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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

( २०३ )

सार शब्द निःअक्षर आहीं । गहै नाम तेहि संशय नहीं ॥
सार शब्द जो प्राणी पावै । सत्तलोक महि जाय समावै ॥

साखी—कहै कबीर विचार के, सुनहु साधु धर्मदास ।

अमरमूल निज शब्द है, ताकर अस परकास ॥

चौपाई

अमर मूल ग्रन्थ में सारा । बिना अमर नहिं हंस उबारा ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कर जोर निहोरा । स्वामी सुनिये बिनती मोरा ॥

कवन प्रसाद दरश हम पाया । कवन प्रसाद अमर भइ काया ॥

कवन प्रसाद साधु कहलायऊ । कवन प्रसाद हंस गति पायऊ ॥

कवन प्रसाद ज्ञान हम पाया । कवन प्रसाद अमर भइ काया ॥

कवन प्रसाद नाम हम पाया । कवन प्रसाद हम लोक सिधाया ॥

कवन प्रसाद सजन जन जानी । सो समुझाय कहो मोहि बानी ॥

सद्गुरु वचन

कहैं कबीर सुनौ धर्मदास । यह सब भेद कहों परकास ॥

पुरुष दयातैं दर्शन पावा । कोटि भक्ति सत नाम समाया ॥

जब कीन्ही सतगुरु ने दया । नाम जान अमर भई काया ॥

सेवा कीन्ही साधु कहाए । लोक जायके हंस कहाए ॥

हेत दीप सज्जन जन जाना । कहैं कबीर भेद निर्वाना ॥

साखी—एक नामकी शोभा, कहैं लग कहों बखान ।

निःअक्षर जो जानि है, सोई सन्त सुजान ॥

चौपाई

सत सहिदानि तोहि समझाई । अमर मूल महि देखौ आई ॥

कोटि जन्मको पातक होई । नाम प्रताप जाय सब खोई ॥

नामहि गहैं सूरमा जानी । बिना नाम कायर सो मानी ॥

( २०४ )

अमरमूल

नाम बिना सबही बिधि हीना । नाम बिना है ज्ञान बिहीना ॥
नाम बिना सो मूरख कहिये । नाम बिना सो पापी लहिये ॥
नाम जान सोई गुण आगर । नाम जान पहुँच सुख-सागर ॥

छंद

नाम अमी अमोल अबिचल अंक वीरा पावही ।
तज कागकि चाल मरालपथ गह अमरलोक सिधावही ॥
जिमि सदन दीपक बिना नहिं मिटत है अँधियार हो ।
तिमि नाम विन सुनु दास धर्मनि नहीं घट उजियार हो ।

मोरठा-नाम अमोल अपार, अमर मूल मैं वर्णैऊ ।

करहि कर्म जर छार, कहै कबीर बिचार कर ॥

इति श्रीअमरमूल नाम लोकमहिमा वर्णन ।

द्वितीय विश्राम

धर्मदास वचन-चौपाई

बिन्ती इक मैं करों गुसाईं । जिहि तें मन की संशय जाईं ॥

अमरमूल का कहौं विचारा । जाते हंस उत्तर है पारा ॥

कौन भक्त सों हंस कहावा । कौन विधीसों पंथ चलावा ॥

सो मर्यादि देहु बतलाई । तुम प्रभु ही हंसन सुखदाईं ॥

सद्गुरु वचन

कहै कबीर सुन धर्मनि नागर । यहविधिहंस पहुँच सुख सागर ॥

प्रथम करै सतगुरु की सेवा । जाते मिटै काल कर भेवा ॥

महा प्रसाद प्रेम सो पावै । सेवा कर निज गुरुहि मनावै ॥

घट में राखे प्रेम अनंदा । चौरासी के छूटे फंदा ॥

गुरु साहिब एकहि कर जाने । सो हंसा सतलोक पयाने ॥

साधन सों एकहि मति रहई । दुबिधा भाव न कबहुँ करई ॥

गुरु साधु सेवा जिन कीन्ह। ताकहँ मुक्ति निकट हम दीन्ह। ॥

बोधसागर

( २०५ )

सारखी-गुरु संतनको जान कै, हृदय करै परतीत ।
कहे कबीर सो हंस है, चलि है भव जल जीत ॥

चौपाई

सतगुरु तहां आरती करहीं । सब तज जहां जाय पगु धरहीं ॥
चरणाश्रुत साधन को लीजै । मुख पूजाकर अचवन कीजै ॥
गुरुकी दया निरवरत रहई । निंदा रूप न कबहूँ करई ॥
निःअक्षर सुमिरौ चितलाई । जासों आवागवन नसाई ॥
निःअक्षर को निरैवे भावा । देह छोड़ सतलोक सिधावा ॥
गुरुके वचन सोचकर माना । नाम बिना मिथ्या जगजाना ॥
और न देख और नहिं पेखै । निस दिन पल २ नाम विवेखै ॥

सारखी-छूट पसारा देख जग, करनी देय बताय ।
एक नाम कहैं जानके, ता महीं रहै समाय ॥

चौपाई

कर्म भर्म की छोड़हि आशा । एक नाम सों कर विश्वासा ॥
कुलकी लब्धा भर्म नसावै । ऐसी रहिनी साधु कहावै ॥
यह विधिसों तुम पंथ चलाओ । जन्म जन्म को पाप नसावो ॥
वंश तुम्हार लोक कहैं जाई । नाम बिना बूड़ी दुनियाई ॥
नाम जान सो वंश तुम्हारा । बिना नाम बूड़ा संसारा ॥
नाम पार नहिं वेदन पावा । नेति नेति कर सब गुहरावा ॥
आदि ब्रह्मको पार न पावे । पठ पठ पण्डित भर्म लगावे ॥
मुक्ति पंथ नहिं सुतै समावा । पठ गुन थकित पार नहिं पावा ॥
अंतकाल जम घेरै आई । तब विद्या कछु काम न आई ॥
विद्या पठ कीन्हा अभिमाना । अंतकाल होय नर्क निदाना ॥
वेद पुराण साख यह भाखा । नाम बिनाको जमसों राखा ॥
व्यास ब्रह्मकी अस्तुति कीन्हा । श्रीभागवत भाखनित लीन्हा ॥

( २०६ )

अमरमूल

काम रूपकर सबहि सुनावा । पंडित तासु मरम नहि पावा ॥
पुरन ब्रह्म नाहिं चित दीन्हा । काम रूप सबहीमहि लीन्हा ॥
बिन सदगुरु कोइ मरम न पावे । झूठ राह सबही लपटावे ॥
सतपुरुषको मरम न जाने । झूठहि धाय सांच कर माने ॥
झूठहि झूठ रहा लिपटाई । सतपुरुषको लखा न जाई ॥
अठारा पुराण ग्रन्थ बहु भाखा । तिनमहि सिरे भागवत राखा ॥
ब्रह्म महातम कहि समुझावैं । श्रीभागवत भक्त दृढावैं ॥
कृष्ण चरित्रसबकरहिबखाना । कृष्ण मरम काहू नहि जाना ॥
निर्गुन भक्ति नहीं चित दीन्हा । सर्गुण भक्ति सबहिगहिलीन्हा ॥
निर्गुन ब्रह्म मरम नहि जाना । शिव समाधिलगावहिं ध्याना ॥
विष्णु ध्यान कीन्हा मनमाहीं । अलख निरंजन देखैं छाहीं ॥
देखत छांहि मम्र मन भयञ्ज । निरंजन रूप विष्णु ह्वैगण्ड ॥
दैत्य देव कीन्हें उतपानी । कीन्हें दैत्य देवनकी हानी ॥
दैत्य मारिके देव छुडावा । ताते विष्णु सबन मन भावा ॥
गोपिन मिलकर रास पसारा । लीला एहि भक्त चित धारा ॥
ता लीला महि सृष्टि भुलानी । ब्रह्मादिक सबमुनि अरु ज्ञानी ॥
ज्ञान कथैं अरु जोति दृढावैं । जोति स्वरूप मर्म नहि पावैं ॥
जोति स्वरूप निरंजन राई । जिन यह सकल सृष्टि भर्माई ॥
सत पुरुष का मर्म न जाना । झूठ ज्ञान सबही लिपटाना ॥
सत्य पुरुष सतगुरु सों पावे । सत्य नाम महाँ जाय समावे ॥

साखी-कहे कबीर धर्मदाससों, अमर मूलनिज जान ।

अमर शब्द जा घट बसे, पावै पद निर्वान ॥

चौपाई

सत्य महाँ पावहु बासा । विना अमरनहिंकालविनाशा ॥
पठ पठ मूरख ज्ञान विगारे । ज्ञान गम्य नहिं कोइ विचारे ॥

बोधसागर

( २०७ )

ज्ञान गम्य जाके घट होई । शब्द खोज करि है जन सोई ॥
ज्ञान गम्य नहीं मूरख पावे । सतगुरु मिले तो भेद बतावे ॥
सब संसार दूण्ड फिर आवै । ज्ञान बिना सब मूल गँवावे ॥

साखी—संत मिले संशय नसे, नहीं तो पच पच मरना ।
नाव मिली केवटनहिं, किसी बिधि पार उतरना ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास कहै सुनहु गुसाई । ज्ञान शब्द मोहे समुझाई ॥
ज्ञान रूप सतपुरुष प्रकाश । सत्य लोक महँ कीन्हौ वासा ॥
किहिबिधि समझ परैयह बानी । कहिये सदगुरु नाम निशानी ॥

सदगुरु वचन

ज्ञान स्वरूप पुरुषकर आही । ज्ञानहि रूप कबीर लखाही ॥
ज्ञान प्रकाश दीप सम जानौ । बिना ज्ञान बस झूठ बखानौ ॥
बिना ज्ञान घटमें अधियारा । ज्ञानबिना नहीं होय उबारा ॥
ज्ञान बिना अक्षर नहीं पाई । ज्ञान रूप अक्षर है भाई ॥
ज्ञान रूप पुरुष कर जानौ । एही वचन सत्य कर मानौ ॥
ज्ञान रूप निःअक्षर कहिये । अक्षर भेद ज्ञान सो लहिये ॥
निःअक्षर हो ज्ञानहि जानौ । अक्षर निःअक्षर पहिचानौ ॥
ज्ञान शब्द पुरुष कर अंशा । ज्ञान जान जन सोह मम वंशा ॥
बिना ज्ञान नहीं वंश कहावे । ज्ञान होय तब शब्दहि पावे ॥
सोई वंश सत शब्द समाना । शब्दहि हेत कथै निज ज्ञाना ॥

साखी—कहे कबीर विचारकै, सुनियो हो धर्मदास ।

जो यह शब्दहि पाय है, करि है लोक निवास ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

बिनती करी धर्मनि कर जोरी । हे सम्रथ विनती यक मोरी ॥
जेहि तैं वंश शब्द कहँपावे । सत्य लोक कहँ सत्य सिधावे ॥
औ जीवन कहँ देहु दढाई । जाते जीव मुक्ति गति पाई ॥

( २०८ )

अमरमूल

अब मैं वंशका कहों विचारा । धर्मदास तुम अंश हमारा ॥
आदि नाम आमोदिक शाखा । सोई शब्द वंश कहैं राखा ॥
साठ सभै बारह चौपाई । एही तत्त्व हंस घर जाई ॥
जब माली का भेदहि पावै । सत्य नाम में जाय समावै ॥
ऐसो भेद सुनौ धर्मदासू । जन्म जन्म की भेटत त्रासू ॥
सद्गुरु दया कर्म होय छीना । अमर होय नामहि लौ लीना ॥
संशय का मैं कहों ठिकाना । संशय काल घटमाहि समाना ॥
जबही पुरुष धर्म कहैं कीन्हा । तबही संशय उत्पन लीन्हा ॥
निः अक्षरकी परिचय पावै । संशय मिटे अमर घर जावै ॥
संशय को खंडित है ज्ञाना । ज्ञान हीन संशय लिपटाना ॥
संशय काल सबन कहैं खाई । निःसंशय हो नाम समाई ॥
संशय काल लखै नहि कोई । तातैं गण बिगोय बिगोई ॥
संशय नाम सुनौ धर्मदासू । एक नाम की राखहु आसू ॥
नाम छोड़ अन्तहि चित आनै । संशय तमहि पकर गहि तानै ॥
नामहि गहै तेहि निहसंसा । नाम बिना बूढे सब हंसा ॥
सारखी-कहैं कबीर धर्मदाससों, संशय को विस्तार ।
एक नाम कहैं जानके, उतरहु भौ जल पार ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी संशय उत्पानी । ज्ञान हीन सब जीवहि जानी ॥
विरला हंस होय अंकुरी । सो यह ज्ञान गहै निज मुरी ॥
ज्ञान लखे बिन मुक्ति न होई । तौ यह दुनियां जाय बिगोई ॥
नाम महातम भाख सुनावा । बिना नाम कोई पार न पावा ॥

सद्गुरु वचन

कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । यह निज भेद कहौ तुमपासू ॥
ज्ञान हीन प्रानी जो होई । ताकर भेद कहौ मैं सोई ॥

बोधसागर

( २०९ )

ता कहैं दीजै पान प्रवाना । निश्चय हंस होय निर्वाना ॥
और प्रतीत हीय मैं धरई । सो प्राणी भवसागर तरई ॥
पान पाय सत्यहि मुख भाखै । सदगुरु चरण हियेमें राखै ॥
सदगुरु केर निछावर करई । साधु चरण चितनिश्चय धरई ॥
तन मन धन संतन पर वारै । सतगुरु चरण हृदयमें धारै ॥
सुत नारी कर मोह न आवै । सबही त्याग चरण चित लावै ॥
चरण धोय चरणाभूत लीजै । सत्यलोक महाँ अमृत पीजै ॥

धर्मदास वचन

पुरुषरूप कर यह उपदेशा । नारी को अब कहौ सँदेशा ॥
नारी नाम सुक्ति किमि होई । ताके घट महाँ ज्ञान विगोई ॥

सदगुरु वचन

ताकर तोहि भेद समुझाऊँ । मनो कामना सकल मिटाऊँ ॥
नारी तरै सुनो धर्मदासू । कहैं कबीर नाम विश्वासू ॥
ज्ञान हीन नारी को रूपा । ताको मैं सब कहाँ स्वरूपा ॥
तन मन धन संतन पर वारै । संतनकी सेवा चित धारै ॥
साधन सौ जो अन्तर करई । धर्मरायके फंदा परई ॥
गुरुके चरण निछावर जाई । तन मन धन सब देय चढ़ाई ॥
गुरुकी सेवा निशिदिन करई । सो तिरिया भवसागर तरई ॥
ऐसी धरन धरै धर्मदासू । तबही मिटै कालकी फांसू ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिन्ती अनुसारि । हे स्वामी तुम्हरी बलिहारी ॥
यही वचन प्रभु मोहि सुनाऊ । मोरे मन इक भर्म समाऊ ॥
नारी रूप सकल हम जाना । पुरुष रूप एकहि पहिचाना ॥
नारी कहिये सब संसारा । आदि ब्रह्म है पुरुष अपारा ॥
आदि पुरुषहमतुमकहँ चीन्हा । दूसर पुरुष कहाँ अब कीन्हा ॥

नं. ७ कबीरसागर - ८

( २१० )

अमरमूल

जो तुम कही सोई हम जानी । नारी रूप सुर्त पहिचानी ॥
दूसर नारि कहाँ है कीन्हा । यही वचन हम संशय लीन्हा ॥
मैं नररूप आँहु मति हीना । यही भेद सुन भयउ मलीना ॥
तुम तौ दयावर्त गुरु स्वामी । क्षमिय चूक प्रभुअन्तरयामी ॥
नारी नाम मातु जो कहिये । इनहि भेद कैसे निर्वहिये ॥
नारी नाम बहिन जो आही । तासौँ कैसे अंक मिलाही ॥
नारी नाम पुत्री जो होई । तासौँ कैसे अंक सजोई ॥

साखी—यह सब भेद बतावहु, सुनहु हो बंदीछोर ।
यह संशय प्रभु मेटहु, चरण गहों प्रभु तोर ॥

सद्गुरु वचन—चौपाई

कहैं कबीर सुनो धर्मदासू । यह संशय उपजी तुम पासू ॥
आदि पुरुष तब हते अकेला । शब्द स्वरूपी पंथ दुहेला ॥
तब साहिब ऐसा मत कीन्हा । सकल सृष्टिरचिबेचित दीन्हा ॥
मनसा घटते भिन्न निकारी । उत्पति भई तहाँ इक नारी ॥
सोई नारि सकल जग जाया । भग भोगे तैं पुरुष कहाया ॥
भग द्वारे होय बालक आया । यही भांति सब जग भर्माया ॥
मैं तो एक मतौ रच जबही । पुत्र, बंधु पिता भयो तबही ॥
मैं तो एक नारीकर जबही । पुत्रि, बहिन माता भई तबही ॥
भाई बहिन कीन्हा व्योहारा । धर्मराय को यह संसारा ॥
यह संशय महाँ मार लै जाई । मार जार सब दुनियां खाई ॥
आपहि पिता आपही पूता । आपहि देव आपही भूता ॥
आपहि नारि रूप औतरिया । आपहि सकल सृष्टि विस्तरिया ॥
आपहि कर्म धर्म उपजावन । आपहि रचै आप विनसावन ॥
तातैं भेदे बताऊँ तोही । ज्ञानी होय समझ कर लेही ॥
धर्मदास को संशय छूटा । जन्म जन्मके पातक टूटा ॥

बोधसागर

( २११ )

ज्ञानी सों कहिये उपदेशा । मूरख सों जिन कहौ संदेशा ॥
संशय कीन्ह सकल जग भंगा । काहु न चीन्हा संशय अंगा ॥

साखी-कहैं कबीर सो बाचि है, गुरु चरण चित दीन्ह ॥
अमर मूल निज शब्द है, हंसा चित गहि लीन्ह ॥

चौपाई

धर्मदास तुम करो विचारा । विना शब्द नहिं उत्तरौ पारा ॥
सार शब्द सों सब उपजावा । नारि पुरुष दोई निरमावा ॥
सूरज पुरुष चन्द्र है नारी । यह घटमें द्वै रूप सँवारी ॥
जैसे धातु कनककी एका । साँचा माही रूप अनेका ॥
पाप पुण्य रूपहि सों बांधी । कीन्ह धर्म यह अगम अगाधी ॥
पाप रू पुण्य भर्म है भाई । धर्म राय सब भर्म उपाई ॥
भर्म अमल तबही मिट जाई । सत्य नाम जब रहै समाई ॥
जब लग भर्म अमल है भाई । तब लग नाम बूझ नहिं जाई ॥
बूझ सीख गावै बहु भाँती । सुमरन भर्म करै दिनराती ॥
आप न चीन्हे मूढ़ गँवौरा । भर्मी भ्रम भूला संसारा ॥
धर्मदास तुम भर्महि छाड़ौ । निर्भय होय नाम चित माड़ौ ॥
जो तुम भर्म करो जो माहीं । तौ कस हंसन लोक कह जाहीं ॥
भर्म छोड़के भक्ति दढावहु । यह विधि हंसनलोक पठावहु ॥
तुम कहैं दीन्ह जक्तकी भारा । तुम्हरी मुहर चलै संसारा ॥
हाथ तुम्हार जीव सब तरहीं । भवसागर तैं हंस उबरहीं ॥
धर्मदास जग पारस देहू । जीव छुड़ाय काल सों लेहू ॥
पारस नाम कहेउ उपदेशा । मूरख सो जिन कहो संदेशा ॥

छन्द-ज्ञानी कहैं यह भेद धर्मनि देहु तुम समुझायकै ।

रहन गहन विवेक बानी कहहु सकल बुझायकै ॥

( २१२ )

अमरमूल

नाम पारस परस घट महाँ काग होय मराल हो ।
अमर लोकहिं बास कर तहाँ नाहिं काल कराल हो ॥
सोरठा-करलेहु आप समान, गुरुभृंगी यह जीव को ।
देखकर नाम निशान, रूप बरख पल्टायकै ॥
इति श्री अमरमूल ग्रंथ नाममहिमा वर्णन तृतीय विश्राम ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास उठ बिनती लाई । तुम पर ताप हंस मुक्ताई ॥
किहिंविधिपलटै जिवकी काया । सो समुझाय करौ मोहे दाया ॥
हो सतगुरु तुम अन्तर्यामी । पारस भेद कहो मोहे स्वामी ॥

सतगुरु वचन-चौपाई

कहै कबीर सुन सन्त सुजाना । पारस भेद सुनाऊँ ज्ञाना ॥
ज्ञानी काहिं कहैं शब्द है सारा । यह पारस तैं हंस उबारा ॥
पारस पान बालक कहैं दीजे । तातैं हंस काल नहिं छीजे ॥
कामिनी कहैं पारस है सेवा । धर्मदास लखियो यह भेवा ॥
यही रहन तुम पंथ चलाओ । जीवन बोथ लोक पहुँचाओ ॥
तीनहु विधि यह कहै बुझाई । जो मानैं सो लोक सिधार्ई ॥
पुरुष होय शब्द नहिं जाना । निश्चय हुइहै नरक निदाना ॥
बालक हो वीरा नहिं पावै । कैसे कै वह लोक सिधावै ॥
कामिनि हो पारस नहिं लेही । गुरु सोई जो पारस देही ॥
कामिनि जो सो पारस लेही । कैसे मुक्ति होय पुनि तेही ॥
यासे गुरु जो अन्तर करई । धर्मराय के फन्दा परई ॥
गुरु नहिं शिष कहैं ज्ञान बतावा । यद गुरुमें फिर धोख समावा ॥
शिष्य जो गुरुसों अन्तर राखा । शिष्यमहैं धोखा सत हम भाखा ॥
गुरु सोई जो शिष्य समुझावै । शिष्य सोई जो गुरु मन लावै ॥

बोधसागर

( २१३ )

गुरु कहैं पेट करै अधिकार्ई । निश्चय नरक जाय रे भाई ॥
तुम सों भेद कही निहंतता । निश्चय वचन सुनो मतिमंता ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिनवैं कर जोरी । स्वामी सुनिये विन्ती मोरी ॥
नारी नाम नरक की खानी । सो गुरुको किमि दीजे आनी ॥
सकल नरक नारी ढिग कहिये । सोई नरक गुरु कैसे चहिये ॥
गुरुतो ब्रह्म रूप हम जाना । नर्क भोगे सो कौने ज्ञाना ॥
गुरुकी महिमा अगम बताई । नीच वचन कैसे कहैं साई ॥
नीच सोई जो नीची कहै । नीच पंथ सों पार न लहै ॥
ऊँचा होय सो गुरु पद धारा । नीचा छोड़ ऊंच भव पारा ॥
नीचे कर्म काट गुरु दीन्हा । गुरुका वचन मान मैं लीन्हा ॥

दोहा—सो अब मोहि बतावहु, तुम गुरु अगम अपार ।

धर्मदास की बीनती, सुनियो हो करतार ॥

साखी—रहित ज्ञान तुम भाखिया, सत्य शब्द ठहराय ।

व्यभिचारी महाँ सत कहौं, कहौ गुरु समुझाय ॥

सतगुरु वचन चौपाई

कहैं कबीर सुनो धर्मदासू । अब यह भेद कहौं तुम पासू ॥
हम जानी तुम संशय छूटा । काल कठिन भव तुम कहैं लूटा ॥
काल केरि गति तुम नहि जाना । झूठी मायामें लिपटाना ॥
जब जाना निज ब्रह्म स्वरूपा । ता कहैं नाहि रं क अरु भूपा ॥
नाम अमल रस छाके अंका । ताको कहा नरककी शंका ॥
तुम कहैं जीव बुद्धि नहि छूटा । ताते जमरा फिर फिर लूटा ॥
धर्मरायकी गति नहि जानी । हर मंदिर उपजाऔ आनी ॥
यह बाजी महाँ जीव भुलाना । शिवहिसमाधिलगावहि ध्याना ॥
विष्णु रूप काहू नहि जाना । सुर मुनि नर बूढ़े अभिमाना ॥

( २१४ )

अमरमूल

यही वचनमें सब जग वंध्य। नाम बिना नहि छूटत फंध्य ॥
झूठी माया सब जग फंदा। फंद कटे बिन नहि निर्द्वन्दा ॥
अज्ञानी जिव पर है फांसा। नर्क स्वर्ग दोऊ कर आशा ॥
संशय काटनको हम आए। धर्मराय सब दुनियां खाए ॥
ज्ञान सँवाद तुम कहैसमुझाए। तुम कहै धर्मराय भर्माए ॥
वचन हमारे दोष लगाए। झूठी माया तुम लिपटाए ॥
शिष्य सोईं गुरु बचनहि माना। आप ज्ञान बूझे नहि ज्ञाना ॥
गुरु प्रतीति हृदये नहि आई। तातैं बूड़ी सब दुनियाई ॥
बूड़त जाह थाँह नहि पावा। तातैं जन्म जन्म भर्मावा ॥
तब सतगुरु भये अन्तरध्याना। धर्मदास मनमहँ पछताना ॥

धर्मदास वचन

दया करौ गुरु पूरन स्वामी। मैं नहि जाना अंतर जामी ॥
हों अज्ञान तुम मर्म न जाना। जान बूझ भूले अभिमाना ॥
क्षमि अपराध मोर प्रभुराया। मोरे चित जो अन्तर आया ॥
तुम गुरु सतगुरु ब्रह्म समाना। मैं शिव आहुँ महा अज्ञाना ॥
कुवचन वचन बोल जो भाखा। माता पिता हृदये नहि भाखा ॥
करुणामय गुरु अन्तर्यामी। करहु दया अब मोपर स्वामी ॥
जो नहि दर्शन पाऊँ आजू। तजौँ प्रान मैं तुम्हरे काजू ॥
हे साहिब तुम पथ जो दीन्हा। तातैं तुमहि बूझ हम लीन्हा ॥

साखी-धर्मदास बिनखत बदन, करुणा बहुविधि कीन्ह।

दर्शन बिन अति विकल है, जल बिन तलफत मीन ॥

सतगुरु वचन-चौपाई

तबहि कबीर दया चित आई। धर्मदास तब दर्शन पाई ॥
दर्शन पाय भयो आनंदा। जैसे चकोर मिलत है चंदा ॥

बोधसागर

( २१६ )

गहि गुरुचरण बंदगी कीन्हा । चरण धोय चरणामृत लीन्हा ॥
बिन्ती कीन्ह चरण चितलाई । महा प्रसाद दीजिये साईं ॥
आमनिको अज्ञा तब दीन्हा । नाना व्यंजन तूर्तहि कीन्हा ॥
कंचन थार आरती चारी । सेवा बहुत हृदयमें धारी ॥
सुत नारी सब चरणन लागे । प्रेम प्रतीत भक्ति मन पागे ॥
चरणामृत सबही मिल लीन्हा । दिव्य ज्ञान सब कहैं कर दीन्हा ॥
साहिब चौका बैठे जाई । बहुत भौंति कर आसन लाई ॥
परस थार जब आमनि नारी । सुन्दर बदन प्राण अतिधारी ॥
मार मार प्रसाद लै खावहिं । प्रेमभाव साहिब मन भावहिं ॥
पाय प्रसाद पुनि अचवन लीन्हा । धर्मदास तब बिन्ती कीन्हा ॥
दया करहु अब मोपर स्वामी । बन्दी छोड़ु वर अनंतर जामी ॥
तब दीन्हऊँ प्रसाद गुसाईं । धर्मदास तब हवैं मन माईं ॥
जेतक साथ रहे घर नाहीं । वह सब आनंद भये मनमाहीं ॥
आमनि तबहीं पलंग बिछावा । सतगुरु तहां आन पौढावा ॥
धर्मदास तब पंख डुलावैं । आमनि चरण चापि सुख पावैं ॥
सकल साध हिल बंदगी कीन्हा । तन मन धन साहिब कहँ दीन्हा ॥
मेटी सकल जगतकी लाजा । ताते होय जीवको काजा ॥
धर्मनि तहां निछावर करहीं । बार बार बिन्ती अनुसरहीं ॥

साखी-यह तन लेव गुसाईं, जो होवे हम काज ।

तन मन धन कर निछावर, सुख संपति कुल लाज ॥

सदगुरुवचन-चौपाई

कर धर सिज्या पर बैठाया । अन्तर गति स्थिर ठहरावा ॥
जोई मुख सौं भीतर देखा । सबहि कसौटी कीन्ह परेखा ॥
साहिब तब ही दाय़ा कीन्हा । मस्तिक हाथ आमनिके दीन्हा ॥
जाहु न अपने घरके माहीं । सत्य तुम्हार देखे मन माहीं ॥

( २१६ )

अमरसूल

यह मन कर्म अकर्म करावे । देहके स्वारथ नाच नचावे ॥
तातें तुम मन थिर हम जाना । काल चरित्र छूटा अभिमाना ॥
हमरे देह काम नहीं होई । तुम अहंकार सकुल हम खोई ॥
धर्मदास तुम वंश उजागर । हंसन पहुँचावहु सुख-सागर ॥
निश्चय हुई है मुक्ति परवाना । सत्यलोक कहि देव पयाना ॥
वंश तुम्हार जहां लग होई । इनके हाथ मुक्ति सब होई ॥
वंश ब्यालिस अचल तुम्हारा । तिनके हाथ मुक्ति संसारा ॥
ब्यालिस मांहि त्रयोदश भाखा । अंश हमारहु हैं निज शाखा ॥
नाम जानते सबै उबारा । बिना नाम बूड़ा संसारा ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिन्ती अनुसारी । हे साहिब मैं तुम बलिहारी ॥
हमरे वंश कहैं पारस देई । तुम्हरे दरश बहुर कब लेई ॥
यही अर्ज मेरो सुन लीजे । वंश हमारहु आपनो कीजे ॥
जिहंते मुक्ति होय सब केरा । सो मोहे स्वामी कहौ नवेरा ॥

सद्गुरु वचन

तुम्हरे वंश को कहौ उपदेशा । जाते होय हंसको भेषा ॥
जो कोई हंस होय जगमाहीं । उबरहिं वंशनकी वाहीं ॥
वंश तुम्हार जे बालक होई । तिनसौ पारस ले सब कोई ॥
जा कहैं नाहीं ब्यापै कामा । निशदिन रहे शब्दमें धामा ॥
रहित गहिनसौ स्थिर अंगा । मनसा वाचा सत्य प्रसंग्रा ॥
सत पास को जानैं भेदा । आतम परसै सूक्ष्ममें भेदा ॥
ऐसा सज्जत शब्द सनेहा । प्रकट कबीर तासुकी देहा ॥
तिनसौ पारस भेद न कीजे । वंश मोर जो शब्द पतीजे ॥
पारस मांहि भेद जो करई । कहैं कबीर सो किहि विधि तरई ॥
बालक बोध कै पंथ चलाओ । बिना पंथ सोला नहीं पाओ ॥

बोधसागर

( २१७ )

बालक तेरे वंशके हाथा । पंथ दीन्ह मैं तिनके हाथा ॥
मुक्ति जान कर राखै गोई । तेहि सम झोही और न कोई ॥
शब्द जान कर पन्थ चलावै । देश देश फिर सब समझावै ॥
तौन देश गैवनइ कराई । सुर्तन बन्त हंसन मुक्ताई ॥
पुरुष आज्ञा जो मोकहैं दीन्हा । मुक्ति भेदसों सब कहि दीन्हा ॥
सार शब्दका भेद जो पावा । यह सब ज्ञान तोहि समझावा ॥
बिना ना मिट है नहिं संशा । नाम जान सो हमरे वंशा ॥
नाम जान सो वंश करावै । नाम बिना सो मुक्ति न पावै ॥
वंश तुम्हार नाम जब पाई । भवसागरतें लोक सिधार्द ॥
नाम न जान करै अहंकारा । सो जिव परि है भवजलधारा ॥
नाम जान सो वंश हमारा । बिना नाम बूझा संसारा ॥
बिना नाम सबही अभिमानी । नाम प्रचय कोई कोई जानी ॥
नाम निहश्चर कहा बुझाई । अमरमूल महाँ देखो आई ॥
निह अक्षर को पावै भेदा । सोई हंसा होय अछेदा ॥

साखी-कहै कबीर विचारकै, निःअक्षरको भेद ।

निःअक्षर जो पावहीं, सोई हंस अछेद ॥

चौपाई

निह अक्षर तुम ज्ञान सुनाओ । जम्बू द्वीप हंस मुक्ताओ ॥
ऐसा धरम धरे जो कोई । निश्चय पार पाय है सोई ॥
तुम धर्मदास पन्थके राजा । तुम्हरे हाथ जीव को काजा ॥
यही मता हम तुम कहैं दीन्हा । दूसर कोइ न पावै चीन्हा ॥
अक्षर भेद बसै जिहि अंगा । निस बासर हम ताके संगा ॥
सत्य लोक महाँ वासा पाई । अमृत भोजन करै अघाई ॥

छन्द-यही महिमा जीव धरहै, बाम करै सतलोक हो ।

काल फन्दा काटकै लै, धरौ हँसन थोक हो ॥

( २१८ )

अमरमूल

सुन्नन सिज्या बास लीन्हो, असन अमृत पावहीं ।
वस्त्र अम्मर पहिरकै तिन, जरा मरन नसावहीं ॥
सोरठा-षोडश भान प्रवान, धर्मनि शोभा हंसकी ।
पावो शब्द प्रवान, अञ्जलोक वासा कियो ॥
इति श्रीग्रंथ अमरमूल धर्मदास कसोटी, पारस भेद वर्णन-
चतुर्थ विश्राम

धर्मदास वचन चौपाई

धर्मदास तब विन्ती कीन्हौ । अबलगसाहिबहमनहिंचीन्हा ॥
जब तैं दाय़ा भई तुम्हारी । भयो प्रकाश हृदयमें भारी ॥
अमर लोकके हौ गुरु वासी । कारण वन आये अविनाशी ॥
मृतलोक आये किहि काजा । धर्मराय बड़ पापी राजा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मनि सुनौ वचन चितलाई । जीवन काज पुरुष पठवाई ॥
सत्यलोक तैं जगमे आवा । धर्मराय मोहे देखन धावा ॥
धर्मराय तब पूछी बाता । कवन काज तुम आयेउ ताता ॥
मृतलोक में अब मैं जाऊँ । हंसन काज पुरुष पठवाऊँ ॥
धर्मराय तब बोलन लीन्हा । हमरे देश मुक्ति तुम दीन्हा ॥
मैं तो तीन लोक कर राजा । तुम कस करो जीव करकाजा ॥
यह तो लोक पुरुष मोहे दीन्हा । तुम कस मोहे छुड़ावन लीन्हा ॥
अजहुँ भली है जाहु गुसाई । जीव जीव जन्तु मारो सब ठाई ॥
अगम अपार निरंजन देवा । तुम नहिं जानत मोरा भेवा ॥
किहि विधि हंस उतारो पारा । कौन भेद लै करो पसारा ॥
तब हम कहा सुनो धर्मराजा । जानत नाहिं मर्म तुम काजा ॥
हम बल एक शब्द का भाई । तेही के बल हंस मुक्ताई ॥

बोधसागर

( २१९ )

जहां नाम तहां तुम नहीं कोई । विना नाम है तुम्हरी छोई ॥
यह विधि होय हंस परवाना । आवा गमन तासु नहीं जाना ॥

धर्मराय वचन

जेतिक नामे मुख सुन्न करिया । सो सब नाम हमारे धरिया ॥
जो कोई धर्म करही संसारा । सो सब मोर आहि व्यवहारा ॥
बहुत भाँति मैं फंदा कीन्हा । शंकर सहित बांध मैं लीन्हा ॥
कवन नाम हंसन मुक्ताओ । सो स्वामी मोहे भेद बताओ ॥

ज्ञानी वचन

नाम हमार पुरुषके केरा । वही नाम सों हंस उबेरा ॥
धर्मराय तुम ताहि न जाना । अपने अवगुण भये विगाना ॥
यही नाम आपन घट लेते । जीवन कष्ट नाहिं तुम देते ॥

धर्मराय वचन

परम पुरुष है मोरा नाऊँ । दूसर पुरुष कहाँ निर्माऊँ ॥
मोरे आगे कवन कहावा । सब कहँ मार जार भर्मावा ॥
तीन लोक महँ जीव पसारा । उन कहँ मार करौ संहारा ॥
ब्रह्मा पुत्र हमारो भयऊ । अंतकाल ताही दुख दयऊ ॥
शिवसमाधि कीन्हा अहँकारा । प्रलय काल करौ जर छारा ॥
विष्णु बड़े सबही में अंशा । तिनकहँ मार करौ निरवंशा ॥
अपने अंश यही गति दैहौँ । सृष्टि संहार प्रलयकर लैहौँ ॥
तुम तो आए हंस उबारन । कवन भाँति करिहौ जगतारन ॥

ज्ञानी वचन

धर्मराय कहँ तब ससुझाई । तुम जीवनके दुष्ट कहाई ॥
जब तुमकीन्ह चोरको काजा । तानैं पुरुष मोहिं उपराजा ॥
नाम एक मोहे दीन्ह अमोला । वोही नाम जिव बन्दी खोला ॥
ठाकुर नाम तुम्हारा होई । तीन लोक ठकुराह समोई ॥

( २२० )

अमरमूल

पुरुष नाम तुम दीन्ह बिसारी । आपहि पुरुष रूप विस्तारी ॥
योग सन्तायन हमरौ नाऊ । तोहि कारण मोहे निर्माऊ ॥
तुम निज धर्म करौ अहंकारा । आदि ब्रह्म अहे रखवारा ॥

धर्मराय वचन

धर्मराय तब उत्तर दीन्हा । हम कहैं दया पुरुष ने कीन्हा ॥
तुमही दया करहु मोहि पाहीं । जिहिते मोर रहै जग छाहीं ॥
तुम जेठे हम लहुरे भाई । हम ऊपर तुम काहि पठाई ॥
पुरुष समानहिं तुम कहैं जाना । अपने मन तुम दूसर ठाना ॥
कहौ उपदेश सोह उपदेशा । जातें ऊजर होय न देशा ॥
पुरुष वचन हम शिरपर मानी । आज्ञा भंग करों नहिं ज्ञानी ॥

ज्ञानी वचन

योग सन्तायन बोलन दीन्हा । यह उपदेश पुरुष तोहि दीन्हा ॥
जा जिव पान प्रवाना पावै । ताके निकट काल नहिं जावै ॥
जो कोइ जीव होइ है ज्ञानी । ताकी तुम कीजौ महिमानी ॥
सार शब्द जो बालक पावै । तासो प्रेम बहुत तुम लावै ॥
यह उपदेश हमारौ लीजे । पुरुषके वचन मान शिर लीजे ॥
जो इतना नहिं करौ कबूला । तौ तुम सहहु दुःख बहु शूला ॥
पान प्रवाना शब्द न होई । जस जानो तस करिहौ सोई ॥
इतना धर्मराय जब जाना । जो तुम कहा सोई परवाना ॥
बिन्ती एक हमारी लीजे । नाम सन्देश मोहि कहि दीजे ॥

साखी-मैं उपदेश जो पावहुँ, सो सब कहहुँ तुम्हार ।

तुमहि पुरुषके अगुवा, हंस छुड़ावनहार ॥

ज्ञानी वचन-चौपाई

तब साहिब जो कहिबे लीन्हा । तुम नहि पावहु नामको चीन्हा ॥
जब तुम सत्यलोक महाँ रहिये । चौसठ युगलग सेवा करिया ॥

बोधसागर

( २२९ )

तबै पुरुष आज्ञा तेहि दीन्हा । सत्रह खण्ड राज्य तब दीन्हा ॥
तब तुम मान सरोवर जाई । कन्या देख बहुत सुख पाई ॥
पुरुष तोहि तब मार निकारा । तब हम भएऊ हंस रखवारा ॥
शब्द वार तब पुरुष सम्हारी । तुम्हरे टारे टरत न टारी ॥
मूल शब्दका का पावै भेदा । सोई हंसा होय अच्छेदा ॥
सोई भेद तुम नाहिंन पावा । कितनौ सेवा कर गुहरावा ॥
तुम कुबुद्धि औगुण बड़ कीन्हा । पुरुष आय पेल जो दीन्हा ॥
तबतै तुम्हरो भित्र पसारा । राज पसारेउ यह संसारा ॥
हम कहैं दया हंस की आई । दीन्ह पयान लोक तैं भाई ॥
बचन हमार मान सिर लीजै । शब्द खोजि अब नाहि करीजे ॥
जब तुम पाहौ शब्द ठिकाना । लोक तुम्हार न रहे निदाना ॥
सबै जीव सत लोकहि जाई । तुम्हरी नहीं रहै ठकुराई ॥
येही मन्त्र हमारो धरहू । शब्द खोज अब नाहीं करहू ॥
साखी-महा प्रलय जब होय है, देखि हो लोक हमार ।
तब हम तुम कहैं मिलिहिंगे, शब्द दोह टकसार ॥

चौपाई

सत्रह खण्ड तबहि मिटि जाई । रहै पुरुष तब शब्द समाई ॥
धर्मराय तुम पुरुष के अंशा । मिलहै शब्द मिटे सब संसा ॥
इतना वचन धर्म सौ कीन्हा । पीछे जगही प्याना कीन्हा ॥
ता पाछे संसारहि आये । पेडरमों बहु जीव छुड़ाये ॥
चार सिद्ध पर्वत पर पाये । तिनसों ज्ञान भेद समुझाये ॥
चारौ सिद्ध काल सों बाचा । दिव्य ज्ञान हृदय मंह साचा ॥
ता पीछे तुम्हरे ढिग आए । धर्मदास तुम दर्शन पाए ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिन्ती अनुसारि । है सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥
अगम ज्ञान तुममोहिं लखावा । हृदय कमल तुम मोर छुड़ावा ॥

( २२२ )

अमरमूल

धन्य भाग्य सतगुरु पगुधारा । अब भयोजीवन सुफल हमारा ॥
एक वचन मोहि कहौ बुझाई । जिह्तिं जीव की संशय जाई ॥
काल कठिन सो काहु न जाना । सो मोसौं कहिये परवाना ॥
जीवत काल चिन्ह जब पावै । तब तुम्हरे सतलोक सिधौवै ॥
जीवत काल चीन्ह नहि जाई । तो कैसे सत लोक सिधाई ॥
तुम तो ज्ञान बहुत उपदेशा । बिन देखे सब लगै अन्देशा ॥
दया करो अपनो जन जानी । काल चिह्न याऊ पहिचानी ॥
बिन चीन्है नहिं होय उबारा । भवसागर बांकी है धारा ॥
काल कठिन है जगकौ फंदा । किहिं विधिजीवहोयनिरद्वन्दा ॥
निरद्वन्दी मोहे करो गुसाई । तौ मैं पंथ चलाऊं जाई ॥

सद्गुरु वचन

साहिब तब कहिबे चितधारा । धर्मदास सुन काल पसारा ॥
काल अमल संशय है भाई । प्रथम काल तुम चीन्हौ आई ॥
जेतक कर्म करै संसारा । सो सब आहि काल व्यौहरा ॥
काल रुयाल जानत नहिं कोई । कर विपरीत सबन कहैं सोई ॥
दस औतार काल ने छलिया । काल अपर्बल सबकहैं दलिया ॥
मीन स्वरूप काल औतारा । कूर्म स्वरूप महा जो धारा ॥
बारह रूप औतार जो कीन्हा । नरसिंह रूप औतारजोलीन्हा ॥
वामन होके बलि कहैं छलऊ । परशुराम होय क्षत्री दलऊ ॥
राम रूप होय रावन मारा । कृष्ण रूप होयकंस पछारा ॥
बौध रूप जगन्नाथ औतारा । लीला बहुत भांति सम्हारा ॥
दस औतार कालके धरिया । म्लेच्छ मारसतयुगसोकरिया ॥
इतनी देह धरी युगमाहीं । काल अमल व्यापै तिनपाहीं ॥
काल मर्म काहू नहिं जाना । सबकहैं पकर कीन्हे पिसवाना ॥
काल पुरुष काहू नहिं चीन्हा । काल पाय सबहिन गहि लीन्हा ॥