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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दजीद्वारा संशोधित

श्री-अमरसिंह बोध

A decorative horizontal line with a central diamond-shaped ornament, used as a section separator.

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन

बम्बई

श्रीमद्भगवद्गीता

संस्कृत भाषायां प्रथमः विभागः

सप्तमः अध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता

१९९९

सत्य कबीराय नमः

बोधसागर

द्वितीयस्तत्रंगः

अमरसिंहबोध

★

धर्मदास वचन-बीपाई

धर्मदास उठि ठाढे भयऊ । दोउकर जोरि सो विनती कियऊ ॥
जुग जुग जीव चेताये ज्ञानी । कालफांस ते छुडाये आनी ॥
युगकमोद कीना जिव काजा । सोई तुम भाषि कहो निज साजा ॥
यमराजाते भये छुटारा । निर्भय हंसालोक सिधारा ॥

सतगुर वचन

धर्मदास मैं कहि समुझाऊँ । युगकमोदकी खबर सुनाऊँ ॥
जब हम इते पुरुषमें पाँही । तबकी बात कहू सब तोही ॥
युग परवान चाकरी भयऊ । युग जुग पंथपसारा कियऊ ॥
अर्बे खर्बेजिव असंख्य अपारा । सब उबार लाये पुरुष दरबारा ॥
रहे सब हंस पुरुषके पास । करते कुतूहल लोकनिवासा ॥
भूख प्यास निद्रा नहिं भाई । पुरुष ध्यानमें रहे समाई ॥
पुरुष दयाल दयाकरि भारी । षोडश रवि हंस उजियारी ॥
सेज पुष्प बनी अति भावन । सुख विनोद सब लोकसुहावन ॥
बैठे पुरुष सेजपर आयी । तत्क्षण ज्ञानी लिये बुलाई ॥
ज्ञानी तुम जाओ संसारा । जाइ करो अब हंस उबारा ॥
सिंगलद्वीप अमरपुर गामा । अमरसिंह राजा करनामा ॥
ताको अबे चेताओं जायी । चेतन अंश जग रहे खुलायी ॥

धर्मदास साहबका सद्गुरुसे युगकमोदका वृत्तान्त पूछना और सद्गुरुका उत्तर - राजा अमर सिंहकी कथा आरंभ

(७०)

अमरसिंह बोध

ज्ञानी वचन

ज्ञानी वचन कहै कर जोरी । सत्यपुरुषएक बिनती मोरी ॥
पुरुष मोहिं पठवो संसारा । कौन नामते हंस उबारा ॥
साखी-कौन नाम हंसन कहैं, कौन देऊँ कडिहार ॥
कौन नाम नारिन कहैं, जाते होई उबार ॥

चौपाई

कालफाँस जासे कटि जावे । सहजे हंसलोक महाँ आवे ॥
इतना बोल पुरुषसे पाऊँ । तब भवसागरमें चलिजाऊँ ॥

पुरुष वचन

अहो ज्ञानी वचन सुनि लेहू । मान सिखापन शिरपर देहू ॥
सब राह दिखाऊँ मैं तोही । उबरे हंसा अधिकारी सोई ॥
साखी-बालककू बीरा कहो, तिरिया कुटिल सनेह ॥
सुरतवंत कोयह शब्द है; पुरुष नाम निज लेह ॥

चौपाई

पुरुष हुकम दीना तेहि बारा । ज्ञानी वेग जाओ संसारा ॥
मूलनाम परवाना देहू । सकल जीव अपना करि लेहू ॥
ज्ञानी चले लोकते जबहीं । धर्म धीर मिले पुनि तबहीं ॥
देखत धर्मरायमनहिं संकाना । आपन हानि मनहिं अनुमाना ॥
ज्ञानी तुम सुनो वचन हमारा । काहेको आये तुम संसारा ॥
चौदा भुवन राज लिख दीना । अब काहेको चितवन कीना ॥
आहार यही हम कहैं दियऊ । पुरुषदया अब काहेकु कियऊ ॥
राज हमारो है संसारी । मुखदुःख जीवन देहुँ अपारी ॥
ब्रह्मा विष्णु मदेश कहाई । मेरे अंस जगमाँहि रहाई ॥
हमतो रहही शून्य मँझारी । गम नहिं पावे कोइ हमारी ॥
राज भार सब उनको दियेऊ । हम न्यारे होइ देखत रहेऊ ॥

कबीर साहबका अमर पुरीमें जाना और अमर सिंहका मिलना और कबीर साहबका गुप्त हो जाना फिर राजाकी विकलताका वर्णन

बोधसागर

(७१)

ज्ञानी तुम जाओ संसारा । वचन एक अब सुनो हमारा ॥
पुरुष वचनकी तुम कहैं लाजा । ता पाछे करियो जिव काजा ॥

ज्ञानी वचन

सुनहु वचन निरंजन राई । सबै बात मैं कहुं समुझाई ॥
कोटि ज्ञान हम तुम कहैं हारा । द्वादश पंथ चले संसारा ॥
ताते चलिहै आहार तुमारा । इतना वचन धर्म कहैं हारा ॥
धर्मदास सुनियो चित लाई । धर्मधीर ऐसा ठहराई ॥
तब हम आये यहि संसारा । जीवनकाज पृथ्वी पगु धारा ॥
अमरपुरी एक नगर रह्राई । सिंगलद्वीपके माँहि बसाई ॥
तहाँ आई हम कीन्ह पसारा । पहुँचे रायके महल मैझारा ॥
षोडश रविकी ज्योति पसारा । महलन मांही भयो उजियारा ॥
अमरसिंह राजाको नामा । लागी कचहरी बहु विधि धामा ॥
देख प्रकाश उठे तब राई । नृप धाये महलनमें आई ॥
आये महलमें सतगुरु पासा । सतगुरु चरण गहे विश्वासा ॥

अमरसिंह वचन

अहो संत एक विनती करिहो । पूछत वचन क्रोध जनि धरिहो ॥
कै तुम तीन देवनमें कोई । कै परब्रह्म तुम आये सोई ॥
और गम्य नहीं चलत हमारी । सो तुम वचन कहो निरवारी ॥

सतगुरु वचन

साखी—हम आये सतलोकसे, जीवन करन उबार ॥
कालफांस निवारके, ले जाऊँ लोक मैझार ॥

चौपाई

यह कहि गुप्त भये प्रभु राई । राव परे धरनी सुरझाई ॥
बिकल भये मुख आवे न बानी । तलफत मीन जैसे बिन पानी ॥
सतगुरु बिन तलफत नृप तैसे । स्वाँति बुंद बिन चात्रिक जैसे ॥

पांच दिन पीछे फिर कबीर साहबका राजा अमरसिंहको मिलना

(७२)

अमरसिंह बोध

छन्द चर्चरी

मोहि कहा जानि दरशन दिये प्रभु गुप्त पुनि काहे भये ॥
हग पलक देत बिलंब नाही कवन दिशि कहँवा गये ॥
हमहीं अभागी कीन्ह सतगुरु दरस देके छिप रहे ॥
कैसे धरूँ मन धीर तबलग दरश तुम ना देखिहे ॥

सोरठा-भये अभाग मुहि जान, दरश देहेके छिप रहे ॥

नहीं करूँ जलपान, जबलग दरश न देखहुँ ॥

चौपाई

दिवस पाँच तब ऐसे बीता । निपट राय उर बाढ़ी चींता ॥
सुनी खबर तब पंथ चलि आये । तिन राजाको आन उठाये ॥
ले झारी मुख मंजन कीना । संत चरण चितवहु विधिदीना ॥
सतगुरु दरश दिये तेहि वारा । महल मांहि कीनो उजियारा ॥
तहां जाइ जब ठाडे भयऊ । राजा चरण धाय तब गह्यऊ ॥
हमहि सनाथ किये प्रभुराई । हम निज सेवक तुमरे आई ॥

सतगुरु वचन

ज्ञानी कहे सुनो हो राई । यमफांसीते लेहों छुड़ाई ॥
सब जग परचो कालके फंदा । बहुविधि तिनको बांधे बंधा ॥
नेम धर्म कुल कर्म लगाये । ये फंदा सब जगत फँदाये ॥
जो कोइ हंसा होय सुभागी । काल फांसते बचिहै भागी ॥
धर्मकाल ताको नहि पावे । सुरति निरति ले शब्द समावे ॥
साखी-शब्द सुरत युग बांधई, कर्म भर्म दे छोर ॥
हंस गति जब आवई, कहा करे यम चोर ॥

अमरसिंह वचन-चौपाई

हे साहेब जो आयेसु पाऊँ । तो रानीको वचन सुनाऊँ ॥
अबके सतगुरु जाहु दुराई । तो हमकूँ नहि जीवत पाई ॥

रानीका साहबकी शरणमें आना और राजाको सत्यलोक देखना

बोधसागर

(७३)

सतगुरु वचन

सतगुरु कहे सुनो हो राई । भक्ति प्रेम बस कतहुँ न जाई॥
तत्क्षण राजा चलिभे जबहीं । सात खण्डपर पहुँचे तबहीं ॥
सुस्वरकला रानि तहाँ रहेऊ । तासों राय वचन एक कहेऊ ॥
सुनो रानी एक वचन हमारा । अपने जीवका करौ उवारा ॥
साखी-राजा रानीसों कहै, मानो वचन हमार ॥
साहेब आये लोकसे, चरन सोगहो सम्हार ॥

रानी वचन-चौपाई

रानी कहै सुनो हो राजा । विलख वदन आये केहि काजा ॥
केहि कारन आये तुम खरारी । हमसे वचन कहो निरुवारी ॥

राजा वचन

रानी तुमसों कहूँ हवाला । जो सतगुरुने दीनो प्याला ॥
एक दिना लीला अस कियेऊ । महलनमें उजियारा भयेऊ ॥
तब हम तत्क्षण धाये जबहीं । महलन बीच पहुँचे तबहीं ॥
दरशन पाये भयउ अनन्दा । बारहिँ बार चरण गहि वंदा ॥
पलक ओट प्रभु गये विलायी । चार दिवस परे धरनि सुरझाई ॥
प्रोहित विप्र सब आये जबहीं । कहे समुझाइ हमकूँ तबहीं ॥
बनिया मोदी सगरे धाये । छीया सेठ चौधरी आये ॥
भाई भतीजे परजा धाई । काहे राय मरत हो भाई ॥
सबे मिलि आनिउठाये जबहीं । ले झारी भर दीना तबहीं ॥
ले झारी मुख धोवंत भयऊ । साहेब दरश बेगि तब दयऊ ॥
दरश पाय मैं भयउ सनाथा । रानी सत्य कहत हौं बाता ॥

रानी वचन

राजा बात कहत हौं तोही । सत्य कहूँ जो मानो मोही ॥
अब तुम बात कहत हो नीका । तेहि पाछे पुनिलागे नहि फीका ॥

(७४)

अमरसिंह बोध

राजा बात कहीहौ आछी । पाछे जगमें होय न हाँसी ॥

राजा वचन

रानी मानो कहा हमारा । साहेब चरण बेगि चितधारा ॥
धन जौवन तनरंग पतंगा । छिनमें छार होत है अंगा ॥
तुरत मान जो रानी लीना । संत दरश कामिनि जो कीना ॥
हाथ नारियल आरति लीना । सात खंडसे उतर पग दीना ॥
सात सहेली संग लगी जबहीं । स्वरकला पुनि उतरी तबहीं ॥
सब उमराव बैठे दरबारा । रानी आइ बाहिर पग धारा ॥
तब उमराव उठे भहराई । स्वरकला कस अचरज लाई ॥
रानी कबहु न देखी भाई । सो रानी कस बाहेर आई ॥
गजमोतिन से पूरे मांगा । लाल हिरा पुनि दमके आंगा ॥
आधा मस्तक कीन्ह उघारा । मानिक दमके झलाहलपारा ॥
तब रानी सतगुरु पहुँ आई । नारियल भेट जो आनचढ़ाई ॥
रानी थाल हाथमें लियऊ । करत निछावर आरतिकियऊ ॥
साखी-रानी ठाड़ि मैदानमें, सुनो संत धर्मदास ॥
सुरजकिरन अरु रानिको, एकही भयो प्रकाश ॥

चौपाई

लगिचकाचौधि अधिक पुनि जबहीं । देखि न जाय रानी तन तबहीं ॥
राजा रानी दंडवत कीन्हा । ऐसी भक्ति हृदयमें चीन्हा ॥
दोउ कर जोरि राय भयो ठाढा । उपज्यो प्रेम हृदय अति गाढा ॥
साहेब हमपर दया जो कीजै । भुवन हमारे पांव जो दीजै ॥
तबहीं हम मंदिर महाँ आये । पलंग बिछाय तहाँ बैठाये ॥
झारी भर तब राजा लीना । चरनामृतकी युक्ति कीना ॥
राजा ऊपरते डारत पानी । चरण पखारे स्वरकला रानी ॥
चरण पखारि अँगोछा लीना । जैसी भाव भक्ति उन कीना ॥

बोधसागर

(७५)

चरणामृत तब शीश चढावा । लेचरणामृत बहु विनती लावा ॥
जैसी भक्ति राव जो पावा । धरमदास तोहि बरनिसुनावा ॥

धर्मदास वचन

और कहो राजाकी करनी । सो साहेब तुम भाखो वरनी ॥

सतगुरु वचन

तुरतहि तब सब साज बनावा । हमको सो अस्नान करावा ॥
हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनेउ सार धरे दोड थारा ॥
अधर थार भूमिते रहई । रानी तबहीं चितवन करई ॥
रानी कहे रायसों तबहीं । लीला निरखो गुरुकी अबहीं ॥
अधर अग्र जिनका पनवारा । महा प्रसादते आइ अपारा ॥
नर नारी तब ठाढे भय आई । महा प्रसाद अब देहु गुसाई ॥
तब हम दीनेउ तहां प्रसादा । पाय प्रसाद भई तब यादा ॥
पुरुषलोककी भई सुधि तबहीं । ज्ञानी आय चेताये भलहीं ॥
हम भूले तुम लीन चेताई । फिरि न विगोवे आइ यमराई ॥
या यम देश कठिन है फांसी । काम क्रोध मद लोभविनाशी ॥
साखी-काम क्रोध अरु लोभ यह, त्रिगुन बसे मन माहि ॥
सत्य नाम पाये विना, जमते छुटको नाहि ॥

चौपाई

श्रवन लागिनिलाम सुनाई । तुरत राय कह चले लिवाई ॥
पहुँचे जाय सुमेर पहारारा । पुर बैकुंठ रच्यो जेहि ठारा ॥
जय विजय जो तहां रहेऊ । तेहि साहेबको देखत भयेऊ ॥
देखत पौरिया ठाडे भयऊ । आदर करि साहेबको लयऊ ॥
कहे पौरिया विनती लाई । भूपति लोक कहाँको जाई ॥
तब हम पौरियन सो कहेऊ । एक जिव सत्यनाम जो गहेऊ ॥

१ इरे !

(७६)

अमरसिंह बोध

पुर वैकुंठ दिखायो चाहीं । ताते हम आये यहि ठाहीं ॥
तहाँते हम चले रिगई । पहुँचे चित्रगुप्तके ठाई ॥
लगयो दरबार चित्रको जहँवा । पुण्य पापको निबेरो तहँवा ॥
देखि साहेबको ठाडे भयऊ । हाथ जोरिके बिनती कियऊ ॥
डार सिंघासन बैठक दीना । तब साहेब सो बिनती कीना ॥
धन्य आजबड भाग्य हमारा । साहेब आये इहाँ पग धारा ॥
आये गुप्त साहेबके पास । विनति करत बहुभये उदासा ॥
हे साहेब हम पूछत तुमपै । कह लाये भूपन कहु हमपै ॥
यह तो हमरो चोर कहाई । अधम पापि राजा यह आई ॥
तब साहेब गुप्तसे कहेऊ । लीखनी तुमारी देहि चुकोई ॥
यह सुनि गुप्तते रेसियाना । हमरी लिखाई बाद बखाना ॥
गुप्त कर्म करे नर कोई । सो निज चोर हमारा होई ॥
सारखी-प्रकट करम जो करहिं नर, सोई चित्र लिख लेहूँ ॥
भूपतिलोक कहावहीं, पाप पुन्य कर येहु ॥

चोपाई

तब साहेब एक जुगति बनाई । पारसपथरी तहाँ दिखाई ॥
अनेक कर्मसे लोहा भरिया । पारस भेटत कंचन करिया ॥
साहेब गुप्तसे कहे समुझाई । इनकू लोहा करो रे भाई ॥
लोहासे जो कंचन कियेऊ । यहि विधि हंसा निरमल भयऊ ॥
इतनी सुनि यम भये अधीना । फेर न तिनसे बोलन कीना ॥
अहो जमराय वचन सुनु मोरा । कही करो तो करहु चोरा ॥
राजाकू ले जाओ भाई । इनकू यमपुरी लाओ दिखाई ॥
तबयमराज हुकुम करिदीयऊ । दूत दोय राज संग गयऊ ॥

१ चित्रगुप्त ।

नरकका वर्णन

बोधसागर

(७७)

दूत रायको चले लिवाई । पहुँचे जाय यमपुरी मांही ॥
त्रास जीवको देतहै जहँवा । देखत राजा मन पछितावा ॥

नरकको वर्णन

एक तो कोल्हू मांहि पिराई । ऊंधे मस्तक एक झुलाई ॥
एक तो बांध खंभसू ताते । चीसे देत बहुतही भांते ॥
एक जीवको खात चवाई । भागत फिरे वचत नहिं भाई ॥
एक जीव कुंडमहिं डारा । मोगरी झिरपै मारे अपारा ॥
कुंड चौरासी बने है ति भाई । भांति भांति यम त्रास दिखाई ॥
ऐसे त्रास जीवनको दियऊ । देखत राजा व्याकुल भयऊ ॥
एक कुंड तो रुधिर भराई । दूजा कुंड तो पीब कहाई ॥
त्रीजो कुंड हि सूत्र भराई । योजन एक ताकि गहराई ॥
योजन चारकी है चकराई । योजन चार लगि गन्ध उडाई ॥
परे जीव ता मांहि अपारा । चौथा कुंड नरककी धारा ॥

साखी-परे जीव ता कुंडमें, कोइ अब हमहिं उबार ॥
मारत मोगरी शीरपर, बहुतहिं करत पुकार ॥

चौथाई

पांचैं कुंड सो अग्नि कहाई । बहुत जीव तहँ जरहीं भाई ॥
योजन लक्ष है ता गहिराई । पांच लक्षकी है चकराई ॥
करत पुकार तहँ जीव अपारा । यहि अवसर को उहमहिं उबारा ॥
राजा यमपुरी देखि बनाई । कहत न बने रहे शिरनाई ॥
झूठी वचन कहत है जोई । जीभ्या काटिलेत पुनि सोई ॥
झूठी बांह देखाई जो कबही । काटे बांह यम टूंठा करही ॥
झूठी साख भरे जो भाई । विषधर ताके जीभ लगाई ॥

१ अच्छी तरहसे ।

(७८)

अमरसिंह बोध

बिन अपराध मारे जो कोई । बहुत मार तेहि ऊपर होई ॥
स्वपुरुषतजिपरपुरुषसंगजावे । अगिनपुरुष तेहिसंग मिलावे ॥
पुरुष होय नारी कहैं त्यागे । नारी और सो मन जो लागे ॥
अग्निनारि तेहिसंग मिलावैं । यहि विधिजीवनत्रास दिखावैं ॥
एक एकको त्रास दिखावैं । हाथ छूरी ले कण्ठ चलावैं ॥
एक जीवको ठाडे कीना । काग गीधकोहुकमकरि दीना ॥
काग गीध नोचत हैं भाई । भागत फिरे त्रास अधिकाई ॥
जे नर नारी मदिरा पावैं । तत्त तेल पुनि ताहि पिलावैं ॥
संत साधुकी निंदा करई । जूठी साख पंचमें भरई ॥
ताको फल पावत है सोई । सब अँगमें कुछ पुनि होई ॥
ऐसी यमपुरी देखी बनाई । देखत राजा मन पछताई ॥

साखी-देखी राजा यमपुरी, मनमें भये हुशियार ॥
साहेबसो विनती करे, हमको लेउ उबार ॥

चौपाई

नृप अरु दूत पहुँचे तहवाँ । चित्रगुप्तको दरबार रहै जहवाँ ॥
जहाँ बिराजे ज्ञानी सिंहासन । गहे चरण तहाँ नृपति ततक्षण ॥

राजा बचन

तब राय चरण परस्यो आयी । अबकी साहेब लेहु बचाई ॥
यह यम देश कठिन है गांसी । सुरनर सुनि परे यमफांसी ॥

साखी-सुनि कथा जब नरककी, धर्मदासभय मान ॥
सतगुरु सो कहने लगे, औरौ कहहु बयान ॥

सतगुरु बचन-चौपाई

कहैं कवीर सुनो धर्मदासा । नरक वृत्तान्त करौ परकासा ॥
धर्मराय अस बाजी लावा । पाप पुण्य दोउ कीन उपावा ॥

बोधसागर

(७९)

पाप पुण्य रचि जीव फँसाया । जो जस करै सोतस फल पाया ॥
करै पाप तेहि नरक भुगतवैं । करै पुण्य तेहि स्वर्ग पठावैं ॥
कर्महिं भुगुति गरभमें जावै । यहि विधि कालजीव फँदावै ॥
सुनु धर्मदास नरककी बाता । सबही तुमसन कहूं विरुयाता ॥
सकल सुनहु यमपुर इतिहासा । अद्वुत सुनि होय जीव त्रासा ॥
ठीका पुरै जब जिवकी भाई । धर्मराय मन चिन्ता आई ॥
आयसु किंकर गण तब पावैं । हुकुम चित्रगुप्त ताहि सुनावैं ॥
ते जग आवै आयसु पायी । जीवहिं पकरि तहाँ ले जायी ॥
लै जाँहिंसो यम सदन मंझारा । करै ताहि यम सन्मुख ठारा ॥
रवि सुत तहाँ सिहोंसन बैठे । यमगण तहाँ विराजत बैठे ॥
काल सेन तहाँ सबहि विराजै । शास्त्र प्रवर्तक सुनिवर छाजै ॥
धर्मशास्त्र के जे जे करता । सबही देखै जो जिव मरता ॥
व्यास पराशर आदिक सबहीं । पहुँचै यमपुरितनत्यागैतबहीं ॥
ये सब यम सहाय सो करहीं । पाप पुण्यकर लेखा धरहीं ॥
सबहिं मुसाहिब कालके आहीं । निज नैनन हम देखत जाहीं ॥
धर्माधर्म विचारत नीको । सबमिलिन्याय करत करनीको ॥
चित्रगुप्त जब बही सुनावै । धर्म राय कहिके समुझावै ॥
जिन २ पाप किया जग आयी । तिनकर लेखा जब सुनि पायी ॥
ते सुनि दूतन कहत जनायी । यथा योग्य भुगतावहु जायी ॥
जब कोई जीव सुकर्मा आवै । शुचि सुन्दर दूतन तन धावै ॥
रविसुत कहविलसाओ स्वर्गा । अर्थ धर्म अभिमत सुखवर्गा ॥
यही सुकृत जब श्रुतिपथ आही । बहुत समुझायौ हम तुव पाही ॥
साखी पापी मनुषहिं पाइ यम, दूतन कहे रिसाइ ॥
रौरवादिक की यातना, इनाहिं भुगावौ जाइ ॥

(८०)

अमरसिंह बोध

चोपाई

सुनहिं वचन यमगण यमकेरा । त्रास दिखावहिं नरहिं घनेरा ॥
लोह दण्ड सुद्वर हनि कोपै । रौरवादि महाँ तिनही तोपै ॥
यहि विधि यम करहिं विलासा । अब विस्तर ते सुनु धर्मदासा ॥
बहु विधि विद्या जग महाँ पावै । वेद बिचारि जो ब्रह्म समावै ॥
आतम ब्रह्म एक करि जाने । ब्राह्मण सो तेहि वेद बखानै ॥
ऐसे नर कहैं जो कोइ मारै । ब्रह्महत्या तेहि वेद पुकारै ॥
ब्रह्मरूप ब्रह्मविद जाने । तेहि वधन कहैं ब्रह्मवध अनुमानै ॥
जानि ब्रह्म वध पाप कराला । तब दूतन कह यम ततकाला ॥
कुंभीपाक माहि लैडारौ । सुद्वर परिघ मार बहु मारौ ॥
इन रिस करि मारचो महिदेवा । सुनी न मम अनुशासन भेवा ॥
रौरव माँहि गिरावहु घाती । काहू कहै सुनौ नहिं बाती ॥
जो तिय मारै गर्भ गिरावै । तेल यंत्र तनु तासु पिरावै ॥
जिन गुरु हने हने निज स्वामी । छुरा धार ते पीडित नामी ॥
जे विश्वासघात नर करहीं । ते नर कालसूत्र महाँ परहीं ॥
बाल वृद्ध कर हरे जो प्राना । तस तेल महाँ पचत अयाना ॥
परदारा परक्षेत्र जे हरहीं । जे नर परपुर सीम विगरहीं ॥
ते गुरु पाप नरक महाँ पचहीं । हाहाकार शब्द तहाँ मचहीं ॥
चकन ते तिनके तनु छेदैं । सुद्वर परिघ शूल बहु भेदैं ॥
गम्यअगम्य विचार न करहीं । खाज अखाज नहीं चित धरहीं ॥
तिनके तन को करकच छेदैं । बहुत भांति चोचनसों भेदैं ॥
साखी-चोर वृत्ति करि जो जीवै, करै जो परसे द्रोह ॥
झूठ बोलि अरु मद पिवै, पर निन्दा करै जोह ॥
तिन पापिन कहैं यमविकारा । ठौर भयंकर माँझ तेहि डारा ॥
जे नर कन्यादान मँझारी । विघ्न करत रौरव अधिकारी ॥

बोधसागर

(८१)

दान देत लखि भांजी मारै । योग्यअयोग्य जो नाहि उचारे ॥
पर तप मँह कर विघ्न अनेका । नहिं हिय मँह जो करत विवेका ॥
आप छूँछ औरन ब्रत टारै । वेद शास्त्र जिन नाहि उचारे ॥
हरि यश सुनत दहैं मन माहीं । दूसर सुनै तो चित विचलाहीं ॥
तिनकर देह सो कूकर भखहीं । पुनि असिपत्रमांझ दुख भरहीं ॥
एकहु अक्षर गुरुसों सीखै । ताहि न मानै मन कर तीखै ॥
ते परहीं नर रौरव माहीं । बहुविध दुख भुगतहिं सो ताहीं ॥
जे नर हरत दीनके प्रानन । मित्रहि मारत दाहत कानन ॥
तिनहि अँगारन मांझ सुतावैं । यमगण दारुन त्रास दिखावैं ॥
जे गुरुधन हारक संसारा । किम कूप मँह परत निहारा ॥
जौन गुरु व्यभिचारी होई । प्रजहिं दुःख देई नर जोई ॥
शिष्य शंक जो नाहिं मिटावत । प्रजहिं न्याय जो नाहिं चुकावत ॥
युक्त अयुक्त न जानत जोई । करत सपक्ष न्याय शठ कोई ॥
ते नर अंध तामिस्त्र मँझारे । गिरत लखे पावत दुख भारे ॥
विन देखे पर दोष गिनावैं । यम गण तिनके नैन टँकावैं ॥
अप्रिय वचन औरहीं कहहीं । कारण छेददुख ते शठ लहहीं ॥
देव साधु ब्राह्मण धन हरई । तृष्णावश लोभहिं मन धरई ॥
सूचीमुख नरकहिं कर नाऊँ । ते तहैं जाइ वसावैं गाऊँ ॥
जे परतिय अभिलाषत प्रानी । निन्दत सुर गुरु भूसुर जानीं ॥
धर्मशास्त्र तीरथ हरिजन कर । निन्दा करत सुनहु दुख तिनकर ॥
पहिले शूलन पर बैठावैं । मुद्गर शूलनसे करि घावैं ॥
पाछे काक श्वान तेहि खाहीं । छेदहिं दुख सुख हेरत नाहीं ॥
भोगी बहुत काल प्रिय नारी । त्यागत ताहि अधम अविचारी ॥
विनु वैराग ताहिको त्यागे । ताहि त्यागि औरिन मँह पागे ॥
सो शठ नरकमाँहिं दुख पावै । कहँ लग कहौं कहत नहिं आवै ॥
कर पद बाँधि यम सासत देहीं । जो जस किये सो तस फल लेहीं ॥

(८२)

अमरसिंह बोध

सूरज सुत जस आज्ञा देई । दूत उठाय सबै शिर लेई ॥
चित्रगुप्त सो लिखनी लेखै । धर्मराय न्याय तहैं पेखै ॥

सारखी-कै कमाई जो कछू, कभी न निष्फल जाय ॥

सात समुन्दर आडा परै, मिलै अगाऊ धाय ॥

भूमि ताभ्रमय तहां बनाई । तापर अग्नि प्रचण्ड बिछाई ॥
दहकत ज्वाला सो महि कैसी । अति दुस्सह प्रलयगिनि जैसी ॥
तहैं नर जाइ जरत दुख पावैं । यमगण हानि तेहि मांझ जरावैं ॥
तीव्र नख रद शूचीकच केते । पापिन कहैं दुख देहि सब तेते ॥
अति तनु कृश तनु बहु पापी । तहैं दुख पावत जन परितापी ॥
सांकरि बांधि बांधि गज लावैं । अति दृढ सुदूर हानि तेहि ढावैं ॥
दुख लहि जब इतउत नर धावैं । यमगण धरि तिहि माहिं गिरावैं ॥
पुनि निज कृतकर याद करावैं । परिघन हनि बहु त्रास दिखावैं ॥
तस थम्भ बहु ठाड रहावैं । पर तिय गामी ताहि सटावैं ॥
निज पति छोड परपुरुष लुभावैं । सोइ तिया तहैं लाइ मिलावैं ॥
यमगण ताहि मारि भिटावत । कर वचन पुनि ताहि सुनावत ॥
यमके दूत अस कहैं पुकारी । तबतौ तन मन सकल विसारी ॥
प्राण समान चही परनारी । अबकिन भेटेहु रुचि किमि मारी ॥
उन्नत कुच भुजभरि जिमि भेटे । मुख चुम्बन रति करि दुख मेटे ॥
रही जो तव जीवन जग नारी । यह सोइ अपर न करहु विचारी ॥
कलनहिछनजेहि विनतोहि पापी । मिलहु न तिय सँग करत अलापी ॥
यहि विधि यमगण वचन सुनावैं । हनि हनि अधमन खम्भ लगावैं ॥
मद पीवत सँग जे करि प्रीती । मांसहिं खाइ करत अनरीती ॥
तस तैल तेहि मारि पियाई । कहत मदहि पीवहु शठ आई ॥
हाहाकार करै जब सोई । करै विनती सो बहु रोई ॥
ता ऊपर तैलहिं सो डारैं । भीतर बाहर दोऊ विधि जारैं ॥
इतना करैं बहुरि सो आगे । करन शासना सो फिर लागे ॥

बोधसागर

(८३)

असिपत्र बिंपिन महाँ चलहूँ । खायो माँस सोई फल लहहूँ ॥
तहाँ अहँतरु दल अतिही तीखैँ । ऊपर परत कटत तनु दीखैँ ॥
रहत न बने तहाँ पुनि भाजत । करिविलापबहुविधिदुखपावत ॥
करि परघात पाल निज देही । कूटकरमबहु विधिकिय जेही ॥
ते असिपत्र नरक महाँ जावैं । पुनि रकटाइशिर दुख पावैं ॥
एक शिर काटि फेरि होइ आवै । बहुरि कटैं बहुरि है जावै ॥
जे परहिंसक अधम नरेशा । तेलयंत्र तनु पिसत इमेशा ॥
तेल चुराय जो जगमहाँ लेते । यमगण तेहि बहुत दुख देते ॥
तेल चोर कहीं तेल कराही । घृत चोरहिँ घृत माँझ गिराहीं ॥
जेपर दूध मधू दधि हरहीं । ते गण रक्त कुण्ड महाँ परहीं ॥
पाश बाँधि गल तेहि महाँ डारैं । यम गण दारुण त्रास विडारैं ॥
तीरथ चलत जानि फन हरहीं । ते नर रक्त पीब दह परहीं ॥
देव सदन महिसुर गुरुधामा । जे तोडत मन करहिँ अरामा ॥
बन वाटिका पुहम बहु छेदैं । मठ मखं भवन सुरभिधर भेदैं ॥
दीन भवन चटशाल गिरावैं । अस्थिचूर्ण महाँ ते दुख पावैं ॥
पर उपांनत वस्त्र शठ हरहीं । पर भोजन छिपाय जो धरहीं ॥
लोहयंत्र बिच ताहि पिरावैं । बहुविधि तेही दुःख दिखावैं ॥
जे नर घर पुर विपिन जरावत । अग्निकुण्ड तनु तासु गिरावत ॥
जे निज स्वामिहि दोष लगावैं । पर अपवाद प्रीति करि गावैं ॥
तिन कहीं नकं शाल्मली डारै । पाश बाँधि लटकात तरारै ॥
मुद्गर परिघन यमगण मारैं । निर्दय तनक न करूणा धारैं ॥
जो तिरिया परपति रत होई । नाथवती विधवा किन होई ॥
तस लोहमय खम्ब नराकृति । यम वशसे तेहि तिय भेटति ॥
लोह शूल खर तस विशाला । जीभ छेद मुख करत विहाला ॥
इमिदुख लहँहि अधम नरनारी । कहाँ लगिकहाँ सोलेहु विचारी ॥

१ यज्ञशाला । २ गोशाला । ३ जूता ।

चित्रगुप्तसे वार्तालाप

(८४)

अमरसिंह बोध

यहिविधिजोयम शासतिकरई । कहैं लगि कहौं पार नहिं परई ॥
सुनत हाल व्याकुल धर्मदासु । सुख प्रस्वेद नहिं आवै श्वासु ॥
देखि दशा सदगुरु बोले । केहि कारण धर्मनि तुम डोले ॥
धरि धीरज तब धर्मनि भाषा । नरककथासुनिभयमन भाखा ॥

धर्मदास वचन

हो साहेब यम बड विकरारा । केहि विधि हंसा पावे पारा ॥
यही भय मम मन महाँ आवै । चितवत चितव्याकुलहोयजावै

सतगुरु वचन

सुनत वचन प्रभु मन विहँसाये । कही शब्द धर्मनि समुझाये ॥
धर्मनि तुमही भय कलु नाही । सतगुरु शब्द है तुमरे पाही ॥
अपर कथा सुनहु चितधारी । संशय मिटै तो होहु सुखारी ॥
जब राजा विनती ममकीन्हा । तब हम ताहि दिलासा दीन्हा ॥
शब्द गहै सो नाहि डराई । तुम किमिडरहु सुनहु हो राई ॥
सत्य शब्द मम जे जिव पैहैं । काल फांस सो सबै नशैंहैं ॥
सुनत वचन राजा धरु धीरा । बोले वचन काल बलबीरा ॥

चित्रगुप्त वचन

है साहब तुम काह विचारो । नगर हमार उजारन धारो ॥
हो साहब जो तुम अस करहु । न्याय नीति सबही तुम हरहु ॥
सुनो साहेब एक बात हमारी । पंथ तुम्हारा चले संसारी ॥
ताते बिनती करैं बहोरी । सुनो गुसाइयाँ अरनो मोरी ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव अधिकारी । तीनकी आशजगतमहैं भारी ॥
उनको हम नहिं कबहु डरावैं । चूक चाल तो ताहि नचावैं ॥
और जीवकी कौन चलावे । हमते उबरन एको न पावे ॥
सीधि चाल चलुजीव सुजाना । सो जीव देहों लीक पयाना ॥
परंपंच करी साहेबको धावे । हम ते जीव जान नहिं पावे ॥
चाल चलत लागै बडिबारा । ताते नाहीं दोष हमारा ॥

बंकुच्छका वर्णन

बोधसागर

(८५)

सतगुरु वचन

ज्ञानी कहे सुनो जमराई । हमरो हंसा न्यार रहाई ॥
परंपंच तुमरो देखि डराये । जीवघात कबहू नहिं लाये ॥
निशिदिन जीव दया उर धारे । ज्ञान ग्रंथ मन माहिं बिचारे ॥
अहो यमराय जाहु वैकुंठा । राजा विष्णुसों करावहु भेटा ॥

चित्रगुप्त वचन

चित्रगुप्त उठे कर जोरी । साहेब चूक जो बखशो मोरी ॥
तुम हो धनी मैं दास तुम्हारा । अपने दिल हम कीन बिचारा ॥

साखी-इतना कही चलत भये, राजा लीना पास ॥

मध्य चौक ठाडे भये, देख्यो सबको बास ॥

चौपाई

अगिन कौन है इंद्र कुबेरा । दक्षिण दिशा है काल बसेरा ॥
नैऋत कौन सुरनको बासा । पश्चिम देवी कीन निवासा ॥
देव वास वायव है भाई । गण गंधर्व सुनि देव रहाई ॥
उत्तर दिशा भगवान जो होई । निज वैकुंठ कहावैं सोई ॥
कनक भूमि रतननकी पोती । बने वैकुंठ अधिक जग जोती ॥
सकल देव दर्शनको आये । लक्ष्मी सहित बैठे प्रभु राये ॥
राजा साथ हमहूँ चलि गयऊ । देखि विष्णु तब ठाडे भयऊ ॥
डारि सिंहासन बैठक दीना । आज सुफल तुम हमको कीना ॥
भले आय तुम दर्श दिखाये । भूपति लेइ कहाँ तुम लाये ॥

अमरसिंह वचन

ओ भगवान सुनो मम वानी । सेवा तुम्हरी निष्फल जानी ॥
हम एकोत्तर मंदिर बनावा । तामैं मूरति लै पधरावा ॥
साधु राखि मंदिरके मांही । छाजन भोजन दीना ताही ॥
जेता धर्म हम सुने पुराना । विप्रन कहे धरम ठिकाना ॥
सुरभी सोने सींग मढाई । पीतांबर पुनि ताहि ओढाई ॥

(८६)

अमरसिंह बोध

भगवान वचन

यहि विधि गौ एकशत भाई । दइ विप्रनको सुनो प्रभुराई ॥
यहि विधि सेवा कीन तुम्हारी । तहू कर्म तुम हम शिर डारी ॥
सुनु राजा तोहि कहिसमझाऊं । पाप करे कस धरो छिपाऊं ॥
राजालोक कर्म बहु धरहीं । जीव मारिके भक्षण करहीं ॥
तुरी चढ़े बन खेले शिकारा । नाहक मारै जीव बिचारा ॥
मारे जीव तुमहु सुनाई । इतनो पाप कहां धरो छिपाई ॥

साखी-चार खानमें भरमहु, कीनो कर्म अपार ॥

विष्णु कहै राजा सुनो, कैसे होइ उबार ॥

चौपाई

सतगुरु ऐसी जुगति बनाई । लीला करी एक तेहि ठाई ॥
नृप शिर हाथ धरचोतेहिवारी । निकसे कागमुखमांहिअपारी ॥
बहुत काग जरे उद्र मंझारा । बहुतक भये पिंडते न्यारा ॥
लखि भगवान रहे शरमाई । फेर बात ना बोले भाई ॥
ततखन हमहूँ चले रिगाई । पहुँचे मानसरोवर जाई ॥
कामिनि शोभा बहुत अपारा । राजापरचो तब चरण मँझारा ॥
दयावंत भल लोक दिखाई । जुत्थजुत्थकामिनिअधिकाई ॥
करे ध्यान पुरुषको जहयँ । चारभानुकी शोभा जहवाँ ॥
झलके अंगकामिनिके भाई । रैन दिवस तहांजानि न जाई ॥
सिंहासन एकधर्यो तेहि ठाई । चंद्रअंश तहां बैठक पाई ॥
भाव प्रीति साहेब सो कीना । भले ज्ञानी तुम दरशन दीना ॥
बैठे एक सिंहासन दोई । राजा संग इत पुनि सोई ॥
अहो अंश दया अब होई । राजाकूँ ले जाओ सोई ॥
चन्द्रअंश तब शीश नवाई । आतुर हम तब चले रिगाई ॥
ले राजा तब शरीर समाया । भूपति बेगि उठे अकुलाया ॥
तबही राजा शीश नवाई । हमको तारो बेग गुसाई ॥