कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
( २५३ )
ब्रह्म ज्ञान जाके घट होई । मरम पुरुष कहैं जाने सोई ॥
सत्य शब्दका मर्म जिन जाना । और सकल जग झूठ बखाना ॥
सबमें ब्रह्म रहौ भर पूरी । बाहर भीतर तत्त्व हजुरी ॥
दूजा काहु न देखै कोई । सत्य शब्द जाके घट होई ॥
जाको सद्गुरु दाया कीन्हा । सो पावेगा शब्दका चीन्हा ॥
अगम भेद लख पावै जोई । सतगुरु साँच और सब छोई ॥
सतगुरु महिमा ही लख पाई । सो सत लोक पहुँचि है जाई ॥
यहै ज्ञान धर्मन करहु सुन लेहू । सब कहैं सत्य शब्द कह देहू ॥
मिथ्या ज्ञान करहु उपदेशा । तो नहि पावहु लोक संदेशा ॥
जो तुम काज आपना चाहू । तौ जीवन कहैं सत्य लखाहूँ ॥
जो कोई शब्द सुनै तुम पासा । सोई करि है लोक निवासा ॥
जाके सत्य ज्ञान घट भयऊ । यारै प्रीति निज घर कहैं गयऊ ॥
अनमोलिक हीरा निज जाना । ताका मोल वही परमाना ॥
सोहैं सम निर्मौलक भयऊ । साहिब सेवकइक मिल गयऊ ॥
कञ्चन और आभूषण जाई । ऐसे ब्रह्म जीव मिलजाई ॥
दूजा भाव न एका रहिया । संशय मेट अमर पद लहिया ॥
अमर मूल अमर पद भई काया । अमर शब्द जिन हंसन पाया ॥
अमर शब्द सतगुरु सो पावै । बिन सतगुरु सब मूल गँवावै ॥
कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । ऐसा भेद करौ परकासू ॥
यहै भेद संसार सुनावहुँ । सब जीवन कहैं लोक लेजावहुँ ॥
तुम कहैं दीन्ह जत्त कडिहारी । तुम्हरी बाँह उतर भवपारी ॥
जा कहुँ तुम बकसो सहिदानी । सो कडिहार जत्त मुहैं जानी ॥
जापर दाया तुमने कीना । सोई जीव मुक्ति कहैं चीना ॥
मुक्ति भेद जब पावै प्राणी । सतगुरुनेक सदा उत्पानी ॥
रजगुण तमगुण त्याग कराई । सतगुण धर्महिं परसैं भाई ॥
सतगुण धर्म कर पावै भेदा । कहैं कबीर सोइ हंस अच्छेदा ॥
( २५४ )
अमरमूल
धर्मदास वचन
धर्मदास विन्ती अनुसारी । हे सतगुरु मैं तुम बलिहारी ॥
सतगुण धर्म मोहि समुझाई । जिह्वितें मन संशय चलिजाई॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास चित केहु विचारी । सतगुरु धर्म कहौं निरवारी ॥
प्रथमहि भोजन सब परिहरही । रजगुण भोजन मध्यम करही॥
उत्तम तंड़ुल आन भरावै । बार छानकै तहां मँगावै ॥
उत्तम चौका दीन्ह बहुभांती । शब्द बोल मलकीन्हौं स्वाँती॥
दुग्ध खांड घृत असन करावा । तासौं कहिये सतगुण भावा॥
जितनी क्षुधा होय घट प्रानी । लेव अहार सोई अनुमानी ॥
शब्द बोले परसाद चढ़ावै । भाजी बनै तो अति मनभावै॥
भाजी नहीं तौ जलभर आना । गुरुकहैं देय अधिक सुखमाना ॥
ऊगुर लेय बहुत मन मानी । यह विधि कहिये सात्त्विक ज्ञानी॥
तीसर भाग अभ्यागत देई । तब प्रसाद पवित्र करलेई ॥
अभ्यागत नहिं आपही पावै । राजस धर्म नर्क कह जावै ॥
सतगुरु धर्म छूट जब जाई । राजस तामस आन समाई ॥
सतगुण धर्म करौं प्रतिपाला । निश्चय पावे लोक रसाला ॥
चैतन्य पुरुषमें जाय समाई । दुविधा भाव सबै मिट जाई॥
रजगुण तमगुण सतगुण कहिये । सब मिट जाय ज्ञान जो पड़ये
सब कहैं भर्म भूत करडारा । झूठी बात भेट औटारा ॥
सबै ब्रह्म ना दूसरे कोई । दूजा भर्म मिट गये सोई ॥
वेद शास्त्र सब कहै बखानी । वचन बिलास कहैं सब ज्ञानी॥
छळ शास्त्र मिल झगरा कीन्हा । ब्रह्म रूप कारू नहिं चीन्हा ॥
चीन्हैं तौ जो दूसर होई । भर्म विवाद करें सब कोई ॥
एके ब्रह्म अखंडित कहई । खंडित ज्ञान महीं निसदिन रहई॥
बोधसागर
( २५५ )
ताकी बात कहत परवाना । झूठ न छोड़ै मूर्ख अज्ञाना ॥
मूरख किमि कर कहिये भाई । ब्रह्म सकलमें रहा समाई ॥
आपहि मूरख आपहि ज्ञानी । आप कथा सब कहै बखानी ॥
आपहि ऊँच नीच दिखलावै । ज्ञानी होय जगत समुझावै ॥
आपहि बूझ आपही नाहीं । आप आपमहैं सकल समाहीं ॥
आपहि सुत्रिन करे बनाई । जप तप ज्ञान आप ठहराई ॥
स्वर्ग नर्क सब आपहि बासा । बाजीगर है करे तमासा ॥
आप तमासा आप भुलाया । आपहि हैं सब माहि समाया ॥
आप आप को चीन्हे नाहीं । आपहि ज्ञानी आप समाहीं ॥
साखी-आप आपको चीन्हकै, आप ब्रह्म हो जाय ।
आप न चीन्है आप कहैं, परौ भर्म महैं जाय ॥
चौपाई
अकह कहन कहि नहिं जाई । आप अकथ हो कथा सुनाई ॥
आपहि मनका रूप बनाया । दूया होके जगत दिखाया ॥
ऐसा भाव विधाता कीन्हा । ताते कोइ न पावै कीन्हा ॥
साखी-आप आपको चीन्हकै, सब संशय मिटजाय ।
कहैं कबीर निर्दोष भये, ब्रह्म स्वरूप समाय ॥
चौपाई
जबहि ब्रह्मरूप कहैं जाना । तब संसार झूठ कर जाना ॥
कितहुँ न देखे दूजा नाऊ । सब घट ब्रह्म जो रहा समाऊ ॥
जाहि ज्ञान अनुभव परगासा । सकल कर्मको भयो तब नाशा ॥
कर्म धर्म जो दोउ मिटये । ना कहुँ गये ना कहूँ आये ॥
जैसा रहा तैसा है सोई । बीचको भर्म मेट सब खोई ॥
कर्म भर्म की छूटी आशा । एकै नाम करहु विश्वासा ॥
नाम छोड़कै और न जाने । तीरथ व्रत कछु मन नहिं आने ॥
( २५६ )
अमरमूल
आपहि तीर्थ आपहि देवा । आपहि आप लगावै सेवा ॥
आपहि मूरत पिंड बैधावै । आप जन्त्र है जन्तर लावै ॥
आपहि महिमा सबकी कीन्हा । आपहि निन्दक मिथ्या कीन्हा ॥
साखी-आप सकल जग व्यापिया, आपहि अलख अपार ।
आपहि जग उपजावही, आपहि दस औतार ॥
चौपाई
आपहि देव दैत्य संहारा । आप युद्ध कीन्ह असरारा ॥
आपहि महाभार्थ करवाया । पांडौको शुभ ज्ञान सुनाया ॥
आपहि कौरव पांडव भयऊ । आपहि होय सबनसौं कियऊ ॥
आपहि है अहंकार स्वरूपा । आपहि रय्यत आपहि भूपा ॥
आपहि चाकर हो सेवा लावा । आप पंडित हो वेद पढ़ावा ॥
आपहि भला बुरा अनुसारा । आप अमीर न्याव निर्बारा ॥
आप ले आवै आपहि खाई । आप अतीत आप सिवकाई ॥
आपहि न्याव आपहि बादा । आपहि तीता आपहि वादा ॥
आपहि खाटा मीठा भयऊ । आपहि सर्वस्वाद कर लयऊ ॥
आपहि लघु दीरघ हो देखा । आपहि दूर निकट हो लेखा ॥
आपहि सकलौ वेद पुराना । आपहि पोथी आप बखाना ॥
आपहि छऊ शास्त्र बनावा । वाद विवाद कर ज्ञान सुनावा ॥
आपहि जीत आपही हारा । आपहि तरे आपही तारा ॥
साखी-ऐसी महिमा ब्रह्मकी कहत कही नहिं जाय ।
जो कोइ यह मति समझ है, तेही ब्रह्म समय ॥
चौपाई
ब्रह्म अखण्ड खण्ड नहिं होई । खंडित ब्रह्म ध्यावे सब कोई ॥
आप कहैं है ब्रह्म अखंडा । आपहि खंडित कह सबखंडा ॥
आपहि मनुष्य रूप कहावै । आपहि दूजा भाव स्वभावै ॥
बोधसागर
( २५७ )
आप अवचन वचन नहीं आवै । आप वचन कहि सब समुझावै॥
आप अरूप रूप नहीं कोई । आपहि सकल स्वरूप है सोई ॥
आपहि निर्गुण रूप जो कहिये । ज्ञानगम्यते यह मत लहिये ॥
आपहि ज्ञान मुक्तिके दाता । आपहि दाता आपहि मुक्ता ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । ऐसा ज्ञान घट करौ प्रकाशा ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास विनती अनुसारी । हे साहिब मैं तुम बलिहारी ॥
यह मत मोहक अगम लखावा । हृदय कमल अब आन जुड़ावा ॥
एक बात मैं बूझहुँ सार्ई । सोइ कहौ जिहि संशय जाई ॥
तुम सब ब्रह्म कहो समुझावा । मोरे मन निश्चय यह आवा ॥
औरन सों कह कहौ गुसाई । यह तौ ज्ञान कहौं नहीं जाई ॥
मैं जाना सब तुम्हरी दाया । और जीव नहीं शब्द समाया ॥
ताकर मोहे कहौं उपदेशा । सो हंसन सों कहौं सन्देशा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास तुम ज्ञान सुनाऊँ । जो मानैं सो सन्त स्वभाऊ ॥
जो नहीं माना शब्द तुम्हारा । फिर पछतै है बारम्बारा ॥
धर्मदास तुम आपन सोधौ । तब तुम सकल मृष्टिपर बोधौ ॥
जो तुम्हरी मन थिर नहीं होई । तब लग पंथ चलैं नहीं कोई ॥
सारखी—जब मन कहै परबोध हु, सकल भर्म मिटजाय ।
एक नाम कहै सेवहु, आवागमन मिटजाय ॥
चौपाई
धर्मदास मैं कहौं नवैरा । जासों हंस मुक्त होय तेरा ॥
मुक्ति होय सत नामहि पावै । बहुरि न योनी संकट आवै ॥
( २५८ )
अमरमूल
धर्मदास वचन
धर्मदास कहैं सुनो गुसाईं । मुक्ति वस्तु सो मोहि सुनाईं ॥
तुम तौ मुक्ति भर्म कर डारा । तुमते पायँउ ज्ञान भंडारा ॥
मुक्ति करौ जो बन्धा होई । यह तौ हंस निबन्धक सोई ॥
नहिं कोई बन्धा नहिं कोइ छूटा । संशयके बस सब जग लूटा ॥
तुम्हरी दाय़ा सो हम जाना । मुक्ति अमुक्ति दोउ भर्माना ॥
सद्गुरु उवाच
अब तुम्हारे जिव निश्चय आई । हम जाना तुम सिखहौ भाई ॥
निज मन्त्रहि जानहु धर्मदासा । अब कह बूझहु सत्त विलासा ॥
जो कहिये सो वचन विलासा । यह तौ साखी पद परकासा ॥
ग्रन्थ कहेउ सब जगत प्रबोधा । जो बूझे सो पावै सोधा ॥
जो बूझे ग्रन्थनकी वानी । तब पावै गम निज सहिदानी ॥
जब पावै शब्दहि कर लेखा । तब जानहु जैसे सब धोखा ॥
धोखा योग यज्ञ तप कीन्हा । धोखा दान पुण्य सब लीन्हा ॥
धोखा कर्म करे संसारा । धोखा कोटिन ज्ञान पसारा ॥
धोखा पुरान सकल जहाना । धोखा शास्त्र वेद मत ठाना ॥
धोखा साखी पद है भाई । धोखा कह सब ज्ञान हुनाई ॥
धोखा प्रथम सांच कर माना । समझे धोखा सबै नसाना ॥
जस निर्गुण तस सर्गुण माना । निर्गुण सर्गुण एक समाना ॥
अगुण सगुण दोनों मिट गयऊ । आदिब्रह्म सौ परिचय भयऊ ॥
धर्मदास यह मति सुनि लेहू । धोखा ज्ञान चित्त मत देहू ॥
प्रथमहि भक्त रूपकर ज्ञाना । ता पीछे फिर तत्त्व समाना ॥
जबही तत्त्व समाना भाई । तबही जीव लोक कहैं जाई ॥
जबही सत्त्व हदैं महैं आवै । धोखा रूप सबै मिट जावै ॥
जब तुम अपना तत्त्वहि जानौ । गुरु औ शिष्य दोउ पहिचानौ ॥
बोधसागर
( २५९ )
तुमही शिष्य गुरु हो सोईं । तुम गुरुही शिष्य सब कोई ॥
गुरु अरु शिष्य एककर जाना । दूजा भाव सो सबै बिलाना ॥
दूजा भाव वसत है जाके । नहीं शिष्य नाही गुरु ताके ॥
साखी-गुरु शिष्यकी महिमा, कहैं कबीर विचार ।
अमरमूल जो जान हो, उत्तरो भौजल पार ॥
चौपाई
तुम कहैं शब्द दीन्ह टकसारा । सो हंसन सों कहो पुकारा ॥
शब्द सार का सुन्न करिहैं । सहजै सत्यलोक निस्तरिहैं ॥
सुन्न का बल ऐसा होई । कर्म काट सब पलमहैं खोई ॥
जाके कर्म काट सब डारा । दिव्य ज्ञान सहजै उजियारा ॥
जा कहैं दिव्यज्ञान परकाशा । आपहिमें सब लोक निवासा ॥
लोक अलोक शब्द हैं भाई । जिन जाना तिन संशय जाई ॥
तत्त्व सार सुन्न है भाई । जातें यमकी तपन बुझाई ॥
सुन्न सों सब कर्म बिनाशा । सुन्न सों दिव्यज्ञान प्रकाशा ॥
सुन्न सो जैहै सतलौका । सुन्न सों मिटे हैं सब धोका ॥
धर्मन सुन्न देहु लखाई । जासों हंस सबै मुकाई ॥
गुरु धोबी सिख कपड़ा जानी । सुन्न साबुन है परवानी ॥
बस्तर को तब मैल नसाई । तैसे ज्ञान हिये दसाई ॥
ह्दे ज्ञान परकट जब होई । कर्म भर्म सब मिटगए दोई ॥
ज्ञान दीप जबही परकाशा । मोहे तिमिरको भयो विनाशा ॥
सत्य पुरुष महैं जाय समाना । हंस पुरुष एकहि कर जाना ॥
दुतिया धोखा मिट तब गयऊ । एक रूप महैं एकसम एऊ ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिन्ती अनुसारि । हे सतगुरु तुम्हरी बलहारी ॥
एक बात अब बूझौ साई । जिहितैं मनकी संशय जाई ॥
( २६० )
अमरमूल
तुम तौ एक एक ठहरावा । एक महात्मन निज हम पावा ॥
सत्य लोक का कहौ ठिकाना । केतक है विस्तार प्रमाना ॥
केतक ऊँच नीच है भाई । सो मोहि साहिब देहु बताई ॥
केतक लंबा औ चकराई । सो सब लेखा कहु समझाई ॥
सद्गुरु वचन
कहैं कबीर सुन सुकृत वानी । लोक कथा सब सुन बिलछानी ॥
सब विस्तार तोहि समझाऊं । लेखा नहीं अलेख लखाऊं ॥
कहिये तो लेखा हो भाई । अलेखा बात सुख कही न जाई ॥
जासौ कहिये अगम अपारा । ताको अंश न पावहि पारा ॥
जहँ लेखा तहँ परलय होई । अलेख अंत न पावहि कोई ॥
एक समय ऐसो धर्मदासा । अपने चित्तको कहौ प्रकाशा ॥
जब हम सत्यलोकमें रहिया । सो वृत्तान्त तुहै नहिं कहिया ॥
सत्यलोक तैं आगे गयऊ । अचरज तहँवा देखत भयऊ ॥
सो अचरज अब कहौ न जाई । तुम पूछौ तौ देहुँ बताई ॥
ऐसी बात ताहिं काहू जानी । तुम ना काहू फिर पूछी आनी ॥
धर्मदास प्राण हित मोरा । सुनहु ज्ञान यह दीप अंजोरा ॥
केतक सत्यलोक में देखा । पुरुष प्रमाण न जात विशेषा ॥
ऐसा लोक यही ब्यवहारा । ऐसहि रूप तहँ पुरुष सव्वारा ॥
तहवों देख सुर्त सौ जाई । जिनमोहिं दीन्हा अगम लखाई ॥
साखी—अनंत काल तहँ देखऊ, सत्यलोक विस्तार ।
गिन्ती कहैं लग कीन्हिये, धर्मदास निर्धार ॥
चौपाई
गिन्ती कहाँ गिनौ निज धामा । को वणै सो पुरुष प्रवाणा ॥
गिन्ती की मर्याद मिटाई । सार शब्द सब घटन समाई ॥
बोधसागर
( २६१ )
साखी-जौ कछु गिन्ती आवही, ताकौ है सब नाश ।
परे न गिन किम गीनिये, ऐसा शब्द प्रकाश ॥
चौपाई
वचन भेद कर कथा सुनावा । जिह्तिं तुम्हरा मनपति आवा ॥
ब्रह्म अखण्ड लेख किमि जानी । खंडित कर किमि ज्ञान बखानी ॥
तहँ लगि सुनी सो माया जानी । जो देखा सो भर्म बखानी ॥
कहिये जो तौ दुतिया होई । दुनिया भर्म मेंट सब कोई ॥
एक ब्रह्म दुतिया नहिं कोई । कैसे दुतिया कहिये सोई ॥
साखी-नहिं उत्पति नहिं प्रलय, नहिं आवे नहिं जाय ।
नहिं गिन्ती अनगिनत वह, बूझ कै शब्द समाय ॥
चौपाई
तब हम आगे दीन्ह पयाना । जहँ देखा तहँ हंस समाना ॥
अक्षर एक हम सब में देखा । भाव अनेक कहो का लेखा ॥
तब हम चले आप स्थाना । ऊर्ध्वलोक सो कीन्ह पयाना ॥
मारगमें अचरज एक देखा । ताका अब मैं कहौं बिवेका ॥
अद्भुत लीला वर्णि न जाई । कहे सुने सौ को पतिआई ॥
धर्मदास मैं तुमहिं सुनाऊँ । अकथ कथा कथ ज्ञान बुझाऊँ ॥
तहँवां देख कबीर कर लोका । असंख्य कबीर कर देखा थोका ॥
हम जाना की हमहि कबीरू । जहँ देखा तहँ कबीर शरीरू ॥
तब अपने चित कीन्ह बिचारा । एकहि रूप सकल बिस्तारा ॥
दूजा और आय नहिं कोई । सब घट रमें कबीर समोई ॥
साखी-हम कबीर हम कर्ता, सकल सृष्टि धर्मदास ।
दूजा और न देखिये, सत्य शब्द परकास ॥
( २६२ )
अमरभूल
चौपाई
नहीं कबीर नहीं धर्मदासा । अक्षर एक सकल घट वासा ॥
सत्य पुरुष वाही सों कहिये । आदि अन्त अक्षर गह रहिये ॥
अक्षर मूल और सब डारा । शाख रमैनी पत्र पसारा ॥
कथा जोकहि-कहि ज्ञान सुनावा । यही भांति संसार बुझावा ॥
जिन बूझा तिन धोखा माना । सकल बात मिथ्याकर जाना ॥
सारखी— कहै कबीर यह मनहि है, मतका सकल पसार ।
चिन्ह यह मन कहै बूझिया, आवागमन निवार ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास विनती करजोरी । बंदिछोर सुन विन्ती मोरी ॥
निश्चय जान मोहिं समुझायो । निश्चय सकल हमतुमसों पायो ॥
सो यह बात अब बूझों साई । सो साहिब मोहिं देहु बताई ॥
आवागमन कवन विधि होई । बन्दी छोर सुनावहु सोई ॥
श्रीसाहिब कबीर वचन
तब साहिब कहिबे अनुसारा । कहौं विचार तासु व्यवहारा ॥
पांच तत्त्वका पुतरा बनावा । तामहँ परगट आप समावा ॥
त्रिगुण आतमा रूप बनाई । दुख सुख ताहि सबै भुगताई ॥
इन मँ मन राजा कर दीन्हा । ताते जीव बुद्धि गह लीन्हा ॥
आपन रूप आपनहिं चीन्हा । ताते आवागमन कर लीन्हा ॥
ना कोइ आया ना कोई गया । मनके मते जन्मतें भया ॥
मनही ज्ञानी मूरख कहिये । मनही ब्रह्मरूप यह लहिये ॥
मनका है यह सकल पसारा । मनही पाप पुण्य बिस्तारा ॥
मनही मोह काम उपजावै । मनही आशा तृष्णा लावै ॥
बोधसागर
( २६३ )
मनही देहरा देव पसारा । मनही पूजे पूजन हारा ॥
मनही नार पुरुष कर जाना । मनहि पुत्र मन बाप बखाना ॥
मनही राजा रय्यत कहिये । मनहि दिवान मनहि मिलि रहिये ॥
साखी—कहैं कबीर यह मनहि है, मनका सकल पसार ।
मन चीन्हे ते अमर हैं, गढ़ निहअक्षर सार ॥
चौपाई
कहैलग कहिये मनकी बानी । झूठ पसारा मनहि बखानी ॥
एक ब्रह्म सब घटहि समाई । नहि कहुँ आवै नहि कहुँ जाई ॥
मनकी वृत्ति यह कथा सुनावा । मनही वेद पुरान पढ़ावा ॥
मनहि शास्त्र शुभ घड़ी विचारी । उत्तम मध्यम कह निर्वारी ॥
मनही भाव बूत्त सब करई । मनके भाव योग तप धरई ॥
मनके भाव यज्ञ जो कीन्हा । मनके भाव दान जो दीन्हा ॥
मनके भाव प्रतिग्रह लेई । मनके भाव तुला सब देई ॥
यह सब है मन केर खुटाई । सतगुरु मिस सब कर्म छुटाई ॥
साखी—यह सब मनकी दौर है, मनका सकल पसार ।
ज्ञान चीन्ह मन अचल है, कहैं कबीर विचार ॥
चौपाई
मनकी कथा कहेउ प्रसंगा । अचरज बात कहेउ सब रंगा ॥
यह मत तौ हम तुमसों कहिया । ज्ञानी होय कोइ कोई लहिया ॥
इक अक्षर का यह है लेखा । ज्ञानी हों सोइ शब्द विवेका ॥
धर्मदास अक्षर हट जानौ । दूजा भाव न मनमहँ आनौ ॥
दूजा कहिये मनका भाऊ । ताते सत्य ज्ञान समझाऊ ॥
झूठा है मन का पैसारा । ताते चित महाँ शब्द सँभारा ॥
( २६४ )
अमरमूल
साखी—कहै कबीर विचारकै, सुनियो सन्त सुजान ।
हम तुम कहैं निज भाखऊ, सत्य शब्द परवान ॥
चौपाई
धर्मदास सुन सत्य सँदेशा । सत्य शब्द कहियो उपदेशा ॥
जाके पास होय दिव्य ज्ञाना । सोई पावहि पद निर्वाना ॥
छंद—निर्वाण पद कहैं पाय है सोई ज्ञान दीपक उर धरै ।
अज्ञान तमको नाश कर परकाश आतमको करै ॥
जिमि भानु है आकाशमें प्रतिबिम्ब सब घट देखिये ।
ब्रह्म जीव है भेद इतनौ धर्मदास विवेकिये ॥
सोरठा—सत्य नाम परवान, कहैं कबीर विचारकै ।
पहुँचै लोक ठिकान, यहै भेद जो पावही ॥
इति श्री अमरमूल, जीव सीव भेद लोकवर्णन
नवम विश्राम
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास उठ पांयन परई । सतगुरुसों विनती अनुसरई ॥
सत्यलोक मोहे बरन सुनावा । वचन तुम्हारे सब लखि पावा ॥
तुम तौ कहैं अवचन है सोई । चरचा शब्द कहौ किमि होई ॥
जब तुम शब्द जो कहि समुझावा । वचन भावमें सब जो आवा ॥
अवचन बात वचनकिमिकहिये । सो मोहे स्वामी भेद बतइये ॥
प्रथमहि तौ तुम शब्द सुनावा । ता पीछे फिर ज्ञान दढावा ॥
और तुम कहे वचन अनलेखा । हम सेवक किमि करें विवेका ॥
एक वचन कहिये समुझाई । जिहिते चित्त अन्त नहिं जाई ॥
बोधसागर
( २६६ )
साहिब कबीर-वचन
तब कबीर अस कहिबे लीन्हा । ज्ञान भेद सकल कहि दीन्हा ॥
धर्मदास मैं कहौं विचारी । जिहितैं निबहै सब संसारी ॥
प्रथमहि शिष्य होय जो आई । ता कहैं पान देहु तुम भाई ॥
जब देखहु तुम दृढ़ता ज्ञाना । ता कहैं कहहू शब्द प्रवाना ॥
शब्द मांहि जब निश्चय आवै । ता कहैं ज्ञान अगाध सुनावै ॥
अनुभवका जब करै विचारा । सो तौ तीन लोकसों न्यारा ॥
अनुभव ज्ञान प्रगट जब होई । आतमराम चीन्ह है सोई ॥
शब्द निहशब्द आप कहलावा । आपहि बोल अबोल सुनावा ॥
आपहि चुप जो बोलत रहिया । आप वचन अवचन जो कहिया ॥
आप गुरु है शब्द सुनावै । आप शिष्य है सुत समावै ॥
आहि गुरु शिष्य जो होई । देखै सुनै आपही सोई ॥
साखी-देखै सुनै कहै सबै, आपहि रूप अपार ।
आप न चीन्है आप कहैं, भूला सब संसार ॥
चौपाई
यह मति हम तौ तुम कहैं दीन्हा । बिरला शिष्य कोइ पावै चीन्हा ॥
धर्मदास तुम कहौ सन्देशा । जो जस जीव ताहि उपदेशा ॥
बालक सम जाकर है ज्ञाना । तासौं कहहू वचन प्रवाना ॥
जा कहैं सूक्ष्म ज्ञान है भाई । ता कहैं सुन्नन देहु लखाई ॥
ज्ञान गम्य जा कहैं पुनि होई । सार शब्द जा कहैं कहु सोई ॥
जा कहैं दिव्य ज्ञान परवेशा । ता कहैं तत्त्व ज्ञान उपदेशा ॥
अनुभव ज्ञान जाहि कहैं होई । दूसर कितहु न देखै सोई ॥
उग्र ज्ञान जा कहैं परकाशा । आतमराम घटमाहिं निवासा ॥
आतमरामकी परचय होई । आपहि आतमराम है सोई ॥
( २६६ )
अमरमूल
दूजा कितहुं न देखहि भाई । आप रहा सब ठांव समाई ॥
यही भांति तुम जग समुझावो । जो समुझै तेहिं लोक पठावो ॥
आत्मारामकी परिचय पाई । ताके निकट लोक है भाई ॥
हम तौ एक लोक कहैं दीन्हा । अनंतलोक घट नाहीं चीन्हा ॥
अनंतलोककी परिचय पावै । कहैं कबीर भव बहुरि न आवै ॥
एक बचन तो देउँ लखाई । जिहिं तैं तुम्हरो संशय जाई ॥
एक समय सत लोकहि रहिया । सत्य पुरुष इक मोसन कहिया ॥
हे कबीर हम तुम हैं एका । दूजा भाव मति राखहु ठेका ॥
सुर्त स्वरूप तुम्हारा भाई । शब्द रूप हमही निर्माई ॥
सुरत शब्द निकट इक भाखा । पर्दा अंतर कछू न राखा ॥
ब्रह्म स्वरूप मोहिं कहैं जानौ । केवल ब्रह्म स्वरूप बखानौ ॥
शब्द मोहिं यक सुर्त उतपानी । सो मोकों तुम निश्चय जानी ॥
धर्मराय है मेरो अंशा । सो निज जानहु हमरो वंशा ॥
आदि भवानी रूप बनावा । तामें निश्चय जाय समावा ॥
तीनों गुण हैं मोर प्रकाशा । पांच तत्त्व महाँ मोर निवासा ॥
जीवन रूप कियो हम भाई । आतम रूप जु हमहिं बनाई ॥
पांच तत्त्व परकट हम कीन्हा । निश्चय वासतहां हम लीन्हा ॥
आपहिं सों सब रूप अवतारा । राम कृष्ण परकट संसारा ॥
यह सब रूप मोर है सांचा । इनहि चीन्ह सो यमसों बाँचा ॥
यम माहीं है मोरो रूपा । सब पृथ्वीमह मोर स्वरूपा ॥
चौरासी लख योनी कीन्हा । आप बास योनीमहाँ लीन्हा ॥
हम से दूसर नाहिन कोई । भर्म माँह सब रहे समोई ॥
भर्म रूप हम सृष्टि बनाई । भर्म माँहि सब रहे समाई ॥
सुर नर मुनिगण यक्ष अपारा । राची सृष्टि भर्म व्यवहारा ॥
बोधसागर
( २६७ )
इतने भर्म न छूटत भाई । ब्रह्मादिक से रहे भुलाई ॥
हे कबीर हम तुमसों कही । निश्चय जान बात यह सही ॥
पुरुष बात यह मोहि सुनाई । सो मैं तुम कहैं आन जनाई ॥
धर्मदास निरखहु निज नैना । निश्चय जान परख मम वैना ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास विनवै कर जोरी । साहिब सुनहु बिनती मोरी ॥
यहै कथा तुम मोकहैं भाखी । दूसर और कवन है साखी ॥
सतगुरु वचन
तब कबीर बोले अंस बानी । सत्य बात यह सुनियो ज्ञानी ॥
यहै कथा हम त्रेता भाखी । मधुकर विप्र ताहिकर साखी ॥
साखी—यहै कथा त्रेता कही, मधुकर सों समुझाय ।
और न दूजा जानही, धर्मदास सुन भाय ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
अमृत कथा मोहि समुझावा । हृदयकमल मम आन जुझावा ॥
सतगुरु सप्रथ की बलिजाऊँ । बहुर न भवसागर महाँ आऊँ ॥
अस्तुति कवन एकमुख करऊँ । सतगुरु चरण हृदयमहाँ धरऊँ ॥
गद गद गिरा नयन भरदयऊँ । अहो नाथ मोहि बड़सुख भयऊँ ॥
बहुत अनंद भयउ मन माहीं । अचरज सुख कछु कही न जाहीं ॥
बचन सुधा रविकिरण समूहा । मम संशय यामिनिगत जूहा ॥
बहुत अनंद भयउ हियमाहीं । ब्रह्म अनंद कहो नहिं खाहीं ॥
बिनती एक सुनो गुरु ज्ञानी । तुम महिमाकिमिकहौं बखानी ॥
जो अब दायो करो गुसाई । सोई शब्दमहैं रहौं समाई ॥
श्रीसाहिब कबीर वचन
कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । हम तुम एक शब्दमहैं बासू ॥
दूसर भाव नहीं है आशा । सोई कबीर सोई धर्मदासा ॥
( २६८ )
अमरमूल
एक रूप धर्मदास कबीरा । लख चौरासी एक शरीरा ॥
काया वीर नाम है धीरू । सब घट रहें समाय कबीरू ॥
जो बोलत सो शब्दप्रवाना । शब्दहि रूप कबीर समाना ॥
शब्दहि रूप कबीर कहाई । शब्द रूप है रहै समाई ॥
निजही शब्द कबीर है सारा । जाका है निज सकल पसारा ॥
एकै रूप शब्द पुन एका । एक भाव दुतिया नहिं देखा ॥
एकहि हम तुम एक शरीरा । एक शब्द है मति के धीरा ॥
एको रूप एकै अनुहारी । एकहि पुरुष सकल बिस्तारी ॥
साखी-रंग रूप सब एक है, एकहि सकल पसार ।
एक जान सोइ एकहै, दूजा यह संसार ॥
बिनती एक करौं कर जोरी । सतगुरु संशय मेटहु मोरी ॥
जो तुम ऐसा ज्ञान सुनावा । हृदयकमल मम आन जुडावा ॥
इक संशय उपजी मन माहीं । चार कर्म देखे जिमि पाहीं ॥
कर्म ज्ञान कहे सब कोई । कर्म करे सो निश्चय होई ॥
कर्म सकल जीवन कहैं फाँसा । कर्म संग यह भयो बिनाशा ॥
कर्म करै तैसा फल पाई । ऊँच नीच योनिन भरमाई ॥
काल पाय कोइ ज्ञान बिचारा । काल पाय सब कर्म सँचारा ॥
ऐसी कथा सुनी सब ठाई । सोइ कहौं जिहि संशय जाई ॥
तुम तो एक एक ठहरावा । दूसर भाव कवन उपजावा ॥
सब घट ब्रह्म एक ठहराई । तौ किमि कष्ट सहैजिव आई ॥
जो तुम कहौं सब ब्रह्म समाना । कोई जीव होहिं अज्ञाना ॥
जो कहिये सब एकहि आई । तौ कस ज्ञान कथा अब गार्ई ॥
एक ब्रह्म तौ सब घट चीन्हा । गुरु शिष्य काहे कहैं कीन्हा ॥
यह तो आप आप ठहराई । काहे का तुम पंथ चलाई ॥
बोधसागर
( २६९ )
जो असकहौ सकल प्रभु कीन्हा । ज्ञान गम्य कैसे कै चीन्हा ॥
काहे कहैं तुम कथा सुनाई । काहे कहैं अब ज्ञान बताई ॥
का कहैं गुरु शिष्य कहावा । कर्म अंक काहे फल पावा ॥
को बूझे अरु कवन बुझावै । कवन गुरुको शिष्य कहावै ॥
सारखी—यह संशय गुरु मेटहु, बिनती सुनो हमार ।
बलिहारी तुव नामकी, क्षणमें लीन्ह उबार ॥
साहिब कबीर वचन चौपाई
तब सद्गुरु बोले इक बानी । अचरज बात लेहु पहिचानी ॥
कर्म रेख तुम पूछेंउ आई । सो सब कथा तुम्हैं समझाई ॥
मात पिता मिल कर्म कमावा । ताही कर्म देह बनि आवा ॥
ब्रह्मलोक सों जब जिव आवा । कर्म रहित निर्मल पद पावा ॥
जलनिधि वारी मेघ लै आई । बून्द बून्द निर्मल हर्षाई ॥
भूमि परी ढाबर पहिचानी । इमि जीवहि माया लपटानी ॥
पवन लगे निर्मलता होई । माया मलिन दूर सब खोई ॥
जल कहैं पवन जीव कहैं ज्ञाना । ज्ञान भयेते कर्म नसाना ॥
कर्मनसे निर्मल पद पावा । ज्योंका त्यों तब आप कहावा ॥
आप चीन्ह भव जलतै न्यारा । तन छूटे पहुँचै दरबारा ॥
जब जन्मा तब कर्मका लेखा । तन छूटा तब आंखन देखा ॥
जन्म मरनतेथिर नहिं कीन्हा । ऐसी विधि है कर्मको चीन्हा ॥
जाहि समय जैसी बनि आई । ताहि समय तैसा है भाई ॥
तिहिं कर्म काल ठहराना । सब शास्त्रिनमिलकीन्ह बखाना ॥
जीव रूप ताहीसों जानी । आपको आप नहीं पहिचानी ॥
तातै ज्ञान सुनायऊ आई । जीव बुद्धि जातै मिट जाई ॥
गुरु शिष्य यह कारण आई । कर्म अंक लिखनी मिट जाई ॥
तातै पंथ चलाएउ आई । यह कारण हम ज्ञान सुनाई ॥
( २७० )
अमरमूल
एही तें है सकल पसारा । याहीतें है सब व्यवहारा ॥
आतम राम चीन्ह जब पावा । सकल पसारा मेट बहावा ॥
आतम परमातम मिल जाई । जैसे सरिता सिन्धु समाई ॥
जब लग यह चीन्हें नहिं आतमा । तब लग नहिं मिलि है परमातम ॥
शब्द बिना आतम दृग हीना । सद्गुरु संघ यही कहि दीना ॥
शब्द नेत्र जबही लख पावा । सद्गुरु मिलनिज घरहि सिधावा ॥
ऐसी मति जाही घट होई । हंस हिरंमर कहिये सोई ॥
तिन कहैं जानहु हमहिं स्वभाऊ । हमहुँ नहीं कछु ताहिं दुराऊ ॥
धर्मदास यह बूझहु ज्ञाना । जातें हंस होय निर्वाना ॥
जा कहैं आतम ज्ञान प्रकाशा । वही कबीर वही धर्मदासा ॥
आतम राम देख जिन पाई । आप आप सब ठांव समाई ॥
जब देखा तब आप समाना । ब्रह्म छोड़ दूसर नहिं आना ॥
सोहं सोहं सत्य कबीरा । शब्द मंत्र है प्रकट शरीरा ॥
यहां ग्रंथ मैं मंत्र सुनावा । चारहि वेदका मूल बतावा ॥
षटे शास्त्र मिलकरहिं विचारा । प्रकट ब्रह्म यह ज्ञान विचारा ॥
साखी- ऐसा ज्ञान जब ऊपजै, सुनहु हो धर्मदास ।
परकट ब्रह्म स्वरूप है, एक नाम विश्वास ॥
चौपाई
यहै ग्रंथ सब सुनै सुनावै । निश्चय प्रेम भक्ति को पावै ॥
जो ज्ञानी है बूझे ज्ञाना । निश्चय है है ब्रह्म समाना ॥
चार पदार्थ को फल होई । निश्चय जानहु यहमत सोई ॥
ऐसो ज्ञान अखंडित भारी । अमरमूल मैं कहेऊँ बिचारी ॥
साखी-अमरमूल यह ग्रंथ है, सकल ज्ञान भंडार ।
मुनत अमर पद पावहीं, कहैं कबीर विचार ॥
बोधसागर
( २७१ )
धर्मदास वचन
धर्मन हियमें अतिही हवैउ । गद्गद गिरा नयन जल बवैउ॥
सतगुरु चरण रहे हियमाहीं । भानु उदय पङ्कज बिकसाहीं ॥
मोह निशा व्याकुल अतिभारी । तामहैं सोवत नाहिं सम्हारी ॥
गुरु दयाल मोहिं लीन्ह जगाई । आवागमन रहित घर पाई ॥
अब सन्देह रहा कछु नाहीं । शब्द तुम्हार बसा हियमाहीं ॥
स्तुति कहा तुम्हारी कीजै । अमृत कथा श्रवण भर पीजे ॥
छन्द-तुम आदि ब्रह्म अपार सतगुरु, जीवकारण आयऊ ।
काट फन्दा सकल यमके, अमरलोक पठायऊ ॥
भवसिंधु कठिन कराल भारी, पार काहू ना लयो ।
तुम कृपा गोपद जान सोई, पार धर्मनि कर दयो ॥
सोरठा-दीन्हों मोहि लखाय, परमात्म आत्म सकल ।
अमरमूल समुझाय, अमर वस्तु गुरु दीन्हेऊ ॥
इति श्रीग्रन्थ अमरमूल धर्मदास सम्बोधन विज्ञात मतवर्णन
दशम विश्राम सम्पूर्ण
इति अमरमूल ग्रन्थ समाप्त
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