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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

शाप देने पर अद्याका पश्चात्ताप और निरंजनके डरसे डरना और शाप पाना, निडर होना

अवुरागसागर

( ३९ )

ब्रह्मादि शिवसनकादिनारदको उन बचि भागहो ॥
सुनुधरमनिविरलाबच शब्द सतसो लागि हो ॥२८॥
सो-० सत्य शब्द परताप, कालकला व्यापै नहीं ॥
निकट न आवै पाप, मनवच कर्म जो पदगहे ॥२९॥

शाप देदेने पर अधाका पश्चाताप और निरंजनके डरसे डरना । छन्द

शाप तीनोंको दैलियो मन माहीं तब पछतावई ॥
कस करहि मोहि निरंजनापल छमा मोहि नआवई ॥

निरंजनका अधाको शाप देना

आकाशबानी तबै भयी यहू काह कीन भवानिया ॥
उत्पत्तिकारणतोहिपठाई कहा चरित यह ठानिया ॥
सो-० नीचहि ऊच सिताय, बदल मोहि सोपावई ॥
द्वापर युग जब आय तुमहिं पञ्च भर्तार हो ॥३०॥

अधाका निडर होना । कबीर वचन धर्मदासप्रति

शाप ओयल जब सुनेउ भवानी । मनसन गुने कहा नहि बानी ॥
ओयल प्रभाव शाप हम पाया । अब कहा करब निरंजनराया ॥
तोरे वस परी हम आई । जस चाहौ तस करौ मितार्ई ॥

विष्णुका गौरसे श्याम होने का कारण अधावचन विष्णुप्रति

पुनि कहि माता विष्णु दुलारा । सुनहु पुत्र इकवचन हमारा ॥
सत्य सत्य तुम कहौ बुझाई । पितुपद परसन जब गै भाई ॥
प्रथमहु तो तुम गौर शरीरा । कारण कौन श्याम भये धीरा ॥

विष्णुवचन अधा प्रति

आज्ञा पाय हम तत्काला । पितुपद परसन चले पताला ॥
अक्षत पुहुप लीन्ह करमाहां । चले पताल पंथ मग जाहां ॥
पहुँचि शेष नाग पहुँ गयऊ । विषके तेज हम अलसयऊ ॥

अद्याका विष्णुकी ज्योतिका दर्शन करना

( ४० )

अनुरागसागर

भयो श्याम विषतेज समावा । भइ अवाज अस वचन सुनावा ॥
अहो विष्णु माता पहुँ जाई । वचन सत्य कहियो समुझाई ॥
सतयुग त्रेता जैसे जबही । द्वापर है चौथा पद तबही ॥
तब तुम होहु कृष्ण अवतारा । लैहौ ओयलसो कही विचारा ॥
नाथ हु नाग कलिन्दी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥
ऊंच होइके नीच सतावे । ताकर ओयल मोहिसो पावे ॥
जो जिव देई पीर पुनि काहू । हम पुनि ओयल दिखावे ताहू ॥
पहुँचे हम तब ही तुव पास । कीन्हैउ सत्य बचन परकाशा ॥
भेटउ नाहि मोहि पद ताता । विषज्वाला साँवल भो गाता ॥
व्याकुल भयो तवै फिर आयो । पितु पद दर्शन मैं नहि पायो ॥

अवाका विष्णुको ज्योतिका दर्शन कराना

इतना सुनि हर्षित भइ माई । लीन्ह विष्णु कहैं गोद उठाई ॥
पुनि अस कहेउ आदि भवानी । अब सुनहु पुत्रप्रियममबानी ॥
देख पुत्र तोहि पिता भिटावों । तोरे मन कर धोख मिटावों ॥
प्रथमहि ज्ञान दृष्टिसों देखो । मोर वचन निजहृदय परेखो ॥
मनस्वरूप करता कहैं जानो । मनते दूजा और न मानो ॥
स्वर्ग पताल दौर मन केरा । मन अस्थिर मन अहै अनेरा ॥
क्षणमहैं कला अनन्त दिखावे । मनकहैं देख कोइ नहि पावे ॥
निराकार मनहीको कहिये । मनकी आशा दिवस निशि रहिये ॥
देखहु पलटि शून्यमह जोती । जहवां झिलमिलझालर होती ॥
फेरहु श्वास गगन कह धायो । मार्ग अकाशहि ध्यान लगायो ॥
जैसे माता कहि समुझावा । तैसे विष्णु ध्यान मन लावा ॥

छन्द

पेठि गुंफा ध्यान कीन्हो श्वास संयम लायके ॥
पवन धूँका दियो जबते गगन गरज्यो आयके ॥

ज्योतिदर्शन रहस्य

अवुरागसागर

( ४१ )

बाजासुनततबमगनभापुनिकीन्हमनकसख्यालहो ॥
शून्यस्वेतपीतसब्जलालदियायरंगजगालहो ॥३०॥
सो०-ताहपीछे धर्मदास, मनपनि आपदिखायल ॥
कीन्ह ज्योति परकास, देखि विष्णु हरित भये३०॥
मातहि नायो शीश, बहु अधीन पुनि विष्णुभा ॥
मैं देखा जगदीश, हे जननी परसाद तुव ॥ ३१ ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास गहि टेके पाया । हे साहिबइकसंशय आया ॥
कन्या मनको ध्यान बतावा । सो यह सकल जीव भरमावा॥

सदगुरु वचन

धर्मदास यह काल स्वभाऊ । पुरुष भेद विष्णु नहीं पाऊ ॥
कामिनिकी यह देखहु बाजी । अमृतगोय दियो विष साजी ॥
जात काल दूजा जनिजानहु । निरखि धर्म सत्यहिं पुरआनहु ॥
प्रगट सु तोहि कहो ससुझाई । धर्मदास परखहु चितलाई ॥
जब परगट तस गुप्त सुभाऊ । जोरह हृदय सो बाहर आऊ ॥
जब दीपक बारे नर लोई । देखहु ज्योति सुभाव विलोई ॥
देखत ज्योति पतंग हुलासा । प्रीति जान आवै तिहिपासा ॥
परसत होवे भसम पतंगा । अनजाने जरि परहि मतंगा ॥
ज्योतिस्वरूपकाल अस आही । कठिनकाल यह छांडत नाही ॥
कोटि विष्णु औतारहि खाया । ब्रह्मा रुद्रहि खाय नचाया ॥
कौन विपति जीवनकी कहऊँ । परखि वचन निज सहजहि रहऊँ ॥
लाख जीव वह नित्यहि खाई । असविकरालसोकालकसाई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनहुँ गुसाई । मोरे चित संशय असआई ॥
अष्टंगीहि पुरुष उत्पानी । जिहिविधि उपजी सो मैं जानी ॥

मायाका विष्णुको सर्व प्रथम बनाना

( ४२ )

अनुरागसागर

पुनि वहि मास लीन्ह धमराई । पुरुष प्रताप सु बाहर आई ॥
सो अछंगीहि असछल कीन्ह । गोइसि पुरुष प्रगटयम कीन्ह ॥
पुरुष भेद नहि सुनन बतावा । कालनिरञ्जन ध्यान करावा ॥
यह कस चरित कीन्ह अछंगी । ताजा पुरुष भइकाल किसंगी ॥

सद्गुरु वचन

धर्म सुनहु जन नारि सुभाऊ । अब तुहि प्रगटवरणिसमझाऊ ॥
होय पुत्री जेहि घर माहीं । अनेक जतन परितोषै ताहीं ॥
वन्न भक्ष सुख सेज निवासा । घरबाहर सब तिहि विश्वासा ॥
यज्ञ कराय देय पितु माता । बिदाकीन्हहितप्रीतिसों ताता ॥
गयी सुता जब स्वामी गेहा । रात्या तासु संग गुण नेहा ॥
माता पिता सबै बिसरावा । धर्मदास अस नारि स्वभावा ॥
ताते अद्या भई बिगानी । काल अंग है रही भवानी ॥
ताते पुरुष प्रगटने लायी । कालरूप विष्णुहि दिखलायी ॥

धर्मदासवचन कबीर प्रति

हे साहब यह जान्यो भेदा । अब आगेका करहु उछेदा ॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति

पुनि माता कहि विष्णु दुलारा । मरद्यो मान जेठ निजबारा ॥
अहो विष्णु तुम लेहु अशीशा । सब देवनमें तुमहीं ईशा ॥
जो इच्छा तुम चितमें धरिहौं । सो तब तोर काज मैं करिहौं ॥

मायाका विष्णुको सर्वप्रधान बनाना

प्रथम पुत्रब्रह्म दुरि गयऊ । अकरमझूठिताहि प्रिय भयऊ ॥
देवन श्रेष्ठ तुमहि कहैं मातहि । तुम्हारी पूजा सब कोई ठानहि ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

कृपा वचन अस माते भाखा । सबते श्रेष्ठ विणुकह राखा ॥
माता गयी रुद्रके पास । देख रुद्र अति भये हुलासा ॥

अद्याका महेशको वरदान देना

अनुरागसागर

( ४३ )

अद्याका महेशकी बरदान देना

पुनि लहुरा कहैं पूछे माता । तुम शिव कहो हृदयकी वाता ॥
माँगहु जो तुम्हरे चित भावे । सो तोहि देख माता फुरमावे ॥
दोउ पुत्रन कहैं मात हदावा । माँग महेश जो मनभावा ॥

महेशवचन

जोरि पानि शिवकहबे लीन्हा । देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥
कबहिं न विनसे मेरी देही । हे माता मागों वर एही ॥
हे जननी यह कीजै दया । कबहु न विनशै मेरी काया ॥

अद्यावचन

कह अछंगी अस नहीं होई । दूसरा अमर भयो नहिंकोई ॥
करहु योग तप पवन सनेहा । रहै चार युग तुम्हरी देहा ॥
जौलौं पृथ्वी अकाश सनेही । कबहु न विनशै तुम्हरी देही ॥

धर्मदासवचन

धर्मदास विनती चित लाई । ज्ञानि मोहि कहो समुझाई ॥
यह तो सकल भेद हम पायी । अब ब्रह्माको कहो उथायी ॥
अद्या शाप ताहि कहैं दीन्हा । तेहि पीछे ब्रह्मा कस कीन्हा ॥

कबीर वचन

विष्णु महेश जबै वर पाये । भये आनन्द अतिहि हरषाये ॥
दोनो जने हरष मन कीन्हा । ब्रह्मा भयो मान मद हीना ॥
धर्मदास मैं सब कुछ जानों । भिन्न भिन्न कर प्रगट बखानों ॥

शाप पानेके कारण दुःखित हो ब्रह्मा विष्णुके पास जाकर

अपना दुःख कहना और विष्णुका उसे आश्वासन देना

ब्रह्मा मनमें भयो उदासा । तब चलि गयो विष्णुके पास ॥

ब्रह्मावचन विष्णुप्रति

जाय विष्णुसे बिन्ती ठाना । तुम हो बंधु देव परधाना ॥
तुम पर माता भई दयाला । शाप विवश तुम भये बिहाला ॥

( ४४ )

अनुरागसागर

निज करनी बल पायेहो भाई । किहि विधि दोष लगाऊँ माई ॥
अब अस जतन करोहो भ्राता । चले परिवारे वचन रहै माता ॥

विष्णुवचन

कहे विष्णु छोड़ो मन भंगा । मैं करिहौं सेवकाई संगा ॥
तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संशय सब देहु बहाई ॥
जो कोइ होवे भक्त हमारा । सो सेवै तुम्हारो परिवारा ॥

छन्द

जगमाहि एस दिढाई हौं फलपुन्य आशा जोयहो ॥
यज्ञ धर्म रु करे पूजा द्विज बिना नहिं होय हो ॥
जो करे सेवा द्विजनकी तेहि महापुण्य प्रभावहो ॥
सो जीवमोकहै अधिकप्यारेराखिहौं निज ठाँवहो ॥ ३१

कबीरवचन धर्मदासप्रति

सो ०-ब्रह्मा भये अनंद, जबहि विष्णु असमापेऊ ॥
मेटेउ चितकर दंड, सखा मोर सब सुखीभी ॥ ३२ ॥

कालप्रपंच

देखहु धर्मनि काल पसारा । इन ठग ठग्यो सकल संसारा ॥
आशा दै जीवन बिलपावै । जन्म जन्म पुनि ताहि सतावै ॥
बलि हरिचंद बेतु बइरोचन । कुंती सुत औरौ महिसोचन ॥
ये सब त्यागी दानि नरेशा । इन कहैं ले राखे केहि देशा ॥
जस गंजत इन सबकी कीन्ह। सो जग जानेकाल अधीना ॥
जानत है जग होय न शुद्धी । कालअमरबलसबकी हरबुद्धी ॥
मन तरंगमें जीव भुलाना । निजघर उलटिनचीन्ह अजाना ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनो गुसाई । तबकी कथा मोहि समुझाई ॥
तुम प्रसाद जमको छल चीन्हा । निश्चय तुम्हरे पदचित दीन्ह ॥

गायत्रीका अद्याको शाप देना

अनुरागसागर

( ४६ )

भव बूझत तुमसी गहि राखा । शब्द सुधारस मोसन भाखा ॥
अब वह कथा कहो समुझाई । शाप अंत किया कौन उपाई ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति गायत्रीके अक्षाको शाप देनेका वृत्तान्त

धर्मनि तुम सन कहो बखानी । भाषो ज्ञान अगमकी बानी ॥
मातु शाप गायत्री लीन्हा । उलटि शाप पुनिमातहिंदीन्हा
हम जो पांच पुरुषकी जोई । पांचोंकी तुम माता होई ॥
बिना पुरुषकी तू जिनि है बारा । सो जानही सकल संसारा ॥
दुहुनु शाप फल पायो भाई । उगरह भयो देह धरि आई ॥

जगतकी रचनाका विशेष वृत्तान्त

यह सब द्रंद बाद है गयऊ । तब पुनि जगकी रचना भयऊ
चौरासी लख योनिन भाऊ । चार खानि चारिहु निरमाऊ ॥

छन्द

प्रथम अंडजरच्यो जननी, चतुरमुखपिण्डजकियो ॥
विष्णु उष्मज रच्यो तबहीं, रुद्र स्थावर लियो ॥
लीन्ह रचि जेहि खानि चारों, जीव बंधनदीन्हहो ॥
होन लागी कृषीकारण, करण कर्ता चीन्हहो ॥
सो०—यहि विधि चारो खानि, चारहु दिशि विस्तार किया
धर्मदास चित जान, वाणी चारि उचारको ॥३३॥

धर्मदास वचन कबीरप्रति

धर्मनि कहैं जोरि युग पानी । तुम सद्गुरु यह कहो बखानी ॥
चार खानिकी उत्पति भाऊ । भिन्न भिन्न मुहि वरणि सुनाऊ ॥
चौरासी लख योनिन धारा । कौन योनि केतिक विस्तारा ॥

चार खानकी गिनती । कबीरवचन धर्मदास प्रति

कह कबीर सुन धर्मनि बानी । योनि भावतोहि कही बखानी ॥
भिन्न भिन्न सब कहु समुझाऊं । तुमसे अन्त न कछु दुराऊं ॥
तुम जिन शंका मानहु भाई । वचन हमार गहो चितलाई ॥

चौरासी लाख योनिकी गिनती

( ४६ )

अनुरागसागर

चौरासी लाख योनिकी गिनती

नौ लख जलके जीव बखानी । चौदह लाख पक्षी परवानी ॥
किरम कोट सत्ताइस लाख । तीन लाख अस्थावर भाखा ॥
चतुर लक्ष मानुष परमाना । मानुष देह परम पद जाना ॥
और योनि परिचय नहीं पावे । कर्म बंध भव भटका खावे ॥

मनुष्य खानि सवते अधिक क्यों है ? धर्मदासवचन

धर्मदास नायो पद शीशा । यह समुझाय कहो जगदीशा ॥
सकल योनि जिव एकसमाना । किमिकारण नहीं इसमझाना ॥
सो चरित्र मुनि कहौ बुझाई । जाते चित संशय मिटिजाई ॥

सद्गुरुवचन

सुनु धर्मनि निज अंश अभूषण । तोहि बुझाय कहौ यह दूषण ॥
चार खानि जिव एकै आहीं । तत्त्व विशेष अहैं सुन ताहीं ॥
सो अब तुमसों कहों बखानी । तत्त्व विशेष अहैं सुन ताहीं ॥
ऊष्मज दोय तत्त्व परमाना । अंडज तीन तत्त्व गुण जाना ॥
पिण्डज चार तत्त्व गुण कहिये । पांच तत्त्व मानुष तन लहिये ॥
तासों होय ज्ञान अधिकारी । नरकी देह भक्ति अनुसारी ॥

किन २ खानिमें कौन २ तत्त्व है । धर्मदासवचन कबीरप्रति

हे साहिब मुहि कहु समुझाई । कौन कौन तत्त्व इन सब पाई ॥
अंडज अरु पिंडजके संग । ऊष्मज और अस्थावर अंगा ॥
सो साहिब मोहि वरणि सुनाओ । करो दया जनि मोहि दुराओ ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति छन्द

सतगुरु कहैं सुन दास, धर्मनि तत्त्व खानिनिवेरनो ॥
जाहि खानि जो तत्त्व दीन्हौ, कहौ तुमसो टेरनो ॥

१ इस पदको कई प्रतियोंमें लिखा है ।

सकल जिवन जिव एक समाना । नर सब औरनको नहीं जाना

सब मनुष्योंका ज्ञान एक समान क्यों नहीं है ?

अवुरागसागर

( ४७ )

खनिअण्डज तीन तत्त्व हैं, आप वायु अरु तेजहो॥
अचल खानी एकतत्त्वहि, तत्त्वजलका थेंगहो३३॥
सो०-ऊष्मज तत हैं द्योय, वायु तेज समजानिये॥
पिंडज चारहिं सोयं,पृथ्वी तेहि अपवायुसम ॥३४॥
पिंडज नर परधान, पांच तत्त्वतेज संग है ॥
कहे कबीर परमान, धरमदास लेहुपरखिके ॥३५॥
पिंडज नरकी देह सँवारा । तामें पांच तत्त्व विस्तारा ॥
ताते ज्ञान होय अधिकाई । गहै नाम सत लोकहिं जाई॥

सब मनुष्योंका ज्ञान एक समान क्यों नहीं ? धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनु बन्दी छोरा । इक संशय मेटो प्रभु मेरा ॥
सब नर नारि तत्त्व सम आहीं। इक सम ज्ञान सबनको नाहीं॥
दया शील संतोष क्षमा गुनन । कोई शून्य कोइ होय सम्पूर्णन॥
कोई मनुष्य होय अपराधी । कोई शीलतलकोई कालउपाधी॥
कोई मारि तन करे अहारा । कोई जीव दया उर धारा ॥
कोई ज्ञान सुनत सुख माने । कोई काल गुणवाद बखाने ॥
नाना गुण किहि कारण होई । साहिब बरणि सुनावो सोई ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

धर्मदास परखो चित लाई । नरनारी गुण कहूँ बुझाई ॥
जानते नर है ज्ञानी अज्ञानी । सो सब तोहि कहों सहिदानी॥
नाहर सर्प औ स्वान सियारा । काग गिद्ध सूकर मंजारा ॥
और अनेकजो इन अचखानी । खाहि अखजअधमगुणजानी ॥
इन जो इतने जे जिव आवा । नरकी जोन जन्म जिन पावा॥
पीछे जो इन सुभावन छूटे । कर्म प्रधान महापुन छूटे ॥
ताते सब चले कागके लेखे । नरकी देह परगट तेहि देखे ॥

योनिप्रभाव मेटनेका उपाय

( ४८ )

अनुरागसागर

जिहि जो इतने जो नर आज । ताको तैसो आहि सुभाऊ ॥
अघकरमी घातक विष पूजा । जो इन प्रभाव होय नहि दूजा ॥

योनिप्रभाव मेटनेका

सतगुरु मिले तो ज्ञान लखावै । काग दशा तव सब बिसरावै ॥
मुरचा जो इन छूटे तब भाई । ज्ञान मसकला फिरे बनाई ॥
जब धोबी वस्तर कहैं धोवे । जससाबुन मिल उज्वल होवे ॥
थोर मैल कर वस्तर भाही । थोड़े परिश्रम मैल नसाई ॥
निपट मलिनजे वस्तर आही । ता कहैं अधिक अधिक श्रम चाही
जैसे मैल वस्तर कर भाऊ । ऐसे जीवन करे सुभाऊ ॥
कोइ कोइ जो अंकुर होई । स्वरूप ज्ञान सो गहे विलोई ॥

धर्मदास वचन

यह तो स्वरूप जोनि करलेखा । खानि भाव अब कहूँ विशेषा ॥
चारि खानिको जिव है जोई । मनुष्य खानमहँ आवे सोई ॥
ताकर लच्छन मोहि बताओ । विलग विलग करि मुहिस मझाओ
जेहि परखी सुहहिं महँ चेतू । कर अब साहब यहि बड़ हेतू ॥

चारि खानिके लक्षणोंकी पारख । कबीर वचन

धर्मदास परखहु चित लायी । चारि खानि गुण कहूँ समुझायी ॥
चारों खानि जीव भरमाया । तब ले नरकी देह धराया ॥
देह धरे छोड़े जस खाना । तैसे ता कहैं ज्ञान बखाना ॥
लच्छन औ अपलच्छन भेदा । सो सब तुमसौ कहौ निषेदा ॥

अण्डजखानसे मसुष्यदेहमें आये हुए जीवकी पारख

प्रथम कहौ अण्डजकी बानी । एकहि एक कहौ बिलछानी ॥
आलस निद्रा जा कहैं होई । काम क्रोध दारिद्री सोई ॥
चोरी चंचल अधिक सुहाई । तृष्णा माया अधिक बढ़ाई ॥
चोरी बुगुली निन्द्रा भावे । घर बनझाड़ी अगिन लगावे ॥
रोवे कूंदे मंगल गावे । भूत प्रेत सेवा मन भावे ॥

अण्डजखानिसे मनुष्यदेहमें आये हुए जीवकी पारख

अनुरागसागर

( ४९ )

देखत देत और पुनि काहू । मन मन झंखे बहु पछताहू ॥
वाद विवाद सबसों ठाने । ज्ञान ध्यान कछु मनहिं न आने ॥
गुरुसतगुरु चीन्हें नहिं भाई । वेद शास्त्र सब देइ उठाई ॥
आपन नीच ऊंच मन होई । हमसमसरि दूसर ना कोई ॥
मैले बस्तर नहीं नहाई । आंख कीन सुख लार बहाई ॥
पांसा जुवा चित्त मन आने । गुरुचरणननिशिदिननिहिजाने ॥
कुवरा मूड़ ताहिका होई । लंबा होय पाव पुनि सोई ॥

ॐ

यहि भांतिलक्षणमें कहा, तुम सुनहु धर्मनि नागरू ॥
अंडज खानिन गोयराखा, कह्यो भेद उजागरू ॥
यह खानि वर्णन कहौ तौसों, कछु नाहि छिपायऊ ॥
सोसमुझावानीजीवथिरकै, धोखसकलमिटायऊ ३४

उष्मज खानिसे मनुष्य देहमें आये हुये जीवनकी पारख

सोरठा-टूजीखानि बताय, ताहि लक्ष तौसों कहो ॥
उष्मजते जिय आय, नर देही जिन पाइय ॥ ३६ ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । उषमज भेद कहौ परगासा ॥
जाइ शिकार जीव बहु मारे । बहुतसे आनन्द होयतेहि वारे ॥
मारि जीव जब घर कहैं आयी । बहुविधि रांध ताहि कहैं खाई ॥
निन्दे नाम ज्ञान कह भाई । गुरु कहैं मेठि करे अधिकाई ॥
निन्दे शब्द और गुरु देवा । निन्दे चौका नरियर भेवा ॥
बहुत बात बहुतेनरि आयी । कथे ज्ञान बहुते ससुझायी ॥
झूठे वचन सभामें कहई । टेढ़ी पाग छोर उरमहई ॥
दया धरम मनहीं नहिं आवे । करें पुन्य तेहि हांसी लावे ॥
माल तिलक अरु चन्दन करई । हाट बजार चिकन पटफिरई ॥

स्थावर खानिसे मनुष्य शरीरमें आये हुए जीवकी पारख

( ५० )

अनुरागसागर

अन्तर पापी ऊपर दाय। सो जिव यमके हाथ विकाया॥
लंब दांत अरु वदन भयावन । पीरे नेत्र ऊँच अति पावन ॥

छन्द

कहे सतगुरु सुनहु धर्मनि, भेद भल तुम पाइया ॥
सतगुरु विना नहि भेद पावे, भली विधितो हिंदर साइया
भैंटिया तुम मोहिको, कछु नाहिं तोहिं दुराइहौं ॥
जो बृझिहो तुम मोहिसो, सकल भेद बताइहौं ॥३५॥

स्थावर खानिसे मनुष्य शरीरमें आये हुए जीवनकी पारख

सो०-तीजी खानि सुभाव अचल खानि जेहि कहत
नरदेही तिन पाव, ताकर लक्षण अब बताइहौं ॥३७॥
अचल खानिको कहो सँदेसा । देह धरे जस होवैं भेसा ॥
छनिक बुद्धि होवे जिव केरी । पलटत बुद्धि न लागे बेरी ॥
झाड़ा फेटा सिर पर पागा । राज द्वार सेवा भल लागा ॥
घोड़ा पर होवे असवारा । तीन खरग औ कमर कटारा ॥
इत उत चित सैन जो मरई । पर नारी करि सैन बुलवाई ॥
रससों बात कहैं मुख जानी । काम बान लागे उर आनी ॥
पर घर ताकइ चोरी जायी । पकर बांधि राजा पहँलायी ॥
हांसी करे सकल पुनि जगहूँ । लाज शर्म उपज नहिं तबहूँ ॥
छिन इक मन महाँ पूजा करई । छिन इक मन सेवा चित धरई ॥
छिन इक मन महाँ बिसरे देवा । छिन इक मन महाँ की जै सेवा ॥
छिन इक ज्ञानी पोथी बांचा । छिन इक माँहि सवन घर नाचा ॥
छिन इक मनमें सूर कहोई । छिन इकमें कादर हो सोई ॥
छिन इक मनमें साहु कहाई । छिन इक मनमें चारि लगाई ॥
छिन इक मनमें करे जु धर्मा । छिन इक मनमें करे अकर्मा ॥

पिंडज खानिसे मनुष्यशरीरमें आये हुए जीवकी पारख

अवुरागसागर

( ५१ )

भोजन करत साथ खजुआई । बाँह जाँघ पुनि मींजत भाई॥
भोजन करत सोय पुनि जाई । जो जगाय तिहि मारन धाई॥
आंख लाल होहि पुनि जाकी । कहैलंग भेद कहों मैं ताकी॥

छन्द

अचलखानीभेद धर्मनि, छिनक बुद्धि सो होयहो ॥
छिन माहिं करके मेट डारे, कहों तुमसों सोयहो॥
मिले सतगुरु सत्य जा कहैं, खान बुधिसबमेटही॥
गुरुचरणलीन अधीन होवै, लोकसोहैंसापैठही॥३६॥

पिंडज खानिसे मनुष्य गरीरमें आयै हुए जीवनकी पारख

सोरठा-सुनहु हो धरमदास, पिंडज लक्षणगुणकहो॥
कहों तुम्हारे पास चौथीखानिकी युक्तिसो ॥३७॥
पिंडज खानिके लच्छ सुनाऊँ । गुण अवगुणका भेद बताऊँ ॥
वैरागी उनमुनि मत धारी । करे धर्म पुनि वेद विचारी ॥
तीरथ औ पुनि योग समाधी । गुरुके चरणचित्तभलबाँधी ॥
वेद पुराण कथे बहु ज्ञाना । सभा बैठि बातें भल ठाना ॥
राजयोग कामिनी सुख माने । मनशंका कबहुँ नहिं आने ॥
धन संपति सुख बहुत सहायी । सेज सुपेद पलंग बिछायी ॥
उत्तम भोजन बहुत सुहायी । लौंग सुपारी बीसों खायी ॥
खरचे दाम पुन्य महाँ सोई । हिरदे सुधि ताकर पुनि होई॥
चच्छु तेज जाकर पुनि जानी । पराक्रम देही बल ठानी ॥
देखो स्वर्ग सदा तेहि हाथा । देखे प्रतिमा नावे माथा ॥

छन्द

बहुतलीन आधीन धर्मनि, ताहि जितकहैंजानिहो॥
सतगुरुचरणनिशिदिनगहे, मतशब्दनिश्चयमानिहो॥

मनुष्यशरीरसे मनुष्यदेहमें आनेवाले जीवकी पारख

( ५२ )

अनुरागसागर

एक एक बिलोय धर्मनि, कह्यो सत मैं तोहिसों ॥
चारखानी लक्ष भाषेउँ, सुनो आगे मोहिसों ॥३८॥

मनुष्य शरीरसे मनुष्यदेहमें आनेवाले जीवकी पारख

सोरठा-छूटे नरकी देह, जन्म धरे फिर आयके ॥
ताका कहौ सँदेह, धर्मदास सुनु कानदे ॥३९॥

धर्मदासवचन

हे स्वामी इक संशय आयी । सो पुनि मोहि कहो समझाई ॥
चौरासी योनिन भरमावे । तब मानुष की देही पावे ॥
यह विधि मोसन कह्यो बुझायी । अब कैसे यह संधि लखायी ॥
सो चरित्र गुरु मोहि लखाऊ । धर्मदास गहि ठके पाऊ ॥
मानुष जन्म धरे पुनि आयी । लक्षण तासु कहो समझायी ॥

कबीरवचन

धर्मदास तुम भलिविधि जानो । होय चरित सो भले बखानो ॥
आयु रहते भी मृत्यु होती है

आइ अछत जो नर मर जायी । जन्म धरे मानुषको आई ॥
जो पुनि मूरख ना पतियाई । दीपक बाती देख जराई ॥
बहुविधि तेल भरे पुनि ताही । लगै वायु तबै बुझ जाही ॥
अग्नि लायके ताहि लेसावे । यहिविधि जीवहु देह धरावे ॥
ताको लक्षण सुनहु सुजाना । तुमसों न गौय राखै ज्ञाना ॥
शूरा होवे नरके माहीं । भयउ डरताके निकट जाहीं ॥
माया मोह ममता नहि व्यापे । दुश्मन ताहि देखि डरकाँपे ॥
सत्य शब्द प्रतीति कर माने । निन्दा रूप न कबही जाने ॥
सतगुरु चरण सदा चितराखे । प्रेम प्रीतिसो दीनता भाखे ॥
ज्ञान अज्ञान होइ कहैं बूझे । सत्यनाम परिचय नित सूझे ॥
जो मानुष अस लक्षण होई । धर्मदास लिखि राखो सोई ॥

चौरासी धारा क्यों बनी ?

अनुरागसागर

( ५३ )

छन्द

जनमजनमको मैल छूटे, पुरुष शब्द जो पावई ॥
नाम भा सुमिरण गहे सो, जीव लोक सिधायई ॥
गुरुशब्द निश्चय दृढगहेसो, जीव अमियअमोलहो
सतनामबल निज घर चले, करे हंसकलोलहो ॥२८॥
सोरठा-सत्यनामपरताप, काल न रोके जीवकहैं ॥
देखिवंशको छाप, काल रहै सिर नायके ॥ ४० ॥

चौरासी धार क्यों बनी ? धर्मदासवचन

चारि खानिके बूझेउ भाऊ । अब बूझों सो मोहि बताऊ ॥
चौरासी योनिनकी धारा । किह कारण यह कीन्ह पसारा ॥
नर कारण यह सृष्टि बनाई । कै कोह और जीव भुगताई ॥
है साहिब जनि मोहि दुराओ । कीजे कृपाबिलंबजनिलाओ ॥

मनुष्यके लिये चौरासी बनी है सदगुरुवचन

धर्मनि नर देही सुखदायी । नर देही गुरु ज्ञान समाई ॥
सो तनु पाय आप जहैं जावे । सतगुरुभक्ति विनादुख पावे ॥
नर तनु काज कीन्ह चौरासी । शब्द न गहे मूढ़मतिनाशी ॥
चौरासीकी चाल न छाड़े । सत्य नाम सो नेह न माड़े ॥
लै डारे चौरासी माहीं । परचै ज्ञान जहां कछु नाहीं ॥
पुनिपुनि दौड़ि कालमुखजाहीं । ताहूते जिव चेतत नाहीं ॥
बहुत भांतिते कहि समुझावा । जीवत विपति जान गुहरावा ॥
यह तनु पाय गये सतनामा । नामप्रताप लहे निजधामा ॥

छन्द

आदिनाम विदेह अस्थिर, परखि जो जियरा गहे ॥
पाय बीरा सार सुमिरण, गुरु कृपा मारग लहे ॥

जीवोंके लिये कालका फन्दा रचना

( ५४ )

अनुरागसागर

तजिकागचाल मराल पथगहि, नीरक्षीरनिवारिके ॥
ज्ञानदृष्टिसोअदृष्टि देखे, क्षरअक्षरसुविचारिके॥२९॥
सोरठा-निह अक्षर है सार, अक्षरतै लखि पावई ॥
धर्मनि करो विचार निह अक्षर निहतत्त्व है ॥४१॥

धर्मदासवचन

धर्मदास कहे शुभ दिन मोरा । हे प्रभु दरसन पायउँ तोरा ॥
मुहि किंकर पर दाया कीजै । दास जानि मोहि यह बरदीजै ॥
निशिदिन रहो चरण लौलीना । पल इक चित्त न होवे भीना ॥
तुव पदपंकज रुचिर सुहावन । पद पराग बहुपतितन पावन ॥
कृपासिंधु करुणामय स्वामी । दया कीन्ह मोहि अंतरयामी ॥
हे साहिब मैं तव बलिहारी । आगल कथा कहो निरवारी ॥
चारखानिरचि पुनिकसकीन्ह। सो सब मोहि बतावो चीन्ह। ॥

जीवोंके लिये कालका फन्दा रचना । कबीरवचन

सुनु धर्मनि यह है यमबाजी । जेहि नहिं चीन्हे पंडितकाजी ॥
जा यम ताहि गोसइयां भाखे । तजे सुधा नर विषकहैं चाखे ॥
चारिहु मिलियह रचना कीन्ह। कच्छा रंग सु जीवहि दीन्ह। ॥
पांच तत्त्व तीनों गुण जानो । चौदह यम ता संग पिछानो ॥
यहि विधि कीन्ही नरकीकाया । मरे खाय बहुरि उपजाया ॥
ओंकार है वेदको मूला । ओंकारमें सब जग भूला ॥
है ओंकार निरंजन जानों । पुरुष नाम सो गुप्त अमानो ॥
सहस्र अठासी ब्रह्मा जाया । भा विस्तर कालकी छाया ॥
ब्रह्माते जिव उपजे बारा । तिन पुनि कथे बहुत विस्तारा ॥
स्मृति शास्त्र पुराण बखाना । तामें सकल जीव उरझाना ॥
जीवनको ब्रह्मा भटकावा । अडखनिरंजन ध्यान ददावा ॥

अनुरागसागर

( ६६ )

वेद मते सब जिव भरमाने । सत्य पुरुषको मर्म न जाने॥
निरंकार कस कीन्ह तमासा । सो चरित्र ब्रह्मो धर्म दासा॥

छन्द

असुर हैं जीवन सतावे, देव ऋषि मुनि कारकं ॥
पुनि धरि औतार रक्षक, असुर करै संहारकं ॥
जीवको दिखलाय लीला, अपनी महिमा घनी ॥
यहिजानजीवनबांधिआशा, यही है रक्षक धनी४०
सो०-रक्षककला दिखाय, अन्तकाल भक्षण करे ॥
पीछे जिव पछताय, जबहि कालके मुख परे ॥४२॥
अडसठ तीरथ ब्रह्मा थापा । अकरम करम पुण्य औ पापा ॥
बारहराशि नखत सत्ताइस । सात वार पंद्रह तिथि लाइस ॥
चारों युग तब बांधे तानी । घड़ी दंड स्वासा अनुमानी ॥
कार्तिक माघ पुन्य कहिदीन्हा । यमबाजी कोइ बिरले चीन्हा ॥
तीरथ धामकी बांधि महातम । तजेन भरम न चीन्हे आतम ॥
पाप पुण्यमहैं सबै फँदावा । यहि विधिजीव सबै उरझावा ॥
सत्य शब्द विनु बांचे नाही । सारशब्द बिन यममुख जाही ॥
त्रास जानि जिव पुण्य कमावे । किंचित फल तेहि छुधान जावे ॥
जबलग पुरुष डोर नहिं गहई । तब लग योनिन फिर२लहई ॥
अमित कला जम जीव लगावे । पुरुष भेद जीव नहिं पावे ॥
लाम लोभ जिव लागे धायी । आशा बंध काल धर खायी ॥
यम बाजी कोइ चीन न पावे । आशा दे यम जीव नचावे ॥
प्रथमैं सतयुगको व्यवहारा । जीवहि यम लै करै अहारा ॥
लच्छ जीव यम नितप्रति खाई । महाअपरबल काल कसाई ॥
तसशिलानिशिदिन तहैं जरई । तापर लै जीवन कहैं धरई ॥

तप्तशिलापर कष्ट पाकर जीवोंका गुहार करना और कबीर साहबका सत्यपुरुषकी आज्ञासे उन्हें छुड़ाना

( ५६ )

अनुरागसागर

जीवहि जारै कष्ट दिखावे । तब फिर लै चौरासी नावे ॥
ता पीछे योनिन भरमावे । यहि विधि नानाकष्ट दिखावे॥
बहुविधि जीवन कीन्ह पुकारा । काल देत है कष्ट अपारा ॥

तत्त शिलापर कष्ट पाकर जीवोंका गुह्यार करना और कबीर
साहबका सतपुरुषकी आज्ञामें जाकर उन्हें छुड़ाना

यमकर कष्ट सह्यो नहिं जाई । हे गुरु ज्ञानी होहु सहाई ॥

छन्द

जबदेखिजीवनकोविकल अतिदया पुरुषजनाइया ॥
दयानिधि सत पुरुषसाहिब, तबै मोहि बुलाइया ॥
कहे मुहिं समुझाय बहुविधि, जीवजाय चितावहू ॥
तुम दरशदेतेहो जीव शीतल, जायतपनबुझायहू४१॥
सोरठा-आज्ञालीन्हामान, पुरुषसिखापनसीसधरि ॥
ताक्षण कीन्ह पयान, सीसनायसतपुरुष कहैं ॥४३॥
आये जहैं यम जीव सतावे । काल निरंजन जीव नचावे ॥
चटपट करे जीव तहैं भाई । ठाढ़े भये तहां पुनि जाई ॥
मोहि देख जिव कीन्ह पुकारा । हे साहिब मुहि लेहि उबारा ॥
तब हम सत्य शब्द गुहरावा । पुरुष शब्दते जीव जुड़ावा ॥

जीवोंका स्तुति करना

सकल जीव तब अस्तुति लाये । धन्य पुरुष भल तपन बुझाये॥
यमते छोर लेव तुम स्वामी । दया करो प्रभु अन्तर्यामी ॥

कबीरवचन जीवोंप्रति

तब मैं कहा जीव समुझाई । जोर करो तो वचन नसायी॥
जब तुम जाय धरौ जग देहा । तब तुम करिहो शब्द सनेहा॥
पुरुष नामसुमिरण सहिदाना । बीरा सार कहो परवाना ॥
देह धरी सत शब्द समाई । तब हंसासत लोकै जाई ॥

जहाँ आशा तहाँ वासा

अनुरागसागर

( ६७ )

जहां आशा तहां वासा

जहाँ आशा तहाँ वासा होई । मन वच करम सुमिर जो कोई ॥
देह धारि कीन्है जिहि आसा । अंत आय लीन्हैउ तहाँ वासा ॥
जब तुम देह धरो जग जाई । विसरचो पुरुषकाल धरिखाई ॥

जीवन वचन कबीर प्रति

कहे जीव सुनु पुरुष पुराना । देह धरी विसरचो यह ज्ञाना ॥
पुरुष जान सुमरेउ यमराई । वेद पुराण कहे ससुझाई ॥
वेद पुराण कहे पति एहा । निराकार ते कीजे नेहा ॥
सुर नर मुनि तैतीस करोरी । बांधे सबै निरंजन डोरी ॥
ताके मते कीन्ह मै आसा । अब मोहि चीन्ह परे यम फांसा ॥

कबीर वचन जीवोंप्रति

सुनो जीव यह छल मम केरा । यह यम फंदा कीन्ह घनेरा ॥

छन्द

काल कला अनेक कीन्हौं, जीव कारण ठाट हो ॥
तीर्थव्रत जग योग फन्दे, कोइ न पावत बाट हो ॥
आप तन धरि प्रगट हँके सिफत आपन कीन्हैऊ ॥
नानागुणनमन कर्म कीन्है, जीव बंधन दीन्हैऊ ॥ ४२ ॥
सोरठा-कालकराल प्रचण्ड, जीवपरे वश ताहिके ॥
जनम जनमभे दण्ड, सत्यनाम चीन्है विना ॥ ४४ ॥

१ यह छन्द कई ग्रंथोंमें कई प्रकारसे लिखा है दूसरे प्रकारसे जो दो सौ वर्षसे भी अधिकके लिखे पुराने ग्रंथ में इस प्रकार है—

छन्द-काल कन्या अनेक कीन्है जीव कारण जाल हो ।

वेद शास्त्र पुरान स्मृति ते रुधै काल कराल हो ।

देव धरि नर प्रगट हो फिरे, ताहि आशा कीन्हैऊ,

अमृत इत उत काल वसि, बहुपंथमें चित दीन्हैऊ ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

गुरु महिमा

( ६८ )

अनुरागसागर

छन इक जीवन कहँ सुख दयऊ । जीव प्रबोध पुरुष पहुँ गयऊ ॥
छन इक जीवन कहँ सुख दीन्हा । जीवन कह्यो ज्ञानको चीन्हा ॥
जब तुम देह धरो जग जाई । तब हम शब्द कहब गोहराई ॥
जौ गहि हो सत नामकी डोरी । तब आनब हम जमसे छोरी ॥
जीव परमोधि पुरुष पहुँ गयऊ । जीवनको दुख वरनि सुनयऊ ॥
पुरुष दयाला दयानिधि स्वामी । जिनके मूल अमान अकामी ॥
कह्यो मोहिँ बहुविधि समुझाई । जीवन आनों शब्द चेताई ॥

धर्मदासवचन

धर्मदास अस विनती लायी । ज्ञानी मोहिँ कहो समझायी ॥
जो कछु पुरुष शब्द सुख भाखो । सो साहिब मोहि गोयन राखो ॥
कौन शब्दते जीव उबारा । सो साहिब सब कहो बिचारा ॥

सदगुरुवचन

पुरुष मोहि जैसे फुरमायी । सो सब तुमसों संधिलखायी ॥
केहेउ मोहि बहुविधिसमझायी । जीवहि आनो शब्द चितायी ॥
गुप्त वस्तु प्रभु मोकहँ दीन्हा । नाम विदेह मुक्तिकर चीन्हऽ ॥
दीन्ह पात परवाना हाथा । संधिछाप मोहि सौंप्यो नाथा ॥
बिनु रसनाते सो धुनि होई । गुरुगमते लखि पावे कोई ॥
पंच अमीय मुक्तिका मूला । जाते मिटे गर्भ अस्थूला ॥
यहि विधि नाम गहे जो हँसा । तारौ तासु इकोतर बँसा ॥
नाम डोरि गहि लोकहि जायी । धर्मराय तिहि देखि डरायी ॥
ज्ञानी करो शिष्य जेहि जाई । तिनका तोरो जल अँचवाई ॥
जिहि विधि दीन्ह तुमहि मैं पाना । तेहि विधि देहु शिष्य सहिदाना ॥

गुरुमहिमा

गुरुमुख शब्द सदा उर राखे । निशिदिन नाम सुधारस चाखे ॥
पियानेह जिमि कामिनि लागे । तिमिर गुरुरूप शिष्य अनुरागे