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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

( ३७ )

जो साहब सतलोक रहाई । तिनको सब कोई चीन्हौ भाई॥
नाम बिना दुखि तीनों देवा । जिनकी गन गंधर्व करें सेवा ॥
जगके देव सब काल अधीना । बचे सोई जो नामको चीन्हा ॥
हम बल एक शब्दका भाई । ताही बल हंसा सुत्काई ॥
जहाँ नाम काल गति नाही । बिना नाम है कालकी छाई ॥
ज्ञान हीन जाने नहीं भाई । जीव कै सँग मन काल रहाई ॥
जीव के संग कालको वासा । अज्ञानी जन गहे विश्वासा ॥
मनको कहो न कीजे कोई । मन जिवको भरमावे सोई ॥
कहे कबीर मन जात गँवारी । मनको कहो न करो नर नारी ॥
मनको कहो जो कर है भाई । भवसागरमें देय बहाई ॥
मन चंचल सो काल है भाई । मनको त्यागे निरमल हो जाई ॥
मनके रूप समानी माया । सब संसार व्याप्त यह छाया ॥
मन थिरकर परमात्म जाना । यहि विधितत्त्वलेय पहिचाना ॥
काल जाल ते तेही छूटे । काल विचारा ताहि न लूटे ॥
यही भेद धर्म सुन लीजे । शब्द माहि तुम बासा कीजे ॥
काल ज्ञान संसार बखाना । काल स्वरूप नहीं पहिचाना ॥
काल चरित्र तुमसे कहो भाई । यही भेद कोई नहीं पाई ॥
काया माया झूठी जानो । झूठा सकल पसारा मानो ॥
झूठो नाम साहबको नाही । बूझ लेव अपने हिय माहीं ॥
साखी-काल पाय जग ऊपजो, काल पाय सब धाय ।
कालपाय सब विनसही, काल काल कह खाय ॥
सोरठा-धर्मदास लेव जान, मुन्य सुरूपी मनहि है ।
वचन कबीर प्रमान, रूप रेख मनको नहीं ॥

चौपाई

परम पुरुष नाम गहो भाई । ताते हंसा लोक सिधाई ॥
आदि नाम है जिव रखवारा । उनको सब कोई करो पुकारा ॥

( ३८ )

ज्ञानबोध

अमर लोक साहबका न्यारा । जहाँ पुरुष का है दरबारा ॥
आदि पुरुष जहाँ आप अकेला । धर्मराय नहि मन के मेला ॥
अंधकार जहाँ कबहुँ न होई । सदा जोति अमरापुर सोई ॥
आदि पुरुष जहाँ काल न जाई । तीन देव की कौन चलाई ॥
आदि नाम जो ध्यान लगाई । तब हँसा सत लोकहि पाई ॥
ऐसा लोक साहबका भाई । जहाँ हँसा सुख सदा रहाई ॥
तादि लोकमें जो कोइ जावे । भवसागरमें बहुरि न आवे ॥
धर्म राय से तिन का टूटे । जन्म मरण को संशय छूटे ॥
बिरले जीव निःसंशय होई । दृढ़ परतीत नाम गहँ सोई ॥
अगम भेद मैं तुम्हें बताया । काल निरञ्जन गम्य न पाया ॥
जगके जीव प्रबोधो भाई । पुरुष शरण जब हँसा जाई ॥
जीवहि बोधो सब संसारा । पकड़ हँस फँको पैले पारा ॥
भवसागरसे जीव उबारो । जन्म मरण जिव संशय टारो ॥
जीव मुक्त मैं तुमको दीन्हा । पुरुष भक्ति है नामको चीन्हा ॥
सार युक्ति मैं तुमसे कहिया । कहन सुननको अब नहिं रहिया ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास विनवे कर जोरी । सतगुरु सुनिये विनती मोरी ॥
निरगुन नाम लखे नहिं कोई । सरगुनमें जग भरमें सोई ॥
अज्ञानी जिव कहा न माने । आदि नामको भेद न जाने ॥
यह सब भेद कहो प्रभुराई । कैसे जीव प्रबोधों जाई ॥

साहिव कबीर वचन-चौपाई

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । अब मैं भेद कहाँ तुम पासा ॥
सज्जन जन जो होवे भाई । तुम्हरे शरन दौरके आई ॥
तन मन तुमसे ध्यान लगाई । ताको नाम सुनइयो भाई ॥
जब देखहु तुम दृढ़ता ज्ञाना । तबही देव पान परवाना ॥

बोधसागर

( ३९ )

निरभय ज्ञान कहो जिवपासा । जो कोह होय तुम्हारा दासा ॥
मूरखके तुम पास न जइयो । बचन हमारो हियमें गहियो ॥
मूरख ज्ञान कहो मत भाई । नाहक ज्ञान गांठको जाई ॥
डुरमति मन जाही कर भाई । तासे राखो भेद छिपाई ॥
ज्ञानी जनको नाम सुनावो । परम पुरुषसों हृदय चिन्हाओ ॥
साखी-मूरखसे ना खोलिहौ कहैं कबीर विचार ।
ज्ञानीसे न डुरायहौ, सुनो सत् मतसार ॥

चौपाई

अलख नाम घट भीतर देखो । हृदये माहीं करो विवेको ॥
घट घट राम बसे हैं भाई । विना ज्ञान नहिं देत दिखाई ॥
अतुभव ज्ञान प्रगट जब होई । आतमराम चीन्ह है सोई ॥
आतमराम चीन्ह जब पावा । सकल पसारा मेट बहावा ॥
हिये नयनसे देखो भाई । जब तुमको वह राम दिखाई ॥
सब घट व्यापक सबसे न्यारा । सोई राम है जीव मँझारा ॥
अकह नाम कहा नहिं जाई । घट घट व्याप्त निरंतर आई ॥
आतमराम देख जिव पाई । आप आप सब ठांव समाई ॥
जहाँ देखा तहाँ आप समाना । ब्रह्म छोड़ दूसर नहिं आना ॥
यही मता हम तुमकह दीन्हा । दूसर कोउ न पावै चीन्हा ॥
ऐसा ज्ञान लखाओ भाई । जो नहिं मानकाल तिहिं खाई ॥

साखी-अजर पुरुष एकै रहै, अजर लोक अस्थान ।

कहे कबीर सर्वांग जो, ताहि पुरुषको जान ॥

सोरठा-सुनहु ज्ञानी धर्मदास, सोइ ज्ञान जप ऊपजै ।

एक नाम विश्वास, प्रगट ब्रह्म स्वरूप है ॥

चौपाई

आदि नाम जो राखे आसा । तापै परे न कालकी फाँसा ॥
आदि नाम निरअक्षर भाई । ताहि नाम ले लोकहि जाई ॥

( ४० )

ज्ञानबोध

सोहँ शब्द निरक्षर वासा । ताहि शब्द जपहै निज दासा ॥
आदि नाम निज सार है भाई । जमराजा तेहि निकट न आई ॥
तुम कहँ शब्द दीन्ह टकसारा । सो हंसन सो कहौ पुकारा ॥
सार शब्दका सुमरण करि है । सहज अमर लोक निस्तारि है ॥
सुमरन का बल ऐसा होई । कर्म काट सब पलमें खोई ॥
जाके कर्म काट सब डारा । दिव्य ज्ञान सहजै उजियारा ॥
जाकहँ दिव्य ज्ञान परकाशा । आपहिमें सब लोग निवासा ॥
लोक अलोक शब्द है भाई । जिन जाना तिन संशय जाई ॥
तत्व सार सुमरन है भाई । जातै कालकी तपन बुझाई ॥
सुमरनते सब कर्म विनाशा । सुमरनसों दिव्य ज्ञान प्रकाशा ॥
धर्मन सुमरन दयो लखाई । जासों हंस सबै मुक्ताई ॥

सारखी-कहे कबीर विचारके, सुमरन सार बखान ।

कहै भेद जो पावहीं, पहुँचे लोक ठिकान ॥

धर्मदास-वचन चौपाई

कहँ धर्मदास सुनों प्रभुराई । अब जिवको सन्देह मिटाई ॥
अलख अगोचर हो प्रभु मेरा । अब जीवन को करें उबेरा ॥
आदि ब्रह्म तुम अगम अपारा । जीव काज आये करतारा ॥
आदि नाम गुरु मोहिँ लखाये । जीवनके तुम बंद छुड़ाये ॥
अजर लोकमें जिव पहुँचाये । धन्य भाग हम दर्शन पाये ॥
अमर वस्तु सतगुरु मोहिँ दीन्ह। जीवनके सब दुखहर लीन्ह ॥
सतगुरु चरण गहँ हिय माहीं । भानु उदय पंकज बिगसाहीं ॥
सतगुरुने मोहिँ लीन्ह जगाई । आवागमन रहित घर पाई ॥
अब सन्देह रहा कछु नाहीं । शब्द तुम्हार बसो हियमाहीं ॥

सोरठा-दीन्हों मोहिँ लखाय, परमात्म आत्म सकल ।

अलख नाम समुझाय, अमर वस्तु गुरु दीन्हऊ ॥

बोधसागर

( ४१ )

साहब कबीर बचन-चौपाई

ज्ञान उपदेश कहा मैं भाई । ताते जीव हिय ज्ञान समाई ॥
यही ग्रंथ मैं नाम नियारा । सूक्ष्म रीति से कहो पुकारा ॥
आदि नाम जाने संसारा । करे भक्ति पहुँचे दरबारा ॥
पढ़े सन्त होवै मति धीरा । आदि नाम गहै अन्न शरीरा ॥
आदि नाम है सत् कबीरा । जो जन गहे छूटे भव पीरा ॥
आदि नाम पहिचाने भाई । तब हंसा निज घरही जाई ॥
ज्ञान उपदेश कहा गुरु पूरा । नाम गहे चेला कोई सूरा ॥
साधु सन्तसों बिनती मोरी । नाम भूले अक्षर लीजो जोरी ॥

इति श्रीग्रन्थज्ञानबोध समाप्त


भवतारणबोध (चतुर्दश तरंग)

सत्यपुरुषाय नमः

अथ श्रीबोधसागरे

चतुर्दशस्तरंगः

ग्रन्थ भवतारणबोध

★

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास बिनवै कर जोरी । सद्गुरु सुनिये विनती मोरी ॥
भवसागर कवनहिं विधि छूटे । यमबंधन कवनहिं विधि टूटे ॥
भव दरियाका वार न पारा । ता मई अँटके सब संसारा ॥
सो दरियाव कौन विधि थाहूँ । परम पुरुषको कैसे पाहूँ ॥
करों भक्तिके योग कमावों । देओं दानके तीर्थ नहावों ॥
करों यज्ञ के इन्द्री साधों । बाहर फिरों के मतको बांधों ॥
जो तुम कहो मैं करिहों । वचन तुम्हारे हृदये धरिहों ॥
भवसागर दुख मेटो मोरा । दूटै जन्म मरनको ठौरा ॥
संशय रहित करहु मोहिं स्वामी । तुम सब घटके अन्तर्यामी ॥

सद्गुरु वचन

सुन धर्मदास मैं सत्य बताऊँ । भवसागरका भरम मिटाऊँ ॥
संशय रहित सदा तुम होऊँ । तुम्हरी राह न रोकै कोऊ ॥
करो भक्ति औ बंधन काटो । जन्म मरणका संशय पाटो ॥
भाव भक्ति करिये चित लाई । सेवहु साधु तजि मान बढ़ाई ॥
सुन धर्मदास भक्तिपद ऊचा । इन सीढ़ी कोई नहिं पहुँचा ॥
योगी योगसाधना करई । भवसागरते नाहीं तरई ॥
दान देय सोई फल पावे । भवसागर भुक्तनको आवे ॥
तीर्थ नहाये जो कछु होहीं । सो सब भाषा सुनाऊँ तोहीं ॥

बोधसागर

( ४३ )

जन्म लेय उज्ज्वल तन पावे । सम्पति है जगमें पुनि आवे ॥
ऊंचे घरसे ले अवतारा । ब्राह्मण क्षत्रीको व्यवहारा ॥
इन्द्री साधन है यह नीका । विना भक्ति जानों सब फीका ॥
इन्द्री साधन है तप भारी । तामस तेज क्रोध हंकारी ॥
क्रोध किये गति सुक्ति न पावे । भक्ति महात्महाथ नहिं आवे ॥
बरत एक भक्तिका पूरा । और बरत कीजै सब दूरा ॥
और बरत सब यम की फांसी । भक्ति बरत मिलही अविनासी ॥
हर अवराधन की सुनु बाता । कहा भेद सुनिये तुम ज्ञाता ॥
हरि हर नाम सदा शिव केरा । तासों दूर होत भव फेरा ॥
बहुत प्रीतिसों शिवको ध्यावे । रिधि सिद्धि द्रव्य बहुत सुख पावे ॥
मन जिसके निश्चय कर धरहीं । गिरि कैलासमें वासा करहीं ॥
फिरके काल झपेटे बाहीं । डार देय भवसागर माहीं ॥
ताते संशय छूटे नाहीं । भवसागरमें जीव जो जाहीं ॥
शिवकी साधन है यह गती । निर्भय पद पावे नहिं रती ॥
जाके सुमिरे योगी यती । चौरासी भरमें उत्पती ॥
हरि हरकी यह कथा सुनाई । आगे और सुनाऊ भाई ॥

सारखी-शिवसाधनकी यह गती, शिव हैं भवके रूप ।

विन समझे ये जगत सब, परे महा भ्रम रूप ॥

नरक वासमें मनु परे, ऐसी शिवकी मौज ।

कहे कबीर विचारिके, मिटे न यमकी फौज ॥

चौपाई

हरि हरि नाम विष्णुका होई । विष्णु विष्णु भाषे सब कोई ॥
विष्णुहिं को कर्ता बतलावे । कहो जीव कैसे फल पावे ॥
सब घट माहीं विष्णु विराजे । खान पानमें विष्णुहि गाजे ॥
सकल भोग विष्णु जो लेही । भोग करे जग भरमें देही ॥

( ४४ )

भवतारणबोध

हरि हरि नाम विष्णुका भाषा । शुभ और अशुभ कर्म दोहराया ॥
इनमें करें कलोल सदाई । करें भोग जीवन भरमाई ॥
बहुत प्रीतिसो विष्णुहि ध्यावे । सो जिव विष्णुपुरीको जावे ॥
विष्णु पुरीमें निर्भय नाहीं । फिरके डार देय भूमाहीं ॥
हरि हरि नाम विष्णुका भाषा । हरिकी और सुनो अब साखा ॥
साखी-हरि नाम है विष्णुका, जिन कीन्हा सब जेर ।
चौरासी भरमे सदा, मिटै न भवका फेर ॥

चौपाई

सुनहु धर्मदास तुम हो साधू । इनको कबहुँ मत अवराधू ॥
हरि हर ब्रह्मा को है नाऊँ । रज गुण व्यापक है सब ठाऊँ ॥
जगत् कहै ब्रह्मा है करता । मर्म माहिँ सब बह बह मरता ॥
ब्राह्मण को पूजे ससारा । जीव होय नहि भवते न्यारा ॥
पढ़ पढ़ विद्या जग भर्मावे । भक्ति पदार्थ कैसे पावे ॥
पोथी पाठ पढ़ै दिनराती । ये केवल भ्रमके उत्पाती ॥
आप भरम ते निर्भय नाहीं । बहे जात हैं भ्रमके माहीं ॥
औरनको शिक्षा सब देही । ताते मिलै न परम सनेही ॥
पाप पुण्य का लेखा करही । विना भक्ति चौरासी परही ॥
यह ब्राह्मणकी यह करतूती । ब्राह्मण पूजे होय न सुक्ती ॥

साखी-त्रिगुण भक्ति है जगकी, निर्गुण लखै न कोय ।

सर्गुण निर्गुण दोह मिटै, भक्ति रहित घर होय ॥

इह त्रिगुणहि कि भक्तिमें, जिन भूलो धर्मदास ।

ऊपर निर्गुण जानिये, जहाँ योगीका बास ॥

चौपाई

धर्मदास सुनसन्त सुजाना । नर्गुण सों अब करो बखाना ॥
निर्गुण नाम निरंजन भाई । जिन सारी उत्पत्ति बनाई ॥

बोधसागर

( ३६ )

निर्गुण सों जु भया ओंकारा । तासों तीनों गुण विस्तारा ॥
निर्गुण सो मन भये प्रचण्डा । ताको बास सकल ब्रह्मण्डा ॥
ओङ्कार मन आप निरञ्जन । नाना विधिके कीये व्यञ्जन ॥
भौंति भौंतिके घाट सवारा । कहैलंग गिनों वार नहि पारा ॥
ताके अंश सकल अवतारा । राम कृष्ण तामैं सरदारा ॥
पूरण आप निरञ्जन होई । इनके फेर फार नहि कोई ॥
सर्गुण निर्गुणहुकी करे सेवा । भक्ति करे अरु पूजे देवा ॥
कर आचार विचार न जाने । सो मेरे मन कभी न माने ॥
मन बोधे मन माहि समावे । निज पदको कोई नहि पावे ॥
मन को बोध करे जो कोई । मन पहुँचावे पहुँचै सोई ॥
जाप निरञ्जन माहि समाई । आगे गम्य न काहू पाई ॥
ऐसे तीन लोक सब अटके । खरे सयाने ते सब भटके ॥
ऋषिसुनि गणगन्धर्व रु देवा । सब मिल करें निरञ्जन सेवा ॥
साधक सिद्ध साधु जो भयेऊ । इनके आगे कोई न गयेऊ ॥
बहुत प्रीति सो भक्ति विचारी । मिलन २ लीला अधिकारी ॥
जाय निरञ्जन सो हो भेटा । काल रूप धर करै समेटा ॥
वही निरञ्जन का विस्तारा । तामैं उरझो सब संसारा ॥
जिधर तिधर राखै बिलमाई । रचना अनन्त अपार बनाई ॥
धर्मदास तुम भक्ति सनेही । इन मैं मत अटकावे देही ॥
जन्म धरे छूटै नहि भाई । ताते आप कहो गुहराई ॥
भक्ति गुप्त जाने नहि कोई । तुर्त सनेही पावै सोई ॥
साखी-इन्ते भक्ती गुप्त है, सुन धर्मदास सुजान ।
भक्ति करो भरमो नहीं, सोई भक्ति प्रमाण ॥

धर्मदास-वचन चौपाई

हे स्वामी मैं हूँ अज्ञानी । गुप्त भक्ति मोहिं कहो बखानी ॥
तुम यह भक्ति कहाँ सों आनी । सोई बात मोहिं कहो बखानी ॥

( ४६ )

भवतारणबोध

तुम्हारी भक्ति कौन विधि पावे । कौन भांति की भक्ति कहावे ॥
भक्ति कहींजे कौन प्रकारा । ताको स्वामी कहो विचारा ॥
भक्ति २ सब जगत बखाने । भक्ति भेद कैसी विधि जाने ॥
सो निश्चय मोहिं कहो बखानी । केहि विधि छूटै भवकी बानी ॥
जाते सब संशय मिट जाई । तातें आप देहु समझाई ।

साखी-भव वाणीभ्रम दुख बढ़ै सुख कर सत गुरु देव ।

भक्ति करो निष्कपट होय, सदा तुम्हारी सेव ॥

कबीर-वचन चौपाई

कहैं कबीर सुनो मम बानी । भक्ति सार मैं कहौं बखानी ॥
आगे भक्त भये बहु भाई । करी भक्ति पै युक्ति न पाई ॥
आदि भक्ति शिव योगीं केरी । राखी गुप्त न जग में फेरी ॥
योग करे औ भक्ति कमावै । अधर एक नामै ध्वनि लावै ॥
सौ अक्षर है रंकारा । तासों उपजे सकल पसारा ॥
रहे अधर ब्रह्मांड के माहीं । शिव जानतको जानत नाही ॥
तासन मेरी भक्ति नियारी । जाको क्या जाने संसारी ॥
ताको योगेश्वर नहीं पावे । और जीवकी कौन चलावे ॥
शिवसों अधिक न कोऊ जाने । ऐसी भांति छान बिलछाने ॥
सोउ जीव आगे नहीं आवे । तीन लोक प्रभुता उठ जावे ॥
ठौर हमारो कैसे पावे । वहाँ गये बहुरिहु नहीं आवे ॥
धर्मदास कहु वर्णन अपना । ब्रह्म पुत्र सेवे तिहिं चरना ॥
सनक सनन्दन सनत्कुमारा । सनकादिकसे चारों अवतारा ॥
पांच वर्ष काया नित रहई । ब्रह्म लीन कोह पार न लरई ॥
केते ब्रह्म होय होय गयऊ । सनकादिकसे निश्चय भयऊ ॥
ध्यान जु करे निरञ्जन माहीं । निरञ्जनसों न्यारा कोउ नाही ॥
निरञ्जन अंश हंस अवतारा । सकल मृष्टि है ताहि मँझारा ॥

बोधसागर

( ३७ )

यहाँ ताहि कोई बिरला जाने । आगे कहो कौन विधि माने ॥
इनकी भक्ति करे नर सोई । हमरी भक्ति न जानत कोई ॥
भक्त अनेक भये जग माहीं । निर्भय घर को पावत नाहीं ॥
भक्ति करै तब भक्त कहावे । भगते रहित न कोई पावे ॥
भग भुगते फिर फिर भग आवे । भगते बचपन कोई पावे ॥
चौदह लोक बसै भगमाहीं । भगते न्यारा कोई नाहीं ॥
न्यारी युक्ति मैं तुमहिं दिखाई । तहाँ सुतं रहै साध कहाई ॥
भुगते भग औ भक्त कहावे । फिर फिर योनी संकट आवे ॥
मेरी भक्ति युक्ती जाना । ताका आवागमन नशाना ॥
भक्ति करै तब सुत्तिको होई । नहिं तो बाना जाय विगोई ॥
भक्ति भेद बहुतक है भाई । निर्मल भक्ति न काहूँ पाई ॥
तुम जो बूझो भक्ति प्रकारा । ताका भेद सुनो अब न्यारा ॥
भक्ति होय नहिं नाचे गाये । भक्ति होय नहिं घंट बजाये ॥
भक्ति होय नहिं मूरत पूजा । पाहन सेवे क्या तोहि सूझा ॥
विमल विमल गावें अरु रोवें । क्षण एक परम जन्म को खोवें ॥
ऐसा साहिब मानत नाहीं । ये सब काल रूप के छाहीं ॥
मन ही गावे मन ही रोवे । मन ही जागे मन ही सोवे ॥
जब लग भीतर लग्न न लागे । तब लग सुतं न कबहुँ जागे ॥
सत्य नाम की खबर न पाई । कां कर भक्ति करौं रे भाई ॥
ठौर ठिकाना जानत नाहीं । झूठे मग्न रहैं मन माहीं ॥
कहन सुनन कां भक्त कहावें । भक्ति भेद कितहुँ नहिं पावें ॥
लग्न प्रेम बिन भक्ति न होई । सङ्गति को पावे नहिं कोई ॥
अपने साहिबको नहिं जाना । बिन देखे किहि कियो बखाना ॥
ऐसे भूल परे संसारा । कैसे उतरे भव जल पारा ॥
सत्य भक्तिको नाहीं लागा । ऐसे हैं सब जीव अभागा ॥

( ४८ )

भवतारणबोध

धर्मदास तुम हो बुद्धिवन्ता । भक्ति करो पावो सतसन्ता ॥
एक पुरुष हैं अगम अपारा । सब घट व्यापक सबसों न्यारा ॥
ताको नहीं जाने संसारा । ताकी भक्ति महानिजसारा ॥
भक्ति करे जब उतरे पारा । सुर्त नृत्य कर सेवे सारा ॥
यह विधि भक्तिपदारथ पावे । मुक्ति होय भव बहुरि न आवे ॥
भवसागर ते उतरे पारा । फिरके जग नहीं ले अवतारा ॥
ऐसी भक्ति मुक्ति की दाता । जाकी गति नहीं लखै विधाता ॥
भक्तिही भक्ति भेद बहु भारी । यही भक्ति जगत ते न्यारी ॥
साखी-भक्तिपदारथ अगम फल, मुक्ति चार यहि बार ।
पावे पूरण पुरुष को, जग नहीं ले अवतार ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास कहै सुनो गुसाई । पूरण पुरुष बसे किहि ठाई ॥
केहि विधि सों सेवा कीजे । कैसे चरणकमल चितदीजे ॥
कौन भांति साधों सो भक्ती । सदगुरु मोहिं बताओ युक्ती ॥

सदगुरु वचन

पहिले प्रेम अङ्ग मैं आवे । साधु देख सन्मुख होय धावे ॥
चरण धोय चरणामृत लेवे । प्रीति सहित साधूको सेवे ॥
अन्तर छांड़ि करो सेवकाई । यहि विधि भवके दुःख मिटाई ॥
जोह साधु प्रेम गति जाने । ता साधूकी सेवा ठाने ॥
परम पुरुषकी भक्ति दृढावे । सुतैं नृप कर तहैं पहुँचावे ॥
तासों प्रीति करो चितलाई । छांड़ो दुर्मति औ चतुराई ॥
तबही परम पुरुषको पाये । भव तरके जग बहुरि न आवे ॥
भवतारन संशय नहीं तोही । दो क्षण होय तो लागे मोही ॥
कीतहु बातकी फिकर न करना । कही भक्त निश्चय कर तरना ॥

बोधसागर

( ४९ )

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास बूझे चित लाई । सकल वेद मोहिं देहु बताई ॥
निर्गुण रहित तुम्हारा नाई । कैसे भक्ति करो तेहि ठाई ॥
हो स्वामी यह अचरज बाता । भक्ति करनको दाव न घाता ॥
सर्गुण भक्ति करै संसारा । निर्गुण योगेश्वर आधारा ॥
इन दोनोंके पार बतावा । तुम कैसी विधितहैं मन लावा ॥
सत्य बात मोहि कहो गुसाई । केहि विधि सुतं लगाऊँ धाई ॥
सगुणहि पार न पावत कोई । मेरे मन बर संशय होई ॥
सतगुरु संशय देहु निवारी । मैं जाऊँ तुम्हरी बलिहारी ॥
सर्गुण निर्गुण भेद बताऊँ । तीसर न्यारा मोहिं लखाऊँ ॥
मोरे मन पतयावत नाहीं । बहुत फिकर कीन्हा मनमाहीं ॥
हो समर्थ तुम सतगुरु साई । दृढ़तासे पकड़ो मम बाहीं ॥
सर्व युक्ति बतलावो मोई । अंतर कछु न राखो गोई ॥
तुम सत सत्य तुम्हारी बाता । मैं याचक तुम समरथ दाता ॥
देहु मोहिं मैं मांगो सोई । सोइ लखाव मिटे दिल दोई ॥

साखी-सत्य सत्य समरथ धनी, सत्य करहु परकाश ।

सत्य लोक पहुँचायहो, छूटै यम भव त्रास ॥

सद्गुरु-वचन चौपाई

सुन धर्मन सब कहो सँदेशा । तुमको होय न भवका लेशा ॥
भव तारण समर्थ है न्यारा । ताको नहिं जाने संसारा ॥
योगेश्वर वह गति नहिं पाई । सिद्ध साधककी कौन चलाई ॥
भक्ति होय जगतमें भारी । ध्रुव प्रहलाद सदा अधिकारी ॥
भक्तिमाहिं इन सम नहिं कोई । रामकृष्ण प्रकटे नहिं गोई ॥
दोनों जाने दो व्रत साधू । यही एक इष्ट अवराधू ॥
सतयुग भक्ति करी ध्रुवराजा । पांच वर्ष आयू तत आज्ञा ॥

नं. ७ कबीर सागर - ३

( ५० )

भवतारणबोध

निकसे गृह ते बाहर गयेऊ । नारदके उपदेशी भयेऊ ॥
छठें मास प्रकटे हरि आई । राज दिये वैकुण्ठ पठाई ॥
साठ हजार वर्ष दियो राजू । कुटुम सहित वैकुण्ठ विराजू ॥
एकदिवस जब प्रलय हूय आई । तहाँ तो पुनि ये देह गिराई ॥
पुनि सामीप्य मोक्ष कर दीन्हा । परम पुरुष गति तबहु न चीन्हा ॥
काल पुरुष राखे सब घेरी । सत्य पुरुष जग जाय न हेरी ॥
ऐसे भक्त भये जग माहीं । परम पुरुष गति पावत नाहीं ॥
भक्ति सगुण करे यहि पावे । निर्गुण माहीं नाहिं समावे ॥
जो सायुज्य होय गति पूरी । देव निरंजन जाय हजुरी ॥
ज्योनि स्वरूपी ताका नाऊँ । चारों सुक्त बसैं तेहिं ठाऊँ ॥
सालोक्यहि सामीप्य कहाई । सारूपी सायोज्य लहाई ॥
चार मुक्ति जाके घर होई । ताको पार न पावे कोई ॥
ताके परे मोर अस्थाना । कैसी भक्ति कहा कहों ज्ञाना ।

साखी-ध्रुवकी गति तुमसों कही, सुन धर्मदास सुजान ।

अपरम्पार न पावही, पूर्ण पद निर्वान ॥

चौपाई

सुन धर्मन एक कथा नियारी । बड़ी भक्ति प्रहलाद विचारी ॥
हिरनाकुश दोनों बलकारा । ताके घर लीन्हा अवतारा ॥
तपके हेतु गये बन माहीं । कोइ बातको संशय नाहीं ॥
गर्भवन्त होती तिहि नारी । इन्द्र आवाज सुनि अधिकारी ॥
नभवानीते भई अवाजा । इन्द्रासनको लेही राजा ॥
हिरनाकुश घर जन्म धराई । सो द्वारासन लेही भाई ॥
इन्द्रहि संशय उपजो भारी । गर्भ वातसों देहों ठारी ॥
ये छल इन्द्र कियो अधिकारी । अपने देशहिं ले गयो नारी ॥
तेहिं क्षण नारद आये तहँवाँ । इन्द्रहिको समझायो जहँवाँ ॥

बोधसागर

( ५१ )

इनको गर्भ न चौरै भाई । भक्त होय सबको सुखदाई ॥
गर्भहि मांझ ज्ञान तेहिं दीन्हौ । नारद एक काम बड़ कीन्हौ ॥
हृद कीन्हौ तेहिं गर्भके माहीं । वर्ष हजार रही तिहि ठाहीं ॥
फिर नारी अपने पुर आई । इन्द्रजीत हिरनाकुश पाई ॥
तहां जन्म लीन्हो प्रहलादा । राम रटन रसना ले स्वादा ॥
ऐसो रटन लगाये भारी । तामसभक्त न कोइ अधिकारी ॥
केतो कष्ट सहे सिर अपना । तबही दुःख न व्यापे सपना ॥
हिरनाकुशके मनमें आई । राम तेरो मोहिं देहु बताई ॥
स्वम्भ फार लीन्हौ अवतारा । हरि नरसिंह रूप तब धारा ॥
हिरनाकुश नख उदर विदारा । अपने जन प्रहलाद उबारा ॥
फिरके इन्द्रासन पहुँचाया । सर्गुण भक्तिजान सब माया ॥
ऐसे दृढ़व्रत रामहि गहिया । तेज्ज इन्द्रासन सुख लहिया ॥
ऐसे भक्त न होवे भाई । ताकी गति तुमको समुझाई ॥
इन्द्रासनको राज सुनाऊं । महा भोग बड़े सुख पाऊं ॥
सत्तर दाय चौकड़ी भुगता । बन्धन भवके होय न मुक्ता ॥
बड़े भक्त की कथा सुनाई । पूछो और कहो तोहिं भाई ॥

साखी-इन्द्र राजसुख भोगकर, फिर भवसागरमाहिं ।

यह सर्गुणकी भक्ति है, कबहुँ निर्भय नाहिं ॥

धर्मदास वचन चौपाई

धर्मदास बूझे चित लाई । सतगुरु संशय देहु मिटाई ॥
सर्गुण भक्त मुक्त नहिं होई । है वह एकहि या है दोई ॥
यह संदेह मिटाओ मेरा । तुम सतगुरु मम बन्दी छोरा ॥
की सर्गुण को निर्गुण कहिये । भिन्न भिन्न भेद मोहिं कहिये ॥
सकल मृष्टि कहैवाते भयऊ । यही युक्ति काहु नहिं कहऊ ॥
जो मोहिं ऊपर दया तुम्हारी । सबविधिकहियेयुक्ति विचारी ॥

( ५२ )

भवतारणबोध

यह संसार कहाँसे आया । को है ब्रह्मा अरु को है माया ॥
अन्तर छोड़ि निरन्तर भाखो । मोसन अन्तर कछु न राखो ॥
भक्ति भेद कहो मोहे स्वामी । तुम सब घटके अन्तर्यामी ॥
जीव काज आये जगमाहीं । अब मोको कछु संशय नाहीं ॥
सत गुरु मैं आधीन तुम्हारा । तुम भवसागर तारन हारा ॥

साखी-निरसंशय पद कहा है, सो मोहिं कहु समुझाय ।
फिर भूमैं भरमो नहिं, तहाँ रहो लवलाय ॥
कहै सुनै सुख ऊपजै, जगमें आवे नाहिं ।
काल रहै शिर नायके, सो दीजे समझाहि ॥

सदगुरुवचन-चौपाई

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब निज भेद कहो परकाशा ॥
सुरत लगाय सुनहु मम वानी । छान लेव जो जिह्वा छानी ॥
सूक्ष्म गति अतिभारी झीनी । ताहि जगतमें विरला चान्ही ॥
आदि न अन्तहती नहिंमाया । उत्पति प्रलय हती न काया ॥
शून्य शिखर नहिंतत्त्वनमूला । कारण सूक्ष्म नहीं अस्थूला ॥
आदि ब्रह्म नहीं ओंकारा । नहीं निरञ्जन नहिं अवतारा ॥
दश अवतार न चौविस रूपा । तब नहिं होता ज्योतिस्वरूपा ॥
पुण्य पाप काहू नहिं थापा । सोय ब्रह्म नहिं सोहं जापा ॥
नहिं तब शून्य सुमेर न भारा । कूर्म न शेष धरे अवतारा ॥
अक्षर एक न रंंकारा । त्रिगुण रूप है नहिं विस्तारा ॥
शक्ति युक्ति नहिं आदि भवानी । एक होय नहिं ज्ञान अज्ञानी ॥
शब्द न स्वांति कछु नहिं होई । कहो विचार सुनो तुम सोई ॥
नहिं है बीज नहिं अंकुरा । आदि अमी नहिं चन्द न सूरा ॥
धर्मदास समझ के रहना । कहों कहा कछु नहिं कहना ॥

बांधसागर

( ५३ )

धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनहु गुसाई । इन बातन बनवे की नाई ॥
कियेउ संशय वे इक ठोरी । तुमहु हते के है कोई औरी ॥
सत्य सत्य अब मो पहँ कहिये । संशय रहित सोई पद लहिये ॥
त्रयी वाचा ले पूछी साई । साधु संत तुम आप गुसाई ॥

सद्गुरु वचन

कहै कबीर सुनहु धर्मदासा । सकल भेद मैं किया प्रकाशा ॥
जो प्रतीति हो मन महाँ तोरा । भवको मेटि शरण रहो मोरा ॥
धर्मदास छोड़ो सब माया । अस्थिर अमर अखंडित काया ॥
भक्ति मुक्ति उपजी है जासों । प्रेमहि लभ्य लगावो तासों ॥
अब मैं तोहि लखाऊं जागा । छूटै जन्म मरणको धागा ॥
जन्ममरण है अति दुख भारी । तासों तुम को लेहुँ उवारी ॥
अब आपा को थापों नहीं । देख लेहु तुम बाहर माहीं ॥

साखी अब तोहि भेद बताऊँ मैं, निर्मल ठौर नियार ॥

सर्व परे सब ऊपरहिं, देखो वहाँ अकार ॥

चौपाई

पुरुष कहो तो पुरुषहि नहीं । पुरुष हुवा आपा भू माहीं ॥
शब्द कहो तो शब्दहि नहीं । शब्द होय माया के छाहीं ॥
दो विन हो नहिं अघर अवाजा । कहो कहा यह काज अकाजा ॥
अमृत सागर वार न पारा । नहिं जानों केतिक विस्तारा ॥
तामें अघर भवन इक जागा । अक्षय नाम अक्षर इक लागा ॥
नाम कहो तो नाम न जाका । नामधरा जो काल तिहि ताका ॥
है अनाम अक्षर के माहीं । निह अक्षर कोइ जानत नाहीं ॥
धर्मदास तहाँ बास हमारा । काल अकाल न पावे पारा ॥
ताकी भक्ति करे जो कोई । भव ते छूटै जन्म न होई ॥

( ५४ )

भवतारणबोध

सारखी-भवसागर भरमों नहीं, यही प्रताप हमार ।
निश्चय करिके मानियो, तुरत उतरिहो पार ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी यह अकथ कहानी । आगे सुनी न काहू जानी ॥
योगेश्वर नहिं पावें पारा । मैं क्या जानों जीव विचारा ॥
अचरज गुप्त तुम आय सुनाई । ताकी गम्य न काहू पाई ॥
ताकी भक्ति करैं किहि भांती । रूप अरूप न पूजा पाती ॥
कौन युक्ति सो भक्ति करीजै । अगम ठौर कैसे कर लीजै ॥
जस जानहुतस मोहिं लेचालहु । तन मन छोड़ देह सुख पालहु ॥
अब कछु मोसैं होवत नाही । सुरत समाय गई तुम माहीं ॥
यहाँ वहाँ तुम समरथ दाता । मोकहैं जान परी यह बाता ॥

सारखी-नाम कबीरा धरा क्यों, कारन कौन प्रमाण ।
देह धरी तुम आयके, कहिये मोहि बखान ॥

चौपाई

सत्य कबीर नाम मैं जाना । सो भवको क्यों कियो पयाना ॥
ऐसे सन्त जन्म क्यों धारा । किहि कारण लीन्हा अवतारा ॥
सत्य कहो बन्धनमें नाही । निरबन्धन कैसे जग माहीं ॥
देही धरी सबहि दुख पाया । तुमही काहि न व्यापी माया ॥
हठ हों पूछत हों गुरु बाता । रिस न करहु तुम समरथ दाता ॥

सारखी-मैं पूछत हित आपने, जीव मुक्तिके काज ।

साधु सन्त तुम सुजन हो, अब नहिं मोकों लाज ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

धरमदास कहो तुम सांची । मिथ्या नहीं सत्य सुख बांची ॥
तुम हो अंश हंस पति राजा । तुम्हरो मोह करन को काजा ॥
आदि अनादि समीपी मोरा । अब मैं काज कहुंगा तोरा ॥

बोधसागर

( ५५ )

वहांसे तुम्हीं दीन पठवाईं । यहां आय कर लागी कई ॥
काल पुरुष दीन्हा भरमाईं । जिन सब सृष्टि बनाके खाईं ॥
जग जीवनसों तुमहो नियारा । तुम्हरे काज लीन्ह अवतारा ॥
अवर काज मोर कछु नाहीं । हों निरंतर जगके माहीं ॥
मोहिं न व्यापे जगकी माया । कहन सुननकी है यह काया ॥
देह नहीं अरु दरशै देही । रहो सदा जहां पुरुष विदेही ॥
यह गत मोर न जाने कोई । धर्मदास तुम राखो गोईं ॥
आदि पुरुष निहअक्षर जाना । देही धर मैं प्रकटे आना ॥
गुप्त रहे नाहीं लख पावा । सो मैं जगमें आन चितावा ॥
जुगुन २ लीन्हा अवतारा । रहों निरन्तर प्रकट पसारा ॥
सतयुग सतसुकृत कह टेरा । त्रेता नाम सुनीन्द्रहि मेरा ॥
द्वापरमें करुना मय कहाये । कलियुग नाम कबीर रखाये ॥
चारों युगके चारों नाऊँ । माया रहित रहै तिहि ठाऊँ ॥
सो जागह पहुँचे नहिं कोई । सुर नर नाग रहै सुख गोईं ॥
सबसे कहां पुकार पुकारी । कोइ न माने नर अरु नारी ॥
उनका दोष कछु नहिं भाईं । धर्मराय राखे अटकाईं ॥
गुप्त पसारा है अति भारी । ताहि न जाने नर अरु नारी ॥
शिव गोरख सोइ पार न पावें । और जीवकी कौन चलावें ॥
नवहिं नाम चौरासी सिद्धा । समझ बिना जगमें रहे अन्धा ॥
ऋषि मुनि और असंखन भेषा । सत्य ठौर सपने नहिं देखा ॥
जोर कहीं पतयावत नाहीं । बहुत कहीं समझा मनमाहीं ॥
कोइ योग कोइ मदके माता । कोइ कहै हम लखे विधाता ॥
कोइ मान दिशा मन लावे । मौन होयकर मूल गवावे ॥
सत्य पुरुष की युक्ति न पाईं । हृदय धरे नहिं सत्यको भाईं ॥
कोई कहै हम हैं भज नीका । काज अकाज लखै नहिं जीका ॥

( ५६ )

भवतारणबोध

कोई कहै हम पढ़े पुराना । तत्व अतत्त्व सबै कछु जाना ॥
कोई कहै विद्या आधीना । सब विचार कायामें चीन्हा ॥
कोई कहै तप वश करि राखा । तप है मूल और सब शाखा ॥
कोई कहै कर्म अधिकारा । कर्महि सो उतरे भवपारा ॥
कोई कहे भाग्य लिखा सो होई । भाग्य लिखा मेटै नहिं कोई ॥
कहै लग कहौं यही सब कहई । भेद हमार न कोई लहई ॥
सब सों हार मान मैं बैठा । ये सब जीव काल घर पैठा ॥

सारखी-सोइ काल करतार सोइ, भक्ति सुक्ति तेहि हाथ ।
मेरो कह्यो नहिं आदरे, परंपंची बड़ साथ ॥
मनहिं प्रपंची मनहिं निरञ्जन, मन ही है ओंकार ।
फन्दा है त्रयि लोक का, कोइ न भवते न्यार ॥
निरंजनहिं निर्वाण पद, कही तुम्हीं हितवन्त ।
योग यती संन्यास गत, कोइ न पावत अन्त ॥
सप्त सुर्त में रमि रहा, सुर्त शब्द तेहि हाथ ।
ऐसी अगम अपार गति, तीन लोकके नाथ ॥

चौपाई

सात शून्यका सकल पसारा । सात शून्यते कोइ न न्यारा ॥
सात सुर्तका भेद बताऊं । तामें ज्ञान सकल समुझाऊं ॥
उत्पत्ति प्रलय है वाके माहीं । इन गति सों कोइ न्यारा नाहीं ॥
प्रथमहिं अमी सुर्त निज ठौरा । तहाँ निरंजन कीन्हा दौरा ॥
वहाँ जाय अमी ले आवै । ताहाँ अजर बीज उपजावै ॥
सोइ बीज रक्त में धरहीं । यह विधि सों वह उत्पत्ति करहीं ॥
बीजहि जलका रंग कहाया । तासों रची सकलकी काया ॥
दूजी मूल सुर्त तेहि संग । घट २ माहि बनावे रंगा ॥
तीजी चमक सुर्त अंबारा । नौ नारीमें किया पसारा ॥