भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

साधन वर्णन

(६४)

ज्ञानप्रकाश

औरहिँ और बुझा उन्ह भाई । पान नलीन्ह वैसहिँ चलिजाई ॥ तेहि गौनत प्रभु प्रगटे तुरन्ता । कला अमित को पावै अन्ता ॥ धर्मदास गहि चरणशिर नाथी । युगकर जोरि ठाढ़ भो जायी ॥ बैठे पुनि आज्ञा प्रभु पाई । विमुख जीव कर बात जनाई ॥

धर्मदास वचन

प्रभु विरतन्त कहो अब ताहीं । वह पान मुक्तिकै लीन्हेसि नाहीं ॥ मैं भाषेऊँ तुमरी सहि दाना । दुर्मति बूझेसि कहु आना ॥

सतगुरु वचन

धर्मनि उन्ह जोन पान नलीन्है । परिहैं कालमुख जायकमीने ॥ तजि रणभूमि टरै जो भाई । तेहि जीवहिं निश्चै यम ख ई ॥ वह यम चोर कालके हंस । धर्मराय धरि करै विध्वंसा ॥ धर्मदास तुम सुनहु हमारा । निशिदिनरहिहो नाम अधारा ॥ अब तुम आपन करहु विचारा । करिहहु निशिदिन ज्ञानविचारा ॥ दुष्ट मित्र सों प्रेम बढै हो । भक्ति भजन आनन्द रहै हो ॥

अर्थ—दुष्ट और मित्र दोनोंमें किसीसे राग द्वेष न रखकर समान प्रीति रखना सबकी भलाई चाहूँ किसीकी बुराई नहीं चाहना ॥

जो सुख होय तो जनि इतरैहौ । दुख परै तौ जनि विललैहौ ॥ संकट महाँ बहु साहब कीजै । निश्चल नाम ध्यान चित दीजै ॥ चित निश्चन्त रहै जो भाई । तो तेहि संकट जाय नसाई ॥ यह मम देश दोउ है भाई । दुख सुख तन धरि चारै आई ॥ चहिये साधुन नहि चित डोलावैँ । हठ प्रतीतिनाम गुरु गावैँ ॥ कच्चे जीवन कर यह लेखा । संकट परै विकल हिय पेखा ॥ सुख सम्पति धन पुत्र सगाई । यह सब सपना आहै भाई ॥ धर्मनि शूरा हंस जो होई । गन न दुख सुख एकौ सोई ॥ अरु घर झगरा निवेरेहु भाई । गुरु गमहि पन्थ कहौ उपाई ॥

समाप्ति

बोधसागर

(६५)

पाँचौ कै परपञ्च मिटावै । पाँच भूतकै स्वाद गँवावै ॥ नासा श्रवण रसना चक्षु इन्द्री । पाँचौ चोर काल मतिमन्द्री ॥ पाँचहु स्वाद विषयकी पूजा । गुरुगमिपन्थ परखहि तेहि दूजा ॥ चक्षु स्वाद रस रूप सलोना । राँचि रहै जग अकिलविलोना ॥ साधु चक्षु राते सतरूपा । गुरुपदनिरखत अकिल अनूपा ॥ श्रवण स्वाद रस गीत कवीता । मगन होई सुनु रसमत चीता ॥ सन्तन श्रवण स्वाद गुरु बानी । शब्द भजन पद सार समानी ॥ नासा वास सुवास अघाहीं । कुबास वासके निकटन जाहीं ॥ सन्त न लागे वास कुवासा । नाम विदेह जपै निःस्वासा ॥ रसना स्वाद षट्स रस मधुभोजन । तजे विलोना सुरस परोजन ॥ सन्त न स्वाद नाम रससारा । षट्स रस व्यंजन छार असारा ॥ निःइच्छित जो पहुँचे आई । सुरस व्यंजन प्रीति सोपाई ॥ इन्द्री स्वादु काम रति नेहा । नारी भोग रतन तजि देहा ॥ सत्य सुरति अनुराग समावे । निशिदिन प्रेमभक्ति चितलावे ॥ पाँचौ आहि प्रबल घट माहीं । मन राजा पाँचौ कर नाहीं ॥ सत्यगुरु ज्ञान मन धरि राखे । पाँच चोरसाधि सत्यसुखमाखे ॥ छन्द-धरि मनहि बाँधहु पाँच साधहु सारसतगुरु ज्ञानते ॥ यह देशहै यमराजको तरे सो विदेही नामते ॥ सतनामव्रतगहिशब्द हियधरि करहु सेवा तासु हो ॥ तत्त्वध्यान सतपदरूप स्थित होय अमर लोकैनिवासुहो ॥ दोहा-गुरु सुखशब्द प्रतीति करि, हर्ष शोक विसराय ॥ दया क्षमा सतशील गहि, अमरलोक को जाय ॥ सोरठा-वण्यौ ज्ञान प्रकार, धर्मदास सम्बोध मत ॥ कहै कवीर कवीर, जेहि मम शब्द प्रतीति दृढ ॥ इति श्री धर्मदास बोध ज्ञान प्रकाश समाप्तः ॥

इति श्री बोधसागरे धर्मदास बोधज्ञानप्रकाश वर्णनो नामप्रथमस्तत्रंगः ॥

नं. ४ कबीरसागर - ३

इति श्रीधर्मदासबोध ग्रन्थ ज्ञानप्रकाश समाप्त

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दजीद्वारा संशोधित

श्री-अमरसिंह बोध

A decorative horizontal line with a central diamond-shaped ornament, used as a section separator.

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन

बम्बई

श्रीमद्भगवद्गीता

संस्कृत भाषायां प्रथमः विभागः

सप्तमः अध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता

१९९९

सत्य कबीराय नमः

बोधसागर

द्वितीयस्तत्रंगः

अमरसिंहबोध

धर्मदास वचन-बीपाई

धर्मदास उठि ठाढे भयऊ । दोउकर जोरि सो विनती कियऊ ॥ जुग जुग जीव चेताये ज्ञानी । कालफांस ते छुडाये आनी ॥ युगकमोद कीना जिव काजा । सोई तुम भाषि कहो निज साजा ॥ यमराजाते भये छुटारा । निर्भय हंसालोक सिधारा ॥

सतगुर वचन

धर्मदास मैं कहि समुझाऊँ । युगकमोदकी खबर सुनाऊँ ॥ जब हम इते पुरुषमें पाँही । तबकी बात कहू सब तोही ॥ युग परवान चाकरी भयऊ । युग जुग पंथपसारा कियऊ ॥ अर्बे खर्बेजिव असंख्य अपारा । सब उबार लाये पुरुष दरबारा ॥ रहे सब हंस पुरुषके पास । करते कुतूहल लोकनिवासा ॥ भूख प्यास निद्रा नहिं भाई । पुरुष ध्यानमें रहे समाई ॥ पुरुष दयाल दयाकरि भारी । षोडश रवि हंस उजियारी ॥ सेज पुष्प बनी अति भावन । सुख विनोद सब लोकसुहावन ॥ बैठे पुरुष सेजपर आयी । तत्क्षण ज्ञानी लिये बुलाई ॥ ज्ञानी तुम जाओ संसारा । जाइ करो अब हंस उबारा ॥ सिंगलद्वीप अमरपुर गामा । अमरसिंह राजा करनामा ॥ ताको अबे चेताओं जायी । चेतन अंश जग रहे खुलायी ॥

धर्मदास साहबका सद्गुरुसे युगकमोदका वृत्तान्त पूछना और सद्गुरुका उत्तर - राजा अमर सिंहकी कथा आरंभ

(७०)

अमरसिंह बोध

ज्ञानी वचन

ज्ञानी वचन कहै कर जोरी । सत्यपुरुषएक बिनती मोरी ॥ पुरुष मोहिं पठवो संसारा । कौन नामते हंस उबारा ॥ साखी-कौन नाम हंसन कहैं, कौन देऊँ कडिहार ॥ कौन नाम नारिन कहैं, जाते होई उबार ॥

चौपाई

कालफाँस जासे कटि जावे । सहजे हंसलोक महाँ आवे ॥ इतना बोल पुरुषसे पाऊँ । तब भवसागरमें चलिजाऊँ ॥

पुरुष वचन

अहो ज्ञानी वचन सुनि लेहू । मान सिखापन शिरपर देहू ॥ सब राह दिखाऊँ मैं तोही । उबरे हंसा अधिकारी सोई ॥ साखी-बालककू बीरा कहो, तिरिया कुटिल सनेह ॥ सुरतवंत कोयह शब्द है; पुरुष नाम निज लेह ॥

चौपाई

पुरुष हुकम दीना तेहि बारा । ज्ञानी वेग जाओ संसारा ॥ मूलनाम परवाना देहू । सकल जीव अपना करि लेहू ॥ ज्ञानी चले लोकते जबहीं । धर्म धीर मिले पुनि तबहीं ॥ देखत धर्मरायमनहिं संकाना । आपन हानि मनहिं अनुमाना ॥ ज्ञानी तुम सुनो वचन हमारा । काहेको आये तुम संसारा ॥ चौदा भुवन राज लिख दीना । अब काहेको चितवन कीना ॥ आहार यही हम कहैं दियऊ । पुरुषदया अब काहेकु कियऊ ॥ राज हमारो है संसारी । मुखदुःख जीवन देहुँ अपारी ॥ ब्रह्मा विष्णु मदेश कहाई । मेरे अंस जगमाँहि रहाई ॥ हमतो रहही शून्य मँझारी । गम नहिं पावे कोइ हमारी ॥ राज भार सब उनको दियेऊ । हम न्यारे होइ देखत रहेऊ ॥

कबीर साहबका अमर पुरीमें जाना और अमर सिंहका मिलना और कबीर साहबका गुप्त हो जाना फिर राजाकी विकलताका वर्णन

बोधसागर

(७१)

ज्ञानी तुम जाओ संसारा । वचन एक अब सुनो हमारा ॥ पुरुष वचनकी तुम कहैं लाजा । ता पाछे करियो जिव काजा ॥

ज्ञानी वचन

सुनहु वचन निरंजन राई । सबै बात मैं कहुं समुझाई ॥ कोटि ज्ञान हम तुम कहैं हारा । द्वादश पंथ चले संसारा ॥ ताते चलिहै आहार तुमारा । इतना वचन धर्म कहैं हारा ॥ धर्मदास सुनियो चित लाई । धर्मधीर ऐसा ठहराई ॥ तब हम आये यहि संसारा । जीवनकाज पृथ्वी पगु धारा ॥ अमरपुरी एक नगर रह्राई । सिंगलद्वीपके माँहि बसाई ॥ तहाँ आई हम कीन्ह पसारा । पहुँचे रायके महल मैझारा ॥ षोडश रविकी ज्योति पसारा । महलन मांही भयो उजियारा ॥ अमरसिंह राजाको नामा । लागी कचहरी बहु विधि धामा ॥ देख प्रकाश उठे तब राई । नृप धाये महलनमें आई ॥ आये महलमें सतगुरु पासा । सतगुरु चरण गहे विश्वासा ॥

अमरसिंह वचन

अहो संत एक विनती करिहो । पूछत वचन क्रोध जनि धरिहो ॥ कै तुम तीन देवनमें कोई । कै परब्रह्म तुम आये सोई ॥ और गम्य नहीं चलत हमारी । सो तुम वचन कहो निरवारी ॥

सतगुरु वचन

साखी—हम आये सतलोकसे, जीवन करन उबार ॥ कालफांस निवारके, ले जाऊँ लोक मैझार ॥

चौपाई

यह कहि गुप्त भये प्रभु राई । राव परे धरनी सुरझाई ॥ बिकल भये मुख आवे न बानी । तलफत मीन जैसे बिन पानी ॥ सतगुरु बिन तलफत नृप तैसे । स्वाँति बुंद बिन चात्रिक जैसे ॥

पांच दिन पीछे फिर कबीर साहबका राजा अमरसिंहको मिलना

(७२)

अमरसिंह बोध

छन्द चर्चरी

मोहि कहा जानि दरशन दिये प्रभु गुप्त पुनि काहे भये ॥ हग पलक देत बिलंब नाही कवन दिशि कहँवा गये ॥ हमहीं अभागी कीन्ह सतगुरु दरस देके छिप रहे ॥ कैसे धरूँ मन धीर तबलग दरश तुम ना देखिहे ॥

सोरठा-भये अभाग मुहि जान, दरश देहेके छिप रहे ॥

नहीं करूँ जलपान, जबलग दरश न देखहुँ ॥

चौपाई

दिवस पाँच तब ऐसे बीता । निपट राय उर बाढ़ी चींता ॥ सुनी खबर तब पंथ चलि आये । तिन राजाको आन उठाये ॥ ले झारी मुख मंजन कीना । संत चरण चितवहु विधिदीना ॥ सतगुरु दरश दिये तेहि वारा । महल मांहि कीनो उजियारा ॥ तहां जाइ जब ठाडे भयऊ । राजा चरण धाय तब गह्यऊ ॥ हमहि सनाथ किये प्रभुराई । हम निज सेवक तुमरे आई ॥

सतगुरु वचन

ज्ञानी कहे सुनो हो राई । यमफांसीते लेहों छुड़ाई ॥ सब जग परचो कालके फंदा । बहुविधि तिनको बांधे बंधा ॥ नेम धर्म कुल कर्म लगाये । ये फंदा सब जगत फँदाये ॥ जो कोइ हंसा होय सुभागी । काल फांसते बचिहै भागी ॥ धर्मकाल ताको नहि पावे । सुरति निरति ले शब्द समावे ॥ साखी-शब्द सुरत युग बांधई, कर्म भर्म दे छोर ॥ हंस गति जब आवई, कहा करे यम चोर ॥

अमरसिंह वचन-चौपाई

हे साहेब जो आयेसु पाऊँ । तो रानीको वचन सुनाऊँ ॥ अबके सतगुरु जाहु दुराई । तो हमकूँ नहि जीवत पाई ॥

रानीका साहबकी शरणमें आना और राजाको सत्यलोक देखना

बोधसागर

(७३)

सतगुरु वचन

सतगुरु कहे सुनो हो राई । भक्ति प्रेम बस कतहुँ न जाई॥ तत्क्षण राजा चलिभे जबहीं । सात खण्डपर पहुँचे तबहीं ॥ सुस्वरकला रानि तहाँ रहेऊ । तासों राय वचन एक कहेऊ ॥ सुनो रानी एक वचन हमारा । अपने जीवका करौ उवारा ॥ साखी-राजा रानीसों कहै, मानो वचन हमार ॥ साहेब आये लोकसे, चरन सोगहो सम्हार ॥

रानी वचन-चौपाई

रानी कहै सुनो हो राजा । विलख वदन आये केहि काजा ॥ केहि कारन आये तुम खरारी । हमसे वचन कहो निरुवारी ॥

राजा वचन

रानी तुमसों कहूँ हवाला । जो सतगुरुने दीनो प्याला ॥ एक दिना लीला अस कियेऊ । महलनमें उजियारा भयेऊ ॥ तब हम तत्क्षण धाये जबहीं । महलन बीच पहुँचे तबहीं ॥ दरशन पाये भयउ अनन्दा । बारहिँ बार चरण गहि वंदा ॥ पलक ओट प्रभु गये विलायी । चार दिवस परे धरनि सुरझाई ॥ प्रोहित विप्र सब आये जबहीं । कहे समुझाइ हमकूँ तबहीं ॥ बनिया मोदी सगरे धाये । छीया सेठ चौधरी आये ॥ भाई भतीजे परजा धाई । काहे राय मरत हो भाई ॥ सबे मिलि आनिउठाये जबहीं । ले झारी भर दीना तबहीं ॥ ले झारी मुख धोवंत भयऊ । साहेब दरश बेगि तब दयऊ ॥ दरश पाय मैं भयउ सनाथा । रानी सत्य कहत हौं बाता ॥

रानी वचन

राजा बात कहत हौं तोही । सत्य कहूँ जो मानो मोही ॥ अब तुम बात कहत हो नीका । तेहि पाछे पुनिलागे नहि फीका ॥

(७४)

अमरसिंह बोध

राजा बात कहीहौ आछी । पाछे जगमें होय न हाँसी ॥

राजा वचन

रानी मानो कहा हमारा । साहेब चरण बेगि चितधारा ॥ धन जौवन तनरंग पतंगा । छिनमें छार होत है अंगा ॥ तुरत मान जो रानी लीना । संत दरश कामिनि जो कीना ॥ हाथ नारियल आरति लीना । सात खंडसे उतर पग दीना ॥ सात सहेली संग लगी जबहीं । स्वरकला पुनि उतरी तबहीं ॥ सब उमराव बैठे दरबारा । रानी आइ बाहिर पग धारा ॥ तब उमराव उठे भहराई । स्वरकला कस अचरज लाई ॥ रानी कबहु न देखी भाई । सो रानी कस बाहेर आई ॥ गजमोतिन से पूरे मांगा । लाल हिरा पुनि दमके आंगा ॥ आधा मस्तक कीन्ह उघारा । मानिक दमके झलाहलपारा ॥ तब रानी सतगुरु पहुँ आई । नारियल भेट जो आनचढ़ाई ॥ रानी थाल हाथमें लियऊ । करत निछावर आरतिकियऊ ॥ साखी-रानी ठाड़ि मैदानमें, सुनो संत धर्मदास ॥ सुरजकिरन अरु रानिको, एकही भयो प्रकाश ॥

चौपाई

लगिचकाचौधि अधिक पुनि जबहीं । देखि न जाय रानी तन तबहीं ॥ राजा रानी दंडवत कीन्हा । ऐसी भक्ति हृदयमें चीन्हा ॥ दोउ कर जोरि राय भयो ठाढा । उपज्यो प्रेम हृदय अति गाढा ॥ साहेब हमपर दया जो कीजै । भुवन हमारे पांव जो दीजै ॥ तबहीं हम मंदिर महाँ आये । पलंग बिछाय तहाँ बैठाये ॥ झारी भर तब राजा लीना । चरनामृतकी युक्ति कीना ॥ राजा ऊपरते डारत पानी । चरण पखारे स्वरकला रानी ॥ चरण पखारि अँगोछा लीना । जैसी भाव भक्ति उन कीना ॥

बोधसागर

(७५)

चरणामृत तब शीश चढावा । लेचरणामृत बहु विनती लावा ॥ जैसी भक्ति राव जो पावा । धरमदास तोहि बरनिसुनावा ॥

धर्मदास वचन

और कहो राजाकी करनी । सो साहेब तुम भाखो वरनी ॥

सतगुरु वचन

तुरतहि तब सब साज बनावा । हमको सो अस्नान करावा ॥ हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनेउ सार धरे दोड थारा ॥ अधर थार भूमिते रहई । रानी तबहीं चितवन करई ॥ रानी कहे रायसों तबहीं । लीला निरखो गुरुकी अबहीं ॥ अधर अग्र जिनका पनवारा । महा प्रसादते आइ अपारा ॥ नर नारी तब ठाढे भय आई । महा प्रसाद अब देहु गुसाई ॥ तब हम दीनेउ तहां प्रसादा । पाय प्रसाद भई तब यादा ॥ पुरुषलोककी भई सुधि तबहीं । ज्ञानी आय चेताये भलहीं ॥ हम भूले तुम लीन चेताई । फिरि न विगोवे आइ यमराई ॥ या यम देश कठिन है फांसी । काम क्रोध मद लोभविनाशी ॥ साखी-काम क्रोध अरु लोभ यह, त्रिगुन बसे मन माहि ॥ सत्य नाम पाये विना, जमते छुटको नाहि ॥

चौपाई

श्रवन लागिनिलाम सुनाई । तुरत राय कह चले लिवाई ॥ पहुँचे जाय सुमेर पहारारा । पुर बैकुंठ रच्यो जेहि ठारा ॥ जय विजय जो तहां रहेऊ । तेहि साहेबको देखत भयेऊ ॥ देखत पौरिया ठाडे भयऊ । आदर करि साहेबको लयऊ ॥ कहे पौरिया विनती लाई । भूपति लोक कहाँको जाई ॥ तब हम पौरियन सो कहेऊ । एक जिव सत्यनाम जो गहेऊ ॥

१ इरे !

(७६)

अमरसिंह बोध

पुर वैकुंठ दिखायो चाहीं । ताते हम आये यहि ठाहीं ॥ तहाँते हम चले रिगई । पहुँचे चित्रगुप्तके ठाई ॥ लगयो दरबार चित्रको जहँवा । पुण्य पापको निबेरो तहँवा ॥ देखि साहेबको ठाडे भयऊ । हाथ जोरिके बिनती कियऊ ॥ डार सिंघासन बैठक दीना । तब साहेब सो बिनती कीना ॥ धन्य आजबड भाग्य हमारा । साहेब आये इहाँ पग धारा ॥ आये गुप्त साहेबके पास । विनति करत बहुभये उदासा ॥ हे साहेब हम पूछत तुमपै । कह लाये भूपन कहु हमपै ॥ यह तो हमरो चोर कहाई । अधम पापि राजा यह आई ॥ तब साहेब गुप्तसे कहेऊ । लीखनी तुमारी देहि चुकोई ॥ यह सुनि गुप्तते रेसियाना । हमरी लिखाई बाद बखाना ॥ गुप्त कर्म करे नर कोई । सो निज चोर हमारा होई ॥ सारखी-प्रकट करम जो करहिं नर, सोई चित्र लिख लेहूँ ॥ भूपतिलोक कहावहीं, पाप पुन्य कर येहु ॥

चोपाई

तब साहेब एक जुगति बनाई । पारसपथरी तहाँ दिखाई ॥ अनेक कर्मसे लोहा भरिया । पारस भेटत कंचन करिया ॥ साहेब गुप्तसे कहे समुझाई । इनकू लोहा करो रे भाई ॥ लोहासे जो कंचन कियेऊ । यहि विधि हंसा निरमल भयऊ ॥ इतनी सुनि यम भये अधीना । फेर न तिनसे बोलन कीना ॥ अहो जमराय वचन सुनु मोरा । कही करो तो करहु चोरा ॥ राजाकू ले जाओ भाई । इनकू यमपुरी लाओ दिखाई ॥ तबयमराज हुकुम करिदीयऊ । दूत दोय राज संग गयऊ ॥

१ चित्रगुप्त ।

नरकका वर्णन

बोधसागर

(७७)

दूत रायको चले लिवाई । पहुँचे जाय यमपुरी मांही ॥ त्रास जीवको देतहै जहँवा । देखत राजा मन पछितावा ॥

नरकको वर्णन

एक तो कोल्हू मांहि पिराई । ऊंधे मस्तक एक झुलाई ॥ एक तो बांध खंभसू ताते । चीसे देत बहुतही भांते ॥ एक जीवको खात चवाई । भागत फिरे वचत नहिं भाई ॥ एक जीव कुंडमहिं डारा । मोगरी झिरपै मारे अपारा ॥ कुंड चौरासी बने है ति भाई । भांति भांति यम त्रास दिखाई ॥ ऐसे त्रास जीवनको दियऊ । देखत राजा व्याकुल भयऊ ॥ एक कुंड तो रुधिर भराई । दूजा कुंड तो पीब कहाई ॥ त्रीजो कुंड हि सूत्र भराई । योजन एक ताकि गहराई ॥ योजन चारकी है चकराई । योजन चार लगि गन्ध उडाई ॥ परे जीव ता मांहि अपारा । चौथा कुंड नरककी धारा ॥

साखी-परे जीव ता कुंडमें, कोइ अब हमहिं उबार ॥ मारत मोगरी शीरपर, बहुतहिं करत पुकार ॥

चौथाई

पांचैं कुंड सो अग्नि कहाई । बहुत जीव तहँ जरहीं भाई ॥ योजन लक्ष है ता गहिराई । पांच लक्षकी है चकराई ॥ करत पुकार तहँ जीव अपारा । यहि अवसर को उहमहिं उबारा ॥ राजा यमपुरी देखि बनाई । कहत न बने रहे शिरनाई ॥ झूठी वचन कहत है जोई । जीभ्या काटिलेत पुनि सोई ॥ झूठी बांह देखाई जो कबही । काटे बांह यम टूंठा करही ॥ झूठी साख भरे जो भाई । विषधर ताके जीभ लगाई ॥

१ अच्छी तरहसे ।

(७८)

अमरसिंह बोध

बिन अपराध मारे जो कोई । बहुत मार तेहि ऊपर होई ॥ स्वपुरुषतजिपरपुरुषसंगजावे । अगिनपुरुष तेहिसंग मिलावे ॥ पुरुष होय नारी कहैं त्यागे । नारी और सो मन जो लागे ॥ अग्निनारि तेहिसंग मिलावैं । यहि विधिजीवनत्रास दिखावैं ॥ एक एकको त्रास दिखावैं । हाथ छूरी ले कण्ठ चलावैं ॥ एक जीवको ठाडे कीना । काग गीधकोहुकमकरि दीना ॥ काग गीध नोचत हैं भाई । भागत फिरे त्रास अधिकाई ॥ जे नर नारी मदिरा पावैं । तत्त तेल पुनि ताहि पिलावैं ॥ संत साधुकी निंदा करई । जूठी साख पंचमें भरई ॥ ताको फल पावत है सोई । सब अँगमें कुछ पुनि होई ॥ ऐसी यमपुरी देखी बनाई । देखत राजा मन पछताई ॥

साखी-देखी राजा यमपुरी, मनमें भये हुशियार ॥ साहेबसो विनती करे, हमको लेउ उबार ॥

चौपाई

नृप अरु दूत पहुँचे तहवाँ । चित्रगुप्तको दरबार रहै जहवाँ ॥ जहाँ बिराजे ज्ञानी सिंहासन । गहे चरण तहाँ नृपति ततक्षण ॥

राजा बचन

तब राय चरण परस्यो आयी । अबकी साहेब लेहु बचाई ॥ यह यम देश कठिन है गांसी । सुरनर सुनि परे यमफांसी ॥

साखी-सुनि कथा जब नरककी, धर्मदासभय मान ॥ सतगुरु सो कहने लगे, औरौ कहहु बयान ॥

सतगुरु बचन-चौपाई

कहैं कवीर सुनो धर्मदासा । नरक वृत्तान्त करौ परकासा ॥ धर्मराय अस बाजी लावा । पाप पुण्य दोउ कीन उपावा ॥

बोधसागर

(७९)

पाप पुण्य रचि जीव फँसाया । जो जस करै सोतस फल पाया ॥ करै पाप तेहि नरक भुगतवैं । करै पुण्य तेहि स्वर्ग पठावैं ॥ कर्महिं भुगुति गरभमें जावै । यहि विधि कालजीव फँदावै ॥ सुनु धर्मदास नरककी बाता । सबही तुमसन कहूं विरुयाता ॥ सकल सुनहु यमपुर इतिहासा । अद्वुत सुनि होय जीव त्रासा ॥ ठीका पुरै जब जिवकी भाई । धर्मराय मन चिन्ता आई ॥ आयसु किंकर गण तब पावैं । हुकुम चित्रगुप्त ताहि सुनावैं ॥ ते जग आवै आयसु पायी । जीवहिं पकरि तहाँ ले जायी ॥ लै जाँहिंसो यम सदन मंझारा । करै ताहि यम सन्मुख ठारा ॥ रवि सुत तहाँ सिहोंसन बैठे । यमगण तहाँ विराजत बैठे ॥ काल सेन तहाँ सबहि विराजै । शास्त्र प्रवर्तक सुनिवर छाजै ॥ धर्मशास्त्र के जे जे करता । सबही देखै जो जिव मरता ॥ व्यास पराशर आदिक सबहीं । पहुँचै यमपुरितनत्यागैतबहीं ॥ ये सब यम सहाय सो करहीं । पाप पुण्यकर लेखा धरहीं ॥ सबहिं मुसाहिब कालके आहीं । निज नैनन हम देखत जाहीं ॥ धर्माधर्म विचारत नीको । सबमिलिन्याय करत करनीको ॥ चित्रगुप्त जब बही सुनावै । धर्म राय कहिके समुझावै ॥ जिन २ पाप किया जग आयी । तिनकर लेखा जब सुनि पायी ॥ ते सुनि दूतन कहत जनायी । यथा योग्य भुगतावहु जायी ॥ जब कोई जीव सुकर्मा आवै । शुचि सुन्दर दूतन तन धावै ॥ रविसुत कहविलसाओ स्वर्गा । अर्थ धर्म अभिमत सुखवर्गा ॥ यही सुकृत जब श्रुतिपथ आही । बहुत समुझायौ हम तुव पाही ॥ साखी पापी मनुषहिं पाइ यम, दूतन कहे रिसाइ ॥ रौरवादिक की यातना, इनाहिं भुगावौ जाइ ॥

(८०)

अमरसिंह बोध

चोपाई

सुनहिं वचन यमगण यमकेरा । त्रास दिखावहिं नरहिं घनेरा ॥ लोह दण्ड सुद्वर हनि कोपै । रौरवादि महाँ तिनही तोपै ॥ यहि विधि यम करहिं विलासा । अब विस्तर ते सुनु धर्मदासा ॥ बहु विधि विद्या जग महाँ पावै । वेद बिचारि जो ब्रह्म समावै ॥ आतम ब्रह्म एक करि जाने । ब्राह्मण सो तेहि वेद बखानै ॥ ऐसे नर कहैं जो कोइ मारै । ब्रह्महत्या तेहि वेद पुकारै ॥ ब्रह्मरूप ब्रह्मविद जाने । तेहि वधन कहैं ब्रह्मवध अनुमानै ॥ जानि ब्रह्म वध पाप कराला । तब दूतन कह यम ततकाला ॥ कुंभीपाक माहि लैडारौ । सुद्वर परिघ मार बहु मारौ ॥ इन रिस करि मारचो महिदेवा । सुनी न मम अनुशासन भेवा ॥ रौरव माँहि गिरावहु घाती । काहू कहै सुनौ नहिं बाती ॥ जो तिय मारै गर्भ गिरावै । तेल यंत्र तनु तासु पिरावै ॥ जिन गुरु हने हने निज स्वामी । छुरा धार ते पीडित नामी ॥ जे विश्वासघात नर करहीं । ते नर कालसूत्र महाँ परहीं ॥ बाल वृद्ध कर हरे जो प्राना । तस तेल महाँ पचत अयाना ॥ परदारा परक्षेत्र जे हरहीं । जे नर परपुर सीम विगरहीं ॥ ते गुरु पाप नरक महाँ पचहीं । हाहाकार शब्द तहाँ मचहीं ॥ चकन ते तिनके तनु छेदैं । सुद्वर परिघ शूल बहु भेदैं ॥ गम्यअगम्य विचार न करहीं । खाज अखाज नहीं चित धरहीं ॥ तिनके तन को करकच छेदैं । बहुत भांति चोचनसों भेदैं ॥ साखी-चोर वृत्ति करि जो जीवै, करै जो परसे द्रोह ॥ झूठ बोलि अरु मद पिवै, पर निन्दा करै जोह ॥ तिन पापिन कहैं यमविकारा । ठौर भयंकर माँझ तेहि डारा ॥ जे नर कन्यादान मँझारी । विघ्न करत रौरव अधिकारी ॥

बोधसागर

(८१)

दान देत लखि भांजी मारै । योग्यअयोग्य जो नाहि उचारे ॥ पर तप मँह कर विघ्न अनेका । नहिं हिय मँह जो करत विवेका ॥ आप छूँछ औरन ब्रत टारै । वेद शास्त्र जिन नाहि उचारे ॥ हरि यश सुनत दहैं मन माहीं । दूसर सुनै तो चित विचलाहीं ॥ तिनकर देह सो कूकर भखहीं । पुनि असिपत्रमांझ दुख भरहीं ॥ एकहु अक्षर गुरुसों सीखै । ताहि न मानै मन कर तीखै ॥ ते परहीं नर रौरव माहीं । बहुविध दुख भुगतहिं सो ताहीं ॥ जे नर हरत दीनके प्रानन । मित्रहि मारत दाहत कानन ॥ तिनहि अँगारन मांझ सुतावैं । यमगण दारुन त्रास दिखावैं ॥ जे गुरुधन हारक संसारा । किम कूप मँह परत निहारा ॥ जौन गुरु व्यभिचारी होई । प्रजहिं दुःख देई नर जोई ॥ शिष्य शंक जो नाहिं मिटावत । प्रजहिं न्याय जो नाहिं चुकावत ॥ युक्त अयुक्त न जानत जोई । करत सपक्ष न्याय शठ कोई ॥ ते नर अंध तामिस्त्र मँझारे । गिरत लखे पावत दुख भारे ॥ विन देखे पर दोष गिनावैं । यम गण तिनके नैन टँकावैं ॥ अप्रिय वचन औरहीं कहहीं । कारण छेददुख ते शठ लहहीं ॥ देव साधु ब्राह्मण धन हरई । तृष्णावश लोभहिं मन धरई ॥ सूचीमुख नरकहिं कर नाऊँ । ते तहैं जाइ वसावैं गाऊँ ॥ जे परतिय अभिलाषत प्रानी । निन्दत सुर गुरु भूसुर जानीं ॥ धर्मशास्त्र तीरथ हरिजन कर । निन्दा करत सुनहु दुख तिनकर ॥ पहिले शूलन पर बैठावैं । मुद्गर शूलनसे करि घावैं ॥ पाछे काक श्वान तेहि खाहीं । छेदहिं दुख सुख हेरत नाहीं ॥ भोगी बहुत काल प्रिय नारी । त्यागत ताहि अधम अविचारी ॥ विनु वैराग ताहिको त्यागे । ताहि त्यागि औरिन मँह पागे ॥ सो शठ नरकमाँहिं दुख पावै । कहँ लग कहौं कहत नहिं आवै ॥ कर पद बाँधि यम सासत देहीं । जो जस किये सो तस फल लेहीं ॥

(८२)

अमरसिंह बोध

सूरज सुत जस आज्ञा देई । दूत उठाय सबै शिर लेई ॥ चित्रगुप्त सो लिखनी लेखै । धर्मराय न्याय तहैं पेखै ॥

सारखी-कै कमाई जो कछू, कभी न निष्फल जाय ॥

सात समुन्दर आडा परै, मिलै अगाऊ धाय ॥

भूमि ताभ्रमय तहां बनाई । तापर अग्नि प्रचण्ड बिछाई ॥ दहकत ज्वाला सो महि कैसी । अति दुस्सह प्रलयगिनि जैसी ॥ तहैं नर जाइ जरत दुख पावैं । यमगण हानि तेहि मांझ जरावैं ॥ तीव्र नख रद शूचीकच केते । पापिन कहैं दुख देहि सब तेते ॥ अति तनु कृश तनु बहु पापी । तहैं दुख पावत जन परितापी ॥ सांकरि बांधि बांधि गज लावैं । अति दृढ सुदूर हानि तेहि ढावैं ॥ दुख लहि जब इतउत नर धावैं । यमगण धरि तिहि माहिं गिरावैं ॥ पुनि निज कृतकर याद करावैं । परिघन हनि बहु त्रास दिखावैं ॥ तस थम्भ बहु ठाड रहावैं । पर तिय गामी ताहि सटावैं ॥ निज पति छोड परपुरुष लुभावैं । सोइ तिया तहैं लाइ मिलावैं ॥ यमगण ताहि मारि भिटावत । कर वचन पुनि ताहि सुनावत ॥ यमके दूत अस कहैं पुकारी । तबतौ तन मन सकल विसारी ॥ प्राण समान चही परनारी । अबकिन भेटेहु रुचि किमि मारी ॥ उन्नत कुच भुजभरि जिमि भेटे । मुख चुम्बन रति करि दुख मेटे ॥ रही जो तव जीवन जग नारी । यह सोइ अपर न करहु विचारी ॥ कलनहिछनजेहि विनतोहि पापी । मिलहु न तिय सँग करत अलापी ॥ यहि विधि यमगण वचन सुनावैं । हनि हनि अधमन खम्भ लगावैं ॥ मद पीवत सँग जे करि प्रीती । मांसहिं खाइ करत अनरीती ॥ तस तैल तेहि मारि पियाई । कहत मदहि पीवहु शठ आई ॥ हाहाकार करै जब सोई । करै विनती सो बहु रोई ॥ ता ऊपर तैलहिं सो डारैं । भीतर बाहर दोऊ विधि जारैं ॥ इतना करैं बहुरि सो आगे । करन शासना सो फिर लागे ॥

बोधसागर

(८३)

असिपत्र बिंपिन महाँ चलहूँ । खायो माँस सोई फल लहहूँ ॥ तहाँ अहँतरु दल अतिही तीखैँ । ऊपर परत कटत तनु दीखैँ ॥ रहत न बने तहाँ पुनि भाजत । करिविलापबहुविधिदुखपावत ॥ करि परघात पाल निज देही । कूटकरमबहु विधिकिय जेही ॥ ते असिपत्र नरक महाँ जावैं । पुनि रकटाइशिर दुख पावैं ॥ एक शिर काटि फेरि होइ आवै । बहुरि कटैं बहुरि है जावै ॥ जे परहिंसक अधम नरेशा । तेलयंत्र तनु पिसत इमेशा ॥ तेल चुराय जो जगमहाँ लेते । यमगण तेहि बहुत दुख देते ॥ तेल चोर कहीं तेल कराही । घृत चोरहिँ घृत माँझ गिराहीं ॥ जेपर दूध मधू दधि हरहीं । ते गण रक्त कुण्ड महाँ परहीं ॥ पाश बाँधि गल तेहि महाँ डारैं । यम गण दारुण त्रास विडारैं ॥ तीरथ चलत जानि फन हरहीं । ते नर रक्त पीब दह परहीं ॥ देव सदन महिसुर गुरुधामा । जे तोडत मन करहिँ अरामा ॥ बन वाटिका पुहम बहु छेदैं । मठ मखं भवन सुरभिधर भेदैं ॥ दीन भवन चटशाल गिरावैं । अस्थिचूर्ण महाँ ते दुख पावैं ॥ पर उपांनत वस्त्र शठ हरहीं । पर भोजन छिपाय जो धरहीं ॥ लोहयंत्र बिच ताहि पिरावैं । बहुविधि तेही दुःख दिखावैं ॥ जे नर घर पुर विपिन जरावत । अग्निकुण्ड तनु तासु गिरावत ॥ जे निज स्वामिहि दोष लगावैं । पर अपवाद प्रीति करि गावैं ॥ तिन कहीं नकं शाल्मली डारै । पाश बाँधि लटकात तरारै ॥ मुद्गर परिघन यमगण मारैं । निर्दय तनक न करूणा धारैं ॥ जो तिरिया परपति रत होई । नाथवती विधवा किन होई ॥ तस लोहमय खम्ब नराकृति । यम वशसे तेहि तिय भेटति ॥ लोह शूल खर तस विशाला । जीभ छेद मुख करत विहाला ॥ इमिदुख लहँहि अधम नरनारी । कहाँ लगिकहाँ सोलेहु विचारी ॥

१ यज्ञशाला । २ गोशाला । ३ जूता ।