कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ११४ )
बोधसागर
सगरे झगरे रगरे बगरे, पशुज्ञान गहे डगरे डगरे ॥
बकचाल सभी न मरालमती, बिन एक रतीबन एकरती ॥
जब गर्भमें अर्भक अर्ज करे, तिहि गाढते साहिब गाढि धरे ॥
इत औरहि ढालको ख्याल खिला, बुधि खप्त मरे यहि तप्त शिला ॥
वह औध अचेत सुखोपति सो, कह पाय पराग बनारसको ॥
निज धामते राम पथाम लिया, जगती भगती पद पाय पिया ॥
कित हो झलकी मनसा मलकी, अरु अंध अचेतकिभयटलकी ॥
दुगदानी कि वानि विहानि इतै, मकरंदके फंदको जीव जितै ॥
मृतभृंगन बिंग बिहार करे, क्रम रेख विशेष न देख परे ॥
नहिं कोधित अंध कि गंध मिले, जिव दंडक भंडक भीर हिले ॥
गुरुपीर कबीर उजागर है, भव बोहित सोहित सागर है ॥
जगबंदन भर्म निकंदन है, सरनी सतलोककि संदन है ॥
सतनाम सनेह सुधाम चढे, कलिमा कलिमा कलिमाह पढे ॥
गुणग्राम निकास कबीर कबी, जस गावत पावत कोटि छबी ॥
धुरधर्म धराधर धार कहो, भवतारक पंथ प्रचार कहो ॥
नर पामर घामर बुद्धि बिना, यमज्योति पतंगके ढंग बना ॥
जग व्याधि रु आध असाध करे, चरणाम्बुज चरण चारु हरे ॥
भवतारन हेत निकेत कृपा, पयगाम लियो सुखधाम नृपा ॥
सुरभूप स्वरूप अनूप छिपा, रवि सोम जो कोटि करो मदिपा ॥
गुरुगुप्त कियो धुरको बरनं, भव और भयावन तौ शरनं ॥
हमरे उरके पुर बास करो, निज दासनको अब दास करो ॥
बिन कंतकै भौ जलजंत घने, दुखद्वंद कफंद कफंद फने ॥
जगमाह कि बाह निबाह लहे, भ्रम भो डरभे डरभीर बहे ॥
दनुजात बलात निपात भये, रणधीर बहीर गहीर गये ॥
जिहि जानत जान सुधाम धरे, मुनिके मन मंदिरमें बिहरे ॥
स्वसमवेदबोध
( ११५ )
मनमत्त मतंग मते यहि गौं, तुहि रावत होय महा उतजौं ॥
चित्तचञ्चर बञ्चर बञ्चक है, समसञ्च विरञ्च न रञ्चक है ॥
यम बंकट संकट जीव महा, दमको गमको रमको न रहा ॥
भवसेत अभय पद देत तुही, कलिकंटक कोटिन कर्म दही ॥
चटि सेत पपीलन ढील तहाँ, लैचि दीन पयोनिधि पीन महाँ ॥
नहिं वञ्चको हाड न चाड रहो, मन वाक शरीर कबीर कहो ॥
गुरु नेह न दीसन दीस जिन्हैं, सुखवासन आस है त्रास तिन्हैं ॥
तुम दीनन बन्धु न पीननके, नित पास हो दास अधीननके ॥
मद मान मलान हिये अरभौ, नर नागर सागर भौ गरभौ ॥
करि पाप कलाप करे दुनिया, विष बीज अर्माफल को लुनिया ॥
हरिमें हरिमें हमही वरषे, लहरी भवभक्ति हरी हरषे ॥
दुखदारिद वारिद ज्ञानघनं, निरभय करि भय शमनं शमनं ॥
जिव कालके जाल परे बपुरे, सतनाम निकास सदा जपु रे ॥
गुरुभक्ति निनार किनार गहे, चतुरे लुतरे भवधार बहै ॥
भ्रमभूलते मूलते जात भगे, बुध बालन डालन पात लगे ॥
मन बाचक याचक हौं दरको, तुम छोड अजोड सभी घरको ॥
प्रभु नामको दान निदान चहो, कोई आसरुवास बिकाश न हो ॥
तरनी बरनी तब नाम जहाँ, गहिये लहिये विशराम तहाँ ॥
रसना रसरास रसै रससो, जसतौ बस और सबै कस हो ॥
चढ नाम रथा गइ बीत विथा, रसना रसना बिन कीर्त कथा ॥
पदपंकज प्यार जो छूटि गया, अरु सूत सनेहको टूटि गया ॥
ठग ठाकुर आनिके जूटि गया, जगजीवनकी बुधि छूटि गया ॥
रहगी रमते बड़ि भीर भई, सतपंथ विहाय कुपंथ लई ॥
गुरुभक्ति बिना भव भूलि परे, शरणागत पाहि कबीर हरे ॥
( ११६ )
बोधसागर
दोहा—यह कबीर पंचाशिका, पढ़ै सप्तीति प्रतीत ।
परम पुरुष पद पावही, काल कष्ट जा बीत ॥
इति श्रीकबीर पंचाशिका
सत्यकबीर वचन—चौपाई
तब हम कहा जीव समुझाई । जोर करो तो वचन नसाई ॥
जब तुम जाय धरो नर देहा । तब तुम करिहो शब्द सनेहा ॥
पुरुष नाम सुमिरन सहिदानी । बीरा सार करो परमानी ॥
देह धरे सत शब्द समाई । तब हंसा सतलोकहि जाई ॥
देह धरे कीने जहँ आसा । अन्तकाल लीनो तहँ बासा ॥
अब तोहि कष्टभयौ जिव आनी । ताते यहि बिधि बोलो बानी ॥
जब तुम देह धरो जग जाई । बिसरे पुरुष काल धरि खाई ॥
जीव वचन—चौपाई
कहै जीव सुन पुरुष पुराना । देह धरे बिसरो नहिं ज्ञाना ॥
पुरुष जानि सुमिरौं यमराई । वेद पुरान कहैं समुझाई ॥
वेद पुरान कहै मत येहा । निराकारसे कीजै नेहा ॥
सुर नर मुनि तैंतीस कोरी । बंधे सबहि निरंजन डोरी ॥
ताके मत कीने हम आसा । अब यह जानि परा यमफांसा ॥
ज्ञानी वचन—चौपाई
सुनो जीव यह छल यमकेरा । यह यमफन्दा कीन घनेरा ॥
छंद—कला कला अनेक कीनो जीव कारन ठाट हो ।
वेद पुरानो शास्त्र स्मृती याते हूँध्यौ बाट हो ॥
आप तनधरि प्रकट है यम सिफत आपन कीनहो ।
नाना गुन मन कर्म फाटो जीव बंधन दीन हो ॥
सोरठा—कला कला परचण्ड, जीव परे बस कालके ।
जन्म जन्म सह दण्ड, सत्यनाम चीन्हे बिना ॥
कबीर पंचाशिका एवं अन्य बोध
स्वसमवेवबोध
( ११७ )
चौपाई
छन यक जीवनको सुख दैऊ । जिव बँध मेटि पुरुषपहँ गेऊ ॥
अथ जीवमुक्तावन हेत सत्य कबीरको संसारमें आगमन कथा—चौपाई
यहि विधि काल जक्त धरि खायौ । जिव नहिं कोई मुक्तिपद पायौ ॥
तीनों पुर पसरा यमजाला । सकल जीव कहँ कीन बिहाला ॥
कालके करते जीव न छूटे । बहुविधि योगयुक्तिमें जूटे ॥
विनशत शब्द न जीव उवारा । तब समरथ अस वचन उचारा ॥
सत्य पुरुष वचन—चौपाई
कैल सकल जग बारचौ खाई । एको जीव लोक नहिं आई ॥
तातै समरथ मोहि फरमाई । साँचे जीव आन मुक्ताई ॥
पुरुष वचन कीने तिहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥
प्रथमहि चलयौ जीवके काजा । पुरुष प्रताप शीस पर छाजा ॥
सतयुग सत्य सुकृत मोर नाऊँ । आज्ञा पुरुष जीव बर आऊँ ॥
करि परनाम तब पगधारा । पहुँच्यौ आय धर्म दरबारा ॥
द्रीप झांझरी नाम बखानी । कैल पुरुषकी सो रजधानी ॥
पगके देत झांझरी गाजा । कैल पुरुष बैठा तहँ राजा ॥
गये झांझरी द्रीप मँजारा । गर्बित काल न बुद्धि विचारा ॥
मोकहँ देखि धर्म ढिग आई । महाक्रोध बोले अतुराई ॥
योगजीत इहवाँ कस आवो । सो तुम हमसे वचन सुनावो ॥
योगजीत वचन—चौपाई
तासो कह्यौ सुनो धर्मराई । जीवकाज संसार सिधाई ॥
तुम तो कष्ट जिवनको दीना । तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीना ॥
जीव चिताय लोक ले आवो । काल कष्टते जीव छोड़ावो ॥
ताते मैं संसारहि आवो । देय परवाना लोक पठावो ॥
अथ कालपुरुष और सत्यकबीरका युद्धवर्णन—चौपाई
काल क्रोध करि वचन उचारा । भवसागरमें राज हमारा ॥
( ११८ )
बोधसागर
तुम कस जिव मुक्तावन आवा । मारो तोहि अबहि भलदावा ॥
काल अनंत रूप तब धारा । योगजीत कह आनि प्रचारा ॥
महाभयंकर रूप बनावा । गज स्वरूप है सम्मुख धावा ॥
सत्तरयुग हम सेवा कीना । पुरुष मोहि भवसागर दीना ॥
परमपुरुष सेवा वस भैऊ । राज तिहुँ पुरको मोहि दैऊ ॥
तब तुम नारि निकारौ मोही । योगजीत नहि छोडो तोही ॥
अस कहि धाय सुंड फटकारा । दंतसो योगजीत पर मारा ॥
योगजीत कै लहि ललकारा । गहि कर सुंड दूर तिहि डारा ॥
पुरुषप्रताप सुमिर मन माहीं । मारचो सत्य शब्द से ताहीं ॥
ततछन ताहि दृष्टि पर हेरा । श्यामलिलार भयौ तिहिकेरा ॥
पंख घात जिमि होय पखेरू । तैसे कैल मोहि प्रति हेरू ॥
जब फटकार कर गहे डाला । भागा काल पैठ पाताला ॥
गयौ पाताल कूर्मके आगे । योगजीत गये पीछे लागे ॥
बिनती करे कूर्मसे जाई । राखो कूर्म शरन हम आई ॥
योगजीत मोहि मारि निकारा । जिव ले जाय पुरुष दरबारा ॥
युगन युगन हम सेवा कीना । पुरुष मोहि भवसागर दीना ॥
एक पायँ हम ठाढे रहेऊ । तबहि पुरुष सेवा सब भैऊ ॥
तीन लोक दीना मोहि हारी । अब कस मोकहँ मारि निकारी ॥
जाय कूर्मकी शरन जो परेऊ । तब ताने दाय़ा उर धरेऊ ॥
कूर्मवचन--चोपाई
तबै कूर्म उठि बिनती लाई । को तुम आहु कहाँ ते आई ॥
अपनो नाम कहो मोहि स्वामी । पुरुष अंश तुम अंतरयामी ॥
योगजीत वचन--चोपाई
तब हम कहा नाम मोर ज्ञानी । योगजीत हम अंश बखानी ॥
समरथ वचन जीव बर आवा । काल फौंस जीवन मुक्तावा ॥
स्वसमवेदबोध
( ११९ )
कैलवचन
सुन ज्ञानी मोर वचन अलेखा । अपने मनमें करो बिवेका ॥
सत्तर युग हम सेवा कीना । पुरुष बकसि भवसागर दीना ॥
समरथ वचन दीन मोहि हारी । तीन लोक पायौ संसारी ॥
तबकी बात रहित भै भाई । अब कस उलटी अदल चलाई ॥
सबै अंश भुक्तै रजधानी । हमपर कोप भयौ तुम ज्ञानी ॥
अब जस निरणय हमै सुनावो । तस सीषा पन जानि चलाओ ॥
कूर्मवचन
तबै कूर्म बोले अस वानी । बिनती एक सुनो हो ज्ञानी ॥
जो तुम बिनती मानो मोरा । तौ हम तुमसे करे निहोरा ॥
तुमहू कैल वचन जौ मानो । तौ हम ज्ञानी निर्णय ठानो ॥
ज्ञानी सुनौ पुरुष कै अंशा । धर्मरायको मेटो संसा ॥
चौका पान कजाव तुमारा । लोक वेदको काल पसारा ॥
जो कोइ करे जोर बरियाई । तौ हम ताके संग न भाई ॥
कूर्म जबै अस बिनती ठानी । ज्ञानी कैल दोहू सुख मानी ॥
फिरके कैल झांझरी आनो । ज्ञानी कैलको वचन सुनावो ॥
ज्ञानी और कालपुरुषको वार्ता--चौपाई
बिना शीसके यमकी देही । काल पुरुषको चीन्ह है येही ॥
सत्य कबीरसे बिनय उचारी । सुनिये ज्ञानी अरज हमारी ॥
अपनी देह नाथ मोहि दीजै । ऐसी मोपर दाय़ा कीजै ॥
ताको वचन मानि हम लीना । अपनी देहको कैलको दीना ॥
शीश समेत और बिन माथा । दोनों देह निरंजन साथा ॥
जब चाहे तब शीस देखाई । निज इच्छा पुनि ताहि लोपाई ॥
जो साधू बैराट निरेखे । सो यह कौतुक नैनन दीखे ॥
रूप विराट शून्यमें निरखे । निजु आगूको लेखा परखे ॥
जब षट्मास मरन रहि जावै । काल कबीर कि देह छपावै ॥
( १२० )
बोधसागर
अपनी देह देखावै काला । तब साधू जाने जंजाला ॥
बिना शीस जब दरसै देहा । काल पुरुष तब जाने येहा ॥
मरन काल निज साधु निहारी । होहि सचेत लगावै तारी ॥
निरंजन वचन
सोरठा-तुमहुँ करो बखशीश, पुरुष जो दीनो राज मोहि ।
षोडशमें तुम ईश, ज्ञानी पुरुष एक सम ॥
ज्ञानी वचन--चौपाई
ज्ञानी कहै सुनो धर्मराई । जीवनकहँ मैं आन बचाई ॥
पुरुष आज्ञाते मैं चलि आवों । भवसागरते जीव मुक्तावों ॥
पुरुष अवाज टार यहि बारी । तौ मैं तोकहँ देब निकारी ॥
शब्द
अपने नामकी सोंकर गह मैं पाटि डरी हो ।
तना तनतकै बेटवा मारे निधिया गई बौराई ॥
देहरि चढ़िके मेहरि मारे निर्ई देखो गुरुवाई ।
परवा फोरि द्वैचोखा निकसे बीचमें मिलि गई हस्ती ॥
सोटा चार कमरमें मारेनि निकर गई अलमस्ती ।
आसन लूटेनि वासन लूटेनि लूटे तिनपाई पौवा ॥
ताल अस मोर सनहक लूटी हांडी चलावन डौवा ।
हँसियाको बेट कोदोकै भूसी ईमोर न्यामत लूटी ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो दुविधा गै अब छूटी ।
निरंजन वचन--चौपाई
धर्मराय अस बिनती ठानी । मैं सेवक दुतिया नहिं मानी ॥
ज्ञानी बिनती एक हमारा । सो न करो मोर होय बिगारा ॥
पुरुष मोकहँ दीनो राजू । तुमहू देव होय तब काजू ॥
बिनती एक करो हो ताता । दृढ़ करि जान्यौ हमरी बाता ॥
स्वसमवेदबोध
( १२१ )
कहा तुमार जीव नहीं माने । हमरी दिशभै वाद बखानै ॥
मैं हठ फंदा रच्यौ बनाई । जामें जीव परा अरुझाई ॥
वेद शास्त्र सुमिरन गुन नाना । पुत्र हैं तीन देव परधाना ॥
देवल देव पखान पुजार्ह । तीरथ व्रत जप तप मन लाई ॥
यज्ञ होम अरु नियम अचारा । और अनेक फंद हम डारा ॥
जौ ज्ञानी जैहो संसारा । जीव न माने कहा तुमारा ॥
ज्ञानी वचन-चौपाई
ज्ञानी कहै सुनो धर्मराई । काटो फंद जीव ले जाई ॥
जेतो फंद रची तुम बारी । सत्यशब्द ले सकल विडारी ॥
जिहि जिवको हम शब्द हटै हैं । फंद तुम्हार सबै सुतैहैं ॥
निरंजन वचन चौपाई
सतयुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनों युग जिव थोरे रहिजाही ॥
चौथा युग जब कलऊ आई । तब तुव शरण जीव बहु जाई ॥
ऐसे वचन हारि मोहि दीजै । तब संसार गौन तुम कीजै ॥
ज्ञानी वचन चौपाई
अरे काल परंपंच पसारा । तीनो युग जीवन दुख डारा ॥
बिनती तोरि लीन मैं मानी । मोकहैं ठगे काल अभिमानी ॥
चौथा युग जब कलऊ आई । तब हम अपनो अंश पठाई ॥
काल फन्द छूटे नर लोई । सकल सृष्टि परवानिक होई ॥
घर घर देखो बोध विचारा । सत्य नाम सब ठोर उचारा ॥
पांच हजार पांचसौ पांचा । तब यह वचन होयगा सांचा ॥
कलियुग बीत जाय जब येता । सब जिव परम पुरुषपद चेता ॥
निरंजन वचन चौपाई
ज्ञानी बिनती सुनो हमारी । द्वापर अंत होय जिहि बारी ॥
बोध शरीर धरब हम जाई । जगन्नाथको नाम धराई ॥
( १२२ )
बोधसागर
राजा इंद्रदौन पहाँ जैहैं । मेरो मंदिर सोई उठै हैं ॥
तब समुद्र ढाहनको धावै । मंदिर मेरो तोरि बहावै ॥
कृपा करो तब तुम तहाँ जाई । मेरो मन्दिर देहु थपाई ॥
जो हंसा तुमरो गुण गाई । ताके निकट तो हम नहिं जाई ॥
जो कछु वर माँग्यो धर्मराया । सो ज्ञानी दीनो करि दाया ॥
धर्मराय उठि शीस नवाई । तब ज्ञानी संसारहि आई ॥
इति
अथ सतयुगमें ज्ञानीजीको मृत्युलोकमें आगमनकथा और सत्य
सुकृत नाम धारण और जवत जीव तारण--चौपाई
ज्ञानी योगजीत कहलाये । सत्यसुकृत सुनींद्र बतलाये ॥
पुनि अचित मुक्तामणि होई । योग संतायन कहिये सोई ॥
अविनाशी करुणामय जानी । कबीर आदि बहुनाम बखानी ॥
चारों युगके चारों नामा । सतयुग सत्यसुकृत गुणधामा ॥
त्रेतामाँह सुनींद्र नामधर । करुणामय स्वामी कह द्वापर ॥
कलियुगमाँह कबीर कहाये । हिंदू मुसलमान गुण गाये ॥
सैद अहमद कबीर बखाना । शेख कबीर कहे मुसलमाना ॥
सोई सकल जक्त गुरु पीरा । नाम अनेकन ताके तीरा ॥
देश देशमें नाम है न्यारा । सारे जीव जक्तको तारा ॥
वेद पुराण जासु गुण गावै । नाम अनंत जासु निरतावै ॥
आदिकाल जब सतयुग आया । सत्यसुकृत सो नाम धराया ॥
तीन देवते कीन पुकारा । सो नहिं माने मन हंकारा ॥
प्रथमहिं जब पृथ्वीपर आये । नृप घोघल कह नाम हढ़ाये ॥
सतगुरु चीन्हि चरण लपटाना । नरनायक लह पद निर्वाना ॥
पुनि सतगुरु मथुरामें आई । खेमसरी तिय तहाँ रहाई ॥
खेमसरी ग्वालिनहि चितावा । कुल परिवार सहित मुक्तावा ॥
स्वसमवेदबोध
( १२३ )
पुनि सत सुकृत लोक सीधारा । पहुँच हंस पुरुष दरबारा ॥
पुरुष दरश सब हंसन पाईं । कोटि सोम रवि रोम लजाईं ॥
पुरुष स्वरूप भये सब हंसा । बीती सब यमकी भ्रम शंसा ॥
कछु दिन कीने लोक निवासा । बहुरि आय देख्यो निजदासा ॥
निशि दिन रहौं गुप्त जगमाहीं । मोकहँ कोइ जिव चीन्हत नाहीं ॥
जिहि जीवन परबोध्यौ आईं । दीन्हौं तिनको लोक पठाईं ॥
सत्यलोक हंसनको बासा । सदा वसंत पुरुषके पास ॥
इति
सतयुगका वृत्तान्त
अथ त्रेतायुगमें सतसुकृतजीको पृथ्वीमें आगमनकथा और
मुनींद्रनाम धारण और जबत जीवतारण
सत्कबीर वचन-चौपाई
सतयुग गत है त्रेता आवा । नाम मुनींद्र जीव मुक्तावा ॥
जब आयो जीवन उपदेशा । धर्मराय उर हुआ अँदेशा ॥
इन भवसागर मोर उजारा । जिव ले जाय पुरुष दरबारा ॥
कितनो छल बल करो उपाईं । ज्ञानी डर मोर नाहिं डेराईं ॥
पुरुष प्रताप ज्ञानीके पास । ताते मोर न लागे फाँसा ॥
इनते काल बसावै नाहीं । नाम प्रताप जीव घर जाहीं ॥
छंद-सतनामके परताप धर्मन हंस निज घरको चले ॥
जिमि देखि केहरि त्रास गज हो कँपिके धरनी रले ॥
पुरुष नाम प्रताप केहरि काल गज सो जानिहै ॥
नाम गहि इसलोक पहुँचे बहुरि भव नाहिं आनिहै ॥
सोरठा-सतगुरु शब्द समय, गुरु आज्ञा निरखत रहै ।
रहै नाम लौ लाय, कर्म भर्म ममता तजे ॥
चौपाई
त्रेतायुग तबही पग धारा । मृत्युलोक कीनो पैसारा ॥
( १२४ )
बोधसागर
जीव अनेकन पूछेहु जाई । यमसे को तोहि लेय छोड़ाई ॥
कहै कर्म वश जिव अज्ञाना । हमरे कर्ता पुरुष है ध्याना ॥
विष्णु सदा हमरे रखवारा । यमसे मोहि छोडावनहारा ॥
कोई महेश कि आसा लावै । कोइ चंडी देवीको गावै ॥
कहा करो जिव भयो बिगाना । खसम छोड़िकर जार बिकाना ॥
भरम कोठरी सब जग डारा । धोखा दे यम जीवन मारा ॥
साखी सोई काल सोई है करता, भक्ति मुक्ति तिहि हाथ ।
हमरो कहा न आदरे, मन यम जिवके साथ ॥
परंपंची निरंजन, मन सोई ओंकार ।
फंदे तीनों लोक सब, कोई न पावै पार ॥
चौपाई
सत्यपुरुषको आयसु पावो । कालहि मेटिछोरि जिव ल्यावो ॥
जोर करो तो वचन नशाई । सहज जीवन लेहु चेताई ॥
जो ग्रासै जिव सेवै ताही । अनचीन्है यमके मुख जाही ॥
चहुँदिशि फिर आयौ गढलंका । जहँवाँ रावण बसै निशंका ॥
भाट विचित्र पन्यौ गुरुचरना । पायौ अमर धाम गहि शरना ॥
मंदोदरी प्रेममें पागी । सतगुरुके सो चरनन लागी ॥
रानीको दीनो गुरुदिच्छा । पूरन भई तासुकी इच्छा ॥
पुनि आयौ रावण दरबारा । जहाँ पौरिया रह रखवारा ॥
कह्यौ पौरियाते तब जाई । रावणको मम पांह बोलाई ॥
जबहि पौरिया खबरि जनाई । सिद्ध एक प्रभु तुमहिं बोलाई ॥
सुनि प्रभु क्रोधकीन तेहि बारा । तैं मतिहीन आहि प्रतिहारा ॥
शिवसुत मोर दरश नहि पावै । भिक्षुक मोकहँ कहा बोलावै ॥
यह मत ज्ञान हन्यौकिन तोरा । जो तू मोहि बोलावन दोरा ॥
स्वसमवेदबोध
( १२५ )
हे प्रतिहार सुनो यह बानी । सिद्धरूप तुम कहो बखानी ॥
कौन बरन अरु कौन है भेखा । मोसन कहो दृष्टि जो देखा ॥
अहो राव तिहि श्वेत स्वरूपा । श्वेतहि माला तिलक अनुपा ॥
शशिसमान तिहि रूप विराजा । श्वेतबरन सब श्वेतहि साजा ॥
मंदोदरि कह सुन रावण राजा । यह तो रूप पुरुषको साजा ॥
वेगिहि आय गहो तुम पाई । तौ तुव राज अटल है जाई ॥
छोड़िहो अपनो मान बढ़ाई । गहो चरण तिहि शीस नवाई ॥
रावण सुनत कोध अति कीना । जरत हुताशन जनु घृत दीना ॥
रावण चलो अस्त्र गहि हाथा । तुरत जाय तिहि काटो माथा ॥
मारो ताहि शीस खसि परई । देखो भिक्षुक कहा मोर करई ॥
जहैं सुनींद्र तहैं रावण आई । सत्तर बार तरवार चलाई ॥
लै सुनींद्र यक तृणको ओटा । अतिबल रावण मान्यो चोटा ॥
रावण अस्त्र अफल जब भयऊ । तब खिसियायके सोरहि गयऊ ॥
तृण सुनींद्र लीने यहि भावन । बल तुमार देखो नृप रावण ॥
काटे जो तृण कटै न तेरे । कौन भाँति शिर खंडै मेरे ॥
मन्दोदरी कहै समुझाई । हे नृप सतगुरुको गहु पाई ॥
रावण कहे सहित अभिमाना । सेवों शिव नहिं जानों आना ॥
जाने अटल राज मोहिं दीना । ताहि दंडवत पलपल कीना ॥
ऐसो वचन सुनींद्र पुकारी । हो रावण तुम गर्व प्रहारी ॥
भेद हमारा तुम नहिं जानी । वचन एक तोहि कहौं बखानी ॥
रामचंद्र तोहि माँरें आई । मांस तुम्हार स्वान नहिं खाई ॥
रावणको कीनो अपमाना । औध नग्र कह कीन पयांना ॥
मारगमाहँ चलो जब जाई । मधुकर विप्र मिला तब आई ॥
सो सुनींद्रके चरनन परेऊ । अतिसै प्रेम मोद मन भरेऊ ॥
तापर सतगुरु कीनी दाय। सहितकुटुम निजलोक पठाया ॥
( १२६ )
बोधसागर
रामचन्द्र वन भये दुखारी । तबहिं मुनींद्र तहाँ पग धारी ॥
योग युक्ति रघुपतिहि दृढ़ाई । बहुविधि ताकहैं शांति धराई ॥
जब मुनींद्रजी दायो कीने । सेत बांधि लंका पग दीने ॥
मन संशय कीने हनुमाना । सतगुरु कृपा लह्यौ दृढ़ ज्ञाना ॥
गरुड़ जो परम प्रेमते ध्याये । परम हंसकी पदवी पाये ॥
यहि बिधि केते जीव चेतार्ई । तब मुनींद्र निज लोक सिधार्ई ।
पहुँचे हंस पुरुष दरबारा । दरस पाय दुख हंस विदारा ॥
कछुक दिवसजबयहिबिधि बीते । त्रेता गत द्वापर तब थीते ॥
इति त्रेतायुगवृत्तान्त
अथ द्वापर युगमें मुनींद्रजीको पृथ्वीमें आगमन कथा और करुणामय
स्वामी नामधारन और जवतजीव तारन--बोपाई
पुरुष अवाज भई तेहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥
परम पुरुष कह शीस नवाई । महि मंडल मुनींद्र चलि आई ॥
जो प्रभु आहि नाम अरु नामी । द्वापर कह करुणामय स्वामी ॥
प्रथमहि जब भूलोक सिधारे । गढ गिरनार तहाँ पग धारे ॥
चंद्रविजय नृप नाम बखानी । गढ गिरनार तासु रजधानी ॥
परम भक्ति मय ताकी रानी । इंद्रमती तेहि नाम बखानी ॥
साधुसे परम प्रीति सो धारे । नित साधुनकी बाट निहारे ॥
साधुको जहाँ कहुँ आवत हेरे । नित आपने ढिग सो टरे ॥
परम प्रीतिसे सेवा धारे । तन मन धन साधुनपर वारे ॥
तासु प्रीतिकी रीति बिचारी । करुणामय स्वामी पग धारी ॥
जात चले तेहि मारग माहीं । रानीको मंदिर रह जाहीं ॥
देखे रानी चढ़ी अटारी । साधु जानि हरषित भइ भारी ॥
त्वरित पठायौ तहाँ निज चेरी । बेगि साधुको आनहु टेरी ॥
वृषली चलि हमकहैं शिर नावा । रानीको संदेश सुनावा ॥
स्वसमवेदबोध
( १२७ )
महाराज दाया चित दीजै । भूपति भौन गौन अब कीजै ॥
करुणामय स्वामी कह ताहीं । हम नहिं भूपतिके गृह जाहीं ॥
राज काज है मान बड़ाई । हमैं साय ना नृप घर जाई ॥
पुनि वृषली रानी ढिग आवो । साधु न आवै मोर बोलावो ॥
यह सुनि इंद्रमती उठि धाई । करुणामयके पद शिर नाई ॥
मोपर दाया कीजै नाथा । मो गृह चलिये करो सनाथा ॥
रानीकी लखि प्रीति अपारा । करुणामय तिहि भौन सिधारा ॥
ताके भौन जबहि पग दीनो । चरण धोय चरनोदक लीनो ॥
रानी चरनामृत करि पाना । बहुतभांति कीने सनमाना ॥
कीन सेव भल हिय हर्षाई । पीछे ज्ञान मुननको आई ॥
सुनि गुरुज्ञान प्रीति अति बाढ़ी । चरनन लागि प्रेममें गाढ़ी ॥
नाथ मोहि गुरुदीक्षा दीजै । अपनी शरन माहिं अबलीजै ॥
रानीको गुरुदीक्षा दीना । राजा चंद्रविजय नहिं लीना ॥
रानीको निज लोक पठाया । सो सतगुरुसे विनय सुनाया ॥
हे प्रभु नृपको करो उबारा । यद्यपि वह नहिं शिष्य तुमारा ॥
भावभक्ति रानीके काजा । सतगुरु कृपा तरो सो राजा ॥
यहिबिधिजिनजिनगृहगुरुज्ञाना । सो सब सत्यलोक कर थाना ॥
हंसनको सतलोक ले जाई । तहाँ आप कछु काल वितार्ई ॥
इति द्वापर युग
अथ कलियुगमें करुणामय स्वामीको पृथ्वीमें आगमन कथा
और सत्य कबीर और सेयद अहमद कबीर शेख कबीर
नामधारण और जग जीव तारण--चौपाई
द्वापर जगको अंत जो पाया । पुरुष बचन तब टेरि सुनाया ॥
ज्ञानी बेगि जाहु मर्त्य लोक । नाश करो जीवनको शोका ॥
सत्य पुरुषको करो प्रणामा । तब ज्ञानी पहुँचे नर धामा ॥
( १२८ )
बोधसागर
प्रथमहि मृत्युलोक जब आये । कलियुग नाम कबीर कहाये ॥
हिंदू मुसलमान गुरुपीरा । मिश्रित नाम कहाव कबीरा ॥
प्रथमहि प्रकट भये चलि काशी । तहाँ आपनो ज्ञान प्रकाशी ॥
नग्रमें जबहिं धरे निज पाई । श्वपच सुदर्शन तहाँ रहाई ॥
ताने सतगुरुको पहिचाना । चरनन लागि गह्यो दृढ़ ज्ञाना ॥
जब सतगुरुकी दीक्षा पाई । करे भक्ति सो मन चित लाई ॥
श्वपच करे भक्ती मन लाई । मात पिता देखै हर्षाई ॥
भक्ति पुत्र लखि हरषित होई । सतगुरु दीक्षा लियो न दोई ॥
ताही काल कृष्ण औतारा । अरु कौरौ पांडव तन धारा ॥
सत्य कबीर कृष्णसंवादा । ज्ञानगुष्टि तहैं बहु कथि बादा ॥
कृष्णहि बहु विधि ज्ञान दृढाई । क्षर अक्षरके पार लखाई ॥
सत्य कबीर ज्ञान गंभीरा । कथे सकल सुर नर मुनितीरा ॥
ताही समय युधिष्ठिर राजा । ताने कीन यज्ञको साजा ॥
वंधु मारि अपकीरति कीना । ताते यज्ञ रचन चित दीना ॥
कृष्णकेरि जब आज्ञा पाई । तब पांडौ सब साज मँगाई ॥
यज्ञ कि सामित्री गहि सारी । जहैं तहैंते सब साधु हँकारी ॥
पांडौ प्रति बोले यदुपाला । पूरन यज्ञ जान तिहि काला ॥
घंट अकास बजत सुनि आवो । यज्ञको तब पूरन फल पावो ॥
जुरे तहाँ कोटिन ऋषि राजा । साधू ब्राह्मण सहित समाजा ॥
भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सबहि जेवाई ॥
भोजन कीन सकल ऋषिराई । बजा न घंट भूप भ्रम आई ॥
पांडौ तबहि कृष्णपहैं गयऊ । मन संशय करि पूछत भयऊ ॥
करिके कृपा कहो यदुराजा । कारन कौन घंट नहि बाजा ॥
सो अस कारण तासु बताई । साधू नहि कोइ भोजन पाई ॥
चक्रत है तब पांडौ कहेऊ । कोटिन साधू भोजन लहेऊ ॥
स्वसमवेदबोध
( १२९ )
अब कहँ साधु पाइये नाथा । तब तिनते बोले यदुनाथा ॥
श्वपच सुदर्शनको ले आवो । आदर मान समेत जँवावो ॥
सोई साधु और नहिं कोई । पूरन यज्ञ जाहिते होई ॥
कृष्णकी जब अस आज्ञा पाई । तब पांडौ ताके ढिग जाई ॥
श्वपच सुदर्शनको ले आई । विनय प्रीतिसे ताहि जँवाई ॥
भूप भौन भोजन कर जबही । बजा अकाशमें घंटा तबही ॥
काल कलुक जब गयौ सिराई । तब देहांत श्वपचको आई ॥
तन तजके तब सो चलि जाई । सतगुरु तिहि निजलोक पठाई ॥
ताही समय कृष्ण तज देही । बोधरूप धारचो तब येही ॥
नाम जो इन्द्रदौन तेहि काला । देश उड़ैसेको महिपाला ॥
तन तजि कृष्ण तहां चलि जाई । इन्द्रदौन कहँ स्वप्न देखाई ॥
स्वप्नमें अस हरि ताहि बताई । मेरो मंदिर देहु उठाई ॥
भूपतिसे जब ऐसे कहेऊ । सो मंदिरकी रचना गहेऊ ॥
रामचंद्र गहि निज दल भीरा । गये जबहि वारिधिके तीरा ॥
बांध्यौ सेत बंध बरियाई । तेहि कारन सागर दुख पाई ॥
जो बलवान अबल दुख देई । बदला अवशि भरैंगे तेई ॥
नीति निरंजनकी यह जाना । स्वसमवेदमें प्रथम बखाना ॥
बदला पूर्व लेन तिहि बारा । छोभित सिन्धु उठा खरधारा ॥
जब रचि मंदिर लाग उठावा । क्रोधवंत सागर तब धावा ॥
छनमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथको मंदिर तोरे ॥
हारा नृप करि जतन उपाई । हरि मंदिर तहाँ उठै न पाई ॥
सत्यकबीर बचन-चौपाई
मंदिरकी यह दशा बिचारी । बर पूरब मनमाहँ सँभारी ॥
तब हम चले उड़ैसे माहीं । इन्द्रदौन भूपतिके पाहीं ॥
मन्दिर षट परकार बनाई । उदधि नीर तेहि लीन बुडाई ॥
पीछे उदधि तीर हम जाई । जायके चौरा तहाँ बनाई ॥
बो० सा० ९/
( १३० )
बोधसागर
इन्द्रदौनकहँ वचन सुनावो । अहो राव तुम काम लगावो ॥
मण्डप शंक न राखो राजा । इहवों हम आये यहि काजा ॥
जाहु बेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानो वचन हमारा ॥
राजा मण्डप काम लगाई । मण्डप देखि उदधि तब धाई ॥
सागर लहरि उठै बिकरारा । आवै लहरि क्रोध चित धारा ॥
उदधि उमङ्ग क्रोध अति आई । लहरि आनि चौरा नियराई ॥
दरस हमार उदधि तब पाई । अतिभय मान रहा ठहराई ॥
समुद्र वचन
छन्द-रूप धान्यो विप्रको तब उदधि हमपै आइया ।
चरन गहिके माथ नायो मरम हम नहि पाइया ॥
जगन्नाथके भोर स्वामी ताने हम इत आइया ।
अपराध मेरो क्षमा कीजै मरम अब हमपाइया ॥
सोरठा-तुम प्रभु दीन दयाल, रघुपति ओल दिवाइये ।
वचन करो प्रतिपाल, कर जोरे बिनती करो ॥
चौपाई
कीनो गौन लंक रघुवीरा । उदधि बांधि उतरे रन धीरा ॥
जो कोइ करे जोर बरियाई । अलखरूप तिहि ओल दिवाई ॥
मोपर दया करो तुम स्वामी । लेव ओल उर अंतर्धामी ॥
कबीर वचन--चौपाई
ओल तुमार उदधि हम चीन्हा । बोरे नम्र द्वारिका दीना ॥
उदधि वचन
यह सुनि उदधि धरचो तब पाई । चरन टेकि तब चल हरषाई ॥
उदधि लहरि उमँगौ तब धाई । बोरचो नम्र द्वारिका जाई ॥
मंदिर काम पूर तब भयऊ । हरिको थापन तहवों कियऊ ॥
कृष्ण वचन--चौपाई
तब पंडन हरि स्वप्न जनायो । सत्य कबीर मोहिं पै आयो ॥
स्वसमवेदबोध
( १३१ )
आसन सागर तीर बनाईं । दरस कबीर उदधि उठि जाईं॥
यहि विधि मंदिर मोर थपाईं । कलि युगमें एक धाम बसाईं ॥
पंडा वचन--चौपाई
पंडा उदधि तीर तब जाईं । करि असनान मंडपहि जाईं ॥
पंडा मन अस पाखण्ड लाईं । प्रथमहि दरस मलेच्छ देखाईं॥
हरिको दरसन हम नहि पाईं । पहिले हम चौरा गनि आईं ॥
तब हम कौतुक एक बनाईं । पूजन मंडप पंडा जाईं ॥
तहवाँ एक चरित्र रहाईं । लखि पंडा चक्रुत है जाईं ॥
जहँ लगि सूरत मंदिर माहीं । भये कबीर रूप धरि ताहीं ॥
हरि मूरति कहैं पंडा देखा । भये कबीर रूप धरि भेखा ॥
अछत पुष्प लै विप्र भुलाईं । नहिं ठाकुरको पूजन पाईं ॥
देखि चरित्र विप्र शिर नावा । हम स्वामी तुम मर्म न पावा ॥
तुमकहैं देखि हीन मन लाईं । ताते मोहि चरित्र देखाईं ॥
छमा अपराध करो प्रभु मोरे । विनती करौं दोउ कर जोरे ॥
छन्द-बचन एक मैं कह्यौं ताते विप्र सुन तैं कान दे ।
पूज ठाकुर दीन आयसु दुबिधा मनकी छाड़ दे ॥
आंति भोजन करे जो जिव आगहीनो तासुको ।
करे भोजन छूति राखे शीश उलटै जासुको ॥
चौपाई
पंडौ मनमें मान्यौ हीना । ताते यह चरित्र गुरु कीना ॥
जगन्नाथकी छूति उठाईं । बर्न विवेक न तहाँ रहाईं ॥
सबहि जाति हरि भोग लगावैं । यकठे बैठके भोजन पावैं ॥
कछु नहिं छूति रही तिहि ठामा । सर्वजाति यकमय हरिधामा ॥
आचारिनि बहु कीन विचारा । जगन्नाथ है चलै अचारा ॥
तिनको तहैं आचार न चाले । सत्य कबीर वचन को टाले ॥
( १३२ )
बोधसागर
इमि गुरु हरि मंदिर थपवाई । पूरब कथा बहुरि अब आई ॥
श्वपच सुदर्शन तन तजि गयऊ । लोकजाय गुरु बिनती कियऊ ॥
हे सतगुरु अस दाया कीजै । मेरे मातु पिता गति दीजै ॥
श्वपचके मातु पिता जो रहेऊ । पूर्वदेह गुरु ज्ञान न कहेऊ ॥
ताते बहुरि देह सो धारी । द्विजकुलमें प्रकटे नर नारी ॥
पुत्रकि भक्ति प्रतापते सोई । श्वपच देह तजिके द्विज होई ॥
कुलपति नाम पिताको रहेऊ । श्रिया नाम माताको कहेऊ ॥
चन्दवार तेहि नयको नाँऊ । नारी पुरुष बसैं तेहि ठाँऊ ॥
जब दोनों द्विज कुल तन पाई । नरहरि लछमना नाम धराई ॥
जगन्नाथ के योग पग धारे । सत्य कबीर चले चँदवारे ॥
दोऊ जीव तारनके काजा । चँदवार गुरु आनि विराजा ॥
सत्यकबीर वचन-चौपाई
जगन्नाथसे जब पग धारे । तबहि आनि पहुँचे चँदवारे ॥
बालक रूप धरयो तिहि ठामा । कीनेहु तालमाहि विश्रामा ॥
कमल पत्र पर आसन लाई । आठ पहर हम तहाँ रहाई ॥
नरहरि नारि लछमना जोई । तालके ऊपर पहुँची सोई ॥
पुत्र हेत सों आस लगाई । करि असनान विनय रविराई ॥
अञ्जल ले विनवै कर जोरी । सुन्दर पुत्रहेत चित दौरी ॥
ततछन हम अंचल पर आवा । हमकहँ देखि नारि हरषावा ॥
बालरूप है भेटयो ओही । विप्र नारि यह ले गई मोही ॥
बहुत धौस तिहि संग रहाऊ । नारि पुरुष मिलि सेवा लाऊ ॥
जब हम उठै पलँग झटकोरा । सुवरन मिलै तिन्हें यक तोरा ॥
तिनके हृदय न शब्द समार्ई । बालक जानि प्रतीत न आई ॥
ताहि देह नहि चीन्हो मोही । भयो गुप्त तबही तन ओही ॥
नरतिय जब दोनों तन त्यागे । जन्म लीन जोलहा है जागे ॥
स्वतमवेदबोध
( १३३ )
नीरू नीमा जोलह जोलाही । काशी नग्र बसै दोड ताही ॥
ताही नग्र कवीर तलाई । कमल पुष्प तामें रह छाई ॥
बालक रूप तहाँ हम लीने । कमल पुष्प पर आसन कीने ॥
तहैं बारह बालक पौढाऊ । करे कुटूहल बाल सुभाऊ ॥
तिहि औसरमें नीरू जोलाहा । नारि गौन सँग ल्यावै ताहा ॥
तृषावंत जब मै सो नारी । तालपै जल अँचवन पग धारी ॥
नीमा दृष्टि बाल पर परेऊ । देखत दृश मोद मन भरेऊ ॥
जिमिरविदृश पद्म विकशाना । धाय धरचो धन रंक समाना ॥
तब सो बालक लियौ उठाई । ले बालक नीरूपहैं आई ॥
क्रोधवन्त जोलहा तब भैऊ । नीमासे तब ऐसे कहेऊ ॥
काको बालक तैं लै आई । नग्रमें मेरी होय हँसाई ॥
नग्रके लोग हँसैगे मोही । गौनहि तिय बालक सँग जोही ॥
जोलहा रोष कीन तिहि वारी । बेगि देहु तुम बालक हारी ॥
हर्ष गुना बनि नारी लाई । तब हम तासे बचन सुनाई ॥
बाल वचन
छन्द-सुनहु बचन हमार नीमा तोहि कहीं समुझायके ।
पिछली प्रीतिके कारने तोहि दृस दीनो आयके ॥
आपने गृह लै चलो मोहि चीन्हिके जौँ गुरु करो ।
देहुँ नाम दृढाय तुमको फंद यमके नहि परो ॥
सोरठा-सुनत बचन अस नारि, नीरू त्रास न राखेऊ ।
ले गई नग्र मझार, काशी नगर पहुँचेऊ ॥
चौपाई
लै बालक जब घरको गैऊ । नग्र लोग सब देखत भैऊ ॥
नग्र नारि नर हाँसी लाई । नारि गौन सँग बालक ल्याई ॥
जोलहा सुनि सुनि लाजित होई । बाल वृतांत कहै सब सोई ॥