कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( २०४६ )
बोधसागर
१३८
इत जो देव गणेश बखानी । सो गम्मस रूमी यूनानी ॥
इंद्रको हिन्दू कह देव पितर । उत जु पितर कह लाववप्रधर ॥
हिन्दू अनपूर्णा कह भाषी । अनपूर्णा यूनानी साषी ॥
संस्कृतमें जो पित्र कहावै । सोई पारसी पितर बतावै ॥
अंग्रेजीमें फादर सोई । मातर मादर कहिये जोई ॥
आता प्रादर नाम कहीजै । कृतकार कृतगार भनीजै ॥
अंग्रेजी कृयटार कहावै । हिन्दू सो करताहि बतावै ॥
मिह संस्कृत सूरज भाषा । अरबी मिह नाम सोइ राखा ॥
अब्र संस्कृत बादल बोले । अब्र पारसीमें सोइ खोले ॥
पुत्र संस्कृत सुअन कहावै । अंग्रेजीमें सन बतलावै ॥
पृष्ठ पारसी पुस्त प्रमाना । नैन सो अबीऐन बखाना ॥
सृष्टि संस्कृत कीन बखाना । सो पारसी सरिस्त प्रमाना ॥
दुहिता संस्कृत बेटी होई । सो पारसी दुखतर कह सोई ॥
सो डाटर अंगरेजी माहीं । अस्व अस्य लो हार्स कहाहीं ॥
शब्द अनेक बकी यक ताई । बुधवन्तो सो लेहु मिलाई ॥
भाषा बहुत पढ़े जो कोई । बोलके मेल मिलावै सोई ॥
अब तृतिये दृष्टांत निरेखे । संस्कृत व्याकरण परेखे ॥
जो व्याकरण संस्कृत माहीं । ऐसो शुद्ध और कई नाहीं ॥
संस्कृतसे है अरबी बानी । मिश्री यूनानी अलेनानी ॥
संस्कृतसे सब गुण महि सारी । उक्ति युक्ति कछु भिन्नसवारी ॥
अब चौथे यह भाषो भेदा । सर्व शास्त्रके प्रथमहि वेदा ॥
चारो महा बाल है जोई । संस्कृतमें पुनि उजरी सोई ॥
पुनि पञ्चम अस कहो बखानी । ताते आदि संस्कृत जानी ॥
मुख्य नाम परमेश्वर केरा । संस्कृत की बोलीमें हेरा ॥
और बोलमें आवत नाहीं । संस्कृतमें शुद्ध गहाहीं ॥
अब छठये यहि विधिते सुनिये । ताते आदि संस्कृत गुणिये ॥
१३९
जीवधर्मबोध
( २०४७ )
सत्य कबीरके नाम जो चारो । चहुँयुगमें भिन्न भिन्न उचारो ॥
सत्य सुकृत सुनींद्र कहाये । करूनामय स्वामी बतलाये ॥
कलियुग माह कबीर उचारो । चारों युगके नाम हैं चारो ॥
नाम संस्कृतमें युग तीनी । कलियुग मिश्रीत करि दीनी ॥
अरबी संस्कृत मिश्रीत कबीरा । हिन्दू सुसलमान गुरु पीरा ॥
जेते और कबीरके नाऊ । सबही संस्कृत माह कहाऊ ॥
सतये स्वसंवेद कह येही । अज हरि हर मथुरा धर देही ॥
तीनों देव पिता सब नरके । तीन लोक ब्रह्मा हरि हरके ॥
ब्रह्म श्वासते वेद उपानी । उचरे तीन देव सुख बानी ॥
संस्कृत सुर बानी होई । ताते श्रेष्ठ और नहिं कोई ॥
इति देश
अथ ब्रह्मा और आदमकी एकता—चौपाई
ब्रह्मा आदम एकै अहई । सत्यकबीर बचन अस कहई ॥
ब्रह्मा सावित्री नर नारी । आदम होवा ताहि पुकारी ॥
ब्रह्माको काशीमें वासा । अदनवाग सो नाम प्रकाशा ॥
काशी सम कोइ पुरी न आना । देखो काशी खंड प्रमाना ॥
बन अनंद पथमें कहलाया । वाराणसी बहुरि बतलाया ॥
नाम तासु कहिये पुनि वासी । सब अनंद सब सुखकी रासी ॥
वाराणसी सो भयो बनारस । सुखसे सावित्री ब्रह्मावस ॥
आदिमें कहे जो वन आनंदा । अरबी अदनबाग सुखकंदा ॥
वन है बाग अरबकी भाषा । नाम अनंद अदवसों राखा ॥
उलटि आनंद अदन हो सोई । कहे अरब पारसके लोई ॥
संस्कृतकी बोली बहुतेरी । अरब लोग उलटा कहि टेरी ॥
वन अनंद बाग अदन जो भैऊ । वाराणसी बनारस कहेऊ ॥
अरब न संस्कृत सके उचारी । उलटा सुलटा सो करि डारी ॥
इति आदमब्रह्मा
( २०४८ )
बोधसागर
१४०
अथ मनुशतव्रता और नूहकी एकता-चौपाई
मनुशतव्रता नूहको जानी । पल्लय पयोध जो राख्यौ प्राणी ॥
नाव बहेतरा मनु नृपाला । रच्यौ बचावनजिव तेहिकाला ॥
ताही बहेत्रा सकल चढ़ाई । तेहि औसर जल परलय आई ॥
तब हरि लियौ मीन औतारा । दौय सींग निजु शीशमें धारा ॥
मीन रूप जो विष्णु बनाई । ताहि बहेत्रा शृंग लगाई ॥
भलिबिधि बांधे बहेत्रा ताही । निजु बलते गहि राख्यौ वाही ॥
नाव बाँधि हरि आन्हा दैऊ । मनुजाये तह आसन गहेऊ ॥
लीने सप्तऋषी निजु संगा । आठ जीव बैठे यहि ढंगा ॥
चहुँ दिश तबहि जलामय होई । भे संहार बचा नहिं कोई ॥
तरे बहेत्रा जलके माही । आठो जीव तहां बचि जाही ॥
प्रलैय कीन फिर सृष्टि बसाये । धर्म महम्मद अस बतलाये ॥
प्रलय पिछारी नूह पुकारा । प्रथमें नाम और कछु धारा ॥
आदिको नाम नूह ना होई । बदलि गयौ पीछे ते सोई ॥
इति मनुशतव्रत।
अथ महादेव और महम्मदकी एकता-चौपाई
श्रीमुख सत्यकबीर बखानी । महम्मद महादेव सो जानी ॥
महादेव क्षत्री रन वाके । सोह महम्मदकी है साके ॥
धर्म जासुको शस्त्र प्रहारा । सोई करे सृष्टि संहारा ॥
तमगुण आदिमें वेद बखाना । रुह महम्मद प्रथम उपाना ॥
तमगुण आदि सृष्टिको करता । भवसागर ताते थिर धरता ॥
भव है नाम महादेव केरा । ताते यह भवसागर टेरा ॥
भव भवानी द्वै रूप बनाया । भवसागर सरदारी पाया ॥
शिवके संग नारि द्वै जानी । शीश गंग कटि गौरि भवानी ॥
महम्मदमें मकार द्वै देखो । दोहू नारि तेहि संग विशेषो ॥
दोउ मकार महम्मद नामा । गंग गौरि बरणो वर बामा ॥
१४१
जीवधर्मबोध
( २०४९ )
आप भिखारी अनधन देही । महम्मद महादेव है येही ॥
धन अरु दर्ब चाकरन पाही । आप अलोनो साग जो खाही ॥
महा उदार महम्मद दाता । जत्तमाह सो शिव विख्याता ॥
योग भोग दोनों गुण भीजा । साबर मन्त्रो दोवा तवीजा ॥
योग युक्ति शिववर्त बताया । उत नमाजा रोज ठहराया ॥
ये ऊँकार शब्द गोहरावै । वे भोरे उठि बाग उठावै ॥
खड़ी एक नस महम्मद माथे । दंडाकार तिलक तेहि साथे ॥
प्रकट दोऊ भृकुटीके बीचे । मस्तक अंत प्रजंतलों खींचे ॥
जस कबीरमुनि तिलक कराही । सोई महम्मद मस्तक माही ॥
कोधवंत जब महम्मद बोले । तेहि औसर सोई नस डोले ॥
रोमधार यक उर बिच धारी । सोऊ दंडाकार सँवारी ॥
नाभिते कंठप्रजंतलो सोही । जन कबीर मुनि रूप है ओही ॥
शिवके संग रहे बहु देवी । तिमि बहु तारि महम्मद सेवी ॥
चीन्ह चक्र सब ताके साथ । आदिभक्ति सोई पशुनाथा ॥
इति श्रीमहादेव और भहम्मदकी एकता
अथ हनुमान और अलीकी एकता
छन्द—मूलना
हंक हनुमानते लंकमें शंकभ अलीके हंक गढ बंक टूटे ।
अली हनुमान दोऊ बांहके बली अरि अनी दलमली ज्यौ
सनी कूटे ॥ १ ॥ शूद्र जेहि शत्रुगण वीर्य सामुद्रधन रुद्र शिव
देखि दल दैत फूटे ॥ शूर संग्राममें गुणनके धाम दोऊ अली
हनुमान गुणमाहँ जूटे ॥ २ ॥
इति हनुमान
अथ परशुराम और मूसाकी एकता—चौपाई
परशुराम मूसा यकताई । ऐसे दोहुको मेल मिलाई ॥
( २०५० )
बोधसागर
१४२
विप्र अवज्ञा कीनो हरिकी । क्रोधवन्त कमला तबसरकी ॥
विष्णुकि छाती चरण प्रहारा । सब दुःख द्रन्द्व घेर तिहि बारा ॥
रहे बेहाल काल बहु तेरे । तब प्रभु तिनिहि दयाद्वग हेरे ॥
परशुराम लीनों औतारा । ब्राह्मण कुलको पा ८नहारा ॥
विद्या बुद्धि तपोधन धारी । रूप शील बल वीरज भारी ॥
सो द्विजराज काज चित दीने । क्षत्री मारि निछत्तर कीने ॥
तथा यहूदिन विकल विचारा । तब मूसा लीनो औतारा ॥
सो फिर उनको मारि नसाया । इवरानिनको प्राण बचाया ॥
विद्या बुद्धि निपुण गुणखानी । बल वीरज शोभा सरसानी ॥
परशुराम कर फरसा जोटा । तैसे मूसाके कर सोटा ॥
जैसे ब्राह्मण तथा यहूदी । दोनों माह देखिये खूदी ॥
कुल अभिगान दोहुनमें भारी । अबिरहाम वंश तन धारी ॥
परशुराम मूसा यक सारा । दोनों विष्णु केर औतारा ॥
इति परशुराम और मूसा
अथ कृष्ण और कृष्णकी एकता—चौपाई
कृष्ण कैष्ट दोउ एक समाना । हरि औतार धरे नर बाना ॥
कैष्ट नाम ईसाको आही । अंग्रेजी बोलीके माही ॥
हिंदू कहे कृष्ण जगदीसा । ईसा इनके ईस हैं ईशा ॥
कृष्ण आगमन जबहि जनायौ । सो सुनि कंसराय भय पायौ ॥
इसा जन्म भव्य सुनि काना । तबहि रोद भूपति भय माना ॥
कृष्ण जोजन्म भयौ जेहि बारा । चहुँदिस फैल गयौ उजियारा ॥
कंसकी डर वसुदेव डेराये । मथुरासे गोकुलमें ल्याये ॥
यथा कृष्ण मथुराको त्यागे । तैसे ईसाको ले भागे ॥
गर्भसे जब ईसा प्रकटाने । चहुँदिश तबहि तेज चमकाने ॥
यूसुफ नृप हिरौद भय पाई । ले मसीहको मिश्र सिधार्ई ॥
कृष्ण जन्म सुनि कंस डेरायो । केते बालक मारि नशायो ॥
१४३
जीवधर्मबोध
( २०५१ )
ईसा भय हिरोद भूपाला । हने बहुत बालक तेहि काला ॥
रोग अनेकन कृष्ण घटाये । जीव केर दुःखद्वन्द्व हटाये ॥
मृतकहूको फेरि जिलाये । गुण अनेक कहलों बतलाये ॥
सा सबही गुण ईसा माहीं । देखि द्वैतदल दूर पराहीं ॥
इन असुरनको मारि नशाया । उन भूतन अरु प्रेत भजाया ॥
कुबरी कूबर कृष्ण सुधारा । तिमि ईसा कुबरी सुखसारा ॥
साठि हजार शिष्य संग लयऊ । दुर्वासा ऋषि आवत भयऊ ॥
चावल एक कृष्ण भंडारा । सबको तृप्त कीन तेहि वारा ॥
रोटी पांच मीन द्वै रहई । सो मसीह निज करमें गहई ॥
पांच हजार भीर नरदीसा । सबको पेट भन्यौ तेहि ईसा ॥
ज्वाला कठिन कृष्णकर घाटा । ईसा अंधकारको डाटा ॥
अर्जुन पर हरि कीनी दाय। तिहि निजरूप विराट देखाया ॥
तिमि ईसा शोभा सरसाई । निजशिष्यन निजरूप दिखाई ॥
कृष्णमें केते गुण सरसाई । तिमि कोइ गुण ईसा अधिकाई ॥
कृष्ण किष्ट दूनों यक रूपा । उभय भये भवसागर भूपा ॥
कृष्णमृत्यु जिमिप्रथम बताया । भील तीरते प्राण नसाया ॥
जगमें जगन्नाथ जग मगही । कृष्ण अस्थि हरिमेला लगही ॥
ईसा को तिमि क्रूस चढाये । जिये बहुरि निज पंथ चलाये ॥
इन गीता उत कथा इञ्जीला । दोनों विष्णु स्वरूप सुशीला ॥
इति श्रीकृष्ण और कृष्णकी एकता
अथ राजा और पण्डितकी एकता चौपाई
राजा पंडित एक समाना । जगमें श्रेष्ठ दोहूका जाना ॥
राज पाये इनके मद भारी । विद्या मद उनके अधिकारी ॥
ये बस करे सेन ले लोहा । अमृत वचन ते मेमन मोहा ॥
ये धन हरबे मनको हरते । हुकुम दोहूको जगमें बरते ॥
इन धन अरु दर्प घनेरा । उनके विद्या धन बहुतेरा ॥
( २०५२ )
बोधसागर
१४४
दिग विजयी दोनों तन धारी । विषयानंद अहै संसारी ॥
इनकी तृष्णा न धनते हटई । वह दिन दिन विद्यामें डटई ॥
धन विद्या बन माह भुलाने । ताते नहीं सतपदको जाने ॥
दोना जो विषयनको तजई । है निरद्वंद जो हरि पद भजई ॥
जत्कमें उत्तम देखो जैसे । भक्तमें श्रेष्ठ होहि सो तैसे ॥
विद्या भक्तिको अंग विचारी । तासु दृष्टि पांडितको भारी ॥
ताते बुध नृपते बड़ अहई । वेद प्रमान शास्त्र अस कहई ॥
विद्याधन सब धनन बड़ेरा । अंग सद्ग ताको नित हेरा ॥
राजकर्म पंडित आधीना । बिन पंडित हो महीप मलीना ॥
इति एकता
अथ भवसागर वर्णन
दोहा-भवसागर वर्षा न करो, सुनो सयाने सन्त ।
जामें गोता खात जिव, लहै न कोई अन्त ॥
सोरठा-भाँति भाँतिके जीव, चौरासी लख योनि जग ।
विलग विलग कर पीव, खानि-खानि बिलगायके ॥
चौपाई
यह भव उदधि अपार बखाना । गोता खाहि जीव विधि नाना ॥
चौरासी लख योनि भ्रमावै । बूढ़े उछले पार न पावै ॥
जेते जीव भवनधि तन धारी । मानुष देह मुक्ति अधिकारी ॥
सो मानुष तन दुर्लभ कैसे । जैन धर्म वर्णन कर ऐसे ॥
यह दृष्टांत सुनाये सोई । अस चौड़ा सागर जो होई ॥
कोटिन योजनकी चौड़ाई । भवनधि थूल कहा कहिजाई ॥
बैल केर जूवा गहि लीजै । जूवा डंडा अलग करीजै ॥
तेहि समुद्रके एक किनारे । जूवाको डंडा गहि डारे ॥
जूवा डारे दूजे छोरा । मारे वायूको झकझोरा ॥
बहुत फिरे डंडा अरु जूवा । बहै सदा इत उत सो हूवा ॥
१४५
जीवधर्मबोध
( २०५३ )
जो संयोग कबहु गह सोई । जूवा दंड यकठे होई ॥
आपै आप मिले जो आई । पैठे ताहि छिद्रमें जाई ॥
बिन सहाय जूवामें पैठे । पहिली ठौर ठेकाने बैठे ॥
ऐसी दुर्लभ मानुष देही । चौरासी भ्रम पावै येही ॥
धर्म महम्मद बहुरि बतावै । एक बार मानुष तन पावै ॥
सूसा ईसा मतमें सोई । फेर नहीं मानुष तन होई ॥
वेद करे पुनि ऐसे वर्णन । पुनि पुनि जीव लहै मानुष तन ॥
आठ लक्ष योनी भ्रमि आवै । पुनि गह जीव मनुष तन पावै ॥
सत्यकबीर जो बचन उचारा । अति दुर्लभ मानुष औतारा ॥
नरतनु पाये न भक्ति विचारा । सो पापी आतम हत्यारा ॥
सुरदुर्लभ यह मानुष देही । सो तन लहै भजु परम सनेही ॥
चार खानिके जीव अपारा । जो थावर जंगम तन धारा ॥
कोइ दीर्घ कोइ सूक्ष्म देखो । भारी थूल हरु लघु लेखो ॥
नाना वर्ण और गुणधारी । पूरि रहे भवसागर झारी ॥
युगन प्रजंत काहु थित गाई । अतिसै लघु आयू कोइ पाई ॥
स्वर्ग नर्क चौरासी लाखा । सो सब अंड पिंडकी साखा ॥
भवसागर त्रिदेव भे राजा । सब जिव तिनके देठ विराजा ॥
सोई सुर सुरपति शिरताजा । तिनके हाथ है काज अकाजा ॥
भवसागरमें द्वै तट जानो । एक लोक यक वेद बखानो ॥
वेद कूलपर मन आसीना । लोकछोर माया गहि लीना ॥
मध्यमें तीन देव गुणधारी । महा अपर्बल पाँच शिकारी ॥
भ्रमसागर कहिये भवसागर । दश दिश काल मचायौ झागर ॥
भव पुनि भगको नाम कहावै । तामें सब जिव आवै जावै ॥
भव शिव नाम भवानी पतिको । जीव लखै को ताकी गतिको ॥
तीनों लोक वसै भग माही । बिन गुरु कृपा न बाहर जाही ॥
कोटिन योग युक्ति जो करिये । भग मारग पुनि पुनि पग धरिये ॥
( २०५४ )
बोधसागर
१४६
चौरासी लख मीन बनाये । मन मछुवा सब तिनहि फसाये॥
सत्यकबीर वचन-शब्द
तन झौपडी मन बसै महरवा ।
नान्हेनान्हे डोभवन बीनै महजरवाडारि दिये नियक भरमसगरवा ।
गहिरैमें महरा पैठि न सकै विन बूड़े नहि मिलत सिकरवा ॥
यक ओर महरा यक ओर महरी मारि लिहे नियक मोहमछरवा ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो ताकि लिहे नियक अमर सहरवा ॥
चौपाई
तीन देवमें विष्णु बड़ेरे । तिनको हुकुम फिरे चहुँ फेरे ॥
तीन लोक भवसागर माही । तीन देव तहाँ राज कराही ॥
तीन लोकको सूत्र बखानो । जामें सकल जीव भरमानो ॥
प्रथमहि विष्णु सर्व शिरमौरा । तासु हेठ सुरगण सब औरा ॥
दुतिये पौरी विद्याधर है । नहीं देवता नहिं सो नर है ॥
सुर नर माह जान यह सीढी । भाषो बहुरि तीसरी पीढी ॥
नर वानर यक लेखे कहिये । यक व्यौहार दोहमें लहिये ॥
दोनों बीच भेद अति थोरा । पशु अरु मानुषमें यह डोरा ॥
विन दुम नर कपि पूछ समेता । नर वानर यक गुण कह केता ॥
औरैंग औटैंग वानर जोई । नर आकार सर्व सो होई ॥
अंगरेजीके ग्रंथन माहीं । विना पूछ वानर यह आहीं ॥
दोनों पगते नर ज्यों चाले । दोनों हाथ काममें डाले ॥
वानर इतर जाति बहु तेरे । भिन्नभेद क्रम क्रमसे हेरे ॥
अंगरेजी अखबार बखाने । द्वै मानुष दुमदार लखाने ॥
हवशदेशको जंगल जहँवा । द्वै मानुष दुम युत रह तहँवा ॥
डेढ़ हाथकी पूछ सो गहई । मादमें पशु समान सो रहई ॥
एक जाति मानुषको आही । रहे हिमालय पर्वत माही ॥
ऐसो निकट छोड़ तनधारी । पंछिन संग मचावै रारी ॥
१४७
जीवधर्मबोध
( २०५५ )
चील्ह गीध गहि गगन उड़ाही । तेहि मानुषको धरि धरि खाही॥
तब सो नर गण जोरि सहाई । पंछिके संग करे लड़ाई ॥
ऐसे विविधि भांति नरजाती । तिनकी कथा न कथे सिराती ॥
नानारूप बरण गुणधारी । जहाँ तहाँ पृथ्वी माह विहारी ॥
चार लक्ष मानुषकी जाती । तिनकी कथा कथे बहु भांती ॥
जलमानुष थलमानुष देखो । वनमानुष आदिक बहु लेखो ॥
पशुमानुष कहु मिश्रित होई । अकथकथा कहि जात न कोई ॥
बहुरि कहो मानुष पशु ख्याला । सब परिवार जो करे उगाला ॥
भोजन पीछे पागुर करही । बिन उगाल तिनको दुःखधरही ॥
पशु नर नरपशु एक सो हेरी । देखहु कुदरत करता केरी ॥
छायारूपी नर कहु सरसै । चेष्टा दीख रूप नहिं दुरसै ॥
रचना विविधि भांति कहि गार्ई । ताको लेख लिखो नहिं गार्ई ॥
चौथो सूत्र बहुरि कहि गावो । जलचर मानुष मेल मिलावो ॥
रह समुद्रमें गर्गन मच्छी । अर्थ है मीन अर्थ तिय अच्छी ॥
कटिके ऊपर सुन्दर नारी । अर्थहेट मच्छी तनधारी ॥
कबहुके सागर तीर सुरखारी । कबहुके जलमें गोता मारी ॥
भुंगी ऋषि शिर सींग बताई । मुखमें सुण्ड गणेश गोसाई ॥
पंचम पौरी करो बखाना । पशुपंछीको मेल मिलाना ॥
चाम सुन्दरी वाको कहई । दोनों रंग ढंग गुण गहई ॥
सो नहिं खग अंडजकी जाती । चाम गूदरी है बहु भांती ॥
नहिं पशु नहिं खग मध्यम थापू । सुरगी एकसै परसे टापू ॥
वृद्ध नारि सो सुख है जाको । जब कोइ दुःख देत है वाको ॥
रुदन विलाप करे जस नारी । केते पशु खग नरगुण धारी ॥
दाडुर एक अमेरिका देश ! रुदन करे जब लहे कलेशा ॥
छठी पौरी बरणो सोई । जो चेतन रूप जड़ होई ॥
( २०५६ )
बोधसागर
१४८
लजवंयक पौधा चेतन । पशु पंछी सम चेत तासु तन ॥
जड़ चेतन गुण दोहू गहावै । पशु पौधाको मेल मिलावै ॥
सतई पौरीको अर्थावो । जो चेतन जड़ सम स्थिलावो ॥
पलपी तारा दोनों मछरी । सो सम चेतनते अति पछरी ॥
जड़ समान यक ठौर गहाई । हले न चले गहे थिरताई ॥
पलपी देह दाग बहुताई । जो कोइ ताको काटै जाई ॥
जैसे माली कलम लगावै । फूल बेलको काटि बनावै ॥
जेतनो टूक करें कोइ ताको । होहि पालपी सबही वाको ॥
जेतनी दाग रहे तब माही । सो सबही पलपी है जाही ॥
जड़ चेतन दोऊ ता ढंगा । जड़समान चेतनको अंगा ॥
अष्टम पौरी कहो बखानी । जड़मय योनि गोदजिव जानी ॥
नर नारकी लोक जिव पौरी । जड़सम सदा रहै एक ठौरी ॥
नर्कहेत नारकसो नाही । जैन मते दुख देखो नाही ॥
तीन लोकको सत जो भाषा । काया तरुकी पह सब साषा ॥
जैसो कर्म जीव जो कर्ता । तैसो तनधरि जगमें वर्ता ॥
सब जिव पुण्य पापकी आसा । पुनि पुनि कर योगिनमें वासा ॥
इति जीवधर्मबोध समाप्त
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The emblem is centered on a red background. It consists of a golden teardrop-shaped frame containing the Devanagari word 'प्रेमी' (Premi). Below this frame is a golden ribbon or banner with the text 'खेमराज श्रीकृष्णदास' (Khemraj Shri Kunnadas) written in Devanagari script. The entire emblem is surrounded by a wide, ornate golden border with a repeating pattern of stylized floral and geometric motifs.
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई.