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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

धर्मदास साहबका गर्भविषय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर

सत्यकबीराय नमः

सत्यं शुद्धं गुणातीतं कंजपर्णसमुद्भवम् ।
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञं सद्गुरुं प्रणतोऽभ्यहम् ॥

अथ श्रीबोधसागरे

पंचमस्तत्रंगः

ग्रन्थ जगजीवन बोध

( गर्भ चिंतावनी )

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास कह सुनहु स्वामी । कहो गरभकी अन्तर्यामी ॥
कैसे जीव गरभ में आवे । कैसे जीव जठर दुख पावे ॥
कैसे जीव परवशै भयऊ । कैसे इन्द्री देह बनयऊ ॥
कैसे जीव अपने पद परसे । कैसे जीव समरथ पद परसे ॥
कैसे जीव कौल बँधावे । कैसे साहब दर्शन पावे ॥
सो सब भेद कहो गुरु ज्ञानी । घट भीतरका भेद बखानी ॥

सतगुरु-वचन

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । तुम घट भली बुद्धि परकासा ॥
प्रथमें सत्य नाम गुण गाऊँ । घट भीतर का भेद बताऊँ ॥
सबही जीव गर्भ में जावैं । कौल बान्ध कै बाहर धावैं ॥
चूके कौल गरभ का भाई । बारम्बार गरभ में जाई ॥
नौ नाथ सिद्धि चौरासी भारी । उनहुँ देह गरभमें धारी ॥

गर्भोत्पत्ति वर्णन

( २२ )

जगजीवनबोध

नौ अवतार विष्णु जो लीन्हा । उनहूँ गरभ वसेरा कीन्हा ॥
तेतिस कोटी देव कहाये । गरभ वास महाँ देह बनाये ॥
जोगी जंगम औ तप धारी । गर्भवास में देह सवारी ॥
गर्भ वास तब छूटे भाई । जब समरथ गुरु बाहँ गहाई ॥

गर्भोत्पत्ति वर्णन

नारि पुरुष बांधे संयोगा । कामबाण लगि देहसुख भोगा ॥
सप्त धातुका अंग बनाया । जिह्वा दांत सुख कान उपाया ॥
हाथ पावैं रु शीस निर्माया । सुन्दर रूप बनी बहु काया ॥
नख शिख काहू नर बहु कीन्हा । दशही द्वार युक्ति करि लीन्हा ॥
दश द्वार नौ नाडि बनायी । ऐसे सबतर बन्ध लगायी ॥
दीन्हा ठेक बहतर भारी । नाडी बन्धन बहुत अपारी ॥
नाद विन्दुसों काथ निरमायी । तामैं प्रकृती आन समायी ॥
हृद कारिगर हुन्नर कीन्हा । जैसे दूधमें जामन दीन्हा ॥
तीनसों साठ चार बन्ध लायी । सोलह खाईं तहां बनायी ॥
सोलह खाईं चौदह दर्वाजा । अठहूँ हाथ गढ़ खूब विराजा ॥
छाजे महल अधिकही छाजा । तामैं जीव जो आनि विराजा ॥
अजब महल बहु खूब बनाया । छठे महल हंस चितवन लाया ॥
छठे मांस में सुरती आयी । दुख सुखकी तब पारख पायी ॥
छै मासको भयो जब प्रानी । दुख सुखकी मति सबै पहिचानी ॥
ओंघे सुख झूले लटकंता । मैल बहुत तहाँ कीच रहता ॥
जठर अग्नि तहाँ बहुत सतावै । संकट गर्भ तहाँ अन्त न आवै ॥
बहुत सांकीरी पिंजार पोई । तडफटै बहुत निकसे नहिं जोई ॥
सुखसों बोल निकसि नहिं आवै । करुना करि मन में पछितावै ॥
अरुझे श्वास रोवै मन माहीं । कौन करमगति लागी आहीं ॥
करुणा करि मन में पछितावै । ज्यों करीब कंठ करद बैठावै ॥

जगजीवनका गर्भके कष्टसे व्याकुल होकर साहबकी स्तुति और कौल करना

बोधसागर

( २३ )

ता दुःखकी गति कासु कहीजै । करम उनमानतहैं दुःख सहीजै॥
यदि आलोच करै मनमाही । संगी मित्र कोइ दीखत नाही ॥
पिछला जनम जब सूझा भाई । तब जिव दिलमा चिता आई ॥
स्त्री मित्र कुटुम्ब परिवारा । सुत नाती औ सैन पियारा ॥
संगी सुजन बन्धु औ भाई । गरभ कि चीन्ह परी नहिं ताई ॥
महा दुःख सो गरभ में पावे । बहुत वैराग हियामें आवे ॥
सूझी सकल बाहरकी बाती । जो जिव पिछली होती जाती ॥
जब जिव गरभमें ज्ञान विचारा । अब मैं सुमरूं सिरजन हारा ॥
सोच मोह जिव कछू न कीजै । अब सदगुरु का शरणा लीजै ॥
जिव अपने दिल माहि विचारे । तब समरथ को कीन पुकारे ॥
सुनु धर्मदास यक कथा सुनाऊँ । यक राजाको जस बने बनाऊँ ॥
राय जगजीवन ताहिकर नामा । जब वह पहुँच्यो एही ठामा ॥
करन विन्ती लागु अधीरू । सतगुरु कहैं तब कीन्ही टेरू ॥

जगजीवन वचन

साहिब संकट दूर निवारो । मैं निज खानाजाद तुम्हारो ॥
दिल मैं करूणा करै अतिभारी । अब मोहि साहब लेहु उबारी ॥
करै अस्तुति बहुते सुधिलावै । तुम वितु खाविन्द कौन छुडावै ॥
अब दुःख दूर निवारो स्वामी । कौल कहूँ प्रभु अन्तरयामी ॥
बाहर निकारो आदि सनेही । बहु दुःख पावै मेरी देही ॥
मैं जन प्रभुको दास कहाऊँ । आन देव के निकट न जाऊँ ॥
सतगुरुका होय रहों चेरा । दम दम नाम उचारूँ तेरा ॥
नित उठि गुरु चरणामृत लेऊँ । तन मन धने निछावर देऊँ ॥
जो मैं तन सों कहूँ कमाई । अर्थमाल मैं गुरुहि चढाई ॥
कुबुद्धि सीख काहु नहिं मानूं । हराम माल जहर करिजानूं ॥
कुलकी त्यागूं मान बढाई । निर्मल ज्ञान एक संत सगाई ॥

( २४ )

जगजीवनबोध

रात दिवस ऐसे लव लाऊँ । करत फुरत भक्ति गुरु कराऊँ ॥
दुःख सुख परे सो तनसे सहूँ । भक्ति दृढ़े गुरु चरणै रहूँ ॥
परत्रिया ताकूँ नहिं कोई । जननी बहन करि देखूँ सोई ॥
दुष्ट बैन कबहुँ नहिं खोलूँ । शीतल बैन सदा सुख बोलूँ ॥
स्वास उस्वासमों रटना लाऊँ । आन उपाय एको नहिं चाऊँ ॥
तन मन धन निछावर देखूँ । सतगुरु का चरणामृत लेऊँ ॥
सतगुरु कहैं सोई अब करिहौँ । आज्ञा लोप पाओं नहिं धरिहौँ ॥
और सकल बैरी कर जानूँ । सद्गुरु कहैं मित्र कर मानूँ ॥
ज्ञान बतावै सोई गुरुदाता । तन मन धन अरपूँ उन ताता ॥
तन मन धन मैं उनको देखूँ । नित उठि गुरुचरणामृत लेऊँ ॥
यहि गर्भवासमें कौल बधाऊँ । बाहर निकारो धुर निबाऊँ ॥
जो मैं छूटूँ गरभ सबेही । तन मन अरपूँ औ गुरु देही ॥
एक नाम सांचा कर मानूँ । और सबै मिथ्या कर जानूँ ॥
कहा अस्तुति करें गुसाई । बहुत दुःख पावत हूँ या ठाई ॥
यहां कोई मित्र नहिं भाई । मातु पिता नहिं लोग लुगाई ॥
देवी देवका कछु न चालै । गुरु विन कौन करै प्रतिपालै ॥
अब तो खबर परी यहि ठाहीं । और कोईका चालै नाहीं ॥
पिछली बात मैं हृदय जानी । कोई काहूँका नहीं रे प्राणी ॥
अपने साथ चलेगा सोई । जो कछु सुकृत करे सो होई ॥
मद माया में जीव भरमाया । सो तो कोई काम न आया ॥
बहुत विचार किया मैं सोई । अन्तकाल अपनो नहिं कोई ॥
ऐसी करुणा करै विचारा । दया करो दुःख भंजन हारा ॥

साहिब वचन

तब साहिब यों कहै पुकारा । कहि समझाया तोहि बारम्बारा ॥
अनेक बार गरभमें आया । तैं रतीकर्म भरम नहिं पाया ॥

साहबका दया करके जगजीवनसे कौल लेकर गर्भसे मुक्त करना

बोधसागर

( २५ )

कई बेर तैं कौल बँधावा । कई बार तैं गर्भ में आवा ॥
गर्भ में ज्ञान उपजा है तोही । संकटमें सुमिरे सब कोही ॥
बाहर निकसि नहिं उपजे ज्ञाना । अंधकार अहंकार समाना ॥
बार अनेक भुलाना भाई । नहिं सतगुरु की दीक्षा पाई ॥
गरभ त्रास तब छूटै भाई । जब सतगुरु कहैं बाँह समार्ई ॥

जगजीवन वचन

बोलत वचन कहो गुरु देवा । जीवकी अवधि बताओ भेवा ॥
दीन दयाल दया गुरु कीजै । बूडत जीव आपन करि लीजै ॥
दयावंत गुरु दीन दयाला । मुक्तिरूप जीवन प्रतिपाला ॥
मोको अभय दान गुरु दीजै । अन्दर ज्ञान उजालो कीजै ॥

सतगुरु वचन

गरभ बासमें कौल बन्धावा । सो कैसे तैं न बाहर निर्वावा ॥
बडु संकट तोहि उपजे ज्ञाना । बाहर निकसत सब विसराना ॥
जोई जीव कौल निर्वाहै । सोई नहिं गरभवास मईं आहै ॥

जगजीवन वचन

अब नाहीं भूलें गुरु देवा । तन मन लाय कहूं गुरु सेवा ॥
मोकैं बाहिर काढो स्वामी । कौल न चूकैं अन्तर्यामी ॥

सतगुरु वचन

कौल बोल सब चौकस कीना । तबहीं गर्भ सों बाहर लीना ॥
नौवे मास जो बाहर आया । लोग कुटुम्ब सबही सुख पाया ॥
सबही हरष करें मन माई । पुत्र हेतु सब करें बधाई ॥
बाजा बाजे करै उछावा । गीत नाद आधिके चितआवा ॥
सबै सजन मिलि गूड़ बँटावा । रैन समय तिय मंगल गावा ॥
नगरलोक सब करें बधाई । घर घर साजे देह लुगाई ॥
घर राजाके जनम सो पढ़या । कौल किया सो सब विसरैया ॥
पीसुन मिले सबहिं धुतारा । सबहीं ज्ञान भुलावन हारा ॥

पिशुन कर्म वर्णन

( २६ )

जगजीवन बोध

ताका नाम सुनो रे भाई । महा जालके फन्द फँदाई ॥
झूठे झूठ मिले संसारा । नरक कुण्ड में नाखन हारा ॥

पिसुन कर्म वर्णन

प्रथम माता

माता मनमें करै बखाना । यह भल उग्यो आजुको भाना ॥
बालक जन्मा मोरे कोखा । जन्म भरे की भागी धोखा ॥

नाइन

नाइन एक बधार्ई लायी । तीन तो एकै बात जनायी ॥
मेरा कहा करो तुम कामा । नाक छेदि कहो नाथू नामा ॥
नाल औवल पीसो गाढो । दिहली को तब बालक काढो ॥
यह तो बात मैं गुप्त सुनायी । सुवा जिवाका तो सुहि दायी ॥

पिता

पिताके मनमें ऐसी आवैं । उमगे हरष हिय नाहि समावैं ॥
बाटे पान मिठाइ बहुत । धन्य भाग्य मोर जनम्यो पूता ॥

काका

काका कहै मैं उतरूं पारा । बालक खेले घरके द्वारा ॥
कर्म जोर मोरें बड कीन्हा । क्षेत्रपाल मोहि बालक दीन्हा ॥

दादा

दादा सुनिकै दौरे आये । पोता देख बहुत सुख पाये ॥
दासी हाथे कुवैर मैगाया । हेतु प्रीति से कण्ठ लगाया ॥

दादी

दादीके मन हर्ष अपारा । लेत बलाई बारंबारा ॥
मैं करी बहुत सतियनकी सेवा । भये प्रसन्न मोर कुलदेवा ॥

नानी

नानी आवत वेगि उठाया । सुख चुम्बा है कण्ठ लगाया ॥
लून ले शिर ऊपर वारा । द्रव्य माल पुनि बहुत उतारा ॥

बोधसागर

( २७ )

नाना

अब नाना मुख देखन आया । दौहित्रा देखि अधिक मुख पाया ॥
उमँगे हरष हिये न अमायी । कंचन चूरा दिया बधायी ॥

भुआ

बहुत करै हरष भुआ बाई । दिन दिन अधिकी करै बधाई ॥
मुख चुम्बा दै कंठ लगावे । हिये हर्ष उमँग नहिं मावे ॥

मौसी

मौसी मन बहु हर्ष उठावै । धन्य बहिन को कोख तरावै ॥
मुख चूमे अरु कण्ठ लगावै । अतिशय उमँग हिये नहिं मावै ॥

अडोसी पडोसी

बुढिया एक जो बोले आयी । तिन यक बात कही समझायी ॥
बालक तैल लौन सों लीजै । लौना नाम कहे धरि दीजै ॥

दूसरी पडोसिन

दूजी कहै सुनो रे बाई । बालक डारो छीतर माई ॥
सांचो टोना यही कहावों । इनको छीतर कहि बतलावो ॥

तीसरी पडोसिन

तिया तीसरी बोले सयानी । मैं जान्यों सो काडु न जानी ॥
कोदरा बरोबर तौल के लीजै । याकर नाग कोदरसिंह कीजै ॥

चौथी पडोसिन

चमरिन गोद यहीको डारो । मोल लेइ पुनि ताहि उजारो ॥
चमरूसिंह नाम यहि केरा । बालक याते जिवै घनेरा ॥

पांचवी पडोसिन

याको धूर गुनौरे डारो । दूत पराछित या विधि मारो ॥
घूरन सिंहै अरु गेनौ नामा । दीजे ताहि सुधरे सब कामा ॥

( २८ )

जगजीवनबोध

छठी पडोसिन

यह सब बात बताओ माई । चूल्हे डारो चुल्हन कहाई ॥
जेती नारि आर्यों तेहि बारा । सबहिन आपन मता उचारा ॥
कोह काहू कोह काहु बतावैं । स्यानप आपन सबहि जतावैं ॥

ओझा और स्याने

बुढवै एक जो सीस धुनावैं । वाके शिर पर भैरों आवैं ॥
सो कह हमको बैल बधाओ । भैरोंसिघ कही बतलाओ ॥
देवी पूजक एक तब आया । देवीसिंह तब नाम बताया ॥
गाजी मुर्गी कोह चढ़ावैं । गाजीदीन तब नाम बतावैं ॥
यहि विधि अनेकनहू आये । आपन आपन उक्ति सुनाये ॥

पुरोहित

घरको पुरोहित ऐसी कही । मनको मनोरथ पूरण सही ॥
यह तो बडा सपूत कहावै । इनके तुलै कोह नहीं आवै ॥
पुरोहित कह यजमान है मेरा । कुल देवी भैरोंका चेरा ॥

चारण और भाट

चारण भाट जपै महामाई । भोजक भाट तहां चलि आई ॥
सबही मिलि दीनी आशीशा । महामाइ सुत कीन्ह बरखीशा ॥

मुसलमान फकीर

दवैश एक कहै समुझाई । नाम फकीरा कहो रे भाई ॥
बांधि गांठ गले में दीजे । सब पीरों का चारण लीजे ॥

योगी

जोगी एक तहां चलि आया । मेरी भभूत का परचा पाया ॥
कहा हमारा सुनिकै लीजे । याका नाम सदाशिव दीजे ॥

दिगम्बर

यन्त्र मन्त्र जतीकरि लाये । करि तावीज गले पहराये ॥
व्रत्र वटु सूअरदांत मंगायी । एक सुपारी माहि मढायी ॥

पिशुनके फेरमें पड़कर जगजीवनका गर्भका कौल भूल जाना और संसारी बंधनोंमें मगन होना

बाधसागर

( २१ )

भोजपत्रमें यंत्र मढाया । सात भांतिका रेशम लाया ॥
गूगल बारि धूप लै कीन्हा । सो पहिराय गलेमें दीन्हा ॥

पण्डित लोग

ब्राह्मण सबही नगरके आये । पत्रा पोथी साथहिं लाये ॥
पीपल केरे पान मँगाया । लगन साधिके नाम सुनाया ॥
जगजीवन नाम जनमका सही । याका मरण होय ना कबही ॥
द्रव्य माल दक्षिणा दीना । जनमपत्रिका लिखाय जो लीना ॥
बहु विधि सो संस्कार कराया । मोह फाँसमें पकरि दवाया ॥
गर्भ कौल तो सब विसराना । अमर रहनका जतन बहुठाना ॥
एक सो बात गुप्त ना होई । स्याना लोग कहैं सब कोई ॥
फन्द अनेकन में फन्दई । कौल किया सब गया भुलाई ॥
झूठे झूठ मिलै सब कोई । इन्ते काज एको नहिं होई ॥
पिछली कौल सबै विसरानी । महा जालमें बँधे प्राणी ॥
यह सब झूठे पाखण्ड साजू । इनसँ सरे न एको काजू ॥
साखी-कहैं कबीर सब चेतहूँ, आगे काल कराल ।

आल जँजाल तम छाडिके, पिछले लोक सँभाल ॥

चोपाई

जौन कौल गर्भ में कीया । मूरख विसारि-सब दीया ॥
फिर भी कठिन हो गया भाई । तुम करिहौ कौन उपाई ॥
इतने सब मिलि करहिं बधाई । तामें तेरा कौन सहाई ॥
तुम अबकी चेतौ जो नाहीं । मानुष जनम भाग बड पाही ॥
साखी-ये तेरे मित्र नहीं, सब वैरी करि जान ।

उबरा चाहो कालते, गुरुहि मित्र कर मान ॥

चोपाई

एक जीव बेरी बहुताई । यूथ युत्थ बाटन सब लाई ॥
कोई जीवको का तकसीरा । सबको जडिया मोह जँजीरा ॥

( ३० )

जगजीवनबोध

ज्ञान ध्यान जिव कैसे पावैं । इतने पिशुन ताहि भरमावैं ॥
देखो दिलै करि ज्ञान विचारा । किहिविधि उतरो भवजल पारा ॥
रे कुबुद्धि दुख में मत झूले । पिछला काल बोल मति भूलै ॥
इक दिन फेरि परैगा गाढा । सुशुक बांधि यम करिहैं ठाढा ॥
तुम मति जानो अमर है काया । यह दीसै सुपनेकी माया ॥
यहि चकचौंध भुलो मति कोई । संवल फूल जैसा तन होई ॥
जैसे नींद में सुपना आवै । जागि परै तब कछू न पावै ॥
यह तन ऐसे देखो भाई । झूठे झूठ मिलैं सब आई ॥
दिनाचार चटक दिखलावै । अन्तकाल ग्रासन कूँ धावै ॥
काल जंजाल सो छूटा जाई । गुरुसे प्रीति करो रे भाई ॥
सतगुरु ऐसी युक्ति लखावै । जासे जीव परम पद पावै ॥
सुनो जीव अबूझ की बाता । जनम गवाँवै करम कमाता ॥
हर्ष मोह मैं सबहि सुनाऊँ । जेते घर में सबहि दिखाऊँ ॥
एक वर्ष लगि डोल डोलावै । पशू रूपमें जनम गँवावै ॥
उखली जीभ तोतला बोलै । मातु पिता सब हर्षित डोलै ॥
आज जंजाल बोले बहकावे । त्यों त्यों हरष हिये नहिं मावे ॥
परी करै औ ऊभा धावै । बाहर भीतर दौड़ा आवै ॥
कंचन घँघुर बेगि गढ़ाई । रेशम केरी डोर पोवाई ॥
सोना रूपा बहु पहिराया । हीरा मोती भूल भुलाया ॥
बालन सँग में खेलन जावै । नाच कूद के घरही आवै ॥
मनमें आनंद करै चँचलाई । सोच फिकर कछु व्यापे नाई ॥
करै कुतूहल मनमें सोई । दिन दिन तेज सवाया होई ॥
आकुल बोलै सोच न आने । कूर कपट कर बहु सुख गाने ॥
संकटका दिन चित्त न आवै । करै अनीति जोई मन भावै ॥
चित्तमें दुर्मति रहै अति घनी । महा दुष्ट बुद्धि पापी सनी ॥
द्वादश वर्षकी भयी है देही । अनन्त उपाय करै नर केही ॥

बोधसागर

( ३१ )

प्रगट काम काया के भीतर । सोच फिकिर नहिं व्यापे अंतर॥
अन्ध करै बहुत अहंकारा । निरखै तिरिया घर घर द्वारा॥
परवश दूती आनि मिलावै । जोर करै तो पकरि मगावै ॥
नाहकको तू कान लगावै । नहिं मानै तो यमघर जावै ॥
अघ करमी होय तन डोलै । जोर बहुत गरभ सो बोलै ॥
आंखिन माहीं वर्षे लोई । ज्ञान ध्यानकी सुधि ना होई ॥
गुरु चरचाके निकट न जावै । हँसी मसखरीसों मन भावै ॥
झूठी बात करै लबराई । तासों हेतु करै मितराई ॥

साखी—यह नर गरभ भुलाइया, देखि मायाको झोल ।
कहै कबीर सब चेतहु, सुमिरि पाछलो कौल ॥

चौपाई

इन्द्री स्नेह न मानै चेता । माया गर्ब फिरै मैमंता ॥
ईगुण प्रगटा अन्तर माहीं । कामातुर होय करी विवाही ॥
पहले विवाही एक लुगाई । बहुत प्रेम सँग ताहि लिवाई ॥
विषय विवेक फिर उपजा भारी । पीछे व्याही सुन्दरि नारी ॥
अँगारस्वरूप कामिनि अधिकार्ई । कामातुरसों रहे लपटाई ॥
महा अनन्द भये मन माहीं । एक पलक सँग छाड़े नाहीं ॥
करै खवासी कहत है दासी । बन्धा मोह जाल की फांसी ॥
खिदमतगार सहेली घनी । कई नायिका कई रामजनी ॥
नव नव खण्डके महल बनाये । सेना केरे कलस चढाये ॥
करी बिछावन तहैं बडभारी । गादी तकिया बहुत अपारी ॥
बहुत मोलको अतर मँगावै । फूलन केरी सेज बिछावै ॥
कहैं लगि बरनूं यह विस्तारा । मायाविनको बार न पारा ॥
टपका स्वाद भया तर अन्धा । आवै यम तब करै बहु फंदा ॥
नित नित त्रिया नई संयोगा । खान पान और षट रस भोगा ॥

सद्गुरुका पाटनमें पहुँचना और एक सूखे बागमें ठहरना, उसका हरा हो जाना और राजाका खबर पाकर बाग देखने आना फिर कबीर साहबसे मिलना

( ३२ )

जगजीवनबोध

मता विषय रस कछू न सूझे । भैरों भूत शीतला पूजै ॥
भूलै कौल गरभकी बांधी । अब चकचौंध आई आंधी ॥
सबही जीव कौलकरि आवै । बाहर निकसि सब बिसरावै ॥

सतगुरुके आगमन

ऐसे जीव भूल रहे सारे । तब सतगुरु आइ पगु धारे ॥
जीव चितावन सतगुरु आये । अलीदास धोबी समझाये ॥
और हंस बहुत चेताये । फिरत फिरत पाटनपुर आये ॥

सतगुरुका पाटनपुरमें पहुँचना

सतगुरु आये पाटन ठाऊँ । जगजीवन राय बसै तेहि गाऊँ ॥
राय न मानै भक्ति विचारा । हँसे भक्तको बारम्बारा ॥
भक्त रूप सब शहर निहारा । कोउ न मानै कहा हमारा ॥
तब आपन मन कीन विचारा । कैसे मानै शब्द हमारा ॥
जाइ बाग में आसन कीन्हा । गुप्त रहे काहू नहिँ चीन्हा ॥
द्रादश वर्ष भये बाग सुखाने । सुलगे काछ होय पुराने ॥
चार कोस तेहि बाग लम्बाई । तीन कोसकी है चकलाई ॥
तहाँ जाय आसन हम कीन्हा । रहौं गुप्त काहू नहिँ चीन्हा ॥
तहवाँ मैं कौतुक अस कीया । सूखे बाग हरा कर दीया ॥
विकसे पुढुप जीव सब जागे । सबने हरियर देखा बागे ॥
माली जाय कै दीन बधाई । जागा भाग तुम्हारा भाई ॥
देखा बाग जाय तेहि वारा । फल फूलनका अन्त न पारा ॥
हर्षा माली बाहर आया । देखा बाग बहुत सुख पाया ॥
फूलन छाब भरी दुइ चारी । नाना विधिके फूल अपारी ॥
नाना विधिके मेवा लाया । ले माली दरबारि आया ॥
बैठा राजा सभा मैझारा । उमरावनको तहाँ न पारा ॥
माली सब ले धरी रसाला । राजा पूछ करे ततकाला ॥

बोधसागर

( ३३ )

राजा जगजीवन बचन

कौन देश तैं माली आया । फूल अन्नप कहाँसे लाया ॥
कौन बाग के फलन विशेषा । कानो सुनी न आँख न देखा ॥

माली बचन

नौ लखा बाग रहा होय आया । फल प्रसून सब नये बनाया ॥
सुनिके राजा हरषा भारी । संग उठी चली परजा सारी ॥

राजा बचन

कहु दिवान यह कौन प्रकारा । समझि बूझिके करो विचारा ॥
ज्योतिषी पण्डित सवैं बुलाये । पत्रा पोथी सबहीं लाये ॥

ज्योतिषी बचन

लगन सोधि सब ऐसी कही । कोइ पुरुष यहाँ आये सही ॥
है कोइ नर कै कोइ पखेहू । सोधो जाय बाग सब हेहू ॥
हेरे राय बागके माहीं । बैठे संत यक ध्यान लगाहीं ॥
राजा जाय धरा तब पाई । नगर भरेकी परजा आई ॥
कहे राजा धन मेरो भागा । दर्शन पाय अमर होय लागा ॥
आलसी घर गंगा आयी । मिटि गई गर्मी भयी शितलायी ॥

सतगुरु बचन

तब राजासों कही पुकारी । सुन राजा एक बात हमारी ॥
हम जनि भार चढाओ भाई । काहे को तुम देहु बड़ाई ॥
अच्छा बाग विमल हम चीन्हा । तासो आये आसन कीन्हा ॥
ऐसा तुमहीं बाग बनाया । नाना विध के रख लगाया ॥
आसन किया देखि हम ठारी । बहुत फूल फलकी अधिकारी ॥

राजा बचन

फिर कै राजा शीस नवाया । द्वादश वर्ष भये बाग सुखाया ॥
सूखा बाग भये बहु बारा । नहिं कोइ लोक आहे संसारा ॥

नं. ५ कबीरसागर - ३

सद्गुरुका राजाको गर्भका कौल याद दिलाना

( ३४ )

जगजीवनबोध

छाडी फल फूलनकी आसा । कोइ न आवै बागके पास । ॥
तुम समर्थ पग धारे आई । हरा हुआ बाग सब ठाई ॥
राजा कहै दया अब कीजै । मोकूँ मुक्तिदान फल दीजै ॥
मेरे मस्तक धरहू हाथा । मैं रहूँ सतगुरु तुम्हारे साथ । ॥

सतगुरु वचन

तुमको कौल भुलाना भाई । किया सो कौल गया बिसराई ॥
संकट गरभ में बाचा दीन्ह । बाहरनिकसि करमबहु कीन्ह ॥
किया कौल जब गये भुलाई । तब हम आइके चरित दिखाई ॥
बहु विधि बात कही चेताई । बाहर निकसि बुद्धि पलटाई ॥
तुमको तो कछु सूझत नाही । फन्दा मोहजाल के माहीं ॥
आवै यम दश द्वार मून्दी । तबहीं बांधि करेगा कून्दी ॥
सोच बूझ देख मन माहीं । इतने में तेरा कौन सहाहीं ॥
पिसुन मिलै सब वार न पारा । नरक बास में नाखन हारा ॥
बहु विधि तुमसों शब्द पुकारा । किया कौन नर भूल गवौरा ॥
घर घर हम सब कही पुकारी । कोइ न मानै कही हमारी ॥

हे राजा जब तू मातृगर्भमें था तब तू वचनवद्ध हुआ था कि भजनके अतिरिक्त अब और कुछ न करेगे । उस दुःखमें तो तू पुकारता था तथा हाय हाय करता था, कि मुझको इस दुःखसे निकालो । जब तू गर्भके बाहर आया तब तू अपनी प्रतिज्ञा भूल गया और शारीरिक कामना तथा पशुधर्मके वशीभूत होकर तूने कौन कौनसे कुकर्म न किये ? सत्यगुरुकी दयाको तू एकबारगी भूल गया, भोगविलासमें फँसकर अन्धा हो गया और मायाने तेरे ज्ञानको बिलकुल ही नष्ट कर दिया । जब यमदूत आवेगे और तेरी मुश्कें बांधकर नरक में लेजावेंगे तब तेरा कौन मित्र सहायता करेगा ? और तुझको उनसे कौन छुड़ावेगा ? राजा ! तू सोच तथा समझ कि, वे लोग जिन्हें तू अपना

राजाका सद्गुरुसे उद्धारकी विनती करना

बोधसागर

( ३५ )

मित्र समझता है उनमें से कौन तेरा उस समय सहायक होगा ?
कौन तुझको नरकसे बचावेगा ? गर्भमें मैंने तुझको बहुत सम-
झाया था सो हे गँवार ! तू उन सब बातोंको भूल गया मैंने
सबसे घर घर पुकार कर कहा मेरा कहना किसी मूर्खने न
माना । इतनी बात सुनकर राजा बोला ।

राजा बचन-चौपाई

अब तो गुरु होहु सहाई । मोकों यमसे लेहु छुड़ाई ॥
सबही करम बरुसकै दीजे । हूबत मोहि उबारके लीजे ॥
सैन करी पालकी मँगाई । लै सद्गुरु को माहिं बिठाई ॥
पाँव उधार काँध धर लीन्हा । तबही महल पयाना कीन्हा ॥
सद्गुरु पग धर महलके माहीं । सब रानिनको राय बुलाहीं ॥
समरथ दर्शन दीन्हा आनी । धनधन भाग्य तुम्हारो रानी ॥
सद्गुरु को पलँगा बैठाई । सब मिलि पाँव पखारो आई ॥
राजा भाखे शीश नवाई । मोकों राखो गुरु शरनाई ॥
करिये सद्गुरु जीवको काजा । दया करो मैं लाऊँ साजा ॥
अब हम शरना लेब तुम्हारी । दया करो तन दुखत हमारी ॥

सतगुरु बचन

तब कहे सतगुरु लेहु सँभारी । राजा सुनहु बात हमारी ॥
कस चले राजा लोक हमारे । मैं नहिं देखूँ लगन तुम्हारे ॥
कोटिन ज्ञान कथे असरारा । बिना लगन नहिं जीव उबारा ॥
जो कोई बूझे भक्ति हमारी । ताको चहिये लगन सँचारी ॥
जैसे लगन चकोरकी होई । चन्द्र सनेह अँगार चुगोई ॥
ऐसे लगन गुरुसे होई । धर्मराय शिर पग धर सोई ॥
तुम तो हो मोटे महाराजा । कैसे छोड़िहौ कुल मर्यादा ॥
कैसे छोड़िहौ मान बड़ाई । कैसे छोड़िहौ मुख चतुराई ॥
कैसे छोड़िहौ हाथी असवारा । कैसे छोड़िहौ अंथ भँडारा ॥

सद्गुरुका राजाको आरती करनेका उपदेश देना

( ३६ )

जगजीवनबोध

कैसे छोड़िहौ काम तरंगा । कैसे राजसे करो मन भंगा ॥
कैसे छोड़िहौ कनक जवाहिरा । कैसे छोड़िहौ कुल परिवारा ॥
तुम तो उनकी बांधी आसा । हम तो राजा कथैं निरासा ॥
जो तुम तजु अन्तरकी बाथा । तबहीं चलो हमारे साथा ॥
भक्ति कठिन करी ना जाई । काहे को हिंस करत हो राई ॥

राजा वचन

राजा कहे दोऊ कर जोरी । सुनिये समरथ बिनती मोरी ॥
नगरके सब षट् बरन बुलाऊं । यहि अवसर सब माल लुटाऊं ॥
तुम तो कह्यो बाहर लेव वासा । मैं तो देहकी छोड़ों आसा ॥
अमृत वचन पियाओ आनी । हंस उबार करो निरबानी ॥
नगर कोटकी छोड़ी आसा । निश दिन रहूं तुम्हारे पास ॥
हुकुम करो सोई मैं लाऊं । करो दया मैं शीस नवाऊं ॥
उमँग उठे हर्षित मन मोरा । थकित भये जनु चन्द्र चकोरा ॥
सूखा बाग जो फल परकाशा । तबते पूजी मनकी आशा ॥
कसनी कसो सो सहुँ शरीरा । तबहुँ प्रीत न छोड़ूँ तीरा ॥
जो तुम कहो सो भक्ति कराऊँ । दया करो तो शीश चढाऊँ ॥

सतगुरु वचन

तब समरथ अस शब्द उचारा । अब आरति का करो विस्तारा ॥
चार गुरुको चौक पुराओ । तिनका तोरायके जल अरपाओ ॥
राजा गर्भ निवारौं तोरा । भाव भक्तिसे करो निहोरा ॥
भाव भक्ति हम चाहें राजा । धन सम्पत्तिसे न कछु काजा ॥

राजा वचन

दया करो सो साज मँगाऊँ । कौन वस्तु ले आगे आऊँ ॥
मैं हूँ जीव मतीका भोरा । कहैं जानूँ चौका के व्योरा ॥
समरथ कहौ मैं आनूँ सोही । चौका जुगति बताओ मोही ॥
करहु गुरु चौका विस्तारी । जीवहि यमसों लेहु उबारी ॥

राजाका पहलेके हंसोंका हाल पूछना और सद्गुरुका उत्तर देना

बोधसागर

( ३७ )

सतगुरु वचन

चार गुरु को साज मँगाओ । चार सवा सौ पान लै आओ॥
चार सवा सेर कन्द मँगाओ । आठ अंश नारियल लै आओ॥
चार माला अरु लोटा चारो । सतगुरु आगे लाकर धारो ॥
चार थाली चार गादी कीजे । चार चँदोवा ताने लीजे ॥
चार कलस जल भरि धरवाओ । तब सतगुरुके आगे आओ ॥
सब यह साज आगे धरि दीन्हा । तब सतगुरुसे विन्ती कीन्हा ॥

राजा वचन

मैं हूँ जीव करम बहु कीना । कैसे यमसों करिहो भीना ॥
गिनत गिनत नहिं आवे चीना । बारम्बार मैं औगुन कीना ॥
ऐसा करम किया मैं भारी । कैसे यमसे लेहो उबारी ॥
एक बात गुरु कहौ विचारी । मोसम पतित आगे कोइ तारी॥
तब सतगुरु बहुत विहँसाने । फिर राजासों निरणय ठाने ॥

सतगुरु वचन

सतगुरु सत्यसुकृत मम नाऊँ । जाइ मथुरामें धारेउँ पाऊँ ॥
खेमसरी ग्वालिनी उबारी । बहुत जीव लै लोक सिधारी ॥
द्वादश पहुँचे पुरुष हजुरी । और हंस द्रौपन मँझुरी ॥
त्रेता युगे मुनिन्दर नाऊँ । नगर अयोध्या धारे पाऊँ ॥
हंस बयालिस लीन्हा लारा । पहुँचे तहाँ पुरुष दरबारा ॥
और हंस द्रौप महाँ गयऊँ । जिन जैसी जिव देह बनयऊँ ॥
अब द्वापरका कहुँ विचारा । नरहर राजका किया उधारा ॥
सात सौ हंस पावन कीन्हा । कुटुम्ब सहित पयाना दीन्हा ॥
चन्द्रविजय घर इन्दुमति नारी । संकट राजा लीन उबारी ॥
केता पूछो जीव सनेही । गिनत गिनत ना आवे छेही ॥
युगन युगन भवसागर आऊँ । जो समझे तेहि लोक पठाऊँ ॥

( ३८ )

जगजीवनबोध

शब्द हमारा मानै कोई । तौ नहिं जाय यमपुरी सोई ॥
इतनी बात कही समझायी । दिल राजाके प्रतीति समायी ॥

राजा वचन

धन्य भाग मेरा कुल कर्मा । कोटित यज्ञ कियो तप धर्मा ॥
सत्यगुरु आयदरस मोहि दीन्हा । बूझत हंस उबार कै लीन्हा ॥
हो प्रभु मोर करो निवैरा । मै तो चरण कमलका चेरा ॥
कहु सन्देश नगर में भाई । जय जीवन राय लोकको जाई ॥
नेगी जोगी सबहि बुलायी । और नगरकी परजा आई ॥
चन्दनका सिंहासन कीन्हा । चौका पूरि कलश धरि दीना ॥
सतगुरु शब्द उचारे लीना । युक्ति साजि गादी पगु दीना ॥
सब रानिनको बेगि बुलायी । करि दण्डवत् गुरुचरणा आयी ॥
जीव प्रति नरियल ले आये । सो सतगुरु को आनि चढ़ाये ॥

सारखी-सब रानी बिन्ती करें, सुनु समरथ चित लाय ।

महा अकरमी जीव हम, सबहि लेहु सुकताय ॥

चौपाई

जेठी रानी चन्द्रमति जोई । सतगुरुकी गति जानी सोई ॥
दूजी रानी है मनकी युक्ती । निर्भय होय करै गुरु भक्ती ॥
तीजी रानी है मनपोई । लज्या कारण ना मानै कोई ॥
चौथी रानी भानुमति आही । जीवत सती सुजानो ताही ॥
पांचवीं रानी धन्ना बाई । कलावंत होय आगे आई ॥
छठवीं रानी प्राणप्यारी । पूजे सन्त वह लाज निवारी ॥
सतई रानी है सत मामा । निर्भय होय जपै गुरु नामा ॥
अठवीं आनन्दकला है रानी । सतगुरुसों प्रीति निज ठानी ॥
नौवीं रानी नामपियारी । भक्तिवंत जाने संसारी ॥
दशवीं रानी है दिल दायक । सब रानीकी सो है नायक ॥
ग्यारहवीं रानी है रंगरोपा । ताके कारन राव नहिं लोपा ॥

राजा रानी इत्यादि सब परिवारका सद्गुरुकी शरणमें आना और राजकुंवरका हठ करना पीछे शरणमें आना

बोधसागर

( ३९ )

बारहवीं रानी सूरजमती । हंस रूप है ताकी गती ॥
द्वादश रानी सब बनि आयी । एक अंग होय सब भक्ति करायी ॥
राजा छडीदार पठवाई । तो वो कुँवरको लाय बुलाई ॥

छडीदार बचन

छडीदार कहै कर जोरी । राजकुँवर सुनु विन्ती मोरी ॥
राजा रानि गुरु चरणै आये । ताते तुमको बेगि बुलाये ॥
गरभवाससों करै निरुवारा । तुरत चलो जनि लावो बारा ॥

कुँवर बचन

तुम छडीदार कहो बात विचारी । कैसा गुरु है सो अधिकारी ॥

छडीदार बचन

हम मति हीन कछु नहि जाना । निश्चय आही पुरुष पुराना ॥
यह सुपने नाहीं कहुँ देखा । सुर मुनि नारद शारद पेखा ॥

कुँवर बचन

कुँवर बीनती कीन सुहाती । सुनतैं बात जुडानी छाती ॥
हंस रूप चारों हैं भाई । उमंग हरष हिये नाहि समाई ॥
जहाँ सतगुरु आसन कीन्हा । कुँवर चार आइ दर्शन लीन्हा ॥
बडा कुँवर वह सूरजभाना । गुरु स्वरूप हृदय में आना ॥
दूजा कुँवर इन्द्रमन दासा । शब्दै पीवै शब्दकी आसा ॥
तीजै कहिये चतुर्भुज कुमारा । शब्द सुनत वह सीस उतारा ॥
चौथा कुँवर विक्रम दासा । जिन तन मनकी छोडी आसा ॥
चारों कुँवर धरे गुरु पाई । तन मन धन सब प्रीति चढाई ॥
कदलौ केर पतवार धरायी । गज मुक्ताहल चौक पुरायी ॥
नरियल मोरि के मालूम कीन्हा । लिखि परवाना सबकूँ दीन्हा ॥
इतने हंस भये मन भावन । तिनको सतगुरु कीन्हा पावन ॥
तन मन धन सो बदला कीन्हा । शिरके साँट साहबको चीन्हा ॥
करी निछावर मेटे गर्भफेरा । अब तो भई भगतिकी वेरा ॥

कुकर्मी जीवके उद्धारका उपाय

( ४० )

जगजीवनबोध

सतगुरु वचन

तुमरी राय भली बनि आही । तुम गरभवासकीकौल निबाही॥
जोई कौल गरभका पालै । ताको सतगुरु होहि दयालै ॥
गरभ कौल कोई चूके भाई । असंख्य जन्म चौरासी जाई ॥

साखी-गरभ कौल चूके नहीं, वोही हंस सुजान ।
चौरासी भरमें नहीं, सो पहुँचे यहि परमान ॥

राजा--वचन चौपाई

राजा कहै दोऊ कर जोरी । सुनु समरथ यह विन्ती मोरी॥
महाकुर्मी जो होय प्रानी । करमनसे कैसे होय छुटानी ॥

सतगुरु वचन

तब समरथ गुरु शब्द उचारा । करमन काटि कहैं निरवारा ॥
असंख्यजन्म कर्म किय आयी । पान पान में करम कटायी ॥
जो जिव कर्म करै निरवारा । पाख पाख में कर्म सुधारा ॥
विना पान नहि कर्म कटाई । कोटिन ज्ञान करै जो भाई ॥
रेखा गुंज विचारै जानी । विना गुंज करै जिव हानी ॥
युग छत्र सो हंस उबारा । छत्र मुनी से उतरे पारा ॥
युग बन्धन ते शिष्य करीजै । असंख्यजन्मका कर्म जो छीजै॥
जैसा जीव तैसा होय पाना । सबही करम होय छय माना ॥
लगन जैमुनि आवै हाथा । धर्मराय तेहि नावै माथा ॥
गुरुशिष्य युक्ति एकजो आवै । पारसपान छत्र मुनि पावै ॥
पान एकोतर लैहैं जोई । असंख्य जन्मका कर्म नशाई ॥

राजा वचन

राजा सतगुरु विनती लायी । लगन जैमुनि देहु बतायी ॥
लगन जैमुनी कैसे पावै । कैसे सतगुरु सों लौ लावै ॥
कौन जुगति चरनामृत लेही । कैसे करै जो बने विदेही ॥