कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बाललीला और रामानन्दको गुरु करनेका वर्णन
ज्ञानसागर
( ७५ )
दूध न पीवत नाम कबीरा । खेलेत संत संग मत धीरा ॥ तिनसौँ कहैं जागौ रे भाई । बिना नाम नहिँ काल पराई ॥ कोई न बूझौ भेद हमारा । रामानंद पर तब पगु धारा ॥ तब अपने मन कीन्ह उपाई । तिनहि दरश कैसहु नहि पाई ॥
रामानन्दको गुरु करना
जाहि रामानंद गंग स्नाना । तेहि मारग में जा पौढाना ॥ तबहि पांव गुरु लाग कबीरू । रामानंद बोल्यो मत धीरू ॥ उठ कबीर तब वचन उचारा । रामानंद है गुरु हमारा ॥
साखी-करहिगोष्ठी शिष्य सब, कोई ज्ञान जीत नहिं जाय ॥ सत ऋषि सुधि पाई, गुरु सों बोले आय ॥
बोपाई
विद्या कहे मलेच्छ को दीन्हा । रामानंद कोध तब कीन्हा ॥ चले शिष्य तब आज्ञा पाई । कबीर संतको आन बुलाई ॥ सुनतहिं शिष्य चहुँ दिशि धाये । हेर खोज कबीरै लाये ॥ आये कबीर लागि नहि बारा । गुरु मंडलमें आन पगु धारा ॥ अन्तर कपाट शिष्य तब लाया । पूजत रामानंद हरि राया ॥ सुन कबीर आगे चलि आये । गुरुहि आनकर मस्तक नाये ॥ लक्ष्मीनारायण मुकुट सिरनाये । पहिरै वस्त्र माल नहीं समाये ॥ तबहि कबीर वचन अस भाखा । वस्त्र पहिरि माला तुम राखा ॥ अंतर कपाट खोल तब दीन्हा । रामानंद सुन अचरज कीन्हा ॥ दिव्यज्ञान तुम कहैं केहि दीन्हा । जोर कर गुरुहि विनोदित कीन्हा ॥ कब हम तुम को दिशा दीन्हा । नाम हमारा काहे तुम लीन्हा ॥ गुरु हमैं तुम दिशा दीन्हा । झूठ बोलका क्या फल चीन्हा ॥
नं. १ कबीर सागर -
( ७६ )
ज्ञानसागर
साखी-गुरु जब चलैं नहाने, तब हम दिक्षा पाव ॥ तातैं गुरु कहि थाप्यो, फिर पीछे पछताव
चौपाई
पूज्यो पाहन पंडित धर्मा । पहिल न जानो तुम्हरो मर्मा ॥ मैं तो चाहत मुक्ति पदार्थ । तुम पाहिन जापूजे निश्चारथ ॥ तब गुरु सुनकै अचरज भयऊ । योग समाधि वैकुंठहि गयऊ ॥ सत्त समाधि विष्णु जब देखा । तापर देश कबीरहि लेखा ॥ जहैं देखा तहां सत्त कबीरा । झूठ ध्यान भूले मत धीरा ॥ हे कबीर तुम मर्म न जाना । जान मलेछ किया अपमाना ॥ जो कछु आहि मुक्ति सन्देशा । सो सब मोहि कहौ उपदेशा ॥
साहिब कबीर वचन
छोड़ी सबै मान अभिमाना । तो कह देव मुक्ति फल दाना ॥ शिष्य सरवा सौ बात जनाऊ । काल तोर शरणगत आऊ ॥ कहैं कबीर काल है काला । है बड़ दारुण काल कराला ॥
साखी-मुक्तिदेव नहिं लेव तुम, रामानंद गुरु देव ॥ भोरहि जन्म गवांय हो, करि पाहन की सेव ॥
सिकन्दर शाहकी बारता-चौपाई
ता निशि को तब भयो प्रभाता । काशी आइ भयी एक बाता ॥ आये सिकन्दर शाह सुल्ताना । है व्याधा बहु भेद न जाना ॥ रामानंद की सुनी बड़ावा । तातैं शाह आप चलि आवा ॥ आये मंडप जहां सुल्ताना । रामानंद तब देख रिसाना ॥ आये शाह सन्मुख भये जबही । रामानंद मुख फेरा तबही ॥ वार अनेक तिहितें सुख फेरा । तांकी ओर क्रोध कर हेरा ॥ मारचो खंग परचो खसि धरनी । शाह के अङ्ग अनिल सम बरनी ॥ आये शाह जहां दुःख नसावन । अधिक भई जो देह सतावन ॥
सिकन्दरसाहूकी वार्ता और रामानन्दजीका कत्ल होना
ज्ञानसागर
( ७७ )
पय औ रुधिर चल्योगुरु अंगा । पावक उठी शाह के अंगा ॥ तवै शाह ने सुधि अस पाई । महिमा जान कबीर बुलाई ॥
सारखी-कबीर दर्शन दीन्हा जबै, तपन भई सब दूर ॥
शाह कहा तुम सांच हो, औ अल्लहका नूर ॥
सिक्कन्दरवन-चोपाई
पय औ रुधिर चल्यो गुरु अंगा । शाह कहै यह कौन प्रसंगा ॥
कबीरवन
जेहि तन मान्यो शब्द हमारा । तेहि तैं चले दूध की धारा ॥
कीन्हा कालउ केर विचारा । आधा अङ्ग रुधिर अनुसारा ॥
अगले जन्म मुक्ति जो होई । अंकूरी जीव कहावै सोई ॥
गोको बिलाना
यहै चरित्र तहां पुनि भयऊ । तब नूरी के मंदिर गयऊ ॥
काजी मुह्ता सबै रहाये । गाय आनि के गलो कटाये ॥
देखि दुखित भये सत्त कबीरू । महा व्याधि गाई की पीरू ॥
केहि कारण गाई जो मारा । सो सब मोहि कहो उपचारा ॥
काजी काया देख विचारी । एकहि ब्रह्म गाय क्यों मारी ॥
गाय ज़िवावहु मुर्गा सारू । नातर वेद अथर्वन हारू ॥
सत्त शब्द है जासु शरीरू । व्यापी महा गाय की पीरू ॥
सारखी-उठिके गाय ठाढ़ी भई, आज्ञा जबही कीन्ह ॥
काजी मुह्ता जानि कै, पाव पकर तब लीन्ह ॥
चोपाई
नगर के लोग अचंभो लागा । यह कबीर कर्ता हो जागा ॥
मगध गवन
तब तहैं से पुनि कीन पयाना । उत्तर देश मगध अस्थाना ॥
नूवा नूरी काल बस भयऊ । तिन पुनि जन्म मनुष्य हिलयऊ ॥
( ७८ )
ज्ञानसागर
राजा बीरसिंह देव बड़ राज । ताके गृह अब धारचो पाऊँ ॥ कमलावती तासु नृप नारी । तिन बड़ सेवा कीन्ह हमारी ॥ ताकौ दीन्ह पान परवाना । तिन कछु भेद हमारा जाना ॥ कह्यो तासों मुक्ति प्रभाऊ । सुनत भयो आनंदित चाऊ ॥ विजुलीखां पठान बड़ ज्ञानी । सन्त जान जिन सेवा ठानी ॥ तासों कही मुक्ति परभाऊ । ज्ञान गम्य तिन बहुत कराऊ ॥
साखी-अति आधीन जब देखा, ता कहैं दीन्हहा नाम ॥
प्रीति जानि कै ताकी, कछु दिन किय विश्राम ॥
चोपाई
विजुलीखां कहै पीर हमारे । नृप वीरसिंह शिष्य तुम्हारे ॥ साहिब आप तजो जब देहा । दोह दीन सो कीन्ह सनेहा ॥ सुनि विहंसि अस आज्ञा ठानी । दोह दीन से हम निरवानी ॥ हिन्दू तुरक नहीं हो भाई । सुन पठान संशय उपजाई ॥ जो तुम दोइसों न्यारी रीती । मेरे मन कैसे होय प्रतीती ॥ तुम तो हो अछह के बन्दा । यह तो अहै आदमी गंदा ॥ तुमहि शरीर तजौगे जबही । शरीर उपाय करों क्या तबही ॥ कै पृथिवी कै देहों जारा । करहु हुकम सो पीर हमारा ॥ जो कछु होई लोक व्यवहारा । सोई कहो मम पीर पियारा ॥ जो साहिब हुकम जस करिहौ । मजार तुम्हारा रचिके धरिहौ ॥
साखी-बिहंसि कह्यो तब तिनसैं, मजार करौ सम्हार ॥
हिन्दू तुरक नहीं हौं, ऐसा वचन हमार ॥
चोपाई
दिन कछु गये तासु संबादा । राजा बीरसिंह ने भेजे प्यादा ॥ बन्दीछोर आवैं मम गेहा । रानी विन्ती कीन्ह सनेहा ॥ ताकी प्रीति तहाँ पगुधारा । दुःखद्वन्द्व तिन सबै विसारा ॥
ज्ञानसागर
( ७१ )
तिन पुनि कही सुनौ गुरु ज्ञानी । दुतिया ब्याह लगन में ठानी ॥ ब्याह जो होय बिकट अस्थाना । क्या जाने होवे संग्रामा ॥ कोइ घायल कोइ जाई मारा । खाड़ो आही दुहु दिशि धारा ॥ ताकी आज्ञा करौ गुसाई । तिनहि देह क्या करो उपाई ॥ कै गाड़ौ कै जारौ धूरी । यह संशय मेटो प्रभु मोरी ॥ करौ सोई लोक कुल धर्मा । बिन लागै कोई जानै न मर्मा ॥ साखी-जो गाड़ौ तो माटी, जो जारौ तो छार ॥ करो लोककी जो कृति, बोलता ब्रह्म निनार ॥
चौपाई
हे स्वामी तुम मोहि बताओ । तुम तनतजोतो काहि कराओ ॥ जस प्रभु तस पुन सेवक करई । सेवा युक्ति सदा सो तरई ॥ जो तुम कितहू करहू प्याना । गाड़हि लागै तुमहिं पठाना ॥ हँसै सबै यह देखि परतच्छा । गुरु तुम्हारो आहि मलेच्छा ॥ तस कछु भेद बताओ स्वामी । करो कृपा सो अन्तर्यामी ॥ वास्तव तेहो कहाँ बुझाई । जारौ देह जो क्षार उड़ाई ॥ तातैं लोक मैं नहीं छुड़ाओ । यातैं दोह दीन फरमाओ ॥ गयो नृपति तहैं साज बराती । कौतुक रचो देह तब त्यागी ॥ सुनत साज दल चले पठाना । राना मुर्दा ले बिल खाना ॥ लेकर गाड़ै करै निमाजा । करन बिहानक दूरी काजा ॥ साखी-रानी भेजे प्यादहीं, तन जब तजो कबीर ॥ आयो बिजुली खान तब, सुनि वृत्तान्त गंभीर ॥
चौपाई
राजा पास पठाओ पाती । सुनतहि क्रोध जरी तब छाती ॥ छाड़्यो ब्याह चले दल साजी । हनें निशान सम्हर की बाजी ॥ बाजा गाजी तुरही आवहि । यह बिजुलीखां युक्ति बनावहि ॥ ऐसी भांति सो कीन्ह प्याना । रन के आगे बजै निशाना ॥
रतनाकी कथा
( ८० )
ज्ञानसागर
बांधी अस्त्र अस चले बहु बीरा । कुहुक बान औ बहु धन तीरा ॥ बरछी सेल औ छुरी कटारी । खड्ग रु तुरी चपल परचारी ॥ दोड़ दिशि देख अस्त्र चमकारा । मानो साज चलो जल धारा ॥ राजा कीन्ह मरन का ठाना । वयरख रोप जो रहो पठाना ॥ जब देखा मैं होत लराई । युद्ध जानि अस कन्यो उपाई ॥ रानी जान मोर कछु मर्मा । तिन पुनि कही तजो नृप भर्मा ॥
साखी-पहिले खोदो माटी, मुदां देखु निहार ॥
सुरदा नहिं वहि भीतरे, कहा करत ही रार ॥
चोपाई
सत् कबीर नहीं नर देही । जारै जरत ना गाई गड़ही ॥ पठयो दूत पुनि जहां पठाना । सुनिके खान अचंभी माना ॥ दोड़ दल आई सलाहा जबही । बने गुरु नहिं भेटे तबही ॥ दोनों देख तबै पछतावा । ऐसे गुरु चीन्ह नहिं पावा ॥ अपने मैं अचंभा ठाना । रंक माहिं धन गया छिपाना ॥ दोड़ दीन कीन्ह बड़ शोगा । चकित भये सबै पुनि लोगा ॥
रतनाकी कथा
तब अपने मन कीन्ह विचारा । रतना कँदोइन कै पगु धारा ॥ रतना समाधान बहु कीन्हा । राजहि पठय सँदेशा दीन्हा ॥ तुम नृप किमि करते पछताना । निश्चय आही शब्द प्रवाना ॥ रहौ सदा शब्दहि मन लाई । दर्शन मोक्ष होय नहिं भाई ॥ साखी-विजुलीखां सौं दुआ कहि, किमि कारण पछताव ॥ रहौ नाम लौ लाइके, जाते कर्म कटाव ॥
चोपाई
लोक वेद मैं ऐसे विचारा । किमि कारण मन दुखी तुम्हारा ॥ सुने दंडवत बहु विध कीन्हा । तत्त्व मता नामहि गहि लीन्हा ॥ रतना सौं कहि मता अपाना । तेहि सुनिके हरष बहु आना ॥
ज्ञानसागर
( ८१ )
हे स्वामी मोहिं कीजै चेरी । जातै कटै कर्म की बेरी ॥ धन्य शब्द धनिजो कह्यु चहिये । सो सब स्वामी मोसों कहिये ॥ सवा सेर मिष्ठान ले आवहु । और सवासौ पान मैगावहु ॥ इतना चहिये और न काजा । तातै भाग चले यमराजा ॥ सोई अंश पान निज लीन्हा । ताको जीव दान मैं दीन्हा ॥ अंकुरी जिव भेटे निज गेहा । नूवा नाम जो प्रथम सनेहा ॥ साखी-ताको पठयो निज भवन, तीन लोक तें न्यार ॥ नूरी के मन इच्छा, धर्मदास अवतार ॥
चौपाई
सुन धर्म दास यहै कुल धर्मा । मेटो तीरथ बरत कुल भर्मा ॥ कोटि जन्म कीन्हौ तप धर्मा । विनसत गुरु नहिं मिटिहै भर्मा ॥
धर्मदासवचन
हंस राज जो दर्शन दीन्हा । जन्म स्वारथ अधमको कीन्हा ॥ हे प्रभु मोरे बन्दी छोरा । हौं आधीन दास मैं तोरा ॥ आनहु पान और मिठाई । जितनौ रतना के मन भाई ॥ आनहु रतना कहौ तुम स्वामी । कृपा करो तुम अन्तर््यामी ॥
कबीरवचन
प्रथम हि जो पावै निज बीरा । पुरुष रच्यो सुख सागर तीरा ॥ जाके रहे पुरुष औ नारी । बीरा नाम जीव रखवारी ॥ सवा लक्ष जीव नित जो मारा । तातैं सवा सेर व्यवहारा ॥ साखी-सवा सेर मिष्ठान जो, और सवा सौ पान ॥ इतना ले जो शिष्य हो, यम तेहि देखि डरान ॥
चौपाई
सुहर देखि जैसे घट वारा । जिनहैं घाट ऊपर बैठारा ॥ जो कोइ झूठा रूप बनावै । बिना पान जान नहिं पावै ॥
( ८२ )
ज्ञानसागर
आने फेर परवाना सोई । जैसा अंक सुहर पर होई ॥ इतनी सुन हरषे धर्म दासा । शिरनी पान लाइ धरे पासा ॥ सेत सिंहासन सेतु ई साजा । सेत पान सिर क्षत्र बिराजा ॥ पाने दलतै सबहीं कीन्हहा । तामें अंक अग्र को दीन्हहा ॥ प्रथम हि तितुका वेग तुरायी । मारग भेद तबै समुझायी ॥ बाएं दाहिने है सहि दानी । इकदिशि धर्म द्वितीय दुर्गदानी ॥ पाछे चित्र गुपित्र को थाना । तेहि तजि हंसा देइ पयाना ॥ टूटै घाट अठासा कोरी । हंसा चढ़े नाम की डोरी ॥
साखी-यमसों तितुका तोरकै, तब दीजौ निजपान ॥
पाई प्रसादै हर्ष तब, शब्द देख मन मान ॥
चौपाई
जाई उबारौ हंस अंकुरा । मन की दिशा देख मन भुला ॥ हे प्रभु कौन शब्द है सारा । तौन शब्द तैं जीव उबारा ॥ एक शब्द पुनि दीन्हहा हेरी । यही शब्द तैं जीव उबेरी ॥ जस दरपर लै दीजे हाथा । दर्शन देखै मुख औ माथा ॥ धर्म दास सुनत मन माना । बिकसे कमल उदैं जनु भाना ॥ यही वस्तु से जीव उबारा । और ज्ञान है बहुत अपारा ॥ मूल नाम अक्षर धुनि साचा । जेहि तैं जीव काल सों बाचा ॥ आदि नाम पुरुष कर आही । भाग जीव पाव पुनि ताही ॥ धन्य भाग वस्तु जिन पाया । मोकहँ सत गुरु अलख लखाया ॥ अक्षर मूल और सब डाला । डारहि में फल फूल रसाला ॥ किंचित को फल पावै सोई । कहैं कबीर अमर सो होई ॥ अक्षर मूल अमी पैंच शाखा । साखी रमैनी ताकी पाता ॥ सुमिरन डार पुहुप है जोगा । तेहि सम आहिना दूसर भोगा ॥ साखी-अक्षर धुनि लौ लावई, अपराधै परिचय योग ॥ कहैं कबीर संशय गयी, भोगहि मध्ये भोग ॥
चौका आरतीकी विधि
ज्ञानसागर
( ८३ )
चौपाई
भव मैं अक्षर परचे पावे । सत्त गहै सतलोक सिधावे ॥ पुहुपहि से फल उपजे सारा । फल है मुक्ति भोगसे न्यारा ॥ हे प्रभु जो इतना नहि जाना । सो जिव कैसे लोग पयाना ॥ पंच अमीका सुमिरन दीजे । बंदी छोर ताहि किमि कीजे ॥ औ पुनि ताहि देव जप माला । आवहि लोकसो भौनहि डाला ॥ निश्चय कहौ पंथ कर भाऊ । दुविधा भाव लरो मत काऊ ॥ कहो पंथ जो पाँजी वाका । धरती शीश स्वर्ग का नाका ॥
साखी-यहि विधि राह चलावहु, सुनहु हो धर्मदास ॥ जीव छुड़ाओ काल सो, सत्त शब्द परकाश ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हे प्रभु मैं कहत डराऊँ । कहों सो एक वस्तु जो पाऊँ ॥ जो नहि पावहि एती साजा । तासों किमि डरि है यमराजा ॥
कबीर वचन
साठ समय बारह चौपाई । एही तत्व हंस घर जाई ॥ पांच अमी महाँ एकौ पावे । है परमान सो लोग सिधावे ॥ अथवा जो एकौ नहि पावे । चार करी तत्त्व मन लावे ॥ चार करी बूझे मन लाई । यमराजा तेहि देख डराई ॥ अदेख देख तत्व मन धरयी । बोलता ब्रह्म सो परिचय करई ॥ इनकी देख नाम लौ लावे । डोर गहै सत्य लोक सिधावे ॥
धर्मदास वचन
हे प्रभु जो इतना नहि जानै । सो जिव कहा करै विश्रामै ॥ नामहि पाइ तत्व मन धरई । दुविधा भाव कबहुँ नहि करई ॥ निर्गुण नाम रहे लव लाई । ताके निकट काल नहि जाई ॥
( ८४ )
ज्ञानसागर
साखी-खोजकर सत शब्द का, गहै तत्त्व मत धीर ॥ निश्चय लोक सिधाइ है, अस कथ कहैं कबीर ॥
धर्मदासवचन-चोपाई
हे प्रभु जा पर दाय़ा होई । पावै वस्तु सार पुनि सोई ॥ अथवा जो ऐती नहि पावै । हे प्रभु तो कैसी बनि आवै ॥
साहब कबीर वचन
पावै सार जान निज बीरा । निश दिन सुमिरे धन्य कबीरा ॥ जहाँ सुने सतगुरु को नामा । सुने भक्ति छाड़ै सब कामा ॥ सुने जो भक्ति तत्त्व मन लावै । देह छोड़ि सत लोक सिधौवै ॥
धर्मदास वचन
हे प्रभु जो इतना नहि राता । तासौ कैसी कहिये वाता ॥ माया जीव अधिक लपटाना । तातैं प्रभु पूछौ इठ ग्याना ॥
साहब कबीर वचन
धर्मदास मोहि यदि भावै । करही जाप धनी जो पावै ॥ आवै मल्ल तब करै लड़ाई । जाने दाव घात चतुराई ॥ तबही बने कृपी को साजा । कोठी बीज खेत उप राजा ॥
साखी-शूरा बैर भल खोजिये, बीज धरहि को सार ॥ रयाया बीज न बोइये, ऐसा मता हमार ॥
चोपाई
बिना नाम बहु तन डहकाया । फिर फिर भौजल भटकाखाया ॥ जुग जुग जन्मबहुरि भवलीन्हा । होई हित नहि नाम विहूना ॥ नाम पाय जो तत्त्व न धरई । ते पुनि जन्मै गुरु क्या करई ॥ तत्त्व प्रमाण यही धरमदासा । तातैं मिटै कालकी फाँसा ॥
धर्मदास वचन
बालक कहा तत्त्व को जानैं । मुक्त होय तेहि कौन प्रमानै ॥
योग कर्मका वर्णन
ज्ञानसागर
( ८५ )
साहित्य कवीर वचन
बालक नाम कौ दीजै बीरा । पहुँचे लोक जब तजे शरीरा ॥ त्रिया कह सनेह है सारा । उपजै भाव होय जम न्यारा ॥ जातैं नर अचेत अज्ञाना । तातैं तत्त्व नाम परमाना ॥ तत्त्व है मूल और सब साखा । ताकौ नाम जोग मय भाखा ॥ जो नर तत्त्व न राखे ज्ञाना । ताकौ ज्ञान बालक सब जाना ॥ पावै आदि अंत निज बीरा । पुरुष रच्यो सुख सागर तीरा ॥ छठै मास बीरा निज पावै । है प्रमान सो लोक सिधवै ॥
साखी-तत्त्व मुक्ति है निश्चय, औ बीरा निज सार ॥
माया लीन्ह नर प्राणी, भूल परा संसार ॥
धर्मदास वचन-चोपाई
निसिदिन रह माया लपटाना । सो प्रभु कैसे होय निर्वाना ॥
साहित्य कवीर वचन
निस दिन रहे माया विस्तारा । पलकौ भज तो उतरै पारा ॥ पलकौ नाम चित्त ना धरई । ते पुनि जन्मैं गुरु क्या करई ॥ कर्म निवारन जेहिते होई । परिचय सहज तत्त्व है सोई ॥
धर्मदास वचन
सो मोहि स्वामी प्रगट बताऊ । केहि विधिजोगकर्मसमझाऊ ॥
साहित्य कवीर वचन
प्रथम सत्य आसन आराधै । निवरी कर्म जो या विधि साधै ॥ काम मारिये अरूप अहारा । जहाँ काम तेहि जोग बिकारा ॥ कोइ कछु कहै हृदय नहीं धरई । निन्दा विन्दा मब परिहरई ॥ तजै देह जिमि कांचरि सांपा । आलस निद्रा सहज निदापा ॥ दृष्टि न जावै भल औ मंदा । मनहि न आनै संसो नंदा ॥ धोती वस्ती नेती करई । जिमि कामिन सो ग्रहै बहरई ॥
अष्ट कमल वर्णन
( ८६ )
ज्ञानसागर
तिनका खेह मंदिर में होई । करई दूर भामिनी सोई ॥ या विधि काया संयम राधै । बांधै मूल अरु नाको साधै ॥
छंद-मूल बांधै नाम साधै काया संयम जानिकै ।
मन पवन दोई तुरी साजै युक्ति जीव बनायकै ॥
देह ताडना चित्त को तुबक सर छाड़ै आस हो ।
तेही आस चढ़टोरै ममासा जीव होय निकास हो ॥
सोरठा-ऐसी बाजी होई, मनके संग दौराइये ।
मन शूरा पुनि सो, कष्ट परै पुनि ना टरै ॥
चोपाई
परै कष्ट तब तोरिगे वासा । राखै खड़ नाम को पासा ॥
नाम अछ ते दूत डराई । भागे अरि शूरा जिमि पाई ॥
अरि के भाजैं होय हुलासा । दुविधा भिटै कमल परगासा ॥
अष्ट कमल देखै पुनि सोई । मानौ रंक महा धन होई ॥
देखै ब्रह्म जहाँ अस्थाना । भय भाजैं तब हो निर्वाना ॥
अष्टकमल वर्णन
अष्ट कमल तोहि भेद बताऊँ । अजपा सोहं प्रगट बुझाऊँ ॥
मूल कमल दल चार ठिकाना । देव गणेश तहाँ कीन्ह पयाना ॥
ऋद्धि सिद्धि बासा तहाँ होई । छै सौ जप अजपा तहाँ सोई ॥
द्वितीय कमल पटदल परमाना । तहाँ कमलन कर आहि ठिकाना ॥
सावित्री ब्रह्मा है जहवाँ । षट सहस्र जाप है तहवाँ ॥
छन्द-त्रय कमल दल अष्ट है हरि लक्ष्मी तिहि संग मौँ ।
षट सहस्र जहँ होई अजपा निरखि देखो अंग मौँ ॥
कमल चौथा द्वादश दल शिव को तहाँ निवासु हो ।
सुरति नरति करि लोक पहुँचै षट सहस्र जहाँ जासु हो ॥
ज्ञानसागर
( ८७ )
सोरठा-पञ्चयें कमल प्रकाश, तिहिं पोडश दल अहै ॥ आतम जीव निवास, कइ सहस्र अजपा कह्यो ॥
चौपाई
छठवां कमल अहै दल तीनी । सरस्वती तहैं वासा कीनी ॥ दोसौ एक अजपा जहैं होई । बूझे भेद सो बिरला कोई ॥ भौर गुफा दो जल परवाना । सातों कमलकोआहि ठिकाना ॥ एक सहस्र अजपा परकाशा । तहां बोलता ब्रह्म को वासा ॥ तहां जोग साधे बहु जोगी । इंगलापिंगला सुखमनि भोगी ॥ तहां देख असंख्य जो फूला । ब्रह्म थाप काया में भूला ॥ सात कमल जाने सब कोई । अष्टम कमल विनुमुक्ति न होई ॥ विनु सतगुरु को भेद बतावै । नाम प्रताप जोग हि आवै ॥ काया तें जो बाहिर होई । भाग जीव पावै पुनि सोई ॥ छन्द-बहु भांति मुनि ऋषिजोग ठान्यो भयोरहित नहिं लेस हो ॥ काया थापी सुरति सों सब काग भये नहिं हंस हो ॥ पक्षी होई तब होइ महाबल नाम विना तो काग हो ॥ पक्षी त्यागी जो नाम साधे हंस होय बड़ भाग हो ॥ सोरठा-जोग तो आहि अपार, पक्षी भया पर नयन नहीं ॥ जोग नाम उजियार, नाम तेहि जो पावही ॥
चौपाई
पक्षी भाग नयन जिन पावै । ताके जहां तहां उड़ जावै ॥ देखे लोक जो गुरु बतावै । पक्षी नयन को यहै स्वभावै ॥ अथवा नाम नेक जो पावै । साधे तत्त्व जो लोक सिधावै ॥ नाम नयन पक्षी जो होई । तेहि समान दूसर नहिं कोई ॥ बाहिर को मैं कहब ठिकाना । सुरतिकमलसतगुरु निरवाना ॥
( ८८ )
ज्ञानसागर
छः सौ एक एकसौ बीसा । अजपा ऊपर देखे ईसा ॥ सातदलकमल देवऋषि माना । अष्ट कमल उनहूँ नहिं जाना ॥
छन्द-यह भांति अजपा तत्त्वऽराधे बस करे पाँचों भूत हो । रुनक झुनक बाजेआदि अक्षर दिमँकर बाचे तार हो ॥ षट् चक्र बांधे देह में तब जोग मुद्रा सार हो । प्रेम को बाजे पखावज प्रति दिना ततकार हो ॥
सोरठा-आतम जीव जो जाय, मुक्ति मुक्ता संग में ॥ तिन सँग ब्रह्म समाय, जिमि जा सरिता सागरेँ ॥
चौपाई
सरिता परै सिन्धु महाँ जबहीं । दुबिधा भाव न उपजै कबहीं ॥ सरिता संग रहे यक नीरा । भिन्न भाव कथ कहैं कबीरा ॥ दक्षिण नयन जब नेह निहारी । ते समरै बहुतै अधिकारी ॥ चन्दन निकट वृक्ष जो होई । भेद सुवास प्रबल है सोई ॥ संगति का फल ऐसा होई । यह तो भेद जाने जन कोई ॥ चन्दन नाम सुमेर है जोगा । इतनी प्रगट करै जो भोगा ॥ आतम जीव भेद पुनि होई । चन्दन बेल कहै सब कोई ॥ चन्दन कष्ट सब कोई जाना । यहै भेद विरले पहिचाना ॥
छन्द-जोग सम कछु भोग नाहीं देखु हृदय विचारि कै । पांच को बस करो आपने बसै पांच सम्हारि कै ॥ तीन गुण औ नाम चौथा बहुरि इनहि सम्हारिये । तब जीतिये निष्कंटका हो प्रति योग यहि विधि साधिये ॥
सोरठा-मेटें जम को दंड, मुक्ति होय तेहि अटल पुन ॥ विष को करे निकन्द, जोग होय जो नाम फल ॥
ज्ञानसागर
( ८९ )
चोपाई
संशय मिटे जोग के धारे । मैं अपने मन कीन्ह विचारे ॥ संशय को खंडन है जोगा । ता सम आहि न दूसर भोगा ॥ जीव को काज जाहितें होई । सोई जतन करो सब कोई ॥ अथवा देह जोग कोई न साथे । तो अब सहज जोग अवराधे ॥ ता मैं मिल जो यह निस रहई । दुविधा भाव कबहुँ नहिं करई ॥
साखी-पांच तत्त्व गुण तीन हैं, और प्रकृति पञ्चीस ॥
चौतीस ऊपर डेरा करई, नाम तत्त्व इक्कीस ॥
चोपाई
चौतीस ऊपर डेरा करई । नाम तत्त्व पलक नहिं टरई ॥ ये सब एक नखा मैं राखै । गुरु प्रसाद अमीरस चाखै ॥ सत गुरु दया सम्पुट उघराई । शून्य शहर में बैठे जाई ॥ देखे बोलता ब्रह्म तेहि ठाई । करे हर्ष धर्ष सी जाई ॥ ब्रह्म देखि त्रिकुटी मैं मुक्ता । जीव सीव होय इक जुगता ॥ जीव सीव एकै लख जाना । देह जीव तब देख पयाना ॥ शब्द प्रतीत देख सत लोका । गुरु की दया मिटे सब धोखा ॥ अगम अलख सो गुरु समझावै । सुरती निरति से दर्शन पावै ॥ गुरु की दया गम्य जो होई । निश्चय दर्शन पावै सोई ॥ एक बार जो दर्शन पावै । देखै बहुरि विलम्ब न लावै ॥ एकै सुरति निरति जो धारे । सुरति सनेही दीप निहारे ॥ यह निस तत्त्व मता जो धारे । गुरु प्रताप सों लोक सिधारे ॥ जाते सहज योग नहिं होई । तातैं आरति साथे लोई ॥ जो मनसा मारे नहिं कोई । तो पुन दासी कर निज सोई ॥ जो कोई काछे सन्त का भेखा । तासों कहिये जोग का लेखा ॥
साखी-गेही लीन्हें आरती, संत सोई सो भोग ॥
इडा पिंगला साधिकै, सुषमनि राधे जोग ॥
गैबी रहनी
( ९० )
ज्ञानसागर
चौपाई
जैसे ग्रेही के मन नेहा । तैसे साथे जोग सनेहा ॥ आसन हठ पर नारि न जावै । ग्रेही रहै न भेष बनावै ॥ देखी देखा भेष बनावै । राध जोग तो शोभा पावै ॥ भेषै धरे सूरता चाही । कादर भेष की हांसी आही ॥ जाते मन सूरमा नहिं होई । तातैं ग्रेही थाप्यो सोई ॥ ग्रेही मैं छल मता अपारा । तातैं सत्य भक्ति चित धारा ॥ करे जो सेवा सन्त की सोई । आरत भक्त महा फल होई ॥ धन्य सन्त जो आरति साजा । काल जंजाल तेहि घरतैं भाजा ॥ आरति समान भक्ति नहीं दूजा । सब ते भली सन्त की पूजा ॥ चरणामृत तासु को लेई । सुरति निरति चरणन चित देई ॥
साखी-सन्त आरती जोग मन, करहि गगनमें बास ॥
ग्रेही जोग न जानहीं, कर आरति परकाश ॥
चौपाई
विना जोग मैं होय उबारा । कै नेवर कै दीपक बारा ॥ तातैं सहज जोग मैं भाखा । शिरनि पान महातम राखा ॥ आरति तो नानाविधि साजै । पान मिष्टान्न भक्त भय भाजै ॥ जो कछु आहि जोगकर भाऊ । सब भाखौ आरति पर भाऊ ॥ वह देही यह ग्रेही व्यवहारै । काया संजम दै अनुसारै ॥ निशिदिन सुरति निरति बिचारा । तातैं मंदिर सेत सद्धार ॥ पांचौ तत्त्व तीन गुण साथै । तातैं मन बिच आरति राधै ॥ इंगला पिंगला सुषमनि वासा । मन बिच कर्म आरत परकाशा ॥ बांधै मूल नाम को साथै । दुबिधा मिटै एक अवराधै ॥ एक घरै कर प्रकृति पचीसा । सोई पुरुष आरति मैं दीसा ॥
साखी-उलट पवन जब आवै, त्रिकुटी भेट जो होय ॥
गुरु की दायो प्रकट हो, संपुट उघरै सोय ॥
आरतीका योगरूपसे वर्णन
ज्ञानसागर
( ११ )
चौपाई
उघरै संपुट गुरु की दाय़ा । नरिअर को देखै परभाया ॥ तत्त मूल नरिअर मो जाना । ज्ञानवंत भजि हो निर्वाना ॥ अनहद बाजै त्रिकुटी ताला । तातैं भक्ति जो होय रिशाला ॥ बिन करताल पखावज बाजे । अनहद धुन निस दिन तहैं गाजै ॥ अष्ट दल कमल फूल जो फूला । तातैं सुमिरन किये समतूला ॥ सुन अति जोग छतीसौ रागा । तातैं भांति भांति पद जागा ॥ जोग करत मैं देह बिसारै । या संसार मैं काज सम्झारै ॥ जोग समाधि छूटत नहिं देखा । आरत से मिटै कर्म विशेषा ॥ प्रतिदिन जो समाधि मन लावै । तातैं सदा आरति गावै ॥ जोग हीन तत्त नहिं लहई । तातैं पान पढोता चहई ॥ देखो मन बहुरंग अपारा । तातैं पुहुप सेत विस्तारा ॥ देह समाधि गंध बहु होई । साथै अग्र प्रबल है सोई ॥ चौका सेत हंस भल छाजै । सेत सिंहासन छत्र विराजै ॥
साखी-परचै मैं मन बांधै, करे जोग मन बास ॥ संतन आरत जोग मन, दीपक करे प्रकाश ॥
चौपाई
मन औ पवन आहिं दो धारा । तातैं पवन अनिल घूत जारा ॥ जोग जुगत बिन संग न होई । पालै पवन पाहन है सोई ॥ गगन बाव गरजै जो जाई । दीप शिखर द्वारै ठहराई ॥ ह्यावै जोग अमीरस चाखा । तातैं महाप्रसाद जो भाखा ॥ धन्य अंकुर जीव है सोई । परिचय जोग करै तन जोई ॥ जोग न होय आरती करई । सोई जीव भवसागर तरई ॥ मूल नाम और सब शाखा । पुहुप जोग महातम राखा ॥ जोगी दृष्टि भाव बहु करई । घट घटमें सुमिरन अनुसरई ॥
पुनोकी बड़ाई
( ९२ )
ज्ञानसागर
मूल नाम मुक्ति फल जोगा । ताते नरिअर मिष्ठानका भोगा ॥ देह बिसार जोग फल चाखा । मन वच कर्म नरिअर सत भाखा ॥ उज्ज्वल मंदिर सेत सम्हारा । तेहि रूप साज्यो पनवारा ॥ मुक्ति पदारथ अबेधा हीरा । तेहि पाये कोई गहिर गंभीरा ॥ चंदन काष्ठ सिंहासन चाही । सुमिरण नाम इकोतर आही ॥
साखी-उत्तम पान बडो ना, टूटा भंग न होय ॥ नरिअर चहिये निर्मल, महा मुक्ति फल होय ॥
चौपाई
और कछू बात संपत्ति आही । काचा जीव सुन बिचलेताही ॥ ताते सहज बताओ भाऊ । परचै जीवको परम स्वभाऊ ॥ अथवा जो इतना नहिं होई । सहज आरती थापो सोई ॥ सवा सेर आनो मिष्ठाना । सत्त सवासो आनो पाना ॥ प्रति पूनौ जो आरति करई । सोई जीव भवसागर तरई ॥
धर्मदास वचन
हे प्रभु पूनौ कह अधिकारा । दया करौ दुख भंजन हारा ॥
साहिब कबीर वचन
तुम कह दोन्ह यही दिन पाना । तासौँ पूनौ आरति ठाना ॥ अथवा सबई अर्थ नहि जाना । दोई आरति थाप प्रमाना ॥ छठे मास साजौ निज बीरा । ताते दोई आरती मत धीरा ॥
साखी-जोग आरती फल बड़ा, सत्त वचन परकाश ॥
दुविधा मेटो निश्चय, सत्तलोक होय वास ॥
चौपाई
सत्तभाव देखहु मति धीरां । लगन साखि देख निज बीरा ॥ बिना लगन करो मत शिक्षा । जोती खेती जो भल दिशा ॥ ऊसरू बीज डारही कोई । निःफल खेती किसान की होई ॥
गुरुवाके लक्षण
ज्ञानसागर
( १३ )
ऊसर बीज का ऐसा भाऊ । बोवहि बीज अवृथा जाऊ ॥ काचे जीवकहैं सुमिरत देई । परिचय जीव तात गहि लेई ॥ ता कहैं कैसी करहि जमराजा । देह धरै तो गुरु कहैं लाजा ॥ बिना लगन मगन भयो जानी । ऐसो अहे शिष्य सहिदानी ॥ पूरा जब शिष्य जो होई । गुरु देव भेद बतावै सोई ॥ अथवा जो गुरु अन्तर राख्यौ । गुरुमें धोख सन्त में भाखौ ॥ लीक करी औ पंथ बतावै । शोभा अधिक गुरु सो पावै ॥ जस बाना तस होवै करनी । ता गुरु सम औरन बरनी ॥ सदा लीन नाम जो भाखै । पांच आत्मा अनुरुचि राखै ॥ पांचमें करे पच्चीसों नारी । ते बस किये जोग अधिकारी ॥ मरत तजो जस कांचरी सांपा । तातें सब को मेटव दापा ॥ करो शिष्य जो यहि विधिकोई । पुरइन पान रहैं जनु सोई ॥ साखी-जो ऐसी बनि आवै, और बान है सार ॥ तातें ग्रेही थापो, कडिहारी संसार ॥
गुरुवाके लक्षण चौपाई
आप स्वारथी भेष बनावै । मन की दशा ताहि चित लावै ॥ तृष्णा जुक्त करे गुरुवाई । जम सो बाचै कौन उपाई ॥ निश्चय मानो शब्द हमारा । पर द्रोही कैसा कडिहारा ॥ आप अबूझ औरन समझावै । साखी रमैनी झगरो लावै ॥ जातें साधु सेवा नहिं आवै । तृष्णा कारण भेष बनावै ॥ सिंह न चाहै स्वान सियारा । पैरच बिना कैसे कडिहारा ॥ पर नारी औ मन्मथ कर्मा । यह तो भेद काल को मर्मा ॥ मारहि मनसा होइ सो होई । नातर नारि करे पुनि लोई ॥ ग्रेही माहि भक्ति को भेवा । नाम जपै औ साधू सेवा ॥ जोपै सहज भाव कडिहारा । शिष्य कियेका क्या अधिकारा ॥
( १४ )
ज्ञानसागर
ग्रेही माहि मुक्त फल बासा । सो सब वचन कहौं परकाशा ॥ नाम गहै राखै सत करमा । सब जीव तजै एक पुनि भरमा ॥ साखी-मद रु मांस को त्यागै, और न करै जीव घात ॥ अथवा जो कछु चूकि है, साधु सेव चित राख ॥
चौपाई
करे आरती मन विच करमा । पर घर तजै जान निज भरमा ॥ गृह में जो रहे उदासा । निश्चय सत् लोक में वासा ॥ जो कोई यहै अवज्ञा करई । कछु दिन रूपहीन अनुसरई ॥ जो को चूके साधु की सेवा । ताकर फल भारवों कछु भेवा ॥ जाई सो लोक नाम परतापा । तजै देह जिमि कांचरी सांपा ॥ देखै जाइ हंसन की पांती । ता मध्ये अस बैठ अजाती ॥ जातें चूक परैं सेवकाई । तातें शोभा हीन लजाई ॥ जो कोई याकी करे उछेदा । तातें मैं समझाऊं भेदा ॥ गृही तरे सो कौन विशेषा । गुरु को अचरज यौ बड़ देखा ॥ गुरु नहीं कोई यहि भवसागर । सतगुरु आप अजर मनि आगर ॥ जाप आहि जो नाम हमारा । तातें नाम धरा कडिहारा ॥ कडिहार लेवै जीवका भारा । तेहि न सूझ किमि उतरे पारा ॥ साखी-जैसे महिमा प्रकट है, तैसे सिन्धु का नीर ॥ सरिता सब कडिहार भये, सतगुरु सिन्धु कबीर ॥
चौपाई
सरिता माहि बारि जो होई । जीव जन्तु सुख पावै सोई ॥ सरिता लहै पुण्य परमारथ । सत कडिहारी जोग स्वारथ ॥ अथवा नीर अथाह न होई । सहज जोग भारवों पुनि सोई ॥ भदी में सोह सदा जो बारी । ऐसी उत्पति आहि हमारी ॥ प्यासा जाय नदी के पास । बिन पानी सो जाय पियासा ॥