बुद्धि नहि छूटा । ताते जमरा फिर फिर लूटा ॥ धर्मरायकी गति नहि जानी । हर मंदिर उपजाऔ आनी ॥ यह बाजी महाँ जीव भुलाना । शिवहिसमाधिलगावहि ध्याना ॥ विष्णु रूप काहू नहि जाना । सुर मुनि नर बूढ़े अभिमाना ॥

( २१४ )

अमरमूल

यही वचनमें सब जग वंध्य। नाम बिना नहि छूटत फंध्य ॥ झूठी माया सब जग फंदा। फंद कटे बिन नहि निर्द्वन्दा ॥ अज्ञानी जिव पर है फांसा। नर्क स्वर्ग दोऊ कर आशा ॥ संशय काटनको हम आए। धर्मराय सब दुनियां खाए ॥ ज्ञान सँवाद तुम कहैसमुझाए। तुम कहै धर्मराय भर्माए ॥ वचन हमारे दोष लगाए। झूठी माया तुम लिपटाए ॥ शिष्य सोईं गुरु बचनहि माना। आप ज्ञान बूझे नहि ज्ञाना ॥ गुरु प्रतीति हृदये नहि आई। तातैं बूड़ी सब दुनियाई ॥ बूड़त जाह थाँह नहि पावा। तातैं जन्म जन्म भर्मावा ॥ तब सतगुरु भये अन्तरध्याना। धर्मदास मनमहँ पछताना ॥

धर्मदास वचन

दया करौ गुरु पूरन स्वामी। मैं नहि जाना अंतर जामी ॥ हों अज्ञान तुम मर्म न जाना। जान बूझ भूले अभिमाना ॥ क्षमि अपराध मोर प्रभुराया। मोरे चित जो अन्तर आया ॥ तुम गुरु सतगुरु ब्रह्म समाना। मैं शिव आहुँ महा अज्ञाना ॥ कुवचन वचन बोल जो भाखा। माता पिता हृदये नहि भाखा ॥ करुणामय गुरु अन्तर्यामी। करहु दया अब मोपर स्वामी ॥ जो नहि दर्शन पाऊँ आजू। तजौँ प्रान मैं तुम्हरे काजू ॥ हे साहिब तुम पथ जो दीन्हा। तातैं तुमहि बूझ हम लीन्हा ॥

साखी-धर्मदास बिनखत बदन, करुणा बहुविधि कीन्ह।

दर्शन बिन अति विकल है, जल बिन तलफत मीन ॥

सतगुरु वचन-चौपाई

तबहि कबीर दया चित आई। धर्मदास तब दर्शन पाई ॥ दर्शन पाय भयो आनंदा। जैसे चकोर मिलत है चंदा ॥

बोधसागर

( २१६ )

गहि गुरुचरण बंदगी कीन्हा । चरण धोय चरणामृत लीन्हा ॥ बिन्ती कीन्ह चरण चितलाई । महा प्रसाद दीजिये साईं ॥ आमनिको अज्ञा तब दीन्हा । नाना व्यंजन तूर्तहि कीन्हा ॥ कंचन थार आरती चारी । सेवा बहुत हृदयमें धारी ॥ सुत नारी सब चरणन लागे । प्रेम प्रतीत भक्ति मन पागे ॥ चरणामृत सबही मिल लीन्हा । दिव्य ज्ञान सब कहैं कर दीन्हा ॥ साहिब चौका बैठे जाई । बहुत भौंति कर आसन लाई ॥ परस थार जब आमनि नारी । सुन्दर बदन प्राण अतिधारी ॥ मार मार प्रसाद लै खावहिं । प्रेमभाव साहिब मन भावहिं ॥ पाय प्रसाद पुनि अचवन लीन्हा । धर्मदास तब बिन्ती कीन्हा ॥ दया करहु अब मोपर स्वामी । बन्दी छोड़ु वर अनंतर जामी ॥ तब दीन्हऊँ प्रसाद गुसाईं । धर्मदास तब हवैं मन माईं ॥ जेतक साथ रहे घर नाहीं । वह सब आनंद भये मनमाहीं ॥ आमनि तबहीं पलंग बिछावा । सतगुरु तहां आन पौढावा ॥ धर्मदास तब पंख डुलावैं । आमनि चरण चापि सुख पावैं ॥ सकल साध हिल बंदगी कीन्हा । तन मन धन साहिब कहँ दीन्हा ॥ मेटी सकल जगतकी लाजा । ताते होय जीवको काजा ॥ धर्मनि तहां निछावर करहीं । बार बार बिन्ती अनुसरहीं ॥

साखी-यह तन लेव गुसाईं, जो होवे हम काज ।

तन मन धन कर निछावर, सुख संपति कुल लाज ॥

सदगुरुवचन-चौपाई

कर धर सिज्या पर बैठाया । अन्तर गति स्थिर ठहरावा ॥ जोई मुख सौं भीतर देखा । सबहि कसौटी कीन्ह परेखा ॥ साहिब तब ही दाय़ा कीन्हा । मस्तिक हाथ आमनिके दीन्हा ॥ जाहु न अपने घरके माहीं । सत्य तुम्हार देखे मन माहीं ॥

( २१६ )

अमरसूल

यह मन कर्म अकर्म करावे । देहके स्वारथ नाच नचावे ॥ तातें तुम मन थिर हम जाना । काल चरित्र छूटा अभिमाना ॥ हमरे देह काम नहीं होई । तुम अहंकार सकुल हम खोई ॥ धर्मदास तुम वंश उजागर । हंसन पहुँचावहु सुख-सागर ॥ निश्चय हुई है मुक्ति परवाना । सत्यलोक कहि देव पयाना ॥ वंश तुम्हार जहां लग होई । इनके हाथ मुक्ति सब होई ॥ वंश ब्यालिस अचल तुम्हारा । तिनके हाथ मुक्ति संसारा ॥ ब्यालिस मांहि त्रयोदश भाखा । अंश हमारहु हैं निज शाखा ॥ नाम जानते सबै उबारा । बिना नाम बूड़ा संसारा ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिन्ती अनुसारी । हे साहिब मैं तुम बलिहारी ॥ हमरे वंश कहैं पारस देई । तुम्हरे दरश बहुर कब लेई ॥ यही अर्ज मेरो सुन लीजे । वंश हमारहु आपनो कीजे ॥ जिहंते मुक्ति होय सब केरा । सो मोहे स्वामी कहौ नवेरा ॥

सद्गुरु वचन

तुम्हरे वंश को कहौ उपदेशा । जाते होय हंसको भेषा ॥ जो कोई हंस होय जगमाहीं । उबरहिं वंशनकी वाहीं ॥ वंश तुम्हार जे बालक होई । तिनसौ पारस ले सब कोई ॥ जा कहैं नाहीं ब्यापै कामा । निशदिन रहे शब्दमें धामा ॥ रहित गहिनसौ स्थिर अंगा । मनसा वाचा सत्य प्रसंग्रा ॥ सत पास को जानैं भेदा । आतम परसै सूक्ष्ममें भेदा ॥ ऐसा सज्जत शब्द सनेहा । प्रकट कबीर तासुकी देहा ॥ तिनसौ पारस भेद न कीजे । वंश मोर जो शब्द पतीजे ॥ पारस मांहि भेद जो करई । कहैं कबीर सो किहि विधि तरई ॥ बालक बोध कै पंथ चलाओ । बिना पंथ सोला नहीं पाओ ॥

बोधसागर

( २१७ )

बालक तेरे वंशके हाथा । पंथ दीन्ह मैं तिनके हाथा ॥ मुक्ति जान कर राखै गोई । तेहि सम झोही और न कोई ॥ शब्द जान कर पन्थ चलावै । देश देश फिर सब समझावै ॥ तौन देश गैवनइ कराई । सुर्तन बन्त हंसन मुक्ताई ॥ पुरुष आज्ञा जो मोकहैं दीन्हा । मुक्ति भेदसों सब कहि दीन्हा ॥ सार शब्दका भेद जो पावा । यह सब ज्ञान तोहि समझावा ॥ बिना ना मिट है नहिं संशा । नाम जान सो हमरे वंशा ॥ नाम जान सो वंश करावै । नाम बिना सो मुक्ति न पावै ॥ वंश तुम्हार नाम जब पाई । भवसागरतें लोक सिधार्द ॥ नाम न जान करै अहंकारा । सो जिव परि है भवजलधारा ॥ नाम जान सो वंश हमारा । बिना नाम बूझा संसारा ॥ बिना नाम सबही अभिमानी । नाम प्रचय कोई कोई जानी ॥ नाम निहश्चर कहा बुझाई । अमरमूल महाँ देखो आई ॥ निह अक्षर को पावै भेदा । सोई हंसा होय अछेदा ॥

साखी-कहै कबीर विचारकै, निःअक्षरको भेद ।

निःअक्षर जो पावहीं, सोई हंस अछेद ॥

चौपाई

निह अक्षर तुम ज्ञान सुनाओ । जम्बू द्वीप हंस मुक्ताओ ॥ ऐसा धरम धरे जो कोई । निश्चय पार पाय है सोई ॥ तुम धर्मदास पन्थके राजा । तुम्हरे हाथ जीव को काजा ॥ यही मता हम तुम कहैं दीन्हा । दूसर कोइ न पावै चीन्हा ॥ अक्षर भेद बसै जिहि अंगा । निस बासर हम ताके संगा ॥ सत्य लोक महाँ वासा पाई । अमृत भोजन करै अघाई ॥

छन्द-यही महिमा जीव धरहै, बाम करै सतलोक हो ।

काल फन्दा काटकै लै, धरौ हँसन थोक हो ॥

( २१८ )

अमरमूल

सुन्नन सिज्या बास लीन्हो, असन अमृत पावहीं । वस्त्र अम्मर पहिरकै तिन, जरा मरन नसावहीं ॥ सोरठा-षोडश भान प्रवान, धर्मनि शोभा हंसकी । पावो शब्द प्रवान, अञ्जलोक वासा कियो ॥ इति श्रीग्रंथ अमरमूल धर्मदास कसोटी, पारस भेद वर्णन- चतुर्थ विश्राम

धर्मदास वचन चौपाई

धर्मदास तब विन्ती कीन्हौ । अबलगसाहिबहमनहिंचीन्हा ॥ जब तैं दाय़ा भई तुम्हारी । भयो प्रकाश हृदयमें भारी ॥ अमर लोकके हौ गुरु वासी । कारण वन आये अविनाशी ॥ मृतलोक आये किहि काजा । धर्मराय बड़ पापी राजा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मनि सुनौ वचन चितलाई । जीवन काज पुरुष पठवाई ॥ सत्यलोक तैं जगमे आवा । धर्मराय मोहे देखन धावा ॥ धर्मराय तब पूछी बाता । कवन काज तुम आयेउ ताता ॥ मृतलोक में अब मैं जाऊँ । हंसन काज पुरुष पठवाऊँ ॥ धर्मराय तब बोलन लीन्हा । हमरे देश मुक्ति तुम दीन्हा ॥ मैं तो तीन लोक कर राजा । तुम कस करो जीव करकाजा ॥ यह तो लोक पुरुष मोहे दीन्हा । तुम कस मोहे छुड़ावन लीन्हा ॥ अजहुँ भली है जाहु गुसाई । जीव जीव जन्तु मारो सब ठाई ॥ अगम अपार निरंजन देवा । तुम नहिं जानत मोरा भेवा ॥ किहि विधि हंस उतारो पारा । कौन भेद लै करो पसारा ॥ तब हम कहा सुनो धर्मराजा । जानत नाहिं मर्म तुम काजा ॥ हम बल एक शब्द का भाई । तेही के बल हंस मुक्ताई ॥

बोधसागर

( २१९ )

जहां नाम तहां तुम नहीं कोई । विना नाम है तुम्हरी छोई ॥ यह विधि होय हंस परवाना । आवा गमन तासु नहीं जाना ॥

धर्मराय वचन

जेतिक नामे मुख सुन्न करिया । सो सब नाम हमारे धरिया ॥ जो कोई धर्म करही संसारा । सो सब मोर आहि व्यवहारा ॥ बहुत भाँति मैं फंदा कीन्हा । शंकर सहित बांध मैं लीन्हा ॥ कवन नाम हंसन मुक्ताओ । सो स्वामी मोहे भेद बताओ ॥

ज्ञानी वचन

नाम हमार पुरुषके केरा । वही नाम सों हंस उबेरा ॥ धर्मराय तुम ताहि न जाना । अपने अवगुण भये विगाना ॥ यही नाम आपन घट लेते । जीवन कष्ट नाहिं तुम देते ॥

धर्मराय वचन

परम पुरुष है मोरा नाऊँ । दूसर पुरुष कहाँ निर्माऊँ ॥ मोरे आगे कवन कहावा । सब कहँ मार जार भर्मावा ॥ तीन लोक महँ जीव पसारा । उन कहँ मार करौ संहारा ॥ ब्रह्मा पुत्र हमारो भयऊ । अंतकाल ताही दुख दयऊ ॥ शिवसमाधि कीन्हा अहँकारा । प्रलय काल करौ जर छारा ॥ विष्णु बड़े सबही में अंशा । तिनकहँ मार करौ निरवंशा ॥ अपने अंश यही गति दैहौँ । सृष्टि संहार प्रलयकर लैहौँ ॥ तुम तो आए हंस उबारन । कवन भाँति करिहौ जगतारन ॥

ज्ञानी वचन

धर्मराय कहँ तब ससुझाई । तुम जीवनके दुष्ट कहाई ॥ जब तुमकीन्ह चोरको काजा । तानैं पुरुष मोहिं उपराजा ॥ नाम एक मोहे दीन्ह अमोला । वोही नाम जिव बन्दी खोला ॥ ठाकुर नाम तुम्हारा होई । तीन लोक ठकुराह समोई ॥

( २२० )

अमरमूल

पुरुष नाम तुम दीन्ह बिसारी । आपहि पुरुष रूप विस्तारी ॥ योग सन्तायन हमरौ नाऊ । तोहि कारण मोहे निर्माऊ ॥ तुम निज धर्म करौ अहंकारा । आदि ब्रह्म अहे रखवारा ॥

धर्मराय वचन

धर्मराय तब उत्तर दीन्हा । हम कहैं दया पुरुष ने कीन्हा ॥ तुमही दया करहु मोहि पाहीं । जिहिते मोर रहै जग छाहीं ॥ तुम जेठे हम लहुरे भाई । हम ऊपर तुम काहि पठाई ॥ पुरुष समानहिं तुम कहैं जाना । अपने मन तुम दूसर ठाना ॥ कहौ उपदेश सोह उपदेशा । जातें ऊजर होय न देशा ॥ पुरुष वचन हम शिरपर मानी । आज्ञा भंग करों नहिं ज्ञानी ॥

ज्ञानी वचन

योग सन्तायन बोलन दीन्हा । यह उपदेश पुरुष तोहि दीन्हा ॥ जा जिव पान प्रवाना पावै । ताके निकट काल नहिं जावै ॥ जो कोइ जीव होइ है ज्ञानी । ताकी तुम कीजौ महिमानी ॥ सार शब्द जो बालक पावै । तासो प्रेम बहुत तुम लावै ॥ यह उपदेश हमारौ लीजे । पुरुषके वचन मान शिर लीजे ॥ जो इतना नहिं करौ कबूला । तौ तुम सहहु दुःख बहु शूला ॥ पान प्रवाना शब्द न होई । जस जानो तस करिहौ सोई ॥ इतना धर्मराय जब जाना । जो तुम कहा सोई परवाना ॥ बिन्ती एक हमारी लीजे । नाम सन्देश मोहि कहि दीजे ॥

साखी-मैं उपदेश जो पावहुँ, सो सब कहहुँ तुम्हार ।

तुमहि पुरुषके अगुवा, हंस छुड़ावनहार ॥

ज्ञानी वचन-चौपाई

तब साहिब जो कहिबे लीन्हा । तुम नहि पावहु नामको चीन्हा ॥ जब तुम सत्यलोक महाँ रहिये । चौसठ युगलग सेवा करिया ॥

बोधसागर

( २२९ )

तबै पुरुष आज्ञा तेहि दीन्हा । सत्रह खण्ड राज्य तब दीन्हा ॥ तब तुम मान सरोवर जाई । कन्या देख बहुत सुख पाई ॥ पुरुष तोहि तब मार निकारा । तब हम भएऊ हंस रखवारा ॥ शब्द वार तब पुरुष सम्हारी । तुम्हरे टारे टरत न टारी ॥ मूल शब्दका का पावै भेदा । सोई हंसा होय अच्छेदा ॥ सोई भेद तुम नाहिंन पावा । कितनौ सेवा कर गुहरावा ॥ तुम कुबुद्धि औगुण बड़ कीन्हा । पुरुष आय पेल जो दीन्हा ॥ तबतै तुम्हरो भित्र पसारा । राज पसारेउ यह संसारा ॥ हम कहैं दया हंस की आई । दीन्ह पयान लोक तैं भाई ॥ बचन हमार मान सिर लीजै । शब्द खोजि अब नाहि करीजे ॥ जब तुम पाहौ शब्द ठिकाना । लोक तुम्हार न रहे निदाना ॥ सबै जीव सत लोकहि जाई । तुम्हरी नहीं रहै ठकुराई ॥ येही मन्त्र हमारो धरहू । शब्द खोज अब नाहीं करहू ॥ साखी-महा प्रलय जब होय है, देखि हो लोक हमार । तब हम तुम कहैं मिलिहिंगे, शब्द दोह टकसार ॥

चौपाई

सत्रह खण्ड तबहि मिटि जाई । रहै पुरुष तब शब्द समाई ॥ धर्मराय तुम पुरुष के अंशा । मिलहै शब्द मिटे सब संसा ॥ इतना वचन धर्म सौ कीन्हा । पीछे जगही प्याना कीन्हा ॥ ता पाछे संसारहि आये । पेडरमों बहु जीव छुड़ाये ॥ चार सिद्ध पर्वत पर पाये । तिनसों ज्ञान भेद समुझाये ॥ चारौ सिद्ध काल सों बाचा । दिव्य ज्ञान हृदय मंह साचा ॥ ता पीछे तुम्हरे ढिग आए । धर्मदास तुम दर्शन पाए ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिन्ती अनुसारि । है सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥ अगम ज्ञान तुममोहिं लखावा । हृदय कमल तुम मोर छुड़ावा ॥

( २२२ )

अमरमूल

धन्य भाग्य सतगुरु पगुधारा । अब भयोजीवन सुफल हमारा ॥ एक वचन मोहि कहौ बुझाई । जिह्तिं जीव की संशय जाई ॥ काल कठिन सो काहु न जाना । सो मोसौं कहिये परवाना ॥ जीवत काल चिन्ह जब पावै । तब तुम्हरे सतलोक सिधौवै ॥ जीवत काल चीन्ह नहि जाई । तो कैसे सत लोक सिधाई ॥ तुम तो ज्ञान बहुत उपदेशा । बिन देखे सब लगै अन्देशा ॥ दया करो अपनो जन जानी । काल चिह्न याऊ पहिचानी ॥ बिन चीन्है नहिं होय उबारा । भवसागर बांकी है धारा ॥ काल कठिन है जगकौ फंदा । किहिं विधिजीवहोयनिरद्वन्दा ॥ निरद्वन्दी मोहे करो गुसाई । तौ मैं पंथ चलाऊं जाई ॥

सद्गुरु वचन

साहिब तब कहिबे चितधारा । धर्मदास सुन काल पसारा ॥ काल अमल संशय है भाई । प्रथम काल तुम चीन्हौ आई ॥ जेतक कर्म करै संसारा । सो सब आहि काल व्यौहरा ॥ काल रुयाल जानत नहिं कोई । कर विपरीत सबन कहैं सोई ॥ दस औतार काल ने छलिया । काल अपर्बल सबकहैं दलिया ॥ मीन स्वरूप काल औतारा । कूर्म स्वरूप महा जो धारा ॥ बारह रूप औतार जो कीन्हा । नरसिंह रूप औतारजोलीन्हा ॥ वामन होके बलि कहैं छलऊ । परशुराम होय क्षत्री दलऊ ॥ राम रूप होय रावन मारा । कृष्ण रूप होयकंस पछारा ॥ बौध रूप जगन्नाथ औतारा । लीला बहुत भांति सम्हारा ॥ दस औतार कालके धरिया । म्लेच्छ मारसतयुगसोकरिया ॥ इतनी देह धरी युगमाहीं । काल अमल व्यापै तिनपाहीं ॥ काल मर्म काहू नहिं जाना । सबकहैं पकर कीन्हे पिसवाना ॥ काल पुरुष काहू नहिं चीन्हा । काल पाय सबहिन गहि लीन्हा ॥

बोधसागर

( २२३ )

काल पायकर जागहि योगी । कालकष्ट सुन फिरहिं वियोगी॥ काल पायकर पाप जो करहीं । काल पाय सब पुण्यहि धरहीं॥ काल पायकर सत गुरु भयऊ । काल पाय त्रेता है गयऊ ॥ द्वापर काल पायकर आवा । कलियुग काल पाय निरमावा॥ कालहि पाय चला सब जाई । काल पाय संसार समाई ॥ काल पाय कर भक्ति करावै । काल पायकर लोकहि आवै॥ काल भेद मैं कहा विचारी । धर्मदास तुम ज्ञान सङ्घारी ॥ काल कालको मर्म न जाना । सत्य पुरुष तैं भय उत्पाना॥ अलख निरञ्जन नाम कहावा । पुरुष प्रसंग रूप बनि आवा॥ पुरुष प्रगट जब रूप बतावा । सत्य लोक जब नाम धरावा ॥ तबही पुरुष गुप्त होय गयऊ । काल रूप यह मनकर भयऊ॥

साखी-काल काल सब कोई कहैं, काल न कीन्ह विचार । मन थिर होवै शब्द महैं, काल रहे झकमार ॥

चौपाई

ना कहैं आवै ना कहैं जाई । शब्दहि माहीं सहज समाई ॥ जा देखहैं तैसा है सोई । गुप्त प्रगट वे रहै समोई ॥ गुप्त ये प्रगट एक कर भयेऊ । दुतिय भावकर ज्ञान नश्येऊ॥ दुतिया दुर्मत दासी होई । ज्ञान विचार कहां रहो सोई ॥ तीन कालसों जो रहै थीरा । सोई पुरुष कायाको बीरा ॥ सोई वीर शब्द निज मूला । मंत्र ध्यान सोई स्थूला ॥ वही शब्द तैं काल डराई । नातर करि हैं कोट उपराई ॥

साखी-दुनिया चेरी काल की, मूरख बूझे नाहिं । जाकी दुनिया मिट गई, ते आतमब्रह्म समाहिं ॥

चौपाई

जैसा है तस कहा न जाई । ज्ञान विना बूझे नहिं भाई ॥ आय ज्ञान तव परगट भयऊ । दुतिया भाव सबै मिट गयऊ॥

( २२४ )

अमरमूल

दीपक ज्ञान भयो उजियारा । कालतिमिरमिटगा अँधियारा ॥ भय आनन्द गुरु जब पाये । ऊँच नीच सब दूर बहाये ॥ ऊँच नीच सब समकर जाना । ऊँच नीच सब झूठ बखाना ॥ ऊँच नीच सब झूठहि लावै । जब आतम परमातम पावै ॥ झूठा लोग न बूझै कोई । सब संसार झूठ है सोई ॥ समता ज्ञान प्रकाश कराई । और ज्ञान सब झूठ हैं भाई ॥ झूठ सांच संसार समाना । सत्य शब्द नाही पहिचाना ॥ झूठ सांच दोई मिट गयऊ । ज्ञानप्रकाश जाहि घट भयऊ ॥ धर्मदास तुम बूझहु ज्ञाना । काल कर्म सुनहु अब काना ॥ सतगुरु दया जाहि पर होई । अमरमूल कहैं जाने सोई ॥

साखी-अमर मूल कहैं जानई, काल दगा मिट जाय ।

काल परख कर बूझ है, सब नहिं काल समाय ॥

चौपाई

काल तिहकालका भेद सुनाऊँ । धर्मदास मैं तोहि लखाऊँ ॥ निह अक्षरका भेद निज पावै । निह अक्षर माहिं जाय समावै ॥ जो नहिं जान निहअक्षर भेदा । ता महाँ काल करत है छेदा ॥ निह अक्षर विन काल न जीतै । यज्ञ दान केता कर बीतै ॥ योग यज्ञ तप काल पसारा । यज्ञ दान सब काल व्योहरा ॥ काल गती संसार है भाई । बिरला जन कोई लख पाई ॥

साखी-संशय काल शरीर महिं, विषय काल है दूर ।

ताहि लखत कोई संतजन, जार करै सब धूर ॥

चौपाई

जीव बुद्धिसों नाहिन चीन्हा । काल न चीन्हत मतिके हीना ॥ कबहुँ सुख कबहुँ दुख होई । काल जाल जानत नहिं कोई ॥ मानस कह मनमाहिं बिचारी । निरालंब होय प्रभुहिं पुकारी ॥

बोधसागर

( २२६ )

कबहुँ कहै प्रभुने सब कीन्ह। कबहुँ कहत सब मोर अधीना॥ स्वारथ रूप सदा चित लावै । परमारथ कबहुँ नहि भावै ॥

साखी-कहै कवीर धर्मदास सों, तुम सुनियो चितलाय । काल भेद नहि जानहीं, मूरख रहे खुलाय ॥

चौपाई

जो देखा सो काल पसारा । जो बिनसे सो काल अहारा ॥ धर्मदास तुमचित थिर करहू । मनकी डगमग तब परिहरहू ॥ भूत भविष्य वर्तमान जो कहिये । यहि बिधि तीनकाल निर्वहिये ॥ भूत सबै है कालकी काया । भविष्य होय सोइ जीव कहाया ॥ वर्तमान परमात्म जानो । यहि विधितीनकाल पहिचानो ॥ जोई भूत सोई वर्तमाना । सोई भविष्यत भर्मकर जाना ॥ भूत भविष्यत और वर्तमाना । मनथिर भए सबै पहिचाना ॥ शब्द मांहि हंसा निरबहई । मन बिच कर्म नामको गहई ॥ मनके रूप समानी माया । सब संसार व्याप्त यह छाया ॥ मन थिर कर परमात्म जाना । यह विधि तत्त्व लेहुपहिचाना ॥ काल जाल तैं तेही लूटै । काल बिचारै ताहि न लूटै ॥ यही भेद धर्मन सुन लीजै । शब्द मांहि बासा तुम कीजै ॥ काल ज्ञान संसार बखाना । काल स्वरूप नहीं पहिचाना ॥

साखी-इतना भेद सुन लीजिये, काल को ज्ञान बखान । काल पाय कर होत है, हम सों फिर फिर ज्ञान ॥

धर्मदास वचन चौपाई

धर्मदास तब पांयन परई । सतगुरु सों बिन्ती अनुसरई ॥ जो तुम कही सोई परवाना । काल पाय कर फिर २ ज्ञाना ॥ तुम प्रसाद मुक्ति फल पावा । यह भवसागर बहुर न आवा ॥ हम सों ज्ञान कहा फिर होही । सोई बात कहो निज मोही ॥

( २२६ )

अमरमूल

सद्गुरु वचन

तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । तुम नहिं पाओ ज्ञानको चीन्हा ॥ हम तौ सत्यलोकके वासी । तहैं नहिं काल बसै अविनाशी ॥ मैं जो कहा मृतलोकव्यवहारा । काल पाय सब होत औतारा ॥ काल पाय बिनसै संसारा । काले सब बिनास जग डारा ॥ काल कर्म काहू नहिं जाना । जीव जन्तु सब काल समाना ॥ कालहि पाय सृष्टि निर्माई । काल पाय फिर माहिं समाई ॥ साखी-काल पाय जग ऊपजो, काल पाय वर्त्ताय । काल पाय सब विनसही, काल काल कहैं खाय ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

यह सुन धर्मदास हर्षाने । सद्गुरु रूप हिये पहिचाने ॥ तुम साहिब मोहे कीन्ह निहाला । आपन जान कीन्ह प्रतिपाला ॥ बिन्ती एक करत संकाई । हे सतगुरु मोहे भाख सुनाई ॥ कालहिकी गति कहि समुझावा । अचरज बात मोर मन आवा ॥ प्रथम पुरुषकी प्रथमहि काला । मोहि बतावहु भेद रसाला ॥

सद्गुरु वचन

तब सतगुरु कहिबे अनुसारा । धर्मदास सुन शब्द हमारा ॥ प्रथम हते जब शून्य स्वभाऊ । धर्मदास सुन शब्द निर्माऊ ॥ शब्दते पुरुष शब्द निर्मावा । यही भेद बिरले जन पावा ॥ जाकौ कहिये शून्य स्वभाऊ । काल शून्य एकै समुझाऊ ॥ काल भेद कोई नहिं जाना । धर्मदास तुम सुनियो ज्ञाना ॥ शून्यहि माहि शब्द उच्चार। धर्मरायको भयो पसारा ॥ प्रथमहि जिन्द रूप इकभयऊ । सत्तर युग सोवत चल गयऊ ॥ तब साहिब मोहे आज्ञा दीन्हा । जिन्द जीवकहैं तुम नहिं चीन्हा ॥ जिन्द जीव कहैं आन बुलाई । सत्तर युग उन सोय सिराई ॥

बोधसागर

( २२७ )

तब हम जाय शब्द अस बोला । सोवत जिन्द नाहिं चित डोला ॥ का सोवत तोहि पुरुष बुलाई । नाहिं जागहि तिहि नींद सुहाई ॥ तब हम तेहि जगावन लागे । जिन्द जाग परम अनुरागे ॥ जगे न नीन्द भर्म बहु आवा । तब हम एक शब्द उपजावा ॥ काल शब्द कहैं टेर पुकारा । सुनकर जिन्द भयो संचारा ॥ काल शब्द सुनजिन्द डराना । तबही आया चरण लिपटाना ॥ काल नाम सुन ऐसा भाई । काल नाम सुन भक्ति कराई ॥ धर्मदास सुन कालको भेदा । काल बिना नाहिं करै निषेदा ॥ काल नयन भर देख न कोई । कालहि पढ़ पढ़ गये बिगोई ॥ वेद शास्त्र सुन पंडित कहाई । काल पुरुष सब जीव भर्माई ॥ साधू मिलकर भक्ति कमाई । जातैं काल फांस नाहिं आई ॥ काल शब्द ना होतौ भाई । ता काहे को भक्ति कराई ॥ कालके डर तपसी तप साधा । इन्द्री पांच काल डर बांधा ॥ कालहिके डर योग जो करई । कालहि डरतैं दान जो भरई ॥ कालहि डर भावै सत जाना । कालहि डर छोड़ै अभिमाना ॥ सत्यहि वचन काल डरकहहीं । कालहि डरसे झूठ परिहरहीं ॥ ऐसा डर है कालहि केरा । धर्मदास तुम करहु न बेरा ॥

सारखी-ऐसा डर है कालका, सुनहु हो धर्मदास ।

एक नाम कहैं जानकै, निडर रहो सुखवास ॥

चौपाई

कालहि डर दुनियां सब बूड़ी । काहु न देखी कालकी मूड़ी ॥ तुम धर्मदास निडर हो रहहु । नाहिन काल झूठ परिहरहु ॥

छन्द-यह भांति पंथ चलाव जगमें हंस लोक पठाइबौ ।

ज्ञान गम्य लखायकै फिर शब्दसार लखाइबौ ॥

हृदय जेहि पर होय गुरुकी रहत गहन समावही ।

काल कष्ट निवारकै सोई पुरुषलोक सिधावही ॥

( २२८ )

अमरमूल

सोरठा-आप सरीखा जान, ता कई शब्द लखाइयो ।

धर्मदास लेव मान, यही सिखावन पुरुषको ॥

इति श्रीग्रन्थ अमरमूल धर्मराय बाद कालको वर्णन ।

पंचम विश्राम

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास आनंद समाना । विगसेउ कमल उदेजनुभाना॥ बहुत भांतिसों विन्ती कीन्हा । मन वच कर्म चरणचित दीन्हा॥ पदरज लीन्हौ तृषा मिटाई । छूछी सीप स्वाती जिमि पाई॥ रंकहि निधी मिलगई जैसे । अहिमणि मिलै मगन भय ऐसे॥ चरणामृत वह विधिसों लीन्हा । गुरु चरणनको मैं आधीना ॥ अब प्रतीति मोर मन आई । निश्चय वचन मान तुव साँई ॥ अबही जाय लोक मैं देखा । ज्ञान गम्यसों पायउ लेखा ॥ भक्ति मुक्ति दोनों हम जाना । दया तुम्हार परी पहिचाना ॥ जेपर दया तुम्हारी होई । ऐसे पदको पहुँचे सोई ॥ हम जानकै मान उपदेशा । विन सतगुरु नहिं मिटत अँदेशा॥ तुम सतगुरु और सब शिष्या । यही ज्ञान परगट हम देख्या ॥ सतगुरु आप और सब वंशा । सत्य पुरुषको तुम निज अंशा ॥ तुम्हरे बचन लोक पहिचाना । तुम्हरी दया परी अब जाना ॥ यह मन बूझ शब्द है लोका । ज्ञान भयो मिट गये सब शोका॥ लोक अलोक एक कर जाना । तुम्हरे बचन सत्य हम जाना ॥ अब मोरे जिव परचय आई । बिन जाने जाने बूझी दुनियाई॥ नहि बूझौ नाहीं उतराना । यहि पाया हम केवल ज्ञाना ॥ एक बचन मैं बूझा साँई । विन्ती करौं चरण चित लाई ॥

बोधसागर

( २२९ )

तुम सतगुरु मोहिदिय उपदेशा । मैं हंसनसों कहौ सँदेशा ॥ यह तौ बात कही नहि जाई । जब पावे तब ज्ञान समाई ॥ जब तुम दया करी हियमाही । तबहीं पाऊ नामकी छाहीं ॥ कहिये बचन मोर मन भावै । जातैं हंसा लोक सिधायै ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । सब कहैं देह शब्दका चीन्हा ॥ जो नहि पाव शब्द सहदानी । तो कस करहु लोकपहचानी ॥ सब कहैं ज्ञान गम्य कर देहु । शब्द लखाय आपनकर लेहु ॥ प्रथमहि देहु पान परवाना । ता पीछे फिर ज्ञान लखाना ॥ समय जान सब कहौ बिचारी । यही भांति सब जिव निर्वारी ॥ साधुनकी सेवा चित लावै । सो जिव भवसागर नहि आवै ॥ गुरुकी दया मान सिरलीन्हा । भाव सहित पूजातिन कीन्हा ॥ इतनौ भेद एक नहि जानी । सो कैसे पुन शिष्य बखानी ॥ ज्ञानवन्त कहैं यह उपदेशा । मूरखसों जिन करहु संदेशा ॥ सार शब्द जाके घट होई । तिहि हंसा सम और न कोई ॥ धर्मदास तुम कहैं नहि भारा । सबके तारन है करतारा ॥ यह उपदेश कहहु बहु भांती । माने सोई हंस की जाती ॥ जो नहि मानै कहा तुम्हारा । सो चल जैहै यम के द्वारा ॥ यमके हाथ परै सो आई । बहता जाय थाह नहि पाई ॥

साखी-कहै कबीर धर्मदाससों, दीजो पान प्रवान । यही हंस जो पावहीं, पहुँचे पद निर्वान ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी तुम्हरी बलिहारी । अब चौकाको कहौ बिचारी ॥ कवन शब्दसो आरति साजी । कवन शब्द सतगुरुकी पाँजी ॥

( २३० )

अमरमूल

कवन शब्दसों नरियर मोरा । कवन शब्दसों तिनका तोरा ॥ कवन शब्दसों चौका करई । कवन शब्दसों दीपक बरई ॥ कवनै शब्द पान लिख दीन्हा । कवन शब्द प्रसाद जो लीन्हा ॥ कवन शब्द मिष्टान्न चढ़ावा । कवन शब्दसों छत्र तनावा ॥ कवन शब्द पनवारौ साजा । धोती कवनै शब्द विराजा ॥ कवन शब्दसों चंदन दीजे । कवन शब्दसों पुहुप चढ़ीजे ॥ दल प्रसाद किहिं शब्द बनाई । यही भेद गुरु कहु ससुझाई ॥

सद्गुरु वचन

यहे भेद अब तोहिं बताऊँ । चौका साज सकलसमझाऊँ ॥ प्रथमहि तौ चौका अनुसारा । सोई शब्द मैं कहौं पसारा ॥ सेत सिंहसन चौका चारी । कंचन थार आरती वारी ॥ तहाँ धनी जीव बैठे आई । लिखनी लिख बहुभाँति बनाई ॥ धर्मदास उठ बिन्ती कीन्हा । चन्द्र सूर्य दोइ साखी दीन्हा ॥ शब्द माहिं बहु भाँति समावा । कदली पत्र जो आन धरावा ॥ अमर शब्द उच्चार कराया । अमर प्रवान अमरभइ काया ॥ अमर प्रवान अमर कर जाना । अमर शब्द बिरले पहिचाना ॥ अमर शब्दका पावै भेदा । कहैं कबीर प्रवान अच्छेदा ॥ एक बीज धरती कहैं दीन्हा । पान सुपारी नरियर कीन्हा ॥ सो प्रसाद संतन कहैं आई । सत्त सुकृत के लोक सिधाई ॥ तीन लोक सों भिन्न पसारा । बाहर भीतर शब्द पसारा ॥ दूजी दुर्मत चित सों मेटो । एकहि चीन्ह कबीरहि भेटो ॥ यहि शब्द मिष्टान्न चढ़ावा । कदली पत्र जो आन धरावा ॥ सवा शेर मिष्टान्न मँगावहु । सत्य पुरुष कहैं आनचढ़ावहु ॥ सत्य सुकृत कहैं आन चढ़ाई । दीन भाव कर बिन्ती लाई ॥