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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

स्वसमवेदबोध

( १२५ )

हे प्रतिहार सुनो यह बानी । सिद्धरूप तुम कहो बखानी ॥
कौन बरन अरु कौन है भेखा । मोसन कहो दृष्टि जो देखा ॥
अहो राव तिहि श्वेत स्वरूपा । श्वेतहि माला तिलक अनुपा ॥
शशिसमान तिहि रूप विराजा । श्वेतबरन सब श्वेतहि साजा ॥
मंदोदरि कह सुन रावण राजा । यह तो रूप पुरुषको साजा ॥
वेगिहि आय गहो तुम पाई । तौ तुव राज अटल है जाई ॥
छोड़िहो अपनो मान बढ़ाई । गहो चरण तिहि शीस नवाई ॥
रावण सुनत कोध अति कीना । जरत हुताशन जनु घृत दीना ॥
रावण चलो अस्त्र गहि हाथा । तुरत जाय तिहि काटो माथा ॥
मारो ताहि शीस खसि परई । देखो भिक्षुक कहा मोर करई ॥
जहैं सुनींद्र तहैं रावण आई । सत्तर बार तरवार चलाई ॥
लै सुनींद्र यक तृणको ओटा । अतिबल रावण मान्यो चोटा ॥
रावण अस्त्र अफल जब भयऊ । तब खिसियायके सोरहि गयऊ ॥
तृण सुनींद्र लीने यहि भावन । बल तुमार देखो नृप रावण ॥
काटे जो तृण कटै न तेरे । कौन भाँति शिर खंडै मेरे ॥
मन्दोदरी कहै समुझाई । हे नृप सतगुरुको गहु पाई ॥
रावण कहे सहित अभिमाना । सेवों शिव नहिं जानों आना ॥
जाने अटल राज मोहिं दीना । ताहि दंडवत पलपल कीना ॥
ऐसो वचन सुनींद्र पुकारी । हो रावण तुम गर्व प्रहारी ॥
भेद हमारा तुम नहिं जानी । वचन एक तोहि कहौं बखानी ॥
रामचंद्र तोहि माँरें आई । मांस तुम्हार स्वान नहिं खाई ॥
रावणको कीनो अपमाना । औध नग्र कह कीन पयांना ॥
मारगमाहँ चलो जब जाई । मधुकर विप्र मिला तब आई ॥
सो सुनींद्रके चरनन परेऊ । अतिसै प्रेम मोद मन भरेऊ ॥
तापर सतगुरु कीनी दाय। सहितकुटुम निजलोक पठाया ॥

( १२६ )

बोधसागर

रामचन्द्र वन भये दुखारी । तबहिं मुनींद्र तहाँ पग धारी ॥
योग युक्ति रघुपतिहि दृढ़ाई । बहुविधि ताकहैं शांति धराई ॥
जब मुनींद्रजी दायो कीने । सेत बांधि लंका पग दीने ॥
मन संशय कीने हनुमाना । सतगुरु कृपा लह्यौ दृढ़ ज्ञाना ॥
गरुड़ जो परम प्रेमते ध्याये । परम हंसकी पदवी पाये ॥
यहि बिधि केते जीव चेतार्ई । तब मुनींद्र निज लोक सिधार्ई ।
पहुँचे हंस पुरुष दरबारा । दरस पाय दुख हंस विदारा ॥
कछुक दिवसजबयहिबिधि बीते । त्रेता गत द्वापर तब थीते ॥

इति त्रेतायुगवृत्तान्त

अथ द्वापर युगमें मुनींद्रजीको पृथ्वीमें आगमन कथा और करुणामय
स्वामी नामधारन और जवतजीव तारन--बोपाई

पुरुष अवाज भई तेहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥
परम पुरुष कह शीस नवाई । महि मंडल मुनींद्र चलि आई ॥
जो प्रभु आहि नाम अरु नामी । द्वापर कह करुणामय स्वामी ॥
प्रथमहि जब भूलोक सिधारे । गढ गिरनार तहाँ पग धारे ॥
चंद्रविजय नृप नाम बखानी । गढ गिरनार तासु रजधानी ॥
परम भक्ति मय ताकी रानी । इंद्रमती तेहि नाम बखानी ॥
साधुसे परम प्रीति सो धारे । नित साधुनकी बाट निहारे ॥
साधुको जहाँ कहुँ आवत हेरे । नित आपने ढिग सो टरे ॥
परम प्रीतिसे सेवा धारे । तन मन धन साधुनपर वारे ॥
तासु प्रीतिकी रीति बिचारी । करुणामय स्वामी पग धारी ॥
जात चले तेहि मारग माहीं । रानीको मंदिर रह जाहीं ॥
देखे रानी चढ़ी अटारी । साधु जानि हरषित भइ भारी ॥
त्वरित पठायौ तहाँ निज चेरी । बेगि साधुको आनहु टेरी ॥
वृषली चलि हमकहैं शिर नावा । रानीको संदेश सुनावा ॥

स्वसमवेदबोध

( १२७ )

महाराज दाया चित दीजै । भूपति भौन गौन अब कीजै ॥
करुणामय स्वामी कह ताहीं । हम नहिं भूपतिके गृह जाहीं ॥
राज काज है मान बड़ाई । हमैं साय ना नृप घर जाई ॥
पुनि वृषली रानी ढिग आवो । साधु न आवै मोर बोलावो ॥
यह सुनि इंद्रमती उठि धाई । करुणामयके पद शिर नाई ॥
मोपर दाया कीजै नाथा । मो गृह चलिये करो सनाथा ॥
रानीकी लखि प्रीति अपारा । करुणामय तिहि भौन सिधारा ॥
ताके भौन जबहि पग दीनो । चरण धोय चरनोदक लीनो ॥
रानी चरनामृत करि पाना । बहुतभांति कीने सनमाना ॥
कीन सेव भल हिय हर्षाई । पीछे ज्ञान मुननको आई ॥
सुनि गुरुज्ञान प्रीति अति बाढ़ी । चरनन लागि प्रेममें गाढ़ी ॥
नाथ मोहि गुरुदीक्षा दीजै । अपनी शरन माहिं अबलीजै ॥
रानीको गुरुदीक्षा दीना । राजा चंद्रविजय नहिं लीना ॥
रानीको निज लोक पठाया । सो सतगुरुसे विनय सुनाया ॥
हे प्रभु नृपको करो उबारा । यद्यपि वह नहिं शिष्य तुमारा ॥
भावभक्ति रानीके काजा । सतगुरु कृपा तरो सो राजा ॥
यहिबिधिजिनजिनगृहगुरुज्ञाना । सो सब सत्यलोक कर थाना ॥
हंसनको सतलोक ले जाई । तहाँ आप कछु काल वितार्ई ॥

इति द्वापर युग

अथ कलियुगमें करुणामय स्वामीको पृथ्वीमें आगमन कथा

और सत्य कबीर और सेयद अहमद कबीर शेख कबीर

नामधारण और जग जीव तारण--चौपाई

द्वापर जगको अंत जो पाया । पुरुष बचन तब टेरि सुनाया ॥
ज्ञानी बेगि जाहु मर्त्य लोक । नाश करो जीवनको शोका ॥
सत्य पुरुषको करो प्रणामा । तब ज्ञानी पहुँचे नर धामा ॥

( १२८ )

बोधसागर

प्रथमहि मृत्युलोक जब आये । कलियुग नाम कबीर कहाये ॥
हिंदू मुसलमान गुरुपीरा । मिश्रित नाम कहाव कबीरा ॥
प्रथमहि प्रकट भये चलि काशी । तहाँ आपनो ज्ञान प्रकाशी ॥
नग्रमें जबहिं धरे निज पाई । श्वपच सुदर्शन तहाँ रहाई ॥
ताने सतगुरुको पहिचाना । चरनन लागि गह्यो दृढ़ ज्ञाना ॥
जब सतगुरुकी दीक्षा पाई । करे भक्ति सो मन चित लाई ॥
श्वपच करे भक्ती मन लाई । मात पिता देखै हर्षाई ॥
भक्ति पुत्र लखि हरषित होई । सतगुरु दीक्षा लियो न दोई ॥
ताही काल कृष्ण औतारा । अरु कौरौ पांडव तन धारा ॥
सत्य कबीर कृष्णसंवादा । ज्ञानगुष्टि तहैं बहु कथि बादा ॥
कृष्णहि बहु विधि ज्ञान दृढाई । क्षर अक्षरके पार लखाई ॥
सत्य कबीर ज्ञान गंभीरा । कथे सकल सुर नर मुनितीरा ॥
ताही समय युधिष्ठिर राजा । ताने कीन यज्ञको साजा ॥
वंधु मारि अपकीरति कीना । ताते यज्ञ रचन चित दीना ॥
कृष्णकेरि जब आज्ञा पाई । तब पांडौ सब साज मँगाई ॥
यज्ञ कि सामित्री गहि सारी । जहैं तहैंते सब साधु हँकारी ॥
पांडौ प्रति बोले यदुपाला । पूरन यज्ञ जान तिहि काला ॥
घंट अकास बजत सुनि आवो । यज्ञको तब पूरन फल पावो ॥
जुरे तहाँ कोटिन ऋषि राजा । साधू ब्राह्मण सहित समाजा ॥
भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सबहि जेवाई ॥
भोजन कीन सकल ऋषिराई । बजा न घंट भूप भ्रम आई ॥
पांडौ तबहि कृष्णपहैं गयऊ । मन संशय करि पूछत भयऊ ॥
करिके कृपा कहो यदुराजा । कारन कौन घंट नहि बाजा ॥
सो अस कारण तासु बताई । साधू नहि कोइ भोजन पाई ॥
चक्रत है तब पांडौ कहेऊ । कोटिन साधू भोजन लहेऊ ॥

स्वसमवेदबोध

( १२९ )

अब कहँ साधु पाइये नाथा । तब तिनते बोले यदुनाथा ॥
श्वपच सुदर्शनको ले आवो । आदर मान समेत जँवावो ॥
सोई साधु और नहिं कोई । पूरन यज्ञ जाहिते होई ॥
कृष्णकी जब अस आज्ञा पाई । तब पांडौ ताके ढिग जाई ॥
श्वपच सुदर्शनको ले आई । विनय प्रीतिसे ताहि जँवाई ॥
भूप भौन भोजन कर जबही । बजा अकाशमें घंटा तबही ॥
काल कलुक जब गयौ सिराई । तब देहांत श्वपचको आई ॥
तन तजके तब सो चलि जाई । सतगुरु तिहि निजलोक पठाई ॥
ताही समय कृष्ण तज देही । बोधरूप धारचो तब येही ॥
नाम जो इन्द्रदौन तेहि काला । देश उड़ैसेको महिपाला ॥
तन तजि कृष्ण तहां चलि जाई । इन्द्रदौन कहँ स्वप्न देखाई ॥
स्वप्नमें अस हरि ताहि बताई । मेरो मंदिर देहु उठाई ॥
भूपतिसे जब ऐसे कहेऊ । सो मंदिरकी रचना गहेऊ ॥
रामचंद्र गहि निज दल भीरा । गये जबहि वारिधिके तीरा ॥
बांध्यौ सेत बंध बरियाई । तेहि कारन सागर दुख पाई ॥
जो बलवान अबल दुख देई । बदला अवशि भरैंगे तेई ॥
नीति निरंजनकी यह जाना । स्वसमवेदमें प्रथम बखाना ॥
बदला पूर्व लेन तिहि बारा । छोभित सिन्धु उठा खरधारा ॥
जब रचि मंदिर लाग उठावा । क्रोधवंत सागर तब धावा ॥
छनमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथको मंदिर तोरे ॥
हारा नृप करि जतन उपाई । हरि मंदिर तहाँ उठै न पाई ॥

सत्यकबीर बचन-चौपाई

मंदिरकी यह दशा बिचारी । बर पूरब मनमाहँ सँभारी ॥
तब हम चले उड़ैसे माहीं । इन्द्रदौन भूपतिके पाहीं ॥
मन्दिर षट परकार बनाई । उदधि नीर तेहि लीन बुडाई ॥
पीछे उदधि तीर हम जाई । जायके चौरा तहाँ बनाई ॥

बो० सा० ९/

( १३० )

बोधसागर

इन्द्रदौनकहँ वचन सुनावो । अहो राव तुम काम लगावो ॥
मण्डप शंक न राखो राजा । इहवों हम आये यहि काजा ॥
जाहु बेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानो वचन हमारा ॥
राजा मण्डप काम लगाई । मण्डप देखि उदधि तब धाई ॥
सागर लहरि उठै बिकरारा । आवै लहरि क्रोध चित धारा ॥
उदधि उमङ्ग क्रोध अति आई । लहरि आनि चौरा नियराई ॥
दरस हमार उदधि तब पाई । अतिभय मान रहा ठहराई ॥

समुद्र वचन

छन्द-रूप धान्यो विप्रको तब उदधि हमपै आइया ।
चरन गहिके माथ नायो मरम हम नहि पाइया ॥
जगन्नाथके भोर स्वामी ताने हम इत आइया ।
अपराध मेरो क्षमा कीजै मरम अब हमपाइया ॥
सोरठा-तुम प्रभु दीन दयाल, रघुपति ओल दिवाइये ।
वचन करो प्रतिपाल, कर जोरे बिनती करो ॥

चौपाई

कीनो गौन लंक रघुवीरा । उदधि बांधि उतरे रन धीरा ॥
जो कोइ करे जोर बरियाई । अलखरूप तिहि ओल दिवाई ॥
मोपर दया करो तुम स्वामी । लेव ओल उर अंतर्धामी ॥

कबीर वचन--चौपाई

ओल तुमार उदधि हम चीन्हा । बोरे नम्र द्वारिका दीना ॥

उदधि वचन

यह सुनि उदधि धरचो तब पाई । चरन टेकि तब चल हरषाई ॥
उदधि लहरि उमँगौ तब धाई । बोरचो नम्र द्वारिका जाई ॥
मंदिर काम पूर तब भयऊ । हरिको थापन तहवों कियऊ ॥

कृष्ण वचन--चौपाई

तब पंडन हरि स्वप्न जनायो । सत्य कबीर मोहिं पै आयो ॥

स्वसमवेदबोध

( १३१ )

आसन सागर तीर बनाईं । दरस कबीर उदधि उठि जाईं॥
यहि विधि मंदिर मोर थपाईं । कलि युगमें एक धाम बसाईं ॥

पंडा वचन--चौपाई

पंडा उदधि तीर तब जाईं । करि असनान मंडपहि जाईं ॥
पंडा मन अस पाखण्ड लाईं । प्रथमहि दरस मलेच्छ देखाईं॥
हरिको दरसन हम नहि पाईं । पहिले हम चौरा गनि आईं ॥
तब हम कौतुक एक बनाईं । पूजन मंडप पंडा जाईं ॥
तहवाँ एक चरित्र रहाईं । लखि पंडा चक्रुत है जाईं ॥
जहँ लगि सूरत मंदिर माहीं । भये कबीर रूप धरि ताहीं ॥
हरि मूरति कहैं पंडा देखा । भये कबीर रूप धरि भेखा ॥
अछत पुष्प लै विप्र भुलाईं । नहिं ठाकुरको पूजन पाईं ॥
देखि चरित्र विप्र शिर नावा । हम स्वामी तुम मर्म न पावा ॥
तुमकहैं देखि हीन मन लाईं । ताते मोहि चरित्र देखाईं ॥
छमा अपराध करो प्रभु मोरे । विनती करौं दोउ कर जोरे ॥

छन्द-बचन एक मैं कह्यौं ताते विप्र सुन तैं कान दे ।

पूज ठाकुर दीन आयसु दुबिधा मनकी छाड़ दे ॥

आंति भोजन करे जो जिव आगहीनो तासुको ।

करे भोजन छूति राखे शीश उलटै जासुको ॥

चौपाई

पंडौ मनमें मान्यौ हीना । ताते यह चरित्र गुरु कीना ॥
जगन्नाथकी छूति उठाईं । बर्न विवेक न तहाँ रहाईं ॥
सबहि जाति हरि भोग लगावैं । यकठे बैठके भोजन पावैं ॥
कछु नहिं छूति रही तिहि ठामा । सर्वजाति यकमय हरिधामा ॥
आचारिनि बहु कीन विचारा । जगन्नाथ है चलै अचारा ॥
तिनको तहैं आचार न चाले । सत्य कबीर वचन को टाले ॥

( १३२ )

बोधसागर

इमि गुरु हरि मंदिर थपवाई । पूरब कथा बहुरि अब आई ॥
श्वपच सुदर्शन तन तजि गयऊ । लोकजाय गुरु बिनती कियऊ ॥
हे सतगुरु अस दाया कीजै । मेरे मातु पिता गति दीजै ॥
श्वपचके मातु पिता जो रहेऊ । पूर्वदेह गुरु ज्ञान न कहेऊ ॥
ताते बहुरि देह सो धारी । द्विजकुलमें प्रकटे नर नारी ॥
पुत्रकि भक्ति प्रतापते सोई । श्वपच देह तजिके द्विज होई ॥
कुलपति नाम पिताको रहेऊ । श्रिया नाम माताको कहेऊ ॥
चन्दवार तेहि नयको नाँऊ । नारी पुरुष बसैं तेहि ठाँऊ ॥
जब दोनों द्विज कुल तन पाई । नरहरि लछमना नाम धराई ॥
जगन्नाथ के योग पग धारे । सत्य कबीर चले चँदवारे ॥
दोऊ जीव तारनके काजा । चँदवार गुरु आनि विराजा ॥

सत्यकबीर वचन-चौपाई

जगन्नाथसे जब पग धारे । तबहि आनि पहुँचे चँदवारे ॥
बालक रूप धरयो तिहि ठामा । कीनेहु तालमाहि विश्रामा ॥
कमल पत्र पर आसन लाई । आठ पहर हम तहाँ रहाई ॥
नरहरि नारि लछमना जोई । तालके ऊपर पहुँची सोई ॥
पुत्र हेत सों आस लगाई । करि असनान विनय रविराई ॥
अञ्जल ले विनवै कर जोरी । सुन्दर पुत्रहेत चित दौरी ॥
ततछन हम अंचल पर आवा । हमकहँ देखि नारि हरषावा ॥
बालरूप है भेटयो ओही । विप्र नारि यह ले गई मोही ॥
बहुत धौस तिहि संग रहाऊ । नारि पुरुष मिलि सेवा लाऊ ॥
जब हम उठै पलँग झटकोरा । सुवरन मिलै तिन्हें यक तोरा ॥
तिनके हृदय न शब्द समार्ई । बालक जानि प्रतीत न आई ॥
ताहि देह नहि चीन्हो मोही । भयो गुप्त तबही तन ओही ॥
नरतिय जब दोनों तन त्यागे । जन्म लीन जोलहा है जागे ॥

स्वतमवेदबोध

( १३३ )

नीरू नीमा जोलह जोलाही । काशी नग्र बसै दोड ताही ॥
ताही नग्र कवीर तलाई । कमल पुष्प तामें रह छाई ॥
बालक रूप तहाँ हम लीने । कमल पुष्प पर आसन कीने ॥
तहैं बारह बालक पौढाऊ । करे कुटूहल बाल सुभाऊ ॥
तिहि औसरमें नीरू जोलाहा । नारि गौन सँग ल्यावै ताहा ॥
तृषावंत जब मै सो नारी । तालपै जल अँचवन पग धारी ॥
नीमा दृष्टि बाल पर परेऊ । देखत दृश मोद मन भरेऊ ॥
जिमिरविदृश पद्म विकशाना । धाय धरचो धन रंक समाना ॥
तब सो बालक लियौ उठाई । ले बालक नीरूपहैं आई ॥
क्रोधवन्त जोलहा तब भैऊ । नीमासे तब ऐसे कहेऊ ॥
काको बालक तैं लै आई । नग्रमें मेरी होय हँसाई ॥
नग्रके लोग हँसैगे मोही । गौनहि तिय बालक सँग जोही ॥
जोलहा रोष कीन तिहि वारी । बेगि देहु तुम बालक हारी ॥
हर्ष गुना बनि नारी लाई । तब हम तासे बचन सुनाई ॥

बाल वचन

छन्द-सुनहु बचन हमार नीमा तोहि कहीं समुझायके ।
पिछली प्रीतिके कारने तोहि दृस दीनो आयके ॥
आपने गृह लै चलो मोहि चीन्हिके जौँ गुरु करो ।
देहुँ नाम दृढाय तुमको फंद यमके नहि परो ॥
सोरठा-सुनत बचन अस नारि, नीरू त्रास न राखेऊ ।
ले गई नग्र मझार, काशी नगर पहुँचेऊ ॥

चौपाई

लै बालक जब घरको गैऊ । नग्र लोग सब देखत भैऊ ॥
नग्र नारि नर हाँसी लाई । नारि गौन सँग बालक ल्याई ॥
जोलहा सुनि सुनि लाजित होई । बाल वृतांत कहै सब सोई ॥

( १३४ )

बोधसागर

यह बालक तलावमें पाईं । नीमा देखि ताहि लै आई ॥
कमलपुष्प शिशु सेज बनाई । हरषित नारि सो लियौ उठाई ॥
जोलहा यद्यपि कथा प्रकासी । तऊ लोग सब करते हाँसी ॥
बहुत घौस तिहि भौन रहाऊ । जोलहा जाने बालक भाऊ ॥
बालक रूप तासु ग्रह रहते । खानपान तहँ नहिं कछु गहते ॥
बिन भोजन तन छवि सरसाई । दिन दिन देहकी दीरघताई ॥
जोलहा पुनि पंडितन बोलाये । बालक नाम धरनको आये ॥
पंडित करन जो लगे बिचारा । तब शिशु निजमुख बचन उचारा ॥
नाम कबीर हमारा अहई । और नाम जनि पंडित कहई ॥
यह सुनिके सब चकृत भैऊ । शिशु निजनाम आपते कहेऊ ॥
कोइ कहै यह दानौ देवा । कोई कहै यह अलख अभेवा ॥
कोई ईश्वर अंश बतावा । कोइ कह आप देह धरि आवा ॥
पंडित निज निज भौन सिधारा । बिन भोजन बीते बहु बारा ॥
जोलहा तब मनमें दुख पाईं । भोजन करो कबीर गोसाईं ॥
जोलहजोलाही दुखित निहारी । तब हम तिनते बचन उचारी ॥
कोरी यक बछिया ले आवो । कोरा भांडा एक मँगावो ॥
ततछन सो जोलहा चलि जाई । गऊ कि बछिया कोरी ल्याई ॥
कोरा भांडा एक गहाई । भांडा बछिया शीघ्रही आई ॥
दोऊ कबीरके सम्मुख आना । बछिया दिशाहछि निज ताना ॥
बछिया हेठ सो भांडा धरेऊ । ताके थनहि दूधते भरेऊ ॥
दूध हमारे आगे धरही । यहिबिधि खानपान नित करही ॥
तबसे जोलहा डरै बहुत । हमरे घर है अचरज पूता ॥
केते दिन यहि विधि चलिगैऊ । संग बालकन खेलत भैऊ ॥
कथै बालकन प्रति विज्ञाना । सो जड़वत नहिं कछु पहिचाना ॥
तब साधुन सँग गोछि कराही । अगम ज्ञान कथ तिनके पाही ॥

स्वसमवेदबोध

( १३५ )

सुनि साधुन मन अचरज होई । यह तो सिद्ध पुरुष है कोई ॥
सब जोलहा मिलके एक बारा । नीरू ते अस बचन उचारा ॥
बालककी सुन्नत करवावो । तिहि कारन सब साज मँगावो ॥
ताहि काल अस कथा कहाई । नाई सुन्नतको बोलवाई ॥
तब नाई कबीर ढिग आया । ले अस्तुरा निकट नियराया ॥
पांच इंद्री ताको दिखलावो । काटि लेहु जो तोहि मनभावो ॥
यह लखि भभरिके नाई भागा । सुन्नत नहीं कीन डर लागा ॥
पुनि जोलहन अस कौतुककीना । तब बोलाय काजीको लीना ॥
एक गाय तिहि काल मँगाई । काजी ताको जबह कराई ॥
जिहि औसर अस कौतुक ठाना । सत्यकबीर मरम सब जाना ॥
खेलत रहे बालकन माहीं । तेहि छन धायके पहुँचे ताहीं ॥
गऊ घात जब देखत भैऊ । दया धारि काजीते कहेऊ ॥
बहुबिधि काजीको समुझाई । महापाप जिव घात बताई ॥
काजी लज्जित है शिर नायौ । बिनती करै न उत्तर आयौ ॥
तबहि कबीर गऊ ढिग जाई । मरी गाय तिहि काल जिवाई ॥
तब जोलहा गृह तजे कबीरा । अब नहिं रहौं तुमारे तीरा ॥
विकल भये तब नीमा नीरू । नग्र चहुँ दिश बालक हेरू ॥
दूँदत सुत न लहौ नर नारी । रुदन बिलाप करै दोउ भारी ॥
विकल विलोकि दया उर आई । तब कबीर तेहि दियो देखाई ॥
नीरू नीमा बिनती करही । प्रभु हमरे गृह पुनि पग धरही ॥
तब हम तिनते बचन उचारी । ऐसो पाप कीन तुम भारी ॥
तब जोलहा बोलै शिर नाई । नहिं यह पाप मेरी समताई ॥
मिल जोलहन कीनी बरियाई । ताकी खबर न मैं कहु पाई ॥
तापर कृपा बढुरिकै कीना । पुनि ताके गृहमें पग दीना ॥
बाल चरित्र है विविधि विधाना । सो संकेत न होय बखाना ॥

( १३६ )

बोधसागर

चरचा जग अनेक परचारा । कछुकसोलिखौं होय विस्तारा॥
रामानंद गुरु जिमि गहेऊ । वेद मते प्रथमै सो कहेऊ ॥
केते ध्योस जोलहा गृह बासा । अजौं न ता हिय ज्ञान प्रकासा॥
बार बार तेहि नाम हटाई । तिनको नहिं प्रतीत गुरु आई॥
बालक जानि न गुरुपद गहेऊ । ताते परमधाम नहिं लहेऊ ॥
जोलहाकी जब आयु पुराई । मथुरा नग्र देह घर जाई ॥
सकल कथा मैं कीन प्रकाशा । जिमिगुरुकर जोलहा गृहवासा॥
श्वपचके मातु पिता जो रहेऊ । श्रीपाकुलपति नाम सोकहेऊ॥
बहुरि लछमना नरहर सोई । नीमा नीरू सोई होई ॥
तिन दुहुँके तारणके काजा । जोलहा गुरुगृह आनि विराजा॥
गर्भवास कबहुँ नहिं आवै । निज इच्छा नर तन दरसावै ॥
हिंदू मुसलमान नहिं सोई । बाल बृद्ध अरु युवा न होई ॥
दाय़ा करै देह नर धरही । जीव अनंत कोटि ले तरही ॥
जरा मरण कबहुँ नहिं ताही । सदा समान एकरस आही ॥
सो वृतांत अब करो बखाना । जिमि कबीर काशी कथ ज्ञाना॥
षट् दरसन झगरनको आवै । अगम ज्ञान सबको समुझावै ॥
सत्यपथको कीन प्रचारा । हिंसा कर्म निंद निरधारा ॥
तीरथ व्रत अरु मूरति पूजा । जीव हने ईश्वर कथ दूजा ॥
जीवघात करिहै जो कोई । वासा तासु नरकमें होई ॥
पाहन को पूजै पाखंडी । गल काटै जो सम्मुख चंडी ॥
बकरा मुरगा जबह जो करही । विस्मिच्छह कहि धर्म उचरही॥
सो सब पापकर्म बतलाये । हिंदू तुर्क सुनत दुख पाये ॥
वैरभाव दोनों कुल धरहीं । सत्यकबीर टेक नहिं टरहीं ॥
मिलि विप्रन अस युक्ति बनाई । किमि कबीरकी हुरमत जाई ॥
ऐसी गोष्ठि सबन मिलि ठाना । करि प्रपंच अस कीन बहाना॥

स्वसमवेदबोध

( १३७ )

जहाँ तहाँ बहु विप्र सिधारा । सत्यकबीर केर भंडारा ॥
निवता दियो चहुँ दिश जाई । साधुनकी जमाति चलिआई ॥
भीर भई साधुनकी भारी । गृह तजि सत्यकबीर सिधारी ॥
आयके विष्णु भये भंडारी । साधुनको आदर कर भारी ॥
पोषन भरना विष्णुको कर्मा । आयके गहि लीनों निजधर्मा ॥
सत्य कबीर कर्मते न्यारा । मायाको सब खेल पसारा ॥
माया सदा जासुकी दासी । सकै कौन करि ताकी हाँसी ॥
सब साधुनको हरि सनमाने । विप्र सकल देखत खिसियाने ॥
मर्म न कोई लरुयो तिहि बारा । धन्य कबीर धन्य भंडारा ॥
दोहा-काशी कुटी कबीरपर, भई साधुनकी भीर ।
जो कलु किया सो हरि किया, होय कबीर कबीर ॥

चोपाई

आदर भोजन दछिना पाई । धन्य धन्य कहि साधु सिधाई ॥
काजी पंडित करें विचारा । जाय कबीर कौन विधि मारा ॥
काशीमें तेहि काल बताई । शाह सिकन्दर पहुँचा आई ॥

इति

ग्रंथनिरंभयज्ञान-सत्यकबीर वचन

साखी-कलिमहँ काशी प्रकटचौ, सुनो सन्त धर्मदास ।
सत्य पंथ परचारैऊ, निंदक भये उदास ॥
शाह शिकंदरके तन, भयो ज्वाल उत्पान ।
दुखग्याकुल अति विकलतन, काशी पहुँचा आन ॥

चोपाई

पूछै शाह ऐसा कोइ भाई । जाते मेरो कष्ट दुराई ॥
साखी-काजी पंडित मिलिके, कहा शाहसे जाय ।
है कबीर दरवेश यक, ताको लेहु बुलाय ॥

( १३८ )

बोधसागर

चौपाई

कहैं शाह तेहि तुरत ले आवो । साइत एक विलंब न लावो ॥
सारखी-आये धायके लोग बहु, आतुर बोले वैन ।
चलो कबीरा शाहपै, हम आये तोहि लैन ॥

चौपाई

गये शाहके सन्मुख जबही । ज्वाला देह दूर भइ तबही ॥
उठिके शाह भयो तब ठाढा । मोहिते अधिक प्रेम तब बाढा ॥
सारखी-शाह न छोडे हमकहँ, बढचो प्रेम मनमाहिँ ।
शेखतकी तेहि पीर थे, सो सुरझे मनमाहिँ ॥

चौपाई

कहैं तकी सुन शाह सिकंदर । हमते कियो तफाउत अंतर ॥
जोलहाते तुम कीनेहु यारी । हमते अन्तर कियो विगारी ॥
कह सिकंदर तुम हमरे पीरा । वह द्रदमंद द्रवेश फकीरा ॥
कहैं मारफत राहकी बाते । राखा जान जो मेरा जाते ॥
ऐसे शाह कह्यो समुझाई । तबहुँ न शेखतकी शरमाई ॥
काशीके पंडित अरू काजी । शेखतकी मिली परपैच साजी ॥
कह काजी सुनु शाहके पीरा । कैसेहु मारा जाय कबीरा ॥
यह जोलहा जौँ मारा जाई । तौ हम सबकी टरै बलाई ॥
कहैं तकी सुन पंडित काजी । क्या कबीर जोलहा है पाजी ॥
चाहो तो आतशमें जारो । चाहो टूक टूक करि डारो ॥
चाहो जलके बीच डुबाओ । चाहो देगमें आँच दिलावो ॥
चाहो हाथीसे चिरवाओ । चाहो खाक त्वचा भरवावो ॥
चाहो तो देवालमें साटो । चाहो बोटी बोटी काटो ॥
चाहो मोहडे तोप उडावो । चाहो कूपमें जितत दबावो ॥
सारखी-मेरा नाम शेख तकी, मैं सिकंदरको पीर ।
देखो कैसे बाचिहैं, कैसा फकर कबीर ॥

स्वसमवेदबोध

( १३९ )

काजी पंडित सब हरषाना ।जिमि पंकज विकसे लखि भाना॥
कह काजी तुमते सब होई । तुम ऐसा दूजा नहीं कोई ॥
इस जोलहेने कुपुत्र मचाया । दोनों दीनकी अदल मिटाया ॥

साखी-तीरथ व्रत एकादशी, रोजा और नमाज ।
ये सब कछु न मानई, कहै एक शिरताज ॥
खसी वो सुरगी गायनी, पीर निमित्त हम देह ।
सबको कहै कसाइ है, ऐसा काफिर येह ॥

चौपाई

काशीके लोग हमैं नहीं मानें । जोलहाकी सब सिफत बखानें ॥

साखी-भाग हमारे शेखजी, तुम इहँ पहुँचे आय ।
जौं यह जोलहा मारहुँ, सबको कंटक जाय ॥
कहै तकी सुन काजी, हमते बाढी रार ।
जीअत कबहुँ छोड़ो, न अब यहि डारो मार ॥
शेखतकी परंपंच करि, गये शाहके पाहँ ।
हमें देख तहँ बैठे, अधिक जरे मनमाहँ ॥
कहै तकी चित रोष धरि, सुनो सिकन्दर बात ।
कहा हमारा मानहुँ, तब होवै कुशलात ॥

सोरठा-यहि जोलहै तू मार, नहीं तो देगा बददुआ ।
तुमको करें खुवार, जान माल सब गलैगा ॥

साखी-कहै सिकन्दर पीर सुन, मोहि तुमारि पनाह ।
जो चाहो सो करो यहि, तुमें कोई रोकै नाह ॥

चौपाई

कहो कबीरके मारन ताँई । इहवाँ मेरी कछु न बसाई ॥
पीर फकीर जात अल्लाहा । मेरो जोर न पहुँचे ताहा ॥

( १४० )

बोधसागर

साखी—जौँ वह होतो रैअत, तौ हम करते जोर ।
वह अलमस्त फकीर है, तहाँ न फावै मोर ॥
तुमहु कही समुझायके, पीर फकीर अल्लाह ।
अब तुम कहते मारने, यह न होय हमपाह ॥

चौपाई

अहो पीरजी तुम वह एका । अपने मनमें करो विवेका ॥
उन तुमरो कछु नाहिं बिगारा । काहे तुमने कुफुर पसारा ॥
बुजरूग सब नेकी फरमावै । जोर जुलुम कछु नाहीं भावै ॥

साखी—कहा हमारा मानिये, छोड़ि दीजिये रार ।
कुलह सुलह दे बैठिये, अल्लह ओर निहार ॥
कहै तकी सुलतान सुन, तुमे नहीं कछु दोष ।
जो मैं कहों सो मानिये, कर मेरो संतोष ॥
कहै सिकंदर पीर सुन, मेरो शिर बरु लेहु ।
फकिर कबीर न मारिये, यह मांगे मोहि देहु ॥

चौपाई

सुनतहि तकी कोध परजारा । शिरते ताज जमीन दे मारा ॥
निपटहि बिकल देखि तिहि भाई । तब हम शाहसे कहा बुझाई ॥
कहै कबीर सुनो सुलताना । करो पीरको बचन प्रमाना ॥
कहै सिकंदर सुनो हो पीरा । मन मानै सो करो कबीरा ॥

साखी—डारहु मारि कबीरको, हम नहिं मानै उन ।
ताका कबहु न भला हो, करे फकरको खून ॥

चौपाई

शेखतकी तब उठे रिसाई । है कोई बांध कबीरहि भाई ॥
साखी—शेखतकी आपै उठै, काजी पंडित झार ।
बाँध बाँध सब कोई कहै, कोई न करे गोहार ॥

स्वसमवेदबोध

( १४१ )

बाहँ बांधि पग बांधिके, बोर गंगजल नीर ।
निःसंशय निश्चित सो, निरभय सदा कबीर ॥
गंगाजलपर आसन, वंद परे खहराय ।
जन कबीर सतनाम बल, निरभय मंगल गाय ॥
शाह सिकंदर देखही, अरु ठाढे सब लोग ।
धनि कबीर सब कोइ कहै, शेखतकी भा सोग ॥

चौपाई

शेखतकी तब मीजै हाथा । सुखे सुख नहिं आवै वाता ॥
शेखतकी तब कहै बनाई । अबकी कसनी बढ़ौ न भाई ॥
अबकी बार कबीरहि पावो । देगि मूढ़िके आच दिलावो ॥
देग आंचते बचै कबीरा । तो जानौ अल्लाहको नूरा ॥
कहै कबीर नाम परकासा । तासो गयौ सिकंदरके पास ॥
शाह सिकंदर उठिभे ठाढे । अधिको प्रेम तासु उर बाढे ॥
शेखतकी कह क्रोधित बैना । धुनै शीस राते भये नैना ॥
सुन कबीर कह तकी मयाना । तुम कीनो चेटक हम जाना ॥

सारखी-अबहि तोहि कीमा करे, देग मूढ़ि देव आँच ।
देव आँचदे बाँचिहो, तो कबीर तुम साँच ॥
कहै कबीर सुन शेखतकि, करो जो तुम मनभाव ।
हम जैसेको तैसा, देग आँच दिलवाव ॥

चौपाई

तुम नाटक चेटक मन लावा । हमरे चेटक नाम प्रभावा ॥
शेखतकी तुम आप हो जैसे । हमको तुम मति जानो तैसो ॥

सारखी-कीमा करने कारने, शेख घालो तरवार ।
खांडा गहि शिर ना कटै, शेखतकी गे हार ॥
कहै तकी इहि जोलहा, बाँध्यौ खांडा मोर ।

( १४२ )

बोधसागर

ताते देही ना कटै, लगै अत्र हो भोर ॥
देग मुसल्लम मूँदेहूँ, मोहड़ा मूँद रिसाय ॥
आप आँच दिलवावई, ठाढ़ कतहुँ नहिं जाय ॥

चौपाई

देख लोग सब बहुत तमासा । हम पुनि गये सिकन्दर पास ॥
साखी-शाह सिकन्दर पीरपै, खबरि पठाई साँच ।
है कबीर पास हमारे, काहि दिलावो आँच ॥

चौपाई

सो सुनि तकी देग मुख खोला । सुन्न देखि वाको मन डोला ॥
आतुर तकी शाहपै आये । हमैं देखि पुनि शीश डोलाये ॥
बहुरि तकी लज्जित है कहई । जोलहापै कल्लु चेटक अहई ॥
साखी-देग अत्र जल बांचेऊ, नहिं व्यापै तन पीर ।
बहुरि अग्नि जरि बाचिहौ, तो तुम साँच कबीर ॥

चौपाई

विहँसि कबीर कहै सुन शेखा । करो जो आवैं तुमरे लेखा ॥
शेखतकी बहु काठ मँगाया । अति विस्तार अँबार लगाया ॥
साखी-ताहि बीच मोहि मूँदके, दीन्हेसि अग्नि लगाय ।
अग्नी धाय बुतानी, जन कबीर गुन गाय ॥

चौपाई

कहै तकी यह बाँध्यौ आगी । याको चेटक सब पर लागी ॥
तब जानो तुम साँच फकीरा । धरती गाड़े बचे कबीरा ॥
कहैं कबीर सत नाम प्रतापा । कतहुँ नहिं व्यापै तनतापा ॥
साखी-तुम मति चूको शेखजी, करो जो तुव मन होय ।
कहैं कबीर मोहि डर नहीं, निर्भय नाम समोय ॥

चौपाई

शेखतकी पुनि कूप खुदाये । गर पग बाँधि ताहिमें नाये ॥

स्वसमवेदबोध

( १४३ )

साखी-ईटा पाथरते भरे, दीनो रूप सुँदाय ।
कहै तकी अबकी मरे, ऐसो करे खुदाय ॥

चौपाई

शेखतकी अल्लाह मनावै । अबकी बार न जीअत आवै ॥
हम पुनि गये शाहके पास । तबहि सिकन्दर वचन प्रकासा ॥

साखी-कहै सिकन्दर पीर सुन, किसको गाड़ो रूप ।
सो कबीर इहँ बैठ हैं, अदभुत ख्याल अनूप ॥

चौपाई

शेखतकी व्याकुल है बोले । नैन नासिका मस्तक डोले ॥
साखी-यहि जोलहाके पासमें, तारो गुटका आहि ।
ताते गाड़े नहीं मड़े, जरे न काटा जाय ॥
अब गहि कर पग बांधिके, हाथी देव हुलाय ।
हाथी धरि धरि चीरि है, तब कछु नाहि बसाय ॥
खूनी पील मँगायकै, दीन्हेसि मद्य पिलाय ।
कर पग बँधि हाथी हुले, हाथी चला पराय ॥
केतनो करै महाउत, गज सम्मुख नहीं आव ।
कहै तकी अब तोपके, मोहड़े राखि उड़ाव ॥
गोला दारू भरि दिहसि, राखे मोहड़े तोप ।
कहै कबीर सतनाम बल, निर्भय रहौ निशोक ॥
चले सिकन्दर निज घरे, हमकहँ लीने साथ ।
शेखतकी झूँसी रहे, शाह इलाहाबाद ॥

चौपाई

काशीके ब्रह्मन अरु काजी । मुरछि रहे सब हिरफत बाजी ॥
साखी-एक घौस गंगा तटे, बैठ सिकन्दर शाह ।
शेखतकी हमहू तहाँ, मुरदा यक बहा जाय ॥

नं. ९ कबीरसागर - ६

( १८४ )

बोधसागर

चौपाई

कहै तकी सुन फकर कबीरा । मुरदा फेर जिलावहु धीरा ॥

साखी-कहै कबीर गरीब हम, तुम बादशाहके पीर ।

मुरदा तुमहि जिलावहु, सतगुरु कहै कबीर ॥

चौपाई

शेखतकी चितवै चित लाई । अल्लह मुरदा देहु जिलाई ॥

साखी-अल्लह पीर मनाइया, शेखतकी बहु बार ।

मुरदा जिंदा न हुवा, बहिगो रेत मझार ॥

चौपाई

शेखतकी कह सुनो कबीरा । मुरदा तुमहि जिलावहु फीरा ॥

साखी-उठि मुरदाहि हम चितवा, दूरते नरे आय ।

कुदरत निर्भय नामके, मुरदा फेर जिलाय ॥

मुरदेको अस बोलेऊ, उठ कुदरत कम्माल ।

कर कुबड़ी धर टेकिऊ, सजि जिव भया सो बाल ॥

चौपाई

सुत कमाल कहि उत्तर दीना । उठि कमाल तब अस्तुति कीना ॥

गुरु सत्त जो कही कमाला । गुरु कबीर मोहि कीन निहाला ॥

साखी-कहै कमाल पुकारिके, गुरु हैं सत्य कबीर ।

मुरदेसे जिंदा किया, गन्दी गली शरीर ॥

शेखतकी मन मूछिके, कह धनि धन्य कबीर ।

तुम अल्लाह खुदाय हो, तुम मेरे गुरु पीर ॥

कहै कबीर सुन शेखजी, तुम औलियाकि जात ।

रोजा निमाज कर बंदगी, बैठो नबी जमात ॥

जो अल्लह फरमाया, सो नहिं करता कोय ।

हलाल हराम चीन्है नहीं, कैसे मुसलिम होय ॥