कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
आगमनिगमबोध
( ६१ )
सदा शौच असनान जो कीना । संध्या बदले आत्म लैलीना ॥
जब कबहूँ चित चंचल होई । पढ़ै उपनिषदको तब सोई ॥
औषद सम भोजनको भोगा । चाहे नहिं कछु सुख संयोगा ॥
शत्रु मित्र जगमें नहिं कोई । सदा सैन पृथ्वीपर सोई ॥
धरतीपर धरि भोजन करही । चार मास वर्षा न बिचरही ॥
फिरै अकेले संग न कोई । भिक्षा भोजन गहै न ओई ॥
सोलह त्रास अहार प्रमाना । लेय हाथपर भिक्षा दाना ॥
जाके घर भिक्षाको जाही । मुखसे तहैं कछु माँगै नाही ॥
जेती बारमें गऊ दुहाई । गृही द्वार तबलों ठहराई ॥
जहैं माँगन को कारण पावै । तहां प्रणवको शब्द उठावै ॥
तीन बार कर शब्द उठाना । जाते गृही सुनै निज काना ॥
तीन भौन कै पांच कि साता । येते घरलों भीखको जाता ॥
जौ भिक्षा संयोग न लहई । तौ संन्यासी भूखा रहई ॥
भिक्षा ले पुनि बनहि सिधारे । मता श्रेष्ठ संन्यास उचारे ॥
पहिले वेदपाठ करि लीजै । तब पीछे संन्यास कहीजै ॥
वेदकि विधिते बोध न जबलों । धर्म मर्म जाने कह तबलों ॥
ऐसी विधिते भोजन करही । मोट देहि जिहि नजर न परही ॥
सदा काल आतम लौलीना । सकल भर्म भयतजि तिनदीना ॥
प्रथमे सब सुख भोग भरीजै । सब इंद्रिनको तृप्त करीजै ॥
तब पीछे लीजै संन्यासा । रहै न काहू वस्तुकि आसा ॥
शीतकालको गुदरी एका । राखे सो निज सहित विवेका ॥
यह मध्यम संन्यास प्रमाना । अब उत्तमको करें बखाना ॥
नम्र दिगम्बर बाना होई । शीत उष्ण दुखसुखसह सोई ॥
सहदुख सुखदुखसुखनहिंमाना । ऐसे निज मनमें अनुमाना ॥
ज्ञान अग्निमें तन हम दाहा । अब याकी कछु रही न चाहा ॥
( ६२ )
बोधसागर
यह विचार निज मनमें धारे । भूतक संन्यासीको नहीं जारे ॥
जीतेहि निज तन जिन दाही । सुये दग्ध पुनि उचित न वाही ॥
दोहा-जो मध्यम संन्यासते, उत्तम विधि गहि लेय ।
परमहंस ताको कहै, नम्र दिगंबर तेय ॥
काहूको परनामसो, करै न शीश झुकाय ।
सेवासे नहीं कछु सुखी, निरादरते नहीं दुख पाय ॥
मधूमास भोजन दोउ, तजि दीजै निरधार ।
धातु वस्तु सुद्रादि सब, नहीं कर परसनहार ॥
चौपाई
भोजन पाकते राखै काजू । तजे इतर सुख स्वाद समाजू ॥
पक भोजन तजि और न लेही । गृही जो पाक भोग नहीं देही ॥
ताहि गृहीको पापी जाना । देत नहीं जो भोजन दाना ॥
संन्यासीकी तप बड याही । कछु काहूसे मांग जो नाही ॥
दुण्डी संन्यासी जो होई । दंड हाथमें धारे सोई ॥
दंड बाँसकी लकड़ी भाषा । सात गाठि पुनि तामें राखा ॥
सरस्वति आश्रम तीरथ तीनी । दंड ग्रहण अधिकारी कीनी ॥
ब्राह्मण बिना न दंडी होई । द्विज गृहते अहार गह सोई ॥
चारों मठके जो ब्रह्मचारी । सोछ विप्र कुलते तनुधारी ॥
उत्तम मध्य कनिष्ठ संन्यासा । भिन्न २ करि वेद प्रकाशा ॥
शिव अरु विष्णुभाव नहि दूजे । पंचम देव संन्यासी पूजे ॥
शिव नरसिंहगणगतिरविदेवी । इन पाँचोंकी स्मृत देवी ॥
सिंहासन धरि पूजा करही । इष्ट आपनो बीचमें धरही ॥
अधिक नेम जिहि देवसे लावै । बीच सिंहासन तिहि बैठावै ॥
चौपाई
शिव शक्तीको धर्म जो धरही । चन्द्राकारतिलकलिलारमेकरही ॥
योगा संन्यासी ब्रह्मचारी । भगवां भेष तिलक सो धारी ॥
आगमनिगमबोध
( ६३ )
अथ मीमांसाधर्म वर्णन
दोहा—देव अलख करतार जहँ, गुरु दरवेष कहाय ।
शास्त्र मीमांसा धर्म कह, कर्मफल जिव पाय ॥
चौपाई
व्यास शिष्य जैमिनि ऋषिराया । धर्म मिमांसा सो ठहराया ॥
ताके शिष्य न करी सहाई । धर्म मिमांसा जग फैलाई ॥
शिष्यनको अस नाम उचारी । भट्ट कुमार अरु मिश्र सुरारी ॥
बहुरि प्रभाकर कुरकहि टेरे । भे प्रसिद्ध जगमाह बडेरे ॥
जैमिनि शिष्य बुद्धिगुणधारा । भली भांति निज धर्म प्रचारा ॥
धर्म मिमांसा जो कोई गहई । ताके नाम मिमांसक अहई ॥
एसो धर्म सो कीन उचारा । ईश्वर नहिं जग सिरजनहारा ॥
जो कुछ दुख सुख जगमें होई । जीव कर्मको कारण सोई ॥
जैसो कर्म करे जो कोई । तैसो उदय ताहि को होई ॥
ईश्वर नहिं कछु करे करावै । नर स्वच्छंद जस कर तस पावै ॥
सृष्टि अनादिनिध करि जानो । सदा स्वभाविक ऐसेहि मानो ॥
परमागुनते जग उत्तपाता । ज्ञान कर्म दोउमुक्तिको दाता ॥
वेदान्ती जस करे बखाना । तीन वेद ईश्वर गुण माना ॥
मीमांसक नहिं माने सोई । तीन वेद मानुष तन होई ॥
कर्म सुकर्म करे जो कोई नर । होय सो ब्रह्मा विष्णु महेश्वर ॥
कर्मैते जिव सब पद पावै । कर्महि ऊँच नीच गति जावै ॥
जेतो देखो कर्म पसारा । कर्मको खेल खिला जग सारा ॥
ब्रह्म कर्म करहि विधि नाना । देव अराधन सुख व्रत दाना ॥
होय यज्ञ तिनके बहुतेरे । साधन करि करि देवन टेरे ॥
इति मीमांसा धर्म
( ६४ )
बोधसागर
अथ शिवधर्म वर्णन
दोहा—देव रुद्र योगी गुरु, योग मुक्ति चित धार ।
पातञ्जल यह शास्त्र है, कथे धर्म व्यौहार ॥
इति
अथ शेष अवतार कथा वर्णन—चौपाई
करे एक ऋषि संध्या तरपन । ताके अंजुल प्रकटै धरि तन ॥
अंजुलते कलि बाहर परेऊ । नाम तासु पातांजल धरेऊ ॥
पातांजल है शेष औतारा । सो जग मल शोधन हितकारा ॥
शास्त्र चिकित्सा कीन प्रकाशा । देह रोगमल ताते नाशा ॥
शब्द अशुद्ध उचारा मल हंता । पाणिनिकरनिकाभाज्य करंता ॥
तिमि वक्षित अंतह मल शोधू । योग सूत्र करि जीव प्रबोधू ॥
प्रथमहि चित्तकि वृत्ति निरोधन । कथे समाधि अरुताको साधन ॥
वैराग आदिक विधि विधाना । कथे तहां साधन विधि नाना ॥
तेसे चित्त वक्षित जो साधी । नाहित कीनो योग समाधी ॥
यम नियमों आसन प्रतिहारा । प्राणायाम धारण धारा ॥
ध्यान समाधि आठ यह भाषी । द्वितिये पदमें सबसों राषी ॥
तृतियें पदमें योग विभूती । वरनो सकल जो सिद्ध प्रसूती ॥
बहुरि चतुर्थहि चरणके माही । मोक्ष योग फल बनें ताही ॥
इति
अथ नव नाथोंके नाम
दोहा—गोरखनाथ मछंद्रो, सुरतिनाथ मङ्गल नाथ ।
चर पट चम्बा प्राणनाथ, घध्यू गोपीनाथ ॥
इति
अथ गोरखनाथजीकी कथा चौपाई
नवो नाथ सिद्धौ चौरासी । गोरख श्रेष्ठ सर्व गुण रासी ॥
आगमनिगमबोध
( ६५ )
मुद्रा सकल ताहिने कीनो । ऐसो योग माहि चित दीनो ॥
दोहा-मुद्रा सन्मुख स्वेष्टि भूचरि चाचरि जान ।
शामभवी उन्मीलनी, पुनि अगोचरी मान ॥
आत्म भावनी बडुरि कह; पूर्ण बोधिनगाय ।
सर्व साक्षिनी आदि दै, मुद्राते जित लाय ॥
चौपाई
ऐसो योगी भया समाधी । आठों भांति योग भलसाधी ॥
राज योग हठ योग बखानो । त्राहठ अरु कुण्डली प्रमानो ॥
योग लंबिका तारक साधा । योग मीमांसकसांख्य समाधा ॥
आठों योग भली विधि कीना । ऐसो योगी परम प्रवीना ॥
वज्र कीन पुनि अपनी अङ्गा । करि चौरासी कल्प सुटङ्गा ॥
ऐसी वज्र शरीर बनाई । कबहुँ मरे न जरे न जाई ॥
सारी मांस देह गलि गिरेऊ । हाड गूद जमि एकै भयऊ ॥
हाड गूद जब एकमें पागा । हीरा सम तनु चमकन लागा ॥
योगको रस भल गोरख लीना । सत्य कबीर प्रशंसा कीना ॥
केते गोरखनाथ के चेले । सिद्ध भये गहि ज्ञान दुहेले ॥
गोरख यती जक्त गुन गाये । योग युक्ति जगमें फैलाये ॥
शिवजी आदि अचार्य येहा । योग समाधि आदि गुनगेहा ॥
पुनि नौनाथ सिद्ध चौरासी । योग धर्म जग माह प्रकासी ॥
शिवगोरख सम और न योगी । ब्रह्मानन्द योग रस भोगी ॥
अथ चौरासी सिद्धनके नाम
दोहा-भङ्कर सङ्कर संघरो, जङ्कर ऋम होय ।
दूरम कनी फाहनीफा, लडुरूपा सङ्कर रोय ॥
लङ्करहनीरतन कह, पूरन बिवालक बर्न ।
जलकाखिघडसुरतिसिध, निरतिसिधकेवलकर्न ॥
( ६६ )
बोधसागर
समरथ असरन गौन गुल, चतुर वैन राय ऐन ।
केवल करन औघड दरवत, ईस्वरभरथरी भूतवैन ॥
कनका शंस् अक्षर दैन, पलका निधि शिवराम ।
पिपल्का गिरधर सालस, कसक गैलस नाम ॥
मगनधार मुक्तीसरो, चलन नाचत सूर ऐन ।
गिरवर जोति लगन कहो, जोति मनसिध सैन ॥
विमल जोति शीतल जलो, अघडधान्य पतिप्रान ।
तोल संयोग अकाल निर, बहुरि भोलसर जान ॥
राजकुमार बखानिये, विष्णुपति कृष्णकुमार ।
शंकर योग ब्रह्म योग है, मीरहुसेन बिचार ॥
मीर जअलीक धारिजो, पुनि कालिंदर नैन ।
फिर नालिन्दर नैन है, सरस्वती गुरुधन सैन ॥
गुफाबासी कल नासी, कलके संगी होय ।
यक रंगी केवल क्रमी, पुनि कम नासी जोय ॥
कलक विनाशी मूल मंत्री, योग तन्त्री परमान ।
जंग गहिर दीपक रंगी, आपो रूपी जान ॥
फिर अकलेस प्रतापी, बीरम योगी नाम ।
खल समोगल भोगी कहो, इन्द्रयोगी गुण ग्राम ॥
पुनि केदार योगी गनो, कीन धर्मकी वृद्ध ।
मुनि विचित्र रहमी योगी, ये चौरासी सिद्ध ॥
अथ षट् यतियोंके नाम
दोहा--गोरख नाथो दत्तजी, पुनि लक्ष्मण हनुमन्त ।
भैरो भीषम जानिये, ये षट् यती वदन्त ॥
इति
आगमनिगमबोध
( ६७ )
अथ बारह पंथ वर्णन
दोहा—आइ कुनकाई प्रथम, तुसलाई कपिलान ।
तृतीये सप्तनाथ पंथ है, चौथ धर्म नाथ जान ।
वैराग्य नाथके भरथरी, षष्ठम गङ्गा नाथ ।
रामचन्द्र सप्तम कहै, अष्टम लक्ष्मण नाथ ।
फिर नटेश्वरी नवम है, पिंगल दशम कहाय ।
पुनि धजपंथ इग्यारहे, बारहे कानी फाय ।
इति
अथ अष्टांगयोगवर्णन
दोहा—जमनियमोआसनकहो, प्राणायाम अगाध ।
प्रत्याहारो ध्यान कह, पुनि धारण समाध ॥
अथ यमकी दश शाखा वर्णन
दोहा—युक्ति सहित सब कर्मकर, ताको यमबतलाय ।
जाते साधन सुगमहो, सकल कलुषता जाय ॥
चौपाई
प्रथम अहिंसा जीव बताई । नर पशु आदि एक समताई ॥
मनसा बाचा कर्म या तीनों । काहूको कछु दुःख नहिं दीनों ॥
द्वितीये बोले साची बानी । मिथ्यावाक्यते धर्मकी हानी ॥
तृतीये पर धनको मति हरना । चौथे परतिय संग न करना ॥
पञ्चम दायो हृदय महार् । दुखी दरिद्री करो सहाई ॥
छठये अर्चा ताहि बखानी । बुधिते धर्म कीजिये प्रानी ॥
अहंकार मद मान न धरिये । औरहि कबहु तुच्छ मति करिये ॥
सप्तम क्षमा ताहि को जाना । लाभालाभ न सुखदुख माना ॥
अष्टम धौत धर्म भल साजी । जो कछु लाभ ताहिमें राजी ॥
नवमें अल्प अहार करीजै । दशमें शोच भली विधि कीजै ॥
इति
( ६८ )
बोधसागर
अथ नियमकी दशा शाखा वर्णन—चौपाई
प्रथमै तप द्वितिये सन्तोख्या । तृतिये कोकह नाम असंख्या ॥
श्रुति ईश्वरहिय निश्चय जाना । चौथे धनते दीजै दाना ॥
पंचम करता पुरुषको पूजा । ताहि छोड़ि न्यावो मतिदूजा ॥
पुनि सिद्धांत श्रवण है छठये । विद्वत जनकी संगत गठये ॥
श्रुति पुरान विद्या आध्ययना । सब शुभकर्मनमें चित देना ॥
सप्तम औ इंद्री धिक्कारे । जब कछु अबुचित कर्म निहारे ॥
अष्टम सत्य जाहि को कहते । भले कर्मकी इच्छा कहते ॥
नवमें जब हरि चर्चा कहिये । इंद्रिन सहित चित्तको धरिये ॥
दशमें होय अर्थ अस कहिये । तन मन धन इंद्री जो गहिये ॥
प्रभुकी हेतु सकल सुख त्यागे । ज्ञान कृशातु विषय धन दागे ॥
इति
अथ चौदह आसन वर्णन—चौपाई
पञ्चो बीरभद्र सृ संगकरी । पुनि दन्ददास वृश्चिक सृंबासरी ॥
बकरी मोर सिंह जसको अस । समान अंतरशुद्धपुनिवैठकजस ॥
अथत्रिविधि प्राणायाम वर्णन
दोहा—प्रथम सहज मध्यम बहुरि, कठिन तीसरो आहि ।
प्राणायाम त्रिविधि कहो, साधे योगी जाहि ॥
चौपाई
प्रथम सहज कहिये द्वै शाखा । श्वासा परशवासा मय भाषा ॥
पूरक कुम्भक रेचक माही । तरसु जान नाकाम है ताही ॥
द्वितिये पूरक इडाहै नारी । बाम नाक नथुन थित धारी ॥
बाहरकी वायू लेजाई । भरे इडा नाडीमें लाई ॥
कुम्भकको अस कारय कथना । बन्द करे दोउ नाकके नथुना ॥
थित प्रयन्त रोके रहे पौना । रेचक कर्म कहौ अब तौना ॥
आगमनिगमबोध
( ६२ )
शनैः २ पुनि पौन निकारे । पिङ्गला रग मारगको धारे ॥
बाहर पौन करो सो जबलों । नश्रुना बाम बन्द रख जबलों ॥
तृतीये तहैं करम आरम्भन । बाहर मात्रालों कर थम्भन ॥
मात्रा ताहि कालको नाऊ । नाम उचार शुद्ध करि पाऊ ॥
नहि विलम्ब नहिं शीघ्रविवेका । शब्द शुद्ध सो मात्रा एका ॥
चौथे जब यह युक्ति संभाला । राखे थित तामैं कछु काला ॥
फिर द्विगुना फिर तिगुना करिये । तिगुणते अधिकमें जबचितधरिये
एकबावर ऐसी विधि ठाना । कुंभकमें यह युक्ति प्रमाना ॥
इडाको पलटि पिंगला करना । पुनि पिंगल इडाकरि धरना ॥
पंचम ऐसी युक्ति विलोको । वायूको निज चलते रोको ॥
छठे जो पूरक रेचक भासा । आपते हो श्वासा पर श्वासा ॥
इकीस सहस्र अरु षट् सठथापू । चले श्वास सो अजपा जापू ॥
तापर ध्यान करै जो कोऊ । ताको जाप रैन दिन होऊ ॥
सप्तम वृद्ध होय वय ताही । वय प्रमान श्वासते आही ॥
द्वितिये मध्यम यहि विधि भाला । प्रथम प्राण वायू कर चाला ॥
बाहर अंगुल बाहर आवै । पुनि अदना वायू ले जावै ॥
प्राण कि ठौर अपान ले जाई । पूरकमें यह युक्ति कराई ॥
द्वितिये कुम्भकमे यह डौरा । प्राण अपान करो झक ठौरा ॥
लेकर बन्द करो यहि उक्ती । बरतै अंत रेचक द्वौ युक्ती ॥
पहिले सदाके ढंग न रहई । फेर इडा वायू जो कहई ॥
जोर कियेतै बाहर आई । पहुँच न बाहर अंगुल तार्ई ॥
तृतिये अष्ट कर्म कहि दीनी । पूरक तीन अरु कुम्भक तीनी ॥
दो रेचक भे आठौ कर्मा । अब चौथेको भाखो मर्मा ॥
खैचत थंभन त्यागन प्राना । पूरकगह रेचक नहिं ठाना ॥
( ७० )
बोधसागर
ताको कुम्भक नाम बखाना । प्राणनको निज वशमें आना ॥
एकीस लाख अरु साठि हजार । हो नर श्वास पूर्ण जिहि बारा ॥
तिहि अवसर अस युक्ति जो कीये । तौ सौ दो सौ वर्ष लौ जीये ॥
तृतिये कठिन कि बुक्ति सो अहाँ । प्रथम खैचरी मुद्रा गहई ॥
ऐसी लांबी जीभ बढ़ावै । तालूमें पुनि ताहि लगावै ॥
पुनि सो ऐसी युक्त गहावै । प्राणवायु धौले नहि पावै ॥
कान नाक मुख हगलों जोई । तहलों जान न पावै सोई ॥
द्वितीये भूचरि मुद्रा गार्ह । दक्षिण पगकी एडी रूयाई ॥
गुदा लिंग जड दावै बाँही । बाम पाव एडी रख ताही ॥
बार २ एडी बदले दोऊ । पुनि अपान ऊपर खैचेऊ ॥
अथ प्रत्याहारवर्णन-चौपाई
प्रत्याहार सो नाम भनंतो । इन्द्री दमन कीजिये संतो ॥
प्राणायाम प्राण दम धारा । तिमि इन्द्री दम प्रत्याहारा ॥
प्रथमें विषम स्वादते भाजा । द्वितिये बहु विरुद्ध जो काजा ॥
कबहुँ ताहि न करत सयाने । दृष्टिहु ताके दिश नहिं ताने ॥
तृतिये विषम सर्वथा त्यागी । मनहु दृष्टि सन्मुखते भागी ॥
चौथे हर्ष न शोक रहाई । पंचम प्राणायाम हटाई ॥
इति
अथ धारण अथवा परमेश्वरकी प्रीति-चौपाई
प्रीतम प्रीति हिये अति बाढे । सदा ध्यान सुमिरनमें गाढे ॥
प्रथमहि गुरुको ध्यान गहीजै । हग सन्मुख जो कछुक लहीजै ॥
सो सब गुरुकी दाया जाना । बारह मात्रालों हठ ठाना ॥
होयरपक जो पूरन जाना । मात्रा सहस दोसौ षट् पाना ॥
इति
आगमनिगमबोध
( ७१ )
अथ ध्यानको वर्णन-चौपाई
ध्यानते ऐसो ज्ञान गहीजै । तातैं बुद्ध धारणा कीजै ॥
दो सहस पांच सो बानवे मात्रा । तहँलो तिहि पहुँचाव सुमात्रा ॥
इति
अथ समाधि वर्णन-चौपाई
अष्टम योग समाधि कहावै । सो धारणा तहँलो पहुँचावै ॥
पांच सहस एकै सो चौरासो । मात्रा धारे शंक विनासी ॥
द्वितिये चिता दूर पराई । तृतिये रूप दृष्टि प्रिय आई ॥
चौथे यहू चितवनि त्यागे । पँचयें मोहि तोहि भेद न लागे ॥
छठयें नहीं कछु रहा दराई । सतयें आप आपमें छाई ॥
तू मोहिमें तोहि माह समाई । जीवहि शिवकी भै एकताई ॥
सहस गिरा इत भाषे येही । जीअत साधु त्याग जब देही ॥
सहज समाधी ज्ञात बखाना । प्राणवायु तहँ लों परमाना ॥
एक सहस सत्तर अरु दोई । मात्रा लों जब निजवश होई ॥
ताको संयम नाम उचारा । यह अर्धांग योग निरधारा ॥
इति
अथ षट्चक्र भेदनकी युक्ति
दोहा-षट् चक्रको भेदके, योगी जन चढ़ि जाय ।
गगन गुफामें बासकर, आवागमन नशाय ॥
चौपाई
अब षट् चक्रको करें बखाना । मूलद्वार प्रथमैं कहि गाना ॥
मूल द्वार कमल जो अहई । नाम अधार चक्र सो कहई ॥
पाखुरि चार सो कमल विराजा । कृपा गनेश करे तिहि काजा ॥
गुदासे पानी खँचन लागे । खँच खँच जलपुनि तिहि त्यागे ॥
यहि विधि गुदा शुद्ध कर जोई । बस्ती किया नाम सो होई ॥
( ७२ )
बोधसागर
पुनि ऊपरको पौन चढाई । द्वितिये भेदन करे उपाई ॥
जो अधार चक्रके ऊपर । स्वाधिष्ठान चक्र है दूसर ॥
लिंग भूमिका परसों अहई । षट्दल कमल तासुको कहई ॥
पौनके बल गुदाचक्र बँधाई । स्वाधिष्ठान चक्रपर जाई ॥
स्वाधिष्ठानके भेदन काजा । द्वादश अंगुलको गज साजा ॥
सो गज लिंगमें देत चलाई । लिंगद्वार तिहि शुद्ध कराई ॥
ग्रह गज करत किया कहँ लावै । बहुरि लिंगते दूध पिलावै ॥
लिंगते सहतको खैंचे जबहीं । गजकी कियापूर्ण हो तबहीं ॥
पौन खैंच पुनि लिंगके द्वारा । स्वाधिष्ठान बेधि चल पारा ॥
बहुरि अपान समान मिलाई । धोती कियामें तब मन लाई ॥
मणि पूरक चक्र जो कहई । नाभी द्वारेमें सो अहई ॥
दश दल कमल तासु परमाना । ताके भेदनको मन ठाना ॥
दो अंगुल पट चौडा लीजै । अरु नौ हाथको लामा लीजै ॥
लीलै ताहि वस्त्रको सारा । बहुरि काटि तिहि मैलनिकारा ॥
तीन बार ऐसी विधि सारा । बहुरि काटि तिहि मैलनिकारा ॥
तीन बार ऐसी विधि कीजै । धोती किया सो पूर्ण कहीजै ॥
नाभिते बहुरि पौन उलटाई । मणि पूरक चक्रर भेदाई ॥
फेरि अपान प्रान जो दोई । मेले प्रान माह तब सोई ॥
अनहद चक्र भेद तब जाई । हृदय स्थान माह जो पाई ॥
बारह पशुरी ताकी होई । हृदये मध्य कमल सो जोई ॥
ताकी सिद्ध हेत जो दीशा । कुंजर किया करे योगीशा ॥
तीन बार भल पानी पीजै । पुनि पुनि सो उलटीकर दीजै ॥
सवा हाथकी दातन लेना । भीतर नाड चलायसोदीना ॥
बार बार पानीको पीना । दातन डारि छोड पुनि दीना ॥
ताकी सिद्ध पूर्ण जब लहिये । कुंजर किया नामसो कहिये ॥
आगमनिगमबोध
( ७३ )
बहुरि पौनको लेहु उठाई । अनहद चक्र भेदिके जाई ॥
प्रान अपान समाना, तीनों । कण्ठमें तिनहि मेलि तब दीनो ॥
चक्र विशुद्ध कण्ठके माही । षोडश दल है कमल तहाँही ॥
योग लंबिका ताहित करना । दूध अधार ते काया धरना ॥
सूक्ष्म बोलते कार्य कीजै । पुनि तब ऐसी उक्ति गहीजै ॥
जीभके हेटकी नस जो सगरो । मस्का संधो लोनसे रगरो ॥
जीभ दुहन पुनि प्रातहि काला । या विधि रसना करो विशाला ॥
ऐसी अपनी जीभ बढावै । ऊर्ध्व द्वारमें ताहि लगावै ॥
जरमें अमृत चूवै जोई । ताको पान करे तब सोई ॥
पीअत अमृत जागी देहा । योग लंबिका सिद्ध भो येहा ॥
बहुरि विशुद्ध चक्रकी भाना । आगेको तब करे पयाना ॥
अग्नि चक्र है त्रिकुटी थाना । द्वै दल कमल तासु परमाना ॥
ताहि तनेती किया कराई । बत्ती निज नासिका चलाई ॥
नाक शुद्ध करि बत्ती कीता । मूर्द्धा शुद्ध भो ज्ञान गहीता ॥
पुनि उद्यान महा सुख पावै । बहुरि कण्ठते पौन उठावै ॥
चक्र विशुद्ध भेद जब लावै । अग्नि चक्रमें वायू लावै ॥
तिहि औसर जिह्वा लेजाई । ऊरध द्वारे माह लगाई ॥
बन्द करे तब ऊरध द्वारा । अग्नी चक्र भेदि हो पारा ॥
चलि ब्रह्माण्ड श्वास लय होई । कुंभक करिके तनु शिथलोई ॥
काम अरु क्रोध लोभ मोहानी । तब इन सबकी सेन परानी ॥
कर ब्रह्माण्डमें योगी वासा । जबहि चढायो गगनमें श्वासा ॥
जहँ नहि द्यौस नहीं जहँ राती । नहि सूरज शशि उडुगणपाती ॥
तहँ सुषुमना वेधि ब्रह्माण्डा । गडा जाय योगीके झण्डा ॥
जब ब्रह्माण्डमें माहरम जाई । सङ्गी साथी सकल पराई ॥
सङ्गी साथी जब रहि गयऊ । निर्विकल्प योगी तब भयऊ ॥
इति षट्चक्र
( ७४ )
बोधसागर
अथ दो प्रकारकी समाधि वर्णन--चौपाई
दोय प्रकार समाधि कहीजै । सविकल्पो निर्विलप गनीजै ॥
जो सविकल्प समाधि कहावै । ज्ञाता ज्ञान ज्ञेययुत ध्यावै ॥
त्रिपुटी भान सहित जब सोई । ब्रह्म बीच वृत्ती लय होई ॥
सा सविकल्प समाधि कहावे । निर्विकल्पको अब कहि गावे ॥
त्रिपुटी भानु रहित वृत्ती जब । ब्रह्मानन्द हो निर्विकल्प तब ॥
जो सब कल्पको साधना जाने । निर्विकल्प फल तासु बखाने ॥
निर्विकल्प सूखो पति दोई । यतनो भेद दोहूमें होई ॥
निर्विकल्पमें ब्रह्मा नन्दा । सुषुप्तितमें अज्ञानको फन्दा ॥
निर्विकल्पमें चार हैं बाधक । तिहि सचेत रह चातुरसाधक ॥
प्रथमै लय विशेष बहोरी । पुनिकर अरशा स्वाद कहोरी ॥
आलस निद्रा जब सरसाना । वृत्ती होय सुषुप्ति समाना ॥
ब्रह्मानन्द भोग नहिं भोगी । सजग होहि तिहि औसर योगी ॥
आलस निद्रा दूर हटाई । फेरि वृत्ति निज लेहि जगाई ॥
द्वितिये पुनि विशेष बताई । वृत्ती जबै बहिर है जाई ॥
कछु पदार्थको कारण जाई । अन्तर वृत्ति बहिर्मुख होई ॥
हो सचेत योगी तिहि काला । वृत्ती बहिरंतर सुख बाला ॥
तृतीये राग द्वेश जो होई । नाम कषाय कहाँ लै सोई ॥
राग द्वेष विधि कहो बखानी । यक बाहर एक अन्तर जानी ॥
बाहर धन दारादिक शोचा । अन्तरकी चिंता मन पोचा ॥
भूत भव्य चिन्ता मन आई । योगीकी समाधि विनशाई ॥
चौथे रसास्वाद अब भाषो । ऐसे अर्थ तासुको राखो ॥
ब्रह्मानन्दते सुख अनुभव कर । दुख निवृत्तसे हृदय सुख भर ॥
यहू योगमें विघ्न बताई । जबलों नहिं निज प्रीतम पाई ॥
चितकी पंच भूमिका आही । प्रथमै ज्ञेय नाम कह ताही ॥
आगमनियमबोध
( ७५ )
द्वितिये मूढता नाश कहावै । तृतिये को विशेष बतावै ॥
चौथे पुनि एकाग्रता होई । पंचम भूमि निरोधक होई ॥
अर्थ तासु यहि भौनि जाचना । लोक वासना देव वासना ॥
शास्त्र वासना आदिक जोई । क्षेप नाम ताहीको होई ॥
निद्रा आसना तुम गुन घेरे । नाम मूढता ताको टेरे ॥
बाहर सुखवृत्ती जब होई । नाम विशेष कहावै सोई ॥
चित्त एकाग्र होय जेहि बारा । एकाग्रता नाम सो धारा ॥
ब्रह्माकार जबै है जाई । ताको नाम निरोध बताई ॥
जो योगी निज विघ्न हटावै । ब्रह्मानन्द सोई सुख पावै ॥
योगीको सब सुखसुरसावै । ज्ञान बिना पै मुक्ति न पावै ॥
केवस ज्ञान उगे जिहि बारा । तब योगी हो ब्रह्माकारा ॥
अष्ट सिद्धि नौ निद्धि विराजा । योगी संगसकलसुख साजा ॥
इति समाधि
अथ ओंकार जापको वर्णन—चौपाई
ॐकार जप सबको सारा । जिहि योगी परधामपधारा ॥
ऋद्धि सिद्धि गुण ज्ञान कहाये । ॐकार भव पार कराये ॥
जो कोई शुद्ध जाप मन लावै । सकल पदार्थ ताते पावै ॥
जाप अशुद्ध करै जो कोई । वृथा परिश्रम ताको होई ॥
पुत्र जनै जिहि औसर बाला । होय टेढ शिशुजोतिहिकाला ॥
जौ बालक सीधे नहि आवै । तौ निज मात प्रणविनशावै ॥
ॐकार जप ऐसो जानी । शुद्ध जाप बिन जिवकी हानी ॥
जब इंद्रिनको वशकरि लीजै । ताको कल्प समाधि कहीजै ॥
मन इंद्रिनको भूत कहावै । मनको बहुरि अकाश बतावै ॥
पुनि आकाश तीन विधि भाषा । चिदाकाश प्रथमै कहि राखा ॥
मनको चिदाकाश कहि गाये । नभ समान चहुँ दिशरहछाये ॥
( ७६ )
बोधसागर
जैसे नभको अन्त न कोई । तैसे मन अनंत है सोई ॥
द्वितिये मनाकाश कहि टेरे । ब्रह्माकाश नाम तिहि केरे ॥
ब्रह्माकाश कहै इमि तेही । ब्रह्म सो व्यापक है मन येही ॥
सर्वमयी जिमि ब्रह्म विराजै । तैसे यह मन सबमें गजै ॥
तृतिये भूताकाश बखाना । मन अरु ब्रह्मते करे मिलाना ॥
मनाकाश अरु भूताकाशा । ताते ब्रह्म द्योय परकाशा ॥
ब्रह्म दोउते पार बहुता । थूल देह वासनाके सूता ॥
त्रिविधि वासना कहो बखानी । सत रज तम गुन ताको जानी ॥
जब रजगुन तम गुण चल जाई । सूक्ष्म देह जीव तब पाई ॥
दोहा-यहि विधि सूक्ष्मता लहै, तन थूलता नशाथ ।
जिहि औसर यहि गुन गहै, जीवन सुक्त कहाय ॥
दोय प्रकार समाधि कह, यक चेतन जड एक ।
योगी भवसागर तरे, निज बल बुद्धि विवेक ॥
इति
अथ अथर्वण वेद योगतत्त्व उपनिषद-चौपाई
सबते श्रेष्ठ विष्णु कहलावै । सोऊ योग समाधि लगावै ॥
सदा योग मारग आचरही । परम पुरुष ध्यान सो करही ॥
सो प्रकाश सब घट घटमाहीं । तिहि चितवनी करें नर नाहीं ॥
भूलिविषय रति प्रभुहिविसारी । यही अचंभौ मो मन भारी ॥
वस्तु अनित्य जासु मन भावै । महा सूठ सो जीव कहावै ॥
पुत्र हो दूध जाय थन पीये । तरुण सुखीतिहिकरगहिलीये ॥
यद्यपि जान भिन्न तिय देही । तद्यपि जान पयोधर येही ॥
जाहि द्वारते बाहर आवत । ऐसो दुख सदा नर पावत ॥
तामें पुनि पैठत सुख माना । कैसे भूले नर बिन ज्ञाना ॥
जाहि रूपको जननी कहते । सोई निज दारा करि कहते ॥
आगमनिगमबोध
( ७७ )
कबहुँ जिहि निजपिता पुकारी । साई रूप निज भरता भारी ॥
निजु मन माह विचारिके देखो । पिता सोइ प्रकटा सुद लेखो ॥
रहटा कृष डोलची जैसे । आवे जाय जक्त यह तैसे ॥
यक भरि आवै दूजा रीते । ऐसी भूल माह जग बीते ॥
मुक्तिके मारगको नहि दूँढा । चर्खा गाह परा जग मूँढा ॥
ओंशन्द हरि भजनके काजा । तामें अक्षर तीन विराजा ॥
तिहि अक्षर तिहुँ लोक बखानो । तीनों वेद त्रिवेद हि मानो ॥
अर्थ रेफ अनुनासिक होई । सबसे सार जानिये सोई ॥
तनमें प्राण परवानमें सोना । तिलमें तेल घृत दूधसे होना ॥
फूलमें यथा सुगन्ध समाई । तैसे सार ताहि बतलाई ॥
ऊँकारके अक्षर चारी । ताको कहिये अर्थ विचारी ॥
प्रथम अकार हि ब्रह्मा जानो । द्वितिये ओंकार विष्णु पहिचानो ॥
रुद्रहि जान मकार स्वरूपा । ना निर्वचनसो ज्योति स्वरूपा ॥
बहुरि अकार ऋग वेद अहाँ । यजुर्वेद ओंकारहि कहई ॥
सामवेद कह जान मकारो । अनिर्वचन नन्ना चित धारो ॥
तृतिये जाग्रत जान अकारा । स्वप्न अवस्था भाष ओंकारा ॥
फेरि मकार सुषुप्ती गई । नन्ना रूप जान तुरियाई ॥
चौथे पुनि अकार मृत लोका । मध्य लोक ओंकार बिलोका ॥
स्वर्गको लोक मकार प्रमाना । तिहुँते परे नकार बखाना ॥
पँचथे मन कई जान अकारा । ओ चितना बुद्ध माहंकारा ॥
पुनि छठयें ब्रह्मचर्य अकारा । ओ गृहस्थको नाम पुकारा ॥
मम्मा वानप्रस्थ प्रकाशा । नन्ना जानि लेहु संन्यासा ॥
सतयें अकारहरिजगुन भनिये । ओ सतमाको तमगुन गनिये ॥
अठयें अकार ज्ञान थीरता । तीनि ओकार मकार वीरता ॥
नन्ना न्याय कियो परमाना । नवम अकार कम करि माना ॥
नं. १० बोधसागर - ९
( ७८ )
बोधसागर
पुनि कह ओ उपासना सारा । मम्मा ज्ञान नन्ना सब पारा ॥
ऊँ कारको अर्थ अनंतो । वर्णन कौन सकै करि संतो ॥
प्रवण आदि सबहीको भाषा । ताते और अनेकन शाखा ॥
मन स्वरूप अस जो उरबासी । अधरकमल समताद्विकप्रकाशी ॥
कमल नाल ऊपरको राखा । हेठको ताके मुखको भाषा ॥
ताके बीच माह मन रहई । पावन होय प्रणव जब कहई ॥
प्रथम हि अक्षरके उच्चारै । मनकी उज्ज्वलता जिव धारै ॥
द्वितिये अक्षरते दिल खिलता । अनहद शब्द गगनसुनिसिलता ॥
चौथे अर्ध बिंदु बतलाई । ताते ज्योति माह मिलजाई ॥
जब यह मन मलते बिलगाना । होय शुद्ध बिछौर समाना ॥
सूरते अधिक नूर जग मगई । परम प्रकाशमान तब लगई ॥
दोहा—कोध आलस निद्रा बहुत, बहु भोजन बहु जाग ।
फाका करनो कर्म षट्, योगी दीजै त्याग ॥
चौपाई
यहि विधि तीन मास जब साधै । अंतर परे न मनको बाधै ॥
तृतिये मास हो सह गति वाकी । देव दृष्टि सब आवै ताकी ॥
मास पांचमें यह गुन पावै । देव स्वरूप आप हौ जावै ॥
छठयें मास मिले हरि माही । प्रणव साधना सदा कराही ॥
अथ अथर्वण वेद योगसुखा उपनिषद—चौपाई
प्रथम हि पद्म आसनको मारै । बैठि एकांत ध्यानसो धारै ॥
द्वितिये नासा आगे देखै । टरै न दृष्टि ध्यान करि लेखै ॥
तृतिये दोउ कर पग कह जोरी । चौथे मनको लेहु बटोरी ॥
विषय बिकल्प अरु संशय कोई । मनके निकट न आवै सोई ॥
पंचम पावन प्रणव को ध्याई । छठयें नामी सुरति लगाई ॥
सप्तम निजु मन माह बिचारी । अशुचि बस्तु मानुष तनधारी ॥
आगमनिगमबोध
( ७९ )
तीन देह तू भौन बताये । तामें थम्भा चार लगाये ॥
एक बड तीन थंभ लछु साजे । पांच देवता नौ द्रवाजे ॥
पृष्ठ अस्थि बड़ थंभ पुकारी । ताके निकट सुषुम्ना नारी ॥
लछु थम्भा जो तीन कहाये । सो सत रज तम गुन बतलाये ॥
पंच प्रवण सुर पांच उचारी । तेहि देह जिव गेह सवारी ॥
मनके रंभ माहचित धारो । सूर्य मंडलाकार निहारो ॥
तेहि रविमंडल प्रणव सिरखो । प्रणवमें दीप शिखा पुनि देखो ॥
दीप शिखा ऊरध दिश जानी । ज्योति स्वरूप ताहि अलुमानी ॥
ताहीमें निज ध्यान हटाई । इमि योगी तन तजि तहँ जाई ॥
रवि मंडल भनि सूक्ष्मनि नारी । गेह पन्थ ब्रह्म रंभको फारी ॥
तन तजिके योगी इमि जाही । परम पुरुषके रूप समाही ॥
ऐसी युक्ति गहे सुख पागी । आलस निद्रा वश दुर्भागि ॥
छन छन ऐसी युक्तिको गहिये । यही उनिषद देखत रहिये ॥
जो यह युक्ति न हरदम होई । निश्चय तीन काल कर सोई ॥
भोर मध्य दिन सायंकाला । नितप्रतिगहि लीजै यह चाला ॥
इति
अथ अष्टसिद्धियोंके नाम चौपाई
प्रथमै अणिमा नाम कहावे । ताहि लहे लछु देह बनावे ॥
द्वितिये महिमा कहो बखानी । निज तनकी दीरघता ठानी ॥
तृतिये लघिमा जो लहिपावै । सो अपनो तन हर्क बनावै ॥
चौथे गरिमा नाम भनीजै । जो लहि निज तन भारी कीजै ॥
पंचम प्राप्ती नाम बतावो । सो लहि जहँ चाहो चलजावो ॥
पुनि प्रकामिका छठयें अहई । जाते निज मनोर्थ सब लहई ॥
सतयें ईशता नामक होई । जापर चहै आप बड होई ॥
( ८० )
बोधसागर
अठयै वशियौ नाम कहाई । जेहि चाहे तिहि देत भ्रमाई ॥
आठों सिद्धिमें भेद अनेका । जानहि योगी सहित विवेका ॥
इति
अथ नव निधियोंके नाम
दोहा-महापद्म अरु पद्म कह, कच्छप मकर मुकुंद ।
खर्ब शंख अरु नील कह, नवम कहावे कुंद ॥
इति
अथ योगी भेष वर्णन-चौपाई
शैली सिंगी मुद्रा काना । भगवौ वल्ल विभूत है बाना ॥
योग युक्ति साधन भल राखा । अजपा जाप जपे गति भाषा ॥
क० भा० प्रकाशसे
इति श्री आगमनिगमबोध समाप्त