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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

धर्मदास साहबका सद्गुरुसे कालके जीवोंके मारनेके विषयमें प्रश्न करना और कबीर साहबका उत्तर

सत्यकबीराय तमः

यस्योपदेशमाराध्य नरो मोक्षमवाप्नुयात् ।
तं कबीरमहं वन्दे मनोवाक्यायकर्मभिः ॥

अथ श्रीबोधसागरे

चतुर्थस्तरंगः

श्रीग्रन्थ भोपालबोध प्रारंभः

धर्मदासवचन चौपाई

धर्मदास कहे बन्दी छोरा । कैसे जीवन मारत चोरा ॥
केहि विधि जीवन मारत आई । साहिब सो मोहि भाष सुनायी ॥
कारण कौन मारत यम जीवा । मारन काल कौन है नीवा ॥

सतगुरु वचन

सद्गुरु कहै अंश सुनु वानी । महा कालकी कहौं निशानी ॥
धर्मराय आज्ञा जब करई । तबहीं मीच पृथ्वी पग धरई ॥

धर्मराय वचन

भयी मृष्टि बहुत अधिकार्ई । पृथ्वी भार न जाय सहाई ॥
ताते मीच पृथ्वी तुम जाऊ । जीवन धरि हम पर ले आऊ ॥
आनो जीव हमारे पास । जाहु मीच पृथ्वी करु बासा ॥
पवनरूप घट जाइ समाओ । जीवन जाय बाँधि ले आओ ॥
खांसी जूडी ताप तिजारी । काम क्रोध होउ रोग अपारी ॥

कबीर साहबका जालंधर देशमें राय भोपाल के घर जाना

( ६ )

भोपालबोध

लोभ मोह भ्रम फाँस अपारा । यह नहीं मर्म लखै संसारा ॥
यहि फन्दा जग सबहिं फन्दाओ । विरले हंस सुकृत बन्दाओ ॥
साखी-यहि विधि जगमें जाइके, जीव लाउ हम पास ॥
फन्दा डारहु जीव पै, होहु मीच दुख रास ॥

चौपाई

यहि विधि काल जब आज्ञादीना । चले यमदूत सब साज सजीना ॥
उत पुरुष आज्ञा मोहि दीन्हा । जीव सुक्तावन कहै पठावन लीन्हा
कहे पुरुष सुनु ज्ञानी बाता । काल करे अब जीवन घाता ॥
घात करी सो भक्षण करिहै । बहुरि जीव भौसागर परि है ॥
काल दुष्ट बहु जीव सतावै । सारशब्द विनु मोहि न पावै ॥
याते जगमहँ अब तुम आओ । जीवहिं चिताय लोक कहँ लाओ ॥
आज्ञा मोरि लेहु सहिदाना । जाइ जगत जीव लाओ निदाना ॥
साखी-सुकृत जाहु संसार में, उल्टी राह चलाउ ॥
शब्दसार जीवन कहो, काल हंस सुक्ताउ ॥

चौपाई

पुरुष आज्ञा हम शिर मानी । करि प्रणाम तब जगत पयानी ॥
देश जलंधर राय भोपाला । गयउ तहां जिन्दाके हाला ॥
जाई पौरिमें ठाढ रहायी । कह्यो पौरिया बहुत चितायी ॥
राजहिं लाउ हमारे पास । दर्शन करै कर्म नृप नासा ॥
लागे कुंजी कुलुफ किवौरा । बहुत लोग बैठे शठिहारा ॥
कोइ कहै न्याय जिन्द चाहै । कोइ कहै बटपार यह आहै ॥
कोई कहै मारि यहि खेदो । निर्गुण भेद तिन्है नहिं भेदो ॥
चारि पहर तब रैन बितावा । भयो भिनसार भोर हो आवा ॥
तब हम चरित दिखावन लागे । फूटि कपाट भये दोह भागे ॥

राय भोपालका कबीर साहबको क्लेश करने की सलाह करना

बोधसागर

( ७ )

सबै कँगूरा भुइ खसि परेऊ । ज्ञानी चली राय पहुँ गयऊ ॥

साखी-चकित सकल पौरिय, पाछे लगि सब धाय ॥

जहाँ राय भोपाल हैं, तहाँ पोरिया जाय ॥

चौपाई

करत गोहार पौरिया जाई । मार मार बहुत हकराई ॥

राय भोपाल बैठि जहाँ राजे । गये पौरिया तहाँ सब भाजे ॥

कीन्ह सलाम दोई कर जोरी । यह जिन्दा बटपार बडचोरी ॥

कहैं पौरिया पौर उचारो । तुरत बुलाओ राय यहि बारो ॥

जिन्दा वचन नहीं हम माना । बीत रैन भये भोर सुजाना ॥

मंत्र एक जिन्दा तब करिया । फूट कपाट कँगूरा गिरिया ॥

तब जिन्दा आयो महाराजा । हम आये तेहि पीछे भाजा ॥

ना जानौ कौन यह आही । होय बटपार धसा घर माही ॥

साखी-हो राजा महाराज मम, कहचो सत्य हम बात ॥

तत्क्षण जिन्दा मारहु, नातौ सब पर घात ॥

चौपाई

सुनो पौरिया कहे अस राजा । सुनिये वेद करौ तव काजा ॥

विप्र बुलाय सुनो मतिमाना । करिये तबै विवेक सुजाना ॥

आज्ञा वेद होय तब मारा । नहिं तो जिन्दा कहा बिगारा ॥

एतिक वचन राय सुख बोला । साहब आसन तवहीं डोला ॥

तत्क्षण हम अस लीला कीन्हा । रायमहल सोने करि दीन्हा ॥

कंचन कपाट रतनकी पांती । विपरीत बने खम्भ बहु भांती ॥

बने कँगूरा रतन रसाला । चकित राजा भये भोपाला ॥

साखी-भयो विवेक मन रायके, देखत मन पतियाय ॥

कौन पुरुष तुम समरथ, मोहैं कहैं दरश दिखाय ॥

राजाके अधीन होकर सद्गुरुका हास्य प्रकटना

( ८ )

भोपालबोध

ज्ञानीवचन चौपाई

सत्य पुरुषके हम शठिहारा । जीवन काज आये संसारा ॥
पुरुष लोक सत्य परवाना । ताका मरम कोई नहि जाना ॥

साखी-हो राजा भोपाल सुनु, चीन्हौं यमका जाल ॥

शब्द हमारा परखहु, नातो पैहो काल ॥

चौपाई

छोडहु राम नाम हित जाना । सद्गुरु बचन गहो मतिमाना ॥

अलख निरञ्जन छाडो देवा । भ्रम तजिकरु सतगुरुकी सेवा ॥

सुमता होय करो दृढ करनी । पहुँचो लोक पुरुषकी शरनी ॥

आवागमन रहित होय जाऊँ । जो प्राणी सत्यगुरु कहैं पाऊँ ॥

पुरुष अवाज जाव उबराई । ताते दर्शन दीन्ह तोहि भाई ॥

छन्द-करहु राजा भक्ति दृढ होय छोडु राजा गुमान रे ॥

नारि पुरुष पुत्र पुत्री लेहु हिलिमिलि पान रे ॥

पुरुष नाम ले करहु आरती जीव तृण तुराय के ॥

पुरुष अंक ले पाव वीरा काल गहे नहि आयके ॥

राजा भोपाल वचन चौपाई

तब राजा बन्दे दोनों पाई । करगहि महलन लैं जाई ॥

धन्य भाग मोहि दर्शन दीना । अधमजीव आपनकरि लीना ॥

कुटिल कठोर अधम अघपापी । दर्शन दीन छुटै त्रयतापी ॥

महामोह तम पुञ्ज अपारा । वचन तुम्हार कीन रविधारा ॥

उठो सुधर्मा मन चित लायी । साहब चरण पखारहु आयी ॥

छन्द-गुरु ब्रह्म रूप प्रकाश अघहर पुंज तमहिं विदारनं ॥

मुक्ति दाता अखिल ज्ञाता कोटरवि छवि वारणं ॥

सोई रूप धरि जगत प्रगट होय जिन दीन पतितन दुख हरे ॥

भवसिन्धु ताप बुझाय शीतल जीव गहि आपन करै ॥

रानीका सद्गुरुके अधीन होना

बोधसागर

( ९ )

सोरठा-निज मन सुकुर सुधार, गुरु पदपंकज उर धारिए ॥
मिटै सकल अँधियार, अस्थिर घर तब पाइए ॥

चोपाई

राजा आज्ञा रानी मानी । साहब चरण पखारे आनी ॥
कश्चन झारी ले जल धायी । साहब चरण पखारी आयी ॥
राजा रानी चरण धुवाये । अँचरन रानी तबहि पुछाये ॥
चरण हिये मन्थे पर लायी । चरणाभूत सबही मिलि पायी ॥
कीन्ह दण्डवत पलपल रानी । साहब दरस दीन्ह भल आनी ॥

रानी वचन

साखी-हमहिं जनि भार चढ़ावहु, हमरे नाम कबीर ।
अगम निगम वह पुरुष है, जे गहि लागो तीर ॥

रानी वचन-चोपाई

सुनिके रानी वचन पतियानी । तब साहब सों बिननी ठानी ॥
और पुरुष जानो नहिं नीका । तुम सतपुरुष आहु यहि जीका ॥
तुमहि पुरुष आहु दृढ़ जानी । और पुरुष नाहीं मन मानी ॥
रानी कहै सुनो महाराजा । साहिब आये तुमरे काजा ॥
रानी कहै बेगि गहु चरना । काल अजापी है निज मरना ॥
आये पुरुष हमारे पास । हमरे मनकी पूजी आसा ॥

रानी वचन

सुनहु राय रानी निज वचना । यह तो जाल कालकी रचना ॥
मेटहु काम कोध हंकारा । माया मोह तजौ संसारा ॥
ज्ञान हेतु दृढ़ करनी करई । आवागमन का पूग परई ॥
तजि संसार शब्द कहँ ध्याओ । गुरुगम पुरुष नाम चितलाओ ॥

साखी-ना फिर जन्मे जोइनि ना, स्वर्ग नर्क को जाय ॥
सो हंसा रहित भये, अजर अमर घर पाय ॥

( १० )

भोपालबोध

यह तो माया जाल है, कठिन बीर झतवाल ॥
जीव शब्द न मानई, यक दिन खेहे काल ॥
मोह नदी विकराल है, कोई न उतारे पार ॥
सतगुरु केवट साथ ले, हंस होय यम न्यार ॥

चौपाई

कोटि जुहार होत नित तोहीं । कैसे कै लौ लावहु मोहीं ॥
कैसे छोड़ो राज गुमाना । किमि छोड़ो पाखण्ड अभिमाना ॥
कैसे छाड़हु राज बड़ाई । कैसे छाड़हु सुख चतुराई ॥
बैठि सभा बोलहु हँसि बाता । कुँवर पचास संग निशि राता ॥
बैठि महल महाँ खेलहु सारी । कामिनि के संग सदा बहारी ॥
छुटे न नाति कुटुम्ब की आशा । छुटे न कश्चन भोग विलासा ॥
सारखी-यह सुख कैसे छोड़िहो, हम तो कथे निरास ॥
सैन चैन जब छोड़हु, चलहु पुरुषके पास ॥

राजा भोपाल वचन

कहै राय सुनिये गुरुदेवा । मोकहाँ राखु चरन की सेवा ॥
मस्तक मोर दीजिये हाथा । दम अघ करमी होयँ सनाथा ॥
छोड़ो सहस बीस मैं हाथी । अब मैं चलौं तुम्हारे साथी ॥
अब हम दौलत छोड़ैं तुर्गंगा । छोड़ों सकल कामिनी संगा ॥
देह गर्व औ राज गुमाना । छोड़ैँ सकल भक्ति मनमाना ॥
जब तुम अमृत वचन पुकारा । तेहि क्षण छूटा सकल विकारा ॥
छन्द-दया निधान करूणा विलोकहु महादारुण दुःख दहै ॥
मैं अधम जीव अघोर अकरमी पतित पावन पद गहै ॥
तुम ज्ञान घन विज्ञान आगर धर्म कंटक मर्दन ॥
तुव नाम अमोल समरथ करहु दया निर्धन ॥

राजाका आरती चौका करके नामका उपदेश लेना

बोधसागर

( ११ )

सोरठा-अविरल भक्ति तुम्हार, पूरे भागते पाइये ।
विनवों बारम्बार, पुरुष दरश करवावहू ॥

ज्ञानी वचन-चौपाई

नाम पदार्थ देउँ मैं तोहीं । तैं राजा चीन्हा दृढ मोहीं ॥
पुरुष नाम एक यज्ञ कराओं । जेहि नाम ते हंस बचाओं ॥
जरी केर एक चन्दोवा तानो । कञ्चन केर सिंहासन आनो ॥
दिवालगिरी लागे जरकेरा । मोतिन झालर लागु घनेरा ॥
मोतिन लै भर थार धराऊँ । तापर आरति जोति लसाऊँ ॥
कंचन कलसा पाँचो वाती । झारीजल हीर लै पाती ॥
पूंगी फल औ स्वेत मिठाई । चन्दन पान धरो तहैं लाई ॥
कदलीफल उत्तम तहैं जानो । मेवा अष्ट युक्त प्रमानो ॥
कदलीपत्र कपूर सुगन्धा । आमपत्र लै चहु दिशि बन्धा ॥
सात हाथ वस्तर ले स्वेता । पुष्प गुलाब कहौ मरु केता ॥
नौ रतन लै थार धरायी । मनि मानिकके मध्य रहायी ॥
यह सब विधि जब दीनबतायी । राजा सबही लीन सजारी ॥
चौका बैठे सतगुरु जबहीं । रानी गाय चरण गहे तबहीं ॥
सवा लाख दीपक तहैं बारी । बहु आनन्द शब्द विस्तारी ॥
सब मिलि हाथ नारियल लीन्हा । आगे धरा दण्डवत कीन्हा ॥
राजा तृण धरे मुख माँहीं । भये अधीन बांधि कर आहीं ॥

राजा भोपाल वचन

तुम दीननके आहु दयाला । कृपा कीन्ह मोहि प्रतिपाला ॥
अब जनि मोसन करहु दुराई । अपने कर लीजै सुकताई ॥
यहि संसार नाहिं मम काजा । दारुण महा काल है राजा ॥
अब तुम आपन लोकदिखाओ । महा पुरुष के दर्श कराओ ॥

राजाको लेकर कबीर साहबका सत्यलोक को जाना

( १२ )

शोपालबोध

सत्गुरु वचन

नौ नारी मिलि विन्ती करई । कुवर पचास ठाढ़ तहँ रहई ॥
बेटी एक सुरजकी जोती । ताहि लिलार पुहे जनु मोती ॥
साहब चरण धरा तिन आई । अब हम चरणछोड़ि नहिं जायी ॥
कीन्ह आरती नरयर मोरा । सकल जीवके तिनुका तोरा ॥
सुकृत अंश बुलाये ज्ञानी । पुरुष दरश कर राजा आनी ॥
लै अमरावहु लोक द्वारा । पल महाँ लाय ठाढ़ बैठारा ॥
दिना चार लगी राख्यो काया । वेगी जाय पुरुष पहाँ आया ॥
लिखिलिखिपान सबन कहँदीना । सकलो जीव वन्दन कीना ॥
जेते जीव परवाना पावा । तेते हंसा लोक सिधावा ॥
काया छोड़ि हंस चले आगे । सत्य सुकृत के चरनन लागे ॥
लागी डोर पुरुषके पास । तवै दूत यक कियो तमाशा ॥
सुकृत संग हंस सब जेते । आये दूत कला धरि तेते ॥
छाप तिलक तब विरचि बनायी । मारगमाँहि ठाढ़ भय आयी ॥
आओ हंस पुरुषके पास । नातो होवै ठाट विनाशा ॥
बोले दूत हंस कहँ जायी । हम गुरुज्ञानी तोंहि सहायी ॥
हमरे संग चलो हो राजा । हमरे शरण काल उठि भाजा ॥
हंस रूप तुम धरि बटपारा । हम नहिं फन्दा परै तुम्हारा ॥
सुकृत कहै हंस चलि आज । हमरे संग काल नहिं पाऊ ॥
बाएँ अंग कालका धारा । दहिने पाँजी अहै हमारा ॥
ताहि द्वार होय सुरति लगाओ । बेगि दरश पुरुषके पाओ ॥
सुकृत सागर पहुँचे जायी । अहो हंस तुम लेहु नहायी ॥
सकल हंस मिलि पैठि नहावा । निरखै द्रौप द्रौपका भावा ॥

बोधसागर

( १३ )

देखहिं लोक लोककी रचना । तब टेके सुकृतके चरना ॥
बैठे लोकमहँ हंस निहारा । जहँवाँ पुरुष आप विस्तारा ॥
सकल हंस तहँ बैठे पांती । सोरह रवि हंसनकी कांती ॥
पुहुप सेज सब हंस विराजा । तहँवाँ बुझाय नहिं रंक औ राजा ॥
कंचन भूमि देख अति शोभा । बरनौ कहा हंस तहँ लोभा ॥
राजा कीन्ह दण्डवत जबहीं । रानी पुत्र कीन्ह पुनि तवहीं ॥
अब नहिं भवमहँ जाऊ लिवायी । अति आनन्द बहुत सुखपायी ॥

सुकृत बचन

सुकृत उत्तर कहै समझायी । चलू राय गहिर जनि लायी ॥
जो तुम गहर लगावहु राजा । विनशे ठाट तब होय अकाजा ॥
तब पछतैहो राय भुपाला । ततक्षण बेगि चलो यहि हाला ॥

राजा भोपाल बचन

विनशे ठाट होय जरि छारा । अब नहिं छोड़ब चरण तुम्हारा ॥
ऐसा लोक छोड़ि नहिं जायब । बार बार तुहि माथ नवायब ॥
छन्द-राजा करै बहु बीन्ती तुम दीन बन्धु दयाल हौ ॥
हंसन नायक परम लायक काटिया फन्दा काल हौ ॥
चरण शरण आधीन समरथ शरण राखो आपनो ॥
दास जानि बन्ध छोरो काल तेहि नहिं पावनो ॥

सोरठा-अब हम शरण तुम्हार, दास जानि दाया करो ॥
आयो पुरुष दरबार, आपन कै प्रतिपालिये ॥

बचन-चौपाई

एती विन्ती राजा ठानी । ज्ञानी देश जलन्धर जानी ॥
भवसागर सो ज्ञानी आये । पुरुष दरश कीन्हा तब जाये ॥
दिना चार ऐसेहि चलि गयऊ । राजा खबरि कोई नहिं दयऊ ॥

( १४ )

भोपालबोध

तबै पौरिया रावपहँ जायी । महल देखि कोइ नाहिँ रहायी ॥
कहँवा राजा कहँवा रानी । कहँवा पुत्र कुवँर रजधानी ॥
कहँवा बेटी है चन्द्रावति । ताकर रूप बरनो कौनी गति ॥
कहँवा रानी कामसुंगगा । परिमल अंग बसत जेहि संगगा ॥
रोवत गयउ पौरिया द्वारा । जाय सबन सों कीन्ह पुकारा ॥
जाति कुटुम्ब सब देखन आये । जिन राजा ते बहु सुख पाये ॥

साखी-देखत अमिहत राजाकी, भयी अचम्भो बात ॥

रोवत कुटुम्ब दीवान मिलि, किन यह कीन निपात ॥

नगर लोग व्याकुल भये, घरघर रोवन लाग ॥

की यहि राजा मारिया, सबहिन केर अभाग ॥

चौपाई

कहै पौरिया सुनो दिवाना । तुम हम बूझो हम सब जाना ॥
जिन्दा एक नगरमें आया । तासों राजा कौन ऊँकाया ॥
कह्यो राय मैं बहुत चिताई । तुरतहिँ जिन्दा कहँ मरवायी ॥
राजा बात नहीं पतियावा । वच सुनि राजा मोहि रिसावा ॥
राजा कहै मुक्तिकरदाता । अस नहिँ जाने करै निपाता ॥
मोर कहा माना नहिँ भाई । जस कीन्हा तस फल नित पाई ॥

साखी-वचन पौरिया सुनतही, विकल भये सब कोय ॥

आज गरासे राय कहँ, काल आसै लोय ॥

चौपाई

नगर लोग तब कीन्ह विचारा । सब मिलि भागौ करौ सम्हारा ॥

भूलि अन्य शब्द नहिँ चीन्हा । मारन काल तिहुँ पुर दीन्हा ॥

साखी-सुकृत अंश न पाइया, अन्धा गये भुलाय ॥

धन्य राम भोपाल है, गहे शब्द चित लाय ॥

मंत्रि आदिका राजाको महलमें न देखकर पश्चात्ताप और शोक करके भयसे नगर छोड़कर भाग जाना

बोधसागर

( १५ )

छन्द-गये राजा लोक कहैं तजिया सब मान गुमान हो ॥
इमि हंस धर्मनि जो मिले तुम देहु ताको पान हो ॥
कहै कबीर जो शब्द मानै सकल तजि नामे गहै ॥
अपवर्ग निश्चय ताहि कहैं नहि पला पकडत काल है ॥
सोरठा-जो हंसा इमि होय, शब्द सार तासों कहो ॥
काग चाल तिन खोय, हंस चाल गहि लोक लो ॥

इति श्रीप्रबंधभोपालबोध समाप्त

इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससम्वादे भोपालबोधवर्णनो
नाम चतुर्थस्तरंगः


इति

श्रीबोधसागरान्तर्गत
ग्रन्थभोपालबोध

समाप्त

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीगुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-जगजीवनबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदासः,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्गः, बम्बई-४०० ००४

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

श्रीगणेशाय नमः

A faint, stylized illustration of Lord Ganesha seated on a lotus. He is depicted with four arms, holding a small object in his hands. Above him is a traditional umbrella (chhatra). The entire illustration is rendered in a light, monochromatic style, appearing as a watermark or a very faded print.

श्रीगणेशाय नमः

धर्मदास साहबका गर्भविषय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर

सत्यकबीराय नमः

सत्यं शुद्धं गुणातीतं कंजपर्णसमुद्भवम् ।
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञं सद्गुरुं प्रणतोऽभ्यहम् ॥

अथ श्रीबोधसागरे

पंचमस्तत्रंगः

ग्रन्थ जगजीवन बोध

( गर्भ चिंतावनी )

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास कह सुनहु स्वामी । कहो गरभकी अन्तर्यामी ॥
कैसे जीव गरभ में आवे । कैसे जीव जठर दुख पावे ॥
कैसे जीव परवशै भयऊ । कैसे इन्द्री देह बनयऊ ॥
कैसे जीव अपने पद परसे । कैसे जीव समरथ पद परसे ॥
कैसे जीव कौल बँधावे । कैसे साहब दर्शन पावे ॥
सो सब भेद कहो गुरु ज्ञानी । घट भीतरका भेद बखानी ॥

सतगुरु-वचन

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । तुम घट भली बुद्धि परकासा ॥
प्रथमें सत्य नाम गुण गाऊँ । घट भीतर का भेद बताऊँ ॥
सबही जीव गर्भ में जावैं । कौल बान्ध कै बाहर धावैं ॥
चूके कौल गरभ का भाई । बारम्बार गरभ में जाई ॥
नौ नाथ सिद्धि चौरासी भारी । उनहुँ देह गरभमें धारी ॥

गर्भोत्पत्ति वर्णन

( २२ )

जगजीवनबोध

नौ अवतार विष्णु जो लीन्हा । उनहूँ गरभ वसेरा कीन्हा ॥
तेतिस कोटी देव कहाये । गरभ वास महाँ देह बनाये ॥
जोगी जंगम औ तप धारी । गर्भवास में देह सवारी ॥
गर्भ वास तब छूटे भाई । जब समरथ गुरु बाहँ गहाई ॥

गर्भोत्पत्ति वर्णन

नारि पुरुष बांधे संयोगा । कामबाण लगि देहसुख भोगा ॥
सप्त धातुका अंग बनाया । जिह्वा दांत सुख कान उपाया ॥
हाथ पावैं रु शीस निर्माया । सुन्दर रूप बनी बहु काया ॥
नख शिख काहू नर बहु कीन्हा । दशही द्वार युक्ति करि लीन्हा ॥
दश द्वार नौ नाडि बनायी । ऐसे सबतर बन्ध लगायी ॥
दीन्हा ठेक बहतर भारी । नाडी बन्धन बहुत अपारी ॥
नाद विन्दुसों काथ निरमायी । तामैं प्रकृती आन समायी ॥
हृद कारिगर हुन्नर कीन्हा । जैसे दूधमें जामन दीन्हा ॥
तीनसों साठ चार बन्ध लायी । सोलह खाईं तहां बनायी ॥
सोलह खाईं चौदह दर्वाजा । अठहूँ हाथ गढ़ खूब विराजा ॥
छाजे महल अधिकही छाजा । तामैं जीव जो आनि विराजा ॥
अजब महल बहु खूब बनाया । छठे महल हंस चितवन लाया ॥
छठे मांस में सुरती आयी । दुख सुखकी तब पारख पायी ॥
छै मासको भयो जब प्रानी । दुख सुखकी मति सबै पहिचानी ॥
ओंघे सुख झूले लटकंता । मैल बहुत तहाँ कीच रहता ॥
जठर अग्नि तहाँ बहुत सतावै । संकट गर्भ तहाँ अन्त न आवै ॥
बहुत सांकीरी पिंजार पोई । तडफटै बहुत निकसे नहिं जोई ॥
सुखसों बोल निकसि नहिं आवै । करुना करि मन में पछितावै ॥
अरुझे श्वास रोवै मन माहीं । कौन करमगति लागी आहीं ॥
करुणा करि मन में पछितावै । ज्यों करीब कंठ करद बैठावै ॥

जगजीवनका गर्भके कष्टसे व्याकुल होकर साहबकी स्तुति और कौल करना

बोधसागर

( २३ )

ता दुःखकी गति कासु कहीजै । करम उनमानतहैं दुःख सहीजै॥
यदि आलोच करै मनमाही । संगी मित्र कोइ दीखत नाही ॥
पिछला जनम जब सूझा भाई । तब जिव दिलमा चिता आई ॥
स्त्री मित्र कुटुम्ब परिवारा । सुत नाती औ सैन पियारा ॥
संगी सुजन बन्धु औ भाई । गरभ कि चीन्ह परी नहिं ताई ॥
महा दुःख सो गरभ में पावे । बहुत वैराग हियामें आवे ॥
सूझी सकल बाहरकी बाती । जो जिव पिछली होती जाती ॥
जब जिव गरभमें ज्ञान विचारा । अब मैं सुमरूं सिरजन हारा ॥
सोच मोह जिव कछू न कीजै । अब सदगुरु का शरणा लीजै ॥
जिव अपने दिल माहि विचारे । तब समरथ को कीन पुकारे ॥
सुनु धर्मदास यक कथा सुनाऊँ । यक राजाको जस बने बनाऊँ ॥
राय जगजीवन ताहिकर नामा । जब वह पहुँच्यो एही ठामा ॥
करन विन्ती लागु अधीरू । सतगुरु कहैं तब कीन्ही टेरू ॥

जगजीवन वचन

साहिब संकट दूर निवारो । मैं निज खानाजाद तुम्हारो ॥
दिल मैं करूणा करै अतिभारी । अब मोहि साहब लेहु उबारी ॥
करै अस्तुति बहुते सुधिलावै । तुम वितु खाविन्द कौन छुडावै ॥
अब दुःख दूर निवारो स्वामी । कौल कहूँ प्रभु अन्तरयामी ॥
बाहर निकारो आदि सनेही । बहु दुःख पावै मेरी देही ॥
मैं जन प्रभुको दास कहाऊँ । आन देव के निकट न जाऊँ ॥
सतगुरुका होय रहों चेरा । दम दम नाम उचारूँ तेरा ॥
नित उठि गुरु चरणामृत लेऊँ । तन मन धने निछावर देऊँ ॥
जो मैं तन सों कहूँ कमाई । अर्थमाल मैं गुरुहि चढाई ॥
कुबुद्धि सीख काहु नहिं मानूं । हराम माल जहर करिजानूं ॥
कुलकी त्यागूं मान बढाई । निर्मल ज्ञान एक संत सगाई ॥

( २४ )

जगजीवनबोध

रात दिवस ऐसे लव लाऊँ । करत फुरत भक्ति गुरु कराऊँ ॥
दुःख सुख परे सो तनसे सहूँ । भक्ति दृढ़े गुरु चरणै रहूँ ॥
परत्रिया ताकूँ नहिं कोई । जननी बहन करि देखूँ सोई ॥
दुष्ट बैन कबहुँ नहिं खोलूँ । शीतल बैन सदा सुख बोलूँ ॥
स्वास उस्वासमों रटना लाऊँ । आन उपाय एको नहिं चाऊँ ॥
तन मन धन निछावर देखूँ । सतगुरु का चरणामृत लेऊँ ॥
सतगुरु कहैं सोई अब करिहौँ । आज्ञा लोप पाओं नहिं धरिहौँ ॥
और सकल बैरी कर जानूँ । सद्गुरु कहैं मित्र कर मानूँ ॥
ज्ञान बतावै सोई गुरुदाता । तन मन धन अरपूँ उन ताता ॥
तन मन धन मैं उनको देखूँ । नित उठि गुरुचरणामृत लेऊँ ॥
यहि गर्भवासमें कौल बधाऊँ । बाहर निकारो धुर निबाऊँ ॥
जो मैं छूटूँ गरभ सबेही । तन मन अरपूँ औ गुरु देही ॥
एक नाम सांचा कर मानूँ । और सबै मिथ्या कर जानूँ ॥
कहा अस्तुति करें गुसाई । बहुत दुःख पावत हूँ या ठाई ॥
यहां कोई मित्र नहिं भाई । मातु पिता नहिं लोग लुगाई ॥
देवी देवका कछु न चालै । गुरु विन कौन करै प्रतिपालै ॥
अब तो खबर परी यहि ठाहीं । और कोईका चालै नाहीं ॥
पिछली बात मैं हृदय जानी । कोई काहूँका नहीं रे प्राणी ॥
अपने साथ चलेगा सोई । जो कछु सुकृत करे सो होई ॥
मद माया में जीव भरमाया । सो तो कोई काम न आया ॥
बहुत विचार किया मैं सोई । अन्तकाल अपनो नहिं कोई ॥
ऐसी करुणा करै विचारा । दया करो दुःख भंजन हारा ॥

साहिब वचन

तब साहिब यों कहै पुकारा । कहि समझाया तोहि बारम्बारा ॥
अनेक बार गरभमें आया । तैं रतीकर्म भरम नहिं पाया ॥