कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
विष्णुका दशरथके घर अवतार लेना अर्थात् रामकथावर्णन
ज्ञानसागर
(३५)
चौपाई
कन्या हाथ लीन जयमाला । नावहु गले गहि चरण गुपाला ॥
शिव विवाह पार्वती सों कीन्हा । सती हेत तिन भल कै चीन्हा ॥
तबही रूप प्रथम कर दीन्हा । दीन्ह शाप विष्णु सुन लीन्हा ॥
अहो विष्णु तुम वैर विचारा । तुमहु वैर देव व्यवहारा ॥
वसुधा भारहि व्याकुल आही । सुत पुलस्त महा बल ताही ॥
ले अवतार मारहुगे मोई । सो पुन हर तुम्हारा जोई ॥
नारदका जस कीन्हौ अंगा । तईसन जाय करो परसंगा ॥
बरबस वैर लेव सब पाहीं । विधिना रूप बनावै ताहीं ॥
विष्णु अपन मन कीन्ह तिवाना । काके गिरह लेहुँ अवधाना ॥
पूर्व जन्म जो दशरथ राऊ । सेवा कीन्ह यहा परभाऊ ॥
माँगिन तिन फल अंतक बारा । पुत्र होहु गोपाल हमारा ॥
आये नृपति संग त्रेनारी । सेवा कीन्ही यही प्रकारी ॥
साखी-लेव अवतार अयोध्या, दैत्य बधन जो होय ॥
आज्ञा भयी आकाश तैं, करु उपाय अब सोय ॥
चौपाई
हिरनाकुश हिरण्याक्षहि मारा । ताकौ दियो सुनिगृह अवतारा ॥
सुनि पुलस्त गृह जन्मौ बारा । रावन कुंभकर्ण बरियारा ॥
जा कहैं विष्णु स्वर्ग कर राऊ । भक्ति हेतु ता कहैं जन्माऊ ॥
नाम विभीषण भक्त हरि केरा । जपै विष्णु नहि लावै बेरा ॥
नृप कश्यप दुतिया अवतारा । सो तो भयऊ अवध भुवारा ॥
तिनके गृह अवतारहि लीन्हा । अपने अंश चार तिन कीन्हा ॥
राजा के गृह जन्मौ बारा । ज्योतिष राम वर्ग उच्चारा ॥
जेष्ठ पुत्र कौशलया सुतही । राम नाम थापो पुन तबही ॥
सुमित्रा के दोई बालक आही । लषन शत्रुहन भाषौ ताँही ॥
( ३६ )
ज्ञानसागर
दोई जन्म सुमित्रा किये सेवा । तातें हरि प्रगटे दोई भेवा ॥
कैकई सुतहि भरत जो भाखा । विप्रन दीन्ह पदारथ थाका ॥
कौशिक ऋषि आये तेहि ठाई । नृप दशरथ तब हित बहु पाई ॥
बार अनेक दण्डवत कीन्हा । नृप कहँ आशिर्वाद जो दीन्हा ॥
है प्रभु कह आयसु जो होई । कृपा करो जिन राखौ गोई ॥
जेष्ठ पुत्र जो राम सुजाना । ताहि देव नृप हो मम माना ॥
साखी-नृप बूझौ मन आपने, दिये बनै परकाज ॥
थाती सौपौ पुनि तुमहि, आन देखु मुनिराज ॥
चौपाई
राम लक्षण चले मुनिके साथ। ताडुका बांधि व्याहब रघुनाथा ॥
चले राम लछमन मुनि संग। देख रूप जैसे कोटि अनंगा ॥
दिक्षा मंत्र दियो ऋषि जानी । दीन्ह जाप कहि अमृत वाणी ॥
ऋषि आश्रम आये रघुराया । यज्ञ शाला मुनिवर बैठाया ॥
दीन्ह तुरंत तब निर्भय भारा । मुनिकै दैत्य जो करै संबारा ॥
आये बीर महाबल भारी । लागी होन परस्पर मारी ॥
मुनिवर आज्ञा दीन्ही जबही । ताडुका दैत्य मार हरि तबही ॥
ताडुका दैत्य राम जब मारा । ऋषि मुनिवर तब कियो यज्ञ शाला
साखी-मिथिला नगरी रहत हैं, रच्यो स्वयंवर राय ॥
चलो राम सो देखिये, मुनिवर संग सहाय ॥
चौपाई
चले राम लक्ष्मण औ राऊ । मिथिलानगर अब धरिये पाऊ ॥
पाहन शिला जबै पग लाग। प्रभु प्रगटे जो खटका भागा ॥
गौतम नारि अहिल्या नाऊँ । ताको हरि पठई निज ठाऊँ ॥
समाचार मिथिलापति पाये । आदर कै मुनिवर लै आये ॥
समाधान नृपति बड़ कीन्हा । उत्तम मंदिर बैठक दीन्हा ॥
ज्ञानसागर
( ३७ )
जो कोइ आय जान यज्ञ शाला । सब कई पोषण कीन्ह भुवाला ॥
पहुँचे अवधि सुदिन आये । राजा नगर महाँ ढोल बजाये ॥
साखी-जाके बल बहु होवै, धनुष उठावै सोय ॥
सीता ब्याहों ताहिको, मिथ्या वचन न होय ॥
चौपाई
चल भइ सीता जहाँ फुलवाई । देवी पूजन मातु पठाई ॥
आवत राम मार्ग जब देखा । सुफल जन्म आपुनतब लेखा ॥
अहो अंबिका आदि भवानी । सुनिये मातु तुम अन्तर्जाभी ॥
मोर मनोरथ पुरबो माता । सो बर देव जो मनमें राता ॥
बिधि विन्ती सीताकी जानी । ततक्षण भई अकाश तें वाणी ॥
अहो सीता लक्ष्मी अवतारा । निश्चय तोर राम भरतारा ॥
सुनत संदेशा भयो अनन्दा । जिमि चकोर पाये निशि चंदा ॥
देवी पूजि गई निज सीता । मनमें हर्ष बहुत पुनि कीता ॥
आई सिय जहाँ सृष्टि भुवारा । उठै न धनुष सबै बल हारा ॥
रावन बालि महा बलधारी । उठै न धनुष सबै बल हारी ॥
जब नृप जनक भयो विसमादा । उठै न धनुष जन्म मम बादा ॥
तब रघुवर सुनिको शिर नावा । सभा मांझ तब धनुष उठावा ॥
रैवेंचो राम धनुष चढ़ो जबही । महा अघोर शब्द भयो तबही ॥
साखी-सुनि गण त्याग्यो ध्यान तब, महि मंडल भुई चाल ॥
हरष्यो राजा जनक तब, सिया दीन्ह जयमाल ॥
चौपाई
टूटचो धनुष धूम भइ भारी । परसराम तब लाग गुहारी ॥
आवत तासु जो नृपति सकाने । बहुत नाम जो सुनत प्रमाने ॥
सभा मांझ आये परसरामा । सब मिलि दंडवत कीन्ह प्रणामा ॥
भृगुकुल कह सुन मिथिला राज । तोरचौ धनु किन मोहि बताऊ ॥
( ३८ )
ज्ञानसागर
रघुपति कहैं धनुष मैं मापा । तुम किहि काज करत है दापा ॥
देखि राम भृगुकुल किय रोषा । मारौं शीस जो करौ सरोषा ॥
बिहैंसे राम लखन दोइ भाई । हे द्विज यान करौ सुरमाई ॥
जान बूझि जिन होहु अयाना । मिटै तिमिर ऊगै जब भाना ॥
द्विज कुल देखि किया परमाना । तातैं तुमको भयो अभिमाना ॥
साखी-द्विज कुल धनुष जो आपनो, दीन्ह रामके हाथ ॥
मैं क्षत्री बल भजन, खैंचो हो रघुनाथ ॥
चोपाई
खैंच्यो राम तासु धनु कैसा । तृणहि उठाय लेत हैं जैसा ॥
परशराम गहि ताके पाऊ । क्षमा करो कौशिल्या राऊ ॥
कर प्रणाम भृगु वनहिं सिधारे । रामचन्द्र रहै सभा मझारे ॥
ये जो आहि सो त्रिभुवन राऊ । तिन महि मंडल तेज प्रभाऊ ॥
कहैं सबै हरि को अवतारा । परशुराम औ राम भुवारा ॥
जो निज इच्छा आवत जाई । तौन गर्भ काहे दुख पाई ॥
ऐसा निरंकार परकाशा । सब ते न्यारा सब में बासा ॥
इच्छा कर जस त्रिभुवन राऊ । इच्छा आस कैं निर्माऊ ॥
बाजा लगा जीव जो राखा । ताकी भक्ति सबै मिल भाखा ॥
साखी-कोइ इक ज्ञानी पारखी, परखे खरा औ खोट ।
कहे कबीर तब बाँचि हैं, रही नाम की ओट ॥
चोपाई
राम लखन के सुनो प्रभावा । मिथिलापति एक दूत पठावा ॥
नृप दशरथ बेगहि चलि आहू । राम लखन कर सुनो विवाहू ॥
नृप दशरथ बेगिही चलि आएहू । ऋषिन करायवो तहां विवाहू ॥
चारौं भाइ ब्याह तिहिं पाहीं । बहुत अनँद कीन्ह मन माहीं ॥
चारौं भाई और भुवारा । ले चलि आये अवध मझारा ॥
तहां आइ विप्रन दिय दाना । कछु दिन कियौ सुखराम सुजाना ॥
ज्ञानसागर
( ३१ )
भरत गये जहाँ जननी ताता । विद्या पढ़ै बहुत हरपाता ॥
अवध नरेश मता अस ठाना । रामहिं राज देहु मन माना ॥
सब मिलि ऐसा मत उपराजा । करब बिहान राम कहै राजा ॥
यह चरित्र जब देख भवानी । समझी निराकार की वानी ॥
साखी-सूठ मनुष्य न बूझै, राम लीन्ह अवतार ॥
मारे दैत्य संघारे, लंका के सरदार ॥
चौपाई
सवा लक्ष जीव प्रतिदिन खाई । कौतुक राज बनावत राई ॥
अंबिका गई कैकेई पास । हे रानी तुव पति मति नाशा ॥
रामहिं काल देत हैं राजू । निश्चय है हैं तोर अकाजू ॥
जो वर दियो नृपति तोहि काहीं । सो तुम मांगो आजुहि माहीं ॥
भरतहिं राज राम बनो बासा । माँगहु आज जो होइ हुलासा ॥
गयी कैकेई मांगा बर सोई । राम बिछोह प्राण नृप खोई ॥
त्यागो प्राण अवध नृप जबहीं । सरवन बैर जन्म लियो तवहीं ॥
चले राम लक्ष्मण सिय साथ । करहिं शोक धुनहीं बहु माथा ॥
रामहिं संग दूर लग जाई । फिरहु राम तुम तात दुहाई ॥
सुमंत मंत्री अस वचन सुनाये । पठये दूत तव भरत बुलाये ॥
जाइ बुलावहु भरतहिं आजू । उन कहैं देहु अवध कर राजू ॥
आज्ञा भयी फिरयो सब लोग । सब कहैं भयो राम कर शोगा ॥
साखी-भरतहिं पठे संदेश पुनि, तबहि भयो रवि सांझ ॥
गये जहां तहां रघुपति, बैठ गये वनमांझ ॥
चौपाई
राम लखन बैठे सिया लाई । फिरहु भरत तुम तात दुहाई ॥
फिरहु भरत प्रभु आयसु होई । प्रजा लोक संग सब कोई ॥
( ४० )
ज्ञानसागर
राम लक्ष्मण औ सिय साथा । वन मारग लीन्है धनु हाथा ॥
बहु दिन रहै ऋषिनके ठाई । समाचार लंकापति पाई ॥
लीन संग मारीच बलवंता । हरे सिया मन हो हर्षता ॥
मारीच ही कीन्ह मृग वेषा । नहि छल बूझे राम नरेशा ॥
मृग को देख नृपत तब भूला । लोभ मोह को वन जो फूला ॥
प्रगटचो सांझ अन्ध भो भाना । बिगरचो मोह जो ज्ञान छिपाना ॥
राम लखन गए मृगहि शिकारा । सीतहि रावन रथ बैठारा ॥
आगे मारग रोक जटाऊ । मार गयो तिहि रावण राऊ ॥
मारीचहि राम कीन्ह जब घाता । बूझ परी नारदकी बाता ॥
सिय हर रावन मार लुटेवा । जाकी जगत करत है सेवा ॥
दूँढहु लक्ष्मण वन गुहराई । मोह भयो जब सिया न पाई ॥
मारीचहि मार राम पछिताना । जबहि जटाउ कही सहिदाना ॥
हनुमान मिल पंथ मँझारा । रावन मारचो राम भुवारा ॥
सुन स्वामी तू त्रिभुवन नाथा । कृपा करो तुम मोरे साथा ॥
हनुमान जब कीश अनुसार । कुशल प्रभाव पूछ तिहि बारा ॥
बालि सुग्रीव दोइ जन भाई । बालि लीन्ह वध बंधु छुड़ाई ॥
जो प्रभु कीजे कपि पर दाय। मारो बालि सुनो रघुराया ॥
साखी-रामचन्द्र अस बोले, कीने बालि कुकर्म ॥
मारौं ताहि पल भीतरै, जान कहौं अस मर्म ॥
चौपाई
आए रघुपति जहँ गए राजा । बालि मार सुग्रीव निवाजा ॥
मार बालि कहँ एकहि तीरा । बूझे सन्त गही नहि पीरा ॥
यह तो भेद जानि है सोई । सतगुरु दया जाहि पर होई ॥
तब हनुमान लंक कियो गवना । पहुँचै जाय जहाँ रह रवना ॥
पहुँचे जाय भेट भइ सीया । देत्य देख वह कीतुक कीया ॥
ज्ञानसागर
( ४१ )
मारहिं कपि कहैं कौतुक जानी । तब हनुमान आप बल ठानी ॥
जारि नगर तब कीन्हों छारा । नगर लोग सब कहैं विकारा ॥
साखी-आय कहौं रघुपति सौं, समाचार हनु वीर ॥
सिंधु बांधि हरि उत्तरे, दैत्य वधन रनधीर ॥
चौपाई
आए कीन्ह दैत्य संग्रामा । मारे दैत्य बहुत तब रामा ॥
कुंभकरण निद्रा सौं जागा । रघुवर सौं युद्ध करे अचुरागा ॥
कहै विभीषण सुन नृप रावन । आए राम जो असुर सतावन ॥
सिया संग लै जाहु तुरंता । क्षमा अपराध गहु पग हर्षता ॥
मारी लात विभीषण भाई । कोधित मिलो राम कहैं आई ॥
समाधान नृपति बड कीन्हौं । लंका बकसि ताहिं कौ दीन्हौं ॥
कुंभकरण गहि समर अपारा । ताको हरि बहु बल सौं मारा ॥
इंद्र जीत तब लाग गुहारी । कर अश्वमेध तपस्या भारी ॥
तिन कपि रोके कपिदल जुथ्या । विभीषण भेद कहो अज जुथ्या ॥
जौलौं पूर्ण जह ना होई । मारहु राम वध करे सोई ॥
भयो प्रभात राम जब देखा । लक्ष्मण लाग्यो बान विशेषा ॥
साखी-मार सो महाबली, मेघनाद जिहि नाम ॥
सुनत क्रोध रावन कियो, कठिन कीन्ह संग्राम ॥
चौपाई
दैत्य महाबल शक्ति संधाना । जूझे लक्ष्मण भया निदाना ॥
तुम हनुमान लै आवहु मूरी । उत्तर दिशा देश बड़ दूरी ॥
दौनागिर पर्वत कर नाऊ । संजीवन सहित ताहि लै आऊ ॥
संजीवन बास तैं लक्ष्मण जागा । हर्ष भये तब कपिकर भागा ॥
तब रघुवीर घेर गढ लंका । दैत्यनके जी उपजी शंका ॥
तब रावन गहि समर अपारी । बंधुहि व्याकुल है सब झारी ॥
( ४२ )
ज्ञानसागर
रामचन्द्र रावन कहै मारा । वार अनेक सीस झुइ पारा ॥
मारचो हृदय ताक कै जबही । रावन काल वश्य भयो तबही ॥
सीता समाधान हरि कीन्हा । ताको रूप न काहू चीन्हा ॥
सिया लीन्ह रघुवीर बुलाई । राज विभीषण दीन्ह सुहाई ॥
लै सीतहि अवधपुर आना । भरतहि कीन्ह बहुत सनमाना ॥
सीता सती रही अवधाना । गर्भ वास लौकृश उत्पाना ॥
साखी-राज करै रघुवंश मणि, तब अस कीन्ह प्रमान ॥
थाप्यो कोट अयोध्यहि, सुनौ मंत्र हनुमान ॥
चौपाई
जबहि राम लंका से आये । अयोध्या कोट उठावन लाये ॥
लक्ष्मण भाइ संग तब लीन्हा । सुदिन जानकै तब निव दीन्हा ॥
उठत कोट सो भय अस शोरा । है कछु द्रव्य नीच अस बोला ॥
सुन अस वचन राम रघुराई । खनहु खनहु अस आज्ञा पाई ॥
चहुँ दिश खने जो बाजु कुदारा । तपसी एक देख तहँवारा ॥
लुहिडा माथे दै तप करई । जोग अरंभ सदा चित धरई ॥
भौह बार मुख रहे छिपाने । बैठे महि के तले सयाने ॥
देखा ऋषिहि बहुत भय माना । शाप न देई बहुत सकाना ॥
छाँड़ि समाधि निरखि जब हेरा । राम दंडवत किये चहुँ फेरा ॥
साखी-बोले वचन ऋषी तब, कोहो सो कहु मोहि ॥
रूप भाव बहु आगर, देखों नृप सम तोहि ॥
रामचंद्र वचन-चौपाई
दशरथ तनय राम मोहि नाऊ । रहौं समीप अवधपुर गाऊ ॥
ऋषि कहो भयो राम अवतारा । पूछौ यह कह करब भुवारा ॥
हे ऋषि राज मैं कीर्ति बनाऊँ । जातैं रहे यहि जग में नाऊँ ॥
कह ऋषिराज जीवन है थोरा । छाँडो कोट कहा सुन मोरा ॥
ज्ञानसागर
( ४३ )
राम कह्यो ऋषि सो निज मर्मा । केते दिवस किया तपधर्मा ॥
लोमश ऋषि मोर है नाऊ । अपने जन्म को कह्यो प्रभाऊ ॥
आठ पहर रात दिन होई । अहो रात कहैं सब कोई ॥
दोई पाख कर प्रहर प्रमाना । सो एकदिवस पित्रन को जाना ॥
वर्ष दिवस जब उनको होई । एक दिवस देवन को सोई ॥
बारह वर्ष दिवस जब जाना । चौदह सहस्र इक मनु जो वखाना ॥
सप्त मनु जबही जाइ विगोई । तब इक इन्द्र काल सब होई ॥
सप्त इन्द्र जब होवै नाशा । इक ब्रह्मा को होई विनाशा ॥
साखी-सप्त ब्रह्मा जब विनशहीं, तब एक विष्णु को नाश ॥
सप्त विष्णु जब वीतहीं, तब इक रुद्र विनाश ॥
सोरा रुद्र गति जब हो जाई । तब इक रोम मम परे खसाई ॥
तातैं लोमस नाम है मोरा । करा समाध जीतवै है थोरा ॥
सुन रघुवीर अचंभित भयऊ । ऋषिको वचन प्रतीत न लयऊ ॥
राम चरित्र ऋषी तब जाना । क्या सोंचौ रघुवीर सुजाना ॥
देव अंगुष्ठ भैंटहु जो मोही । तैसे अंगुष्ठ दैऊ मैं तोही ॥
यहै कमंडल मोरे साथा । काढ़ौ गिन जो आवहि हाथा ॥
क्रोधित हाथ डार भगवाना । गिनि उनचास कोट परवाना ॥
परचो पाय रघुवीर न जाना । लोमश वचन सत् कर माना ॥
एतिक सुदरी गिनी विशेषा । कमंडलको कहैं कहिये लेखा ॥
इतने राम रावन होय गएऊ । सुनि रघुवीर अचंभौ भएऊ ॥
साखी-जान्यो जन्महि अल्प जब, चले स्वर्ग अस्थान ॥
निराकार निरञ्जन, तासु मर्म नहि जान ॥
चौपाई
त्याग्यो राजपाट बन्धु चारी । गये स्वर्ग नृप सैन सिधारी ॥
आप इच्छा जन्म पुन लीन्हा । कृष्ण चरित्र आगे पुन कीन्हा ॥
नं. १ कबीरसागर-
कृष्णचरित्रवर्णन
( ४४ )
ज्ञानसागर
जाहि राम को जपत संसारा । ताको तो ऐसो व्यवहारा ॥
बाजी दिखाय जीव सब राखा । मारे अन्त करै अस लाखा ॥
काह करै जिव बस परेऊ । तातैं सत्त शब्द चित धरेऊ ॥
जमराजा है अति बरबंडा । मारे ब्रह्मा विष्णु नौ खंडा ॥
काल फांस कैसे मुक्तावै । जब लग सत्तनाम नहि पावै ॥
साखी-नाम अदल जो पावै, कहै कबीर विचार ॥
होय अटल जो निश्चय, जमराजा रहे हार बार ॥
चोपाई
सुन धर्म मैं तोहि सुनाऊं । कृष्ण चरित्र को भाव बताऊं ॥
कृष्णचरित्र
राम रूप त्रेता अवतारा । गयो वियोग सकल संसारा ॥
करै भेख बहुत विधि कैसा । लेखा मूल ब्याज है जैसा ॥
एक नार रघुपति दुख पाया । सोरा सहस्र गोपि निरमाया ॥
प्रथमहि गोपिन को निरमाया । पीछे कृष्ण देव है आया ॥
देवकी कहैं जन्म लियौ जाई । दीन्ह सबै गोकुल पहुँचाई ॥
नंद के गेह आन तिन राखा । है मम पुत्र जसोधा भाखा ॥
करै नंद जसोधा महरी । पल भर कृष्ण राख न बहरी ॥
गोपी सबै विलास बनावैं । रात दिवस हरिके गुण गावैं ॥
नृप दशरथ वसुदेव अवतारा । कौशिल्यासुमित्रा देवकी वारा ॥
नारद ऋषि कंसहि कह भेऊ । यह निज जन्म न जानै केऊ ॥
उपजो तुव वैरी भगवाना । नंद गेह गोकुल अस्थाना ॥
सुन नृप कीन्ह जो बहुत उपाई । मारहु ताहि कहै अस राई ॥
कागासुर इक दैत्य अपारा । बलपौरुरज जिहिकै अधिकारा ॥
ताको कंस वचन अस भाखी । राम कृष्ण कर फोरहु आंखी ॥
चलयो दैत्य आयो हरि पाहीं । सखा संग जहैं बाल कन्हाहीं ॥
जान्यो कृष्ण दुष्ट यह आही । चपट कै मारचो है हरि ताही ॥
ज्ञानसागर
( ४५ )
सारखी-मारौ दैत्य महा बली, दैत्य राज भयमान ॥
भगनी तासु जो पूतना, ता कईं दीन्हों पान ॥
चौपाई
चली पूतना कर छल भेषा । गरल लगाइ पयोधर रेखा ॥
लेके पयोधर कृष्ण लगाई । तारी तवै सबै विष खाई ॥
एक बार ग्वालन संग गएऊ । जान बकासुर छैकै लएऊ ॥
मारचो कृष्ण ताहि पल माहीं । नहीं दैत्य जीते कोइ जाहीं ॥
इन्द्र पूजा नहिं दीन्ह गुवारा । वर्षे इन्द्र अखंडित धारा ॥
डारचो इन्द्र वर्षा दिन साता । हरि गिर लीन्हो ऊपरहाथा ॥
सारखी-सात दिवस जब वर्षेऊ, जान्यो इन्द्र भुवार ॥
क्षमा अपराध अब कीजिये, देव विनय अनुसार ॥
चौपाई
एक बार कालिन्दी तीरा । बछड़े लै गए जादौ बीरा ॥
लागी प्यास पियावहिं पानी । पीवत ही भइ सब की हानी ॥
देखत कृष्ण अचंभौ भयऊ । उरग गरल साँवल तन भयऊ ॥
पुन धँस गये तहं यदुराई । नाथ्यो नाग वारि मई जाई ॥
सारखी-यह चरित्र माधव कियो, जानत नाहिन कोय ॥
बूझेगे कोइ बिरले, सतगुरु मिलिया सोय ॥
चौपाई
केसी नाम बंधु बड़ बीरा । तिन पुनकीन्हा असुर शरीरा ॥
तब निकंद कीन्है जो ठाना । छलके मारचो तेहि भगवाना ॥
सुकल केश कईं बेग पठावहु । राम कृष्ण कौं बेग लै आवहु ॥
चल अकूर आये हरि पाहीं । कृष्ण चरित्र बूझे पल माहीं ॥
सोरा सहस्र अबला सों नेहा । बूझ न परै जीव दोइ देहा ॥
सारखी-बहु क्रीडा हरि कीन्हौ, जानत नाहिं न कोय ॥
अजिया पुत्रहि पालिये, आप स्वारथी होय ॥
( ४६ )
ज्ञानसागर
चौपाई
मारत तासु बार नहीं लावा । ऐसा देखो हरी स्वभावा ॥
रावन कुंभकरन जा मारा । ताको जन्य शिशुपाल अवतारा ॥
चलत कृष्ण गोपिन किए शोगा । संग भले तब जादों लोगा ॥
मारन कौं हरि मता जो ठाना । मथुरासे हरि कीन्ह पयाना ॥
मुष्ट चार और दोह खँडावा । सब असुरनहि कंस गुहरावा ॥
रंग भूमि नृप कंस बनावा । काल रंग भूमी ही आवा ॥
चल भए कृष्ण जहां कहैं तबही । कुबरीको सन्मान कियो जबही ॥
पूर्व जन्म तिन सेवा कीन्हा । भक्ति हेतु ताको रति दीन्हा ॥
साखी-कुबरीको सन्मान कर, चल भयो राज द्वार ॥
हस्ती कौं बल महाबल, तिनको पहिले मार ॥
चौपाई
मारत तासु वीर जो धाये । मुष्ट चार अरु दोह खँडाये ॥
मुये नृप पुन तब खस परेऊ । कालिन्दी तट आन जराएऊ ॥
उग्रसेन कीन्हों सन्माना । गये हरि मात पिता अस्थाना ॥
पूर्व जन्म सेवा तिन कीन्हा । भक्ति हेतु मैं दर्शन दीन्हा ॥
जरासन्ध नृप लाग गुहारी । सत्रह बार तिन कीन्हों मारी ॥
तैंतिस शोहणि दल तिन जीता । जमन केर सम्हर पर बीता ॥
नृप मुचकुंदहि तब पुनि मारा । ताकौ हरि पुनि बैर विचारा ॥
साखी-यह चरित्र कहु कैसौ, जमन को आनि मराव ॥
जीव कौ बदला जीव है, अदल अंश कर न्याव ॥
चौपाई
कंस मार हरि गोकुल गएऊ । गोपिन समाधान हरि किएऊ ॥
सब मिलि कीन्हों मंगलचारा । तब हरि ऐसौ वचन उचारा ॥
दुरवासा ऋषि तप बड़ कीन्हा । इच्छा भोजन माँगहि लीन्हा ॥
ज्ञानसागर
( ४७ )
जाय सबै ले जमुनहि पारा । ले चलि भोजन भर भर थारा॥
जमुना बहु विधि आप गुसाई । तब हरि ऐसा वचन सुनाई ॥
कही जाइ कालिन्दी तीरा । कृष्ण छुवा नहि मोर शरीरा ॥
होई है थाह जाइ हो पारा । चल भो गोपी लाग न बारा ॥
साखी-कृष्ण सन्देशा कहिके, सबै भई तब पार ॥
जाइ कराइन भोजन, तब विन्ती अनुसार ॥
चौपाई
तब गोपिन अस बचन सुनावा । हे प्रभु पार जाहिं किहिं भावा॥
कालिन्दी से कहि सब मांदा । ऋषि नहि खाइब मोर प्रसादा ॥
कहत सन्देशा सब भई पारा । अचरज भयो मनमाहिं विचारा ॥
ठगई लगा तीनों पुर माहीं । कृष्ण कहाये अचरज नाही ॥
चौथे लोक बसे परधाना । ताहिखबर कहु विरलन जाना ॥
तपके तेज कहा बड़ भएऊ । तीन लोक जो अचरज ठएऊ ॥
एकवार शिशुपाल भुवारा । कृष्ण से कीन्ह जो समर अपारा ॥
मारचो तबै दैत्य बल बीरा । निकसे प्राण जो छांडि शरीरा ॥
सब के देखत कृष्ण जो खावा । तेहु न बूझे काल स्वभावा ॥
सब के देखत आस जो कीन्हा । तासों कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥
साखी-काल सबन को आस्थो, वचन कह्यो समुझाय ॥
कहैं कबीर मैं का करो, देख नहीं पतिआय ॥
चौपाई
बूझो संतो काल की हानी । हरि को भाव भले मैं जानी ॥
कृष्ण के भयो जो प्रदुमनबारा । ताकुल अनिरुधलीन्ह अवतारा ॥
सुन प्रवीन बानासुर राऊ । शिव सेवही महाबल पाऊ ॥
ता नृप कै दुहिता एक भयऊ । ऊखा नाम तासु सो ठयऊ ॥
रूप आगर किमि करें बखाना । ताहि देख कर काम लजाना ॥
उन्मद यौवन भयो पुन जबही । काम बान सर लागेउ तबही ॥
( ४८ )
ज्ञानसागर
साखी-तासु दूत गण द्वारिका, अनिरुध अंश भुवार ॥
दोऊ उपजो मर्म अब, जस हंसनकी ज्वार ॥
चौपाई
दिवस आठ दस बीते जबही । अनिरुध कुँवर प्रगट भयो तबही ॥
बानासुर ने कोध दल साजा । अगणित बाज सम्हर कौ बाजा ॥
युद्ध करै दैत्य तहाँ जाई । अनिरुध सब कहँ मार हटाई ॥
छै प्रकार जीतो उन जबही । सातई बार भर्म भयो तबही ॥
दैत्य मार गहि समर अपारा । बाँध चपल कै कृष्ण कुँवारा ॥
कोई कहै मारो विषको मूला । शत्रु राखकै नृपकस भूला ॥
मंत्री कहई सुना भुवारा । शिव की आज्ञा मैं यह मारा ॥
नारद ऋषि तबही सुधि पाई । कृष्णहि बात जनावहु जाई ॥
चल भयो कृष्ण जो कोध अपारा । दैत्य जहाँ तहाँवा पशु धारा ॥
साखी-गरुड़ चढ़े तब कृष्ण सो, पुरही पहुँचे आय ॥
जाही नग्र अग्नि दियो, दैत्य राज तिहि ठाँयै ॥
चौपाई
आय दैत्य करै संग्रामा । हरि भेटें तेहि यम उन ग्रामा ॥
मारो हलधर अग्नित वीरा । बानासुर देख परे तेहि भीरा ॥
मोरा कृष्ण मता सुन आजू । अटल दियो महि शंकर राजू ॥
बहु विधि युद्ध दैत्य तब कीन्हा । कृष्ण चपल तेहि बाँध हिलीन्हा ॥
बाँध्यो नृप शंकर सुधि पाई । कोधित आई तब कृष्ण लराई ॥
दोनों वीर महा बल धारी । लागी होन परस्पर मारी ॥
दोनों मंत्र पुनि दीन अडाई । तारी मार मार पुन धाई ॥
दोह जुरे पुन मछ समाना । कौतुक आई निरंजन जाना ॥
दोउके समर पावक उठि जबही । आदि भवानी चलभइ तबही ॥
दोनों सुत कहँ जब बिलगावा । बादल पवनके जैसे स्वभावा ॥
ज्ञानसागर
( ४९ )
साखी-दोई सुत तब बरजी, आदि भवानी आय ॥
बर ऊषा अनिरुद्धको, शंकर दीन्ह मिलाय ॥
चोपाई
चले कृष्ण और सुत भामिनि । तासु अंग चमके जिमि दामिनि ॥
कृष्ण द्वारिका पहुँचे जाई । सो वृत्तान्त कहौं समुझाई ॥
जोपै हर हरिको व्रत धरई । प्रभु सेवक कहु काहे लरई ॥
प्रभु सेवक कहु कैसे लड़ाई । सो गति मोहि कहौ समुझाई ॥
हरि हर युद्ध सबै कोइ जाना । सहस्रनाम किमि करब बखाना ॥
यमराजा जु ठगौरी लायी । ज्ञान देख कर चेतो भायी ॥
बूझौ सब मिलि पाखंड धरमा । मैं जानौं भल कालही मरमा ॥
अदेख देख सब कहि समुझाई । ताको विरला जन पति आई ॥
साखी-शङ्कर कियो युद्ध हरिसों, तब कहु कैसो दास ॥
पंडित जन सब थापहीं, सहस्र नाम विश्वास ॥
चोपाई
चारौं वेद को मूल बताऊँ । सहस्र नाम को सार बुझाऊँ ॥
काशीमें विश्वास जनावई । विश्वनाथके मंदिर धावई ॥
विश्वनाथको भेद बतावहु । सार ग्रन्थ मोही समझावहु ॥
सबै ग्रन्थ करि आगिल कीन्हा । भक्ति तत्त्व सबै मिलि चीन्हा ॥
सब पर सहस्र नाम परवाना । जहाँ लग शास्त्र रु वेद पुराना ॥
तेहि जाने जेते सब कोई । बूझौ मरम जु विरला कोई ॥
बूझौ पंडित भेद बताई । प्रभु सेवक कहु कैसे लराई ॥
यह सब बन्ध बहुत मैं भाखी । ते यमराजा सब ठग राखी ॥
ज्यों नारी पिय को व्रत तजई । दूजे जु प्रेम प्रीति सों भजई ॥
तैसो देखो यह संसारा । नाम बिना किमि उतरे पारा ॥
साखी-भूल परी सब दुनियाँ, पाखंडके व्यवहार ॥
मूल छाँड़ि डारे गहै, कैसे उतरे पार ॥
( ५० )
ज्ञानसागर
चौपाई
तब हरि कीन्हे चरित अपारा । सो अब भाखौँ अगिलव्यवहारा ॥
पांडव पांच सेवा बहु करई । तिन सों कृष्ण हेतु बहु धरई ॥
मारन तासु को मतौ बिचारा । पांडव कौरव नृप दोह मारा ॥
दोनोंमें छल कियो भगवाना । ताको मर्म काहु नहि जाना ॥
बंधु विरोध वैर उपजाई । प्रतिदिन समर करें तहँ आई ॥
राजा दुपद स्वयम्बर ठाना । तहँ पारथ राहु संधाना ॥
दुयोंधन अस कीन्ह उपाई । कन्या मारि लेव पाँचों भाई ॥
कृष्ण ताहि छल मत उपजावा । तातें ताहि पांच पति भावा ॥
तेहि मारन हरि मतौ बिचारा । गीता कह अध्याय अठारा ॥
कौरव आई जो करहि लड़ाई । ताहि कृष्ण छलसे भरवाई ॥
मारचो करण गंगसुत द्रोना । सबको मारि कियो दल सूना ॥
मारचो दुयोंधन जो राई । अठारह शोहणी मार गिराई ॥
साखी-पाँचों पांडव बचि रहे, औ जूझे सब झार ॥
धरमराय अस कीन्हा, कृष्ण परी हंकार ॥
चौपाई
चल भये कृष्ण स्वर्ग अस्थाना । शून्यआदि जहँ शशिनहिंभाना ॥
पुर वैकुंठ ते आगे गयेऊ । तहाँ जाइके स्तुति कियेऊ ॥
अलख निरंजन अंतर््यामी । सब ते न्यारे हो तुम स्वामी ॥
सबमें व्याप्त निरंजन राया । पाँचो तत्त्व शून्य उपजाया ॥
तुमही ब्रह्मा विष्णु महेशा । आदि अंत तुम देव गणेशा ॥
अहो कृपालु कृपानिधि स्वामी । करहु दया तुम अंतर्यामी ॥
ततक्षण भई अकाशतें वाणी । अहो कृष्ण सबको उत्तपानी ॥
अब जो कहैं करो सो जानी । सोई वचन लेव सिर मानी ॥
तुम भेजा महि भार उतारहु । असुरनको विध्वंसके मारहु ॥
ज्ञानसागर
( ५१ )
साखी-मारहु जादव वंश कहैं, मानो वचन रसाल ।
गोपी जाय संहारो, तेहि पाछे तुव काल
कृष्ण वचन-चोपार्द
कृष्ण कहै सुनु पुरुष पुराना । काल अभै कहाँ मोर ठिकाना॥
निरंजन वचन
तैं मम अंश मोहिमें वासा । काल रूप संसार निवासा ॥
पातक जीव जो रहै महाबल । मारहुतिनिहीतुम अतिबल छल॥
उपजत विनसत क्षीन भइ देहा । कलियुग आवै क्षीण सनेहा ॥
क्षीण शरीर अवधि भइ थोरा । पूजी अवधि आई कै तोरा ॥
जस कछु कहो कियासो चढ़िहौ । जाकौ दिया राज महिकरिहौ॥
छाड़ो महि मंडलको भाऊ । जगन्नाथ में कष्ट बनाऊ ॥
तजो कृष्ण अब वेग शरीरू । आये अन्न अब दास कबीरू ॥
कृष्ण वचन
साखी-सुन कियो कृष्ण अचंभो, कैसो दास कबीर ॥
सो मोहि स्वामी कहब सब, तब मैं तजों शरोर ॥
निरंजन वचन-चोपार्द
कली अनेक राज है मोरा । कलियुग नरहिअवधि है थोरा ॥
पांडव नंदन यज्ञ जो ठानहि । ऋषिगण सबहीनिवतजुआवहि॥
यज्ञ पूर्ण नहिं ताकर होई । नाम प्रभाव कहै नहिं कोई ॥
कलि उत्पन्न मनुष्य शरीरू । जा कहैं सुनियो दास कबीरू॥
तिनके शिष्य सुपच जो होई । पूरण यज्ञकर ततक्षण सोई ॥
या सहिदानी तोहि बताऊँ । तोहि सेती महि मंडल छाऊँ ॥
बालिही राम रूप तुम मारा । ताकर होई व्याध औतारा ॥
ताकर बैर देहुँ तुम जाई । फेर जीव कछु संशय नाई ॥
सुनिकै कृष्ण चले सिरनाई । नगर द्वारिका पहुँचे आई ॥
पाण्डव यज्ञ तथा सुपच सुदर्शन कथा-वर्णन
( ५२ )
ज्ञानसागर
पांडव निवते यज्ञ पठाये । चलिये स्वामी बेग बुलाये ॥
मारन बंधु या किया लागा । तातें यज्ञ रची है रागा ॥
चल भये कृष्ण बार नहिलाये । पुर पांडव के आश्रम आये ॥
आवत समाधान नृप कीन्हा । छत्र तानि सिंहासन दीन्हा ॥
आवत कृष्णसभा सिर नावा । भोजन को तब आज्ञा पावा ॥
साखी-बैठे गन्धरव देव गण, ऋषि मुनिवर सब झार ॥
सब मिलि कीन्हा भोजन, इच्छा के अनुसार ॥
चौपाई
भोजन भये घंट नहिं बाजा । राय युधिष्ठिर को भयी लाजा ॥
अहो कृष्ण का करौं उपाई । सोमोहि स्वामी कहिये समुझाई ॥
जबहि कृष्ण अस भाव बताया । सुनहू मंत्र युधिष्ठिर राया ॥
खोजहु भक्त जो निर्गुण गावयी । सतगुण महिमा सदा बतावयी ॥
आनब ताहि यज्ञ निवताई । दीन भाव कर ताहि लिवाई ॥
कृष्ण वचन सुनि युधिष्ठिर राया । भगत बुलावन दूत पठाया ॥
सुनिके दूत चले चहुँ देशा । नहिं कोइ भक्तन भेटे वेशा ॥
चले भीम तब लागि न वारा । चहुँ दिश फिर काशी पगुधारा ॥
बैठे सुपच ताहि सों कहई । निर्गुन भक्त यहाँ कोइ रहई ॥
कहै सुपच निर्गुन को जानों । सतगुरु महिमा सदा बखानों ॥
साखी-कहै भीम सुन हरिजन, कृपा करौं मम संग ॥
चलो जहाँ हरि बैठे, स्वामी बाल गुविन्द ॥
चौपाई
कहै सुपच प्रभु कैसे कहऊ । कालहि जान कृष्ण परिहरऊ ॥
सुनतहि भीम कोप तब कीन्हा । यामैं कहा भक्त वर चीन्हा ॥
यहि मारो तो राख रिसाई । कह्यो मंत्र राजा पर जाई ॥
तीन लोक के जे प्रभुराई । तिनको भाखै काल कसाई ॥
ज्ञानसागर
( ५३ )
कृष्णहि कहै काल की फांसी । कीन्हही आय भक्त की हांसी ॥
मारचो नहि पर तुव भय माना । यह सुनकर विहिसे भगवाना ॥
सारखी-जाव युधिष्ठिर वेग दै, तुम आनो गहि पांय ॥
आज्ञा मानि चले तब, आये युधिष्ठिर राय ॥
चोपाई
अहो संत तजिये अपराधा । अधम उधारन सुनियत साधा ॥
चलो स्वामी मेरे गृह आजू । कृपा करौ मम होवै कालू ॥
कहैं सुपच सुन पांडव राज । तोर का काज होय वहि ठाऊ ॥
तुम्हरे गये होय मम काजा । परमारथ तुम को बड़ साजा ॥
चल परमारथ कारण संता । सभा माहिं बैठे हरषंता ॥
आवत स्वपच कृष्ण जब जाना । होय काज पूरण सनमाना ॥
राय युधिष्ठिर पखारे पांऊ । भोजन सादर आन जिवाऊं ॥
भोजन करके सुपच भयो ठाढा । बाज्यो घंट शब्द भयो गाढा ॥
बाज्यो घंट यज्ञ भयो पूरा । कौतुक देखि ऋषीगण भूला ॥
पूरण यज्ञ विष्णु जब जाना । तबही कीन्ह द्वारिका पयाना ॥
सारखी-बूझो रे नर परानी, क्या सुपचे अधिकार ॥
गण गन्धर्व सुनि देव ऋषि, सब मिलि कीन्ह अहार ॥
चोपाई
सब के खाये घंट नहि बाजा । धर्म की देह युधिष्ठिर राजा ॥
सो सब रहे पूर्ण यज्ञ नाहीं । नामहि महिमा जानत नाहीं ॥
सुपच जान भल नाम प्रभाऊ । ताते पूरण यज्ञ कराऊ ॥
कृष्ण शक्ति में सुनि ऋषि झूला । जान बूझिकै पंडित भूला ॥
बूझौ सन्तो नाम हमारा । नाम विना किमि उत्तरौ पारा ॥
कृष्ण पारथ ही वेग बुलावा । तेहि पुनि निज मतौ सुनावा ॥
गोपी लैकै जाऊं मैं जहँवा । पुर वैकुंठ सुमेर है तहँवा ॥
कृष्णका स्वर्गारोहण और जगन्नाथकी स्थापना
( ५४ )
ज्ञानसागर
मथुरा तैं तुम वेग लै आवहु । जाहु तुरन्त गहर जनिलावहु ॥
चल भयो पार्थ हाथ धनु तीरा । गोपी लैन कोटिन यदुबीरा ॥
आपस में जो करे लड़ाई । इक मारे एक मरजाई ॥
छप्पन कोटि जो सबै सिरानो । सो नट षट कृष्णहि के जानो ॥
अष्ट कन्या लखी चित्रसारी । तिनकहैं कृष्णजो यहि विधि मारी ॥
साखी-मारिन सब जेती हती, कृष्ण काल बरि यान ॥
तब अपने मन में गुनौ, करो उदधि अस्थान ॥
चौपाई
वधिक देव घात संधाना । बालि बैरको भाव जो जाना ॥
जम सब प्रान घेर लै गयेऊ । मारचो कृष्ण मूर्च्छित भयेऊ ॥
निरंकार निरंजन राऊ । आपहि मारिजो ताहि नसाऊ ॥
बालि का बैर व्याधा जबलीन्हा । यह तो भेद न काहू चीन्हा ॥
तीन लोक के कृष्ण भुवारा । रहै न बैर जीव व्यवहारा ॥
जो जीव आप स्वारथहि मारा । सो जीव अपनौ किमि निस्तारा ॥
तबहि कृष्ण अस मता विचारा । तत्त्व मता अस रूप संहारा ॥
जादव रूप कृष्ण सब मारे । पारथ बान रहे सब हारे ॥
गोपी रही जो प्राणहि प्यारी । तिनको कृष्ण येहि बिधि मारी ॥
आये कृष्ण पहुँ अर्जुन बीरा । लाज न छाड़ै अत्र शरीरा ॥
साखी-कहैं कृष्ण सुन अर्जुन, छाड़ो यहि संसार ॥
हम तो जात हैं स्वर्ग को, इत परंपंच अपार ॥
गये पारथ जहँ चारौं भाई । चलौ वही जहँ यादो राई ॥
कहै सन्देश सुनौ हो राऊ । यहवाँ मोर दर्श नहि पाऊ ॥
मृत मंडल नहि मेटव मोही । छाड़ौ महि बोलों अस तोही ॥
छाड़ौ राज पाट सब भाई । पुत्र राज देख सब जाई ॥