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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( २१२ )

अमरमूल

नाम पारस परस घट महाँ काग होय मराल हो ।
अमर लोकहिं बास कर तहाँ नाहिं काल कराल हो ॥
सोरठा-करलेहु आप समान, गुरुभृंगी यह जीव को ।
देखकर नाम निशान, रूप बरख पल्टायकै ॥
इति श्री अमरमूल ग्रंथ नाममहिमा वर्णन तृतीय विश्राम ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास उठ बिनती लाई । तुम पर ताप हंस मुक्ताई ॥
किहिंविधिपलटै जिवकी काया । सो समुझाय करौ मोहे दाया ॥
हो सतगुरु तुम अन्तर्यामी । पारस भेद कहो मोहे स्वामी ॥

सतगुरु वचन-चौपाई

कहै कबीर सुन सन्त सुजाना । पारस भेद सुनाऊँ ज्ञाना ॥
ज्ञानी काहिं कहैं शब्द है सारा । यह पारस तैं हंस उबारा ॥
पारस पान बालक कहैं दीजे । तातैं हंस काल नहिं छीजे ॥
कामिनी कहैं पारस है सेवा । धर्मदास लखियो यह भेवा ॥
यही रहन तुम पंथ चलाओ । जीवन बोथ लोक पहुँचाओ ॥
तीनहु विधि यह कहै बुझाई । जो मानैं सो लोक सिधार्ई ॥
पुरुष होय शब्द नहिं जाना । निश्चय हुइहै नरक निदाना ॥
बालक हो वीरा नहिं पावै । कैसे कै वह लोक सिधावै ॥
कामिनि हो पारस नहिं लेही । गुरु सोई जो पारस देही ॥
कामिनि जो सो पारस लेही । कैसे मुक्ति होय पुनि तेही ॥
यासे गुरु जो अन्तर करई । धर्मराय के फन्दा परई ॥
गुरु नहिं शिष कहैं ज्ञान बतावा । यद गुरुमें फिर धोख समावा ॥
शिष्य जो गुरुसों अन्तर राखा । शिष्यमहैं धोखा सत हम भाखा ॥
गुरु सोई जो शिष्य समुझावै । शिष्य सोई जो गुरु मन लावै ॥

बोधसागर

( २१३ )

गुरु कहैं पेट करै अधिकार्ई । निश्चय नरक जाय रे भाई ॥
तुम सों भेद कही निहंतता । निश्चय वचन सुनो मतिमंता ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिनवैं कर जोरी । स्वामी सुनिये विन्ती मोरी ॥
नारी नाम नरक की खानी । सो गुरुको किमि दीजे आनी ॥
सकल नरक नारी ढिग कहिये । सोई नरक गुरु कैसे चहिये ॥
गुरुतो ब्रह्म रूप हम जाना । नर्क भोगे सो कौने ज्ञाना ॥
गुरुकी महिमा अगम बताई । नीच वचन कैसे कहैं साई ॥
नीच सोई जो नीची कहै । नीच पंथ सों पार न लहै ॥
ऊँचा होय सो गुरु पद धारा । नीचा छोड़ ऊंच भव पारा ॥
नीचे कर्म काट गुरु दीन्हा । गुरुका वचन मान मैं लीन्हा ॥

दोहा—सो अब मोहि बतावहु, तुम गुरु अगम अपार ।

धर्मदास की बीनती, सुनियो हो करतार ॥

साखी—रहित ज्ञान तुम भाखिया, सत्य शब्द ठहराय ।

व्यभिचारी महाँ सत कहौं, कहौ गुरु समुझाय ॥

सतगुरु वचन चौपाई

कहैं कबीर सुनो धर्मदासू । अब यह भेद कहौं तुम पासू ॥
हम जानी तुम संशय छूटा । काल कठिन भव तुम कहैं लूटा ॥
काल केरि गति तुम नहि जाना । झूठी मायामें लिपटाना ॥
जब जाना निज ब्रह्म स्वरूपा । ता कहैं नाहि रं क अरु भूपा ॥
नाम अमल रस छाके अंका । ताको कहा नरककी शंका ॥
तुम कहैं जीव बुद्धि नहि छूटा । ताते जमरा फिर फिर लूटा ॥
धर्मरायकी गति नहि जानी । हर मंदिर उपजाऔ आनी ॥
यह बाजी महाँ जीव भुलाना । शिवहिसमाधिलगावहि ध्याना ॥
विष्णु रूप काहू नहि जाना । सुर मुनि नर बूढ़े अभिमाना ॥

( २१४ )

अमरमूल

यही वचनमें सब जग वंध्य। नाम बिना नहि छूटत फंध्य ॥
झूठी माया सब जग फंदा। फंद कटे बिन नहि निर्द्वन्दा ॥
अज्ञानी जिव पर है फांसा। नर्क स्वर्ग दोऊ कर आशा ॥
संशय काटनको हम आए। धर्मराय सब दुनियां खाए ॥
ज्ञान सँवाद तुम कहैसमुझाए। तुम कहै धर्मराय भर्माए ॥
वचन हमारे दोष लगाए। झूठी माया तुम लिपटाए ॥
शिष्य सोईं गुरु बचनहि माना। आप ज्ञान बूझे नहि ज्ञाना ॥
गुरु प्रतीति हृदये नहि आई। तातैं बूड़ी सब दुनियाई ॥
बूड़त जाह थाँह नहि पावा। तातैं जन्म जन्म भर्मावा ॥
तब सतगुरु भये अन्तरध्याना। धर्मदास मनमहँ पछताना ॥

धर्मदास वचन

दया करौ गुरु पूरन स्वामी। मैं नहि जाना अंतर जामी ॥
हों अज्ञान तुम मर्म न जाना। जान बूझ भूले अभिमाना ॥
क्षमि अपराध मोर प्रभुराया। मोरे चित जो अन्तर आया ॥
तुम गुरु सतगुरु ब्रह्म समाना। मैं शिव आहुँ महा अज्ञाना ॥
कुवचन वचन बोल जो भाखा। माता पिता हृदये नहि भाखा ॥
करुणामय गुरु अन्तर्यामी। करहु दया अब मोपर स्वामी ॥
जो नहि दर्शन पाऊँ आजू। तजौँ प्रान मैं तुम्हरे काजू ॥
हे साहिब तुम पथ जो दीन्हा। तातैं तुमहि बूझ हम लीन्हा ॥

साखी-धर्मदास बिनखत बदन, करुणा बहुविधि कीन्ह।

दर्शन बिन अति विकल है, जल बिन तलफत मीन ॥

सतगुरु वचन-चौपाई

तबहि कबीर दया चित आई। धर्मदास तब दर्शन पाई ॥
दर्शन पाय भयो आनंदा। जैसे चकोर मिलत है चंदा ॥

बोधसागर

( २१६ )

गहि गुरुचरण बंदगी कीन्हा । चरण धोय चरणामृत लीन्हा ॥
बिन्ती कीन्ह चरण चितलाई । महा प्रसाद दीजिये साईं ॥
आमनिको अज्ञा तब दीन्हा । नाना व्यंजन तूर्तहि कीन्हा ॥
कंचन थार आरती चारी । सेवा बहुत हृदयमें धारी ॥
सुत नारी सब चरणन लागे । प्रेम प्रतीत भक्ति मन पागे ॥
चरणामृत सबही मिल लीन्हा । दिव्य ज्ञान सब कहैं कर दीन्हा ॥
साहिब चौका बैठे जाई । बहुत भौंति कर आसन लाई ॥
परस थार जब आमनि नारी । सुन्दर बदन प्राण अतिधारी ॥
मार मार प्रसाद लै खावहिं । प्रेमभाव साहिब मन भावहिं ॥
पाय प्रसाद पुनि अचवन लीन्हा । धर्मदास तब बिन्ती कीन्हा ॥
दया करहु अब मोपर स्वामी । बन्दी छोड़ु वर अनंतर जामी ॥
तब दीन्हऊँ प्रसाद गुसाईं । धर्मदास तब हवैं मन माईं ॥
जेतक साथ रहे घर नाहीं । वह सब आनंद भये मनमाहीं ॥
आमनि तबहीं पलंग बिछावा । सतगुरु तहां आन पौढावा ॥
धर्मदास तब पंख डुलावैं । आमनि चरण चापि सुख पावैं ॥
सकल साध हिल बंदगी कीन्हा । तन मन धन साहिब कहँ दीन्हा ॥
मेटी सकल जगतकी लाजा । ताते होय जीवको काजा ॥
धर्मनि तहां निछावर करहीं । बार बार बिन्ती अनुसरहीं ॥

साखी-यह तन लेव गुसाईं, जो होवे हम काज ।

तन मन धन कर निछावर, सुख संपति कुल लाज ॥

सदगुरुवचन-चौपाई

कर धर सिज्या पर बैठाया । अन्तर गति स्थिर ठहरावा ॥
जोई मुख सौं भीतर देखा । सबहि कसौटी कीन्ह परेखा ॥
साहिब तब ही दाय़ा कीन्हा । मस्तिक हाथ आमनिके दीन्हा ॥
जाहु न अपने घरके माहीं । सत्य तुम्हार देखे मन माहीं ॥

( २१६ )

अमरसूल

यह मन कर्म अकर्म करावे । देहके स्वारथ नाच नचावे ॥
तातें तुम मन थिर हम जाना । काल चरित्र छूटा अभिमाना ॥
हमरे देह काम नहीं होई । तुम अहंकार सकुल हम खोई ॥
धर्मदास तुम वंश उजागर । हंसन पहुँचावहु सुख-सागर ॥
निश्चय हुई है मुक्ति परवाना । सत्यलोक कहि देव पयाना ॥
वंश तुम्हार जहां लग होई । इनके हाथ मुक्ति सब होई ॥
वंश ब्यालिस अचल तुम्हारा । तिनके हाथ मुक्ति संसारा ॥
ब्यालिस मांहि त्रयोदश भाखा । अंश हमारहु हैं निज शाखा ॥
नाम जानते सबै उबारा । बिना नाम बूड़ा संसारा ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिन्ती अनुसारी । हे साहिब मैं तुम बलिहारी ॥
हमरे वंश कहैं पारस देई । तुम्हरे दरश बहुर कब लेई ॥
यही अर्ज मेरो सुन लीजे । वंश हमारहु आपनो कीजे ॥
जिहंते मुक्ति होय सब केरा । सो मोहे स्वामी कहौ नवेरा ॥

सद्गुरु वचन

तुम्हरे वंश को कहौ उपदेशा । जाते होय हंसको भेषा ॥
जो कोई हंस होय जगमाहीं । उबरहिं वंशनकी वाहीं ॥
वंश तुम्हार जे बालक होई । तिनसौ पारस ले सब कोई ॥
जा कहैं नाहीं ब्यापै कामा । निशदिन रहे शब्दमें धामा ॥
रहित गहिनसौ स्थिर अंगा । मनसा वाचा सत्य प्रसंग्रा ॥
सत पास को जानैं भेदा । आतम परसै सूक्ष्ममें भेदा ॥
ऐसा सज्जत शब्द सनेहा । प्रकट कबीर तासुकी देहा ॥
तिनसौ पारस भेद न कीजे । वंश मोर जो शब्द पतीजे ॥
पारस मांहि भेद जो करई । कहैं कबीर सो किहि विधि तरई ॥
बालक बोध कै पंथ चलाओ । बिना पंथ सोला नहीं पाओ ॥

बोधसागर

( २१७ )

बालक तेरे वंशके हाथा । पंथ दीन्ह मैं तिनके हाथा ॥
मुक्ति जान कर राखै गोई । तेहि सम झोही और न कोई ॥
शब्द जान कर पन्थ चलावै । देश देश फिर सब समझावै ॥
तौन देश गैवनइ कराई । सुर्तन बन्त हंसन मुक्ताई ॥
पुरुष आज्ञा जो मोकहैं दीन्हा । मुक्ति भेदसों सब कहि दीन्हा ॥
सार शब्दका भेद जो पावा । यह सब ज्ञान तोहि समझावा ॥
बिना ना मिट है नहिं संशा । नाम जान सो हमरे वंशा ॥
नाम जान सो वंश करावै । नाम बिना सो मुक्ति न पावै ॥
वंश तुम्हार नाम जब पाई । भवसागरतें लोक सिधार्द ॥
नाम न जान करै अहंकारा । सो जिव परि है भवजलधारा ॥
नाम जान सो वंश हमारा । बिना नाम बूझा संसारा ॥
बिना नाम सबही अभिमानी । नाम प्रचय कोई कोई जानी ॥
नाम निहश्चर कहा बुझाई । अमरमूल महाँ देखो आई ॥
निह अक्षर को पावै भेदा । सोई हंसा होय अछेदा ॥

साखी-कहै कबीर विचारकै, निःअक्षरको भेद ।

निःअक्षर जो पावहीं, सोई हंस अछेद ॥

चौपाई

निह अक्षर तुम ज्ञान सुनाओ । जम्बू द्वीप हंस मुक्ताओ ॥
ऐसा धरम धरे जो कोई । निश्चय पार पाय है सोई ॥
तुम धर्मदास पन्थके राजा । तुम्हरे हाथ जीव को काजा ॥
यही मता हम तुम कहैं दीन्हा । दूसर कोइ न पावै चीन्हा ॥
अक्षर भेद बसै जिहि अंगा । निस बासर हम ताके संगा ॥
सत्य लोक महाँ वासा पाई । अमृत भोजन करै अघाई ॥

छन्द-यही महिमा जीव धरहै, बाम करै सतलोक हो ।

काल फन्दा काटकै लै, धरौ हँसन थोक हो ॥

( २१८ )

अमरमूल

सुन्नन सिज्या बास लीन्हो, असन अमृत पावहीं ।
वस्त्र अम्मर पहिरकै तिन, जरा मरन नसावहीं ॥
सोरठा-षोडश भान प्रवान, धर्मनि शोभा हंसकी ।
पावो शब्द प्रवान, अञ्जलोक वासा कियो ॥
इति श्रीग्रंथ अमरमूल धर्मदास कसोटी, पारस भेद वर्णन-
चतुर्थ विश्राम

धर्मदास वचन चौपाई

धर्मदास तब विन्ती कीन्हौ । अबलगसाहिबहमनहिंचीन्हा ॥
जब तैं दाय़ा भई तुम्हारी । भयो प्रकाश हृदयमें भारी ॥
अमर लोकके हौ गुरु वासी । कारण वन आये अविनाशी ॥
मृतलोक आये किहि काजा । धर्मराय बड़ पापी राजा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मनि सुनौ वचन चितलाई । जीवन काज पुरुष पठवाई ॥
सत्यलोक तैं जगमे आवा । धर्मराय मोहे देखन धावा ॥
धर्मराय तब पूछी बाता । कवन काज तुम आयेउ ताता ॥
मृतलोक में अब मैं जाऊँ । हंसन काज पुरुष पठवाऊँ ॥
धर्मराय तब बोलन लीन्हा । हमरे देश मुक्ति तुम दीन्हा ॥
मैं तो तीन लोक कर राजा । तुम कस करो जीव करकाजा ॥
यह तो लोक पुरुष मोहे दीन्हा । तुम कस मोहे छुड़ावन लीन्हा ॥
अजहुँ भली है जाहु गुसाई । जीव जीव जन्तु मारो सब ठाई ॥
अगम अपार निरंजन देवा । तुम नहिं जानत मोरा भेवा ॥
किहि विधि हंस उतारो पारा । कौन भेद लै करो पसारा ॥
तब हम कहा सुनो धर्मराजा । जानत नाहिं मर्म तुम काजा ॥
हम बल एक शब्द का भाई । तेही के बल हंस मुक्ताई ॥

बोधसागर

( २१९ )

जहां नाम तहां तुम नहीं कोई । विना नाम है तुम्हरी छोई ॥
यह विधि होय हंस परवाना । आवा गमन तासु नहीं जाना ॥

धर्मराय वचन

जेतिक नामे मुख सुन्न करिया । सो सब नाम हमारे धरिया ॥
जो कोई धर्म करही संसारा । सो सब मोर आहि व्यवहारा ॥
बहुत भाँति मैं फंदा कीन्हा । शंकर सहित बांध मैं लीन्हा ॥
कवन नाम हंसन मुक्ताओ । सो स्वामी मोहे भेद बताओ ॥

ज्ञानी वचन

नाम हमार पुरुषके केरा । वही नाम सों हंस उबेरा ॥
धर्मराय तुम ताहि न जाना । अपने अवगुण भये विगाना ॥
यही नाम आपन घट लेते । जीवन कष्ट नाहिं तुम देते ॥

धर्मराय वचन

परम पुरुष है मोरा नाऊँ । दूसर पुरुष कहाँ निर्माऊँ ॥
मोरे आगे कवन कहावा । सब कहँ मार जार भर्मावा ॥
तीन लोक महँ जीव पसारा । उन कहँ मार करौ संहारा ॥
ब्रह्मा पुत्र हमारो भयऊ । अंतकाल ताही दुख दयऊ ॥
शिवसमाधि कीन्हा अहँकारा । प्रलय काल करौ जर छारा ॥
विष्णु बड़े सबही में अंशा । तिनकहँ मार करौ निरवंशा ॥
अपने अंश यही गति दैहौँ । सृष्टि संहार प्रलयकर लैहौँ ॥
तुम तो आए हंस उबारन । कवन भाँति करिहौ जगतारन ॥

ज्ञानी वचन

धर्मराय कहँ तब ससुझाई । तुम जीवनके दुष्ट कहाई ॥
जब तुमकीन्ह चोरको काजा । तानैं पुरुष मोहिं उपराजा ॥
नाम एक मोहे दीन्ह अमोला । वोही नाम जिव बन्दी खोला ॥
ठाकुर नाम तुम्हारा होई । तीन लोक ठकुराह समोई ॥

( २२० )

अमरमूल

पुरुष नाम तुम दीन्ह बिसारी । आपहि पुरुष रूप विस्तारी ॥
योग सन्तायन हमरौ नाऊ । तोहि कारण मोहे निर्माऊ ॥
तुम निज धर्म करौ अहंकारा । आदि ब्रह्म अहे रखवारा ॥

धर्मराय वचन

धर्मराय तब उत्तर दीन्हा । हम कहैं दया पुरुष ने कीन्हा ॥
तुमही दया करहु मोहि पाहीं । जिहिते मोर रहै जग छाहीं ॥
तुम जेठे हम लहुरे भाई । हम ऊपर तुम काहि पठाई ॥
पुरुष समानहिं तुम कहैं जाना । अपने मन तुम दूसर ठाना ॥
कहौ उपदेश सोह उपदेशा । जातें ऊजर होय न देशा ॥
पुरुष वचन हम शिरपर मानी । आज्ञा भंग करों नहिं ज्ञानी ॥

ज्ञानी वचन

योग सन्तायन बोलन दीन्हा । यह उपदेश पुरुष तोहि दीन्हा ॥
जा जिव पान प्रवाना पावै । ताके निकट काल नहिं जावै ॥
जो कोइ जीव होइ है ज्ञानी । ताकी तुम कीजौ महिमानी ॥
सार शब्द जो बालक पावै । तासो प्रेम बहुत तुम लावै ॥
यह उपदेश हमारौ लीजे । पुरुषके वचन मान शिर लीजे ॥
जो इतना नहिं करौ कबूला । तौ तुम सहहु दुःख बहु शूला ॥
पान प्रवाना शब्द न होई । जस जानो तस करिहौ सोई ॥
इतना धर्मराय जब जाना । जो तुम कहा सोई परवाना ॥
बिन्ती एक हमारी लीजे । नाम सन्देश मोहि कहि दीजे ॥

साखी-मैं उपदेश जो पावहुँ, सो सब कहहुँ तुम्हार ।

तुमहि पुरुषके अगुवा, हंस छुड़ावनहार ॥

ज्ञानी वचन-चौपाई

तब साहिब जो कहिबे लीन्हा । तुम नहि पावहु नामको चीन्हा ॥
जब तुम सत्यलोक महाँ रहिये । चौसठ युगलग सेवा करिया ॥

बोधसागर

( २२९ )

तबै पुरुष आज्ञा तेहि दीन्हा । सत्रह खण्ड राज्य तब दीन्हा ॥
तब तुम मान सरोवर जाई । कन्या देख बहुत सुख पाई ॥
पुरुष तोहि तब मार निकारा । तब हम भएऊ हंस रखवारा ॥
शब्द वार तब पुरुष सम्हारी । तुम्हरे टारे टरत न टारी ॥
मूल शब्दका का पावै भेदा । सोई हंसा होय अच्छेदा ॥
सोई भेद तुम नाहिंन पावा । कितनौ सेवा कर गुहरावा ॥
तुम कुबुद्धि औगुण बड़ कीन्हा । पुरुष आय पेल जो दीन्हा ॥
तबतै तुम्हरो भित्र पसारा । राज पसारेउ यह संसारा ॥
हम कहैं दया हंस की आई । दीन्ह पयान लोक तैं भाई ॥
बचन हमार मान सिर लीजै । शब्द खोजि अब नाहि करीजे ॥
जब तुम पाहौ शब्द ठिकाना । लोक तुम्हार न रहे निदाना ॥
सबै जीव सत लोकहि जाई । तुम्हरी नहीं रहै ठकुराई ॥
येही मन्त्र हमारो धरहू । शब्द खोज अब नाहीं करहू ॥
साखी-महा प्रलय जब होय है, देखि हो लोक हमार ।
तब हम तुम कहैं मिलिहिंगे, शब्द दोह टकसार ॥

चौपाई

सत्रह खण्ड तबहि मिटि जाई । रहै पुरुष तब शब्द समाई ॥
धर्मराय तुम पुरुष के अंशा । मिलहै शब्द मिटे सब संसा ॥
इतना वचन धर्म सौ कीन्हा । पीछे जगही प्याना कीन्हा ॥
ता पाछे संसारहि आये । पेडरमों बहु जीव छुड़ाये ॥
चार सिद्ध पर्वत पर पाये । तिनसों ज्ञान भेद समुझाये ॥
चारौ सिद्ध काल सों बाचा । दिव्य ज्ञान हृदय मंह साचा ॥
ता पीछे तुम्हरे ढिग आए । धर्मदास तुम दर्शन पाए ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिन्ती अनुसारि । है सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥
अगम ज्ञान तुममोहिं लखावा । हृदय कमल तुम मोर छुड़ावा ॥

( २२२ )

अमरमूल

धन्य भाग्य सतगुरु पगुधारा । अब भयोजीवन सुफल हमारा ॥
एक वचन मोहि कहौ बुझाई । जिह्तिं जीव की संशय जाई ॥
काल कठिन सो काहु न जाना । सो मोसौं कहिये परवाना ॥
जीवत काल चिन्ह जब पावै । तब तुम्हरे सतलोक सिधौवै ॥
जीवत काल चीन्ह नहि जाई । तो कैसे सत लोक सिधाई ॥
तुम तो ज्ञान बहुत उपदेशा । बिन देखे सब लगै अन्देशा ॥
दया करो अपनो जन जानी । काल चिह्न याऊ पहिचानी ॥
बिन चीन्है नहिं होय उबारा । भवसागर बांकी है धारा ॥
काल कठिन है जगकौ फंदा । किहिं विधिजीवहोयनिरद्वन्दा ॥
निरद्वन्दी मोहे करो गुसाई । तौ मैं पंथ चलाऊं जाई ॥

सद्गुरु वचन

साहिब तब कहिबे चितधारा । धर्मदास सुन काल पसारा ॥
काल अमल संशय है भाई । प्रथम काल तुम चीन्हौ आई ॥
जेतक कर्म करै संसारा । सो सब आहि काल व्यौहरा ॥
काल रुयाल जानत नहिं कोई । कर विपरीत सबन कहैं सोई ॥
दस औतार काल ने छलिया । काल अपर्बल सबकहैं दलिया ॥
मीन स्वरूप काल औतारा । कूर्म स्वरूप महा जो धारा ॥
बारह रूप औतार जो कीन्हा । नरसिंह रूप औतारजोलीन्हा ॥
वामन होके बलि कहैं छलऊ । परशुराम होय क्षत्री दलऊ ॥
राम रूप होय रावन मारा । कृष्ण रूप होयकंस पछारा ॥
बौध रूप जगन्नाथ औतारा । लीला बहुत भांति सम्हारा ॥
दस औतार कालके धरिया । म्लेच्छ मारसतयुगसोकरिया ॥
इतनी देह धरी युगमाहीं । काल अमल व्यापै तिनपाहीं ॥
काल मर्म काहू नहिं जाना । सबकहैं पकर कीन्हे पिसवाना ॥
काल पुरुष काहू नहिं चीन्हा । काल पाय सबहिन गहि लीन्हा ॥

बोधसागर

( २२३ )

काल पायकर जागहि योगी । कालकष्ट सुन फिरहिं वियोगी॥
काल पायकर पाप जो करहीं । काल पाय सब पुण्यहि धरहीं॥
काल पायकर सत गुरु भयऊ । काल पाय त्रेता है गयऊ ॥
द्वापर काल पायकर आवा । कलियुग काल पाय निरमावा॥
कालहि पाय चला सब जाई । काल पाय संसार समाई ॥
काल पाय कर भक्ति करावै । काल पायकर लोकहि आवै॥
काल भेद मैं कहा विचारी । धर्मदास तुम ज्ञान सङ्घारी ॥
काल कालको मर्म न जाना । सत्य पुरुष तैं भय उत्पाना॥
अलख निरञ्जन नाम कहावा । पुरुष प्रसंग रूप बनि आवा॥
पुरुष प्रगट जब रूप बतावा । सत्य लोक जब नाम धरावा ॥
तबही पुरुष गुप्त होय गयऊ । काल रूप यह मनकर भयऊ॥

साखी-काल काल सब कोई कहैं, काल न कीन्ह विचार ।
मन थिर होवै शब्द महैं, काल रहे झकमार ॥

चौपाई

ना कहैं आवै ना कहैं जाई । शब्दहि माहीं सहज समाई ॥
जा देखहैं तैसा है सोई । गुप्त प्रगट वे रहै समोई ॥
गुप्त ये प्रगट एक कर भयेऊ । दुतिय भावकर ज्ञान नश्येऊ॥
दुतिया दुर्मत दासी होई । ज्ञान विचार कहां रहो सोई ॥
तीन कालसों जो रहै थीरा । सोई पुरुष कायाको बीरा ॥
सोई वीर शब्द निज मूला । मंत्र ध्यान सोई स्थूला ॥
वही शब्द तैं काल डराई । नातर करि हैं कोट उपराई ॥

साखी-दुनिया चेरी काल की, मूरख बूझे नाहिं ।
जाकी दुनिया मिट गई, ते आतमब्रह्म समाहिं ॥

चौपाई

जैसा है तस कहा न जाई । ज्ञान विना बूझे नहिं भाई ॥
आय ज्ञान तव परगट भयऊ । दुतिया भाव सबै मिट गयऊ॥

( २२४ )

अमरमूल

दीपक ज्ञान भयो उजियारा । कालतिमिरमिटगा अँधियारा ॥
भय आनन्द गुरु जब पाये । ऊँच नीच सब दूर बहाये ॥
ऊँच नीच सब समकर जाना । ऊँच नीच सब झूठ बखाना ॥
ऊँच नीच सब झूठहि लावै । जब आतम परमातम पावै ॥
झूठा लोग न बूझै कोई । सब संसार झूठ है सोई ॥
समता ज्ञान प्रकाश कराई । और ज्ञान सब झूठ हैं भाई ॥
झूठ सांच संसार समाना । सत्य शब्द नाही पहिचाना ॥
झूठ सांच दोई मिट गयऊ । ज्ञानप्रकाश जाहि घट भयऊ ॥
धर्मदास तुम बूझहु ज्ञाना । काल कर्म सुनहु अब काना ॥
सतगुरु दया जाहि पर होई । अमरमूल कहैं जाने सोई ॥

साखी-अमर मूल कहैं जानई, काल दगा मिट जाय ।

काल परख कर बूझ है, सब नहिं काल समाय ॥

चौपाई

काल तिहकालका भेद सुनाऊँ । धर्मदास मैं तोहि लखाऊँ ॥
निह अक्षरका भेद निज पावै । निह अक्षर माहिं जाय समावै ॥
जो नहिं जान निहअक्षर भेदा । ता महाँ काल करत है छेदा ॥
निह अक्षर विन काल न जीतै । यज्ञ दान केता कर बीतै ॥
योग यज्ञ तप काल पसारा । यज्ञ दान सब काल व्योहरा ॥
काल गती संसार है भाई । बिरला जन कोई लख पाई ॥

साखी-संशय काल शरीर महिं, विषय काल है दूर ।

ताहि लखत कोई संतजन, जार करै सब धूर ॥

चौपाई

जीव बुद्धिसों नाहिन चीन्हा । काल न चीन्हत मतिके हीना ॥
कबहुँ सुख कबहुँ दुख होई । काल जाल जानत नहिं कोई ॥
मानस कह मनमाहिं बिचारी । निरालंब होय प्रभुहिं पुकारी ॥

बोधसागर

( २२६ )

कबहुँ कहै प्रभुने सब कीन्ह। कबहुँ कहत सब मोर अधीना॥
स्वारथ रूप सदा चित लावै । परमारथ कबहुँ नहि भावै ॥

साखी-कहै कवीर धर्मदास सों, तुम सुनियो चितलाय ।
काल भेद नहि जानहीं, मूरख रहे खुलाय ॥

चौपाई

जो देखा सो काल पसारा । जो बिनसे सो काल अहारा ॥
धर्मदास तुमचित थिर करहू । मनकी डगमग तब परिहरहू ॥
भूत भविष्य वर्तमान जो कहिये । यहि बिधि तीनकाल निर्वहिये ॥
भूत सबै है कालकी काया । भविष्य होय सोइ जीव कहाया ॥
वर्तमान परमात्म जानो । यहि विधितीनकाल पहिचानो ॥
जोई भूत सोई वर्तमाना । सोई भविष्यत भर्मकर जाना ॥
भूत भविष्यत और वर्तमाना । मनथिर भए सबै पहिचाना ॥
शब्द मांहि हंसा निरबहई । मन बिच कर्म नामको गहई ॥
मनके रूप समानी माया । सब संसार व्याप्त यह छाया ॥
मन थिर कर परमात्म जाना । यह विधि तत्त्व लेहुपहिचाना ॥
काल जाल तैं तेही लूटै । काल बिचारै ताहि न लूटै ॥
यही भेद धर्मन सुन लीजै । शब्द मांहि बासा तुम कीजै ॥
काल ज्ञान संसार बखाना । काल स्वरूप नहीं पहिचाना ॥

साखी-इतना भेद सुन लीजिये, काल को ज्ञान बखान ।
काल पाय कर होत है, हम सों फिर फिर ज्ञान ॥

धर्मदास वचन चौपाई

धर्मदास तब पांयन परई । सतगुरु सों बिन्ती अनुसरई ॥
जो तुम कही सोई परवाना । काल पाय कर फिर २ ज्ञाना ॥
तुम प्रसाद मुक्ति फल पावा । यह भवसागर बहुर न आवा ॥
हम सों ज्ञान कहा फिर होही । सोई बात कहो निज मोही ॥

( २२६ )

अमरमूल

सद्गुरु वचन

तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । तुम नहिं पाओ ज्ञानको चीन्हा ॥
हम तौ सत्यलोकके वासी । तहैं नहिं काल बसै अविनाशी ॥
मैं जो कहा मृतलोकव्यवहारा । काल पाय सब होत औतारा ॥
काल पाय बिनसै संसारा । काले सब बिनास जग डारा ॥
काल कर्म काहू नहिं जाना । जीव जन्तु सब काल समाना ॥
कालहि पाय सृष्टि निर्माई । काल पाय फिर माहिं समाई ॥
साखी-काल पाय जग ऊपजो, काल पाय वर्त्ताय ।
काल पाय सब विनसही, काल काल कहैं खाय ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

यह सुन धर्मदास हर्षाने । सद्गुरु रूप हिये पहिचाने ॥
तुम साहिब मोहे कीन्ह निहाला । आपन जान कीन्ह प्रतिपाला ॥
बिन्ती एक करत संकाई । हे सतगुरु मोहे भाख सुनाई ॥
कालहिकी गति कहि समुझावा । अचरज बात मोर मन आवा ॥
प्रथम पुरुषकी प्रथमहि काला । मोहि बतावहु भेद रसाला ॥

सद्गुरु वचन

तब सतगुरु कहिबे अनुसारा । धर्मदास सुन शब्द हमारा ॥
प्रथम हते जब शून्य स्वभाऊ । धर्मदास सुन शब्द निर्माऊ ॥
शब्दते पुरुष शब्द निर्मावा । यही भेद बिरले जन पावा ॥
जाकौ कहिये शून्य स्वभाऊ । काल शून्य एकै समुझाऊ ॥
काल भेद कोई नहिं जाना । धर्मदास तुम सुनियो ज्ञाना ॥
शून्यहि माहि शब्द उच्चार। धर्मरायको भयो पसारा ॥
प्रथमहि जिन्द रूप इकभयऊ । सत्तर युग सोवत चल गयऊ ॥
तब साहिब मोहे आज्ञा दीन्हा । जिन्द जीवकहैं तुम नहिं चीन्हा ॥
जिन्द जीव कहैं आन बुलाई । सत्तर युग उन सोय सिराई ॥

बोधसागर

( २२७ )

तब हम जाय शब्द अस बोला । सोवत जिन्द नाहिं चित डोला ॥
का सोवत तोहि पुरुष बुलाई । नाहिं जागहि तिहि नींद सुहाई ॥
तब हम तेहि जगावन लागे । जिन्द जाग परम अनुरागे ॥
जगे न नीन्द भर्म बहु आवा । तब हम एक शब्द उपजावा ॥
काल शब्द कहैं टेर पुकारा । सुनकर जिन्द भयो संचारा ॥
काल शब्द सुनजिन्द डराना । तबही आया चरण लिपटाना ॥
काल नाम सुन ऐसा भाई । काल नाम सुन भक्ति कराई ॥
धर्मदास सुन कालको भेदा । काल बिना नाहिं करै निषेदा ॥
काल नयन भर देख न कोई । कालहि पढ़ पढ़ गये बिगोई ॥
वेद शास्त्र सुन पंडित कहाई । काल पुरुष सब जीव भर्माई ॥
साधू मिलकर भक्ति कमाई । जातैं काल फांस नाहिं आई ॥
काल शब्द ना होतौ भाई । ता काहे को भक्ति कराई ॥
कालके डर तपसी तप साधा । इन्द्री पांच काल डर बांधा ॥
कालहिके डर योग जो करई । कालहि डरतैं दान जो भरई ॥
कालहि डर भावै सत जाना । कालहि डर छोड़ै अभिमाना ॥
सत्यहि वचन काल डरकहहीं । कालहि डरसे झूठ परिहरहीं ॥
ऐसा डर है कालहि केरा । धर्मदास तुम करहु न बेरा ॥

सारखी-ऐसा डर है कालका, सुनहु हो धर्मदास ।

एक नाम कहैं जानकै, निडर रहो सुखवास ॥

चौपाई

कालहि डर दुनियां सब बूड़ी । काहु न देखी कालकी मूड़ी ॥
तुम धर्मदास निडर हो रहहु । नाहिन काल झूठ परिहरहु ॥

छन्द-यह भांति पंथ चलाव जगमें हंस लोक पठाइबौ ।

ज्ञान गम्य लखायकै फिर शब्दसार लखाइबौ ॥

हृदय जेहि पर होय गुरुकी रहत गहन समावही ।

काल कष्ट निवारकै सोई पुरुषलोक सिधावही ॥

( २२८ )

अमरमूल

सोरठा-आप सरीखा जान, ता कई शब्द लखाइयो ।

धर्मदास लेव मान, यही सिखावन पुरुषको ॥

इति श्रीग्रन्थ अमरमूल धर्मराय बाद कालको वर्णन ।

पंचम विश्राम

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास आनंद समाना । विगसेउ कमल उदेजनुभाना॥
बहुत भांतिसों विन्ती कीन्हा । मन वच कर्म चरणचित दीन्हा॥
पदरज लीन्हौ तृषा मिटाई । छूछी सीप स्वाती जिमि पाई॥
रंकहि निधी मिलगई जैसे । अहिमणि मिलै मगन भय ऐसे॥
चरणामृत वह विधिसों लीन्हा । गुरु चरणनको मैं आधीना ॥
अब प्रतीति मोर मन आई । निश्चय वचन मान तुव साँई ॥
अबही जाय लोक मैं देखा । ज्ञान गम्यसों पायउ लेखा ॥
भक्ति मुक्ति दोनों हम जाना । दया तुम्हार परी पहिचाना ॥
जेपर दया तुम्हारी होई । ऐसे पदको पहुँचे सोई ॥
हम जानकै मान उपदेशा । विन सतगुरु नहिं मिटत अँदेशा॥
तुम सतगुरु और सब शिष्या । यही ज्ञान परगट हम देख्या ॥
सतगुरु आप और सब वंशा । सत्य पुरुषको तुम निज अंशा ॥
तुम्हरे बचन लोक पहिचाना । तुम्हरी दया परी अब जाना ॥
यह मन बूझ शब्द है लोका । ज्ञान भयो मिट गये सब शोका॥
लोक अलोक एक कर जाना । तुम्हरे बचन सत्य हम जाना ॥
अब मोरे जिव परचय आई । बिन जाने जाने बूझी दुनियाई॥
नहि बूझौ नाहीं उतराना । यहि पाया हम केवल ज्ञाना ॥
एक बचन मैं बूझा साँई । विन्ती करौं चरण चित लाई ॥

बोधसागर

( २२९ )

तुम सतगुरु मोहिदिय उपदेशा । मैं हंसनसों कहौ सँदेशा ॥
यह तौ बात कही नहि जाई । जब पावे तब ज्ञान समाई ॥
जब तुम दया करी हियमाही । तबहीं पाऊ नामकी छाहीं ॥
कहिये बचन मोर मन भावै । जातैं हंसा लोक सिधायै ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । सब कहैं देह शब्दका चीन्हा ॥
जो नहि पाव शब्द सहदानी । तो कस करहु लोकपहचानी ॥
सब कहैं ज्ञान गम्य कर देहु । शब्द लखाय आपनकर लेहु ॥
प्रथमहि देहु पान परवाना । ता पीछे फिर ज्ञान लखाना ॥
समय जान सब कहौ बिचारी । यही भांति सब जिव निर्वारी ॥
साधुनकी सेवा चित लावै । सो जिव भवसागर नहि आवै ॥
गुरुकी दया मान सिरलीन्हा । भाव सहित पूजातिन कीन्हा ॥
इतनौ भेद एक नहि जानी । सो कैसे पुन शिष्य बखानी ॥
ज्ञानवन्त कहैं यह उपदेशा । मूरखसों जिन करहु संदेशा ॥
सार शब्द जाके घट होई । तिहि हंसा सम और न कोई ॥
धर्मदास तुम कहैं नहि भारा । सबके तारन है करतारा ॥
यह उपदेश कहहु बहु भांती । माने सोई हंस की जाती ॥
जो नहि मानै कहा तुम्हारा । सो चल जैहै यम के द्वारा ॥
यमके हाथ परै सो आई । बहता जाय थाह नहि पाई ॥

साखी-कहै कबीर धर्मदाससों, दीजो पान प्रवान ।
यही हंस जो पावहीं, पहुँचे पद निर्वान ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी तुम्हरी बलिहारी । अब चौकाको कहौ बिचारी ॥
कवन शब्दसो आरति साजी । कवन शब्द सतगुरुकी पाँजी ॥

( २३० )

अमरमूल

कवन शब्दसों नरियर मोरा । कवन शब्दसों तिनका तोरा ॥
कवन शब्दसों चौका करई । कवन शब्दसों दीपक बरई ॥
कवनै शब्द पान लिख दीन्हा । कवन शब्द प्रसाद जो लीन्हा ॥
कवन शब्द मिष्टान्न चढ़ावा । कवन शब्दसों छत्र तनावा ॥
कवन शब्द पनवारौ साजा । धोती कवनै शब्द विराजा ॥
कवन शब्दसों चंदन दीजे । कवन शब्दसों पुहुप चढ़ीजे ॥
दल प्रसाद किहिं शब्द बनाई । यही भेद गुरु कहु ससुझाई ॥

सद्गुरु वचन

यहे भेद अब तोहिं बताऊँ । चौका साज सकलसमझाऊँ ॥
प्रथमहि तौ चौका अनुसारा । सोई शब्द मैं कहौं पसारा ॥
सेत सिंहसन चौका चारी । कंचन थार आरती वारी ॥
तहाँ धनी जीव बैठे आई । लिखनी लिख बहुभाँति बनाई ॥
धर्मदास उठ बिन्ती कीन्हा । चन्द्र सूर्य दोइ साखी दीन्हा ॥
शब्द माहिं बहु भाँति समावा । कदली पत्र जो आन धरावा ॥
अमर शब्द उच्चार कराया । अमर प्रवान अमरभइ काया ॥
अमर प्रवान अमर कर जाना । अमर शब्द बिरले पहिचाना ॥
अमर शब्दका पावै भेदा । कहैं कबीर प्रवान अच्छेदा ॥
एक बीज धरती कहैं दीन्हा । पान सुपारी नरियर कीन्हा ॥
सो प्रसाद संतन कहैं आई । सत्त सुकृत के लोक सिधाई ॥
तीन लोक सों भिन्न पसारा । बाहर भीतर शब्द पसारा ॥
दूजी दुर्मत चित सों मेटो । एकहि चीन्ह कबीरहि भेटो ॥
यहि शब्द मिष्टान्न चढ़ावा । कदली पत्र जो आन धरावा ॥
सवा शेर मिष्टान्न मँगावहु । सत्य पुरुष कहैं आनचढ़ावहु ॥
सत्य सुकृत कहैं आन चढ़ाई । दीन भाव कर बिन्ती लाई ॥

बोधसागर

( २३१ )

धर्मदास वचन

अर्ज एक अब सुनो हमारी । तुम गुरु लीन्हा जीव उबारी॥
शोध देख हम सकल शरीरू । पीरा मेटौ बाप कबीरू ॥
केते लाख चूक जो परई । किहि कारण नरिअर अनुसरई॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास तुम सुनो ये बाणी । ताकर भेद कहौं परवानी ॥
सवा लाख चूक जो परई । तिहि कारण नरिअर अनुसरई॥
बहुत भांति सों तत्व लगावै । मृत्युलोकमें बहुरि न आवै ॥

सुमिरन नरिअर तिलकको

मृत्यु लोक यम को स्थाना । खैंच कबीर ने मारा बाना ॥
बान मार जत यश लीन्हा । तिलक काढ़ धर्मन कहै दीन्हा॥

साखी-पाक नारिअर मोरके, हंस उतारो पार ।

कंचन कपूर मिलगए, साहिब जीवको करौ उधार॥

खिरचा अचवन लेके, यकटक सुमरौ ध्यान ।

कहै कबीर धर्मदाससों, सोहे शब्द प्रधान ॥

सम्पूर्ण

चौपाई

तबही दीपक आन प्रकाशा । मनो सत्य लोक कियो बासा॥

अन्न शब्द का पावै भेदा । कहे कबीर तब जोत अछेदा॥

तबहि पानका लिखनी नीका । अन्न शब्दका पावे टीका ॥

सत्यका अंक तहाँ लिख दीन्हा । मंत्र उचार एक तब कीन्हा ॥

सुख सागर मोरौ स्थाना । तहँवा सेत चढ़ाये पाना ॥

सेत पानका अम्बर काया । सीपमाँहिं जिम स्वाति समाया॥

भर्मत पवन बिहरत संसारा । निर्मल पवन हंस रखवारा ॥

तबहि तिनका बेग तुरावा । जन्म जन्मके पाप बहावा ॥