कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ब्रह्माको जगानेके लिये अद्याका गायत्रीको युक्ति बताना
( ३४ )
अनुरागसागर
ब्रह्माको जगानेके लिये अधाका गायत्रीको युक्ति बताना
सो०-अद्या आयसु पाइ, गायत्री तब ध्यान महँ ॥ निज कर परसेउ जाय,ब्रह्मा तबहीं जागिहै ॥२४॥ गायत्री पुनि कीन्ह तैसी । माता युक्ति बताई जैसी ॥ गायत्री तब चित्त लगाई । चरणकमल कहँ परसेउ जाई॥
ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर क्रोध करना
ब्रह्मा जाग ध्यान मन डोला ॥ व्याकुल भयो वचन तब बोला ॥ कवन अहै पापिन अपराधी । कहा छुड़ायहु मोरि समाधी ॥ शाप देहुँ तोकहँ मैं जानी । पिताध्यानमोहिखण्डचोआनी
गायत्री वचन ब्रह्माप्रति
कहि गायत्री मोहिन पापा । बृक्षि लेहु तब देहहु शापा ॥ कहाँ तोहिसो सांची बाता । तोहि लेन पठयी तुव माता ॥ चलहु वेगि जननिलावहुबारे । तुम विन रचना को विस्तारे ॥
ब्रह्मावचन गायत्रीप्रति
ब्रह्मा कहे कौन विधि जाऊँ । पितादरश अजहुँ नहि पाऊँ ॥
गायत्रीवचन ब्रह्माप्रति
गायत्री कह दरशन पैहो । बेगि चलहु नहि तो पछते हो ॥
ब्रह्माका गायत्रीको साक्षी देनेको कहना और गायत्रीका
ब्रह्मासे रति करनेकी बात कहना
ब्रह्मा कहै देहु तुम साखी । परस्यो सीस देख मैं आंखी ॥ ऐसे कहो मातु समुझायी । तोतुम्हरे सङ्ग हम चलिजायी ॥
गायत्रीवचन ब्रह्माप्रति
कह गायत्री सुन श्रुति धारी । हम नहीं मिथ्या बचन उचारी ॥ जो मम स्वारथ पुरवहु भाई । तो हम मिथ्या कहब बनाई ॥
ब्रह्मावचन गायत्रीप्रति
कह ब्रह्मा नहि लखी कहानी । कहौँ बुँझाय प्रगटकी बानी ॥
सावित्री उत्पत्तिकी कथा
अनुरागसागर
( ३५ )
गायत्री वचन
कह गायत्री देहु रति मोही । तो कह झूठ जित्ताऊं तोही ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
गायत्री कहै है यह स्वारथ । जानि कहौं मैं पुन परमारथ ॥ सुनि ब्रह्मा चित करे विचारा । अबका यत्न करहुँ इहिवारा ॥
छन्द
जो विमुख या कह करौं अब तो नहीं बन आवई ॥ साखि तो यह देय नहीं जननि मोहि लजावई ॥ यहाँ नाहि पिता पायो भयो न एको काज हो ॥ पाप सोचत नहि बने अब करौं रतिविधि साजहो २५ सो०-कियो भोगरतिरंग, विसरन्यो सो मनदर्शका दोउ कहैं बढयो उमंग, छलमति बुद्धिप्रकाशकिले २६ ॥
सावित्री उत्पत्तिकी कथा
कह ब्रह्मा चल जननी पास । तब गायत्री वचन प्रकाशा ॥ औरो करौ युक्ति इक ठानी । दूसरी साखि लेहु उत्पानी ॥ ब्रह्मा कहे भली है बाता । करहु सोई जेहि मानै माता ॥ तब गायत्री यतन विचारा । देहि मैल गहि कीन्ह नियारा ॥ कन्यारचि निज अंशमिलावा । नाम सावित्री तासु धरावा ॥ गायत्री तिहि कह समुझावा । कहियो दरशब्रह्म पितु पावा ॥ कह सावित्रीहम नहि जानी । झूठ साखि दे आपनि दानी ॥ यह सुनिदोउकहैंचिन्ता व्यापा । यह तौ भयो कठिन संतापा ॥ गायत्री बहु विधि समुझाई । सावित्री के मन नहि आयी ॥ पुनि गायत्री कहा बुझाई । तब सावित्री वचन सुनाई ॥ ब्रह्मा कर मोसों रति साजा । तो मैं झूठ कहौं यहि काजा ॥ गायत्री ब्रह्महि समुझावा । दै रति या कहैं काज बनावा ॥ ब्रह्मा रति सावित्रीहि दीन्हा । पापमोट आपन शिर लीन्हा ॥
ब्रह्माका गायत्री और सावित्रीके साथ माताके पास पहुँचना और सबका शाप पाना
( ३६ )
अनुरागसागर
सावित्री कस दूसर नाऊं । कहि पुहुपावति वचन सुनाऊं॥ तीनों मिलिके चलि भे तहवां । कन्या आदिकुमारी जहवां ॥
ब्रह्माका गायत्री और सावित्री के साथ माताके पास पहुँचना
और सबका शाप पाना
करि प्रणाम सन्मुख रहे जाईं । माता सब पूछी कुशलार्ह ॥
अद्यावचन ब्रह्माप्रति
कह ब्रह्मा पितु दर्शन पाये । दूसरि नारि कहाँसे लाये ॥
ब्रह्मावचन
कह ब्रह्मा दोऊ हैं साखी । परस्यो सीस देव इन आंखी॥
अद्यावचन गायत्रीप्रति
तब माता बूझे अनुसारी । कहु गायत्री वचन विचारी॥
तुम देखा इन दर्शन पावा । कहा सत्य दर्शन परभावा ॥
गायत्रीवचन
तब गायत्री वचन सुनावा । ब्रह्मा दर्श सीस पितु पावा ॥
मैं देखा इन परसेउ शीशा । ब्रह्महि मिले देव जगदीशा ॥
छन्द
लेह पुहुप परसेउ शीशपितु इन दृढमें देखत रही॥
जल दार पुहुप चढ़ाय दीन्ह हे जननि यह है सही ॥
पुहुपते पुहुपावती भयी प्रगट ताही ठामते ॥
इनहु दर्शन लह्यो पितुको पूछहु इहि वामते ॥२६॥
हे जननी यह है सही तुम पूछि लो पुहुपावती ॥
सबही सांच मैं तोसों कहूँ नहीं झूठहै एको रती ॥
अद्यावचन पुहुपावतीप्रति
माता कह पुहुपावतीसी कहो सत्य हि मो सना ॥
जो चढ़े सीसाहि पिताके तुम वचन बोलहु ततखना॥
१ यह छन्द पुरानी प्रतियोंमें नहीं है
अद्याका ब्रह्माको शाप देना
अनुरागसागर
( ३७ )
सो०-कहु पुहुपावति मोहि, दरश कथानिरवारके। यह मैं पूछों तोहि, किम ब्रह्मादरशन किये॥२७॥
सावित्री वचन
पुहुपावंती वचन तब बोली । मातासत्य वचन नहीं डोली॥ दर्शन सीस लह्यो चतुरानन । चढ़े सीसयह धर निश्चय मन॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति
साख सुनत अद्या अकुलानी । भा अचरज यह मर्म न जानी॥
अद्याकी चिंता
अलखनिरंजन अस प्रण भार्खी । मोकहैं कोउ न देखै आंखी ॥ ये तीनहुँ कस कहहिँ लबारी । अलखनिरंजन कहहु सम्हारी॥ ध्यान कीन्ह अछुंगी तिहि क्षण । ध्यानमहिँ अस कहा निरंजन ॥
निरंजन वचन
ब्रह्मा मोर दरश नहि पाया । झूठिसाखिइन आन दिवाया॥ तीनों मिथ्या कहा बनाई । जनि मानहु यह है लबराई॥
अद्याका ब्रह्माको शाप देना
यह सुनि माता कीन्हे दापा । ब्रह्मा कहैं तब दीन्हो शापा ॥ पूजा तोरि करै कोई नाहीं । जो मिथ्या बोलेउ मनमाहीं ॥ इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा । नरक मोट अपने शिर लीन्हा॥ आगे है जो शाख तुम्हारी । मिथ्या पाप करहिँ बहुभारी॥ प्रगट करहिँ बहु नेम अपारा । अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥ विष्णु भक्तोंसे करहिँ हँकारा । तांते परिहैं नरक मँझारा ॥ कथा पुराण औरहिँ समुझे हैं । चाल बिहून आपन दुख पैहैं ॥
१ पुराने ग्रन्थोंमें यह चौपाई इस प्रकार है—
सावित्री अस वचन उचारी । मानो निश्चय वचन हमारी
नं. २ कबीरसागर ३
अद्याका गायत्री को शाप देना
( ३८ )
अनुरागसागर
उनसे और सुनैँ जो ज्ञाना । करिसो भक्ति कहाँ परमाना॥ और देवको अंश लखैहैं । औरन निन्द काल मुख जेहै॥ देवन पूजा बहु विधि लैहैं । दछिना कारण गला कटै हैं॥ जा कहा शिष्य करै पुनि जाई । परमारथ तिहि नहिं लखायी॥ परमारथके निकट न जेहैं । स्वारथ अर्थ सबै समुझैहैं॥ आप स्वारथी ज्ञान सुनैहैं । आपनि पूजा जगत दृढ़ै हैं॥ आप ऊंच औरहि कहै छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होइ खोटा ॥
कबीर वचन धर्मदासप्रति
जब माता अस कीन्ह प्रहारा । ब्रह्मा मूर्छित महीकर धारा ॥
अद्याकागायत्रीको शाप देना
गायत्री जान्यो तेहि वारा । हुए है तोर पंच भरतारा ॥ गायत्री तोर होई वृषभ भर्तारि । सांत पांच और बहुत पसारि॥ धर औतार अखज तुम खायी । कहा जानियह दीन्ही सारखी॥ निजस्वारथ तुम मिथ्या भारी । कहा जानियह दीन्ही सारखी॥ मानि शाप गायत्री लीन्ही । सावित्रिहि तबचितवन कीन्ही॥
अद्याका सावित्री को शाप देना
पुढुपावति निजमान धरायेहु । मिथ्या कहनिजजन्मनशायेहु॥ सुनहुपुष्पावतितुम्हरोविश्वासा । नहिं पूजिहैं तुम्हसे कछु आशा॥ होय कुगंध ठौर तव बासा । भुगतहु नरक कामगहि आशा॥ जो तोहि सींच लगावे जानी । ताकर होय वंशकी हानी ॥ अब तुम जाय धरौ औतारा । कयोडा केतकी नाम तुम्हारा॥
कबीर वचन धर्मदासप्रति छन्द
भये शापवश तीनों विकलमति, हीनछीन कुकर्मते॥ यह काल कलाप्रचंडकामिनि, डस्यो सब कहैं चर्मते ॥
शाप देने पर अद्याका पश्चात्ताप और निरंजनके डरसे डरना और शाप पाना, निडर होना
अवुरागसागर
( ३९ )
ब्रह्मादि शिवसनकादिनारदको उन बचि भागहो ॥ सुनुधरमनिविरलाबच शब्द सतसो लागि हो ॥२८॥ सो-० सत्य शब्द परताप, कालकला व्यापै नहीं ॥ निकट न आवै पाप, मनवच कर्म जो पदगहे ॥२९॥
शाप देदेने पर अधाका पश्चाताप और निरंजनके डरसे डरना । छन्द
शाप तीनोंको दैलियो मन माहीं तब पछतावई ॥ कस करहि मोहि निरंजनापल छमा मोहि नआवई ॥
निरंजनका अधाको शाप देना
आकाशबानी तबै भयी यहू काह कीन भवानिया ॥ उत्पत्तिकारणतोहिपठाई कहा चरित यह ठानिया ॥ सो-० नीचहि ऊच सिताय, बदल मोहि सोपावई ॥ द्वापर युग जब आय तुमहिं पञ्च भर्तार हो ॥३०॥
अधाका निडर होना । कबीर वचन धर्मदासप्रति
शाप ओयल जब सुनेउ भवानी । मनसन गुने कहा नहि बानी ॥ ओयल प्रभाव शाप हम पाया । अब कहा करब निरंजनराया ॥ तोरे वस परी हम आई । जस चाहौ तस करौ मितार्ई ॥
विष्णुका गौरसे श्याम होने का कारण अधावचन विष्णुप्रति
पुनि कहि माता विष्णु दुलारा । सुनहु पुत्र इकवचन हमारा ॥ सत्य सत्य तुम कहौ बुझाई । पितुपद परसन जब गै भाई ॥ प्रथमहु तो तुम गौर शरीरा । कारण कौन श्याम भये धीरा ॥
विष्णुवचन अधा प्रति
आज्ञा पाय हम तत्काला । पितुपद परसन चले पताला ॥ अक्षत पुहुप लीन्ह करमाहां । चले पताल पंथ मग जाहां ॥ पहुँचि शेष नाग पहुँ गयऊ । विषके तेज हम अलसयऊ ॥
अद्याका विष्णुकी ज्योतिका दर्शन करना
( ४० )
अनुरागसागर
भयो श्याम विषतेज समावा । भइ अवाज अस वचन सुनावा ॥ अहो विष्णु माता पहुँ जाई । वचन सत्य कहियो समुझाई ॥ सतयुग त्रेता जैसे जबही । द्वापर है चौथा पद तबही ॥ तब तुम होहु कृष्ण अवतारा । लैहौ ओयलसो कही विचारा ॥ नाथ हु नाग कलिन्दी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥ ऊंच होइके नीच सतावे । ताकर ओयल मोहिसो पावे ॥ जो जिव देई पीर पुनि काहू । हम पुनि ओयल दिखावे ताहू ॥ पहुँचे हम तब ही तुव पास । कीन्हैउ सत्य बचन परकाशा ॥ भेटउ नाहि मोहि पद ताता । विषज्वाला साँवल भो गाता ॥ व्याकुल भयो तवै फिर आयो । पितु पद दर्शन मैं नहि पायो ॥
अवाका विष्णुको ज्योतिका दर्शन कराना
इतना सुनि हर्षित भइ माई । लीन्ह विष्णु कहैं गोद उठाई ॥ पुनि अस कहेउ आदि भवानी । अब सुनहु पुत्रप्रियममबानी ॥ देख पुत्र तोहि पिता भिटावों । तोरे मन कर धोख मिटावों ॥ प्रथमहि ज्ञान दृष्टिसों देखो । मोर वचन निजहृदय परेखो ॥ मनस्वरूप करता कहैं जानो । मनते दूजा और न मानो ॥ स्वर्ग पताल दौर मन केरा । मन अस्थिर मन अहै अनेरा ॥ क्षणमहैं कला अनन्त दिखावे । मनकहैं देख कोइ नहि पावे ॥ निराकार मनहीको कहिये । मनकी आशा दिवस निशि रहिये ॥ देखहु पलटि शून्यमह जोती । जहवां झिलमिलझालर होती ॥ फेरहु श्वास गगन कह धायो । मार्ग अकाशहि ध्यान लगायो ॥ जैसे माता कहि समुझावा । तैसे विष्णु ध्यान मन लावा ॥
छन्द
पेठि गुंफा ध्यान कीन्हो श्वास संयम लायके ॥ पवन धूँका दियो जबते गगन गरज्यो आयके ॥
ज्योतिदर्शन रहस्य
अवुरागसागर
( ४१ )
बाजासुनततबमगनभापुनिकीन्हमनकसख्यालहो ॥ शून्यस्वेतपीतसब्जलालदियायरंगजगालहो ॥३०॥ सो०-ताहपीछे धर्मदास, मनपनि आपदिखायल ॥ कीन्ह ज्योति परकास, देखि विष्णु हरित भये३०॥ मातहि नायो शीश, बहु अधीन पुनि विष्णुभा ॥ मैं देखा जगदीश, हे जननी परसाद तुव ॥ ३१ ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास गहि टेके पाया । हे साहिबइकसंशय आया ॥ कन्या मनको ध्यान बतावा । सो यह सकल जीव भरमावा॥
सदगुरु वचन
धर्मदास यह काल स्वभाऊ । पुरुष भेद विष्णु नहीं पाऊ ॥ कामिनिकी यह देखहु बाजी । अमृतगोय दियो विष साजी ॥ जात काल दूजा जनिजानहु । निरखि धर्म सत्यहिं पुरआनहु ॥ प्रगट सु तोहि कहो ससुझाई । धर्मदास परखहु चितलाई ॥ जब परगट तस गुप्त सुभाऊ । जोरह हृदय सो बाहर आऊ ॥ जब दीपक बारे नर लोई । देखहु ज्योति सुभाव विलोई ॥ देखत ज्योति पतंग हुलासा । प्रीति जान आवै तिहिपासा ॥ परसत होवे भसम पतंगा । अनजाने जरि परहि मतंगा ॥ ज्योतिस्वरूपकाल अस आही । कठिनकाल यह छांडत नाही ॥ कोटि विष्णु औतारहि खाया । ब्रह्मा रुद्रहि खाय नचाया ॥ कौन विपति जीवनकी कहऊँ । परखि वचन निज सहजहि रहऊँ ॥ लाख जीव वह नित्यहि खाई । असविकरालसोकालकसाई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कह सुनहुँ गुसाई । मोरे चित संशय असआई ॥ अष्टंगीहि पुरुष उत्पानी । जिहिविधि उपजी सो मैं जानी ॥
मायाका विष्णुको सर्व प्रथम बनाना
( ४२ )
अनुरागसागर
पुनि वहि मास लीन्ह धमराई । पुरुष प्रताप सु बाहर आई ॥ सो अछंगीहि असछल कीन्ह । गोइसि पुरुष प्रगटयम कीन्ह ॥ पुरुष भेद नहि सुनन बतावा । कालनिरञ्जन ध्यान करावा ॥ यह कस चरित कीन्ह अछंगी । ताजा पुरुष भइकाल किसंगी ॥
सद्गुरु वचन
धर्म सुनहु जन नारि सुभाऊ । अब तुहि प्रगटवरणिसमझाऊ ॥ होय पुत्री जेहि घर माहीं । अनेक जतन परितोषै ताहीं ॥ वन्न भक्ष सुख सेज निवासा । घरबाहर सब तिहि विश्वासा ॥ यज्ञ कराय देय पितु माता । बिदाकीन्हहितप्रीतिसों ताता ॥ गयी सुता जब स्वामी गेहा । रात्या तासु संग गुण नेहा ॥ माता पिता सबै बिसरावा । धर्मदास अस नारि स्वभावा ॥ ताते अद्या भई बिगानी । काल अंग है रही भवानी ॥ ताते पुरुष प्रगटने लायी । कालरूप विष्णुहि दिखलायी ॥
धर्मदासवचन कबीर प्रति
हे साहब यह जान्यो भेदा । अब आगेका करहु उछेदा ॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति
पुनि माता कहि विष्णु दुलारा । मरद्यो मान जेठ निजबारा ॥ अहो विष्णु तुम लेहु अशीशा । सब देवनमें तुमहीं ईशा ॥ जो इच्छा तुम चितमें धरिहौं । सो तब तोर काज मैं करिहौं ॥
मायाका विष्णुको सर्वप्रधान बनाना
प्रथम पुत्रब्रह्म दुरि गयऊ । अकरमझूठिताहि प्रिय भयऊ ॥ देवन श्रेष्ठ तुमहि कहैं मातहि । तुम्हारी पूजा सब कोई ठानहि ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
कृपा वचन अस माते भाखा । सबते श्रेष्ठ विणुकह राखा ॥ माता गयी रुद्रके पास । देख रुद्र अति भये हुलासा ॥
अद्याका महेशको वरदान देना
अनुरागसागर
( ४३ )
अद्याका महेशकी बरदान देना
पुनि लहुरा कहैं पूछे माता । तुम शिव कहो हृदयकी वाता ॥ माँगहु जो तुम्हरे चित भावे । सो तोहि देख माता फुरमावे ॥ दोउ पुत्रन कहैं मात हदावा । माँग महेश जो मनभावा ॥
महेशवचन
जोरि पानि शिवकहबे लीन्हा । देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥ कबहिं न विनसे मेरी देही । हे माता मागों वर एही ॥ हे जननी यह कीजै दया । कबहु न विनशै मेरी काया ॥
अद्यावचन
कह अछंगी अस नहीं होई । दूसरा अमर भयो नहिंकोई ॥ करहु योग तप पवन सनेहा । रहै चार युग तुम्हरी देहा ॥ जौलौं पृथ्वी अकाश सनेही । कबहु न विनशै तुम्हरी देही ॥
धर्मदासवचन
धर्मदास विनती चित लाई । ज्ञानि मोहि कहो समुझाई ॥ यह तो सकल भेद हम पायी । अब ब्रह्माको कहो उथायी ॥ अद्या शाप ताहि कहैं दीन्हा । तेहि पीछे ब्रह्मा कस कीन्हा ॥
कबीर वचन
विष्णु महेश जबै वर पाये । भये आनन्द अतिहि हरषाये ॥ दोनो जने हरष मन कीन्हा । ब्रह्मा भयो मान मद हीना ॥ धर्मदास मैं सब कुछ जानों । भिन्न भिन्न कर प्रगट बखानों ॥
शाप पानेके कारण दुःखित हो ब्रह्मा विष्णुके पास जाकर
अपना दुःख कहना और विष्णुका उसे आश्वासन देना
ब्रह्मा मनमें भयो उदासा । तब चलि गयो विष्णुके पास ॥
ब्रह्मावचन विष्णुप्रति
जाय विष्णुसे बिन्ती ठाना । तुम हो बंधु देव परधाना ॥ तुम पर माता भई दयाला । शाप विवश तुम भये बिहाला ॥
( ४४ )
अनुरागसागर
निज करनी बल पायेहो भाई । किहि विधि दोष लगाऊँ माई ॥ अब अस जतन करोहो भ्राता । चले परिवारे वचन रहै माता ॥
विष्णुवचन
कहे विष्णु छोड़ो मन भंगा । मैं करिहौं सेवकाई संगा ॥ तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संशय सब देहु बहाई ॥ जो कोइ होवे भक्त हमारा । सो सेवै तुम्हारो परिवारा ॥
छन्द
जगमाहि एस दिढाई हौं फलपुन्य आशा जोयहो ॥ यज्ञ धर्म रु करे पूजा द्विज बिना नहिं होय हो ॥ जो करे सेवा द्विजनकी तेहि महापुण्य प्रभावहो ॥ सो जीवमोकहै अधिकप्यारेराखिहौं निज ठाँवहो ॥ ३१
कबीरवचन धर्मदासप्रति
सो ०-ब्रह्मा भये अनंद, जबहि विष्णु असमापेऊ ॥ मेटेउ चितकर दंड, सखा मोर सब सुखीभी ॥ ३२ ॥
कालप्रपंच
देखहु धर्मनि काल पसारा । इन ठग ठग्यो सकल संसारा ॥ आशा दै जीवन बिलपावै । जन्म जन्म पुनि ताहि सतावै ॥ बलि हरिचंद बेतु बइरोचन । कुंती सुत औरौ महिसोचन ॥ ये सब त्यागी दानि नरेशा । इन कहैं ले राखे केहि देशा ॥ जस गंजत इन सबकी कीन्ह। सो जग जानेकाल अधीना ॥ जानत है जग होय न शुद्धी । कालअमरबलसबकी हरबुद्धी ॥ मन तरंगमें जीव भुलाना । निजघर उलटिनचीन्ह अजाना ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कह सुनो गुसाई । तबकी कथा मोहि समुझाई ॥ तुम प्रसाद जमको छल चीन्हा । निश्चय तुम्हरे पदचित दीन्ह ॥
गायत्रीका अद्याको शाप देना
अनुरागसागर
( ४६ )
भव बूझत तुमसी गहि राखा । शब्द सुधारस मोसन भाखा ॥ अब वह कथा कहो समुझाई । शाप अंत किया कौन उपाई ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति गायत्रीके अक्षाको शाप देनेका वृत्तान्त
धर्मनि तुम सन कहो बखानी । भाषो ज्ञान अगमकी बानी ॥ मातु शाप गायत्री लीन्हा । उलटि शाप पुनिमातहिंदीन्हा हम जो पांच पुरुषकी जोई । पांचोंकी तुम माता होई ॥ बिना पुरुषकी तू जिनि है बारा । सो जानही सकल संसारा ॥ दुहुनु शाप फल पायो भाई । उगरह भयो देह धरि आई ॥
जगतकी रचनाका विशेष वृत्तान्त
यह सब द्रंद बाद है गयऊ । तब पुनि जगकी रचना भयऊ चौरासी लख योनिन भाऊ । चार खानि चारिहु निरमाऊ ॥
छन्द
प्रथम अंडजरच्यो जननी, चतुरमुखपिण्डजकियो ॥ विष्णु उष्मज रच्यो तबहीं, रुद्र स्थावर लियो ॥ लीन्ह रचि जेहि खानि चारों, जीव बंधनदीन्हहो ॥ होन लागी कृषीकारण, करण कर्ता चीन्हहो ॥ सो०—यहि विधि चारो खानि, चारहु दिशि विस्तार किया धर्मदास चित जान, वाणी चारि उचारको ॥३३॥
धर्मदास वचन कबीरप्रति
धर्मनि कहैं जोरि युग पानी । तुम सद्गुरु यह कहो बखानी ॥ चार खानिकी उत्पति भाऊ । भिन्न भिन्न मुहि वरणि सुनाऊ ॥ चौरासी लख योनिन धारा । कौन योनि केतिक विस्तारा ॥
चार खानकी गिनती । कबीरवचन धर्मदास प्रति
कह कबीर सुन धर्मनि बानी । योनि भावतोहि कही बखानी ॥ भिन्न भिन्न सब कहु समुझाऊं । तुमसे अन्त न कछु दुराऊं ॥ तुम जिन शंका मानहु भाई । वचन हमार गहो चितलाई ॥
चौरासी लाख योनिकी गिनती
( ४६ )
अनुरागसागर
चौरासी लाख योनिकी गिनती
नौ लख जलके जीव बखानी । चौदह लाख पक्षी परवानी ॥ किरम कोट सत्ताइस लाख । तीन लाख अस्थावर भाखा ॥ चतुर लक्ष मानुष परमाना । मानुष देह परम पद जाना ॥ और योनि परिचय नहीं पावे । कर्म बंध भव भटका खावे ॥
मनुष्य खानि सवते अधिक क्यों है ? धर्मदासवचन
धर्मदास नायो पद शीशा । यह समुझाय कहो जगदीशा ॥ सकल योनि जिव एकसमाना । किमिकारण नहीं इसमझाना ॥ सो चरित्र मुनि कहौ बुझाई । जाते चित संशय मिटिजाई ॥
सद्गुरुवचन
सुनु धर्मनि निज अंश अभूषण । तोहि बुझाय कहौ यह दूषण ॥ चार खानि जिव एकै आहीं । तत्त्व विशेष अहैं सुन ताहीं ॥ सो अब तुमसों कहों बखानी । तत्त्व विशेष अहैं सुन ताहीं ॥ ऊष्मज दोय तत्त्व परमाना । अंडज तीन तत्त्व गुण जाना ॥ पिण्डज चार तत्त्व गुण कहिये । पांच तत्त्व मानुष तन लहिये ॥ तासों होय ज्ञान अधिकारी । नरकी देह भक्ति अनुसारी ॥
किन २ खानिमें कौन २ तत्त्व है । धर्मदासवचन कबीरप्रति
हे साहिब मुहि कहु समुझाई । कौन कौन तत्त्व इन सब पाई ॥ अंडज अरु पिंडजके संग । ऊष्मज और अस्थावर अंगा ॥ सो साहिब मोहि वरणि सुनाओ । करो दया जनि मोहि दुराओ ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति छन्द
सतगुरु कहैं सुन दास, धर्मनि तत्त्व खानिनिवेरनो ॥ जाहि खानि जो तत्त्व दीन्हौ, कहौ तुमसो टेरनो ॥
१ इस पदको कई प्रतियोंमें लिखा है ।
सकल जिवन जिव एक समाना । नर सब औरनको नहीं जाना
सब मनुष्योंका ज्ञान एक समान क्यों नहीं है ?
अवुरागसागर
( ४७ )
खनिअण्डज तीन तत्त्व हैं, आप वायु अरु तेजहो॥ अचल खानी एकतत्त्वहि, तत्त्वजलका थेंगहो३३॥ सो०-ऊष्मज तत हैं द्योय, वायु तेज समजानिये॥ पिंडज चारहिं सोयं,पृथ्वी तेहि अपवायुसम ॥३४॥ पिंडज नर परधान, पांच तत्त्वतेज संग है ॥ कहे कबीर परमान, धरमदास लेहुपरखिके ॥३५॥ पिंडज नरकी देह सँवारा । तामें पांच तत्त्व विस्तारा ॥ ताते ज्ञान होय अधिकाई । गहै नाम सत लोकहिं जाई॥
सब मनुष्योंका ज्ञान एक समान क्यों नहीं ? धर्मदास वचन
धर्मदास कह सुनु बन्दी छोरा । इक संशय मेटो प्रभु मेरा ॥ सब नर नारि तत्त्व सम आहीं। इक सम ज्ञान सबनको नाहीं॥ दया शील संतोष क्षमा गुनन । कोई शून्य कोइ होय सम्पूर्णन॥ कोई मनुष्य होय अपराधी । कोई शीलतलकोई कालउपाधी॥ कोई मारि तन करे अहारा । कोई जीव दया उर धारा ॥ कोई ज्ञान सुनत सुख माने । कोई काल गुणवाद बखाने ॥ नाना गुण किहि कारण होई । साहिब बरणि सुनावो सोई ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
धर्मदास परखो चित लाई । नरनारी गुण कहूँ बुझाई ॥ जानते नर है ज्ञानी अज्ञानी । सो सब तोहि कहों सहिदानी॥ नाहर सर्प औ स्वान सियारा । काग गिद्ध सूकर मंजारा ॥ और अनेकजो इन अचखानी । खाहि अखजअधमगुणजानी ॥ इन जो इतने जे जिव आवा । नरकी जोन जन्म जिन पावा॥ पीछे जो इन सुभावन छूटे । कर्म प्रधान महापुन छूटे ॥ ताते सब चले कागके लेखे । नरकी देह परगट तेहि देखे ॥
योनिप्रभाव मेटनेका उपाय
( ४८ )
अनुरागसागर
जिहि जो इतने जो नर आज । ताको तैसो आहि सुभाऊ ॥ अघकरमी घातक विष पूजा । जो इन प्रभाव होय नहि दूजा ॥
योनिप्रभाव मेटनेका
सतगुरु मिले तो ज्ञान लखावै । काग दशा तव सब बिसरावै ॥ मुरचा जो इन छूटे तब भाई । ज्ञान मसकला फिरे बनाई ॥ जब धोबी वस्तर कहैं धोवे । जससाबुन मिल उज्वल होवे ॥ थोर मैल कर वस्तर भाही । थोड़े परिश्रम मैल नसाई ॥ निपट मलिनजे वस्तर आही । ता कहैं अधिक अधिक श्रम चाही जैसे मैल वस्तर कर भाऊ । ऐसे जीवन करे सुभाऊ ॥ कोइ कोइ जो अंकुर होई । स्वरूप ज्ञान सो गहे विलोई ॥
धर्मदास वचन
यह तो स्वरूप जोनि करलेखा । खानि भाव अब कहूँ विशेषा ॥ चारि खानिको जिव है जोई । मनुष्य खानमहँ आवे सोई ॥ ताकर लच्छन मोहि बताओ । विलग विलग करि मुहिस मझाओ जेहि परखी सुहहिं महँ चेतू । कर अब साहब यहि बड़ हेतू ॥
चारि खानिके लक्षणोंकी पारख । कबीर वचन
धर्मदास परखहु चित लायी । चारि खानि गुण कहूँ समुझायी ॥ चारों खानि जीव भरमाया । तब ले नरकी देह धराया ॥ देह धरे छोड़े जस खाना । तैसे ता कहैं ज्ञान बखाना ॥ लच्छन औ अपलच्छन भेदा । सो सब तुमसौ कहौ निषेदा ॥
अण्डजखानसे मसुष्यदेहमें आये हुए जीवकी पारख
प्रथम कहौ अण्डजकी बानी । एकहि एक कहौ बिलछानी ॥ आलस निद्रा जा कहैं होई । काम क्रोध दारिद्री सोई ॥ चोरी चंचल अधिक सुहाई । तृष्णा माया अधिक बढ़ाई ॥ चोरी बुगुली निन्द्रा भावे । घर बनझाड़ी अगिन लगावे ॥ रोवे कूंदे मंगल गावे । भूत प्रेत सेवा मन भावे ॥
अण्डजखानिसे मनुष्यदेहमें आये हुए जीवकी पारख
अनुरागसागर
( ४९ )
देखत देत और पुनि काहू । मन मन झंखे बहु पछताहू ॥ वाद विवाद सबसों ठाने । ज्ञान ध्यान कछु मनहिं न आने ॥ गुरुसतगुरु चीन्हें नहिं भाई । वेद शास्त्र सब देइ उठाई ॥ आपन नीच ऊंच मन होई । हमसमसरि दूसर ना कोई ॥ मैले बस्तर नहीं नहाई । आंख कीन सुख लार बहाई ॥ पांसा जुवा चित्त मन आने । गुरुचरणननिशिदिननिहिजाने ॥ कुवरा मूड़ ताहिका होई । लंबा होय पाव पुनि सोई ॥
ॐ
यहि भांतिलक्षणमें कहा, तुम सुनहु धर्मनि नागरू ॥ अंडज खानिन गोयराखा, कह्यो भेद उजागरू ॥ यह खानि वर्णन कहौ तौसों, कछु नाहि छिपायऊ ॥ सोसमुझावानीजीवथिरकै, धोखसकलमिटायऊ ३४
उष्मज खानिसे मनुष्य देहमें आये हुये जीवनकी पारख
सोरठा-टूजीखानि बताय, ताहि लक्ष तौसों कहो ॥ उष्मजते जिय आय, नर देही जिन पाइय ॥ ३६ ॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । उषमज भेद कहौ परगासा ॥ जाइ शिकार जीव बहु मारे । बहुतसे आनन्द होयतेहि वारे ॥ मारि जीव जब घर कहैं आयी । बहुविधि रांध ताहि कहैं खाई ॥ निन्दे नाम ज्ञान कह भाई । गुरु कहैं मेठि करे अधिकाई ॥ निन्दे शब्द और गुरु देवा । निन्दे चौका नरियर भेवा ॥ बहुत बात बहुतेनरि आयी । कथे ज्ञान बहुते ससुझायी ॥ झूठे वचन सभामें कहई । टेढ़ी पाग छोर उरमहई ॥ दया धरम मनहीं नहिं आवे । करें पुन्य तेहि हांसी लावे ॥ माल तिलक अरु चन्दन करई । हाट बजार चिकन पटफिरई ॥
स्थावर खानिसे मनुष्य शरीरमें आये हुए जीवकी पारख
( ५० )
अनुरागसागर
अन्तर पापी ऊपर दाय। सो जिव यमके हाथ विकाया॥ लंब दांत अरु वदन भयावन । पीरे नेत्र ऊँच अति पावन ॥
छन्द
कहे सतगुरु सुनहु धर्मनि, भेद भल तुम पाइया ॥ सतगुरु विना नहि भेद पावे, भली विधितो हिंदर साइया भैंटिया तुम मोहिको, कछु नाहिं तोहिं दुराइहौं ॥ जो बृझिहो तुम मोहिसो, सकल भेद बताइहौं ॥३५॥
स्थावर खानिसे मनुष्य शरीरमें आये हुए जीवनकी पारख
सो०-तीजी खानि सुभाव अचल खानि जेहि कहत नरदेही तिन पाव, ताकर लक्षण अब बताइहौं ॥३७॥ अचल खानिको कहो सँदेसा । देह धरे जस होवैं भेसा ॥ छनिक बुद्धि होवे जिव केरी । पलटत बुद्धि न लागे बेरी ॥ झाड़ा फेटा सिर पर पागा । राज द्वार सेवा भल लागा ॥ घोड़ा पर होवे असवारा । तीन खरग औ कमर कटारा ॥ इत उत चित सैन जो मरई । पर नारी करि सैन बुलवाई ॥ रससों बात कहैं मुख जानी । काम बान लागे उर आनी ॥ पर घर ताकइ चोरी जायी । पकर बांधि राजा पहँलायी ॥ हांसी करे सकल पुनि जगहूँ । लाज शर्म उपज नहिं तबहूँ ॥ छिन इक मन महाँ पूजा करई । छिन इक मन सेवा चित धरई ॥ छिन इक मन महाँ बिसरे देवा । छिन इक मन महाँ की जै सेवा ॥ छिन इक ज्ञानी पोथी बांचा । छिन इक माँहि सवन घर नाचा ॥ छिन इक मनमें सूर कहोई । छिन इकमें कादर हो सोई ॥ छिन इक मनमें साहु कहाई । छिन इक मनमें चारि लगाई ॥ छिन इक मनमें करे जु धर्मा । छिन इक मनमें करे अकर्मा ॥
पिंडज खानिसे मनुष्यशरीरमें आये हुए जीवकी पारख
अवुरागसागर
( ५१ )
भोजन करत साथ खजुआई । बाँह जाँघ पुनि मींजत भाई॥ भोजन करत सोय पुनि जाई । जो जगाय तिहि मारन धाई॥ आंख लाल होहि पुनि जाकी । कहैलंग भेद कहों मैं ताकी॥
छन्द
अचलखानीभेद धर्मनि, छिनक बुद्धि सो होयहो ॥ छिन माहिं करके मेट डारे, कहों तुमसों सोयहो॥ मिले सतगुरु सत्य जा कहैं, खान बुधिसबमेटही॥ गुरुचरणलीन अधीन होवै, लोकसोहैंसापैठही॥३६॥
पिंडज खानिसे मनुष्य गरीरमें आयै हुए जीवनकी पारख
सोरठा-सुनहु हो धरमदास, पिंडज लक्षणगुणकहो॥ कहों तुम्हारे पास चौथीखानिकी युक्तिसो ॥३७॥ पिंडज खानिके लच्छ सुनाऊँ । गुण अवगुणका भेद बताऊँ ॥ वैरागी उनमुनि मत धारी । करे धर्म पुनि वेद विचारी ॥ तीरथ औ पुनि योग समाधी । गुरुके चरणचित्तभलबाँधी ॥ वेद पुराण कथे बहु ज्ञाना । सभा बैठि बातें भल ठाना ॥ राजयोग कामिनी सुख माने । मनशंका कबहुँ नहिं आने ॥ धन संपति सुख बहुत सहायी । सेज सुपेद पलंग बिछायी ॥ उत्तम भोजन बहुत सुहायी । लौंग सुपारी बीसों खायी ॥ खरचे दाम पुन्य महाँ सोई । हिरदे सुधि ताकर पुनि होई॥ चच्छु तेज जाकर पुनि जानी । पराक्रम देही बल ठानी ॥ देखो स्वर्ग सदा तेहि हाथा । देखे प्रतिमा नावे माथा ॥
छन्द
बहुतलीन आधीन धर्मनि, ताहि जितकहैंजानिहो॥ सतगुरुचरणनिशिदिनगहे, मतशब्दनिश्चयमानिहो॥
मनुष्यशरीरसे मनुष्यदेहमें आनेवाले जीवकी पारख
( ५२ )
अनुरागसागर
एक एक बिलोय धर्मनि, कह्यो सत मैं तोहिसों ॥ चारखानी लक्ष भाषेउँ, सुनो आगे मोहिसों ॥३८॥
मनुष्य शरीरसे मनुष्यदेहमें आनेवाले जीवकी पारख
सोरठा-छूटे नरकी देह, जन्म धरे फिर आयके ॥ ताका कहौ सँदेह, धर्मदास सुनु कानदे ॥३९॥
धर्मदासवचन
हे स्वामी इक संशय आयी । सो पुनि मोहि कहो समझाई ॥ चौरासी योनिन भरमावे । तब मानुष की देही पावे ॥ यह विधि मोसन कह्यो बुझायी । अब कैसे यह संधि लखायी ॥ सो चरित्र गुरु मोहि लखाऊ । धर्मदास गहि ठके पाऊ ॥ मानुष जन्म धरे पुनि आयी । लक्षण तासु कहो समझायी ॥
कबीरवचन
धर्मदास तुम भलिविधि जानो । होय चरित सो भले बखानो ॥ आयु रहते भी मृत्यु होती है
आइ अछत जो नर मर जायी । जन्म धरे मानुषको आई ॥ जो पुनि मूरख ना पतियाई । दीपक बाती देख जराई ॥ बहुविधि तेल भरे पुनि ताही । लगै वायु तबै बुझ जाही ॥ अग्नि लायके ताहि लेसावे । यहिविधि जीवहु देह धरावे ॥ ताको लक्षण सुनहु सुजाना । तुमसों न गौय राखै ज्ञाना ॥ शूरा होवे नरके माहीं । भयउ डरताके निकट जाहीं ॥ माया मोह ममता नहि व्यापे । दुश्मन ताहि देखि डरकाँपे ॥ सत्य शब्द प्रतीति कर माने । निन्दा रूप न कबही जाने ॥ सतगुरु चरण सदा चितराखे । प्रेम प्रीतिसो दीनता भाखे ॥ ज्ञान अज्ञान होइ कहैं बूझे । सत्यनाम परिचय नित सूझे ॥ जो मानुष अस लक्षण होई । धर्मदास लिखि राखो सोई ॥
चौरासी धारा क्यों बनी ?
अनुरागसागर
( ५३ )
छन्द
जनमजनमको मैल छूटे, पुरुष शब्द जो पावई ॥ नाम भा सुमिरण गहे सो, जीव लोक सिधायई ॥ गुरुशब्द निश्चय दृढगहेसो, जीव अमियअमोलहो सतनामबल निज घर चले, करे हंसकलोलहो ॥२८॥ सोरठा-सत्यनामपरताप, काल न रोके जीवकहैं ॥ देखिवंशको छाप, काल रहै सिर नायके ॥ ४० ॥
चौरासी धार क्यों बनी ? धर्मदासवचन
चारि खानिके बूझेउ भाऊ । अब बूझों सो मोहि बताऊ ॥ चौरासी योनिनकी धारा । किह कारण यह कीन्ह पसारा ॥ नर कारण यह सृष्टि बनाई । कै कोह और जीव भुगताई ॥ है साहिब जनि मोहि दुराओ । कीजे कृपाबिलंबजनिलाओ ॥
मनुष्यके लिये चौरासी बनी है सदगुरुवचन
धर्मनि नर देही सुखदायी । नर देही गुरु ज्ञान समाई ॥ सो तनु पाय आप जहैं जावे । सतगुरुभक्ति विनादुख पावे ॥ नर तनु काज कीन्ह चौरासी । शब्द न गहे मूढ़मतिनाशी ॥ चौरासीकी चाल न छाड़े । सत्य नाम सो नेह न माड़े ॥ लै डारे चौरासी माहीं । परचै ज्ञान जहां कछु नाहीं ॥ पुनिपुनि दौड़ि कालमुखजाहीं । ताहूते जिव चेतत नाहीं ॥ बहुत भांतिते कहि समुझावा । जीवत विपति जान गुहरावा ॥ यह तनु पाय गये सतनामा । नामप्रताप लहे निजधामा ॥
छन्द
आदिनाम विदेह अस्थिर, परखि जो जियरा गहे ॥ पाय बीरा सार सुमिरण, गुरु कृपा मारग लहे ॥