कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १५६ )
बोधसागर
अथ सत्य कबीरके इतरपंथ वर्णन चौपाई
प्रथमें नानक पन्थ बखानो । पानप बहुरि पंथ कहि गानो ॥
दास मलोक पन्थ परचारा । बहुरि गरीबदास विस्तारा ॥
इत उत देशन देशन माहीं । सत्यकबीर पन्थ जहँ ताहीं ॥
जहँतहँ देखो सत्य कबीरा । हिंदू मुसलमान गुरु पीरा ॥
निज इच्छाते सो तन धारे । कालजालते जीव उबारे ॥
कबहुँ योनि संकट नहि आवै । जीव दया करि सतगुरु ध्यावै ॥
जिन जिन सतगुरुको पहिचाना । सो अवश्य लह पद निर्बाना ॥
शब्द
हम बसैं चामके धाम हमें कोई क्या जाने ॥
पशुपंछी नरनाग जहां लगि सबै चामको साज ।
चामै चामको दाम बटोरै चामरंगको राज ॥
चामै मांडै चामै पोवै चामै करै रसोई ।
चामै चामको परसि जिवावै चाम करे सो होई ॥
चामै गावै चाम बजावै चाम करावै नाच ।
चामै चामको भाव बतावै चाम बीच है सांच ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो हम हैं पूरे चमार ।
जो कोई हमको पहिचानै उतरे भवनधि पार ॥
सो गुरु खोज सो सन्त सुजाना ॥
जो गुरु खोजि अमरघर आवै पावै मूल ठेकाना ।
जिन गुरु गुरु पञ्च निरमाये रच्यौ जमीं असमाना ॥
तिनके कर्म कटे भवबंधन जिन ओहिगुरुको जाना ।
टीका मूल बिनपरगट कीनो चौदह कोटि जो ज्ञाना ॥
नहीं बोल भाषामें आवै शब्दसैन सो जाना ।
आशा बन्धते परगट कीनो जो जैसे अनुमाना ॥
स्वसमवेदबोध
( १५७ )
सारशब्द दियौ है पुरुषने आप तो गुप्त रहाना ॥
जिहि पारसते पुरुष ददाने करि चौका बंधाना ।
कहैं कबीर ये अगम गुरु है सही छाप परवाना ॥
दोहा-जेते पंथ कबीरके, भिन्न भिन्न विधि थाप ।
कहैं चौका अरु आरती, कंठी माला छाप ॥
तिलक रु कंठीमात्र कहैं, कहैं शब्दहि निरधार ।
कहैं आँढ़ कहैं भिन्न कछु, सबको तारन द्वार ॥
कोई त्रिगुणकी भक्तिमय, कोई तिनते न्यार ।
योग युक्ति करि सुक्तिपद, पावत यहि संसार ॥
इति
अथ नारायणदासजीकी कथा--चौपाई
धर्मदाससुत दास नरायन । भिन्न कथा कछु तं सु बतायन ॥
न्यारो पंथ आपनो ठाना । बारह पंथमें तासु मिलाना ॥
वंश माह द्वै भेद बखाना । प्रथम नारायणदासहि जाना ॥
वचन चुरामणि दुतिय बताई । वंशकेरि कड़िहारी पाई ॥
दोनो जगमें पंथ चलावैं । धर्मदासके वंश कहावैं ॥
इति
अथ जगजीवनदासजी सत्यनामकी कथा--चौपाई
सतनामी जगजीवन दासा । अवध देशमें पंथ प्रकाशा ॥
कोटवा नग्रमें सो प्रकटाना । आहि मध्यमहि हिंदुस्थाना ॥
राजपूत कुल कर ठकुराई । सतगुरु कृपाते पंथ चलाई ॥
न्यारो ज्ञान आपनो भाखा । ताके भई बहुत शिषसाखा ॥
कारी तिलक देहिं निज माथा । आन्दू बाँधें अपने हाथा ॥
आँढ़ एक भांतिको धागा । कंठीके बदले कर लागा ॥
इति
(१५८)
बोधसागर
अथ रामकबीरजीकी कथा--चौपाई
राम कबीरकी कथा कहीजै । वैरागिनको ज्ञान गहीजै ॥
ठाकुर प्रतिमा पूजे सोई । रामकृष्णको ध्यावै ओई ॥
इत कबीर पंथिनसे मेला । उत वैरागिनमें मिलि खेला ॥
रामकृष्ण सम्बन्धी जोई । प्रीति करे पूजै सब सोई ॥
इति
अथ नानकशाहजीकी कथा--चौपाई
नानकशाह कीन तप भारी । सब विधि भये ज्ञान अधिकारी ॥
भक्ति भाव ताको लखि पाया । तापर सतगुरु कीनो दाया ॥
जिदा रूप धरयो तब साई । प्रभु पंजाब देश चलि आई ॥
अनहद बानी कियौ पुकारा । सुनिकै नानक दरश निहारा ॥
सुनिकै अमर लोककी बानी । जानि परा निज समरथ ज्ञानी ॥
नानक वचन
आवा पुरुष महागुरु ज्ञानी । अमरलोककी सुनी न बानी ॥
अर्ज सुनो प्रभु जिदा स्वामी । कहैं अमरलोक रहा निजुधामी ॥
काहु न कही अमर निजुबानी । धन्य कबीर परमगुरु ज्ञानी ॥
कोई न पावै तुमरो भेदा । खोज थके ब्रह्मा चहुँ वेदा ॥
जिन्दा वचन
जब नानक बहुतै तप कीना । निरंकार बहुते दिन चीन्हा ॥
निरंकारते पुरुष निनारा । अजर द्रौप ताकी टकसारा ॥
पुरुष बिछोह भयौ तुव जबते । काल कठिन मग रोंक्यौ तबते ॥
इत तुव सरिस भक्त नहीं होई । क्यौ परपुरुष न भेटैउ कोई ॥
जबते हमते बिछुरे भाई । साठि हजार जन्म तुम पाई ॥
धरि धरि जन्म भक्ति भलकीना । फिर काल चक्र निरंजन दीना ॥
गहु मम शब्द तो उतरो पारा । बिन सतशब्द लहै यम द्वारा ॥
स्वसमवेदबोध
( १५९ )
तुम बड़ भक्त भवसागर आवा । और जीवको कौन चलावा ॥
निरंकार सब सृष्टि भुलावा । तुम करि भक्तिलौटिक्योंआवा॥
नानक वचन
धन्य पुरुष तुम यह पद भाखी । यह पद अमर गुप्त कह राखी ॥
जबलों यम तुमको नहीं पावा । अगम अपार भर्म फैलावा ॥
कहो गोसाईं हमते ज्ञाना । परमपुरुष हम तुमको जाना ॥
धनि जिंदा प्रभु पुरुष पुराना । विरले जन तुमको पहिचाना ॥
जिन्दा वचन
भये दयाल पुरुष गुरु ज्ञानी । गहो पान परवाना बानी ॥
भली भई तुम हमको पावा । सकलो पंथ कालको धावा ॥
तुम इतने अब भये निनारा । फेरि जन्म ना होय तुम्हारा ॥
भली सुरति तुम हमको चीन्हा । अमरमंत्र हम तुमको दीन्हा ॥
स्वसमवेद हम कहि निज बानी । परमपुरुष गति तुम्हें बखानी॥
नानक वचन
धन्य पुरुष ज्ञानी करतारा । जीवकाज प्रकटे संसारा ॥
धनि करता तुम बंदी छोरा । ज्ञान तुम्हार महा बल जोरा ॥
दिया दान गुरु किया उबारा । नानक अमरलोक पग धारा ॥
इति
चौपाई
यहि विधि नानक गुरुपद गहेऊ । शिष शाखा तेहि जगमें रहेऊ ॥
गुरुपद तजि बहु पंथ चलाये । अन्य देवकी सेव गहाये ॥
परमपुरुष पद नहीं पहिचाना । भांति अनेक बनायो बाना ॥
अजहुँ गुरुकी तीन निशानी । गहै कछुक गुरुकी निजबानी ॥
द्वितिये सत्यनामकी साका । तृतिये देखा श्वेत पताका ॥
क्षत्री कुल नानक तन धारी । ताको सुयश गाव संसारी ॥
इति
( १६० )
बोधसागर
अथ गरीबदासजीकी कथा--चौपाई
गरीबदासकी कथा बखानो । जाटके कुलमें सो प्रकटानो ॥
दिखी निकट नग्र छोटियानी । सतगुरु कृपा भयो सो ज्ञानी ॥
सत्यकबीरको सुशाय उचारा । जक्तमाहिं निज पंथ पसारा ॥
सतगुरुकी अस्तुति भल गावै । अधिक प्रीति मनमाहिं बढ़ावै ॥
एकसौ वर्ष ताहि चलि गयऊ । प्रकट गरीबदास तब भयऊ ॥
इति
अथ कबीर आचार वर्णन--चौपाई
सत्यनामकी सेवा धारा । सुमिरण ध्यान नाम निरधारा ॥
सतगुरु वर्णन प्रीति सुहाये । मूरतिको नहिं शीस नवाये ॥
तीरथ व्रत मूरति भ्रमजाला । सत्यभक्ति गहिये सत चाला ॥
निरगुण सरगुणको तजि दीजै । सत्यपुरुषकी भक्ति गहीजै ॥
संत गुरुकी सेवा धारे । तन मन धन अर्पण करि डारे ॥
कोटिन तीर्थ गुरुके चरना । संचय सोच पोच सब हरना ॥
दुखी दीन देखत दुख लागा । परमारथ पथ तन धन त्यागा ॥
गृही साधु दोउ एक समाना । परमदयाल दोहूको बाना ॥
मद्य मांस भेष जगमें जोई । महा मलीन जानिये सोई ॥
परम दया सब जिवपर पालौ । अधोहृष्टि मारगमें चालौ ॥
हिंसा कर्म जेते जगमाहीं । ताके कबहुँ निकट न जाहीं ॥
सब जीवनकी कर रखवाली । जीवघात कहुँ बात न चाली ॥
वर्षा ऋतु जब जिव अधिकारा । तब नहिं कबहुँ पंथ पग धारा ॥
अमल नाम जगमें हैं जेते । सकल अभक्ष जानिये तेते ॥
सत्यकबीर बचन
साखी-विष्णुधर्म जैनी दया, मुसलमान यकतार ।
ये तीनों जब जानि लै, तब जिव उतरे पार ॥
स्वसमवेदबोध
( १६१ )
चौपाई
तीनों जहाँ होय संध्या । सो कबीर आचारको ठड़ा ॥
शौच अचार शुद्ध सब करनी । उज्ज्वल किया बइल्लव बरनी ॥
अंतर बाहर परम पुनीता । हिसा रहित कर्म चितचीता ॥
जस जैनी जिव दाया पाला । ताही सम कबीर मुनि चाला ॥
मुसलमानके जिमि अछाहा । ताहीते निज नेह निवाहा ॥
तिमि कबीर मुनिके सतनामा । रह लौलीन सदा सो तामा ॥
स्वसमवेद विधि करि शुभकर्मा । सार शब्द गहि पावै मर्मा ॥
सतगुन गहे बइल्लव ताते । भाषे परम पुरुषकी बातें ॥
शुद्ध भेष सब शुक्लाचारा । शुक्लवर्ण शुक्ले व्यौहारा ॥
शली टोपी तुलसी माला । कंठी कंठमें तिलक विशाला ॥
सूत्र रु शिखा बइल्लव बाना । योग युक्ति गुरुधर्म प्रमाना ॥
करकमंडल चोला पहिरे । चर्चा ज्ञानमाहिं बड़ गहिरे ॥
तत्त्वमाहिं निःतत्त्व बताई । झीना ज्ञान कथै ऋषिराई ॥
असन वसन विधिवत सो धरई । धर्मवस्तु कछु संग्रह करही ॥
इति
अथ तिलकस्वरूपवर्णन—चौपाई
ऊर्द्धपुण्ड्र अरु दंडाकारा । शुभ्रतिलक तेहि सोह लिलारा ॥
नासा अग्र भागते काढा । मस्तक अंत प्रयंत लो ठाढा ॥
नाकबांस दोउ भुकुटी बीते । मस्तक अंत प्रयंतलों खींचे ॥
दंडाकार सो तिलक बताई । तासु महामन कहो न जाई ॥
यमदंडनको दंडक दंडा । कर्म भर्म सो कर शतखंडा ॥
परम बइल्लव तिलक जो धारी । तिलक देखियम बिलखि सिधारी
ताको अर्थ कहो किमि जाई । सुर नर मुनि कोइ पार न पाई ॥
बो० सा० ९/
( १६२ )
बोधसागर
दोय स्वरूप अकार बखाना । एक शूल यक सूक्ष्म जाना ॥
सूक्ष्म रूप अकार है एही । विष्णु विश्वंभर कहिये तेही ॥
स्वर व्यंजन द्वे भांतिके अक्षर । सबहीको मह पितु अकारबर ॥
स्वर अक्षरको आदि अकारा । सोई सर्व धर्म नय सारा ॥
स्थूलस्वरूप अकार जो कहिये । सकल स्वरनके आदिमें लहिये ॥
स्थूल रूप है जग विस्तारा । सूक्ष्म रूप रमै संसारा ॥
परम पुरुष है आदि अकारा । अमल अलेख अभेद अपारा ॥
आदि अकार जो गह्यो विकारा । ताते भयो सकल संसारा ॥
आदि अकारते तीनों गुन है । सतगुणरूप अकार विष्णु है ॥
शूल अकार विकार गहंता । सबही वर्णन माहिं रमंता ॥
वासुदेव सो रमै चराचर । लखि नहि परत सो अलख अगोचर ॥
संसृत महँ सोई आकारा । अछिफ पारसीमाहिं पुकारा ॥
सो अछिफ अछीह कहाया । ताहि अलिफते सबजम जाया ॥
ताकी सिफत कही नहि जाई । पीर पयंबर पार न पाई ॥
जो कोई अछिफ पहिचाना । ताही रूपमाहिं मिलि जाना ॥
चार खानि जेते जगमाहीं । बिना अछिफ कतहुँ कछु नाहीं ॥
कहुँ गुप्त कहुँ प्रकट निहारी । यह अछिफ सब माहिं बिहारी ॥
देखे ताहि कोइ कोइ साधू । जिनके हृदये ज्ञान अगाधू ॥
तेहि अछिफकी कथा अपारा । गिरा गनेश शेष कथिहारा ॥
नर बपुरा सो किहि विधि कहई । शिव सनकादिक मूक है रहई ॥
सत्य कबीरको तिलक है येही । वंशके साधु जो मस्तक देही ॥
इतर पंथको तिलक है न्यारे । वेद धर्मकी रीति बिचारे ॥
इति
अथ सत्यकबीरको धामक्षेत्र वर्णन—वार्ता
सहज सुरति संप्रदा धीरज धाम दशमद्वार त्रिपुटी तीरथ ॥
स्वसमवेदबोध
( १६३ )
मुष्मना सुख विलास । काया रामशाला अगम इष्ट । निश्चित
नाम उपाशी लौ माला मनसा देवी मनसो देव अलख अचा-
रज सत्य गोत्र समुद्ध शाखा वेदविचार खासा सुमिरन निह
अक्षर मंत्र प्रीति परिक्रमा जीव योग ऋषि निजमन निजब-
इच्छव निर्भय मुक्ती गुरु शब्द गुरुपाठ येता धाम क्षेत्र अवि-
नाशीकी सेजपर कबीरने सुनाया । इतना अर्थ ले काशी कबीर
गुरु रामानन्द पास आया ।
इति धामक्षेत्र
अथ जीवके अंतकालको वर्णन--चौपाई
अंतकाल जब जिवको आवै । यथा कर्म तस देही पावै ॥
हेट द्वार जब जीव निकाशा । नरकखानिमें ताको बासा ॥
ठेले नरक शीस बल जाई । ताहींमें पुनि रहै समाई ॥
नाभिद्वार जो प्रान चलाना । जलचर योनि माहिं प्रकटाना ॥
मूलद्वार कर जीव पयाना । पशू योनिमें तासु ठिकाना ॥
जीभ द्वारते जिव कढ़ि आवै । अन्नखानिमें बासा पावै ॥
श्वासद्वारते जिव जब जाता । अंडजखानिमें सो प्रकटाता ॥
नेत्र द्वार जब जीव सिधारा । मक्खी आदिक तन सो धारा ॥
श्रीन द्वारते जिव जब चाला । प्रेम देह पावै ततकाला ॥
दशमद्वारते निकसै प्राना । राजा होय भोग विधि नाना ॥
रंभ द्वारते जिव जब जाता । परम पुरुषके लोक समाता ॥
इति
अथ हंसनको स्थानवर्णन सत्य कबीर वचन--चौपाई
तेज अंड है पालँग बारा । द्वै पालँग मध्य अँघियारा ॥
सालोकमुक्ति मृतलोक बखाना । मानसरोवर तिहि अस्थाना ॥
धीया अंश तहाँ बैठारा । चौसठ कामिनि संग बिहारा ॥
( १६४ )
बोधसागर
जो कोइ बाम मताको ध्यावै । सो सालोक मुक्तिको पावै ॥
सहस साठ वैकुंठ रहाई । तहाँ सुमेर रहा ठहराई ॥
धर्मराय अविनाशी रहई । पुण्य पापको लेखा गहई ॥
तहाँ सामीप मुक्ति है सोई । नौसे सरखी तेरह सँग होई ॥
पांच शिखा सुमेर रहाई । पांचो अंश कला तहाँ लाई ॥
ईशान कोन ध्रुव आसन कीना । बाइब कोन इन्द्र अस्थाना ॥
नैऋत कोन यमनको थाना । अग्नीकोन इन्द्र अस्थाना ॥
जाको धर्मरायमें कहिया । मध्य विष्णु सिंहासन लहिया ॥
सहस साठ वैकुंठ प्रमाना । तहाँते शून्य डोरि बंधाना ॥
मारग जो निर्वाणहि ध्यावै । सो समीप वैकुंठहि पावै ॥
मेरुते शून्य अठारह कोरी । तहाँवा लगी शून्यकी डोरी ॥
शून्य मध्य है द्वीप अत्रूपा । तहाँ निरञ्जन ज्योतिस्वरूपा ॥
अंधकार है शून्य मझारा । द्वै पालंग शून्य बिस्तारा ॥
चार करोर ज्योति उजियारी । शोभा अद्भुत तासु निहारी ॥
सारूप मुक्ति सोई तब पाई । मारग भेद अघोर चलाई ॥
आगे अक्षरको अस्थाना । पालंग एक तहाँते जाना ॥
अक्षर योग माया विस्तारी । मुक्ति सायुज्य महे मतधारी ॥
तहाँते चार वेद परमाना । चौथी मुक्तिको यही ठेकाना ॥
तहाँते आगे कोइ न गैऊ । यह मत चारो वेदन कहेऊ ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास बिनती चित लाई । साहेब कहो भेद समुझाई ॥
चार मुक्ति अस्थान बतावो । आगे कहो भेद जिमि पावो ॥
बस्ती शून्य बीचकी भाखो । समरथ मोहिगोय जिनिराखो ॥
सत्य कबीर वचन
धर्मदास तुम भलकै जानी । जो बूझो सो कहों बखानी ॥
स्वसमवेदबोध
( १६५ )
एक असंख्य अक्षरते आगे । अर्चित नामको डोरी लागे ॥
अथर द्रौप है ताको नामा । परम रम्य अक्षर विश्रामा ॥
निरतै प्रेम सुरति तिहि द्वारा । तिहि सँग सखी बारहहजारा ॥
तीन अंश आगे परमाना । ओहं सोहं को अस्थाना ॥
आठ अंश तहवों उपजाये । अंश वंश अस्थान बनाये ॥
ओहं सोहं होत उचारा । तहाँति शून्य डोर बंधाना ॥
आगे सहज सुरति अस्थाना । तहाँति शून्य डोर बंधाना ॥
आगे शून्य है पांच असंखा । मूल सुरत अस्थान विसंखा ॥
तेहि सँग हंस बावन हजारा । पांच ब्रह्म उनते उपचारा ॥
चार असंख्य शून्य तेहि आगे । इच्छा सुरति तहाँ अनुरागे ॥
खात सनेही जिनको धारा । तिन संग हंस पचीस हजार ॥
आगे शून्य असंख्य द्वै जाना । तहाँ अकूर सुरति अस्थाना ॥
पांचहजार हंस सँग सांचे । तिनकी सुरति हंस सब बांचे ॥
जहाँ अकूर केर परमाना । तिल परमान द्वार अनुमाना ॥
बिहग शब्द तहँ लागी डोरी । चढ़ि हंसा गये पुरुष सोरी ॥
साखी-सोरह असंख्य लोक है, धर्मन करो विचार ।
चार असंख्य है बस्ती, बारह सुत्र पसार ॥
चोपाई
आदि अन्त अरु वंश पसारा । तहँलगि देख शून्य बिस्तारा ॥
यतना तजि जब होय निनारा । हंसा आवै लोक हमारा ॥
हमैं चीन्हि सतगुरु रस पीये । कर्म तोरिके युग युग जीये ॥
निशदिन सतगुरु सुरति लगावै । साधु सन्तके चितै समावै ॥
जापर दया सन्त गुरु केरी । तिनकी कटी कर्मकी बेरी ॥
करि करनी अभिमान भुलाई । तन छूटे यम ले धरि खाई ॥
तन मन धन ले प्रीति लगावै । सो हंसा सतलोक सिधावै ॥
सत्यलोक है अथरस नीपा । ता मध्ये सत्ताइस द्रौपा ॥
( १६६ )
बोधसागर
सत्य शब्दको टेका दीना । ऐसे विधि पुहमी रचि लीना ॥
सागर सात तहाँ बिस्तारा । चलि हंसा जहाँ करे बिहारा ॥
पुहुपद्गीप है मध्य सिंहासन । कलाद्गीप हंसनको आसन ॥
सारखी-अबिगति भूषन अंगमें, अबिगति करे शृंगार ।
अबिगति बस्तर छाजई, अबिगति करे अहार ॥
इति
अथ प्रलय वर्णन--चौपाई
तीन प्रकारकी सृष्टि बखानो । प्रथमे ब्रह्म सृष्टि कहि गानो ॥
द्वितिये जीवकि सृष्टि कहायौ । तृतिये माया सृष्टि बतायौ ॥
ब्रह्म सृष्टि आचिन्त प्रमाना । जीव सृष्टि अक्षरते जाना ॥
माया सृष्टि निरञ्जन करता । सिरजै पोषै पुनि संहरता ॥
माया सृष्टि जाय बिनसाई । जीव ब्रह्म नहि प्रलैमें आई ॥
रचना सेखि निरंजन लेता । गूमट शीस माहि धरि देता ॥
शिरमें गूमट अजब कहाई । सकल सृष्टि तेहिमाहँ समाई ॥
प्रलयको घौस आव जेहिबारा । जत्त समस्त होय संहारा ॥
पुनि जलते पूरे संसारा । उठै चहुँ दिसि लहरि अपारा ॥
जलकी ऐसी बृद्धि बताई । अति उतंग पानी चढि जाई ॥
पृथ्वीते ऊपर जल सोई । दश योजन लों ऊँचा होई ॥
अन्तकाल कलियुग जब आवै । चीन्ह भयापन बहुत देखावै ॥
सवासौ वर्ष ग्रहन निरधारा । चंद ग्रहण सत वर्ष बिचारा ॥
ताहि ग्रनते लेखा लीजै । कलियुग लोक प्रवाना दीजै ॥
नानक बचन
परलय की विधि कहो दयाला । अलख ज्योति वर्षे केहि रूयाला ॥
काल बली तुमको नहि माना । प्रलयकाल तेहि कहा ठिकाना ॥
जिवा बचन
मुन नानक यह भेद अपारा । काल प्रलय जब करे संहारा ॥
स्वसमवेदबोध
( १६७ )
रचना निगलि निरंजन लेता । अमरलोकसे अलगहि रहता ॥
लै रचना फिरता सो रहई । गूमत शीशमें सब जिव गहई ॥
प्रलय द्वीपते पुरुष निनारा । सो साहिब नहिं जग औतारा ॥
प्रलय निरंजन संग पसारा । ले बैठे सब आप मझारा ॥
तेज रूप बतैं नौ खंडा । लेय समेटि सकल ब्रह्मंडा ॥
तीन देव चौकी उठि जाई । मेरु सुमेरु सिंधु चलि आई ॥
श्रुत्र अकाश बर्त नौ खंडा । पाँच तत्त्वको रहै न झंडा ॥
ऊँकार मठ रहै समाई । सो फिरता रह श्रुत्रमें भाई ॥
सत्तर युग लों झूलत रहई । ता पीछे अति संकट गहई ॥
तब युग सत्तर श्रुत्र रहीता । प्रलय करे सब जिवन भरीता ॥
फिर अमरावति छाह सिधाई । फिर सतपुरुषको टेरत भाई ॥
दुखित होय अरजी तब लाया । पुरुष दयाल देह मन भाया ॥
तबहिं पुरुष ज्ञानीको टेरो । जाय श्रुत्रमें कीजै फेरो ॥
कहो निरंजनपै अब जाई । कूर्म पीठपै बैठहु भाई ॥
चलिकै फिर हम तापहैं आये । पुरुष बचन ताको समुझाये ॥
सुनो निरंजन बचन हमारा । जाय कूर्मपै करो पसारा ॥
रचना करो सकल ब्रह्मंडा । जाय कूर्मपै रोपौ झंडा ॥
सुन्यौ निरंजन सो फरमाना । सुनिके बचन कियौ परमाना ॥
सुनि सो बचन निरंजन धाये । जहां कूर्म तहवाँ चलि आये ॥
बैठ कूर्मपै सतशब्द उचारा । रचना प्रकट भई सतसारा ॥
पाँचतत्त्व परगट तब कीना । सात शून्य पर आसन दीना ॥
जलके ऊपर मही छवाई । नवो खंड सूमेर रचाई ॥
तहैं सुमेर परबत फैलाई । तब मुखते अध्या प्रकटाई ॥
मिलि दोनो तिरदेव उपाई । यहि विधि सब रचना फैलाई ॥
उपजे ब्रह्मा विष्णु महेशा । नारद शारद गौरि गनेशा ॥
इति
( १६८ )
बोधसागर
अथ नरक वर्णन--चौपाई
प्रथमहि जल रंगी कहि गाया । ताके ऊपर कूर्म बताया ॥
कूर्मके ऊपर मीन कहीते । मीनके ऊपर कच्छप थीते ॥
कच्छपपर बाराह बखाना । तापर शेष नाग अस्थाना ॥
शेषनाग निज शिरपर धारा । पृथ्वी सहित सकल महिभारा ॥
सात नरक चौरासी कुंडा । पर तामें पापिनको झुंडा ॥
तहुँ यमदूत ताडना करही । दंड प्रचंड जीव दुख भरही ॥
इति
अथ चौदह यमके नाम
दोहा-मृत्यु शृंग प्रथमै कहो, कोधित अंध बताय ।
दुगदानी तीजे कहो, मन मकरंद जताय ॥
चित्तचंचल पंचम गनौ, छठे अपर्बल नाम ।
अंध अचेत है सप्तमै, कर्मरेख पुनि मान ॥
अग्निघंट नौमै कहो, कालसेन पुनि चीत ।
मनसा मलई ग्यारहै, बरहे कह भयभीत ॥
पुनि तालुका है तेरहै, सूरधार दशचार ।
यमगन जेते नरकमै, ये चौदह सरदार ॥
इति
अथ सत्यकबीरके गुप्त होनेका वर्णन--चौपाई
संवत पंद्रहसौ उनहतर । देश उदैसे सतगुरु पगधर ॥
पुनि मगहर चलिगे गुरुदेवक । हिंदू मुसलमान जहँ सेवक ॥
बीरसिंह नरनाथ बघेला । सत्तकबीरको सो तहँ चेला ॥
बिजुलीखाँ पठान सोऊ राजा । शिष्य कबीरको तहां विराजा ॥
बिजुलीखाँ जब यह सुनि पाई । अब गुरु जगसे जाहि लुपाई ॥
तब तासे पूछौ सो भेवा । हिंदू मुसलमान गुरुदेवा ॥
वसमवेदबोध
( १६९ )
जब सतगुरुको निज तन त्यागे । कौन धर्म प्रभुको सुभ लागे ॥
हिंदू कैधौ मूसलमाना । मृत्युकर्म किहि विधिते ठाना ॥
तब कबीर तेहि उत्तर देऊ । जौ तुम लोथ हमारी लेऊ ॥
तौ अपनी कुलरीति विचारा । मृत्युकर्म कर तेहि अनुसारा ॥
पुनि गुरु बीरसिंह गृह गयऊ । राजा रानी हर्षित भयऊ ॥
चादर तानके पौढ़े जाई । भये अबोल कबीर गोसाई ॥
राजा रानी जब अस लखेऊ । बिकल भये सतगुरु तन तजेऊ ॥
रुदन करे जब राजा रानी । नग्र शोर भा लोगन जानी ॥
बिजुलीखां नृपको गुरुभाई । सुनत खबर तुरितै उठि धाई ॥
बीरसिंहसे बचन सुनावो । सतगुरु लोथ हमैं देखलावो ॥
नृप गुरुलोथ जो परगट कीन्हा । बिजुलीखां तेहि जोरसे लीना ॥
ले भाग्यौ सो गाड़ौ जाई । राय बीरसिंह तब रिसियाई ॥
लै निजु सैन संग तेहि बेला । चढे बीरसिंह राय बघेला ॥
दोनों दिशिते दल उमड़ाने । एक न कहा एकको माने ॥
जब घमसान होनेपर भयऊ । तब अकाशबानी अस कहेऊ ॥
कवित्त
अकथ कहानी तहैं बोले नभबानी सुनो, दोहु दल ज्ञानी ॥
जिव हानीमें न दीजिये । बिज्लीखां पठान कह ठाढे हो पठान ॥
पीर, सिंहजी बघेल दहपेल मति कीजिये ॥ हाड चाम देह ॥
जन्म मरन न पीर ऐसो, साहिब कबीर सत्य बातको पती-
जिये । कबुर खुदाय नहिं लोथ कहुँ पाय कछु, तहैं दरसाय
दोऊ भाग करि लीजिये ॥
बोपाई
यह सुनि दोनों रह ठहराई । तब चलिके सो कबुर खुदाई ॥
अस अचरज तहैं देख्यो जाई । कतहुँ लोथ गुरु दधि न आई ॥
( १७० )
बोधसागर
कबुरमें चादर पुष्प सो पाई । ले दोनों द्वे भाग बनाई ॥
मुसलमान तेहि कबुरमें धरेऊ । हिंदू ले समाधसो करेऊ ॥
हिंदुनके कबीर चौरा है । तुरकनके कबीर रोजा है ॥
इत हिंदू सेवै गुरुदेवा । सुरशिद मुसलमान उत सेवा ॥
बालरूप जब गुरु प्रकटाना । कमलपुष्पमें कर निज थाना ॥
अंतकाल जब गयौ दुराई । गौरमें सोइ पुष्प देखलाई ॥
आदि अंत जाके नहिं देही । जन्म मरण कबहुँ नहिं तेही ॥
सकल विकार तो जो प्रभुपारा । जीवकाज तनधर संसारा ॥
सह्यौ निरादर दुःख अधिकार्ई । निज दासनको दास कहाई ॥
सो सब जीव हेतको दीसा । समरथ परमगुरु जगदीशा ॥
कबुर बीचते गये लोपाई । मथुरा नग्रमें पहुँचे जाई ॥
नीरू नीमा जोलह जोला ही । तन तजिके परकटभे ताही ॥
दोनोंको निज शब्द गहाई । जाते भवनधि फेर न आई ॥
मथुरा नग्रते बहुरि सिधाई । धर्मदास ढिग सतगुरु आई ॥
धर्मदासहि बहु भांति शिखाई । सहितदेह पुनि गयौ लोपाई ॥
महा कठिन युग कलियुग होई । शुभ करनी जिव करे न कोई ॥
यज्ञ योग जप तप व्रत दाना । भावन भक्ति विषय लपटाना ॥
तिनको काज कौन बिधि सुधरे । बिन कबीर गुरु पार न उतरे ॥
दयासिंधु तेहि पार लँघावै । सत्यकबीर कि सरन जो आवै ॥
सत्यकबीर वचन
बावन बीर कबीर कहावो । कलियुगकेर जीव सुत्तावो ॥
इति
अथ स्वसमवेदकी स्फुटवार्ता-चोपाई
एकलक्ष अरु असी हजारा । पीर पयंबरको औतारा ॥
सो सब आहि निरंजन वंशा । तन धरि धरि निज पिता प्रसंशा ॥
दश औतार निरंजन केरे । राम कृष्ण सबमाहि बडेरे ॥
स्वसमवेदबोध
( १७१ )
पूरन आप निरंजन होई । यामें फेरफार नहीं कोई ॥
दोहा—पांच सहस्र अरु पांचसौ, जब कलियुग वित जाय ।
महापुरुष फरमान तब, जग तारनको आय ॥
हिन्दु तुर्क आदिक सबै, जेते जीव जहान ।
सत्य नामकी साख गहि, पावैं पद निर्वान ॥
यथा सरितगण आपही, मिलैं सिन्धुमें धाय ।
सत्य सुकृत के मध्ये तिम्भि, सबही पंथ समाय ॥
जबलगि पूरण होय नहीं, ठीकेको तिथि वार ।
कपट चातुरी तबहिलों, स्वसमवेद निरधार ॥
सबहिं नारि नर शुद्ध तब, जब टीका दिन अंत ।
कपट चातुरी छोड़िके, शरण कबीर गहंत ॥
एक अनेक न है गयो, पुनि अनेक हो एक ।
हंस चलै सतलोक सब, सत्यनामकी टेक ॥
घर घर बोध विचार हो, दुर्मति दूर बहाय ।
कलियुगमें इक है सोई, बरते सहज सुभाय ॥
कहा उग्र कह छुद्र हो, हर सबकी भवभीर ।
सो समान समदृष्टि है, समर्थ सत्य कबीर ॥
बिनय—बोपाई
बिन्ती करौ संत गुरु पाहीं । जो मम दोष न हृदय गहाहीं ॥
निज अपराध कहौ किन खोली । कहूँ कहूँ मैं बदल्यो गुरु बोली ॥
मम बानी अरु सद्गुरु बानी । दोनों यहि मत मेले सानी ॥
जहैं जस उचित देख तस कीना । सूक्ष्म गुरु वाणी गहि लीना ॥
मेरो दोष न कछु तहैं लेखब । सत्य कबीरकी बानी देखब ॥
सत्य कबीरको ग्रन्थ निहारा । सब कछु लिख्यो ताहि अनुसारा ॥
इति श्रीस्वसमवेद धर्मबोध समाप्त
A decorative border consisting of a repeating pattern of stylized leaves or scalloped shapes, forming a rectangular frame around the central illustration.
A botanical illustration of a plant with two flowers and a long, pointed seed pod. The plant has a central stem with several small, lanceolate leaves. Two flowers are shown: one is a daisy-like flower with a central disk and many small petals, and the other is a smaller, more compact flower. A long, slender, pointed seed pod (silicle) is attached to the stem above the flowers.
अथ धर्मबोध प्रारंभ
भारतपथिक कवीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्दजीद्वारा संशोधित
भारत का विकास
एकलव्य शर्मा
भारत का विकास (1947-1950)
विज्ञान
सत्यनाम
A black and white woodcut-style illustration of Sri Kabir Sahib seated on a throne. He is wearing a tall, pointed turban and a long robe, holding a rosary. A halo surrounds his head, and a decorative lamp is positioned above him. A small pot is on the floor to his left.
श्री कबीर साहिब
नं. ९ कबीरसागर - ७