कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
( १७ )
सोरठा
भवसागरको पार, विना नाम उत्तरे नहीं ।
गहिलेव नाम अपार, कई कबीर सब जीवसे ॥
चौपाई
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । आदि नाम मैं कहों सब पासा ॥
यहि जगसे मैं कहा चिताई । अज्ञानी नहि माने भाई ॥
जौन जीव को ज्ञान न होई । कहे वचन माने नहि सोई ॥
और कहे जुलहा मति हीना । ब्रह्मा विष्णु शिवराम न चीन्हा ॥
ऐसे भक्त न देखे भाई । ब्रह्मा विष्णु शिवहिं विसराई ॥
जिन्दा हर का मरम न पाई । जुलहा भक्ति न जाने भाई ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव जग उपजाई । इन तीनोंकी यह दुनियाई ॥
रावन छली रामकी नारी । रामचन्द्र कीन्हा रण भारी ॥
हर सीताको रावण लाये । राम लंकपति चिह्न मिटाये ॥
कहाँलों वरणों वार न पारा । तीन देवका सकल पसारा ॥
सार्वी-रामचन्द्र वर्णन कहूं, त्रयलोकी हैं नाथ ।
जग जिव कई समझायके, सुनिये जुलहा बात ॥
चौपाई
ऐसे सब जग कई गुहराई । धर्मदास मैं तुम्हें सुनाई ॥
आदि नाम मैं भाख सुनाई । यह जग जीव न चेता भाई ॥
आदि नाम सबको दरसाया । जग जीवों को ज्ञान सुनाया ॥
यह जुलहाको भेद न पाये । अज्ञानी क्यों रार मचाये ॥
आदि नामकी सुधि विसराये । मायामें सब जग लपटाये ॥
सच्चा साहिवको नहिं पाये । रामकृष्ण जग ध्यान लगाये ॥
ऐसे भूल गये संसारा । कैसे उत्तरे भव जल पारा ॥
कहे कबीर गहो निज नामा । जब पहुँचे अमरापुर गामा ॥
नं. ७ कबीरसागर - २
( १८ )
ज्ञानबोध
साहब पै जग धरे न ध्याना । तिहुँपुर काल ठगो हम जाना ॥
सब कोइ नाम गहो रे भाई । छोड़ो दुर्गति और चतुराई ॥
भरम जाल मनही ना लाओ । सत्तपुरुषमें ध्यान लगावो ॥
दुनियामें भरमो मति हीना । जम घरजायँगे नाम विहीना ॥
यही मता हम जगहि लखाये । धर्मदास विरले जिव पाये ॥
सारखी—कहैं कबीर जनगायके, सुनो जगत यह ज्ञान ॥
नीचे त्रयलोकी रहत, ऊपर सत्तगुरु नाम ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । जग जीवोंकी कथा प्रकाशा ॥
आदि नाम हम भास्व सुनाया । मूरख जीव भरम नहि पाया ॥
राम वरन जग कीन्हहा भाई । तुम सुनियो मैं देखै बताई ॥
जगत कहै जुलहा अज्ञानी । हरिहरका कछु भेद न जानी ॥
नीच जात और भक्त कहाई । हरि के दरस कबहुँ ना पाई ॥
वेद पुराण गीता हम जाना । हमसे नाहक करे बखाना ॥
हमरो वेद कहे निज बाता । रामचंद्र समरथ है दाता ॥
चार वेद ब्रह्मने ठाना । जुलहा भूल गया अभिमाना ॥
ब्रह्म विष्णु शिवसे और न देवा । ऋषि मुनि करें सबै मिल सेवा ॥
ले अवतार जीव जग आये । शालग्राममें सुर्त लगाये ॥
ब्रह्म विष्णु शिवहि जग धाये । जुलहा उलटा ज्ञान चलाये ॥
वेद शास्त्र में हमने जाना । ब्रह्म विष्णु महेश्वर माना ॥
सार वेदमें देखा भाई । रजगुण तमगुण सत्तगुण साई ॥
गीता भागवत पुस्तक नाना । निशिदिन जाप करें भगवाना ॥
आदि भवानी तीनों देवा । इनकी सब मिल साथे सेवा ॥
ऐसा ज्ञान हमारा होई । जुलहा कहा न मानो कोई ॥
सारखी—तीन देव निजके गहे, राखे देवी आस ।
सोइ जीव सुख भोग हैं, हंसा करे विलास ॥
बोधसागर
( १९ )
चौपाई
ऐसे जग जिव ज्ञान चलाई । धर्मदास तोहि कथा सुनाई ॥
यही जगत की उलटी रीती । नाम न जाने कालसों प्रीती ॥
वेद रीति सुनियो धर्मदासा । मैं सब भाख कहों तुम पासा ॥
वेद पुरान में नामहि भाषा । वेद लिखा जानों तुम साखा ॥
छऊ शास्त्र मिलिझगराकीन्हा । ब्रह्मरूप काहू नहि चीन्हा ॥
चीन्हो है जो दूसर होई । भर्म विवाद करे सब कोई ॥
मूल नाम ना काहू पाये । साखा पत्र गह जग लपटाये ॥
डार पत्रको जो कोई धरही । निश्चय जाय नरकमें परही ॥
भूले लोग कहैं हम पावा । मूल वस्तु विन जन्म गमावा ॥
जीव अभागि मूल नहि जाने । डार पत्र में पुरुष बखाने ॥
पढ़े पुराण औ वेद बखाने । सत् पुरुष जगभेद न जाने ॥
वेद पढ़े औ भेद न जाने । नाहक यह जग झगड़ा ठाने ॥
वेद पुराण यह करे पुकारा । सबहीसे इक पुरुष नियारा ॥
ताहि न यह जग जाने भाई । तीन देवमें ध्यान लगाई ॥
तीन देव की करहीं भक्ती । जिनकी कभी न होवे सुक्ती ॥
तीन देवका अजब खयाला । देवी देव प्रपंची काला ॥
इनमें मत भटको अज्ञानी । काल झपट पकड़ेगा प्राणी ॥
तीन देव पुरुष गम्य ना पाई । जगके जीव सब फिरे भुलाई ॥
जो कोइ सत् पुरुष गये भाई । जा कहैं देख डरे जमराई ॥
ऐसा सबसे कहियो भाई । जग जीवोंका भरम नशाई ॥
साखी-रूप देख भरमो नहीं, कहैं कबीर विचार ।
अलख पुरुष हृदये लखे, सोइ उतारि है पार ॥
चौपाई-जो जो वस्तु दृष्टिमें आई । सोई सबहि काल धर खाई ॥
मूरति पूजै सुक्त न होई । नाहक जन्म अकारथ खोई ॥
( २० )
ज्ञानबोध
यह जग करै मूर्तिकी पूजा । करै गर्व हमसे नहिं दूजा ॥
पण्डित भक्त भये जग माहीं । पाथर पूजत जन्म गमाही ॥
ऐसे भक्त भये अधिकार्ई । पीतरकी निज मूर्ति बनाई ॥
इनसै भक्त और नहिं कोई । जिन अपनी दुरमति नहिं खोई ॥
आदि ब्रह्मको भेद न पाये । पद पद पंडित जग भरमाये ॥
अन्तकाल जम घेरे आई । तब विद्या कछुकाम न आई ॥
पाथर पूजें पढ़े पुराना । पद गुण अर्थ विवेकहि ज्ञाना ॥
ज्ञान कथे है वार न पारा । सतगुरु भक्त न जान लबारा ॥
ऐसा मत ब्राह्मणने धारा । जले जात हैं यमके द्वारा ॥
आदि नाम भूलो मत भाई । असुर अंश दुरमतहि लखाई ॥
धर्मदास देखो जग रीती । सांचा छोड़ झूठसों प्रीती ॥
साखी
सार शब्द ना जान है, कहैं कबीर बखान ।
यह जग भूले बावरे, गहे न सतगुर मान ॥
ब्राह्मण भूले बावरे, सरगुण मतके जोर ।
लख चौरासी भोगिहैं, पारब्रह्मके चोर ॥
सरगुण माहिं सार नहिं कोई । निरगुण नाम नियारा होई ॥
निर्गुणसे सरगुण है भाई । सरगुणमें यह जग लपटाई ॥
रजगुण सतगुणतमगुणकहिये । सब मिटजाय ज्ञान जोलहिये ॥
तीनों गुण से सरगुण होई । चौथा पद निरगुण है सोई ॥
निर्गुण नाथ निरंजन राई । निज उत्पत्ति बनाके खाई ॥
ताके परे इक नाम नियारा । सो साहब है मूल अपारा ॥
बोधसागर
( २१ )
उन्हें जगत नहीं जाने भाई । काल अंश राखे भगमाई ॥
ब्रह्मा विष्णु शिवहि जग झाँके । सत्य कबीर नाम रस छोँके ॥
नाम अमल रस चाखे कोई । ताको जरा मरन ना होई ॥
सतगुरु भक्ति करे जो कोई । जाति वर्ण डुरमति सब खोई ॥
आदि नामको नित गुणगावे । भवसागर में बहुरि न आवे ॥
आदि नामको गहे जो आसा । सतगुरु काटे काल कि फाँसा ॥
आदिनाम है गुप्त अमोला । धर्मदास मैं तुमसे खोला ॥
गुप्त मता पावे जो कोई । गेही तज बैगगी होई ॥
आदि नाम गुप्त संसारा । जो पावै जग से हो न्यारा ॥
धर्मदास यह जग बौराना । कोई न जाने पद निरवाना ॥
यहि कारन मैं कथा पसारा । जगसे कहियो नाम नियारा ॥
यही ज्ञान जग जीव सुनाओ । सब जीवोंका भरम नशाओ ॥
अब मैं तुमसे कहों चिताई । त्रयदेवनकी उतपत्ति भाई ॥
साहब कीन्ह इक अजबतमाशा । सो सब कहँ मैं तुम्हरे पास ॥
कछु संक्षेप कहों गुहराई । सब संशय तुम्हरे मिट जाई ॥
भरम गये जग वेद पुराना । आदि नामका भेद न जाना ॥
राम राम सब जगत बखाने । आदि नाम कोई बिरला जाने ॥
राजाराम सबको यह जग जाने । तुम से ताको भेद बखाने ॥
ज्ञानी सुन सो हिरदै लगाई । मूरख सुने सो गम्य न पाई ॥
मा अछंगी पिता निरंजन । वे जम दारुण वंशन अंजन ॥
पहिले कीन्ह निरंजन राई । पीछेसे माया उपजाई ॥
मायारूप देख अति शोभा । देव निरंजन तन मन लोभा ॥
कामदेव धर्मराय सताये । देवी को तुरतइ धर खाये ॥
पट से देवी करी पुकारी । साहब मोहे करो उबारी ॥
टेर सुनो सतगुरु तहँ आये । अछंगी को बंद छुड़ाये ॥
( २२ )
ज्ञानबोध
धर्मराय को हिकमत दीन्ह। नख रेखासे भगकर लीन्ह ॥
धर्मराय करें भोग विलासा । मायाको सु रही तब आसा ॥
धर्मराय अरु माया साजे । तीन लोक तासे उपराजे ॥
तीन पुत्र अष्टंगी जाये । ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये ॥
तीन देव विस्तार चलाये । इनमें यह जग धोखा खाये ॥
पुरुष गम्य कैसे के पावै । काल निरंजन जग भरमावै ॥
तीन लोक अपने सुत दीन्ह। सुन्न निरंजन बासा लीन्ह ॥
अलख निरंजन सुन्न ठिकाना । ब्रह्मा विष्णु शिव भेद न जाना ॥
तीन दव सो उनको धावै । निरञ्जनको वे पार न पावै ॥
अलख निरञ्जन बड़ वटपारा । तीन लोक जिव कीन्ह अहारा ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये । सकल खाय पुन धूर उड़ाये ॥
तिनके सुत है तीनै देवा । आंधर जीव करत है सेवा ॥
रामहिं रूप धरी है माया । जिन लंकाको राय सताया ॥
दश औतार माया ने धरिया । काल अपर्बल सबको छलिया ॥
काल पुरुष काहू नहिं चीन्हीं । काल पाय सबही गह लीन्हीं ॥
एसा राम सकल जग जाने । आदि ब्रह्मको ना पहिचाने ॥
तीनों देव असुर औतारा । ताको भजे सकल संसारा ॥
तीनों गुणका यह विस्तारा । धर्मदास मैं कहीं पुकारा ॥
सारखी
गुण तीनों की भक्ति में भूल परो संसार ।
कई कबीर निज नाम विन, कैसे उतरे पार ॥
सोरठा
जगजिव है अज्ञान, आदि नाम नहिं जानहीं ।
मायामें लपटान, जीव जमपुरी जावहीं ॥
बोधसागर
( २३ )
चौपाई
ऐसा राम कबीर न जाना । धर्मदास सुनियो दै काना ॥
सुत्र के परे पुरुष को धामा । तहैं साहब है आदि अनामा ॥
ताहि धाम सब जीवका दाता । मैं सबसों कहता निज बाता ॥
कहत अगोचर सब के पारा । आदि अनादि पुरुष है न्यारा ॥
आदि ब्रह्म इक पुरुष अकेला । ताके संग नहीं कोइ चेला ॥
ताहि न जाने यह संसारा । बिना नाम है जमके चारा ॥
नाम बिना यह जग अरुझाना । नाम गहे सौ संतसुजाना ॥
सच्चा साहब भजु रे भाई । यहि जगसे तुम कहो चित्ताई ॥
धोखा में जिव जन्म गँवाई । झूठी लगन लगाये भाई ॥
ऐसा जग से कहु समझाई । धमदाम जिव बोधो जाई ॥
सज्जन जिव आवै तुम पासा । जिन्हें देव सतलोकहि बासा ॥
ज्ञानहीनके सुन षट करमा । धर्मदास उनके ये धरमा ॥
भरग गये वे भव जलमाहीं । आदि नाम को जानत नाही ॥
पीतर पाथर पूजन लागे । आदि नाम घटही से त्यागे ॥
तीरथ बर्त करे संसारे । नेम धरम असनान सकारे ॥
भेष वनाय विभूति रमाये । घर घर भिक्षा माँगन आये ॥
जग जीवनको दीक्षा देहीं । सत्तनाम विन पुरषहि द्रोही ॥
ज्ञान हीन जो गुरु कहावै । आपन भूला जगत भुलावै ॥
काम कोध मद लोभ विक्राग । इन्हें न त्यागे साध बिचारा ॥
ऐसा ज्ञान चलाया भाई । सत साहबकी सुध बिसराई ॥
यह दुनियां दो रंगी भाई । जिव गह शरण असुरकी जाई ॥
तीरथ व्रत तप पुन्य कमाई । यह जम जाल तहाँ ठहराई ॥
यहै जगत ऐसा अरुझाई । नाम बिना बूढ़ी दुनियाई ॥
जो कोइ भक्त हमारा होई । जात वरण को त्यागे सोई ॥
( २४ )
ज्ञानबोध
तीरथ व्रत सब देय बहाई । सतगुरु चरणसे ध्यान लगाई ॥
काम क्रोध मद लोभ न तेही । सोई पावै परम सनेही ॥
मनहीं बांध स्थिर जो करही । सो हंसा भवसागर तरही ॥
भक्त होय सतगुरुका पूरा । रहै पुरुष के नित्त हजुरा ॥
यही जो रीति साधकी भाई । सार युक्ति में कह गुहराई ॥
साखी-सत्तनाम निज मूल है, यह कबीर समझाय ॥
दोई दीन खोजत फिरें, परम पुरुष नहीं पाय ॥
सोरठा
सत्तनाम गुण गाव, गहै नाम सेवा करै ।
सहज परम पद पाव, सतगुरु पद विश्वास दृढ ॥
चौपाई
पाथर पूज हिंदु भुलाना । सुरदा पूज भूले तुरकाना ॥
कहैं कबीर ये दोह भुलाना । आदि पुरुष कोई नहीं जाना ॥
हिन्दू तुर्क दोई उपदेशा । नाम गहै मिटि काल कलेशा ॥
भवसागर कोइ पार न पावे । या जग में सब गोता खावे ॥
भव दरयाव है अगम अपारा । पुरुष भक्त उतरेंगे पारा ॥
धर्मदास जग कहो समझाई । आदि नाम बिन सुक्ति न पाई ॥
जो जन भजि हैं निर्भयनामा । सो हंसा पहुँचै निज धामा ॥
अजर नाम लै लोकहि जाई । दुष्ट काल तब रहे सुरझाई ॥
कर्मत्याग सब भजो यकनामा । कभी न हो भवसागर धामा ॥
ब्रह्मने जो राह चलाई । सो सब कहों मैं तुमसे गार्ई ॥
चार वरण अरु वेद बखाना । जगके जीव सबही उरझाना ॥
जात पांत ब्रह्म कर दीन्हा । सबमें ऊँच ब्राह्मणको दीन्हा ॥
ब्रह्म अपने मते चलाये । तीनों गुण जग नाम लखाये ॥
आदि नामकी सुध नहीं पाये । चारों जुग धोखाहि गुमाये ॥
बोधसागर
( २५ )
यह ब्रह्मा की है कगवृत्ती । जगहि लखाये झूठी रीती ॥
ब्रह्माने यह जग भरमाया । पत्त पुरुषका भेद न पाया ॥
तिहुँपुर कालके जाल पसारा । तामें अटके सब संसारा ॥
जात पांत कोई भेद न चीन्हा । मिथ्या राह जगहि गहलीन्हा ॥
ब्राह्मण प्रभुकी भक्ति न जाने । ब्रह्म रूप नाहीं पहचाने ॥
सार शब्द ब्राह्मण नहीं जाने । आदि नाम शूद्रही बखाने ॥
ब्राह्मण धरे शूद्र औतारा । करे मुक्ति तिहुँ पुरसे न्यारा ॥
धन्य शूद्र जो सेवा करई । आदि नामको हियमें धरई ॥
जाति वनरमें भेद बताऊँ । जो कोई समझे ताह लखाऊँ ॥
जाति बरण सब एकहि होई । दूसर जाति नहीं है कोई ॥
दूसर कर्म जाति है भाई । कर्म करे सो नाम धराई ॥
जैसो कर्म करे जो भाई । तैसी ताकी जात बनाई ॥
चार बरण सब एकहि जानो । दूसरे कर्म जो जात बखानो ॥
जाति बरणका चिह्न न कोई । कैसे जाति दूसरी होई ॥
दूसरि जाति कोई विधि माने । जग अज्ञात भेद न जाने ॥
जाति पांति होके नहिं आये । यह जगमें झगड़ा फैलाये ॥
जाति पांति नाहीं कोई न्यारी । एक जाति है सब संसारी ॥
भगके द्वार जीव सब आये । जन्म मरनमें बहुरि समाये ॥
राह एक आये संसारा । कौन ज्ञानसे भये नियोग ॥
एकइ घरसे सब जिव आये । एक बाप एक माता जाये ॥
ऊँच नीच सब सम कर जाना । ऊँच नीच सब झूँठ बखाना ॥
डार जनेऊ ब्राह्मण कहलायें । ब्राह्मणिको कहो का पहिराये ॥
सुनत करा मुसलमानहि कीन्हा । तुर्कानीको का कर दीन्हा ॥
ना हिन्दू ना तुर्क कहाये । ज्ञान हीन जिव धोखा खाये ॥
जात बरन मिथ्या कर जानो । सत्त कहे निश्चय कर मानो ॥
( २६ )
ज्ञानबोध
यह जग आंधर जानो भाई । नाम न जाने ऊँच कहाई ॥
ऊँच वही जो नामहि जानें । विना नाम सब नीच कहानें ॥
ना कोउ वर्ण नहीं कोउ भेषा । शब्द सरूपी जैहै देशा ॥
सब मिल भक्ति करो रे भाई । सतगुरु मुखसे यह फरमाई ॥
यह सतगुरुका ज्ञान है भाई । जो कोइलखे सो लोक सिधाई ॥
जात वर्ण हम भाख सुनाई । धर्मदास जगसे कहो जाई ॥
ऐसा तुम जग जान लख वो । सत्तलोकमें जिव पहुँचावो ॥
साखी-यह जग त्रयगुण भक्तमें, धूल परे धर्मदास ॥
नाम गहे विश्वास करि, जाय पुरुषके पास ॥
माना कहा कबारकी, सबको यहै पुकार ।
भरम जाल सब त्यागदे, गहले नाम अपार ॥
सारठा
जिन सब न म आधार विना नाम भव ना तरे ।
जाय काल दर्बार, सत्तपुरुष जो ना गहे ॥
चौपाई
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब निज भेद कहों तुम पास ॥
अकह हतो पुनि कहा बखानी । उत्पति प्रलय हती मम वाणा ॥
आदि न अंत हती नहि माया । उत्पति प्रलय हती न काया ॥
सोहं ब्रह्म न नहि ओङ्कारा । काल निरंजन नहि औतारा ॥
दश आतारन चौबीस रूपा । तब नहि होता ज्योति स्वरूपा ॥
जब नहि चंद्रलोक दीपविस्तारा । तब नहि सुकृत करचो संसारा ॥
जब नहि लाक चंद्रसूर्य अरुतारा । तब नहि तीनों गुण औतारा ॥
वहां नहीं है दिन अरु राती । ऊच न नीच जात ना पांती ॥
नाही मुख पवन नहि पानी । समरथ गति काहू नहि जानी ॥
आदि ब्रह्म नहि करे पसारा । आप अकह तब हता नियारा ॥
बोधसागर
( २७ )
है अनाम अक्षर के माहीं । निहअक्षर कोइ जानत नाहीं ॥
अमर लोक जहाँ अम्बर काया । अकाल पुरुष जहाँ आपरहाया ॥
धर्मदास जहाँ वाम हमारा । काल अकाल न पावे पारा ॥
निरभय घर बोही है भाई । रोग न व्यापे काल न खाई ॥
समरथ घर हैं पैले पारा । सबके ऊपर है निरधारा ॥
जिनकी गम्य काल नहीं पाई । तीन देवकी कौन चलाई ॥
मन माया काल गति नाहीं । जीव सहाय बसै तेहिं ठाही ॥
ऐसा है वह देश हमारा । जहाँसे हम आये संसारा ॥
ताकी भक्ति करे जो कोई । भवते छूटै जन्म न होई ॥
वहाँ जाय जीव करे विलासा । अमरलोक जिवका नहीं नासा ॥
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । आदिनाम मैं कहा तुम पासा ॥
जो कोई माने कहा तु हारा । निरभय जाय पुरुषके द्वारा ॥
मूरख सतगुरु मरम न पावे । भवसागरमें भटका खावे ॥
सार युक्ति मैं तुम्हें लखया । गन मुनि काहू भेद न पाया ॥
भाषा ग्रंथ ज्ञान उपदेशा । तुम अपने घट करो प्रवेशा ॥
सारखी-अस मुख है हमरे घरे, कहैं कबीर समझाय ।
सत्त शब्द तो कोई गहे, अस्थिर बैठे जाय ॥
सोरठा
चौथे पद निरवान, पूरे गुरुसे पाइये ।
कहे कबीर बखान, सत्त मान सतगुरु सही ॥
चौपाई
और सुनो गुरुमु का लेखा । भक्त होय सो करै विवेका ॥
जो कोई पान पम्बाना पावै । ताके निकट काल नहीं जावै ॥
पान परवाना पावै भाई । नाम गहे अरु भरम नशाई ॥
तन मन से गुरु सेवा लाई । गुरुसे देव और नहीं भाई ॥
गुरु से कपट शिष्य जो राखे । जमराजाके सुदगर चाखे ॥
( २८ )
ज्ञानबोध
सोई हंस काल घर जावे । सत् लोकमें वास न पावे ॥
निरभय घर कबहुँ ना पावै । कोट जन्मतिहिकालसतावै ॥
भक्ति कर पूजत हैं जो देवा । निश्चय जाय कालकी सेवा ॥
मनुष्य तन वे कभी न पावै । लख चौरासी भटका खावै ॥
जैसे कर्म करे संसारा । तस भुगते चौरासी धारा ॥
ना गुरु ना निगुरा पंथी । कहा कयो बांचैसे ग्रंथी ॥
साखी-भक्ति करें भरमत फिरे, जग छोड़े नहिं सोय ।
कहैं कबीर धर्मदास से, जिनका तरन न होय ॥
सोरठा
करनी देय वहाय, आदि नाम कह जानके ।
ता महाँ रहै समय, भरम जाल सब छोड़ दे ॥
धर्मदास वचन
चौपाई
धर्मदास तब कहै करजोरी । स्वामी सुनिये विनती मोरी ॥
हो स्वामी मैं बूझो तोहीं । करके कृपा बताइये मोहीं ॥
हो अविनाशी ब्रह्म कहाये । यह जगमें तुम कैसे आये ॥
यह सब भेद बताइय स्वामी । तुम सब घटके अंतर्यामी ॥
सकल चरित तुम मोहि बतावो । मैं जाते जगजीव चितावो ॥
यह जग तब पतियावे साई । चारों जुग तुम कहाँ रहाई ॥
साखी-सो अब मोहि बतावहूँ, तुम गुरु अगम अपार ।
धर्मदास विनती करे, सुनियो हो करतार ॥
कबीर वचन चौपाई
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब यह भेद कहों तुम पासा ॥
वेद पुराण शास्त्र जग ठाना । भूले जीव न पांय ठिकाना ॥
बोधसागर
( २९ )
तीन लोक जिव काल सतावै । ब्रह्मा विष्णू पार न पावै ॥
सत् पुरुष तब मोहिं पठावा । जीव उबारन मैं जग आवा ॥
यहि कारण आयो संसारा । जगके जीव मैं करों उबारा ॥
जग जीवनको नाम लखावै । पकड़ हंस सतलोक पठावै ॥
हम हैं सतलोकके बासी । दास कहाय प्रगट भये कासी ॥
ना कोइ वर्ण नहीं कोइ भेशा । सत् पुरुषके थे हम देशा ॥
तहैंकी रचना अद्भुत भाई । सो मैंने तोहि पहिले सुनाइ ॥
और तोहि मैं कहूँ समझाई । धर्मदास सुन चित्त लगाई ॥
धरी देह भवसागर आये । धर्मदास तोहि नाम सुनाये ॥
कलियुगमें काशी चल आये । जब हमरे तुम दर्शन पाये ॥
तब हम नाम कबीर धराये । काल देख तब रह सुरझाये ॥
जो कोइ हमको चीन्हा भाई । जिनका काल धोक मिट जाई ॥
देह नहीं अरु दरसै देही । जग ना चीन्हे पुरुष विदेही ॥
नहीं बाप ना माता जाये । अब गतिहीसे हम चल आये ॥
हते विदेह देह धर आये । जग जीवोंके बन्द छुड़ाये ॥
नाम गहे तेहि लोक पठाये । बिना नाम जिव कालहि खाये ॥
गुप्त रहे नाहीं लख पावा । सो मैं जगमें आन चितावा ॥
चारों जुग भवसागर आये । आदि नाम जग ढेर सुनाये ॥
नाम सुने शरणागत आवें । तिनहीकी हम बंद छुडावें ॥
जीव प्रबोध लोक पहुँचावें । काल निरंजन देख डरावें ॥
चारों जगके चारों नामा । माया रहित रहै तिहि ठामा ॥
सतजुग सत् सुकृत कहलाये । त्रेता नाम सुनींद धराये ॥
द्वापरमें करुनामय कहाये । कलियुग नाम कबीर रखाये ॥
आदि नाम चारों जुग ढेरा । सज्जन जीव सुनतही दौरा ॥
जो जो जीव शरणमें आये । तिनको हमने नाम सुनाये ॥
( ३० )
ज्ञानबोध
आदि नाम जो नित गुन गावैं । कर विश्वास अमर पद पावैं ॥
जो कोइ सतगुरु नामको धावैं । तिनको साहब पार लगावैं ॥
पार हाय जो माया त्यागे । जन्म मरनको संशय भागे ॥
माया त्याग वैरागी होई । अजर अमरको पावैं सोई ॥
धर्मदास वचन
कह धर्मदाम सुनो प्रभु राई । भक्त भाव मोहि देव बताई ॥
कबीर वचन
भक्तोंकी यह कथा पसारा । धर्मदास सुनियो चित्त धारा ॥
जगमें भक्त भये अधिकारी । जोगी सन्यासी लट धारी ॥
शीव गोरख अरु बहु ब्रह्मचारी । मायाने सबको ठग डारी ॥
इनको ठग जब हमपर धाई । गुप्त नाम हम टेरे सुनाई ॥
लोट गइ माया बहुवारी । रहे जीत माया गइ हारी ॥
माया जल है कठिण अपारा । तासे गन सुनि बैठे हारा ॥
माया जाल परो मत भाई । धर्मदास जग कहो गुहराई ॥
भवसागर है भक्त बहुतेरा । जिनको तुमसे कहो निबेरा ॥
मौनी भये मुखहु नहिं बोलें । भेष बनाये घर घर डोलें ॥
अंगहि भस्म गले बिच माला । मठिया बैठ सुने मतवाला ॥
धून रमाय गुरिया सरकावे । गगन चढ़ाय के जग भरमावैं ॥
कान फाड़ शिर जटा बढ़ाये । माथे चन्दन तिलक लगाये ॥
वस्त्र रँगा जोगी बन आये । सतगुरु मिले न भेष बनाये ॥
बहुत करें जप तप रे भाई । आदि नाम कोई नहिं पाई ॥
पाहन सेवैं भक्त कहावैं । चन्दन तेल सिंदूर चढ़ावैं ॥
मानुष जन्म बड़े तप होई । नाम बिना झूठे तन खोई ॥
साधु युक्ति अस चाल बताऊँ । धर्मदास मैं तुम्हैं लखाऊँ ॥
काम क्रोध लोभ अहँकारा । सोई साधु जिन इतने मारा ॥
सूखा फीका करे अहारा । निशिदिन सुमरे नाम हमारा ॥
बोधसागर
( ३१ )
तत्त्व प्रकृति और बल माया । इन्हिं जीत तब साधु कहाया ॥
अन्त कपट सब देय बहाई । क्षमा गङ्गमें बैठ नहाई ॥
हार जीत और अभिमाना । इनसों रहित साधुको ज्ञाना ॥
बिहँसत बदन भजनको आगर । शीतल दया प्रेम सुखसागर ॥
सब षट् कर्म छोड़ अज्ञाना । धर ले केवल निर्गुन ध्याना ॥
धन्य धन्य जग साधु है सोई । जिन अपनी दुरमति सब खोई ॥
ऐसी रहन साधुकी भाई । जब हँसा निरभय पद पाई ॥
यह भक्तोंकी कथा सुनाई । निरभय पद कोइ बिरले पाई ॥
साधू लक्षण तुम्हें सुनाया । गन सुनि काहू भेद न पाया ॥
आदि नामको नित गुनगावो । सोवत जागत ना बिसरावो ॥
सत साहिब है सबसे न्यारा । ताहि जपे होवे भव पारा ॥
भक्त अनेक भये जग माहीं । जोग करै पै युक्ति न पाहीं ॥
जोगहि युक्तिनाम बिन नाहीं । झूठी माया आन लगाहीं ॥
नामहि गहै तेहि निहसंसा । नाम बिना बूझे सब हँसा ॥
नाम निरक्षर सुधि जब पावा । काल अपर्बल निकट न आवा ॥
माया त्याग भजो निज नामा । तब जिव जाय पुरुषके धामा ॥
सबसे कहो पुकार पुकारी । कोइ न माने नर अरु नारी ॥
सत्य पुरुषकी युक्ति न पाई । ऊदय धरे नहिं सत्य को भाई ॥
शिव गोरख सोइ पार न पावे । और जीवकी कौन चलावे ॥
कहें कबीर सुनो मम बानी । जोग युक्ति मैं कहों बखानी ॥
अब गेहीका सुनो विचारा । धर्मदास मैं कहों पुकारा ॥
गेही भक्त करे जो कोई । अब मैं तुमसे भाखों सोई ॥
गेही भक्ति सत्त गुरुकी करई । आदि नाम निज हृदसे धरई ॥
गुरु चरनसे ध्यान लगावै । अन्त कपट गुरुसे ना लागै ॥
( ३२ )
ज्ञानबोध
गुरु सेवामें फल सब आवै । गुरु विमुख नर पार न पावै ॥
गुरु वचन निश्चय कर मानै । पूरे गुरुकी सेवा ठानै ॥
विन विश्वास भक्ति परकाशा । प्रीति विना नहिं दुबिधा नाशा ॥
मीन मांस मद निकट न जाई । अंकुर भक्ष सो सदा कराई ॥
गुरुसे शिष्य करे चतुराई । सेवा हीन नर्कमें जाई ॥
परधन पाहन समझे भाई । झूठ वचन हृदये नहिं लाई ॥
पर तिरिया माता सम मानै । झूठ छोड़ सत्यहिको जाने ॥
जीवपै दया करै रे भाई । बुरे कर्म सब देय बिहाई ॥
हृदये दया प्रीति ना होई । सतगुरु सपने मिले न सोई ॥
नाम नेह गुरु सुतै लगावे । आदि नामको पल पल ध्यावे ॥
लेवै पान सुक्ति सहदानी । जाते काल न रोकै आनी ॥
सारखी-पुरुष नाम निशिदिन गहो, शब्द करो परतीत ।
अंक नाम निज पाइया, जाहो भवजल जीत ॥
सोरठा
भर्म तजे यम जाल, सत्तनाम लौ लावई ।
चले संतकी चाल, परमार्थ चित दे गहे ॥
चौपाई
गेही भक्त आरती आने । प्रति पूनोकी आरति ठाने ॥
अमावस आरती नहिं होई । ताहि भवन रह काल समोई ॥
पाख दिवस नहिं होवे साजू । प्रति पूनो कर आरति काजू ॥
पूनो पान लीन्ह धर्मदासा । पावे शिष्य होट सुखबासा ॥
छटे मास नहिं आरति भेवा । साल माह गुरु चौका सेवा ॥
नाम कबीर जपै लौलाई । तुम्हरा नाम कहे गुहराई ॥
ऐसी रहनि गेहि जो धरि है । गुरु प्रताप दोई निस्तरि है ॥
बोधसागर
( ३३ )
साखी-सो भव पार उतारि है, केवटसे कर प्रीत ।
जब सतगुरु केवट मिले, जैहै भव जल जीत ॥
सोरठा-काल जीव धर खाय, सत्तनाम जाने विना ।
बचि है एक उपाय, सत्त कबीर कह भव तरे ॥
चौपाई
सत्त कबीर गुरु धर्मदासा । जीव पठै है पुरुष के पास ॥
सत्त गुरु सत्त कबीरहि आहीं । गुप्त रहे जग चीन्हत नाहीं ॥
सतगुरु आप जगत पग धारे । दासा तन धर शब्द पुकारे ॥
काल निरंजन सब पर छाया । आदि नामका चिह्न भिटया ॥
धर अवतार असुर संहारा । जिव जाने यह धनी हमारा ॥
एही धोख नर्क सब जाहीं । जिव अचेत छल चीन्है नाहीं ॥
नर्क बास नहिं छूटै भाई । जो सतगुरु को चीन्है नाहीं ॥
ब्रह्मा विष्णु शिवसे नहिं देवा । जिन्ह बैकुण्ठवास नहिं देवा ॥
ऐसा काल अपरबल भाई । जिहिके छल जग चीन्है नाई ॥
जगमें जीव घात बहुतेरे । करे घात अरु पाप घनेरे ॥
दुष्ट अन्याई करजिवकी घाता । खेल शिकार माने मन माता ॥
जीव मार तन करत अहारा । जीव दया नहिं करत गँवारा ॥
जीवघाती खो बहुत दुख पावे । जन्मजन्म तिथिकाल सतावे ॥
काग देह धर विष्टा खाहीं । जन्म अनेक भ्रमे जगमाहीं ॥
जीव दया विन मुक्ति न पावैं । मीन मांस मद राक्षस खावैं ॥
धर्मदास यह जग बौराई । दुष्ट जीवकी कथा सुनाई ॥
जीव कष्ट मोहिं सहा न जाई । ज्ञान हीन नर जीव सताई ॥
यहि कारण हम जगमें आये । तीन लोक जम लूटत पाये ॥
पहले लूटे विष्णु सुरारी । फिर लूटे शंकर लटधारी ॥
( ३४ )
ज्ञानबोध
गनमुनि लूटे तपसी झारी । अरु लूटे सगले संसारी ॥
चन्द्र सूर्य तारागण सोई । कहै कबीर बचा नहिं कोई ॥
देखो यही काल की रीती । धर्म न परखो रीति अनीती ॥
ऐसा काल कठिन बरियारा । बचे सोह जो नाम पुकारा ॥
काल रीति मैं तोहिं सुनाई । धर्मदास जिव बोधा जाई ॥
साखी-कहे कबीर धर्मदास सों, तुम सुनियो चितलाय ।
काल भेद ना जानहीं मूरख रहै झुलाय ॥
सोरठा-तजो काल बरयार, जीव दया चितमें करो ।
उतरो भव जल पार, आदि नाम हृदय गहो ॥
सुनो संत मति धीर, कहो ज्ञान परखो हिये ।
काल अपरबल बीर, हृदये विवेकं दृढ ॥
चौपाई
आदि नाम है अजर शरीरा । तनमनसे गह सत्त कबीरा ॥
जोई गहे धर्मदास कबीरा । सो पावे सुख सागर तीरा ॥
काया बीर नाम है धीरू । सब घट रहे सभायक बीरू ॥
निजही शब्द कबीर है सारा । जाका है निज सकल पसारा ॥
एकै रूप शब्द पुर एका । एक भाव दुतिया नहिं देखा ॥
कैसे दुतिया कहिये सोई । दुतिया भर्म मिटै सब कोई ॥
एकहि हम तुम एक शरीरा । एक शब्द है मतिके धीरा ॥
दूसर भाव नहीं है आसा । सोई कबीर सोई धर्मदासा ॥
एक रूप एकै अनुहारी । एकहि पुरुष सकल विस्तारी ॥
आदि नाम मैं भाख सुनाओ । नाम गहे जब मुक्ती पाओ ॥
जो कोइ आदि नामको चीन्हा । तासो काल भयो बलहीना ॥
साखी-आदि नाम है मुक्तिका, जप जाने जो कोय ।
कोटि जाप संसारमें, तासे मुक्ति न होय ॥
बोधसागर
( ३५ )
सोरठा-बूझ लेहु हो हंस, आदि नाम निज सार है ।
अमर होय ते वंश, जिन जानो निज नामको ॥
और मन्त्र सब छार, आदि नाम निज मंत्र है ।
बूढ़ मरा संसार, कह कबीर निजनाम विन ॥
चौपाई
कहे कबीर सुनो धर्मदासु । चार गुरुकी कथा प्रकासु ॥
चार गुरु संसारहि कीन्हों । जिनके हा जिवमुक्ती दीन्हों ॥
वे हंसन को लोक पठाये । भवसागर जिव बहुरि न आये ॥
सार शब्द साहब का न्यारा । सोई शब्द कहैं गुरु उचारा ॥
सार शब्द काल नहिं पाईं । तीन देवकी कौन चलाई ॥
शब्द सङ्ग हंसा घर जाईं । काल अपरबल देख डराईं ॥
सार शब्द मैं तुमको दीन्हा । काल तुम्हारे रहे अधीना ॥
धर्मदास तुम मतिके धीरा । तुमको दीन्हा मुक्तिका वीरा ॥
तुमते जीव उतारि है पारा । सौंप दीन्ह तोहि जगको भारा ॥
सतजुग शिष्यसहतेजी कहाये । द्वापर चतुर्भुज नाम सुनाये ॥
त्रेता शिष्य बंकेजी भाई । कलियुगमें धर्मदास गुसाई ॥
चार गुरु भवसागर माहीं । धर्मदास वे जिव मुक्ताहीं ॥
यह मैं तुमसे कहां समझाईं । सब संशय तुम्हरे भिट जाईं ॥
वंस ब्यालिस तुम्हारे सारा । और सकल सब झूठ पसारा ॥
इनहीं सौंप देव जिव भारा । सब जीवनको करे उबारा ॥
धर्मदास तुम पुरुषके अंशा । अब हमको कछु नाहीं संशा ॥
होय पंथ भव सागर सारा । तुम्हरे वंश सब जीव उबारा ॥
ब्यालिस वंशराजलिख दीन्हों । अटल राज भवसागर कीन्हों ॥
धर्मदास मैं कहां बिचारी । यहि विधि निबहै सब संसारी ॥
साखी-नाम भेद जो जानहीं, सोई वंश हमार ।
नातर दुनिया बहुत है, बूढ़ मरा संसार ॥
( ३६ )
ज्ञानबोध
सोरठा-जैसे भव जल जीत, सार शब्द जो जानहीं ।
कठिन काल विपरीत, नातो जम ले जायगा ॥
धर्मदास वचन
चौपाई
धर्मदास तब विन्ती लाई । अब मैं पंथ करो गुन गाई ॥
अमरलोकके हो गुरु वासी । कारन कौन आये अविनाशी ॥
मृत्युलोक आये कैहि काजा । धर्मराय पापी बड़ राजा ॥
साहब कबीरका वचन
धर्मदाम तुम सुनियो भाई । जीवन काज पुरुष पठवाई ॥
सक्त पुरुष सतलोकके बासी । सकल हंसके लिये अविनाशी ॥
पुरुषदरश कोइ बहुरि न पावै । तीन लोकमें आन रहावै ॥
तीन लोक सब परले होई । अमरलोक सुखदायक सोई ॥
जीवकाज जगमें हम आये । धर्मरायसे जीव छुड़ाये ॥
आदि अनाम अमोल अपारा । अकह अगोचर सबसे न्यारा ॥
तहाँसे हम आये संसारा । पहुँचे काशी नगर मैझारा ॥
सत्त सत्त हम करें पुकारा । भवसागरके जीव उबारा ॥
नाम सुने जो मो लग धाये । जिनको हमने पार लगाये ॥
समझे सुने जो वाचा मेरी । काटूँ ताकी कर्मकी बेरी ॥
भगकी राह नहीं हम आये । जन्म मरन ना बहुरि समाये ॥
त्रिगुण पांच ताव हम नाही । इच्छारूप देह हम आहीं ॥
साखी-पांच तत्त्व गुन तीन नहीं, तामें सकल शरीर ।
सब कोइ हृदये चीन्हियो, सतगुरु पुरुष कबीर ॥
चौपाई
हम जमके शिर मर्दन द्वारा । जो कोइ गहे सो उतरे पारा ॥
जहाँ हम रहें काल तहाँ नाही । हंसन हम सुखदायक आहीं ॥