कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ब्रह्माके लिये अद्याकी चिन्ता
अनुरागसागर
( ३३ )
ऐसे बहु दिन गये बितायी । नहि पायो ब्रह्मा दरशपितायी॥
शून्य ध्यानयुग चार गमावा । पिता दरश अजहुँ नहि पावा॥
ब्रह्मा के लिये अथाकी चिन्ता
ब्रह्मा तात दरश नहि पाई । शून्य ध्यान महाँ जुग बहु जाई॥
माता चिन्ता करत मनमाहाँ । जेठ पुत्र ब्रह्मा रह काहाँ ॥
किहि विधिरचना रचहुँ बनाई । ब्रह्मा आवै कौन उपाई ॥
गायत्री उत्पत्ति
उबटि शरीर मैल (न) गहिकाढी । पुत्री रूप कीन्ह रचिठाढी ॥
शक्ति अंशनिज ताहि मिलावा । नाम गायत्री ताहि धरावा ॥
गायत्री मातहि सिर नावा । चरणचूमिनिज सीस चढ़ावा ॥
गायत्री वचन अध्यामति
गायत्री विनवै कर जोरी । सुनु जननी यक विनती मोरी ॥
कौन काज मोहँ निरमाई । कहो वचन लेऊँ सीस चढ़ाई ॥
अद्यावचन गायत्री प्रति
कहे अद्या पुत्री सुनु वाता । ब्रह्मा आहि जेठहि तुव भ्राता ॥
पिता दरश कहँ गयो अकाशा । आनौ ताहि वचन प्रकाशा ॥
दरश तातकर वह नहि पावे । खोजत खोजत जन्म गमावे ॥
जौने विधिते इहँवा आई । करो जाय तुम तीन उपाई ॥
गायत्रीका ब्रह्मा के खोजमें जाना । कबीर वचन धर्मदास प्रति
चलि गायत्री मारग आई । जननी वचन प्रीति चितलाई ॥
चलत भई मारग सुकुमारी । जननी वचन ध्यान उर धारी ॥
छन्द
जाय देखो चतुरमुख कहँ, नाहि पलक उधारई ॥
कछुक दिन सो रही तहवों, बहरि युक्ति विचारई ॥
कौन विधि यह जागि है, अब करौँ कौन उपायहो ॥
मन गुनित सो चबहुत विधि, ध्यान जननी लायहो र४॥
ब्रह्माको जगानेके लिये अद्याका गायत्रीको युक्ति बताना
( ३४ )
अनुरागसागर
ब्रह्माको जगानेके लिये अधाका गायत्रीको युक्ति बताना
सो०-अद्या आयसु पाइ, गायत्री तब ध्यान महँ ॥
निज कर परसेउ जाय,ब्रह्मा तबहीं जागिहै ॥२४॥
गायत्री पुनि कीन्ह तैसी । माता युक्ति बताई जैसी ॥
गायत्री तब चित्त लगाई । चरणकमल कहँ परसेउ जाई॥
ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर क्रोध करना
ब्रह्मा जाग ध्यान मन डोला ॥ व्याकुल भयो वचन तब बोला ॥
कवन अहै पापिन अपराधी । कहा छुड़ायहु मोरि समाधी ॥
शाप देहुँ तोकहँ मैं जानी । पिताध्यानमोहिखण्डचोआनी
गायत्री वचन ब्रह्माप्रति
कहि गायत्री मोहिन पापा । बृक्षि लेहु तब देहहु शापा ॥
कहाँ तोहिसो सांची बाता । तोहि लेन पठयी तुव माता ॥
चलहु वेगि जननिलावहुबारे । तुम विन रचना को विस्तारे ॥
ब्रह्मावचन गायत्रीप्रति
ब्रह्मा कहे कौन विधि जाऊँ । पितादरश अजहुँ नहि पाऊँ ॥
गायत्रीवचन ब्रह्माप्रति
गायत्री कह दरशन पैहो । बेगि चलहु नहि तो पछते हो ॥
ब्रह्माका गायत्रीको साक्षी देनेको कहना और गायत्रीका
ब्रह्मासे रति करनेकी बात कहना
ब्रह्मा कहै देहु तुम साखी । परस्यो सीस देख मैं आंखी ॥
ऐसे कहो मातु समुझायी । तोतुम्हरे सङ्ग हम चलिजायी ॥
गायत्रीवचन ब्रह्माप्रति
कह गायत्री सुन श्रुति धारी । हम नहीं मिथ्या बचन उचारी ॥
जो मम स्वारथ पुरवहु भाई । तो हम मिथ्या कहब बनाई ॥
ब्रह्मावचन गायत्रीप्रति
कह ब्रह्मा नहि लखी कहानी । कहौँ बुँझाय प्रगटकी बानी ॥
सावित्री उत्पत्तिकी कथा
अनुरागसागर
( ३५ )
गायत्री वचन
कह गायत्री देहु रति मोही । तो कह झूठ जित्ताऊं तोही ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
गायत्री कहै है यह स्वारथ । जानि कहौं मैं पुन परमारथ ॥
सुनि ब्रह्मा चित करे विचारा । अबका यत्न करहुँ इहिवारा ॥
छन्द
जो विमुख या कह करौं अब तो नहीं बन आवई ॥
साखि तो यह देय नहीं जननि मोहि लजावई ॥
यहाँ नाहि पिता पायो भयो न एको काज हो ॥
पाप सोचत नहि बने अब करौं रतिविधि साजहो २५
सो०-कियो भोगरतिरंग, विसरन्यो सो मनदर्शका
दोउ कहैं बढयो उमंग, छलमति बुद्धिप्रकाशकिले २६ ॥
सावित्री उत्पत्तिकी कथा
कह ब्रह्मा चल जननी पास । तब गायत्री वचन प्रकाशा ॥
औरो करौ युक्ति इक ठानी । दूसरी साखि लेहु उत्पानी ॥
ब्रह्मा कहे भली है बाता । करहु सोई जेहि मानै माता ॥
तब गायत्री यतन विचारा । देहि मैल गहि कीन्ह नियारा ॥
कन्यारचि निज अंशमिलावा । नाम सावित्री तासु धरावा ॥
गायत्री तिहि कह समुझावा । कहियो दरशब्रह्म पितु पावा ॥
कह सावित्रीहम नहि जानी । झूठ साखि दे आपनि दानी ॥
यह सुनिदोउकहैंचिन्ता व्यापा । यह तौ भयो कठिन संतापा ॥
गायत्री बहु विधि समुझाई । सावित्री के मन नहि आयी ॥
पुनि गायत्री कहा बुझाई । तब सावित्री वचन सुनाई ॥
ब्रह्मा कर मोसों रति साजा । तो मैं झूठ कहौं यहि काजा ॥
गायत्री ब्रह्महि समुझावा । दै रति या कहैं काज बनावा ॥
ब्रह्मा रति सावित्रीहि दीन्हा । पापमोट आपन शिर लीन्हा ॥
ब्रह्माका गायत्री और सावित्रीके साथ माताके पास पहुँचना और सबका शाप पाना
( ३६ )
अनुरागसागर
सावित्री कस दूसर नाऊं । कहि पुहुपावति वचन सुनाऊं॥
तीनों मिलिके चलि भे तहवां । कन्या आदिकुमारी जहवां ॥
ब्रह्माका गायत्री और सावित्री के साथ माताके पास पहुँचना
और सबका शाप पाना
करि प्रणाम सन्मुख रहे जाईं । माता सब पूछी कुशलार्ह ॥
अद्यावचन ब्रह्माप्रति
कह ब्रह्मा पितु दर्शन पाये । दूसरि नारि कहाँसे लाये ॥
ब्रह्मावचन
कह ब्रह्मा दोऊ हैं साखी । परस्यो सीस देव इन आंखी॥
अद्यावचन गायत्रीप्रति
तब माता बूझे अनुसारी । कहु गायत्री वचन विचारी॥
तुम देखा इन दर्शन पावा । कहा सत्य दर्शन परभावा ॥
गायत्रीवचन
तब गायत्री वचन सुनावा । ब्रह्मा दर्श सीस पितु पावा ॥
मैं देखा इन परसेउ शीशा । ब्रह्महि मिले देव जगदीशा ॥
छन्द
लेह पुहुप परसेउ शीशपितु इन दृढमें देखत रही॥
जल दार पुहुप चढ़ाय दीन्ह हे जननि यह है सही ॥
पुहुपते पुहुपावती भयी प्रगट ताही ठामते ॥
इनहु दर्शन लह्यो पितुको पूछहु इहि वामते ॥२६॥
हे जननी यह है सही तुम पूछि लो पुहुपावती ॥
सबही सांच मैं तोसों कहूँ नहीं झूठहै एको रती ॥
अद्यावचन पुहुपावतीप्रति
माता कह पुहुपावतीसी कहो सत्य हि मो सना ॥
जो चढ़े सीसाहि पिताके तुम वचन बोलहु ततखना॥
१ यह छन्द पुरानी प्रतियोंमें नहीं है
अद्याका ब्रह्माको शाप देना
अनुरागसागर
( ३७ )
सो०-कहु पुहुपावति मोहि, दरश कथानिरवारके।
यह मैं पूछों तोहि, किम ब्रह्मादरशन किये॥२७॥
सावित्री वचन
पुहुपावंती वचन तब बोली । मातासत्य वचन नहीं डोली॥
दर्शन सीस लह्यो चतुरानन । चढ़े सीसयह धर निश्चय मन॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति
साख सुनत अद्या अकुलानी । भा अचरज यह मर्म न जानी॥
अद्याकी चिंता
अलखनिरंजन अस प्रण भार्खी । मोकहैं कोउ न देखै आंखी ॥
ये तीनहुँ कस कहहिँ लबारी । अलखनिरंजन कहहु सम्हारी॥
ध्यान कीन्ह अछुंगी तिहि क्षण । ध्यानमहिँ अस कहा निरंजन ॥
निरंजन वचन
ब्रह्मा मोर दरश नहि पाया । झूठिसाखिइन आन दिवाया॥
तीनों मिथ्या कहा बनाई । जनि मानहु यह है लबराई॥
अद्याका ब्रह्माको शाप देना
यह सुनि माता कीन्हे दापा । ब्रह्मा कहैं तब दीन्हो शापा ॥
पूजा तोरि करै कोई नाहीं । जो मिथ्या बोलेउ मनमाहीं ॥
इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा । नरक मोट अपने शिर लीन्हा॥
आगे है जो शाख तुम्हारी । मिथ्या पाप करहिँ बहुभारी॥
प्रगट करहिँ बहु नेम अपारा । अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥
विष्णु भक्तोंसे करहिँ हँकारा । तांते परिहैं नरक मँझारा ॥
कथा पुराण औरहिँ समुझे हैं । चाल बिहून आपन दुख पैहैं ॥
१ पुराने ग्रन्थोंमें यह चौपाई इस प्रकार है—
सावित्री अस वचन उचारी । मानो निश्चय वचन हमारी
नं. २ कबीरसागर ३
अद्याका गायत्री को शाप देना
( ३८ )
अनुरागसागर
उनसे और सुनैँ जो ज्ञाना । करिसो भक्ति कहाँ परमाना॥
और देवको अंश लखैहैं । औरन निन्द काल मुख जेहै॥
देवन पूजा बहु विधि लैहैं । दछिना कारण गला कटै हैं॥
जा कहा शिष्य करै पुनि जाई । परमारथ तिहि नहिं लखायी॥
परमारथके निकट न जेहैं । स्वारथ अर्थ सबै समुझैहैं॥
आप स्वारथी ज्ञान सुनैहैं । आपनि पूजा जगत दृढ़ै हैं॥
आप ऊंच औरहि कहै छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होइ खोटा ॥
कबीर वचन धर्मदासप्रति
जब माता अस कीन्ह प्रहारा । ब्रह्मा मूर्छित महीकर धारा ॥
अद्याकागायत्रीको शाप देना
गायत्री जान्यो तेहि वारा । हुए है तोर पंच भरतारा ॥
गायत्री तोर होई वृषभ भर्तारि । सांत पांच और बहुत पसारि॥
धर औतार अखज तुम खायी । कहा जानियह दीन्ही सारखी॥
निजस्वारथ तुम मिथ्या भारी । कहा जानियह दीन्ही सारखी॥
मानि शाप गायत्री लीन्ही । सावित्रिहि तबचितवन कीन्ही॥
अद्याका सावित्री को शाप देना
पुढुपावति निजमान धरायेहु । मिथ्या कहनिजजन्मनशायेहु॥
सुनहुपुष्पावतितुम्हरोविश्वासा । नहिं पूजिहैं तुम्हसे कछु आशा॥
होय कुगंध ठौर तव बासा । भुगतहु नरक कामगहि आशा॥
जो तोहि सींच लगावे जानी । ताकर होय वंशकी हानी ॥
अब तुम जाय धरौ औतारा । कयोडा केतकी नाम तुम्हारा॥
कबीर वचन धर्मदासप्रति छन्द
भये शापवश तीनों विकलमति, हीनछीन कुकर्मते॥
यह काल कलाप्रचंडकामिनि, डस्यो सब कहैं चर्मते ॥
शाप देने पर अद्याका पश्चात्ताप और निरंजनके डरसे डरना और शाप पाना, निडर होना
अवुरागसागर
( ३९ )
ब्रह्मादि शिवसनकादिनारदको उन बचि भागहो ॥
सुनुधरमनिविरलाबच शब्द सतसो लागि हो ॥२८॥
सो-० सत्य शब्द परताप, कालकला व्यापै नहीं ॥
निकट न आवै पाप, मनवच कर्म जो पदगहे ॥२९॥
शाप देदेने पर अधाका पश्चाताप और निरंजनके डरसे डरना । छन्द
शाप तीनोंको दैलियो मन माहीं तब पछतावई ॥
कस करहि मोहि निरंजनापल छमा मोहि नआवई ॥
निरंजनका अधाको शाप देना
आकाशबानी तबै भयी यहू काह कीन भवानिया ॥
उत्पत्तिकारणतोहिपठाई कहा चरित यह ठानिया ॥
सो-० नीचहि ऊच सिताय, बदल मोहि सोपावई ॥
द्वापर युग जब आय तुमहिं पञ्च भर्तार हो ॥३०॥
अधाका निडर होना । कबीर वचन धर्मदासप्रति
शाप ओयल जब सुनेउ भवानी । मनसन गुने कहा नहि बानी ॥
ओयल प्रभाव शाप हम पाया । अब कहा करब निरंजनराया ॥
तोरे वस परी हम आई । जस चाहौ तस करौ मितार्ई ॥
विष्णुका गौरसे श्याम होने का कारण अधावचन विष्णुप्रति
पुनि कहि माता विष्णु दुलारा । सुनहु पुत्र इकवचन हमारा ॥
सत्य सत्य तुम कहौ बुझाई । पितुपद परसन जब गै भाई ॥
प्रथमहु तो तुम गौर शरीरा । कारण कौन श्याम भये धीरा ॥
विष्णुवचन अधा प्रति
आज्ञा पाय हम तत्काला । पितुपद परसन चले पताला ॥
अक्षत पुहुप लीन्ह करमाहां । चले पताल पंथ मग जाहां ॥
पहुँचि शेष नाग पहुँ गयऊ । विषके तेज हम अलसयऊ ॥
अद्याका विष्णुकी ज्योतिका दर्शन करना
( ४० )
अनुरागसागर
भयो श्याम विषतेज समावा । भइ अवाज अस वचन सुनावा ॥
अहो विष्णु माता पहुँ जाई । वचन सत्य कहियो समुझाई ॥
सतयुग त्रेता जैसे जबही । द्वापर है चौथा पद तबही ॥
तब तुम होहु कृष्ण अवतारा । लैहौ ओयलसो कही विचारा ॥
नाथ हु नाग कलिन्दी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥
ऊंच होइके नीच सतावे । ताकर ओयल मोहिसो पावे ॥
जो जिव देई पीर पुनि काहू । हम पुनि ओयल दिखावे ताहू ॥
पहुँचे हम तब ही तुव पास । कीन्हैउ सत्य बचन परकाशा ॥
भेटउ नाहि मोहि पद ताता । विषज्वाला साँवल भो गाता ॥
व्याकुल भयो तवै फिर आयो । पितु पद दर्शन मैं नहि पायो ॥
अवाका विष्णुको ज्योतिका दर्शन कराना
इतना सुनि हर्षित भइ माई । लीन्ह विष्णु कहैं गोद उठाई ॥
पुनि अस कहेउ आदि भवानी । अब सुनहु पुत्रप्रियममबानी ॥
देख पुत्र तोहि पिता भिटावों । तोरे मन कर धोख मिटावों ॥
प्रथमहि ज्ञान दृष्टिसों देखो । मोर वचन निजहृदय परेखो ॥
मनस्वरूप करता कहैं जानो । मनते दूजा और न मानो ॥
स्वर्ग पताल दौर मन केरा । मन अस्थिर मन अहै अनेरा ॥
क्षणमहैं कला अनन्त दिखावे । मनकहैं देख कोइ नहि पावे ॥
निराकार मनहीको कहिये । मनकी आशा दिवस निशि रहिये ॥
देखहु पलटि शून्यमह जोती । जहवां झिलमिलझालर होती ॥
फेरहु श्वास गगन कह धायो । मार्ग अकाशहि ध्यान लगायो ॥
जैसे माता कहि समुझावा । तैसे विष्णु ध्यान मन लावा ॥
छन्द
पेठि गुंफा ध्यान कीन्हो श्वास संयम लायके ॥
पवन धूँका दियो जबते गगन गरज्यो आयके ॥
ज्योतिदर्शन रहस्य
अवुरागसागर
( ४१ )
बाजासुनततबमगनभापुनिकीन्हमनकसख्यालहो ॥
शून्यस्वेतपीतसब्जलालदियायरंगजगालहो ॥३०॥
सो०-ताहपीछे धर्मदास, मनपनि आपदिखायल ॥
कीन्ह ज्योति परकास, देखि विष्णु हरित भये३०॥
मातहि नायो शीश, बहु अधीन पुनि विष्णुभा ॥
मैं देखा जगदीश, हे जननी परसाद तुव ॥ ३१ ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास गहि टेके पाया । हे साहिबइकसंशय आया ॥
कन्या मनको ध्यान बतावा । सो यह सकल जीव भरमावा॥
सदगुरु वचन
धर्मदास यह काल स्वभाऊ । पुरुष भेद विष्णु नहीं पाऊ ॥
कामिनिकी यह देखहु बाजी । अमृतगोय दियो विष साजी ॥
जात काल दूजा जनिजानहु । निरखि धर्म सत्यहिं पुरआनहु ॥
प्रगट सु तोहि कहो ससुझाई । धर्मदास परखहु चितलाई ॥
जब परगट तस गुप्त सुभाऊ । जोरह हृदय सो बाहर आऊ ॥
जब दीपक बारे नर लोई । देखहु ज्योति सुभाव विलोई ॥
देखत ज्योति पतंग हुलासा । प्रीति जान आवै तिहिपासा ॥
परसत होवे भसम पतंगा । अनजाने जरि परहि मतंगा ॥
ज्योतिस्वरूपकाल अस आही । कठिनकाल यह छांडत नाही ॥
कोटि विष्णु औतारहि खाया । ब्रह्मा रुद्रहि खाय नचाया ॥
कौन विपति जीवनकी कहऊँ । परखि वचन निज सहजहि रहऊँ ॥
लाख जीव वह नित्यहि खाई । असविकरालसोकालकसाई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कह सुनहुँ गुसाई । मोरे चित संशय असआई ॥
अष्टंगीहि पुरुष उत्पानी । जिहिविधि उपजी सो मैं जानी ॥
मायाका विष्णुको सर्व प्रथम बनाना
( ४२ )
अनुरागसागर
पुनि वहि मास लीन्ह धमराई । पुरुष प्रताप सु बाहर आई ॥
सो अछंगीहि असछल कीन्ह । गोइसि पुरुष प्रगटयम कीन्ह ॥
पुरुष भेद नहि सुनन बतावा । कालनिरञ्जन ध्यान करावा ॥
यह कस चरित कीन्ह अछंगी । ताजा पुरुष भइकाल किसंगी ॥
सद्गुरु वचन
धर्म सुनहु जन नारि सुभाऊ । अब तुहि प्रगटवरणिसमझाऊ ॥
होय पुत्री जेहि घर माहीं । अनेक जतन परितोषै ताहीं ॥
वन्न भक्ष सुख सेज निवासा । घरबाहर सब तिहि विश्वासा ॥
यज्ञ कराय देय पितु माता । बिदाकीन्हहितप्रीतिसों ताता ॥
गयी सुता जब स्वामी गेहा । रात्या तासु संग गुण नेहा ॥
माता पिता सबै बिसरावा । धर्मदास अस नारि स्वभावा ॥
ताते अद्या भई बिगानी । काल अंग है रही भवानी ॥
ताते पुरुष प्रगटने लायी । कालरूप विष्णुहि दिखलायी ॥
धर्मदासवचन कबीर प्रति
हे साहब यह जान्यो भेदा । अब आगेका करहु उछेदा ॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति
पुनि माता कहि विष्णु दुलारा । मरद्यो मान जेठ निजबारा ॥
अहो विष्णु तुम लेहु अशीशा । सब देवनमें तुमहीं ईशा ॥
जो इच्छा तुम चितमें धरिहौं । सो तब तोर काज मैं करिहौं ॥
मायाका विष्णुको सर्वप्रधान बनाना
प्रथम पुत्रब्रह्म दुरि गयऊ । अकरमझूठिताहि प्रिय भयऊ ॥
देवन श्रेष्ठ तुमहि कहैं मातहि । तुम्हारी पूजा सब कोई ठानहि ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
कृपा वचन अस माते भाखा । सबते श्रेष्ठ विणुकह राखा ॥
माता गयी रुद्रके पास । देख रुद्र अति भये हुलासा ॥
अद्याका महेशको वरदान देना
अनुरागसागर
( ४३ )
अद्याका महेशकी बरदान देना
पुनि लहुरा कहैं पूछे माता । तुम शिव कहो हृदयकी वाता ॥
माँगहु जो तुम्हरे चित भावे । सो तोहि देख माता फुरमावे ॥
दोउ पुत्रन कहैं मात हदावा । माँग महेश जो मनभावा ॥
महेशवचन
जोरि पानि शिवकहबे लीन्हा । देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥
कबहिं न विनसे मेरी देही । हे माता मागों वर एही ॥
हे जननी यह कीजै दया । कबहु न विनशै मेरी काया ॥
अद्यावचन
कह अछंगी अस नहीं होई । दूसरा अमर भयो नहिंकोई ॥
करहु योग तप पवन सनेहा । रहै चार युग तुम्हरी देहा ॥
जौलौं पृथ्वी अकाश सनेही । कबहु न विनशै तुम्हरी देही ॥
धर्मदासवचन
धर्मदास विनती चित लाई । ज्ञानि मोहि कहो समुझाई ॥
यह तो सकल भेद हम पायी । अब ब्रह्माको कहो उथायी ॥
अद्या शाप ताहि कहैं दीन्हा । तेहि पीछे ब्रह्मा कस कीन्हा ॥
कबीर वचन
विष्णु महेश जबै वर पाये । भये आनन्द अतिहि हरषाये ॥
दोनो जने हरष मन कीन्हा । ब्रह्मा भयो मान मद हीना ॥
धर्मदास मैं सब कुछ जानों । भिन्न भिन्न कर प्रगट बखानों ॥
शाप पानेके कारण दुःखित हो ब्रह्मा विष्णुके पास जाकर
अपना दुःख कहना और विष्णुका उसे आश्वासन देना
ब्रह्मा मनमें भयो उदासा । तब चलि गयो विष्णुके पास ॥
ब्रह्मावचन विष्णुप्रति
जाय विष्णुसे बिन्ती ठाना । तुम हो बंधु देव परधाना ॥
तुम पर माता भई दयाला । शाप विवश तुम भये बिहाला ॥
( ४४ )
अनुरागसागर
निज करनी बल पायेहो भाई । किहि विधि दोष लगाऊँ माई ॥
अब अस जतन करोहो भ्राता । चले परिवारे वचन रहै माता ॥
विष्णुवचन
कहे विष्णु छोड़ो मन भंगा । मैं करिहौं सेवकाई संगा ॥
तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संशय सब देहु बहाई ॥
जो कोइ होवे भक्त हमारा । सो सेवै तुम्हारो परिवारा ॥
छन्द
जगमाहि एस दिढाई हौं फलपुन्य आशा जोयहो ॥
यज्ञ धर्म रु करे पूजा द्विज बिना नहिं होय हो ॥
जो करे सेवा द्विजनकी तेहि महापुण्य प्रभावहो ॥
सो जीवमोकहै अधिकप्यारेराखिहौं निज ठाँवहो ॥ ३१
कबीरवचन धर्मदासप्रति
सो ०-ब्रह्मा भये अनंद, जबहि विष्णु असमापेऊ ॥
मेटेउ चितकर दंड, सखा मोर सब सुखीभी ॥ ३२ ॥
कालप्रपंच
देखहु धर्मनि काल पसारा । इन ठग ठग्यो सकल संसारा ॥
आशा दै जीवन बिलपावै । जन्म जन्म पुनि ताहि सतावै ॥
बलि हरिचंद बेतु बइरोचन । कुंती सुत औरौ महिसोचन ॥
ये सब त्यागी दानि नरेशा । इन कहैं ले राखे केहि देशा ॥
जस गंजत इन सबकी कीन्ह। सो जग जानेकाल अधीना ॥
जानत है जग होय न शुद्धी । कालअमरबलसबकी हरबुद्धी ॥
मन तरंगमें जीव भुलाना । निजघर उलटिनचीन्ह अजाना ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कह सुनो गुसाई । तबकी कथा मोहि समुझाई ॥
तुम प्रसाद जमको छल चीन्हा । निश्चय तुम्हरे पदचित दीन्ह ॥
गायत्रीका अद्याको शाप देना
अनुरागसागर
( ४६ )
भव बूझत तुमसी गहि राखा । शब्द सुधारस मोसन भाखा ॥
अब वह कथा कहो समुझाई । शाप अंत किया कौन उपाई ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति गायत्रीके अक्षाको शाप देनेका वृत्तान्त
धर्मनि तुम सन कहो बखानी । भाषो ज्ञान अगमकी बानी ॥
मातु शाप गायत्री लीन्हा । उलटि शाप पुनिमातहिंदीन्हा
हम जो पांच पुरुषकी जोई । पांचोंकी तुम माता होई ॥
बिना पुरुषकी तू जिनि है बारा । सो जानही सकल संसारा ॥
दुहुनु शाप फल पायो भाई । उगरह भयो देह धरि आई ॥
जगतकी रचनाका विशेष वृत्तान्त
यह सब द्रंद बाद है गयऊ । तब पुनि जगकी रचना भयऊ
चौरासी लख योनिन भाऊ । चार खानि चारिहु निरमाऊ ॥
छन्द
प्रथम अंडजरच्यो जननी, चतुरमुखपिण्डजकियो ॥
विष्णु उष्मज रच्यो तबहीं, रुद्र स्थावर लियो ॥
लीन्ह रचि जेहि खानि चारों, जीव बंधनदीन्हहो ॥
होन लागी कृषीकारण, करण कर्ता चीन्हहो ॥
सो०—यहि विधि चारो खानि, चारहु दिशि विस्तार किया
धर्मदास चित जान, वाणी चारि उचारको ॥३३॥
धर्मदास वचन कबीरप्रति
धर्मनि कहैं जोरि युग पानी । तुम सद्गुरु यह कहो बखानी ॥
चार खानिकी उत्पति भाऊ । भिन्न भिन्न मुहि वरणि सुनाऊ ॥
चौरासी लख योनिन धारा । कौन योनि केतिक विस्तारा ॥
चार खानकी गिनती । कबीरवचन धर्मदास प्रति
कह कबीर सुन धर्मनि बानी । योनि भावतोहि कही बखानी ॥
भिन्न भिन्न सब कहु समुझाऊं । तुमसे अन्त न कछु दुराऊं ॥
तुम जिन शंका मानहु भाई । वचन हमार गहो चितलाई ॥
चौरासी लाख योनिकी गिनती
( ४६ )
अनुरागसागर
चौरासी लाख योनिकी गिनती
नौ लख जलके जीव बखानी । चौदह लाख पक्षी परवानी ॥
किरम कोट सत्ताइस लाख । तीन लाख अस्थावर भाखा ॥
चतुर लक्ष मानुष परमाना । मानुष देह परम पद जाना ॥
और योनि परिचय नहीं पावे । कर्म बंध भव भटका खावे ॥
मनुष्य खानि सवते अधिक क्यों है ? धर्मदासवचन
धर्मदास नायो पद शीशा । यह समुझाय कहो जगदीशा ॥
सकल योनि जिव एकसमाना । किमिकारण नहीं इसमझाना ॥
सो चरित्र मुनि कहौ बुझाई । जाते चित संशय मिटिजाई ॥
सद्गुरुवचन
सुनु धर्मनि निज अंश अभूषण । तोहि बुझाय कहौ यह दूषण ॥
चार खानि जिव एकै आहीं । तत्त्व विशेष अहैं सुन ताहीं ॥
सो अब तुमसों कहों बखानी । तत्त्व विशेष अहैं सुन ताहीं ॥
ऊष्मज दोय तत्त्व परमाना । अंडज तीन तत्त्व गुण जाना ॥
पिण्डज चार तत्त्व गुण कहिये । पांच तत्त्व मानुष तन लहिये ॥
तासों होय ज्ञान अधिकारी । नरकी देह भक्ति अनुसारी ॥
किन २ खानिमें कौन २ तत्त्व है । धर्मदासवचन कबीरप्रति
हे साहिब मुहि कहु समुझाई । कौन कौन तत्त्व इन सब पाई ॥
अंडज अरु पिंडजके संग । ऊष्मज और अस्थावर अंगा ॥
सो साहिब मोहि वरणि सुनाओ । करो दया जनि मोहि दुराओ ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति छन्द
सतगुरु कहैं सुन दास, धर्मनि तत्त्व खानिनिवेरनो ॥
जाहि खानि जो तत्त्व दीन्हौ, कहौ तुमसो टेरनो ॥
१ इस पदको कई प्रतियोंमें लिखा है ।
सकल जिवन जिव एक समाना । नर सब औरनको नहीं जाना
सब मनुष्योंका ज्ञान एक समान क्यों नहीं है ?
अवुरागसागर
( ४७ )
खनिअण्डज तीन तत्त्व हैं, आप वायु अरु तेजहो॥
अचल खानी एकतत्त्वहि, तत्त्वजलका थेंगहो३३॥
सो०-ऊष्मज तत हैं द्योय, वायु तेज समजानिये॥
पिंडज चारहिं सोयं,पृथ्वी तेहि अपवायुसम ॥३४॥
पिंडज नर परधान, पांच तत्त्वतेज संग है ॥
कहे कबीर परमान, धरमदास लेहुपरखिके ॥३५॥
पिंडज नरकी देह सँवारा । तामें पांच तत्त्व विस्तारा ॥
ताते ज्ञान होय अधिकाई । गहै नाम सत लोकहिं जाई॥
सब मनुष्योंका ज्ञान एक समान क्यों नहीं ? धर्मदास वचन
धर्मदास कह सुनु बन्दी छोरा । इक संशय मेटो प्रभु मेरा ॥
सब नर नारि तत्त्व सम आहीं। इक सम ज्ञान सबनको नाहीं॥
दया शील संतोष क्षमा गुनन । कोई शून्य कोइ होय सम्पूर्णन॥
कोई मनुष्य होय अपराधी । कोई शीलतलकोई कालउपाधी॥
कोई मारि तन करे अहारा । कोई जीव दया उर धारा ॥
कोई ज्ञान सुनत सुख माने । कोई काल गुणवाद बखाने ॥
नाना गुण किहि कारण होई । साहिब बरणि सुनावो सोई ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
धर्मदास परखो चित लाई । नरनारी गुण कहूँ बुझाई ॥
जानते नर है ज्ञानी अज्ञानी । सो सब तोहि कहों सहिदानी॥
नाहर सर्प औ स्वान सियारा । काग गिद्ध सूकर मंजारा ॥
और अनेकजो इन अचखानी । खाहि अखजअधमगुणजानी ॥
इन जो इतने जे जिव आवा । नरकी जोन जन्म जिन पावा॥
पीछे जो इन सुभावन छूटे । कर्म प्रधान महापुन छूटे ॥
ताते सब चले कागके लेखे । नरकी देह परगट तेहि देखे ॥
योनिप्रभाव मेटनेका उपाय
( ४८ )
अनुरागसागर
जिहि जो इतने जो नर आज । ताको तैसो आहि सुभाऊ ॥
अघकरमी घातक विष पूजा । जो इन प्रभाव होय नहि दूजा ॥
योनिप्रभाव मेटनेका
सतगुरु मिले तो ज्ञान लखावै । काग दशा तव सब बिसरावै ॥
मुरचा जो इन छूटे तब भाई । ज्ञान मसकला फिरे बनाई ॥
जब धोबी वस्तर कहैं धोवे । जससाबुन मिल उज्वल होवे ॥
थोर मैल कर वस्तर भाही । थोड़े परिश्रम मैल नसाई ॥
निपट मलिनजे वस्तर आही । ता कहैं अधिक अधिक श्रम चाही
जैसे मैल वस्तर कर भाऊ । ऐसे जीवन करे सुभाऊ ॥
कोइ कोइ जो अंकुर होई । स्वरूप ज्ञान सो गहे विलोई ॥
धर्मदास वचन
यह तो स्वरूप जोनि करलेखा । खानि भाव अब कहूँ विशेषा ॥
चारि खानिको जिव है जोई । मनुष्य खानमहँ आवे सोई ॥
ताकर लच्छन मोहि बताओ । विलग विलग करि मुहिस मझाओ
जेहि परखी सुहहिं महँ चेतू । कर अब साहब यहि बड़ हेतू ॥
चारि खानिके लक्षणोंकी पारख । कबीर वचन
धर्मदास परखहु चित लायी । चारि खानि गुण कहूँ समुझायी ॥
चारों खानि जीव भरमाया । तब ले नरकी देह धराया ॥
देह धरे छोड़े जस खाना । तैसे ता कहैं ज्ञान बखाना ॥
लच्छन औ अपलच्छन भेदा । सो सब तुमसौ कहौ निषेदा ॥
अण्डजखानसे मसुष्यदेहमें आये हुए जीवकी पारख
प्रथम कहौ अण्डजकी बानी । एकहि एक कहौ बिलछानी ॥
आलस निद्रा जा कहैं होई । काम क्रोध दारिद्री सोई ॥
चोरी चंचल अधिक सुहाई । तृष्णा माया अधिक बढ़ाई ॥
चोरी बुगुली निन्द्रा भावे । घर बनझाड़ी अगिन लगावे ॥
रोवे कूंदे मंगल गावे । भूत प्रेत सेवा मन भावे ॥
अण्डजखानिसे मनुष्यदेहमें आये हुए जीवकी पारख
अनुरागसागर
( ४९ )
देखत देत और पुनि काहू । मन मन झंखे बहु पछताहू ॥
वाद विवाद सबसों ठाने । ज्ञान ध्यान कछु मनहिं न आने ॥
गुरुसतगुरु चीन्हें नहिं भाई । वेद शास्त्र सब देइ उठाई ॥
आपन नीच ऊंच मन होई । हमसमसरि दूसर ना कोई ॥
मैले बस्तर नहीं नहाई । आंख कीन सुख लार बहाई ॥
पांसा जुवा चित्त मन आने । गुरुचरणननिशिदिननिहिजाने ॥
कुवरा मूड़ ताहिका होई । लंबा होय पाव पुनि सोई ॥
ॐ
यहि भांतिलक्षणमें कहा, तुम सुनहु धर्मनि नागरू ॥
अंडज खानिन गोयराखा, कह्यो भेद उजागरू ॥
यह खानि वर्णन कहौ तौसों, कछु नाहि छिपायऊ ॥
सोसमुझावानीजीवथिरकै, धोखसकलमिटायऊ ३४
उष्मज खानिसे मनुष्य देहमें आये हुये जीवनकी पारख
सोरठा-टूजीखानि बताय, ताहि लक्ष तौसों कहो ॥
उष्मजते जिय आय, नर देही जिन पाइय ॥ ३६ ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । उषमज भेद कहौ परगासा ॥
जाइ शिकार जीव बहु मारे । बहुतसे आनन्द होयतेहि वारे ॥
मारि जीव जब घर कहैं आयी । बहुविधि रांध ताहि कहैं खाई ॥
निन्दे नाम ज्ञान कह भाई । गुरु कहैं मेठि करे अधिकाई ॥
निन्दे शब्द और गुरु देवा । निन्दे चौका नरियर भेवा ॥
बहुत बात बहुतेनरि आयी । कथे ज्ञान बहुते ससुझायी ॥
झूठे वचन सभामें कहई । टेढ़ी पाग छोर उरमहई ॥
दया धरम मनहीं नहिं आवे । करें पुन्य तेहि हांसी लावे ॥
माल तिलक अरु चन्दन करई । हाट बजार चिकन पटफिरई ॥
स्थावर खानिसे मनुष्य शरीरमें आये हुए जीवकी पारख
( ५० )
अनुरागसागर
अन्तर पापी ऊपर दाय। सो जिव यमके हाथ विकाया॥
लंब दांत अरु वदन भयावन । पीरे नेत्र ऊँच अति पावन ॥
छन्द
कहे सतगुरु सुनहु धर्मनि, भेद भल तुम पाइया ॥
सतगुरु विना नहि भेद पावे, भली विधितो हिंदर साइया
भैंटिया तुम मोहिको, कछु नाहिं तोहिं दुराइहौं ॥
जो बृझिहो तुम मोहिसो, सकल भेद बताइहौं ॥३५॥
स्थावर खानिसे मनुष्य शरीरमें आये हुए जीवनकी पारख
सो०-तीजी खानि सुभाव अचल खानि जेहि कहत
नरदेही तिन पाव, ताकर लक्षण अब बताइहौं ॥३७॥
अचल खानिको कहो सँदेसा । देह धरे जस होवैं भेसा ॥
छनिक बुद्धि होवे जिव केरी । पलटत बुद्धि न लागे बेरी ॥
झाड़ा फेटा सिर पर पागा । राज द्वार सेवा भल लागा ॥
घोड़ा पर होवे असवारा । तीन खरग औ कमर कटारा ॥
इत उत चित सैन जो मरई । पर नारी करि सैन बुलवाई ॥
रससों बात कहैं मुख जानी । काम बान लागे उर आनी ॥
पर घर ताकइ चोरी जायी । पकर बांधि राजा पहँलायी ॥
हांसी करे सकल पुनि जगहूँ । लाज शर्म उपज नहिं तबहूँ ॥
छिन इक मन महाँ पूजा करई । छिन इक मन सेवा चित धरई ॥
छिन इक मन महाँ बिसरे देवा । छिन इक मन महाँ की जै सेवा ॥
छिन इक ज्ञानी पोथी बांचा । छिन इक माँहि सवन घर नाचा ॥
छिन इक मनमें सूर कहोई । छिन इकमें कादर हो सोई ॥
छिन इक मनमें साहु कहाई । छिन इक मनमें चारि लगाई ॥
छिन इक मनमें करे जु धर्मा । छिन इक मनमें करे अकर्मा ॥
पिंडज खानिसे मनुष्यशरीरमें आये हुए जीवकी पारख
अवुरागसागर
( ५१ )
भोजन करत साथ खजुआई । बाँह जाँघ पुनि मींजत भाई॥
भोजन करत सोय पुनि जाई । जो जगाय तिहि मारन धाई॥
आंख लाल होहि पुनि जाकी । कहैलंग भेद कहों मैं ताकी॥
छन्द
अचलखानीभेद धर्मनि, छिनक बुद्धि सो होयहो ॥
छिन माहिं करके मेट डारे, कहों तुमसों सोयहो॥
मिले सतगुरु सत्य जा कहैं, खान बुधिसबमेटही॥
गुरुचरणलीन अधीन होवै, लोकसोहैंसापैठही॥३६॥
पिंडज खानिसे मनुष्य गरीरमें आयै हुए जीवनकी पारख
सोरठा-सुनहु हो धरमदास, पिंडज लक्षणगुणकहो॥
कहों तुम्हारे पास चौथीखानिकी युक्तिसो ॥३७॥
पिंडज खानिके लच्छ सुनाऊँ । गुण अवगुणका भेद बताऊँ ॥
वैरागी उनमुनि मत धारी । करे धर्म पुनि वेद विचारी ॥
तीरथ औ पुनि योग समाधी । गुरुके चरणचित्तभलबाँधी ॥
वेद पुराण कथे बहु ज्ञाना । सभा बैठि बातें भल ठाना ॥
राजयोग कामिनी सुख माने । मनशंका कबहुँ नहिं आने ॥
धन संपति सुख बहुत सहायी । सेज सुपेद पलंग बिछायी ॥
उत्तम भोजन बहुत सुहायी । लौंग सुपारी बीसों खायी ॥
खरचे दाम पुन्य महाँ सोई । हिरदे सुधि ताकर पुनि होई॥
चच्छु तेज जाकर पुनि जानी । पराक्रम देही बल ठानी ॥
देखो स्वर्ग सदा तेहि हाथा । देखे प्रतिमा नावे माथा ॥
छन्द
बहुतलीन आधीन धर्मनि, ताहि जितकहैंजानिहो॥
सतगुरुचरणनिशिदिनगहे, मतशब्दनिश्चयमानिहो॥
मनुष्यशरीरसे मनुष्यदेहमें आनेवाले जीवकी पारख
( ५२ )
अनुरागसागर
एक एक बिलोय धर्मनि, कह्यो सत मैं तोहिसों ॥
चारखानी लक्ष भाषेउँ, सुनो आगे मोहिसों ॥३८॥
मनुष्य शरीरसे मनुष्यदेहमें आनेवाले जीवकी पारख
सोरठा-छूटे नरकी देह, जन्म धरे फिर आयके ॥
ताका कहौ सँदेह, धर्मदास सुनु कानदे ॥३९॥
धर्मदासवचन
हे स्वामी इक संशय आयी । सो पुनि मोहि कहो समझाई ॥
चौरासी योनिन भरमावे । तब मानुष की देही पावे ॥
यह विधि मोसन कह्यो बुझायी । अब कैसे यह संधि लखायी ॥
सो चरित्र गुरु मोहि लखाऊ । धर्मदास गहि ठके पाऊ ॥
मानुष जन्म धरे पुनि आयी । लक्षण तासु कहो समझायी ॥
कबीरवचन
धर्मदास तुम भलिविधि जानो । होय चरित सो भले बखानो ॥
आयु रहते भी मृत्यु होती है
आइ अछत जो नर मर जायी । जन्म धरे मानुषको आई ॥
जो पुनि मूरख ना पतियाई । दीपक बाती देख जराई ॥
बहुविधि तेल भरे पुनि ताही । लगै वायु तबै बुझ जाही ॥
अग्नि लायके ताहि लेसावे । यहिविधि जीवहु देह धरावे ॥
ताको लक्षण सुनहु सुजाना । तुमसों न गौय राखै ज्ञाना ॥
शूरा होवे नरके माहीं । भयउ डरताके निकट जाहीं ॥
माया मोह ममता नहि व्यापे । दुश्मन ताहि देखि डरकाँपे ॥
सत्य शब्द प्रतीति कर माने । निन्दा रूप न कबही जाने ॥
सतगुरु चरण सदा चितराखे । प्रेम प्रीतिसो दीनता भाखे ॥
ज्ञान अज्ञान होइ कहैं बूझे । सत्यनाम परिचय नित सूझे ॥
जो मानुष अस लक्षण होई । धर्मदास लिखि राखो सोई ॥