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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

हंसरहनीवर्णन

बोधसागर

(६१)

काल कसौटी ठहरे हँसा । कहैं कबीर सोइ सुकृत अंसा ॥
सत्य असत्य जानि किमि जायी । कादर विचलै सूर रहायी ॥
धर्मदास तोहि बहुत बुझावा । रहनि गहनि सतपन्थ बतावा ॥
बहुते बेर सिखायो तोही । देखौ अयश न पावै मोही ॥
बहुरि कोटि शिखापन तोही । देखहुँ कोइ हँसै ना मोही ॥

रहनी वर्णन

अभ्यागत जो आवे द्वारा । सन्त असन्त सोहि विचारा ॥
दीजै भिक्षा हरष सो ताहीं । एहि सम योग पुण्य तप नाहीं ॥

धर्मदास वचन

हे साहेब विनती एक करऊं । समरथ जानि पट उतर धरऊं ॥
हे प्रभु रंक होय कोइ दासा । जाय अभ्यागत ताहि अवासा ॥
ताके घर कछु सुकृत न होई । सो कस करै कहो प्रभु सोई ॥
सो कस करै कहौ प्रभुराई । केहि प्रकार तेहि सेवा लाई ॥

सत्गुरु वचन

मुनु धर्मनि पथ नीती भाखे । शक्ति अछत पुनि गोय न राखे ॥
तन बस्तर लै गोय न भाई । जब अशक्त तब काह कराई ॥
आप खाय तब ताहि खिआवै । नहि तो यक सम समय गँवावै ॥
तीरथ व्रत जप तप बहु करमा । काहे परै याहि निज धरमा ॥
कोटि तीर्थ भ्रमर फल पावै । सो फल भरहीं साधु जिवैं ॥
मानो गुरु साधुनका बानी । कह कबीर शब्द सहिदानी ॥
कहै कबीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम गहि मिटै उपाधू ॥
सत्यकवीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम कहैं सत्य अवराधू ॥
सत्य नाम गहि तजे दुचितार्ई । कहैं कवीर हम ताहि सहाई ॥
सत्यनाम कहैं चीन्हैं सोई । कहैं कवीर गुरु गम जेहि होई ॥
को हम को तुम को है अनन्ता । कहैं कबीर यह बूझैं सन्ता ॥

(६२)

ज्ञानप्रकाश

सोइ हम सोइ तुम सोइ अनन्ता । कहैं कबीर गुरु पारस सन्ता ॥
सन्त चेतु चित सतगुरु ध्याना । कहैं कबीर सद्गुरु परमाना ॥
सतगुरु शब्द ज्ञान गुरु पुंजा । कहैं कबीर लखु मोहनकुंजा ॥
कुंज मोहि मोहन ठहरावै । कहैं कबीर सोइ सन्त कहावै ॥
सन्त कहाय जो सोधै आपू । कहैं कबीर तेहि पुण्य न पापू ॥
पुण्य पाप नहि मान गुमाना । कहैं कबीर सो लोक समाना ॥
जिन्दा सुरदा चीन्है जीवा । कहैं कबीर सतगुरु निज पीवा ॥
सुरदा जग जिन्दा सतनामा । कहैं कबीर सतगुरु निज धामा ॥
यक जग जीतै यक जग हारै । कहैं कबीर गुरु काज सवैरै ॥

धर्मदास बचन

कौन जग जीतै कौन जग हारै । कहौ कौन विधि काज सवैरै ॥

सतगुरु बचन

इन्द्रिन जीते साधुन सो हारै । कहैं कबीर सतगुरु निस्तारै ॥
सतगुरु सो सत्यनाम लखावै । सतपुर लै हंसन पहुँचावै ॥
सत्यनाम सतगुरु तत भाखा । शब्द ग्रन्थ कथि गुप्तहि राखा ॥
सत्य शब्द गुरु गम पहिचाना । विनु जिभ्या करु अमृत पाना ॥
सत्य सुरति अम्मर सुख चीरा । अमी अंकका साजहु वीरा ॥
सोहं ओहं जावन वीरु । धर्मदास सो कहै कबीरु ॥
धरिहौ गोय कहिहौ जिन काहीं । नाद सुशील लखैहो ताहीं ॥
प्रथमहि नाद विन्द तब कीन्हा । मुक्ति पन्थ सो नाद गहि चीन्हा ॥
नाद सो शब्द पुरुष मुख बानी । गुरुमुख शब्द सो नाद बखानी ॥
पुरुष नाद सुत षोडश अहई । नाद पुत्र शिष्य शब्द जो लहई ॥
शब्द प्रतीति गहै जो हंसा । शब्द चालु जेहिसे मम बंशा ॥
शब्द चाल नाद दृढ़ गहई । यम शिर पगु देइ सो निस्तरई ॥
सुमिरण दया सेवा चित धरई । सत्यनाम गहि हंसा तरई ॥

पठित मूर्खका वर्णन

बोधसागर

(६३)

बिन्दो होय शब्द मम धावैँ । नाहबिन्दु दोउ मोहिँ पहुँ आवैँ ॥
नाद सखा जेहि अहँविगुरचे । अहँ रहित सो निज घर पहुँचे ॥
केते पढ़ि गुणि नर्कीहि जैहै । केते पढ़ि गणि लोक सिधैहै ॥

धर्मदास बचन

हो सद्गुरु मैं तुम्हारो दासा । विनती करौँ खसम तुव पासा ॥
पढ़े गुणै दुइदिशि किमिजाहीं । सो चरित्र वरणों मोहिँ पाहीं ॥

सतगुरु बचन

सुनु धर्मनि बहु पढ़ि अरथावै । शब्द कहै सो चालु न पावै ॥
पढ़ि गुणि नीति विचारे नाही । अस पढुआ सुनु नरकहिँ जाही ॥
जिन्ह पढ़िशब्दचाल गहिभाई । सुनु धर्मनि सो लोकहि जाई ॥
छन्द-जो कथत बकतौ तरे जग तो जग सबै तरि जायहो ॥
तजि तरुत सुलतान उबैर नृप कयों बनजाय हो ॥
तातै कहूँ निज समुझ पापी शब्द पढ़ि सतपद गहै ॥
जो सत्य पद निरखत चलै तो नहिँ फेरि जो नीवहै ॥
दोहा-सत्यनाम सुमिरण करै, सतगुरुपद निज ध्यान ॥
आतम पूजा जीव दया, लहै सो मुक्ति अमान ॥
सोरठा-सदगुरु कहै पुकारी, चाल चलै पथ निरखिके ॥
इंस होय भव पारि, शब्द गहन सदगुरु कृपा ॥

चोपाई

गुप्त भयो कहि शब्द प्रमाना । कालिंजर पुनि आय तुलाना ॥
कहैं कालिंजर विनै बडाई । देहु पान मोहिँ अहो गुसाई ॥
धर्मदास कहै देउँ परवाना । साहिब मोहि कह्यो सहिदाना ॥
कह कालिंजर सुनहुँ गोसाई । का सहिदान आहि तुव ठाई ॥
तब सहिदान कहा सुख बासा । सतगुरु बोल कीन्ह परगासा ॥
समय संयोग बोल सो कहेऊ । सुनि भौमौन मुगुध होई रहेऊ ॥
जात कमीना सुनत परायी । केहि कारण आरती लायी ॥

साधन वर्णन

(६४)

ज्ञानप्रकाश

औरहिँ और बुझा उन्ह भाई । पान नलीन्ह वैसहिँ चलिजाई ॥
तेहि गौनत प्रभु प्रगटे तुरन्ता । कला अमित को पावै अन्ता ॥
धर्मदास गहि चरणशिर नाथी । युगकर जोरि ठाढ़ भो जायी ॥
बैठे पुनि आज्ञा प्रभु पाई । विमुख जीव कर बात जनाई ॥

धर्मदास वचन

प्रभु विरतन्त कहो अब ताहीं । वह पान मुक्तिकै लीन्हेसि नाहीं ॥
मैं भाषेऊँ तुमरी सहि दाना । दुर्मति बूझेसि कहु आना ॥

सतगुरु वचन

धर्मनि उन्ह जोन पान नलीन्है । परिहैं कालमुख जायकमीने ॥
तजि रणभूमि टरै जो भाई । तेहि जीवहिं निश्चै यम ख ई ॥
वह यम चोर कालके हंस । धर्मराय धरि करै विध्वंसा ॥
धर्मदास तुम सुनहु हमारा । निशिदिनरहिहो नाम अधारा ॥
अब तुम आपन करहु विचारा । करिहहु निशिदिन ज्ञानविचारा ॥
दुष्ट मित्र सों प्रेम बढै हो । भक्ति भजन आनन्द रहै हो ॥

अर्थ—दुष्ट और मित्र दोनोंमें किसीसे राग द्वेष न रखकर समान प्रीति रखना सबकी भलाई चाहूँ
किसीकी बुराई नहीं चाहना ॥

जो सुख होय तो जनि इतरैहौ । दुख परै तौ जनि विललैहौ ॥
संकट महाँ बहु साहब कीजै । निश्चल नाम ध्यान चित दीजै ॥
चित निश्चन्त रहै जो भाई । तो तेहि संकट जाय नसाई ॥
यह मम देश दोउ है भाई । दुख सुख तन धरि चारै आई ॥
चहिये साधुन नहि चित डोलावैँ । हठ प्रतीतिनाम गुरु गावैँ ॥
कच्चे जीवन कर यह लेखा । संकट परै विकल हिय पेखा ॥
सुख सम्पति धन पुत्र सगाई । यह सब सपना आहै भाई ॥
धर्मनि शूरा हंस जो होई । गन न दुख सुख एकौ सोई ॥
अरु घर झगरा निवेरेहु भाई । गुरु गमहि पन्थ कहौ उपाई ॥

समाप्ति

बोधसागर

(६५)

पाँचौ कै परपञ्च मिटावै । पाँच भूतकै स्वाद गँवावै ॥
नासा श्रवण रसना चक्षु इन्द्री । पाँचौ चोर काल मतिमन्द्री ॥
पाँचहु स्वाद विषयकी पूजा । गुरुगमिपन्थ परखहि तेहि दूजा ॥
चक्षु स्वाद रस रूप सलोना । राँचि रहै जग अकिलविलोना ॥
साधु चक्षु राते सतरूपा । गुरुपदनिरखत अकिल अनूपा ॥
श्रवण स्वाद रस गीत कवीता । मगन होई सुनु रसमत चीता ॥
सन्तन श्रवण स्वाद गुरु बानी । शब्द भजन पद सार समानी ॥
नासा वास सुवास अघाहीं । कुबास वासके निकटन जाहीं ॥
सन्त न लागे वास कुवासा । नाम विदेह जपै निःस्वासा ॥
रसना स्वाद षट्स रस मधुभोजन । तजे विलोना सुरस परोजन ॥
सन्त न स्वाद नाम रससारा । षट्स रस व्यंजन छार असारा ॥
निःइच्छित जो पहुँचे आई । सुरस व्यंजन प्रीति सोपाई ॥
इन्द्री स्वादु काम रति नेहा । नारी भोग रतन तजि देहा ॥
सत्य सुरति अनुराग समावे । निशिदिन प्रेमभक्ति चितलावे ॥
पाँचौ आहि प्रबल घट माहीं । मन राजा पाँचौ कर नाहीं ॥
सत्यगुरु ज्ञान मन धरि राखे । पाँच चोरसाधि सत्यसुखमाखे ॥
छन्द-धरि मनहि बाँधहु पाँच साधहु सारसतगुरु ज्ञानते ॥
यह देशहै यमराजको तरे सो विदेही नामते ॥
सतनामव्रतगहिशब्द हियधरि करहु सेवा तासु हो ॥
तत्त्वध्यान सतपदरूप स्थित होय अमर लोकैनिवासुहो ॥
दोहा-गुरु सुखशब्द प्रतीति करि, हर्ष शोक विसराय ॥
दया क्षमा सतशील गहि, अमरलोक को जाय ॥
सोरठा-वण्यौ ज्ञान प्रकार, धर्मदास सम्बोध मत ॥
कहै कवीर कवीर, जेहि मम शब्द प्रतीति दृढ ॥
इति श्री धर्मदास बोध ज्ञान प्रकाश समाप्तः ॥

इति श्री बोधसागरे धर्मदास बोधज्ञानप्रकाश वर्णनो नामप्रथमस्तत्रंगः ॥

नं. ४ कबीरसागर - ३

इति श्रीधर्मदासबोध
ग्रन्थ ज्ञानप्रकाश समाप्त

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दजीद्वारा संशोधित

श्री-अमरसिंह बोध

A decorative horizontal line with a central diamond-shaped ornament, used as a section separator.

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन

बम्बई

श्रीमद्भगवद्गीता

संस्कृत भाषायां प्रथमः विभागः

सप्तमः अध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता

१९९९

सत्य कबीराय नमः

बोधसागर

द्वितीयस्तत्रंगः

अमरसिंहबोध

★

धर्मदास वचन-बीपाई

धर्मदास उठि ठाढे भयऊ । दोउकर जोरि सो विनती कियऊ ॥
जुग जुग जीव चेताये ज्ञानी । कालफांस ते छुडाये आनी ॥
युगकमोद कीना जिव काजा । सोई तुम भाषि कहो निज साजा ॥
यमराजाते भये छुटारा । निर्भय हंसालोक सिधारा ॥

सतगुर वचन

धर्मदास मैं कहि समुझाऊँ । युगकमोदकी खबर सुनाऊँ ॥
जब हम इते पुरुषमें पाँही । तबकी बात कहू सब तोही ॥
युग परवान चाकरी भयऊ । युग जुग पंथपसारा कियऊ ॥
अर्बे खर्बेजिव असंख्य अपारा । सब उबार लाये पुरुष दरबारा ॥
रहे सब हंस पुरुषके पास । करते कुतूहल लोकनिवासा ॥
भूख प्यास निद्रा नहिं भाई । पुरुष ध्यानमें रहे समाई ॥
पुरुष दयाल दयाकरि भारी । षोडश रवि हंस उजियारी ॥
सेज पुष्प बनी अति भावन । सुख विनोद सब लोकसुहावन ॥
बैठे पुरुष सेजपर आयी । तत्क्षण ज्ञानी लिये बुलाई ॥
ज्ञानी तुम जाओ संसारा । जाइ करो अब हंस उबारा ॥
सिंगलद्वीप अमरपुर गामा । अमरसिंह राजा करनामा ॥
ताको अबे चेताओं जायी । चेतन अंश जग रहे खुलायी ॥

धर्मदास साहबका सद्गुरुसे युगकमोदका वृत्तान्त पूछना और सद्गुरुका उत्तर - राजा अमर सिंहकी कथा आरंभ

(७०)

अमरसिंह बोध

ज्ञानी वचन

ज्ञानी वचन कहै कर जोरी । सत्यपुरुषएक बिनती मोरी ॥
पुरुष मोहिं पठवो संसारा । कौन नामते हंस उबारा ॥
साखी-कौन नाम हंसन कहैं, कौन देऊँ कडिहार ॥
कौन नाम नारिन कहैं, जाते होई उबार ॥

चौपाई

कालफाँस जासे कटि जावे । सहजे हंसलोक महाँ आवे ॥
इतना बोल पुरुषसे पाऊँ । तब भवसागरमें चलिजाऊँ ॥

पुरुष वचन

अहो ज्ञानी वचन सुनि लेहू । मान सिखापन शिरपर देहू ॥
सब राह दिखाऊँ मैं तोही । उबरे हंसा अधिकारी सोई ॥
साखी-बालककू बीरा कहो, तिरिया कुटिल सनेह ॥
सुरतवंत कोयह शब्द है; पुरुष नाम निज लेह ॥

चौपाई

पुरुष हुकम दीना तेहि बारा । ज्ञानी वेग जाओ संसारा ॥
मूलनाम परवाना देहू । सकल जीव अपना करि लेहू ॥
ज्ञानी चले लोकते जबहीं । धर्म धीर मिले पुनि तबहीं ॥
देखत धर्मरायमनहिं संकाना । आपन हानि मनहिं अनुमाना ॥
ज्ञानी तुम सुनो वचन हमारा । काहेको आये तुम संसारा ॥
चौदा भुवन राज लिख दीना । अब काहेको चितवन कीना ॥
आहार यही हम कहैं दियऊ । पुरुषदया अब काहेकु कियऊ ॥
राज हमारो है संसारी । मुखदुःख जीवन देहुँ अपारी ॥
ब्रह्मा विष्णु मदेश कहाई । मेरे अंस जगमाँहि रहाई ॥
हमतो रहही शून्य मँझारी । गम नहिं पावे कोइ हमारी ॥
राज भार सब उनको दियेऊ । हम न्यारे होइ देखत रहेऊ ॥

कबीर साहबका अमर पुरीमें जाना और अमर सिंहका मिलना और कबीर साहबका गुप्त हो जाना फिर राजाकी विकलताका वर्णन

बोधसागर

(७१)

ज्ञानी तुम जाओ संसारा । वचन एक अब सुनो हमारा ॥
पुरुष वचनकी तुम कहैं लाजा । ता पाछे करियो जिव काजा ॥

ज्ञानी वचन

सुनहु वचन निरंजन राई । सबै बात मैं कहुं समुझाई ॥
कोटि ज्ञान हम तुम कहैं हारा । द्वादश पंथ चले संसारा ॥
ताते चलिहै आहार तुमारा । इतना वचन धर्म कहैं हारा ॥
धर्मदास सुनियो चित लाई । धर्मधीर ऐसा ठहराई ॥
तब हम आये यहि संसारा । जीवनकाज पृथ्वी पगु धारा ॥
अमरपुरी एक नगर रह्राई । सिंगलद्वीपके माँहि बसाई ॥
तहाँ आई हम कीन्ह पसारा । पहुँचे रायके महल मैझारा ॥
षोडश रविकी ज्योति पसारा । महलन मांही भयो उजियारा ॥
अमरसिंह राजाको नामा । लागी कचहरी बहु विधि धामा ॥
देख प्रकाश उठे तब राई । नृप धाये महलनमें आई ॥
आये महलमें सतगुरु पासा । सतगुरु चरण गहे विश्वासा ॥

अमरसिंह वचन

अहो संत एक विनती करिहो । पूछत वचन क्रोध जनि धरिहो ॥
कै तुम तीन देवनमें कोई । कै परब्रह्म तुम आये सोई ॥
और गम्य नहीं चलत हमारी । सो तुम वचन कहो निरवारी ॥

सतगुरु वचन

साखी—हम आये सतलोकसे, जीवन करन उबार ॥
कालफांस निवारके, ले जाऊँ लोक मैझार ॥

चौपाई

यह कहि गुप्त भये प्रभु राई । राव परे धरनी सुरझाई ॥
बिकल भये मुख आवे न बानी । तलफत मीन जैसे बिन पानी ॥
सतगुरु बिन तलफत नृप तैसे । स्वाँति बुंद बिन चात्रिक जैसे ॥

पांच दिन पीछे फिर कबीर साहबका राजा अमरसिंहको मिलना

(७२)

अमरसिंह बोध

छन्द चर्चरी

मोहि कहा जानि दरशन दिये प्रभु गुप्त पुनि काहे भये ॥
हग पलक देत बिलंब नाही कवन दिशि कहँवा गये ॥
हमहीं अभागी कीन्ह सतगुरु दरस देके छिप रहे ॥
कैसे धरूँ मन धीर तबलग दरश तुम ना देखिहे ॥

सोरठा-भये अभाग मुहि जान, दरश देहेके छिप रहे ॥

नहीं करूँ जलपान, जबलग दरश न देखहुँ ॥

चौपाई

दिवस पाँच तब ऐसे बीता । निपट राय उर बाढ़ी चींता ॥
सुनी खबर तब पंथ चलि आये । तिन राजाको आन उठाये ॥
ले झारी मुख मंजन कीना । संत चरण चितवहु विधिदीना ॥
सतगुरु दरश दिये तेहि वारा । महल मांहि कीनो उजियारा ॥
तहां जाइ जब ठाडे भयऊ । राजा चरण धाय तब गह्यऊ ॥
हमहि सनाथ किये प्रभुराई । हम निज सेवक तुमरे आई ॥

सतगुरु वचन

ज्ञानी कहे सुनो हो राई । यमफांसीते लेहों छुड़ाई ॥
सब जग परचो कालके फंदा । बहुविधि तिनको बांधे बंधा ॥
नेम धर्म कुल कर्म लगाये । ये फंदा सब जगत फँदाये ॥
जो कोइ हंसा होय सुभागी । काल फांसते बचिहै भागी ॥
धर्मकाल ताको नहि पावे । सुरति निरति ले शब्द समावे ॥
साखी-शब्द सुरत युग बांधई, कर्म भर्म दे छोर ॥
हंस गति जब आवई, कहा करे यम चोर ॥

अमरसिंह वचन-चौपाई

हे साहेब जो आयेसु पाऊँ । तो रानीको वचन सुनाऊँ ॥
अबके सतगुरु जाहु दुराई । तो हमकूँ नहि जीवत पाई ॥

रानीका साहबकी शरणमें आना और राजाको सत्यलोक देखना

बोधसागर

(७३)

सतगुरु वचन

सतगुरु कहे सुनो हो राई । भक्ति प्रेम बस कतहुँ न जाई॥
तत्क्षण राजा चलिभे जबहीं । सात खण्डपर पहुँचे तबहीं ॥
सुस्वरकला रानि तहाँ रहेऊ । तासों राय वचन एक कहेऊ ॥
सुनो रानी एक वचन हमारा । अपने जीवका करौ उवारा ॥
साखी-राजा रानीसों कहै, मानो वचन हमार ॥
साहेब आये लोकसे, चरन सोगहो सम्हार ॥

रानी वचन-चौपाई

रानी कहै सुनो हो राजा । विलख वदन आये केहि काजा ॥
केहि कारन आये तुम खरारी । हमसे वचन कहो निरुवारी ॥

राजा वचन

रानी तुमसों कहूँ हवाला । जो सतगुरुने दीनो प्याला ॥
एक दिना लीला अस कियेऊ । महलनमें उजियारा भयेऊ ॥
तब हम तत्क्षण धाये जबहीं । महलन बीच पहुँचे तबहीं ॥
दरशन पाये भयउ अनन्दा । बारहिँ बार चरण गहि वंदा ॥
पलक ओट प्रभु गये विलायी । चार दिवस परे धरनि सुरझाई ॥
प्रोहित विप्र सब आये जबहीं । कहे समुझाइ हमकूँ तबहीं ॥
बनिया मोदी सगरे धाये । छीया सेठ चौधरी आये ॥
भाई भतीजे परजा धाई । काहे राय मरत हो भाई ॥
सबे मिलि आनिउठाये जबहीं । ले झारी भर दीना तबहीं ॥
ले झारी मुख धोवंत भयऊ । साहेब दरश बेगि तब दयऊ ॥
दरश पाय मैं भयउ सनाथा । रानी सत्य कहत हौं बाता ॥

रानी वचन

राजा बात कहत हौं तोही । सत्य कहूँ जो मानो मोही ॥
अब तुम बात कहत हो नीका । तेहि पाछे पुनिलागे नहि फीका ॥

(७४)

अमरसिंह बोध

राजा बात कहीहौ आछी । पाछे जगमें होय न हाँसी ॥

राजा वचन

रानी मानो कहा हमारा । साहेब चरण बेगि चितधारा ॥
धन जौवन तनरंग पतंगा । छिनमें छार होत है अंगा ॥
तुरत मान जो रानी लीना । संत दरश कामिनि जो कीना ॥
हाथ नारियल आरति लीना । सात खंडसे उतर पग दीना ॥
सात सहेली संग लगी जबहीं । स्वरकला पुनि उतरी तबहीं ॥
सब उमराव बैठे दरबारा । रानी आइ बाहिर पग धारा ॥
तब उमराव उठे भहराई । स्वरकला कस अचरज लाई ॥
रानी कबहु न देखी भाई । सो रानी कस बाहेर आई ॥
गजमोतिन से पूरे मांगा । लाल हिरा पुनि दमके आंगा ॥
आधा मस्तक कीन्ह उघारा । मानिक दमके झलाहलपारा ॥
तब रानी सतगुरु पहुँ आई । नारियल भेट जो आनचढ़ाई ॥
रानी थाल हाथमें लियऊ । करत निछावर आरतिकियऊ ॥
साखी-रानी ठाड़ि मैदानमें, सुनो संत धर्मदास ॥
सुरजकिरन अरु रानिको, एकही भयो प्रकाश ॥

चौपाई

लगिचकाचौधि अधिक पुनि जबहीं । देखि न जाय रानी तन तबहीं ॥
राजा रानी दंडवत कीन्हा । ऐसी भक्ति हृदयमें चीन्हा ॥
दोउ कर जोरि राय भयो ठाढा । उपज्यो प्रेम हृदय अति गाढा ॥
साहेब हमपर दया जो कीजै । भुवन हमारे पांव जो दीजै ॥
तबहीं हम मंदिर महाँ आये । पलंग बिछाय तहाँ बैठाये ॥
झारी भर तब राजा लीना । चरनामृतकी युक्ति कीना ॥
राजा ऊपरते डारत पानी । चरण पखारे स्वरकला रानी ॥
चरण पखारि अँगोछा लीना । जैसी भाव भक्ति उन कीना ॥

बोधसागर

(७५)

चरणामृत तब शीश चढावा । लेचरणामृत बहु विनती लावा ॥
जैसी भक्ति राव जो पावा । धरमदास तोहि बरनिसुनावा ॥

धर्मदास वचन

और कहो राजाकी करनी । सो साहेब तुम भाखो वरनी ॥

सतगुरु वचन

तुरतहि तब सब साज बनावा । हमको सो अस्नान करावा ॥
हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनेउ सार धरे दोड थारा ॥
अधर थार भूमिते रहई । रानी तबहीं चितवन करई ॥
रानी कहे रायसों तबहीं । लीला निरखो गुरुकी अबहीं ॥
अधर अग्र जिनका पनवारा । महा प्रसादते आइ अपारा ॥
नर नारी तब ठाढे भय आई । महा प्रसाद अब देहु गुसाई ॥
तब हम दीनेउ तहां प्रसादा । पाय प्रसाद भई तब यादा ॥
पुरुषलोककी भई सुधि तबहीं । ज्ञानी आय चेताये भलहीं ॥
हम भूले तुम लीन चेताई । फिरि न विगोवे आइ यमराई ॥
या यम देश कठिन है फांसी । काम क्रोध मद लोभविनाशी ॥
साखी-काम क्रोध अरु लोभ यह, त्रिगुन बसे मन माहि ॥
सत्य नाम पाये विना, जमते छुटको नाहि ॥

चौपाई

श्रवन लागिनिलाम सुनाई । तुरत राय कह चले लिवाई ॥
पहुँचे जाय सुमेर पहारारा । पुर बैकुंठ रच्यो जेहि ठारा ॥
जय विजय जो तहां रहेऊ । तेहि साहेबको देखत भयेऊ ॥
देखत पौरिया ठाडे भयऊ । आदर करि साहेबको लयऊ ॥
कहे पौरिया विनती लाई । भूपति लोक कहाँको जाई ॥
तब हम पौरियन सो कहेऊ । एक जिव सत्यनाम जो गहेऊ ॥

१ इरे !

(७६)

अमरसिंह बोध

पुर वैकुंठ दिखायो चाहीं । ताते हम आये यहि ठाहीं ॥
तहाँते हम चले रिगई । पहुँचे चित्रगुप्तके ठाई ॥
लगयो दरबार चित्रको जहँवा । पुण्य पापको निबेरो तहँवा ॥
देखि साहेबको ठाडे भयऊ । हाथ जोरिके बिनती कियऊ ॥
डार सिंघासन बैठक दीना । तब साहेब सो बिनती कीना ॥
धन्य आजबड भाग्य हमारा । साहेब आये इहाँ पग धारा ॥
आये गुप्त साहेबके पास । विनति करत बहुभये उदासा ॥
हे साहेब हम पूछत तुमपै । कह लाये भूपन कहु हमपै ॥
यह तो हमरो चोर कहाई । अधम पापि राजा यह आई ॥
तब साहेब गुप्तसे कहेऊ । लीखनी तुमारी देहि चुकोई ॥
यह सुनि गुप्तते रेसियाना । हमरी लिखाई बाद बखाना ॥
गुप्त कर्म करे नर कोई । सो निज चोर हमारा होई ॥
सारखी-प्रकट करम जो करहिं नर, सोई चित्र लिख लेहूँ ॥
भूपतिलोक कहावहीं, पाप पुन्य कर येहु ॥

चोपाई

तब साहेब एक जुगति बनाई । पारसपथरी तहाँ दिखाई ॥
अनेक कर्मसे लोहा भरिया । पारस भेटत कंचन करिया ॥
साहेब गुप्तसे कहे समुझाई । इनकू लोहा करो रे भाई ॥
लोहासे जो कंचन कियेऊ । यहि विधि हंसा निरमल भयऊ ॥
इतनी सुनि यम भये अधीना । फेर न तिनसे बोलन कीना ॥
अहो जमराय वचन सुनु मोरा । कही करो तो करहु चोरा ॥
राजाकू ले जाओ भाई । इनकू यमपुरी लाओ दिखाई ॥
तबयमराज हुकुम करिदीयऊ । दूत दोय राज संग गयऊ ॥

१ चित्रगुप्त ।

नरकका वर्णन

बोधसागर

(७७)

दूत रायको चले लिवाई । पहुँचे जाय यमपुरी मांही ॥
त्रास जीवको देतहै जहँवा । देखत राजा मन पछितावा ॥

नरकको वर्णन

एक तो कोल्हू मांहि पिराई । ऊंधे मस्तक एक झुलाई ॥
एक तो बांध खंभसू ताते । चीसे देत बहुतही भांते ॥
एक जीवको खात चवाई । भागत फिरे वचत नहिं भाई ॥
एक जीव कुंडमहिं डारा । मोगरी झिरपै मारे अपारा ॥
कुंड चौरासी बने है ति भाई । भांति भांति यम त्रास दिखाई ॥
ऐसे त्रास जीवनको दियऊ । देखत राजा व्याकुल भयऊ ॥
एक कुंड तो रुधिर भराई । दूजा कुंड तो पीब कहाई ॥
त्रीजो कुंड हि सूत्र भराई । योजन एक ताकि गहराई ॥
योजन चारकी है चकराई । योजन चार लगि गन्ध उडाई ॥
परे जीव ता मांहि अपारा । चौथा कुंड नरककी धारा ॥

साखी-परे जीव ता कुंडमें, कोइ अब हमहिं उबार ॥
मारत मोगरी शीरपर, बहुतहिं करत पुकार ॥

चौथाई

पांचैं कुंड सो अग्नि कहाई । बहुत जीव तहँ जरहीं भाई ॥
योजन लक्ष है ता गहिराई । पांच लक्षकी है चकराई ॥
करत पुकार तहँ जीव अपारा । यहि अवसर को उहमहिं उबारा ॥
राजा यमपुरी देखि बनाई । कहत न बने रहे शिरनाई ॥
झूठी वचन कहत है जोई । जीभ्या काटिलेत पुनि सोई ॥
झूठी बांह देखाई जो कबही । काटे बांह यम टूंठा करही ॥
झूठी साख भरे जो भाई । विषधर ताके जीभ लगाई ॥

१ अच्छी तरहसे ।

(७८)

अमरसिंह बोध

बिन अपराध मारे जो कोई । बहुत मार तेहि ऊपर होई ॥
स्वपुरुषतजिपरपुरुषसंगजावे । अगिनपुरुष तेहिसंग मिलावे ॥
पुरुष होय नारी कहैं त्यागे । नारी और सो मन जो लागे ॥
अग्निनारि तेहिसंग मिलावैं । यहि विधिजीवनत्रास दिखावैं ॥
एक एकको त्रास दिखावैं । हाथ छूरी ले कण्ठ चलावैं ॥
एक जीवको ठाडे कीना । काग गीधकोहुकमकरि दीना ॥
काग गीध नोचत हैं भाई । भागत फिरे त्रास अधिकाई ॥
जे नर नारी मदिरा पावैं । तत्त तेल पुनि ताहि पिलावैं ॥
संत साधुकी निंदा करई । जूठी साख पंचमें भरई ॥
ताको फल पावत है सोई । सब अँगमें कुछ पुनि होई ॥
ऐसी यमपुरी देखी बनाई । देखत राजा मन पछताई ॥

साखी-देखी राजा यमपुरी, मनमें भये हुशियार ॥
साहेबसो विनती करे, हमको लेउ उबार ॥

चौपाई

नृप अरु दूत पहुँचे तहवाँ । चित्रगुप्तको दरबार रहै जहवाँ ॥
जहाँ बिराजे ज्ञानी सिंहासन । गहे चरण तहाँ नृपति ततक्षण ॥

राजा बचन

तब राय चरण परस्यो आयी । अबकी साहेब लेहु बचाई ॥
यह यम देश कठिन है गांसी । सुरनर सुनि परे यमफांसी ॥

साखी-सुनि कथा जब नरककी, धर्मदासभय मान ॥
सतगुरु सो कहने लगे, औरौ कहहु बयान ॥

सतगुरु बचन-चौपाई

कहैं कवीर सुनो धर्मदासा । नरक वृत्तान्त करौ परकासा ॥
धर्मराय अस बाजी लावा । पाप पुण्य दोउ कीन उपावा ॥

बोधसागर

(७९)

पाप पुण्य रचि जीव फँसाया । जो जस करै सोतस फल पाया ॥
करै पाप तेहि नरक भुगतवैं । करै पुण्य तेहि स्वर्ग पठावैं ॥
कर्महिं भुगुति गरभमें जावै । यहि विधि कालजीव फँदावै ॥
सुनु धर्मदास नरककी बाता । सबही तुमसन कहूं विरुयाता ॥
सकल सुनहु यमपुर इतिहासा । अद्वुत सुनि होय जीव त्रासा ॥
ठीका पुरै जब जिवकी भाई । धर्मराय मन चिन्ता आई ॥
आयसु किंकर गण तब पावैं । हुकुम चित्रगुप्त ताहि सुनावैं ॥
ते जग आवै आयसु पायी । जीवहिं पकरि तहाँ ले जायी ॥
लै जाँहिंसो यम सदन मंझारा । करै ताहि यम सन्मुख ठारा ॥
रवि सुत तहाँ सिहोंसन बैठे । यमगण तहाँ विराजत बैठे ॥
काल सेन तहाँ सबहि विराजै । शास्त्र प्रवर्तक सुनिवर छाजै ॥
धर्मशास्त्र के जे जे करता । सबही देखै जो जिव मरता ॥
व्यास पराशर आदिक सबहीं । पहुँचै यमपुरितनत्यागैतबहीं ॥
ये सब यम सहाय सो करहीं । पाप पुण्यकर लेखा धरहीं ॥
सबहिं मुसाहिब कालके आहीं । निज नैनन हम देखत जाहीं ॥
धर्माधर्म विचारत नीको । सबमिलिन्याय करत करनीको ॥
चित्रगुप्त जब बही सुनावै । धर्म राय कहिके समुझावै ॥
जिन २ पाप किया जग आयी । तिनकर लेखा जब सुनि पायी ॥
ते सुनि दूतन कहत जनायी । यथा योग्य भुगतावहु जायी ॥
जब कोई जीव सुकर्मा आवै । शुचि सुन्दर दूतन तन धावै ॥
रविसुत कहविलसाओ स्वर्गा । अर्थ धर्म अभिमत सुखवर्गा ॥
यही सुकृत जब श्रुतिपथ आही । बहुत समुझायौ हम तुव पाही ॥
साखी पापी मनुषहिं पाइ यम, दूतन कहे रिसाइ ॥
रौरवादिक की यातना, इनाहिं भुगावौ जाइ ॥

(८०)

अमरसिंह बोध

चोपाई

सुनहिं वचन यमगण यमकेरा । त्रास दिखावहिं नरहिं घनेरा ॥
लोह दण्ड सुद्वर हनि कोपै । रौरवादि महाँ तिनही तोपै ॥
यहि विधि यम करहिं विलासा । अब विस्तर ते सुनु धर्मदासा ॥
बहु विधि विद्या जग महाँ पावै । वेद बिचारि जो ब्रह्म समावै ॥
आतम ब्रह्म एक करि जाने । ब्राह्मण सो तेहि वेद बखानै ॥
ऐसे नर कहैं जो कोइ मारै । ब्रह्महत्या तेहि वेद पुकारै ॥
ब्रह्मरूप ब्रह्मविद जाने । तेहि वधन कहैं ब्रह्मवध अनुमानै ॥
जानि ब्रह्म वध पाप कराला । तब दूतन कह यम ततकाला ॥
कुंभीपाक माहि लैडारौ । सुद्वर परिघ मार बहु मारौ ॥
इन रिस करि मारचो महिदेवा । सुनी न मम अनुशासन भेवा ॥
रौरव माँहि गिरावहु घाती । काहू कहै सुनौ नहिं बाती ॥
जो तिय मारै गर्भ गिरावै । तेल यंत्र तनु तासु पिरावै ॥
जिन गुरु हने हने निज स्वामी । छुरा धार ते पीडित नामी ॥
जे विश्वासघात नर करहीं । ते नर कालसूत्र महाँ परहीं ॥
बाल वृद्ध कर हरे जो प्राना । तस तेल महाँ पचत अयाना ॥
परदारा परक्षेत्र जे हरहीं । जे नर परपुर सीम विगरहीं ॥
ते गुरु पाप नरक महाँ पचहीं । हाहाकार शब्द तहाँ मचहीं ॥
चकन ते तिनके तनु छेदैं । सुद्वर परिघ शूल बहु भेदैं ॥
गम्यअगम्य विचार न करहीं । खाज अखाज नहीं चित धरहीं ॥
तिनके तन को करकच छेदैं । बहुत भांति चोचनसों भेदैं ॥
साखी-चोर वृत्ति करि जो जीवै, करै जो परसे द्रोह ॥
झूठ बोलि अरु मद पिवै, पर निन्दा करै जोह ॥
तिन पापिन कहैं यमविकारा । ठौर भयंकर माँझ तेहि डारा ॥
जे नर कन्यादान मँझारी । विघ्न करत रौरव अधिकारी ॥